गुरुवार, 29 जनवरी 2015

किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल,एक आलोचनात्मक विश्लेषण

29 जनवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अब दिल्ली के मतदान में कुछ ही दिन शेष रह गए हैं। दिल्ली में ऐसा पहली बार हुआ है कि यहाँ की सभी तीनों प्रमुख पार्टियों ने अपने-अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि दिल्ली पिछले 800 सालों से भारत की राजधानी है,भारत का दिल बनी हुई है ऐसे में दिल्ली पर कब्जे का मतलब सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं हो सकता।
मित्रों,लगभग सारे विश्लेषक यह मानकर चल रहे हैं कि इस बार दिल्ली में मुख्य मुकाबला भाजपा और आप पार्टी के बीच है। यह कहीं-न-कहीं आश्चर्यजनक है क्योंकि जो पार्टी दिल्ली को अपने हाल पर छोड़कर बनारस भाग गई थी वही पार्टी कैसे टक्कर में हो सकती है! फिर भी जो है सो है। ऐसा तो हमारे साथ अक्सर ही होता है कि हम जो चाहते हैं वैसा होता नहीं है। हम चौथे स्तंभ हैं और हम तो इसके साथ-साथ कि क्या हो रहा है बस यही बता सकते हैं कि क्या होना चाहिए। बस यही तो हमारे वश में है।
मित्रों,पिछले कई दिनों से जबसे किरण बेदी जी को भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है मीडिया किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल तथा भाजपा और आप पार्टी की तुलना करने में जुटी हुई है। मैं समझता हूँ कि दोनों दो तरह के मिजाज वाले लोग हैं इसलिए इन दोनों की तुलना हो ही नहीं सकती फिर भी जबकि दोनों आमने-सामने हैं तो तुलना तो करनी ही पड़ेगी।
मित्रों,पहले अरविंद केजरीवाल की कथनी,करनी और शख्सियत पर विचार करते हैं। अरविंद को भी किरण बेदी की ही तरह रमन मैग्सेसे पुरस्कार मिल चुका है। अरविंद विवाद पुरूष हैं क्योंकि उनको जानबूझकर विवादों में रहने में मजा आता है इसलिए वे लगातार विवादित बयान देते रहते हैं,अंट-शंट बकते रहते हैं। अरविंद आरोप लगाने में मास्टर हैं लेकिन आज तक अपने किसी भी आरोप को साबित नहीं कर पाए हैं। अरविंद में एक और कमी यह है कि जब उनके ऊपर आरोप लगता है तो वे चुप्पी साध जाते हैं,न तो खंडन करते हैं और न ही मंडन। झूठ बोलने में उनको मास्टरी है। किसी के बारे में भी कुछ भी बोल दिया और जब प्रमाण मांगा गया तो कह दिया कि हमने तो आरोप लगा दिए हैं अब ये सही हैं या गलत जनता समझेगी। अरविंद चंदा किंग हैं और उनको भारतमाता के कट्टर दुश्मनों से भी चंदा लेने में कोई आपत्ति नहीं है। अरविंद कभी भी अपने किसी भी पुराने कथन पर कायम नहीं रह पाए हैं। बोलते हैं कि हम तो आम आदमी हैं जी हमें वीवीआईपी ट्रीटमेंट नहीं चाहिए लेकिन साथ ही वीवीआईपी पास की भी ईच्छा रखते हैं। अरविंद सर्वेवीर हैं। उनके पास सर्वक्षकों की एक बेहतरीन टीम है जो पहले से ही सर्वेक्षण के निष्कर्ष निर्धारित कर लेते हैं और पीछे सर्वेक्षण करते हैं। जैसे-हमने पता लगाया है जी कि हमारे 49 दिनों के शासन में भ्रष्टाचार काफी कम हो गया था,हमने सर्वे करवाया है जी कि हम 55 सीटों पर चुनाव जीतने जा रहे हैं,हमने यह सर्वे करवाया है जी,वह सर्वे करवाया है जी। अरविंद जी धरातल पर चाहे काम करें या न करें सर्वे बहुत करवाते हैं। अरविंद जी ने मीडिया में भी अच्छे दोस्त बना रखे हैं जो उनके आगे-पीछे भगत सिंह की तस्वीरें लगाकर लगातार उनको क्रांतिकारी साबित करने में जुटी रहती है। उनके क्रांतिकारी मीडिया-मित्र भी लगातार सर्वे करवाते हैं और गजब के सर्वे करवाते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले एबीपी न्यूज कह रहा था कि दिल्ली में सरकार तो भाजपा की बनेगी लेकिन दिल्ली के लोग मुख्यमंत्री के रूप में तो अरविंद को ही देखना चाहते हैं। यानि सरकार तो भाजपा की बनेगी लेकिन मुख्यमंत्री तो अरविंद केजरीवाल ही होंगे। कुल मिलाकर अरविंद केजरीवाल मीडियाप्रेमी हैं,ब्लोअर की हवा हैं,परले दर्जे के हवाबाज हैं। आजतक उन्होंने सिर्फ बोला ही है किया कुछ भी नहीं है और अभी भी वे ऐसा ही करते दिख रहे हैं। मुख्यमंत्री बनकर वे बहुतकुछ कर सकते थे लेकिन उन्होंने खुद कोई काम नहीं किया सिर्फ केंद्र सरकार या विपक्ष के खिलाफ बयान देते रहे या फिर केंद्र और संसद-संविधान के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करते रहे। उनकी पार्टी में एक-से-एक कश्मीर के स्वतंत्रता-प्रेमी और राष्ट्रविरोधी तत्त्व भरे पड़े हैं।
मित्रों,अब आते है किरण बेदी जी पर। किरण बेदी ने जब जो कहा है वही किया है। किरण जी ने कभी किसी के ऊपर भी झूठे आरोप नहीं लगाए हैं न ही किरण जी अपनी झूठी प्रशंसा ही पसंद करती हैं। तभी तो महान क्रांतिकारी पत्रकार रवीश कुमार को उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गाड़ी नहीं उठवाई थी। किरण जी कर्मठ हैं,कर्त्तव्यनिष्ठ हैं,अनुशासनप्रिय हैं और देशभक्त हैं। किरण जी के पास एक पूरा खाका है,पूरी योजना है कि दिल्ली का मुख्यमंत्री बनकर वे कैसे दिल्ली के लिए काम करेंगी और दिल्ली का विकास करेंगी जो कि केजरीवाल के पास नहीं है। किरण जी ने अपने 40 साल के प्रशासनिक जीवन के द्वारा पहले ही यह साबित कर दिया है कि उनके पास अच्छा शासन व प्रशासन देने की भरपुर योग्यता है। किरण जी ने नौकरी के दौरान कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि किरण जी उस पुलिस का हिस्सा थीं जिसको हमारे देश में सर्वाधिक भ्रष्ट विभाग का खिताब अता किया जाता है और फिर भी वे निष्कलंक हैं। फिर वे जिस पार्टी का हिस्सा हैं वह घोर राष्ट्रवादी पार्टी है,राष्ट्रभक्तों की पार्टी है। हाँ,मैंने पिछले तीन-चार दिनों में गौर किया है कि किरण जी में कुछ कमियाँ भी हैं। किरण जी पत्रकारों को देखकर घबरा जाती हैं और ठीक से जवाब नहीं दे पातीं जबकि उनको ऐसा नहीं करना चाहिए। किरण जी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रेरणा लेनी चाहिए जिन्होंने लोकसभा चुनावों के दौरान अपने घोर विचारधारात्मक शत्रु चैनल एबीपी पर धमाकेदार साक्षात्कार देकर तहलका मचा दिया था। जहाँ तक दो-2 वोटर आईकार्ड होने का सवाल है तो मेरे पास भी दो-दो हैं जिनमें से एक का अब मैं कहीं भी इस्तेमाल नहीं करता। मैं भी चाहता हूँ कि एक को रद्द करवा दूँ लेकिन लालफीताशाही और दफ्तरों की बेवजह की दौड़ लगाने से भागता हूँ। अगर ऐसा करना अपराध है तो मैं भी अपराधी हूँ लेकिन क्या ऐसा नहीं होना चाहिए कि बीएलओ जाँच करके खुद ही एक को रद्द कर दे। फिर दिल्ली में तो कम-से-कम 22% वोटर आई कार्ड फर्जी हैं,एक ही फोटो पर 15-पन्द्रह आई कार्ड बने हुए हैं तो क्या इसमें भी उस तस्वीर वाले या वोटर की ही गलती है। मेरी 70 वर्षीय माँ की उम्र वोटर आईकार्ड में 98 साल दर्ज कर दी गई है,मेरे गाँव के कई पुरुषों के वोटर आईकार्ड में महिलाओं की और कई महिलाओं के वोटर आईकार्ड में पुरुषों की तस्वीरें दर्ज है,इसमें किसकी गलती है? हमारे हाजीपुर में लोग पिछले 20 सालों से रह रहे हैं और बार-बार मतदाता सूची में नाम दर्ज करने के लिए आवेदन देते हैं फिर भी उनका नाम दर्ज नहीं किया जाता,इसमें किसकी गलती है?
मित्रों,तो यह था अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी की कथनी,करनी और शख्सियत का आलोचनात्मक विश्लेषण। अब यह आप दिल्लीवासियों पर निर्भर करता है आप किसको चुनते हैं। झूठ और अराजकता को या सत्य और सृजनात्मकता को? विवादपुरुष को या विकासस्त्री को? रायता को या विकास को? राष्ट्रविरोधी को या राष्ट्रभक्त को? निर्णय आपके अपने हाथों में है। आप ही अपनी दिल्ली के भाग्यनिर्माता हैं। क्या आप वर्ष 2013 में अपने द्वारा की गई गलती को दोहराना चाहेंगे?

(हाजीपुर टाईम्स पर प्रकाशित)

2 टिप्‍पणियां:

अजय कुमार झा ने कहा…

सामयिक और सटीक विश्लेषण किया ब्र्रज भाई , हालांकि दिल्ली के विधानसभा चुनाव कई विशेष कारणों से बिल्कुल अलग हैं

AJIT NEHRA ने कहा…

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