शुक्रवार, 10 जून 2022

इस्लाम की अंतर्राष्ट्रीय फजीहत

मित्रों, हमारे गाँव एक व्यक्ति को बड़ा तगड़ा बवासीर था। डॉक्टर के पास दिखाने लेकर गया तो डॉक्टर ने बता दिया की तुम्हें बवासीर ही है। अब वो डॉक्टर को सब जगह घूम घूमकर गाली दे रहा है और कह रहा है की हाँ, ये बात सच है की मुझे बवासीर है, पर डॉक्टर की हिम्मत कैसे हुई मुझे यह बात बताने की?? अब जो बात डॉक्टर और उस व्यक्ति के बीच थी, सारे समाज के सामने है। मित्रों, कुछ इस तरह की हालत इन दिनों दुनिया के सामने इस्लाम की है. भाजपा प्रवक्ता नुपुर शर्मा ने कथित पैगम्बर हजरत मोहम्मद के बारे में एक कटु सत्य क्या बोल दिया पूरी दुनिया के मुसलमान उछलने लगे कि वो इस तथ्य को कैसे बोल सकती है? कोई यह नहीं कह रहा कि नुपूर शर्मा ने जो कहा वो झूठ है सब यही कह रहे हैं कि उसने ऐसा कैसे कहा? उसकी हिम्मत कैसे हुई? कोई कह भी नहीं सकता क्योंकि यही सच है. मित्रों, जबसे इस्लाम की उत्पत्ति हुई है इस्लाम को मानने वाले मोहम्मद के कुकृत्यों के बारे में कुछ भी सुनना नहीं चाहते जबकि मोहम्मद ने जो कुछ किया सोंच-समझकर किया. उसने जो कुछ किया, जो कुछ नियम बनाए अपने व्यक्तिगत सुख के लिए बनाए और उसे अल्लाह के नाम पर थोप दिया कि यह उसका नहीं अल्लाह का नियम है. मुसलमान एक बार में ४ शादियाँ कर सकते है लेकिन उसने ९ किए. लूट के माल में अपना हिस्सा निर्धारित कर अपने ऐशो आराम को सुनिश्चित कर लिया. साथ ही बोल दिया कि उसका विरोध अल्लाह का विरोध है इसलिए कोई विरोध नहीं करेगा, चाहे वो अपनी पुत्रवधू से विवाह करे या ६ साल की आयशा से जिसे विवाह का मतलब भी पता नहीं था. मित्रों, मैं इस्लाम पर पहले ही एक आलेख राक्षस धर्म और संस्कृति लिखकर अर्ज कर चुका हूँ कि यह भलेमानसों का धर्म है ही नहीं लुटेरों का धर्म है जो हिंसा और सेक्स के अलावा कुछ भी नहीं जानते. इनके धर्मग्रन्थ इन्हीं बातों से भरे पड़े हैं. वक्त फिल्म में राजकुमार साहब का एक प्रसिद्ध डायलग था कि जिनके घर शीशे के हों वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते लेकिन ये लोग तो हर शुक्रवार को हाथों में पत्थर लेकर ही नमाज पढने जाते हैं. जाने इनका अल्लाह कैसा है जो इनको ये सब सिखाता है? मित्रों, उस पर गजब यह कि वे हम हिन्दुओं पर हँसते हैं. अरे मूर्खों हम तो सबमें भगवान को देखते हैं. सबको भगवान का प्रतीक मानते हैं. हम तो मानते हैं कि दुनिया में जितने नाम हैं सब भगवान के नाम हैं क्योंकि सबमें भगवान हैं. जिस तरह हमें हमारी तस्वीर से पहचाना जा सकता है लेकिन हम तस्वीर नहीं होते ठीक उसी तरह भगवान की मूर्तियाँ भगवान का प्रतीक मात्र हैं वो भगवान नहीं हैं. अब अगर किसी को इतनी-सी बात समझ में नहीं आ रही तो इसमें हमारी क्या गलती है? अब अगर कोई सूरज को ऊर्जा का स्रोत न माने और हमेशा उसकी तरह घूम कर पेशाब करे तो उससे सूरज का कभी कुछ बिगड़ेगा क्या? ऐसा कोई कुकर्म नहीं जो इस्लाम में हलाल न हो. कोई धर्म क्या ऐसा होता है? मोहम्मद कहते थे हम तो मद्रास की तरफ ही जाएंगे फिर भी दिल्ली पहुंचेंगे और आज दुनियाभर के मुसलमान भी ऐसा ही कह रहे. हम कहते हैं आत्मवत सर्वभूतेषु, अतिथि देवो भव और वो कहते हैं तुम भी मुसलमान हो जाओ नहीं तो मैं तुम्हारा सिर काट दूंगा, तुम्हारे मंदिर तोड़ दूंगा, तुम्हारी बहु-बेटियों के साथ सामूहिक बलात्कार करूंगा, तुम्हारे धन-दौलत छीन लूँगा. हम कहते हैं मुंडे मुंडे मति भिन्नाः, तुम कहते हो सिर्फ तुम सही हो बांकी सारे न केवल गलत हैं बल्कि तुम उनको मिटा डालोगे. हम कहते हैं हम तुम्हें सुख पहुंचाएंगे तो हमारा भगवान खुश होगा तुम कहते हो तुम हमें जितना तडपाओगे तुम्हारा अल्लाह उतना ही खुश होता. हम कहते हैं हमारा भगवान हममें है तुम कहते हो तुम्हारा अल्लाह तुममें नहीं है बल्कि वो तुमसे अलग है और तुम्हारा मालिक है. वो तुम्हें आदेश देता है और तू गुलामों की तरह उसका पालन करता है. मित्रों, कुल मिलाकर नुपूर शर्मा प्रकरण ने न केवल हजरत मोहम्मद के कुकृत्यों को दुनिया के समक्ष उजागर कर दिया है बल्कि उन अनपढ़ मुसलमानों के सामने भी उनके चरित्र को नंगा कर दिया है जिनको अबतक यह बताया जाता था कि मोहम्मद अत्यंत महान दयालु, त्यागी और उदार थे. इस मामले में अगर किसी से गलती हुई है तो डरपोक भारत सरकार से हुई है जिसने जल्दीबाजी में यह देखे बिना नुपूर शर्मा को असामाजिक बता दिया कि उसने किन परिस्थितियों में हजरत मोहम्मद की करनी पर बोला. साथ ही भाजपा ने भी उससे पल्ला झाड़कर यह बता दिया कि वो हिन्दुओं के लिए नहीं बल्कि सिर्फ सत्ता के लिए राजनीति करती है. उसे समझना चाहिए कि कोई हिन्दू धर्म को दिन-रात गालियाँ देगा तो आखिर कब तक हिन्दू बिना जवाब दिए रह सकेगा? सबसे दुखद बात तो यह है कि भारत के मुसलमान भारत को छोड़कर अरब देशों की जय-जयकार कर रहे हैं.

गुरुवार, 2 जून 2022

नीतीश, तेजस्वी और प्रशांत किशोर

मित्रों, अरस्तू ने कहा था कि लोकतंत्र मूर्खो का शासन है और ठीक कहा था. वर्तमान बिहार और भारत के सन्दर्भ में अगर हम देखें तो. जैसा कि हम सब जानते हैं कि हमारे देश में कलक्टर, डॉक्टर, पुलिस अधीक्षक, न्यायाधीश, सेनाध्यक्ष, वैज्ञानिक परीक्षा के बाद ही चुने जाते हैं. यानि देश का हर कर्मचारी कोई न कोई परीक्षा पास करने के बाद ही अपना पद पा सकता है. मगर देश की बागडोर अनपढ़ों के हाथ में क्यों? गांव वार्ड सदस्य, सरपंच, प्रधान, विधायक, नगर पालिका का पार्षद, नगर पालिका का अध्यक्ष, नगर निगम का मेयर, संसद के सदस्य, लोकसभा के सदस्य, यहां तक कि मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का भी यही हाल है. आखिर इनकी परीक्षा क्यों नहीं ली जाती? क्या इस देश का रक्षा मंत्री सेना में था? देश का स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर क्यों नहीं? देश का शिक्षा मंत्री अध्यापक क्यों नहीं? वक्त है अपनी आंखों से परदा हटाने का. मित्रों, इसी तरह प्रसिद्ध आइरिश लेखक, पत्रकार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने प्रजातंत्र की व्याख्या कुछ इसी तरह से की है- प्रजातंत्र मूर्खों का, मूर्खों के लिए, मूर्खों द्वारा शासन है. आज हमारे देश में जिस तरीके का है शायद इसी बात की कल्पना कर ही प्रजातंत्र को ऐसे पारिभाषित की गयी है. प्रजातंत्र में प्रत्येक व्यक्ति के वोट की कीमत आँकी जाती है और उसके गणना के हिसाब से ही सरकारें बना करती हैं. वोट देने वालों में अधिकांश लोग राजनीति से बिल्कुल अनजान होते हैं, उन्हें पता हीं नहीं होता कि हम कैसी सरकार बना रहे हैं और ना ही वे जानने का प्रयास ही करते हैं. अधिकांश लोगों के जेहन में तत्कालिक घटनाक्रम ही अंकित होता है और उसी आधार पर ही सरकार बनाने के प्रयास किए जाते हैं, मतलब कि इस मामले में जनता की याददाश्त बहुत ही कमजोर होती है. चुनाव के समय जो मुद्दा सबसे ज़्यादा चर्चित होता है, जो जनता के विचार को झकझोरता है उसी मुद्दे को आधार बना कर ही जनता अपने वोट का निर्धारण करती है. जनभावनाओं के ज्वार पर बनने वाली सरकारें भी अच्छी तरह से जानती हैं कि जिस मुद्दे के आधार पर हमारी सरकारें बनी हैं वो मुद्दा कुछ समय बाद ही जनता के दिमाग़ से निकल जाएगा और फिर वे अपनी मनमानी पर उतर आती हैं और जनता बाद में ठगी सी महसूस करती रह जाती है. मित्रों, क्या आप जानते हैं कि अपने देश को कौन लोग चला रहे हैं? अपने देश भारत को मात्र १२५० परिवार चला रहे हैं. ५ साल जब एक पार्टी हमें लूट चुकी होती है तब हम उसको सबक सिखाने के लिए फिर से उसी को जिता देते हैं जिसको हमने ५ साल पहले सत्ता से हटाया था और यह सिलसिला लगातार चलता रहता है. फिर वह दल जो पिछले ५ साल से विपक्ष में होता है और भी दोगुनी गति से देश-प्रदेश को लूटता है क्योंकि उसको पिछले ५ साल की भी भरपाई करनी होती है. मित्रों, कश्मीर की राजतन्त्र में क्या हालत थी और आज क्या हालत है? ऐसा इसलिए है क्योंकि वहां मुसलमान बहुमत में हैं जो सभी गैरमुसलमानों मुसलमान बना देना चाहते हैं या फिर मार डालना चाहते हैं और लोकतंत्र तो बहुमत का शासन है. क्या लोकतंत्र के पास कश्मीर का ईलाज है? लोकतंत्र होने के बावजूद आज श्रीलंका और पाकिस्तान दिवालिया हैं और तानाशाही होने के बावजूद आज चीन दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है. मित्रों, अगर हम आंकड़ों पर नजर डालें तो साल १९६७ तक बिहार भारत के सबसे अग्रणी व सुशासित राज्यों में गिना जाता था लेकिन १९६७ से यानि जबसे बिहार में पिछड़ों की, जिसकी जितनी जनसंख्या में भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी की राजनीति करने वाले दलों का शासन हुआ बिहार पिछड़ता चला गया और पिछले २५-३० सालों से बिहार सबसे निचले पायदान पर शान से विराजमान है. मित्रों, यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे नेता बड़ी चालाकी से गाल पर पड़े थप्पड़ को भी ट्राफी में बदल देते हैं. सोनू और स्वयं मेरे द्वारा समय-समय पर बिहार की दुरावस्था को लेकर उठाए गए प्रश्नों का जब नीतीश कुमार जी के पास कोई उत्तर नहीं था तब उन्होंने विकास को लात मारकर जाति-पाति की गन्दी राजनीति शुरू कर दी. आज बिहार में सीओ डीएम और एडीएम का और अदना-सा राजस्व कर्मचारी सीओ का पैसे के बल पर तबादला करवा देता है, पैसा नहीं देने पर सीओ आँख मूंदकर दाखिल ख़ारिज के आवेदन को रद्द कर देता है, स्कूलों में पढाई नहीं होती, कॉलेज में शिक्षक ही नहीं हैं, अस्पतालों में सरकार-प्रदत्त मशीनें रखे-रखे ख़राब हो रही हैं, बैंक बिना घूस लिए लोन नहीं देते, मनरेगा सबसे भ्रष्ट योजना बन गयी है, पुलिस परित्राणाय डाकुनाम विनाशाय च साधुनाम हो गई हैं लेकिन इससे नीतीश जी को कोई फर्क नहीं पड़ता उनको बस जातीय जनगणना चाहिए. नीतीश जी हज़ार बार दिल्ली गए लेकिन मोदी जी के सामने कभी विशेष राज्य के दर्जे का मुद्दा नहीं उठाया. उनको तो बस जातीय जनगणना चाहिए फिर चाहे बिहार सारे मानदंडों पर सबसे नीचे बना रहे तो बना रहे. मैं पूछता हूँ कि जातीय जनगणना से सबसे ज्यादा फायदा किसको होगा? निश्चित रूप से सबसे ज्यादा फायदा मुसलमानों को होगा क्योंकि उनके लिए बच्चे अल्लाह की देन हैं. और जिन लोगों ने राष्ट्रहित में हम दो हमारे दो के सरकारी नारे पर अमल किया वो निश्चित रूप से सबसे ज्यादा घाटे में रहेंगे क्योंकि आज नहीं तो कल जातीय जनगणना के आधार पर आरक्षण देने की मांग जरूर उठेगी. मित्रों, फिर ऐसा कौन-सा उपाय है जिससे बिहार को फिर से देश का अग्रणी राज्य बनाया जा सके? मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि नीतीश जी को हटाकर तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाना कोई समाधान नहीं है क्योंकि दोनों में मौलिक रूप से कोई अंतर नहीं है. बिहार की जनता दोनों को देख चुकी है. दोनों की रुचि सिर्फ सत्ता प्राप्ति में है. एक नागनाथ है तो दूसरा सांपनाथ. इसलिए अगर हमें बिहार को फिर से देश का अग्रणी राज्य बनाना है तो किसी ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपनी होगी जो सिर्फ जातीय हित की बात न करके प्रदेश-हित की बात करता हो. जिसके पास दिन-प्रतिदिन की योजना हो. यह हमारा सौभाग्य है कि प्रशांत किशोर जिनमें ये सारे गुण हैं ने बिहार को बदलने की ठानी है. अगर हमें बिहार को बदलना है तो जाति-धर्म से ऊपर उठकर उनका समर्थन करना होगा अन्यथा बारी-बारी से जदयू और राजद हमें लूटती रहेंगी और हम पर भ्रष्टाचार की मार लगातार बढती जाएगी. पहले भले ही बिहारियों के सामने विकल्पहीनता की स्थिति थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. नीतीश और तेजस्वी से कहीं ज्यादा तेजस्वी और विश्वसनीय विकल्प हमारा दरवाजा खटखटा रहा है.

सोमवार, 23 मई 2022

रंजीत, सोनू और नीतीश

मित्रों, इन दिनों बिहार में मौसम बहारों जैसा भले ही हो नीतीश कुमार जी के लिए बिहार का राजनैतिक मौसम बिलकुल भी मुफीद नहीं है. एक तरफ भाजपा आरसीपी को आगे करके उनको हटाना चाहती है वहीँ दूसरी तरफ मनमोहन सिंह की तरह रेनकोट पहनकर स्नान करनेवाले नीतीश कुमार के दामन पर लगातार दाग-पर-दाग लगते जा रहे हैं. ऐसा नहीं है कि बिहार लोक सेवा आयोग में पहले गड़बड़ी नहीं होती थी. हम तो सुनते आ रहे हैं कि ५० साल पहले भी रिश्वत देने पर रैंक में सुधार कर दिया जाता था. बीपीएससी में भ्रष्टाचार था लेकिन बहुत कम. बहुत सारे युवा जो निहायत गरीब होते थे वो लालू राज में भी पास हो जाते थे लेकिन जबसे नीतीश जी मुख्यमंत्री बने हैं ऐसा होना बंद-सा हो गया है. लोग बताते हैं कि अब पूरी-की-पूरी सीट पहले ही बेच दी जाती है. आश्चर्य तो इस बात का है कि हर साल होनेवाले करोड़ों रूपये के लेनदेन के बारे में न तो ईडी और न ही सीबीआई आज तक कुछ भी पता लगा पाई है. यहाँ तक कि नीतीश जी के एक स्वजातीय नेताजी जिनसे आजकल नीतीश जी का ३६ का आंकड़ा है का नाम भाई लोगों ने वसूली भाई रख दिया था. मित्रों, इसी क्रम में नीतीश जी के एक और घनघोर नजदीकी है जिनका नाम है रंजीत कुमार सिंह, आईएएस. रंजीत वैशाली जिले की देसरी थाने के फटिकवारा गाँव के हैं. ये गुजरात कैडर के आईएएस हैं लेकिन लगातार बिहार में प्रतिनियुक्ति पर बने हुए हैं. आईएएस बनने के कुछ सालों के भीतर ही हाजीपुर के औद्योगिक क्षेत्र में जमीन के बड़े-बड़े प्लाट की इन्हें खरीदने के लिए तलाश थी. पता नहीं कितनी जमीन खरीदी जब आर्थिक अपराध ईकाई नहीं जाने तो हम कैसे जानें. लेकिन सच तो यह है कि ऊपर-ऊपर महात्मा गाँधी बननेवाले रंजीत जहाँ कहीं भी, जिस विभाग में रहे वहां जमकर गड़बड़ियाँ हुई. फलस्वरूप उनका विभाग लगातार बदलता रहा. अभी कुछ महीने पहले ही जब प्राथमिक शिक्षकों की काउंसिलिंग का भार उनके माथे पर था तब गड़बड़ियों के कारण कई जिलों में पूरी काउंसिलिंग को रद्द करना पड़ा. फिर भी उनको दण्डित करने के बदले एक बार फिर उनका विभाग बदल दिया गया. मित्रों, उन्हीं नीतीश जी के स्वजातीय रंजीत कुमार सिंह का नाम एक बार फिर से इन दिनों सुर्ख़ियों में है. बीपीएससी के इतिहास में पहली बार परीक्षा से पहले प्रश्न पत्र आउट हो गया है और उसके तार रंजीत कुमार सिंह से भी जुड़े हैं. आउट प्रश्न पत्र अन्य आरोपियों के अलावा रंजीत कुमार सिंह को भी व्हाट्स एप के माध्यम से भेजा गया था. आरोप तो यह भी लग रहा है कि सीतामढ़ी में उन्होंने कुछ प्रतियोगियों से पैसों की वसूली भी की थी. प्रति छात्र १० लाख. लेकिन बिहार पुलिस कह रही है कि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं. ऐसे कई लोग जिनके मोबाइल पर प्रश्न पत्र भेजा गया पुलिस की गिरफ्त में हैं लेकिन रंजीत कुमार सिंह समान सबूत मिलने के बावजूद बिहार सरकार में पंचायत विभाग के निदेशक जैसे महत्वपूर्ण पद पर बने हुए हैं और शायद बने रहकर बिहार की जनता की छाती पर मूंग दलने का काम करते रहेंगे. नीतीश जी के प्रिय जो ठहरे. मित्रों, अभी बीपीएससी के प्रश्न-पत्र के आउट होने और जनता के बीच मामला आउट हो जाने का मामला गरम ही था कि नीतीश जी की मति मारी गई और वो अपने गाँव कल्याण बिगहा में जनता दरबार लगा बैठे. संयोग से वहां उनके पडोसी गाँव नीमाकौल का सोनू यादव भी आया हुआ था. मध्य विद्यालय नीमकौल में पढनेवाले सोनू ने हिम्मत दिखाकर मुख्यमंत्री जी को अपने पास बुलाया और फिर जो कहा उससे न सिर्फ नीतीश कुमार बल्कि पूरी बिहार सरकार सन्नाटे में आ गई. उनसे कहा कि वो निहायत गरीब परिवार से है. उसके पिता दही बेचते हैं और वो ५वीं तक के बच्चों को ट्यूशन पढाता है लेकिन उनके पिता जमकर शराब पीते हैं और अपने साथ-साथ उसकी कमाई भी पी जाते हैं. स्कूल जहाँ वो पढता है वहाँ पढाई नहीं होती. शिक्षक आते नहीं और जो आते हैं उनको कुछ भी नहीं आता. दीपक सर को बिलकुल नहीं आता. सोनू ने नीतीश जी से मीडिया के सामने कहा कि वो आईएएस बनना चाहता है लेकिन उसमें उसके पिता की पियक्कड़ी और सरकारी स्कूल में पढाई नहीं होना बाधा बन रहा है. बमुश्किल २ मिनट में छठी कक्षा में पढनेवाले ११ वर्षीय सोनू ने नीतीश कुमार के सामने उनकी सरकार की पोल खोलकर रख दी, नंगा करके रख दिया. मित्रों, उसके बाद डैमेज कण्ट्रोल शुरू हुआ और सरकार ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे विद्यालय का दौरा भी किया करें. लेकिन सवाल उठता है कि जिन एक लाख सत्तर हजार शिक्षकों की बहाली नीतीश जी ने पंचायतों के माध्यम से करवाई उन अयोग्य शिक्षकों का वो क्या करेंगे? सोनू के स्कूल के दीपक सर जिनका सोनू ने मुख्यमंत्री जी से जिक्र किया था उन दीपक सर का क्या करेंगे जिनको एबीसीडी तक नहीं आती. मित्रों, कुल मिलाकर इन दिनों बिहार सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ की अवस्था में है. राजस्व विभाग में भी लेटलतीफ अंचलाधिकारियों पर मेरे आलेख लिखने के बाद कार्रवाई हुई है लेकिन उन लोगों के खिलाफ कुछ भी नहीं हुआ है जो पैसा नहीं देने पर बेवजह दाखिल ख़ारिज के आवेदन को अस्वीकृत कर देते हैं. होना तो यह चाहिए कि जनता को लूट-लूट कर मोटे हो चुके राजस्व विभाग के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की संपत्ति की समदरका जांच होनी चाहिए और उसके बाद उनको सीधे बर्खास्त किया जाना चाहिए. साथ ही रंजीत कुमार सिंह की संपत्ति की भी न केवल जांच होनी चाहिए बल्कि पद से बर्खास्त कर जेल भेजना चाहिए. साथ ही सारे अयोग्य और ड्यूटी से गायब रहनेवाले शिक्षकों को घर बैठना चाहिए. साथ ही शराबबंदी को लेकर किए जा रहे पाखंड को छोड़कर पूरे मन से कार्रवाई करनी होगी. साथ ही न केवल बिहार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों बल्कि उसमें काम करनेवाले अन्य लोगों की संपत्ति की भी जांच हो और ज्यादा पाए जाने पर उनको भी जेल भेला जाए. मगर ऐसा होगा क्या?

बुधवार, 11 मई 2022

मंत्री जी को शर्म आती है

मित्रों, अभी २ साल भी नहीं हुए जब हम कथित इन्टरनेट आतंकवादियों ने बिहार विधानसभा चुनावों के समय भाजपा को जिताने के लिए अपनी जान लगा दी थी इस आशा में कि इस बार सरकार अच्छा काम करेगी जिससे भ्रष्टाचार घटेगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. मित्रों, आपलोग भी जानते हैं कि बिहार ही नहीं भारत का सबसे भ्रष्ट विभाग राजस्व विभाग है. बिहार में प्रत्येक अंचल में एक अंचलाधिकारी होता है जिसके मातहत कई हल्का कर्मचारी और अंचल निरीक्षक होते हैं. हुआ यह कि मेरी कुछ जमीन वैशाली जिले के महनार अंचल के जगरनाथपुर, हरपुर, भटगामा, गोरिगामा और फटिकवारा में है जिनके दाखिल ख़ारिज के लिए हमने १ जनवरी, 2021 को आवेदन दिया था. इसमें से जगरनाथपुर, हरपुर और भटगामा का दाखिल ख़ारिज जनवरी २०२२ में कर दिया गया. तब अंचलाधिकारी महोदय ने सम्बंधित सभी दस्तावेजों का गहराई से अध्ययन किया था. अभी कल-परसों फटिकवारा का आवेदन (आवेदन संख्या-१७२२, वित्तीय वर्ष-२०२०-२१) उन्होंने इस आधार पर अस्वीकृत कर दिया है कि दस्तावेज अपठनीय है जबकि सारे दस्तावेज वही हैं जो जगरनाथपुर, हरपुर और भटगामा के आवेदन के साथ संलग्न थे. सवाल उठता है कि जो दस्तावेज जनवरी में पठनीय थे अब अपठनीय कैसे हो गए जबकि सीओ साहब वही रमेश प्रसाद सिंह जी हैं? इतना ही नहीं कर्मचारी और सीआई ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि जमीन खतियानी है, जगरानी देवी ने न्यायालय से डिक्री प्राप्त की है और जमीन उनके कब्जे में भी है फिर भी बेवजह आवेदन को मनमाने तरीके से अस्वीकृत कर दिया गया. मित्रों, जब हमने इस बारे में सीओ से बात की तो उन्होंने यह कहकर फोन काट दिया जो होना था हो गया अब डीसीएलआर के यहाँ अपील करिए, हम कुछ नहीं कर सकते. इस वार्तालाप का ऑडियो भी हमारे पास है. क्या यही वो रामराज्य है जिसके लाने का वादा भाजपा करती है? बिहार के राजस्व मंत्री राम सूरत राय भी भाजपा कोटे से हैं इसलिए यहाँ यह बहाना भी नहीं चलनेवाला कि मंत्री जदयू कोटे से है. मंत्री जी कई बात कह चुके हैं और सार्वजानिक रूप से कह चुके हैं कि उनके विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण उनको शर्म आती है लेकिन स्थिति में बदलाव के लिए कुछ करते नहीं. पूरे विभाग में बिना रिश्वत के पत्ता तक नहीं हिलता. पैसे दो तो दस्तावेज खूब पठनीय हो जाता है और नहीं दो पूरी तरह से अपठनीय हो जाता है. सबकुछ अंधाधुंध तरीके से चलाया जा रहा है. किसी की कोई जवाबदेही नहीं. मित्रों, पाँचों ऊँगली घी में और सर कढ़ाई में विभागवाले मंत्री जी को क्या सचमुच में शर्म आती है या वो शर्माने का नाटक कर रहे हैं? वैसे स्वयं मोदी जी भी कोरोना टीका लेते समय स्वीकार कर चुके हैं कि नेताओं की चमड़ी मोटी होती है. अगर मंत्री जी को सचमुच शर्म आती है तो महनार के सीओ की संपत्ति की जाँच करवाते हुए पूछा जाना चाहिए कि कर्मचारी और सीआई की रिपोर्ट सकारात्मक होने के बावजूद जगरानी देवी के फटिकवारा का दाखिल ख़ारिज का आवेदन कैसे अस्वीकृत कर दिया गया? इतना ही नहीं सीओ के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करते हुए उक्त दाखिल ख़ारिज को स्वीकृत किया जाना चाहिए. आखिर हम अपील में जाकर सीओ की मनमानी का खामियाजा भुगतते हुए क्यों हजारों रूपये खर्च करें?

मंगलवार, 3 मई 2022

नेहरु बनते मोदी

मित्रों, यह कार्टून सिर्फ एक कार्टून नहीं है बल्कि हिन्दुओं के देश हिंदुस्तान में हिन्दुओं की स्थिति को बयान करती पूरी किताब है. आजादी के बाद से ही यह हालत है, यही हालत है. आप चाहें तो फोटोशोप कर नेहरु को हटाकर मोदी को लगा सकते हैं, मोहन भागवत या इन्द्रेश कुमार को लगा सकते हैं सच्चाई में कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

रविवार, 24 अप्रैल 2022

कबीरा आप ठगाईए

मित्रों, मुझे पूरा यकीन है कि आप भी संत कबीर के इस दोहे से परिचित होंगे- कबीरा आप ठगाईए और न ठगिए कोय, आप ठगे सुख उपजे और ठगे दुख होय. सो मैंने बचपन में जबसे इस दोहे को पढ़ा इसे अपना जीवन-मंत्र बना लिया. बार-बार मुझे ठगा गया लेकिन मैंने कभी किसी को नहीं ठगा. लेकिन अब तो स्थिति भयावह हो चली है. अब ठगी एक कला बन गई है, योग्यता का पैमाना बन गई है और इस कला को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया है भारत के सॉफ्टवेयर ईंजिनियरों ने. एक वेबसाइट बना लिया और हफ्ते-दो-हफ्ते तक लोगों को लूटने के बाद बंद कर दिया. झारखण्ड का जामतारा इनकी राजधानी है. वैसे तो मुझे अभिमान था कि मेरे साथ अब तक साईबर ठगी नहीं हो पाई है लेकिन पिछले वर्ष वह अभिमान भी खंड-खंड हो गया. मित्रों, वैसे तो मेरा पूरा जीवन धूप में छाँव के ठंडे साए खोजते हुए बीता है लेकिन साल २०२१ में तो जैसे मुझ पर गम के इतने पहाड़ एक साथ टूटे कि रोजाना मुझे रिश्तों के नए-नए रूप देखने को मिले. पिताजी इस नाफानी दुनिया से दूर जा चुके थे कुल ८५ हजार की जमा पूँजी यानी अपने एक महीने के पेंशन के बराबर पैसा छोड़कर. माँ के बक्से से मात्र १९ हजार रूपये निकले. किसी तरह से हमने अपने बल पर पिताजी का श्राद्ध किया लेकिन उसके तत्काल बाद मेरे सामने वही सबसे बड़ा सवाल मुंह बाए खड़ा था कि अब आगे दाल-रोटी कैसे चलेगी. मेरी बेचैनी चरम पर थी. पिताजी के पिछले माह के पेंशन में से तीस हजार रूपये मेरे खाते में थे लेकिन हमारा एक महीने का मकान का किराया ही १० हजार था, फिर खाने-पीने, कपड़े, बच्चे की स्कूल फीस. ऐसा लगता था जैसे किसी भी समय मेरे सर के सौ टुकड़े हो जाएंगे. मित्रों, फिर मैंने सोंचा कि क्यों न टाइम्स जॉब से संपर्क किया जाए सो मैंने टाइम्स जॉब की वेबसाइट पर जाकर नौकरी के लिए आवेदन दिया. अभी चौबीस घंटे भी नहीं बीते थे कि १ फरवरी, २०२१ को मेरे पास 7440268569 नंबर से एक लड़की का फोन आया कि क्या आपने कल टाइम्स जॉब पर नौकरी के लिए आवेदन दिया था? फिर उसने वो सारे विवरण मुझे बताए जो मैंने अपने आवेदन में भरे थे. फिर उसने बताया कि आपके लिए कई सारे ऑफर आए हैं बस आपको हम एक लिंक एसएमएस कर रहे हैं आप उस पर जाकर १०० रूपये का ऑनलाइन पेमेंट कर दीजिए. फिर मुझे इसी नंबर से एक लिंक timejobsservice.com भेजा गया. जब मैंने सौ रूपये का पेमेंट करने के लिए मेरे बैंक आईसीआईसीआई द्वारा भेजा गया ओटीपी डाला तब मेरे खाते से १०० रूपये के बदले १९८५६ रूपये कट गए. सबसे आश्चर्य की बात तो यह थी कि बैंक द्वारा भेजे गए ओटीपी वाले एसएमएस में खाते से कितनी राशि निकलनेवाली है का जिक्र ही नहीं था जबकि सरकारी बैंकों से आनेवाले इस तरह के एसएमएस में राशि का भी जिक्र होता है. जैसे ही आईसीआईसीआई बैंक से १९८५६ रूपये कटने का एसएमएस आया मैं समझ गया कि मेरे साथ साईबर फ्रॉड हुआ है. इसके बाद जब मैंने 7440268569 पर फोन किया तो लड़की जो अपना नाम नेहा बता रही थी मुझे पैसा वापस कर देने का झूठा दिलासा देने लगी. जब मैं उस पर नाराज हो गया तो बोली जाओ नहीं करते पैसे वापस क्या कर लोगे? मित्रों, फिर मैं भागा-भागा आईसीआईसीआई की हाजीपुर शाखा में गया लेकिन मैनेजर ने किसी भी तरह का आवेदन लेने से मना कर दिया. फिर मैंने बैंक के कस्टमर केयर पर फोन कर मेरे साथ हुई घटना की सूचना दी. कस्टमर केयर ने बताया कि आपकी शिकायत जांच के लिए दर्ज कर ली गई है कुछ दिनों में समाधान भी हो जाएगा. इस बीच मेरे खाते में १९८५६ रूपये भी डाल दिए गए मगर वो पैसा सिर्फ दीखता था मैं उसे निकाल नहीं सकता था. मित्रों, इसके बाद मैं नगर थाना हाजीपुर गया और मामले की एफआईआर कर जाँच करने के लिए आवेदन दिया. मुंशी बोले कि अभी थानेदार फिल्ड में हैं आवेदन दे दीजिए और कल आकर पता कर लीजिएगा. फिर तो जैसे टहलाने का सिलसिला ही चल पड़ा. पहले तो थानेदार सुबोध सिंह ने कहा कि मामला छोटा है, बीस हजार का ही है, मुंशी से पता कर लीजिए कि एफआईआर हुआ कि नहीं. जब मैं मुंशी के पास गया तो उसने कहा कि उसे कुछ भी पता नहीं है थानेदार से पूछिए. कई दिनों की भागदौड़ के बाद जब मैं थानेदार पर बरस पड़ा तो उसने टका-सा जवाब दिया कि शहर में इतनी हत्या-चोरी-लूटपाट की घटनाएँ हो रही है हम उनको देखें या आपके केस को देखें. फिर मैंने बिहार पुलिस से उम्मीद ही छोड़ दी. मैं कोई प्रधानमंत्री की भतीजी तो था नहीं कि थानेदार मेरे पैसों को वापस दिलाने का जीतोड़ प्रयास करता. मित्रों, इससे पहले मैं घटना की शाम ही हाजीपुर के हिंदुस्तान कार्यालय का दरवाजा भी खटखटा चुका था. २००००रू की रकम पुलिस की नजर में भले ही बहुत छोटी हो लेकिन मेरे लिए काफी बड़ी थी. मैंने सोंचा कि पहले मैं हिंदुस्तान, पटना में रहा हूँ और हाजीपुर, हिंदुस्तान के कई स्टाफ तब मेरे सहकर्मी थे इसलिए पुलिस न सही मेरे पुराने साथी तो मेरे लिए कुछ-न-कुछ अवश्य करेंगे. लेकिन वहां भी मुझसे सारी सूचनाएँ ले ली गईं मगर मेरे साथ हुई घटना को अख़बार में स्थान नहीं दिया गया. शायद उनको मुझसे भी पैसों की उम्मीद थी. मित्रों, मेरे भीतर क्रोध का ज्वालामुखी फट रहा था. मैंने तत्काल घर लौटते ही पहले 1 फरवरी को नमो ऐप पर और फिर २ फरवरी को केन्द्रीय गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर जाकर साईबर क्राइम सेल में अपनी शिकायत दर्ज कराई. मित्रों, इस बीच दिनांक ६ फरवरी को मेरे खाते से बैंक ने १९८५६ रूपये निकाल लिए. फिर मैंने बैंक के नोडल अधिकारी के पास ऑनलाइन शिकायत की. लेकिन दिनांक १९ फरवरी को उन्होंने भी मेरे पैसा वापस करने के आवेदन को रद्द कर दिया. फिर मैंने पटना स्थित रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के बैंकिंग लोकपाल के पास शिकायत की. लेकिन ३१ जुलाई, २०२२ को उन्होंने भी मेरे दावे को नकार दिया. मैंने उससे यह भी निवेदन किया था कि वो बैंक को आदेश दे कि वो ओटीपी के साथ निकलनेवाली राशि को भी एसएमएस में शामिल करे लेकिन उसने ऐसा कोई आदेश भी नहीं दिया. मित्रों, इस बीच १४ फरवरी को मुझे वैशाली लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी ने फोन करके बुलाया और कहा कि आपने जो केन्द्रीय गृह मंत्रालय के साईबर अपराध सेल में शिकायत की थी उसका निस्तारण कर दिया गया है. उन्होंने मुझे यह भी बताया कि ऐसे मामलों में कुछ नहीं होता है. मित्रों, मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि इस समय भारत की स्थिति क्या है मेरा मामला इसका लिटमस टेस्ट है? वर्तमान भारत में सबकुछ जैसे माया है, दिखावा है. अगर आप प्रधानमंत्री की भतीजी नहीं हैं तो देश में आपकी कोई सुननेवाला नहीं है. मुझे अपने पैसे खोने का गम तो है लेकिन उससे भी बड़ा गम इस बात का है कि भविष्य में दूसरे लोगों के साथ ऐसा न हो इसके लिए इंतजाम भी नहीं किए जा रहे हैं. क्या कोई टाइम्स जॉब से पूछेगा कि जो सूचना उनके पास थी ठगों के पास कैसे चली गई? क्या कोई भारत के बैंकों को इस बात के निर्देश देगा कि भविष्य में जब ओटीपी भेजी जाए तो उसके साथ खाते से निकलनेवाली राशि का ब्यौरा भी भेजा जाए? या फिर ग्राहकों के साथ ठगों द्वारा फ्रॉड होने के बाद सरकार द्वारा भी फ्रॉड किया जाता रहेगा? सिर्फ औपचरिकता से कुछ नहीं होगा सरकार को अपनी नीयत ठीक करनी पड़ेगी. मोदी जी को यह साबित करना होगा कि अब तक जो चल रहा था वो सचमुच नहीं चलेगा. परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्.

मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

मोदी गांधी हैं या सावरकर

मित्रों, हमारे इतिहास में एक काला अध्याय है तुगलक वंश. इस वंश ने दिल्ली पर १३२० से लेकर १४१४ तक शासन किया. इस वंश का सस्थापक गयासुद्दीन तुगलक था जिसका मकबरा आज भी दिल्ली के तुगलकाबाद में है. गयासुद्दीन जब खिलजियों का सेनापति था तब उसने बहुत सारे मंदिर तोड़े, देव प्रतिमाएं खंडित की, हजारों निर्दोष, निरपराध हिन्दुओं को बेवजह मारा, हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार किए और करवाए, हजारों हिन्दू महिलाओं को सरेबाजार बेचा, हजारों हिन्दू बच्चों को हवा में उछाल कर भालों से बींध कर मार डाला और इन सभी अमानवीय क्रूर कर्म के बदले में गाजी तुगलक का ख़िताब पाया. लेकिन जब १३२० में वही गाजी तुगलक अर्थात गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली के तख़्त पर बैठा तो अचानक अजीबोगरीब हरकतें करने लगा. वो सिंहासन पर सर रखकर रोने लगता और बलबन और अलाउद्दीन खिलजी का नाम ले-लेकर छाती पीटने लगता. उसके परिजन और सिपहसलार आश्चर्यचकित और परेशान थे कि जो गाजी तुगलक कभी काफिरों यानि हिन्दुओं के लिए कहर था वो रोंदू कैसे हो गया? हालाँकि इस बात के प्रमाण नहीं मिलते कि गयासुद्दीन कभी हिन्दुओं के प्रति उदार भी हुआ था. मित्रों, मुझे लगता है कि हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी भी इस समय इसी बीमारी यानि गाजी तुगलक सिंड्रोम से ग्रस्त हैं. मोदी जब तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे तब तक मुंहजबानी ही सही हिन्दुओं के कट्टर पैरोकार रहे और उन मुसलमानों के खिलाफ लगातार बोलते रहे जिनका कुरान हिन्दुओं को लूट लेने, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार करने और हिन्दुओं को जान से मार देने का खुला और स्पष्ट आदेश देता है. जुमलावीर मोदी जब तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे अपने जुमलों में सावरकर के अनन्य प्रशंसक और भक्त रहे. उन सावरकर के जिन्होंने कहा था कि मुस्लिम तुष्टिकरण बंद होना चाहिए और भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए लेकिन वही मोदी जब भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनका एक अलग ही रूप दिखाई देता है. मोदी अचानक सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास का नारा लगाने लगते हैं. ठीक उसी तरह वे विरोधाभासी बातें करने लगते हैं जैसे कभी गाजी तुगलक करता था. लगता है जैसे मोदी के भीतर गाजी तुगलक की आत्मा घुस गई है. मित्रों, आज तक कांग्रेस पार्टी जिन मुसलमानों को मिठाई दिखाकर लोलीपोप चटा रही थी उन्हीं मुसलमानों को मोदी आईएएस-आईपीएस बनाने लगे, जिन मुसलमानों को पैसों को लाले थे उन्हीं मुसलमानों के लिए भारत सरकार के अल्पसंख्यक मंत्रालय ने पैसों की बरसात कर दी. छात्रवृत्ति, पक्का मकान, सस्ता लोन, मुफ्त का राशन आदि. लेकिन उससे हुआ क्या? मेरे एक छात्र ने जो मुज़फ्फरनगर की मशहूर फ़िल्मी हस्ती का बेटा है ने पिछले दिनों जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव चल रहे थे तब मुझे फोन कर बताया था कि इस बार यूपी में योगी वापसी नहीं करने वाले क्योंकि भाजपा को मुसलमानों का एक भी वोट नहीं मिलनेवाला है. इस दौरान बात करते हुए उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. मैंने उससे पूछा कि फिर तो मुसलमान नमकहराम हैं तो उसने कहा कि आपको जो समझना है समझिए लेकिन योगी-मोदी मुसलमानों को फूटी आँख नहीं सुहाते. मैं सन्नाटे में था क्योंकि एक धनाढ्य परिवार से होते हुए भी उस छात्र को योगी सरकार से हजारों रूपये की छात्रवृत्ति मिली थी. बाद में मैंने पढ़ा कि जिस बूथ पर भारत के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख़्तार अब्बास नकवी ने मतदान किया था वहां भाजपा को मात्र दो मत मिले. इसका मतलब साफ़ था कि स्वयं नकवी के परिजनों ने भी भाजपा को वोट नहीं दिया. इतना ही नहीं भाजपा की जीत का जश्न मनानेवाले कई मुसलमानों की खुद मुसलमान ही हत्या कर चुके हैं. फिर भी मोदी न जाने किन सपनों में खोये हुए हैं सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास. शायद इस तरह के सपनों को ही अंग्रेजी में फूल्स ड्रीम कहते हैं. मित्रों, मोदी मुसलमानों को एक हाथ में कुरान और दूसरे में लैपटॉप पकडाने वाले हैं और सोंच रहे हैं कि ऐसा कर देने भर से वो पूंछविहीन पशु इन्सान बन जाएँगे जबकि सच्चाई यह है कि जबतक उनके एक हाथ में कुरान है वो न तो सर्वधर्मसमभाव का पालन करेंगे और न ही भारत को अपनी पुण्यभूमि ही मानेंगे बल्कि यही कहते रहेंगे कि करदे फकत इशारा अगर शाहे खुरासान सजदा न करूं हिंद की नापाक जमीन पर. अभी-अभी हमने गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर पर हमला होते हुए देखा है. एक बेहद कुशाग्र बुद्धिवाले आईआईटी से स्नातक मुसलमान ने जन्नत के लालच में आकर यह हमला किया. उसके भी एक हाथ में कुरान था और दूसरे में लैपटॉप लेकिन दिमाग में सिर्फ कुरान था, जहर था. आधुनिकता और उदारता उसे छू तक नहीं गयी थी. असली चीज दिमाग को बदलना है जो कुरान होने नहीं देगा. ये लोग लैपटॉप से अच्छी बातें नहीं सीखेंगे बल्कि बम बनाना सीखेंगे. पूरे देश में जहाँ भी बम बनाते हुए लोग मारे जाते हैं वे सारे-के-सारे मुसलमान होते हैं क्यों? मुसलमान चाहे भारत का उपराष्ट्रपति बना दिया जाए या उच्च पदाधिकारी वो मूलत: जिहादी होता है। एकाध अपवाद भी हैं कलाम साहेब की तरह लेकिन वे एकाध ही हैं। मित्रों, इतना ही नहीं हम देख रहे हैं कि दिल्ली के क़ुतुब-परिसर से इस बात के सबूत मिटाने के प्रयास हो रहे हैं कि वहां की इमारतें हिन्दू-मंदिरों को तोड़ कर बनाए गए थे. समझ में नहीं आता कि मोदी चाहते क्या हैं? मुसलमानों को खुश करने के लिए जो काम गाँधी नामधारी कान्ग्रेस के नेता नहीं कर पाए वो काम मोदी कर रहे हैं. जबकि वो भी जानते हैं कि उपदेशो हि मूर्खाणां, प्रकोपाय न शान्तये। पयःपानं भुजंगानां केवल विषवर्धनम्।। जो पत्थरबाजी पहले सिर्फ कश्मीर तक सीमित थी अब मोदी राज में पूरे भारत में हो रही है. भारत की राजधानी दिल्ली तक में ऐसा कोई महीना ऐसा कोई हफ्ता नहीं जाता जब मुसलमानों के हाथों किसी हिन्दू की हत्या न हुई हो लेकिन इन्द्रेश कुमार और मोहन भागवत जी मुसलमानों में हिन्दुओं का डीएनए ढूँढने में लगे हैं. जिस तेजी से इस्लाम के बारे में सच बोलने पर यति नरसिंहानन्द सरस्वती को जेल में बंद कर दिया जाता है उससे तो यह लगने लगा है कि मोदी जी ने भारत को पाकिस्तान बना दिया है जहाँ ईश निंदा कानून लागू है. गजब तो यह है कि जब तक एक भारतीय वसीम रिजवी रहता है तब तक कुरान पर सवाल उठाने के बावजूद आजाद रहता है मगर जैसे ही वो जीतेंद्र नारायण त्यागी बन जाता है भाजपा सरकार द्वारा जेल में डाल दिया जाता है. मित्रों, हमारे देश में न तो गांधियों की कमी रही है और न ही उन गाँधी के अनुयायियों की जिनके तुष्टिकरण के कारण भारत के तीन टुकड़े हुए. फिर मोदी क्यों गाँधी बनना चाहते हैं? हमें न तो और पाकिस्तान चाहिए और न ही गाँधी. हमें तो सावरकर चाहिए जो एक ही हुए हैं. हमें नहीं चाहिए भगवान राम की शोभायात्रा पर पत्थरों की बरसात बल्कि हमें तो पत्थरबाजों के घरों पर बुलडोजर चलानेवाला नेता चाहिए. अब तो गुजरात में भी जेहादी फिर से सर उठाने लगे हैं और कई मुस्लिमबहुल ईलाकों से हिन्दुओं को भगा रहे हैं. मोदी ने २००२ के गोधरा दंगों के बाद गुजरात में बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद् के कार्यकर्ताओं पर जिस तरह की कठोर कार्रवाई की विशेषज्ञों का मानना है कि यह उसी का परिणाम है कि आज गुजरात में हिन्दुओं को क्रूरकर्मा मुसलमानों से बचानेवाला कोई बचा ही नहीं. बंगाल और केरल में हिन्दुओं को मरता देख कर भी जिस तरह मोदी ने अपनी दोनों आँखों और कानों को मूँद रखा है उससे भी यही लगता है कि मोदी सावरकर कम गाँधी ज्यादा हैं और थोडा-थोडा जिन्ना भी.

गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

तेजस्वी सो रहे हैं कृपया हॉर्न न बजाएँ

मित्रों, कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता मालिक होती है लेकिन बिहार में लोकतंत्र और जनता की दशा को देखकर तो ऐसा लगता है कि लोकतंत्र में जनता भिखारी होती है. फिर एक समय बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू जी ने मंच से यह कहा था कि अब राजा रानी के पेट से पैदा नहीं होगा लेकिन वास्तविकता यह है कि लालू जी ने खुद अपने बाद पहले अपनी पत्नी को बिहार की महारानी बना दिया और अब अपने बेटे को महाराजा बनाने की फ़िराक में हैं. मित्रों, यह हमारे विधानसभा क्षेत्र राघोपुर का दुर्भाग्य है कि लालूजी के वही छोटे बेटे जिनको लालू जी बिहार का महाराजा बनाना चाहते हैं हमारे विधायक हैं लेकिन सिर्फ कहने को विधायक हैं. राघोपुर प्रखंड में सरकारी योजनाओं और सुविधाओं की स्थिति पूरे बिहार में सबसे ज्यादा ख़राब है लेकिन तेजस्वी यादव को इससे कोई मतलब नहीं. वो तो न जाने किस दुनिया में खोये हुए हैं. राघोपुर प्रखंड में शिक्षा की स्थिति इतनी ख़राब है कि रोजाना स्कूलों का ताला खुल जाए तो गनीमत समझिए. शिक्षक आते ही नहीं फिर ताला खोलेगा कौन? शिक्षा निजी शिक्षकों और ट्यूटरों के भरोसे किसी तरह अंतिम सांसें ले रही है. एक समय बिहार के तदनुसार राघोपुर प्रखंड के सरकारी विद्यालय पूरे भारत के लिए उदाहरण थे. आज वे बदहाली के प्रतीक बन गए हैं. मित्रों, इसी तरह से स्वास्थ्य-सुविधाओं के क्षेत्र में भी राघोपुर प्रखंड की हालत काफी पतली है. यहाँ के अस्पतालों को अस्पताल कहना अस्पताल की परिभाषा को गाली देने के समान है. न बेड, न उपकरण और न ही डॉक्टरों का आगमन. जैसे विद्यालय कागज पर चल रहे वैसे ही अस्पताल भी कागज पर न सिर्फ चल रहे हैं बल्कि दौड़ रहे हैं. कई बार अधिकारी भटकते हुए अस्पताल में विशेष रूप से मोहनपुर रेफरल अस्पताल में पहुँच भी जाते हैं. बदहाली पर नाराजगी जताते हैं. सुधार लाने के निर्देश देते हैं और सो जाते हैं. एकाध बार तो तेजस्वी भी ऐसा कर चुके हैं. मित्रों, इसी तरह राघोपुर प्रखंड में स्थापित ४० सरकारी नलकूपों में से एक भी चालू नहीं है लेकिन इससे तेजस्वी यादव का क्या सरोकार? उनको थोड़े ही राघोपुर में गेंहूँ-धनिया की खेती करनी है. वो तो वोटों की खेती करते हैं और इस नए तरह के राजतन्त्र में बिहार की सबसे बड़ी राजनैतिक रियासत के राजकुमार हैं. मित्रों, अब हम आते हैं राघोपुर प्रखंड के किसानों की सबसे बड़ी समस्या पर. हुआ यह कि जब आजादी के बाद बिहार में भूमि-सर्वेक्षण चल रहा था तब राघोपुर के बहुत सारे किसानों की जमीन गंगा नदी में थी. सरकार ने उसे गंगशिकस्त घोषित कर अपने नाम कर लिया और किसानों से कहा कि जब जमीन पानी से बाहर निकलेगी तब किसानों को लौटा देंगे. मगर ऐसा हुआ नहीं. वो जमीन आज भी बिहार सरकार के पास है. अब कुछ समय के बाद जब राघोपुर प्रखंड में भूमि-सर्वेक्षण होगा तब अगर ये जमीन किसानों को लौटाई नहीं गई तो राघोपुर के किसानों की लाखों एकड़ जमीन छिन जाएगी, लुट जाएगी. लेकिन इससे भी कदाचित तेजस्वी जी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि न तो वे राघोपुर के निवासी हैं और न ही राघोपुर में उनकी ऐसी कोई जमीन है जो गंगशिकस्त की श्रेणी में आती हो. मित्रों, कुल मिलाकर राघोपुर की जनता के दोनों ही हाथ खाली हैं. सांसद पशुपति कुमार पारस भी गायब हैं और विधायक तेजस्वी तो गायब हैं ही. यह हमारा दुर्भाग्य है कि दोनों आधुनिक राजपरिवार से हैं. दोनों मानते हैं कि जनता जाति-पांति और विरासत के नाम पर उनको ही जिताएगी. जहाँ तक हम समझते हैं कि लोकतंत्र में नेता नेतृत्वकर्ता होता है इसलिए उसे सबसे आगे होना चाहिए. जनता जो मन ही मन सोंचे नेता को उसकी गर्जना करनी चाहिए, जहाँ जनता के कदम जाकर रूकें नेता को वहां से शुरुआत करनी चाहिए. नेता को जनता के आगे चलना चाहिए लेकिन यहाँ तो नेता सोया हुआ है. दुर्भाग्यवश हमारे विधायक बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता भी हैं. सवाल उठता है कि जो व्यक्ति अपनी विधानसभा तक का यानि कुछेक वर्ग किलोमीटर का ख्याल नहीं रख सकता हो वो भला कैसे पूरे बिहार का ख्याल रखेगा? फिलहाल तो हम आपसे यही कहेंगे कि जब भी आप तेजस्वीजी के आवास के पास से गुजरें तो कृपया हॉर्न न बजाएं क्योंकि तेजस्वी सो रहे हैं.

शनिवार, 2 अप्रैल 2022

नाथ अनाथन की सुध लीजै

मित्रों, मैं कई वर्षों से बराबर बिहार के अख़बारों में यह खबर पढता चला आ रहा था कि पोल पर करंट लगने से फलाने गाँव के फलाने बिजली मिस्त्री की मौत हो गयी. मेरी समझ में नहीं आता था कि ऐसा हो कैसे जाता है. लेकिन जब परसों मेरी ससुराल वैशाली जिले के देसरी थाने के भिखनपुरा में ऐसी ही घटना घट गई तब समझ में आया कि वास्तव में हो क्या रहा है और पोल पर करंट लगने से मरनेवाले हैं कौन. मित्रों, हुआ यह कि परसों सुबह से ही पूरे भिखनपुरा पंचायत की बिजली गई हुई थी. सुबह से ही लोग बिजली आपूर्ति कंपनी के दफ्तर में फोन पर फोन किए जा रहे थे. दोपहर में जेई और सरकारी लाइन मैन चकमगोला के मुकेश सिंह के घर पहुंचे. मुकेश निजी तौर पर बिजली मिस्त्री का काम करता था. बिहार में बेरोजगारी इतनी ज्यादा है कि प्रत्येक सरकारी बिजली मिस्त्री कई सारे निजी बिजली मिस्त्रियों को अपने साथ रखते हैं और ज्यादातर मामलों में ये निजी मिस्त्री ही पोल पर चढ़कर यांत्रिक त्रुटि को दूर कर बिजली आपूर्ति की पुनर्बहाली को सुनिश्चित करते हैं. मित्रों, पेट जो न कराए. मुकेश उन दोनों के साथ दौड़ा-दौड़ा भिखनपुरा आया. पोल पर चढ़ने से पहले उसने जेई और लाइन मैन से पूछा कि शट डाउन तो ले लिया है न? उनदोनों के हामी भरने के बाद वो जैसे ही पोल पर चढ़ा उसे करंट लग गया क्योंकि शट डाउन नहीं लिया गया था. बेचारा ऊंचाई से सर के बल पक्की सड़क पर आ गिरा. उसके गिरते ही जेई और लाइन मैन भाग गए. गांववालों ने उसे आनन-फानन में अस्पताल पहुँचाया लेकिन तब तक मुकेश दम तोड़ चुका था. मित्रों, बिजली कम्पनी का सितम यहीं तक नहीं रूका. कंपनी ने उलटे मुकेश पर पोल पर चढ़कर तार चुराने का मुकदमा थाने में दर्ज करवा दिया. कल जब मुकेश के गाँववालों ने सड़क जाम कर दिया तब प्रशासन ने लाइन मैन कृष्ण कुमार सिंह और जेई के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया और मृतक मिस्त्री के परिजनों को ४ लाख रूपया मुआवजा देने का आश्वासन दिया. मित्रों, सवाल उठता है कि क्या ४ लाख में मुकेश के परिवार की जिंदगी पार लग जाएगी? चार लाख का मुआवजा तो बिहार में उन आम आदमी के परिजनों को भी दिया जाता है जो करंट लगते से मरते हैं. फिर क्या अंतर है पोल पर चढ़नेवाले बिजली मिस्त्रियों और आम आदमी में? सवाल उठता है कि जिन निजी मिस्त्रियों से बिजली कंपनी काम ले रही है उनका रजिस्ट्रेशन कर उनका बीमा क्यों नहीं करवाती? आखिर कब तक मुकेश जैसे पेट के मारे निजी मिस्त्री बेमौत मरते रहेंगे और कब तक उनको आम आदमी की तरह ४ लाख का मुआवजा दिया जाता रहेगा? मेरा मानना है कि जो समाज के लिए, समाज के हित के लिए, समाज के सुख के लिए अपनी जान पर खेलता है और जान कुर्बान करता है वो शहीद है फिर चाहे वो सीमा पर खड़ा सैनिक हो या पोल पर चढ़नेवाला बिजली मिस्त्री. आखिर कब तक इन गुमनाम शहीदों के साथ, उनके मानवाधिकारों के साथ अन्याय होता रहेगा? क्या बिहार और भारत सरकार इन अनाथों की सुध लेगी या फिर जैसे चलता आ रहा है चलता रहेगा?

रविवार, 20 मार्च 2022

कश्मीरी हिन्दुओं की चीत्कार है द कश्मीर फाइल्स

मित्रों, जब हम बच्चे थे तब हमने पढ़ा था कि जब भारत ने १९७४ में पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण किया था तब पूरी दुनिया में इसका विरोध हुआ था. सबसे ज्यादा विरोध वो देश कर रहे थे जिनके पास परमाणु बमों का जखीरा था. तब भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में एक शेर कहा था कि हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती. मित्रों, कुछ इसी तरह की स्थिति पिछले ३२ सालों से कश्मीरी हिन्दुओं की है. उनकी आँखों से लगातार आंसू बहते रहे लेकिन आंसू पोछना तो दूर किसी ने उनके दर्द को जानने-समझने की जरुरत ही नहीं समझी. उलटे जिस कौम के लोगों ने उनके साथ अविश्वसनीय अत्याचार किए उसको ही सियासत ने पीड़ित घोषित कर दिया. किसी हिन्दू युवती को सामूहिक बलात्कार के बाद लकड़ी चीरने वाले आरी से जीवित अवस्था में ही बीचों बीच चीर दिया गया तो किसी को चावल के डिब्बे में मारने के बाद उनके परिजनों को अपनों के खून से सना चावल खाने को बाध्य किया गया तो किसी शिक्षक को उसके ही मुसलमान शिष्य ने सिर्फ इसलिए गोली मार दी क्योंकि वो हिन्दू था और मारने के बाद उसके शव पर पेशाब किया. मित्रों, एक साथ कश्मीर की हजारों मस्जिदों से घोषणाएं होने लगी कि महिलाओं को छोड़कर पुरुष हिंदू तत्काल कश्मीर घाटी से निकल जाएं. कुछ ही दिनों के भीतर पूरी-की-पूरी कश्मीर घाटी हिन्दूविहीन हो चुकी थी. सीआरपीएफ को गांवों से शहरों में भेजने के बाद मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने इस्तीफा दे दिया था और लन्दन में गोल्फ खेलने चले गए थे. कश्मीर घाटी कई दिनों तक पुलिस-प्रशासन विहीन थी. मुस्लिम पड़ोसियों की जैसे ईच्छा हुई उन्होंने हिन्दुओं पर अत्याचार किए. हिन्दू अपना अतीत, अपना सबकुछ छोड़कर कश्मीर घाटी छोड़कर भागा. कोई जम्मू में आ टिका तो कोई दिल्ली में तो कोई इंदौर या किसी अन्य शहर में. सबने फिर से शून्य से जिन्दगी शुरू की. आरम्भ में भीख भी मांगनी पड़ी लेकिन उन्होंने बदले की भावना से बंदूक नहीं उठाई बल्कि कलम को चुना. बड़े ही सुनियोजित तरीके से लाखों साल पुरानी एक संस्कृति को तलवार और अत्याचार के बल पर समाप्त कर दिया गया. मित्रों, फिर भी साहित्य से लेकिन फिल्म तक दशकों तक जानबूझकर उन लोगों को पीड़ित बताया जाता रहा जिन्होंने जन्नत की चाह में जन्नते कश्मीर को जहन्नुम में बदल दिया था और हिन्दुओं को अपने ही देश में दर-ब-दर भटकने के लिए मजबूर कर दिया था. तब न तो वैश्विक मीडिया और न ही संयुक्त राष्ट्र संघ के माथे पर पसीना आया था जबकि वही मीडिया और वही संयुक्त राष्ट्र संघ सीरिया के एक बच्चे के शव को देखकर दहाड़े मार-मार कर रोने लगे थे. आज भी भारत सहित पूरी दुनिया जेहादी हिंसा और कट्टरपन से परेशान है लेकिन पूरी तरह से अप्रासंगिक हो चुके संयुक्त राष्ट्र संघ को उलटे इस्लाम की बदनामी की चिंता है. इस्लाम अगर बदनाम है तो अपनी करतूतों से और उस बदनामी के कलंक को दूर करने की जिम्मेदारी पूरी-की-पूरी मुसलमानों की है. जब कृत्य राक्षसों जैसे होंगे तो आलोचना ही होगी प्रशंसा नहीं. मित्रों, हद तो तब हो गई जब एक निर्देशक ने कश्मीरी हिन्दुओं के आंसुओं को अभिव्यक्ति देने की कोशिश की एक फिल्म द कश्मीर फाइल्स बनाकर तब फिल्म को नफरत पैदा करने का प्रयास बता दिया गया. मानो मुसलमान ११९२ से ही हिन्दुओं से एकतरफा प्यार करते आ रहे हैं और हिन्दू हैं कि उनसे नफरत ही करते जा रहे हैं. १९९० में कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार के बाद भी गोधरा में मुसलमानों ने हिन्दुओं को जिन्दा जलाया, दिल्ली में दंगे किए और देशभर में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा की हजारों घटनाओं को अंजाम दिया. कल-परसों भी होली खेल रहे हिन्दुओं के ऊपर कई स्थानों पर मुसलमानों ने पथराव किए हैं, गोलियां चलाई हैं. कई स्थानों पर तो इस फिल्म के दर्शकों पर भी हमले किए गए हैं. आखिर ये कैसा भाईचारा है जो एकतरफा है. अगर यह भाईचारा है तो नहीं चाहिए हमें हिन्दुओं की जान और माल की कीमत पर भाईचारा. अगर हिन्दुओं की चीत्कार और दर्द को सामने लाने से किसी की पोल खुलती है तो जरुर खुलनी चाहिए. बल्कि हिन्दूबहुल हिंदुस्तान की सियासत से यह पूछना चाहिए कि यदि भारत के सारे नागरिक कानून की नजर में समान हैं तो क्यों हिन्दुओं के हत्यारे १९९० के बाद दशकों तक खुलेआम घूमते रहे, कुछ तो प्रधानमंत्री से हाथ मिलाते देखे गए और कुछ तो आज भी आजाद घूम रहे हैं? मैं साधुवाद देना चाहूँगा विवेक रंजन अग्निहोत्री जी को कि उन्होंने हिंदुस्तान में कश्मीरी हिन्दुओं के दर्द को दुनिया के सामने रखा, उन्होंने इस्लाम के खौफनाक चेहरे को बेनकाब करने का साहस किया. हम उम्मीद करते हैं कि वो १९८४ के सिखविरोधी दंगों, गोधरा आगजनी और दिल्ली के दंगों पर भी फिल्म बनाएँगे जिससे भारतविरोधी शक्तियों की पहचान हो सके और तदनुसार भारत सरकार हिन्दुओं और हिंदुस्तान की रक्षा के लिए अपेक्षित कदम उठा सके.

गुरुवार, 10 मार्च 2022

यूपी में सुशासन और हिंदुत्व की जीत

मित्रों, आज १० मार्च है. पांच राज्यों के चुनाव परिणाम का दिन. अब कोई रहस्य नहीं रह गया है कि आज भी, अभी भी देश की जनता के दिल पर भाजपा का कब्ज़ा है. उत्तर प्रदेश में १९८६ के बाद ऐसा पहली बार हुआ है किसी पार्टी की लगातार दूसरी बार सरकार बनी है. उत्तर प्रदेश सहित पाँचों राज्यों में जनता ने नया इतिहास लिखा है. जनता ने बता दिया है कि जो राम पे नाज करेगा वो हिंदुस्तान पे राज करेगा. मित्रों, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि २०१७ से पहले उत्तर प्रदेश की स्थिति कितनी चिंताजनक थी. पूरे प्रदेश पर दंगाइयों और बलात्कारियों का कब्ज़ा था. पूरा प्रदेश जल रहा था वहीँ अखिलेश सैफई में नाच-गाना देखने में मशगुल थे. चौतरफा भ्रष्टाचार व्याप्त था और जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी. औरतों का दिन में भी घर से निकलना मुहाल था. मित्रों, योगीजी ने मुख्यमंत्री बनते ही सबसे पहले रोमियो स्कायड बनाकर औरतों को सुरक्षित करते हुए यह सुनिश्चित किया कि प्रदेश में कोई महिला रात के १२ बजे भी बिना डरे बिना हिचकिचाए घर से निकले. अस्पतालों को दुरुस्त किया गया, अपराध पर पूरा नियंत्रण पाया गया, गरीबों को समय पर और पूरा-का-पूरा सस्ता अनाज उपलब्ध करवाया गया और माफियाओं के घरों पर कुछ इस पैमाने पर बुलडोजर चलाया गया कि बुलडोजर योगी आदित्यनाथ जी की सरकार का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया. इसके साथ ही भाजपा ने जिस तरह से राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया उसके चलते उसे राम के साथ-साथ रामभक्त हिन्दुओं का आशीर्वाद मिलना भी तय हो गया. मित्रों, रही बात चार अन्य राज्यों की तो देवभूमि उत्तराखंड में फिर से भाजपा की सरकार का बनना यह दर्शाता है कि लोग कांग्रेस को किसी भी तरह भाजपा का विकल्प नहीं मानते साथ ही लोगों को पार्टी और काम से मतलब है न कि मुख्यमंत्री से. इसके साथ ही उत्तराखंड की जीत में वहां के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता जिन्होंने अपनी मेहनत और कार्यकुशलता से अत्यल्प समय में एक अवश्यम्भावी हार को जीत में बदल दिया. मित्रों, रही बात मणिपुर की तो यह देखना काफी सुखद है कि भाजपा और हिंदुत्व का झंडा अब पूर्वोत्तर में भी लहरा रहा है. हम उम्मीद करते हैं कि निकट भविष्य में भाजपा केरल, आंध्रा, तेलंगाना और तमिलनाडु समेत पूरे दक्षिण भारत में भी अपनी स्थिति मजबूत करेगी और एक दिन ऐसा भी आएगा जब वहां भाजपा की सरकार होगी. मित्रों, बचे हुए राज्यों में जहाँ गोआ की जीत भाजपा के लिए अप्रत्याशित होते हुए भी काफी सुखद है वहीँ पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत के परिणाम भविष्य में सिर्फ पंजाब के लिए ही नहीं पूरे भारत के लिए खतरनाक हो सकते हैं. भविष्य में पंजाब फिर से अलगाववाद और खालिस्तान की आग में जल सकता है.

शनिवार, 19 फ़रवरी 2022

मनमोहन सिंह का राष्ट्रवाद

मित्रों, कभी संत कबीर ने कहा था कि मैं तो कूता राम का, मुतिया मेरा नाऊँ, गले राम की जेवड़ी, जित खींचे तित जाऊँ. लेकिन आज कोई कबीर का युग तो है नहीं सो राम के बदले लोग-बाग़ अपने स्वार्थ के लिए वक्त के अनुसार किसी-न-किसी प्रभावशाली इन्सान या परिवार का कुत्ता बनते रहते हैं. ऐसे ही एक कुत्ते हैं मनमोहन सिंह. नाम तो सुना ही होगा. वही मनमोहन सिंह जिनके बारे में कहा जाता है कि वे भारत के एकमात्र रिमोट संचालित प्रधानमंत्री थे. बल्कि उनको उनकी इसी विशेषता के कारण प्रधानमंत्री बनाया गया था. रिमोट ऑन चालू, रिमोट ऑफ़ बंद. मित्रों, कल इन्हीं मौनमोहन सिंह ने बोला है शायद नकली गाँधी परिवार ने आदेश दिया होगा. मनमोहन सिंह ने भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी पर नकली राष्ट्रवादी होने के आरोप लगाए हैं. एक समय कांग्रेस के महा राष्ट्रवादी अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने कहा था कि इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा. इस एक वाक्य से आप समझ सकते हैं कि कांग्रेसियों के लिए राष्ट्र क्या होता है और तदनुसार राष्ट्रवाद क्या होता है. अब इंदिरा जी तो रही नहीं सो अब उनके लिए भारत की परिभाषा गाँधी फैमिली इज इंडिया एंड इंडिया इज गाँधी फैमिली हो गया है. इसी फिरोज गाँधी परिवार का लिखा हुआ भाषण पढ़ते हुए मनमोहन सिंह ने लाल किले से अपने पहले भाषण में कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ अल्पसंख्यकों का है अर्थात मुसलमानों का है. शायद गाँधी परिवार के लिए अल्पसंख्यकवाद ही राष्ट्रवाद है इसलिए उसने भाषण में ऐसा लिखकर मनमोहन को पढने को दिया था. मित्रों, मनमोहन सिंह को दुःख है, इस बात का अपार दुःख है कि आज नेहरु की गलतियों को उनकी गलती कहा जा रहा है. अरे भाई नेहरु ने गलतियाँ की थी इसलिए जो गलतियाँ नेहरु की थी हमेशा नेहरु की रहेंगी. किसी शायर ने क्या खूब कहा है-लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई. कहने का मतलब यह कि जो गलतियाँ नेहरु ने १९४६ से १९६४ के बीच अपने प्रधानमंत्रित्व काल में की थीं उसके दुष्परिणाम अब तक आ रहे हैं फिर क्यों न नेहरु की गलतियों को उनकी गलती कहा जाए? क्या नेहरु पैगम्बर थे जो उनकी गलतियों को गलत कहने पर ईशनिंदा हो जाएगी. फिर भारत में तो ईशनिंदा कानून है भी नहीं. मित्रों, नेहरु ने सेना को २५ लाख से कम करके ३ लाख कर दिया परिणाम भारत को १९४७ में पीओके और १९६२ में पूरा अक्साई चिन और अरुणांचल व लद्दाख का एक बड़ा हिस्सा खोना पड़ा, तिब्बत तो हाथ से गया सो अलग. नेहरु को आइजनहावर ने परमाणु बम देने की पेशकश इस ताकीद के साथ की थी कि चीन कभी भी भारत पर हमला कर सकता है लेकिन नेहरु नहीं माने. नेहरु को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में स्थायी सीट ऑफर की गई थी और उन्होंने उसे चीन को दिलवा दिया था परिणाम आज चीन एक बार फिर भारत पर हमले की ताक में है. तो ये तो थी महान कूटनीतिज्ञ नेहरु की विदेश नीति. मित्रों, आतंरिक नीतियों के मोर्चे पर भी नेहरु खासे असफल रहे. नेहरु ने समान नागरिक संहिता को लागू नहीं किया परिणाम आज फिर से इस्लाम भारत में स्वाभाविक तौर पर अलगाववादी हो रहा है. नेहरु को नोबल चाहिए था नहीं मिला तो उन्होंने खुद को ही भारत रत्न दे डाला. नेहरु ने धारा ३७० लागू किया परिणाम १९९० में देखने को मिला जब कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीर से भगा दिया गया और वो अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रहने के लिए विवश हो गए. नेहरु ने अम्बेडकर जी की बातों को अनसुना करके भारत में मुसलमानों को रहने दिया परिणाम आज कश्मीर, केरल और बंगाल सहित देश के कई हिस्सों जिसमें राजधानी दिल्ली भी शामिल है हिन्दुओं का नरसंहार हो रहा है. मित्रों, कहने का तात्पर्य यह कि जब नेहरु की गलतियों का खामियाजा देश को आज भी भुगतना पड़ रहा है तो फिर नेहरु की आलोचना क्यों न की जाए? मनमोहन के लिए भले ही नेहरु भगवान हों बांकी सबके लिए वो न तो तब भगवान थे और न ही आज हैं. रही बात चीन की तो चीन ने अपने सीमावर्ती ईलाकों में रेल और सड़कों का सबसे ज्यादा विकास मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते किया था तो मनमोहन सिंह ने उसे रोका क्यों नहीं? मान लिया नहीं रोक सकते थे लेकिन उनको भारत-चीन सीमा पर भारत की तरफ से रेल और सड़क का विकास करने के लिए कदम उठाने से किसने रोका था? क्यों देहरादून तक जाने के लिए भी २०१४ तक एक ही सुरंग थी वो भी अंग्रेजों के ज़माने की? क्यों चीन के साथ एक-के-बाद एक आर्थिक समझौते करके मनमोहन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को चीन पर निर्भर कर दिया था बजाए आत्मनिर्भर बनाने के? मित्रों, मनमोहन सिंह का एक और आरोप है बेरोजगारी बढ़ने और अमीरी-गरीबी के बीच खाई बढ़ने का. तो क्या अमीरी-गरीबी के बीच की खाई पहली बार बढ़ी है? जबसे कथित आर्थिक सुधार शुरू हुए हैं यह खाई और बढ़ गई है. आर्थिक सुधार किसने शुरू किए थे? कभी चंद्रशेखर जी ने नरसिंह राव से मनमोहन सिंह के बारे में कहा था कि मैंने जो चाकू सब्जी काटने के लिए लिया था आप तो उसी से देश के कलेजे का आपरेशन कर रहे हैं. और जब मनमोहन ने आर्थिक सुधार शुरू किए थे उस समय जब कहा गया था कि इससे बेरोजगारी बढ़ेगी तब तो उन्होंने इन आरोपों को अनसुना कर दिया था. जब सबकुछ निजी हाथों में चला जाएगा तो सरकार कहाँ से रोजगार देगी, कहाँ से पैसे लाएगी और निजी क्षेत्र अपना मुनाफा देखेगा या लोगों को रोजगार देगा? मित्रों, ये वही मनमोहन सिंह हैं जिन्होंने चंद्रशेखर जी से खुद पैरवी करके खुद को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अध्यक्ष बनवाया था वो भी तब जब चंद्रशेखर जी कार्यवाहक प्रधानमंत्री थे. ऐसे सत्तालोलुप व्यक्ति की बात पर हम क्यों विश्वास करें? एक तरफ मनमोहन चीन के भारत में घुस आने का ताना देंते हैं वो वहीँ दूसरी तरफ वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री रहते हुए रक्षा बजट में घातक कटौती करते हैं. यहाँ तक कि कश्मीर में ड्यूटी कर रहे अर्द्धसैनिक बलों को राईफल के बदले डंडा थमा देते हैं. मित्रों, रही बात पाकिस्तान जाकर मोदी के बिरयानी खाने की तो मनमोहन आज तक मोदी की नीति को समझ ही नहीं पाए हैं. मोदी पहले बात से समझाते है फिर लात का इस्तेमाल करते हैं. यह मोदी की विदेश नीति का ही परिणाम है कि आज पाकिस्तान दिवालिया हो चुका है और दर-दर पर भीख मांगता फिर रहा है फिर भी उसे भीख नहीं मिल रही वर्ना आपके समय तो आपका आवास कश्मीरी आतंकवादियों के कहकहों से गुलजार रहता था. मित्रों, अंत में मैं माननीय मनमोहन सिंह जी से जिनके कार्यकाल को चुपचाप रहकर घोटालेबाजों का साथ देने और घोटालों के लिए ज्यादा जाना जाता है अनुरोध करूँगा कि वो जहाँ तक हो सके आदतन मौन रहें. काहे बुढ़ापे में अपनी बेईज्जती करवाने को उतारू हैं? नेहरु-गाँधी परिवार एक डूबता जहाज है और डूबकर रहेगा. अब कभी इंडिया में गाँधी फैमिली इज इंडिया एंड इंडिया इज गाँधी फैमिली नहीं होगा क्योंकि भारत के हिन्दू उनकी सच्चाई को जान चुके हैं, समझ चुके हैं और वो भी अच्छी तरह से.

बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

अब कैसे छूटे राम रट लागी

मित्रों, आज हिन्दू धर्म के महानतम संतों में से एक संत रैदास जी की जयंती है. यूं तो हिन्दू धर्म में बहुत से महान संत हुए हैं लेकिन रैदास महानतम थे. मैं उनको इसलिए महानतम कह रहा हूँ क्योंकि संत रैदास के जीविकापार्जन के साधन को तत्कालीन समाज में बहुत सम्मान की नजरों से नहीं देखा जाता था. तत्कालीन शासक जो मुसलमान थे की तरफ से उनको काफी लालच दिया गया लेकिन राम के अखंड व अटल भक्त रैदास बस इतना ही कहते रहे कि अब कैसे छूटे राम रट लागी? मित्रों, संत रैदास उन रामानंद जी के शिष्य थे जिनके बारे में कहा जाता है कि भक्ति द्राविड़ उपजी लाए रामानंद. रामानंद जी ने बिना जातीय भेदभाव के काशी में अपने शिष्य बनाए. उनके शिष्यों में सुरसुरानंद ब्राह्मण, पीपा राजपूत, सेन नाई, धन्ना जाट, कबीर जुलाहा और रैदास चमार तक शामिल थे. रामानंद जी के शिष्यों के बारे में एक दोहा काफी लोकप्रिय है अनतानन्द, कबीर, सुखा, सुरसुरा, पद्वावती, नरहरि, पीपा, भावानन्द, रैदासु, धना, सेन, सुरसरि की धरहरि. कितने महान थे रामानंद जिन्होंने ईश्वरभक्ति के अनमोल खजाने को सबके लिए खोल दिया था और कहा जाति-पाति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि के होई. मध्यकालीन समाज में यह बहुत बड़ी घटना थी, शायद सबसे बड़ी. यहाँ हम आपको बता दें कि रामानंद ब्राह्मण थे. श्री रामानंद ने रामभक्ति के माध्यम से एक सामाजिक क्रांति का सूत्रपात किया। सामाजिक विषमताओं और बाहरी आडम्बरों में जकड़े समाज में पुनरुत्थान की ओर पहला कदम बढ़ाने वाले रामानंद थे। रामभक्ति के माध्यम से उन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों में सामाजिक समरसता तथा समन्वय की भावना पैदा करने का एक सफल प्रयास किया। श्री रामानंद ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ श्री वैष्णवमताज भास्कर में प्रचलित ऊंच-नीच की भावना पर क्रूर प्रहार किया है। मित्रों, तो रामानंद जी जैसे महान गुरु के महान शिष्य रैदास जी के बारे में जितना भी कहा जाए कम है. रामानंद के अधिकतर शिष्यों की तरह रैदास भी ईश्वर यानि आपने राम के निर्गुण रूप के उपासक थे वे कहते भी हैं हिंदू पूजइ देहरा मुसलमान मसीति। रैदास पूजइ उस राम कूं, जिह निरंतर प्रीति॥ मित्रों, उनकी भक्ति कितनी अटल थी इसके बारे में एक प्रसंग का बार-बार जिक्र किया जाता है. हुए यह कि गुरु रविदास का नाम बनारस शहर और आसपास के इलाकों में बहुत प्रसिद्ध हो चुका था। एक बार कुछ यात्री पंडित गंगाराम के साथ हरिद्वार में कुंभ के पर्व पर हर की पैड़ी में स्नान करने जा रहे थे। जब वे बनारस पहुँचे तो उनके मन में प्रेम उमड़ आया कि गुरु रविदास से भेंट करके फिर आगे को चलेंगे। वे गुरु रविदास का निवास स्थान पूछकर सीर गोवर्धनपुर में पहुँच गए। सभी यात्री गुरु रविदास के दर्शन करके बहुत प्रसन्‍न हुए। गुरु रविदास ने पूछा कि कहिए, आप कहाँ जा रहे हैं? पंडित गंगाराम ने बताया कि हम हरिद्वार में कुंभ स्नान के लिए जा रहे हैं। गुरु रविदास ने यात्रियों से कहा कि गंगाजी के लिए मेरी ओर से यह कसीरा ले जाओ और यह भेंट गंगाजी को तब देना जब वे हाथ निकालकर लें, नहीं तो इसे वैसे ही मत देना। गुरु रविदास की भेंट लेकर यात्रीगण हरिद्वार की तरफ रवाना हो गए। कुछ दिनों में यात्रीगण हरिद्वार पहुँच गए। उन्होंने गंगाजी के तट पर यात्रियों की भारी भीड़ देखी। गंगा में स्नान करने के बाद पंडित गंगाराम ने कहा, “हे माता गंगाजी, आपके लिए एक कसीरा भेंट के रूप में रविदास ने भेजी है। माता, अपना हाथ बाहर निकालें और इस भेंट को स्वीकार करें।” यह सुनते ही गंगाजी प्रकट हो गई और हाथ बढ़ाकर उन्होंने कसीरा ले लिया। गंगाजी ने अपने हाथ का एक हीरे जड़ित कंगन गुरु रविदास के लिए भेंट किया और गंगाराम से कहा कि मेरी यह भेंट गुरु रविदास को पहुँचा देना। ले कंगन अति हर्ष युत, देखत सब विसमाद। ऐसे न कबहुं भयो, गंगा को प्रसादि॥ गंगाराम सहित सभी यात्री बहुत हैरान हुए कि इस प्रकार आज तक किसी को गंगाजी ने भेंट नहीं दी थी। गंगाजी के दर्शन करके और स्नान करके पंडित गंगाराम वापस अपने घर पहुँच गया। गंगाराम ने अपनी पत्नी को प्रत्यक्ष दर्शन की सारी कथा सुनाई और गंगाजी का दिया हुआ कंगन अपनी पत्नी को रखने के लिए दे दिया। कुछ दिनों के बाद पंडित गंगाराम की पत्नी ने कहा कि इस कंगन को बाजार में बेच दिया जाए। यह बड़ी कीमत में बिक जाएगा। पैसे लेकर अपना जीवन मजे से गुजारेंगे। हमें किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहेगी। जब पंडित गंगाराम वह कंगन बाजार में बेचने के लिए गया तो कंगन की जितनी कीमत थी, उसकी कीमत के बराबर किसी के पास धन नहीं था। जो भी सर्राफ कंगन को देखता था, वह हैरान हो जाता था और कहता था कि ऐसा कंगन हमने पहले कभी नहीं देखा। तब कुटवारै सुध दई वाकै हाट बिकाए। भुखन कंगन हाथ को बेचत जन इक आए॥ इस बात की खबर सिपाही के पास पहुँच गई कि एक आदमी बहुमूल्य कंगन बेचने की कोशिश कर रहा है। सिपाही गंगाराम को पकड़कर हाकिम के पास ले गए। हाकिम के पूछने पर गंगाराम ने सारी कथा कह सुनाई कि यह कंगन गंगा माता के हाथ का है, जिसे गंगा माता ने गुरु रविदास को पहुँचाने के लिए दिया था। सारी बातें सुनकर हाकिम चकित रह गया। हाकिम ने कहा कि गुरु रविदास को यहाँ बुलाया जाए और उनकी राय ली जाए, तब गुरु रविदास को सादर सभा में बुलाकर कंगन के बारे में पूछा गया। गुरु रविदास ने कहा कि यह कोई बड़ी बात नहीं है। अभी एक बरतन में गंगा जल डालकर और कंगन उसमें डालकर ऊपर से कपड़ा देकर ढक दें। मन चंगा तो कठौती में गंगा। गंगाजी इस बात का फैसला कर देंगी। जैसा उन्होंने कहा, सारी सामग्री उसी ढंग से तैयार कर दी गई। तब गुरु रविदास ने गंगाजी को निर्णय करने के लिए कहा। जब कपड़ा बरतन से हटाया गया तो दो कंगन नजर आए। हाकिम और बाकी लोग यह देखकर बहुत प्रसन्‍न हुए। गुरु रविदास ने दोनों कंगन गंगाराम को दे दिए। मित्रों, ऐसे थे हमारे संत रैदास. रैदास ने आजीवन सहज भक्ति की और सहज भक्ति का उपदेश भी दिया. उनको न तो मंदिर की जरुरत थी न ही देव प्रतिमाओं की क्योंकि उनके लिए तो उनके राम चन्दन थे और वे पानी थे जिसकी सुगंधी उनके अंग-अंग से आती थी. रैदास ऐसा समाज चाहते थे जिसमें कोई भूख से न मरे और सारे लोग मिलजुलकर प्रेमपूर्वक निवास करें. ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिले सबन को अन्न. छोट बड़ों सब सम वसै, रविदास रहे प्रसन्न उनका व्यक्तित्व इतना महान था कि मेवाड़ की महारानी और महाराणा प्रताप की चाची मीराबाई ने उनको गुरु स्वीकार करते हुए उनसे ही भक्ति की दीक्षा ली. मीरा कहती है गुरु मिलिआ संत गुरु रविदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी. ऐसे महान संत को उनकी जयंती पर कोटि-कोटि नमन. अगर वे आज जीवित होते तो मैं अपने रक्त से उनके पांव पखारता.

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

राहुल गांधी की ऐतिहासिक बकवास

मित्रों, भारतीय राजनीति में राहुल गाँधी एक ऐसे शख्स हैं जिनको अगर हम भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा विदूषक कहें तो गलत नहीं होगा. कभी यह आदमी आलू को सोना बनाने लगता है तो कभी पिछत्तिस बोलकर नई अंक प्रणाली की स्थापना करता है तो कभी भारत की आबादी को १०० अरब बता देता है. यह आदमी कब क्या बोल जाए कोई नहीं जानता हालांकि इसके बोलने से भारत की जनता का मुफ्त में मनोरंजन जरूर हो जाता है. मित्रों, कल माननीय राष्ट्रपति के अभिभाषण के जवाब में इसने जो भाषण संसद में किया वो भी किसी बकवास से किसी भी तरह से कम नहीं था. इसने वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी को शहंशाह और अलोकतांत्रिक कहा जबकि सच्चाई यह है कि किसानों पर सैंकड़ों बार गोलीबारी कांग्रेस ने करवाई, सैंकड़ों बार विरोधी दलों की सरकारों को राष्ट्रपति शासन लगाकर बर्खास्त नेहरु और इंदिरा ने किया, यहाँ तक कि साधू-संतों पर भी इंदिरा गाँधी ने संसद के सामने गोलीबारी करवाई, देश में एक मात्र बार आतंरिक आपातकाल भी इंदिरा गाँधी ने लगाया फिर भी शहंशाह मोदी हो गए. मोदी तो इतने लोकतान्त्रिक हैं कि बंगाल और केरल में अपने कार्यकर्ताओं को हत्या तक को मूकदर्शक बने देख रहे हैं राष्ट्रपति शासन नहीं लगा रहे,शाहीन बाग़ और सिंघू बोर्डर भी उनसे खाली नहीं होता. मित्रों, राहुल जी ने अपने भाषण में एक आरोप यह लगाया है कि भारत सरकार की गलत नीतियों के कारण चीन और पाकिस्तान आज एक हो गए हैं. हद है यार चीन और पाकिस्तान कब एक नहीं थे जो आज हो गए? फिर चीन की 2025 में ताइवान और 2040 में अरुणाचल पर कब्जा करने की योजना है इसे सारी दुनिया जानती है लेकिन राहुल जी नहीं जानते तभी तो उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ २००८ में समझौता किया था. मित्रों, राहुल जी ने यह आरोप भी लगाया है कि भारत कभी राष्ट्र नहीं था और आज भी नहीं है बल्कि राज्यों का संघ है तो हम राहुल जी बता देना चाहेंगे कि आज से हजारों साल पहले श्रीमद विष्णु पुराण में घोषणा की गई थी कि उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः ।। मित्रों, अपनी एक अन्य पंक्ति में राहुल जी ने आरोप लगाया कि दलितों का ३००० सालों से शोषण हो रहा है. लगता है राहुल जी ने सिर्फ इटली का इतिहास पढ़ा है भारत का नहीं पढ़ा. जो ८०० सालों तक ख़ुद गुलाम रहे और धर्म और प्रजा की रक्षा के लिए शहादत देते रहे वो भला कैसे दूसरों का शोषण करेंगे? चाहे तैमूर से युद्ध हो या नादिरशाह या अब्दाली से या फिर शिवाजी या महाराणा प्रताप की सेना हो इतिहास गवाह है कि ब्राह्मणों से लेकर दलितों तक ने एकजुट होकर विधर्मियों का सामना किया. १८५७ के विद्रोह में गंगू मेहतर उर्फ़ गंगाराम पहलवान के योगदान को भला कोई कैसे भुला सकता है? मित्रों, रही बात राहुल जी के परनाना नेहरु की जेलयात्रा की तो नेहरूजी किस तरह जेल में रहे पूरी दुनिया जानती है. इस सम्बन्ध में मेरे मित्र श्री इन्द्रेश उनियाल जी ने अपने एक आलेख नाभा का नाटक में लिखा है कि नेहरु जी को जब सितम्बर 22, 1923 को नाभा की रियासत में अवैध रूप से प्रवेश करने और आंदोलन मे भाग लेने के लिये 2 वर्ष की कैद की सजा सुनाई गई तब मोतीलाल नेहरु खासे परेशान हो गए और गिरफ़्तारी के ३ दिन बाद ही वायसराय से बात कर नेहरु जी के लिए नाभा जेल में पांच सितारा सुविधा उपलब्ध करवाई. कहाँ नेहरू और कहाँ सावरकर की जेल यात्रा! मित्रों, राहुल जी ने दावा किया है कि उनकी दादी और उनके पिता देश के लिए शहीद हुए जबकि सच्चाई यह है कि उनकी दादी और पिता खुद उनके द्वारा पैदा किए गये आतंकवाद की भेंट चढे. राहुल जी यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आज भी उनकी पार्टी जेहादी और खालिस्तानी आतंकियों का खुलकर समर्थन करती है. मित्रों, रही बात बढती बेरोजगारी की तो जब तक जनसँख्या को कानून बनाकर कठोरतापूर्वक नियंत्रित नहीं किया जाएगा कोई माई का लाल भारत से बेरोजगारी दूर नहीं कर सकता. फिर कोरोना काल में भारत सरकार लोगों की जान बचाए या नौकरी दे? फिर सरकारी क्षेत्र में नौकरी की गुन्जाईश है ही कितनी? मित्रों, राहुल जी ने अपने भाषण में भाजपा सांसद कमलेश पासवान के बारे में कहा है कि वो गलत पार्टी में सही व्यक्ति हैं जबकि सच्चाई यह है कि राहुल जी खुल गलत पार्टी में गलत व्यक्ति हैं. वर्षों पहले जब अटल जी के बारे में भी ऐसा ही कहा गया था तब अटल जी ने कहा था कि वे सही पार्टी में सही व्यक्ति हैं क्योंकि बबूल के पेड़ पर आम नहीं फलता. मित्रों, अंत में मैं एक ऐतिहासिक घटना का जिक्र करना चाहूँगा. नेहरू आइन्सटीन से मिलने गए. मुलाकात के बाद पत्रकारों ने जब पूछा कि दोनों में क्या बातचीत हुई तो नेहरु जी ने कहा कि उन्होंने भी बकवास की और बदले में मैंने भी बकवास की. कहने का तात्पर्य यह है कि राहुल गाँधी खानदानी बकवासी है और अब तक एक-से-एक ऐतिहासिक बकवास कर चुके हैं और निश्चित रूप से आगे भी करते रहेंगे.

रविवार, 30 जनवरी 2022

योगी तेरी खैर नहीं ...

मित्रों, ज्यादा दिन नहीं हुए. यही कोई २०१८-१९ की बात है. राजस्थान में विधानसभा चुनाव चल रहे थे तब एक नारा खूब सुर्ख़ियों में था-मोदी तुझसे वैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं. हुआ भी ऐसा ही. राजस्थान की जनता ने वसुंधरा को मुख्यमंत्री के पद से हटाकर एक निहायत अयोग्य हिंदूविरोधी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया. जनता समझ रही थी कि वो वसुंधरा से बदला ले रही है लेकिन वास्तविकता कुछ और ही थी. जनता खुद कुल्हाड़ी पर पैर मारने जा रही थी. मित्रों, आज तीन-चार साल बाद राजस्थान की क्या स्थिति है? वसुंधरा तो महारानी थी और है लेकिन जनता का क्या हाल है? अगर हम कहें कि आज राजस्थान बलात्कारियों का प्रदेश बन गया है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. और सिर्फ इसलिए बन गया है क्योंकि कांग्रेस का हाथ बलात्कारियों के साथ है. सरकार न जाने क्यों मूक-बधिर नाबालिग लड़कियों के साथ हुए बलात्कार को भी जबरदस्ती सड़क-दुर्घटना बना दे रही है. आए दिन दलितों के साथ मार-पीट होती है. आदिवासी ललनाओं के साथ सामूहिक बलात्कार होते हैं. पुजारियों की हत्या होती है. जेहादियों के हौंसले इतने बुलंद हैं कि राजधानी जयपुर के शिवमंदिर की छत पर दरगाह बनाने की घिनौनी कोशिश होती है. हिन्दू डरे-सहमें हैं जैसे वो भारत में नहीं पाकिस्तान में हों. मित्रों, इतना ही नहीं किसानों की ऋण माफ़ी के बदले उनकी जमीनों की नीलामी हो रही है. वास्तव में वहां किसानों की जमीनों की नहीं बल्कि उनके सम्मान और ईज्जत की नीलामी हो रही है. छात्र बेहाल हैं. रीट तक के प्रश्न आउट हो जा रहे हैं. मित्रों, कहने का तात्पर्य यह है कि राजस्थान में वसुंधरा तो आज भी खैर से हैं अगर खैर से कोई नहीं है तो वो है राजस्थान की जनता जो बदले की भावना में इस कदर अंधी हो गई थी कि खुद अपना ही नुकसान कर बैठी. आज राजस्थान में जंगलराज है. जिसकी लाठी उसकी भैंस है. मित्रों, मैं देख रहा हूँ कि यूपी में भी कुछ हिन्दू योगी से बदला लेने की बात कर रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि अगर योगी हार गए तो यूपी में हिन्दुओं की हालत राजस्थान से भी ज्यादा बुरी हो जाएगी. राजस्थान में तो फिर भी तोतला मुख्यमंत्री है यूपी में तो अकल लेस मुख्यमंत्री बन जाएगा जो बिना मुख्यमंत्री बने ही पत्रकारों को कूटवा दे रहा है. इस संबंध में एक ताजा वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में हाथ में असलहा लिए सुरक्षाकर्मी पत्रकार खालिद चौधरी को धक्का देकर अखिलेश के पास आने से रोक रहे हैं। पत्रकार का आरोप है कि उसके साथ मारपीट भी की गई। वीडियो में वह मारो मत, मारो मत कहकर खुद को सुरक्षाकर्मियों से बचाने की कोशिश भी कर रहे हैं। मित्रों, अकल लेस ने जो टिकट बांटे हैं उस सूची को गौर से देखिएगा. उसमें ज्यादातर गुंडे हैं. कुछ तो हिन्दुओं के खिलाफ दंगा करने के आरोपी भी हैं. फिर यह भी फैक्ट है कि विकास शांति की छाँव में होता है. अकल लेस का पुराना रिकॉर्ड कहता है कि उसके मुख्यमंत्री बनते ही प्रदेश में कानून और व्यवस्था चौपट हो जाएगी और गुंडों का राज कायम हो जाएगा. आज जो अपराधी जेल की शोभा बढ़ा रहे हैं तब कैबिनेट की शोभा बढाएंगे. अच्छे पुलिस अधिकारियों को खुलेआम सड़कों पर पीटा जाएगा जिसकी बानगी कुछ दिन पहले सुपर कॉप अनिरुद्ध सिंह को पीट कर समाजवादी नेता दिखा भी चुके हैं. मित्रों, इतना ही नहीं सारी वैकेंसी यादवों और मुसलमानों से भरी जाएगी. थानों पर जेहादियों का कब्ज़ा हो जाएगा. मंदिरों पर हमले होंगे. पुजारियों जिनमें ज्यादातर ब्राह्मण हैं के दिन-दहाड़े गले रेते जाएंगे. होली मनाने पर रोक लग जाएगी. मंदिरों में जबरन नमाज पढ़ी जाएगी. मंदिरों से लाउडस्पीकर उतार दिए जाएंगे. राम मंदिर का निर्माण संकट में पड़ जाएगा. मंदिरों में घंटी न बजे यह देखने के लिए पुलिसकर्मी तैनात कर दिए जाएँगे. कुकुरमुत्ते की तरह सर्वत्र दरगाह उग आएँगे. राजस्थान को पछाड़ते हुए यूपी एक बार फिर से नंबर वन बलात्कारी स्टेट बन जाएगा. आपकी कहीं कोई सुनवाई नहीं होगी. रोते-रोते आपकी आँखों में आंसू सूख जाएंगे. मित्रों, कहने का तात्पर्य यह है कि इस बार अगर आप योगी जी से बदला लेने की सोंच कर मतदान करने की सोंच रहे हैं तो निश्चित रूप से आप अपने ही भविष्य का सर्वनाश करने जा रहे हैं. योगी जी का क्या वो तो फिर से मठ में वापस चले जाएंगे जहाँ कोई शत्रु उनकी छाया तक को नहीं छू सकता लेकिन आपका जीवन और आपके प्रदेश का जन-जीवन जरूर बर्बाद हो जाएगा. इसलिए राजस्थान से शिक्षा लीजिए कोई जरूरी नहीं कि ठेंस लगने पर ही बुद्धि खुले दूसरों को लगे ठेस से समय रहते सीख लेना कहीं बेहतर होता है.

शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

तन्ने उपराष्ट्रपति किन्ने बनाया?

मित्रों, इस बार गणतंत्र दिवस पर जब पूरा भारत, देशभक्ति में डूबा हुआ था. उस समय हमारे ही देश के एक पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी, अमेरिका में एक भारत विरोधी मंच पर, भारत के ही लोकतंत्र के ख़िलाफ़ ज़हर उगल रहे थे. भारत के 73वें गणतंत्र दिवस पर, अमेरिकी कार्यक्रम में भारत के पूर्व उप राष्ट्रपति कह रहे थे कि यहां धर्म के आधार पर असहनशीलता बढ़ गई है और अल्पसंख्यकों में डर और असुरक्षा की भावना पैदा की जा रही है. गणतंत्र दिवस के मौक़े पर हम सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम तो करते हैं ताकि कहीं पर कोई हमला ना हो जाए. कहीं कोई विस्फोट ना हो जाए. और इसके लिए हमारे सुरक्षाबल चारों तरफ़ तैनात भी रहते हैं. लेकिन जब हमारे ही देश में बैठे इस तरह के लोग भारत विरोधी विचारों से विस्फोट करते हैं तो उससे पूरी दुनिया में देश की बदनामी होती है और भारत कमज़ोर और बंटा हुआ दिखाई देता है. हद तो यह है कि ऐसे गंदे और झूठे आरोप वह व्यक्ति लगा रहा है जो दस वर्षों तक भारत का उपराष्ट्रपति रह चुका है. इस कार्यक्रम में हामिद अंसारी के अलावा, स्वरा भास्कर और बेंगलूरु के आर्कबिशप पीटर मचाडो भी शामिल थे, जो भारत में ईसाई धर्म के लोगों को ख़तरे में बता चुके हैं. आप इन लोगों को हमारे गणतंत्र के टाइम बम भी कह सकते हैं. मित्रों, सवाल ये है कि भारत के मुसलमानों को हामिद अंसारी को अपना आदर्श मानना चाहिए या गुलाम नबी आज़ाद और आरिफ मोहम्मद खान जैसे नेताओं को अपना आदर्श मानना चाहिए. उन्हें डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम से प्रेरणा लेनी चाहिए या हाफिज़ सईद जैसे आतंकवादियों को अपना नायक मानना चाहिए. इनमें से इस्लाम का सच्चा अनुयायी कौन है? हामिद अंसारी ने भारत के ख़िलाफ़ ये वैचारिक जेहादी विस्फोट उस समय किया, जब देश अपना 73वां गणतंत्र दिवस मना रहा था. ये एक वर्चुअल कार्यक्रम था, जिसका आयोजन अमेरिका की छोटी बड़ी कुल 17 संस्थाओं ने किया. इन संस्थाओं में ज़्यादातर वो हैं, जिन पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर भारत विरोधी एजेंडा चलाने के आरोप लगते रहे हैं. सोचिए, जिन संस्थाओं के डीएनए में ही भारत विरोधी विचार मिले हुए हैं, उन्हीं के कार्यक्रम में इस देश के एक पूर्व उपराष्ट्रपति ना सिर्फ़ शामिल होते हैं, बल्कि देश के ख़िलाफ़ वैचारिक धमाके भी करते हैं. मित्रों, हामिद अंसारी ने इस कार्यक्रम में भारत के ख़िलाफ़ तीन बड़ी बातें कहीं. पहली बात उन्होंने ये कही कि भारत में धर्म के आधार पर असहनशीलता बढ़ गई है और अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना पैदा की जा रही है. दूसरी बात उन्होंने ये कही कि भारत में नागरिक राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से बदलने की कोशिशें हो रही हैं. धार्मिक बहुमत वाली आबादी को राजनीति में एकाधिकार देकर असुरक्षा का माहौल पैदा किया जा रहा है. यहां बहुमत वाली आबादी से उनका मतलब हिन्दुओं से है. और तीसरी बात उन्होंने ये कही कि, भारत की मौजूदा व्यवस्था और ट्रेंड्स को राजनीतिक और कानूनी रूप से चुनौती देने की ज़रूरत है. यानी वो इस कार्यक्रम का आयोजन करने वाली संस्थाओं से भारत के ख़िलाफ एकजुट होकर राजनीतिक और कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए कह रहे हैं. अब राजनीतिक और कानून लड़ाई का मतलब क्या है? इसका मतलब है, मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था यानी जो सरकार अभी केन्द्र में है, उसे हटाना और उसके ख़िलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कानूनी संघर्ष करके उसे बदनाम करना. मित्रों, सवाल उठता है कि देश से सबकुछ पाने के बाद भी ऐसी गद्दारी क्यों? इस देश ने हामिद अंसारी को वो सबकुछ दिया, जो भारत को एक सहनशील और धर्मनिरपेक्ष देश साबित करता है. वो एक मुसलमान होते हुए 10 साल तक इस देश के उप-राष्ट्रपति रहे. इस नाते वो राज्यसभा के सभापति भी थे. इसके अलावा वो संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, अफगानिस्तान, ईरान और सऊदी अरब जैसे देशों में भारत के राजदूत और उच्चायुक्त भी रहे. वर्ष 1984 में उन्हें इसी देश में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, पद्म श्री से सम्मानित किया गया. क्या यह चिंताजनक नहीं है कि आज वो अचानक से इस देश को साम्प्रदायिक बताने लगते हैं. अगर भारत वाकई में साम्प्रदायिक है, तो एक मुसलमान होते हुए, हामिद अंसारी इस देश के 10 साल तक उप-राष्ट्रपति कैसे बने रहे? हमें लगता है कि इस देश ने हामिद अंसारी को जो सम्मान दिया, उसी सम्मान की थाली में उन्होंने छेद करने का काम किया है. इससे बड़ी विडम्बना नहीं हो सकती कि, आज भी हामिद अंसारी जैसे व्यक्ति, इस देश से सबकुछ हासिल करके उसे आसानी से बदनाम कर सकते हैं. मित्रों, बदनाम भी कहाँ और किस मंच से किया? हामिद अंसारी ने जिस कार्यक्रम में ये सारी बातें कहीं, उसका आयोजक कौन था? ये वर्चुअल कार्यक्रम अमेरिका की 17 संस्थाओं ने आयोजित किया था और इनमें से ज्यादातर भारत विरोधी एजेंडा चलाने के लिए मशहूर हैं. इनमें इंडियन अमेरिकन मुस्लिम कौंसिल, एमनेस्टी इंटरनेशनल और जेनोसाइड वाच जैसे भारत और हिंदुविरोधी संगठन प्रमुख हैं. सबसे पहले आईएएमसी नाम की संस्था के बारे की बात करते हैं. हाल ही में त्रिपुरा की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट दाख़िल किया था, जिसमें इस संस्था पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं. इसमें लिखा है कि ऐसे कई सबूत मौजूद हैं, जो ये बताते हैं कि भारत के ख़िलाफ़ आईएएमसी और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई मिल कर साथ काम कर रहे हैं. इसके अलावा ये संस्था, पाकिस्तान स्थित ‘जमात-ए-इस्लामी’ संगठन से भी मिली हुई है, जिस पर भारत में धार्मिक माहौल बिगाड़ने के आरोप हैं. पिछले साल जब त्रिपुरा में हिंसा भड़की थी, तब इस संस्था के लोगों ने सोशल मीडिया के ज़रिए भारत के ख़िलाफ़ एक मुहिम चलाई थी. जिसके तहत ये झूठी खबर फैलाई गई कि त्रिपुरा में मस्जिदों और मुस्लिम समुदाय के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है. आईएएमसी के संस्थापक, शेख उबैद पर ये आरोप भी लग चुके हैं कि उन्होंने रोहिंग्या मुसलमानों के नाम पर फंड जुटाए. बाद में इस फंड का इस्तेमाल, अमेरिका के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग में भारत को ब्लैकलिस्ट करवाने की कोशिश करने के लिए किया. मित्रों, चौंकाने वाली बात ये है कि इस संगठन से कई ऐसे लोग भी जुड़े हुए हैं, जो भारत से जम्मू कश्मीर को अलग करने के लिए अभियान चलाते रहते हैं. रशीद अहमद नाम का व्यक्ति, जो इस संस्था का मौजूदा अध्यक्ष है, वो वर्ष 2017 और 2018 में इस्लामिक मेडिकल एसोसिएशन ऑफ़ नार्थ अमेरिका नाम की संस्था का भी प्रमुख था. उसने कोरोना महामारी के दौरान भारत की मदद के लिए करोड़ों रुपए का चंदा जुटाया लेकिन बाद में इसका इस्तेमाल भारत को बदनाम करने में किया. अब सोचिए, हामिद अंसारी एक ऐसी संस्था के वर्चुअल कार्यक्रम में शामिल हुए, जो भारत को तोड़ने का सपना देखती है. मित्रों, इस कार्यक्रम के आयोजकों में एमनेस्टी इंटरनेशनल नाम का एक एनजीओ भी था, जिसने सितम्बर 2020 में भारत में अपने सभी ऑपरेशंस बन्द कर दिए थे. ब्रिटेन के इस एनजीओ पर आरोप है कि उसने विदेशों से मिलने वाले करोड़ों रुपये के फण्ड की जानकारी भारत सरकार से छिपाई और भारत विरोधी एजेंडे को भी हवा दी. उदाहरण के लिए ये संस्था जम्मू कश्मीर के मुद्दे पर दुनिया भर में भारत के खिलाफ अभियान चलाती रही है. 26/11 हमले के दोषी अजमल कसाब, संसद हमले के दोषी अफज़ल गुरु और 1993 मुंबई ब्लास्ट के दोषी याकूब मेमन के समर्थन में भी इसने दुनिया भर में अभियान चलाया था. इसके अलावा भीमा कोरेगांव हिंसा को लेकर भी इस संस्था ने खूब बयान जारी किए थे. ये विशेष तौर पर विदेशों में भारत की छवि खराब करने के लिए काम करती रही है. इस कार्यक्रम में अमेरिका के भी चार सांसद भी शामिल हुए. इनकी बातों का सार ये था कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता ख़तरे में है. मित्रों, इसमें कोई संदेह नहीं कि हामिद अंसारी ने अपने देश के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया है. हामिद अंसारी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत विरोधी बातें करते हैं. लेकिन निजी जीवन में इसी देश से मिलने वाली तमाम सुख सुविधाओं का इस्तेमाल करते है. दिल्ली में उनका पता है, 31, डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलम रोड, ये एक सरकारी बंगला है, जो डेढ़ एकड़ से ज्यादा के क्षेत्र में फैला हुआ है. इस बंगले के रख रखाव का खर्च, हामिद अंसारी के टेलीफ़ोन बिल, उनके स्टाफ की सैलरी, दफ़्तर का ख़र्च, उन्हें हर महीने मिलने वाली पेंशन और सभी यात्राओं के लिए अलग से भत्ता भारत सरकार द्वारा दिया जाता है. यानी हामिद अंसारी इस देश से तमाम सुख सुविधाएं लेते हैं, लेकिन फिर इसी देश के टुकड़े टुकड़े चाहने वालों का वो साथ देते हैं. जबकि सच्चाई यह है कि भारत में आजादी के बाद से मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते हिदुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया. भारत में पुजारियों के बदले मौलवियों को सरकार वेतन देती है. भारत में तीन मुसलमान राष्ट्रपति हो चुके हैं. भारत का प्रधानमंत्री लाल किले घोषणा करता है कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है. मित्रों, फिर भी मुसलमानों के बड़े-बड़े नेताओं द्वारा ये साबित करने की कोशिश होती है कि पाकिस्तान ज़िन्दाबाद का नारा लगाना ही असली इस्लाम है. हामिद अंसारी जैसे लोगों की वजह से ही भारत, लगभग 200 वर्षों तक अंग्रेज़ों का गुलाम रहा था. आपको जानकर हैरानी होगी कि, कुल मिला कर सिर्फ़ 20 हज़ार ब्रिटिश अफसरों और सैनिकों ने 30 करोड़ भारतीयों को दो सदियों तक गुलाम बना कर रखा. सोचिए, अंग्रेज़ सिर्फ़ 20 हज़ार थे और हम 30 करोड़ थे. लेकिन इसके बावजूद हमारे देश को आज़ादी पाने में वर्षों लग गए. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हमारा देश संगठित नहीं था और हमारे लक्ष्य स्पष्ट नहीं थे. जबकि अंग्रेज़ संख्या में केवल 20 हज़ार होते हुए भी एकजुट थे और उनका मकसद साफ़ था. उन्हें भारत पर शासन करना था. वो जानते थे कि इस देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो अपने राजनीतिक फायदों के लिए उनकी गोदी में बैठ जाएंगे. वर्ना, सोचिए, ये कैसे मुमकिन होता कि केवल मुट्ठीभर अंग्रेज़ों ने करोड़ों भारतीयों को अपना गुलाम बना कर रखा. मित्रों, आज जब हामिद अंसारी की बात हो ही रही है तो उनकी एक चर्चित तस्वीर भी इन दिनों वायरल हो रही है, जो 2015 के गणतंत्र दिवस समारोह की है. इस समारोह में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनकी पत्नी बतौर मुख्य अतिथि शामिल थे. सलामी मंच पर उनके साथ भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, उस समय के उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और पूर्व केन्द्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह मौजूद थे. तब राष्ट्रगान के दौरान इस मंच पर मौजूद भारत के सभी नेता तिरंगे को सैल्यूट कर रहे थे. लेकिन हामिद अंसारी ने ऐसा नहीं किया था. ये एक तस्वीर उनके पूरे चरित्र के बारे में आपको बता देगी. वैसे, प्रोटोकोल के तहत तब उनके लिए सैल्यूट करना ज़रूरी नहीं था. लेकिन सोचिए, राष्ट्रगान के दौरान देश को सैल्यूट करने में क्या परेशानी हो सकती है, बांकी लोग भी तो प्रोटोकॉल तोड़ते हुए झंडे को सलामी दे ही रहे थे? लेकिन हामिद अंसारी भला ऐसा क्यों करने लगें, वे तो ऐसे विषधर सांप की तरह हैं जिसको दूध पिलाकर लोग ऐसी झूठी उम्मीद मन में बांधे रहते हैं कि ऐसा करने से वो अपनी दुष्टता छोड़कर संत-महात्मा बन जाएगा.

सोमवार, 24 जनवरी 2022

रेप रेप में फर्क

मित्रों, मेरे इस आलेख का शीर्षक देखकर आप चौंक जरूर गए होंगे. आप सोंच रहे होंगे कि रेप रेप होता है, सबसे जघन्य अपराध होता है, सारी रेप पीड़िताओं को एक समान दर्द होता है फिर फर्क कैसा? हमारे आपके लिए नहीं होता है, कोई फर्क नहीं होता है लेकिन सियासत के लिए फर्क होता है और बहुत होता है. मित्रों, सबसे पहले तो यह देखा जाता है कि रेप हुआ किसके साथ है. क्या वो दलित है? ऐसे मामले बड़े ही गंभीर होते हैं. फिर देखा जाता है कि आरोपी कौन है सवर्ण या अवर्ण या मुसलमान? आरोपी अगर सवर्ण और पीडिता दलित हुई तो मामला फिर काफी बिकाऊ और लम्बा चलनेवाला हो जाता है. पूरी-की-पूरी कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियाँ आनन-फानन में घटनास्थल पर पहुँच जाती हैं और पीडिता को तत्काल बिटिया का ख़िताब दे दिया जाता है. लेकिन अगर पीडिता दलित और आरोपी मुसलमान हुआ तो ऐसा मान लिया जाता है कि पीडिता को कोई दर्द नहीं हुआ होगा, यह भी मान लिया जाता है कि गलती लड़की की ही रही होगी. फिर तो कोई राजनैतिक दल उसके घर के कई सौ किलोमीटर के पास से नहीं फटकते. ऐसा लगने लगता है कि जैसे किसी हिन्दू लड़की के साथ बलात्कार भारत में नहीं पाकिस्तान में हुआ हो. अगर पीडिता सवर्ण है और आरोपी चाहे दलित, अवर्ण, मुसलमान या कोई भी हो तो मामला दबा देने लायक होता है क्योंकि सवर्णों को दर्द तो होता ही नहीं है. मित्रों, इतना ही नहीं रेप के मामलों में सियासत यह भी देखती है कि जिस राज्य में रेप हुआ है वहां किस पार्टी की सरकार है. अगर भाजपा की हुई तो मामला काफी गंभीर और अक्षम्य हो जाता है. फिर तो अगर दलित पीडिता के पड़ोस में किसी राजपूत का घर हुआ तो उसे ही बलात्कारी मान लिया जाता है फिर चाहे बलात्कार न भी हुआ हो या फिर पीडिता की मौत खुद उसके भाई की पिटाई से ही क्यों न हुई हो. आखिर राजपूतों ने आज से ८०० साल पहले तक देश पर शासन जो किया था और देश की रक्षा में करोड़ों की संख्या में बलिदान जो दिया है, आखिर राजपूतों ने हिन्दू ललनाओं की आततायियों से रक्षा के लिए अपनी जान दी है. फिर आप पूछेंगे कि जब इतिहास में राजपूतों के किसी दुष्कर्म का जिक्र ही नहीं है तो फिर वे प्रमाणित दुष्कर्मी कैसे हो गए? तो इसका जवाब है कि चूँकि बॉलीवुड की सलीम-जावेद लिखित फ़िल्में राजपूतों को बलात्कारी बताती हैं इसलिए वे बलात्कारी होते हैं, होने चाहिए और हैं. फिर चाहे हाथरस में उन्होंने पीडिता की पानी पिलाकर प्राणरक्षा ही क्यों न की हो, फिर चाहे वो कथित बलात्कार के समय फैक्ट्री में क्यों न हों. फिर चाहे वो नाटकवाली बाई पीडिता की भाभी क्यों न बन गई हो जैसे रेप न हुआ हो रेप का नाटक हो रहा हो, कोई खेल चल रहा हो और खेल-खेल में बिना किसी सबूत के घटना के ७ दिन बाद मुआवजे के लिए केस का मजमून बदल दिया जाता है और चार निरपराध राजपूतों को जेल में डाल दिया जाता है क्योंकि यही सियासत की मांग है. मित्रों, आप पूछेंगे कि अगर राज्य में कांग्रेस या दूसरे गैर भाजपाई दलों का शासन हो तब? तब तो जादूगर सरकार बड़े ही आराम से रेप को सड़क-दुर्घटना में बदल देती है और घटना-स्थल को धुलवा देती है जिससे सारे सबूत मिट जाएँ लेकिन सरकार के पास इस सवाल का जवाब नहीं होता कि ऐसी कौन-सी सड़क-दुर्घटना होती है जिसमें बोतल पीडिता के गुप्तांग में घुस जाता है? मित्रों, एक और तरह का रेप होता है और वो राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में होता है. यहाँ आरोपी मुसलमान और पीडिता दलित होती है. आप पार्टी का नेता आरोपी जेल से वापस आने के बाद पीडिता के चाचा को सरेआम पुलिसवालों के सामने गोली मार देता है और आराम से टहलता हुआ निकल जाता है जैसे वो भारत में नहीं पाकिस्तान में हो. फिर भी किसी भी दल का कोई राजनेता पीडिता के घर झाँकने तक नहीं आता और ऐसा तब होता है जबकि दिल्ली पुलिस पर हिन्दुत्ववादी सरकार का नियंत्रण होता है. मित्रों, अब तो आप समझ ही गए होंगे कि सारे रेप एक जैसे नहीं होते और उनमें भारी अंतर होता है भले ही पीडिताओं के दर्द में कोई अंतर नहीं हो रेप को देखने का सियासत का चश्मा जरूर अलग-अलग होता है.

सोमवार, 17 जनवरी 2022

यूपी में का नईखे

आपन जे महाराज बा गुंडन खातिर ऊ यमराज बा ढहल ढलमनाईल क्रिमिनल के दरबार बा, बंद पडल मेरठ के चोर बाजार बा यूपी में का नईखे, लईकी लोग सुरक्षित बिया, बिना डरे घर से निकलअतिया २४ घंटा बिजली बा, दंगा मुक्त गली बा मुख्यमंत्री ईमानदार बा, चोर लोग बेरोजगार बा अस्पताल में सुधार बा पूंजी निवेश के बहार बा आ हो के कहअता कि यूपी में कुच्छो नईखे कम भ्रष्टाचार बा गरीब आमदी के बहार बा पत्थरबाजन पर प्रहार बा बाबा के भेदभाव मुक्त वेबहार बा अब तहरा के सूझते न ईखे त हम का करीं हर तरफ होत विकास बा सुरक्षा के अहसास बा क्रिमिनल खुदे जेल में भागत बा सरकार पर विश्वास बा यूपीए में त सबकुछ बा बुझाईल साफ सुथरा शहर बा पानी से भरल नहर बा किसान के जेबी भरल बा नया नया एक्सप्रेस बे बन रहल बा आरे बुडबक अभीयो अन्हरायल बारे रे प्रदुषण मुक्त नदी के पानी बा लहलहात खेती किसानी बा रोजगार के अपार साधन बा साफ सुथरा शासन बा पूरा देश मे नंबर एक बने जा रहल बा आपन यूपी आऊर तहरा के का चाहिं रे तोहनी लोग सूधरे वाला नईखू अईसहिं गावत रह ज ईबअ कि यूपी में का बा जा आपन दिमाग के ईलाज कराबअ प्रधानमंत्री आवास योजना बा हर विद्यार्थी के छात्रवृत्ति बा हर भहीना सस्ता राशन बा साफ सुथरा नीति बा बुझाईल यूपी में का बा कि टिन के चश्मा दीं तहरा के भांग घोंटले बारे का रे आ पढ़े से मन तृप्त ना भईल त देखे-सुने खातिर निचलका लिंक पर क्लिक करीं https://youtu.be/MGLZvyVKfZE

रविवार, 16 जनवरी 2022

जबरदस्ती के गृहमंत्री नीतीश कुमार

मित्रों, अगर हम आपसे पूछें कि भारत में पुलिस को किस आधार पर काम करना चाहिए तो आप कहेंगे कि आईपीसी, सीआरपीसी, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के आदेश, संसद और राज्यों की विधानसभाओं द्वारा बनाए गए कानूनों व सरकारों और उच्चाधिकारियों द्वारा जारी आदेशों के आलोक में पुलिस को काम करना चाहिए. लेकिन वास्तविकता है क्या? बिहार की पुलिस को तो जैसे किसी कानून से मतलब ही नहीं है. जो थानेदार और पुलिस अधिकारी करें और बोलें वही कानून. मित्रों, फिर अगर हम आपसे पूछें कि पुलिस का पहला काम क्या है तो आप कहेंगे कि पुलिस का प्रथम या प्राथमिक कार्य प्राथमिकी यानि एफआईआर लिखना है. लेकिन बिहार पुलिस तो एफआईआर लिखती ही नहीं है सिर्फ सनहा दर्ज करती है. अभी दो दिन पहले बिहार की राजधानी पटना के जिस सचिवालय से बिहार का शासन चलता है उस सचिवालय की महिला कर्मचारी को किस तरह से सचिवालय थाना में महिला एएसपी और थानेदार द्वारा एफआईआर आवेदन की रिसीविंग मांगने पर अपमानित किया गया, किस तरह जेल में डाल देने की ठीक उसी तरह धमकी दी गई जैसे गंगाजल फिल्म में एसपी अमित कुमार को दारोगा मंगनीराम ने दी थी सारी दुनिया ने देखा है. मित्रों, ऐसी यह ईकलौती घटना हो ऐसा बिलकुल भी नहीं है. खुद जब मेरे साथ १ फरवरी,२०२१ को साइबर ठगी हुई और जब मैं हाजीपुर नगर थाना में एफआईआर दर्ज करवाने गया तो मुझे भी रिसीविंग नहीं दी गई. बाद में जब भी मैंने थानेदार सुबोध सिंह से संपर्क किया तो उन्होंने मुंशी से संपर्क करने को कहा. जब मुंशी से संपर्क किया तो उसने थानेदार से संपर्क करने के लिए कहा. फिर मैंने थाने पर यह सोंचकर जाना ही बंद कर दिया कि जो पुलिस एफआईआर ही नहीं दर्ज कर रही है वो मेरे १९८५६ रूपये क्या खाक बरामद करवाएगी. मित्रों, इससे पहले जब २०१७ की दिवाली के दिन राजेंद्र चौक, हाजीपुर से मेरा मोबाईल चोरी हो गया और मैं नगर थाने पर एफआईआर दर्ज करवाने गया तब मुंशी ने मुझे चोरी के एफआईआर के बदले मोबाईल गुम जाने का सनहा दर्ज करवाने को कहा और जब वो किसी तरह नहीं माना तो मुझे सनहा ही दर्ज करवाना पड़ा. बाद में मैंने अख़बार में पढ़ा कि बिहार पुलिस मोबाईल चोरी के मामले में एफआईआर दर्ज ही नहीं करती सिर्फ सनहा लिखती है. मित्रों, बलात्कार से लेकर चोरी तक के ऐसे हजारों समाचार पिछले सालों में बिहार में छप चुके हैं जिनमें फरियादी को एफआईआर के लिए कोर्ट जाना पड़ा है. यहाँ तक कि बिहार के मुख्यमंत्री ने जब जनता के दरबार में मुख्यमंत्री कार्यक्रम दोबारा शुरू किया तब सबसे ज्यादा शिकायतें बिहार पुलिस के खिलाफ ही आईं. अभी जब ३ जनवरी, २०२२ को अंतिम बार जनता का दरबार लगा उस दिन भी बिहार पुलिस के खिलाफ ऐसे-ऐसे मामले सामने आए कि बिहार के मुख्यमंत्री को जो गृह मंत्री भी हैं को चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए. किसी का बेटा दो साल से अपहृत है लेकिन एफआईआर के दो साल बाद भी न तो कोई गिरफ़्तारी ही हुई है न ही बच्चा ही बरामद हुआ है. रूपसपुर, पटना की लड़की ने आरोप लगाया कि उसके साथ बलात्कार हुआ है और कई महीने बाद भी बलात्कारी न सिर्फ खुलेआम घूम रहे हैं बल्कि दोबारा बलात्कार की धमकी भी दे रहे हैं. अररिया से आए एक युवक ने आरोप लगाया कि उसके भाई की २०२० में ही हत्या हुई लेकिन आज तक कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है. इसी तरह ६ दिसंबर, २०२१ के जनता दरबार में मधेपुरा से आए एक युवक ने आरोप लगाया कि उसे ४ गोली मारी गई थी लेकिन थानेदार अभियुक्तों की गिरफ़्तारी के लिए ४ लाख रूपया मांग रहे हैं मतलब चार गोली का चार लाख. एक गोली का रेट १ लाख. मित्रों, अभी कुछ दिन पहले बेगुसराय और भागलपुर के सोना व्यवसायी को जान से मारने की धमकी देते हुए रंगदारी मांगी गयी. दोनों ही मामलों में पुलिस ने कुछ भी नहीं किया है जबकि हर हफ्ते बिहार में कहीं-न-कहीं सोना व्यवसायी की हत्या हो रही है. बेगुसराय के पीपी ज्वेलर्स के मालिक ने तो वीडियो जारी कर नीतीश कुमार पर बिहार में फिर से जंगलराज लाने का आरोप लगाते हुए कहा है कि उन्होंने शराब की बोतल पकड़ने के लिए उनको मुख्यमंत्री नहीं बनाया था. मित्रों, ईधर बिहार पुलिस का मन इतना बढ़ गया है, खास तौर पर उन थानों में जहाँ पर थानेदार कुर्मी जाति से आते हैं कि बेवजह पहले निर्दोष लोगों को उठा लिया जाता है बाद में जंग लगे हथियार की बरामदगी दिखाकर केस बनाया जाता है. वैशाली जिले के चांदपुरा ओपी में पिछले महीनों में कई सारी ऐसी घटनाएँ घट चुकी हैं. मधुबनी के महमदपुर हत्याकांड से पहले किस तरह दारोगा महेंद्र सिंह ने संजय सिंह को झूठे एससीएसटी एक्ट मुकदमे में फंसाया था इसे भी पूरी दुनिया ने देखा है. साथ ही बिहार की सबसे विवादित पुलिस अधिकारी और मुख्यमंत्री की नाक की बाल लिपि सिंह के नेतृत्व में कैसे पूर्व डॉन पप्पू देव को उठाने के बाद पीट-पीट कर मार दिया गया यह भी पूरी दुनिया ने देखा है. मित्रों, यह बिहार पुलिस की अकर्मण्यता ही है जिसके चलते बिहार में सूचना का अधिकार का प्रयोग करना अपनी मौत को आमंत्रण देना है. पिछले ५ सालों में बिहार में २० से ज्यादा आरटीआई कार्यकर्ताओं की सरेआम हत्या हो चुकी है. मित्रों, ऐसी स्थिति में जबकि पुलिस पर मुख्यमंत्री का कोई नियंत्रण ही नहीं रह गया है न जाने क्यों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गृहमंत्री की कुर्सी पर कुंडली मारे बैठे हैं? उनके गृह मंत्री रहने से बिहार की जनता को तो कोई लाभ नहीं है अगर पूरे बिहार में किसी को कोई लाभ हो रहा है तो सिर्फ एक आदमी को है और वो आदमी हैं नीतीश कुमार. हरियाणा में जब मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर जी को लगा कि वे गृह मंत्री के पद से न्याय नहीं कर पा रहे हैं तो उन्होंने तेज तर्रार अनिल विज को गृह मंत्री बना दिया. आज तो यह विश्वास करने को भी मन नहीं कर रहा कि किसी समय नीतीश कुमार ने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा भी दिया था.