बुधवार, 6 मई 2026

जय भीम, जय भीम राव कांबले

मित्रों, इन दिनों पुणे में 4 साल की अबोध बच्ची के साथ घटी एक रेप और बेरहमी से की गई हत्या की घटना ने पूरे भारत के मन-मस्तिष्क को झकझोर कर रख दिया है. यहाँ अपराधी का नाम भीमराव कांबले है. मतलब नाम भी बाबा साहेब वाला और जाति भी बाबा साहेब वाली। उम्र जानकर तो आप और भी आश्चर्य में पड़ जाएंगे। 65 साल. मित्रों, इतना ही नहीं मृतक बच्ची कथित रूप से ब्राह्मण जाति की थी. मतलब बलात्कारी महार और पीड़िता ब्राह्मणी। इतना ही नहीं पता चला है कि पुणे की मासूम बच्ची के साथ हैवानियत के आरोप में गिरफ्तार भीमराव कांबले एक आदतन अपराधी है, जिसका पूरा इतिहास क्राइम से भरा हुआ है. साल 2015 में बड़े अपराध में जेल के अंदर गया कांबले छूट गया था. हमारे हाथ लगे दस्तावेजों और कोर्ट आदेशों से साफ हो गया है कि यह पहली बार नहीं, बल्कि उसके हाथ काले कारनामों से रंगे पड़े हैं. साल 2015 में बड़े अपराध में जेल के अंदर गया कांबले छूट गया था. मित्रों, साल 1998 में भीमराव कांबले की क्राइम की दुनिया में पर्दापण हुआ, जब साल 1998 में उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना) और धारा 452 (हमले की तैयारी के साथ घर में अनधिकृत प्रवेश) के तहत मामला दर्ज किया गया था. इस मामले ने तभी संकेत दे दिए थे कि उसकी गतिविधियां समाज और महिलाओं की सुरक्षा के लिए खतरा हैं. साल 2015 में यौन उत्पीड़न केस में सबूतों के अभाव भीमराव कांबेल छोड़ दिया गया था. इस मामले से संबंधित कोर्ट ऑर्डर की कॉपी भी सामने आई है. मामला अत्यंत गंभीर था, लेकिन कानूनी प्रक्रिया के दौरान अभियोजन पक्ष आरोपों को सिद्ध करने में नाकाम रहा. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके खिलाफ कोर्ट में पर्याप्त व पुख्ता सबूत पेश नहीं किए जा सके. गौरतलब है तब प्रत्यक्षदर्शियों या तकनीकी साक्ष्यों की कमी के चलते, न्यायालय ने भीमराव कांबले को 'बेनिफिट ऑफ डाउट' देते हुए सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था. उसकी यह आपराधिक कुंडली बताती है कि वह पहले भी गंभीर कानूनी पचड़ों में फंस चुका है. भले ही वह अदालत से एक बार तकनीकी आधार पर बच निकला हो, लेकिन उसके खिलाफ दर्ज पुराने मुकदमे उसकी हिंसक और आपराधिक प्रवृत्ति की गवाही देते हैं. अब नए सिरे से उठ रहे सवालों ने प्रशासन को फिर से उसके पुराने रिकॉर्ड को खंगालने पर मजबूर कर दिया है. मित्रों, पुणे में पिछले सप्ताह उसी हजारों सालों से दबे-कुचले व्यक्ति द्वारा चार वर्षीय जिस पुजारी की लड़की की दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई थी, उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने दम घुटने से उसकी मौत होने का संकेत दिया है। पुलिस ने बताया है कि 65 वर्षीय आरोपित भीमराव ने पीड़िता के मुंह में मोजा ठूंस दिया था। इससे दम घुटने से उसकी मौत हो गई। पुलिस के अनुसार, आरोपित बच्ची को खाने का लालच देकर बहला-फुसलाकर मवेशी बाड़े में ले गया, जहां उसने उसका यौन उत्पीड़न किया और बाद में उसकी बेरहमी से हत्या कर दी। मृतक मासूम के शरीर पर चोट के भी गहरे निशान पाए गए हैं. मित्रों, अब हम आते हैं अपने मूल विषय पर. सामाजिक न्याय के नए पुरोधा आदरणीय नरेंद्र मोदी जी का एक भाषण हमने देखा है जिसमें वो कहते हैं कि जिनके साल हजारों सालों तक अत्याचार हुए उनको बदला लेने का अवसर मिलना चाहिए। जाहिर है कि वर्ष २०१८ में जब सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के अन्यायपूर्ण प्रावधानों को अवैध घोषित करते हुए कहा था कि इस एक्ट में पहले जांच होनी चाहिए फिर गिरफ़्तारी तब महान मोदी जी कथित रूप से हजारों सालों से अत्याचार झेल रही जातियों को बदला लेने का भरपूर अवसर प्रदान करते हुए न सिर्फ पहले गिरफ़्तारी फिर जाँच को फिर से लागू कर दिया बल्कि धाराओं को भी बढाकर २२ से 47 कर दिया। इतना ही नहीं लाखों रूपये के मुआवजे भी दिए जाने लगे. भले ही अदालत में आरोप झूठे साबित हो जाएं और निर्दोष आरोपी का जीवन,कैरियर, घर, परिवार सबकुछ बर्बाद हो जाए लेकिन न तो झूठे आरोप लगानेवालों पर कोई कानूनी कार्रवाई होगी और न ही मुआवजा वापस लिया जाएगा। मित्रों, नतीजा यह है कि एससी-एसटी के लिए यह एक्ट एक तीर से दो शिकार करने का सुअवसर प्रदान कर रहा है. सवर्ण को जेल भेजकर उसके पूर्वजों द्वारा किये गए कथित अत्याचारों का बदला भी ले लिया और जेब में लाखों रूपये भी आ गए. हालाँकि मोदी जी भी जानते हैं कि एक हजार साल तक देश के समस्त हिन्दू क्रमशः मुसलमानों और ईसाइयों के गुलाम थे इसलिए जातीय अत्याचार की कहानियां झूठी हैं. मित्रों, मैं इस आलेख के अंत में प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी पिछड़े से अति पिछड़े हो गए मोदी जी से मांग करता हूँ कि एससी-एसटी एक्ट में एक और बदलाव करके यह प्रावधान कर दें कि जो भी एससी-एसटी वर्ग का व्यक्ति सवर्ण महिलाओं के साथ रेप और फिर उनकी हत्या करेगा उसको अपराध में की गई क्रूरता के अनुसार सजा नहीं बल्कि ईनाम दिया जाएगा। ऐसा प्रावधान करने से ही सामाजिक न्याय पूर्णता को प्राप्त करेगा। साथ ही मैं चंद्रशेखर रावण के उन दावों का भी तहे दिल से समर्थन करता हूँ कि एससी-एसटी आजीवन दबा-कुचला रहेगा भले ही वो वास्तविक रावण की तरह आतताई हो और सोने की लंका में रहता हो. यहाँ तक कि उनको मंदिरों का पुजारी बनाना भी उनके साथ अत्याचार है और ऐसा करनेवालों पर एससी-एसटी एक्ट के तहत कठोर-से-कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए.

बुधवार, 21 जनवरी 2026

सवर्ण विरोधी भाजपा

मित्रों, यूजीसी ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 लागू कर दिया है. इसे लेकर विवाद पैदा हो रहा है. जैसे-जैसे लोगों को इसके बारे में मालूम हो रहा है, त्यों-त्यों भारत के सवर्णों में नाराजगी दिखने लगी है. इस नियम में ओबीसी को SC/ST के साथ जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों में नाराजगी पैदा हो गई है. वो इस गाइडलाइंस को एकतरफा बता रहे हैं, ये आशंका जता रहे हैं कि इसका जमकर दुरुपयोग किया जाएगा. ये गाइडलाइंस 15 जनवरी 2026 से देशभर के सभी कॉलेज, युनिवर्सिटियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में लागू भी हो गए हैं. दरअसल इसके प्रावधान इतने कड़े हैं कि लोगों को लग रहा है कि ऐसे कानून का सही इस्तेमाल तो कम होगा लेकिन इससे बदला लेने की कार्रवाई ज्यादा होगी यानि दुरुपयोग खूब हो सकता है. मित्रों, संसद की शिक्षा, महिला, बाल और युवा संबंधी मामलों की संसदीय समिति ने यूजीसी के ड्राफ्ट रेगुलेशंस की समीक्षा करने के बाद इसे 8 दिसंबर 2025 को सरकार को सौंपा. कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह इस समिति के चेयरमैन हैं. इस समिति यूजीसी को सिफारिशें दीं, जिसके आधार पर भेदभाव वाले नियम में ओबीसी को भी जाति आधारित डिसक्रिमिनेशन में शामिल किया जाए. ओबीसी को यूजीसी के ड्राफ्ट में नहीं रखा गया था. साथ ही ये सिफारिश भी दी कि Equity Committee में SC/ST/OBC से आधे से ज्यादा प्रतिनिधित्व हो. डिसेबिलिटी को भी डिस्क्रिमिनेशन के आधार में शामिल किया जाए. अन्य बदलावों में discriminatory practices की लिस्ट और पब्लिक डिस्क्लोजर की सिफारिश की. इन सिफारिशों के बाद UGC ने फाइनल रेगुलेशंस में कई बदलाव करते हुए इसे जनवरी 2026 में नोटिफाई कर दिया- जैसे OBC को शामिल करना और फॉल्स कंप्लेंट पर जुर्माने का प्रावधान हटाना. कई रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया में कहा जा रहा है कि दिग्विजय सिंह की अगुवाई वाली संसदीय समिति ने OBC को शामिल करने की सिफारिश की, जिससे फाइनल गाइडलाइंस प्रभावित हुईं. मित्रों,जब यूजीसी के ड्राफ्ट में OBC को बाहर रखा गया तो उसकी आलोचना हुई; अब शामिल करने से सामान्य वर्ग के छात्र इसे “दूसरा SC/ST एक्ट” बता रहे हैं. सोशल मीडिया पर सामान्य वर्ग के छात्रों का विरोध काफी तेज है, जो इसे असंतुलित बता रहे हैं. झूठी शिकायतों पर जुर्माने का प्रावधान हटाने से भी चिंता बढ़ी है. सवर्णों का मानना है कि ये नियम उन्हें पहले से दबाने वाला मानकर पहले से दोषी ठहराते हैं, जबकि SC/ST/OBC को पहले से ही “ओप्रेस्ड” यानि पीड़ित मा्न लिया गया है. अगर कोई जनरल कैटेगरी का व्यक्ति जाति-आधारित भेदभाव का शिकार होता है, तो उसके लिए कोई सुरक्षा नहीं है. झूठी शिकायतों से करियर बर्बाद होने का खतरा है. कुछ इसे आरक्षण की तरह एकतरफा पॉलिसी बता रहे हैं. मित्रों, इस नियम के अनुसार हर उच्च शिक्षा संस्थान में इक्विटी कमेटी गठन करना जरूरी होगा, जिसमें OBC, SC, ST, महिलाओं और दिव्यांगों के प्रतिनिधि शामिल होंगे. शिकायत पर 24 घंटे में प्राइमरी कार्रवाई करनी होगी और 15 दिनों में रिपोर्ट देनी होगी. यूजीसी के प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 में भेदभाव स्पष्ट रूप से SC/ST/OBC के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर किया गया भेदभाव है. सामान्य भेदभाव की व्यापक परिभाषा में धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान या विकलांगता पर अनुचित व्यवहार भी शामिल है. यानि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के सदस्यों के खिलाफ जाति या जनजाति के आधार पर कोई भी स्पष्ट या निहित अनुचित, भेदभावपूर्ण या पक्षपाती व्यवहार इसमें शामिल होगा. नियमों का उल्लंघन करने पर संस्थान को डिग्री देने से रोकना या अनुदान बंद करना संभव है. यानि यूजीसी उसकी मान्यता ही खत्म कर सकता है. संस्थानों को इक्विटी कमेटी बनानी होगी, जिसमें SC, ST, OBC, PwD और महिलाओं के प्रतिनिधि शामिल होंगे. जाति-आधारित भेदभाव को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, जो SC, ST और OBC के सदस्यों के खिलाफ होता है. शिकायतों के लिए 24×7 हेल्पलाइन और सख्त समय-सीमा होगी. शिकायत मिलने के 24 घंटे में कार्रवाई शुरू हो जाएगी. 60 दिनों में जांच पूरी करनी होगी. उल्लंघन पर संस्थान की मान्यता रद्द हो सकती है, या UGC फंडिंग रोक सकती है. ड्राफ्ट गाइडलाइंस फरवरी 2025 में जारी हुईं. फाइनल नियम 13 जनवरी 2026 को नोटिफाई हुए. कुल प्रोसेस में लगभग 11 महीने (करीब 330 दिन) लगे, जिसमें पब्लिक फीडबैक, विरोध और संसदीय समिति की रिव्यू शामिल थे. UGC के नए नियमों के तहत जातिगत भेदभाव की शिकायत मिलने पर इक्विटी कमेटी जांच करेगी. संस्थान प्रमुख को रिपोर्ट सौंपेगी. आरोपी छात्र पर संस्थागत अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी, जैसे चेतावनी, जुर्माना, निलंबन या निष्कासन. शिकायत ऑनलाइन, लिखित, ईमेल या 24×7 इक्विटी हेल्पलाइन से दर्ज हो सकती है. कमेटी शिकायत मिलते ही जल्द बैठक करेगी; गंभीर मामलों में पुलिस को सूचित किया जाएगा. निर्णय से असंतुष्ट पक्ष 30 दिनों में ऑम्बड्सपर्सन को अपील कर सकता है. हल्के मामलों में परामर्श या चेतावनी मिलेगी. गंभीर मामलों में छात्रावास/होस्टल से हटाना, परीक्षा से वंचित करना या संस्थान से निकालना जैसी कार्रवाई हो सकती है. संस्थान सभी शिकायतों का रिकॉर्ड रखेंगे.विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों ने देश में घमासान मचा दिया है. एक तरफ संविधान का अनुच्छेद 14 समानता की बात करता है तो दूसरी तरफ यूजीसी की नई गाइडलाइन किसी भी तरह से समानता का अधिकार का पालन करती नहीं दिख रही है. मित्रों,यूजीसी गाइडलाइन तो सवर्णों के लिए खतरनाक है ही, बिहार के 38 में 33 जिलों को एट्रोसिटी संभावित क्षेत्र घोषित करने की खबर भी वायरल हो रही है. बताया जा रहा है कि एट्रोसिटी संभावित क्षेत्रों में सामान्य वर्ग के किसी भी व्यक्ति को हथियारों का लाइसेंस नहीं दिया जा सकता. इसके उलट अनुसूचित जाति और जनजाति को बिना जांच पड़ताल के हथियार लाइसेंस दिए जाने का प्रावधान है. सरकार की यह कवायद यह जाहिर करना चाहती है कि सवर्णों से अनुसूचित जाति और जनजाति को खतरा है, लेकिन अनुसूचित जाति और जनजाति से सवर्णों को कोई खतरा नहीं है. मित्रों, इससे पहले मोदी सरकार द्वारा (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2018) मूल 1989 के कानून को मजबूत करने के लिए लाया गया था, जिसने 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले (जिसमें गिरफ्तारी के लिए अग्रिम जांच और अनुमोदन की आवश्यकता थी) को पलट दिया, और इसमें पीड़ित/गवाह सुरक्षा के लिए नए प्रावधान जोड़े गए, जिससे तत्काल गिरफ्तारी और मामलों के त्वरित निपटारे के प्रावधान बहाल हुए। 2018 में सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीश ए.के. गोयल की बेंच) ने एक फैसले में SC/ST एक्ट के तहत गिरफ्तारी के लिए अग्रिम जांच और अनुमोदन की आवश्यकता बताई थी. वास्तव में २०१८ में संशोधित एससीएसटी एक्ट १९१८ के रौलेट एक्ट से भी ज्यादा सख्त और काला कानून है. फिर इसका दुरुपयोग भी जमकर हो रहा है. न सिर्फ इसके द्वारा सवर्णों पर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं बल्कि इसके द्वारा जमकर पैसा भी कमाया जा रहा है मुआवजे के रूप में. विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार एससी एसटी एक्ट के आजकल 90% केस फर्जी होते हैं। इसमें पुलिस और न्यायिक व्यवस्था की मिलीभगत होती है और सिर्फ धन उगाही के काम में आती है। न जाने देश में ऐसे कितने विष्णु तिवारी हैं जिनका जीवन झूठे एससी-एसटी मुकदमों के कारण बेवजह जेल में बीत गया। मित्रों, अभी २० जनवरी, २०२६ को दिए अपने एक निर्णय के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अनुसूचित जाति या जनजाति से संबंध रखने वाले को केवल अपमानजनक शब्द बोलने या गाली-गलौज करना स्वत: ही अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं बन सकता. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता को जाति के आधार पर अपमानित करने की स्पष्ट मंशा होनी चाहिए। पटना हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एफआईआर और आरोप पत्र में जाति-आधारित अपमान के अभाव को रेखांकित किया। कोर्ट ने एससी एसटी एक्ट की धारा 3(1) के प्रावधानों को दोहराते हुए कहा कि केवल अपशब्दों का प्रयोग करने पर एससी एसटी एक्ट के प्रावधान लागू नहीं होंगे. मित्रों, दिल्ली में 30 अप्रैल 2025 को मोदी कैबिनेट की बैठक में कई फैसले लिए गए, जिसमें जाति जनगणना को अहम माना जा रहा है. केंद्र सरकार ने फैसला किया कि आगामी जनगणना में जातिगत गणना को पारदर्शी तरीके से शामिल किया जाएगा. लेकिन उसके बाद जातिगत जनगणना की रिपोर्टों का होगा क्या? क्या इसको ढाल बनाकर राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तरों पर आरक्षण की सीमा को बढाकर ८०-९० प्रतिशत नहीं कर दिया जाएगा? मित्रों, हाल ही में भारत सरकार द्वारा जाती एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में सबसे अधिक बेरोजगार इस समय सवर्ण जाति के लोग हैं. बावजूद इसके न तो सवर्णों के हित के लिए एक पॉलिसी सरकार बनाएगी और न ही सवर्ण जाति के छात्रों के लिए फ्री कोचिंग की सुविधा करेगी. सरकार की हालिया वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, बेरोज़गारी की दर विभिन्न जातियों में इस प्रकार है: अनुसूचित जाति (SC): 3.3%; अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 3.1%; अनुसूचित जनजाति (ST): 1.9%; सवर्ण वर्ग (General Category): 3.8%। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि सवर्ण वर्ग में बेरोज़गारी की दर अन्य वर्गों की तुलना में अधिक है। हालांकि, इस पर समाज में व्यापक चर्चा नहीं हो रही है। ऐसा लगता है कि मीडिया और राजनीतिक दल सवर्णों को लगातार नजरअंदाज कर रहे हैं, जबकि यह इस वर्ग के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। सरकार न सिर्फ कोचिंग और स्कॉलरशिप में भेदभाव करती है बल्कि बिजनेस करने के लिए लोन देने में भी भेदभाव करती है. यकीन मानिए अगले दस सालों में सवर्णों में यह बेरोजगारी दर 10% को छू जाएगी. मित्रों, अंत में मैं इन काव्य पंक्तियों के द्वारा एक सामान्य सवर्ण के दर्द को आपलोगों के सामने रखना चाहता हूँ राष्ट्रवाद का झोला टंगे मैं सवर्ण बेचारा आवारा हूँ, मुसलमानों से यदि बच जाऊं तो दलितों का चारा हूँ, कांग्रेस ने दर्द दिए तब हमने कमल को चुना, किन्तु जेल में डाल रहे हमें कोई पड़ताल बिना, इतने दिन तक भक्ति की फिर भी मोदी का मारा हूँ, वोट बैंक की राजनीति में मैं सवर्ण बेचारा हूँ.

रविवार, 18 जनवरी 2026

झुनझुना बन चुका है नमो ऐप

मित्रों, जब देश में सोनिया-मनमोहन की सरकार थी तब देश की हालत क्या थी याद है आपको? पूरे भारत में निराशा का माहौल था. पूरी दुनिया भारत को असफल राष्ट्र मानने लगी थी. भारत में लोकतंत्र फेल हो चुका था. सरकार क्या थी घोटालों की सरकार थी. जनता की कहीं कोई सुननेवाला नहीं था. मजबूरन देश की जनता ने सरकार बदलने का निर्णय किया और एक ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाया जो देश को बदल देने के वादे और दावे कर रहा था. उसका दावा था कि अब चलता है को देश में चलने नहीं देगा. काला धन देश में वापस लाएगा. लेकिन हुआ क्या? मित्रों, ऐसे ही उम्मीद भरे माहौल में १८ जून, २०१५ को नमो ऐप लांच किया गया. शहर-शहर कार्यक्रमों का आयोजन करके इस ऐप का प्रचार भी किया गया. सच पूछिए तो मुझे इसके बारे में जानकर अपार ख़ुशी हुई. मैंने कई बार इस मंच पर अपनी समस्याएँ रखीं और हर बार त्वरित समाधान हो गया. यहाँ तक कि मेरे हाजीपुर शहर में कचरे के उठान से सम्बंधित समस्या का भी समाधान किया गया. इस बीच मैं मुज़फ्फरनगर के श्रीराम कॉलेज में अध्यापक बन गया. एक बार जब मैंने मुज़फ्फरनगर के लिए दिल्ली से बस पकड़ी तब पता चला कि बस पहले हापुड़ जाएगी, फिर मेरठ जाएगी और उसके बाद मुजफ्फरनगर. उस समय गर्मी का मौसम था और बस भी ठसाठस भरी हुई थी. मुझे खड़े होकर यात्रा करनी पड़ी और वह भी सिर्फ इसलिए क्योंकि उस दिन भारत के तत्कालीन गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह सड़क मार्ग से दिल्ली से मेरठ जा रहे थे और इसलिए बसों का रूट बदल दिया गया था. मैंने मुज़फ्फरनगर पहुँचते ही नमो ऐप पर इसकी शिकायत की. कुछ दिनों के बाद मुझे फोन आया तब मैंने कहा कि मेरी समस्या का समाधान तो तब होगा जब आगे से किसी मंत्री या अन्य वीआईपी के चलते यातायात का रूट नहीं बदला जाएगा. मित्रों, कुछ समय बाद मेरे कॉलेज का सफाईकर्मी हमारे पत्रकारिता विभाग में आया और बताया कि उसके गाँव की दबंग जाति के लोगों ने उसके वाल्मीकि समुदाय के लोगों के मोहल्ले का रास्ता रोक दिया है. पंचायत चुनाव में उन लोगों ने एक मुसलमान को प्रधान पद के लिए वोट दिया था जो जीतने के बावजूद मामले में हाथ डालने से भाग रहा है. मैंने तत्काल नमो ऐप पर शिकायत दर्ज करवा दी. कुछ दिनों के बाद मुज़फ्फरनगर के जिलाधिकारी का मुझे फोन आया और समस्या का समाधान कर दिया गया. मित्रों, इसके बाद ऐप में कई बदलाव कर दिए गए. अब शिकायत करने पर जिस विभाग या राज्य सरकार से शिकायत सम्बंधित है उसके बारे में भी बताना पड़ता था. इतना ही नहीं शिकायत करने के बाद अब मामले को प्रदेश लोक शिकायत विभाग में भेज दिया जाता था और मैसेज भेज दिया जाता था कि आपकी समस्या का समाधान कर दिया गया है और तबसे जनसमस्याओं के समाधान का यह मंच झुनझुना बनकर रह गया है. उसके बाद आपके पास बार-बार फोन करके पूछा जाता है कि क्या आप समाधान से संतुष्ट हैं लेकिन उसके बाद होता कुछ भी नहीं है. मतलब फोन करके पूछना भी सिर्फ औपचारिकता होती है. तबसे मैंने कई बार कई तरह की समस्याओं के बारे में शिकायत की जिनमें से अधिकतर बिहार के राजस्व व पुलिस विभाग से सम्बंधित थी. हर बार मैसेज आता रहा कि आपकी समस्या का समाधान कर दिया गया है हालाँकि अधिकतर समस्याओं का कोई समाधान नहीं हुआ. मामले को जनशिकायत में भेजकर औपचारिकता पूरी कर ली गई. एक मामले में तो मुझे वैशाली जिला जनशिकायत विभाग द्वारा कई महीने तक तारीख-पे-तारीख देकर मामले की मेरी अनुपस्थिति में सुनवाई कर ली गई और फैसला मेरे खिलाफ सुना दिया गया. मामला महनार के अंचलाधिकारी द्वारा घूस नहीं देने पर दस्तावेज के अपठनीय होने का बहाना बनाकर दाखिल-ख़ारिज के आवेदन को रद्द कर देने से सम्बंधित था. मित्रों, कुल मिलाकर जो मंच जनता को प्रधानमंत्री जी द्वारा उपलब्ध करवाया गया था वो अब बेकार हो साबित चुका है. यद्यपि नमो ऐप अभी भी मोदी जी के भोंपू के रूप में जरूर बखूभी अपने काम को अंजाम दे रहा है और दिन-रात जनता को मोदी जी के मन की बात सुना-बता रहा है. लेकिन जनता अपने मन की बात अब कैसे सरकार को सुनाए और क्यों सुनाए जब उसकी बातों को सुना ही नहीं जा रहा? ऐसे में सवाल उठता है कि अब लोग अपनी शिकायतों को लेकर जाएँ तो कहाँ जाएँ. बिहार में तो प्रदेश स्तर पर जन शिकायतों के लिए ऐसा कोई मंच है भी नहीं. मुझे लगा था कि नेता लोग भले भी मोटी चमड़ी वाले होते हैं लेकिन मोदी जी ऐसे नहीं हैं लेकिन इस नमो ऐप की दुर्गति देखकर तो ऐसा लगता है कि मोदी जी भी बांकी नेताओं की तरह ही मोटी चमड़ी वाले हैं.