सोमवार, 13 अप्रैल 2015

नमो की शॉल और प्रेस्टीच्यूट्स

मित्रों, पिछले कुछ दिनों से इंटरनेट पर जनरल वीके सिंह द्वारा मीडिया के एक हिस्से को प्रेस्टीच्यूट्स कहे जाने का विवाद छाया हुआ है। भारतीय मीडिया का एक हिस्सा इस बात को लेकर मुँह फुलाये बैठा है कि उनकी तुलना प्रौस्टीच्यूट्स यानि वेश्याओं के साथ क्यों कर दी गई। जाहिर है कि जनरल साहब को ऐसा नहीं करना चाहिए था बल्कि बिकाऊ मीडिया की तुलना तो किसी जानवर के साथ करनी चाहिए थी।
मित्रों,वेश्या तो सिर्फ शरीर का सौदा करती हैं यह बिकाऊ मीडिया तो रोजाना अपने ईमान का सौदा करती है। इनकी हालत तो कुत्तों जैसी है जो रोटी को देखते ही मुँह से लार टपकाने लगते हैं। इन प्रेस्टीच्यूट्स की आमदनी का आप हिसाब ही नहीं लगा सकते हैं। इनका वेतन होता तो हजारों और लाखों में होता है लेकिन इनकी वास्तविक आय करोड़ों में होती है। वरना क्या कारण है कि किसी पत्रकार के पास दिल्ली में करोड़ों की कोठी है तो किसी के पास नोएडा में अपना मॉल है?
मित्रों,अभी जब भारत के पीएम नरेंद्र मोदी फ्रांस गए थे तो उन्होंने एक शॉल ओढ़ रखी थी जिस पर कथित रूप से N M लिखा हुआ था।

https://twitter.com/sagarikaghose/status/587161033845800960

महान पत्रकार सागरिका घोष ने बिना सोंचे-समझे,बिना किसी प्रमाण के नमो पर यह आरोप लगा दिया कि उनके द्वारा ओढ़ी गई यह शॉल लुईस व्हिटन कंपनी द्वारा बनाई गई थी जबकि लुईस व्हिटन का कहना है कि वो ऐसे शॉल तो बनाती ही नहीं है।

https://twitter.com/search?q=sagrika%20ghose&src=tyah

इसी तरह बिकाऊ मीडिया ने नरेंद्र मोदी के शूट को लेकर भी अफवाह उड़ाई थी और बाद में बिना विलंब किए माफी भी मांग ली थी। लोकसभा चुनावों के समय इसी बिकाऊ मीडिया का एक चैनल एक नेता को जबर्दस्ती क्रांतिकारी,बहुत ही क्रांतिकारी साबित करने पर तुला हुआ था। हद है बेहयाई की कि पहले कुछ भी बोल दीजिए और जब वह झूठ साबित हो जाए तो बेरूखी के साथ माफी मांग लीजिए।

https://twitter.com/sagarikaghose/status/587189427065135104

मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि कांग्रेस-राज में जमकर मलाई चाभनेवाली बिकाऊ मीडिया ने बार-बार की फजीहत के बाद भी हार नहीं मानी है और अभी भी बेवजह के विवाद पैदा करने की कोशिश करती रहती है। आपको याद होगा कि मनमोहन सिंह की सरकार ने इस दलाल मीडिया का वर्चस्व इस कदर बढ़ा हुआ था कि नीरा राडिया और बरखा दत्त मंत्रियों की सूची तक बनाने में दखल रखते थे और नरेंद्र मोदी की सरकार आते ही इनलोगों के ऐसे बुरे दिन आ गए कि अब जब पीएम विदेश जाते हैं तो इन लोगों को अपनी जेब से भाड़ा लगाकर समाचार कवर करने जाना पड़ता है। ऐसे लोगों का देशहित से भी पहले भी कुछ भी लेना-देना नहीं था और आज भी नहीं है बल्कि इनके लिए तो अपना स्वार्थ ही सबकुछ है। इस बिकाऊ मीडिया को आज भी इस बात का भ्रम है कि वह जो कुछ भी कह या दिखा देगी देश की जनता उसको आँखें बंद करके सच मान लेगा। जबकि सच्चाई तो यह है कि आज की सबसे शक्तिशाली मीडिया न तो प्रिंट मीडिया है और न ही इलेक्ट्रानिक मीडिया बल्कि सोशल मीडिया है। एक ऐसा प्लेटफॉर्म जहाँ न तो कोई बड़ा है और न ही कोई छोटा,सब बराबर हैं। एक ऐसा पात्र है जो पलभर में दूध को दूध और पानी को पानी कर देता है। इसलिए अच्छा हो कि प्रेस्टीच्यूट्स जल्दी ही सही रास्ते पर आ जाएँ और फिजूल की अफवाहें फैलाना बंद कर दे नहीं तो यकीनन उनकी हालत ऐसी हो जाएगी कि वे सच भी बोलेंगे तो लोग उसे झूठ समझेंगे। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

1 टिप्पणी:

N A Vadhiya ने कहा…

Nice Article sir, Keep Going on... I am really impressed by read this. Thanks for sharing with us.. Happy Independence Day 2015, Latest Government Jobs.Top 10 Website