मंगलवार, 25 अगस्त 2009

न दैन्यम न पलायनम

यकीनन आप यकीन नहीं करेंगे,
मैं एक पत्थरदिल इंसान हूँ;
हाँ यह एक अलग बात है की
मेरा दिल अनगढ़ नहीं है,
लगातार वक्त इस पर
अपने छेनी-हथौरे चलाता रहा है
बेरहमी से।
कई बार मैंने महसूस किया है
की जैसे मैं नदी की धारा में फंसा
पत्थर हूँ
देश, काल और परिस्थिति कुछ भी
मेरे नियंत्रण में नहीं है,
और मैं लुढ़कता-पुढ़कता चला
जा रहा हूँ अपनी नियति की ओर;
मेरी यात्रा जारी है सुख-दुःख के दोनों तीरों
के बीच,
परन्तु कभी-कभी मैंने सुखद स्थितियों को
हाथों से नहीं जाने देने की कोशिश भी की है;
पकड़ना चाहा है जमीन को चिमटकर;
भले ही तेज धारा ने धकेल दिया हो आगे करके विवश,
तो क्या मैं हार गया हूँ युद्ध,
नही! कदापि नहीं! लड़ना भी अपने-आपमें कम नहीं है;
फ़िर मैंने तो घनघोर युद्ध किया है
अथक और अनंत,
आज तीरों की शैय्या पर भले ही
जिंदगी ने लिटा दिया हो मुझे,
मैंने इस बदलती दुनिया के एक छोटे
से हिस्से को ही सही,
अपने अनुसार बदलने की जिद
नहीं छोड़ी है;
क्योंकि अभी भी मेरी सांसें
रुकी नहीं हैं, चल रही हैं.

2 टिप्‍पणियां:

prafull ने कहा…

सही कहा आप ने भाईसाहब,में आपके विचारो से सहमत हूँ.लोगो की हालत येसी ही है ,पर फिर भी लोग प्र्यत्नसील है.....किसी महापुरूस ने कहा है कि-- हरी से लगे रहो रे भाई, जबतक घट में प्राण ! कभी तो दिन-दयाल कि भनक परेगी कान !..

Navjeet ने कहा…

diljalon se dil lagane ki baat nahin ki jati hai. dhooan wahin uthta hai jahan aag ho.