गुरुवार, 29 सितंबर 2022

बाई बाई पीएफआई

मित्रों, आतंकी संगठन पीएफआई अब गुजरे हुए कल की बात हो गई है. केंद्र सरकार की कार्रवाई और संगठन पर प्रतिबन्ध के बाद स्वयं संगठन ने खुद को समाप्त घोषित कर दिया है. निश्चित रूप से केंद्र सरकार का यह उचित समय पर उठाया गया उचित कदम है. लेकिन सवाल उठता है कि जब सिम्मी पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया तो फिर यह उससे भी ज्यादा हिंदूविरोधी तदनुसार भारतविरोधी संगठन पैदा कैसे हो गया और किन लोगों ने इसके पैदा होने व पल्लवित-पुष्पित होने में सहायता की? सवाल उठता है कि भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति और सोनिया गाँधी परिवार के लाडले मोहम्मद हामिद अंसारी साल २०१७ में इस आतंकी संगठन के कार्यक्रम में भाग लेने क्यों गए थे? जबकि यह जेहादी और आतंकी काम तो करता ही है, केरल में देशभक्तों की निर्मम हत्याओं में भी इनके कार्यकर्ता आरोपित हैं. इतना ही नहीं दिल्ली में हिन्दुओं के नरसंहार, शाहीन बाग़ सड़क जाम, उत्तर प्रदेश की तोड़फोड़ समेत तमाम ऐसे सारे हिंसक कृत्यों में इसके हाथ होने के प्रमाण हैं जिनमें मुसलमान संगठित रूप से शामिल हैं. मित्रों, इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे पूर्व उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी और उनकी कांग्रेस पार्टी ने हिन्दुओं और हिन्दुस्थान के लिए बेहद खतरनाक इस आतंकी संगठन के पैदा होने और पनपने में नैतिक समर्थन दिया और बदले में चुनावों में थोक में मुस्लिम वोट बैंक का समर्थन हासिल किया. इतना ही नहीं आज जब इस संगठन पर कार्रवाई हुई है तो भाजपा को छोड़कर किसी भी राजनैतिक दल ने कार्रवाई का समर्थन नहीं किया है बल्कि कुछ मुस्लिमजीवी कथित हिन्दू नेताओं ने तो कार्रवाई का विरोध करते हुए महान राष्ट्रवादी संगठन आरएसएस को भी प्रतिबंधित करने की मांग तक कर दी है. इन छद्मधर्मनिरपेक्ष परिवारवादी भ्रष्टाचारवादियों का वश चले तो ये सारे हिन्दुओं का सुन्नत करवा देंगे बस इनको देश और प्रदेश को लूटने का सुनहरा अवसर मिलना चाहिए और बार-बार मिलना चाहिए. केंद्र सरकार को ऐसे नेताओं के साथ पीएफआई के संबंधों की भी जाँच करनी चाहिए और उनको भी जेल में डालना चाहिए. मित्रों, जैसा कि हमने कहा कि पीएफआई पर केंद्र सरकार की कार्रवाई की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है. लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह पर्याप्त है? क्या इस रक्तबीज के रक्त से आगे कोई राक्षसी संगठन जन्म नहीं लेगा? क्या सिम्मी पर प्रतिबन्ध के बाद उसके अशुद्ध रक्त से पीएफआई पैदा नहीं हो गया था? फिर क्या गारंटी है कि पीएफआई के बाद कोई आतंकी संगठन पैदा नहीं होगा? दरअसल इन सारे फसादों की जड़ कुरान के उन २६ आयातों में है जिन्हें इस पुस्तक से हटाने की मांग सुप्रीम कोर्ट में जीतेंद्र नारायण त्यागी जी ने की थी जब वो वसीम रिजवी थे. अब इस महान आसमानी पुस्तक पर तो रोक लग नहीं सकती क्योंकि भाजपा में भी नकवी जैसे नेता हैं इसलिए केंद्र सरकार को चाहिए कि कानून बनाकर मदरसों पर रोक लगाए. साथ ही जनसंख्या कानून और समान नागरिक संहिता को तुरंत लागू किया जाए. पीएफआई के दस्तावेज भी बताते हैं कि वो जनसंख्या बढाकर भारत में इस्लाम का शासन लाना चाहता था. ऐसे इन दोनों कानूनों को और नहीं टाला जा सकता. इसके साथ ही धार्मिक स्थल कानून, १९९१ और वक्फ बोर्ड को हिन्दुओं के मंदिर और जमीनों पर कब्ज़ा करने की असीमित शक्ति देनेवाले सारे कानूनों को भी तत्काल समाप्त करना चाहिए. तभी देशविरोधी और हिंदूविरोधी सोंच और विचारधारा को कमजोर किया जा सकेगा क्योंकि पीएफआई एक संगठन नहीं विचारधारा है और हमें उस विचारधारा को जड़ से उखाड़कर उसकी जड़ों में मट्ठा डालना है.

रविवार, 18 सितंबर 2022

राहुल गाँधी की भारत तोड़ो यात्रा

मित्रों, तथाकथित भारत जोड़ो यात्रा के क्रम में राहुल गाँधी कन्याकुमारी, तमिलनाडु से यात्रा शुरू कर फिलहाल केरल में है। वाम दलों द्वारा शासित इस राज्य में यह यात्रा करीब 18 दिन रहेगी। ज्ञात हो कि केरल की वायनाड लोकसभा क्षेत्र से राहुल गांधी सांसद हैं। 20 लोकसभा सीटों वाले केरल की राष्ट्रीय राजनीति में वैसी अहमियत नहीं, जैसी कहीं अधिक सीटों वाले उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बंगाल आदि की है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि यह यात्रा चुनाव वाले राज्यों हिमाचल और गुजरात से नहीं गुजर रही है। मित्रों, अब यह कहा जा रहा है कि यह यात्रा पूरी हो जाने के बाद उसका दूसरा चरण गुजरात से शुरू होगा। इसका अर्थ है कि यह काम करीब पांच माह बाद होगा। भारत जोड़ो यात्रा केरल में तो 18 दिन रहेगी, लेकिन 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में चार-पांच दिन। इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं और सबसे पहला सवाल केरल सरकार का नेतृत्व कर रही माकपा ने उठाया। उसने इसे सीट जोड़ो यात्रा करार दिया, जिसके जवाब में कांग्रेस ने उसे भाजपा की बी टीम बता दिया। ध्यान रहे कि माकपा के साथ मिलकर कांग्रेस ने बंगाल में विधानसभा चुनाव लड़ा था। जिससे लगता है कि यह यात्रा भारत जोड़ो यात्रा नहीं बल्कि विपक्षी एकता तोड़ो यात्रा है. मित्रों, एक समय उत्तर प्रदेश कांग्रेस का गढ़ था। नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी यहीं से चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बने, लेकिन लगता है कि कांग्रेस इस राज्य में अपने लिए कोई उम्मीद नहीं देख रही है। भारत जोड़ो यात्रा का उत्तर प्रदेश में केवल चार-पांच दिन का सफर कांग्रेसजनों के लिए भी आश्चर्य का विषय है। कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश की मानें तो इस यात्रा का उद्देश्य पार्टी को मजबूती देना है, न कि विपक्षी एकता को बल देना, लेकिन वह इसकी अनदेखी कर रहे हैं कि कांग्रेस अपने बूते कितनी भी मजबूती पा ले, बिना गठबंधन वह कोई ख़ास छाप नहीं छोड़ पाएगी। जयराम रमेश का यह भी मानना है कि यदि कांग्रेस मजबूत होगी तो विपक्षी दल खुद उसके साथ आ जाएंगे, पर यह भी उनकी एक भूल ही है, क्योंकि अधिकांश भाजपा विरोधी दल उसकी कमजोरी का लाभ उठाकर उसके ही वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं। कांग्रेस इसीलिए कमजोर हुई, क्योंकि वह क्षेत्रीय दलों को साथ लेने के फेर में अपनी राजनीतिक जमीन उनके लिए छोड़ती गई। कांग्रेस भले ही यह कहे कि इस यात्रा का उद्देश्य पार्टी को मजबूती देना है, लेकिन लगता यही है कि इसका मकसद राहुल गांधी का कद बढ़ाना भर है। मित्रों, भारत जोड़ो यात्रा को शुरू हुए अभी दस दिन ही हुए हैं, लेकिन वह कई विवादों से दो-चार होकर विवादों भरी यात्रा बन चुकी है। एक विवाद जहरीले नफरती बयान देने वाले पादरी से राहुल की मुलाकात से उभरा और दूसरा कांग्रेस की ओर से आरएसएस के गणवेश को आग लगाते हुए ट्वीट से। इस ट्वीट से यही स्पष्ट हुआ कि कांग्रेस भारत जोड़ने के नाम पर आरएसएस और भाजपा पर निशाना साधना चाहती है। साथ ही राहुल और पादरी की मुलाकात का वीडियो भी वायरल हुआ है, जिसमें जॉर्ज पोन्नैया राहुल को समझाते नजर आते हैं कि केवल जीसस क्राइस्ट यानी यीशु मसीह ही एकमात्र वास्तविक भगवान हैं, कोई शक्ति देवी या देवता भगवान नहीं हैं। मतलब जिन हिन्दुओं को कांग्रेस को अपने साथ जोड़ना चाहिए उन्हीं हिन्दुओं को वो उल्टे नाराज कर रही है. कांग्रेस आज भी यह मानने को तैयार नहीं है कि हिंदुस्तान हिन्दुओं का देश है. ऐसा लगता है कि भारत को जोड़ने के लिए नहीं बल्कि हिन्दुओं से नफरत करनेवालों को अपने साथ जोड़ने निकले हैं। तभी तो उन्होंने जॉर्ज पोन्नैया जैसे व्यक्ति को भारत जोड़ो यात्रा का पोस्टर बॉय बनाया है, जिसने हिंदुओं को चुनौती दी, धमकी दी और भारत माता के बारे में अनुचित बातें कहीं। इसमें संदेह नहीं कि स्वयं कांग्रेस का हिंदू विरोधी होने का लंबा इतिहास रहा है। मित्रों, सवाल उठता है और उठाना भी चाहिए कि यदि कांग्रेस का उद्देश्य वास्तव में भारत को जोड़ना है, तो फिर वह अपने आचार-व्यवहार के माध्यम से आरएसएस-भाजपा की विचारधारा से प्रभावित हिन्दुओं को आकर्षित करने का काम क्यों नहीं करती? यदि भारत जोड़ो यात्रा का उद्देश्य सचमुच लोगों से जुड़ना है तो फिर विरोधी दलों पर अनावश्यक टीका-टिप्पणी करने का क्या मतलब है? इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस यात्रा में राहुल गांधी वही सब बयान दोहरा रहे हैं, जो वह बीते तीन-चार साल से कहते चले आ रहे हैं। इसका अर्थ है कि वह आम जनता के समक्ष कोई नया विचार नहीं रखने जा रहे हैं या फिर उनके पास कोई नवीन विचार है ही नहीं। मित्रों, भारत जोड़ो यात्रा के बीच ही गोवा के आठ कांग्रेस विधायक जिस तरह टूट कर भाजपा में चले गए, उससे कांग्रेस को झटका तो लगा ही, यह भी प्रकट हुआ कि ये विधायक पार्टी में अपना कोई भविष्य नहीं देख रहे थे। जब विधायकों का यह हाल है तो सामान्य कार्यकर्ताओं के मनोबल का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। कांग्रेस में ऐसे नेताओं की संख्या बढ़ती जा रही है, जो यह मान रहे हैं कि कुछेक चाटुकार नेता गांधी परिवार का गुणगान कर अपना हित साधने में लगे हुए हैं। उनके पास ऐसी कोई रणनीति नहीं कि देश को आगे कैसे ले जाया जाए और जनता के सामने क्या ठोस विकल्प पेश किया जाए? उनकी इस खोखली सोच के कारण ही इस समय जदयू, टीआरएस, तृणमूल कांग्रेस आदि अपने-अपने हिसाब से विपक्षी एका की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं। मित्रों, मरा हुआ हाथी भी सवा लाख का होता है. कांग्रेस के बिना विपक्षी एकता संभव नहीं, लेकिन ममता बनर्जी और केसीआर उसे साथ लिए बिना विपक्ष को एकजुट करना चाहते हैं। ये नेता यह भूल रहे हैं कि कांग्रेस के पास आज भी कहीं अधिक वोट हैं और उसे केंद्र में शासन करने का अनुभव भी है। इस सबके बावजूद कांग्रेस जिस तरह गांधी परिवार को ही अपना उद्धारक बताने में समय जाया कर रही है, वह उसकी मुश्किलों को बढ़ा रहा है। मित्रों, कांग्रेस की मुश्किलें इसलिए भी बढ़ रही हैं, क्योंकि सोनिया गांधी हों या राहुल, उनका एकमात्र लक्ष्य हर विषय पर प्रधानमंत्री को कोसना और उन्हें नीचा दिखाना है। राहुल यही काम भारत जोड़ो यात्रा के जरिये कर रहे हैं। उनके बयान उनकी नकारात्मक राजनीति को ही रेखांकित कर रहे हैं। भारत जोड़ो यात्रा यह भी बता रही है कि राहुल उन राज्यों से बचना चाहते हैं, जहां भाजपा राजनीतिक रूप से कहीं अधिक सशक्त है। भाजपा विरोधी दलों के नेता जिस तरह अपने-अपने तरीके से विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं, उससे यही स्पष्ट होता है कि उनका लक्ष्य प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी को मजबूत करना है। मुश्किल यह है कि इनमें से किसी नेता का अपने राज्य के बाहर कोई प्रभाव नहीं। इन दलों के मुकाबले कांग्रेस का प्रभाव कहीं अधिक है, लेकिन वह अपनी मूर्खतापूर्ण राजनीति के कारण न तो अपनी छवि सुधार पा रही है और न ही देश की जनता का ध्यान अपनी ओर खींच पा रही है। मित्रों, ४०० से ४४ तक पहुँचने के बाद भी कांग्रेस किस तरह विचारशून्यता और दिशाहीनता से ग्रस्त है, उससे पता चलता है कि उसके नेता और खासकर राहुल गांधी कोई नया विमर्श नहीं खड़ा कर पा रहे हैं। कांग्रेस की एक अन्य समस्या यह भी है कि वह वामपंथी और समाजवादी हिंदुविरोधी सोच से बाहर निकलने के बजाय उससे और अधिक ग्रस्त होती जा रही है. जबकि देश अब हिन्दू-राष्ट्र बनने की ओर बढ़ चुका है. साथ ही यह यात्रा उसी तरह की अत्यंत आरामदायक पांचसितारा पैदल यात्रा है जैसे गांधीजी की एक्सपेंसिव पावर्टी यानि महँगी गरीबी. जनता इस बात को भी समझ रही है.

रविवार, 11 सितंबर 2022

पीके से भयभीत नीतीश

मित्रों, करीब ढाई-तीन दशक पहले की बात है. जब मैं बीए में पढ़ रहा था तब मुझ पर शतरंज सीखने का नशा चढ़ा. मुझे लगता था कि मैं काफी तेज दिमाग का हूँ. मैंने एक किताब शतरंज कैसे खेलें और बिसात-मोहरे आदि खरीदे. जब शतरंज की एबीसीडी सीख ली तब समस्या यह थी कि खेलूँ किसके साथ. उस समय मेरा भांजा बंटी हमारे यहाँ ही रहता था. तब वो मात्र आठ-नौ साल का रहा होगा. मैंने उसे अपने साथ शतरंज खेलने को कहा. शुरू में चूंकि उसे शतरंज आती नहीं थी इसलिए मैं एकतरफा जीतता रहा. फिर एक दिन उसने मुझे मात दे दी. मैं गुस्से में आ गया और बिसात ही पलट दी. थोड़ी देर बाद मुझे लगा कि खेल तो खेल है इसमें जीत-हार होती रहती है. मित्रों, हमारे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी बिहार में अपनी संभावित हार को देखते हुए बौखला गए हैं. दरअसल उनको लगता है कि उनको कोई हरा ही नहीं सकता. वो यह समझने को तैयार ही नहीं हैं कि राजनीति भी शतरंज के खेल के समान होती है और नीतीश जी राजनीति की बिसात पर अब तक की सबसे गलत चाल चल चुके हैं. जिस परिवार और विचारधारा के खिलाफ नीतीश जी पिछले २५ सालों से राजनीति करते आ रहे हैं उसी के चरणों में जाकर लमलेट हो गए. इतना ही नहीं जो परिवार कल तक नीतीश जी की नजरों में भ्रष्टाचार का प्रतीक था आज परम पवित्र हो गया? आज उस परिवार की घोटालों से अर्जित कई हजार करोड़ की संपत्ति अचानक महा सफ़ेद हो गई? सारे पाप समाप्त? मित्रों, इतना ही नहीं नीतीश जी कह रहे हैं कि प्रशांत किशोर जी को दिख नहीं रहा कि उन्होंने बिहार के लिए क्या किया है. तो मैं नीतीश जी से कहना चाहता हूँ कि दिख तो आपको भी नहीं रहा है कि आपने बिहार के लिए क्या किया है. आज झूठे हैं और इसलिए आपका स्वयं को बिहार-निर्माता मानने का घमंड भी झूठा है क्योंकि हर झूठे व्यक्ति में झूठा घमंड होता ही है. बिहार के लिए आपने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जिसका आप जिक्र कर सकें. नीतीश जी पहले बिहार में एक ही लालू थे अब हजारों लालू हैं जो कलम दिखाकर आपकी सरकार के हजारों कार्यालयों में जनता को दिन-रात लूट रहे हैं. नीतीशजी आपके कार्यकाल में भ्रष्टाचार और नौकरशाही चरम पर है. हर तरफ रूदन और बर्बादी है. ये जंगल राज टाइप टू है. पहले गुंडे लूट रहे थे अब अधिकारी लूट रहे हैं. रक्षक भक्षक बन गए हैं. लोक शिकायत कार्यालयों में कोई समाधान नहीं मिल रहा सिर्फ मामलों को निष्पादित किया जाता है. जज को दारोगा न सिर्फ उनके चेंबर में घुसकर पीटता है बल्कि उसके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करता है और आप कहते हैं कि बिहार में कहाँ जंगल राज है. आपको अपनी ही आँख का ढेढ़र सूझ नहीं रहा है? आपके सातों निश्चय बहुत पहले दम तोड़ चुके हैं. तोड़ते भी क्यों नहीं आपने सारे ईमानदार अधिकारियों को मक्खी मारने का काम जो दे रखा है और सारे बेईमान अधिकारियों को फिल्ड में लगा रखा है. मित्रों, पूरी बिहार सरकार का ऐसा कोई महकमा नहीं जो ठीक-ठाक काम कर रहा हो. पुलिस स्वयं सबसे ज्यादा कानून तोडती है, थानों में बिना रिश्वत एफआईआर दर्ज नहीं होता. बीपीएससी दुकान बन गई है, पुल उद्घाटन से पहले गिर जा रहे हैं, नौकरी मांगने पर लाठी मारी जाती है, तिरंगे तक का अपमान किया जाता है लेकिन अधिकारी का बाल भी बांका नहीं होता. बिहार में सरकार नाम की चीज नहीं है और नीतीश जी प्रधानमंत्री बनकर पूरे भारत को बिहार बना देने के सपने देख रहे हैं. एक शाहे बेखबर मुग़ल बादशाह बहादुर शाह प्रथम था और दूसरे नीतीश कुमार जी हुए हैं. एक और मुग़ल बादशाह शाह आलम के बारे में कहा जाता था कि शहंशाहे शाह आलम, दिल्ली ते पालम. अर्थात शाह आलम का शासन तो कम-से-कम दिल्ली से पालम तक था नीतीश जी का कहीं नहीं है. मित्रों, पूरे बिहार की जनता के विश्वास के साथ धोखा करने वाले, पूरे बिहार की जनता के त्याग के साथ धोखा करनेवाले नीतीश कुमार को अब भी लगता है कि वो बिना कोई उल्लेखनीय काम किए सिर्फ सामाजिक समीकरण के बल पर फिर से चुनाव जीत जाएंगे. नीतीश जी सत्ता के नशे से बाहर आईए. आप प्रशांत जी से भयभीत हैं इसलिए अंड-बंड बोल रहे हैं. २०१५ में आपके सारथी रहे प्रशांत किशोर जी ने अब आपकी निकम्मी सरकार को उखाड़ फेंकने का बीड़ा उठा लिया है. २ अक्तूबर से उनका दांडी मार्च भी शुरू हो जाएगा जो आपके घमंड के ताबूत की आखिरी कील साबित होगा. बस दिन गिनने शुरू कर दीजिए.

रविवार, 4 सितंबर 2022

जय बोलो सुशासन की

हर दफ्तर में घूसासन की, दागी मंत्री के शपथासन की, कुर्सी पर चिपकासन की, जय बोलो सुशासन की. पुलिस के लूटासन की, सीओ के मनमनासन की, राजस्व कर्मचारी के झांसन की, काम के लटकासन की, जय बोलो सुशासन की. शिक्षा के मरणासन की, अस्पतालों के सड़नासन की, डॉक्टर इंजिनियर के कुबेरासन की, गांजा चिलम भाषण की, जय बोलो सुशासन की. सड़कों, बांधों के टूटासन की, पुलों के गिरासन की, पीएम बनने के स्वपनासन की, जय बोलो सुशासन की. भ्रष्ट परिवार से हाथ मिलासन की, पल्टूराम के पलटासन की, डाल डाल कूदासन की, नैतिकता के शीर्षासन की, बंदर के हाथ में शासन की, जय बोलो सुशासन की. जनता दरबार के ढोंगासन की, गुंडाराज के लौटासन की, सरकार के लापतासन की, जय बोलो सुशासन की.

शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

नीतीश कुमार का मंकी पॉलिटिक्स

मित्रों, आज से ४० साल पहले जब हम सुनते थे कि अमेरिका-यूरोप में छोटी-छोटी बातों पर विवाह टूट जाता है तो हमें घोर आश्चर्य होता. जैसे अगर पति-पत्नी में से कोई एक खर्राटा लेता है, पति-पत्नी के पसंद के भोजन अलग-अलग हैं इत्यादि. फिर पति और पत्नी अलग. इस तरह एक-एक पुरुष या महिला पूरे जीवन में कई-कई शादियाँ कर चुके होते हैं. मित्रों, आज जब हम बिहार के कथित समाजवादी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी की राजनीति को देखते हैं तब हमें यूरोप और अमेरिका में छोटी-छोटी बातों पर होनेवाले तलाकों पर आश्चर्य नहीं हो रहा क्योंकि यह आदमी तो कुर्सी पर बने रहने के लिए बार-बार जनमत का भी अपमान कर दे रहा है. इसके लिए जैसे गठबंधन और चुनाव बेमानी हो गए हैं. चुनाव किसी और के साथ मिलकर लड़ो और सरकार किसी और के साथ बना लो. शादी किसी और के साथ और सुहागरात किसी और के साथ. जिस देश में अटल जी ने अपनी सरकार एक वोट से गिरवा ली लेकिन खरीद-फरोख्त नहीं किया उसी देश में उनकी सहायता से बिहार की राजनीति में शून्य से शिखर तक की यात्रा करनेवाला व्यक्ति ऐसा कर रहा है. मित्रों, जिन लोगों को लगता है कि नीतीश कुमार ने अचानक रामचंद्र प्रसाद सिंह से परेशान होकर यह कदम उठाया है तो उन लोगों को हम बताना चाहेंगे कि ऐसा हरगिज नहीं है. कुछ भी अचानक नहीं हुआ है बल्कि सबकुछ सुनियोजित था. दरअसल नीतीश कुमार की राजनीति ही इसी तरह की रही है. वे हमेशा एकसाथ दो नावों की सवारी करते रहे हैं. वो जब सरकार में भाजपा के साथ होते हैं तो राजद से मेलजोल बनाए रखते हैं और जब राजद के साथ होते हैं तो भाजपा के साथ. जब-जब उनको लगने लगता है कि अब गठबंधन का सहयोगी उनके ऊपर हावी होने लगा है तब-तब वो नाव बदल लेते हैं. फिर कुछ दिनों तक जब तक हनीमून पीरियड रहता है सबकुछ ठीक लगता है और उसके बाद फिर से वही गन्दा खेल . निकाह, तलाक, हलाला और फिर से निकाह. नीतीश अचानक कुछ भी नहीं करते. नीतीश पहले गठबंधन से भागने की योजना बनाते है फिर बहानों की तलाश करते हैं. मित्रों, एक कहावत है कि लालचियों की बस्ती में ठग कभी भूखो नहीं मरते. बिहार में भी ऐसा ही हो रहा है. सत्ता किसे नहीं चाहिए? भले ही वो आधी सत्ता ही क्यों न हो सो जब भी नीतीश भाजपा या राजद की तरफ हाथ बढ़ाते हैं दोनों लपक लेते हैं और इस प्रकार पिछले २० सालों से नीतीश कुमार बिना विधायक का एक भी चुनाव लड़े मुख्यमंत्री बने हुए हैं. हमने अपने २ जनवरी, २०२२ के आलेख भाजपा-जदयू का लठबंधन में कहा था कि नीतीश विश्वसनीय नहीं है और कभी भी भाजपा के पेड़ से राजद के पेड़ पर छलांग लगा सकते हैं. मित्रों, ये तो रहा नीतीश कुमार का स्वभाव, उनकी आदत. अब बात करते हैं कि नीतीश जी की गुलाटी के पीछे और कौन-कौन से कारण हैं. तो पहला कारण है नीतीश जी का २०२० के चुनावों में बिहार की जनता से अंतिम बार वोट मांगना. २०२० के बिहार विधान सभा चुनावों में नीतीश जी बिहार की जनता से कह चुके हैं कि मुख्यमंत्री के पद के लिए यह उनका अंतिम चुनाव है. अब जबकि अगले विधान-सभा चुनाव में मात्र ३ साल बचे हैं तो नीतीश जी को उसकी तैयारी के लिए समय चाहिए. फिर भाजपा तो उनको २०२५ में मुख्यमंत्री पद के लिए आगे करने से रही क्योंकि नीतीश वादा कर चुके हैं कि मुख्यमंत्री के रूप में यह उनका अन्तिम कार्यकाल है. इसलिए भी नीतीश कुमार भाग लिए. मित्रों, एक सम्भावना यह भी है कि तेजस्वी भी उनको २०२५ में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में स्वीकार न करें तो उनके भूतपूर्व पल्टूराम और अबके पल्टूचाचा ने इसके बारे में भी सोंच रखा है और अब जबकि भाजपा ने उनको राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति नहीं बनाया तो वो प्रधानमंत्री बनने का प्रयास करेंगे. सफल हुए तो ठीक और नहीं हुए तो मुख्यमंत्री तो हैं ही. भाजपा तो उनको प्रधानमंत्री का उम्मीदवार कभी बनाती नहीं. डूबती हुई कान्ग्रेस और सत्ता के लिए छछा रहे राजद के लिए तो इस समय नीतीश सोने की खदान दिख रहे हैं. फिर राजद और विकास का तो शुरू से ही ३६ का आंकड़ा रहा है. उसको तो बस लूटना है कभी देश को तो कभी प्रदेश को. हालांकि इस बात की कोई गारंटी नहीं कि नीतीश फिर से कब भाजपा की गोद में बैठ जाएं. तो कहने का तात्पर्य यह कि नीतीश कुमार की मंकी पॉलिटिक्स को जो लोग ऐतिहासिक साबित करने में लगे हैं उन लोगों को समझ लेना चाहिए कि यह व्यक्ति चाइल्ड ऑफ़ टाइम यानी गौं का यार है. यह न तो उसका पहला पाला बदल है और न ही आखिरी. इस व्यक्ति का राजनैतिक डीएनए सचमुच गड़बड़ है. इसलिए राजद को भी यह सोंच-समझकर ही चलना होगा कि उसके साथ भी एकबार फिर से २०१७ की तरह धोखा हो सकता है. मित्रों, सवाल उठता है कि ऐसे में बिहार की जनता क्या करे? बिहार की जनता के समक्ष विकल्प क्या हैं? अभी परसों से नई सरकार का मुस्लिम तुष्टिकरण शुरू हो चुका है कल से तेजस्वी ने अपने चुनावी वादों से पल्टी मारना शुरू कर यह बता दिया है जैसे चाचा हैं वैसा ही भतीजा भी है इसलिए कथित नई सरकार से कोई उम्मीद नहीं पालिए. मेरी मानिए तो बिहार की जनता के समक्ष बस दो ही विकल्प हैं कि अब वो या तो भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत से जिताए या फिर नए लोगों को जिताए. बिहार में पिछले ३२ सालों से कथित समाजवादी लालू-नीतीश-राबड़ी का शासन है फिर भी बिहार आज भी देश का सबसे पिछड़ा और गरीब राज्य है. आज भी बिहार की हर कुर्सी भ्रष्ट है. इसलिए बिहार की जनता उसे जिताए जिसके पास जोश हो, होश हो, योजनाएं हों, ताजगी हो, लालच नहीं हो और जो जाति-संप्रदाय की राजनीति नहीं करता हो. मेरा मतलब एक बार फिर प्रशांत किशोर जी से है.

बुधवार, 3 अगस्त 2022

विकल्पहीनता से बाहर आता बिहार

मित्रों, इंकलाबी शायर दुष्यंत कुमार ने आज से कई दशक पहले भारतीय लोकतंत्र के लिए कितनी सटीक और हर युग में सामायिक कविता लिखी थी कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए, कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए। यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है, चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए। न हो क़मीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफ़र के लिए। ख़ुदा नहीं, न सही, आदमी का ख़्वाब सही, कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए। वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता, मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए। तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शाइर की, ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए। जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले, मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए। मित्रों, भारत में नेता का मतलब है सपनों का सौदागर. नेता सपने बेचते हैं, वादे बेचते हैं और हम उनकी बातों में आकर बार-बार उनको चुनते रहते हैं. नीतीश कुमार जब मुख्यमंत्री बने और जब बिहार में सरकार चलानी शुरू की तभी हमने उनसे कहा था कि आप एक अतिवाद को छोड़ कर दूसरे अतिवाद की तरफ जा रहे हैं. लालू-राबड़ी राज में जहाँ प्रशासनिक अधिकारियों की कोई कीमत नहीं रह गई थी नीतीश राज में जनता की कोई कीमत नहीं रह गई है. लालू राज में जहाँ अपराधी जनता को लूट रहे थे नीतीश राज में अधिकारी जनता को लूट रहे हैं. बिहार जल रहा है और नीतीश जी चैन की बंशी बजा रहे हैं. या तो वे लाचार हैं और कुछ कर नहीं पा रहे हैं या फिर उनको इस घनघोर अफसरशाही में मजा आ रहा है. उन्होंने कदाचित मूकदर्शक बिहार की जनता को मूर्खदर्शक समझ लिया है. मित्रों, जब नीतीश जी के क्षेत्र हरनौत के सोनू नामक बच्चे ने नीतीशजी के सामने बिहार के सरकारी स्कूलों की पोल खोल कर रख दी तब लगा था कि अब कम-से-कम बिहार में शिक्षा की स्थिति तो सुधरेगी लेकिन सावन आते ही सारी सख्ती बरसात के पानी में बह गई. सोडावाटर का जोश ठंडा पड़ गया. अब फिर से मास्टर-मास्टरनी स्कूल से गायब हैं या लेटलतीफ हैं. हेडमास्टर सख्ती करे तो उसे पीटा जाता है. जब बिहार की राजधानी पटना के विक्रम के स्कूल की हालत ऐसी है जहाँ तीन मास्टरनी मिलकर उम्रदराज हेड मास्टरनी को कमरा बंद करके पीटती हैं तो दूर-दराज के क्षेत्रों की तो बात ही छोडिए. खुद मेरे गाँव राघोपुर प्रखंड के जुड़ावनपुर बरारी में स्थित मध्य विद्यालय जुड़ावनपुर रामपुर बरारी करारी में शिक्षकों ने पीपा पुल खुलते ही भांज लगा लिया है. पहले दूरवासी जमींदार होते थे अब दूरवासी शिक्षक हैं. सबके सब अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए हाजीपुर-पटना में रहने लगे हैं. किसी दिन कोई शिक्षक स्कूल जाता है तो किसी दिन कोई. बस स्कूल का ताला खुल जाना चाहिए. बीच में जब सोनू मीडिया की सुर्ख़ियों में था तब शिक्षकों के लिए स्कूल से निर्धारित समय-सीमा के भीतर अपनी ताजी तस्वीर व्हाटस ऐप पर भेजना अनिवार्य कर दिया गया था लेकिन अब सब माफ़ है. मैं समझता हूँ कि बिहार में शिक्षा की हालत चाहे वो प्राथमिक शिक्षा हो या उच्च शिक्षा इतनी बुरी अनपढ़ राबड़ी के समय भी नहीं थी जितनी नीतीश के समय है. आखिर बिहार की जनता ने उनको स्थिति में सुधार लाने के लिए मुख्यमत्री बनाया था या बिगाड़ने और बर्बाद कर देने के लिए? मित्रों, राजस्व और भूमि सुधार विभाग के कामकाज को भी नीतीश सुधार नहीं पा रहे हैं. अभी इसी एक अगस्त को पटना के ही संपतचक सीओ कार्यालय में एक महिला रेखा देवी ने आत्मदाह करने का प्रयास किया। उसकी १५ धुर जमीन की दाखिल-ख़ारिज के लिए सीओ २ लाख रूपये की रिश्वत मांग रहा है. बिहार सरकार को यह समझना होगा कि जनता को इस बात से मतलब नहीं है कि आपने कितने सीओ को निलंबित किया, बर्खास्त किया या कितने पर जुर्माना लगाया बल्कि बिहार की जनता को तो तभी तसल्ली मिलेगी जब उसकी जमीन की दाखिल-ख़ारिज बिहार रिश्वत लिए होने लगेगी. मित्रों, बिहार में ऐसा कोई सरकारी काम नहीं जिसमें रिश्वत नहीं ली जाती. बिना रिश्वत दिए न तो राशन कार्ड बनता है और न ही १० प्रतिशत कमीशन दिए बिना प्रधानमंत्री आवास योजना का पैसा मिलता है. मनरेगा तो भ्रष्टाचार की गंगा है जिसमें ठेकेदारों के लिए ३५ प्रतिशत कमीशन फिक्स है. औद्योगिक ऋण में अनुदान की राशि घूस में चली जाती है जिससे लाभुकों को अनुदान का लाभ ही नहीं मिल पाता. हर घर नल का जल घर से कहीं ज्यादा सडकों पर बह रहा है. बिहार पुलिस से तो चम्बल के डाकू अच्छे. नीतीश जी जैसे शाहे बेखबर के गृह मंत्री होने से बिहार के पुलिस अधिकारियों को जैसे जनता को लूटने की खुली छूट मिल गई है. जनता के नौकर अफसर खुद को भगवान समझने लगे हैं. सबकुछ खुलेआम हो रहा है, सबको पता है लेकिन नीतीश जी को कुछ भी पता नहीं है. एक रंजीत रजक मांझी जी का खास था एक रंजीत कुमार सिंह नीतीश जी की नाक का बाल है. व्यक्ति बदल गए लेकिन किरदार नहीं बदला इसलिए शायद बिहार नहीं बदला. मित्रों, बिहार बदलता भी तो कैसे बिहारियों के पास विकल्प ही नहीं था. नीतीश को हटाकर लालू के उस लाल को तो मुख्यमंत्री बना नहीं सकते जो लिखी हुई हिंदी भी नहीं पढ पाता लेकिन चारा-घोटाले के पैसे के दम पर कैम्ब्रिज का दौरा करता है. फिर लालू के लाल को गद्दी सौंपने का मतलब होता बिहार को फिर से जातिवाद और यादववाद की आग में झोंक देना. यह स्थिति तो नीतीश के जंगलराज से भी बुरी स्थिति होगी. मित्रों, यह हमारे बिहार और हमारा सौभाग्य है कि अब हमारे समक्ष एक सशक्त और सक्षम विकल्प उपलब्ध है और वह विकल्प हैं प्रशांत किशोर जो हर तरह से बिहार के मुख्यमंत्री बनने के लायक हैं. प्रशांत जी के पास जोश भी है और होश भी है. योजना निर्माण के तो वो महारथी हैं. जब उनके नेतृत्व में बिहार में सरकार बनेगी तब बिहार को असली डबल ईंजन वाली सरकार मिलेगी. वर्तमान में तो सिर्फ मोदी जी की केंद्र सरकार का ईंजन चालू है नीतीश जी की सरकार का ईंजन तो कई वर्ष पहले से ही बंद है. आखिर कब तक हम बिहार के लिए बोझ बन चुके नीतीश जी को ढोते रहेंगे? आखिर कब तक? आन्दोलन की भूमि बिहार से फिर एक बार बिहार को बदलने और बचाने के लिए आन्दोलन खड़ा करना होगा जिसके लिए बेदाग छविवाले प्रशांत जी पहल कर चुके हैं. अगर बिहार को बचाना है प्रशांत किशोर को लाना है.

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

बाप रे बाप रुपया गिर रहा है

मित्रों, एक जंगल में एक खरगोश रहता था। वह बहुत ही डरपोक था। कहीं जरा-सी भी आवाज सुनाई पड़ती तो वह डरकर भागने लगता। डर के मारे वह हर वक्त अपने कान खड़े रखता। इसलिए वह कभी सुख से सो नहीं पाता था। एक दिन खरगोश एक आम के पेड़ के नीचे सो रहा था। तभी पेड़ से एक आम उसके पास आकर गिरा। आम गिरने की अवाज सुनकर वह हड़बड़ा कर उठा और उछलकर दूर जा खडा हुआ। "भागो! भागो! आसमान गिर रहा है।" चिल्लाता हुआ सरपट भागने लगा। रास्ते में उसे एक हिरन मिला। हिरन ने उससे पूछा, "अरे भाई तुम इस तरह भाग क्यों रहे हो? आखिर मामला क्या है? खरगोश ने कहा, अरे भाग, भाग! जल्दी भाग! आसमान गिर रहा है। हिरन भी डरपोक था। इसलिए वह भी भयभीत होकर उसके साथ भागने लगा। भागते-भागते दोनो जोर-जोर से चिल्ला रहे थे, "भागो! भागो! आसमान गिर रहा है।" उनकी देखादेखी डर के मारे जिराफ, भेडि़या, लोमडी, गीदड़, तथा अन्य जानवरों का झुंड भी उनके साथ भागने लगा। सभी भागते-भागते एक साथ चिल्लाते जा रहे थे, भागो! भागो! आसमान गिर रहा है। उस समय सिंह अपनी गुफा में सो रहा था। जानवरो का शोर सुनकर वह हडबड़ाकर जाग उठा। गुफा से बाहर आया, तो उसे बहुत क्रोध आया। उसने दहाड़ते हुए कहा, रूको! रूको! आखिर क्या बात है? सिंह के डर से सभी जानवर रूक गए। सबने एक स्वर मे कहा, "आसमान नीचे गिर रहा है। यह सुनकर सिंह को बड़ी हँसी आई। हँसते-हँसते उसकी आँखो में आँसू आ गए। उसने अपनी हँसी रोककर कहा, "आसमान को गिरते हुए किसने देखा है?" सब एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। अंत में सभी की निगाह खरगोश की ओर मुड़ गई तभी उसके मुँह से निकला, "आसमान का एक टुकड़ा तो उस आम के पेड़ के नीचे ही गिरा है।" "अच्छा चलो, हम वहाँ चलकर देखते हैं।" सिंह ने कहा। सिंह के साथ जानवरों की पूरी पलटन आम के पेड़ के पास पहुँची सबने इधर-उधर तलाश की। किसी को आसमान का कोई टुकड़ा कहीं नजर नही आया। हाँ, एक आम जरूर उन्हे जमीन पर गिरा हुआ दिखाई दिया। सिंह ने आम की ओर इशारा करते हुए खरगोश से पूछा, "यही है, आसमान का टुकड़ा, जिसके लिए तुमने सबको भयभीत कर दिया?" अब खरगोश को अपनी भूल समझ में आई। उसका सिर शर्म से झुक गया। वह डर के मारे थर-थर काँपने लगा. दूसरे जानवर भी इस घटना से बहुत शार्मिंदा हुए। वे अपनी गलती पर पछता रहे थे कि सुनी-सुनाई बात से डरकर वे बेकार ही भाग रहे थे। मित्रों, साल २०१४ से ही भारत में भी खरगोशों का एक समूह ऐसा रहा है जिसके पास छाती पीटने के अलावा कोई काम नहीं है. यह गैंग इन्तजार करता रहता है कि कब भारत में कुछ बुरा हो जिससे उनको मोदी सरकार को बुरा-भला कहने का मौका मिले. इस गैंग में बड़े-बड़े नेता, अर्थशास्त्री, वामपंथी विद्वान, छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी और यहाँ तक कि न्यायमूर्ति तक शामिल हैं. जुबेर को पकड़ा तो क्यों पकड़ा और नुपुर को क्यों नहीं पकड़ा अभी रुदाली गैंग का इस मुद्दे को लेकर विलाप चल ही रहा था कि रूपए ने थोडा-सा कमजोर होकर इन हिन्दुविरोधियों व तदनुसार भारतविरोधियों को आँखों में थूक लगा-लगाकर रोने का एक और सुनहरा मौका दे दिया. मित्रों, जुबेर को पकड़ा तो नुपुर शर्मा को भी क्यों पकड़ना चाहिए? क्या दोनों ने एक ही तरह का अपराध किया था? मेरी नज़र में देशद्रोह से बड़ा कोई अपराध नहीं है और जो कोई भी मेरे देश को कमजोर करता है उसको सीधे मृत्युदंड दे देना चाहिए. मित्रों, अभी जब श्रीलंका कंगाल हुआ तो यह रूदाली गैंग यह मनाने लगी कि भारत भी कंगाल हो जाए. जब हम राष्ट्रवादियों ने तथ्यों और आंकड़ों के साथ जवाब दिया कि भारत बहुत मजबूत स्थिति में है और अमेरिका से भी ज्यादा मजबूत स्थिति में है तो इन लोगों की घिन्दघी बंध गई. अब अगर हम मान भी लें कि रुपया गिरा है. मतलब गिरा है लेकिन अब नहीं गिर रहा है तो क्या सिर्फ रुपया गिरा है? दिसंबर 2021 में एक डॉलर 74.50 रुपये के बराबर था. अब 15 जुलाई के आंकड़ों को देखें तो ये 79.74 रुपये का हो गया है. इस तरह डॉलर के मुकाबले रुपया पिछले साढ़े छह महीने में गिरा है और इसका मूल्य 7% तक नीचे आ गया है. लेकिन क्या सिर्फ रुपया डॉलर के मुकाबले गिरा है? नहीं! बांकी मुद्राओं की स्थिति तो और भी बुरी है. मित्रों, साल 2022 की शुरुआत से अब तक दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले डॉलर तेजी से मजबूत हुआ है. यूरोपीय देशों की मुद्रा यूरो, ब्रिटेन की पौंड, जापान की येन, स्विट्जरलैंड की फ्रैंक, कनाडा के डॉलर और स्वीडन की क्रोना के मुकाबले डॉलर इस साल अब तक 13% तक मजबूती हासिल कर चुका है. ऐसे में रुपये की इस कमजोरी को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता है. लेकिन रूदाली गैंग को इससे क्या? उसे परेशानी रुपए के गिरने से नहीं है बल्कि मोदी के प्रधानमंत्री होने से है और २०१४ से है. मित्रों, यह सही है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय दोहरे संकट से जूझ रही है. कोविड महामारी का असर कम होने के बाद, बुरी तरह लड़खड़ाई देश की अर्थव्यवस्था के संभलने की उम्मीद थी. लेकिन महंगाई और तेजी से गिरते रुपये ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का काम और मुश्किल कर दिया है. देश में जून में खुदरा महंगाई दर 7.01 फीसदी थी. हालांकि ये मई की 7.04 फीसदी से कम है लेकिन अभी भी यह आरबीआई की अधिकतम सीमा यानी छह फीसदी से अधिक है. फिर भी यह महंगाई मौसमी है क्योंकि बरसात में सब्जियों के दाम बढ़ जाते हैं. दूसरी ओर डॉलर की तुलना में रुपए में गिरावट हुई है. मंगलवार को डॉलर की तुलना में रुपया गिर कर 80 के स्तर के पार कर गया. डॉलर महंगा होने से भारत का आयात और महंगा होता जा रहा है और इससे घरेलू बाजार में चीजों के दाम भी बढ़ रहे हैं. लेकिन यह महंगाई भी वैश्विक है और दुनिया भर में हाल के दिनों में महंगाई बढ़ी है. इसकी अहम वजह कोविड की वजह से सप्लाई के मोर्चे पर दिक्कत से लेकर हाल में रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से तेल और खाद्य वस्तुओं के दाम में इजाफा है. फिर चीन में कोविड का प्रकोप बढ़ने से उत्पादन गिरा और पूरी दुनिया में जरूरी सामानों की कमी हो गई. रॉयटर्स के मुताबिक, स्वयं अमेरिका में महंगाई दर बढ़कर 6.2 फीसदी हो गई है. यह साल 1990 के बाद की सबसे बड़ी तेजी है. अमेरिका में महंगाई 30 साल की ऊंचाई पर है। मित्रों, भारत सरकार की नीतियों की वजह से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने नवंबर से फरवरी तक पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए थे लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म हुए पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए गए. इससे अचानक महंगाई बढ़ गई. ऐसे में अगर आरबीआई रेपो रेट नहीं बढ़ाता यानी निवेश करने वालों को ज्यादा ब्याज नहीं देता तो निवेशक यहां से पैसा निकाल कर अमेरिका ले जाते. चूंकि महंगाई से परेशान अमेरिका में अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ब्याज दर बढ़ा रहा है इसलिए हमारे यहां से डॉलर का निकलना शुरू हो चुका है. यानी निवेशक वहां अपना निवेश कर रहे हैं, जहां उन्हें ज्यादा ब्याज मिल रहा है. इसलिए हम ब्याज दर बढ़ा कर निवेशकों को न रोकें तो यहां से डॉलर निकलना शुरू हो जाएगा. इससे हमारा रुपया और कमजोर हो जाएगा. रुपया कमजोर होने से हमारा आयात और ज्यादा महंगा हो जाएगा और महंगाई इससे भी ज्यादा बढ़ जाएगी. मित्रों, कुछ लोग कह रहे हैं कि ऐसे दौर में जब महंगाई लगातार बढ़ती जा रही तो सरकार ने क्या सोच कर कई जरूरी चीजों पर जीएसटी बढ़ाने का फैसला कैसे लिया? क्या ये लोगों पर दोहरी मार नहीं है? तो इसका जवाब यह है कि जब जीएसटी की शुरुआत की गई थी तब एवरेज न्यूट्रल रेट 12 फीसदी रखने की बात हुई थी. लेकिन राजनीतिक कारणों से कई राज्यों ने यह मांग रखी कि यह रेट कम होना चाहिए. इसलिए कुछ जरूरी चीजों पर कोई जीएसटी नहीं लगाया गया और कुछ चीजों पर पांच-दस फीसदी टैक्स लगाया गया. लेकिन इससे सरकारी का राजस्व घटने लगा. पहले ही रियल एस्टेट, पेट्रोल जैसे उत्पाद जीएसटी के दायरे से बाहर हैं. इसलिए जीएसटी के जरिये जितने राजस्व का लक्ष्य था वह नहीं आ रहा है. यही वजह है कि सरकार ने जीएसटी दर बढ़ाया है. अगर जीएसटी के जरिये टैक्स नहीं आएगा देश का खर्चा कैसे चलेगा? मित्रों, भारत के कुछ घनघोर शुभचिंतक यह प्रश्न भी पूछ रहे हैं कि क्या भारत महंगाई की बढ़ी हुई दर न्यू नॉर्मल हो जाएगी? क्या अब यहां महंगाई हमेशा सात-आठ फीसदी या इससे भी ज्यादा बनी रह सकती है? तो हम कहते हैं कि न्यू-नॉर्मल की बात विदेश के संदर्भ में हो रही है. चूंकि वहां महंगाई दो फीसदी के लगभग बनी रहती है इसलिए वहां बढ़ी हुई महंगाई दर को न्यू नॉर्मल के तौर पर देखा जा रहा है. चूंकि चीन से सस्ता सामान आने की वजह से उनके यहां महंगाई कम थी. लेकिन अभी चीन से सप्लाई में दिक्कत आने की वजह से उनके यहां मैन्युफैक्चर्ड सामान महंगा हो गया है. दरअसल आरबीआई ने कोविड के वक्त काफी ज्यादा नोट छाप दिए थे ताकि सरकार को कर्ज लेने में दिक्कत न हो. महंगाई बढ़ाने में इसका भी हाथ था. अब सरकार इस लिक्विडिटी को सोखने की कोशिश कर रही है. इसलिए आगे जाकर महंगाई काबू हो सकती है. ठीक ऐसा ही अमेरिका ने भी कोविड इस समय किया था और अब अमेरिका भी बाजार से डॉलर को सोखने का प्रयास कर रहा है इसलिए वहां भी ब्याज दर बढ़ रहा है और दुनियाभर से लोग डॉलर लेकर अमेरिका की तरफ दौड़ रहे हैं. लेकिन इससे अमेरिका को भी घाटा है क्योंकि उसका भी निर्यात महंगा होता जा रहा है. मित्रों, हमारे लिए डॉलर की मजबूती और रुपये की कमजोरी नुकसानदेह भी है और फायदेमंद भी है क्योंकि इससे हमारा सामान दुनिया में सस्ता होगा और हमारे निर्यात को फायदा मिलेगा. चीन, बांग्लादेश जैसे देशों ने अपनी मुद्रा का अवमूल्यन कर दुनिया के बाजार में अपना माल सस्ता रखा और इसका उन्हें फायदा हुआ है. हमें डॉलर की जरुरत है इसलिए हम दुनिया के बाजार में सस्ता माल बेचकर ज्यादा डॉलर कमा सकते हैं. क्योंकि हमें ज्यादा आयात करना पड़ता है और इसके लिए हमें डॉलर की जरूरत पड़ती है. रही बात भारत की स्थिति पाकिस्तान या श्रीलंका जैसी होने की तो भारत की इन देशों से तुलना सरासर बेमानी ही नहीं बेईमानी है. भारत में ऐसी स्थिति कभी नहीं आएगी क्योंकि भारत का घरेलू बाजार काफी मजबूत है और इसकी अर्थव्यवस्था का आकार भी काफी बड़ा है. इसलिए भारत में पाकिस्तान और श्रीलंका जैसी स्थिति की कल्पना करना नासमझी है.

मंगलवार, 12 जुलाई 2022

भारत श्रीलंका नहीं है विघ्नसंतोषियों

मित्रों, भारत के भारत विरोधी इन दिनों श्रीलंका की परिस्थितियों की तुलना भारत से कर रहे हैं और कह रहे हैं कि वो दिन दूर नहीं जब भारत में भी श्रीलंका जैसे हालात हो जाएँगे? इस संदर्भ में मुझे एक प्रंसंग याद आ रहा है. मैंने कहीं पढ़ा था कि सोलोमन द्वीप के आदिवासियों के बीच एक विचित्र परंपरा प्रचलित है. जब भी उन्हें किसी वृक्ष को काटना होता है तो वे वृक्ष को घेरकर खड़े हो जाते हैं. उसे घंटों तक शाप देते हैं, बुरा-भला कहते हैं, कोसते रहते हैं. नकारात्मक बातें करते हैं और उसकी असमय मृत्यु की कामना करते हैं. माना जाता है कि इससे वृक्ष की सकारात्मक ऊर्जा पर नकारात्मक ऊर्जा हावी होने लगती है. जो 30 दिन के अंदर-अंदर अपना प्रभाव दिखाती है. हरे-भरे वृक्ष की टहनियां सूखने लगती हैं और वृक्ष की असमय मृत्यु भी हो जाती है, जिसके बाद आदिवासी समाज उस वृक्ष को काट देता है. इस परंपरा का वैज्ञानिक आधार क्या है, ये पता नहीं है लेकिन ये परंपरा अच्छी नहीं हो सकती. मित्रों, देश के नामी चेहरों इतिहासकार रामचंद्र गुहा, सीनियर वकील प्रशांत भूषण और बैंकर उदय कोटक जैसे लोगों को इस परंपरा में शामिल होने से बचना चाहिए.दिल्ली, मुंबई से भी कम जनसँख्या वाले श्रीलंका (Sri Lanka Crisis) में जारी संकट के बीच गुहा जैसे लोगों ने भारत जैसे विशालकाय देश के दुर्दिन की भविष्यवाणी तो शुरू कर दी है, लेकिन इस भविष्यवाणी का आधार क्या है, ये किसी भी विद्वान ने नहीं बताया है. पोथी और बहीखाता लिखने वाले विद्वानों ने ट्वीट करके या बयान देकर इतनी संक्षिप्त बातें की है कि उनकी चेतावनी भी उनकी चाह लगने लगी है. देखने से ऐसा लगता है कि देश को कोसने वाले गुट का विस्तार हो रहा है, जिसमें आदर्श चेहरे भी शामिल हो रहे हैं. मित्रों, गुहा-भूषण-कोटक ने भारत के दुर्दिन के विश्लेषण की जगह भविष्यवाणी ही क्यों की? श्रीलंका घोर आर्थिक संकट में फंसा है, जिसकी वजह से पूरी सरकार को सत्ता छोड़कर भागना पड़ा है. जो कुर्सी से चिपके रहने का हठ करके बैठे थे, उन्हें भी जनविद्रोह के आगे झुकना पड़ा है. इन्हीं परिस्थितियों में भारत के तीन विद्वानों की ओर से चेतावनी आई है कि भारत भी श्रीलंका की ही राह पर आगे बढ़ रहा है. यानी बहुत जल्द भारत की अर्थव्यवस्था ढह जाएगी, देश बर्बाद हो जाएगा, जनता सड़कों पर आ जाएगी. इतिहासकार रामचंद्र गुहा, सीनियर वकील प्रशांत भूषण और बैंकर उदय कोटक ने भारत सरकार को श्रीलंका संकट से सबक लेने की नसीहत क्यों दी है, अब ये भी समझ लेते हैं. मित्रों, बैंकर उदय कोटक ने ट्वीट करके कहा है कि- रूस यूक्रेन के बीच जंग चल रही है और ये मुश्किल ही होता जा रहा है. देशों की असल परीक्षा अब है. न्यायपालिका, रेग्युलेटरी अथॉरिटीज, पुलिस, सरकार, संसद जैसी संस्थाओं की ताकत मायने रखेगी. वो ही करना होगा जो सही है. लोकलुभावन नहीं. एक जलता लंका हम सबको बताता है कि क्या नहीं करना चाहिए. एक दौर में बैंकर उदय कोटक केंद्र की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के समर्थक रहे हैं. उन्होंने अपने ट्वीट में सरकार का कहीं नाम भी नहीं लिया है, लेकिन भावनाएं पढ़ने वाले मान रहे हैं कि बैंकर ने परोक्ष रूप से मोदी सरकार को नसीहत दी है, जिसके भविष्य का आकलन करने पर वो सहज परिस्थितियां नहीं पा रहे हैं. मित्रों, इसी तरह के एक कार्यक्रम में मीडिया से बात करते हुए इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने श्रीलंका के हालातों को भारत के लिए चेतावनी करार दिया और कहा कि- ‘श्रीलंका एशिया का सबसे समृद्ध देश हो सकता था. उनके यहां साक्षरता, स्वास्थ्य सेवाएं, लिंगानुपात की दरें ऊंची थीं. लेकिन सिंहला और बौद्ध बहुसंख्यकों की वजह ये देश बर्बाद हो गया.’ उन्होंने ये भी कहा कि अगर एक धर्म और एक भाषा को महत्व दिया गया तो भारत का हाल भी श्रीलंका जैसा होगा. दरअसल रामचंद्र गुहा ने देश के इतिहास पर अनेक मोटे-मोटे ग्रंथ लिखे हैं, लेकिन उनकी ये वन लाइनर एक पहेली है. किसी से भी पूछा जाए तो वो श्रीलंका में संकट के कई स्पष्ट कारण गिना सकता है, लेकिन धर्म और भाषा का श्रीलंका के मौजूदा संकट पर क्या प्रभाव है, ये समझने के लिए इतिहास के विद्वान का विस्तृत विचार समझना होगा, जो फिलहाल अनुपलब्ध है. मित्रों, वकील प्रशांत भूषण ने तो हद कर दी है. उन्होंने कुछ अखबारों की कटिंग्स को ट्विटर पर शेयर कर भारत और श्रीलंका के हालातों की तुलना की है. उन्होंने लिखा है कि- श्रीलंका के सत्ताधारियों ने बीते कुछ सालों में जो किया और भारत के सत्ताधारी जो आज कर रहे हैं, उनमें आपको कुछ समानता दिख रही है? क्या भारत में इसके परिणाम भी वैसे ही होंगे? जैसे आज श्रीलंका के हालात हैं? उन्होंने आगे लिखा है कि- गौरतलब है कि श्रीलंका में हालात लगातार बदतर होते जा रहे हैं और अर्थव्यवस्था इतनी कमजोर हो चली है कि विदेशी मुद्रा भंडार घटकर केवल 50 अरब डॉलर तक आ गया है. वहीं, श्रीलंका का दूसरे देशों से लिया कर्ज़ भी बढ़कर 51 अरब डॉलर तक जा पहुंचा है. दरअसल प्रशांत भूषण एक वरिष्ठ वकील हैं और उन्होंने कई बड़े केस लड़े हैं, केस की फाइलें तैयार की हैं. अन्ना आंदोलन से उनकी छवि और निखरी. परंतु ऐसे विद्वान ने भी विदेशी मुद्रा भंडार के संकट पर आधी अधूरी बात कही है. अपने ट्वीट में वजन डालने के लिए बेसिरपैर के तथ्यों को घुसाया है, तर्क से परहेज किया है. मित्रों, अब हम विचार करते हैं कि आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी भारत को कोसने वालों की लिस्ट के ही क्यों माने जाते हैं? रघुराम राजन का नाम भारतीय ब्यूरोक्रेसी में रॉकी रॉकस्टार की तरह लिया जाता है. वो 4 सितंबर, 2013 को भारतीय रिजर्व बैंक के 23वें गवर्नर बने. उनका गांधी जी की फोटो वाले नोटों पर नाम छपता रहा है. तमाम उठापटक के बीच 4 सितंबर, 2016 को उन्होंने गवर्नर का पद छोड़ दिया. इसके बाद से रघुराम राजन ने एक अलग ही इकॉनमिस्ट की छवि बनाई. पद छोड़ने के बाद वो एक नए इंडिकेटर पर व्याख्यान देने लगे हैं. भारत की अर्थव्यवस्था पर धार्मिक भेदभाव, नस्लीय भेदभाव (जिसका अर्थशास्त्री ने कोई आधार नहीं दिया है) के प्रभावों का वर्णन किया है. हाल ही में शिकागो को बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में प्रोफेसर रघुनाथ राजन ने एक व्याख्यान दिया और कहा कि- अगर भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि अल्पसंख्यक विरोधी बनती है, तो भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इंडियन प्रोडक्ट के मामले में कई तरह के नुकसानों का सामना कर सकता है. इसके साथ ही भारत में निवेश करने वाले विदेशी निवेशक भी इस बात को लेकर प्रतिक्रिया दे सकते हैं. मित्रों, इतने बड़े अनर्थशास्त्री विद्वान के ऐसे तर्क सुनकर देश की सवा अरब आबादी के दिमाग की नसें फट जानी चाहिए. दरअसल सरकार को चलाने के लिए कई सलाहकार होते हैं. लेकिन क्या कोई सलाहकार ऐसा भी होगा? जिसने सरकार को सलाह दी होगी कि चीन से सामान खरीदने के लिए अपने देश के उद्योगों पर ताला लगा दो, अन्यथा वो लद्दाख और अरुणाचल में देश की जमीन हड़प लेगा. क्या कोई ऐसा सलाहकार भी होगा, जो सरकारों को सलाह देता होगा कि दंगे होते रहने दो. सिर फूटते रहने दो. क्योंकि शासन-प्रशासन की सख्ती से देश बर्बाद हो जाता है. यहां तक कि अगर कश्मीर में पंडितों की हत्या हो रही हो, उनकी बहू-बेटियों से बलात्कार हो रहा हो, उन्हें घाटी से निकाला जा रहा हो, तो भी सरकार को मौन साध लेना चाहिए. ताकि इंडियन प्रोडक्ट दुनिया में बिकता रहे, दुनिया का भारत में पूंजी निवेश होता रहे. अगर ये सच है तो ऐसे सलाहकारों या अर्थशास्त्रियों के विचारों का एक्सरे होना चाहिए. अगर किसी ने आरबीआई गवर्नर जैसे महत्वपूर्ण पद की कुर्सी छोड़ दी हो, तो अपना ज्ञान और ध्यान भी भारत की समस्याओं से हटा लेना चाहिए. वैसे विद्वानों का कांटा कहां पर अटका हुआ है, ये कभी सार्वजनिक नहीं हो पाता. कई अर्थशास्त्रियों के IMF, WB से लेकर जाने कहां-कहां तक तार जुड़े होते हैं. न जाने उनका क्या एजेंडा होता है या फिर स्वार्थ हो सकता है? मित्रों, कुल मिलाकर बात अर्थव्यवस्था तक पहुंचती है. जिसका मतलब होता है रूपया. जिस रुपये से देश चलता है और दुनिया चलती है. IMF या WB जैसी संस्थाएं लोन देने के लिए घात लगाए बैठी रहती हैं और जिस देश को लोन देती हैं, उसकी अर्थव्यवस्था को निचोड़ लेती हैं. चीन इस मामले में सर्वाधिक कुख्यात है. जिसने श्रीलंका को मौजूदा संकट में धकेला है. बाकी संस्थाओं ने श्रीलंका को पहले ही निचोड़ लिया था. सिंधुजा सिंह ने अपने लेख में भारत और श्रीलंका की स्थितियों का विस्तृत विश्लेषण किया है. उन्होंने याद दिलाया है कि साल 2008 में द ग्रेट रेसेसन आया था. जिसमें यूरोजोन के चार देश PIGS बर्बाद हो गए. पूर्तगाल, आयरलैंड, मिस्र (ग्रीस) और स्पेन. इसकी वजह थी यहां की सरकारों के पॉपुलिस्ट फैसले. इन चारों देशों के शासकों की कोशिश थी कि वो किसी भी तरह से सत्ता में बने रहें. इसके लिए उन्होंने लोकलुभावन फैसले किए, जनता तक सामान और सेवाएं पहुंचाना जारी रखने के लिए भारी भरकम कर्ज लिए. उन्हें उम्मीद थी कि सबकुछ सामान्य हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हालत ये हो गई कि 2011 तक चारों देशों को बैंकरप्ट घोषित करना पड़ा. जिसने यूरोजोन डेट क्राइसिस (Eurozone debt crisis) को जन्म दिया. कुछ यही हाल श्रीलंका का हुआ. श्रीलंका की सरकार ने खर्च में किस तरह दरियादिली दिखाई, ये भी समझिए. 1- चीन से कर्ज लेकर मताला राजपक्षा इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाया, जो दुनिया का अब तक का सबसे वीरान एयरपोर्ट है. 2- चीन से हंबनटोटा पोर्ट के लिए 1.1 बिलियन डॉलर की डील की, लेकिन ये कर्ज श्रीलंका नहीं चुका सका और चीन को हंबनटोटा पोर्ट को 99 साल की लीज पर सौंप देना पड़ा. 3- 2014 में महिंदा राजपक्षे ने चीन के साथ मिलकर कोलंबो पोर्ट सिटी प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसे 2017 तक पूरा होना था, लेकिन 2015 में नई सरकार बनने के बाद ये प्रोजेक्ट रद्द कर दिया गया. इससे श्रीलंका की जनता को खुशी हुई और ये ही त्रासदी की वजह भी बनी. चीन कर्ज में फंसाने के लिए कुख्यात है. उसने हिंद महासागर में अपनी उपस्थिती दर्ज कराने के लिए एक चाल चली थी, जिस चाल के कामयाब होने के बाद श्रीलंका के हालात से उसने विरक्ति दिखानी शुरू कर दी है. मित्रों,अंतरराष्ट्रीय या घरेलू संबंधों में कोई भी स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, सिर्फ स्वार्थ ही स्थायी होता है. श्रीलंका ने इसे ना समझने की भूल की, जबकि भारत ने चीन से उचित दूरी बनाकर रखी. चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की साजिश को भारत ने भांप लिया था और इस प्रोजेक्ट से दूरी बना ली. इसके बाद भारत ने चीन को डोकलाम से लेकर गलवान तक आंखें नीची कर लेने को मजबूर कर दिया. नतीजा ये है कि अब बदलते वर्ल्ड ऑर्डर में दुनिया को चीन का विकल्प भारत में दिख रहा है. यह भी भारत सरकार की सफलता है. इसे कार्यकालों से नहीं तौला जा सकता. लेकिन ये स्वीकार करना चाहिए कि खुद से ज्यादा ताकतवर देश से टकराकर भारत ने एक परिपाटी तोड़ी है. सीमा की तथाकथित सुरक्षा के लिए चीन को असीमित व्यापार की छूट देने और एक तरह से धनादोहन की लिबर्टी देने से रोका गया है. श्रीलंका से उलट 2008 की क्राइसिस में भारत ने IMF से लोन न लेने का सही फैसला किया था. क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष किसी देश को मुफ्त में कर्ज नहीं देता, बल्कि इसका भारी ब्याज वसूलता है, नीतियों में परिवर्तन कराता है. यहां तक कि कर्ज लेने वाले देश की इकॉनमी भी तबाह कर देता है. श्रीलंका ने हर संभव जगह से कर्ज लिया. लेकिन पहले कोरोना और बाद में रूस-यूक्रेन युद्ध ने श्रीलंका की इकॉनमी चौपट कर दी, चाय, मसाले का कारोबार चौपट हो गया. टूरिज्म ठप पड़ गया. तो उसके लिए कर्ज चुकाना भी मुश्किल हो गया. श्रीलंका का महात्वाकांक्षी होना गलत नहीं था, लेकिन एक परिवार के लिए देश और जनता को दांव पर लगा देना गलत था, जो दो दशक तक लगातार किया गया. सबसे आश्चर्य की बात तो यह थी कि तात्कालिक लाभ के लिए २०१८ में करों में भारी कटौती की गई और उसकी भरपाई कर्ज लेकर की गई. जो लोग कह रहे थे कि तेल के अंतर्राष्ट्रीय मूल्य में कमी होने पर भारत सरकार क्यों पेट्रोल के दाम कम नहीं कर रही है उनको श्रीलंका की हालत देखकर भारत सरकार के निर्णयों की प्रशंसा कर चाहिए. साथ ही अगर हम २००६ से २०१३ के मध्य मनमोहन सरकार के समय से भारत की अर्थव्यवस्था की तुलना करें तो स्थिति बेहतर है ख़राब नहीं. उस कालखंड में भारत ने कुल २७० अरब डॉलर का विदेशी कर्ज लिया जबकि मोदी के समय सिर्फ १६० अरब डॉलर लिया गया, उस समय भारत सरकार के कर्ज और जीडीपी का अनुपात ६४ प्रतिशत था मोदी के समय ६२ रहा, उस समय विदेशी कर्ज जीडीपी अनुपात २४ प्रतिशत था मोदी के समय १९ प्रतिशत रहा, उस समय मुद्रास्फीति १०.४ थी मोदी के सात साल में ७.०४ रही. साथ ही 2013 में 270 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था जो अब 604 अरब डॉलर है. मतलब यह कि आंकड़े तो बता रहे हैं कि हालात मनमोहन सिंह के समय से अच्छे हैं. फिर जब मनमोहन सिंह के समय भारत श्रीलंका नहीं बना तो अब कैसे बन जाएगा? मित्रों, कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में लिखा है- किसी भी देश को अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए उद्योग खोलने चाहिए. भारत ने भी आत्मनिर्भर भारत का मिशन शुरू किया है. देखने से लगता है कि ये सही दिशा में उठाया गया कदम है. अगर भारत का आत्मनिर्भर होना सही ना हो तो हमें कंप्यूटर क्रांति लाने वालों से पूछना चाहिए कि आज तक देश अपने लैपटॉप, मोबाइल पर भरोसा क्यों नहीं कर सका? जय जवान-जय किसान का नारा देने वालों से पूछना चाहिए कि अगर वो किसानों के पांव पूजते रहे तो देश में किसान हाशिये पर क्यों चलते चले गए? अगर जवानों की जयकार करते रहे तो एक हथगोला तक विदेशों से ही क्यों आता रहा? प्रश्न कई हैं? लेकिन यहां मूल बात गुहा-कोटक-भूषण की टिप्पणियों की है, जिन्हें भारत का भविष्य श्रीलंका जैसा दिख रहा है. इन तीनों के अलावा रघुराम राजन भी जाने-माने विद्वान हैं. ये देश की थाती हैं, जिनकी बातें सुनी जानी चाहिए, उन्हें नीतियों में शामिल किया जाना चाहिए. लेकिन मोटे-मोटे ग्रंथ लिखने वाले इतिहासकार जब वन लाइनर टिप्पणी कर रहे हों, लंबा-चौड़ा बहीखाता तैयार करने वाले बैंकर जब ट्वीट कर रहे हों, कोर्ट के लिए हजारों पन्नों का केस तैयार करने वाले वकील ने चंद लाइनों में एक ट्वीट पर विचार व्यक्त किया हो, तो उनका मंतव्य समझना मुश्किल ही नहीं असंभव हैं. इन्हें एक तार्किक थ्योरी देनी चाहिए, जो देश को पच सके, जिससे देश को लाभ हो सके. अन्यथा अपनी नीयत को संदिग्ध बनाने से कोई लाभ नहीं है. ऐसी टिप्पणियां अपने ही वृक्ष को कोसने, शाप देने से ज्यादा कुछ साबित नहीं होंगी.

बुधवार, 29 जून 2022

सर तन से जुदा

मित्रों, सिर्फ जम्मू और कश्मीर में ही नहीं पूरे भारत में इस समय इस्लामिक आतंकवादी टारगेट किलिंग कर रहे हैं. वो दस-बीस दिन, महीनों पहले ही ऐलान कर देते हैं कि हम इस हिन्दू को मार डालेंगे क्योंकि इसने मोहम्मद या कुरान के खिलाफ बोला है. मोहम्मद के जीवन और चरित्र की आलोचना की है जो वास्तव में आलोचना के हायक है. मित्रों, सवाल उठता है कि क्या हम पाकिस्तान में हैं? क्या कारण है कि राक्षस धर्म और संस्कृति को मानने वाले बेकाबू हो रहे हैं और खासकर उन राज्यों में जहाँ कांग्रेस या विपक्ष की सरकार है? अभी जो राजस्थान में कन्हैया के साथ हुआ क्या गारंटी है कल किसी और हिन्दू के साथ नहीं हो सकता? इतिहास गवाह है कि मुसलमानों ने हमेशा हिन्दुओं के साथ छल किया, छल करके लड़ाई जीती, छल करके मारा. कन्हैया की दुकान में जब राक्षस धर्म वाले पहुंचे तो उसने समझा कि वे कपड़ा सिलवाने आए हैं और इसी विश्वास ने उसकी जान ले ली. ऐसे माहौल में सबको साथ में लेकर, सबका विकास कर सबका विश्वास प्राप्त करने की बेहूदा चाह रखने वाले मोदी जी बताएँगे कि हिन्दू कैसे मुसलमानों पर विश्वास कर सकता है? मित्रों, हम जानते हैं मोदी जी न तो सख्त कानून बनाएँगे जिससे राक्षस धर्म वालों पर नियंत्रण किया जा सके और न ही किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन ही लगाएंगे चाहे वहां मुसलमानों के हाथों कितने ही हिन्दू क्यों न मारे जाएँ. मोदी जी यह समझने को तैयार ही नहीं हैं कि साँपों को दूध पिलाने से उनका विष कम नहीं होता बढ़ता है. मोदी सरकार को खुलकर हिन्दुओं का साथ देना होगा. नहीं दे सकते तो संविधान से वो सारे प्रावधान समाप्त करने होंगे जिनमें मुसलमानों को हिन्दुओं पर वरीयता दी गई है. मित्रों, एक बात और मुसलमान शर्म नहीं करते हम हिन्दू करते हैं. जिन लोगों ने भी कन्हैया को मारा है देख लेना उलेमाओं का संगठन, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, वक्फ बोर्ड, पीएफआई आदि सारे मुस्लिम संगठन उनका मुकदमा लड़ेंगे. भारत के बड़े-बड़े हिन्दू वकील उनका मुकदमा लड़ेंगे और हो सकता है कि पूरी दुनिया में रोजाना मानवता की हत्या करने वाले मजहब माननेवाले दोनों हत्यारे कल सुप्रीम कोर्ट से बाईज्जत बरी भी हो जाएं. इस बीच भारत के हिन्दुओं को असहिष्णु और मुसलमानों को पीड़ित बताया जाता रहेगा. मित्रों, ऐसे माहौल में आखिर हम हिन्दू कब तक एकतरफा कटते रहेंगे. हमें याचना छोड़कर रण करना होगा. हमें अपने आय का एक हिस्सा हथियार खरीदने पर व्यय करना होगा चाहे वो हथियार पारंपरिक ही क्यों न हो. साथ ही देश को अब मोदी नहीं योगी चाहिए. साथ ही हमें समझना होगा कि एक भाजपा को छोड़कर कोई भी दल हिन्दुओं की रक्षा नहीं करनेवाले इसलिए अब आगे से किसी भी राज्य में मोदी तुमसे वैर नहीं ... तेरी खैर नहीं नहीं होना चाहिए. ऐसा करना जानलेवा हो सकता है.

शुक्रवार, 10 जून 2022

इस्लाम की अंतर्राष्ट्रीय फजीहत

मित्रों, हमारे गाँव एक व्यक्ति को बड़ा तगड़ा बवासीर था। डॉक्टर के पास दिखाने लेकर गया तो डॉक्टर ने बता दिया की तुम्हें बवासीर ही है। अब वो डॉक्टर को सब जगह घूम घूमकर गाली दे रहा है और कह रहा है की हाँ, ये बात सच है की मुझे बवासीर है, पर डॉक्टर की हिम्मत कैसे हुई मुझे यह बात बताने की?? अब जो बात डॉक्टर और उस व्यक्ति के बीच थी, सारे समाज के सामने है। मित्रों, कुछ इस तरह की हालत इन दिनों दुनिया के सामने इस्लाम की है. भाजपा प्रवक्ता नुपुर शर्मा ने कथित पैगम्बर हजरत मोहम्मद के बारे में एक कटु सत्य क्या बोल दिया पूरी दुनिया के मुसलमान उछलने लगे कि वो इस तथ्य को कैसे बोल सकती है? कोई यह नहीं कह रहा कि नुपूर शर्मा ने जो कहा वो झूठ है सब यही कह रहे हैं कि उसने ऐसा कैसे कहा? उसकी हिम्मत कैसे हुई? कोई कह भी नहीं सकता क्योंकि यही सच है. मित्रों, जबसे इस्लाम की उत्पत्ति हुई है इस्लाम को मानने वाले मोहम्मद के कुकृत्यों के बारे में कुछ भी सुनना नहीं चाहते जबकि मोहम्मद ने जो कुछ किया सोंच-समझकर किया. उसने जो कुछ किया, जो कुछ नियम बनाए अपने व्यक्तिगत सुख के लिए बनाए और उसे अल्लाह के नाम पर थोप दिया कि यह उसका नहीं अल्लाह का नियम है. मुसलमान एक बार में ४ शादियाँ कर सकते है लेकिन उसने ९ किए. लूट के माल में अपना हिस्सा निर्धारित कर अपने ऐशो आराम को सुनिश्चित कर लिया. साथ ही बोल दिया कि उसका विरोध अल्लाह का विरोध है इसलिए कोई विरोध नहीं करेगा, चाहे वो अपनी पुत्रवधू से विवाह करे या ६ साल की आयशा से जिसे विवाह का मतलब भी पता नहीं था. मित्रों, मैं इस्लाम पर पहले ही एक आलेख राक्षस धर्म और संस्कृति लिखकर अर्ज कर चुका हूँ कि यह भलेमानसों का धर्म है ही नहीं लुटेरों का धर्म है जो हिंसा और सेक्स के अलावा कुछ भी नहीं जानते. इनके धर्मग्रन्थ इन्हीं बातों से भरे पड़े हैं. वक्त फिल्म में राजकुमार साहब का एक प्रसिद्ध डायलग था कि जिनके घर शीशे के हों वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते लेकिन ये लोग तो हर शुक्रवार को हाथों में पत्थर लेकर ही नमाज पढने जाते हैं. जाने इनका अल्लाह कैसा है जो इनको ये सब सिखाता है? मित्रों, उस पर गजब यह कि वे हम हिन्दुओं पर हँसते हैं. अरे मूर्खों हम तो सबमें भगवान को देखते हैं. सबको भगवान का प्रतीक मानते हैं. हम तो मानते हैं कि दुनिया में जितने नाम हैं सब भगवान के नाम हैं क्योंकि सबमें भगवान हैं. जिस तरह हमें हमारी तस्वीर से पहचाना जा सकता है लेकिन हम तस्वीर नहीं होते ठीक उसी तरह भगवान की मूर्तियाँ भगवान का प्रतीक मात्र हैं वो भगवान नहीं हैं. अब अगर किसी को इतनी-सी बात समझ में नहीं आ रही तो इसमें हमारी क्या गलती है? अब अगर कोई सूरज को ऊर्जा का स्रोत न माने और हमेशा उसकी तरह घूम कर पेशाब करे तो उससे सूरज का कभी कुछ बिगड़ेगा क्या? ऐसा कोई कुकर्म नहीं जो इस्लाम में हलाल न हो. कोई धर्म क्या ऐसा होता है? मोहम्मद कहते थे हम तो मद्रास की तरफ ही जाएंगे फिर भी दिल्ली पहुंचेंगे और आज दुनियाभर के मुसलमान भी ऐसा ही कह रहे. हम कहते हैं आत्मवत सर्वभूतेषु, अतिथि देवो भव और वो कहते हैं तुम भी मुसलमान हो जाओ नहीं तो मैं तुम्हारा सिर काट दूंगा, तुम्हारे मंदिर तोड़ दूंगा, तुम्हारी बहु-बेटियों के साथ सामूहिक बलात्कार करूंगा, तुम्हारे धन-दौलत छीन लूँगा. हम कहते हैं मुंडे मुंडे मति भिन्नाः, तुम कहते हो सिर्फ तुम सही हो बांकी सारे न केवल गलत हैं बल्कि तुम उनको मिटा डालोगे. हम कहते हैं हम तुम्हें सुख पहुंचाएंगे तो हमारा भगवान खुश होगा तुम कहते हो तुम हमें जितना तडपाओगे तुम्हारा अल्लाह उतना ही खुश होता. हम कहते हैं हमारा भगवान हममें है तुम कहते हो तुम्हारा अल्लाह तुममें नहीं है बल्कि वो तुमसे अलग है और तुम्हारा मालिक है. वो तुम्हें आदेश देता है और तू गुलामों की तरह उसका पालन करता है. मित्रों, कुल मिलाकर नुपूर शर्मा प्रकरण ने न केवल हजरत मोहम्मद के कुकृत्यों को दुनिया के समक्ष उजागर कर दिया है बल्कि उन अनपढ़ मुसलमानों के सामने भी उनके चरित्र को नंगा कर दिया है जिनको अबतक यह बताया जाता था कि मोहम्मद अत्यंत महान दयालु, त्यागी और उदार थे. इस मामले में अगर किसी से गलती हुई है तो डरपोक भारत सरकार से हुई है जिसने जल्दीबाजी में यह देखे बिना नुपूर शर्मा को असामाजिक बता दिया कि उसने किन परिस्थितियों में हजरत मोहम्मद की करनी पर बोला. साथ ही भाजपा ने भी उससे पल्ला झाड़कर यह बता दिया कि वो हिन्दुओं के लिए नहीं बल्कि सिर्फ सत्ता के लिए राजनीति करती है. उसे समझना चाहिए कि कोई हिन्दू धर्म को दिन-रात गालियाँ देगा तो आखिर कब तक हिन्दू बिना जवाब दिए रह सकेगा? सबसे दुखद बात तो यह है कि भारत के मुसलमान भारत को छोड़कर अरब देशों की जय-जयकार कर रहे हैं.

गुरुवार, 2 जून 2022

नीतीश, तेजस्वी और प्रशांत किशोर

मित्रों, अरस्तू ने कहा था कि लोकतंत्र मूर्खो का शासन है और ठीक कहा था. वर्तमान बिहार और भारत के सन्दर्भ में अगर हम देखें तो. जैसा कि हम सब जानते हैं कि हमारे देश में कलक्टर, डॉक्टर, पुलिस अधीक्षक, न्यायाधीश, सेनाध्यक्ष, वैज्ञानिक परीक्षा के बाद ही चुने जाते हैं. यानि देश का हर कर्मचारी कोई न कोई परीक्षा पास करने के बाद ही अपना पद पा सकता है. मगर देश की बागडोर अनपढ़ों के हाथ में क्यों? गांव वार्ड सदस्य, सरपंच, प्रधान, विधायक, नगर पालिका का पार्षद, नगर पालिका का अध्यक्ष, नगर निगम का मेयर, संसद के सदस्य, लोकसभा के सदस्य, यहां तक कि मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का भी यही हाल है. आखिर इनकी परीक्षा क्यों नहीं ली जाती? क्या इस देश का रक्षा मंत्री सेना में था? देश का स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर क्यों नहीं? देश का शिक्षा मंत्री अध्यापक क्यों नहीं? वक्त है अपनी आंखों से परदा हटाने का. मित्रों, इसी तरह प्रसिद्ध आइरिश लेखक, पत्रकार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने प्रजातंत्र की व्याख्या कुछ इसी तरह से की है- प्रजातंत्र मूर्खों का, मूर्खों के लिए, मूर्खों द्वारा शासन है. आज हमारे देश में जिस तरीके का है शायद इसी बात की कल्पना कर ही प्रजातंत्र को ऐसे पारिभाषित की गयी है. प्रजातंत्र में प्रत्येक व्यक्ति के वोट की कीमत आँकी जाती है और उसके गणना के हिसाब से ही सरकारें बना करती हैं. वोट देने वालों में अधिकांश लोग राजनीति से बिल्कुल अनजान होते हैं, उन्हें पता हीं नहीं होता कि हम कैसी सरकार बना रहे हैं और ना ही वे जानने का प्रयास ही करते हैं. अधिकांश लोगों के जेहन में तत्कालिक घटनाक्रम ही अंकित होता है और उसी आधार पर ही सरकार बनाने के प्रयास किए जाते हैं, मतलब कि इस मामले में जनता की याददाश्त बहुत ही कमजोर होती है. चुनाव के समय जो मुद्दा सबसे ज़्यादा चर्चित होता है, जो जनता के विचार को झकझोरता है उसी मुद्दे को आधार बना कर ही जनता अपने वोट का निर्धारण करती है. जनभावनाओं के ज्वार पर बनने वाली सरकारें भी अच्छी तरह से जानती हैं कि जिस मुद्दे के आधार पर हमारी सरकारें बनी हैं वो मुद्दा कुछ समय बाद ही जनता के दिमाग़ से निकल जाएगा और फिर वे अपनी मनमानी पर उतर आती हैं और जनता बाद में ठगी सी महसूस करती रह जाती है. मित्रों, क्या आप जानते हैं कि अपने देश को कौन लोग चला रहे हैं? अपने देश भारत को मात्र १२५० परिवार चला रहे हैं. ५ साल जब एक पार्टी हमें लूट चुकी होती है तब हम उसको सबक सिखाने के लिए फिर से उसी को जिता देते हैं जिसको हमने ५ साल पहले सत्ता से हटाया था और यह सिलसिला लगातार चलता रहता है. फिर वह दल जो पिछले ५ साल से विपक्ष में होता है और भी दोगुनी गति से देश-प्रदेश को लूटता है क्योंकि उसको पिछले ५ साल की भी भरपाई करनी होती है. मित्रों, कश्मीर की राजतन्त्र में क्या हालत थी और आज क्या हालत है? ऐसा इसलिए है क्योंकि वहां मुसलमान बहुमत में हैं जो सभी गैरमुसलमानों मुसलमान बना देना चाहते हैं या फिर मार डालना चाहते हैं और लोकतंत्र तो बहुमत का शासन है. क्या लोकतंत्र के पास कश्मीर का ईलाज है? लोकतंत्र होने के बावजूद आज श्रीलंका और पाकिस्तान दिवालिया हैं और तानाशाही होने के बावजूद आज चीन दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है. मित्रों, अगर हम आंकड़ों पर नजर डालें तो साल १९६७ तक बिहार भारत के सबसे अग्रणी व सुशासित राज्यों में गिना जाता था लेकिन १९६७ से यानि जबसे बिहार में पिछड़ों की, जिसकी जितनी जनसंख्या में भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी की राजनीति करने वाले दलों का शासन हुआ बिहार पिछड़ता चला गया और पिछले २५-३० सालों से बिहार सबसे निचले पायदान पर शान से विराजमान है. मित्रों, यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे नेता बड़ी चालाकी से गाल पर पड़े थप्पड़ को भी ट्राफी में बदल देते हैं. सोनू और स्वयं मेरे द्वारा समय-समय पर बिहार की दुरावस्था को लेकर उठाए गए प्रश्नों का जब नीतीश कुमार जी के पास कोई उत्तर नहीं था तब उन्होंने विकास को लात मारकर जाति-पाति की गन्दी राजनीति शुरू कर दी. आज बिहार में सीओ डीएम और एडीएम का और अदना-सा राजस्व कर्मचारी सीओ का पैसे के बल पर तबादला करवा देता है, पैसा नहीं देने पर सीओ आँख मूंदकर दाखिल ख़ारिज के आवेदन को रद्द कर देता है, स्कूलों में पढाई नहीं होती, कॉलेज में शिक्षक ही नहीं हैं, अस्पतालों में सरकार-प्रदत्त मशीनें रखे-रखे ख़राब हो रही हैं, बैंक बिना घूस लिए लोन नहीं देते, मनरेगा सबसे भ्रष्ट योजना बन गयी है, पुलिस परित्राणाय डाकुनाम विनाशाय च साधुनाम हो गई हैं लेकिन इससे नीतीश जी को कोई फर्क नहीं पड़ता उनको बस जातीय जनगणना चाहिए. नीतीश जी हज़ार बार दिल्ली गए लेकिन मोदी जी के सामने कभी विशेष राज्य के दर्जे का मुद्दा नहीं उठाया. उनको तो बस जातीय जनगणना चाहिए फिर चाहे बिहार सारे मानदंडों पर सबसे नीचे बना रहे तो बना रहे. मैं पूछता हूँ कि जातीय जनगणना से सबसे ज्यादा फायदा किसको होगा? निश्चित रूप से सबसे ज्यादा फायदा मुसलमानों को होगा क्योंकि उनके लिए बच्चे अल्लाह की देन हैं. और जिन लोगों ने राष्ट्रहित में हम दो हमारे दो के सरकारी नारे पर अमल किया वो निश्चित रूप से सबसे ज्यादा घाटे में रहेंगे क्योंकि आज नहीं तो कल जातीय जनगणना के आधार पर आरक्षण देने की मांग जरूर उठेगी. मित्रों, फिर ऐसा कौन-सा उपाय है जिससे बिहार को फिर से देश का अग्रणी राज्य बनाया जा सके? मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि नीतीश जी को हटाकर तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाना कोई समाधान नहीं है क्योंकि दोनों में मौलिक रूप से कोई अंतर नहीं है. बिहार की जनता दोनों को देख चुकी है. दोनों की रुचि सिर्फ सत्ता प्राप्ति में है. एक नागनाथ है तो दूसरा सांपनाथ. इसलिए अगर हमें बिहार को फिर से देश का अग्रणी राज्य बनाना है तो किसी ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपनी होगी जो सिर्फ जातीय हित की बात न करके प्रदेश-हित की बात करता हो. जिसके पास दिन-प्रतिदिन की योजना हो. यह हमारा सौभाग्य है कि प्रशांत किशोर जिनमें ये सारे गुण हैं ने बिहार को बदलने की ठानी है. अगर हमें बिहार को बदलना है तो जाति-धर्म से ऊपर उठकर उनका समर्थन करना होगा अन्यथा बारी-बारी से जदयू और राजद हमें लूटती रहेंगी और हम पर भ्रष्टाचार की मार लगातार बढती जाएगी. पहले भले ही बिहारियों के सामने विकल्पहीनता की स्थिति थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. नीतीश और तेजस्वी से कहीं ज्यादा तेजस्वी और विश्वसनीय विकल्प हमारा दरवाजा खटखटा रहा है.

सोमवार, 23 मई 2022

रंजीत, सोनू और नीतीश

मित्रों, इन दिनों बिहार में मौसम बहारों जैसा भले ही हो नीतीश कुमार जी के लिए बिहार का राजनैतिक मौसम बिलकुल भी मुफीद नहीं है. एक तरफ भाजपा आरसीपी को आगे करके उनको हटाना चाहती है वहीँ दूसरी तरफ मनमोहन सिंह की तरह रेनकोट पहनकर स्नान करनेवाले नीतीश कुमार के दामन पर लगातार दाग-पर-दाग लगते जा रहे हैं. ऐसा नहीं है कि बिहार लोक सेवा आयोग में पहले गड़बड़ी नहीं होती थी. हम तो सुनते आ रहे हैं कि ५० साल पहले भी रिश्वत देने पर रैंक में सुधार कर दिया जाता था. बीपीएससी में भ्रष्टाचार था लेकिन बहुत कम. बहुत सारे युवा जो निहायत गरीब होते थे वो लालू राज में भी पास हो जाते थे लेकिन जबसे नीतीश जी मुख्यमंत्री बने हैं ऐसा होना बंद-सा हो गया है. लोग बताते हैं कि अब पूरी-की-पूरी सीट पहले ही बेच दी जाती है. आश्चर्य तो इस बात का है कि हर साल होनेवाले करोड़ों रूपये के लेनदेन के बारे में न तो ईडी और न ही सीबीआई आज तक कुछ भी पता लगा पाई है. यहाँ तक कि नीतीश जी के एक स्वजातीय नेताजी जिनसे आजकल नीतीश जी का ३६ का आंकड़ा है का नाम भाई लोगों ने वसूली भाई रख दिया था. मित्रों, इसी क्रम में नीतीश जी के एक और घनघोर नजदीकी है जिनका नाम है रंजीत कुमार सिंह, आईएएस. रंजीत वैशाली जिले की देसरी थाने के फटिकवारा गाँव के हैं. ये गुजरात कैडर के आईएएस हैं लेकिन लगातार बिहार में प्रतिनियुक्ति पर बने हुए हैं. आईएएस बनने के कुछ सालों के भीतर ही हाजीपुर के औद्योगिक क्षेत्र में जमीन के बड़े-बड़े प्लाट की इन्हें खरीदने के लिए तलाश थी. पता नहीं कितनी जमीन खरीदी जब आर्थिक अपराध ईकाई नहीं जाने तो हम कैसे जानें. लेकिन सच तो यह है कि ऊपर-ऊपर महात्मा गाँधी बननेवाले रंजीत जहाँ कहीं भी, जिस विभाग में रहे वहां जमकर गड़बड़ियाँ हुई. फलस्वरूप उनका विभाग लगातार बदलता रहा. अभी कुछ महीने पहले ही जब प्राथमिक शिक्षकों की काउंसिलिंग का भार उनके माथे पर था तब गड़बड़ियों के कारण कई जिलों में पूरी काउंसिलिंग को रद्द करना पड़ा. फिर भी उनको दण्डित करने के बदले एक बार फिर उनका विभाग बदल दिया गया. मित्रों, उन्हीं नीतीश जी के स्वजातीय रंजीत कुमार सिंह का नाम एक बार फिर से इन दिनों सुर्ख़ियों में है. बीपीएससी के इतिहास में पहली बार परीक्षा से पहले प्रश्न पत्र आउट हो गया है और उसके तार रंजीत कुमार सिंह से भी जुड़े हैं. आउट प्रश्न पत्र अन्य आरोपियों के अलावा रंजीत कुमार सिंह को भी व्हाट्स एप के माध्यम से भेजा गया था. आरोप तो यह भी लग रहा है कि सीतामढ़ी में उन्होंने कुछ प्रतियोगियों से पैसों की वसूली भी की थी. प्रति छात्र १० लाख. लेकिन बिहार पुलिस कह रही है कि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं. ऐसे कई लोग जिनके मोबाइल पर प्रश्न पत्र भेजा गया पुलिस की गिरफ्त में हैं लेकिन रंजीत कुमार सिंह समान सबूत मिलने के बावजूद बिहार सरकार में पंचायत विभाग के निदेशक जैसे महत्वपूर्ण पद पर बने हुए हैं और शायद बने रहकर बिहार की जनता की छाती पर मूंग दलने का काम करते रहेंगे. नीतीश जी के प्रिय जो ठहरे. मित्रों, अभी बीपीएससी के प्रश्न-पत्र के आउट होने और जनता के बीच मामला आउट हो जाने का मामला गरम ही था कि नीतीश जी की मति मारी गई और वो अपने गाँव कल्याण बिगहा में जनता दरबार लगा बैठे. संयोग से वहां उनके पडोसी गाँव नीमाकौल का सोनू यादव भी आया हुआ था. मध्य विद्यालय नीमकौल में पढनेवाले सोनू ने हिम्मत दिखाकर मुख्यमंत्री जी को अपने पास बुलाया और फिर जो कहा उससे न सिर्फ नीतीश कुमार बल्कि पूरी बिहार सरकार सन्नाटे में आ गई. उनसे कहा कि वो निहायत गरीब परिवार से है. उसके पिता दही बेचते हैं और वो ५वीं तक के बच्चों को ट्यूशन पढाता है लेकिन उनके पिता जमकर शराब पीते हैं और अपने साथ-साथ उसकी कमाई भी पी जाते हैं. स्कूल जहाँ वो पढता है वहाँ पढाई नहीं होती. शिक्षक आते नहीं और जो आते हैं उनको कुछ भी नहीं आता. दीपक सर को बिलकुल नहीं आता. सोनू ने नीतीश जी से मीडिया के सामने कहा कि वो आईएएस बनना चाहता है लेकिन उसमें उसके पिता की पियक्कड़ी और सरकारी स्कूल में पढाई नहीं होना बाधा बन रहा है. बमुश्किल २ मिनट में छठी कक्षा में पढनेवाले ११ वर्षीय सोनू ने नीतीश कुमार के सामने उनकी सरकार की पोल खोलकर रख दी, नंगा करके रख दिया. मित्रों, उसके बाद डैमेज कण्ट्रोल शुरू हुआ और सरकार ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे विद्यालय का दौरा भी किया करें. लेकिन सवाल उठता है कि जिन एक लाख सत्तर हजार शिक्षकों की बहाली नीतीश जी ने पंचायतों के माध्यम से करवाई उन अयोग्य शिक्षकों का वो क्या करेंगे? सोनू के स्कूल के दीपक सर जिनका सोनू ने मुख्यमंत्री जी से जिक्र किया था उन दीपक सर का क्या करेंगे जिनको एबीसीडी तक नहीं आती. मित्रों, कुल मिलाकर इन दिनों बिहार सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ की अवस्था में है. राजस्व विभाग में भी लेटलतीफ अंचलाधिकारियों पर मेरे आलेख लिखने के बाद कार्रवाई हुई है लेकिन उन लोगों के खिलाफ कुछ भी नहीं हुआ है जो पैसा नहीं देने पर बेवजह दाखिल ख़ारिज के आवेदन को अस्वीकृत कर देते हैं. होना तो यह चाहिए कि जनता को लूट-लूट कर मोटे हो चुके राजस्व विभाग के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की संपत्ति की समदरका जांच होनी चाहिए और उसके बाद उनको सीधे बर्खास्त किया जाना चाहिए. साथ ही रंजीत कुमार सिंह की संपत्ति की भी न केवल जांच होनी चाहिए बल्कि पद से बर्खास्त कर जेल भेजना चाहिए. साथ ही सारे अयोग्य और ड्यूटी से गायब रहनेवाले शिक्षकों को घर बैठना चाहिए. साथ ही शराबबंदी को लेकर किए जा रहे पाखंड को छोड़कर पूरे मन से कार्रवाई करनी होगी. साथ ही न केवल बिहार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों बल्कि उसमें काम करनेवाले अन्य लोगों की संपत्ति की भी जांच हो और ज्यादा पाए जाने पर उनको भी जेल भेला जाए. मगर ऐसा होगा क्या?

बुधवार, 11 मई 2022

मंत्री जी को शर्म आती है

मित्रों, अभी २ साल भी नहीं हुए जब हम कथित इन्टरनेट आतंकवादियों ने बिहार विधानसभा चुनावों के समय भाजपा को जिताने के लिए अपनी जान लगा दी थी इस आशा में कि इस बार सरकार अच्छा काम करेगी जिससे भ्रष्टाचार घटेगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. मित्रों, आपलोग भी जानते हैं कि बिहार ही नहीं भारत का सबसे भ्रष्ट विभाग राजस्व विभाग है. बिहार में प्रत्येक अंचल में एक अंचलाधिकारी होता है जिसके मातहत कई हल्का कर्मचारी और अंचल निरीक्षक होते हैं. हुआ यह कि मेरी कुछ जमीन वैशाली जिले के महनार अंचल के जगरनाथपुर, हरपुर, भटगामा, गोरिगामा और फटिकवारा में है जिनके दाखिल ख़ारिज के लिए हमने १ जनवरी, 2021 को आवेदन दिया था. इसमें से जगरनाथपुर, हरपुर और भटगामा का दाखिल ख़ारिज जनवरी २०२२ में कर दिया गया. तब अंचलाधिकारी महोदय ने सम्बंधित सभी दस्तावेजों का गहराई से अध्ययन किया था. अभी कल-परसों फटिकवारा का आवेदन (आवेदन संख्या-१७२२, वित्तीय वर्ष-२०२०-२१) उन्होंने इस आधार पर अस्वीकृत कर दिया है कि दस्तावेज अपठनीय है जबकि सारे दस्तावेज वही हैं जो जगरनाथपुर, हरपुर और भटगामा के आवेदन के साथ संलग्न थे. सवाल उठता है कि जो दस्तावेज जनवरी में पठनीय थे अब अपठनीय कैसे हो गए जबकि सीओ साहब वही रमेश प्रसाद सिंह जी हैं? इतना ही नहीं कर्मचारी और सीआई ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि जमीन खतियानी है, जगरानी देवी ने न्यायालय से डिक्री प्राप्त की है और जमीन उनके कब्जे में भी है फिर भी बेवजह आवेदन को मनमाने तरीके से अस्वीकृत कर दिया गया. मित्रों, जब हमने इस बारे में सीओ से बात की तो उन्होंने यह कहकर फोन काट दिया जो होना था हो गया अब डीसीएलआर के यहाँ अपील करिए, हम कुछ नहीं कर सकते. इस वार्तालाप का ऑडियो भी हमारे पास है. क्या यही वो रामराज्य है जिसके लाने का वादा भाजपा करती है? बिहार के राजस्व मंत्री राम सूरत राय भी भाजपा कोटे से हैं इसलिए यहाँ यह बहाना भी नहीं चलनेवाला कि मंत्री जदयू कोटे से है. मंत्री जी कई बात कह चुके हैं और सार्वजानिक रूप से कह चुके हैं कि उनके विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण उनको शर्म आती है लेकिन स्थिति में बदलाव के लिए कुछ करते नहीं. पूरे विभाग में बिना रिश्वत के पत्ता तक नहीं हिलता. पैसे दो तो दस्तावेज खूब पठनीय हो जाता है और नहीं दो पूरी तरह से अपठनीय हो जाता है. सबकुछ अंधाधुंध तरीके से चलाया जा रहा है. किसी की कोई जवाबदेही नहीं. मित्रों, पाँचों ऊँगली घी में और सर कढ़ाई में विभागवाले मंत्री जी को क्या सचमुच में शर्म आती है या वो शर्माने का नाटक कर रहे हैं? वैसे स्वयं मोदी जी भी कोरोना टीका लेते समय स्वीकार कर चुके हैं कि नेताओं की चमड़ी मोटी होती है. अगर मंत्री जी को सचमुच शर्म आती है तो महनार के सीओ की संपत्ति की जाँच करवाते हुए पूछा जाना चाहिए कि कर्मचारी और सीआई की रिपोर्ट सकारात्मक होने के बावजूद जगरानी देवी के फटिकवारा का दाखिल ख़ारिज का आवेदन कैसे अस्वीकृत कर दिया गया? इतना ही नहीं सीओ के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करते हुए उक्त दाखिल ख़ारिज को स्वीकृत किया जाना चाहिए. आखिर हम अपील में जाकर सीओ की मनमानी का खामियाजा भुगतते हुए क्यों हजारों रूपये खर्च करें?

मंगलवार, 3 मई 2022

नेहरु बनते मोदी

मित्रों, यह कार्टून सिर्फ एक कार्टून नहीं है बल्कि हिन्दुओं के देश हिंदुस्तान में हिन्दुओं की स्थिति को बयान करती पूरी किताब है. आजादी के बाद से ही यह हालत है, यही हालत है. आप चाहें तो फोटोशोप कर नेहरु को हटाकर मोदी को लगा सकते हैं, मोहन भागवत या इन्द्रेश कुमार को लगा सकते हैं सच्चाई में कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

रविवार, 24 अप्रैल 2022

कबीरा आप ठगाईए

मित्रों, मुझे पूरा यकीन है कि आप भी संत कबीर के इस दोहे से परिचित होंगे- कबीरा आप ठगाईए और न ठगिए कोय, आप ठगे सुख उपजे और ठगे दुख होय. सो मैंने बचपन में जबसे इस दोहे को पढ़ा इसे अपना जीवन-मंत्र बना लिया. बार-बार मुझे ठगा गया लेकिन मैंने कभी किसी को नहीं ठगा. लेकिन अब तो स्थिति भयावह हो चली है. अब ठगी एक कला बन गई है, योग्यता का पैमाना बन गई है और इस कला को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया है भारत के सॉफ्टवेयर ईंजिनियरों ने. एक वेबसाइट बना लिया और हफ्ते-दो-हफ्ते तक लोगों को लूटने के बाद बंद कर दिया. झारखण्ड का जामतारा इनकी राजधानी है. वैसे तो मुझे अभिमान था कि मेरे साथ अब तक साईबर ठगी नहीं हो पाई है लेकिन पिछले वर्ष वह अभिमान भी खंड-खंड हो गया. मित्रों, वैसे तो मेरा पूरा जीवन धूप में छाँव के ठंडे साए खोजते हुए बीता है लेकिन साल २०२१ में तो जैसे मुझ पर गम के इतने पहाड़ एक साथ टूटे कि रोजाना मुझे रिश्तों के नए-नए रूप देखने को मिले. पिताजी इस नाफानी दुनिया से दूर जा चुके थे कुल ८५ हजार की जमा पूँजी यानी अपने एक महीने के पेंशन के बराबर पैसा छोड़कर. माँ के बक्से से मात्र १९ हजार रूपये निकले. किसी तरह से हमने अपने बल पर पिताजी का श्राद्ध किया लेकिन उसके तत्काल बाद मेरे सामने वही सबसे बड़ा सवाल मुंह बाए खड़ा था कि अब आगे दाल-रोटी कैसे चलेगी. मेरी बेचैनी चरम पर थी. पिताजी के पिछले माह के पेंशन में से तीस हजार रूपये मेरे खाते में थे लेकिन हमारा एक महीने का मकान का किराया ही १० हजार था, फिर खाने-पीने, कपड़े, बच्चे की स्कूल फीस. ऐसा लगता था जैसे किसी भी समय मेरे सर के सौ टुकड़े हो जाएंगे. मित्रों, फिर मैंने सोंचा कि क्यों न टाइम्स जॉब से संपर्क किया जाए सो मैंने टाइम्स जॉब की वेबसाइट पर जाकर नौकरी के लिए आवेदन दिया. अभी चौबीस घंटे भी नहीं बीते थे कि १ फरवरी, २०२१ को मेरे पास 7440268569 नंबर से एक लड़की का फोन आया कि क्या आपने कल टाइम्स जॉब पर नौकरी के लिए आवेदन दिया था? फिर उसने वो सारे विवरण मुझे बताए जो मैंने अपने आवेदन में भरे थे. फिर उसने बताया कि आपके लिए कई सारे ऑफर आए हैं बस आपको हम एक लिंक एसएमएस कर रहे हैं आप उस पर जाकर १०० रूपये का ऑनलाइन पेमेंट कर दीजिए. फिर मुझे इसी नंबर से एक लिंक timejobsservice.com भेजा गया. जब मैंने सौ रूपये का पेमेंट करने के लिए मेरे बैंक आईसीआईसीआई द्वारा भेजा गया ओटीपी डाला तब मेरे खाते से १०० रूपये के बदले १९८५६ रूपये कट गए. सबसे आश्चर्य की बात तो यह थी कि बैंक द्वारा भेजे गए ओटीपी वाले एसएमएस में खाते से कितनी राशि निकलनेवाली है का जिक्र ही नहीं था जबकि सरकारी बैंकों से आनेवाले इस तरह के एसएमएस में राशि का भी जिक्र होता है. जैसे ही आईसीआईसीआई बैंक से १९८५६ रूपये कटने का एसएमएस आया मैं समझ गया कि मेरे साथ साईबर फ्रॉड हुआ है. इसके बाद जब मैंने 7440268569 पर फोन किया तो लड़की जो अपना नाम नेहा बता रही थी मुझे पैसा वापस कर देने का झूठा दिलासा देने लगी. जब मैं उस पर नाराज हो गया तो बोली जाओ नहीं करते पैसे वापस क्या कर लोगे? मित्रों, फिर मैं भागा-भागा आईसीआईसीआई की हाजीपुर शाखा में गया लेकिन मैनेजर ने किसी भी तरह का आवेदन लेने से मना कर दिया. फिर मैंने बैंक के कस्टमर केयर पर फोन कर मेरे साथ हुई घटना की सूचना दी. कस्टमर केयर ने बताया कि आपकी शिकायत जांच के लिए दर्ज कर ली गई है कुछ दिनों में समाधान भी हो जाएगा. इस बीच मेरे खाते में १९८५६ रूपये भी डाल दिए गए मगर वो पैसा सिर्फ दीखता था मैं उसे निकाल नहीं सकता था. मित्रों, इसके बाद मैं नगर थाना हाजीपुर गया और मामले की एफआईआर कर जाँच करने के लिए आवेदन दिया. मुंशी बोले कि अभी थानेदार फिल्ड में हैं आवेदन दे दीजिए और कल आकर पता कर लीजिएगा. फिर तो जैसे टहलाने का सिलसिला ही चल पड़ा. पहले तो थानेदार सुबोध सिंह ने कहा कि मामला छोटा है, बीस हजार का ही है, मुंशी से पता कर लीजिए कि एफआईआर हुआ कि नहीं. जब मैं मुंशी के पास गया तो उसने कहा कि उसे कुछ भी पता नहीं है थानेदार से पूछिए. कई दिनों की भागदौड़ के बाद जब मैं थानेदार पर बरस पड़ा तो उसने टका-सा जवाब दिया कि शहर में इतनी हत्या-चोरी-लूटपाट की घटनाएँ हो रही है हम उनको देखें या आपके केस को देखें. फिर मैंने बिहार पुलिस से उम्मीद ही छोड़ दी. मैं कोई प्रधानमंत्री की भतीजी तो था नहीं कि थानेदार मेरे पैसों को वापस दिलाने का जीतोड़ प्रयास करता. मित्रों, इससे पहले मैं घटना की शाम ही हाजीपुर के हिंदुस्तान कार्यालय का दरवाजा भी खटखटा चुका था. २००००रू की रकम पुलिस की नजर में भले ही बहुत छोटी हो लेकिन मेरे लिए काफी बड़ी थी. मैंने सोंचा कि पहले मैं हिंदुस्तान, पटना में रहा हूँ और हाजीपुर, हिंदुस्तान के कई स्टाफ तब मेरे सहकर्मी थे इसलिए पुलिस न सही मेरे पुराने साथी तो मेरे लिए कुछ-न-कुछ अवश्य करेंगे. लेकिन वहां भी मुझसे सारी सूचनाएँ ले ली गईं मगर मेरे साथ हुई घटना को अख़बार में स्थान नहीं दिया गया. शायद उनको मुझसे भी पैसों की उम्मीद थी. मित्रों, मेरे भीतर क्रोध का ज्वालामुखी फट रहा था. मैंने तत्काल घर लौटते ही पहले 1 फरवरी को नमो ऐप पर और फिर २ फरवरी को केन्द्रीय गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर जाकर साईबर क्राइम सेल में अपनी शिकायत दर्ज कराई. मित्रों, इस बीच दिनांक ६ फरवरी को मेरे खाते से बैंक ने १९८५६ रूपये निकाल लिए. फिर मैंने बैंक के नोडल अधिकारी के पास ऑनलाइन शिकायत की. लेकिन दिनांक १९ फरवरी को उन्होंने भी मेरे पैसा वापस करने के आवेदन को रद्द कर दिया. फिर मैंने पटना स्थित रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के बैंकिंग लोकपाल के पास शिकायत की. लेकिन ३१ जुलाई, २०२२ को उन्होंने भी मेरे दावे को नकार दिया. मैंने उससे यह भी निवेदन किया था कि वो बैंक को आदेश दे कि वो ओटीपी के साथ निकलनेवाली राशि को भी एसएमएस में शामिल करे लेकिन उसने ऐसा कोई आदेश भी नहीं दिया. मित्रों, इस बीच १४ फरवरी को मुझे वैशाली लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी ने फोन करके बुलाया और कहा कि आपने जो केन्द्रीय गृह मंत्रालय के साईबर अपराध सेल में शिकायत की थी उसका निस्तारण कर दिया गया है. उन्होंने मुझे यह भी बताया कि ऐसे मामलों में कुछ नहीं होता है. मित्रों, मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि इस समय भारत की स्थिति क्या है मेरा मामला इसका लिटमस टेस्ट है? वर्तमान भारत में सबकुछ जैसे माया है, दिखावा है. अगर आप प्रधानमंत्री की भतीजी नहीं हैं तो देश में आपकी कोई सुननेवाला नहीं है. मुझे अपने पैसे खोने का गम तो है लेकिन उससे भी बड़ा गम इस बात का है कि भविष्य में दूसरे लोगों के साथ ऐसा न हो इसके लिए इंतजाम भी नहीं किए जा रहे हैं. क्या कोई टाइम्स जॉब से पूछेगा कि जो सूचना उनके पास थी ठगों के पास कैसे चली गई? क्या कोई भारत के बैंकों को इस बात के निर्देश देगा कि भविष्य में जब ओटीपी भेजी जाए तो उसके साथ खाते से निकलनेवाली राशि का ब्यौरा भी भेजा जाए? या फिर ग्राहकों के साथ ठगों द्वारा फ्रॉड होने के बाद सरकार द्वारा भी फ्रॉड किया जाता रहेगा? सिर्फ औपचरिकता से कुछ नहीं होगा सरकार को अपनी नीयत ठीक करनी पड़ेगी. मोदी जी को यह साबित करना होगा कि अब तक जो चल रहा था वो सचमुच नहीं चलेगा. परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्.

मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

मोदी गांधी हैं या सावरकर

मित्रों, हमारे इतिहास में एक काला अध्याय है तुगलक वंश. इस वंश ने दिल्ली पर १३२० से लेकर १४१४ तक शासन किया. इस वंश का सस्थापक गयासुद्दीन तुगलक था जिसका मकबरा आज भी दिल्ली के तुगलकाबाद में है. गयासुद्दीन जब खिलजियों का सेनापति था तब उसने बहुत सारे मंदिर तोड़े, देव प्रतिमाएं खंडित की, हजारों निर्दोष, निरपराध हिन्दुओं को बेवजह मारा, हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार किए और करवाए, हजारों हिन्दू महिलाओं को सरेबाजार बेचा, हजारों हिन्दू बच्चों को हवा में उछाल कर भालों से बींध कर मार डाला और इन सभी अमानवीय क्रूर कर्म के बदले में गाजी तुगलक का ख़िताब पाया. लेकिन जब १३२० में वही गाजी तुगलक अर्थात गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली के तख़्त पर बैठा तो अचानक अजीबोगरीब हरकतें करने लगा. वो सिंहासन पर सर रखकर रोने लगता और बलबन और अलाउद्दीन खिलजी का नाम ले-लेकर छाती पीटने लगता. उसके परिजन और सिपहसलार आश्चर्यचकित और परेशान थे कि जो गाजी तुगलक कभी काफिरों यानि हिन्दुओं के लिए कहर था वो रोंदू कैसे हो गया? हालाँकि इस बात के प्रमाण नहीं मिलते कि गयासुद्दीन कभी हिन्दुओं के प्रति उदार भी हुआ था. मित्रों, मुझे लगता है कि हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी भी इस समय इसी बीमारी यानि गाजी तुगलक सिंड्रोम से ग्रस्त हैं. मोदी जब तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे तब तक मुंहजबानी ही सही हिन्दुओं के कट्टर पैरोकार रहे और उन मुसलमानों के खिलाफ लगातार बोलते रहे जिनका कुरान हिन्दुओं को लूट लेने, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार करने और हिन्दुओं को जान से मार देने का खुला और स्पष्ट आदेश देता है. जुमलावीर मोदी जब तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे अपने जुमलों में सावरकर के अनन्य प्रशंसक और भक्त रहे. उन सावरकर के जिन्होंने कहा था कि मुस्लिम तुष्टिकरण बंद होना चाहिए और भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए लेकिन वही मोदी जब भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनका एक अलग ही रूप दिखाई देता है. मोदी अचानक सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास का नारा लगाने लगते हैं. ठीक उसी तरह वे विरोधाभासी बातें करने लगते हैं जैसे कभी गाजी तुगलक करता था. लगता है जैसे मोदी के भीतर गाजी तुगलक की आत्मा घुस गई है. मित्रों, आज तक कांग्रेस पार्टी जिन मुसलमानों को मिठाई दिखाकर लोलीपोप चटा रही थी उन्हीं मुसलमानों को मोदी आईएएस-आईपीएस बनाने लगे, जिन मुसलमानों को पैसों को लाले थे उन्हीं मुसलमानों के लिए भारत सरकार के अल्पसंख्यक मंत्रालय ने पैसों की बरसात कर दी. छात्रवृत्ति, पक्का मकान, सस्ता लोन, मुफ्त का राशन आदि. लेकिन उससे हुआ क्या? मेरे एक छात्र ने जो मुज़फ्फरनगर की मशहूर फ़िल्मी हस्ती का बेटा है ने पिछले दिनों जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव चल रहे थे तब मुझे फोन कर बताया था कि इस बार यूपी में योगी वापसी नहीं करने वाले क्योंकि भाजपा को मुसलमानों का एक भी वोट नहीं मिलनेवाला है. इस दौरान बात करते हुए उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. मैंने उससे पूछा कि फिर तो मुसलमान नमकहराम हैं तो उसने कहा कि आपको जो समझना है समझिए लेकिन योगी-मोदी मुसलमानों को फूटी आँख नहीं सुहाते. मैं सन्नाटे में था क्योंकि एक धनाढ्य परिवार से होते हुए भी उस छात्र को योगी सरकार से हजारों रूपये की छात्रवृत्ति मिली थी. बाद में मैंने पढ़ा कि जिस बूथ पर भारत के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख़्तार अब्बास नकवी ने मतदान किया था वहां भाजपा को मात्र दो मत मिले. इसका मतलब साफ़ था कि स्वयं नकवी के परिजनों ने भी भाजपा को वोट नहीं दिया. इतना ही नहीं भाजपा की जीत का जश्न मनानेवाले कई मुसलमानों की खुद मुसलमान ही हत्या कर चुके हैं. फिर भी मोदी न जाने किन सपनों में खोये हुए हैं सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास. शायद इस तरह के सपनों को ही अंग्रेजी में फूल्स ड्रीम कहते हैं. मित्रों, मोदी मुसलमानों को एक हाथ में कुरान और दूसरे में लैपटॉप पकडाने वाले हैं और सोंच रहे हैं कि ऐसा कर देने भर से वो पूंछविहीन पशु इन्सान बन जाएँगे जबकि सच्चाई यह है कि जबतक उनके एक हाथ में कुरान है वो न तो सर्वधर्मसमभाव का पालन करेंगे और न ही भारत को अपनी पुण्यभूमि ही मानेंगे बल्कि यही कहते रहेंगे कि करदे फकत इशारा अगर शाहे खुरासान सजदा न करूं हिंद की नापाक जमीन पर. अभी-अभी हमने गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर पर हमला होते हुए देखा है. एक बेहद कुशाग्र बुद्धिवाले आईआईटी से स्नातक मुसलमान ने जन्नत के लालच में आकर यह हमला किया. उसके भी एक हाथ में कुरान था और दूसरे में लैपटॉप लेकिन दिमाग में सिर्फ कुरान था, जहर था. आधुनिकता और उदारता उसे छू तक नहीं गयी थी. असली चीज दिमाग को बदलना है जो कुरान होने नहीं देगा. ये लोग लैपटॉप से अच्छी बातें नहीं सीखेंगे बल्कि बम बनाना सीखेंगे. पूरे देश में जहाँ भी बम बनाते हुए लोग मारे जाते हैं वे सारे-के-सारे मुसलमान होते हैं क्यों? मुसलमान चाहे भारत का उपराष्ट्रपति बना दिया जाए या उच्च पदाधिकारी वो मूलत: जिहादी होता है। एकाध अपवाद भी हैं कलाम साहेब की तरह लेकिन वे एकाध ही हैं। मित्रों, इतना ही नहीं हम देख रहे हैं कि दिल्ली के क़ुतुब-परिसर से इस बात के सबूत मिटाने के प्रयास हो रहे हैं कि वहां की इमारतें हिन्दू-मंदिरों को तोड़ कर बनाए गए थे. समझ में नहीं आता कि मोदी चाहते क्या हैं? मुसलमानों को खुश करने के लिए जो काम गाँधी नामधारी कान्ग्रेस के नेता नहीं कर पाए वो काम मोदी कर रहे हैं. जबकि वो भी जानते हैं कि उपदेशो हि मूर्खाणां, प्रकोपाय न शान्तये। पयःपानं भुजंगानां केवल विषवर्धनम्।। जो पत्थरबाजी पहले सिर्फ कश्मीर तक सीमित थी अब मोदी राज में पूरे भारत में हो रही है. भारत की राजधानी दिल्ली तक में ऐसा कोई महीना ऐसा कोई हफ्ता नहीं जाता जब मुसलमानों के हाथों किसी हिन्दू की हत्या न हुई हो लेकिन इन्द्रेश कुमार और मोहन भागवत जी मुसलमानों में हिन्दुओं का डीएनए ढूँढने में लगे हैं. जिस तेजी से इस्लाम के बारे में सच बोलने पर यति नरसिंहानन्द सरस्वती को जेल में बंद कर दिया जाता है उससे तो यह लगने लगा है कि मोदी जी ने भारत को पाकिस्तान बना दिया है जहाँ ईश निंदा कानून लागू है. गजब तो यह है कि जब तक एक भारतीय वसीम रिजवी रहता है तब तक कुरान पर सवाल उठाने के बावजूद आजाद रहता है मगर जैसे ही वो जीतेंद्र नारायण त्यागी बन जाता है भाजपा सरकार द्वारा जेल में डाल दिया जाता है. मित्रों, हमारे देश में न तो गांधियों की कमी रही है और न ही उन गाँधी के अनुयायियों की जिनके तुष्टिकरण के कारण भारत के तीन टुकड़े हुए. फिर मोदी क्यों गाँधी बनना चाहते हैं? हमें न तो और पाकिस्तान चाहिए और न ही गाँधी. हमें तो सावरकर चाहिए जो एक ही हुए हैं. हमें नहीं चाहिए भगवान राम की शोभायात्रा पर पत्थरों की बरसात बल्कि हमें तो पत्थरबाजों के घरों पर बुलडोजर चलानेवाला नेता चाहिए. अब तो गुजरात में भी जेहादी फिर से सर उठाने लगे हैं और कई मुस्लिमबहुल ईलाकों से हिन्दुओं को भगा रहे हैं. मोदी ने २००२ के गोधरा दंगों के बाद गुजरात में बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद् के कार्यकर्ताओं पर जिस तरह की कठोर कार्रवाई की विशेषज्ञों का मानना है कि यह उसी का परिणाम है कि आज गुजरात में हिन्दुओं को क्रूरकर्मा मुसलमानों से बचानेवाला कोई बचा ही नहीं. बंगाल और केरल में हिन्दुओं को मरता देख कर भी जिस तरह मोदी ने अपनी दोनों आँखों और कानों को मूँद रखा है उससे भी यही लगता है कि मोदी सावरकर कम गाँधी ज्यादा हैं और थोडा-थोडा जिन्ना भी.

गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

तेजस्वी सो रहे हैं कृपया हॉर्न न बजाएँ

मित्रों, कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता मालिक होती है लेकिन बिहार में लोकतंत्र और जनता की दशा को देखकर तो ऐसा लगता है कि लोकतंत्र में जनता भिखारी होती है. फिर एक समय बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू जी ने मंच से यह कहा था कि अब राजा रानी के पेट से पैदा नहीं होगा लेकिन वास्तविकता यह है कि लालू जी ने खुद अपने बाद पहले अपनी पत्नी को बिहार की महारानी बना दिया और अब अपने बेटे को महाराजा बनाने की फ़िराक में हैं. मित्रों, यह हमारे विधानसभा क्षेत्र राघोपुर का दुर्भाग्य है कि लालूजी के वही छोटे बेटे जिनको लालू जी बिहार का महाराजा बनाना चाहते हैं हमारे विधायक हैं लेकिन सिर्फ कहने को विधायक हैं. राघोपुर प्रखंड में सरकारी योजनाओं और सुविधाओं की स्थिति पूरे बिहार में सबसे ज्यादा ख़राब है लेकिन तेजस्वी यादव को इससे कोई मतलब नहीं. वो तो न जाने किस दुनिया में खोये हुए हैं. राघोपुर प्रखंड में शिक्षा की स्थिति इतनी ख़राब है कि रोजाना स्कूलों का ताला खुल जाए तो गनीमत समझिए. शिक्षक आते ही नहीं फिर ताला खोलेगा कौन? शिक्षा निजी शिक्षकों और ट्यूटरों के भरोसे किसी तरह अंतिम सांसें ले रही है. एक समय बिहार के तदनुसार राघोपुर प्रखंड के सरकारी विद्यालय पूरे भारत के लिए उदाहरण थे. आज वे बदहाली के प्रतीक बन गए हैं. मित्रों, इसी तरह से स्वास्थ्य-सुविधाओं के क्षेत्र में भी राघोपुर प्रखंड की हालत काफी पतली है. यहाँ के अस्पतालों को अस्पताल कहना अस्पताल की परिभाषा को गाली देने के समान है. न बेड, न उपकरण और न ही डॉक्टरों का आगमन. जैसे विद्यालय कागज पर चल रहे वैसे ही अस्पताल भी कागज पर न सिर्फ चल रहे हैं बल्कि दौड़ रहे हैं. कई बार अधिकारी भटकते हुए अस्पताल में विशेष रूप से मोहनपुर रेफरल अस्पताल में पहुँच भी जाते हैं. बदहाली पर नाराजगी जताते हैं. सुधार लाने के निर्देश देते हैं और सो जाते हैं. एकाध बार तो तेजस्वी भी ऐसा कर चुके हैं. मित्रों, इसी तरह राघोपुर प्रखंड में स्थापित ४० सरकारी नलकूपों में से एक भी चालू नहीं है लेकिन इससे तेजस्वी यादव का क्या सरोकार? उनको थोड़े ही राघोपुर में गेंहूँ-धनिया की खेती करनी है. वो तो वोटों की खेती करते हैं और इस नए तरह के राजतन्त्र में बिहार की सबसे बड़ी राजनैतिक रियासत के राजकुमार हैं. मित्रों, अब हम आते हैं राघोपुर प्रखंड के किसानों की सबसे बड़ी समस्या पर. हुआ यह कि जब आजादी के बाद बिहार में भूमि-सर्वेक्षण चल रहा था तब राघोपुर के बहुत सारे किसानों की जमीन गंगा नदी में थी. सरकार ने उसे गंगशिकस्त घोषित कर अपने नाम कर लिया और किसानों से कहा कि जब जमीन पानी से बाहर निकलेगी तब किसानों को लौटा देंगे. मगर ऐसा हुआ नहीं. वो जमीन आज भी बिहार सरकार के पास है. अब कुछ समय के बाद जब राघोपुर प्रखंड में भूमि-सर्वेक्षण होगा तब अगर ये जमीन किसानों को लौटाई नहीं गई तो राघोपुर के किसानों की लाखों एकड़ जमीन छिन जाएगी, लुट जाएगी. लेकिन इससे भी कदाचित तेजस्वी जी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि न तो वे राघोपुर के निवासी हैं और न ही राघोपुर में उनकी ऐसी कोई जमीन है जो गंगशिकस्त की श्रेणी में आती हो. मित्रों, कुल मिलाकर राघोपुर की जनता के दोनों ही हाथ खाली हैं. सांसद पशुपति कुमार पारस भी गायब हैं और विधायक तेजस्वी तो गायब हैं ही. यह हमारा दुर्भाग्य है कि दोनों आधुनिक राजपरिवार से हैं. दोनों मानते हैं कि जनता जाति-पांति और विरासत के नाम पर उनको ही जिताएगी. जहाँ तक हम समझते हैं कि लोकतंत्र में नेता नेतृत्वकर्ता होता है इसलिए उसे सबसे आगे होना चाहिए. जनता जो मन ही मन सोंचे नेता को उसकी गर्जना करनी चाहिए, जहाँ जनता के कदम जाकर रूकें नेता को वहां से शुरुआत करनी चाहिए. नेता को जनता के आगे चलना चाहिए लेकिन यहाँ तो नेता सोया हुआ है. दुर्भाग्यवश हमारे विधायक बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता भी हैं. सवाल उठता है कि जो व्यक्ति अपनी विधानसभा तक का यानि कुछेक वर्ग किलोमीटर का ख्याल नहीं रख सकता हो वो भला कैसे पूरे बिहार का ख्याल रखेगा? फिलहाल तो हम आपसे यही कहेंगे कि जब भी आप तेजस्वीजी के आवास के पास से गुजरें तो कृपया हॉर्न न बजाएं क्योंकि तेजस्वी सो रहे हैं.

शनिवार, 2 अप्रैल 2022

नाथ अनाथन की सुध लीजै

मित्रों, मैं कई वर्षों से बराबर बिहार के अख़बारों में यह खबर पढता चला आ रहा था कि पोल पर करंट लगने से फलाने गाँव के फलाने बिजली मिस्त्री की मौत हो गयी. मेरी समझ में नहीं आता था कि ऐसा हो कैसे जाता है. लेकिन जब परसों मेरी ससुराल वैशाली जिले के देसरी थाने के भिखनपुरा में ऐसी ही घटना घट गई तब समझ में आया कि वास्तव में हो क्या रहा है और पोल पर करंट लगने से मरनेवाले हैं कौन. मित्रों, हुआ यह कि परसों सुबह से ही पूरे भिखनपुरा पंचायत की बिजली गई हुई थी. सुबह से ही लोग बिजली आपूर्ति कंपनी के दफ्तर में फोन पर फोन किए जा रहे थे. दोपहर में जेई और सरकारी लाइन मैन चकमगोला के मुकेश सिंह के घर पहुंचे. मुकेश निजी तौर पर बिजली मिस्त्री का काम करता था. बिहार में बेरोजगारी इतनी ज्यादा है कि प्रत्येक सरकारी बिजली मिस्त्री कई सारे निजी बिजली मिस्त्रियों को अपने साथ रखते हैं और ज्यादातर मामलों में ये निजी मिस्त्री ही पोल पर चढ़कर यांत्रिक त्रुटि को दूर कर बिजली आपूर्ति की पुनर्बहाली को सुनिश्चित करते हैं. मित्रों, पेट जो न कराए. मुकेश उन दोनों के साथ दौड़ा-दौड़ा भिखनपुरा आया. पोल पर चढ़ने से पहले उसने जेई और लाइन मैन से पूछा कि शट डाउन तो ले लिया है न? उनदोनों के हामी भरने के बाद वो जैसे ही पोल पर चढ़ा उसे करंट लग गया क्योंकि शट डाउन नहीं लिया गया था. बेचारा ऊंचाई से सर के बल पक्की सड़क पर आ गिरा. उसके गिरते ही जेई और लाइन मैन भाग गए. गांववालों ने उसे आनन-फानन में अस्पताल पहुँचाया लेकिन तब तक मुकेश दम तोड़ चुका था. मित्रों, बिजली कम्पनी का सितम यहीं तक नहीं रूका. कंपनी ने उलटे मुकेश पर पोल पर चढ़कर तार चुराने का मुकदमा थाने में दर्ज करवा दिया. कल जब मुकेश के गाँववालों ने सड़क जाम कर दिया तब प्रशासन ने लाइन मैन कृष्ण कुमार सिंह और जेई के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया और मृतक मिस्त्री के परिजनों को ४ लाख रूपया मुआवजा देने का आश्वासन दिया. मित्रों, सवाल उठता है कि क्या ४ लाख में मुकेश के परिवार की जिंदगी पार लग जाएगी? चार लाख का मुआवजा तो बिहार में उन आम आदमी के परिजनों को भी दिया जाता है जो करंट लगते से मरते हैं. फिर क्या अंतर है पोल पर चढ़नेवाले बिजली मिस्त्रियों और आम आदमी में? सवाल उठता है कि जिन निजी मिस्त्रियों से बिजली कंपनी काम ले रही है उनका रजिस्ट्रेशन कर उनका बीमा क्यों नहीं करवाती? आखिर कब तक मुकेश जैसे पेट के मारे निजी मिस्त्री बेमौत मरते रहेंगे और कब तक उनको आम आदमी की तरह ४ लाख का मुआवजा दिया जाता रहेगा? मेरा मानना है कि जो समाज के लिए, समाज के हित के लिए, समाज के सुख के लिए अपनी जान पर खेलता है और जान कुर्बान करता है वो शहीद है फिर चाहे वो सीमा पर खड़ा सैनिक हो या पोल पर चढ़नेवाला बिजली मिस्त्री. आखिर कब तक इन गुमनाम शहीदों के साथ, उनके मानवाधिकारों के साथ अन्याय होता रहेगा? क्या बिहार और भारत सरकार इन अनाथों की सुध लेगी या फिर जैसे चलता आ रहा है चलता रहेगा?

रविवार, 20 मार्च 2022

कश्मीरी हिन्दुओं की चीत्कार है द कश्मीर फाइल्स

मित्रों, जब हम बच्चे थे तब हमने पढ़ा था कि जब भारत ने १९७४ में पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण किया था तब पूरी दुनिया में इसका विरोध हुआ था. सबसे ज्यादा विरोध वो देश कर रहे थे जिनके पास परमाणु बमों का जखीरा था. तब भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में एक शेर कहा था कि हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती. मित्रों, कुछ इसी तरह की स्थिति पिछले ३२ सालों से कश्मीरी हिन्दुओं की है. उनकी आँखों से लगातार आंसू बहते रहे लेकिन आंसू पोछना तो दूर किसी ने उनके दर्द को जानने-समझने की जरुरत ही नहीं समझी. उलटे जिस कौम के लोगों ने उनके साथ अविश्वसनीय अत्याचार किए उसको ही सियासत ने पीड़ित घोषित कर दिया. किसी हिन्दू युवती को सामूहिक बलात्कार के बाद लकड़ी चीरने वाले आरी से जीवित अवस्था में ही बीचों बीच चीर दिया गया तो किसी को चावल के डिब्बे में मारने के बाद उनके परिजनों को अपनों के खून से सना चावल खाने को बाध्य किया गया तो किसी शिक्षक को उसके ही मुसलमान शिष्य ने सिर्फ इसलिए गोली मार दी क्योंकि वो हिन्दू था और मारने के बाद उसके शव पर पेशाब किया. मित्रों, एक साथ कश्मीर की हजारों मस्जिदों से घोषणाएं होने लगी कि महिलाओं को छोड़कर पुरुष हिंदू तत्काल कश्मीर घाटी से निकल जाएं. कुछ ही दिनों के भीतर पूरी-की-पूरी कश्मीर घाटी हिन्दूविहीन हो चुकी थी. सीआरपीएफ को गांवों से शहरों में भेजने के बाद मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने इस्तीफा दे दिया था और लन्दन में गोल्फ खेलने चले गए थे. कश्मीर घाटी कई दिनों तक पुलिस-प्रशासन विहीन थी. मुस्लिम पड़ोसियों की जैसे ईच्छा हुई उन्होंने हिन्दुओं पर अत्याचार किए. हिन्दू अपना अतीत, अपना सबकुछ छोड़कर कश्मीर घाटी छोड़कर भागा. कोई जम्मू में आ टिका तो कोई दिल्ली में तो कोई इंदौर या किसी अन्य शहर में. सबने फिर से शून्य से जिन्दगी शुरू की. आरम्भ में भीख भी मांगनी पड़ी लेकिन उन्होंने बदले की भावना से बंदूक नहीं उठाई बल्कि कलम को चुना. बड़े ही सुनियोजित तरीके से लाखों साल पुरानी एक संस्कृति को तलवार और अत्याचार के बल पर समाप्त कर दिया गया. मित्रों, फिर भी साहित्य से लेकिन फिल्म तक दशकों तक जानबूझकर उन लोगों को पीड़ित बताया जाता रहा जिन्होंने जन्नत की चाह में जन्नते कश्मीर को जहन्नुम में बदल दिया था और हिन्दुओं को अपने ही देश में दर-ब-दर भटकने के लिए मजबूर कर दिया था. तब न तो वैश्विक मीडिया और न ही संयुक्त राष्ट्र संघ के माथे पर पसीना आया था जबकि वही मीडिया और वही संयुक्त राष्ट्र संघ सीरिया के एक बच्चे के शव को देखकर दहाड़े मार-मार कर रोने लगे थे. आज भी भारत सहित पूरी दुनिया जेहादी हिंसा और कट्टरपन से परेशान है लेकिन पूरी तरह से अप्रासंगिक हो चुके संयुक्त राष्ट्र संघ को उलटे इस्लाम की बदनामी की चिंता है. इस्लाम अगर बदनाम है तो अपनी करतूतों से और उस बदनामी के कलंक को दूर करने की जिम्मेदारी पूरी-की-पूरी मुसलमानों की है. जब कृत्य राक्षसों जैसे होंगे तो आलोचना ही होगी प्रशंसा नहीं. मित्रों, हद तो तब हो गई जब एक निर्देशक ने कश्मीरी हिन्दुओं के आंसुओं को अभिव्यक्ति देने की कोशिश की एक फिल्म द कश्मीर फाइल्स बनाकर तब फिल्म को नफरत पैदा करने का प्रयास बता दिया गया. मानो मुसलमान ११९२ से ही हिन्दुओं से एकतरफा प्यार करते आ रहे हैं और हिन्दू हैं कि उनसे नफरत ही करते जा रहे हैं. १९९० में कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार के बाद भी गोधरा में मुसलमानों ने हिन्दुओं को जिन्दा जलाया, दिल्ली में दंगे किए और देशभर में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा की हजारों घटनाओं को अंजाम दिया. कल-परसों भी होली खेल रहे हिन्दुओं के ऊपर कई स्थानों पर मुसलमानों ने पथराव किए हैं, गोलियां चलाई हैं. कई स्थानों पर तो इस फिल्म के दर्शकों पर भी हमले किए गए हैं. आखिर ये कैसा भाईचारा है जो एकतरफा है. अगर यह भाईचारा है तो नहीं चाहिए हमें हिन्दुओं की जान और माल की कीमत पर भाईचारा. अगर हिन्दुओं की चीत्कार और दर्द को सामने लाने से किसी की पोल खुलती है तो जरुर खुलनी चाहिए. बल्कि हिन्दूबहुल हिंदुस्तान की सियासत से यह पूछना चाहिए कि यदि भारत के सारे नागरिक कानून की नजर में समान हैं तो क्यों हिन्दुओं के हत्यारे १९९० के बाद दशकों तक खुलेआम घूमते रहे, कुछ तो प्रधानमंत्री से हाथ मिलाते देखे गए और कुछ तो आज भी आजाद घूम रहे हैं? मैं साधुवाद देना चाहूँगा विवेक रंजन अग्निहोत्री जी को कि उन्होंने हिंदुस्तान में कश्मीरी हिन्दुओं के दर्द को दुनिया के सामने रखा, उन्होंने इस्लाम के खौफनाक चेहरे को बेनकाब करने का साहस किया. हम उम्मीद करते हैं कि वो १९८४ के सिखविरोधी दंगों, गोधरा आगजनी और दिल्ली के दंगों पर भी फिल्म बनाएँगे जिससे भारतविरोधी शक्तियों की पहचान हो सके और तदनुसार भारत सरकार हिन्दुओं और हिंदुस्तान की रक्षा के लिए अपेक्षित कदम उठा सके.