गुरुवार, 20 जुलाई 2017

विकास से एकबार फिर वंचित रह गया बिहार

मित्रों, हमने काफी दिन पहले भक्तराज रामकृष्ण परमहंस की एक पुस्तक में एक कहानी पढ़ी थी. एक अंधा एक बार एक गुफा में घुस गया और बाहर निकलने के प्रयास में बार-बार दीवारों से टकरा जा रहा था. किस्मत देखिए कि जब भी वो दरवाजे के पास आता दीवार छोड़ देता था और उसे एक बार फिर से पूरी गुफा का चक्कर काटना पड़ता था.
मित्रों, कुछ ऐसी ही किस्मत बिहार की भी है. जब यह अविभाज्य था तब भी इसको प्रचुरता में निर्धनता का इकलौता उदाहरण माना जाता था और आज तो इसके पास लालू, बालू  और आलू के सिवा कुछ बचा ही नहीं है. वैसे कहने को तो अभी भी इसके पास अनमोल मानव संसाधन है लेकिन दुर्भाग्यवश यहाँ के लोगों की सोंच आज भी वही है जो राज्य के बंटवारे से पहले थी. यहाँ के लोग आज भी सिर्फ पेट के लिए जीते हैं विकास की भूख उनमें है ही नहीं.
मित्रों, जब देश को आजादी मिली और देश में औद्योगिक और कृषि क्रांति की शुरुआत हुई तो कांग्रेस पार्टी की केंद्र और राज्य की सरकारों की दुष्टता के चलते बिहार उससे वंचित रह गया. परिणाम यह हुआ कि बिहार से मजदूरों का पलायन उन राज्यों की तरफ शुरू हो गया जिन राज्यों को इसका लाभ मिला था और वह पलायन आज भी बदस्तूर जारी है.
मित्रों, बाद में १९९० के दशक में जब आर्थिक सुधारों के दौर में देश में दूसरी औद्योगिक क्रांति हो रही थी तब बिहार में शासन एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में था जिसका मानना था कि विकास करने से वोट नहीं मिलता.
मित्रों, दुर्भाग्यवश जब गुजरात को विकास की नई ऊंचाईयों तक ले जानेवाला सच्चा देशभक्त देश का प्रधानमंत्री बना जो ह्रदय से चाहता थे कि भारतमाता का पूर्वांग भी समान रूप से शक्तिशाली बने तो बिहार के मुख्यमंत्री ने उससे दूरी बना ली और उन्हीं लालू जी से महाठगबंधन करके बिहार की जनता को ठग लिया जिनकी छवि महाभ्रष्ट और महा विकासविरोधी की है. आज नरेन्द्र मोदी सरकार के अनथक सद्प्रयास से प्रत्यक्ष पूँजी निवेश के मामले में भारत नंबर एक पर है लेकिन बिहार अपने मुख्यमंत्री और अपनी मूर्खता के चलते एक बार फिर से इसके लाभ से वंचित हो रहा है.
मित्रों, आज बिहार में शासन-प्रशासन नाम की चीज नहीं है और यत्र-तत्र-सर्वत्र अराजकता का बोलवाला है. ऐसे माहौल में कौन करेगा बिहार में पूँजी निवेश? यहाँ तक कि परसों पटना हाइकोर्ट ने बिहार सरकार से पूछा राजनीति ही होगी या कुछ काम भी होगा. कोर्ट ने सरकार से वही पूछा जो हम पिछले चार सालों से पूछते आ रहे हैं. हाईकोर्ट ने सरकार से यह भी पूछा कि जब बहाली सही ढंग से नहीं करनी है, तो रिक्तियों का सब्जबाग क्यों दिखाते हैं जनता को?
मित्रों, कदाचित अपनी नीतिहीन राजनीति से उब चुके नीतीश कुमार लालू परिवार से छुटकारा भी पाना चाहते हैं लेकिन उनके विधायक और सांसद ही उनका साथ देने को तैयार नहीं हैं. मुझे लगता नहीं है कि नीतीश के अन्दर इतना नैतिक बल है कि वे सत्ता के अनैतिक मोह तो त्याग कर बिहार के भले की दिशा में कोई कदम उठाएंगे.

कोई टिप्पणी नहीं: