शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

तुम्हीं सो गए दास्ताँ कहते-कहते


मीडिया का एवरेस्ट कहे और माने जानेवाले जनसत्ता के संस्थापक संपादक प्रभाष जोशी नहीं रहे. लेकिन वे इस तरह खामोशी से जा भी कैसे सकते हैं? अभी जो महफ़िल जवान हुई थी, अभी तो उन्हें बहुत कुछ सुनाना था और हमें बहुत कुछ सुनना. लेकिन यह सच है और सबसे कड़वा सच कि वे चुपके से महफ़िल को तनहा छोड़कर खिसक लिए हैं.अब कल का कोई नौसिखिया पत्रकार चाहे उन्हें जितनी भी गालियाँ दे या जो चाहे आरोप लगा ले वह अदम्य इच्छाशक्तिवाला नरमदिल पत्रकार अब कोई जवाब नहीं देगा, नहीं करेगा प्रतिवाद. इतिहास गवाह है कि भारत की इस पुण्यभूमि पर सीता को भी आरोपित होना पड़ा था. फ़िर प्रभाष जी तो हाड़-मांस के बने हमारी ही तरह एक इंसान मात्र थे.प्रभाषजी से पहले भी हिन्दी पत्रकारिता थी. पढने-लिखनेवाले लोग थे. लेकिन हमारे बिहार में एक कहावत खूब कही और सुनी जाती है-लीके-लीक गाड़ी चले, लीके चले कपूत; लीक छाड़ी के तीन चले सिंह, शायर, सपूत.और प्रभाषजी भी सपूत थे, मां-बाप के और भारत माता के भी. फ़िर उन्हें कहाँ पत्रकारिता के क्षेत्र में पहले से चली आ रही परंपरा का पालन भर करना मंजूर होता.१९८३ में उनके संपादन में इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप ने जनसत्ता अख़बार शुरू किया. अब तक सरकार या नेता/अधिकारी जो कहते अखबारवाले आंख मूंदकर उस पर विश्वास कर लेते और जनता भी वही पढने और उसे ही सत्य मानने को बाध्य थी. प्रभाषजी को यह मंजूर नहीं था. फलस्वरूप हिन्दी पत्रकारिता जगत में जन्म हुआ एक नयी प्रवृत्ति का जिसे हम खोजी पत्रकारिता कहते हैं. टीवी की दुनिया में बहुचर्चित स्टिंग ऑपरेशन इसी का विकसित रूप है. प्रभाषजी की पत्रकारिता जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता थी. उन्होंने अपने पूरे कैरिएर में बाजार और बाजारवाद को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया. उनके जैसा कलमकार शायद ही निकट भविष्य में फ़िर से हिन्दी पत्रकारिता जगत में जन्म ले. जो भी उनके संपर्क में आया उसे उनका भरपूर स्नेह मिला, भले ही वह सुपात्र रहे हों या कुपात्र. प्रभाषजी क्रिकेट के अनन्य प्रशंसक थे.दुर्भाग्यवश क्रिकेट से उनका यह लगाव ही उनके लिए जानलेवा बन गया. होनी को भला कौन टाल सकता है? एक पत्रकार और उससे भी ज्यादा एक पाठक होने के नाते हम उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हुए भरी आखों और भरे दिल से बस यही कह सकते हैं-हम तो बेताव थे बहुत-कुछ सुनने के लिए, तुम्हीं सो गए दास्ताँ कहते-कहते.

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

भाई साहब मैं एक सजग पाठक हूँ और मैंने प्रभाषजी के दर्जनों लेख पढ़े हैं. उनके जाने से देश को जो क्षति हुई है उसकी कोइ भरपाई नहीं कर सकता.
रमेश अहलुवालिया,जालंधर

dhiraj ने कहा…

Bahut achchha likhaa hai aapne.Prabhash Ji kaa jana kisi sadme se kam nahi