शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

राहुल गाँधी की कृत्रिम बुद्धि और हस्तिनापुर

मित्रों, एक समय था जब पूरे भारत पर हस्तिनापुर का शासन था. लेकिन तभी वहां धृतराष्ट्र नामक अंधे को राजा बना दिया गया. जाहिर है कि वो सर्वथा अयोग्य था. आश्चर्य कि वहां की जनता ने भी मनांध की तरह आँख मूंदकर राजपरिवार के इस फैसले को मान लिया और परिणाम यह हुआ कि हस्तिनापुर का बहुत जल्दी पतन हो गया.
मित्रों, दूसरी ओर मगध अपेक्षाकृत एक कमजोर और छोटा राज्य था. लेकिन वहां की जनता ने कभी राजा के कमजोर और अयोग्य पुत्र को राजा के रूप में स्वीकार नहीं किया. बार-बार जनविद्रोह होता रहा, वंश बदलता रहा लेकिन मगध का विस्तार होता गया और एक समय ऐसा भी आया जब पूरे भारत पर मगध का ध्वज लहराता था.
मित्रों, इस समय कांग्रेस पार्टी की स्थिति हस्तिनापुर जैसी है. युवराज निहायत अयोग्य हैं कदाचित दुर्योधन से भी ज्यादा लेकिन पार्टी हस्तिनापुर की जनता की तरह अडी हुई है कि हमें तो यही नेता चाहिए और कोई चाहिए ही नहीं. परिणाम सबके सामने है.
मित्रों, अभी पिछले महीने पता चला कि राहुल जी अमेरिका में कृत्रिम बुद्धि पर कुछ बोलनेवाले हैं. यकीन मानिये हँसते-हँसते अंतड़ियों में दर्द होने लगा. जिसकी खुद की बुद्धि कृत्रिम है वो कृत्रिम बुद्धि पर व्याख्यान देगा? आपने पिछले दिनों देखा भी होगा कि राहुल जी अमेरिका में क्या-क्या बोले जा रहे हैं. मैं मानता हूँ कि इस समय उनके सैम अंकल सैम पित्रोदा अपनी जिंदगी के सबसे कठिन मिशन पर हैं मिशन टोटली इम्पॉसिबल पर. घोडा सुस्त हो तो उसको तेज बनाया जा सकता है लेकिन गधे को घोडा कदापि नहीं बनाया जा सकता.
मित्रों, अब हम आते हैं राहुल गाँधी के अमेरिका के वर्तमान दौरे पर. वैसे मुझे नहीं पता कि इस समय उनका भाषण लिख कौन रहा है. वो जो बोल रहे हैं निश्चित रूप से वे उनके शब्द तो नहीं हैं. चलिए हंसी को दबाने का प्रयास करते हुए एक नजर डालते हैं. राहुल गाँधी फरमाते हैं भारत असहिष्णु हो गया है, भारत वंशवाद से ही चल रहा है, मैं भारत का प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हूँ, दुनियाभर में भारत की प्रतिष्ठा लगातार कम हो रही है, भारत की वर्तमान सरकार की आर्थिक नीति सही नहीं है बल्कि चीन की सही है, भारतीय लोकसभा में ५४६ सदस्य हैं, भारत को एनआरआई ने आजाद कराया था और कांग्रेस एनआरआई द्वारा स्थापित और संचालित एनआरआई पार्टी है, सिर्फ बेरोजगारी की वजह से कांग्रेस चुनाव हार गयी, कांग्रेस को घमंड हो गया था इत्यादि.
मित्रों, आप ही बताईए क्या आप अपनी हंसी रोक पा रहे हैं? चाहे कोई भारत में बेवकूफी करे या अमेरिका जाकर करे कहलाएगी तो बेवकूफी ही. (वैसे अगर उनकी अमेरिकी यात्रा का मुख्य उद्देश्य प्रसिद्ध पोर्न अभिनेत्री के साथ रात बिताते हुए विशेष तकनीकी ज्ञान प्राप्त करना था तब जरूर उनकी अमेरिकी यात्रा उम्मीद से बढ़कर सफल रही है.)  ऊपर से गजब यह कि कांग्रेस बहुत जल्दी इनको अपना अध्यक्ष बनाने जा रही है. बढ़िया है हस्तिनापुर वालों बढ़िया है. हमें तो देशहित से मतलब है और तुम्हारा यह कदम निश्चित रूप से देशहित में होगा. महान मगध की जय, भारतमाता की जय.

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

किसानों के साथ योगी सरकार का मजाक

मित्रों, यह बात किसी से छिपी नहीं है कि आजादी के बाद से अगर कोई व्यवसाय सबसे ज्यादा घाटे में रहा है तो वो है कृषि. कहने को तो किसान अन्नदाता है और पूरे देश का पेट भरते हैं लेकिन उनके खुद के हाथ बारहों मास खाली रहते हैं. अगर आप महंगाई के आंकड़े देखेंगे को पाएंगे कि सबसे कम तेजी से अनाजों के दाम बढ़ते हैं. दूसरी चीजों के दाम आसमान को छू जाएं तो कोई चर्चा नहीं होती लेकिन आलू-प्याज-टमाटर थोड़े से महंगे हो जाएँ तो मीडिया आसमान को सर पे उठा लेती है. मानों किसानों ने लगातार घाटा उठाकर दूसरों का पेट भरने का ठेका ले रखा हो.
मित्रों, अनाज-दाल-सब्जियों की खेती करनेवाले किसानों को आजादी के बाद से ही लगातार वादों का सब्जबाग दिखाया गया लेकिन हुआ कुछ नहीं. अंग्रेजों के समय कम-से-कम उनकी स्थिति इतनी बुरी तो नहीं थी कि उनको आत्महत्या करनी पड़े? वर्तमान केंद्र सरकार भी कहती है कि २०२२ तक किसानों की आय दोगुनी कर दी जाएगी मगर इस दिशा में अभी तक कोई काम होता हुआ दिख नहीं रहा है. पता नहीं रातों रात सरकार ऐसा चमत्कार कैसे कर देगी?
मित्रों, यूपी विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा ने वादा किया था कि जीतने के बाद वो किसानों के कर्ज माफ़ करेगी लेकिन अब लगता है कि किसानों को फिर से उसी तरह से ठगा गया है जिस तरह से पिछली अखिलेश सरकार ने ७५ पैसे और ५ रूपये का चेक देकर ठगा था. कितना बड़ा मजाक है लोन डेढ़ लाख का माफ़ी का चेक १ रूपया और १०० रूपये का? इससे ज्यादा पैसे तो बैंक आने-जाने में ही खर्च हो जाएंगे? फिर क्यों किया कर्ज माफ़? सरकार ने किसानों को भिखारी समझा है क्या जो उनके कटोरे में ५० पैसे और एक रूपये डाल रही है? बतौर अलफांसों जी क्या किसान इतने पैसों के बिना मरे जा रहे थे?
मित्रों, मैं हमेशा से ऐसी कर्ज माफ़ी के खिलाफ रहा हूँ. वास्तव में इससे देश का तो कोई भला नहीं ही होता है किसानों को भी सिर्फ तात्कालिक फायदा होता है. अच्छा हो कि ऐसे इंतजाम किए जाएँ कि किसान भिखारी के बदले वास्तविक दाता बन सकें. मैं तो उस दिन की कल्पना करके डरता रहता हूँ जिस दिन हमारे देश के किसान हड़ताल कर देंगे? क्या आपने कभी सोंचा है कि अगर ऐसा हुआ तो देश की हालत क्या होगी?

रविवार, 17 सितंबर 2017

हैप्पी बर्थ डे मोदीजी

मित्रों, कहते हैं कि भगवान जो भी करता है उसके पीछे कोई न कोई कारण होता है वैसे उनकी कृपा जरूर अहैतुकी होती है. शायद इसलिए हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री और भगवान विश्वकर्मा का जन्मदिन एक ही दिन पड़ता है. एक देवताओं का शिल्पी और दूसरा नए भारत का निर्माता. दोनों ही निःस्वार्थ और दोनों ही निराभिमानी.
मित्रों, आप कहेंगे कि मोदीजी का जन्मदिन तो हर साल आता है फिर इस बार बधाई क्यों. तो इसका उत्तर देने से पहले मैं आपसे एक प्रतिप्रश्न करना चाहूँगा और आपको साढ़े ३ साल पहले के भारत और साढ़े ३ साल पहले की दुनिया में ले जाना चाहूँगा. साढ़े तीन साल पहले भारत की स्थिति कैसी थी आपको याद है? रोज-रोज तत्कालीन संघ सरकार के नए-नए घोटाले सामने आ रहे थे. तीनों लोकों में ऐसा कोई विभाग नहीं बचा था जिसमें घोटाला नहीं किया गया हो.  देश के विकास के लिए सरकार के एजेंडे में कोई स्थान ही नहीं था और लगता था जैसे एकमात्र लूटने-खसोटने के उद्देश्य से ही सरकार का गठन किया गया था. लोग राजनीतिज्ञों से इस कदर निराश हो चुके थे कि कानों में उनके नाम पड़ते ही चेहरे पर स्वतः घृणा के भाव आ जाते थे. वैश्विक परिदृश्य में भारत को कोने में धकेल दिया गया था. यहाँ तक कि पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने हमारे कथित प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हरदम रोनेवाली देहाती महिला घोषित कर रखा था.
मित्रों, अब आते हैं आज के परिदृश्य पर. आज भारत में चतुर्दिक जोश का माहौल है, सरकार के प्रति विश्वास का वातावरण है. ईमानदार खुश हैं और बेईमान परेशान. नोटबंदी और जीएसटी के चलते अर्थव्यवस्था की रफ़्तार कुछ घटी जरूर है लेकिन भविष्य के लिए नई उडान की असीम संभावना भी बनी है. भारत के वे सारे पडोसी जो भारत का अहित चाहते थेभारत की बढती ताकत से परेशान है. पूरे संसार को प्रकम्पित कर देनेवाला ड्रैगन आज भयभीत और शर्मिंदा है. आतंकियों को अब बिरयानी नहीं दिया जाता बल्कि सीधे नरक भेज दिया जाता है. आज पूरी दुनिया हर मानवीय संकट में भारत की तरफ आशाभरी दृष्टि से देख रही है. आज भारत की आवाज दुनिया की सबसे सशक्त आवाज है.
मित्रों, कुल मिलाकर नरेन्द्र मोदी जी ने अपने कार्यों से जनता के मन में राजनीतिज्ञों के प्रति जो घृणा का भाव था उसको न केवल कम किया है बल्कि जनता के मन में अपने प्रति श्रद्धा उत्पन्न की है. वैसे मेरे जैसे निर्धन के पास ऐसा कुछ नहीं है शाब्दिक उद्गारों  के अलावा जो मैं उनको उनके ६७वें जन्मदिन पर भेंट कर सकूं. उल्टे अपने प्रधान सेवक से यह छोटा सेवक रिटर्न गिफ्ट की अपेक्षा रखता है. मेरी उनसे दो मांगें हैं-१. बैंकों में जो न्यूनतम जमा रखने का नियम रखा गया है उसको आय के आधार पर दो श्रेणियों में बाँट दिया जाए. जो लोग आय कर देते हैं उनके लिए तो हजार-दो हजार की सीमा रखी जाए लेकिन जिनकी आय आय कर के दायरे में नहीं आती उनके लिए शून्य बैलेंस को मंजूरी दी जाए. २. पेट्रोल और डीजल की कीमत के सम्बन्ध में सरकार स्थिति स्पष्ट करे. अगर वास्तविक कर-संग्रह में गिरावट के चलते ऐसा करना अनिवार्य है तो पीएम को इसके लिए सीधे जनता से बात करनी चाहिए और जनता-जनार्दन का आह्वान करना चाहिए. इसके साथ ही मोदी जी से अनुरोध करूंगा कि अल्फ़ान्सो जी की दिग्विजयी (मेरा मतलब दिग्विजय सिंह से है) जुबान पर शीघ्रातिशीघ्र ताला लगाएं.
मित्रों, अंत में मैं मोदी जी को उनके जन्मदिन पर बहुत-बहुत बधाई देते हुए ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि उनका स्वास्थ्य हमेशा उत्तम रहे और उनको देश निर्माण की दिशा में लगातार सफलता-दर-सफलता मिलती रहे.

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

मालदा से जयपुर वाया पंचकुला

मित्रों,  कार्ल मार्क्स ने कहा था कि "Religion is the sigh of the oppressed creature, the heart of a heartless world, and the soul of soulless conditions. It is the opium of the people". यानि संप्रदाय अफीम है. यह बात अलग है कि हमारे देश के मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों ने इसको धर्म अफीम है बना डाला जबकि धर्म का मतलब ड्यूटी होता है संप्रदाय नहीं. चूंकि हिन्दू धर्म है संप्रदाय नहीं शायद इसलिए मार्क्सवादियों को ऐसी शरारत करनी पड़ी.  अब चूंकि हिन्दू धर्म है अर्थात नैतिक नियमों का महासागर है इसलिए इसमें कट्टरता का नामोनिशान नहीं है. हमारे किसी भी शास्त्र या पुस्तक में यह नहीं लिखा है कि जो अहिंदू हैं उनसे नफरत करो, लूट लो, उनके साथ बलात्कार करो या उनको मार डालो या उनको बंदी बना लो. बल्कि दुनिया में हमीं ऐसे अकेले हैं जो कहते हैं कि तू वसुधैव कुटुम्बकम या सर्वे भवन्तु सुखिनः या ब्रह्मास्मि तत त्वमसि.
मित्रों, यही कारण है कि जब १९४७ में भारत का संप्रदाय के आधार पर बंटवारा हुआ तो बड़ी संख्या में मुसलमानों ने नए मुस्लिम देश पाकिस्तान जाने के बदले हिंदुस्तान में हिन्दुओं के बीच रहना बेहतर समझा. यह आबादी इतनी बड़ी थी कि आज पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान भारत रहते हैं. फिर आया १९७१. भारत को बेवजह पाकिस्तान से युद्ध करना पड़ा. युद्ध के दौरान भारी संख्या में बंगलादेशी भागकर भारत आ गए. इनमें से भी ९० प्रतिशत से ज्यादा मुस्लमान थे. इनकी आबादी इतनी तेजी से बढ़ी कि भारत के कई राज्यों और महानगरों में ये कानून और व्यवस्था के लिए समस्या बन गए. सबसे बड़ी बात यह थी कि ये आसानी से स्थानीय मुस्लिम आबादी से घुल-मिल गए और वैश्विक इस्लामिक भाईचारा का हिस्सा बन गए. कथित धर्मनिरपेक्ष दलों के तुष्टिकरण ने दुनिया के इस सबसे कट्टर और हिंसक संप्रदाय के साहस को इतना बढाया कि इन्होंने पहले १९९३ में मुम्बई में एक साथ दर्जनों स्थानों पर बम विस्फोट कर हजारों लोगों की हत्या कर दी फिर २००२ में ट्रेन में आग लगाकर कई दर्जन हिन्दू तीर्थयात्रियों को सिर्फ इसलिए जिंदा जला दिया क्योंकि वे हिन्दू थे.
मित्रों, पिछले कुछ महीनों से जबसे संघ में मोदी सरकार आई है सुभाष और विवेकानंद की धरती पश्चिम बंगाल के मुसलमानों का जेहादी खून हिलोरे मारने लगा है. मालदा से शुरू हुई आगजनी, लूटपाट और दंगे पूरे बंगाल में फ़ैल रहे हैं और वो भी प्रशासनिक संरक्षण में. उधर म्यामार में हिंसा हो रही है तो वहां के मुसलमान भी भारत आ रहे हैं लेकिन सवाल उठता है कि बंगाल या भारत के अन्य हिस्सों से जिन हिन्दुओं को भगाया जा रहा है वे भाग कर किस देश में जाएंगे? मुसलमानों के तो ५६ देश हैं हिन्दुओं का कोई दूसरा देश तो है नहीं. नेपाल है भी तो बहुत छोटा है.
मित्रों, इस बीच एक और शहर है जो सांप्रदायिक हिंसा की आग में जला है और वो है हरियाणा का पंचकुला. वहां कुछ हिन्दू और सिख एक पथभ्रष्ट शैतान जो खुद को ईन्सान कहता था के बहकावे में आ गए और शहर को जलाने लगे. फिर तो प्रशासन कहर बनकर टूट पड़ा. देखते-२ कई दर्जन उपद्रवी मिट्टी के ढेर में बदल दिए गए. सरकार ने स्पष्ट घोषणा कर दी कि किसी भी मृतक के परिजन को मुआवजा नहीं मिलेगा. इतना ही नहीं हंगामे से हुए नुकसान की भरपाई डेरा की संपत्ति बेचकर की जाएगी. किसी भी हिन्दू या सिख ने विरोध भी नहीं किया.
मित्रों, अब हमारी दंगा एक्सप्रेस आ पहुंची है जयपुर. वीरों की धरती राजस्थान की राजधानी जयपुर. यहाँ पुलिस का डंडा कथित रूप से गलती से एक मुस्लिम बाईक सवार को लग जाती है जिससे वो गाड़ी सहित गिर जाता है. गाड़ी पर उसकी पत्नी और बच्चे भी होते हैं. फिर आनन-फानन में हजारों मुसलमान थाने पर हमला बोल देते हैं और पूरे शहर में आगजनी शुरू कर देते हैं. ड्रोन से लिए गए चित्र बताते हैं कि मुसलमानों ने दंगों की तैयारी पहले से ही कर रखी थी. एक मुसलमान इसमें मारा जाता है लेकिन परिजन लाश लेने से इंकार कर जाते हैं. राजस्थान सरकार के मानों हाथ-पांव फूल जाते हैं और वो मृतक के परिजनों से समझौता-वार्ता करती है. फिर करार होता है कि सरकार उस महान हिंसक उपद्रवी के परिजनों को १० लाख रूपये और एक नौकरी देगी. इसी दंगे में एक दिव्यांग हिन्दू ऑटो चालक भी मारा जाता है लेकिन प्रशासन उसकी लाश को छिपा जाती है. बाद में उसके परिजन भी लाश लेने से मना करते हैं लेकिन उनके साथ कोई समझौता नहीं किया जाता. उसके परिजनों को न तो १० लाख रूपये ही दिए जाते हैं और न तो नौकरी ही. बाद में मीडिया में किरकिरी होने पर घोषणा की जाती है कि उसके परिजनों को भी वही सब मिलेगा जो आदिल के परिवार को दिया जाएगा. इतना ही नहीं यहाँ संपत्ति की भरपाई दंगा करनेवालों से भी नहीं करवाई जाती.
मित्रों, आपको याद होगा कि सोनिया-मनमोहन कीQ सरकार जो साम्प्रदायिकता अधिनियम लाने पर विचार कर रही थी उसमें भी कुछ ऐसे ही भेदभावकारी प्रावधान थे. कि दंगों के लिए हमेशा हिन्दू ही दोषी माने जाएँगे,मुआवजा सिर्फ मुसलमानों को मिलेगा आदि. तब हमारे साथ मिलकर भाजपा ने इसका सख्त विरोध भी किया था. फिर अब भाजपा राजस्थान में अघोषित रूप से उसी अधिनियम को लागू करने पर क्यों आमादा है? ममता ने तो बंगाल में जैसे उसको बहुत पहले से लागू कर रखा है. मगर हमारा सवाल तो भाजपा से है कि क्या भाजपा ने ख़ुदकुशी की पूरी तैयारी कर ली है? मैं आज भी स्टाम्प पर लिख देने को तैयार हूँ कि मुसलमानों ने आज तक भाजपा को न तो कभी वोट दिया है और न ही कभी देंगे फिर महारानी ऐसा क्यों कर रही है जिससे भाजपा का आधार ही समाप्त हो जाए? भाजपा कहती है कि एक देश में २ कानून नहीं चलेगा फिर वो हरियाणा और राजस्थान में अलग-अलग कानून क्यों चला रही है?

शनिवार, 9 सितंबर 2017

झुकता है चीन झुकानेवाला चाहिए

मित्रों, अगर मैं ये कहूं कि पिछले कुछ साल और खासकर कुछ महीने भारतीय कूटनीति के लिए स्वर्णिम रहे हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. वैसे अपने जीवन में लगातार अप्रत्याशित परिस्थितियों का सामना करनेवाला व्यक्ति अतिरंजनापूर्ण बातें कर भी नहीं सकता.
मित्रों, आप समझ गए होंगे कि मैं भारत-चीन संबंध के सम्बन्ध में बात कर रहा हूँ. इसमें कोई संदेह नहीं पिछले ३ दशकों में चीन अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में हमसे काफी आगे निकल चुका है. लेकिन मैं हमेशा से ऐसा मानता रहा हूँ कि भारत ने इस दौरान जो अवसर खोया चीन ने उसी को लपक लिया. वरना जिस तरह आज भारत एफडीआई के क्षेत्र में दुनिया में नंबर एक है ३ दशक पहले भी हो सकता था, २ दशक पहले भी हो सकता था. सबसे बड़ी बात तो यह है कि भारत में लोकतंत्र था, कायदा था, कानून था बस नहीं थी तो व्यवस्था. वहीँ चीन में तानाशाही थी, एकदलीय शासन था,कानून नहीं था परन्तु व्यवस्था थी.
मित्रों, नरेन्द्र मोदी ने शासन में आने के साथ ही बस इतना किया कि पुराने फिजूल कानूनों को समाप्त कर कानून को कम कर दिया और व्यवस्था को स्थापित किया. डीबीटीएल, प्रत्येक सेवा को ऑनलाइन करना, नोटबंदी, जीएसटी इत्यादि कदम इस दिशा में उठाए गए.
मित्रों, वैदेशिक कूटनीति के क्षेत्र में भी कई बदलाव किए गए. कथित आदर्शवादी नेहरु सिद्धांत जिस पर चल कर भारत को अपनी लाखों वर्ग किलोमीटर जमीन पिद्दी जैसे देशो के हाथों खोना पड़ा था को टाटा बाई-बाई कर दिया गया और एक साथ दुनिया के सारे गुटों के देशो के साथ संबंधों में सुधार पर जोड़ दिया गया. इसी बदलाव का नतीजा है कि चीन को भारत के खिलाफ पहली बार डोकलाम में मुंह की खानी पड़ी और अपनी सेना वापस हटानी पड़ी. इतना ही नहीं चीन को मन मारकर ब्रिक्स के घोषणापत्र में पाकिस्तान से संचालित हो रहे भारत-विरोधी आतंकी संगठनों के खिलाफ प्रस्ताव को मंजूरी देनी पड़ी. आज से ४ साल पहले सोनिया-शासन में क्या हम इस बात की कल्पना भी कर सकते थे?
मित्रों, कुछ लोग जिनको रतौंधी की बीमारी है और जिनका पूर्णकालिक कार्य मोदी सरकार के प्रत्येक अच्छे-बुरे काम की बुराई करना है वे इन दिनों नोटबंदी, जीडीपी और जीएसटी को लेकर रुदाली-रूदन करने में लगे हैं. नोटबंदी और बेनामी संपत्ति पर कार्रवाई से चाहे अर्थव्यवस्था को जो भी तात्कालिक नुकसान हुआ हो लोगों में ईमानदारी की प्रवृत्ति बढ़ी है इसमें कोई संदेह नहीं और मैं समझता हूँ कि यही एक अकेली उपलब्धि बहुत बड़ी है. आज लगभग सारी सरकारी सेवाएँ मोबाइल पर उपलब्ध हैं. आयकर ढांचे में सुधार लाने से आयकरदाताओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है तो वहीँ जीएसटी लागू करने से पूरा-का पूरा व्यापार सुनियोजित हुआ है जिसका लाभ कर-वसूली के क्षेत्र में दिखने भी लगा है और भविष्य में आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी दिखेगा इसमें संदेह नहीं.
मित्रों, सबसे अच्छी बात यह है कि विरोधियों के तमाम विधवा-विलाप के बावजूद अभी भी आम जनता का मोदी सरकार के प्रति विश्वास बना हुआ है. तमाम सर्वेक्षण भी इसकी पुष्टि करते हैं. ऐसे में मोदी सरकार चाहे तो भविष्य में और भी कड़े कदम उठा सकती है हालाँकि अब २०१९ भी ज्यादा दूर नहीं रह गया है.

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

गौरी लंकेश की हत्या एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना

मित्रों, पता नहीं क्यों जबसे कट्टर हिन्दूविरोधी और हिन्दू संस्कृति से घनघोर घृणा करनेवाली कथित पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई है तभी से मुझे ऐसा लगता है कि उनको उनके किसी अपने आदमी ने ही मारा है. क्योंकि मारनेवाले ने उनको आराम से उनके घर के भीतर जाकर मारा. अगर वो अजनबी होता तो लंकेश ने उसे घर में घुसने ही नहीं दिया होता. उनके भाई को शक है कि लंकेश ही हत्या नक्सलियों के की है क्योंकि उन्होंने ऐसा करने की धमकी दे रखी थी. गौरी के भाई के मुताबिक़- गौरी नक्सलियों को मुख्य धारा में लाने की मुहिम की अगुवाई कर रही थीं. कुछ नक्सलियों को मुख्य धारा से जोड़ने में वह सफल भी हुई थीं, जिसकी वजह से वह नक्सलियों के निशाने पर थीं और उन्हें लगातार धमकी भरी चिट्ठी और ईमेल आते थे.
मित्रों, शक का कोहरा इसलिए और भी गहरा हो जाता है क्योंकि हत्यारे का वीडियो फूटेज मौजूद है लेकिन पुलिस के हाथ अब तक खाली हैं. इससे पहले ३० अगस्त, २०१५ को मारे गए कन्नड़ लेखक कलबुर्गी की हत्या किसने की और क्यों की का पता भी आज तक सिद्धारमैया की पुलिस नहीं लगा पाई है.
मित्रों, ऐसा कैसे हो सकता है कि पुलिस के हाथों में हत्यारे का सीसीटीवी फुटेज हो फिर भी वो हत्यारों तक नहीं पहुँच पाए? क्या पुलिस इन दोनों हत्याओं में शामिल लोगों को जानबूझकर पकड़ना ही नहीं चाहती है? क्या इस हत्या के पीछे स्वयं कांग्रेस का हाथ है क्योंकि लंकेश ने इन दिनों अपनी कलम का मुंह उसके मंत्रियों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार की तरफ कर दिया था? तो क्या कांग्रेस पूरे होशो-हवास में हत्या की राजनीति कर रही है?
मित्रों,  पुलिस और कानून-व्यवस्था पूरी तरह से राज्य सरकार का विषय है ऐसे में एक खास विचारधारा से जुड़े लोगों की लगातार हत्या होना और उनका उद्भेदन दो साल बाद तक भी नहीं हो पाना सर्वप्रथम राज्य सरकार की क्षमता पर ही सवालिया निशान लगाता है. मैं कर्नाटक के मुख्यमंत्री से मांग करता हूँ कि या तो वे इन दोनों हत्याओं का खुलासा करें अन्यथा पदत्याग करें क्योंकि उनकी पुलिस जब इतने हाईप्रोफाईल मामलों का रहस्योद्घाटन नहीं कर पाती तो आम आदमी से जुड़े मामलों में क्या खाक कारवाई करती होगी.
मित्रों, अगर राज्य पुलिस अक्षम है तो इसका मतलब यह नहीं कि इन्साफ को दम घुट जाए. वैसे भी लंकेश का भाई कह चुका है कि उसको राज्य पुलिस पर भरोसा नहीं है और मामले की जाँच सीबीआई को करनी चाहिए. लेकिन क्या इसके लिए राज्य सरकार तैयार होगी? नहीं होती है तो क्या वो खुद को शक के कटघरे में नहीं डाल लेगी?
मित्रों, अंत में मैं लेखकों और पत्रकारों से किसी तरह की हिंसा का विरोध करता हूँ. जिसको बहस करनी है करे हम खुद भी चौबीसों घंटे तैयार हैं. कोई अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बेजा फायदा उठाता है तो उसके ऊपर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए जैसे इन दिनों अरुण जेटली केजरीवाल के खिलाफ कर रहे हैं लेकिन हिंसा नहीं होनी चाहिए. 

सोमवार, 28 अगस्त 2017

नमो का सफाई अभियान चालू आहे

मित्रों, जबसे हमने नरेन्द्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बनाया है तभी से वे स्वच्छता पर जोर दे रहे हैं. नेताओं ने हम लोगों को चूंकि चुनाव-दर-चुनाव खूब चकमा दिया है इसलिए हमलोग उनकी बातों को जरा हलके में लेते हैं सो हमें लगा कि मोदी सिर्फ बाहरी साफ़-सफाई की बात कर रहे हैं. लेकिन वास्तविकता में ऐसा था नहीं.
मित्रों, वास्तविकता तो यह थी कि प्रधानमंत्री का आशय हर तरह की स्वच्छता से था फिर चाहे वो सामाजिक, लैंगिक, मानसिक, आर्थिक, शारीरिक, धार्मिक या नैतिक स्वच्छता हो या फिर राजनैतिक. हर पहल की शुरुआत अपने आपसे या अपने घर से होनी चाहिए इसलिए राजनैतिक दलों को मिलनेवाले चंदे को अधिक पारदर्शी बनाया गया. हालाँकि अभी भी स्थिति संतोषजनक नहीं है. अलावा इसके राजनैतिक दलों को आरटीआई के अंतर्गत लाना शेष है. अर्थव्यवस्था में व्याप्त काले धन की सफाई के लिए पहले नोटबंदी लागू की गई फिर जीएसटी लाई गई. मानसिक, सामाजिक व लैंगिक क्षेत्र में स्वच्छ वातावरण बनाने के लिए लाखों पोर्न साईटों पर रोक लगाई गई, खुले में शौच और भ्रूणहत्या के खिलाफ अभियान चलाया गया और ३ तलाक व हलाला की १४०० साल पुरानी सडी-गली अमानवीय बेहूदा प्रथा को समाप्त किया गया. शारीरिक व मानसिक स्वच्छता के लिए योग को बढ़ावा दिया गया. धार्मिक या नैतिक स्वच्छता की स्थापना के लिए पहले आसाराम फिर जाकिर नाईक फिर रामपाल और अब बाबा राम रहीम सिंह जैसे पाखंड के साम्राज्य चलानेवालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई.
मित्रों, आज तक भारत के इतिहास में कभी भी किसी भी ऐसे नेता जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हों या सजा मिल चुकी हो की संपत्ति जब्त नहीं की गई थी. भारत के इतिहास में पहली बार बेहिसाब बेनामी संपत्ति अर्जित करनेवाले नेताओं के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई शुरू की गई है. हालाँकि अभी तक निशाने पर सिर्फ विपक्षी नेता ही हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि सृजन घोटाले की भी निष्पक्ष जाँच की जाएगी और सारे दोषियों पर कार्रवाई करते हुए लूटे गए धन की वापसी की जाएगी फिर चाहे दोषी जीवित हो या मृत या फिर बिहार का वर्तमान मुख्यमंत्री ही क्यों न हो. कश्मीर में आतंकियों और आतंकवाद की चल रही सफाई के बारे में तो आपको पता होगा ही.
मित्रों, इस पूरे शाब्दिक व्यायाम का सारांश यह है कि नरेन्द्र मोदी का स्वच्छता कार्यक्रम चालू है जिसके परिणामस्वरुप वयोवृद्ध माँ भारती के चेहरे पर निखार आना निश्चित है. आज ही खबर आई है कि चीन डोकलाम से अपनी सेना वापस करने के लिए तैयार हो गया है. यह भी सही है कि इस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है लेकिन जिस तेजी से सब कुछ किया जा रहा है बहुत जल्द यह बहुत कुछ कुछ-कुछ रह जानेवाला है इसमें संदेह नहीं. महाकवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने कहा था कि
छल-छद्म धन की किन्तु मैं
सीधी-सादी पटरी-पटरी दौड़ा हूँ जीवन की
फिर भी मैं अपनी सार्थकता से खिन्न हूँ
विष से अप्रसन्न हूँ
इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए
पूरी दुनिया साफ़ करने के लिए मेहतर चाहिए.
हमारा सौभाग्य है कि हमें वो मेहतर मिल गया है. वो हमसे कुछ नहीं चाहता सिर्फ हमारा प्यार, हमारा समर्थन चाहता है. हम तो आज भी उसके साथ हैं क्या आप हैं?

सोमवार, 21 अगस्त 2017

नेहरु की मूर्खता के स्मारक है बांध

मित्रों, मेरा ननिहाल महनार रोड रेलवे स्टेशन के पास है. पहले गाँव में खूब धान उपजता था. लोग पोरा (पुआल) बेचकर घोड़ा खरीदते थे. फिर नेहरु के समय गाँव में नहर खोद दी गई और सब सत्यानाश हो गया. आज वहां एक मुट्ठी धान नहीं होता. गर्मी में नहर सूखी रहती है और बरसात में नहर से होकर इतना पानी आ जाता है कि खेतों में अथाह पानी लग जाता है. तीन फसली जमीन एक फसली हो गई है.
मित्रों, बिहार के ज्यादातर ईलाकों में कमोबेश यही स्थिति है. 1954 से पहले जब तक नदियों को तटबंधों और बांधों में नहीं बाँधा गया था पानी को बहने के लिये काफी खुली जगह मिलती थी. पानी कितना भी तेज हो जन-धन की हानि बहुत अधिक नहीं होती थी. 1954 से पहले नदियाँ खुली जगह में धीमे प्रवाह से बहतीं थीं. मध्दिम प्रवाह उर्वर मिट्टी के बहाव में मदद करता था व आसपास के इलाके उर्वर हो जाते थे. परंतु तटबंध से नदियों को बाँधने के बाद जल भराव व बाढ़ से तबाही होना शुरू हो गया. बिहार की बाढ़ का मुख्य कारण तटबंध और बाँध हैं. तटबंध बाढ़ को नियंत्रित करने व सिंचाई को बढ़ावा देने के लिये हैं परंतु इनसे बाढ़ रुक नहीं पाती है बल्कि तटबंध टूटने से बालू बहुत तेज गति से बहता आता है जिससे आसपास की उर्वर भूमि भी बंजर हो जाती है. तटबंध निर्माण से ठेकेदारी व भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलता है. बिहार में कई सारे ठेकेदार विधायक व मंत्री बन गये हैं. बाढ़ नियंत्रण व सिंचाई के नाम पर ये तटबंध राजनीति की देन हैं. तटबंध बाढ़ से सुरक्षा के बजाय बाढ़ की विभीषिका में वृध्दि करते हैं. अगर आप आंकड़े देखें, जैसे-जैसे तटबंध बनते गये हैं, बाढ़ में तेजी आती गयी है.
मित्रों, यही नहीं पर्यावरणविदों का मानना है कि भूकंप के बाद अगर बाँध चरमराता है व टूटता है तो पूरा उत्तरी बिहार बह जायेगा, कुछ नहीं बचेगा. दूसरे, भूमंडलीकरण के दौर में किस देश का संबंध कब दूसरे देश से बिगड़ जाये कहना मुश्किल है. उदाहरण के लिए बिहार के दरभंगा में चीन को ध्यान में रखकर हवाईअड्डा बनाया गया है. अगर कल चीन के साथ हमारे संबंध गड़बड़ाते हैं और चीन इस बाँध पर बमबारी करता है तो पूरा इलाका बह जायेगा. दूसरे, नेपाल में माओवादी सत्ता में हैं. बिहार में भी कई सारे इलाके नक्सली हिंसा से प्रभावित हैं. बड़े बाँध नक्सलवादियों के निशाने पर हमेशा रहेगें व जरा से हमले से भीषण तबाही आ जायेगी.
मित्रों, बिहार के काफी संवेदनशील माने जानेवाले किशनगंज, अररिया आदि जिलों में इस समय जो जलप्रलय की स्थिति चल रही है हो सकता है कि उसके पीछे चीन का हाथ हो और चीन ने नेपाल को ज्यादा पानी छोड़ने के लिए उकसाया हो. इन पीकॉक नैक कहे जानेवाले सीमांचल के जिलों में लगभग सारे-के-सारे सड़क पुल बह गए हैं. यहाँ तक कि कटिहार के पास रेल पुल भी बह गया है जिससे असम जानेवाली लगभग सारी ट्रेनों को रद्द करना पड़ा है. ऐसी स्थिति में अगर चीन का हमला होता है तो आप आसानी से सोंच सकते हैं कि भारत की क्या हालत होगी. वैसे तो ये बाँध नेहरु की मूर्खता के स्मारक बन चुके हैं लेकिन फिर भी नेहरु को बांध बनाना ही था तो भारतीय ईलाके में बनाते. नेपाल में बनवाने की क्या जरुरत थी? पैसा हमारा और नियंत्रण नेपाल का?
मित्रों, हमारे बिहार में एक कहावत है कि नक़ल के लिए भी अकल चाहिए. अमेरिका, रूस का अन्धानुकरण करने से पहले हमारे राजनेताओं को भारत की स्थिति-परिस्थिति का आकलन जरूर कर लेना चाहिए. यह बात आज के नेताओं पर भी लागू होती है. अब आप कहेंगे कि भविष्य में नदियों पर बड़े बांध बनने चाहिए या नहीं. तो मैं कहूँगा बिलकुल भी नहीं. बल्कि बड़े बाँधों के बजाय लघु बाँध बनने चाहिये. छोटे बाँधों से सिंचाई-क्षमता बढ़ेगी, बिजली उत्पादन भी होगा व बाढ़ से बचाव भी होगा.

सोमवार, 14 अगस्त 2017

बिहार में फिर से बड़े घोटाले का सृजन

मित्रों, हो सकता है कि आपने भी बचपन में आवेदन -प्रपत्र या फोटो सत्यापित करने के लिए किसी स्कूल या कॉलेज के प्रधानाचार्य की मुहर बनवाई होगी और खुद ही हस्ताक्षर करके काम चला लिया होगा. ऐसा करनेवालों में से कुछ तो अब नौकरी में भी होंगे. लेकिन क्या आपने कभी ऐसा सुना है कि कोई किसी राजपत्रित अधिकारी का नकली हस्ताक्षर करके और नकली मुहर लगाकर १००० करोड़ की राशि बैंक से निकाल जाए या अपने चहेते के खाते में स्थानांतरित कर दे? शायद नहीं लेकिन जो बात दुनिया में कहीं नहीं होती वो बिहार में होती है तभी तो बिहार बर्बादी का दूसरा नाम है.
मित्रों, बिहार आकर शब्द भी पथभ्रष्ट हो जाते हैं. अब सृजन शब्द को ही लीजिए. इसका अर्थ होता है निर्माण. कहने का मतलब यह कि सृजन एक सकारात्मक शब्द है. लेकिन बिहार में इसका दुरुपयोग घोटाला सृजित करने के लिए हुआ है और इस तरीके से हुआ है कि पूरी दुनिया सन्न है. भ्रष्टाचार की सत्यनारायण कथा इस प्रकार है कि स्वयंसेवी संस्था सृजन की संचालिका मनोरमा देवी एक विधवा महिला थी। जिसके पति अवधेश कुमार की मौत 1991 मे हो गई जो रांची में लाह अनुसंधान संस्थान में वरीय वैज्ञानिक के रूप में नौकरी करते थे। जिसके बाद मनोरमा देवी अपने बच्चे को लेकर भागलपुर चली आई और वही एक किराए के मकान में रह कर अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करने लगी। गरीबी से मजबूर विधवा ने पहले ठेले पर कपड़ा बेचने का काम शुरू किया फिर सिलाई का और धीरे-धीरे उसका काम इतना बढ़ने लगा कि उसमें और भी कई महिलाएं शामिल हो गई। जिसके बाद 1993-94 में मनोरमा देवी ने सृजन नाम की स्वयंसेवी संस्था की स्थापना की। मनोरमा देवी की पहचान इतनी मजबूत थी कि तमाम बड़े अधिकारी से लेकर राजनेता तक उनके बुलावे पर दौड़ते हुए पहुंच जाते थे। मनोरमा देवी ने अपने समूह में लगभग 600 महिलाओं का स्वयं सहायता समूह बनाकर उन्हें रोजगार से जोड़ा। मित्रों,फिर शुरू हुआ हेराफेरी का खेल. मनोरमा देवी ने सहयोग समिति चलाने के लिए भागलपुर में एक मकान 35 साल तक के लिए लीज पर लिया। मकान लेने के बाद सृजन महिला विकास समिति के अकाउंट में सरकार के खजाने से महिलाओं की सहायता के लिए रुपए आने शुरू हो गए। जिसके बाद सरकारी अधिकारियों और बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत से पैसे की हेराफेरी शुरू हो गयी। देखते-देखते बेवजह लगभग 1000 करोड़ से ज्यादा पैसा समिति के अकाउंट में डाल दिया गया और इसके ब्याज से अधिकारी-कर्मचारी मालामाल होते चले गए। दिखावे के लिए इस संस्था के द्वारा पापड़, मसाले, साड़ियां और हैंडलूम के कपड़े बनवाए जाते थे और  'सृजन' ब्रांड से बाजार में बेचे जाते थे. लेकिनअब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि पापड़ और मसाले बनाने का धंधा केवल दुनिया को गुमराह करने के लिए था. संस्था ने घोटाले के पैसे को बाजार में लगाया, साथ ही रियल एस्टेट में भी लगाया. इन पैसों से लोगों को 16% ब्याज दर पर लोन भी मुहैया कराया गया.
मित्रों, अपनी जिंदगी के 75 साल गुजारने के बाद भ्रष्टाचार की देवी मनोरमा देवी की इसी साल फरवरी में मौत हो गई। उसकी मौत के बाद उसके बेटे अमित और उसकी पत्नी प्रिया ने महिला समिति के कामकाज देखना शुरू कर दिया। जब यह मामला का पर्दाफाश हुआ दोनों फरार हो गए फिलहाल पुलिस उनकी तलाश कर रही है। 1995 से लेकर 2016 तक चले इस घोटाले की अधिकारियों द्वारा जांच पड़ताल की जा रही है और जल्द ही इस लूट में शामिल सारे लोगों को बेनकाब करने का दावा किया जा रहा है।
मित्रों, ऐसा नहीं है कि बिहार में भागलपुर ही एकमात्र अभागा जिला है बल्कि बिहार में जहाँ कहीं भी कोई सरकारी योजना चल रही है, सरकारी फंड का व्यय हो रहा है या सरकारी काम चल रहा है वहां घोटाला है,मनमानी है. इसलिए आवश्यक है कि न केवल भागलपुर में घोटाले के दौरान पदस्थापित सारे कर्मचारियों और अधिकारियों की संपत्तियों की गहनता से जाँच हो बल्कि पूरे बिहार में इस तरह का जाँच अभियान चलाया जाए और भ्रष्टाचार बिहार छोडो के नारे को वास्तविकता का अमलीजामा पहनाया जाए.
मित्रों, सवाल उठता है कि भागलपुर जिले में तीन-तीन डीएम आए और चले गए और तीनों के समय उनके नकली हस्ताक्षर से सरकारी खाते से करोडो रूपये गायब कर दिए गए और कैसे उनलोगों को कानोकान खबर तक नहीं हुई? ऐसा कैसे संभव है? मानो गबन न हुआ झपटमारी हो गई. अगर ऐसा हुआ भी है तो ऐसा होना उन साहिबानों की योग्यता पर प्रश्न-चिन्ह लगाता है और प्रश्न-चिन्ह लगाता है भारतीय प्रशासनिक सेवा में बहाली की प्रक्रिया पर.सवालों के घेरे में एजी और सीएजी जैसी संवैधानिक संस्थाएं भी हैं जो २२ सालों में सरकारी चोरों को पकड़ने में विफल रहीं. कदाचित यह घोटाला आगे भी धूमधाम से चलता रहता अगर भागलपुर के वर्तमान डीएम आदेश तितरमारे का महज ढाई करोड़ का चेक कूद कर वापस न आ गया होता.
मित्रों, बिहार सरकार की काबिलियत पर सवाल उठाने का तो प्रश्न ही नहीं. मैं जबसे नीतीश २०१३ में एनडीए से अलग हुए तभी से कहता आ रहा हूँ कि बिहार में सरकार की मौत हो चुकी है और चारों तरफ अराजकता का माहौल है. लगता है जैसे बिहार में शाहे बेखबर बहादुरशाह प्रथम का शासन हो. मुख्यमंत्री न जाने किस मूर्खों की दुनिया में मस्त थे. कहीं कुछ भी ठीक नहीं. हाई कोर्ट भी कहता है जब पैसे लेकर ही बहाली करनी है तो विज्ञापन,परीक्षा और साक्षात्कार का नाटक क्यों करते हो? सीधे गाँधी मैदान में शामियाना लगाकर नियुक्ति-पत्र क्यों नहीं बाँट देते?

रविवार, 13 अगस्त 2017

यूपी को संभालिए मोदी जी!

मित्रों, मेरी एक बहुत ही प्यारी आदत है. इसे मैं बुरी कहूं या अच्छी कह नहीं सकता. मैं जब भी नींद में होता हूँ सपने देखने लगता हूँ. न जाने कितनी बार मेरे सपनों में मैं भारत को विकसित राष्ट्र के रूप में देख चुका हूँ. न जाने कितनी बार भारत को विश्वगुरु बना देख चुका हूँ. मैंने अपने सपनों में देखा है कि मेरे भारत में कोई गरीब नहीं है. सबके पास पर्याप्त रोटी, कपडा और मकान है. हमारे सरकारी अस्पतालों में ईलाज की बेहतरीन सुविधा है. हमारे शिक्षा-संस्थान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मामले में दुनिया में अद्वितीय है. सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार इतिहास बन चुका है. ओलंपिक में भारत ने दुनिया में पहला स्थान प्राप्त किया है. इत्यादि.  लेकिन जितने सपने मैं सोती आँखों से देखता हूँ उससे कहीं ज्यादा जागते हुए कल्पना करता रहता हूँ.
मित्रों, जब भी मेरे सपनों के पूरा होने की जरा-सी भी उम्मीद जगती है मेरी खुशियों का ठिकाना नहीं रहता लेकिन जब सपने टूटने और बिखरने लगते हैं तो मैं जैसे पीड़ा के अंतहीन महासागर में गोते खाने लगता हूँ.
मित्रों, बिहार में २०१५ में जब एनडीए हारा था तो मेरे सपने भी हारे थे.  मेरी भींगी-२ सी पलकों में रह गए जैसे मेरे सपने बिखर के. तभी से मैं इन्तजार करने लगा था यूपी के चुनाव-परिणामों का. यूपी में जब भाजपा जीती तो मुझे लगा कि नरेन्द्र मोदी जिनकी उम्र मेरी ही तरह देश की उन्नति के सपने देखते गुजरी है अब यूपी में आदर्श-शासन स्थापित कर भारत के बांकी राज्यों को बताएंगे कि देखो राम-राज्य कोरी कल्पना नहीं है-दैहिक दैविक भौतिक तापा,राम राज काहू नहीं व्यापा. उन्होंने इसके लिए जिस व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि चुना वो कड़वा सच बोलने और कड़कपन के लिए ही जाना जाता था. शुरू में लगा कि अब यह व्यक्ति यूपी को बदल कर रख देगा. लेकिन अब धारणाएँ बदलने लगी हैं. सपने टूटे तो नहीं हैं लेकिन दरकने लगे हैं.
मित्रों, क्या जून तक यूपी की सड़कें गड्ढाविहीन हो गई? क्या यूपी पुलिस का रवैया थोडा-सा भी बदला? क्या थाना सहित दफ्तरों में व्याप्त भ्रष्टाचार में किंचित भी कमी आई? क्या शिक्षण-संस्थानों में पढाई के माहौल में कोई बदलाव आया? क्या इस साल जापानी बुखार से गोरखपुर अस्पताल में कम बच्चे मर रहे हैं? अगर नहीं तो फिर यूपी में क्या बदला?
मित्रों, दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तो यह है कि योगीजी को कदाचित अभी तक यह पता ही नहीं है कि करना क्या है और कैसे करना है? कौन-कौन से अधिकारी उनकी टीम में होंगे और किस तरह योजनाओं पर अमल होगा.
मित्रों, हम नहीं चाहते कि भविष्य में यूपी में भाजपा का शासन अपनी असफलताओं के लिए जाना जाए. क्योंकि यूपी भाजपा के लिए एक चुनौती तो है लेकिन अवसर भी है. उसके पास इतना प्रचंड बहुमत है कि वो यहाँ खुलकर प्रयोग कर सकती है. इसलिए मैं मोदीजी से कहता हूँ कि यूपी को संभालिए मोदीजी! सपनों को सिर्फ देखने और दिखाने से काम नहीं चलेगा उनको पूरा भी करना होगा देवता.

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

बिहार की नई राजधानी हाजीपुर!

मित्रों, यह खबर शर्तिया आपको अख़बारों में पढने को नहीं मिली होगी. किसी भी शहर के लिए राज्य की राजधानी होना गौरव की बात होती है लेकिन हाजीपुर के साथ ऐसा कतई नहीं है. बल्कि हाजीपुर के लोग  ऐसा होने पर शर्मिंदा हो रहे हैं. आप कहेंगे कि मैं मजाक कर रहा हूँ लेकिन यह भी सच नहीं है. चलिए मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ कि भारत की आर्थिक राजधानी के रूप में किस शहर को जाना जाता है? आप छूटते ही या फिर सवाल पूरा होने के पहले ही बोलेंगे मुंबई. अब आप सोंच रहे होंगे कि बिहार की आर्थिक राजधानी हाजीपुर है क्या? नहीं भाई वो तो पटना ही है लेकिन बिहार की आपराधिक राजधानी जो पहले से पटना ही था अब पटना नहीं है बल्कि हाजीपुर बन गया है.
मित्रों, यकीन न हो तो किसी भी अख़बार के किसी भी जिला संस्करण को को उलट कर देख लीजिए. रोजाना आपको हाजीपुर में जितनी शराब की बरामदगी, सेक्स रैकेट के भंडाफोड़, हत्या, अपहरण, छिनतई, मार-पीट और लूट की ख़बरें पढने को मिलेंगी क्या मजाल कि किसी और जिले के अख़बार में मिले. ऐसा लगता है जैसे बिहार के सारे अपराधियों ने हाजीपुर को ही अपना आधार-केंद्र बना लिया है. स्थिति ऐसी हो गई है कि हाजीपुर में कारोबार करना अपनी जान के साथ खिलवाड़ करना बन गया है.
मित्रों, आज से दो-ढाई दशक पहले तक हमारा हाजीपुर और हमारा वैशाली जिला ऐसा नहीं था. तब जब हम जहानाबाद, बड़हिया और बेगुसराय के बारे में पढ़ते-सुनते तो हमें अपने आप पर और अपने जिला पर बड़ा गर्व होता कि पूरी दुनिया को अहिंसा का अमर पाठ पढ़ानेवाले भगवान महावीर की जन्मस्थली कितनी शांत है. फिर लालू-राबड़ी के जंगल राज में हाजीपुर अपहरण उद्योग का केंद्र बन गया. अपहरण चाहे बिहार के किसी भी स्थान से हुआ हो अपहृत की बरामदगी हाजीपुर से ही होती थी. २००५ में एनडीए राज आने के बाद यह उद्योग पूरे बिहार के साथ-साथ बिहार में भी बंद हो गया.
मित्रों, लेकिन पिछले करीब चार-पांच सालों में और खासकर जिले में वर्तमान पुलिस कप्तान राकेश कुमार की तैनाती के बाद तो जैसे हाजीपुर ने अपराध के मामले में विश्व-रिकार्ड बना डालने की जिद ही पकड़ ली है. आप कहेंगे कि इसमें पुलिस कप्तान की क्या गलती है तो मैं आपको सलाह देता हूँ कि किसी काम से कभी आप भी एसपी ऑफिस का चक्कर लगा लीजिए. मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर बता रहा हूँ कि पहले तो साहब के अंगरक्षक आपको कार्यालय के बाहर से ही टरकाने की कोशिश करेंगे. अगर आपने एसपी साहब से भेंट कर भी ली तो वो कहेंगे कि उनके नीचे के कर्मचारियों या अधिकारियों से बातचीत कीजिए. कहने का मतलब कि वो कुछ नहीं करेंगे कुछ ले-देकर खुद ही निपटा लीजिए.
मित्रों, जब कप्तान ही ऐसा हो तो टीम के बांकी खिलाडी कैसे होंगे आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं. एक सच्ची घटना पेशे खिदमत है. इन दिनों पटना में सेक्स रैकेट चला रहे लोगों ने भी हाजीपुर का रूख कर लिया है शायद मनु महाराज के डर से. अगर आपका भी हाजीपुर में मकान है और आप उसमें नहीं रहते तो सचेत हो जाईए. ये लोग नकली पति-पत्नी बनकर आपके पास आएँगे और किराया पर फ्लैट ले लेंगे. फिर इनके पति के कथित दोस्तों और पत्नी के कथित भाइयों और बहनों का आना-जाना शुरू होगा जो सारे-के-सारे पटनिया होंगे. इनमें से एक-न-एक हमेशा रास्ते पर नजर रखेगा और मुख्य-दरवाजे को हमेशा बंद रखा जाएगा. फिर जब पडोसी और मकान-मालिक असली खेल को समझ जाएंगे तो डेरा और मोहल्ला बदल दिया जाएगा. फिर पति कोई और बनेगा और पत्नी कोई और. पति और पत्नी की जाति भी बदल जाएगी. हद तो तब हो गई जब मैंने पाया कि ऐसा ही एक चकला मेरे पड़ोस में भी चल रहा था और एक बार तो उक्त फ्लैट के बाहर दारोगा जी से भेंट हो गई. शायद हफ्ता वसूलने आए थे. बेचारे हमसे मिलकर ऐसा झेंपे कि पूछिए मत.
मित्रों, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि हाजीपुर में इन कप्तान साहब को पिछले दो-ढाई सालों से क्यों रखा गया है? क्या हाजीपुर इस मामले में भी उपेक्षित ही रहेगा? क्या हाजीपुर को पटना की तरह तेज-तर्रार पुलिस कप्तान का सुख भोगने का कोई हक़ नहीं? पटना में शिवदीप लांडे, विकास वैभव, मनु महाराज ... जैसे अधिकारी जो मीटिंग नहीं हीटिंग के लिए पूरे भारत में जाने जाते हैं और हाजीपुर में राकेश कुमार जिनको सिवाय मीटिंग के कुछ करना आता ही नहीं है?

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

शराबबंदी से किसको फायदा?

मित्रों, मैं वर्षों से अपने आलेखों में कहता आ रहा हूँ कि बिहार एक प्रदेश या जमीन का टुकड़ा ही नहीं है बल्कि एक मानसिकता भी है. नहीं तो क्या कारण है कि जो योजनाएं बांकी भारत में अतिसफल रहती हैं बिहार में अतिविफल हो जाती हैं. भ्रष्टाचार तो जैसे हम बिहारियों के खून में, डीएनए में समाहित है. लहर गिन कर पैसे कमाने वाले तो आपको देश के दूसरे हिस्सों में भी मिल जाएँगे लेकिन सूखे की स्थिति में भी लहरों का मजा देकर पैसा कमाना सिर्फ हम बिहारियों को आता है.
मित्रों, शराबबंदी से पहले बिहार की क्या हालत थी? छोटे-छोटे गाँव के हर गली मोहल्ले में नीतीश सरकार ने शराब की दुकान खोल दी थी. जिधर नजर जाती थी युवाओं के कदम लड़खड़ाते हुए नजर आते थे. मानों पूरा बिहार नशे में था और मदहोश कदमों से बर्बादी की ओर बढ़ रहा था.
मित्रों, ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गलतियों से सबक लिया और राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी. हमने तब भी कहा था कि बिहार पुलिस भारत ही नहीं दुनिया का सबसे भ्रष्ट संगठन है ऐसे में इस आन्दोलन का सफल होना नामुमकिन हैं. सरकार इसे असफल नहीं होने देगी और बिहार पुलिस इसे सफल नहीं होने देगी.
मित्रों, आज शराबबंदी लागू होने के डेढ़ साल बाद क्या स्थिति है? पैसे वाले पियक्कड़ों को तस्करों ने होम डिलीवरी की सुविधा दे दी है. एक फोन पर उनके घर पर शराब पहुंचा दी जाती है. दाम जरूर दोगुना देना पड़ रहा है. यद्यपि तस्कर भी जब पकडे जाते हैं तो उनकी सालभर की कमाई जमानत लेने में ही उड़ जाती है. लेकिन ये छोटे तस्कर हैं. बड़े तस्कर जो राजनीति में भी दखल रखते हैं उन पर कोई हाथ नहीं डालता. हमारे वैशाली जिले के ही एक एमएलसी पहले भी शराब माफिया थे और आज भी हैं. रोज ट्रक से माल मंगाते हैं लेकिन किसी की क्या मजाल कि उन पर हाथ डाल दे.
मित्रों, छोटे पियक्कड़ जो पहले मुंहफोड़वा से दिल लगाए थे अब ताड़ी से काम चला रहे हैं. ऐसे में ताड़ी बेचनेवालों की पौ-बारह है और उन्होंने ताड़ी के दाम कई गुना बढ़ा दिए हैं. इतना ही नहीं राज्य में गांजा और ड्रग्स की तस्करी में भी भारी इजाफा हुआ है. लेकिन अगर बिहार में शराबबंदी से सबसे ज्यादा किसी को लाभ हो रहा है तो वो है यहाँ की पुलिस. माल पकड़ाता है एक ट्रक तो बताया जाता है एक ठेला. बांकी पुलिसवाले खुद ही बेच देते हैं. जब्त दर्ज माल के भी बहुत बड़े हिस्से के साथ ऐसा ही किया जाता है और रिपोर्ट बना दी जाती है कि चूहे शराब पी गए.
मित्रों, ऐसे में बिहार सरकार को विचार करना होगा कि शराबबंदी से किसको क्या मिला? राज्य से खजाने को भारी नुकसान होने के बावजूद मैं मानता हूँ कि सरकार का कदम सही है लेकिन दुनिया की सबसे भ्रष्ट संस्था बिहार पुलिस पर वो कैसे लगाम लगाएगी विचार करने की जरुरत है क्योंकि बिल्ली कभी दूध की रखवाली नहीं कर सकती? बड़े शराब माफियाओं पर भी हाथ डालना इस मुहिम की सफलता के लिए जरूरी हो गया है. साथ ही अगर गांजा और ड्रग्स की आमद को भी रोका नहीं गया तो बिहार की पूत मांगे गई थी और पति गँवा के आई वाली स्थिति होनेवाली है.

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

पीछा करो

मित्रों, आपने कभी किसी का पीछा किया है? हमने तो नहीं किया. लड़की और बस के पीछु तो आपुन कभी भागा इच नहीं. हाँ कभी किसी को गलतफेमिली हो सकती है कि हम उसके पीछु पड़े हुए हैं. होता यह है कि कई बार हाजीपुर में हम सुभाष चौक पर बाईक से होते हैं और कोई लड़की स्कूटी से हमारे आगे होती है. फिर हम सिनेमा रोड में होते है तो वो भी वही होती हैं. फिर हम किसी काम से यादव चौक पर होते है और वो भी वहीँ पर होती है.  मगर ऐसा हम जानबूझकर नहीं करते या वहां-वहां जानबूझकर नहीं होते बल्कि संयोगवश होते हैं.
मित्रों, ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है. अमीन सयानी जी ने एक बार एक बड़ा ही दिलचस्प वाकया सुनाया था रेडियो पर. लता दीदी ने उस समय फिल्मों में नया-नया गाना शुरू किया था. वो रोज घर से निकलतीं. तांगा पकडतीं. फिर स्टेशन से लोकल ट्रेन पकडतीं. फिर ट्रेन से उतर कर तांगा पकडतीं और उतरने के बाद पैदल चलकर बॉम्बे टॉकीज जातीं. एक दिन ऐसा हुआ कि एक घुघराले बालों वाला लड़का उनके घर के पास से उसी तांगे में बैठा जिसमें लता दी बैठीं. फिर वही ट्रेन और फिर से वही तांगा. यहाँ तक कि पैदल वो उनके पीछे-पीछे बॉम्बे टॉकीज भी आने लगा. लता दी डर गई और लगभग दौड़ते हुए बॉम्बे तौकिज के मालिक हिमांशु रॉय और अभिनेता अशोक कुमार के पास पहुँच गई. फिर उनको बताया कि वो लड़का जो अभी गेट में घुस रहा है उनका पीछा कर रहा है. लड़के पर नजर जाते ही सभी हंस पड़े. दादामुनि ने कहा कि ये उनका छोटा भाई किशोर है जो कल ही मुंबई आया है. संयोग से ये भी आज वहीँ से बॉम्बे टॉकीज आ रहा है जहाँ से तुम आ रही हो. कहना न होगा बाद में लता और किशोर पक्के भाई-बहन बन गए.
मित्रों, अब अगर लता दी घटना का राजनीतिकरण करती और हमारी मीडिया जो कुछ दिनों से टीआरपी के लिए महिलाओं की चोटी कटवाती फिर रही होती मामले को लपक लेती कि सुपर स्टार दादामुनि के भाई ने एक गरीब लड़की का पीछा किया और उसका जीना मुहाल कर दिया. किशोर कुमार की गलती बस इतनी होती कि वे उस रास्ते से आते और अशोक कुमार के भाई होते. बांकी तो उनको भी पता नहीं होता कि वे किसी का पीछा कर रहे हैं.
मित्रों, खैर चंडीगढ़ पीछा करो कांड में एक अच्छी बात यह हुई है कि घटना का वीडियो फुटेज मिल गया है जिससे बहुत जल्द दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. पता चल जाएगा कि भाजपा नेता का बेटा सड़क पर चुपचाप जा रहा था या छेड़खानी भी कर रहा था. तब तक आप लोगों को राम राम इस चेतावनी के साथ कि सड़क पर सचेत रहें सावधान रहें कि कोई लड़की आपके आगे-आगे तो नहीं चल रही है. अगर आप भाजपा नेता के बेटे हैं तो बेहतर होगा कि आप सड़क पर निकले ही नहीं.

शनिवार, 5 अगस्त 2017

सत्ता पक्ष के नेताओं पर छापे क्यों नहीं?

मित्रों, क्या आपको याद है कि जबसे अपना देश आजाद हुआ है तबसे हमारे देश और प्रदेश में कितने लोकसभा और विधानसभा चुनाव भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लडे गए? न जाने कितनी बार चुनाव जीतनेवाली सरकारों ने चुनावों से पहले हमसे वादे किए कि जीतने के बाद हम सत्तारूढ़ दल के भ्रष्ट नेताओं को सजा दिलवाएंगे लेकिन चुनाव जीतने के बाद भूतपूर्वों को सजा दिलवाना तो दूर वादा करनेवाले खुद ही भ्रष्टाचार में लिप्त हो गए.
मित्रों, यह हमारे लिए बड़े ही सौभाग्य की बात है कि पिछले ७० सालों में पहली बार केंद्र में एक ऐसी सरकार काम कर रही है जिसने खुद को भ्रष्ट होने से बचाते हुए देसी-विदेशी कालाधन और बेनामी संपत्ति के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई शुरू की है. पिछली सरकारों की तरह इसने भूतपूर्व नेताओं को बख्श नहीं दिया है बल्कि उनके द्वारा अर्जित कालेधन और बेनामी संपत्ति को भी पूरी बेरहमी के साथ जब्त किया है. लेकिन ऐसा देखने में आ रहा है उसकी कार्रवाई में निष्पक्षता नहीं है और चुन-चुनकर सिर्फ विपक्षी नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है. सत्ता पक्ष के जिन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई है वे काफी छोटे स्तर के भ्रष्टाचारी व नेता हैं.
मित्रों, सवाल उठता है कि क्या सिर्फ विपक्ष के नेता ही भ्रष्ट हैं? कल तक जो भ्रष्ट नेता विपक्ष में थे और आज भाजपा में आ गए हैं उनके खिलाफ क्यों कार्रवाई नहीं हो रही? क्या भाजपा में आ जाने मात्र से ही वे ईमानदारों की श्रेणी में आ गए? लालू परिवार अगर भ्रष्ट हैं तो मुलायम परिवार उनसे कम तो नहीं? बिहार के प्रसिद्ध  पासवान परिवार की संपत्तियों की गहराई और उतनी ही निष्ठुरता के साथ क्यों नहीं जांच की जा रही? बोकारो स्टील कारखाना बहाली में गड़बड़ी को लेकर उनके खिलाफ सीबीआई ने मनमोहन सरकार के अंतिम दिनों में जो जाँच शुरू की थी उसका क्या हुआ कौन जवाब देगा?
मित्रों, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भी पिछले सालों में कई घोटाले हो चुके हैं लेकिन आज तक किसी नेता को सजा नहीं मिली है. इनमें से व्यापम घोटाला तो जैसे भूतहा है. इसी तरह राजस्थान में गौमाता के नाम पर अनगिनत घोटाले हो रहे हैं. सरकारी गौशालाओं में एकसाथ सैंकड़ों गायों की मौत हो रही है लेकिन वहां तो कोई छापा नहीं पड़ रहा.
मित्रों, कुल मिलाकर हमारा मानना है इस तरह की एकतरफा कार्रवाई से भ्रष्टाचार कम तो होगा लेकिन पूरी तरह से ख़त्म नहीं होगा. उसके लिए सारे भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ निष्पक्ष होकर कार्रवाई करनी होगी इस तथ्य को मोदी सरकार को समझना होगा. मैं समझता हूँ कि वो इसे समझ भी रही है.

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

चीन को आतंकी राष्ट्र घोषित करवाए भारत

मित्रों, मुझे उम्मीद है कि आपने कभी-न-कभी कनकौआ जरूर देखा होगा. जो मित्र राहुल गाँधी की तरह अपने शहर में आलू की फैक्ट्री लगाना चाहते हैं उनको बता दूं कि हमारे बिहार में मक्के या आलू के खेत में कौओं,चूहों आदि को डराने के लिए खेतों में एक मानवनुमा पुतले को खड़ा कर दिया जाता है. जानवर और पक्षी उनको आदमी समझ लेते हैं और खेत में आने से डरते हैं जिससे फसल की रक्षा हो जाती है. लेकिन जिस दिन उनको पता चल जाता है कि उनको ठगा जा रहा है उसी दिन उनका डर समाप्त हो जाता है और पक्षियों में सबसे चतुर माने जानेवाले कौवे कनकौवे पर मल विसर्जन करने लगते हैं.
मित्रों, कुछ ऐसा ही चीन इन दिनों अपने पडोसी देशों के साथ करने की कोशिश कर रहा है. वो बार-बार हवाबाजी करता रहता है कि हमारे पास इतनी सेना है, इतने हथियार हैं, हम यह कर देंगे, हम वह कर देंगे लेकिन करता कुछ भी नहीं है. लगता है मानों वो फूंक मारकर ही पहाड़ को उडा देगा.
मित्रों, यह चीन न सिर्फ पाकिस्तानी आतंकियों का संयुक्त राष्ट्र संघ में बचाव कर रहा है बल्कि खुद भी आतंकियों की तरह पड़ोसियों में अपनी कथित ताकत का आतंक पैदा कर उनपर अपनी धौंस जमाना चाहता है. इतिहास साक्षी है कि चीन आमने-सामने की लडाई में आज तक किसी भी देश को हरा नहीं पाया है यहाँ तक कि छोटे-से वियतनाम के हाथों भी उसको शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा था. जहाँ तक १९६२ का सवाल है तो उस समय भी चीन से भारत की सेना हारी नहीं थी बल्कि नेहरु ने उनको जान-बूझकर या अपनी महामूर्खता के कारण एक के बाद एक भयंकर रणनीतिक गलतियाँ करते हुए हरवा-मरवा दिया था. सनद रहे कि उस समय भयंकर अकाल जिसे चीनी झेंप मिटाने के लिए गर्व से ग्रेट चाईनीज फेमिन कहते हैं से होनेवाली करोड़ों लोगों की मौतों के चलते कम्युनिस्ट पार्टी काफी अलोकप्रिय हो चुकी थी और ऐसे में भारत के खिलाफ मिले वाक ओवर ने माओ के लिए संजीविनी का काम किया था. इस संदर्भ में नेहरू की भूमिका संदिग्ध हो जाती है और इसकी गहराई से जांच किए जाने की आवश्यकता है. 
मित्रों, वही चीन आज फिर से १९६२ को दोहराना चाहता है मगर उसके पहले प्रयास को ही भारत की वर्तमान संघ सरकार ने ऐसा फटका दिया है कि वो पूरी दुनिया में हँसी का पात्र बनकर रह गया है. पिछले एक-डेढ़ महीने से चीन लगातार भारत को थोथी धमकियाँ देता जा रहा है कि हम पहाड़ हैं तो हम इतने शक्तिशाली हैं, हम ये कर देंगे हम वो कर देंगे लेकिन सच्चाई यही है कि वो डोकलाम में आज भी भारत के मुकाबले कमजोर स्थिति में है. अब तो उसकी स्थिति ऐसी हो गयी है कि उसके एकमात्र पडोसी मित्र पाकिस्तान की मीडिया भी उसका मजाक उड़ाने लगी है.
मित्रों, मेरा मानना है कि भारत को सीमा पर अपनी तैयारियों को युद्ध-स्तर पर और भी चाक-चौबंद तो करना ही चाहिए साथ ही पाकिस्तान का आतंकवाद के मुद्दे पर खुलकर साथ देने के लिए प्रत्येक वैश्विक मंच पर आड़े हाथों भी लेना चाहिए और उसको भी आतंकी राष्ट्र घोषित करवाने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि अपराधी की मदद करनेवाला भी बराबर का अपराधी होता है. चीन के कब्जे में आज भी हमारी हजारों किलोमीटर जमीन फँसी हुई है इसलिए वह किसी भी तरह नरम व्यवहार का अधिकारी नहीं है. फिर आज वैश्विक कूटनीति भी भारत के माकूल है इसलिए लोहा इससे पहले कि ठंडा हो जाए हथौड़े का जबरदस्त प्रहार कर देना चाहिए.

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

नीतीश का निर्णय देश-प्रदेश के हित में लेकिन.....

मित्रों, पिछले दिनों बिहार के राजनैतिक पटल पर जो घटित हुआ वह पूरी तरह से हतप्रभ कर देने वाला रहा. जो आदमी बार-बार ताल ठोककर कह रहा था कि मिटटी में मिल जाऊँगा लेकिन भाजपा से हाथ नहीं मिलाऊंगा उसने चंद घंटों में पाला बदल लिया और भाजपा की गोद में जाकर बैठ गया. सबकुछ इतनी तेजी में हुआ कि लगा कि जैसे सबकुछ पूर्वनिर्धारित था.
मित्रों, सवाल उठता है कि नीतीश कुमार ने जो कुछ किया क्या वो नैतिक रूप से सही था? नहीं कदापि नहीं. क्योंकि नीतीश का अचानक पाला बदल लेना जनादेश का सीधा अपमान है. लेकिन नीतीश के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. याद कीजिए वर्ष २०१० का विधान-सभा चुनाव. तब नीतीश भाजपा के साथ मिलकर प्रचंड बहुमत से चुनाव जीते थे लेकिन साल २०१३ में उन्होंने अचानक भाजपा को लात मारकर सरकार से बाहर कर दिया और रातोंरात उन्ही लालू से हाथ मिला लिया जिनके जंगल राज के खिलाफ लम्बे संघर्ष के बाद वो बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. जाहिर है नीतीश के लिए राजनैतिक मूल्यों और जनादेश का न तो पहले कोई मतलब था और न आज ही है. हमेशा जनता की आँखों में सिद्धांतों की धूल झोंकनेवाले नीतीश का तो बस एक ही सिद्धांत है कि अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता.
मित्रों, आश्चर्य है कि २०१५ के विधान-सभा चुनावों के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जुमला वीर कहने वाले नीतीश कल कैसे अपने मिट्टी में मिल जानेवाले बयान पर यह कहकर निकल लिए कि ऐसा कहना उस समय की आवश्यकता थी. इसका तो यही मतलब निकालना चाहिए कि नीतीश अंग्रेजी में चाइल्ड ऑफ़ टाइम और हिंदी में मतलब के यार हैं.
मित्रों, इतना ही नहीं नीतीश समय-समय पर शब्दों की परिभाषा तक बदल देते हैं. उनके अनुसार कभी सुशासन का मतलब अच्छा शासन होता है तो कभी कथित साम्प्रदायिकता को रोकना ही सुशासन हो जाता है फिर चाहे ऐवज में राज्य में कानून नाम की चीज ही न रह जाए. इतना ही नहीं बार-बार उनकी सांप्रदायिकता की परिभाषा भी बदलती रहती है. कभी भाजपा का साथ देना घनघोर साम्प्रदायिकता होती है तो कभी घोर धर्मनिरपेक्षता.
मित्रों, जाहिर है कि नीतीश कुमार ने थाली का बैगन बनकर मूल्यपरक राजनीति का मूल्य संवर्धन नहीं किया है बल्कि उसका अवमूल्यन ही किया है. हाँ इतना जरूर है उनके इस कदम से देश और प्रदेश को लाभ होगा. प्रदेश एक बार फिर से विकास की पटरी पर लौट आएगा. चाहे आदती गलथेथर नीतीश ने कल की प्रेस-वार्ता में भले ही यह नहीं माना हो कि पिछले ४ सालों में बिहार का विकास न केवल पूरी तरह से अवरूद्ध हो गया बल्कि रिवर्स गियर में चला गया लेकिन आंकड़ों में यह स्वयंसिद्ध है. चूंकि हमारे लिए नेशन फर्स्ट है इसलिए हम नीतीश के इस कदम का स्वागत करते है लेकिन भाजपा को चेताना भी चाहते हैं कि उनसे सचेत रहे और उनको ज्यादा सीटें देकर फिर से इतना मजबूत न होने दे कि वे फिर से मौसम के बदलने या फिर गिरगिट के रंग बदलने से पहले ही पाला बदलने की स्थिति में आ जाएं.

रविवार, 23 जुलाई 2017

हिन्दू राष्ट्रवाद से भयभीत कौन?

मित्रों, अगर आप हाजीपुर में किराया के मकान में रहते हैं तो आपको काफी सावधानी से रहने की आवश्यकता होती है. जैसे अगर आपके मकान मालिक के घर कोई कामवाली नहीं आती है तो आपके घर भी नहीं आनी चाहिए, अगर आपके मकान मालिक के पास गाड़ी नहीं है तो आपके पास भी नहीं होनी चाहिए, आपके खान-पान और रहन-सहन का स्तर भी उनलोगों से ज्यादा नहीं होना चाहिए इत्यादि. आप कहेंगे कि जब पैसे आप खर्च कर रहे हैं तो मकान मालिक कौन होता है टांग अड़ानेवाला? इतना ही नहीं कभी-कभी तो पड़ोस का मकान मालिक भी आपसे अनर्गल उम्मीदें रखने लगता है जैसे आप उनके यहाँ दरबार क्यों नहीं लगाते या उनकी चापलूसी क्यों नहीं करते इत्यादि.
मित्रों, कुछ ऐसी ही स्थिति इन दिनों भारत के भीतर और बाहर स्थित भारत विरोधी तत्वों की हिन्दुओं और हिंदुस्तान को देखकर हो रही है. हम वर्तमान में किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ रहे और न ही भूत में कभी किसी का बिगाड़ा है लेकिन फिर भी कई लोग और कई देश हमसे जले जा रहे हैं. बल्कि हम तो सनातन काल से इन्सान तो इन्सान जीव मात्र के लिए ईश्वर से सर्वे भवन्तु सुखिनः की प्रार्थना करते आ रहे हैं. फिर भी कुछ लोगों और देशों को समस्या है. क्या भारत ने चीन के आर्थिक विकास में कभी कोई बाधा डाली? बल्कि पुराने घावों को भूलकर मदद ही की फिर चीन को भारत की आर्थिक उन्नति से परेशानी क्यो होनी चाहिए? पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से जब चीन एफडीआई में दुनिया का सरताज बना हुआ था तब तो भारत को उससे डाह नहीं हुई फिर आज चीन क्यों जला-भुना जा रहा है जबकि भारत को इस क्षेत्र में उससे आगे निकले अभी एक साल ही हुआ है?
मित्रों, कहने का तात्पर्य यह है कि जो लोग या देश ईर्ष्या नामक दिमागी विकृति के शिकार हैं उनको अपना ईलाज कराना चाहिए अथवा आत्मपरीक्षण करना चाहिए. उनको खुश करने के लिए न तो हम अपना विकास करना बंद करेंगे और न ही अपने को मजबूत करना. चतुर्दिक विकास पर जितना उनका हक़ है उतना हमारा भी है.
मित्रों, जहाँ तक हिन्दू राष्ट्रवाद का सवाल है तो यह तो निश्चित है कि भारत में इस समय राष्ट्रवाद की लहर चल रही है लेकिन वह लहर किसी भी प्रकार से हिन्दू लहर नहीं है बल्कि उसमें उन सभी लोगों का समान योगदान है जो भारत से प्यार करते हैं और जिनको अपने भारतीय होने पर गर्व है. जो लोग अपनी मातृभूमि से ज्यादा सुदूर की जमीन या वहां की संस्कृति को ज्यादा महत्व देते है और चाहते हैं कि बांकी के लोग भी उनका अनुसरण करें तो उनसे हमारा आग्रह है कि वे भारत से प्रेम करें क्योंकि जब उनके घर में आग लगेगी तो कोई अरब या वेटिकन से नहीं आएगा बुझाने के लिए. अभी जब कश्मीर में बाढ़ आई तो किसने बाढ़-पीड़ितों की जान बचाई और सहायता की? वैसे हम अक्सर ट्रकों के पीछे लिखा देखते हैं कि जलनेवाला जलता रहेगा, ७२२२ चलता रहेगा. या फिर जलो मत संघर्ष करो आदि.

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

विकास से एकबार फिर वंचित रह गया बिहार

मित्रों, हमने काफी दिन पहले भक्तराज रामकृष्ण परमहंस की एक पुस्तक में एक कहानी पढ़ी थी. एक अंधा एक बार एक गुफा में घुस गया और बाहर निकलने के प्रयास में बार-बार दीवारों से टकरा जा रहा था. किस्मत देखिए कि जब भी वो दरवाजे के पास आता दीवार छोड़ देता था और उसे एक बार फिर से पूरी गुफा का चक्कर काटना पड़ता था.
मित्रों, कुछ ऐसी ही किस्मत बिहार की भी है. जब यह अविभाज्य था तब भी इसको प्रचुरता में निर्धनता का इकलौता उदाहरण माना जाता था और आज तो इसके पास लालू, बालू  और आलू के सिवा कुछ बचा ही नहीं है. वैसे कहने को तो अभी भी इसके पास अनमोल मानव संसाधन है लेकिन दुर्भाग्यवश यहाँ के लोगों की सोंच आज भी वही है जो राज्य के बंटवारे से पहले थी. यहाँ के लोग आज भी सिर्फ पेट के लिए जीते हैं विकास की भूख उनमें है ही नहीं.
मित्रों, जब देश को आजादी मिली और देश में औद्योगिक और कृषि क्रांति की शुरुआत हुई तो कांग्रेस पार्टी की केंद्र और राज्य की सरकारों की दुष्टता के चलते बिहार उससे वंचित रह गया. परिणाम यह हुआ कि बिहार से मजदूरों का पलायन उन राज्यों की तरफ शुरू हो गया जिन राज्यों को इसका लाभ मिला था और वह पलायन आज भी बदस्तूर जारी है.
मित्रों, बाद में १९९० के दशक में जब आर्थिक सुधारों के दौर में देश में दूसरी औद्योगिक क्रांति हो रही थी तब बिहार में शासन एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में था जिसका मानना था कि विकास करने से वोट नहीं मिलता.
मित्रों, दुर्भाग्यवश जब गुजरात को विकास की नई ऊंचाईयों तक ले जानेवाला सच्चा देशभक्त देश का प्रधानमंत्री बना जो ह्रदय से चाहता थे कि भारतमाता का पूर्वांग भी समान रूप से शक्तिशाली बने तो बिहार के मुख्यमंत्री ने उससे दूरी बना ली और उन्हीं लालू जी से महाठगबंधन करके बिहार की जनता को ठग लिया जिनकी छवि महाभ्रष्ट और महा विकासविरोधी की है. आज नरेन्द्र मोदी सरकार के अनथक सद्प्रयास से प्रत्यक्ष पूँजी निवेश के मामले में भारत नंबर एक पर है लेकिन बिहार अपने मुख्यमंत्री और अपनी मूर्खता के चलते एक बार फिर से इसके लाभ से वंचित हो रहा है.
मित्रों, आज बिहार में शासन-प्रशासन नाम की चीज नहीं है और यत्र-तत्र-सर्वत्र अराजकता का बोलवाला है. ऐसे माहौल में कौन करेगा बिहार में पूँजी निवेश? यहाँ तक कि परसों पटना हाइकोर्ट ने बिहार सरकार से पूछा राजनीति ही होगी या कुछ काम भी होगा. कोर्ट ने सरकार से वही पूछा जो हम पिछले चार सालों से पूछते आ रहे हैं. हाईकोर्ट ने सरकार से यह भी पूछा कि जब बहाली सही ढंग से नहीं करनी है, तो रिक्तियों का सब्जबाग क्यों दिखाते हैं जनता को?
मित्रों, कदाचित अपनी नीतिहीन राजनीति से उब चुके नीतीश कुमार लालू परिवार से छुटकारा भी पाना चाहते हैं लेकिन उनके विधायक और सांसद ही उनका साथ देने को तैयार नहीं हैं. मुझे लगता नहीं है कि नीतीश के अन्दर इतना नैतिक बल है कि वे सत्ता के अनैतिक मोह तो त्याग कर बिहार के भले की दिशा में कोई कदम उठाएंगे.

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

कानून डाल-डाल शशिकला पात-पात

मित्रों, क्या आप जानते हैं कि कानून क्या है? वेदों में वर्णन है कि राजा सभा और समिति की सहायता से शासन करते थे. बाद में प्राचीन और मध्यकाल में राजा का वचन ही शासन होता था. यद्यपि ज्यादातर राजा तब निष्पक्ष हुआ करते थे जिसकी एक झलक आपने बाहुबली फिल्म में देखी भी होगी . मुग़लकाल में मूल्यों का अवमूल्यन हो चुका था और बतौर तुलसी समरथ को नहीं दोष गोसाईं की स्थिति बन गयी थी। ब्रिटिश काल आते-आते स्थिति इतनी बिगड़ गयी कि गांधी जी कानून को अमीरों का रखैल बता गए।
मित्रों, आजादी मिलने के बाद तो जैसे भारत के अमीर और प्रभावशाली लोग कानून के साथ खिलवाड़ करने के लिए पूरी तरह से आजाद ही हो गए क्योंकि अब उनके जैसे और उनके बीच के लोगों के हाथों में ही सबकुछ है और उस सबकुछ में कानून भी आता है. इन वास्तविक रूप से आजाद होनेवाले लोगों में अमीर लोग, न्यायाधीश, अधिकारी और नेता प्रमुख थे. बांकी लोगों के लिए पहले भी देश एक विशाल जेलखाना था और अब भी है.
मित्रों, कानून खुद-ब-खुद तो लागू होने से रहा. शासन सजीव तो कानून सजीव और शासन निर्जीव तो कानून भी मुर्दा. और जब शासन कुशासन तो कानून सज्जनों के गले की फांस और दुर्जनों का कंठहार. ठीक ऐसी ही स्थिति भारत में बन गयी. लेकिन इसमें में सभी राज्यों में एकसमान स्थिति नहीं रही अन्यथा आज बिहार गरीब और गुजरात अमीर नहीं होता.
मित्रों, हमारे ब्रिटिश ज़माने के कानून के अनुसार कानून के समक्ष सभी बराबर हैं और उसको तोड़नेवालों को बिना किसी भेदभाव के जेल भेजने का प्रावधान है. लेकिन क्या ऐसा होता है? वास्तविकता तो यह है किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति को जल्दी सजा होती नहीं है और अगर होती भी है तो जेल उसके लिए जेल नहीं रह जाता बल्कि पञ्चतारा होटल बन जाता है. चाहे बिहार में २० साल पहले लालू जेल गए हों या कर्नाटक में आज शशिकला कारावास का दंड भोग रही हो. क्या उत्तर और क्या दक्षिण. क्या १९९७ और क्या २०१७ स्थिति एक समान है.
मित्रों, कुल मिलाकर प्रभावशाली लोगों के लिए जेल की सजा सजा है ही नहीं पिकनिक और आनंदयात्रा है. सवाल उठता है कि ऐसे में कानून का क्या मतलब है और इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं? बेशक हम किसी और पे दोषारोपण नहीं कर सकते क्योंकि देश में लोकतंत्र है. हम जब तक लालच या जातीय-सांप्रदायिक दुर्भावनाओं को देश से ऊपर रखेंगे स्थिति नहीं बदलेगी. जब विधानसभा और लोकसभा में चोरों, अराजकतावादियों और देशद्रोहियों का बहुमत होगा तो सिर्फ बागों में बहार है का झूठा तराना दिन-रात गाने से बहार आ तो नहीं जाएगी बल्कि देश और राज्य के मंच पर भारतेंदु के प्रसिद्ध नाटक अंधेर नगरी चौपट राजा का जीवंत मंचन होता रहेगा.

बुधवार, 12 जुलाई 2017

निर्दोषों पर हमला हिंदुत्व नहीं

मित्रों, मैंने अपने दिल्ली प्रवास के दौरान कई महिलावादी महिलाओं को पुरुषों जैसा व्यवहार करते देखा है. महिलाएं बेशक बराबरी के लिए संघर्ष करें लेकिन क्या उनके उन्मुक्त होकर जीने, खुलेआम सिगरेट-शराब पीने से महिलाओं का सशक्तिकरण हो जाएगा? इसी तरह मैंने बचपन में गाँव में कीर्तन करते हुए सरस्वती-विसर्जन किया है. बाद में जब महनार रहने आया तो देखा कि मुहर्रम में मुसलमान लाउडस्पीकर पर हो-हल्ला करते हुए जुलूस निकालते हैं. अब देख रहा हूँ कि हिन्दू भी सरस्वती-विसर्जन उसी तरीके से करने लगे हैं.
मित्रों, इस बार बांकी बिहार की ही तरह हाजीपुर में भी रामनवमी में हिन्दू संगठनों की मदद से उग्र जुलूस निकाला गया. सारे जुलूस ऐतिहासिक रामचौड़ा मंदिर जाकर समाप्त हो रहे थे. हर साल की भांति जब हम सपरिवार शाम में रामचौड़ा मंदिर पहुंचे तो पाया कि मंदिर के बाहर-भीतर हर जगह लम्पट युवकों का कब्ज़ा है. अंततः हम बिना पूजा किए ही लौट आए. हमें याद रखना चाहिए कि भीड़ जब उग्र हो जाती है तो अच्छे-बुरे का विचार काफी पीछे छूट जाता है फिर चाहे वो भीड़ हिन्दुओं की हो या किसी और धर्म माननेवालों की.
मित्रों, जब भी कोई हिन्दू पर्व त्योहार आता है तो उस पर मुस्लिम आतंकवादी हमले का खतरा पैदा हो जाता है. अभी जिन अमरनाथ यात्रियों पर हमला हुआ उनकी हमलावरों से क्या कोई दुश्मनी थी? जान-पहचान तक तो थी नहीं. इन हमलों को रोकने का क्या समाधान है? क्या इनको रोकने के लिए हिन्दुओं को भी मुस्लिम आतंकवादी हो जाना चाहिए और निर्दोष मुस्लिमों पर हमला बोल देना चाहिए भले ही वे इस तरह की हिंसा के खिलाफ ही क्यों न हों? फिर हममें और उनमें क्या फर्क रह जाएगा? क्या हमारे ऐसा करने से देश बेवजह के गृह-युद्ध की आग में नहीं जलने लगेगा? हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अगर हमारी भी प्रकृति और प्रवृत्ति हिंसक हो जाती है तो हम भी उसी तरह से आपस में ही लड़-कटकर मर जाएंगे जिस तरह से आज सीरिया, इराक, पाकिस्तान आदि में मुसलमान मर रहे हैं. यहाँ तक कि मस्जिदों तक को मुसलमानों के खून से ही लाल कर दे रहे हैं.
मित्रों, छत्रपति शिवाजी ने जब शाईस्ता खान को पूना में हराया तो उसके हरम की औरतें भी गिरफ्तार कर ली गईं. जब उनको शिवाजी के दरबार में लाया गया तो शिवा अपने ही सैनिकों पर नाराज़ हो गए और शाईस्ता खान की पत्नी जो औरंगजेब की मामी थी से माफ़ी मांगते हुए कहा कि काश आप मेरी माँ होतीं तो मैं भी काफी सुन्दर होता. इतना ही नहीं इसके बाद सभी बंदी महिलाओं को ससम्मान पालकी में बिठाकर मुग़ल शिविर में भिजवा दिया.
मित्रों, अगर इसके उलट उस युद्ध में हिन्दू महिलाएं मुगलों के हाथ आ जातीं तो वे उनके साथ क्या करते? बेशक वे उन पर टूट पड़ते. यह जानते हुए भी शिवाजी ने एक बेमिसाल उदाहरण पेश किया. क्या उनके ऐसा करने से हिंदुत्व का सिर और भी गर्व से ऊंचा नहीं हो गया? इसी तरह से राम ने जब लंका पर विजय प्राप्त की तो राक्षस प्रजा के साथ दयालुतापूर्ण व्यवहार किया.
मित्रों, आज अगर हिन्दुओं की पूरे भारत में दुर्गति हो रही है तो इसके लिए क्या मुसलमान जिम्मेदार हैं? नहीं हो भी नहीं सकते क्योंकि आज भी हिन्दू आबादी में उनसे कई गुना ज्यादा हैं. आज अगर हिन्दू के घर में सांप घुस जाए तो उसको मारने के लिए एक लाठी भी नहीं मिलती. किसने रोका है आत्मरक्षा के लिए वैध हथियार रखने से? जिनके पास अरबों की संपत्ति है उनके पास भी एक लाईसेंसी बन्दूक तक नहीं होती. क्यों? क्या हम अरबों कमानेवाले लाख-दो लाख रूपया आत्मरक्षा पर खर्च नहीं कर सकते? इसी तरह से जब चुनाव आता है तो हिन्दू किसी लालू, केजरीवाल, ममता, अखिलेश जैसे घोषित हिन्दू विरोधी द्वारा दिए गए लालच में आकर उनको वोट दे देते हैं और जब चुनाव के बाद उनकी ही शह पे मुसलमान उनका जीना दूभर कर देते हैं तब वे केंद्र सरकार से राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करने लगते हैं. आखिर केंद्र कहाँ-कहाँ राष्ट्रपति शासन लगाएगा?
मित्रों, फिर भी केंद्र सरकार को जनसंख्या नियंत्रण के लिए अतिशीघ्र कानून बनाना चाहिए या यूं कहें कि बनाना पड़ेगा जिससे भारत में विभिन्न धर्मों की आबादी का अनुपात स्थिर रहे. ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि आज मुस्लिमबहुल पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान जो १४ अगस्त,१९४७ तक भारत में ही थे में हिन्दू विलुप्ति के कगार पर पहुँच चुके हैं. खुद हमारी कश्मीर घाटी में आज एक भी हिन्दू नहीं हैं जबकि कुछ सौ साल पहले पूरा कश्मीर हिन्दू था. 

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

राहुल क्यों गए थे चीनी दूतावास?

मित्रों, पता नहीं क्यों मुझे मनमोहन सरकार के गठन के तत्काल बाद ही ऐसा लगने लगा था कि यह सरकार देश के दुश्मनों के हाथों में खेल रही है. २००९ के बाद मैंने अपने ब्लॉग पर कई-कई बार लिखा कि सोनिया-मनमोहन की सरकार देश की दुश्मन है और भारत की बर्बादी के एजेंडे पर काम कर रही है.
मित्रों, उनके बाद जनता ने उनकी जो दुर्गति की उससे आप भी वाकिफ हैं लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कांग्रेस पार्टी आज भी अपने भारत की बर्बादी के गुप्त एजेंडे पर पूरी मुस्तैदी से काम कर रही है. वरना ऐसी कौन-सी बात थी जिस पर विचार-विमर्श करने राहुल गाँधी ८ जुलाई को चीनी दूतावास गए थे.
मित्रों, जो ख़बरें छनकर आ रही हैं उनसे यह भी पता चला है कि राहुल इससे पहले भी गुप्त रूप से दो बार चीनी दूतावास जा चुके हैं. कदाचित उनकी ताजा यात्रा भी गुप्त ही रह जाती लेकिन चीनी दूतावास के अधिकारियों के उतावलेपन के कारण इसके बारे में दुनिया को पता चल गया. अब खुद कांग्रेस पार्टी कह रही है कि राहुल उस दिन भूटान के दूतावास में भी गए थे.
मित्रों, पता नहीं परदे के पीछे कांग्रेस पार्टी कौन-सी खिचड़ी पका रही है? जबकि हम सभी जानते हैं कि इस समय चीन का भूटान सीमा पर भारत के साथ गहरा तनाव चल रहा है और दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने है? हो सकता है मेरा अनुमान बाद में पूरी तरह से सही साबित न हो लेकिन जहाँ तक मैं कांग्रेस पार्टी को समझ पाया हूँ मुझे लगता है कि राहुल चीन की तरफ से धमकाने के लिए भूटान के दूतावास में गए थे. क्योंकि उनको लगता है कि अगर चीन ने भारत को नीचा दिखा दिया तो आगे मोदी सरकार देश के सामने मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेगी और कांग्रेस की सत्ता में पुनर्वापसी का रास्ता फिर से खुल जाएगा. मेरा अनुमान यह भी है कि कांग्रेस पार्टी को चीन से मोटा कमीशन मिलता है.
मित्रों, राहुल गाँधी की चीनी दूतावास की गुप्त यात्राओं का चाहे जो भी मकसद हो लेकिन इन यात्राओं को जिस तरह से देश की नज़रों से छिपाया जा रहा था उससे लगता तो यही है इनका उद्देश्य भारत का भला करना तो नहीं ही था. तो क्या चीन की बदमाशियों के पीछे कांग्रेस पार्टी है? खैर होगी भी तो क्या? चीन को भलीभांति यह समझ लेना चाहिए कि आज न तो १९६२ का भारत है और न ही ६२ वाला नेतृत्व. आज अगर वो भारत से भिड़ा तो उसका वही हाल होगा जो चौबेजी का छब्बे बनने के चक्कर में हुआ था.

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

ममता की आग में जलता हिंदुत्व

मित्रों, कई साल हो गए. तब उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि जहां 10-20 प्रतिशत मुसलमान होते हैं, वहां छिटपुट सांप्रदायिक दंगे होते रहते हैं। जहां 20-35 प्रतिशत होती है, वहां गंभीर दंगे होते हैं और जहां उनकी आबादी 35 प्रतिशत से ज्यादा होती है, वहां गैर मुस्लिमों के लिए कोई जगह नहीं है। तब मेरे साथ-साथ बहुत-से लोगों को उनका बयान भड़काऊ और बकवास लगा था लेकिन जब हम आज के पश्चिम बंगाल के हालात देखते हैं तो लगता है कि योगी जी ने जो कहा था बिल्कुल सही कहा था और व्यावहारिक अनुभव के आधार पर कहा था.
मित्रों, साल २०११ में मैंने भी कुछ कहा था. तारीख थी १४ मई. ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में चुनाव जीत चुकी थीं लेकिन शपथ-ग्रहण नहीं हुआ था. तब हमने कहा था कि सांपनाथ हारे नागनाथ जीते. अर्थात ममता और कम्युनिस्टों में कोई तात्विक भेद नहीं है. दोनों का एजेंडा भी एक ही है और काम करने का तरीका भी एक ही.
मित्रों, आज ममता के शासन के ६ साल बाद मैं ताल ठोंक के कह सकता हूँ कि इससे अच्छा तो कम्युनिस्टों का ही शासन था. ममता वोट-बैंक के लिए वही गलतियाँ कर रही है जो बंगाल में कम्युनिस्टों, यूपी में अखिलेश और केंद्र में सोनिया ने किया. कथित अल्पसंख्यकों को सर पर चढ़ा लेना और बहुसंख्यकों की पूर्ण अवहेलना करना.
मित्रों, आज बंगाल के हालात क्या है? आज बंगाल में हिन्दू उतने भी सुरक्षित नहीं हैं जितने बंगला देश में हैं. कहना न होगा कि योगी आदित्यनाथ की भविष्यवाणी यहाँ एकदम सटीक साबित हो रही है. बंगाल में मुसलमान ३५ % हो चुके हैं. आज के बंगाल में सचमुच हिन्दुओं के लिए कोई जगह नहीं रह गई हैं. बंगाल दूसरा कश्मीर बनने की और तीव्र गति से अग्रसर है. ऐसे में जब राज्य सरकार को उनपर सख्ती से नियंत्रण करना चाहिए तो वो उनको और भी बढ़ावा दे रही है. मानों ६५ % हिन्दुओं की उसकी नजर में कोई कीमत ही नहीं.
मित्रों, कीमत हो भी कैसे जबकि बंगाली हिन्दुओं में से बहुत-से लोग निजी या जातीय स्वार्थ के लिए तृणमूल कांग्रेस के समर्थक बने हुए हैं. हालाँकि ऐसे ही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब वे भी सीधी कार्यवाही के शिकार होंगे. समझे नहीं क्या? इतिहास गवाह है कि भारत की स्वतंत्रता के पूर्व इसी बंगाल की राजधानी कोलकाता से मुस्लिम लीग ने इतिहास के सबसे भीषण दंगों की शुरुआत की थी.  लीग द्वारा 'सीधी कार्यवाही' की घोषणा से १६ अगस्त सन् १९४६ को कोलकाता में भीषण दंगे शुरु हो गये। इसे कलकत्ता दंगा या कलकत्ता का भीषण हत्याकांड (Great Calcutta Killing) कहते हैं। 'सीधी कार्रवाई' मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की माँग को तत्काल स्वीकार करने के लिए चलाया गया अभियान था। यह 16 अगस्त 1946 को प्रारंभ हुआ, जब लीग के उकसाने पर कलकत्ता तथा बंगाल और बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों में भीषण दंगे भड़क गए। 72 घंटों के भीतर छह हजार से अधिक लोग मारे गए, बीस हजार से अधिक गंभीर रूप से घायल हुए और एक लाख से अधिक कलकत्तावासी बेघर हो गए। उसके बाद जब दंगों की आग पंजाब पहुंची तो ६०-७० लाख लोग इसकी आग में झुलस गए. कहना न होगा कि प्रभावितों में और मरनेवालों में तब भी हिन्दू ज्यादा थे. तो क्या फिर से बंगाल उसी इतिहास को दोहराने जा रहा है? फिर से बंगाल से एक और बंगला देश निकलेगा?  और क्या हम हिन्दू बंगाल खाली करके मूकदर्शक बने ऐसा होने देंगे?
मित्रों, आज संकट की इस विकट घडी में बंगाल में कौन-से दल हिन्दुओं के साथ है? बंगाल के अन्य दंगों की तरह वशीरहाट के दंगों में भी मुसलमानों ने न तो किसी कम्युनिस्ट नेता को मारा और न ही तृणमूल या कांग्रेस के कार्यकर्ता को. वहां भी सिर्फ और सिर्फ भाजपा कार्यकर्ताओं की चुन-चुनकर हत्या की गयी. जब भी इस्लाम के नाम पर दंगे होते हैं और हत्याएं होती हैं केवल भाजपाई ही हिन्दुओं के लिए जान देते आए हैं और देते रहेंगे बांकी दल तो शुरू से ही घोषित हिन्दू-विरोधी हैं.
मित्रों, यह तो सही है कि केरल के साथ-साथ बंगाल में भी केवल भाजपाई हिन्दुओं के लिए जान दे रहे हैं लेकिन सवाल यह भी उठता है कि आखिर कब तक ऐसा चलता रहेगा? कब तक हिन्दू कट्टर इस्लाम के हाथों बंगाल में जलता, लुटता और मरता रहेगा? कब तक केंद्र सरकार मूकदर्शक होकर हिन्दू महिलाओं का बलात्कार और हत्या देखती रहेगी? कब लगेगा बंगाल में राष्ट्रपति शासन? कब????? कितनी हिन्दू बस्तियों के जलने के बाद????

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

इजराईल में मोदी,देर आयद दुरुस्त आयद

मित्रों, यह हमारे लिए बड़े ही सौभाग्य की बात है कि इस समय हमारे प्रधानमंत्री इजराईल में हैं. दुर्भाग्यवश वे वहां जानेवाले भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं. दुर्भाग्यवश इसलिए क्योंकि वोटबैंक की गन्दी राजनीति के चलते पहले के प्रधानमंत्री वहां नहीं गए जबकि १९६२, १९७१ और १९९९ की लड़ाइयों के समय इजराईल ने हर तरह से हमारी मदद की. वो तो खुलकर हमारी मदद करना चाहता था लेकिन हमने उससे चोरी-चोरी चुपके-चुपके सहायता ली. वजह वही वोटबैंक की गन्दी राजनीति. वोटबैंक पहली प्राथमिकता और देश सबसे अंतिम या फिर प्राथमिकता सूची से बिल्कुल बाहर. वैसे वाजपेयी जी को मैं दोषी नहीं ठहराता क्योंकि उनके पास पूर्ण बहुमत था ही नहीं. तो मैं कह रहा था कि हमारी पूर्ववर्ती सरकारों ने अपने राष्ट्रीय हितों को नजरंदाज कर निजी हितों के लिए हमेशा उन फिलिस्तीनियों का एकतरफा और असंतुलित समर्थन किया जिन्होंने हमेशा कश्मीर के मुद्दे पर हमारे दुश्मन पाकिस्तान का साथ दिया.
मित्रों, रामजी की कृपा से भारत के इतिहास में पहली बार केंद्र में एक ऐसी सरकार हमने बनाई है जिसके लिए पहली दस प्राथमिकताओं में एक से लेकर १० तक सिर्फ देशहित है और देशहित ही है. इसलिए सत्ता में आते ही पहले के चलन को बदलते हुए इजराईल से नजदीकियां बढ़ाई गईं और एकतरफा प्यार को दोतरफा बनाया गया. अब तक इजराईल बार-बार आई लव इंडिया का रट्टा लगाते हुए हमारी तरफ दोस्ती का हाथ बढा रहा था लेकिन हम बार-बार उसके बढे हुए हाथ, खुली हुई बाँहों को झटक दे रहे थे.
मित्रों, अब जबकि इतिहास में की गयी गलतियों को मोदी सरकार ने सुधार लिया है और भारत के सच्चे दोस्त की तरफ दोगुनी गर्मजोशी के साथ हाथ बढाया है तो भारत की रणनीतिक क्षमता में एकबारगी जैसे चमत्कारिक अभिवृद्धि हो गयी है. इजराईल देखने में तो छोटा-सा मुल्क है लेकिन है सतसैया के दोहरे तीर की तरह. उसके पास जो तकनीक है वो अमेरिका को छोड़कर अन्य किसी के पास नहीं है. दुनियाभर में डेढ़ करोड़ से भी कम आबादी वाला यहूदी समुदाय इस कदर प्रतिभा का धनी है कि अब तक १९२ नोबेल पुरस्कार उसकी झोली में जा चुके है. मानों इस समुदाय में लोग पैदा ही होते हैं नोबेल जीतने के लिए. कहना न होगा कि यह वही समुदाय है जो पिछले २००० सालों से दुनियाभर में ठोकरें खाता फिर रहा था. यहाँ तक कि शेक्सपीयर की कहानी मर्चेंट ऑफ़ वेनिस में भी उसको बुरा-भला कहा गया. इनको अगर किसी ने सही मायने में गले से लगाया तो वो केवल भारत था. जर्मनी में तो द्वितीय विश्वयुद्ध के ६ सालों में ६० लाख यहूदियों को यातना देकर मार दिया गया जिनमें से १५ लाख बच्चे थे. स्वामी विवेकानंद अंग्रेजों को यथार्थ क्षत्रिय कहा करते थे लेकिन इजराईल तो एकसाथ यथार्थ क्षत्रिय और ब्राह्मण दोनों है. साहस और बुद्धि का अद्भुत संगम.
मित्रों, प्रधानमंत्री मोदी की इजराईल यात्रा से हमें एकसाथ कृषि, रक्षा और तमाम तरह के तकनीकी क्षेत्रों में अभूतपूर्व लाभ प्राप्त होने जा रहा है जिससे हम अभी तक बेवजह वंचित थे. इतना ही नहीं अमेरिका में भारतीय लॉबी की ताक़त अब कई गुना बढ़ जाएगी क्योंकि उसके साथ अमेरिका की सबसे शक्तिशाली यहूदी लॉबी सुर-में-सुर मिलाकर बोलेगी. आश्चर्य होता है कि क्यों नेहरु को कूटनीति का महारथी कहा जाता है जबकि उनकी नीतियों से भारत को केवल क्षति हुई लाभ कुछ भी नहीं मिला भले ही नेहरु परिवार को मिला हो. सौभाग्यवश इजराईल यात्रा करके नरेन्द्र मोदी जी ने नेहरु सिद्धांत को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी है और दुनिया को सन्देश दे दिया है कि अब हम भी वही करेंगे जो देशहित में होगा. दुनिया के बांकी देशों की सरकारें भी तो यही करती हैं

सोमवार, 3 जुलाई 2017

प्रियंका का खून और सोनिया के आंसू

मित्रों, आपलोगों ने भी एक चुटकुला जरूर पढ़ा होगा जिसमें एक व्यक्ति का दूसरे से उसकी पत्नी की मौजूदगी में झगडा हो जाता है. जब तक पति दूसरे को पीट रहा होता है तब तक तो महिला मज़ा लेती है लेकिन जैसे ही पति मार खाने लगता है वो पुलिस को फोन कर देती है. पुलिस जब पूछती है कि इतनी देर से मारा-मारा चल रही है तो पहले क्यों नहीं फोन किया तो महिला जबाव देती है कि तबसे तो मेरे पति उसे पीट रहे थे.
मित्रों, हमारे गाँधी-नेहरु परिवार की भी इन दिनों यही हालत है. जब देश में एक के बाद एक जेहादी आतंकवादी हमले हो रहे थे और धरती को कथित काफिरों के निर्दोष खून से लाल किया जा रहा था, जब हजारों निर्दोष सिखों को गले में जलता हुआ टायर डाल कर कांग्रेसियों ने जिन्दा जला दिया तब राजमाता  Antonia Edvige Albina Maino उर्फ़ सोनिया गाँधी की आँखों से एक कतरा आंसू नहीं टपका. लेकिन जैसे ही पुलिस मुठभेड़ में चंद मुस्लिम आतंकवादी मारे गए उनका दिल जार-जार रोने लगा और आँखों से गंगा-जमुना की निर्बाध धारा बह निकली. आतंकियों के प्रति इतनी दया इतनी करुणा तो शायद लादेन के मन में भी नहीं उमड़ी होगी.
मित्रों, यह कैसी भारतीय राजनेता है जो भारत पर हमला करनेवालों के प्रति ही इतनी गहरी सहानुभूति रखती है! फिर ऐसी महिला कैसे स्वप्न में भी भारत का भला सोंच सकती है? और हम भी कितने दीवाने थे कि उसकी ही गोद में सर रखकर दस सालों तक अपने और अपने देश के भले के सपने देखते रहे!?
मित्रों, जब माँ ऐसी होगी तो उसके बच्चे कैसे होंगे जिनके जिस्म में राजमाता का खून प्रवाहित हो रहा है और जिनकी परवरिश राजमाता के मार्गदर्शन में हुआ है? सो बेटी ने भी सिद्ध कर दिया वो मामूली माहिला की नहीं बल्कि महान भारतीय सोनिया गाँधी की बेटी है. जब भीड़ हिन्दुओं-सिखों को मार रही थी तब तो बेटी नयनसुख प्राप्त करने में लगी थी लेकिन जैसे ही भीड़ के हाथों मरनेवाला मुसलमान हुआ अचानक उसका खून खौलने लगा,भुजाएँ कसमसाने लगीं,नसें फरकने लगीं.
मित्रों, ये कैसी करुणा है जो केवल जेहादी दरिंदों के लिए उमड़ती है और यह कैसा खून है जो सिर्फ एक मजहब विशेष के लिए ही खौलता है? यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं किसी भी तरह के भीड़तंत्र के खिलाफ हूँ. चाहे भीड़ के हाथों मुसलमान मारे जाएँ या काफ़िर. लेकिन राजमाता के मन में इतनी करुणा! आहा,मन अभिभूत हुआ जा रहा है. आज अगर महत्मा ईसा होते तो अपने रक्त से आपके चरण पखारते. और इतना गुस्सा! इतना गुस्सा तो अमरीशपुरी को उनकी किसी भी फिल्म में नहीं आया था. बल्कि आपको याद होगा कि मिस्टर इंडिया में तो वे बार-बार खुश हो रहे थे. इंडिया धन्य हो गया कि ऐसे महामानवों के पांव उसकी धरती पर पड़े.

रविवार, 2 जुलाई 2017

अर्थव्यवस्था के लिए राकेट इंजन साबित होगा जीएसटी

मित्रों, शायर अल्लामा इक़बाल ने क्या खूब कहा है-हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है,बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा. और यह हमारा सौभाग्य है कि आजादी के ६७ साल बाद हमारे देश ने खुद को एक ऐसा दीदा-वर नेतृत्व प्रदान किया है जिसके लिए देश का चमन ही सब कुछ है. ईश्वरीय कृपा से देश में आज एक ऐसी सरकार है जो ऐसे बहाने नहीं बनाती कि ५ साल बहुत कम होता है बल्कि वो ५ साल में ही वो सारे जरूरी काम कर लेना चाहती है जो पिछले ६७ सालों की सरकारें नहीं कर पाई थीं. मास्टर स्ट्रोक पर मास्टर स्ट्रोक. जनता मस्त चीन-पाकिस्तान समेत समस्त विपक्ष पस्त.
मित्रों, आपको याद होगा कि पिछले साल ३०-३१ जुलाई को मैं श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन की ओर से आयोजित होनेवाली राईटर्स मीट में भाग लेने दिल्ली गया था. तब मैंने आपको वहां के माहौल के बारे में बताया था कि वक्ताओं ने उपलब्धियों का वर्णन तो बहुत कम किया केंद्र सरकार की मजबूरियों का रोना ज्यादा रोया. लगता था जैसे केंद्र सरकार के हाथों में कुछ है ही नहीं संविधान-निर्माताओं ने सबकुछ राज्य सरकारों के हाथों में दे दिया है. ऐसे माहौल में लोग केंद्र सरकार से निराश होने लगे थे. तभी पहले सीमा पर सर्जिकल स्ट्राइक और बाद में नोटबंदी ने जैसे फ़िजा को ही बदल कर रख दिया.
मित्रों, जब नोटबंदी की गयी तब हमने उसे ऐतिहासिक बताते हुए कहा था कि सरकार को यहीं पर रूक नहीं जाना चाहिए और बेनामी संपत्ति पकड़ने की दिशा में भी त्वरित कदम उठाने चाहिए. तब मुझे नहीं लगता था कि जीएसटी मोदी सरकार के इस कार्यकाल में मूर्त रूप ले पाएगी. लेकिन कल १ जुलाई २०१७  से जीएसटी एक सच्चाई बन चुकी है. इसमें कोई संदेह नहीं कि यह आजाद भारत में सबसे बड़ा अप्रत्यक्ष कर-सुधार है. अब तक हम कमोबेश उसी कर-प्रणाली को ढोते आ रहे थे जो अंग्रेज छोड़कर गए थे. कश्मीर से कन्याकुमारी तक अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कानून और अलग-अलग कर. विदेशी निवेशकों का तो समझने में जैसे दिमाग का दही ही हो जाता था. लेकिन अब करों के सारे मकड़जालों को साफ़ कर दिया गया है. १७ करों के स्थान पर सिर्फ एक कर और वो भी पूरे देश में एक समान. कुछ राज्यों की आपत्तियों को देखते हुए अभी सिगरेट,शराब और पेट्रो-उत्पादों को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है. इतना ही नहीं अब कर देने की प्रक्रिया को भी पूरी तरह से पारदर्शी बनाते हुए उसका डिजिटलीकरण कर दिया गया है.
मित्रों, जीएसटी को जो लोग गरीबों के लिए जजिया कर का नाम दे रहे हैं उनको बता दूं कि इससे भारत के सभी गरीब व बड़ी जनसंख्या वाले  राज्यों को भारी लाभ होने वाला है क्योंकि अब कर पहले की तरह उत्पादन वाले स्थानों पर नहीं लिया जाएगा बल्कि वहां लिया जाएगा जहाँ उत्पाद का अंतिम उपभोग होता है. जाहिर है जिस राज्य में कर संग्रहण होगा वहां की सरकार के खजाने में स्टेट जीएसटी ज्यादा जाएगा. अब न केवल भारत में उत्पादन करना ही आसान हो जाएगा बल्कि व्यापार करना भी सरल हो जाएगा.
मित्रों, जीएसटी लागू करके अप्रत्यक्ष करों में तो सुधार कर दिया गया है अब बारी है प्रत्यक्ष करों में सुधार की. नकली कंपनी बनाकर काले धन को ठिकाने लगानेवालों पर भी कार्रवाई की आवश्यकता है. पीएम मोदी ने अपने ३० जून के संसद में ऐतिहासिक भाषण और कल चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के समक्ष संबोधन में इसका संकेत भी दे दिया है.अगर जीएसटी के बाद इस दिशा में भी कदम उठाए जाते हैं तो इसमें कोइ संदेह नहीं कि भारतीय अर्थव्यस्था राकेट की गति से आगे बढ़ने लगेगी और कुछ ही सालों में हम दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति होंगे क्योंकि हमारे पास न केवल विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी है बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार भी है. कमी अगर कहीं है तो सिर्फ व्यवस्था की है,व्यवस्था में है. 
मित्रों, हालाँकि कर-संधारण के अतिरिक्त अभी भी हमारे देश में बहुत-कुछ ऐसा है जो औपनिवेशिक काल का है और उसमें आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है जैसे हमारी न्यायिक प्रणाली, हमारी पुलिसिंग, हमारे आपराधिक और दीवानी कानून, हमारी शिक्षा-व्यवस्था इत्यादि. लेकिन इससे जीएसटी लागू करने के महान कदम की महत्ता कम नहीं हो जाती.

मंगलवार, 27 जून 2017

अर्दब में लालू परिवार

मित्रों, पता नहीं आप कभी कुश्ती लड़ें हैं या नहीं. लड़ें तो हम भी नहीं हैं लेकिन लड़ाया बहुत है. मतलब कि बहुत-से डंकों में दर्शक की महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका हूँ. तो मैं बताना चाह रहा था कि कुश्ती में कभी-कभी ऐसी जकड़न जैसी स्थिति पैदा हो जाती है कि पहलवान लाख कोशिश करके भी कुछ कर नहीं पाता, हिल भी नहीं पाता. इस स्थिति को कुश्ती की भाषा में अर्दब कहते हैं.
मित्रों, खुद अपने मुंह से अपने आपको भारतीय राजनीति के अखाड़े का सबसे बड़ा पहलवान अथवा राजनीति का पीएचडी बतानेवाले लालू प्रसाद यादव इन दिनों सपरिवार अर्दब की स्थिति में फंस गए हैं. बेचारे ने बड़ी धूमधाम से उस व्यक्ति के साथ गठबंधन किया था जिसके बारे में वे स्वयं कभी कहा करते थे कि इस आदमी के तो पेट में भी दांत है. तब नीतीश ज्यादा मजबूर थे. मजबूर तो लालू भी थे लेकिन कम थे. नीतीश ने अचानक अपनी सरकार बचाने के लिए लालू जी से मदद मांगी और लालू जी बिहार आगा-पीछा सोंचे गठबंधन कर लिया. पहले मंझधार में पड़ी मांझी सरकार और बाद में कथित छोटे भाई नीतीश कुमार की सरकार को डूबने से बचाया.
मित्रों, तब जिन-जिन लोगों ने लालू परिवार को गठबंधन करने से रोका था जिनमें सबसे आगे रघुवंश बाबू थे को डांट-फटकारकर चुप करवा दिया गया. इससे पहले भी नीतीश लालू जी को काफी नुकसान पहुंचा चुके थे. यहाँ तक कि बिहार की गद्दी छीन ली थी लेकिन फिर भी लालू जी ने गठबंधन किया.
मित्रों, ऐसा नहीं है कि धोखे की गुंजाईश सिर्फ नीतीश की तरफ से थी. याद करिए इसी साल जब यूपी चुनाव के समय प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी जी को कुत्ता-कमीना बता रहे थे ठीक उसी समय बिहार में उनकी पार्टी के नेता तेजस्वी को सीएम बनाने की मांग करने में लगे थे. वो तो भला हुआ कि यूपी में भाजपा जीत गयी वरना बिहार में बहुत पहले तख्तापलट हो चुका होता.
मित्रों, सोंचा था क्या और क्या हुआ. यूपी चुनाव के बाद नीतीश का पलड़ा भारी हो चुका था. नीतीश ठहरे राजनीति के चाणक्य. सो एक के बाद एक लालू परिवार की बेनामी संपत्ति का खुलासा होने लगा. उधर दिल्ली की केंद्र सरकार भी जैसे तैयार ही बैठी थी. धड़ाधड़ छापेमारी और ताबड़तोड़ जब्ती. संभलने का कोई मौका नहीं. लालू के दोनों बेटों का मंत्रालय तक जाना बंद हो गया.
मित्रों, इसी बीच आ गया राष्ट्रपति चुनाव. भाजपा ने बहुत सोंच-समझकर और शायद नीतीश कुमार से पूछ लेने के बाद बिहार के राज्यपाल को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बना दिया. कोविंद इतने नीतीश फ्रेंडली रह चुके थे कि गाँधी मैदान में झंडा फहराने के बाद भी नीतीश सरकार द्वारा तैयार भाषण ही पढ़ते थे. नीतीश जो चाहते थे वो उनको मिल चुका था. मौका मिलते ही कूदकर भाजपा की तरफ हो लिए. लालू जी की पीएचडी की डिग्री धरी की धरी रह गयी. अब बेचारे सन्नाटे में हैं कि करें तो क्या करें. नीतीश को छोड़ देते हैं तो दोनों बेटे बेरोजगार हो जाएँगे और नहीं छोड़ते हैं तो भी सपरिवार जेल जाने की स्थिति उत्पन्न हो रही है. तरह-तरह के घोटालों से अर्जित धन-संपत्ति समाप्ति पर है सो अलग. वैसे भी नीतीश अब ज्यादा समय तक उनको ढोनेवाले नहीं हैं बल्कि सरकार में साथ रखकर भी धोने ही वाले हैं. समय का फेर देखिए कि चारा खानेवाला आज बेचारा बना हुआ है. भई गति चन्दन सांप केरी.

सोमवार, 19 जून 2017

टीम इंडिया हाय-हाय!

मित्रों,१९३२ का ओलंपिक चल रहा था. भारत और अमेरिका की hockey टीमें आमने-सामने थीं. मेजर ध्यानचंद गोल-पर-गोल दाग रहे थे. अंततः भारत ने अमेरिका को २४-१ से हरा दिया. इस करारी और शर्मनाक हार का असर यह हुआ कि उसके बाद अमेरिका ने hockey खेलना ही बंद कर दिया. हो सकता है कि आपमें से कुछ मित्र कहें कि अमेरिका ने सही किया लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता. खेल खेल होता है और उसको खेल की तरह ही लेना चाहिए. जिस दिन जो टीम अच्छा खेलेगी जीतेगी.
मित्रों, हमने देखा है कि जब भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच होता है तब वो मैच रह ही नहीं जाता बल्कि हम क्रिकेट प्रशंसक उसे युद्ध बना देते हैं. मानों एक मैच जीत जाने से भारत का पाकिस्तान पर कब्ज़ा हो जाएगा या फिर हार जाने से हम पाकिस्तान के गुलाम हो जाएँगे. एक समय कोलकाता में दर्शकों ने गावस्कर का घोर अपमान किया था और फिर गावस्कर कोलकाता में कभी नहीं खेले.
मित्रों, कल रात जबसे भारतीय क्रिकेट टीम चैम्पियंस ट्राफी के फाइनल में पाकिस्तान से हारी है पूरे भारत में टीम इण्डिया के खिलाफ गुस्से का तूफ़ान आया हुआ है. मानों क्रिकेट ही देश के लिए सबकुछ हो या फिर देश में क्रिकेट के अलावा कुछ और खेला ही नहीं जाता हो. कल ही भारत ने hockey में पाकिस्तान को ७-१ से धूल चटाई है क्या यह कम गौरव की बात है? बैडमिंटन में भी भारत के अग्रणी पुरुष बैडमिंटन खिलाड़ी किदांबी श्रीकांत ने कल इंडोनेशिया ओपन जीत लिया है और वह यह खिताब जीतने वाले भारत के पहले पुरुष खिलाड़ी बन गए हैं।  क्या यह हमारे लिए गौरव की बात नहीं है? कल एशियाड या ओलंपिक में बैडमिंटन और hockey ही खेले जाएंगे क्रिकेट नहीं फिर सिर्फ क्रिकेट के लिए ऐसी दीवानगी क्यों?
मित्रों, इतना ही नहीं क्रिकेट तो कई-कई बार कलंकित भी चुका है. लोग रिश्वत खाकर मैच हार जाते हैं. अब कल के मैच को ही लें तो भारत के तरफ से पांड्या को छोड़कर किसी ने भी कोशिश भी की क्या? क्या मैच देखकर ऐसा नहीं लग रहा था कि टीम इण्डिया जान-बूझकर हारने के लिए खेल रही है?

गुरुवार, 15 जून 2017

शिक्षक बोझ हैं तो उन पर कृपा क्यों?

मित्रों, क्या आपने कभी ऐसा देखा है कि कोई एक दिन किसी को बेकार और बोझ बताए और दूसरे ही उस पर कृपा और पुरस्कारों की बरसात कर दे? नहीं देखा है तो विडम्बनाओं के प्रदेश बिहार आ जाईए. ताजा प्रसंग यह है कि आपने भी सुना-पढ़ा होगा कि कुछ ही दिन पहले यहाँ के बडबोले शिक्षामंत्री ने कहा था कि नियोजित शिक्षक राज्य पर बोझ बन गए हैं. ग्राउंड पर वास्तविकता को देखते हुए हमें पता है कि उन्होंने जो भी कहा था एकदम सही कहा था २०० प्रतिशत से भी अधिक सही. बिहार के ९०-९५ प्रतिशत नियोजित शिक्षकों को पहाड़ा और महीनों के नाम तक लिखने नहीं आते. इस तरह की रिपोर्ट हमें अक्सर मीडिया में देखने को मिलती है. कल भी जी पुरवैया पर एक खबर प्रसारित हुई हैं जिसमें दिखाया गया है कि गया जिले के एक मध्य विद्यालय के शिक्षकों को जनवरी-फरवरी की स्पेलिंग भी मालूम नहीं हैं. अब आप ही बताईए कि जब शिक्षकों को ही कुछ पता नहीं होगा तो वो पढ़ाएंगे क्या?
मित्रों, ऐसे शिक्षकों को न कहा जाता तो क्या कहा जाता? लेकिन आश्चर्य होता है कि उसके अगले ही दिन सरकार ने यह घोषणा करके कि अब नियोजित शिक्षक भी प्रधानाध्यापक बन सकेंगे जैसे उनको उनकी नालायकी के लिए पुरस्कृत ही कर दिया.
मित्रों, सवाल उठता है कि सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है कि उसने उनको हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के बदले उन पर कृपा कर दी? कोई वेतनभोगी राज्य पर बोझ बन गया है तो उनकी छंटनी होनी चाहिए न कि उनको खुश कर दिया जाए. अगर सरकार को कृपा ही करनी थी तो फिर शिक्षा मंत्री ने उनको बोझ क्यों बताया? क्या किसी ने उनको ऐसा बयान देने के लिए मजबूर किया था या फिर वे उस समय नशे में थे क्योंकि कई बार ऐसा देखा गया है कि लोग नशे में सच बोलने लगते हैं? लेकिन इस समय तो कागजों पर बिहार में पूर्ण शराबबंदी है. फिर आखिर सच्चाई क्या है? क्या शिक्षा मंत्री इस पर रौशनी डालने की कृपा करेंगे? वैसे उनको शिक्षा मंत्री कहना भी सच्चाई को झुठलाने जैसा होगा क्योंकि बिहार में अब पढाई होती ही नहीं है सिर्फ परीक्षा होती है इसलिए उनको अगर हम परीक्षा मंत्री कहेंगे तो ज्यादा सही होगा.

सोमवार, 12 जून 2017

नियोजित शिक्षकों को कब तक ढोएगी बिहार सरकार?

मित्रों, बात साल २००८ की है. तब हम पटना हिंदुस्तान में कॉपी एडिटर थे. पृष्ठ संख्या १ के मुख्य पेजिनेटर दिलीप मिश्र भैया को घर जाना था. वे हमेशा हाजीपुर जंक्शन से ट्रेन पकड़ते थे. उनके कहने पर प्रादेशिक प्रभारी गंगा शरण झा ने हमें तत्क्षण छुट्टी दे दी. रास्ते में मैंने दिलीप भैया से कहा कि भैया यूपी के कानून-व्यवस्था की हालत बहुत ख़राब है जबकि बिहार में सुधार आ गया है. भैया का घर बलिया यूपी था. दिलीप भैया ने कहा कि दरअसल बिहार में जो ग्राम पंचायत मुखिया द्वारा शिक्षकों की नियुक्ति हुई है उसमें सारे गुंडे-बदमाश तमाम हेरा-फेरी के बल पर शिक्षक बन गए हैं. मैंने तत्काल भविष्यवाणी करते हुए कहा कि भैया भले ही अभी आपको इस तुगलकी नियुक्ति में बिहार का भला होता हुआ दिख रहा हो लेकिन सरकार का यह कदम बिहार के भविष्य को बर्बाद करके रख देगा और एक दिन ऐसा भी आएगा जब बिहार सरकार अपने इस कदम पर पछताएगी.
मित्रों. यह बहुत ही ख़ुशी की बात है कि वह दिन आ गया है और देर से ही सही नीतीश सरकार ने माना है कि उससे गलती हुई है. अपनी बेवाकी के लिए जाने जानेवाले बिहार के शिक्षामंत्री अशोक चौधरी ने एक ट्विट के माध्यम से जारी अपने बयान में स्वीकार किया है कि नियोजित शिक्षक बिहार के लिए बोझ बन गए हैं और शिक्षा तंत्र पर भारी पड़ रहे हैं.
मित्रों, मैंने अपने गाँव के मध्य विद्यालय वैशाली जिले के राघोपुर प्रखंड के राजकीय मध्य विद्यालय रामपुर जुड़ावनपुर बरारी में खुद देखा है कि एक-दो शिक्षकों को छोड़कर ज्यादातर नियोजित शिक्षक स्कूल आते ही नहीं हैं. कभी-कभी तो स्कूल में एक भी शिक्षक नहीं होता. एडवांस में हाजिरी बना लेते हैं या फिर औचक निरीक्षण से बचने के लिए अधिकारी को ही मैनेज कर लेते हैं. एक उपाय और भी किया जाता है कि छुट्टी का बिना तारीखवाला आवेदन-पत्र अपने किसी साथी को दे दिया जाता है कि अगर जाँच हो तो लगा दीजिएगा अन्यथा जेब में ही रखे रहिएगा. हाँ,चाहे स्कूल का ताला खुले या न खुले कागज पर सारे बच्चों के लिए उत्तम भोजन रोज जरूर बन रहा है. कुल मिलाकर इन नियोजित शिक्षकों की कृपा से बिहार के विद्यालयों में इन दिनों बांकी सबकुछ हो रहा है सिर्फ पढाई नहीं हो रही है.
मित्रों, इस बार का इंटर का रिजल्ट देखकर बिहार सरकार को भले ही आश्चर्य हुआ हो कि कैसे ५०० से ज्यादा स्कूलों के एक भी परीक्षार्थी उत्तीर्ण नहीं हुए लेकिन हमें तो नहीं हुआ. जब पढाई होगी ही नहीं तो अच्छा परिणाम कहाँ से आएगा?  सवाल उठता है कि अब बिहार सरकार के पास विकल्प क्या है? विकल्प तो बस एक ही है कि बोझ को उतार फेंका जाए यानि सारे नियोजित शिक्षकों को हटाकर उनके स्थान पर टीईटी पास युवाओं को नियुक्त किया जाए. मगर क्या बिहार सरकार के पास ऐसा ऐसा करने का जिगर है? अगर नीतीश कुमार शराबबंदी पर तमाम विरोध के बावजूद अड़ सकते हैं तो अपनी सबसे बड़ी गलती को सुधार क्यों नहीं सकते? मुझे नहीं लगता कि अगर सरकार इस मामले में भूल-सुधार करती है तो उसका उसके वोटबैंक पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. बल्कि ऐसा होने पर इन निकम्मों से आजिज और अपने बच्चों के भविष्य के प्रति निराश हो चुके ग्रामीणों में ख़ुशी की लहर दौड़ जाएगी.

शनिवार, 10 जून 2017

किसानों की कर्जमाफी समस्या या समाधान

मित्रों, मान लीजिए आप एक गाँव में रहते हैं और बहुत दयालु हैं. गाँव में कोइ बेहद गरीब है और आप उसकी सहायता करना चाहते हैं तो आप क्या करेंगे? सामान्यतया तो आप भी वही करेंगे जो बांकी लोग करते हैं. उसको कुछ पैसे दे देंगे और वो उसको खा जाने के बाद फिर से आपके दरवाजे पर आ जाएगा. फिर यह सिलसिला बार-बार चलेगा मगर ऐसा करने से न तो आपको संतोष मिलेगा न ही उसकी स्थिति ही सुधरेगी. तो इसका क्या समाधान निकालेंगे? आप देखेंगे कि क्या उसको कहीं नौकरी  मिल सकती है या वो कोई व्यवसाय कर सकता है.
मित्रों, ठीक यही स्थिति इस समय हमारे देश में किसानों की है. सरकारें आती हैं और चली जाती हैं. लगभग हर सरकार ने किसानों के कर्ज माफ़ किए हैं लेकिन किसी ने भी कृषि को लाभकारी बनाने के बारे में नहीं सोंचा है. पहली बार केंद्र में एक ऐसी सरकार आई है जो इस दिशा में ठोस कदम उठाने के बारे में सोंच रही है. चूंकि संविधान की सातवीं अनुसूची में कृषि को राज्य सूची में रखा गया है इसलिए यह काम काफी मुश्किल है.
मित्रों, मान लीजिए केंद्र सरकार ने मिट्टी स्वास्थय कार्ड जारी करने की योजना बनाई या फसल बीमा योजना को विस्तार देने की घोषणा की लेकिन राज्य सरकार जिसको योजनाओं को लागू करना है ने पर्याप्त अभिरुचि नहीं दिखाई तो? केंद्र सरकार राज्य सरकारों से अपील ही कर सकती है उनमें जबरदस्ती अभिरुचि तो नहीं पैदा कर सकती.
मित्रों, फिर भी ऐसा नहीं कि केंद्र कुछ कर ही नहीं सकती. वो न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ा सकती है और विभिन्न उपायों द्वारा कृषि लागत को भी कम कर सकती है लेकिन इन दोनों के लिए उसको भारी मात्रा में सब्सिडी देनी पड़ेगी.
मित्रों, साथ ही केंद्र सरकार को चाहिए कि नए इलाकों में ज्यादा मुनाफा देनेवाली फसलों की खेती के लिए अनुसन्धान करवाए. उदाहरण के लिए अगर झारखण्ड के जामताड़ा में काजू की शौकिया खेती हो सकती है जो पूरे झारखण्ड या उसकी जैसी जलवायुवाले इलाकों में क्यों नहीं हो सकती? हमें याद है कि एक समय कटिहार और नौगछिया में केले और मखाने की खेती बिलकुल नहीं होती थी और तब वह इलाका बेहद गरीब था लेकिन आज उसका कायाकल्प को चुका है. नए इलाकों में ज्यादा लाभ देनेवाली फसलों की खेती करवाते समय यह भी ध्यान में रखना होगी कि उन फसलों को बाजार भी मिले. उदाहरण के लिए गोभी के मौसम में जब हाजीपुर में गोभी १५ रूपए किलो थी तब हाजीपुर से ३० किलो मीटर दूर महनार के किसान उसे ३ रूपये किलो बेचने के लिए मजबूर थे. जाहिर है कि उनको घाटा लग रहा था. कई बार किसान ऐसी स्थिति में फसल को बेचने के बदले सड़कों पर फेंकने लगते हैं.
मित्रों,  कहने का लब्बोलुआब यह है कि चाहे केंद्र लाख माथापच्ची कर ले लेकिन वो तब तक खेती को लाभकारी नहीं बना सकती जब तक उसको राज्य सरकारों का सहयोग नहीं मिलेगा. सिर्फ बजट आवंटित करने से अगर किसी क्षेत्र का भला हो जाता तो भारत आज भी विकासशील नहीं होता. सबसे बड़ी चीज है ईच्छाशक्ति और समन्वय. मगर ये होगा कैसे जब विपक्ष हिंसा फ़ैलाने पर आमदा हो? कई राज्यों में तो विपक्षी दलों की सरकार है और उन्होंने केंद्र के साथ सहयोग नहीं किया तो? हम जानते हैं कि अंत में जो लोग आज कृषि को लाभकारी बनाने के पवित्र कार्य में सबसे ज्यादा अडंगा लगा रहे हैं वे लोग ही कल को कहेंगे कि मोदी सरकार तो ऐसा नहीं कर पाई.
मित्रों, अंत में दो सुझाव और देना चाहूँगा. पहले यह कि केंद्र यह नहीं देखे कि कौन-सा कृषि विशेषज्ञ किस खेमे का है बल्कि अगर उसके सुझाव अच्छे हैं तो उन पर बेहिचक अमल करे और दूसरा सुझाव केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह जी के लिए है कि उनको अभी बाबा रामदेव के गाईड का काम करना बंद कर मध्य प्रदेश का दौरा करना चाहिए. बाबा कोई बच्चा नहीं हैं वे अकेले भी चंपारण का भ्रमण कर सकते हैं.

गुरुवार, 8 जून 2017

किसान आन्दोलन स्वतःस्फूर्त या साजिश?

मित्रों, इतिहास साक्षी है कि केंद्र में जब-जब भाजपा की सरकार बनती है देशविरोधी शक्तियों की जान पर बन आती है और वे अतिसक्रिय हो उठती हैं. वाजपेयी के समय भी ऐसा देखने को मिला था और अब एक बार फिर से दिख रहा है. कांग्रेसी नेताओं ने तो मोदी सरकार के आगमन के तत्काल बाद खुलेआम पाकिस्तान जाकर मोदी सरकार को अपदस्थ करने के लिए पाकिस्तान से सीधे-सीधे मदद ही मांग ली थी. हमें तभी ऐसा लगा था कि कांग्रेस पाकिस्तान से और चीन से भी मिली हुई है और इनसे उसको ठीक उसी तरह पैसे मिलते हैं जैसे हुर्रियत को कश्मीर में. तब भी मिलते थे जब केंद्र में उसकी सरकार थी और अब भी मिलते हैं जब वो विपक्ष में है वर्ना पाकिस्तान कांग्रेस की और किस तरह से मदद कर सकता है? जो पाकिस्तान कश्मीर में पत्थरबाजी के लिए पैसे दे सकता है वो कांग्रेस समर्थित किसान आन्दोलन को प्रायोजित क्यों नहीं कर सकता?
मित्रों, पहले जंतर-मंतर पर मूत्र-सेवन की नौटंकी और अब मध्य प्रदेश में हिंसा. अगर हम दोनों घटनाओं की टाईमिंग देखें तो हमें आसानी-से साजिश दिख जाएगी. २३ अप्रैल को जैसे ही दिल्ली नगर निगम के लिए मतदान समाप्त हुआ जंतर मंतर पर चल रहा फाइव स्टार आन्दोलन भी स्वतः समाप्त हो गया. ठीक उसी तरह अभी जब कांग्रेस केरल में सरेआम गाय काटकर और खाकर चौतरफा घिरी हुई थी तब मध्यप्रदेश में किसानों का आन्दोलन अचानक हिंसक हो उठा.
मिर्त्रों, इन किसान आन्दोलनों की एक और विशेषता है कि ये केवल वही हो रहे हैं जहाँ भाजपा की सरकार है. तो क्या सिर्फ उन्हीं राज्यों के किसान परेशान हैं जहाँ भाजपा का शासन है? खैर इन किसान आंदोलनों के आगे-पीछे चाहे जो भी हो लेकिन यह भी सच है कि आज भारत में कृषि खतरे में है जिसको बचाना चाहे जितना भी मुश्किल हो लेकिन बचाना तो पड़ेगा ही. यह भी सच है कि मोदी सरकार के लिए अगले लोकसभा चुनावों में कृषि और बेरोजगारी की समस्या गले की फांस बनने जा रही है क्योंकि इन दोनों को लेकर सरकार ने जो वादे किए थे उस दिशा में उसको कोइ खास सफलता मिलती दिख नहीं रही है. दूसरी बात कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश में चुनाव जीतने के लिए किसानों की कर्ज माफ़ी का वादा किया था जिसे उसने पूरा भी किया. स्वाभाविक था कि बांकी राज्यों के किसान भी इसकी मांग करते और ऐसा हुआ भी. आखिर यूपी के किसानों के साथ वीआईपी ट्रीटमेंट क्यों?  

मंगलवार, 6 जून 2017

प्रणव राय पर छापा अभिव्यक्ति पर हमला कैसे?

मित्रों,कहते हैं कि पत्रकारिता लोकतंत्र का वाच डॉग होती है. देश के बहुत सारे पत्रकार इस कहावत पर खरे भी उतरते हैं इसमें संदेह नहीं. लेकिन कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जो मूलतः पत्रकार हैं नहीं. वे पहरा देनेवाले कुत्ते नहीं हैं बल्कि अपने निर्धारित कर्तव्यों के विपरीत चोरों के मदद करनेवाले कुत्ते बन गए हैं. ये रुपयों की बोटी पर पूँछ तो हिलाते ही हैं बोटी की दलाली में भी संलिप्त हैं. अब जाकर ऐसे ही एक पत्रकार के खिलाफ वैसी कानूनी कार्रवाई की गयी है जिसकी प्रतीक्षा हमें २०१० से ही थी जब नीरा रादिया प्रकरण सामने आया था.
मित्रों, जो लोग दूसरी तरह के डॉग हैं वे एकजुट होकर भारत में लोकतंत्र और अभिव्यिक्ति की आजादी के खतरे में होने का रूदाली-गायन करने में लग गए हैं लेकिन सवाल उठता है कि पत्रकार होने से क्या किसी को दलाली-धोखाधड़ी करने,देशद्रोहियों का समर्थन करने की असीमित स्वतंत्रता मिल जाती है? भारत के संविधान में तो ऐसा कुछ भी नहीं लिखा गया है.
मित्रों,सवाल यह भी उठता है कि कार्रवाई किसके खिलाफ की गयी है? क्या एनडीटीवी को या उसके किसी कार्यक्रम को बैन किया गया है? नहीं तो फिर यह कैसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला हो गया? प्रणव राय ने धोखाधड़ी की,बैंक को नुकसान हुआ और उसने इसकी शिकायत सीबीआई से की. सीबीआई ने तो वही किया जो उसे करना चाहिए था. फिर चाहे आरोपी प्रणव राय हो या कोई और. ऐसा कैसे हो सकता है कि आम आदमी करे तो उसे जेल में डाल तो और ब्रजेश पांडे की तरह रसूख वाला करे तो आखें बंद कर लो? कोई जरूरी तो नहीं कि जैसा बिहार पुलिस करती है वैसा ही सीबीआई करे.
मित्रों,जो लोग आज सीबीआई पर सवालिया निशान लगा रहे हैं वे भूल गए हैं कि इसी सीबीआई की विशेष अदालत ने कुछ दिन पहले ही बाबरी-विध्वंस मामले में भाजपा के भीष्म पितामह सहित बड़े-बड़े नेताओं को दोषी घोषित किया है. अगर सीबीआई दबाव में होती तो क्या ऐसा कभी हो सकता था? हद है यार जब सीबीआई भाजपाईयों पर कार्रवाई करे तो ठीक जब आप पर करे तो लोकतंत्र पर खतरा? बंद करो यह दोगलापन और हमसे सीखो कि तमाम अभावों के बीच अपना अनाज खाकर पत्रकारिता कैसे की जाती है? हम इस समय वैशाली महिला थाना के पीछे घर बना रहे हैं और वो भी अपनी पैतृक संपत्ति बेचकर. हमने अपनी जमीन बेचना मंजूर किया लेकिन अपना जमीर नहीं बेचा. कबीर कबीर का रट्टा लगाना आसान है लेकिन कबीर बनना नहीं इसके लिए अपने ही घर को फूंक देना पड़ता है.

शनिवार, 3 जून 2017

टॉप हुए तो गए बेटा

मित्रों,हम बिहारी वर्षों से गाड़ियों के पीछे एक चेतावनी लिखी हुई पढ़ते आ रहे हैं-लटकले त गेले बेटा यानि अगर गाड़ी के पीछे लटके तो गए. मगर कहाँ? शायद यहाँ जाने से मतलब सुरधाम या अस्पताल होगा. खैर गाड़ियों के पीछे लटकना खतरनाक कर्म है इसलिए ऐसी चेतावनी उचित भी है लेकिन बिहार तो बिहार है और बतौर रवीश कुमार बिहार में आकर बहार की गाड़ी पंक्चर हो गयी है. तो इसलिए यहाँ रोजाना कुछ-न-कुछ उलट होता रहता है.
मित्रों,आपने भारत तो क्या पूरी दुनिया में ऐसा कोई देश-प्रदेश नहीं देखा होगा जहाँ टॉप करने वालों को अनिवार्य तौर पर जेल जाना पड़ता है. टॉप हुए नहीं कि हाथों में हथकड़ी लगी समझिए. मुश्किल यह है कि किसी-न-किसी को टॉप तो होना ही होता है. फिर जब पता चलता है कि टॉप करनेवाले को तो विषय का कुछ अता-पता ही नहीं है तो सरकार हर साल इंटर रिजल्ट के बाद कटते-कटते तोला से माशा हो चुकी अपनी नाक को बचाने के लिए टॉपर को ही जेल भेज देती है.
मित्रों,वैसे टॉप होने के लिए सिर्फ टॉपर दोषी हो ऐसा भी नहीं है. जहाँ इंटर गणित की कॉपी मिडिल स्कूल का हिंदी का टीचर जांचे वहां कोई भी टॉप हो सकता है और कोई भी फेल हो सकता है. शायद इसलिए लालू जी के दोनों पुत्रों ने कभी बिहार से मैट्रिक या इंटर पास करने का प्रयास नहीं किया. अभी तो अच्छे भले मंत्री हैं पता नहीं अपनी या फिर परीक्षक की गलती से टॉप-वॉप कर गए तो जेल तो जाएँगे ही मंत्री-पद से भी हाथ धोना पड़ेगा.
मित्रों,वैसे एक सलाह आपके लिए भी है. या तो आप खुद ही मैट्रिक-इंटर में पढ़ रहे होंगे या फिर हो सकता है कि आपके बच्चे पढ़ रहे हों. तो मैं कह रहा था कि अगर आपके बच्चे ने जेईई वगैरह क्रैक किया हो या इस तरह की क्षमता रखता हो तो कदापि बिहार बोर्ड से उसका फॉर्म न भरवाएं. क्योंकि अगर उसको हिंदी या उर्दू के मिडिल स्कूल के टीचर ने गणित,भौतिकी या रसायन शास्त्र में फेल कर दिया तो आपके बच्चे का तो भविष्य ही बर्बाद हो जाएगा. फिर दौड़ते रह जाईएगा बिहार बोर्ड के दफ्तर में मगर होगा कुछ नहीं.
मित्रों,आप कह सकते हैं कि जब बिहार में हमेशा इतना कुछ होता रहता है तो इसके लिए कोई-न-कोई तो दोषी होगा. तो आपको बता दें कि अपने नीतीश कुमार तो खुद को कभी दोषी मानते ही नहीं हैं इसलिए वे दोषी नहीं हैं. हर विवाद के बाद वे किसी लालकेश्वर या परमेश्वर को बलि का बकरा बना देते हैं लेकिन यह नहीं बताते कि लालकेश्वर और परमेश्वर खुद उनकी नाक के बाल क्यों थे? वैसे अगर आपके बच्चे भी मैट्रिक-इंटर में बिहार बोर्ड से पढ़ रहे हों तो उनको कम पढने के लिए बोलिए क्योंकि कहीं गलती से टॉप कर गए तो आप भी फजीहत में पड़ जाईएगा. वैसे जब हिंदी-उर्दू का टीचर गणित की कॉपी जांचेगा तो हो सकता है कि आपका बेटा कॉपी में फ़िल्मी गाना लिखकर भी टॉप कर जाए. भैया बिहार में तो बहार है इसलिए कभी भी किसी के साथ भी ऐसा हादसा हो सकता है.

शुक्रवार, 2 जून 2017

क्या गोहत्या ही असली धर्मनिरपेक्षता है?

मित्रों,क्या आपको पता है कि दुनिया में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा क्या है? दुनिया में राज्य का कोई घोषित राजकीय धर्म न होना और सभी धर्मों के प्रति सर्वधर्मसमभाव रखना ही धर्मनिरपेक्षता होती है. लेकिन अपने भारत में कथित धर्मनिरपेक्षतावादी दलों की मानें तो हिंदुविरोधी कृत्यों में संलिप्त रहना ही धर्मनिरपेक्षता मानी जानी चाहिए.. दुनिया के किसी भी दूसरे देश में ऐसा नहीं होता कि बहुसंख्यक धर्म वाले की उपेक्षा की जाए और अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए दीवानगी की हद तक जाकर कुछ भी कर गुजरने की तत्परता राजनैतिक दलों में रहे. 
मित्रों,वामपंथी तो शुरू से ही हिन्दूविरोधी रहे हैं लेकिन सवाल उठता है कि इन दिनों उस कांग्रेस पार्टी को क्या हो गया है जिसे आज़ादी की लडाई के समय जिन्ना सहित भारत के तमाम मुसलमान हिन्दुओं की पार्टी मानते थे. इतिहास गवाह है कि आजादी की लडाई के समय कांग्रेस ने गोहत्या रोकने को भी एक मुद्दा बनाया था और हर शहर में इसके लिए गोरक्षिणी सभा की स्थापना की थी. इतना ही नहीं पंजा छाप से पहले गाय और बछड़ा ही कांग्रेस का चुनाव निशान था. फिर ऐसा क्या हो गया कि आज कांग्रेस के नेता सरेआम गाय की हत्या करके गोमांस का भोज आयोजित करने लगे हैं? क्या ऐसा उस आलाकमान के कहने पर किया जा रहा है जो विदेश से आई हुई गोभक्षक विधर्मी है? क्या कांग्रेस पार्टी को अब कभी भी बहुसंख्यकों का वोट नहीं चाहिए? क्या कांग्रेस ४४ सीटों से संतुष्ट नहीं है और ४ पर आना चाहती है?
मित्रों,हालाँकि कांग्रेस ने केरल के कई उन कांग्रेस नेताओं को पार्टी से निलंबित कर दिया है जो उस दिन लाईव गोहत्या कार्यक्रम में सहभागी थे लेकिन क्या यह सही नहीं है इसी कांग्रेस की सरकार ने कोर्ट में हलफनामा दिया था कि राम तो कभी हुए ही नहीं? क्या इसी कांग्रेस ने हिन्दुओं के प्रति भेदभाव करनेवाला सांप्रदायिक अधिनियम नहीं बनाया था? क्या इसी कांग्रेस ने भगवा आतंकवाद का नकली हौवा खड़ा करने की कुत्सित कोशिश नहीं की थी?
मित्रों,पिछले १३ सालों के कांग्रेस के कारनामों पर अगर हम सरसरी तौर पर भी नजर डालें तो पाते हैं कि कांग्रेस एक हिन्दूविरोधी राजनैतिक दल है जो भारत से उस महान हिन्दू धर्म को ही समाप्त कर देना चाहती है जिसके चलते सदियों से दुनियाभर में भारत का गौरव रहा है. हमारा दर्शन वहां से शुरू ही होता है जहाँ जाकर दुनिया के तमाम दूसरे धर्म मौन हो जाते हैं. हिन्दू धर्म पर हमला तो सन ७१२ ई. से ही जारी है जब मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर कब्ज़ा किया था और हिन्दुओं का भयकर नरसंहार किया था. उसके बाद सैंकड़ों बार आतताइयों ने हिंदुस्तान की धरती को हिन्दुओं के खून से रक्तरंजित किया लेकिन कुछ बात है कि वे लाख अत्याचार ढाकर भी हिन्दू धर्म को मिटा नहीं पाए. आज कहाँ हैं गोरी,तैमूर,ऐबक,बलबन,खिलजी,बाबर आदि के वंशज? कोई नामोनिशान तक बचा उनका? क्या कांग्रेस भी अपने आपको गुलाम वंश,खिलजी वंश,तुगलक वंश,मुग़ल वंश की तरह  सिर्फ इतिहास के पन्नों में देखना चाहती है?

सोमवार, 29 मई 2017

मोदी सरकार, काम बहुत है समय है थोडा

मित्रों, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को तीन साल पहले गुजरात छोड़कर केंद्रीय राजनीति में आए.  यह पहली बार हुआ कि एक वर्तमान मुख्यमंत्री देश का प्रधानमंत्री बना. उनको चुनने का कारण साफ था गुजरात के बाहर मोदी की कार्यशैली, निर्णय लेने की क्षमता, कुछ नया करने की इच्छाशक्ति और भविष्य को ध्यान में रखकर तकनीक का प्रयोग आदि की खबरें जो आई उसने लोगों के दिलोदिमाग पर एक ही छाप छोड़ी, अबकी बार मोदी सरकार.पहले लोग गुजरात के बाहर मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के जानते थे. अब लोग एक पीएम के रूप में नरेंद्र मोदी को जानते और समझने लगे हैं. पिछले तीन सालों में पीएम मोदी के प्रति लोगों का लगाव कुछ ऐसा बढ़ा है कि उनकी लोकप्रियता का ग्राफ नीचे आने का नाम ही नहीं ले रहा है. विपक्ष आज भी इस बात से परेशान है.

मित्रों,शायद ही इससे पहले किसी प्रधानमंत्री का स्वच्छता के प्रति इतना झुकाव देश ने देखा होगा. खुद झाड़ू लेकर मैदान में उतरना और लाखों लोगों को इसके लिए प्रेरित करना आसान काम नहीं है. लेकिन पीएम मोदी ने बखूबी कर दिया. परिणाम कितना मिला इस बारे में ज्यादा नहीं कहा जा सकता, लेकिन देश में लोग इस बारे में प्राथमिकता से विचार जरूर करने लगे हैं.

मित्रों,पीएम नरेंद्र मोदी काफी मेहनती है. कहा जाता है कि दिन में 18 घंटे वह काम करते हैं. समय की पाबंदी पसंद करते हैं. जब से सत्ता में आए इन्होंने सरकारी कर्मचारियों में इसे लागू करवाने की प्रक्रिया आरंभ कर दी. कई मंत्रालयों में जहां कर्मचारी १२  बजे के बाद दिखाई देते थे और 3 बजे तक कुर्सियां खाली होना शुरू हो जाती वहां की परिस्थिति बिल्कुल बदल गई है. पीएम मोदी ने आदेश देकर सभी केंद्रीय सरकारी कार्यालयों में बायोमेट्रिक मशीन लगाने के आदेश दे दिए.

मित्रों,नरेंद्र मोदी सरकार ने पाकिस्तान के नियंत्रण वाले कश्मीर के हिस्से में सर्जिकल स्ट्राइक की मंजूरी दी और भारतीय सेना ने पहली यह कारनामा कर पूरी दुनिया को अचरज में डाल दिया.

मित्रों,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आते ही यह प्रयास आरंभ किए कि भ्रष्टाचार पर पूर्णतया अंकुश लगे. इसके लिए सरकार ने सभी सरकारी भुगतान ऑनलाइन करने का निर्णय लिया. टेंडरों को पूरी तरह ऑनलाइन करने का आदेश दिया. इस प्रकार के कई आदेश सरकार दिए और इसकी उपलब्धि कितनी है इस बारे में ठोस नहीं कहा जा सकता है. कहा जा सकता है तो सिर्फ इतना कि पिछले तीन साल में अभी  तक सरकार पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा है. जबकि पिछली सरकार में मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक पर आरोप लगते रहे.

मित्रों,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 नवंबर को तत्कालीन 500 और 1000 के नोट को बंद करने का ऐलान किया. देश की पूरी अर्थव्यवस्था जैसे रुक गई. पीएम ने लोगों ने दो महीने का समय मांगा और लोगों ने दिया. लोगों को काफी कष्ट झेलने पड़े. विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाने का प्रयास किया. नोटबंदी को गलत कदम करार दिया. चुनाव में भुनाने का प्रयास भी लेकिन यह लोगों का मोदी से विश्वास कम नहीं हुआ.

मित्रों,पीएम मोदी अपने स्वास्थ्य के प्रति काफी सजग हैं. वह सुबह उठकर योग करते हैं. उन्होंने पूरी दुनिया में योग दिवस मनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र से संपर्क किया और भारत के नाम एक अंतरराष्ट्रीय सफलता लगी. इतना ही नहीं वह लगातार लोगों से यह अपील कर रहे हैं कि वे अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दें.

मित्रों,जब प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम थे तभी से वह लगातार सोशल मीडिया के जरिए लोगों से जुड़े रहे हैं. मोबाइल तकनीक और सूचना तकनीक का प्रयोग कामकाज में करने के वे तभी से पक्षधर रहे हैं ताकि पारदर्शिता बने और काम सहज हो. यह प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की देश को एक देन है कि भारत में राष्ट्रपति का एक ट्विटर हैंडल  बना. पीएमओ का ट्वीटर हैंडल, पीएम का, सभी मंत्रालयों और मंत्रियों को ट्वटीर से लोगों से जुड़ने का आदेश दिया गया और सभी को सक्रियता से इससे जुड़ने की बात कही गई. परिणाम साफ है कि विदेश मंत्रालय से लेकर रेल, और कई अन्य मंत्रालयों में लोगों ने ट्विटर के जरिए अपनी समस्याओं का समाधान किया. कई बार तो बड़ी समस्याओं का समाधान एक ट्वीट से हो गया. उससे से बड़ी बात समय पर लोगों को सुविधा मिली और लोगों ने पीएम की इस मुहिम का लाभ उठाया।

मित्रों,मोदी डिजिटल भारत के सपने को लेकर आगे बढ़ रहे हैं. सरकार के सभी विभागों को डिजिटलाइजेशन के लिए प्रेरित कर रहे हैं. उनका मानना है कि इससे पर्यावरण से लेकर धन की हानि दोनों को बचाया जा सकता है. कई सरकारी काम अब इस माध्यम से होने लगे हैं. इतना ही नहीं कई ऐसे फॉर्म को सरल किया जिसके चलते पहले लोगों को समस्याओं का सामना करना पड़ता था.

मित्रों,पीएम ने न्यू इंडिया की संकल्पना की है. उन्होंने इसके लिए कैशलेस भारत की बात कही है. वह चाहते हैं कि देश में नकदी का चलन कम-से-कम हो. यह सबसे बड़ा माध्यम है भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का. पीएम को कितनी कामयाबी मिली, या मिलेगी यह तो साफ नहीं कहा जा सकता है, लेकिन लोगों ने माना कि पीएम भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत किलेबंदी की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

मित्रों,आजादी के पहले अंग्रेजों ने भारत के लिए कई कानून बनाए. आजादी के बाद भी हजारों की संख्या में इस प्रकार के कानून भारत में चलते रहे. कई ऐसे कानून भी हैं जिनकी अब आवश्यकता ही नहीं रही. आजादी के 70 से भी ज्यादा साल हो गए. कई सरकारें आईं लेकिन किसी ने भी इस ओर विचार नहीं किया. नरेंद्र मोदी सरकार ने कई ऐसे कानून रद्द कर दिए जिनकी अब कोई जरुरत नहीं है. इस तरह 1000 से ज्यादा कानून रद्द कर दिये गए हैं. वे अपनी इस मुहिम में रोज आगे बढ़ रहे हैं. उनका मानना है कि कई गैरजरूरी कानून लोगों के लिए दिक्कत पैदा करते हैं.

मित्रों,योजना आयोग अब इतिहास हो गया है. इसके स्थान पर पीएम मोदी ने नीति आयोग का गठन किया है. जब मोदी गुजरात के सीएम थे तब योजना आयोग, उसकी कार्यशैली और राज्यों से व्यवहार उन्हें उचित नहीं लगा. राज्यों से केंद्र के बेहतर समन्वय के लिए उन्होंने नीति आयोग का गठन किया.

मित्रों,अंतरराष्ट्रीय मंच पर आतंकवाद को नीति के रूप में प्रयोग कर रहे पाकिस्तान को भारत ने अलग-थलग कर दिया. आज पाकिस्तान पर अमेरिका से लेकर कई देशों ने दबाव बनाया है कि वह आतंकवाद को प्रशय देना बंद करे. इस काम में मोदी सरकार को बड़ी कामयाबी मिली है.

मित्रों,पिछले काफी समय से चीन भारत के बड़े भाई की भूमिका में आने के प्रयास में रहा. एक तरफ जहां वह पाकिस्तान की मदद कर रहा है वहीं भारत के कई हिस्से पर अपना दावा करता रहा है. एलएसी को वह स्वीकार नहीं कर रहा है. लेकिन कई दशकों बाद भारत ने लेह में 100 टैंक भेजे और युद्धाभ्यास किया. वहीं अरुणाचल प्रदेश के विकास और सीमा पर सड़क निर्माण कार्य को तेजी से आगे बढ़ाया गया.

मित्रों,मगर ऐसा भी नहीं है कि मोदी सरकार किसी मोर्चे पर विफल न हुई हो. टूटे और अधूरे वादों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है, ख़ास तौर पर रोज़गार और विकास के मामले में, सरकारी आँकड़े ही चुगली कर रहे हैं कि रोज़गार के नए अवसर और बैंकों से मिलने वाला कर्ज़, दोनों इतने नीचे पहले कभी नहीं गए । स्वयं केंद्र सरकार के लेबर ब्यूरो के आँकड़े कहते है कि मोदी सरकार अब तक सिर्फ 9 लाख 97 हजार नौकरियां दी हैं। रोजगार को बढ़ाना तो दूर की बात है, बड़े महकमे में जो पद सालों से खाली है वो भी अब तक नहीं भरे जा पाए हैं।

मित्रों,भाजपा के घोषणा पत्र में जो वायदे किए गए थे उनमें हर साल दो करोड़ युवाओं को रोज़गार देना, किसानों को उनकी उपज का समर्थन मूल्य लागत से दोगुना मूल्य देना, विदेशों में जमा कालेधन की सौ दिनों के भीतर वापसी, भ्रष्टाचार के आरोपी सांसदों-विधायकों के मुकदमों का विशेष अदालतों के जरिए एक साल में निपटारा, महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण, गंगा तथा अन्य नदियों की सफाई, जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 का खात्मा, समान नागरिक संहिता लागू करना, कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी, गुलाबी क्रांति यानी गोकशी और मांस निर्यात पर प्रतिबंध, देश में सौ शहरों को स्मार्ट सिटी के रूप में तैयार करना आदि प्रमुख वायदे थे। इन सभी वादों में से अधिकांश वादों में मोदी सरकार असफल है और कुछ मुद्दों पर प्रयासरत है किंतु अब तक कोई ठोस परिणाम नहीं मिले है। हालाँकि कई स्टार्ट अप और आवास योजनाएं चलाईं गयी हैं लेकिन आज भी बैंक से इनका लाभ उठाना आसान नहीं है.

मित्रों,कई बार लगता है कि जैसे यह सरकार जनता से कुछ छिपाना चाहती है. पता नहीं वो नोट बंदी के आंकड़े क्यों छिपाना चाहती है? इसी तरह सवाल उठता है कि क्या सरकार लोकपाल को सचमुच में नियुक्त करना चाहती है? हम तो समझे थे कि यूपी की भाजपा सरकार देशभर की राज्य सरकारों के लिए एक उदाहरण साबित होगी लेकिन वहां की योजनाओं में आज भी अल्पसंख्यक कोटा बना हुआ है? मोदी सरकार ने नई जातियों को ओबीसी कोटे में शामिल करने के राज्य सरकार के अधिकार को संसद को सुपुर्द कर दिया है लेकिन क्या गारंटी है कि मोदी सरकार इसका दुरूपयोग नहीं करेगी? जिस तरह मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा समाप्त कर दिए गए प्रोन्नति में आरक्षण को फिर से लागू करने जा रही है उससे तो यही संदेह उत्पन्न होता है.

मित्रों,जिस तरह से बड़े पैमाने पर कांग्रेस के नेताओं को भाजपा में शामिल किया जा रहा है उससे तो लगता है कि आने वाले समय में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना होगी कि उसका कांग्रेसीकरण तो नहीं हो रहा है. और यह साबित करना भी होगी कि उसके लिए आज भी नेशन फर्स्ट है कुर्सी नहीं? और ये सब साबित करने के लिए उसके पास बहुत कम समय शेष बचा है,बहुत कम.