सोमवार, 14 अगस्त 2017

बिहार में फिर से बड़े घोटाले का सृजन

मित्रों, हो सकता है कि आपने भी बचपन में आवेदन -प्रपत्र या फोटो सत्यापित करने के लिए किसी स्कूल या कॉलेज के प्रधानाचार्य की मुहर बनवाई होगी और खुद ही हस्ताक्षर करके काम चला लिया होगा. ऐसा करनेवालों में से कुछ तो अब नौकरी में भी होंगे. लेकिन क्या आपने कभी ऐसा सुना है कि कोई किसी राजपत्रित अधिकारी का नकली हस्ताक्षर करके और नकली मुहर लगाकर १००० करोड़ की राशि बैंक से निकाल जाए या अपने चहेते के खाते में स्थानांतरित कर दे? शायद नहीं लेकिन जो बात दुनिया में कहीं नहीं होती वो बिहार में होती है तभी तो बिहार बर्बादी का दूसरा नाम है.
मित्रों, बिहार आकर शब्द भी पथभ्रष्ट हो जाते हैं. अब सृजन शब्द को ही लीजिए. इसका अर्थ होता है निर्माण. कहने का मतलब यह कि सृजन एक सकारात्मक शब्द है. लेकिन बिहार में इसका दुरुपयोग घोटाला सृजित करने के लिए हुआ है और इस तरीके से हुआ है कि पूरी दुनिया सन्न है. भ्रष्टाचार की सत्यनारायण कथा इस प्रकार है कि स्वयंसेवी संस्था सृजन की संचालिका मनोरमा देवी एक विधवा महिला थी। जिसके पति अवधेश कुमार की मौत 1991 मे हो गई जो रांची में लाह अनुसंधान संस्थान में वरीय वैज्ञानिक के रूप में नौकरी करते थे। जिसके बाद मनोरमा देवी अपने बच्चे को लेकर भागलपुर चली आई और वही एक किराए के मकान में रह कर अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करने लगी। गरीबी से मजबूर विधवा ने पहले ठेले पर कपड़ा बेचने का काम शुरू किया फिर सिलाई का और धीरे-धीरे उसका काम इतना बढ़ने लगा कि उसमें और भी कई महिलाएं शामिल हो गई। जिसके बाद 1993-94 में मनोरमा देवी ने सृजन नाम की स्वयंसेवी संस्था की स्थापना की। मनोरमा देवी की पहचान इतनी मजबूत थी कि तमाम बड़े अधिकारी से लेकर राजनेता तक उनके बुलावे पर दौड़ते हुए पहुंच जाते थे। मनोरमा देवी ने अपने समूह में लगभग 600 महिलाओं का स्वयं सहायता समूह बनाकर उन्हें रोजगार से जोड़ा। मित्रों,फिर शुरू हुआ हेराफेरी का खेल. मनोरमा देवी ने सहयोग समिति चलाने के लिए भागलपुर में एक मकान 35 साल तक के लिए लीज पर लिया। मकान लेने के बाद सृजन महिला विकास समिति के अकाउंट में सरकार के खजाने से महिलाओं की सहायता के लिए रुपए आने शुरू हो गए। जिसके बाद सरकारी अधिकारियों और बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत से पैसे की हेराफेरी शुरू हो गयी। देखते-देखते बेवजह लगभग 1000 करोड़ से ज्यादा पैसा समिति के अकाउंट में डाल दिया गया और इसके ब्याज से अधिकारी-कर्मचारी मालामाल होते चले गए। दिखावे के लिए इस संस्था के द्वारा पापड़, मसाले, साड़ियां और हैंडलूम के कपड़े बनवाए जाते थे और  'सृजन' ब्रांड से बाजार में बेचे जाते थे. लेकिनअब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि पापड़ और मसाले बनाने का धंधा केवल दुनिया को गुमराह करने के लिए था. संस्था ने घोटाले के पैसे को बाजार में लगाया, साथ ही रियल एस्टेट में भी लगाया. इन पैसों से लोगों को 16% ब्याज दर पर लोन भी मुहैया कराया गया.
मित्रों, अपनी जिंदगी के 75 साल गुजारने के बाद भ्रष्टाचार की देवी मनोरमा देवी की इसी साल फरवरी में मौत हो गई। उसकी मौत के बाद उसके बेटे अमित और उसकी पत्नी प्रिया ने महिला समिति के कामकाज देखना शुरू कर दिया। जब यह मामला का पर्दाफाश हुआ दोनों फरार हो गए फिलहाल पुलिस उनकी तलाश कर रही है। 1995 से लेकर 2016 तक चले इस घोटाले की अधिकारियों द्वारा जांच पड़ताल की जा रही है और जल्द ही इस लूट में शामिल सारे लोगों को बेनकाब करने का दावा किया जा रहा है।
मित्रों, ऐसा नहीं है कि बिहार में भागलपुर ही एकमात्र अभागा जिला है बल्कि बिहार में जहाँ कहीं भी कोई सरकारी योजना चल रही है, सरकारी फंड का व्यय हो रहा है या सरकारी काम चल रहा है वहां घोटाला है,मनमानी है. इसलिए आवश्यक है कि न केवल भागलपुर में घोटाले के दौरान पदस्थापित सारे कर्मचारियों और अधिकारियों की संपत्तियों की गहनता से जाँच हो बल्कि पूरे बिहार में इस तरह का जाँच अभियान चलाया जाए और भ्रष्टाचार बिहार छोडो के नारे को वास्तविकता का अमलीजामा पहनाया जाए.
मित्रों, सवाल उठता है कि भागलपुर जिले में तीन-तीन डीएम आए और चले गए और तीनों के समय उनके नकली हस्ताक्षर से सरकारी खाते से करोडो रूपये गायब कर दिए गए और कैसे उनलोगों को कानोकान खबर तक नहीं हुई? ऐसा कैसे संभव है? मानो गबन न हुआ झपटमारी हो गई. अगर ऐसा हुआ भी है तो ऐसा होना उन साहिबानों की योग्यता पर प्रश्न-चिन्ह लगाता है और प्रश्न-चिन्ह लगाता है भारतीय प्रशासनिक सेवा में बहाली की प्रक्रिया पर.सवालों के घेरे में एजी और सीएजी जैसी संवैधानिक संस्थाएं भी हैं जो २२ सालों में सरकारी चोरों को पकड़ने में विफल रहीं. कदाचित यह घोटाला आगे भी धूमधाम से चलता रहता अगर भागलपुर के वर्तमान डीएम आदेश तितरमारे का महज ढाई करोड़ का चेक कूद कर वापस न आ गया होता.
मित्रों, बिहार सरकार की काबिलियत पर सवाल उठाने का तो प्रश्न ही नहीं. मैं जबसे नीतीश २०१३ में एनडीए से अलग हुए तभी से कहता आ रहा हूँ कि बिहार में सरकार की मौत हो चुकी है और चारों तरफ अराजकता का माहौल है. लगता है जैसे बिहार में शाहे बेखबर बहादुरशाह प्रथम का शासन हो. मुख्यमंत्री न जाने किस मूर्खों की दुनिया में मस्त थे. कहीं कुछ भी ठीक नहीं. हाई कोर्ट भी कहता है जब पैसे लेकर ही बहाली करनी है तो विज्ञापन,परीक्षा और साक्षात्कार का नाटक क्यों करते हो? सीधे गाँधी मैदान में शामियाना लगाकर नियुक्ति-पत्र क्यों नहीं बाँट देते?

रविवार, 13 अगस्त 2017

यूपी को संभालिए मोदी जी!

मित्रों, मेरी एक बहुत ही प्यारी आदत है. इसे मैं बुरी कहूं या अच्छी कह नहीं सकता. मैं जब भी नींद में होता हूँ सपने देखने लगता हूँ. न जाने कितनी बार मेरे सपनों में मैं भारत को विकसित राष्ट्र के रूप में देख चुका हूँ. न जाने कितनी बार भारत को विश्वगुरु बना देख चुका हूँ. मैंने अपने सपनों में देखा है कि मेरे भारत में कोई गरीब नहीं है. सबके पास पर्याप्त रोटी, कपडा और मकान है. हमारे सरकारी अस्पतालों में ईलाज की बेहतरीन सुविधा है. हमारे शिक्षा-संस्थान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मामले में दुनिया में अद्वितीय है. सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार इतिहास बन चुका है. ओलंपिक में भारत ने दुनिया में पहला स्थान प्राप्त किया है. इत्यादि.  लेकिन जितने सपने मैं सोती आँखों से देखता हूँ उससे कहीं ज्यादा जागते हुए कल्पना करता रहता हूँ.
मित्रों, जब भी मेरे सपनों के पूरा होने की जरा-सी भी उम्मीद जगती है मेरी खुशियों का ठिकाना नहीं रहता लेकिन जब सपने टूटने और बिखरने लगते हैं तो मैं जैसे पीड़ा के अंतहीन महासागर में गोते खाने लगता हूँ.
मित्रों, बिहार में २०१५ में जब एनडीए हारा था तो मेरे सपने भी हारे थे.  मेरी भींगी-२ सी पलकों में रह गए जैसे मेरे सपने बिखर के. तभी से मैं इन्तजार करने लगा था यूपी के चुनाव-परिणामों का. यूपी में जब भाजपा जीती तो मुझे लगा कि नरेन्द्र मोदी जिनकी उम्र मेरी ही तरह देश की उन्नति के सपने देखते गुजरी है अब यूपी में आदर्श-शासन स्थापित कर भारत के बांकी राज्यों को बताएंगे कि देखो राम-राज्य कोरी कल्पना नहीं है-दैहिक दैविक भौतिक तापा,राम राज काहू नहीं व्यापा. उन्होंने इसके लिए जिस व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि चुना वो कड़वा सच बोलने और कड़कपन के लिए ही जाना जाता था. शुरू में लगा कि अब यह व्यक्ति यूपी को बदल कर रख देगा. लेकिन अब धारणाएँ बदलने लगी हैं. सपने टूटे तो नहीं हैं लेकिन दरकने लगे हैं.
मित्रों, क्या जून तक यूपी की सड़कें गड्ढाविहीन हो गई? क्या यूपी पुलिस का रवैया थोडा-सा भी बदला? क्या थाना सहित दफ्तरों में व्याप्त भ्रष्टाचार में किंचित भी कमी आई? क्या शिक्षण-संस्थानों में पढाई के माहौल में कोई बदलाव आया? क्या इस साल जापानी बुखार से गोरखपुर अस्पताल में कम बच्चे मर रहे हैं? अगर नहीं तो फिर यूपी में क्या बदला?
मित्रों, दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तो यह है कि योगीजी को कदाचित अभी तक यह पता ही नहीं है कि करना क्या है और कैसे करना है? कौन-कौन से अधिकारी उनकी टीम में होंगे और किस तरह योजनाओं पर अमल होगा.
मित्रों, हम नहीं चाहते कि भविष्य में यूपी में भाजपा का शासन अपनी असफलताओं के लिए जाना जाए. क्योंकि यूपी भाजपा के लिए एक चुनौती तो है लेकिन अवसर भी है. उसके पास इतना प्रचंड बहुमत है कि वो यहाँ खुलकर प्रयोग कर सकती है. इसलिए मैं मोदीजी से कहता हूँ कि यूपी को संभालिए मोदीजी! सपनों को सिर्फ देखने और दिखाने से काम नहीं चलेगा उनको पूरा भी करना होगा देवता.

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

बिहार की नई राजधानी हाजीपुर!

मित्रों, यह खबर शर्तिया आपको अख़बारों में पढने को नहीं मिली होगी. किसी भी शहर के लिए राज्य की राजधानी होना गौरव की बात होती है लेकिन हाजीपुर के साथ ऐसा कतई नहीं है. बल्कि हाजीपुर के लोग  ऐसा होने पर शर्मिंदा हो रहे हैं. आप कहेंगे कि मैं मजाक कर रहा हूँ लेकिन यह भी सच नहीं है. चलिए मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ कि भारत की आर्थिक राजधानी के रूप में किस शहर को जाना जाता है? आप छूटते ही या फिर सवाल पूरा होने के पहले ही बोलेंगे मुंबई. अब आप सोंच रहे होंगे कि बिहार की आर्थिक राजधानी हाजीपुर है क्या? नहीं भाई वो तो पटना ही है लेकिन बिहार की आपराधिक राजधानी जो पहले से पटना ही था अब पटना नहीं है बल्कि हाजीपुर बन गया है.
मित्रों, यकीन न हो तो किसी भी अख़बार के किसी भी जिला संस्करण को को उलट कर देख लीजिए. रोजाना आपको हाजीपुर में जितनी शराब की बरामदगी, सेक्स रैकेट के भंडाफोड़, हत्या, अपहरण, छिनतई, मार-पीट और लूट की ख़बरें पढने को मिलेंगी क्या मजाल कि किसी और जिले के अख़बार में मिले. ऐसा लगता है जैसे बिहार के सारे अपराधियों ने हाजीपुर को ही अपना आधार-केंद्र बना लिया है. स्थिति ऐसी हो गई है कि हाजीपुर में कारोबार करना अपनी जान के साथ खिलवाड़ करना बन गया है.
मित्रों, आज से दो-ढाई दशक पहले तक हमारा हाजीपुर और हमारा वैशाली जिला ऐसा नहीं था. तब जब हम जहानाबाद, बड़हिया और बेगुसराय के बारे में पढ़ते-सुनते तो हमें अपने आप पर और अपने जिला पर बड़ा गर्व होता कि पूरी दुनिया को अहिंसा का अमर पाठ पढ़ानेवाले भगवान महावीर की जन्मस्थली कितनी शांत है. फिर लालू-राबड़ी के जंगल राज में हाजीपुर अपहरण उद्योग का केंद्र बन गया. अपहरण चाहे बिहार के किसी भी स्थान से हुआ हो अपहृत की बरामदगी हाजीपुर से ही होती थी. २००५ में एनडीए राज आने के बाद यह उद्योग पूरे बिहार के साथ-साथ बिहार में भी बंद हो गया.
मित्रों, लेकिन पिछले करीब चार-पांच सालों में और खासकर जिले में वर्तमान पुलिस कप्तान राकेश कुमार की तैनाती के बाद तो जैसे हाजीपुर ने अपराध के मामले में विश्व-रिकार्ड बना डालने की जिद ही पकड़ ली है. आप कहेंगे कि इसमें पुलिस कप्तान की क्या गलती है तो मैं आपको सलाह देता हूँ कि किसी काम से कभी आप भी एसपी ऑफिस का चक्कर लगा लीजिए. मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर बता रहा हूँ कि पहले तो साहब के अंगरक्षक आपको कार्यालय के बाहर से ही टरकाने की कोशिश करेंगे. अगर आपने एसपी साहब से भेंट कर भी ली तो वो कहेंगे कि उनके नीचे के कर्मचारियों या अधिकारियों से बातचीत कीजिए. कहने का मतलब कि वो कुछ नहीं करेंगे कुछ ले-देकर खुद ही निपटा लीजिए.
मित्रों, जब कप्तान ही ऐसा हो तो टीम के बांकी खिलाडी कैसे होंगे आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं. एक सच्ची घटना पेशे खिदमत है. इन दिनों पटना में सेक्स रैकेट चला रहे लोगों ने भी हाजीपुर का रूख कर लिया है शायद मनु महाराज के डर से. अगर आपका भी हाजीपुर में मकान है और आप उसमें नहीं रहते तो सचेत हो जाईए. ये लोग नकली पति-पत्नी बनकर आपके पास आएँगे और किराया पर फ्लैट ले लेंगे. फिर इनके पति के कथित दोस्तों और पत्नी के कथित भाइयों और बहनों का आना-जाना शुरू होगा जो सारे-के-सारे पटनिया होंगे. इनमें से एक-न-एक हमेशा रास्ते पर नजर रखेगा और मुख्य-दरवाजे को हमेशा बंद रखा जाएगा. फिर जब पडोसी और मकान-मालिक असली खेल को समझ जाएंगे तो डेरा और मोहल्ला बदल दिया जाएगा. फिर पति कोई और बनेगा और पत्नी कोई और. पति और पत्नी की जाति भी बदल जाएगी. हद तो तब हो गई जब मैंने पाया कि ऐसा ही एक चकला मेरे पड़ोस में भी चल रहा था और एक बार तो उक्त फ्लैट के बाहर दारोगा जी से भेंट हो गई. शायद हफ्ता वसूलने आए थे. बेचारे हमसे मिलकर ऐसा झेंपे कि पूछिए मत.
मित्रों, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि हाजीपुर में इन कप्तान साहब को पिछले दो-ढाई सालों से क्यों रखा गया है? क्या हाजीपुर इस मामले में भी उपेक्षित ही रहेगा? क्या हाजीपुर को पटना की तरह तेज-तर्रार पुलिस कप्तान का सुख भोगने का कोई हक़ नहीं? पटना में शिवदीप लांडे, विकास वैभव, मनु महाराज ... जैसे अधिकारी जो मीटिंग नहीं हीटिंग के लिए पूरे भारत में जाने जाते हैं और हाजीपुर में राकेश कुमार जिनको सिवाय मीटिंग के कुछ करना आता ही नहीं है?

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

शराबबंदी से किसको फायदा?

मित्रों, मैं वर्षों से अपने आलेखों में कहता आ रहा हूँ कि बिहार एक प्रदेश या जमीन का टुकड़ा ही नहीं है बल्कि एक मानसिकता भी है. नहीं तो क्या कारण है कि जो योजनाएं बांकी भारत में अतिसफल रहती हैं बिहार में अतिविफल हो जाती हैं. भ्रष्टाचार तो जैसे हम बिहारियों के खून में, डीएनए में समाहित है. लहर गिन कर पैसे कमाने वाले तो आपको देश के दूसरे हिस्सों में भी मिल जाएँगे लेकिन सूखे की स्थिति में भी लहरों का मजा देकर पैसा कमाना सिर्फ हम बिहारियों को आता है.
मित्रों, शराबबंदी से पहले बिहार की क्या हालत थी? छोटे-छोटे गाँव के हर गली मोहल्ले में नीतीश सरकार ने शराब की दुकान खोल दी थी. जिधर नजर जाती थी युवाओं के कदम लड़खड़ाते हुए नजर आते थे. मानों पूरा बिहार नशे में था और मदहोश कदमों से बर्बादी की ओर बढ़ रहा था.
मित्रों, ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गलतियों से सबक लिया और राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी. हमने तब भी कहा था कि बिहार पुलिस भारत ही नहीं दुनिया का सबसे भ्रष्ट संगठन है ऐसे में इस आन्दोलन का सफल होना नामुमकिन हैं. सरकार इसे असफल नहीं होने देगी और बिहार पुलिस इसे सफल नहीं होने देगी.
मित्रों, आज शराबबंदी लागू होने के डेढ़ साल बाद क्या स्थिति है? पैसे वाले पियक्कड़ों को तस्करों ने होम डिलीवरी की सुविधा दे दी है. एक फोन पर उनके घर पर शराब पहुंचा दी जाती है. दाम जरूर दोगुना देना पड़ रहा है. यद्यपि तस्कर भी जब पकडे जाते हैं तो उनकी सालभर की कमाई जमानत लेने में ही उड़ जाती है. लेकिन ये छोटे तस्कर हैं. बड़े तस्कर जो राजनीति में भी दखल रखते हैं उन पर कोई हाथ नहीं डालता. हमारे वैशाली जिले के ही एक एमएलसी पहले भी शराब माफिया थे और आज भी हैं. रोज ट्रक से माल मंगाते हैं लेकिन किसी की क्या मजाल कि उन पर हाथ डाल दे.
मित्रों, छोटे पियक्कड़ जो पहले मुंहफोड़वा से दिल लगाए थे अब ताड़ी से काम चला रहे हैं. ऐसे में ताड़ी बेचनेवालों की पौ-बारह है और उन्होंने ताड़ी के दाम कई गुना बढ़ा दिए हैं. इतना ही नहीं राज्य में गांजा और ड्रग्स की तस्करी में भी भारी इजाफा हुआ है. लेकिन अगर बिहार में शराबबंदी से सबसे ज्यादा किसी को लाभ हो रहा है तो वो है यहाँ की पुलिस. माल पकड़ाता है एक ट्रक तो बताया जाता है एक ठेला. बांकी पुलिसवाले खुद ही बेच देते हैं. जब्त दर्ज माल के भी बहुत बड़े हिस्से के साथ ऐसा ही किया जाता है और रिपोर्ट बना दी जाती है कि चूहे शराब पी गए.
मित्रों, ऐसे में बिहार सरकार को विचार करना होगा कि शराबबंदी से किसको क्या मिला? राज्य से खजाने को भारी नुकसान होने के बावजूद मैं मानता हूँ कि सरकार का कदम सही है लेकिन दुनिया की सबसे भ्रष्ट संस्था बिहार पुलिस पर वो कैसे लगाम लगाएगी विचार करने की जरुरत है क्योंकि बिल्ली कभी दूध की रखवाली नहीं कर सकती? बड़े शराब माफियाओं पर भी हाथ डालना इस मुहिम की सफलता के लिए जरूरी हो गया है. साथ ही अगर गांजा और ड्रग्स की आमद को भी रोका नहीं गया तो बिहार की पूत मांगे गई थी और पति गँवा के आई वाली स्थिति होनेवाली है.

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

पीछा करो

मित्रों, आपने कभी किसी का पीछा किया है? हमने तो नहीं किया. लड़की और बस के पीछु तो आपुन कभी भागा इच नहीं. हाँ कभी किसी को गलतफेमिली हो सकती है कि हम उसके पीछु पड़े हुए हैं. होता यह है कि कई बार हाजीपुर में हम सुभाष चौक पर बाईक से होते हैं और कोई लड़की स्कूटी से हमारे आगे होती है. फिर हम सिनेमा रोड में होते है तो वो भी वही होती हैं. फिर हम किसी काम से यादव चौक पर होते है और वो भी वहीँ पर होती है.  मगर ऐसा हम जानबूझकर नहीं करते या वहां-वहां जानबूझकर नहीं होते बल्कि संयोगवश होते हैं.
मित्रों, ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है. अमीन सयानी जी ने एक बार एक बड़ा ही दिलचस्प वाकया सुनाया था रेडियो पर. लता दीदी ने उस समय फिल्मों में नया-नया गाना शुरू किया था. वो रोज घर से निकलतीं. तांगा पकडतीं. फिर स्टेशन से लोकल ट्रेन पकडतीं. फिर ट्रेन से उतर कर तांगा पकडतीं और उतरने के बाद पैदल चलकर बॉम्बे टॉकीज जातीं. एक दिन ऐसा हुआ कि एक घुघराले बालों वाला लड़का उनके घर के पास से उसी तांगे में बैठा जिसमें लता दी बैठीं. फिर वही ट्रेन और फिर से वही तांगा. यहाँ तक कि पैदल वो उनके पीछे-पीछे बॉम्बे टॉकीज भी आने लगा. लता दी डर गई और लगभग दौड़ते हुए बॉम्बे तौकिज के मालिक हिमांशु रॉय और अभिनेता अशोक कुमार के पास पहुँच गई. फिर उनको बताया कि वो लड़का जो अभी गेट में घुस रहा है उनका पीछा कर रहा है. लड़के पर नजर जाते ही सभी हंस पड़े. दादामुनि ने कहा कि ये उनका छोटा भाई किशोर है जो कल ही मुंबई आया है. संयोग से ये भी आज वहीँ से बॉम्बे टॉकीज आ रहा है जहाँ से तुम आ रही हो. कहना न होगा बाद में लता और किशोर पक्के भाई-बहन बन गए.
मित्रों, अब अगर लता दी घटना का राजनीतिकरण करती और हमारी मीडिया जो कुछ दिनों से टीआरपी के लिए महिलाओं की चोटी कटवाती फिर रही होती मामले को लपक लेती कि सुपर स्टार दादामुनि के भाई ने एक गरीब लड़की का पीछा किया और उसका जीना मुहाल कर दिया. किशोर कुमार की गलती बस इतनी होती कि वे उस रास्ते से आते और अशोक कुमार के भाई होते. बांकी तो उनको भी पता नहीं होता कि वे किसी का पीछा कर रहे हैं.
मित्रों, खैर चंडीगढ़ पीछा करो कांड में एक अच्छी बात यह हुई है कि घटना का वीडियो फुटेज मिल गया है जिससे बहुत जल्द दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. पता चल जाएगा कि भाजपा नेता का बेटा सड़क पर चुपचाप जा रहा था या छेड़खानी भी कर रहा था. तब तक आप लोगों को राम राम इस चेतावनी के साथ कि सड़क पर सचेत रहें सावधान रहें कि कोई लड़की आपके आगे-आगे तो नहीं चल रही है. अगर आप भाजपा नेता के बेटे हैं तो बेहतर होगा कि आप सड़क पर निकले ही नहीं.

शनिवार, 5 अगस्त 2017

सत्ता पक्ष के नेताओं पर छापे क्यों नहीं?

मित्रों, क्या आपको याद है कि जबसे अपना देश आजाद हुआ है तबसे हमारे देश और प्रदेश में कितने लोकसभा और विधानसभा चुनाव भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लडे गए? न जाने कितनी बार चुनाव जीतनेवाली सरकारों ने चुनावों से पहले हमसे वादे किए कि जीतने के बाद हम सत्तारूढ़ दल के भ्रष्ट नेताओं को सजा दिलवाएंगे लेकिन चुनाव जीतने के बाद भूतपूर्वों को सजा दिलवाना तो दूर वादा करनेवाले खुद ही भ्रष्टाचार में लिप्त हो गए.
मित्रों, यह हमारे लिए बड़े ही सौभाग्य की बात है कि पिछले ७० सालों में पहली बार केंद्र में एक ऐसी सरकार काम कर रही है जिसने खुद को भ्रष्ट होने से बचाते हुए देसी-विदेशी कालाधन और बेनामी संपत्ति के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई शुरू की है. पिछली सरकारों की तरह इसने भूतपूर्व नेताओं को बख्श नहीं दिया है बल्कि उनके द्वारा अर्जित कालेधन और बेनामी संपत्ति को भी पूरी बेरहमी के साथ जब्त किया है. लेकिन ऐसा देखने में आ रहा है उसकी कार्रवाई में निष्पक्षता नहीं है और चुन-चुनकर सिर्फ विपक्षी नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है. सत्ता पक्ष के जिन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई है वे काफी छोटे स्तर के भ्रष्टाचारी व नेता हैं.
मित्रों, सवाल उठता है कि क्या सिर्फ विपक्ष के नेता ही भ्रष्ट हैं? कल तक जो भ्रष्ट नेता विपक्ष में थे और आज भाजपा में आ गए हैं उनके खिलाफ क्यों कार्रवाई नहीं हो रही? क्या भाजपा में आ जाने मात्र से ही वे ईमानदारों की श्रेणी में आ गए? लालू परिवार अगर भ्रष्ट हैं तो मुलायम परिवार उनसे कम तो नहीं? बिहार के प्रसिद्ध  पासवान परिवार की संपत्तियों की गहराई और उतनी ही निष्ठुरता के साथ क्यों नहीं जांच की जा रही? बोकारो स्टील कारखाना बहाली में गड़बड़ी को लेकर उनके खिलाफ सीबीआई ने मनमोहन सरकार के अंतिम दिनों में जो जाँच शुरू की थी उसका क्या हुआ कौन जवाब देगा?
मित्रों, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भी पिछले सालों में कई घोटाले हो चुके हैं लेकिन आज तक किसी नेता को सजा नहीं मिली है. इनमें से व्यापम घोटाला तो जैसे भूतहा है. इसी तरह राजस्थान में गौमाता के नाम पर अनगिनत घोटाले हो रहे हैं. सरकारी गौशालाओं में एकसाथ सैंकड़ों गायों की मौत हो रही है लेकिन वहां तो कोई छापा नहीं पड़ रहा.
मित्रों, कुल मिलाकर हमारा मानना है इस तरह की एकतरफा कार्रवाई से भ्रष्टाचार कम तो होगा लेकिन पूरी तरह से ख़त्म नहीं होगा. उसके लिए सारे भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ निष्पक्ष होकर कार्रवाई करनी होगी इस तथ्य को मोदी सरकार को समझना होगा. मैं समझता हूँ कि वो इसे समझ भी रही है.

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

चीन को आतंकी राष्ट्र घोषित करवाए भारत

मित्रों, मुझे उम्मीद है कि आपने कभी-न-कभी कनकौआ जरूर देखा होगा. जो मित्र राहुल गाँधी की तरह अपने शहर में आलू की फैक्ट्री लगाना चाहते हैं उनको बता दूं कि हमारे बिहार में मक्के या आलू के खेत में कौओं,चूहों आदि को डराने के लिए खेतों में एक मानवनुमा पुतले को खड़ा कर दिया जाता है. जानवर और पक्षी उनको आदमी समझ लेते हैं और खेत में आने से डरते हैं जिससे फसल की रक्षा हो जाती है. लेकिन जिस दिन उनको पता चल जाता है कि उनको ठगा जा रहा है उसी दिन उनका डर समाप्त हो जाता है और पक्षियों में सबसे चतुर माने जानेवाले कौवे कनकौवे पर मल विसर्जन करने लगते हैं.
मित्रों, कुछ ऐसा ही चीन इन दिनों अपने पडोसी देशों के साथ करने की कोशिश कर रहा है. वो बार-बार हवाबाजी करता रहता है कि हमारे पास इतनी सेना है, इतने हथियार हैं, हम यह कर देंगे, हम वह कर देंगे लेकिन करता कुछ भी नहीं है. लगता है मानों वो फूंक मारकर ही पहाड़ को उडा देगा.
मित्रों, यह चीन न सिर्फ पाकिस्तानी आतंकियों का संयुक्त राष्ट्र संघ में बचाव कर रहा है बल्कि खुद भी आतंकियों की तरह पड़ोसियों में अपनी कथित ताकत का आतंक पैदा कर उनपर अपनी धौंस जमाना चाहता है. इतिहास साक्षी है कि चीन आमने-सामने की लडाई में आज तक किसी भी देश को हरा नहीं पाया है यहाँ तक कि छोटे-से वियतनाम के हाथों भी उसको शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा था. जहाँ तक १९६२ का सवाल है तो उस समय भी चीन से भारत की सेना हारी नहीं थी बल्कि नेहरु ने उनको जान-बूझकर या अपनी महामूर्खता के कारण एक के बाद एक भयंकर रणनीतिक गलतियाँ करते हुए हरवा-मरवा दिया था. सनद रहे कि उस समय भयंकर अकाल जिसे चीनी झेंप मिटाने के लिए गर्व से ग्रेट चाईनीज फेमिन कहते हैं से होनेवाली करोड़ों लोगों की मौतों के चलते कम्युनिस्ट पार्टी काफी अलोकप्रिय हो चुकी थी और ऐसे में भारत के खिलाफ मिले वाक ओवर ने माओ के लिए संजीविनी का काम किया था. इस संदर्भ में नेहरू की भूमिका संदिग्ध हो जाती है और इसकी गहराई से जांच किए जाने की आवश्यकता है. 
मित्रों, वही चीन आज फिर से १९६२ को दोहराना चाहता है मगर उसके पहले प्रयास को ही भारत की वर्तमान संघ सरकार ने ऐसा फटका दिया है कि वो पूरी दुनिया में हँसी का पात्र बनकर रह गया है. पिछले एक-डेढ़ महीने से चीन लगातार भारत को थोथी धमकियाँ देता जा रहा है कि हम पहाड़ हैं तो हम इतने शक्तिशाली हैं, हम ये कर देंगे हम वो कर देंगे लेकिन सच्चाई यही है कि वो डोकलाम में आज भी भारत के मुकाबले कमजोर स्थिति में है. अब तो उसकी स्थिति ऐसी हो गयी है कि उसके एकमात्र पडोसी मित्र पाकिस्तान की मीडिया भी उसका मजाक उड़ाने लगी है.
मित्रों, मेरा मानना है कि भारत को सीमा पर अपनी तैयारियों को युद्ध-स्तर पर और भी चाक-चौबंद तो करना ही चाहिए साथ ही पाकिस्तान का आतंकवाद के मुद्दे पर खुलकर साथ देने के लिए प्रत्येक वैश्विक मंच पर आड़े हाथों भी लेना चाहिए और उसको भी आतंकी राष्ट्र घोषित करवाने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि अपराधी की मदद करनेवाला भी बराबर का अपराधी होता है. चीन के कब्जे में आज भी हमारी हजारों किलोमीटर जमीन फँसी हुई है इसलिए वह किसी भी तरह नरम व्यवहार का अधिकारी नहीं है. फिर आज वैश्विक कूटनीति भी भारत के माकूल है इसलिए लोहा इससे पहले कि ठंडा हो जाए हथौड़े का जबरदस्त प्रहार कर देना चाहिए.

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

नीतीश का निर्णय देश-प्रदेश के हित में लेकिन.....

मित्रों, पिछले दिनों बिहार के राजनैतिक पटल पर जो घटित हुआ वह पूरी तरह से हतप्रभ कर देने वाला रहा. जो आदमी बार-बार ताल ठोककर कह रहा था कि मिटटी में मिल जाऊँगा लेकिन भाजपा से हाथ नहीं मिलाऊंगा उसने चंद घंटों में पाला बदल लिया और भाजपा की गोद में जाकर बैठ गया. सबकुछ इतनी तेजी में हुआ कि लगा कि जैसे सबकुछ पूर्वनिर्धारित था.
मित्रों, सवाल उठता है कि नीतीश कुमार ने जो कुछ किया क्या वो नैतिक रूप से सही था? नहीं कदापि नहीं. क्योंकि नीतीश का अचानक पाला बदल लेना जनादेश का सीधा अपमान है. लेकिन नीतीश के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. याद कीजिए वर्ष २०१० का विधान-सभा चुनाव. तब नीतीश भाजपा के साथ मिलकर प्रचंड बहुमत से चुनाव जीते थे लेकिन साल २०१३ में उन्होंने अचानक भाजपा को लात मारकर सरकार से बाहर कर दिया और रातोंरात उन्ही लालू से हाथ मिला लिया जिनके जंगल राज के खिलाफ लम्बे संघर्ष के बाद वो बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. जाहिर है नीतीश के लिए राजनैतिक मूल्यों और जनादेश का न तो पहले कोई मतलब था और न आज ही है. हमेशा जनता की आँखों में सिद्धांतों की धूल झोंकनेवाले नीतीश का तो बस एक ही सिद्धांत है कि अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता.
मित्रों, आश्चर्य है कि २०१५ के विधान-सभा चुनावों के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जुमला वीर कहने वाले नीतीश कल कैसे अपने मिट्टी में मिल जानेवाले बयान पर यह कहकर निकल लिए कि ऐसा कहना उस समय की आवश्यकता थी. इसका तो यही मतलब निकालना चाहिए कि नीतीश अंग्रेजी में चाइल्ड ऑफ़ टाइम और हिंदी में मतलब के यार हैं.
मित्रों, इतना ही नहीं नीतीश समय-समय पर शब्दों की परिभाषा तक बदल देते हैं. उनके अनुसार कभी सुशासन का मतलब अच्छा शासन होता है तो कभी कथित साम्प्रदायिकता को रोकना ही सुशासन हो जाता है फिर चाहे ऐवज में राज्य में कानून नाम की चीज ही न रह जाए. इतना ही नहीं बार-बार उनकी सांप्रदायिकता की परिभाषा भी बदलती रहती है. कभी भाजपा का साथ देना घनघोर साम्प्रदायिकता होती है तो कभी घोर धर्मनिरपेक्षता.
मित्रों, जाहिर है कि नीतीश कुमार ने थाली का बैगन बनकर मूल्यपरक राजनीति का मूल्य संवर्धन नहीं किया है बल्कि उसका अवमूल्यन ही किया है. हाँ इतना जरूर है उनके इस कदम से देश और प्रदेश को लाभ होगा. प्रदेश एक बार फिर से विकास की पटरी पर लौट आएगा. चाहे आदती गलथेथर नीतीश ने कल की प्रेस-वार्ता में भले ही यह नहीं माना हो कि पिछले ४ सालों में बिहार का विकास न केवल पूरी तरह से अवरूद्ध हो गया बल्कि रिवर्स गियर में चला गया लेकिन आंकड़ों में यह स्वयंसिद्ध है. चूंकि हमारे लिए नेशन फर्स्ट है इसलिए हम नीतीश के इस कदम का स्वागत करते है लेकिन भाजपा को चेताना भी चाहते हैं कि उनसे सचेत रहे और उनको ज्यादा सीटें देकर फिर से इतना मजबूत न होने दे कि वे फिर से मौसम के बदलने या फिर गिरगिट के रंग बदलने से पहले ही पाला बदलने की स्थिति में आ जाएं.