बुधवार, 20 अक्तूबर 2021

आखिर कब सुधरेंगे बिहार के पटवारी?

मित्रों, साल तो याद नहीं लेकिन १९८० के दशक की बात है. पिताजी हर महीने प्रसिद्ध पत्रिका कादम्बिनी लाते थे. ऐसे ही किसी साल के दिवाली अंक में चम्बल के पूर्व डाकू मोहर सिंह का साक्षात्कार छपा था. मोहर सिंह से जब पूछा गया कि वो बागी क्यों बने तो उन्होंने कहा था कि अगर गाँव का पटवारी सुधर जाए तो कोई बागी नहीं बनेगा. मित्रों, उत्तर प्रदेश का तो पता नहीं कि वहां के पटवारी सुधरे कि नहीं लेकिन अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि बिहार के पटवारी नहीं सुधरे हैं. मैं दावे के साथ कहता हूँ कि अभी भी बिहार में एक भी दाखिल ख़ारिज बिना रिश्वत दिए नहीं होता. राजस्व मंत्री की जमीन का भले ही हो गया हो. इतना ही नहीं पैसा देने पर भी दाखिल ख़ारिज में कर्मचारी सालों साल लगा देता है. मित्रों, ईधर सरकार कहती है कि दाखिल ख़ारिज को ऑनलाइन कर दिया गया है लेकिन सच्चाई यही है कि सारे काम ऑफलाइन हो रहे हैं. इस बारे में पूछने पर एक राजस्व कर्मचारी ने दिलचस्प वाकया सुनाया. हुआ यह कि किसी किसान ने दाखिल ख़ारिज के लिए ऑनलाइन आवेदन दिया. फिर वो कर्मचारी से मिलने आया. कर्मचारी ने २५०० रूपये मांगे तो किसान ने कहा कि आप काम करिए मैं रसीद कटवाने आऊंगा तो पैसे दे दूंगा. कर्मचारी ने विश्वास करके काम करवा दिया और उसे ऑनलाइन भी कर दिया. उधर किसान चालाक निकला और कर्मचारी के पास रसीद कटवाने आया ही नहीं. जब कई महीने बीत गए तब कर्मचारी को शक हुआ और उसने चेक किया. कर्मचारी यह देखकर सन्न रह गया कि किसान ने ऑनलाइन रसीद कटवा लिया था. कर्मचारी ने बताया कि उसने अपनी जेब से सीओ और सीआई को १००० रूपये दे रखे थे. इस धोखे के बाद उस कर्मचारी ने बिना पैसे लिए ऑनलाइन दाखिल ख़ारिज करना ही बंद कर दिया. मजबूरन पार्टी को उसके पास जाना ही पड़ता है और बार-बार जाना पड़ता है. मित्रों, हमारे एक परिचित की तो जमीन ही चोरी हो गई. बेचारे की खतियानी जमीन थी. जब वो रसीद कटवाने गया तो पता चला कि जमीन है ही नहीं. बेचारे की पाँव तले की जमीन भी खिसक गई. आजकल बेचारे डीसीएलआर कार्यालय का चक्कर काट रहे हैं. मित्रों, अब सुनिए सरकार की तो उसे जहाँ विभाग में पारदर्शिता बढ़ानी चाहिए वहीँ वो पारदर्शिता कम करने में लगी है. संशोधन करके सूचना के अधिकार की जान पहले ही निकाली जा चुकी है. पहले जहाँ बिहार भूमि वेबसाइट पर हरेक मौजा में किस-किस किसान का दाखिल ख़ारिज का आवेदन कितने महीनों या सालों से लंबित है का विवरण उपलब्ध रहता था वहीँ अब अनुपलब्ध है. अब किसान सिर्फ अपने आवेदन की स्थिति देख सकता है. न जाने सरकार ने वेबसाइट में इस तरह का संशोधन क्यों किया जिससे इस महाभ्रष्ट विभाग में और भी ज्यादा भ्रष्टाचार हो जाए. मित्रों, आज ही यह समाचार पढने को मिला कि अब अंचलाधिकारी दाखिल ख़ारिज का काम नहीं देखेंगे लेकिन उससे होगा क्या? जो अधिकारी दाखिल ख़ारिज देखेगा क्या वो रिश्वत नहीं लेगा? फिर यह कोई सुधार तो हुआ नहीं. यह भी पढ़ा कि कानपुर आईआईटी की टीम ने कोई नया सॉफ्टवेयर बनाया है जिससे बिना रिश्वत के दाखिल ख़ारिज हो सकेगा. देखते हैं कि आगे होता क्या है? वैसे मुझे नहीं लगता कि अंचलाधिकारी, अंचल निरीक्षक और हलका कर्मचारी के पास इसका तोड़ नहीं होगा. ऐसे में ४० साल बाद वही सवाल उठता है जो चम्बल के कुख्यात डाकू मोहर सिंह ने तब उठाया था कि आखिर कब सुधरेंगे बिहार के पटवारी?

सोमवार, 18 अक्तूबर 2021

महंगाई की मार बेसुध सरकार

मित्रों, महंगाई एक ऐसी चीज है, जो कभी खबरों से बाहर नहीं होती। कभी इसके बढ़ने की खबर है, तो कभी-कभी घटने की हालाँकि ऐसा कम ही होता है। समय साक्षी है कि महंगाई ने इस देश में कई बार सरकारें भी गिरा दी हैं। हालांकि, आजकल के हालात देखकर यकीन करना मुश्किल है कि ऐसा भी होता होगा। मित्रों, महंगाई के मोर्चे पर पिछले कुछ दिनों में आई खबरों पर नजर डालें, तो क्या दिखता है? सरकारी आंकड़ों के अनुसार सितंबर में खुदरा महंगाई की दर पांच महीने में सबसे नीचे आ गई है, जो त्योहारी सीजन में अच्छी खबर मानी जानी चाहिए। लेकिन अगर हम जनसामान्य से बात करें तो निर्धन और माध्यम वर्ग बढती महंगाई से काफी परेशान है. एक तरफ केंद्र सरकार टाटा समूह को राहत दे रही है वहीँ पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस महँगी करके गरीबों की मुट्ठी से पैसे निकाल रही है. ज्ञातव्य हो कि एयर इंडिया पर 31 अगस्त तक कुल 61,562 करोड़ बकाया था। टाटा संस 15,300 करोड़ की जिम्मेदारी लेगी और बाकी 46,262 करोड़ एआईएएचएल को हस्तांतरित किया जाएगा अर्थात ये पैसे सरकार अपने पास से चुकाएगी। मित्रों, सरकार के पास टाटा को राहत पहुँचाने के लिए पैसे हैं, वेदांता के हेयर कट के लिए ४६ हजार करोड़ रूपये हैं लेकिन आम जनता के लिए नहीं हैं? अगर हम सरकार की भी मानें तो वस्तुओं और सेवाओं के दाम घटे नहीं हैं बल्कि उनके दाम बढ़ने की रफ़्तार घटी है. सेवा से याद आया कि आज की तारीख में शिक्षा और स्वास्थ्य पर बढ़ता खर्च भी लोगों को कम तकलीफ नहीं दे रहा है. निजी विद्यालयों और अस्पतालों की मनमानी कोरोना से परेशान आम आदमी को कंगाल करने पर तुली है. एक बच्चे को बारहवीं करवाने में आज १० से १५ लाख रूपये का खर्च आता है जबकि सरकारी विद्यालय सफेद हाथी बनकर रह गए हैं. इसी प्रकार निजी अस्पताल भी लोगों को लूट रहे हैं. सवाल उठता है कि इन दो क्षेत्रों के लिए कोई रेगुलेटरी क्यों नहीं है जो इनकी फीस और चार्जेज पर नियंत्रण रखता? मित्रों, अब समाज के विभिन्न वर्गों पर महंगाई के प्रभावों पर बात करेंगे. सबसे पहले श्रमवीरों की बात. यह बात किसी से छुपी नहीं है कि प्राइवेट फैक्ट्रियों में काम करनेवाले अधिकतर मजदूरों को रोजाना १२ घंटे काम करने पर भी १०-१५ हजार से ज्यादा नहीं मिलता. अभी एक लीटर सरसों तेल 210 रुपए का है. कुछ महीने पहले इसका भाव 120 रुपए लीटर था. रसोई गैस का सिलेंडर अब 1,050 रुपए का हो गया है. फूलगोभी 100 रुपए किलो तो टमाटर 60 रुपए और प्याज़ 50 रुपए. पेट्रोल ११० और डीजल भी १०० के पार है. जिससे आने वाले दिनों में महंगाई और बढ़ेगी. लेकिन राजनीतिक दलों के लिए ये कोई मुद्दा ही नहीं है. कोई भी महंगाई पर चर्चा नहीं करता. पहले पांच हज़ार रुपए में राशन आराम से आ जाता था, लेकिन अब इतने पैसे में कुछ नहीं होता. प्राइवेट नौकरी में तनख़्वाह बहुत मामूली बढ़ती है. लिहाज़ा घर खर्च चलाने के लिए कई तरह के जोड़ घटाव वाला गणित करना पड़ता है. सच तो यह है कि इस बार अधिकतर मजदूर दुर्गा पूजा में घर के लोगों के लिए कपड़ा तक नहीं ख़रीद सके. बच्चे घर से ऑनलाइन क्लास कर रहे हैं, लेकिन स्कूल है जो ट्यूशन फ़ीस के अलावा भी कई तरह की फ़ीस वसूल रहा है. दुर्भाग्यवश ये भी मुद्दा नहीं बन रहा. इतनी महँगी पढ़ाई पूरी करने के बाद जब सरकारी नौकरी और घर के आस-पास काम नहीं मिलता तभी नौबत परदेश में मजदूरी काम करने तक आ जाती है. अधिकतर मजदूर किराए के एक कमरे में रहते हैं. ज़रूरत के सामान के नाम पर उनके पास एक चारपाई, पंखा, चंद बर्तन और कुछ कपड़े होते हैं. घर-परिवार से दूर रहने के बावजूद जानलेवा महंगाई के कारण उनकी सिर्फ जान बच रही है पैसा नहीं बच रहा. मित्रों, सच तो यह है कि मांग नहीं होने से न सिर्फ क्रेता बल्कि दुकानदार भी परेशान हैं. पहले बीजेपी जब विपक्ष में थी तो ज़ोर-शोर से महंगाई पर कांग्रेस पार्टी को घेरती थी, लेकिन मोदी सरकार के ख़िलाफ़ कांग्रेस पार्टी महंगाई को आज तक मुद्दा नहीं बना सकी. यही वजह है कि आम आदमी की कोई नहीं सुन रहा और मीडिया में केवल सरकार का गुणगान चल रहा है.गरीबों को उज्ज्वला योजना में गैस सिलेंडर मिला. तब वे नहीं जानते थे कि इसे भरवाने में इतना पैसा लगेगा. अब महंगाई इतनी अधिक है कि वे फिर से लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने लगे हैं. त्रों, झुलसाती महंगाई ने किसानों को भी कहीं का नहीं छोड़ा है. पिछले कुछ सालों में खेती के लिए ज़रूरी चीज़ों के दाम बहुत बढ़ गए हैं. खाद की क़ीमत पहले की तुलना में दोगुनी हो चुकी है. अब आप 100 बीघा के जोतहर (मालिक) भी हैं, तो महंगाई के कारण सारी ज़मीन पर खेती नहीं करा सकते. ज़मीन परती (ख़ाली) रह जाती है. खाद, बीज, कीटनाशक, पशुओं का चारा, डीज़ल सबकी क़ीमत बढ़ चुकी है. सरकार को किसानों के दर्द से कोई सरोकार नहीं है. ५०० रूपये मासिक में आजकल होता क्या है? अब किसानों को नून-रोटी खाने के लिए भी सोचना पड़ रहा है. तेल-घी की तो बात ही नहीं है. मित्रों, उधर जिन लोगों ने छोटे-मोटे स्कूल खोल रखे थे उनकी हालत भी कोई अच्छी नहीं है। कोविड महामारी के चलते स्कूल बंद हो गया. गैस के दाम बढ़ गए तो लोग दिन भर के लिए सब्ज़ी एक ही बार बनाकर ख़र्च कम करने की कोशिश कर रहे हैं. हरी सब्ज़ी खाना भी कम कर दिया है. कई परिवार तो कोरोना में आमदनी घटने या पूरी तरह से बंद हो जाने चलते पहले से ही इतने लाचार हो चुके हैं कि बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया और उस पर जानलेवा महंगाई की मार. लोग अपने बेटे और बेटी को पोषण वाला खाना भी नहीं दे पा रहे. उनका जीवन स्तर बहुत नीचे आ गया है. समाज में भ्रष्टाचार बढ़ा है क्योंकि लोग ज़रूरतें पूरी करने के लिए आय का ग़लत ज़रिया ढूंढ रहे हैं. मित्रों, सच्चाई तो यह है कि सत्ता पक्ष अराजक हो गया है और आम लोग 'एकाकी' होकर सोचने लगे हैं. मोबाईल और इन्टरनेट ने उनको और भी समाज से काट कर रख दिया है. बढ़ती महंगाई से आदमी तनाव में है, लेकिन वो करे भी तो क्या करे? आम आदमी ने हालात से समझौता कर लिया है. मोदी सरकार आखिरी उम्मीद थी लेकिन अब कोई उम्मीद नजर नहीं आती. मित्रों, रही बात सरकार की तो उसे हम इतना तो कह ही सकते हैं कि तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है लगी है होड़ सी देखो अमीरी औ गरीबी में ये गांधीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है

शनिवार, 16 अक्तूबर 2021

अराजक होता किसान आन्दोलन

मित्रों, हम सभी जानते हैं कि भारत में लोकतंत्र है और भारतीय संविधान ने भारत के प्रत्येक नागरिक को सरकार या सरकारी नीतियों का विरोध करने की आजादी और अधिकार दिया है. यद्यपि यह आजादी या अधिकार पूरी तरह से असीम नहीं है बल्कि इसकी कुछ सीमाएं हैं. आप आन्दोलन करिए या अपने किसी अन्य अधिकार का प्रयोग करिए लेकिन आप ऐसा करते हुए किसी और के अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकते. मित्रों, पिछले कुछ समय से ऐसा देखा जा रहा है कि कई सरकार विरोधी आन्दोलन देशविरोधी स्वरुप अख्तियार कर ले रहे हैं. पहले एनआरसी के खिलाफ जो आन्दोलन हुए और अब जो तथाकथित किसान आन्दोलन चल रहा है दोनों ने ही बारी-बारी से अराजक रूप ग्रहण किया है. एनआरसी आन्दोलन अंततः हिन्दूविरोधी दंगों में परिणत हो गया वहीँ किसान आन्दोलन भी राह से भटकता हुआ परिलक्षित हो रहा है. मित्रों, पहले तो तथाकथित किसानों ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवागमन को बाधित किया, यहाँ तक कि सेना की गाड़ियों को भी गुजरने से रोका और अब किसान हत्या भी करने लगे हैं. पहले लखीमपुर खीरी में उन्होंने चार लोगों को पीट-पीट कर मार डाला और अब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सिन्धु बॉर्डर पर एक दलित के हाथ काटकर उसकी बड़ी ही बेरहमी से हत्या कर दी. इन घटनाओं से ऐसा लगने लगा है कि जैसे उनको भारतीय कानून और न्यायालय का कोई डर ही नहीं है. मित्रों, सवाल उठता है कि संघ सरकार कब तक हाथ-पर-हाथ धरे बैठी रहेगी या मूकदर्शक बनी रहेगी? मान लिया कि पंजाब में चुनाव होनेवाले हैं लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं है कि दिल्ली को एक बार फिर जलने दिया जाए. कहना न होगा अगर संघ सरकार ने २०१९-२० में समय रहते शाहीन बाग़ के अवैध धरने को समाप्त करवा दिया होता तो दिल्ली में सुनियोजित हिन्दूविरोधी-देशविरोधी दंगे नहीं हुए होते. लेकिन दंगों के बाद भी केद्र सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ बनी रही और धरने की स्वाभाविक समाप्ति की प्रतीक्षा करती रही. मित्रों, यह देखकर काफी दुःख होता है एक बार फिर से हमारी केंद्र सरकार कथित किसान आन्दोलन को लेकर असमंजस में है. इस आन्दोलन को लेकर कोई बच्चा भी बता देगा कि इसके पीछे विदेशी फंडिंग हो रही है और किसान आन्दोलन का बस बहाना है. वास्तव में इसका उद्देश्य देश में अराजकता उत्पन्न करना है. फिर से खालिस्तानी आतंकवाद को जीवित करना है. लेकिन न तो केंद्र सरकार और न ही सुप्रीम कोर्ट को कुछ भी दिखाई दे रहा है और न ही वे इसे समाप्त करने की दिशा को कोई कठोर कदम उठाते दिख रहे हैं. क्या टिकैत के दूसरा भिंडरावाला बनने का इंतजार हो रहा है? आज से लगभग ढाई हजार साल पहले आचार्य चाणक्य ने कहा था कि दीमक लकड़ी को और रोग जिस प्रकार शरीर को खा जाते हैं उसी प्रकार अराजकता से राष्ट्र का विनाश हो जाता है अतः राज्य को हर स्थिति में कानून और व्यवस्था को बनाए रखना चाहिए. राज्य को न सिर्फ अराजकतावादियों से बल्कि राज्याधिकारियों और राज्यकर्मियों से भी प्रजा की रक्षा करनी चाहिए.

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2021

निजी क्षेत्र में भ्रष्टाचार

ममित्रों, ऐसा देखा जा रहा है कि पिछले कुछ समय से जबसे संघ में मोदी जी की सरकार आई है लगातार सरकार और सरकार समर्थक यह बोलते आ रहे हैं कि सरकारी क्षेत्र की कंपनियों में गुणवत्ता में सुधार लाना संभव नहीं है इसलिए उनका निजीकरण कर देना चाहिए. मानो हर समस्या का एकमात्र हल निजीकरण है. तथापि प्रश्न उठता है कि क्या निजी क्षेत्र भ्रष्टाचार से सर्वथा मुक्त है? मित्रों, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. वास्तविकता तो यह है कि निजी क्षेत्र में भी उतना ही भ्रष्टाचार है जितना सरकारी क्षेत्र में है बल्कि किसी-किसी क्षेत्र में तो अपेक्षाकृत अधिक ही है. मित्रों, सबसे पहले बात करते हैं बैंकिंग क्षेत्र की. यह वह क्षेत्र है जिसमें देश के गरीब लोग अपना पेट काटकर भविष्य के लिए पैसा जमा करते हैं. आपको याद होगा कि एक समय इस क्षेत्र में हेलियस और जेवीजी जैसी नन बैंकिंग कंपनियों की धूम थी. कोई दो साल में पैसे दोगुना कर रहा था तो कोई ३ साल में. तत्कालीन संघ सरकार को सब पता था कि किस तरह जनता को ठगा जा रहा है लेकिन वो ऑंखें मूंदे रही क्योंकि जेवीजी सहित कई कंपनियों में बड़े-बड़े नेताओं ने भी पैसे लगा रखे थे. फिर एक दिन वही हुआ जो होना था. इन बैंकों ने रातों-रात अपनी शाखाओं और दफ्तरों को बंद कर दिया. हजारों गरीबों की जीवनभर की कमाई लूट ली गई, हजारों ने आत्महत्या कर ली लेकिन किसी भी फरार कंपनी मालिकों और संचालकों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. आज भी सहारा इंडिया में लाखों गरीबों के पैसे फंसे हुए हैं और कदाचित डूब भी जाएंगे. फिर वही लाठी होगी, वही सांप और वही सांप का बिल. इसी तरह महाराष्ट्र में लगातार कोई-न-कोई सहकारी बैंक बंद हो रहा है और लगातार गरीबों के पैसों पर डाका पड़ रहा है. कोई ठिकाना नहीं कि आज जो एचडीएफसी, आईसीआईसीआई जैसे बैंक उदाहरण माने जाते हैं कल निवेश सम्बन्धी एक गलती के कारण या फिर जानबूझकर अपने ही परिवार या मित्र की कंपनी में निवेश कर कंपनी को दिवालिया घोषित कर देने के चलते कब डूब जाएं और कब गरीबों के लाखों करोड़ पर डाका पड़ जाए. फिर भी भारत सरकार सरकारी बैंकों का निजीकरण करने पर आमादा है. दरअसल इस समय देश में अंधा बांटे रेवड़ी वाली हालत है. मित्रों, स्वास्थ्य एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें पूरी तरफ से निजी क्षेत्र का कब्ज़ा था और है. सरकारी अस्पताल इमरजेंसी सेवा के लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त हैं जिसका फायदा निजी क्षेत्र के अस्पताल जमकर उठाते आ रहे हैं और जनता को दोनों हाथों से लूट रहे हैं. बच्चों की नॉर्मल डेलिवरी बहुत पहले दूर की कौड़ी हो चुकी है. आए दिन हम समाचार पत्रों में पढ़ते हैं कि दिल्ली, पटना इत्यादि स्थानों के प्रतिष्ठित अस्पतालों ने साधारण बुखार के ईलाज के नाम पर १७ लाख-२० लाख का बिल मरीज के परिजन को थमाया या फिर गलत अंग का ऑपरेशन कर दिया या फिर मृत व्यक्ति का कई दिनों तक झूठा ईलाज करते रहे. पहले कहावत थी कि सरकारी अस्पतालों में लोग ईलाज करवाने नहीं जाते मरने जाते हैं दुर्भाग्यवश अब निजी अस्पतालों के बारे में यह कहा जाता है लोग वहां ईलाज करवाने नहीं खुद को कंगाल करवाने जाते हैं. लोग जाएँ तो जाएँ कहाँ? सरकारी में व्यवस्था नहीं है और निजी घर तक बिकवा दे रहा है. मित्रों, अब बात करते हैं शिक्षा की. एक जमाना था जब सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में उच्च गुणवत्ता की पढाई होती थी. फिर सामाजिक न्याय वाली सरकारें आईं और सरकारी स्कूलों-कॉलेजों से पढाई गायब हो गई. अगरचे सरकारी स्कूलों के शिक्षक सिर्फ वेतन लेने स्कूल जाते हैं और अगर जाते भी हैं तो आरक्षण की कृपा से उनको खुद ही कुछ पता नहीं है तो बच्चों को बताएंगे क्या? दूसरी तरफ सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अधिकतर विभाग शिक्षक विहीन हैं क्योंकि राज्य सरकारें इनके ऊपर किए गए व्यय को वेवजह का खर्च मानती हैं. ऐसे में निजी स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालय अगर कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे हैं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं तथापि भ्रष्टाचार वहां भी कम नहीं है. शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारियों से हस्ताक्षर दोगुने-तिगुने वेतन पर करवाया जाता है लेकिन दिया नहीं जाता. कई बार तो पैसा उनके खाते में डाल दिया जाता है और वे बेचारे बैंक से पैसा निकालकर फिर कॉलेज-विश्वविद्यालय को वापस कर देते हैं. इतना ही नहीं निजी स्कूलों-कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में भी पढाई न के बराबर होती है ज्यादातर शिक्षणेतर गतिविधियों का ही आयोजन होता है जिससे मीडिया में सुर्ख़ियों में बना रहा जा सके. कुल मिलाकर हमारी शिक्षा-व्यवस्था परीक्षा व्यवस्था बन चुकी है लेकिन न तो ढंग से परीक्षा ली जाती है और न की सम्यक तरीके से कापियों की जांच की जाती है. कई बार तो कापियों के बंडल खुलते भी नहीं हैं और परिणाम घोषित कर दिया जाता है और ऐसा न सिर्फ सरकारी बल्कि निजी शिक्षण-संस्थानों में भी होता है. निजी क्षेत्र की कृपा से शिक्षा अब ज्ञान दान नहीं व्यापार बन गयी है, विशुद्ध व्यापार. मित्रों, अब बात करते हैं ठेके पर होनेवाले कामों की. चाहे वो सफाई हो या सड़क या पुल निर्माण या फिर टोल वसूली किसी भी क्षेत्र में ठेकेदार सही तरीके से काम नहीं करते और जमकर पैसा बनाते हैं फिर चाहे उद्घाटन से पहले ही पुल गिर क्यों न जाए. मित्रों, आपके घर के आसपास भी आपने देखा होगा कि बैंकों और बैंकों के एटीएम के बाहर निजी सुरक्षा कंपनियों के गार्ड पहरा देते हैं. भ्रष्टाचार ने उन गरीबों को भी अछूता नहीं छोड़ा है. बेचारे हस्ताक्षर करते हैं २४ हजार पर लेकिन उनके हाथों में आता है १२-१३ हजार. मतलब यहाँ भी जमकर भ्रष्टाचार हो रहा है. मित्रों, अब बात करते हैं उस घटना की जिसने मुझे यह आलेख लिखने के लिए प्रेरित किया. अडानी पोर्ट से भारी मात्रा में हेरोईन की खेप का पकड़ा जाना. हाल में अडानी ग्रुप को सौपे गए गुजरात के मुंद्रा-अडानी बंदरगाह से एक साथ ३००० किलोग्राम हेरोईन पकड़ी गई है जिसकी कीमत १९००० करोड़ रूपये बताई जाती है. ये हेरोईन टेलकम पाउडर के नाम पर आयातित की गई थी. सोंच लीजिए निजी हाथों में पोर्ट सौंपकर हम देश की सुरक्षा को किस कदर खतरे में डाल रहे हैं. इस घटना के बाद सवाल यह भी उठता है कि क्या बड़े-बड़े धनपति पूरी तरह दूध के धुले हैं? मित्रों, कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि निजीकरण समाधान नहीं है बल्कि इससे पहले से ज्यादा जटिल समस्याओं का जन्म होगा. रही बात भ्रष्टाचार की तो निजीकरण के बाद भी भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होनेवाला है. ऐसे में अच्छा यही रहेगा कि सरकार साफ़ मन से सरकारी क्षेत्र की कंपनियों और बैंकों की व्यवस्था को सुधारे और बार-बार यह कहना बंद करे कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं है. साथ ही एनसीएलटी के माध्यम से सरकारी बैंकों को लगाए जा रहे चूना पर अविलम्ब रोक लगाए. वैसे मुझे लगता है कि इस समय देश एक बार फिर से सरकारविहीन हो गया है.

सोमवार, 27 सितंबर 2021

हिन्दू-धर्म के संगठन में परिवर्तन आवश्यक

मित्रों, एक बार विवेकान्द के शिष्यों ने उनसे प्रश्न किया कि गुरुदेव गृहस्थाश्रम बड़ा है या संन्यास?? तब स्वामी जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि इसके लिए मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ. किसी नगर में एक राजा रहता था, उस नगर में जब कोई संन्यासी आता तो राजा उसे बुलाकर पूछता कि- ”भगवान! गृहस्थ बड़ा है या संन्यास?” अनेक साधु अनेक प्रकार से इसका उत्तर देते थे। कई संन्यासी को बड़ा तो बताते पर यदि वे अपना कथन सिद्ध न कर पाते तो राजा उन्हें गृहस्थ बनने की आज्ञा देता। जो गृहस्थ को उत्तम बताते उन्हें भी यही आज्ञा मिलती। इस प्रकार होते-होते एक दिन एक संन्यासी उस नगर में आ निकला और राजा ने बुलाकर वही अपना पुराना प्रश्न पूछा। संन्यासी ने उत्तर दिया- “राजन। सच पूछें तो कोई आश्रम बड़ा नहीं है, किन्तु जो अपने नियत आश्रम को कठोर कर्तव्य धर्म की तरह पालता है वही बड़ा है।” राजा ने कहा- “तो आप अपने कथन की सत्यता प्रमाणित कीजिये।“ संन्यासी ने राजा की यह बात स्वीकार कर ली और उसे साथ लेकर दूर देश की यात्रा को चल दिया। घूमते-घूमते वे दोनों एक दूसरे बड़े राजा के नगर में पहुँचे, उस दिन वहाँ की राज कन्या का स्वयंवर था, उत्सव की बड़ी भारी धूम थी। कौतुक देखने के लिये वेष बदले हुए राजा और संन्यासी भी वहीं खड़े हो गये। मित्रों, जिस राजकन्या का स्वयंवर था, वह अत्यन्त रूपवती थी और उसके पिता के कोई अन्य सन्तान न होने के कारण उस राजा के बाद सम्पूर्ण राज्य भी उसके दामाद को ही मिलने वाला था। राजकन्या सौंदर्य को चाहने वाली थी, इसलिये उसकी इच्छा थी कि मेरा पति, अतुल सौंदर्यवान हो, हजारों प्रतिष्ठित व्यक्ति और देश-देश के राजकुमार इस स्वयंवर में जमा हुए थे। राज-कन्या उस सभा मण्डली में अपनी सखी के साथ घूमने लगी। अनेक राजा-पुत्रों तथा अन्य लोगों को उसने देखा पर उसे कोई पसन्द न आया। वे राजकुमार जो बड़ी आशा से एकत्रित हुए थे, बिल्कुल हताश हो गये। अन्त में ऐसा जान पड़ने लगा कि मानो अब यह स्वयंवर बिना किसी निर्णय के अधूरा ही समाप्त हो जायगा। इसी समय एक संन्यासी वहाँ आया, सूर्य के समान उज्ज्वल काँति उसके मुख पर दमक रही थी। उसे देखते ही राजकन्या ने उसके गले में माला डाल दी। परन्तु संन्यासी ने तत्क्षण ही वह माला गले से निकाल कर फेंक दी और कहा- ”राजकन्ये। क्या तू नहीं देखती कि मैं संन्यासी हूँ? मुझे विवाह करके क्या करना है?” यह सुन कर राजकन्या के पिता ने समझा कि यह संन्यासी कदाचित भिखारी होने के कारण, विवाह करने से डरता होगा, इसलिये उसने संन्यासी से कहा- ”मेरी कन्या के साथ ही आधे राज्य के स्वामी तो आप अभी हो जायेंगे और पश्चात् सम्पूर्ण राज्य आपको ही मिलेगा। राजा के इस प्रकार कहते ही राजकन्या ने फिर वह माला उस साधु के गले में डाल दी, किन्तु संन्यासी ने फिर उसे निकाल पर फेंक दिया और बोला- ”राजन्! विवाह करना मेरा धर्म नहीं है।“ ऐसा कह कर वह तत्काल वहाँ से चला गया, परन्तु उसे देखकर राजकन्या अत्यन्त मोहित हो गई थी, अतएव वह बोली- ”विवाह करूंगी तो उसी से करूंगी, नहीं तो मर जाऊँगी।” ऐसा कह कर वह उसके पीछे चलने लगी। हमारे राजा साहब और संन्यासी यह सब हाल वहाँ खड़े हुए देख रहे थे। संन्यासी ने राजा से कहा- ”राजन्! आओ, हम दोनों भी इनके पीछे चल कर देखें कि क्या परिणाम होता है।” राजा तैयार हो गया और वे उन दोनों के पीछे थोड़े अन्तर पर चलने लगे। चलते-चलते वह संन्यासी बहुत दूर एक घोर जंगल में पहुँचा, उसके पीछे राजकन्या भी उसी जंगल में पहुँची, आगे चलकर वह संन्यासी बिल्कुल अदृश्य हो गया। बेचारी राजकन्या बड़ी दुखी हुई और घोर अरण्य में भयभीत होकर रोने लगी। इतने में राजा और संन्यासी दोनों उसके पास पहुँच गये और उससे बोले- ”राजकन्ये! डरो मत, इस जंगल में तेरी रक्षा करके हम तेरे पिता के पास तुझे कुशल पूर्वक पहुँचा देंगे। परन्तु अब अँधेरा होने लगा है, इसलिये पीछे लौटना भी ठीक नहीं, यह पास ही एक बड़ा वृक्ष है, इसके नीचे रात काट कर प्रातःकाल ही हम लोग चलेंगे।” राजकन्या को उनका कथन उचित जान पड़ा और तीनों वृक्ष के नीचे रात बिताने लगे। मित्रों, उस वृक्ष के कोटर में पक्षियों का एक छोटा सा घोंसला था, उसमें वह पक्षी, उसकी मादी और तीन बच्चे थे, एक छोटा सा कुटुम्ब था। नर ने स्वाभाविक ही घोंसले से जरा बाहर सिर निकाल कर देखा तो उसे यह तीन अतिथि दिखाई दिये। इसलिये वह गृहस्थाश्रमी पक्षी अपनी पत्नी से बोला- “प्रिये! देखो हमारे यहाँ तीन अतिथि आये हुए हैं, जाड़ा बहुत है और घर में आग भी नहीं है।” इतना कह कर वह पक्षी उड़ गया और एक जलती हुई लकड़ी का टुकड़ा कहीं से अपनी चोंच में उठा लाया और उन तीनों के आगे डाल दिया। उसे लेकर उन तीनों ने आग जलाई। परन्तु उस पक्षी को इतने से ही सन्तोष न हुआ, वह फिर बोला-”ये तो बेचारे दिनभर के भूखे जान पड़ते हैं, इनको खाने के लिये देने को हमारे घर में कुछ भी नहीं है। प्रिय, हम गृहस्थाश्रमी हैं और भूखे अतिथि को विमुख करना हमारा धर्म नहीं है, हमारे पास जो कुछ भी हो इन्हें देना चाहिये, मेरे पास तो सिर्फ मेरा देह है, यही मैं इन्हें अर्पण करता हूँ।” इतना कह कर वह पक्षी जलती हुई आग में कूद पड़ा। यह देखकर उसकी स्त्री विचार करने लगी कि ‘इस छोटे से पक्षी को खाकर इन तीनों की तृप्ति कैसे होगी? अपने पति का अनुकरण करके इनकी तृप्ति करना मेरा कर्तव्य है।’ यह सोच कर वह भी आग में कूद पड़ी। यह सब कार्य उस पक्षी के तीनों बच्चे देख रहे थे, वे भी अपने मन में विचार करने लगे कि- ”कदाचित अब भी हमारे इन अतिथियों की तृप्ति न हुई होगी, इसलिये अपने माँ बाप के पीछे इनका सत्कार हमको ही करना चाहिये।” यह कह कर वे तीनों भी आग में कूद पड़े। यह सब हाल देख कर वे तीनों बड़े चकित हुए। सुबह होने पर वे सब जंगल से चल दिये। राजा और संन्यासी ने राजकन्या को उसके पिता के पास पहुँचाया। इसके बाद संन्यासी राजा से बोला- ”राजन्!! अपने कर्तव्य का पालन करने वाला चाहे जिस परिस्थिति में हो श्रेष्ठ ही समझना चाहिये। यदि गृहस्थाश्रम स्वीकार करने की तेरी इच्छा हो, तो उस पक्षी की तरह परोपकार के लिये तुझे तैयार रहना चाहिये और यदि संन्यासी होना चाहता हो, तो उस उस यति की तरह राज लक्ष्मी और रति को भी लज्जित करने वाली सुन्दरी तक की उपेक्षा करने के लिये तुझे तैयार होना चाहिये। कठोर कर्तव्य धर्म को पालन करते हुए दोनों ही बड़े हैं।“ मित्रों, जबसे अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और निरंजनी अखाड़ा के सचिव महंत नरेंद्र गिरि की संदिग्ध मौत हुई है यह सवाल फिर से हिन्दुओं के मन में उठने लगा है कि क्या हिन्दुओं के सर्वोच्च संगठनों से जुड़े लोग वास्तव में संन्यासी हैं भी या नहीं या गेरुआ वस्त्र धारण कर हिन्दुओं के साथ छल कर रहे हैं? उपरोक्त कथा के अनुसार इनमें से कई सारे ठग हैं. पहले भी राधे माँ और गोल्डन बाबा जैसे संन्यासी हिन्दू धर्म को कलंकित करते रहे हैं लेकिन इस बार भी अखाडा परिषद् के अध्यक्ष ही सवालों के घेरे में हैं. क्या किसी संन्यासी के लिए भोग-विलास से युक्त जीवन व्यतीत करना उचित है? चाहे वो नरेन्द्र गिरी हों या उनके शिष्य आनंद गिरी उनकी जीवन-शैली को किसी भी प्रकार से एक वास्तविक संन्यासी की जीवन-शैली तो नहीं कहा जा सकता. सवाल तो यह भी उठता है कि इन अखाड़ों और शंकराचार्यों की आज के समय में क्या और कितनी उपयोगिता है? ये लोग न तो समाज के लिए कुछ कर रहे हैं और न ही धर्मान्तरण को रोकने के लिए तृणमूल स्तर पर कुछ कर रहे हैं. तो क्या ये लोग हिन्दुओं के पैसों पर भोग-विलास में संलिप्त होकर बोझ नहीं बन गए हैं? क्या इस दिशा में अमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है? मित्रों, ऐसे ही छद्म-संन्यासियों के बारे में ६०० साल पहले कबीर ने कहा था मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।। टेक।। आसन मारि मंदिर में बैठे, नाम छाड़ि पूजन लागे पथरा।। 1।। कनवां फड़ाय जोगी जटवा बढ़ौले, दाढ़ी बढ़ाय जोगी होइ गैले बकरा।। 2।। जंगल जाय जोगी धुनिया रमौले, काम जराय जोगी होइ गैलै हिजरा।। 3।। मथवा मुड़ाय जोगी कपड़ा रंगौले, गीता बाँचि के होइ गैले लबरा।। 4।। कहहि कबीर सुनो भाई साधो, जम दरबजवाँ बाँधल जैवे पकरा।। 5।।

रविवार, 19 सितंबर 2021

ईटीएम से कटे बिहार रोडवेज में टिकट

मित्रों, आप जानते होंगे पिछले कुछ सालों से मैं उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर में रह रहा था। जाहिर है इस दौरान मुझे बार-बार बस यात्रा करनी पडी। मैं यह देखकर हतप्रभ था कि उत्तर प्रदेश में चलनेवाली लगभग सारी बसें सरकारी थीं। साथ ही सारी बसों में ईटीएम (इलेक्ट्रोलक्स टिकट मशीन) से टिकट काटा जा रहा था। यहां तक कि अगर एक बस के संवाहक से आप पैसा वापस लेना भूल गए हों तो दूसरी सरकारी बस के संवाहक को टिकट दिखाकर पैसा वापस ले सकते थे। न ही कोई धांधली न ही धांधली की गुजाईश। मित्रों,अब मुज़फ्फरनगर से आते हैं मुज़फ्फरपुर। वही बिहार वाला मुज़फ्फरपुर। पिछले दिनों मुझे लगातार दस दिनों तक हाजीपुर से मुज़फ्फरपुर जाना पडा। पहले तो रेलवे रो खंगाला तो पता चला कि हाजीपुर से सुबह में ऐसी कोई पैसेंजर ट्रेन है ही नहीं जो नौ बजे से पहले मुज़फ्फरपुर पहुंचा दे। मजबूरन मुझे बस से यात्रा करनी पडी। मैंने जानबुझकर सरकारी बस को चुना हालांकि बिहार में वे अल्पसंख्यक हैं। मित्रों, मैंने देखा सरकारी बसों के संवाहक अगरचे यात्रियों को टिकट देते ही नहीं थे और अगर जिद करने पर देते भी थे तो परचूनिया टिकट जिन पर क्रम संख्या तक अंकित नहीं होते थे बांकी रूट-किराया-गंतव्य स्थान वगैरह के ब्योरे की बाद तो दूर ही रही. एकाध संवाहक कार्बन लगाकर टिकट काट जरूर रहे थे लेकिन उसमें से भी कितना पैसे सरकारी खजाने में जाता होगा राम ही जानें. इतना ही नहीं कोई संवाहक हाजीपुर से मुजफ्फरपुर का भाड़ा ८० रूपया ले रहा था तो कोई ९०-१०० और १२०. कोई निर्धारित भाड़ा नहीं जितना लूट सको लूट लो. मित्रों, अगर ईटीएम से टिकट कटता तो सरकारी बसों में ऐसी मनमानी और बेईमानी हरगिज नहीं होती. क्योंकि ईटीएम से टिकट में हाेने वाली गड़बड़ियों पर रोक लगेगी। यात्रियों को समय और किलोमीटर अंकित टिकट मिलेगा। ईटीएम मशीन से बस के चलने का समय, किराए की डिटेल, किलोमीटर, बस का दूसरे स्थान पर पहुंचने का समय, टैक्स, टूल टैक्स, बस के रूट की जानकारी, कंडक्टर की रिसीट ऑल टिकट का जोड़ भी मिला करेगा। मित्रों, समझ में नहीं आता कि जो मशीन उत्तर प्रदेश की बसों में वर्षों पहले लागू हो चुकी है वो अब तक उसके पडोसी राज्य बिहार में क्यों लागू नहीं हुई? क्या नीतीश कुमार जी इतने शाहे बेखबर हैं कि उनको सरकारी बसों और उनके संवाहकों का सच पता नहीं है? या नीतीश जी भी चाहते हैं कि भ्रष्टाचार चलता रहे? हाँ, यह मेरी समझ में जरूर आ गया है कि उत्तर प्रदेश विकास के मामले में बिहार से इतना आगे क्यों है?

सोमवार, 6 सितंबर 2021

जातीय जनगणना की बेतुकी मांग

मित्रों, अगर आप भारत के किसी छोटे बच्चे से भी पूछेंगे कि देश को किसने बर्बाद किया तो वो छूटते ही कहेगा नेताओं ने. दुर्भाग्य की बात है कि जैसे-जैसे नेताओं की नई पीढी आ रही है वैसे-वैसे नेताओं का देशहित से सरोकार कम होता जा रहा है। अब स्थिति इतनी खराब हो गई है कि हमारे नेता सिर्फ लोक लुभावन देश नशावन मुद्दों को ही हवा देने लगे हैं. मध्यकाल में जहाँ संत कबीर ने कहा था कि जाति न पूछो साधू की, केवल देखिए ज्ञान; मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान वहीँ हमारे वर्तमान काल के नेताओं ने जाति नाम परमेश्वर बना दिया है. मित्रों, हमारे नेता इतने पर ही रूक जाते तो फिर भी गनीमत थी. उन्होंने यह जानते हुए पहले जातीय आरक्षण लागू किया कि हर जाति में गरीबी है. फिर पंचायत व शहरी निकाय चुनावों में यह जानते हुए जाति आधारित आरक्षण लागू किया कि लोकतंत्र बहुमत का शासन है. जाति के नाम पर पार्टी को पारिवारिक संस्था में बदल देनेवाले नेताओं का प्रतिभा का गला घोंटने के बाद भी जी नहींं भरा और अब वो जातीय जनगणना की मांग करने लगे हैं. मित्रों, यह बात किसी से छिपी हुई नहींं है कि जब कांग्रेस राज में परिवार नियोजन का महा अभियान चला था तब सबसे ज्यादा बंध्याकरण सवर्णों ने ही करवाया था जिससे उनकी संख्या में भारी गिरावट आई. ऐसे में अगर जातीय जनगणना होती है तो सबसे ज्यादा नुकसान में वही लोग होंगे जिन्हें सबसे ज्यादा देश की चिंता होती है. मित्रों, ऐसा इसलिए होगा क्योंकि जाति नाम परमेश्वर वाले नेतागण लगे हाथों जनसंख्या के अनुपात में जातीय आरक्षण की मांग करेंगे. फिर पचास प्रतिशत आरक्षण की सीमा को तोड़ दिया जाएगा और देश शत प्रतिशत आरक्षण की ओर अग्रसर हो जाएगा. फिर प्रतिभा और गुणवत्ता का कोई मायने नहीं रह जाएगा और इस तरह भारत कभी भी विश्वगुरू नहीं बन पाएगा. मित्रों, अत: जातीय जनगणना का जमकर विरोध किया जाना चाहिए क्योंकि यह एक पश्चगामी कदम है. इससे न सिर्फ जातीय राजनीति को बढावा मिलेगा वरन प्रतिभावानों का मनोबल भी गिरेगा.

सोमवार, 16 अगस्त 2021

फिर से तालिबान

मित्रों, अफगानिस्तान में फिर से तालिबान का पदार्पण हो चुका है. अर्थात अमेरिका ने पिछले दो दशकों में तालिबान को उखाड़ फेंकने के जो भी प्रयास किए थे सब पर पानी फिर चुका है. इस बार भले भी अफगानिस्तान में लादेन या उमर नहीं हैं लेकिन फिर भी यह यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता है कि भविष्य में अफगानिस्तान फिर से इस्लामिक आतंकवाद का एक और केंद्र बनकर नहीं उभरेगा. मित्रों, मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि पूरी दुनिया में इस्लामिक आतंकवाद व्यक्ति आधारित न थी न है बल्कि विचारधारा आधारित है. जब कुरान और हदीस ही मुसलमानों को पूरी दुनिया से काफिरों को मिटाकर इस्लाम का शासन कायम करने की आज्ञा और प्रेरणा देते हैं तो इसका तात्पर्य तो यही हुआ कि जब तक इस्लाम है दुनिया में हिंसा रहेगी, आतंकवाद रहेगा. मित्रों, अफगानिस्तान पर कब्ज़ा करने बाद तालिबान ने कहा है कि वे शरिया कानून के तहत महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे. लेकिन समस्या यह है कि शरिया कानून में महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है ही नहीं। सच्चाई तो यह है कि अफगानिस्तान में किशोर लड़कियों को घरों से जबरन उठाया जा रहा है और अपने लड़ाकों के बीच जीत की ट्रॉफी के रूप में उनको वितरित कर दिया जा रहा है. मित्रों, अभी दो-तीन दिन पहले भारत के राजौरी में एक तीन वर्षीय बच्चे वीर सिंह की बड़ी ही बेरहमी से हत्या कर दी गई. इस हत्या के पीछे भी वही इस्लामिक विचारधारा है जिसकी क्रूरता का कोई अंत नहीं. यह विचारधारा न तो काफिरों के प्रति नरम है और न ही मुसलमानों के प्रति. इराक और सीरिया में हम शरिया शासन देख चुके हैं जिसमें हजारों निर्दोष लोगों को सिर्फ इसलिए मार दिया गया क्योंकि वे मुसलमान नहीं थे. फिर भी न जाने कुछ लोग क्यों और किस आधार पर इस्लाम को शांति का धर्म बता रहे हैं. मित्रों, तालिबान के फिर से उभरने के पीछे जहाँ अमेरिका की मूर्खता है वहीँ चीन, रूस और पाकिस्तान की धूर्तता भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है. हम नहीं जानते कि भविष्य में वैश्विक राजनीति कौन-सी दिशा पकडनेवाली है और उसमें तालिबान का क्या योगदान होगा लेकिन अफगानिस्तान में जो कुछ भी हो रहा है वो न तो भारत और न ही मानवता के हित में है. रूस न तो कभी भारत का मित्र था, न है और न होगा. वो तो बस नेहरु-गाँधी परिवार का मित्र था. इसी तरह हमें अपनी विदेश नीति अमेरिका से अलग हटकर बनानी होगी. वर्ना जिस तरह अफगानिस्तान में हमारे २२५०० करोड़ रूपये के निवेश बेकार हो गए हैं दूसरे देशों में भी होते रहेंगे.

बुधवार, 11 अगस्त 2021

अश्विनी उपाध्याय की गिरफ़्तारी

मित्रों, क्या आपने कभी देश की स्थिति के बारे में सोंचा है? क्या देश की दुरावस्था को देखकर कभी किसी रात आपकी नींद गायब हुई है? क्या आपके मन में कभी अंग्रेजी राज को देश से मिटा देने की ईच्छा आई है? आपने एकदम सही समझा है मैं गोरे अंग्रेजों की बात नहीं कर रहा बल्कि काले अंग्रेजों की बात कर रहा हूँ. मित्रों, मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जिसे देश में छाई अराजकता के कारण सचमुच रातों में नींद नहीं आती. मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जिसने देश की समस्त बिमारियों का ईलाज ढूंढ निकाला है. मैला आंचल के डागदर बाबू ने तो सबसे बड़ी बीमारी की खोज की थी इस व्यक्ति ने उस बीमारी अर्थात गरीबी का ईलाज भी निकाल लिया है. और उस आदमी को जिसे हम पीआईएल मैन के नाम से भी जानते हैं का नाम है अश्विनी उपाध्याय. मित्रों, यह आदमी सर्वोच्च न्यायालय का वरिष्ठ अधिवक्ता है. इस आदमी ने जंतर मंतर और देश भर में अंग्रेजी राज से चले आ रहे कानूनों को समाप्त करने की मांग करते हुए पिछले ८ अगस्त को जुलूस निकाला था. जंतर मंतर के जुलूस में कुछेक लुम्पेन यानि लम्पट लोग भी घुस आए या घुसा दिए गए और मुसलमानों के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगा दिए. अब मुसलमान तो ठहरे होली काऊ पवित्र गाय सो अश्विनी उपाध्याय जी को उस अपराध के लिए आनन-फानन में उन्हीं कानूनों के अंतर्गत जेल भेज दिया गया जिनको समाप्त करने की उन्होंने मांग की थी. इस देश की राजधानी में मौलाना शाद और अमानतुल्ला खान को ५६ ईंच की दाढ़ीवाले बाबा की पुलिस पकड़ना तो दूर छू भी नहीं पाती लेकिन अपनी ही पार्टी के एक निर्दोष और देशभक्त नेता को झटपट पकड़ लेती है. वाह री सरकार! मित्रों, पकडे भी क्यों न? ऐसा करके सरकार ने एक तीर से दो शिकार जो किए हैं. मुसलमानों को बता दिया कि हम भी नमाजवादियों की तरह ही तुष्टीकरण की नीति पर चलने को तैयार हैं और अपने गले में अटकी हुई हड्डी को निगल भी गई. मित्रों, ऐसा नहीं है कि अश्विनी जी को यह पता नहीं था कि उनकी पार्टी और उनकी पार्टी की संघ सरकार किसी भी तरह के कानूनी, प्रशासनिक या न्यायिक सुधार के खिलाफ है अर्थात यथास्थितिवादी है. फिर भी अश्विनी उपाध्याय जी ने हिम्मत नहीं हारी. ऐसा भी नहीं है कि अश्विनी जी अचानक सड़क पर उतर गए. बल्कि जब उन्होंने देखा कि उनकी पार्टी की सरकार ही उनकी देशहित के लिए नितांत आवश्यक मांगों पर भी कान नहीं दे रही है तब वे सड़क पर उतरे. अश्विनी जी बार-बार जनसंख्या-नियंत्रण कानून की मांग करते रहे. एक बार प्रधानमंत्री के समक्ष कानून के ड्राफ्ट को प्रदर्शित भी किया लेकिन हुआ कुछ भी नहीं. यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय भी गए लेकिन वहां भी सरकार ने कह दिया कि वह ऐसे किसी कानून के समर्थन में नहीं है. इसी तरह अश्विनी जी सर्वोच्च न्यायालय में अकेले लम्बे समय से हिन्दू अल्पसंख्यकों की लडाई लड़ते आ रहे हैं. मित्रों, आज देश में बिना घूस दिए कोई काम नहीं होता तो इसके लिए दोषी कौन है-अंग्रेजी राज वाले कानून. वो कानून जिनका निर्माण अंग्रेजों ने भारत को लूटने और भारतीयों का दमन करने के लिए किया था. हम जानते हैं कि नारेबाजी तो बस एक बहाना है, अश्विनी उपाध्याय नामक ऊंट को पहाड़ के नीचे लाना है. लेकिन हम सरकार को आगाह करना चाहेंगे कि अश्विनी जी ने जो आन्दोलन शुरू किया है, जो मशाल जलाई है वो अब बुझेगी नहीं बल्कि और भी तेजी से धधकेगी और अंततः उसे अंग्रेजी राज के कानूनों को समाप्त करना ही होगा, भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कानून बनाने ही होंगे, समान शिक्षा, समान चिकित्सा, समान कर संहिता, समान पेंशन, समान दंड संहिता, समान श्रम संहिता, समान पुलिस संहिता, समान नागरिक संहिता, समान धर्मस्थल संहिता और समान जनसंख्या संहिता को लागू करना ही होगा. #IsupportAshwiniUpadhyay

सोमवार, 9 अगस्त 2021

समझौते की मेज पर भारत की एक और हार

मित्रों, जब २०१४ का लोकसभा का चुनाव प्रचार चल रहा था तब भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी बार-बार एक बात का वादा अपने भाषणों में किया करते थे कि अगर उनकी सरकार बनी तो भारत न तो किसी देश के आगे आँखें झुकाकर बात करेगा, न ही आँखें दिखाकर बात करेगा बल्कि आँखों में आँखें डालकर बात करेगा. तब लोगों ने समझा था कि उनका इशारा चीन की तरफ है. लेकिन आज जब लद्दाख में भारत और चीन की सेनाएं एक साल के तनाव के बाद वापसी कर रही है तब दूसरा ही मंजर देखने को मिला है. मित्रों, दरअसल भारत वार्ता की मेज पर एक बार फिर से हार गया है जबकि रणनीतिक रूप से भारत की स्थिति चीन के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत थी. सैन्य मामलों के जानकार और विशेषज्ञों ने चीन के साथ हुए भारत के उस समझौते पर सवाल उठाए हैं जिसमें भारत ने अपने अधिकार क्षेत्र वाले पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग झील के उत्तर और दक्षिणी तट पर 10 किलोमीटर चौड़े बफ़र ज़ोन को बनाने के लिए सहमति दे दी है. जानकारों का कहना है कि डेपसांग और कुछ अन्य सक्टरों में भी डिस्इंगेजमेंट को लेकर भारत को चीन पर दबाव बनाना चाहिए था और ऐसा नहीं करके भारत ने बहुत बड़ी चूक कर दी है क्योंकि कूटनीतिक और सैन्य दृष्टि से यह क्षेत्र भारत के लिए बेहद अहम है. यह वही क्षेत्र है, जहां माना जाता है कि चीन की सेना भारत के अधिकार वाले क्षेत्र में 18 किलोमीटर तक अंदर प्रवेश कर गई है. मित्रों, रक्षा मामलों के जानकार और कर्नल (सेवानिवृत्त) अजेय शुक्ला ने इस संबंध में बीबीसी से बात की. चीन के साथ बफ़र ज़ोन को बनाने को लेकर हुए समझौते पर बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा- "मेरी समझ में ये एक अच्छा अग्रीमेंट है क्योंकि पैंगोंग के उत्तर और दक्षिण, दोनों जगह भारत और चीन के सैनिक बिल्कुल आमने-सामने थे. किसी भी समय झड़प की आशंका बनी हुई थी और वो झड़प सिर्फ़ झड़प ना रहकर बढ़ जाए, इसकी भी पूरी आशंका बनी हुई थी. इस लिहाज़ से ख़तरा हर समय बना हुआ था, तो वहां से दोनों ओर की सेनाओं का पीछे हटना अच्छी बात थी. लेकिन यहां ये भी कहना ज़रूरी है कि यहां पर दक्षिणी पैंगोंग ही एकमात्र ऐसी जगह थी जहां भारतीय सेना अच्छी पोज़िशन पर थी.'' वो कहते हैं, ''चीन की सेनाओं की तुलना में इस जगह पर भारतीय सेना की स्थिति काफी अच्छी थी और यहां पर सारी एडवांटेज भारतीय सैनिकों के पास थी. तो यहां से डिस्इंगेजमेंट के लिए सहमति देने का मतलब अब यह है कि जो ट्रंप कार्ड हमारे हाथ में था, हम वो खेल चुके हैं. वो अब हमारे पास नहीं रहा है और अगर चीन ये बात नहीं मानता है कि बाकी जगहों से भी डिस्इंगेजमेंट करना है और वो उससे इनक़ार कर दे तो हमारे पास में कोई ट्रंप कार्ड नहीं बचा है." मित्रों, 10 फ़रवरी को भी उन्होंने एक ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने पैंगोंग से जुड़ी घोषणाओं को लेकर सवाल उठाए थे. उन्होंने ट्वीट में कहा था - ''पैंगोंग सेक्टर में सेनाओं के पीछे हटने को लेकर झूठ बोला जा रहा है. कुछ हथियारबंद गाड़ियों और टैंकों को पीछे लिया गया है. सैनिकों की पोज़िशन में कोई बदलाव नहीं हुआ है. चीन को फ़िंगर 4 तक पेट्रोलिंग करने का अधिकार दे दिया गया है. इसका मतलब यह है कि एलएसी फ़िंगर 8 से फ़िगर 4 पर शिफ़्ट हो गई है.'' मित्रों, राज्यसभा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी ने भी इस संबंध में ट्वीट करके अपना मत ज़ाहिर किया है. उन्होंने लिखा है, "साल 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि कोई आया नहीं और कोई गया नहीं. चीन के लोग बहुत खुश हुए थे. लेकिन ये सच नहीं था. बाद में नरवणे ने सैनिकों को आदेश दिया कि वे एलएसी पार करें और पैंगोंग हिल को अपने कब्ज़े में लें. ताकि पीएलए के बेस पर नज़र रखें. और अब हम उन्हें वहां से हटा रहे हैं. लेकिन डेपसांग से क्या चीन पीछे हट रहा है? नहीं अभी नहीं." मित्रों, इससे पूर्व चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद पर मौजूदा जानकारी देते हुए केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में कहा था कि भारत ने हमेशा चीन को यह कहा कि द्विपक्षीय संबंध दोनों पक्षों के प्रयास से ही विकसित हो सकते हैं. साथ ही सीमा के प्रश्न को भी बातचीत के ज़रिए ही हल किया जा सकता है. वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति में किसी भी प्रकार की प्रतिकूल स्थिति का बुरा असर हमारी द्विपक्षीय बातचीत पर पड़ता है. उन्होंने कहा था कि ''टकराव वाले क्षेत्रों में डिस्इंगेजमेंट के लिए भारत का यह मत है कि 2020 की फ़ॉरवर्ड डेपलॉयमेंट्स (सैन्य तैनाती) जो एक-दूसरे के बहुत नज़दीक हैं, वो दूर हो जायें और दोनों सेनाएं वापस अपनी-अपनी स्थायी चौकियों पर लौट जाएं.'' राजनाथ सिंह ने दोनो सेनाओं के कमांडरों के बीच हुई बातचीत का भी ज़िक्र किया था. राजनाथ सिंह ने कहा था, ''अभी तक सीनियर कमांडर्स के स्तर पर नौ दौर की बातचीत हो चुकी है. हमारे इस दृष्टिकोण और बातचीत के फ़लस्वरूप चीन के साथ पैंगोंग त्सो झील के उत्तर और दक्षिण छोर पर सेनाओं के पीछे हटने का समझौता हो गया है.'' उन्होंने सदन में यह स्पष्ट शब्दों में कहा था कि - इस बातचीत में हमने कुछ भी खोया नहीं है. जबकि सच तो यह है कि भारत ने समझौते में रणनीतिक चोटियों पर से अपना पोजिशन खोया है भले ही समझौते में जमीन खोने का जिक्र नहीं हो लेकिन सच तो यह है कि चीन ने पहले भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण किया और फिर यथास्थिति को औपचारिक रूप देते हुए भारत पर बफर जोन थोप दिया. सच तो यह है कि यह एक एकतरफा समझौता है जिसमें चीन की दोहरी-तिहरी जीत हुई है। पहली- गलवान सौदा एलएसी में थोड़े बदलाव के साथ तीन किमी चौड़ा बफर जोन बनाता है। भारत अपने पैट्रोलिंग प्वाइंट (पीपी) 14 तक पहुंच खो देता है। दूसरी- पैंगॉन्ग सौदा भारत को रणनीतिक कैलाश हाइट्स को खाली करने के लिए मजबूर करता है, जबकि तीसरी- गोगरा सौदा पांच किमी का बफर बनाता है, जिससे भारत पीपी-17 ए तक पहुंच खो देता है। मित्रों, इस बारे में रक्षा मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी भी रक्षा मंत्री से सहमत नहीं हैं। उन्होंने इस मामले में ट्वीट किया है, ''किसी भी सौदे में कुछ दिया जाता है और कुछ लिया जाता है. लेकिन भारत ने चीन के साथ जो समझौता (पैंगोंग इलाक़े को लेकर) किया है वो बेहद सीमित है.'' रणनीतिक और सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी कहते हैं कि दो देशों के बीच समझौते लेन-देन पर आधारित होते हैं. लेकिन चीन के साथ भारत का समझौता केवल पैंगोंग इलाक़े तक सीमित है, और भारत की पेशकश है. ऐसा लगता है कि सर्दियों से पहले चीन ने जो शर्तें रखी थीं भारत ने उसे मान लिया है और पैगोंग इलाक़े को लेकर समझैता कर नो मैन्स लैंड बनाने पर तैयार हो गया है. एक अन्य ट्वीट में उन्होंने सवाल किया, ''चीन के आक्रामक रवैये के ख़िलाफ़ भारत खड़ा रहा है और उसने दिखाया है कि वो युद्ध की पूरी तैयारी के साथ भारत हिमालय की सर्दियों के मुश्किल हालातों में भी डटा रह सकता है. ऐसे में बड़े मुद्दों का हल तलाश करने की जगह अपनी मुख्य ताक़त कैलाश रेंज कंट्रोल को हारने को लेकर इस तरह के एक सीमित समझौते के लिए भारत क्यों तैयार हुआ?'' मित्रों, समझ में नहीं आता कि भारत चीन के समक्ष क्यों झुका? क्या अमेरिका में सत्ता परिवर्तन ने मोदी को हिला कर रख दिया, या फिर रूस की तरफ से कोई दबाव था, या फिर अफगानिस्तान की मौजूदा हालत ने मोदी के हाथ-पाँव फुला दिए? कहाँ गयी वो आँखें जो चीन की आँखों-में आँखें डालकर बात करनेवाली थीं? कहाँ हैं उस कविता के कटे-फटे पृष्ठ जिसको मोदी ने जनता को लुभाने के लिए कभी पढ़ा था-मैं देश नहीं झुकने दूंगा, मैं देश नहीं बिकने दूंगा? माननीय रक्षा मंत्री जी से हमें न तो पहले उम्मीद थी और न अब है क्योंकि वे तो सिर्फ कड़ी निंदा करना जानते हैं. हे गलवान के अमर शहीदों हमें माफ करना क्योंकि हमारी सरकार ने आपकी शहादत को भुला दिया है। पहले कांग्रस सरकार ऐसा करती थी अब भाजपा सरकार भी वही कर रही है.

गुरुवार, 5 अगस्त 2021

भारत कब बनेगा खेलों का विश्वगुरु?

मित्रों, भारत और चीन पड़ोसी देश हैं, दोनों बड़ी आबादी वाले देश हैं, दोनों विश्वगुरु बनने का सपना देख रहे हैं. लेकिन जब बात ओलंपिक खेलों की होती है तो चीन से तुलना करना भारतीयों के लिए काफ़ी शर्मसार करने वाली बात हो जाती है. टोक्यो में जारी ओलंपिक मुक़ाबलों में अब तक का रुझान पिछले ओलंपिक मुक़ाबलों की तरह ही नज़र आ रहा है, जहाँ चीन मेडल टैली में सबसे ऊपर है वहीँ भारत नीचे के पांच देशों में. क्या किसी के पास भारत के इस मायूस और शर्मनाक करने वाले प्रदर्शन का जवाब है? मित्रों, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है. सच तो ये है कि देश में क्रिकेट को छोड़कर किसी और स्पोर्ट्स में किसी को कोई ख़ास दिलचस्पी ही नहीं है. टोक्यो में जारी ओलंपिक खेलों से पहले भारत ने अपने 121 साल के ओलंपिक इतिहास में केवल 28 पदक जीते थे जिनमें से नौ स्वर्ण पदक रहे हैं, और इनमें से आठ अकेले हॉकी में जीते गए थे. जबकि अकेले अमेरिकी तैराक माइकल फेल्प्स ने अपने करियर में 28 ओलंपिक पदक जीते हैं जो घनी आबादी वाले देश भारत के पूरे ओलंपिक इतिहास में (टोक्यो से पहले तक) हासिल किए गए कुल पदकों के बराबर है. मित्रों, भारत के विपरीत चीन ने ओलंपिक मुक़ाबलों में पहली बार 1984 में हुए लॉस एंजेलिस ओलंपिक में भाग लिया था लेकिन टोक्यो से पहले इसने 525 से अधिक पदक जीत लिए थे, जिनमें 217 स्वर्ण पदक थे. टोक्यो में भी अब तक इसका प्रदर्शन ओलंपिक सुपर पावर की तरह रहा है. उसने बीजिंग में 2008 के ओलंपिक खेलों को आयोजित भी किया और 100 पदक हासिल करके पहले नंबर पर भी रहा. मित्रों, दरअसल, चीन और भारत ओलंपिक मुक़ाबलों के हिसाब से तो अलग-अलग हालत में हैं. आखिर ओलंपिक खेलों के आयोजन के पीछे ख़ास मक़सद स्पोर्ट्स की स्पिरिट को बढ़ाना और राष्ट्रीय गौरव हासिल करना है. चीन इतने कम समय में ओलंपिक सुपर पावर कैसे बन गया? तो इसका जवाब है एक शब्द “डिज़ायर”. ये एक गहरा शब्द है जिसमें कई शब्द छिपे हैं: चाहत, मंशा, अभिलाषा, लालच और यहाँ तक कि महत्वाकांक्षा और लगन भी. जहाँ चीन में पूरे समाज के सभी तबक़े में, चाहे वो सरकारी हो या ग़ैर सरकारी, पदक हासिल करने की ज़बरदस्त चाह है. भारतीय सिर्फ सरकारी नौकरी के लालच में खेलते हैं. हमारा तंत्र और व्यवस्था इतना घटिया है कि बड़े-बड़े खिलाडी ठेला खींचते देखे जा सकते हैं. फिर खेल संगठनों में भी जमकर भ्रष्टाचार होता है. यहाँ तक कि खिलाडियों का यौन शोषण भी होता है. मित्रों, दूसरी ओर अगर हम ८० के दशक की चीनी मीडिया पर निगाह डालें तो पता चलेगा कि शुरू के सालों में तमग़ा और मेडल पाने की ये चाहत सिर्फ़ चाहत नहीं थी बल्कि ये एक जुनून था. विश्व में नंबर एक बनने की दिली तमन्ना थी. चीन की आज की पीढ़ी अपने राष्ट्रपति शी जिनपिंग के उस बयान से प्रेरित होती है जिसमे उन्होंने कहा था, “खेलों में एक मज़बूत राष्ट्र बनना चीनी सपने का हिस्सा है.”. राष्ट्रपति शी का ये बयान ‘डिज़ायर’ ही पर आधारित है. मित्रों, आम तौर से भारत के नागरिक और नेता हर मैदान में अपनी तुलना चीन से करते हैं और अक्सर चीन की तुलना में अपनी हर नाकामी को चीन के अलोकतांत्रिक होने पर थोप देते हैं, लेकिन ओलंपिक खेलों में अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकतांत्रिक देश भी बड़ी ताकत हैं. जब भारतीय चीन के प्रति इतने प्रतियोगी हैं तो खेलों का स्तर चीन की तरह क्यों नहीं? या चीन भारतीय खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा क्यों नहीं? आखिर ये कैसे संभव हुआ कि 1970 के दशक में दो ग़रीब देश, जो आबादी और अर्थव्यवस्था के हिसाब से लगभग समान थे मगर इनमें से एक खेलों में निकल गया काफ़ी आगे और दूसरा कैसे काफ़ी पीछे छूट गया? एक पदक में अमेरिका को मात दे रहा है और दूसरा उज़्बेकिस्तान जैसे ग़रीब देशों से भी पिछड़ा है? वास्तव में चीन और हिंदुस्तान की जनसंख्या लगभग समान है और हमारी अधिकांश चीजें भी समान हैं. परन्तु चीन के खिलाड़ियों की ट्रेनिंग साइंटिफ़िक और मेडिकल साइंस के आधार पर ज़्यादा ज़ोर देकर करवाई जाती है जिससे वो पदक प्राप्त करने में कामयाब रहे हैं. चीन में सब बंदोबस्त ‘रेजीमेन्टेड’ होता जिसे सबको मानना पड़ता है. भारत में ऐसा करना मुश्किल है. चीन में माता-पिता और परिवार वाले बचपन से ही अपने बच्चों को खिलाड़ी बनाना चाहते हैं जबकि भारत में, खास तौर ग्रामीण क्षेत्रों में, माँ-बाप बच्चों को पढ़ाने पर और बाद में नौकरी पर ध्यान देते हैं. मित्रों, चीन के पास सरकार के नेतृत्व वाली समग्र योजना है, खेलों में लोगों की व्यापक भागीदारी है, वहां ओलंपिक के हिसाब से लक्ष्य निर्धारित किया जाता है, हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों क्षेतों में मजबूती है, प्रतिभाओं की खोज और प्रोत्साहन के लिए विकसित तंत्र है, सरकारी और निजी क्षेत्रों के बीच तालमेल है. चीन ने अपने खेल के बुनियादी ढांचे में ज़बरदस्त सुधार किया है और वो खुद कई तरह के खेल उपकरण बना सकता है. मित्रों, भले ही रिओ ओलंपिक में चीन पदक तालिका में (70 पदकों के साथ) तीसरे स्थान पर था, लेकिन वो चर्चा इस बात पर कर रहा होगा कि वो लंदन 2012 ओलंपिक में अपने 88 पदकों की संख्या को बेहतर क्यों नहीं कर सका. इसके विपरीत, भारत अपने बैडमिंटन रजत पदक विजेता पीवी सिंधु और कुश्ती कांस्य विजेता साक्षी मलिक को भारी मात्रा में धन और प्रतिष्ठित राज्य पुरस्कारों से नवाज़ रहा है. जिमनास्ट दीपा करमाकर, जो पदक हासिल करने से चूक गईं, और निशानेबाज़ जीतू राय को भी सम्मानित किया गया, जिन्होंने पिछले दो वर्षों में स्वर्ण और रजत सहित एक दर्जन पदक जीते हैं, लेकिन रियो में वो कोई पदक न जीत सकीं. मित्रों, टोक्यो में ओलंपिक खेल शुरू हुए एक हफ़्ते से ज़्यादा हो गया है और पिछली प्रतियोगिताओं की तरह इस बार भी भारत के जिन खिलाड़ियों से पदक की उम्मीद थी वो ख़ाली हाथ देश लौट रहे हैं. भारत ने अब तक एक रजत और तीन कांस्य पदक ही जीता है जबकि चीन पर पदकों की बरसात हो रही है. ओलंपिक खेलों की समाप्ति के बाद जनता भारत की नाकामी का मातम मनाएगी और मीडिया इसका विश्लेषण करेगी और थोड़े दिनों बाद सब कुछ नॉर्मल हो जाएगा. भारत की नाकामी का दोष खिलाडियों को पूरी तरह से नहीं दिया जा सकता. दरअसल भारती में खेल संस्कृति का अभाव है, खेलों में पारिवारिक-सामाजिक भागीदारी की कमी है, खेल सरकारों की प्राथमिकता में नहीं हैं, खेल फ़ेडेरेशनों पर सियासत हावी है, खेल इंन्फ्रास्ट्रक्चर और डाइट नाकाफ़ी है, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद है, देश में ग़रीबी है और खेल से पहले नौकरी को लोग प्राथमिकता देते हैं. साथ ही प्राइवेट स्पॉन्सरशिप की भी कमी है. न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारों का बजट आवश्यकता के अनुसार है, लगभग सभी राज्य सरकारों का स्पोर्ट्स बजट प्रति व्यक्ति दस पैसा भी नहीं है. ऐसी दशा में खेलों की इस दशा के लिए कौन ज़िम्मेदार है-सरकार, परिवार, समाज? मेरी मानें तो सभी.

सोमवार, 2 अगस्त 2021

पारदर्शिता घटानेवाला सुधार

मित्रों, वर्तमान राजनीति के बारे में आपका क्या ख्याल है? मेरी माने तो ऐन केन प्रकारेण सफलता या जीत प्राप्त कर लेना ही वर्तमान काल में राजनीति है लेकिन जब कोई सत्ता पा लेने के बाद भी छल करता रहे तो उसे क्या कहेंगे? मित्रों, आपने एकदम ठीक समझा है मेरा तात्पर्य भारत के उन्हीं नेताओं से है जिनके हाथों में हमने अपने देश-प्रदेश का वर्तमान दे रखा है। वही नेता जिनकी कथनी और करनी में कोई साम्य ही नहीं है। जो कहते कुछ है और करते कुछ हैं। दिखाते कुछ हैं और होता कुछ है। कई बार उनके शब्द उनके कृत्य के नितांत विपरीत होते हैं। मित्रों, मैं मोदीजी की बात नहीं कर रहा मैं बात कर रहा हूं बिहार के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री रामसूरत राय जी की। दरअसल पिछले दिनों बडी धूमधाम से बिहार भूमि की वेबसाइट का नवीनीकरण किया गया है। ३१ जुलाई को बिहार के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री श्री राम सूरत राय जी ने इसका उद्घाटन किया. निस्संदेह यह एक अच्छा कदम है क्योंकि कई सारी सुविधाएँ जो पहले से इस वेबसाइट पर जनता जनार्दन को उपलब्ध नहीं थी अब उपलब्ध है. मित्रों, लेकिन एक सुविधा जो पहले से इस वेबसाइट पर उपलब्ध थी अब समाप्त कर दी गई है. पहले जहाँ प्रत्येक मौजा के प्रत्येक वर्ष के अब तक के सारे लंबित दाखिल ख़ारिज मामलों की स्थिति को जब चाहे तब चाहे जितनी बार देखा जा सकता था अब देखा नहीं जा सकेगा. निश्चित रूप से इससे उन निकम्मे और घूसखोर कर्मचारियों व अधिकारियों को फायदा पहुँचनेवाला है जो बिना घूस लिए जमीन का दाखिल ख़ारिज नहीं करते. मित्रों, जहाँ पूरी दुनिया में सूचना क्रांति के इस दौर में पारदर्शिता बढ़ाने पर जो दिया जा रहा है वहीँ बिहार सरकार ने अपने सबसे भ्रष्ट विभाग में पारदर्शिता को घटानेवाला पश्चगामी कदम उठाया है. एक तरफ मंत्रीजी इस विभाग से घूसखोरी को समाप्त करने का इरादा लगातार मीडिया में जाहिर करते रहते हैं वहीँ दूसरी और उनके द्वारा वेबसाइट में प्रतिगामी परिवर्तन जिससे रिश्वतखोरी को बढ़ावा मिलेगा आश्चर्य में डालनेवाला है. निश्चित रूप से यह जनता के साथ छल है, धोखा है.

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

ब्राह्मण सम्मेलन का नाटक

मित्रों, जब हम आईएएस की तैयारी कर रहे थे तो एक दिन अपनी कोचिंग के इतिहास के शिक्षक और इतिहास के उद्भट विद्वान ओमेन्द्र सर से पूछा था कि देश की आजादी के लिए सबसे ज्यादा फांसी पर कौन चढ़े थे तो उन्होंने बताया था कि ब्राह्मण. साथ ही आन्दोलन का स्थानीय नेतृत्व पूरे भारत में उन्होंने ही किया था. फिर नंबर आता है क्षत्रिय, कायस्थों और अन्य जातियों का. मित्रों, अगर हम आपसे पूछें कि देश की आजादी के बाद सबसे ज्यादा नुकसान किसको हुआ है तो निश्चित रूप से आप कहेंगे सवर्णों का. आज सवर्णों की स्थिति इतनी ख़राब है, वे इतने हाशिए पर जा चुके हैं कि न तो राजनीति में उनकी कोई पूछ है और न ही समाज में. मित्रों, आपने इतिहास की किताबों में पढ़ा होगा कि १९१८ में अंग्रेज सरकार रौलेट एक्ट लेकर आई थी जिसमें पहले गिरफ़्तारी और बाद में जाँच का प्रावधान था. सन १९८९ में तत्कालीन राजीव गाँधी की सरकार ने एक कानून बनाया जो लगभग रौलेट एक्ट ही था. वह कानून था-अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989. इस कानून में ऐसे प्रावधान हैं कि जैसे ही एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज होता है ऑंख बंद कर सबसे पहले आरोपित को गिरफ्तार किया जाएगा फिर बाद में जाँच होगी. जैसे स्कूल में पहले बच्चे को दण्डित कर दिया जाए बाद में पता लगाया जाए कि उसकी गलती थी या नहीं. इतना ही नहीं इस एक्ट में पीड़ित को तत्काल सरकार की तरफ से मुआवजा देने का भी प्रावधान है जो इस एक्ट को और भी घातक बनाता है. कई बार कोर्ट में केस झूठा साबित होने पर भी पीड़ित मुआवजे की राशि नहीं लौटाते जबकि होना यह चाहिए कि वही मुआवजा उन जालसाजों से वापस लेकर आरोपित को देना चाहिए. साथ ही झूठा मुकदमा करनेवालों जेल भी भेजना चाहिए. मित्रों, सन १९८९ को अब ३२ साल बीत चुके हैं. पंचायत चुनावों से लेकर शिक्षण संस्थानों व ठेके तक में तमाम क्षेत्रों में आरक्षण के चलते अब एससी-एसटी समेत पिछड़ी जातियों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति वैसी नहीं रही जैसी १९८९ में थी. बल्कि कई अवर्णों के पास तो अपार धन-संपत्ति है जबकि सवर्णों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति में कल्पनातीत गिरावट आई है और बहुत से लोग तो भूखों मर रहे हैं. फिर भी एससी-एसटी एक्ट ज्यों-का-त्यों है. आरक्षण और फीस में छूट भी वैसे ही है. यहाँ मैं आपको बता दूं कि १९८९ में भी बहुत-से सवर्ण पूरी तरह से भूमिहीन थे और उनकी आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक स्थिति भी एससी-एसटी से बेहतर नहीं थी. फिर भी राजीव गाँधी जो अपनी मूर्खता के लिए विश्व प्रसिद्ध थे यह कानून लेकर आए. जाहिर है वजह वोट बैंक था. आजादी के बाद भी राष्ट्र प्रथम की सोंच रखने के कारण सवर्णों ने सबसे ज्यादा परिवार नियोजन करवाया इसलिए उनकी जनसंख्या में हिस्सेदारी लगातार घटती रही इसलिए भी वोट बैंक के रूप में उनका महत्व क्रमशः घटता गया. साथ ही हर जगह आरक्षण होने से सामाजिक प्रभाव में तो गिरावट आई ही. मित्रों, इस बारे में मुझे एक घटना याद आ रही है. जब २००५ में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो तब के उनके मुख्य सहायक श्री शिवानन्द तिवारी ने उनसे कहा था कि बांकियों की चिंता करिए सवर्णों की चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है. वे तो बिहार का विकास देखकर ही आपको वोट दे देंगे. और ऐसा हुआ भी. इसी से समझ सकते हैं कि सवर्ण आज भी अपने से ज्यादा देश-प्रदेश का भला चाहते हैं. मित्रों, आज एक गरीब ब्राह्मण जिस नौकरी के आवेदन के लिए १००० रूपये की फ़ीस देता है करोड़पति एससी-एसटी को कभी-कभी तो एक पैसा भी नहीं देना पड़ता है. यह कैसा न्याय है और कैसी समानता है? क्या यह अत्याचार नहीं है? क्या समय के साथ आरक्षण और फीस सम्बन्धी प्रावधानों को बदलना नहीं चाहिए? रही बात एससी-एसटी एक्ट की तो चूंकि आज एससी-एसटी बड़ी संख्या में मुखिया-सरपंच-अधिवक्ता-अधिकारी बन चुके हैं इसलिए इस कानून का सदुपयोग तो हो नहीं रहा दुरुपयोग जरूर हो रहा है और जमकर हो रहा है. कई बार तो एससी-एसटी जाति के लोग सवर्णों को पीटते भी हैं और इस एक्ट की सहायता से उनको जेल भी भिजवा देते हैं. मित्रों, कई साल पहले आरा, बिहार में एक महादलित बीडीओ ने एक पत्रकार पर चुपके से एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा इसलिए दर्ज करवा दिया क्योंकि उसने उनका घोटाला पकड़ लिया था. अचानक बेचारे की गिरफ़्तारी भी हो गई. बाद में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने मामला संज्ञान में आने के बाद उसे जेल से बाहर निकलवाया. अब आप ही बताईए कि जब पत्रकार की ऐसी हालत कर दी गई तो बीडीओ साहब का आम सवर्ण या पिछड़ों के प्रति क्या रवैया रहता होगा. मित्रों, इस बीच 20 मार्च 2018 को माननीय सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने स्वत: संज्ञान लेकर एससी/एसटी एक्ट में आरोपियों की शिकायत के फौरन बाद गिरफ्तारी पर रोक लगा दी । शिकायत मिलने पर एफआईआर से पहले शुरुआती जांच को जरूरी किया गया था। साथ ही अंतरिम जमानत का अधिकार दिया था। तब कोर्ट ने माना था कि इस एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी की व्यवस्था के चलते कई बार बेकसूर लोगों को जेल जाना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- गिरफ्तारी से पहले शिकायतों की जांच निर्दोष लोगों का मौलिक अधिकार है। लेकिन, 9 अगस्त 2018 को फैसले के खिलाफ अति हिंसक प्रदर्शनों के बाद केंद्र सरकार एससी/एसटी एक्ट में बदलावों को दोबारा लागू करने के लिए संसद में संशोधित बिल लेकर आई। इसके तहत एफआईआर से पहले जांच जरूरी नहीं रह गई। जांच अफसर को गिरफ्तारी का अधिकार मिल गया और अग्रिम जमानत का प्रावधान हट गया। आश्चर्यजनक तो यह रहा कि किसी भी सवर्ण सांसद ने न तो लोकसभा में और न ही राज्यसभा में इस अन्यायपूर्ण संशोधन का विरोध किया. मित्रों, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने ६ नवम्बर, २०२० को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि उच्च जाति के किसी व्यक्ति को उसके कानूनी अधिकारों से सिर्फ इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता है क्योंकि उस पर अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) के किसी व्यक्ति ने आरोप लगाया है। जस्टिस एल. नागेश्वर राव की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, 'एससी/एसटी ऐक्ट के तहत कोई अपराध इसलिए नहीं स्वीकार कर लिया जाएगा कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति का है, बशर्ते यह यह साबित नहीं हो जाए कि आरोपी ने सोच-समझकर शिकायतकर्ता का उत्पीड़न उसकी जाति के कारण ही किया है।' एसटी/एसटी समुदाय के उत्पीड़न और उच्च जाति के लोगों के अधिकारों के संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी काफी क्रांतिकारी मानी जा रही है। तीन सदस्यीय पीठ की तरफ से लिखे फैसले में जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कहा कि उच्च जाति के व्यक्ति ने एससी/एसटी समुदाय के किसी व्यक्ति को गाली भी दे दी हो तो भी उस पर एससी/एसटी ऐक्ट के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती है। हां, अगर उच्च जाति के व्यक्ति ने एससी/एसटी समुदाय के व्यक्ति को जान-बूझकर प्रताड़ित करने के लिए गाली दी हो तो उस पर एससी/एसटी ऐक्ट के तहत कार्रवाई जरूर की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि जब तक उत्पीड़न का कोई कार्य किसी की जाति के कारण सोच-विचार कर नहीं किया गया हो तब तक आरोपी पर एससी/एसटी ऐक्ट के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती है. सर्वोच्च अदालत ने कहा कि उच्च जाति का कोई व्यक्ति अगर अपने अधिकारों की रक्षा में कोई कदम उठाता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसके ऊपर स्वतः एससी/एसटी ऐक्ट के तहत आपराधिक कृत्य की तलवार लटक जाए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के फैसलों पर फिर से मुहर लगाते हुए कहा कि एससी/एसटी ऐक्ट के तहत उसे आपराधिक कृत्य ठहराया जा सकता है जिसे सार्वजनिक तौर पर अंजाम दिया जाए, न कि घर या चहारदिवारी के अंदर जैसे प्राइवेट प्लेस में। मित्रों, फिर भी इसमें संदेह नहीं कि आज भी इस कानून का जमकर दुरुपयोग हो रहा है. झूठे गवाह जुटा लेना अपने देश में कोई बड़ी बात नहीं है. अभी यूपी में चुनाव होने हैं और यूपी में ब्राह्मणों की अच्छी-खासी संख्या है इसलिए सारे दल ब्राह्मण सम्मलेन आयोजित कर रहे हैं. इनमें वह दल भी शामिल है जिसने देशभर में तोड़-फोड़कर सुप्रीम कोर्ट के २० मार्च, २०१८ के फैसले को पलटवाया. आज सवर्ण और पिछड़े एससी-एसटी को मकान-दूकान किराए पर देने से डरने लगे हैं. साथ ही उनको नौकरी देने में लोग डरते हैं. एक तो भलाई करो फिर जेल भी जाओ. मित्रों, किसी देश का कानून, व्यवस्था को बनाए रखने और समाज में शांति का माहौल बनाने में मदद कर करता है लेकिन जब किसी कानून का इस्तेमाल एक वर्ग द्वारा अन्य वर्ग के विरुद्ध अपने फायदे के लिए होने लगता है तो फिर उस कानून में बदलाव की आवश्यकता होती है। पिछले दिनों एक खबर आयी कि एक व्यक्ति विष्णु तिवारी नामक ललितपुर का ब्राह्मण SC/ST एक्ट के तहत बलात्कार के आरोप में 20 वर्षों से सश्रम कारावास में आगरा केंद्रीय कारागार में कैद था अब जा कर निर्दोष साबित हुआ है। आखिर हमारे देश का कानून किस प्रकार से उस व्यक्ति के गुज़रे हुए 20 वर्ष वापस कर सकता है? यह तो सिर्फ एक उदाहरण है, ऐसे ना जाने कितने उदाहरण देश में भरे पड़े है जो न केवल यह दिखाते हैं कि कैसे SC/ ST का दुरुपयोग होता है बल्कि उसका इस्तेमाल आपसी रंजिश के कारण भी किया जा रहा है। दरअसल, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 (Vishnu v. State of UP) के तहत बलात्कार, आपराधिक धमकी जैसे आरोपों के कारण 20 साल से जेल में बंद एक व्यक्ति को आरोप मुक्त किया है। डॉ. कौशल जयेंद्र ठाकर और गौतम चौधरी की पीठ ने एक ऐसे व्यक्ति को बरी कर दिया जो झूठे बलात्कार और दलित अत्याचार मामले में बीस साल से अधिक समय तक जेल में रहा। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने पाया कि घटना की तारीख, यानी 16.9.2000 से आरोपी जेल में है यानी 20 साल से। उस व्यक्ति को आईपीसी की धारा 376, 506 और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3 (1) (xii) के साथ धारा 3 (2) (v) के तहत गिरफ्तार किया गया था. अब जाकर कोर्ट ने तथ्यों और चिकित्सा रिपोर्टों को सुनते हुए मामले को खारिज कर दिया और आरोपी को आपसी रंजिश का शिकार पाया. मेडिकल रिपोर्ट में चोटों और यौन हमले का कोई संकेत नहीं है। इसके अलावा, अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता ने शिकायत एक ही मकसद के कारण की थी। दोनों पक्षों के बीच पहले से भूमि विवाद था जिसके कारण अभियोजन पक्ष ने यौन उत्पीड़न के मामले को दायर किया । मित्रों, सुनवाई के दौरान, अदालत ने दोहराया कि अगर कोई भूमि विवाद में हैं तो उस व्यक्ति के खिलाफ SC/ST अधिनियम के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती है। कोर्ट के अनुसार, “हमारी जाँच पड़ताल में, चिकित्सा प्रमाण यह स्पष्ट करते है कि डॉक्टर को किसी भी प्रकार का शुक्राणु नहीं मिला था। डॉक्टर ने स्पष्ट रूप से कहा कि जबरन संभोग का भी कोई संकेत नहीं मिला और ना ही किसी प्रकार की अंदरूनी चोट थी।” रिकॉर्ड पर तथ्यों और सबूतों के मद्देनज़र, अदालत ने आश्वस्त किया था कि आरोपी को गलत तरीके से दोषी ठहराया गया है, इसलिए आदेश को बदल कर आरोपी को बरी कर दिया गया. बता दें कि इकोनोमिक टाइम्स कि रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने बताया था कि 2016 में SC/ST एक्ट के अंदर 8900 केस गलत थे। राजस्थान पुलिस के पास उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत 2020 में राजस्थान के अंदर 40 प्रतिशत से अधिक मामले फर्जी पाए गए। स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2018 में यह कहा था कि ये निर्दोष नागरिकों और पब्लिक सर्वेंट को “ब्लैकमेल” करने का एक साधन बन गया है। 1989 अधिनियम न सिर्फ निर्दोष को दंडित करता है और यहां तक कि संदिग्ध अपराधियों को अग्रिम जमानत भी नहीं देता। फिर अदालत ने कहा कि कानून का इस्तेमाल केवल शिकायतकर्ता की शिकायत मात्र से आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लूटने के लिए किया जाता है। यानी देखा जाए तो इस कानून का जितना उपयोग होता है, उससे अधिक दुरुपयोग होता है। एक व्यक्ति के जीवन के 20 वर्ष जेल में ही गुजर गये वो भी केवल झूठे आरोपों के आधार पर, इससे बड़ी विडंबना शायद ही हो सकती है। इतना ही नहीं मुकदमे में सारी जमीन तक बिक गई और सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करना पड़ा. इस दौरान परिजनों ने भी उसकी सुध नहीं ली. मित्रों, उसकी जवानी के वो बीस साल, जब वो अपनी मेहनत और कोशिशों से अपने और अपने परिवार के लिए जमाने भर की खुशियां खरीद सकता था, वो बीस साल उसे कौन वापस करेगा? जो उसने बगैर किसी गुनाह के ही सलाखों के पीछे निकाल दिए. उसकी जवानी के वो बीस साल, जब वो अपनी मेहनत और कोशिशों से अपने और अपने परिवार के लिए जमाने भर की खुशियां खरीद सकता था, वो बीस साल उसे कौन वापस करेगा? उसे उसके मां-बाप कौन लौटाएगा, जो जवान बेटे के गम के तड़प-तड़प कर इस दुनिया से दूर चले गए. उसे उसके उन दो बड़े भाइयों से कौन मिलवाएगा, जिन्हें विष्णु का इंतज़ार भरी जवानी में लील गया. सबसे बडी़ विसंगति तो यह रही कि विष्णु चीख-चीख कर कहता रहा कि वो नाबालिग है, १७ साल का है लेकिन उसकी एक नहीं सुनी गई। मित्रों, सच्चाई तो यह है किसी भी दल को ब्राह्मणों की समस्याओं से कुछ भी लेना-देना नहीं है. कोई भी दल इस काले आधुनिक रौलेट एक्ट को बदलने का वादा नहीं कर रहा लेकिन सबको ब्राह्मणों का वोट चाहिए. बांकी सवर्ण तो किसी गिनती में ही नहीं हैं इसलिए उनके लिए कोई जातीय सम्मेलन नहीं हो रहा. सवाल उठता है कि क्या ब्राह्मण सहित सारी गैर एससी-एसटी जातियों को इस कानून को समाप्त करने की न सही सुप्रीम कोर्ट के २० मार्च, २०१८ के निर्णय के अनुकूल बनाने की मांग नहीं करनी चाहिए? आखिर कब तक सवर्ण बतौर शिवानन्द तिवारी देश-प्रदेश हित में अपने निजी हितों को कुर्बान करते रहेंगे? आखिर यह कैसा नाटक है कि जो कोई पार्टी कभी तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार का आह्वान करती है वो आज ब्राह्मणों का झूठा सम्मान करने का नाटक कर रही है? अगर सचमुच ये पार्टियाँ ब्राह्मणों का सम्मान करती हैं तो उनको सबसे पहले एससी-एसटी एक्ट में बदलाव के वादे को अपने अपने घोषणा-पत्र में शामिल करना चाहिए क्योंकि एससी-एसटी एक्ट का सर्वाधिक दुरुपयोग बसपा के शासन में ही होता है.

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

अफगानिस्तान बनने को ओर अग्रसर भारत

मित्रों, हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं कि भारत में लोकतंत्र है जिसके तीन भाग हैं-कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका. परन्तु जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ी हमारी समझ में आया कि भारत में तंत्र तो है लेकिन भ्रष्ट, कामचोर व सडा-गला लोकतंत्र है. हमने नया संविधान तो बना लिया लेकिन कानून वही बरक़रार रखे जिनके माध्यम से अंग्रेज हमें लूटते थे. मेरा मतलब आईपीसी, न्यायिक प्रक्रिया और भारतीय प्रशासनिक सेवा से है. अब जब कानून ही गड़बड़ है तो व्यवस्था कैसे सही होगी? मित्रों, हमारे देश की कार्यपालिका का तो कहना ही क्या! ये बिना तालाब के मछली पाल लेती है, बिना नदी के पुल बना देती है और बिना बांध बने उसमें छेद भी कर देती है. जहाँ देखिए वहां सिर्फ छेद ही छेद है. न्यायपालिका पहले तो तारीख-पे-तारीख देकर पीड़ितों अथवा दिवंगत पीड़ित-पीडिताओं के परिजनों को थका डालती है फिर कई दशकों के बाद कह देती है कि नो वन किल्ड जेसिका. न्यायमूर्ति से चंद कदम पर बैठा उनका पेशकार मुट्ठी गरम कर रहा होता है मगर न्याय की मूर्ति जी को कुछ नजर नहीं आता फिर ऐसा व्यक्ति कैसे न्याय दे सकता है. उस पर गजब यह कि न्यायाधीश ही न्यायाधीश की नियुक्ति करता है जिससे जमकर भाई-भतीजावाद हो रहा है. मित्रों, व्यवस्थापिका की तो खुद की पूरी व्यवस्था चरमराई हुई है. अब वहां छंटे हुए बदमाश बैठते हैं. सरकारों ने व्यवस्थापिका पर पूरी तरह से कब्ज़ा कर लिया है. विपक्ष भी नैतिक रूप से पतित हो चुका है. फिर कैसी व्यवस्था? अभी ऑक्सीजन की कमी से कोरोना मरीजों की अकालमृत्यु को ही लें तो भारत की समस्त राज्य सरकारें और संघ सरकार भी एक स्वर में कह रही है कि ऑक्सीजन की कमी से देश में कोई नहीं मरा. जबकि हमने अपनी और कैमरों की आँखों से देखा है कि ऑक्सीजन की कमी से देश में हजारों लोग मरे हैं. मतलब कि संसद में संघ सरकार झूठ बोल रही है और प्रमाण-सहित झूठ बोल रही है. विपक्षी दलों की भी जहाँ-जहाँ सरकारें हैं वे सरकारें भी झूठ बोल रही हैं फिर जनता के लिए लड़ेगा कौन? मित्रों, मैं एक बार फिर से दोहरा रहा हूँ कि भारत में लोकतंत्र है. बस कागज़ी लोकतंत्र है जो सिर्फ कागजों पर ही नज़र आता है. तंत्र मस्त है लोक पस्त है. चाहे लोक बचें या न बचें तंत्र बचा रहेगा. वास्तव में ऑक्सीजन की जरुरत लोक से ज्यादा तंत्र को है. अंग्रेजी हुकूमत के सारे अवशेषों यथा कानून, शिक्षा-प्रणाली, न्याय प्रक्रिया, पुलिस और प्रशासनिक तंत्र को मिटाना होगा वर्ना एक दिन तंत्र भी नहीं बचेगा, बचेगी तो बस अराजकता और भारत भी अफगानिस्तान बनकर रह जाएगा.

शनिवार, 17 जुलाई 2021

दानिश सिद्दीकी को श्रद्धांजलि

मित्रों, चलिए पहले एक कहानी हो जाए. एक भेड़िया था और एक खरगोश था. भेड़िया बहुत दिनों से खरगोश को खाने के चक्कर में था और बराबर खरगोश को परेशान कर उससे झगड़ने का सुअवसर खोजता रहता था लेकिन खरगोश था कि सबकुछ बर्दाश्त कर जाता था. फिर एक दिन भेड़ियों ने खरगोश का चौतरफा रास्ता रोक लिया. अब खरगोश के सामने कोई विकल्प ही नहीं रहा सो उसने भेड़िये को चेतावनी दी कि वो उसका रास्ता नहीं रोके नहीं तो अंजाम अच्छा नहीं होगा. बस भेड़िये को बहाना मिल गया और उसने खरगोश पर हमला कर दिया. खरगोश ने भी बदले में कुछ भेड़ियों को मार गिराया. मित्रों, अब तो जैसे मीडिया में आग लग गई. पहले से तैयार बैठी खरगोशविरोधी मीडिया ने आनन-फानन में खरगोश को दंगा भड़काने का दोषी घोषित दिया. कुछ मीडिया समूह ने तो यहाँ तक कह दिया कि खरगोशों ने दंगों और भेड़ियों के सामूहिक संहार कि पूर्व योजना बना रखी थी. जंगल की विकीपीडिया की भी यही राय थी. मित्रों, मेरा मतलब पूरी तरह भारत कि राजधानी दिल्ली के २०२० के दंगों से है. आश्चर्य की बात है कि उस समय दानिश सिद्दीकी नामक महान फोटोग्राफर को पुलिसकर्मी पर पिस्तौल ताने शाहरूख या जाबिर हुसैन के घर से चल रही गतिविधियों की कोई तस्वीर खींचने का मौका नहीं मिला लेकिन रामभक्त गोपाल की तस्वीर खींचने का महान अवसर जरूर मिल गया. जहाँ दानिश मंदिर और हिन्दुओं के स्कूल-घर और गाड़ियों के जलने की कोई तस्वीर नहीं खींच पाए वहीँ जली मस्जिदों पर उन्होंने खूब कैमरा चमकाया. आप ही बताईए ऊपरवाली कहानी में दानिश जैसे लोगों को किसका साथ देना चाहिए था खरगोशों का या भेड़ियों का. मित्रों, यहाँ बात दूसरी है कि दानिश की हत्या हो चुकी है और हुई भी है भेड़ियों के हाथों. दानिश को भारत में कुछ भी अच्छा नहीं लगता था. मोदी सरकार तो बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी जैसे न्यूयॉर्क टाइम्स को अच्छी नहीं लगती है. जबकि सच्चाई तो यह है कि मोदी और योगी सरकार ने जितना मुसलमानों के लिए किया है उतना किसी ने नहीं किया. फिर भी जो लोग भारत में भी तालिबान जैसा शरियत का शासन चाहते हैं उनको मोदी कहाँ सुहानेवाले हैं? मित्रों, पता नहीं ऐसा क्यों है लेकिन सच्चाई यही है कि कुछ महान अंतर्राष्ट्रीय ख्याति वाले पुरस्कार सिर्फ उनके लिए है जो भारत विरोधी हैं, हिंदूविरोधी हैं. दानिश को भी पुलित्ज़र मिल चुका था. मित्रों, क्या अब भी इस बात में कोई संदेह है कि इस्लाम हिंसक और मानवताविरोधी मजहब है? तालिबान ने जीते हुए ईलाकों के मौलवियों से १५ साल से बड़ी अविवाहित और विधवा स्त्रियों कि सूची मांगी है. क्यों? क्या वे उनको पुरस्कार देंगे? फिर वो स्त्रियाँ तो काफ़िर भी नहीं हैं. फिर क्यों किया जाएगा उनका जबरन निकाह जो उनको रोज-रोज बलात्कार जैसा दर्द देगा? क्यों? इस्लाम तो महिलाओं को बहुत सम्मान देता है न? क्या यही सम्मान है? तालिबानियों ने तो आत्मसमर्पण करनेवालों को भी नहीं बख्शा और तभी-का-तभी उड़ा दिया. इस बारे में कुरान की क्या राय है? मित्रों, आज दानिश दुनिया में नहीं हैं. उन्होंने जब भी मौका मिला भारत और हिन्दुओं को बदनाम किया. उन हिन्दुओं को जिनसे अच्छा पड़ोसी हो ही नहीं सकता. दानिश को उसका खुदा जन्नत नसीब करे क्योंकि वो अपने खुदा के अत्यंत नेक बन्दों के हाथों अल्लाह हो अकबर के नारों के बीच मारा गया है. काश, दानिश की हत्या से भारत के अन्य महान पुरस्कार विजेता पत्रकार शिक्षा लेते और अपनी सोंच सचमुच निष्पक्ष कर लेते! हमें अमेरिकावाले न्यूयॉर्क टाइम्स से तो कोई उम्मीद नहीं है लेकिन भारतवाले न्यूयॉर्क टाइम्स वाले तो सुधर जाओ.

गुरुवार, 8 जुलाई 2021

मजबूरी का मंत्रीमंडल विस्तार

मित्रों, हवाबाजी खेल भी है और कला भी। जार्ज बुश जहां इस खेल में माहिर थे वहीं मोदी जी ने इसे कला का रूप दे दिया है। कोई भी वादा करके चुनाव जीतने के बाद अमित शाह जी से कहलवा देते हैं कि वो तो जुमला था। किबला इससे पहले हमने कभी यह शब्द सुना भी नहीं था। मित्रों, फिर बहुत से अन्य नए शब्दों को सुना गया जैसे मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नेन्स, सबका साथ सबका विकास, सबका विश्वास, आत्मनिर्भर भारत, मैं देश नहीं झुकने दूंगा, नेशन फर्स्ट, गरीबों की सरकार आदि। मित्रों, बारी-बारी से ये सारे नारे खोखले निकले। कल मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नमेंस का भी जुलूस निकल गया। यह पहली ऐसी सरकार है जो किसी की सलाह माने बिना बडे ही आत्मविश्वास से गलतियां करती है। जब इसने पहली बार शपथ ली तभी लगा कि बेकार व चापलूस मंत्रियों के बल पर कैसे कोई सरकार गुड गवर्नेन्स दे सकती है? फिर मिनिमम गवर्नमेंट के नाम पर उन एक-एक फालतू लोगों को कई-कई विभाग थमा दिए गए। मित्रों, इस बीच हमने भी आवाज उठाई खासकर सुरेश प्रभु जैसे योग्य व्यक्ति को मंत्रीमंडल से बाहर करना बहुत अखरा लेकिन अक्खड़ मोदी कहां सुननेवाले थे। फिर वे चुनाव-दर चुनाव जीत भी रहे थे। अब बंगाल चुनाव ने उनको सोंचने पर मजबूर कर दिया है। मित्रों, फिर भी मैं नहीं समझता कि डिब्बों को बदलने से सरकार की कार्यशैली में कोई बदलाव आनेवाला है क्योंकि ईंजन तो वही पुराना है। लगता है जैसे बारी-बारी से सबको राज भोगने का अवसर दिया जा रहा है। फिर सबकी मेहनत का कबाड़ा करने में अकेली सक्षम निर्मला जी अभी भी वित्त मंत्री हैं।

मंगलवार, 29 जून 2021

सीखी कहाँ मोदी जू देनी ऐसी देन

मित्रों, इस सत्यकथा से आप भी अपरिचित नहीं होंगे. अकबर के नवरत्नों में से एक थे अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ानाँ जिनको हम रहीम कवि के नाम से भी जानते हैं. रहीम बहुत बड़े कृष्णभक्त तो थे ही बहुत बड़े दानी भी थे. उनका गोस्वामी तुलसीदास से निरंतर संवाद चलता रहता था. तो हुआ यूं कि रहीम जब भी दान करने बैठते तो जैसे-जैसे उनका हाथ ऊपर उठता उनकी आँखें झुकती जातीं. तुलसी को जब मालूम हुआ तो उन्होंने दोहा भेजकर पूछा- सीखी कहाँ नवाबजू देनी ऐसी देन, ज्यों-ज्यों कर ऊँचे उठे त्यों-त्यों नीचे नैन. रहीम कवि भी कम तो थे नहीं सो झटपट उत्तर दिया- देनहार कोई और है देत रहत दिन-रैन, लोग शक मुझ पर करें ता विधि नीचे नैन. मित्रों, अब न तो रहीम रहे और न ही तुलसी, अब तो मोदी जी का राज है और मोदी जी भी कम दानी तो हैं नहीं और दानी भी कैसे रोबिनहुडी. रोबिनहुड अमीरों से लूटकर गरीबों को देता था मोदी जी गरीबों को लूटकर अमीरों में बाँटते हैं. आप तो जानते होंगे कि मैं हवा में बात नहीं करता. हमारे पास आंकड़ों का एक पिटारा होता है. तो अब बात करते हैं आंकड़ों की. 2019 में केंद्र और राज्यों के कुल राजस्व का 65 फीसद हिस्सा खपत पर लगने वाले टैक्स से आया. वह टैक्स जो हर व्यक्ति चुकाता है और जिसके दायरे में सारी चीजें आती हैं. केंद्र की कमाई में इनकम टैक्स का हिस्सा 17 फीसद था. गरीबों के मसीहा मोदी जी के राज में बीते एक दशक (2010 से 2020) के बीच भारतीय परिवारों पर टैक्स का बोझ 60 से बढ़कर 75 फीसद हो गया. इंडिया रेटिंग्स के इस हिसाब में व्यक्तिगत आयकर और जीएसटी शामिल हैं. मसलन, बीते सात साल में पेट्रोल-डीजल से टैक्स संग्रह 700 फीसद बढ़ा है. यह बोझ जीएसटी के आने के बाद बढ़ता गया है जिसे लाने के साथ टैक्स कम होने वादा किया गया था. इस गणना में राज्यों के टैक्स और सरकारी सेवाओं पर लगने वाली फीस शामिल नहीं है. वे भी लगातार बढ़ रहे हैं. मित्रों, अब बात करते हैं कि केंद्र सरकार किस तरह अमीरों पर मेहरबान है. उत्पादन या बिक्री पर लगने वाला टैक्स (जीएसटी) आम लोग चुकाते हैं. कंपनियां इसे कीमत में जोड़कर हमसे वसूल लेती हैं. इसलिए कंपनियों पर टैक्स की गणना उनकी कमाई पर लगने वाले कर (कॉर्पोरेशन टैक्स) से होती है. इंड-रा का अध्ययन बताता है कि 2010 में केंद्र सरकार के प्रति सौ रुपए के राजस्व में कंपनियों से 40 रुपए और आम लोगों से 60 रुपए आते थे. 2020 में कंपनियां केवल 25 रुपए दे रही हैं और आम लोग दे रहे हैं 75 रुपए. याद रहे कि 2018 में कॉर्पोरेट टैक्स में 1.45 लाख करोड़ रुपए की रियायत भी दी गई है. मतलब गरीबों से लो और अमीरों को दो. मित्रों, महान अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड केंज ने कहा था कि सरकार अगर चाहे तो बहुत कम समय में बहुत बड़ी आबादी को गरीब बना सकती है. महंगाई हमारे लिए नई नहीं है. कमाई और मांग बढ़ने से आने वाली महंगाई के कुछ समर्थक मिल जाएंगे. यद्यपि मौद्रिक पैमानों पर धन की आपूर्ति से कीमतें बढ़ती हैं लेकिन इस वक्त जब कमाई व कारोबार ध्वस्त है और सस्ता कर्ज सबकी किस्मत में नहीं है तब अगर भारी कराधान से सरकार ही महंगाई थोप रही है तो जरूर यह सरकार गरीबहितैषी नहीं है. यहाँ हम आपको बता दें खाद्य सामान की कीमत एक फीसद बढ़ने से खाने पर खर्च करीब 0.33 लाख करोड़ रुपए (क्रिसिल) बढ़ जाता है. खाद्य महंगाई बीते एक साल में 9.1 फीसद (कोविड पूर्व तीन फीसद पर थी) की दर से बढ़ी है. फल-सब्जी की मौसमी तेजी को अलग रख दें तो भी खाद्य तेल, मसाले, दाल, अंडे की कीमतों ने महंगाई की कुल दर को मीलों पीछे छोड़ दिया है. मित्रों, ऐसा तब हो रहा है जब सीएसओ के अनुसार 2020-21 में प्रति व्यक्ति आय 8,637 रुपए घटी है. सिर्फ निजी और असंगठित क्षेत्र में बेरोजगारी और वेतन कटौती के कारण आय में 16,000 करोड़ रुपए की कमी आई है. जबकि महामारी व महाबेरोजगारी के बीच दवाएं, पेट्रोल-डीजल, खाने के सामान पर टैक्स कम हो सकता था. बचत पर ब्याज दर में कटौती टाली जा सकती थी. भारत में खुदरा महंगाई में एक फीसदी की बढ़त से जिंदगी 1.53 लाख करोड़ रुपए महंगी (क्रिसिल) हो जाती है. एक बरस में खुदरा महंगाई की सरकारी (आधा- अधूरा पैमाना) सालाना दर 6.2 फीसद रही जो 2019 से करीब दो फीसद ज्यादा थी. अब यह 8 फीसद की तरफ बढ़ रही है. इसके चलते 97 फीसद निम्न और मध्यम वर्गीय आबादी एक साल में पहले के मुकाबले गरीब हो गई है. मित्रों, दूसरी तरफ भारत सरकार का पिछले एक दशक का सबसे बड़ा सुधार; बीमार कंपनियों को उबारने के बदले बैंकों का पैसा डूबा रहा है. इतना ही नहीं मोदी इस बहाने अपने चहेतों को जबरदस्त फायदा भी पहुंचा रहे हैं. इस नए निजाम के ताजा फैसले में लगभग 64,883 करोड़ रुपए की कर्जदार वीडियोकॉन के कथित उद्धार को मंजूर कर दिया गया, जिसमें 96 फीसद नुकसान शेयरधारकों और बैंकों को होगा. खरीदने वाले (वेदांता, अनिल अग्रवाल की समूह की कंपनी) को केवल 2,962 करोड़ रु देने होंगे. दूसरी तरफ बैंकों के अर्थात हमारे करीब 42,000 करोड़ रुपए डूबेंगे. ऐसा तब हुआ है जब वीडियोकॉन के मालिक वेणुगोपाल धुत किस्तों में ४५००० करोड़ देने को तैयार थे. जेट एयरवेज के ‘उद्धार’ में भी बैंक समेत लेनदारों को 90 फीसद का नुकसान (कुल बकाया 40,259 करोड़ रु.) होने की संभावना है. दीवान हाउसिंग के मामले में बचत कर्ताओं और बॉन्ड धारकों को 60 से 95 फीसदी तक का नुकसान उठाना पड़ सकता है. बैंकरप्सी की प्रक्रिया के तहत 2017 के बाद कर्ज की वसूली लगातार कम होती (44 से 25 फीसद) चली गई है. सनद रहे कि कोविड आने से पहले ही ‘उद्धार’ की प्रक्रिया बकाया कर्ज के 95 फीसद मुंडन तक पहुंच गई थी. मतलब जो भी दिवालिया कंपनियों को खरीद रहा है उसे जानबूझकर हजारों करोड़ उपहार में दिए जा रहे हैं और बैंकों का ९५ फीसदी तक पैसा डूब जा रहा है. मित्रों, इस आलेख को पढने के बाद अब तक आप यह समझ गए होंगे कि आजादी के बाद से भारत में अमीर और अमीर और गरीब और भी गरीब कैसे और क्यों होते जा रहे हैं फिर यह सरकार तो कथित रूप से चायवाले की सरकार ठहरी. जहाँ सरकार को करों में राहत देकर जनता की जेब में और ज्यादा पैसा डालना चाहिए वहां सरकार बस आम जनता को चायपत्ती समझ कर निचोड़े जा रही है, निचोड़े जा रही है और अपने खासम खास की झोली भरती जा रही है. आखिर मोदी यारों के यार जो ठहरे. वैसे आप चाहे तो महंगाई पर मोदी जी के पुराने भाषणों को फिर से सुन-पढ़ सकते हैं, परम संतोष मिलेगा. मित्रों, अंत में यही कहा जा सकता है कि गरीबों पे सितम, अमीरों पे करम ऐ जानेजहाँ ये जुल्म न कर, ये जुल्म न कर. मर जाएंगे हम तेरे सर की कसम, ऐ जानेजहाँ ये जुल्म न कर. ये जुल्म न कर.

शुक्रवार, 11 जून 2021

बंगाल की अंतर्कथा और राष्ट्रीय परिदृश्य

मित्रों, हुआ यूं कि मेरे गाँव में एक परिवार था. परिवार के सारे सदस्य मिलजुल कर रहते थे. फिर बड़े बेटे की शादी हुई. आंगन के अन्य पट्टीदारों ने सास-ससुर के खिलाफ बड़ी बहू के कान भरने शुरू कर दिए. लेकिन बड़ी बहू समझदार थी इसलिए उनकी दाल नहीं गली. फिर कुछेक साल बाद जब छोटे बेटे की शादी हुई तब उन्होंने फिर छोटी बहू के कान भरने शुरू कर दिए. संयोगवश छोटी थी कान की कच्ची सो उनकी बातों में आ गई. इस प्रकार एक खुशहाल परिवार लड़ाई का अखाडा बन गया. परेशान होकर ससुर और बड़े भाई ने बंटवारा कर दिया. जैसे ही बंटवारा हुआ पट्टीदार छोटे बेटे और बहू को तंग करने लगे. ऐसा लगने लगा जैसे उनको आँगन में रहने ही नहीं देंगे. मित्रों, कुछ ऐसा ही खेल बंगाल में कई दशकों से चल रहा है. पहले साम्यवाद और नक्सलवाद के नाम पर वामपंथियों ने बंगाल के अवर्णों को सवर्णों से अलग कर दिया. फिर बांग्लादेश से ला-लाकर घुसपैठियों को बंगाल में भर दिया और अवर्णों और मुसलमानों का सामाजिक समीकरण बनाकर तीन दशकों तक लगातार बंगाल को कुछ इस तरह से लूटा कि बंगाल बंगाल से कंगाल बन गया. मित्रों, फिर आई ममता जिसमें ममता एक छटांक भी नहीं थी. वो बस नाममात्र की हिन्दू थी. उनके लिए हिन्दू सिर्फ वोट बैंक थे. उधर बंगाल के मुसलमानों की तो जैसे लौटरी ही लग गई थी. कम्युनिस्ट जहाँ खुलकर मुस्लिम तुष्टिकरण करने से बचते थे ममता एक मुसलमान से भी ज्यादा मुसलमान थी. जो रोगी को भावे वही वैद फरमावे. मुसलमान अब खुलकर अपने दारुल इस्लाम के १४०० साल पुराने एजेंडे पर जुट गए. जाहिर था कि चाहे बंगाल हो या पाकिस्तान या बांग्लादेश सवर्ण हिन्दुओं का मुसलमानों से कम ही वास्ता पड़ता है लेकिन बहुत सारे दलित हिन्दू मुसलमानों के रैयत हैं इसलिए वे मुसलमानों के लिए सॉफ्ट टारगेट बन जाते हैं. मित्रों, जिस तरह नक्सलवाद के समय बहुत सारे हिन्दुओं ने मुसलमानों के साथ मिलकर कथित क्रांति के लिए बहुत सारे सवर्ण हिन्दुओं को मार डाला था दुर्भाग्यवश इस समय भी बहुत सारे हिन्दू तृणमूल कांग्रेस के बहकावे में आकर मुसलमानों के साथ मिलकर अपने हिन्दू भाईयों की हत्या कर रहे हैं. विडंबना यह है कि तब भी बंगाल में हिन्दू मारे जा रहे थे और अब भी हिन्दू ही मारे जा रहे हैं. वास्तव में इन दिनों बंगाल में नरभक्षी भेड़ियों का आतंकी राज चल रहा है. मित्रों, अब रही बात भाजपा की तो उसे तो बस राज भोगने और पैसा कमाने से मतलब है. हिंदुत्व वगैरह अटल-आडवाणी के समय जरूर पार्टी का मुख्य लक्ष्य था लेकिन आज की भाजपा के लिए हिंदुत्व सह उत्पाद भर है बाई प्रोडक्ट, मुख्य उत्पाद तो पैसा है. कदाचित यही कारण है कि भाजपा बंगाल में हिन्दुओं के सामूहिक नरसंहार, सामूहिक बलात्कार से आँखें मूंदें है. जब सपा के समय यूपी जल रहा था तब भी मोदी ने कोई कदम नहीं उठाया था इसलिए इस सरकार से तो कोई उम्मीद करना ही बेकार है. मित्रों, तो ये रही बंगाल की अंतर्कथा. लेकिन क्या आप जानते हैं हैं भीम आर्मी के माध्यम से ठीक यही प्रयोग पूरे भारत में करने के प्रयास किए जा रहे हैं? राष्ट्रिय स्तर पर अवर्ण हिन्दुओं को हिन्दुओं की मुख्य धारा से अलग करने के प्रयास किए जा रहे हैं. फिर इस कहानी के अंत में भी वही होगा जो उत्तर प्रदेश के नीरपुर, बिहार के बायसी और हरियाणा के मेवात में हो रहा है. धीरे-धीरे प्रत्येक हिन्दू की बारी आएगी, बचेगा कोई नहीं.

रविवार, 23 मई 2021

बिहार में आज भी अंग्रेजों के ज़माने की पुलिस

मित्रों, मुझे पूरा यकीन है कि आपने भी शोले फिल्म जरूर देखी होगी. उसमें असरानी बार-बार कहते हैं कि हम अंग्रेजों के ज़माने के जेलर हैं. खैर वो तो फिल्म थी, कल्पना थी लेकिन दुर्भाग्यवश आज भी आजादी के ७४ साल बाद भी कम-से-कम बिहार में तो अंग्रेजों का ही शासन है, अंग्रेजी पुलिस काम कर रही है. आज भी बिहार पुलिस का रवैया, जनता के प्रति व्यवहार वही है जैसा अंग्रेजों के ज़माने में पुलिस का होता था. मित्रों, हमारे बाप-दादा दादा बतलाते थे कि अंग्रेजों के ज़माने में जब किसी गाँव में किसी की हत्या हो जाती थी तो पूरा गाँव घर छोड़कर भाग जाता था क्योंकि पुलिस पूरे गाँव को एक साथ प्रताड़ित करने लगती थी. किसी के भी घर पर रात-बेरात छापा मार देती थी, किसी को भी उठा लेती थी और फिर मनमानी रकम लेकर छोडती थी. अक्सर लोग हवालात से जीवित नहीं लौटते थे और अगर जीवित बच भी गए तो आजीवन घर का मुंह नहीं देख पाते थे क्योंकि उनके ऊपर दस-बीस झूठे मुक़दमे लाद दिए जाते थे. चूंकि शासन अंग्रेजों के अधीन था जिनका एकमात्र उद्देश्य भारत की जनता को दोनों हाथों लूटना था इसलिए लोग कहीं शिकायत भी नहीं कर सकते थे. मित्रों, अगर मैं कहूं कि बिहार के वैशाली जिले में अभी भी अंग्रेजों के ज़माने की पुलिस काम कर रही है तो कदाचित आपको यकीन न भी हो. लेकिन सच यही है. दरअसल वैशाली जिले के जिलाधिकारी के स्टोनो हैं जयराम सिंह जो पटना जिले के रूपस दियारे के निवासी हैं. जयराम सिंह की ससुराल वैशाली जिले के देसरी थाने के चांदपुरा ओपी के खोरमपुर में है. जयराम सिंह पिछले दो दशकों से कुछेक महीने को छोड़कर वैशाली जिले के डीएम के स्टोनो के पद पर लगातार जमे हुए हैं. दुर्भाग्यवश उनके ससुर नागेश्वर सिंह और उनके साले संतोष सिंह का स्वभाव काफी झगडालू है. जयराम की शादी के बाद से ही उनकी ससुराल के लोग अपने पड़ोसियों पर धौंस ज़माने और तंग करने के लिए अक्सर थोक में मुकदमा करते रहते हैं जिनमें जयराम सिंह पैरवी करता है. पिछले दिनों नागेश्वर सिंह के घर में कथित रूप से चोरी हो गई. जिसके बाद नागेश्वर सिंह के पुत्र संतोष सिंह ने अज्ञात के खिलाफ चोरी की एफआईआर चांदपुरा ओपी में दर्ज करवाई और उसी दिन से नागेश्वर सिंह के पड़ोसियों का खाना-सोना मुहाल हो गया है. पुलिस कभी भी बिना सर्च वारंट के किसी के भी घर में १२ बजे रात में घुस जाती है और कभी भी किसी को भी उठा ले जाती है. कल रात भिखनपुरा, कुबतपुर के दीपनारायण सिंह के घर अर्द्धरात्रि में बेवजह छापा मारा गया. कल २२ मई, २०२१ को ही रात के बारह बजे खोरमपुर के नन्दकिशोर सिंह के घर से उनके नाबालिग नाती सकेत कुमार, पुत्र-स्व. वेदप्रकाश सिंह को चांदपुरा ओपी प्रभारी शशिप्रभा मणि बिना किसी सबूत के उठा ले गई. इतना ही नहीं आज २३ मई को जब उसकी विधवा माँ उससे मिलने ओपी पहुंची तो पहले तो मिलने नहीं दिया गया और फिर बाद में घंटों तक थाने में बिठा कर रखा गया. इस बारे में जब ओपी प्रभारी शशिप्रभा मणि से मीडिया ने बात की तो वो बदतमीजी पर उतर आईं और उल्टे मीडिया को ही भ्रष्ट बताने लगी. विदित हो कि जबसे शशि प्रभा मणि प्रभारी बनकर आई हैं तभी से इन्होंने अपने स्टाफ ललन सिंह के साथ मिलकर शराब के अवैध कारोबारियों को शह दी हुई है. साथ ही उसने लोगों को बेवजह घर से उठा लेने को पैसा बनाने का जरिया बना लिया है. इससे पहले भी वो अपने थाना क्षेत्र से कई लोगों को बेवजह उठा चुकी है और एक-दो दिन तक हवालात में रखने के बाद मनमाफिक रिश्वत लेकर छोड़ चुकी है. मित्रों, जब थाना-प्रभारी की शिकायत पुलिस अधीक्षक, वैशाली से की गई तो उन्होंने मामले से पूरी तरह से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि पीड़ित के परिवार को हमारे कार्यालय में आकर लिखित में आवेदन करना होगा. ऐसे में जब राज्य में लॉकडाउन लगा हुआ है और कोरोना कोहराम मचा रहा है तब मोबाइल और इन्टरनेट के युग में एसपी,वैशाली लाचार विधवा माँ को ३० किलो मीटर दूर हाजीपुर बुला रहे हैं. मित्रों, मुझे काफी दुःख और क्षोभ के साथ कहना पड रहा है कि बिहार के डीजीपी मुख्यमंत्री का भी फोन नहीं उठाते फिर मीडिया का क्यों उठाते? ऐसे में सवाल उठता है कि गरीब-कमजोर पुलिस-पीड़ित करें तो क्या करें? त्वरित न्याय के लिए किसके दरवाजे पर अपना सर फोड़ें? महाराष्ट्र में तो एक सचिन वाजे और अनिल देशमुख था बिहार में तो हजारों सचिन वाजे और अनिल देशमुख हैं. फिर बिहारवासियों को काले अंग्रेजों से बचाएगा कौन? पप्पू यादव तक तो पुलिस के कहर से बच नहीं पाए, आम आदमी की क्या औकात? हमने तो मोदी के कहने पर एक बार फिर से कथित डबल ईंजन की सरकार बनवा दी लेकिन सुशासन-४ जबसे शुरू हुआ है बिहार की जनता पर भ्रष्टाचार और कुशासन की मार डबल हो गई है. बिहार का जैसे गुडलक ही ख़राब हो गया है. ऐसे में हम तो बिहार पर्यटन का निःशुल्क प्रचार करते हुए दुनियाभर के लोगों को यह कहकर बिहार में आमंत्रित करना चाहेंगे कि अगर आप अंग्रेजी शासन को आज भी प्रत्यक्ष देखना चाहते हैं तो एक बार जरूर बिहार पधारें और अगर आप अंग्रेजों के ज़माने की पुलिस पर शोध कर रहे हैं या डॉक्यूमेंट्री बनाना चाहते हैं तो आपको बिहार के वैशाली जिले के देसरी थाने के चांदपुरा ओपी के खोरमपुर और भिखनपुरा, कुबतपुर के ग्रामीणों व चांदपुरा ओपी प्रभारी से जरूर मिलना चाहिए.

शनिवार, 22 मई 2021

जाओ रे मोदी तुम जाओ रे

मित्रों, मोदी सरकार को सत्ता में आए ७ साल हो चुके हैं. ऐसे में पर्याप्त समय बीत चुका है जब सरकार के कामकाज का मूल्यांकन किया जा सके. दुर्भाग्यवश मेरे जैसे कट्टर मोदी समर्थक को भी कहना पड़ रहा है कि मोदी सरकार में सरकार और भारतीय जनता पार्टी का तंत्र सिर्फ चुनाव के लिए काम कर रहा है। सरकार तो जैसे मिस्टर इंडिया हो गई है। रामभक्तों की सरकार में सबकुछ रामभरोसे छोड़ दिया गया है। मित्रों, इस समय सरकार के समक्ष चुनौतियों के तीन मोर्चे खुले हुए हैं और तीनों पर यह सरकार विफल है। पहला मोर्चा है कोरोना का पूर्वानुमान लगाकर उससे निबटने की तैयारी करना. दूसरा मोर्चा अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाना है और तीसरा मोर्चा है सीमा पर चीन को मुंहतोड़ जवाब देना. कोरोना के खिलाफ पूर्वानुमान और तदनुसार तैयारी करने के मामले में तो हालत ऐसी रही कि एक तरफ कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे थे वहीँ दूसरी तरफ प्रधानमंत्री जी और उनका पूरा दल-बल बेफिक्र होकर पूरे जोरशोर से बंगाल में चुनाव प्रचार कर रहा था. प्रधानमंत्री अपनी रैलियों में उमडनेवाली भीड़ को देखकर फूले नहीं समा रहे थे. जबतक प्रधानमंत्री की समझ में स्थिति की भयावहता आती तब तक काफी देर हो चुकी थी. जहाँ तक अर्थव्यवस्था का प्रश्न है तो निर्मला जी के वित्त मंत्री रहते उसी तरह इसमें सुधार की कोई सम्भावना ही नहीं है जैसे किसी फुटबॉल मैच को बेकार गोलकीपर के होते नहीं जीता जा सकता है. रही बात चीन से निबटने की तो चीन भूटान में गाँव पर गाँव बसाता जा रहा है और केंद्र सरकार सिर्फ यह कहने के अलावा और कुछ नहीं कर पा रही है कि कोई घुसपैठ नहीं हुई है. केंद्र सरकार का यही रवैया चीन के लद्दाख में घुसपैठ को लेकर भी है. अन्य मोर्चों जैसे आईपीसी को बदलना, न्यायिक प्रक्रिया और भारतीय प्रशासनिक सेवा में सुधार करना, जनसँख्या नियंत्रण कानून बनाना, समान नागरिक संहिता लागू करवाना आदि की दिशा में तो केंद्र सरकार पूरी तरह से विफल है ही. मित्रों, फिर आप कहेंगे कि मोदी तो १८ घंटे काम करते हैं. काम तो करते हैं. बस मीटिंग आयोजित करने का काम करते हैं. मीटिंग पर मीटिंग, मीटिंग पर मीटिंग। होना जाना कुछ भी नहीं। इस सरकार में किसी की कोई जवाबदेही नहीं है। बस एक अव्वल दर्जे का अभिनेता एकतरफा भाषणबाजी किए जा रहा है। कभी-कभी रोने भी लगता है बिना ग्लिसरीन लगाए. कोरोना से पूरे देश में और मुसलमानों के हाथों बंगाल में जिनके परिजन मर रहे हैं वे जानें। सरकार तो बस एक ही काम कर रही है आंकड़े छिपाने का काम। पागलों की तरह देश चलाया जा रहा है। यहां तक कि बंगाल का राज्यपाल सड़कों पर रो रहा है। यह कैसी बेबसी है और काहे की बेबसी है? नेताओं वाली या अभिनेताओं वाली? मोदी भी बापू की तरह देश के लिए हानिकारक बनते जा रहे हैं। वो एक ऐसी गाय बन गये हैं जो बस खूंटे पर मौजूद है. दूध नहीं देती, बच्चे भी नहीं देती सिर्फ गोबर देती है। मित्रों, देश में ऐसा पहली बार ऐसा हुआ है कि विधायकों को केंद्रीय सुरक्षा देनी पड़ी है। अमित शाह जी ने खाना खाया निकल लिए अब उन झोपड़ी वालों को शांतिप्रिय मजहब वालों से बचाएगा कौन? राज्यपाल के काफिले पर हमला हो गया। ममता राजधर्म नहीं निभा रही है तो कम से कम मोदी को तो निभाना चाहिए। और अगर नहीं निभा सकते तो अपना झोला उठाएं और निकल लें। दूसरे को आने दें। भाजपा में योग्य नेताओं की कोई कमी नहीं है. मोदी जी देश को और देश के समय को बर्बाद मत कीजिए। मोदी जी आपको याद होगा कि आप किन परिस्थितियों में गुजरात के मुख्यमंत्री बनाए गए थे? गुजरात भूकंप से तबाह हो गया था और केशुभाई राहत और पुनर्निर्माण का काम ठीक से नहीं चला पा रहे थे. आज देश कोरोना से तबाह हो चुका है और आप पूरी तरह से विफल साबित हो चुके हैं.

गुरुवार, 13 मई 2021

गंगा में तैरती मानवता की लाश

मित्रों, इन दिनों भारत में कोरोना संकट पूरे उफान पर है. तंत्र पूरी तरह फेल है. कदाचित इतनी बुरी स्थिति १८९६ के पूना प्लेग के समय भी नहीं हुई थी जबकि तब देश गुलाम था. जिसे देखो लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर पैसा बनाने में लगा हुआ है. अस्पताल वाले, ऑक्सीजन वाले, एम्बुलेंस वाले, पोस्टमार्टम करने वाले और शवदाह करने वाले. बीमारी से ग्रस्त होने से लेकर अंतिम संस्कार होने तक हर कोई लोगों की मजबूरी का फायदा उठाने में तल्लीन है. मानों वे इन पैसों का उपभोग करने के लिए हमेशा दुनिया में बैठे रहेंगे. मित्रों, इन दिनों मुझे अपने मानव होने पर शर्म आने लगी है. हमसे अच्छे तो जानवर हैं. अरस्तु ने कभी कहा था कि मानव एक सामाजिक प्राणी है. लेकिन कोरोना ने मानवों की परिभाषा ही बदल दी है. वास्तव में मानव एक असामाजिक प्राणी है. कैसा समाज और कैसी सामाजिकता? जो न्यायाधीश दूसरों को गलत काम करने पर दंड देता है जब उसका पिता मर गया तो वो पिता के अंतिम दर्शन तक करने नहीं आया. बहुत स्थानों पर बेटे-बेटी अपने उन माता-पिता का अंतिम संस्कार करने तक नहीं आ रहे जिन्होंने उनको हजार दुःख-परेशानियाँ उठाकर पाला है. इतना ही नहीं जिन चिकित्सकों को हम भगवान मानते आ रहे हैं कोरोना ने उनकी कलई भी खोल दी है. कोई भगवान-उगवान नहीं है. सबके-सब रोबोट हैं. संवेदनहीन पैसा कमाने की मशीन. मित्रों, कवि केदारनाथ सिंह ने कहा था कि मेरी पूँजी क्या है? मुट्ठीभर साँस. कदाचित उससे भी बड़ी पूँजी हमारे पास थी और वो थी मानवता. यह मानवता और सामाजिकता ही है जिसके बल पर मानव आज कथित विकास के इस चरण तक पहुंचा है. जब हमारे पूर्वजों ने रेंगना छोड़कर खड़ा होना सीखा होगा तब उनके समक्ष कितनी तरह की दुश्वारियां रही होंगी. मक्खी, मच्छर लेकर सांप और बाघ-सिंह जैसे खूंखार जानवर. भोजन से लेकर पेयजल और शयन की समस्या. जन्म के बाद बच्चों का लालन-पालन करने की समस्या. रोग, अकाल, बाढ़, भूकंप. सबका सामना मानवता ने मिल-जुलकर किया. वरना जमीन पर रेंगनेवाले कीड़ा समान मानव की क्या औकात! पहले जो कुछ था सबका था. फिर अपना-पराया, मेरा-तेरा का भाव आया. मध्यकाल में भारतीय आध्यात्मिकता पर पश्चिमी भौतिकता ने विजय प्राप्त कर ली. ज्ञान का प्रकाश स्तम्भ जो सर्वे भवन्तु सुखिनः की बात करता था की जगह सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट जैसे मत्स्य न्यायवादी सिद्धांत ने ले लिया. आत्मा पर शरीर की जीत हुई. अब बौद्धिक सम्पदा कानून का युग था. प्रकृति के साथ जीवन का स्थान प्रकृति पर विजय ने ले लिया. और अंत में चीन का माओ कंधे पर बन्दूक लिए आया यह कहते हुए कि नैतिक-फैतिकता कुछ नहीं होती राजनैतिक सत्ता सबकुछ होती है. और राजनैतिक सत्ता लोगों के ह्रदय या श्रद्धा-प्रेम से नहीं बन्दूक की नली से निकलती है. माओ ने यह भी कहा कि राजनीति आदर्श नहीं बल्कि रक्तपात रहित युद्ध है और युद्ध रक्तपात युक्त राजनीति। मित्रों, ये तो रही उस अमेरिका की बातें जो मानवता पर छाये सबसे भीषण संकट के समय भी व्यापार और बौद्धिक सम्पदा कानून की बातें कर रहा है. चीन की बातें जिसने जानबूझकर कोरोना वायरस को प्रयोगशाला में निर्मित कर हथियार की तरह हवा में छोड़कर एक प्रकार का विश्वयुद्ध छेड़ दिया है. लेकिन इस समय भारत में जो रहा है वह घनघोर कष्टकारी है. हमारी भारतीयता क्या है? अपने परिजनों को जीवित या मृत अवस्था में उनके हाल पर छोड़ देना तो भारतीयता नहीं है? लोगों की मदद करने के बदले उनकी मजबूरी का फायदा उठाना तो कतई भारतीयता नहीं है. प्राणी मात्र को सिया राममय मानने वाला भारत भला कैसे पैसे को भगवान मान सकता है? पिछले कुछ दिनों में जो दो सौ से भी अधिक लोगों की लाशें गंगा में बहती हुई मिली हैं वास्तव में वो मानवों की लाशें नहीं हैं बल्कि मानवता की लाश है, भारतीयता की लाश है. बिना भारतीयता के भारत भी लाश है. करने को हम भी सिर्फ तंत्र और सरकार को दोषी ठहरा कर अपना पल्ला झाड़ सकते हैं लेकिन क्या उस भारतीयता की मौत के लिए सिर्फ सरकार जिम्मेदार है जिसके पीछे कभी पूरी दुनिया दीवानी थी और जिसका अर्क पीने के लिए फाहियान , ह्वेनसांग और इत्सिंग ख़ाक छानते फिर रहे थे, जिस भारतीयता का अध्ययन करने के लिए तक्षशिला, विक्रमशिला और नालंदा में दुनियाभर के ज्ञान-पिपासुओं का जमघट लगता था? यद्यपि सत्य तो यह भी है कि हमारा लोकतंत्र कोरोना आपदा का बोझ उठा सकने में पूरी तरह से विफल साबित हुआ है और हो रहा है.

मंगलवार, 4 मई 2021

खून से लथपथ बंगाल, दोषी कौन

मित्रों, बंगाल में चुनाव संपन्न हो चुका है और भयंकर रक्तपात शुरू हो चुका है. जैसा कि ममता बनर्जी ने चुनाव प्रचार के दौरान ही विरोधियों को हिंसा के लिए तैयार रहने की चेतावनी दे दी थी. लगता है जैसे बंगाल बंगाल नहीं १७८९ का फ़्रांस, १९१७ का रूस या १९४९ का चीन या १९८९ का अफगानिस्तान या १९७१ या १९९२ का बांग्लादेश बन गया है. जिन लोगों ने ममता बनर्जी को मत नहीं दिया था उनको खोज-खोज कर मारा जा रहा है, उनकी महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया जा रहा, दुकानें और संपत्तियां लूटी जा रही हैं, आग लगाई जा रही है. और यह सब घटित हो रहा है सत्ता के संरक्षण में. मित्रों, सवाल उठता है कि ऐसे में उनलोगों का क्या होगा जिन्होंने खुलकर ममता बनर्जी का विरोध किया था. चुनाव आयोग की ड्यूटी तो समाप्त हो चुकी है. भारत के संविधान के अनुच्छेद ३५६ के अनुसार अगर किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो चुका है तो यह केंद्र सरकार का अधिकार और दायित्व दोनों है कि वो वहां का शासन अपने हाथों में ले ले. लेकिन हमने देखा है कि जबसे मोदी सरकार केंद्र में आई है उसने बंगाल, केरल और राजस्थान आदि राज्यों में अपनी की पार्टी के कार्यकर्ताओं की हत्याओं पर आखें बंद कर रखी हैं. इनमें भी बंगाल की हालत कई सालों से सबसे ख़राब है. मित्रों, कोई ऐसी पार्टी का समर्थन क्यों करे जो केंद्र में सत्ता में होते हुए भी चुनाव सम्पन्न होते ही अपने कार्यकर्ताओं को उनके हाल पर मरने के लिए छोड दे? यह तो स्वार्थ की पराकाष्ठा है. बिहार में एक कहावत है चढ़ जा बेटा सूली पर राम तेरा भला करेगा. ठीक यही रवैया मोदी का है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब ममता पहली बार मुख्यमंत्री बनी थी तब मुसलमानों ने उसे वोट नहीं दिया था लेकिन उसने मुस्लिम तुष्टिकरण की अति करके उनको अपने पक्ष में कर लिया. कमोबेश भाजपा भी इन्द्रेश कुमार आदि के माध्यम से यह प्रयास लगातार कर रही है जबकि भाजपा के लिए मुस्लिम वोट एक मृगमरीचिका थी, है और हमेशा रहेगी. मित्रों, भाजपा को सबसे पहले बंगाल में उसके कार्यकर्ताओं के साथ जो खून की होली खेल जा रही है उसको रोकना चाहिए वो भी किसी भी कीमत पर. अन्यथा कोई भी व्यक्ति भाजपा का कार्यकर्ता नहीं बनेगा. फिर भाजपा को समान नागरिक संहिता और जनसँख्या नियंत्रण कानून को लागू करना चाहिए. अन्यथा जिस तरह आज बंगाल जल रहा है कल पूरा भारत जलेगा. देश और सनातन धर्म की रक्षा गाँधी बनकर नहीं बल्कि प्रताप और शिवाजी बनकर ही की जा सकती है. इतिहास मोदी को दोबारा मौका नहीं देगा क्योंकि वो किसी को दोबारा मौका नहीं देता है. जो लोग बंगाल में ताल ठोककर नरसंहार कर रहे हैं वो तो इसके लिए दोषी हैं ही लेकिन उससे कहीं ज्यादा मोदी और भाजपा दोषी है जो लोगों को अग्रिम मोर्चे पर धकेल कर बार-बार मैदान छोड़कर भाग जाती है. मित्रों, हम उम्मीद करते हैं कि भाजपा का सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास वाला नशा भी उतर गया होगा. नहीं उतरा है तो अच्छा होगा कि जल्द उतर जाए अन्यथा देश की बहुसंख्यक जनता उसको कुर्सी से उतार देगी भले उसका परिणाम कितना भी भयानक क्यों न हो. वैसे भी जब भाजपा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हिन्दुओं की रक्षा नहीं कर सकती और नहीं कर सकी तो उसे बार-बार केंद्र की सत्ता सौंपने के क्या लाभ? बंगाल तो फिर भी दूर की बात है. मित्रों, अंत में मैं हिन्दुओं का आह्वान करूंगा कि भगवान बुद्ध ने कहा था अप्पो दीपो भव मैं कहता हूँ अप्पो विराथू भव, प्रताप भव, शिवाजी भव, गोविन्द सिंह भव. अप्पो रक्षक भव. अन्यथा जिस हिंदुत्व को राजाओं ने सदियों तक बचाए रखा कुछेक सालों का लोकतंत्र उसे खा जाएगा.

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

आईसीयू में भारत, भाषण झाड़ते पीएम

ममित्रों, इन दिनों कोविद 19 के कारण देश के हालात काफी खराब हैं। जांच में हर तीसरा व्यक्ति कोरोना पॉजीटिव मिल रहा है। संक्रमितों की मृत्यु दर पिछले साल के मुकाबले तीन गुनी है। आज शनिवार को मिली जानकारी के मुताबिक, देश में पिछले 24 घंटे में 2 624 मौतें हो गईं हैं और 3.46 लाख से ज्‍यादा संक्रमण के नए केस आए हैं. भारत में अब तक मौतों का कुल आंकड़ा 1,89,544 हो गया है और सक्रिय मामलों की कुल संख्या 25 लाख 52 हजार के पार हो गए हैं. उधर कनाडा ने भारत से जानेवाली सभी उड़ानों पर अगले ३० दिनों के लिए रोक लगा दी है. ब्रिटेन ने पहले ही भारत को ‘रेड-लिस्ट’ में जोड़ लिया था, जहां से कोविड -19 मामलों की अधिक संख्या के कारण अधिकांश यात्रा पर प्रतिबंध है. इसके अलावा, फ्रांस ब्राजील, चिली, अर्जेंटीना, दक्षिण अफ्रीका और भारत के यात्रियों के लिए 10-दिन के लिए क्वारंटीन कर रहा है, जबकि संयुक्त अरब अमीरात ने भारत से सभी उड़ानों को रद्द कर दिया है. मित्रों, देश में कोविद की ऐसी भयावह स्थिति तब है जबकि महामारी अभी अपने शबाब पर पहुँची भी नहीं है. इस बीच अमेरिकी के एक विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा किया गया है. इस अध्ययन में दावा किया गया है यही हालत रही तो मध्य मई तक भारत में कोविद से होनेवाली मौतों का आंकड़ा रोजाना ५६०० तक पहुँच जाएगा. मित्रों, इस समय देश में ऑक्सीजन की भारी किल्लत हो गई है. विद्युत् शवदाहगृहों में इतनी ज्यादा संख्या में लाशें पहुँच रही हैं कि उनकी भट्ठियां पिघलने लगीं हैं. सर गंगाराम अस्पताल जैसे राष्ट्रीय राजधानी के प्रतिष्ठित अस्पताल में कल ३० से ज्यादा कोरोना मरीजों की मौत हो गई. स्थिति इतनी ख़राब है कि दिल्ली के सक्षम लोग तीन गुना ज्यादा किराया देकर दुबई भागने लगे हैं जबकि पिछले साल दुबई से लोग भारत आ रहे थे. कई सारे विधायक-अधिकारी भी कोरोना का शिकार हो चुके हैं. कम-से-कम कोरोना बीमारों में कोई भेद-भाव नहीं कर रहा वरना भारत में कानून तो अंग्रेजों के ज़माने से ही अमीरों की रखैल है. मित्रों, आप कहेंगे कि पिछले एक साल से सरकारें इस मामले में क्या कर रही थीं. ऑक्सीजन प्लांट बैठाना कोई राकेट साइंस तो है नहीं. तो जवाब है कि पिछले साल केंद्र सरकार ने ऑक्सीजन प्लांट खोलने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को दी थीं और राज्य सरकारों ने उस पर ध्यान तक नहीं दिया. राज्य सरकारों को पैसे भी दे दिए गए थे। बांकी राज्य सरकारों ने उनका किधर दुरूपयोग किया पता नहीं लेकिन केजरीवाल ने पूरा पैसा टीवी पर थोबड़ा दिखाने में लगा दिया। फिर केंद्र सरकार की जिम्मेदारी थी कि वो राज्य सरकारों को तकादा करके काम पूरा करवाए लेकिन केंद्र ने ऐसा नहीं किया. अब जबकि कोरोना दोबारा कहीं ज्यादा भीषणता के साथ कोहराम मचा रहा है तो अफरातफरी मची हुई है लेकिन भोज शुरू होने के बाद कद्दू रोपने से कब कोई लाभ हुआ है जो अब होगा. मित्रों, इतना ही नहीं जब कोरोना की दूसरी लहर ने कहर ढाना शुरू कर दिया था तब भारत के माननीय प्रधानसेवक जी बंगाल में बड़ी-बड़ी रैलियां कर रहे थे जो कि अपने आपमें खुद एक अपराध था. अब प्रधान सेवक जी ने बेमन से रैलियों में जाना बंद कर दिया है लेकिन रैलियों को बंद नहीं किया है बल्कि अब डिजिटली रैलियों को संबोधित कर रहे हैं. मतलब अब भी रैलियों में लोगों को ईकट्ठा किया जा रहा है जबकि कोरोना से देश की हालत ख़राब हो चुकी है. मतलब कि प्रधानमंत्री जी को सिर्फ कुर्सी से मतलब है जनता के स्वास्थ्य से उनको कुछ भी लेना-देना नहीं है. मित्रों, आप कहेंगे कि प्रधानमंत्री जी लगातार मीटिंग तो कर ही रहे हैं और क्या करें? मीटिंग हो, होनी भी चाहिए लेकिन उसका परिणाम भी तो धरातल पर दिखे. हमने मोदी सरकार के गठन के मात्र २ महीने के बाद अपने गवर्नेंट विथ डिफरेंस कहाँ तक डिफरेंट? शीर्षक आलेख में कहा था कि मोदी जी हमें आपकी कोशिश नहीं परिणाम चाहिए. हमने उस आलेख में एक बन्दर के जंगल का राजा बन जाने की कहानी भी लिखी थी जिसमें बन्दर एक डाल से दूसरे डाल पर कूद-कूद कर जानवरों से अपना व्यवहार सुधारने की अपील करता फिरता है. बाद में जब जानवर क्षुब्ध हो जाते हैं तब कहता है कि मेरी कोशिश में तो कमी नहीं थी. मित्रों, जाहिर है कि मित्रों वाले प्रधानमंत्री जी हर मोर्चे पर विफल साबित हो चुके हैं. उनसे न चीन संभल रहा है, न चीनी बीमारी संभल रही है. अमेरिका जो प्रधानमंत्री का सबसे नजदीकी मित्र है इस संकट में टीका बनाने के लिए कच्चा माल तक नहीं दे रहा. कोरोना की जो हालत है उसमें पता नहीं मेरा कौन-सा आलेख मेरा अंतिम आलेख हो जाए. अंत में यही कहूँगा कि चाय-पकौडेवाले को टिप्स तो दी जा सकती है लेकिन उनके हाथों में देश नहीं दिया जा सकता.