रविवार, 19 सितंबर 2021

ईटीएम से कटे बिहार रोडवेज में टिकट

मित्रों, आप जानते होंगे पिछले कुछ सालों से मैं उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर में रह रहा था। जाहिर है इस दौरान मुझे बार-बार बस यात्रा करनी पडी। मैं यह देखकर हतप्रभ था कि उत्तर प्रदेश में चलनेवाली लगभग सारी बसें सरकारी थीं। साथ ही सारी बसों में ईटीएम (इलेक्ट्रोलक्स टिकट मशीन) से टिकट काटा जा रहा था। यहां तक कि अगर एक बस के संवाहक से आप पैसा वापस लेना भूल गए हों तो दूसरी सरकारी बस के संवाहक को टिकट दिखाकर पैसा वापस ले सकते थे। न ही कोई धांधली न ही धांधली की गुजाईश। मित्रों,अब मुज़फ्फरनगर से आते हैं मुज़फ्फरपुर। वही बिहार वाला मुज़फ्फरपुर। पिछले दिनों मुझे लगातार दस दिनों तक हाजीपुर से मुज़फ्फरपुर जाना पडा। पहले तो रेलवे रो खंगाला तो पता चला कि हाजीपुर से सुबह में ऐसी कोई पैसेंजर ट्रेन है ही नहीं जो नौ बजे से पहले मुज़फ्फरपुर पहुंचा दे। मजबूरन मुझे बस से यात्रा करनी पडी। मैंने जानबुझकर सरकारी बस को चुना हालांकि बिहार में वे अल्पसंख्यक हैं। मित्रों, मैंने देखा सरकारी बसों के संवाहक अगरचे यात्रियों को टिकट देते ही नहीं थे और अगर जिद करने पर देते भी थे तो परचूनिया टिकट जिन पर क्रम संख्या तक अंकित नहीं होते थे बांकी रूट-किराया-गंतव्य स्थान वगैरह के ब्योरे की बाद तो दूर ही रही. एकाध संवाहक कार्बन लगाकर टिकट काट जरूर रहे थे लेकिन उसमें से भी कितना पैसे सरकारी खजाने में जाता होगा राम ही जानें. इतना ही नहीं कोई संवाहक हाजीपुर से मुजफ्फरपुर का भाड़ा ८० रूपया ले रहा था तो कोई ९०-१०० और १२०. कोई निर्धारित भाड़ा नहीं जितना लूट सको लूट लो. मित्रों, अगर ईटीएम से टिकट कटता तो सरकारी बसों में ऐसी मनमानी और बेईमानी हरगिज नहीं होती. क्योंकि ईटीएम से टिकट में हाेने वाली गड़बड़ियों पर रोक लगेगी। यात्रियों को समय और किलोमीटर अंकित टिकट मिलेगा। ईटीएम मशीन से बस के चलने का समय, किराए की डिटेल, किलोमीटर, बस का दूसरे स्थान पर पहुंचने का समय, टैक्स, टूल टैक्स, बस के रूट की जानकारी, कंडक्टर की रिसीट ऑल टिकट का जोड़ भी मिला करेगा। मित्रों, समझ में नहीं आता कि जो मशीन उत्तर प्रदेश की बसों में वर्षों पहले लागू हो चुकी है वो अब तक उसके पडोसी राज्य बिहार में क्यों लागू नहीं हुई? क्या नीतीश कुमार जी इतने शाहे बेखबर हैं कि उनको सरकारी बसों और उनके संवाहकों का सच पता नहीं है? या नीतीश जी भी चाहते हैं कि भ्रष्टाचार चलता रहे? हाँ, यह मेरी समझ में जरूर आ गया है कि उत्तर प्रदेश विकास के मामले में बिहार से इतना आगे क्यों है?

सोमवार, 6 सितंबर 2021

जातीय जनगणना की बेतुकी मांग

मित्रों, अगर आप भारत के किसी छोटे बच्चे से भी पूछेंगे कि देश को किसने बर्बाद किया तो वो छूटते ही कहेगा नेताओं ने. दुर्भाग्य की बात है कि जैसे-जैसे नेताओं की नई पीढी आ रही है वैसे-वैसे नेताओं का देशहित से सरोकार कम होता जा रहा है। अब स्थिति इतनी खराब हो गई है कि हमारे नेता सिर्फ लोक लुभावन देश नशावन मुद्दों को ही हवा देने लगे हैं. मध्यकाल में जहाँ संत कबीर ने कहा था कि जाति न पूछो साधू की, केवल देखिए ज्ञान; मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान वहीँ हमारे वर्तमान काल के नेताओं ने जाति नाम परमेश्वर बना दिया है. मित्रों, हमारे नेता इतने पर ही रूक जाते तो फिर भी गनीमत थी. उन्होंने यह जानते हुए पहले जातीय आरक्षण लागू किया कि हर जाति में गरीबी है. फिर पंचायत व शहरी निकाय चुनावों में यह जानते हुए जाति आधारित आरक्षण लागू किया कि लोकतंत्र बहुमत का शासन है. जाति के नाम पर पार्टी को पारिवारिक संस्था में बदल देनेवाले नेताओं का प्रतिभा का गला घोंटने के बाद भी जी नहींं भरा और अब वो जातीय जनगणना की मांग करने लगे हैं. मित्रों, यह बात किसी से छिपी हुई नहींं है कि जब कांग्रेस राज में परिवार नियोजन का महा अभियान चला था तब सबसे ज्यादा बंध्याकरण सवर्णों ने ही करवाया था जिससे उनकी संख्या में भारी गिरावट आई. ऐसे में अगर जातीय जनगणना होती है तो सबसे ज्यादा नुकसान में वही लोग होंगे जिन्हें सबसे ज्यादा देश की चिंता होती है. मित्रों, ऐसा इसलिए होगा क्योंकि जाति नाम परमेश्वर वाले नेतागण लगे हाथों जनसंख्या के अनुपात में जातीय आरक्षण की मांग करेंगे. फिर पचास प्रतिशत आरक्षण की सीमा को तोड़ दिया जाएगा और देश शत प्रतिशत आरक्षण की ओर अग्रसर हो जाएगा. फिर प्रतिभा और गुणवत्ता का कोई मायने नहीं रह जाएगा और इस तरह भारत कभी भी विश्वगुरू नहीं बन पाएगा. मित्रों, अत: जातीय जनगणना का जमकर विरोध किया जाना चाहिए क्योंकि यह एक पश्चगामी कदम है. इससे न सिर्फ जातीय राजनीति को बढावा मिलेगा वरन प्रतिभावानों का मनोबल भी गिरेगा.