बुधवार, 6 मई 2026

जय भीम, जय भीम राव कांबले

मित्रों, इन दिनों पुणे में 4 साल की अबोध बच्ची के साथ घटी एक रेप और बेरहमी से की गई हत्या की घटना ने पूरे भारत के मन-मस्तिष्क को झकझोर कर रख दिया है. यहाँ अपराधी का नाम भीमराव कांबले है. मतलब नाम भी बाबा साहेब वाला और जाति भी बाबा साहेब वाली। उम्र जानकर तो आप और भी आश्चर्य में पड़ जाएंगे। 65 साल. मित्रों, इतना ही नहीं मृतक बच्ची कथित रूप से ब्राह्मण जाति की थी. मतलब बलात्कारी महार और पीड़िता ब्राह्मणी। इतना ही नहीं पता चला है कि पुणे की मासूम बच्ची के साथ हैवानियत के आरोप में गिरफ्तार भीमराव कांबले एक आदतन अपराधी है, जिसका पूरा इतिहास क्राइम से भरा हुआ है. साल 2015 में बड़े अपराध में जेल के अंदर गया कांबले छूट गया था. हमारे हाथ लगे दस्तावेजों और कोर्ट आदेशों से साफ हो गया है कि यह पहली बार नहीं, बल्कि उसके हाथ काले कारनामों से रंगे पड़े हैं. साल 2015 में बड़े अपराध में जेल के अंदर गया कांबले छूट गया था. मित्रों, साल 1998 में भीमराव कांबले की क्राइम की दुनिया में पर्दापण हुआ, जब साल 1998 में उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना) और धारा 452 (हमले की तैयारी के साथ घर में अनधिकृत प्रवेश) के तहत मामला दर्ज किया गया था. इस मामले ने तभी संकेत दे दिए थे कि उसकी गतिविधियां समाज और महिलाओं की सुरक्षा के लिए खतरा हैं. साल 2015 में यौन उत्पीड़न केस में सबूतों के अभाव भीमराव कांबेल छोड़ दिया गया था. इस मामले से संबंधित कोर्ट ऑर्डर की कॉपी भी सामने आई है. मामला अत्यंत गंभीर था, लेकिन कानूनी प्रक्रिया के दौरान अभियोजन पक्ष आरोपों को सिद्ध करने में नाकाम रहा. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके खिलाफ कोर्ट में पर्याप्त व पुख्ता सबूत पेश नहीं किए जा सके. गौरतलब है तब प्रत्यक्षदर्शियों या तकनीकी साक्ष्यों की कमी के चलते, न्यायालय ने भीमराव कांबले को 'बेनिफिट ऑफ डाउट' देते हुए सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था. उसकी यह आपराधिक कुंडली बताती है कि वह पहले भी गंभीर कानूनी पचड़ों में फंस चुका है. भले ही वह अदालत से एक बार तकनीकी आधार पर बच निकला हो, लेकिन उसके खिलाफ दर्ज पुराने मुकदमे उसकी हिंसक और आपराधिक प्रवृत्ति की गवाही देते हैं. अब नए सिरे से उठ रहे सवालों ने प्रशासन को फिर से उसके पुराने रिकॉर्ड को खंगालने पर मजबूर कर दिया है. मित्रों, पुणे में पिछले सप्ताह उसी हजारों सालों से दबे-कुचले व्यक्ति द्वारा चार वर्षीय जिस पुजारी की लड़की की दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई थी, उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने दम घुटने से उसकी मौत होने का संकेत दिया है। पुलिस ने बताया है कि 65 वर्षीय आरोपित भीमराव ने पीड़िता के मुंह में मोजा ठूंस दिया था। इससे दम घुटने से उसकी मौत हो गई। पुलिस के अनुसार, आरोपित बच्ची को खाने का लालच देकर बहला-फुसलाकर मवेशी बाड़े में ले गया, जहां उसने उसका यौन उत्पीड़न किया और बाद में उसकी बेरहमी से हत्या कर दी। मृतक मासूम के शरीर पर चोट के भी गहरे निशान पाए गए हैं. मित्रों, अब हम आते हैं अपने मूल विषय पर. सामाजिक न्याय के नए पुरोधा आदरणीय नरेंद्र मोदी जी का एक भाषण हमने देखा है जिसमें वो कहते हैं कि जिनके साल हजारों सालों तक अत्याचार हुए उनको बदला लेने का अवसर मिलना चाहिए। जाहिर है कि वर्ष २०१८ में जब सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के अन्यायपूर्ण प्रावधानों को अवैध घोषित करते हुए कहा था कि इस एक्ट में पहले जांच होनी चाहिए फिर गिरफ़्तारी तब महान मोदी जी कथित रूप से हजारों सालों से अत्याचार झेल रही जातियों को बदला लेने का भरपूर अवसर प्रदान करते हुए न सिर्फ पहले गिरफ़्तारी फिर जाँच को फिर से लागू कर दिया बल्कि धाराओं को भी बढाकर २२ से 47 कर दिया। इतना ही नहीं लाखों रूपये के मुआवजे भी दिए जाने लगे. भले ही अदालत में आरोप झूठे साबित हो जाएं और निर्दोष आरोपी का जीवन,कैरियर, घर, परिवार सबकुछ बर्बाद हो जाए लेकिन न तो झूठे आरोप लगानेवालों पर कोई कानूनी कार्रवाई होगी और न ही मुआवजा वापस लिया जाएगा। मित्रों, नतीजा यह है कि एससी-एसटी के लिए यह एक्ट एक तीर से दो शिकार करने का सुअवसर प्रदान कर रहा है. सवर्ण को जेल भेजकर उसके पूर्वजों द्वारा किये गए कथित अत्याचारों का बदला भी ले लिया और जेब में लाखों रूपये भी आ गए. हालाँकि मोदी जी भी जानते हैं कि एक हजार साल तक देश के समस्त हिन्दू क्रमशः मुसलमानों और ईसाइयों के गुलाम थे इसलिए जातीय अत्याचार की कहानियां झूठी हैं. मित्रों, मैं इस आलेख के अंत में प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी पिछड़े से अति पिछड़े हो गए मोदी जी से मांग करता हूँ कि एससी-एसटी एक्ट में एक और बदलाव करके यह प्रावधान कर दें कि जो भी एससी-एसटी वर्ग का व्यक्ति सवर्ण महिलाओं के साथ रेप और फिर उनकी हत्या करेगा उसको अपराध में की गई क्रूरता के अनुसार सजा नहीं बल्कि ईनाम दिया जाएगा। ऐसा प्रावधान करने से ही सामाजिक न्याय पूर्णता को प्राप्त करेगा। साथ ही मैं चंद्रशेखर रावण के उन दावों का भी तहे दिल से समर्थन करता हूँ कि एससी-एसटी आजीवन दबा-कुचला रहेगा भले ही वो वास्तविक रावण की तरह आतताई हो और सोने की लंका में रहता हो. यहाँ तक कि उनको मंदिरों का पुजारी बनाना भी उनके साथ अत्याचार है और ऐसा करनेवालों पर एससी-एसटी एक्ट के तहत कठोर-से-कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए.