गुरुवार, 5 अगस्त 2021

भारत कब बनेगा खेलों का विश्वगुरु?

मित्रों, भारत और चीन पड़ोसी देश हैं, दोनों बड़ी आबादी वाले देश हैं, दोनों विश्वगुरु बनने का सपना देख रहे हैं. लेकिन जब बात ओलंपिक खेलों की होती है तो चीन से तुलना करना भारतीयों के लिए काफ़ी शर्मसार करने वाली बात हो जाती है. टोक्यो में जारी ओलंपिक मुक़ाबलों में अब तक का रुझान पिछले ओलंपिक मुक़ाबलों की तरह ही नज़र आ रहा है, जहाँ चीन मेडल टैली में सबसे ऊपर है वहीँ भारत नीचे के पांच देशों में. क्या किसी के पास भारत के इस मायूस और शर्मनाक करने वाले प्रदर्शन का जवाब है? मित्रों, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है. सच तो ये है कि देश में क्रिकेट को छोड़कर किसी और स्पोर्ट्स में किसी को कोई ख़ास दिलचस्पी ही नहीं है. टोक्यो में जारी ओलंपिक खेलों से पहले भारत ने अपने 121 साल के ओलंपिक इतिहास में केवल 28 पदक जीते थे जिनमें से नौ स्वर्ण पदक रहे हैं, और इनमें से आठ अकेले हॉकी में जीते गए थे. जबकि अकेले अमेरिकी तैराक माइकल फेल्प्स ने अपने करियर में 28 ओलंपिक पदक जीते हैं जो घनी आबादी वाले देश भारत के पूरे ओलंपिक इतिहास में (टोक्यो से पहले तक) हासिल किए गए कुल पदकों के बराबर है. मित्रों, भारत के विपरीत चीन ने ओलंपिक मुक़ाबलों में पहली बार 1984 में हुए लॉस एंजेलिस ओलंपिक में भाग लिया था लेकिन टोक्यो से पहले इसने 525 से अधिक पदक जीत लिए थे, जिनमें 217 स्वर्ण पदक थे. टोक्यो में भी अब तक इसका प्रदर्शन ओलंपिक सुपर पावर की तरह रहा है. उसने बीजिंग में 2008 के ओलंपिक खेलों को आयोजित भी किया और 100 पदक हासिल करके पहले नंबर पर भी रहा. मित्रों, दरअसल, चीन और भारत ओलंपिक मुक़ाबलों के हिसाब से तो अलग-अलग हालत में हैं. आखिर ओलंपिक खेलों के आयोजन के पीछे ख़ास मक़सद स्पोर्ट्स की स्पिरिट को बढ़ाना और राष्ट्रीय गौरव हासिल करना है. चीन इतने कम समय में ओलंपिक सुपर पावर कैसे बन गया? तो इसका जवाब है एक शब्द “डिज़ायर”. ये एक गहरा शब्द है जिसमें कई शब्द छिपे हैं: चाहत, मंशा, अभिलाषा, लालच और यहाँ तक कि महत्वाकांक्षा और लगन भी. जहाँ चीन में पूरे समाज के सभी तबक़े में, चाहे वो सरकारी हो या ग़ैर सरकारी, पदक हासिल करने की ज़बरदस्त चाह है. भारतीय सिर्फ सरकारी नौकरी के लालच में खेलते हैं. हमारा तंत्र और व्यवस्था इतना घटिया है कि बड़े-बड़े खिलाडी ठेला खींचते देखे जा सकते हैं. फिर खेल संगठनों में भी जमकर भ्रष्टाचार होता है. यहाँ तक कि खिलाडियों का यौन शोषण भी होता है. मित्रों, दूसरी ओर अगर हम ८० के दशक की चीनी मीडिया पर निगाह डालें तो पता चलेगा कि शुरू के सालों में तमग़ा और मेडल पाने की ये चाहत सिर्फ़ चाहत नहीं थी बल्कि ये एक जुनून था. विश्व में नंबर एक बनने की दिली तमन्ना थी. चीन की आज की पीढ़ी अपने राष्ट्रपति शी जिनपिंग के उस बयान से प्रेरित होती है जिसमे उन्होंने कहा था, “खेलों में एक मज़बूत राष्ट्र बनना चीनी सपने का हिस्सा है.”. राष्ट्रपति शी का ये बयान ‘डिज़ायर’ ही पर आधारित है. मित्रों, आम तौर से भारत के नागरिक और नेता हर मैदान में अपनी तुलना चीन से करते हैं और अक्सर चीन की तुलना में अपनी हर नाकामी को चीन के अलोकतांत्रिक होने पर थोप देते हैं, लेकिन ओलंपिक खेलों में अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकतांत्रिक देश भी बड़ी ताकत हैं. जब भारतीय चीन के प्रति इतने प्रतियोगी हैं तो खेलों का स्तर चीन की तरह क्यों नहीं? या चीन भारतीय खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा क्यों नहीं? आखिर ये कैसे संभव हुआ कि 1970 के दशक में दो ग़रीब देश, जो आबादी और अर्थव्यवस्था के हिसाब से लगभग समान थे मगर इनमें से एक खेलों में निकल गया काफ़ी आगे और दूसरा कैसे काफ़ी पीछे छूट गया? एक पदक में अमेरिका को मात दे रहा है और दूसरा उज़्बेकिस्तान जैसे ग़रीब देशों से भी पिछड़ा है? वास्तव में चीन और हिंदुस्तान की जनसंख्या लगभग समान है और हमारी अधिकांश चीजें भी समान हैं. परन्तु चीन के खिलाड़ियों की ट्रेनिंग साइंटिफ़िक और मेडिकल साइंस के आधार पर ज़्यादा ज़ोर देकर करवाई जाती है जिससे वो पदक प्राप्त करने में कामयाब रहे हैं. चीन में सब बंदोबस्त ‘रेजीमेन्टेड’ होता जिसे सबको मानना पड़ता है. भारत में ऐसा करना मुश्किल है. चीन में माता-पिता और परिवार वाले बचपन से ही अपने बच्चों को खिलाड़ी बनाना चाहते हैं जबकि भारत में, खास तौर ग्रामीण क्षेत्रों में, माँ-बाप बच्चों को पढ़ाने पर और बाद में नौकरी पर ध्यान देते हैं. मित्रों, चीन के पास सरकार के नेतृत्व वाली समग्र योजना है, खेलों में लोगों की व्यापक भागीदारी है, वहां ओलंपिक के हिसाब से लक्ष्य निर्धारित किया जाता है, हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों क्षेतों में मजबूती है, प्रतिभाओं की खोज और प्रोत्साहन के लिए विकसित तंत्र है, सरकारी और निजी क्षेत्रों के बीच तालमेल है. चीन ने अपने खेल के बुनियादी ढांचे में ज़बरदस्त सुधार किया है और वो खुद कई तरह के खेल उपकरण बना सकता है. मित्रों, भले ही रिओ ओलंपिक में चीन पदक तालिका में (70 पदकों के साथ) तीसरे स्थान पर था, लेकिन वो चर्चा इस बात पर कर रहा होगा कि वो लंदन 2012 ओलंपिक में अपने 88 पदकों की संख्या को बेहतर क्यों नहीं कर सका. इसके विपरीत, भारत अपने बैडमिंटन रजत पदक विजेता पीवी सिंधु और कुश्ती कांस्य विजेता साक्षी मलिक को भारी मात्रा में धन और प्रतिष्ठित राज्य पुरस्कारों से नवाज़ रहा है. जिमनास्ट दीपा करमाकर, जो पदक हासिल करने से चूक गईं, और निशानेबाज़ जीतू राय को भी सम्मानित किया गया, जिन्होंने पिछले दो वर्षों में स्वर्ण और रजत सहित एक दर्जन पदक जीते हैं, लेकिन रियो में वो कोई पदक न जीत सकीं. मित्रों, टोक्यो में ओलंपिक खेल शुरू हुए एक हफ़्ते से ज़्यादा हो गया है और पिछली प्रतियोगिताओं की तरह इस बार भी भारत के जिन खिलाड़ियों से पदक की उम्मीद थी वो ख़ाली हाथ देश लौट रहे हैं. भारत ने अब तक एक रजत और तीन कांस्य पदक ही जीता है जबकि चीन पर पदकों की बरसात हो रही है. ओलंपिक खेलों की समाप्ति के बाद जनता भारत की नाकामी का मातम मनाएगी और मीडिया इसका विश्लेषण करेगी और थोड़े दिनों बाद सब कुछ नॉर्मल हो जाएगा. भारत की नाकामी का दोष खिलाडियों को पूरी तरह से नहीं दिया जा सकता. दरअसल भारती में खेल संस्कृति का अभाव है, खेलों में पारिवारिक-सामाजिक भागीदारी की कमी है, खेल सरकारों की प्राथमिकता में नहीं हैं, खेल फ़ेडेरेशनों पर सियासत हावी है, खेल इंन्फ्रास्ट्रक्चर और डाइट नाकाफ़ी है, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद है, देश में ग़रीबी है और खेल से पहले नौकरी को लोग प्राथमिकता देते हैं. साथ ही प्राइवेट स्पॉन्सरशिप की भी कमी है. न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारों का बजट आवश्यकता के अनुसार है, लगभग सभी राज्य सरकारों का स्पोर्ट्स बजट प्रति व्यक्ति दस पैसा भी नहीं है. ऐसी दशा में खेलों की इस दशा के लिए कौन ज़िम्मेदार है-सरकार, परिवार, समाज? मेरी मानें तो सभी.

सोमवार, 2 अगस्त 2021

पारदर्शिता घटानेवाला सुधार

मित्रों, वर्तमान राजनीति के बारे में आपका क्या ख्याल है? मेरी माने तो ऐन केन प्रकारेण सफलता या जीत प्राप्त कर लेना ही वर्तमान काल में राजनीति है लेकिन जब कोई सत्ता पा लेने के बाद भी छल करता रहे तो उसे क्या कहेंगे? मित्रों, आपने एकदम ठीक समझा है मेरा तात्पर्य भारत के उन्हीं नेताओं से है जिनके हाथों में हमने अपने देश-प्रदेश का वर्तमान दे रखा है। वही नेता जिनकी कथनी और करनी में कोई साम्य ही नहीं है। जो कहते कुछ है और करते कुछ हैं। दिखाते कुछ हैं और होता कुछ है। कई बार उनके शब्द उनके कृत्य के नितांत विपरीत होते हैं। मित्रों, मैं मोदीजी की बात नहीं कर रहा मैं बात कर रहा हूं बिहार के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री रामसूरत राय जी की। दरअसल पिछले दिनों बडी धूमधाम से बिहार भूमि की वेबसाइट का नवीनीकरण किया गया है। ३१ जुलाई को बिहार के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री श्री राम सूरत राय जी ने इसका उद्घाटन किया. निस्संदेह यह एक अच्छा कदम है क्योंकि कई सारी सुविधाएँ जो पहले से इस वेबसाइट पर जनता जनार्दन को उपलब्ध नहीं थी अब उपलब्ध है. मित्रों, लेकिन एक सुविधा जो पहले से इस वेबसाइट पर उपलब्ध थी अब समाप्त कर दी गई है. पहले जहाँ प्रत्येक मौजा के प्रत्येक वर्ष के अब तक के सारे लंबित दाखिल ख़ारिज मामलों की स्थिति को जब चाहे तब चाहे जितनी बार देखा जा सकता था अब देखा नहीं जा सकेगा. निश्चित रूप से इससे उन निकम्मे और घूसखोर कर्मचारियों व अधिकारियों को फायदा पहुँचनेवाला है जो बिना घूस लिए जमीन का दाखिल ख़ारिज नहीं करते. मित्रों, जहाँ पूरी दुनिया में सूचना क्रांति के इस दौर में पारदर्शिता बढ़ाने पर जो दिया जा रहा है वहीँ बिहार सरकार ने अपने सबसे भ्रष्ट विभाग में पारदर्शिता को घटानेवाला पश्चगामी कदम उठाया है. एक तरफ मंत्रीजी इस विभाग से घूसखोरी को समाप्त करने का इरादा लगातार मीडिया में जाहिर करते रहते हैं वहीँ दूसरी और उनके द्वारा वेबसाइट में प्रतिगामी परिवर्तन जिससे रिश्वतखोरी को बढ़ावा मिलेगा आश्चर्य में डालनेवाला है. निश्चित रूप से यह जनता के साथ छल है, धोखा है.

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

ब्राह्मण सम्मेलन का नाटक

मित्रों, जब हम आईएएस की तैयारी कर रहे थे तो एक दिन अपनी कोचिंग के इतिहास के शिक्षक और इतिहास के उद्भट विद्वान ओमेन्द्र सर से पूछा था कि देश की आजादी के लिए सबसे ज्यादा फांसी पर कौन चढ़े थे तो उन्होंने बताया था कि ब्राह्मण. साथ ही आन्दोलन का स्थानीय नेतृत्व पूरे भारत में उन्होंने ही किया था. फिर नंबर आता है क्षत्रिय, कायस्थों और अन्य जातियों का. मित्रों, अगर हम आपसे पूछें कि देश की आजादी के बाद सबसे ज्यादा नुकसान किसको हुआ है तो निश्चित रूप से आप कहेंगे सवर्णों का. आज सवर्णों की स्थिति इतनी ख़राब है, वे इतने हाशिए पर जा चुके हैं कि न तो राजनीति में उनकी कोई पूछ है और न ही समाज में. मित्रों, आपने इतिहास की किताबों में पढ़ा होगा कि १९१८ में अंग्रेज सरकार रौलेट एक्ट लेकर आई थी जिसमें पहले गिरफ़्तारी और बाद में जाँच का प्रावधान था. सन १९८९ में तत्कालीन राजीव गाँधी की सरकार ने एक कानून बनाया जो लगभग रौलेट एक्ट ही था. वह कानून था-अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989. इस कानून में ऐसे प्रावधान हैं कि जैसे ही एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज होता है ऑंख बंद कर सबसे पहले आरोपित को गिरफ्तार किया जाएगा फिर बाद में जाँच होगी. जैसे स्कूल में पहले बच्चे को दण्डित कर दिया जाए बाद में पता लगाया जाए कि उसकी गलती थी या नहीं. इतना ही नहीं इस एक्ट में पीड़ित को तत्काल सरकार की तरफ से मुआवजा देने का भी प्रावधान है जो इस एक्ट को और भी घातक बनाता है. कई बार कोर्ट में केस झूठा साबित होने पर भी पीड़ित मुआवजे की राशि नहीं लौटाते जबकि होना यह चाहिए कि वही मुआवजा उन जालसाजों से वापस लेकर आरोपित को देना चाहिए. साथ ही झूठा मुकदमा करनेवालों जेल भी भेजना चाहिए. मित्रों, सन १९८९ को अब ३२ साल बीत चुके हैं. पंचायत चुनावों से लेकर शिक्षण संस्थानों व ठेके तक में तमाम क्षेत्रों में आरक्षण के चलते अब एससी-एसटी समेत पिछड़ी जातियों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति वैसी नहीं रही जैसी १९८९ में थी. बल्कि कई अवर्णों के पास तो अपार धन-संपत्ति है जबकि सवर्णों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति में कल्पनातीत गिरावट आई है और बहुत से लोग तो भूखों मर रहे हैं. फिर भी एससी-एसटी एक्ट ज्यों-का-त्यों है. आरक्षण और फीस में छूट भी वैसे ही है. यहाँ मैं आपको बता दूं कि १९८९ में भी बहुत-से सवर्ण पूरी तरह से भूमिहीन थे और उनकी आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक स्थिति भी एससी-एसटी से बेहतर नहीं थी. फिर भी राजीव गाँधी जो अपनी मूर्खता के लिए विश्व प्रसिद्ध थे यह कानून लेकर आए. जाहिर है वजह वोट बैंक था. आजादी के बाद भी राष्ट्र प्रथम की सोंच रखने के कारण सवर्णों ने सबसे ज्यादा परिवार नियोजन करवाया इसलिए उनकी जनसंख्या में हिस्सेदारी लगातार घटती रही इसलिए भी वोट बैंक के रूप में उनका महत्व क्रमशः घटता गया. साथ ही हर जगह आरक्षण होने से सामाजिक प्रभाव में तो गिरावट आई ही. मित्रों, इस बारे में मुझे एक घटना याद आ रही है. जब २००५ में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो तब के उनके मुख्य सहायक श्री शिवानन्द तिवारी ने उनसे कहा था कि बांकियों की चिंता करिए सवर्णों की चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है. वे तो बिहार का विकास देखकर ही आपको वोट दे देंगे. और ऐसा हुआ भी. इसी से समझ सकते हैं कि सवर्ण आज भी अपने से ज्यादा देश-प्रदेश का भला चाहते हैं. मित्रों, आज एक गरीब ब्राह्मण जिस नौकरी के आवेदन के लिए १००० रूपये की फ़ीस देता है करोड़पति एससी-एसटी को कभी-कभी तो एक पैसा भी नहीं देना पड़ता है. यह कैसा न्याय है और कैसी समानता है? क्या यह अत्याचार नहीं है? क्या समय के साथ आरक्षण और फीस सम्बन्धी प्रावधानों को बदलना नहीं चाहिए? रही बात एससी-एसटी एक्ट की तो चूंकि आज एससी-एसटी बड़ी संख्या में मुखिया-सरपंच-अधिवक्ता-अधिकारी बन चुके हैं इसलिए इस कानून का सदुपयोग तो हो नहीं रहा दुरुपयोग जरूर हो रहा है और जमकर हो रहा है. कई बार तो एससी-एसटी जाति के लोग सवर्णों को पीटते भी हैं और इस एक्ट की सहायता से उनको जेल भी भिजवा देते हैं. मित्रों, कई साल पहले आरा, बिहार में एक महादलित बीडीओ ने एक पत्रकार पर चुपके से एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा इसलिए दर्ज करवा दिया क्योंकि उसने उनका घोटाला पकड़ लिया था. अचानक बेचारे की गिरफ़्तारी भी हो गई. बाद में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने मामला संज्ञान में आने के बाद उसे जेल से बाहर निकलवाया. अब आप ही बताईए कि जब पत्रकार की ऐसी हालत कर दी गई तो बीडीओ साहब का आम सवर्ण या पिछड़ों के प्रति क्या रवैया रहता होगा. मित्रों, इस बीच 20 मार्च 2018 को माननीय सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने स्वत: संज्ञान लेकर एससी/एसटी एक्ट में आरोपियों की शिकायत के फौरन बाद गिरफ्तारी पर रोक लगा दी । शिकायत मिलने पर एफआईआर से पहले शुरुआती जांच को जरूरी किया गया था। साथ ही अंतरिम जमानत का अधिकार दिया था। तब कोर्ट ने माना था कि इस एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी की व्यवस्था के चलते कई बार बेकसूर लोगों को जेल जाना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- गिरफ्तारी से पहले शिकायतों की जांच निर्दोष लोगों का मौलिक अधिकार है। लेकिन, 9 अगस्त 2018 को फैसले के खिलाफ अति हिंसक प्रदर्शनों के बाद केंद्र सरकार एससी/एसटी एक्ट में बदलावों को दोबारा लागू करने के लिए संसद में संशोधित बिल लेकर आई। इसके तहत एफआईआर से पहले जांच जरूरी नहीं रह गई। जांच अफसर को गिरफ्तारी का अधिकार मिल गया और अग्रिम जमानत का प्रावधान हट गया। आश्चर्यजनक तो यह रहा कि किसी भी सवर्ण सांसद ने न तो लोकसभा में और न ही राज्यसभा में इस अन्यायपूर्ण संशोधन का विरोध किया. मित्रों, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने ६ नवम्बर, २०२० को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि उच्च जाति के किसी व्यक्ति को उसके कानूनी अधिकारों से सिर्फ इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता है क्योंकि उस पर अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) के किसी व्यक्ति ने आरोप लगाया है। जस्टिस एल. नागेश्वर राव की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, 'एससी/एसटी ऐक्ट के तहत कोई अपराध इसलिए नहीं स्वीकार कर लिया जाएगा कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति का है, बशर्ते यह यह साबित नहीं हो जाए कि आरोपी ने सोच-समझकर शिकायतकर्ता का उत्पीड़न उसकी जाति के कारण ही किया है।' एसटी/एसटी समुदाय के उत्पीड़न और उच्च जाति के लोगों के अधिकारों के संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी काफी क्रांतिकारी मानी जा रही है। तीन सदस्यीय पीठ की तरफ से लिखे फैसले में जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कहा कि उच्च जाति के व्यक्ति ने एससी/एसटी समुदाय के किसी व्यक्ति को गाली भी दे दी हो तो भी उस पर एससी/एसटी ऐक्ट के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती है। हां, अगर उच्च जाति के व्यक्ति ने एससी/एसटी समुदाय के व्यक्ति को जान-बूझकर प्रताड़ित करने के लिए गाली दी हो तो उस पर एससी/एसटी ऐक्ट के तहत कार्रवाई जरूर की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि जब तक उत्पीड़न का कोई कार्य किसी की जाति के कारण सोच-विचार कर नहीं किया गया हो तब तक आरोपी पर एससी/एसटी ऐक्ट के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती है. सर्वोच्च अदालत ने कहा कि उच्च जाति का कोई व्यक्ति अगर अपने अधिकारों की रक्षा में कोई कदम उठाता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसके ऊपर स्वतः एससी/एसटी ऐक्ट के तहत आपराधिक कृत्य की तलवार लटक जाए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के फैसलों पर फिर से मुहर लगाते हुए कहा कि एससी/एसटी ऐक्ट के तहत उसे आपराधिक कृत्य ठहराया जा सकता है जिसे सार्वजनिक तौर पर अंजाम दिया जाए, न कि घर या चहारदिवारी के अंदर जैसे प्राइवेट प्लेस में। मित्रों, फिर भी इसमें संदेह नहीं कि आज भी इस कानून का जमकर दुरुपयोग हो रहा है. झूठे गवाह जुटा लेना अपने देश में कोई बड़ी बात नहीं है. अभी यूपी में चुनाव होने हैं और यूपी में ब्राह्मणों की अच्छी-खासी संख्या है इसलिए सारे दल ब्राह्मण सम्मलेन आयोजित कर रहे हैं. इनमें वह दल भी शामिल है जिसने देशभर में तोड़-फोड़कर सुप्रीम कोर्ट के २० मार्च, २०१८ के फैसले को पलटवाया. आज सवर्ण और पिछड़े एससी-एसटी को मकान-दूकान किराए पर देने से डरने लगे हैं. साथ ही उनको नौकरी देने में लोग डरते हैं. एक तो भलाई करो फिर जेल भी जाओ. मित्रों, किसी देश का कानून, व्यवस्था को बनाए रखने और समाज में शांति का माहौल बनाने में मदद कर करता है लेकिन जब किसी कानून का इस्तेमाल एक वर्ग द्वारा अन्य वर्ग के विरुद्ध अपने फायदे के लिए होने लगता है तो फिर उस कानून में बदलाव की आवश्यकता होती है। पिछले दिनों एक खबर आयी कि एक व्यक्ति विष्णु तिवारी नामक ललितपुर का ब्राह्मण SC/ST एक्ट के तहत बलात्कार के आरोप में 20 वर्षों से सश्रम कारावास में आगरा केंद्रीय कारागार में कैद था अब जा कर निर्दोष साबित हुआ है। आखिर हमारे देश का कानून किस प्रकार से उस व्यक्ति के गुज़रे हुए 20 वर्ष वापस कर सकता है? यह तो सिर्फ एक उदाहरण है, ऐसे ना जाने कितने उदाहरण देश में भरे पड़े है जो न केवल यह दिखाते हैं कि कैसे SC/ ST का दुरुपयोग होता है बल्कि उसका इस्तेमाल आपसी रंजिश के कारण भी किया जा रहा है। दरअसल, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 (Vishnu v. State of UP) के तहत बलात्कार, आपराधिक धमकी जैसे आरोपों के कारण 20 साल से जेल में बंद एक व्यक्ति को आरोप मुक्त किया है। डॉ. कौशल जयेंद्र ठाकर और गौतम चौधरी की पीठ ने एक ऐसे व्यक्ति को बरी कर दिया जो झूठे बलात्कार और दलित अत्याचार मामले में बीस साल से अधिक समय तक जेल में रहा। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने पाया कि घटना की तारीख, यानी 16.9.2000 से आरोपी जेल में है यानी 20 साल से। उस व्यक्ति को आईपीसी की धारा 376, 506 और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3 (1) (xii) के साथ धारा 3 (2) (v) के तहत गिरफ्तार किया गया था. अब जाकर कोर्ट ने तथ्यों और चिकित्सा रिपोर्टों को सुनते हुए मामले को खारिज कर दिया और आरोपी को आपसी रंजिश का शिकार पाया. मेडिकल रिपोर्ट में चोटों और यौन हमले का कोई संकेत नहीं है। इसके अलावा, अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता ने शिकायत एक ही मकसद के कारण की थी। दोनों पक्षों के बीच पहले से भूमि विवाद था जिसके कारण अभियोजन पक्ष ने यौन उत्पीड़न के मामले को दायर किया । मित्रों, सुनवाई के दौरान, अदालत ने दोहराया कि अगर कोई भूमि विवाद में हैं तो उस व्यक्ति के खिलाफ SC/ST अधिनियम के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती है। कोर्ट के अनुसार, “हमारी जाँच पड़ताल में, चिकित्सा प्रमाण यह स्पष्ट करते है कि डॉक्टर को किसी भी प्रकार का शुक्राणु नहीं मिला था। डॉक्टर ने स्पष्ट रूप से कहा कि जबरन संभोग का भी कोई संकेत नहीं मिला और ना ही किसी प्रकार की अंदरूनी चोट थी।” रिकॉर्ड पर तथ्यों और सबूतों के मद्देनज़र, अदालत ने आश्वस्त किया था कि आरोपी को गलत तरीके से दोषी ठहराया गया है, इसलिए आदेश को बदल कर आरोपी को बरी कर दिया गया. बता दें कि इकोनोमिक टाइम्स कि रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने बताया था कि 2016 में SC/ST एक्ट के अंदर 8900 केस गलत थे। राजस्थान पुलिस के पास उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत 2020 में राजस्थान के अंदर 40 प्रतिशत से अधिक मामले फर्जी पाए गए। स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2018 में यह कहा था कि ये निर्दोष नागरिकों और पब्लिक सर्वेंट को “ब्लैकमेल” करने का एक साधन बन गया है। 1989 अधिनियम न सिर्फ निर्दोष को दंडित करता है और यहां तक कि संदिग्ध अपराधियों को अग्रिम जमानत भी नहीं देता। फिर अदालत ने कहा कि कानून का इस्तेमाल केवल शिकायतकर्ता की शिकायत मात्र से आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लूटने के लिए किया जाता है। यानी देखा जाए तो इस कानून का जितना उपयोग होता है, उससे अधिक दुरुपयोग होता है। एक व्यक्ति के जीवन के 20 वर्ष जेल में ही गुजर गये वो भी केवल झूठे आरोपों के आधार पर, इससे बड़ी विडंबना शायद ही हो सकती है। इतना ही नहीं मुकदमे में सारी जमीन तक बिक गई और सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करना पड़ा. इस दौरान परिजनों ने भी उसकी सुध नहीं ली. मित्रों, उसकी जवानी के वो बीस साल, जब वो अपनी मेहनत और कोशिशों से अपने और अपने परिवार के लिए जमाने भर की खुशियां खरीद सकता था, वो बीस साल उसे कौन वापस करेगा? जो उसने बगैर किसी गुनाह के ही सलाखों के पीछे निकाल दिए. उसकी जवानी के वो बीस साल, जब वो अपनी मेहनत और कोशिशों से अपने और अपने परिवार के लिए जमाने भर की खुशियां खरीद सकता था, वो बीस साल उसे कौन वापस करेगा? उसे उसके मां-बाप कौन लौटाएगा, जो जवान बेटे के गम के तड़प-तड़प कर इस दुनिया से दूर चले गए. उसे उसके उन दो बड़े भाइयों से कौन मिलवाएगा, जिन्हें विष्णु का इंतज़ार भरी जवानी में लील गया. सबसे बडी़ विसंगति तो यह रही कि विष्णु चीख-चीख कर कहता रहा कि वो नाबालिग है, १७ साल का है लेकिन उसकी एक नहीं सुनी गई। मित्रों, सच्चाई तो यह है किसी भी दल को ब्राह्मणों की समस्याओं से कुछ भी लेना-देना नहीं है. कोई भी दल इस काले आधुनिक रौलेट एक्ट को बदलने का वादा नहीं कर रहा लेकिन सबको ब्राह्मणों का वोट चाहिए. बांकी सवर्ण तो किसी गिनती में ही नहीं हैं इसलिए उनके लिए कोई जातीय सम्मेलन नहीं हो रहा. सवाल उठता है कि क्या ब्राह्मण सहित सारी गैर एससी-एसटी जातियों को इस कानून को समाप्त करने की न सही सुप्रीम कोर्ट के २० मार्च, २०१८ के निर्णय के अनुकूल बनाने की मांग नहीं करनी चाहिए? आखिर कब तक सवर्ण बतौर शिवानन्द तिवारी देश-प्रदेश हित में अपने निजी हितों को कुर्बान करते रहेंगे? आखिर यह कैसा नाटक है कि जो कोई पार्टी कभी तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार का आह्वान करती है वो आज ब्राह्मणों का झूठा सम्मान करने का नाटक कर रही है? अगर सचमुच ये पार्टियाँ ब्राह्मणों का सम्मान करती हैं तो उनको सबसे पहले एससी-एसटी एक्ट में बदलाव के वादे को अपने अपने घोषणा-पत्र में शामिल करना चाहिए क्योंकि एससी-एसटी एक्ट का सर्वाधिक दुरुपयोग बसपा के शासन में ही होता है.

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

अफगानिस्तान बनने को ओर अग्रसर भारत

मित्रों, हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं कि भारत में लोकतंत्र है जिसके तीन भाग हैं-कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका. परन्तु जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ी हमारी समझ में आया कि भारत में तंत्र तो है लेकिन भ्रष्ट, कामचोर व सडा-गला लोकतंत्र है. हमने नया संविधान तो बना लिया लेकिन कानून वही बरक़रार रखे जिनके माध्यम से अंग्रेज हमें लूटते थे. मेरा मतलब आईपीसी, न्यायिक प्रक्रिया और भारतीय प्रशासनिक सेवा से है. अब जब कानून ही गड़बड़ है तो व्यवस्था कैसे सही होगी? मित्रों, हमारे देश की कार्यपालिका का तो कहना ही क्या! ये बिना तालाब के मछली पाल लेती है, बिना नदी के पुल बना देती है और बिना बांध बने उसमें छेद भी कर देती है. जहाँ देखिए वहां सिर्फ छेद ही छेद है. न्यायपालिका पहले तो तारीख-पे-तारीख देकर पीड़ितों अथवा दिवंगत पीड़ित-पीडिताओं के परिजनों को थका डालती है फिर कई दशकों के बाद कह देती है कि नो वन किल्ड जेसिका. न्यायमूर्ति से चंद कदम पर बैठा उनका पेशकार मुट्ठी गरम कर रहा होता है मगर न्याय की मूर्ति जी को कुछ नजर नहीं आता फिर ऐसा व्यक्ति कैसे न्याय दे सकता है. उस पर गजब यह कि न्यायाधीश ही न्यायाधीश की नियुक्ति करता है जिससे जमकर भाई-भतीजावाद हो रहा है. मित्रों, व्यवस्थापिका की तो खुद की पूरी व्यवस्था चरमराई हुई है. अब वहां छंटे हुए बदमाश बैठते हैं. सरकारों ने व्यवस्थापिका पर पूरी तरह से कब्ज़ा कर लिया है. विपक्ष भी नैतिक रूप से पतित हो चुका है. फिर कैसी व्यवस्था? अभी ऑक्सीजन की कमी से कोरोना मरीजों की अकालमृत्यु को ही लें तो भारत की समस्त राज्य सरकारें और संघ सरकार भी एक स्वर में कह रही है कि ऑक्सीजन की कमी से देश में कोई नहीं मरा. जबकि हमने अपनी और कैमरों की आँखों से देखा है कि ऑक्सीजन की कमी से देश में हजारों लोग मरे हैं. मतलब कि संसद में संघ सरकार झूठ बोल रही है और प्रमाण-सहित झूठ बोल रही है. विपक्षी दलों की भी जहाँ-जहाँ सरकारें हैं वे सरकारें भी झूठ बोल रही हैं फिर जनता के लिए लड़ेगा कौन? मित्रों, मैं एक बार फिर से दोहरा रहा हूँ कि भारत में लोकतंत्र है. बस कागज़ी लोकतंत्र है जो सिर्फ कागजों पर ही नज़र आता है. तंत्र मस्त है लोक पस्त है. चाहे लोक बचें या न बचें तंत्र बचा रहेगा. वास्तव में ऑक्सीजन की जरुरत लोक से ज्यादा तंत्र को है. अंग्रेजी हुकूमत के सारे अवशेषों यथा कानून, शिक्षा-प्रणाली, न्याय प्रक्रिया, पुलिस और प्रशासनिक तंत्र को मिटाना होगा वर्ना एक दिन तंत्र भी नहीं बचेगा, बचेगी तो बस अराजकता और भारत भी अफगानिस्तान बनकर रह जाएगा.

शनिवार, 17 जुलाई 2021

दानिश सिद्दीकी को श्रद्धांजलि

मित्रों, चलिए पहले एक कहानी हो जाए. एक भेड़िया था और एक खरगोश था. भेड़िया बहुत दिनों से खरगोश को खाने के चक्कर में था और बराबर खरगोश को परेशान कर उससे झगड़ने का सुअवसर खोजता रहता था लेकिन खरगोश था कि सबकुछ बर्दाश्त कर जाता था. फिर एक दिन भेड़ियों ने खरगोश का चौतरफा रास्ता रोक लिया. अब खरगोश के सामने कोई विकल्प ही नहीं रहा सो उसने भेड़िये को चेतावनी दी कि वो उसका रास्ता नहीं रोके नहीं तो अंजाम अच्छा नहीं होगा. बस भेड़िये को बहाना मिल गया और उसने खरगोश पर हमला कर दिया. खरगोश ने भी बदले में कुछ भेड़ियों को मार गिराया. मित्रों, अब तो जैसे मीडिया में आग लग गई. पहले से तैयार बैठी खरगोशविरोधी मीडिया ने आनन-फानन में खरगोश को दंगा भड़काने का दोषी घोषित दिया. कुछ मीडिया समूह ने तो यहाँ तक कह दिया कि खरगोशों ने दंगों और भेड़ियों के सामूहिक संहार कि पूर्व योजना बना रखी थी. जंगल की विकीपीडिया की भी यही राय थी. मित्रों, मेरा मतलब पूरी तरह भारत कि राजधानी दिल्ली के २०२० के दंगों से है. आश्चर्य की बात है कि उस समय दानिश सिद्दीकी नामक महान फोटोग्राफर को पुलिसकर्मी पर पिस्तौल ताने शाहरूख या जाबिर हुसैन के घर से चल रही गतिविधियों की कोई तस्वीर खींचने का मौका नहीं मिला लेकिन रामभक्त गोपाल की तस्वीर खींचने का महान अवसर जरूर मिल गया. जहाँ दानिश मंदिर और हिन्दुओं के स्कूल-घर और गाड़ियों के जलने की कोई तस्वीर नहीं खींच पाए वहीँ जली मस्जिदों पर उन्होंने खूब कैमरा चमकाया. आप ही बताईए ऊपरवाली कहानी में दानिश जैसे लोगों को किसका साथ देना चाहिए था खरगोशों का या भेड़ियों का. मित्रों, यहाँ बात दूसरी है कि दानिश की हत्या हो चुकी है और हुई भी है भेड़ियों के हाथों. दानिश को भारत में कुछ भी अच्छा नहीं लगता था. मोदी सरकार तो बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी जैसे न्यूयॉर्क टाइम्स को अच्छी नहीं लगती है. जबकि सच्चाई तो यह है कि मोदी और योगी सरकार ने जितना मुसलमानों के लिए किया है उतना किसी ने नहीं किया. फिर भी जो लोग भारत में भी तालिबान जैसा शरियत का शासन चाहते हैं उनको मोदी कहाँ सुहानेवाले हैं? मित्रों, पता नहीं ऐसा क्यों है लेकिन सच्चाई यही है कि कुछ महान अंतर्राष्ट्रीय ख्याति वाले पुरस्कार सिर्फ उनके लिए है जो भारत विरोधी हैं, हिंदूविरोधी हैं. दानिश को भी पुलित्ज़र मिल चुका था. मित्रों, क्या अब भी इस बात में कोई संदेह है कि इस्लाम हिंसक और मानवताविरोधी मजहब है? तालिबान ने जीते हुए ईलाकों के मौलवियों से १५ साल से बड़ी अविवाहित और विधवा स्त्रियों कि सूची मांगी है. क्यों? क्या वे उनको पुरस्कार देंगे? फिर वो स्त्रियाँ तो काफ़िर भी नहीं हैं. फिर क्यों किया जाएगा उनका जबरन निकाह जो उनको रोज-रोज बलात्कार जैसा दर्द देगा? क्यों? इस्लाम तो महिलाओं को बहुत सम्मान देता है न? क्या यही सम्मान है? तालिबानियों ने तो आत्मसमर्पण करनेवालों को भी नहीं बख्शा और तभी-का-तभी उड़ा दिया. इस बारे में कुरान की क्या राय है? मित्रों, आज दानिश दुनिया में नहीं हैं. उन्होंने जब भी मौका मिला भारत और हिन्दुओं को बदनाम किया. उन हिन्दुओं को जिनसे अच्छा पड़ोसी हो ही नहीं सकता. दानिश को उसका खुदा जन्नत नसीब करे क्योंकि वो अपने खुदा के अत्यंत नेक बन्दों के हाथों अल्लाह हो अकबर के नारों के बीच मारा गया है. काश, दानिश की हत्या से भारत के अन्य महान पुरस्कार विजेता पत्रकार शिक्षा लेते और अपनी सोंच सचमुच निष्पक्ष कर लेते! हमें अमेरिकावाले न्यूयॉर्क टाइम्स से तो कोई उम्मीद नहीं है लेकिन भारतवाले न्यूयॉर्क टाइम्स वाले तो सुधर जाओ.

गुरुवार, 8 जुलाई 2021

मजबूरी का मंत्रीमंडल विस्तार

मित्रों, हवाबाजी खेल भी है और कला भी। जार्ज बुश जहां इस खेल में माहिर थे वहीं मोदी जी ने इसे कला का रूप दे दिया है। कोई भी वादा करके चुनाव जीतने के बाद अमित शाह जी से कहलवा देते हैं कि वो तो जुमला था। किबला इससे पहले हमने कभी यह शब्द सुना भी नहीं था। मित्रों, फिर बहुत से अन्य नए शब्दों को सुना गया जैसे मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नेन्स, सबका साथ सबका विकास, सबका विश्वास, आत्मनिर्भर भारत, मैं देश नहीं झुकने दूंगा, नेशन फर्स्ट, गरीबों की सरकार आदि। मित्रों, बारी-बारी से ये सारे नारे खोखले निकले। कल मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नमेंस का भी जुलूस निकल गया। यह पहली ऐसी सरकार है जो किसी की सलाह माने बिना बडे ही आत्मविश्वास से गलतियां करती है। जब इसने पहली बार शपथ ली तभी लगा कि बेकार व चापलूस मंत्रियों के बल पर कैसे कोई सरकार गुड गवर्नेन्स दे सकती है? फिर मिनिमम गवर्नमेंट के नाम पर उन एक-एक फालतू लोगों को कई-कई विभाग थमा दिए गए। मित्रों, इस बीच हमने भी आवाज उठाई खासकर सुरेश प्रभु जैसे योग्य व्यक्ति को मंत्रीमंडल से बाहर करना बहुत अखरा लेकिन अक्खड़ मोदी कहां सुननेवाले थे। फिर वे चुनाव-दर चुनाव जीत भी रहे थे। अब बंगाल चुनाव ने उनको सोंचने पर मजबूर कर दिया है। मित्रों, फिर भी मैं नहीं समझता कि डिब्बों को बदलने से सरकार की कार्यशैली में कोई बदलाव आनेवाला है क्योंकि ईंजन तो वही पुराना है। लगता है जैसे बारी-बारी से सबको राज भोगने का अवसर दिया जा रहा है। फिर सबकी मेहनत का कबाड़ा करने में अकेली सक्षम निर्मला जी अभी भी वित्त मंत्री हैं।

मंगलवार, 29 जून 2021

सीखी कहाँ मोदी जू देनी ऐसी देन

मित्रों, इस सत्यकथा से आप भी अपरिचित नहीं होंगे. अकबर के नवरत्नों में से एक थे अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ानाँ जिनको हम रहीम कवि के नाम से भी जानते हैं. रहीम बहुत बड़े कृष्णभक्त तो थे ही बहुत बड़े दानी भी थे. उनका गोस्वामी तुलसीदास से निरंतर संवाद चलता रहता था. तो हुआ यूं कि रहीम जब भी दान करने बैठते तो जैसे-जैसे उनका हाथ ऊपर उठता उनकी आँखें झुकती जातीं. तुलसी को जब मालूम हुआ तो उन्होंने दोहा भेजकर पूछा- सीखी कहाँ नवाबजू देनी ऐसी देन, ज्यों-ज्यों कर ऊँचे उठे त्यों-त्यों नीचे नैन. रहीम कवि भी कम तो थे नहीं सो झटपट उत्तर दिया- देनहार कोई और है देत रहत दिन-रैन, लोग शक मुझ पर करें ता विधि नीचे नैन. मित्रों, अब न तो रहीम रहे और न ही तुलसी, अब तो मोदी जी का राज है और मोदी जी भी कम दानी तो हैं नहीं और दानी भी कैसे रोबिनहुडी. रोबिनहुड अमीरों से लूटकर गरीबों को देता था मोदी जी गरीबों को लूटकर अमीरों में बाँटते हैं. आप तो जानते होंगे कि मैं हवा में बात नहीं करता. हमारे पास आंकड़ों का एक पिटारा होता है. तो अब बात करते हैं आंकड़ों की. 2019 में केंद्र और राज्यों के कुल राजस्व का 65 फीसद हिस्सा खपत पर लगने वाले टैक्स से आया. वह टैक्स जो हर व्यक्ति चुकाता है और जिसके दायरे में सारी चीजें आती हैं. केंद्र की कमाई में इनकम टैक्स का हिस्सा 17 फीसद था. गरीबों के मसीहा मोदी जी के राज में बीते एक दशक (2010 से 2020) के बीच भारतीय परिवारों पर टैक्स का बोझ 60 से बढ़कर 75 फीसद हो गया. इंडिया रेटिंग्स के इस हिसाब में व्यक्तिगत आयकर और जीएसटी शामिल हैं. मसलन, बीते सात साल में पेट्रोल-डीजल से टैक्स संग्रह 700 फीसद बढ़ा है. यह बोझ जीएसटी के आने के बाद बढ़ता गया है जिसे लाने के साथ टैक्स कम होने वादा किया गया था. इस गणना में राज्यों के टैक्स और सरकारी सेवाओं पर लगने वाली फीस शामिल नहीं है. वे भी लगातार बढ़ रहे हैं. मित्रों, अब बात करते हैं कि केंद्र सरकार किस तरह अमीरों पर मेहरबान है. उत्पादन या बिक्री पर लगने वाला टैक्स (जीएसटी) आम लोग चुकाते हैं. कंपनियां इसे कीमत में जोड़कर हमसे वसूल लेती हैं. इसलिए कंपनियों पर टैक्स की गणना उनकी कमाई पर लगने वाले कर (कॉर्पोरेशन टैक्स) से होती है. इंड-रा का अध्ययन बताता है कि 2010 में केंद्र सरकार के प्रति सौ रुपए के राजस्व में कंपनियों से 40 रुपए और आम लोगों से 60 रुपए आते थे. 2020 में कंपनियां केवल 25 रुपए दे रही हैं और आम लोग दे रहे हैं 75 रुपए. याद रहे कि 2018 में कॉर्पोरेट टैक्स में 1.45 लाख करोड़ रुपए की रियायत भी दी गई है. मतलब गरीबों से लो और अमीरों को दो. मित्रों, महान अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड केंज ने कहा था कि सरकार अगर चाहे तो बहुत कम समय में बहुत बड़ी आबादी को गरीब बना सकती है. महंगाई हमारे लिए नई नहीं है. कमाई और मांग बढ़ने से आने वाली महंगाई के कुछ समर्थक मिल जाएंगे. यद्यपि मौद्रिक पैमानों पर धन की आपूर्ति से कीमतें बढ़ती हैं लेकिन इस वक्त जब कमाई व कारोबार ध्वस्त है और सस्ता कर्ज सबकी किस्मत में नहीं है तब अगर भारी कराधान से सरकार ही महंगाई थोप रही है तो जरूर यह सरकार गरीबहितैषी नहीं है. यहाँ हम आपको बता दें खाद्य सामान की कीमत एक फीसद बढ़ने से खाने पर खर्च करीब 0.33 लाख करोड़ रुपए (क्रिसिल) बढ़ जाता है. खाद्य महंगाई बीते एक साल में 9.1 फीसद (कोविड पूर्व तीन फीसद पर थी) की दर से बढ़ी है. फल-सब्जी की मौसमी तेजी को अलग रख दें तो भी खाद्य तेल, मसाले, दाल, अंडे की कीमतों ने महंगाई की कुल दर को मीलों पीछे छोड़ दिया है. मित्रों, ऐसा तब हो रहा है जब सीएसओ के अनुसार 2020-21 में प्रति व्यक्ति आय 8,637 रुपए घटी है. सिर्फ निजी और असंगठित क्षेत्र में बेरोजगारी और वेतन कटौती के कारण आय में 16,000 करोड़ रुपए की कमी आई है. जबकि महामारी व महाबेरोजगारी के बीच दवाएं, पेट्रोल-डीजल, खाने के सामान पर टैक्स कम हो सकता था. बचत पर ब्याज दर में कटौती टाली जा सकती थी. भारत में खुदरा महंगाई में एक फीसदी की बढ़त से जिंदगी 1.53 लाख करोड़ रुपए महंगी (क्रिसिल) हो जाती है. एक बरस में खुदरा महंगाई की सरकारी (आधा- अधूरा पैमाना) सालाना दर 6.2 फीसद रही जो 2019 से करीब दो फीसद ज्यादा थी. अब यह 8 फीसद की तरफ बढ़ रही है. इसके चलते 97 फीसद निम्न और मध्यम वर्गीय आबादी एक साल में पहले के मुकाबले गरीब हो गई है. मित्रों, दूसरी तरफ भारत सरकार का पिछले एक दशक का सबसे बड़ा सुधार; बीमार कंपनियों को उबारने के बदले बैंकों का पैसा डूबा रहा है. इतना ही नहीं मोदी इस बहाने अपने चहेतों को जबरदस्त फायदा भी पहुंचा रहे हैं. इस नए निजाम के ताजा फैसले में लगभग 64,883 करोड़ रुपए की कर्जदार वीडियोकॉन के कथित उद्धार को मंजूर कर दिया गया, जिसमें 96 फीसद नुकसान शेयरधारकों और बैंकों को होगा. खरीदने वाले (वेदांता, अनिल अग्रवाल की समूह की कंपनी) को केवल 2,962 करोड़ रु देने होंगे. दूसरी तरफ बैंकों के अर्थात हमारे करीब 42,000 करोड़ रुपए डूबेंगे. ऐसा तब हुआ है जब वीडियोकॉन के मालिक वेणुगोपाल धुत किस्तों में ४५००० करोड़ देने को तैयार थे. जेट एयरवेज के ‘उद्धार’ में भी बैंक समेत लेनदारों को 90 फीसद का नुकसान (कुल बकाया 40,259 करोड़ रु.) होने की संभावना है. दीवान हाउसिंग के मामले में बचत कर्ताओं और बॉन्ड धारकों को 60 से 95 फीसदी तक का नुकसान उठाना पड़ सकता है. बैंकरप्सी की प्रक्रिया के तहत 2017 के बाद कर्ज की वसूली लगातार कम होती (44 से 25 फीसद) चली गई है. सनद रहे कि कोविड आने से पहले ही ‘उद्धार’ की प्रक्रिया बकाया कर्ज के 95 फीसद मुंडन तक पहुंच गई थी. मतलब जो भी दिवालिया कंपनियों को खरीद रहा है उसे जानबूझकर हजारों करोड़ उपहार में दिए जा रहे हैं और बैंकों का ९५ फीसदी तक पैसा डूब जा रहा है. मित्रों, इस आलेख को पढने के बाद अब तक आप यह समझ गए होंगे कि आजादी के बाद से भारत में अमीर और अमीर और गरीब और भी गरीब कैसे और क्यों होते जा रहे हैं फिर यह सरकार तो कथित रूप से चायवाले की सरकार ठहरी. जहाँ सरकार को करों में राहत देकर जनता की जेब में और ज्यादा पैसा डालना चाहिए वहां सरकार बस आम जनता को चायपत्ती समझ कर निचोड़े जा रही है, निचोड़े जा रही है और अपने खासम खास की झोली भरती जा रही है. आखिर मोदी यारों के यार जो ठहरे. वैसे आप चाहे तो महंगाई पर मोदी जी के पुराने भाषणों को फिर से सुन-पढ़ सकते हैं, परम संतोष मिलेगा. मित्रों, अंत में यही कहा जा सकता है कि गरीबों पे सितम, अमीरों पे करम ऐ जानेजहाँ ये जुल्म न कर, ये जुल्म न कर. मर जाएंगे हम तेरे सर की कसम, ऐ जानेजहाँ ये जुल्म न कर. ये जुल्म न कर.

शुक्रवार, 11 जून 2021

बंगाल की अंतर्कथा और राष्ट्रीय परिदृश्य

मित्रों, हुआ यूं कि मेरे गाँव में एक परिवार था. परिवार के सारे सदस्य मिलजुल कर रहते थे. फिर बड़े बेटे की शादी हुई. आंगन के अन्य पट्टीदारों ने सास-ससुर के खिलाफ बड़ी बहू के कान भरने शुरू कर दिए. लेकिन बड़ी बहू समझदार थी इसलिए उनकी दाल नहीं गली. फिर कुछेक साल बाद जब छोटे बेटे की शादी हुई तब उन्होंने फिर छोटी बहू के कान भरने शुरू कर दिए. संयोगवश छोटी थी कान की कच्ची सो उनकी बातों में आ गई. इस प्रकार एक खुशहाल परिवार लड़ाई का अखाडा बन गया. परेशान होकर ससुर और बड़े भाई ने बंटवारा कर दिया. जैसे ही बंटवारा हुआ पट्टीदार छोटे बेटे और बहू को तंग करने लगे. ऐसा लगने लगा जैसे उनको आँगन में रहने ही नहीं देंगे. मित्रों, कुछ ऐसा ही खेल बंगाल में कई दशकों से चल रहा है. पहले साम्यवाद और नक्सलवाद के नाम पर वामपंथियों ने बंगाल के अवर्णों को सवर्णों से अलग कर दिया. फिर बांग्लादेश से ला-लाकर घुसपैठियों को बंगाल में भर दिया और अवर्णों और मुसलमानों का सामाजिक समीकरण बनाकर तीन दशकों तक लगातार बंगाल को कुछ इस तरह से लूटा कि बंगाल बंगाल से कंगाल बन गया. मित्रों, फिर आई ममता जिसमें ममता एक छटांक भी नहीं थी. वो बस नाममात्र की हिन्दू थी. उनके लिए हिन्दू सिर्फ वोट बैंक थे. उधर बंगाल के मुसलमानों की तो जैसे लौटरी ही लग गई थी. कम्युनिस्ट जहाँ खुलकर मुस्लिम तुष्टिकरण करने से बचते थे ममता एक मुसलमान से भी ज्यादा मुसलमान थी. जो रोगी को भावे वही वैद फरमावे. मुसलमान अब खुलकर अपने दारुल इस्लाम के १४०० साल पुराने एजेंडे पर जुट गए. जाहिर था कि चाहे बंगाल हो या पाकिस्तान या बांग्लादेश सवर्ण हिन्दुओं का मुसलमानों से कम ही वास्ता पड़ता है लेकिन बहुत सारे दलित हिन्दू मुसलमानों के रैयत हैं इसलिए वे मुसलमानों के लिए सॉफ्ट टारगेट बन जाते हैं. मित्रों, जिस तरह नक्सलवाद के समय बहुत सारे हिन्दुओं ने मुसलमानों के साथ मिलकर कथित क्रांति के लिए बहुत सारे सवर्ण हिन्दुओं को मार डाला था दुर्भाग्यवश इस समय भी बहुत सारे हिन्दू तृणमूल कांग्रेस के बहकावे में आकर मुसलमानों के साथ मिलकर अपने हिन्दू भाईयों की हत्या कर रहे हैं. विडंबना यह है कि तब भी बंगाल में हिन्दू मारे जा रहे थे और अब भी हिन्दू ही मारे जा रहे हैं. वास्तव में इन दिनों बंगाल में नरभक्षी भेड़ियों का आतंकी राज चल रहा है. मित्रों, अब रही बात भाजपा की तो उसे तो बस राज भोगने और पैसा कमाने से मतलब है. हिंदुत्व वगैरह अटल-आडवाणी के समय जरूर पार्टी का मुख्य लक्ष्य था लेकिन आज की भाजपा के लिए हिंदुत्व सह उत्पाद भर है बाई प्रोडक्ट, मुख्य उत्पाद तो पैसा है. कदाचित यही कारण है कि भाजपा बंगाल में हिन्दुओं के सामूहिक नरसंहार, सामूहिक बलात्कार से आँखें मूंदें है. जब सपा के समय यूपी जल रहा था तब भी मोदी ने कोई कदम नहीं उठाया था इसलिए इस सरकार से तो कोई उम्मीद करना ही बेकार है. मित्रों, तो ये रही बंगाल की अंतर्कथा. लेकिन क्या आप जानते हैं हैं भीम आर्मी के माध्यम से ठीक यही प्रयोग पूरे भारत में करने के प्रयास किए जा रहे हैं? राष्ट्रिय स्तर पर अवर्ण हिन्दुओं को हिन्दुओं की मुख्य धारा से अलग करने के प्रयास किए जा रहे हैं. फिर इस कहानी के अंत में भी वही होगा जो उत्तर प्रदेश के नीरपुर, बिहार के बायसी और हरियाणा के मेवात में हो रहा है. धीरे-धीरे प्रत्येक हिन्दू की बारी आएगी, बचेगा कोई नहीं.

रविवार, 23 मई 2021

बिहार में आज भी अंग्रेजों के ज़माने की पुलिस

मित्रों, मुझे पूरा यकीन है कि आपने भी शोले फिल्म जरूर देखी होगी. उसमें असरानी बार-बार कहते हैं कि हम अंग्रेजों के ज़माने के जेलर हैं. खैर वो तो फिल्म थी, कल्पना थी लेकिन दुर्भाग्यवश आज भी आजादी के ७४ साल बाद भी कम-से-कम बिहार में तो अंग्रेजों का ही शासन है, अंग्रेजी पुलिस काम कर रही है. आज भी बिहार पुलिस का रवैया, जनता के प्रति व्यवहार वही है जैसा अंग्रेजों के ज़माने में पुलिस का होता था. मित्रों, हमारे बाप-दादा दादा बतलाते थे कि अंग्रेजों के ज़माने में जब किसी गाँव में किसी की हत्या हो जाती थी तो पूरा गाँव घर छोड़कर भाग जाता था क्योंकि पुलिस पूरे गाँव को एक साथ प्रताड़ित करने लगती थी. किसी के भी घर पर रात-बेरात छापा मार देती थी, किसी को भी उठा लेती थी और फिर मनमानी रकम लेकर छोडती थी. अक्सर लोग हवालात से जीवित नहीं लौटते थे और अगर जीवित बच भी गए तो आजीवन घर का मुंह नहीं देख पाते थे क्योंकि उनके ऊपर दस-बीस झूठे मुक़दमे लाद दिए जाते थे. चूंकि शासन अंग्रेजों के अधीन था जिनका एकमात्र उद्देश्य भारत की जनता को दोनों हाथों लूटना था इसलिए लोग कहीं शिकायत भी नहीं कर सकते थे. मित्रों, अगर मैं कहूं कि बिहार के वैशाली जिले में अभी भी अंग्रेजों के ज़माने की पुलिस काम कर रही है तो कदाचित आपको यकीन न भी हो. लेकिन सच यही है. दरअसल वैशाली जिले के जिलाधिकारी के स्टोनो हैं जयराम सिंह जो पटना जिले के रूपस दियारे के निवासी हैं. जयराम सिंह की ससुराल वैशाली जिले के देसरी थाने के चांदपुरा ओपी के खोरमपुर में है. जयराम सिंह पिछले दो दशकों से कुछेक महीने को छोड़कर वैशाली जिले के डीएम के स्टोनो के पद पर लगातार जमे हुए हैं. दुर्भाग्यवश उनके ससुर नागेश्वर सिंह और उनके साले संतोष सिंह का स्वभाव काफी झगडालू है. जयराम की शादी के बाद से ही उनकी ससुराल के लोग अपने पड़ोसियों पर धौंस ज़माने और तंग करने के लिए अक्सर थोक में मुकदमा करते रहते हैं जिनमें जयराम सिंह पैरवी करता है. पिछले दिनों नागेश्वर सिंह के घर में कथित रूप से चोरी हो गई. जिसके बाद नागेश्वर सिंह के पुत्र संतोष सिंह ने अज्ञात के खिलाफ चोरी की एफआईआर चांदपुरा ओपी में दर्ज करवाई और उसी दिन से नागेश्वर सिंह के पड़ोसियों का खाना-सोना मुहाल हो गया है. पुलिस कभी भी बिना सर्च वारंट के किसी के भी घर में १२ बजे रात में घुस जाती है और कभी भी किसी को भी उठा ले जाती है. कल रात भिखनपुरा, कुबतपुर के दीपनारायण सिंह के घर अर्द्धरात्रि में बेवजह छापा मारा गया. कल २२ मई, २०२१ को ही रात के बारह बजे खोरमपुर के नन्दकिशोर सिंह के घर से उनके नाबालिग नाती सकेत कुमार, पुत्र-स्व. वेदप्रकाश सिंह को चांदपुरा ओपी प्रभारी शशिप्रभा मणि बिना किसी सबूत के उठा ले गई. इतना ही नहीं आज २३ मई को जब उसकी विधवा माँ उससे मिलने ओपी पहुंची तो पहले तो मिलने नहीं दिया गया और फिर बाद में घंटों तक थाने में बिठा कर रखा गया. इस बारे में जब ओपी प्रभारी शशिप्रभा मणि से मीडिया ने बात की तो वो बदतमीजी पर उतर आईं और उल्टे मीडिया को ही भ्रष्ट बताने लगी. विदित हो कि जबसे शशि प्रभा मणि प्रभारी बनकर आई हैं तभी से इन्होंने अपने स्टाफ ललन सिंह के साथ मिलकर शराब के अवैध कारोबारियों को शह दी हुई है. साथ ही उसने लोगों को बेवजह घर से उठा लेने को पैसा बनाने का जरिया बना लिया है. इससे पहले भी वो अपने थाना क्षेत्र से कई लोगों को बेवजह उठा चुकी है और एक-दो दिन तक हवालात में रखने के बाद मनमाफिक रिश्वत लेकर छोड़ चुकी है. मित्रों, जब थाना-प्रभारी की शिकायत पुलिस अधीक्षक, वैशाली से की गई तो उन्होंने मामले से पूरी तरह से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि पीड़ित के परिवार को हमारे कार्यालय में आकर लिखित में आवेदन करना होगा. ऐसे में जब राज्य में लॉकडाउन लगा हुआ है और कोरोना कोहराम मचा रहा है तब मोबाइल और इन्टरनेट के युग में एसपी,वैशाली लाचार विधवा माँ को ३० किलो मीटर दूर हाजीपुर बुला रहे हैं. मित्रों, मुझे काफी दुःख और क्षोभ के साथ कहना पड रहा है कि बिहार के डीजीपी मुख्यमंत्री का भी फोन नहीं उठाते फिर मीडिया का क्यों उठाते? ऐसे में सवाल उठता है कि गरीब-कमजोर पुलिस-पीड़ित करें तो क्या करें? त्वरित न्याय के लिए किसके दरवाजे पर अपना सर फोड़ें? महाराष्ट्र में तो एक सचिन वाजे और अनिल देशमुख था बिहार में तो हजारों सचिन वाजे और अनिल देशमुख हैं. फिर बिहारवासियों को काले अंग्रेजों से बचाएगा कौन? पप्पू यादव तक तो पुलिस के कहर से बच नहीं पाए, आम आदमी की क्या औकात? हमने तो मोदी के कहने पर एक बार फिर से कथित डबल ईंजन की सरकार बनवा दी लेकिन सुशासन-४ जबसे शुरू हुआ है बिहार की जनता पर भ्रष्टाचार और कुशासन की मार डबल हो गई है. बिहार का जैसे गुडलक ही ख़राब हो गया है. ऐसे में हम तो बिहार पर्यटन का निःशुल्क प्रचार करते हुए दुनियाभर के लोगों को यह कहकर बिहार में आमंत्रित करना चाहेंगे कि अगर आप अंग्रेजी शासन को आज भी प्रत्यक्ष देखना चाहते हैं तो एक बार जरूर बिहार पधारें और अगर आप अंग्रेजों के ज़माने की पुलिस पर शोध कर रहे हैं या डॉक्यूमेंट्री बनाना चाहते हैं तो आपको बिहार के वैशाली जिले के देसरी थाने के चांदपुरा ओपी के खोरमपुर और भिखनपुरा, कुबतपुर के ग्रामीणों व चांदपुरा ओपी प्रभारी से जरूर मिलना चाहिए.

शनिवार, 22 मई 2021

जाओ रे मोदी तुम जाओ रे

मित्रों, मोदी सरकार को सत्ता में आए ७ साल हो चुके हैं. ऐसे में पर्याप्त समय बीत चुका है जब सरकार के कामकाज का मूल्यांकन किया जा सके. दुर्भाग्यवश मेरे जैसे कट्टर मोदी समर्थक को भी कहना पड़ रहा है कि मोदी सरकार में सरकार और भारतीय जनता पार्टी का तंत्र सिर्फ चुनाव के लिए काम कर रहा है। सरकार तो जैसे मिस्टर इंडिया हो गई है। रामभक्तों की सरकार में सबकुछ रामभरोसे छोड़ दिया गया है। मित्रों, इस समय सरकार के समक्ष चुनौतियों के तीन मोर्चे खुले हुए हैं और तीनों पर यह सरकार विफल है। पहला मोर्चा है कोरोना का पूर्वानुमान लगाकर उससे निबटने की तैयारी करना. दूसरा मोर्चा अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाना है और तीसरा मोर्चा है सीमा पर चीन को मुंहतोड़ जवाब देना. कोरोना के खिलाफ पूर्वानुमान और तदनुसार तैयारी करने के मामले में तो हालत ऐसी रही कि एक तरफ कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे थे वहीँ दूसरी तरफ प्रधानमंत्री जी और उनका पूरा दल-बल बेफिक्र होकर पूरे जोरशोर से बंगाल में चुनाव प्रचार कर रहा था. प्रधानमंत्री अपनी रैलियों में उमडनेवाली भीड़ को देखकर फूले नहीं समा रहे थे. जबतक प्रधानमंत्री की समझ में स्थिति की भयावहता आती तब तक काफी देर हो चुकी थी. जहाँ तक अर्थव्यवस्था का प्रश्न है तो निर्मला जी के वित्त मंत्री रहते उसी तरह इसमें सुधार की कोई सम्भावना ही नहीं है जैसे किसी फुटबॉल मैच को बेकार गोलकीपर के होते नहीं जीता जा सकता है. रही बात चीन से निबटने की तो चीन भूटान में गाँव पर गाँव बसाता जा रहा है और केंद्र सरकार सिर्फ यह कहने के अलावा और कुछ नहीं कर पा रही है कि कोई घुसपैठ नहीं हुई है. केंद्र सरकार का यही रवैया चीन के लद्दाख में घुसपैठ को लेकर भी है. अन्य मोर्चों जैसे आईपीसी को बदलना, न्यायिक प्रक्रिया और भारतीय प्रशासनिक सेवा में सुधार करना, जनसँख्या नियंत्रण कानून बनाना, समान नागरिक संहिता लागू करवाना आदि की दिशा में तो केंद्र सरकार पूरी तरह से विफल है ही. मित्रों, फिर आप कहेंगे कि मोदी तो १८ घंटे काम करते हैं. काम तो करते हैं. बस मीटिंग आयोजित करने का काम करते हैं. मीटिंग पर मीटिंग, मीटिंग पर मीटिंग। होना जाना कुछ भी नहीं। इस सरकार में किसी की कोई जवाबदेही नहीं है। बस एक अव्वल दर्जे का अभिनेता एकतरफा भाषणबाजी किए जा रहा है। कभी-कभी रोने भी लगता है बिना ग्लिसरीन लगाए. कोरोना से पूरे देश में और मुसलमानों के हाथों बंगाल में जिनके परिजन मर रहे हैं वे जानें। सरकार तो बस एक ही काम कर रही है आंकड़े छिपाने का काम। पागलों की तरह देश चलाया जा रहा है। यहां तक कि बंगाल का राज्यपाल सड़कों पर रो रहा है। यह कैसी बेबसी है और काहे की बेबसी है? नेताओं वाली या अभिनेताओं वाली? मोदी भी बापू की तरह देश के लिए हानिकारक बनते जा रहे हैं। वो एक ऐसी गाय बन गये हैं जो बस खूंटे पर मौजूद है. दूध नहीं देती, बच्चे भी नहीं देती सिर्फ गोबर देती है। मित्रों, देश में ऐसा पहली बार ऐसा हुआ है कि विधायकों को केंद्रीय सुरक्षा देनी पड़ी है। अमित शाह जी ने खाना खाया निकल लिए अब उन झोपड़ी वालों को शांतिप्रिय मजहब वालों से बचाएगा कौन? राज्यपाल के काफिले पर हमला हो गया। ममता राजधर्म नहीं निभा रही है तो कम से कम मोदी को तो निभाना चाहिए। और अगर नहीं निभा सकते तो अपना झोला उठाएं और निकल लें। दूसरे को आने दें। भाजपा में योग्य नेताओं की कोई कमी नहीं है. मोदी जी देश को और देश के समय को बर्बाद मत कीजिए। मोदी जी आपको याद होगा कि आप किन परिस्थितियों में गुजरात के मुख्यमंत्री बनाए गए थे? गुजरात भूकंप से तबाह हो गया था और केशुभाई राहत और पुनर्निर्माण का काम ठीक से नहीं चला पा रहे थे. आज देश कोरोना से तबाह हो चुका है और आप पूरी तरह से विफल साबित हो चुके हैं.

गुरुवार, 13 मई 2021

गंगा में तैरती मानवता की लाश

मित्रों, इन दिनों भारत में कोरोना संकट पूरे उफान पर है. तंत्र पूरी तरह फेल है. कदाचित इतनी बुरी स्थिति १८९६ के पूना प्लेग के समय भी नहीं हुई थी जबकि तब देश गुलाम था. जिसे देखो लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर पैसा बनाने में लगा हुआ है. अस्पताल वाले, ऑक्सीजन वाले, एम्बुलेंस वाले, पोस्टमार्टम करने वाले और शवदाह करने वाले. बीमारी से ग्रस्त होने से लेकर अंतिम संस्कार होने तक हर कोई लोगों की मजबूरी का फायदा उठाने में तल्लीन है. मानों वे इन पैसों का उपभोग करने के लिए हमेशा दुनिया में बैठे रहेंगे. मित्रों, इन दिनों मुझे अपने मानव होने पर शर्म आने लगी है. हमसे अच्छे तो जानवर हैं. अरस्तु ने कभी कहा था कि मानव एक सामाजिक प्राणी है. लेकिन कोरोना ने मानवों की परिभाषा ही बदल दी है. वास्तव में मानव एक असामाजिक प्राणी है. कैसा समाज और कैसी सामाजिकता? जो न्यायाधीश दूसरों को गलत काम करने पर दंड देता है जब उसका पिता मर गया तो वो पिता के अंतिम दर्शन तक करने नहीं आया. बहुत स्थानों पर बेटे-बेटी अपने उन माता-पिता का अंतिम संस्कार करने तक नहीं आ रहे जिन्होंने उनको हजार दुःख-परेशानियाँ उठाकर पाला है. इतना ही नहीं जिन चिकित्सकों को हम भगवान मानते आ रहे हैं कोरोना ने उनकी कलई भी खोल दी है. कोई भगवान-उगवान नहीं है. सबके-सब रोबोट हैं. संवेदनहीन पैसा कमाने की मशीन. मित्रों, कवि केदारनाथ सिंह ने कहा था कि मेरी पूँजी क्या है? मुट्ठीभर साँस. कदाचित उससे भी बड़ी पूँजी हमारे पास थी और वो थी मानवता. यह मानवता और सामाजिकता ही है जिसके बल पर मानव आज कथित विकास के इस चरण तक पहुंचा है. जब हमारे पूर्वजों ने रेंगना छोड़कर खड़ा होना सीखा होगा तब उनके समक्ष कितनी तरह की दुश्वारियां रही होंगी. मक्खी, मच्छर लेकर सांप और बाघ-सिंह जैसे खूंखार जानवर. भोजन से लेकर पेयजल और शयन की समस्या. जन्म के बाद बच्चों का लालन-पालन करने की समस्या. रोग, अकाल, बाढ़, भूकंप. सबका सामना मानवता ने मिल-जुलकर किया. वरना जमीन पर रेंगनेवाले कीड़ा समान मानव की क्या औकात! पहले जो कुछ था सबका था. फिर अपना-पराया, मेरा-तेरा का भाव आया. मध्यकाल में भारतीय आध्यात्मिकता पर पश्चिमी भौतिकता ने विजय प्राप्त कर ली. ज्ञान का प्रकाश स्तम्भ जो सर्वे भवन्तु सुखिनः की बात करता था की जगह सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट जैसे मत्स्य न्यायवादी सिद्धांत ने ले लिया. आत्मा पर शरीर की जीत हुई. अब बौद्धिक सम्पदा कानून का युग था. प्रकृति के साथ जीवन का स्थान प्रकृति पर विजय ने ले लिया. और अंत में चीन का माओ कंधे पर बन्दूक लिए आया यह कहते हुए कि नैतिक-फैतिकता कुछ नहीं होती राजनैतिक सत्ता सबकुछ होती है. और राजनैतिक सत्ता लोगों के ह्रदय या श्रद्धा-प्रेम से नहीं बन्दूक की नली से निकलती है. माओ ने यह भी कहा कि राजनीति आदर्श नहीं बल्कि रक्तपात रहित युद्ध है और युद्ध रक्तपात युक्त राजनीति। मित्रों, ये तो रही उस अमेरिका की बातें जो मानवता पर छाये सबसे भीषण संकट के समय भी व्यापार और बौद्धिक सम्पदा कानून की बातें कर रहा है. चीन की बातें जिसने जानबूझकर कोरोना वायरस को प्रयोगशाला में निर्मित कर हथियार की तरह हवा में छोड़कर एक प्रकार का विश्वयुद्ध छेड़ दिया है. लेकिन इस समय भारत में जो रहा है वह घनघोर कष्टकारी है. हमारी भारतीयता क्या है? अपने परिजनों को जीवित या मृत अवस्था में उनके हाल पर छोड़ देना तो भारतीयता नहीं है? लोगों की मदद करने के बदले उनकी मजबूरी का फायदा उठाना तो कतई भारतीयता नहीं है. प्राणी मात्र को सिया राममय मानने वाला भारत भला कैसे पैसे को भगवान मान सकता है? पिछले कुछ दिनों में जो दो सौ से भी अधिक लोगों की लाशें गंगा में बहती हुई मिली हैं वास्तव में वो मानवों की लाशें नहीं हैं बल्कि मानवता की लाश है, भारतीयता की लाश है. बिना भारतीयता के भारत भी लाश है. करने को हम भी सिर्फ तंत्र और सरकार को दोषी ठहरा कर अपना पल्ला झाड़ सकते हैं लेकिन क्या उस भारतीयता की मौत के लिए सिर्फ सरकार जिम्मेदार है जिसके पीछे कभी पूरी दुनिया दीवानी थी और जिसका अर्क पीने के लिए फाहियान , ह्वेनसांग और इत्सिंग ख़ाक छानते फिर रहे थे, जिस भारतीयता का अध्ययन करने के लिए तक्षशिला, विक्रमशिला और नालंदा में दुनियाभर के ज्ञान-पिपासुओं का जमघट लगता था? यद्यपि सत्य तो यह भी है कि हमारा लोकतंत्र कोरोना आपदा का बोझ उठा सकने में पूरी तरह से विफल साबित हुआ है और हो रहा है.

मंगलवार, 4 मई 2021

खून से लथपथ बंगाल, दोषी कौन

मित्रों, बंगाल में चुनाव संपन्न हो चुका है और भयंकर रक्तपात शुरू हो चुका है. जैसा कि ममता बनर्जी ने चुनाव प्रचार के दौरान ही विरोधियों को हिंसा के लिए तैयार रहने की चेतावनी दे दी थी. लगता है जैसे बंगाल बंगाल नहीं १७८९ का फ़्रांस, १९१७ का रूस या १९४९ का चीन या १९८९ का अफगानिस्तान या १९७१ या १९९२ का बांग्लादेश बन गया है. जिन लोगों ने ममता बनर्जी को मत नहीं दिया था उनको खोज-खोज कर मारा जा रहा है, उनकी महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया जा रहा, दुकानें और संपत्तियां लूटी जा रही हैं, आग लगाई जा रही है. और यह सब घटित हो रहा है सत्ता के संरक्षण में. मित्रों, सवाल उठता है कि ऐसे में उनलोगों का क्या होगा जिन्होंने खुलकर ममता बनर्जी का विरोध किया था. चुनाव आयोग की ड्यूटी तो समाप्त हो चुकी है. भारत के संविधान के अनुच्छेद ३५६ के अनुसार अगर किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो चुका है तो यह केंद्र सरकार का अधिकार और दायित्व दोनों है कि वो वहां का शासन अपने हाथों में ले ले. लेकिन हमने देखा है कि जबसे मोदी सरकार केंद्र में आई है उसने बंगाल, केरल और राजस्थान आदि राज्यों में अपनी की पार्टी के कार्यकर्ताओं की हत्याओं पर आखें बंद कर रखी हैं. इनमें भी बंगाल की हालत कई सालों से सबसे ख़राब है. मित्रों, कोई ऐसी पार्टी का समर्थन क्यों करे जो केंद्र में सत्ता में होते हुए भी चुनाव सम्पन्न होते ही अपने कार्यकर्ताओं को उनके हाल पर मरने के लिए छोड दे? यह तो स्वार्थ की पराकाष्ठा है. बिहार में एक कहावत है चढ़ जा बेटा सूली पर राम तेरा भला करेगा. ठीक यही रवैया मोदी का है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब ममता पहली बार मुख्यमंत्री बनी थी तब मुसलमानों ने उसे वोट नहीं दिया था लेकिन उसने मुस्लिम तुष्टिकरण की अति करके उनको अपने पक्ष में कर लिया. कमोबेश भाजपा भी इन्द्रेश कुमार आदि के माध्यम से यह प्रयास लगातार कर रही है जबकि भाजपा के लिए मुस्लिम वोट एक मृगमरीचिका थी, है और हमेशा रहेगी. मित्रों, भाजपा को सबसे पहले बंगाल में उसके कार्यकर्ताओं के साथ जो खून की होली खेल जा रही है उसको रोकना चाहिए वो भी किसी भी कीमत पर. अन्यथा कोई भी व्यक्ति भाजपा का कार्यकर्ता नहीं बनेगा. फिर भाजपा को समान नागरिक संहिता और जनसँख्या नियंत्रण कानून को लागू करना चाहिए. अन्यथा जिस तरह आज बंगाल जल रहा है कल पूरा भारत जलेगा. देश और सनातन धर्म की रक्षा गाँधी बनकर नहीं बल्कि प्रताप और शिवाजी बनकर ही की जा सकती है. इतिहास मोदी को दोबारा मौका नहीं देगा क्योंकि वो किसी को दोबारा मौका नहीं देता है. जो लोग बंगाल में ताल ठोककर नरसंहार कर रहे हैं वो तो इसके लिए दोषी हैं ही लेकिन उससे कहीं ज्यादा मोदी और भाजपा दोषी है जो लोगों को अग्रिम मोर्चे पर धकेल कर बार-बार मैदान छोड़कर भाग जाती है. मित्रों, हम उम्मीद करते हैं कि भाजपा का सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास वाला नशा भी उतर गया होगा. नहीं उतरा है तो अच्छा होगा कि जल्द उतर जाए अन्यथा देश की बहुसंख्यक जनता उसको कुर्सी से उतार देगी भले उसका परिणाम कितना भी भयानक क्यों न हो. वैसे भी जब भाजपा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हिन्दुओं की रक्षा नहीं कर सकती और नहीं कर सकी तो उसे बार-बार केंद्र की सत्ता सौंपने के क्या लाभ? बंगाल तो फिर भी दूर की बात है. मित्रों, अंत में मैं हिन्दुओं का आह्वान करूंगा कि भगवान बुद्ध ने कहा था अप्पो दीपो भव मैं कहता हूँ अप्पो विराथू भव, प्रताप भव, शिवाजी भव, गोविन्द सिंह भव. अप्पो रक्षक भव. अन्यथा जिस हिंदुत्व को राजाओं ने सदियों तक बचाए रखा कुछेक सालों का लोकतंत्र उसे खा जाएगा.

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

आईसीयू में भारत, भाषण झाड़ते पीएम

ममित्रों, इन दिनों कोविद 19 के कारण देश के हालात काफी खराब हैं। जांच में हर तीसरा व्यक्ति कोरोना पॉजीटिव मिल रहा है। संक्रमितों की मृत्यु दर पिछले साल के मुकाबले तीन गुनी है। आज शनिवार को मिली जानकारी के मुताबिक, देश में पिछले 24 घंटे में 2 624 मौतें हो गईं हैं और 3.46 लाख से ज्‍यादा संक्रमण के नए केस आए हैं. भारत में अब तक मौतों का कुल आंकड़ा 1,89,544 हो गया है और सक्रिय मामलों की कुल संख्या 25 लाख 52 हजार के पार हो गए हैं. उधर कनाडा ने भारत से जानेवाली सभी उड़ानों पर अगले ३० दिनों के लिए रोक लगा दी है. ब्रिटेन ने पहले ही भारत को ‘रेड-लिस्ट’ में जोड़ लिया था, जहां से कोविड -19 मामलों की अधिक संख्या के कारण अधिकांश यात्रा पर प्रतिबंध है. इसके अलावा, फ्रांस ब्राजील, चिली, अर्जेंटीना, दक्षिण अफ्रीका और भारत के यात्रियों के लिए 10-दिन के लिए क्वारंटीन कर रहा है, जबकि संयुक्त अरब अमीरात ने भारत से सभी उड़ानों को रद्द कर दिया है. मित्रों, देश में कोविद की ऐसी भयावह स्थिति तब है जबकि महामारी अभी अपने शबाब पर पहुँची भी नहीं है. इस बीच अमेरिकी के एक विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा किया गया है. इस अध्ययन में दावा किया गया है यही हालत रही तो मध्य मई तक भारत में कोविद से होनेवाली मौतों का आंकड़ा रोजाना ५६०० तक पहुँच जाएगा. मित्रों, इस समय देश में ऑक्सीजन की भारी किल्लत हो गई है. विद्युत् शवदाहगृहों में इतनी ज्यादा संख्या में लाशें पहुँच रही हैं कि उनकी भट्ठियां पिघलने लगीं हैं. सर गंगाराम अस्पताल जैसे राष्ट्रीय राजधानी के प्रतिष्ठित अस्पताल में कल ३० से ज्यादा कोरोना मरीजों की मौत हो गई. स्थिति इतनी ख़राब है कि दिल्ली के सक्षम लोग तीन गुना ज्यादा किराया देकर दुबई भागने लगे हैं जबकि पिछले साल दुबई से लोग भारत आ रहे थे. कई सारे विधायक-अधिकारी भी कोरोना का शिकार हो चुके हैं. कम-से-कम कोरोना बीमारों में कोई भेद-भाव नहीं कर रहा वरना भारत में कानून तो अंग्रेजों के ज़माने से ही अमीरों की रखैल है. मित्रों, आप कहेंगे कि पिछले एक साल से सरकारें इस मामले में क्या कर रही थीं. ऑक्सीजन प्लांट बैठाना कोई राकेट साइंस तो है नहीं. तो जवाब है कि पिछले साल केंद्र सरकार ने ऑक्सीजन प्लांट खोलने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को दी थीं और राज्य सरकारों ने उस पर ध्यान तक नहीं दिया. राज्य सरकारों को पैसे भी दे दिए गए थे। बांकी राज्य सरकारों ने उनका किधर दुरूपयोग किया पता नहीं लेकिन केजरीवाल ने पूरा पैसा टीवी पर थोबड़ा दिखाने में लगा दिया। फिर केंद्र सरकार की जिम्मेदारी थी कि वो राज्य सरकारों को तकादा करके काम पूरा करवाए लेकिन केंद्र ने ऐसा नहीं किया. अब जबकि कोरोना दोबारा कहीं ज्यादा भीषणता के साथ कोहराम मचा रहा है तो अफरातफरी मची हुई है लेकिन भोज शुरू होने के बाद कद्दू रोपने से कब कोई लाभ हुआ है जो अब होगा. मित्रों, इतना ही नहीं जब कोरोना की दूसरी लहर ने कहर ढाना शुरू कर दिया था तब भारत के माननीय प्रधानसेवक जी बंगाल में बड़ी-बड़ी रैलियां कर रहे थे जो कि अपने आपमें खुद एक अपराध था. अब प्रधान सेवक जी ने बेमन से रैलियों में जाना बंद कर दिया है लेकिन रैलियों को बंद नहीं किया है बल्कि अब डिजिटली रैलियों को संबोधित कर रहे हैं. मतलब अब भी रैलियों में लोगों को ईकट्ठा किया जा रहा है जबकि कोरोना से देश की हालत ख़राब हो चुकी है. मतलब कि प्रधानमंत्री जी को सिर्फ कुर्सी से मतलब है जनता के स्वास्थ्य से उनको कुछ भी लेना-देना नहीं है. मित्रों, आप कहेंगे कि प्रधानमंत्री जी लगातार मीटिंग तो कर ही रहे हैं और क्या करें? मीटिंग हो, होनी भी चाहिए लेकिन उसका परिणाम भी तो धरातल पर दिखे. हमने मोदी सरकार के गठन के मात्र २ महीने के बाद अपने गवर्नेंट विथ डिफरेंस कहाँ तक डिफरेंट? शीर्षक आलेख में कहा था कि मोदी जी हमें आपकी कोशिश नहीं परिणाम चाहिए. हमने उस आलेख में एक बन्दर के जंगल का राजा बन जाने की कहानी भी लिखी थी जिसमें बन्दर एक डाल से दूसरे डाल पर कूद-कूद कर जानवरों से अपना व्यवहार सुधारने की अपील करता फिरता है. बाद में जब जानवर क्षुब्ध हो जाते हैं तब कहता है कि मेरी कोशिश में तो कमी नहीं थी. मित्रों, जाहिर है कि मित्रों वाले प्रधानमंत्री जी हर मोर्चे पर विफल साबित हो चुके हैं. उनसे न चीन संभल रहा है, न चीनी बीमारी संभल रही है. अमेरिका जो प्रधानमंत्री का सबसे नजदीकी मित्र है इस संकट में टीका बनाने के लिए कच्चा माल तक नहीं दे रहा. कोरोना की जो हालत है उसमें पता नहीं मेरा कौन-सा आलेख मेरा अंतिम आलेख हो जाए. अंत में यही कहूँगा कि चाय-पकौडेवाले को टिप्स तो दी जा सकती है लेकिन उनके हाथों में देश नहीं दिया जा सकता.

रविवार, 11 अप्रैल 2021

ये कहाँ आ गए हम?

मित्रों, भारत अगले साल अपनी स्वतंत्रता के ७५ साल पूरे करने जा रहा है. इन ७५ सालों में देश ने बहुत सारे संकटों का सामना किया है, बहुत सारे उतार-चढाव देखे हैं. यद्यपि अपनी इस उपलब्धि पर हम गर्व कर सकते हैं कि हमने देश की एकता और अखंडता को बनाए रखा तथापि वर्तमान काल में जो देश की स्थिति है उसे कहीं से भी संतोषजनक नहीं कहा जा सकता. मित्रों, हमारे संविधान निर्माताओं ने यह सपने में भी नहीं सोंचा होगा कि आनेवाले दशकों में हमारे राजनेताओं के लिए सिर्फ कुर्सी और कमाई का महत्व रह जाएगा, देशहित की कोई कीमत नहीं रहेगी. दुर्भाग्यवश राज्य के लिए नीति निर्देशक तत्वों के माध्यम से सम्विधाननिर्माताओं ने जो काम आनेवाली पीढ़ी को सौंपा था उसको पूरा कर पाने में हम पूरी तरह से असफल रहे हैं और आज भी संविधान का २० प्रतिशत भाग लागू होने की प्रतीक्षा कर रहा है. मित्रों, वर्तमान भाजपा सरकार ने भी अपने तीन प्रमुख वादों में से राम मन्दिर बनाने और धारा ३७० हटाने के वादे को तो पूरा कर दिया है लेकिन नीति निर्देशक तत्वों में से एक अनुच्छेद ४४ जिसमें सरकार को समान सिविल संहिता बनाने का निर्देश दिया गया है को लागू करने में अभी भी आना-कानी कर रही है जबकि देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए इस अनुच्छेद को लागू करना सबसे ज्यादा आवश्यक था और है. मित्रों, हमारे महान नेताओं की दूसरी सबसे बड़ी विफलता रही है प्रशासनिक सुधार नहीं कर पाना. न जाने क्या सोंचकर हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने भारतीय सिविल सेवकों को स्टील फ्रेम ऑफ़ इंडिया कहा था. दरअसल यह ब्लड ड्रिंकर ऑफ़ इंडिया हैं. जब प्रशासनिक ढांचा अंग्रेजों वाला है तो तंत्र काम कैसे राम राज्य वाला करे? आज भी प्रशासनिक अधिकारी अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल करके पैसा बना रहे हैं. और सिर्फ अधिकारी ही क्यों कर्मचारी भी जनता को लूटने में इस कदर तत्पर हैं कि उन्होंने देश को गुलाम बनानेवाले अंग्रेजों को भी कोसों पीछे छोड़ दिया है. मित्रों, पिछले दिनों घटी दो घटनाओं ने भारतीय लोकतंत्र में लोक के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. पहली घटना सचिन वाजे वसूली कांड है जिसमें महाराष्ट्र कैडर के आईपीएस अधिकारी सचिन वाजे के बारे में मुंबई के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर परमवीर सिंह ने आरोप लगाया है कि कई दशकों से निलंबित चल रहे उस अधिकारी को महाराष्ट्र के तत्कालीन गृह मंत्री अनिल देशमुख ने २ करोड़ रूपये लेकर फिर से बहाल किया था. इतना ही नहीं सचिन वाजे प्रत्येक महीने १०० करोड़ रूपये जनता से वसूली करके गृह मंत्री को पहुंचाने की ड्यूटी कर रहा था. कितनी शर्मनाक घटना है यह! देश में न जाने कितने अनिल देशमुख और कितने सचिन वाजे पदारूढ हैं? ऐसे तंत्र से जनता क्यों कर उम्मीद करे और कैसे उम्मीद करे. दूसरी घटना बिहार के मधुबनी में घटी है जहाँ कमजोर और ईमानदार पक्ष के संजय सिंह को पुलिस ने झूठे हरिजन एक्ट में फंसाकार जेल भेज दिया ताकि गुंडे उसके पूरे परिवार की हत्या कर दें. आखिर कानून का हाथ किसके साथ है? पीड़ितों के साथ या पीडकों के साथ? सर्वहारा वर्ग के साथ या रिश्वत देने में सक्षम धनिकों के साथ? आखिर लोग पुलिस थानों में जाने से डरते क्यों हैं? मैं खुद कई ऐसे मामलों का चश्मदीद गवाह हूँ जिनमें पीड़ित वर्ग जब थाने में शिकायत दर्ज करवाने पहुंचा तो उलटे उसे ही जेल भेज दिया गया. मित्रों, तंत्र का मुख़्तार अंसारी जैसे दुर्दान्तों के आगे बिछ जाना भी काफी चिंताजनक है. मुख़्तार जब पंजाब की जेल में था तब चिकित्सकों ने उसको नौ बीमारियों से ग्रस्त बता दिया था ताकि वो अस्पताल में रहकर दरबार लगा सके. लेकिन जब मुख़्तार उत्तर प्रदेश पहुंचा तो न सिर्फ व्हील चेयर छोड़ अपने पैरों पर चलने लगा बल्कि सारी बीमारियाँ भी गायब हो गईं. मित्रों, जिस तरह पंजाब की सरकार ने मुख़्तार के बचाव में जी-जान लगा दी, जिस तरह सचिन वाजे कांड हुआ, जिस तरह मधुबनी में संजय सिंह को झूठे मुकदमे में जेल में डाल दिया गया उससे तो यही लगता है कि आजादी के ७५ सालों के बाद हमारा लोकतंत्र अपराधियों का, अपराधियों के लिए और अपराधियों द्वारा संचालित है. मित्रों, इन दिनों बंगाल में चुनाव चल रहा है. अजी चुनाव क्या खून की होली खेली जा रही है. जो सत्ता के खिलाफ जाएगा जान से जाएगा. यह लोकतंत्र है या बन्दूकतंत्र. कल तृणमूल समर्थक कुछ कथित अल्पसंख्यक महिलाओं ने एक हिन्दू महिला से हथियार के बल पर बंधक के तौर पर उसका बच्चा छीन लिया जिससे वो भाजपा को वोट न देकर तृणमूल को वोट दे. यह कैसा चुनाव, कैसी सरकार और कैसा लोकतंत्र है भाई? उधर नक्सलियों ने भी बन्दूक के बल पर अपनी समानांतर सरकार चला रखी है जिसमें हमारे नेता भी सहयोग दे रहे हैं. मित्रों, तथापि एक और स्थान पर हमारा लोकतंत्र अपने मूल मार्ग से भटक रहा है. जैसा कि हमने अपने आलेख की शुरुआत में ही कहा कि भारतीय संविधान आज तक भी पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है. भारतीय संविधान के भाग ४ में नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद ३८ कहता है कि राज्य लोक कल्याण में अभिवृद्धि को सुनिश्चित करेगा. लेकिन वर्तमान सरकार निजीकरण की रट लगाए हुए है. स्वास्थ्य और शिक्षा का निजीकरण पहले ही हो चुका है. न तो सरकारी स्कूल और न ही सरकारी अस्पताल किसी काम के रह गए हैं. रेलवे का भी निजीकरण अब कुछ दिनों की बात रह गई है. फिर गरीब कैसे पढ़ेगा, कैसे ईलाज करवाएगा, कैसे यात्रा करेगा और कैसे जीएगा? उस पर बेरोजगारी पहले से ही आसमान छू रही है. अब कोरोना की दूसरी लहर को देश की गरीब और मध्यमवर्गीय जनता कैसे झेलेगी? केंद्र सरकार का पिछले साल कोरोना की पहली लहर के समय रवैया कमोबेश वही था जो सवा सौ साल पहले पुणे के प्लेग के समय अंग्रेज सरकार का था. मित्रों, कुल मिलाकर आजादी के ७५ साल बाद भी हमारा लोकतंत्र वैसा नहीं है जैसा होने का सपना शहीदों ने देखा था. बल्कि भ्रष्टाचार और न्याय की उपलब्धता के मामले में स्थिति १९४७ के मुकाबले कहीं ज्यादा ख़राब है. देश भले ही कितनी भी तेज जीडीपी दर प्राप्त कर ले देश देश मत्स्य न्याय की दिशा में बढ़ रहा है. किसी शायर ने शायद हमारे लोकतंत्र के बारे में ही ये पंक्तियाँ कही होंगी- ले आई जिंदगी हमें कहाँ पर कहाँ से, ये तो वही जगह है गुजरे थे हम जहाँ से. आखिर कब तक हमारा लोकतंत्र सिर्फ गोल चक्कर लगाता रहेगा?

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

गलती से निर्मला सीतारामण

मित्रों, सियासत भी अजीब चीज है. यहाँ हंस आजीवन दाना चुगते रह जाते हैं और कौवे मोती खाते हैं. देश में एक-से-एक अर्थशास्त्र के उद्भट विद्वान भरे पड़े हैं लेकिन मोदी जी ने वित्त मंत्री बना रखा है एक ऐसी महिला को जिसे अर्थशास्त्र की ए, बी, सी, डी तक पता नहीं है. इसी तरह जब सुरेश प्रभु को रेल मंत्री बनाया गया था और उनके कामकाज की पूरी दुनिया में सराहना हो रही थी तब उनको एक वृद्ध समाजवादी ने कहा था कि सुरेश बहुत जल्द तुमको हटा दिया जाएगा क्योंकि मोदी को योग्य व्यक्ति चाहिए ही नहीं और बाद में हुआ भी वही. खैर सुरेश जी के साथ जो हुआ सो हुआ लेकिन निर्मला सीतारामन जो कर रही हैं वो तो अद्भुत है. मित्रों, दरअसल परसों रात में वित्त मंत्रालय ने छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज में कटौती करने का निर्णय लिया था जो कल १ अप्रैल यानि मूर्ख दिवस को लागू होनेवाला था. लेकिन कल सुबह होते ही भारत की महानतम वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने मंत्रालय द्वारा लिए गए इस आदेश को गलती से जारी हो गया बता कर वापस ले लिया. जिससे काफी समय तक समाचार माध्यमों के समक्ष असमंजस की स्थिति बनी रही. कल मूर्ख दिवस होने के चलते भी लोग सरकार के यू टर्न को लेकर भ्रमित रहे. लोगों को लगता रहा कि सरकार ने कहीं जान-बूझकर उनको मूर्ख तो नहीं बनाया है. वैसे यह सरकार तो झूठ बोलकर देश की जनता को रोजाना मूर्ख बनाती है लेकिन कल दिवस विशेष था. मित्रों, मैं काफी दिनों से कहता आ रहा हूँ कि निर्मला जी वित्त मंत्री के पद के लायक नहीं हैं लेकिन मोदी ठहरे बहरे और मनमौजी. जो सिर्फ अपने मन की करते हैं और सुनते हैं. परन्तु अब तो निर्मला जी हद की भी हद कर चुकी हैं. भारत का वित्त मंत्री आदेश जारी कर रातों-रात उसे वापस ले ले कम-से-कम मैंने तो न कभी ऐसा देखा और न कभी सुना. जैसे कोई नीम हकीम अंदाजे पर तुक्केबाजी करते हुए मरीज का ईलाज करता है ठीक उसी तरह से हमारी नीमहकीम वित्त मंत्री अर्थव्यवस्था का सञ्चालन कर रही हैं. मित्रों, आपको याद होगा एक समय निर्मला जी देश की रक्षा मंत्री थी. हमें उनका उपकार मानना चाहिए कि उन्होंने गलती से कभी किसी पडोसी पर परमाणु बम नहीं गिरवा दिया या सेना को किसी महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र से वापस नहीं बुलवा लिया. अगर उन्होंने तब भी गलती से ऐसा आदेश दे दिया होता तो न जाने उसका परिणाम क्या होता. तथापि उनका वित्त मंत्री होना भी देश के लिए कम हानिकारक नहीं है. ऐसे समय में जब देश की अर्थव्यवस्था संकट में है गलती से ड्राइविंग सीट पर एक गलत शख्स बैठी हुई है. हालाँकि सच तो यह भी है कि जबसे मोदी जी की सरकार सत्ता में आई है तभी से अर्थव्यवस्था को रसातल में पहुँचाने की दिशा में कठिन परिश्रम किया जा रहा है. अंत में मैं निर्मला जी से कहना चाहूँगा कि सिर्फ आप ही नहीं बल्कि आपकी पूरी सरकार हमारी गलती से बनी है और गलती से देश का सञ्चालन कर रही है.

गुरुवार, 25 मार्च 2021

और भी बुरे दिन आनेवाले हैं

मित्रों, प्रबंधक की परीक्षा सुख में नहीं दुःख में होती है. आपको याद होगा जब २००८ की आर्थिक मंदी आई थी तब उससे भारत की तत्कालीन संघ सरकार ने कैसे निबटा था और भारत पूर्वी एशिया से उठी उस आर्थिक सुनामी से बेदाग बच गया था. तब भारत सरकार के आर्थिक इंतजामों की दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी. मित्रों, हमारा देश पिछले कई सालों से आर्थिक मोर्चे पर जूझ रहा है जिसे कोरोना ने और भी चिंताजनक बना दिया है. अब केंद्र सरकार की गलतियों का खामियाजा भुगतने की बारी राज्य सरकारों की है. कोरोना के चलते राज्यों के अपने राजस्व नुकसान तो अलग हैं, ऊपर से उन्हें जीएसटी के हिस्से में इस वित्त वर्ष में केंद्र से करीब तीन लाख करोड़ रूपये कम मिले हैं. इतना ही नहीं अगले साल भी इतनी ही कमी रहनेवाली है. मित्रों, इसके अलावा वित्त आयोग की सिफारिशों से भी राज्यों की कमाई या राजस्व को आनेवाले वर्षों में जोर का झटका लगनेवाला है. केंद्र ने राज्य सरकारों को जीएसटी में नुकसान की भरपाई की जो गारंटी दी है वह २०२३ में समाप्त हो जाएगी क्योंकि १५वें वित्त आयोग ने इसे बढ़ाने की कोई सिफारिश नहीं की है. इस गारंटी के खत्म होने के बाद राज्यों के राजस्व का पूरा संतुलन बिगड़ जाएगा और जीएसटी में नुकसान की भरपाई खुद से करनी होगी. मित्रों, यही नहीं वित्त आयोग ने केद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी का सूत्र भी बदल दिया है. नई व्यवस्था में जनसँख्या नियंत्रण, स्वास्थ्य व शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन के पैमाने भी जोड़े गए हैं. इंडिया रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय करों में ८ राज्यों (आन्ध्र, असम, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, ओडिशा, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश) का हिस्सा २४ से लेकर ११८ (कर्नाटक) प्रतिशत तक घट जाएगा. दूसरी तरफ महाराष्ट्र, गुजरात, अरुणाचल की पौ बारह रहेगी. मित्रों, आप जानते हैं कि केंद्र के करों में सेस और सरचार्ज का हिस्सा बढ़ता जा रहा है जिनमें से राज्यों को कुछ नहीं मिलता. केन्द्रीय कर राजस्व में इनका हिस्सा २०१२ में १०.४ प्रतिशत से बढ़कर २०२१ में १९.९ प्रतिशत हो गया है. मित्रों, बात इतनी भर होती तो फिर भी गनीमत थी. वित्त आयोग ने केंद्र से राज्यों को जानेवाले अनुदानों में बढ़ोतरी की सिफारिश की है लेकिन शिक्षा, बिजली और खेती के लिए केन्द्रीय अनुदान बेहतर प्रदर्शन की शर्तों पर मिलेंगे. जाहिर है कि बेहतर प्रदर्शन के लिए राज्यों को ज्यादा खर्च या निवेश करना होगा जिससे खजाने और भी ज्यादा खाली हो जाएँगे. रही बात कर्ज की तो मौजूदा वित्तीय वर्ष में ७ अप्रैल २०२० से १६ मार्च २०२१ तक भारत के २८ राज्य और २ केंद्रशासित प्रदेश बाजार से रिकॉर्ड ८.२४ लाख करोड़ रूपये का कर्ज उठा चुके हैं जो पिछले वित्त वर्ष से ३१ प्रतिशत ज्यादा है जिसके लिए उनको ७ प्रतिशत की दर से ब्याज देना होगा. अगले साल तक राज्यों के कर्ज १० लाख करोड़ को पार कर जाएँगे ऐसा अनुमान है. अर्थात आगे हमारे लिए जीवन जीना और महंगा और कठिन होनेवाला है और और भी बुरे दिन आनेवाले हैं क्योंकि एक तरफ केंद्र तो दूसरी तरफ राज्यों की सरकारें हम पर करों के बोझ में अति तीव्र असहनीय वृद्धि करनेवाली है.

रविवार, 21 मार्च 2021

मोदी राज में पैसा बचाना मना है

मित्रों, एक जमाना था और क्या जमाना था जब भारत और भारतीयों को बचत करने के लिए जाना जाता था और दुनिया भर के देशों के अर्थशास्त्री भारत से इस बात के लिए ईर्ष्या करते थे कि भारत गरीब भले ही हो लेकिन भारतीय धनी हैं. तब भारत और भारत के बैंकों के आर्थिक विकास में इन घरेलू बचतों का अपना अलग ही महत्व था. मित्रों, फिर आज का जमाना आया जब एक सर्वज्ञानी व्यक्ति प्रधानमंत्री बना और उसने अर्थशास्त्र के सारे नियमों को पलटकर रख दिया. आज मंदी से बाहर निकालने की जद्दोजहद में उसने भारत को दो वर्गों में बाँट दिया है. एक तरफ हैं चुनिन्दा लोग जो कर्ज ले सकते हैं क्योंकि वे उसे चुका सकते हैं और दूसरी तरफ हैं वे बहुसंख्यक करोड़ों लोग जो कर्ज नहीं लेते या नहीं ले सकते लेकिन पेट काटकर भविष्य के लिए बचत करते हैं और सर्वज्ञानी जी हैं कि लगातार ब्याज दर कम करके उन गरीबों को और भी गरीब बना रहे हैं. मित्रों, बीते ३ माह में ६ बार (२०१३ के बाद पहली बार) बांड बाजार ने सरकार को घुड़की दी और सस्ती ब्याज दर पर कर्ज देने से मना कर दिया. अब सरकार ठहरी कर्ज बाज़ार की पहली और सबसे बड़ी ग्राहक. बैंकों में जमा अधिकांश बचत सरकार कर्ज पर उठा लेती है और जिस दर पर पैसा उठती है (अभी ६.१५ प्रतिशत पर दस साल का बांड) आम जनता को उससे कहीं अधिक दर पर कर्ज मिलता है. साथ ही बचत पर ब्याज दर भी सरकारी कर्जे पर ब्याज से कम रहती है. इसके साथ ही सरकार से वसूला जानेवाला ब्याज उसके कर्ज की मांग से तय होता है. यहाँ मैं आपको बता दूं कि केंद्र सरकार अगले दो साल (यह और अगला) में करीब २५ लाख करोड़ रूपये का कर्ज लेगी. राज्यों की सरकारें इसके अलावा कर्ज लेनेवाली हैं जो कुल मिलाकर एक रिकॉर्ड होगा. यानि बैंकों के पास आम जनता को कर्ज देने के लिए पहले से कम पैसा बचनेवाला है. मित्रों, उस पर बैंकों के लिए मुश्किल यह है कि मंदी के दबाव के कारण बैंकों को सरकार के साथ-साथ कंपनियों को यानि अमीरों को भी सस्ता कर्ज देना है. नतीजतन गरीबों के बचत के ब्याज पर छुरी चल रही है. तथापि बैंकों को अपने सबसे बड़े ग्राहक यानि सरकार से कम से कम इतना तो ब्याज चाहिए जो महंगाई से ज्यादा हो इसलिए पेट्रोल-डीजल और सामानों के दाम बढ़ने से महंगाई बढ़ रही है. दूसरी तरफ, अपनी कमाई का ५० प्रतिशत हिस्सा ब्याज चुकाने में खर्च कर रही सरकार को नए कर्ज चुकाने के लिए और नए टैक्स लगाने होंगे यानि अभी तो हमारे बुरे दिनों की बस शुरुआत हुई है. मित्रों, महंगाई तो सिर्फ नेताओं के वादों में रूकती है इसलिए स्थिति यह है कि रिजर्व बैंक कर्ज पर ब्याज दरों को जबरन कम रखे हुए है जिससे बैंक जमा लागत घटाने के लिए बचतों पर ब्याज काट रहा है. यहाँ हम आपको यह बता दें कि भारतीयों की ५१ प्रतिशत बचतें इस समय बैंकों में हैं. बचत पर रिटर्न महंगाई से ज्यादा होनी चाहिए ताकि आम जनता का पैसा छीजे नहीं लेकिन इस पर मिल रहा ब्याज महंगाई से कम है जो अत्यंत दुखद है. जो कर्ज नहीं ले रहे उनकी मुसीबत दोहरी है. एक तो नौकरी गई या पगार घटी और दूसरा जिन बचतों पर उनकी निर्भरता थी वह भी छीज रहा है. लॉकडाउन के कारण खर्च रूकने से बैंकों में बचत जरूर बढ़ी थी लेकिन इस दौरान ब्याज दर के मुद्रास्फीति से कम होने के कारण नुकसान ज्यादा हो गया. भारत का एक बहुत ही छोटा सा जनसमूह जो शेयर बाजार के दांवपेंच से वाकिफ है बस वही फायदे में है बड़ी आबादी का सहारा फिक्स डिपोजिट बुरी तरह पिट चुके हैं. मित्रों, अब बचत और उन पर निर्भर लोगों की जो हालत है सो है. अच्छे दिन तो आए नहीं अलबत्ता बुरे दिन जरूर आ गए. आप कहेंगे विकल्प क्या है? विकल्प भी है बशर्ते सर्वज्ञानी महाशय हमारी सलाह को मानें. इसके लिए सबसे पहले सरकार को जनता के लिए निर्धारित आय वाले नए विकल्प देने होंगे. साथ ही सरकार को अपने कर्ज को कम करना होगा. नहीं तो सरकार और ज्यादा संख्या में नए नोट छापेगी और महंगाई और भी विकराल रूप लेती जाएगी.

गुरुवार, 11 मार्च 2021

कोरोना संकट, वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत

मित्रों, इन दिनों खुद प्रधानमंत्री मोदी और उनके समर्थक इस बात की रट लगाए हुए हैं कि उनकी सरकार ने कोरोना संकट से बड़े ही बेहतरीन तरीके से निबटा लेकिन अगर हम यूरोप और अमेरिका द्वारा उठाए गए कदमों और उनके प्रभावों पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि अमेरिका और यूरोप के देश इस दौरान प्रबंधन में हमसे कहीं आगे, बहुत आगे थे. मित्रों, मैकेंजी की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक २०२० की दूसरी और चौथी तिमाही में यूरोपीय समुदाय के देशों की जीडीपी १८ प्रतिशत सिकुड़ गई तब भी वहां रोजगार केवल ३ प्रतिशत घटी जबकि खर्च योग्य आय अर्थात डिस्पोजेबल इनकम में केवल ५ प्रतिशत की कमी आई. वहीँ अमेरिका में इस दौरान जीडीपी १० प्रतिशत टूटा, रोजगार भी घटा लेकिन लोगों की खर्च योग्य आय ८ प्रतिशत बढ़ गई. इस दौरान यूरोपीय समुदाय के देशों ने प्रतिव्यक्ति २३४२ डॉलर और अमेरिका ने ६७५२ डॉलर प्रतिव्यक्ति व्यय किया जबकि भारत सरकार ने कितना व्यय किया खुद सरकार भी नहीं जानती. साथ ही रोजगार की स्थिति पर भी हमारी सरकार रिपोर्ट को दबाने में ही लगी रहती है इसलिए हम इस मामले में भी आज तक अँधेरे में हैं. मित्रों, जहाँ यूरोप और अमेरिका की सरकारों ने अपना पूरा ध्यान रोजगार बचाने और बेरोजगारों की सहायता पर केन्द्रित रखा वहीँ हमारी सरकार का पूरा ध्यान सरकारी कम्पनियों को बेचने और उद्योग जगत को लाभ पहुँचाने में लगा रहा. इस दौरान उद्योग जगत ने कितने लोगों को बेरोजगार कर दिया और उन बेरोजगारों की स्थिति क्या है से सरकार ने कोई मतलब ही नहीं रखा. यहाँ तक कि सरकार ने अचानक लॉक डाउन घोषित कर दिया और जो लोग जहाँ-तहां फँस गए उनके खाने-पीने-रहने-शौचालय आदि का कोई इंतजाम नहीं किया. लोगों को पैदल भूख-प्यास-थकान से जूझते हुए हजारों किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ी. उनमें से कई लोगों की जीवन यात्रा यात्रा के दौरान ही समाप्त हो गई. मित्रों, दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप की सरकारों ने अचानक लॉक डाउन नहीं किया. साथ ही वहां की सरकारों ने आम लोगों की बचत संरक्षित करने और आवासीय, शिक्षा व चिकित्सा की लागत को कम करने पर खर्च किया. जबकि हमारी सरकार ने फैक्ट्री मालिकों से मजदूरों को घर बिठाकर वेतन देने, स्कूलों से २ महीने की फीस माफ़ करने और मकान मालिकों से बिना किराया लिए लोगों को घर में रहने देने का अनुरोध भर करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली. परिणाम यह हुआ कि अचानक हजारों मजदूर रोजगार और गृहविहीन होकर सडकों पर आ गए और कई महीनों तक अफरातफरी का माहौल रहा. जबकि यूरोप और अमेरिका में मकान और फैक्ट्री मालिकों और स्कूल संचालकों को सरकारी आदेश से जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई सरकार ने की. साथ ही मकान किराया और स्कूल फ़ीस को कम किया और कर्मचारियों को अनिवार्य पेंशन भुगतान में छूट दी गई या सरकार ने खुद नुकसान की भरपाई की. मित्रों, इस कार्य में यूरोप और अमेरिका के निजी क्षेत्र ने भी सरकार का भरपूर साथ दिया. कंपनियों को कारोबार में नुकसान हुआ, कई दिवालिया भी हो गईं लेकिन रोजगारों में कमी को कम-से-कम बनाए रखा और पेंशन व बीमा भुगतानों का बोझ उठाया. इन सारी कवायदों का परिणाम यह हुआ कि अमेरिका में २०२० की तीसरी तिमाही में खर्च योग्य आय दोगुनी बढ़कर १६.१ प्रतिशत हो गई तो वहीँ यूरोप में भी बचत दर २४.६ प्रतिशत तक पहुँच गई. अब जबकि वहां की जनता की आय सुरक्षित है और बचत भी बढ़ चुकी है तो जैसे ही कारोबार अपनी पूरी क्षमता से खुलेगा यह ईंधन अर्थव्यवस्था को सरपट दौड़ा देगा. मित्रों, दूसरी तरफ भारत सरकार एक्ट ऑफ़ गॉड के नाम पर रोजाना नए कर थोप रही है, पहले से तंगहाल हो चुकी जनता को पेट्रोल की आग में जला रही है और निजी कम्पनियाँ रोजगार में कटौती करके मुनाफा कूट रही है. सवाल उठता है कि जब पूंजीवादी मुल्कों में सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर संकट से लड़ सकते हैं तो भारत में ऐसा क्यों नहीं हो पाया? भारत सरकार ऐसे संवेदनहीन निजी क्षेत्र के हाथों में सबकुछ सौंपने के बारे में सोंच भी कैसे सकती है? मित्रों, अयोग्य वित्त मंत्री और सरकारी कुप्रबंधन की कृपा से कोविद पूर्व ही मंदी और अभूतपूर्व बेरोजगारी के चलते लोगों की खर्च योग्य आय में ७.१ प्रतिशत की कमी आ चुकी थी. फिर कोविद और अब अत्यधिक करारोपण से उपजी जानलेवा महंगाई लोगों की आय को खा रही है. आज भारत दुनिया में खपत पर सबसे ज्यादा और दोहरा-तिहरा कर लगानेवाले देशों में है. हम न तो सरकार से टैक्स का हिसाब मांगते हैं और न ही इस बात की फिक्र ही करते हैं कि कॉर्पोरेट मुनाफों में बढ़त से रोजगार और वेतन क्यों नहीं बढ़ते और अगर बढ़ने के स्थान पर घटते हैं तो भारत लोक कल्याणकारी राज्य कैसे है? हम तो बस जय श्रीराम का नारा लगाते हैं रामजी के नाम पर देश और खुद को लुटने देते हैं.

मंगलवार, 9 मार्च 2021

जादूगरों के जादूगर मोदी

मित्रों, कौन क्या है, कैसा दिख रहा है और क्या निकलेगा. कौन क्या बोल रहा है और क्या करेगा इसके लिए हमें वक्त का मुंह ताकना पड़ता है. एक समय था जब नरेन्द्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित किया था. तब मोदी जादूगरोंवाले कपडे पहनकर प्रचार करते थे. जनता को लगा कि यह व्यक्ति जरूर अपने जादू से देश और देश की जनता का कायाकल्प कर देगा. लेकिन अब जबकि मोदी को प्रधानमंत्री बने लम्बा समय बीत चुका है तब ऐसा लग रहा है कि मोदी जादूगर तो हैं लेकिन अच्छे वाले और अच्छे दिन लानेवाले जादूगर नहीं हैं. बल्कि जनता को अपने जादू के तिलिस्म में भरमाकर लगातार मूर्ख बनानेवाले लोककथाओं वाले जादूगर हैं. मित्रों, मुझे याद है कि अटल जी के ज़माने में जब स्वर्गीय अनंत कुमार जी को नागरिक उड्डयन मंत्री बनाया गया था तब उन्होंने मीडिया को दिए गए अपने पहले साक्षात्कार में कहा था कि मैं एयर इंडिया का कायाकल्प कर दूंगा. लेकिन हुआ क्या और आज एयर इंडिया किस स्थिति में है यह आप भी जानते हैं. मित्रों, ऐसा नहीं है कि पहले सरकारी कंपनियों को बेचा नहीं गया. अटल जी के ज़माने में भी बेचा गया लेकिन मेरे एक ग्रामीण जिस तरह भैंसों को बेचते थे उस तरह से बेचा गया. दरअसल वो जमाना बैलों से खेती करने का था. हर दरवाजे पर कई-कई जानवर बंधे रहते थे. तब महनार और पटोरी में जानवरों की हाट लगती थी. मेरे उपरलिखित ग्रामीण जानवरों की दलाली करते थे. कई बार वे मरियल भैंस खरीद लाते. फिर कुछ महीनों तक उनके बेटे-पोते उन भैसों को खूब खिलाते और जब उनकी हालत हाथियों जैसी हो जाती तब दलाल साहब उनको ढेर सारा मुनाफा लेकर बेच देते. मित्रों, अब अगर हम मोदीजी की सरकार को देखें तो इसका काम अटल जी से सीधा उल्टा है. मोदी जी पहले सरकारी कंपनियों को बर्बाद करते हैं फिर अपने अमीर मित्रों के हाथों उनको औने-पौने दामों में बेच देते हैं. कम्पनी नहीं बिकती तो कंपनी की संपत्ति ही सही. जमीन ही बेच दो. और ये सारा काम मोदी जी की राष्ट्रवादी सरकार देशहित के नाम पर कर रही है. मित्रों, महंगाई, बेरोजगारी को ही लें तो दोनों अपने चरम पर है लेकिन मोदी जी निश्चिन्त हैं. उनको पता है कि जनता देशहित के नाम पर कुछ भी सह जाने को मानसिक रूप से तैयार बैठी है. बीजेपी की आईटी सेल ने कुछ इस तरह उनका ब्रेनवाश किया है कि जनता जान देगी लेकिन उफ्फ तक नहीं करेगी. मित्रों, मोदी जी किसी से नहीं डरते. ५६ ईंच का सीना है उनका. बस सवालों और आलोचनाओं से डरते हैं. मीडिया के सवालों से बचने के लिए वे कभी प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते. जो भी बोलते हैं सिर्फ संसद में बोलते हैं या फिर एकतरफा भचर-भचर करते रहते हैं. उनके लिए मीडिया का कोई महत्व नहीं है. क्या मोदी सिर्फ संसद के प्रति जिम्मेदार हैं जनता के प्रति जिम्मेदार नहीं है? क्या मोदी जी को सवालों से डर नहीं लगता है? फिर वे ५६ ईंच सीना वाले कैसे हुए? मित्रों, मोदी जी का लक्ष्य देश को लाभ पहुंचाना है ही नहीं बल्कि खरीदारों को लाभ पहुंचाना है। सरकारी कंपनियों की तरह मोदी जनता को भी पहले कंगाल बना रहे हैं फिर बेच देंगे। सांसों पर भी टैक्स लगेगा और वसूली अंबानी अडानी करेंगे। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम जिसको भी चुनते हैं वो डाकू निकलता है। कोई सीधे घोटाला करके डाका डालता है तो कोई इंद्रजाल फैलाकर। मोदी जी कहते हैं कि निजीकरण से देश का कायाकल्प होगा. लेकिन निजी स्कूलों और अस्पतालों की हालत क्या है? अभी तीर्थराज प्रयाग में एक निजी अस्पताल में डॉक्टर ने इसलिए तीन साल की ख़ुशी का पेट आपरेशन के बाद खुला छोड़ दिया क्योंकि उसके माता-पिता ५ लाख रूपये नहीं जमा करवा पाए. ईश्वर ख़ुशी की दिवंगत आत्मा को देशहित में खुश रखे. जब कुछ भी सरकारी नहीं बचेगा तो पूँजी की हृदयहीनता और मुनाफाखोरी से जनता की रक्षा कौन करेगा? वह पूँजी राम मंदिर में करोड़ों का समर्पण कर देगी लेकिन ख़ुशी और ख़ुशी के परिवार की ख़ुशी के लिए दो-चार लाख रूपये नहीं छोड़ेगी. रही बात सरकारी कामकाज की तो ऐसी कौन-सी कुर्सी है जिसकी नीलामी नहीं हो रही है या ऐसा कौन-सा टेबल है जहाँ बिना सेवा-शुल्क लिए जनता की सेवा की जाती है. देश में आज भी वही पुलिस है, वही न्यायालय है और वही बेबसी व लाचारी है. मोदी जी ने वादा किया था कि उनके राज में चलता है नहीं चलेगा फिर चल कैसे रहा है? भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हुआ बस उसका रूप बदल गया है. पहले घोटालों के आरोप इंसानों पर लगते थे अब दो पैर वाले चूहे चार पैर वाले चूहों पर हजारों लीटर शराब गटक जाने के आरोप लगाने लगे हैं. मित्रों, चाहे बंगाल हो या केरल या कोई अन्य राज्य. चाहे वो लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव मोदी जी के आने से पहले जो सच था, वह आज भी सच है और कल जब मोदी नहीं रहेंगे तब भी सच रहेगा. किसी अनाम कवि ने कहा है- हमारे देश में चुनाव क्या है? एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से बकरे अपने लिए सबसे अच्छे कसाई को चुनते हैं. मित्रों, कभी-कभी हमारे देश के हास्य कवि भी बड़ी गंभीर बातें कर जाते हैं. सुरेन्द्र शर्मा जी अपनी एक कविता में कहते हैं कि जनता तो सीता है रावण राजा बना तो हर ली जाएगी और राम राजा बने तो अग्निपरीक्षा के बाद फिर से वनवास पर भेज दी जाएगी जनता तो द्रौपदी है अगर कौरव राजा बने तो उसका चीर हरण हो जाएगा और अगर पांडव राजा बने तो दांव पर लगा दी जाएगी. जीते कोई हारना तो जनता को ही है. तुलसीदास के समय राम नाम की लूट थी और आज राम के नाम पर लूट मची है.

मंगलवार, 2 मार्च 2021

आदमी, पैसा और भगवान

मित्रों, एक जमाना था, शायद नेहरु जी का जमाना जब लोग भगवान और कर्मफल के सिद्धांत पर विश्वास रखते थे. तब भगवान ही भगवान थे और पैसा साधन मात्र था. लेकिन आज जब मोटी चमड़ीवाले मोदी जी का शासन है हमने पैसे को ही सबकुछ बना दिया है. जैसे भगवान को हमने मृत्युदंड दे दिया है. यथा राजा तथा प्रजा. मित्रों, आज पैसा साधन है पैसा साध्य है, पैसा ईश्वर है पैसा आराध्य है; पैसा स्वर्ग है पैसा मंजिल है, पैसा नाव है पैसा साहिल है; पैसा वात्सल्य है पैसा अनुराग है, पैसा पति है पैसा सुहाग है; पैसा ख़ुशी है पैसा प्रकाश है, पैसा उड़ान है पैसा आकाश है; पैसा दिल है, पैसा पैसा धड़कन है, पैसा महफ़िल है पैसा जीवन है; पैसा शक्ति है पैसा भक्ति है, पैसा आदर है पैसा तृप्ति है; पैसा मंदिर है पैसा तीर्थ है, पैसा सम्बन्धी है पैसा मित्र है; पैसा ही कविता है पैसा ही रस है, पैसे के बिना उत्तम साहित्य भी नीरस है; पैसा अपनापन है पैसा ही प्यार है, पैसा ही डिग्री है पैसा ही पढाई है, पैसा के बिना जीवन ढलान है, पैसा है तो चढ़ाई ही चढ़ाई है; पैसा प्रेम है पैसा इन्साफ है, पैसेवाले को सौ खून माफ़ है.; यहाँ तक कि पैसा इंसानियत है पैसा इन्सान है, फिर इन्सान क्या है? पैसा है तो भगवान है वर्ना कुछ भी नहीं है. मित्रों, सोंचिए-हम क्या थे, क्या है और क्या होंगे अभी? लोग कहते हैं कि एक दिन धरती इंसानों के रहने लायक नहीं रहेगी. मगर क्या आज इन्सान धरती पर रहने लायक रह गया है? पैसों के लिए खुद मेरे रक्तसम्बंधियों ने मेरी पीठ में कई-कई बार छुरा भोंका है और हर बार सिर्फ कबीर के इस दोहे को दोहरा कर अपने दिल को दिलासा देता रहा कि कबीरा आप ठगाईए और न ठगिए कोई, आप ठगे सुख उपजै और ठगे दुःख होई.

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी

जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी, हम केहू से कम बानी का। जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी, लाखों गलती करके भी अप्पन बात पर अड़तानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी। मनमोहन जब निजीकरण कईले देश ऊ बेचत रहलें, हम सरकारी कंपनी बेचके देश के बचावतानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी। चीन चढल बा छाती पर हमर दिमाग बा हाथी पर, जीडीपी के माईनस करके ५ ट्रिलियन के बनाबतानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी। बेरोजगारी आकाश लगल बा गरीब गुरबन के बाट लगल बा, पेट्रोल डीजल के दाम बढा के महंगाई हम घटाबतानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी। देश दुनिया के चिंता नईखे महंग कपडा पेन्हतानी, करनी ले साफे अल्लग दिनभर भाषण पेलतानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी। धरम के अफीम चटाके प्रदेश चुनाव जीततानी, रेल के टिकस बढाके जेबी से पैसा खींचतानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी। दोसर केकरो बात न सुनब अप्पन बात सुनाबतानी, कईसे जईबअ कईसे जीबअ तू जानअ लौकडाऊन लगाबतानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी। नेहरू के हम नाम मेटाईब नया नेहरू हम कहाईब, हर चीज हमरा नाम पे होई भले देश के जनता रोई, अल्पसंख्यक फंड बढाके तुष्टीकरण मेटाबतानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी, लाखों गलती करके भी अप्पन बात पर अड़तानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

अच्छा दिन आ गईल बा मोदीजी के राज में

सारी जमा पूँजी ख़तम हो गईल नून रोटी प्याज में अच्छा दिन आ गईल बा मोदीजी के राज में. सबसे पहिले भैया नोटबंदी के चोट भईल, तेकरा बादे भैया कई राज्य में वोट भईल, फिर पधारली जीएसटी जैसे कोढ़ खाज में, अच्छा दिन आ गईल बा मोदी जी के राज में. अब होई देश के निजीकरण अईसन हम सुनअतानी, जईसन मनमोहन ओईसन मोदी अईसन हम गुनअतानी, जनता पीट रहल बा माथा बैठल डूबत जहाज में, अच्छा दिन आ गईल बा मोदीजी के राज में.

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

मोदी राज में लगातार कठिन होता जीवन

मित्रों, एक जमाना था जब भारत में २०१४ के लोकसभा चुनाव प्रगति पर थे. तब एक गीत और नारा बार-बार भारत की फिजाओं में गूँज रहा था कि अच्छे दिन आनेवाले हैं. हमें भी लगा कि शायद इस बार ऐसा होकर रहेगा. कारण यह कि लोग कांग्रेस के भ्रष्टाचार से काफी नाराज और परेशान थे. फिर जब चुनाव परिणामों की घोषणा हुई और भाजपा को अकेले बहुमत मिला तब लोगों की उम्मीदों को और भी बल मिला. मित्रों, इसके बाद जब केन्द्रीय मंत्रिमंडल की घोषणा हुई तब थोड़ी-सी निराशा हुई क्योंकि जिन लोगों को मंत्री बनाया गया था उनमें से कई पूरी तरह से अयोग्य थे. साल-दो-साल होते-होते देश की जनता में निराशा घर करने लगी. लेकिन मोदी जनमानस को समझते थे इसलिए एक-के-बाद-एक ऐसे कदम उठाते रहे जिससे जनता की उम्मीदों का गुब्बारा फूलता ही चला गया. पता नहीं यह कब फूटेगा और उसके बाद भाजपा और भारत का क्या होगा? पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी को लागू करना ये दो ऐसे कदम रहे जिनसे देश की अर्थव्यवस्था को लाभ के स्थान पर हानि हुई. जो बेरोजगारी पहले से ही काफी बढ़ी हुई थी में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. लेकिन यहाँ भी कमाल दिखाया भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी ने और देश की जनता को अपने शब्द-जाल में उलझाए रखा. चुनाव-दर-चुनाव जीतते रहे. मित्रों, फिर आया कोरोना और सरकार द्वारा बिना तैयारी के किए गए लौकडाउन का दौर जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर ही तोड़ दी. कहना न होगा कि इस दौरान अगर भारत का वित्त मंत्री किसी अर्थशास्त्री को बनाया गया होता तो भारतीय जीडीपी आज ऋणात्मक नहीं होती. मित्रों, अगर हम देश की आम जनता के जीवन को देखें और पिछली मनमोहन सरकार से तुलना करें तो उनके लिए अच्छे दिन के बदले बुरे दिन आ गए हैं. नोटबंदी, जीएसटी और कोरोना के कारण आमदनी घट गई है. उस पर जले पर नमक का काम कर रही है कमरतोड़ महंगाई. ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड अलग जनता को लूट रहा है जिससे निबटने के लिए भी मोदी सरकार बिलकुल भी तैयार नहीं है. कहने का तात्पर्य यह कि मोदी सरकार में देशवासियों का जीवन पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो गया है. खाने-पीने से लेकर घर बनाने की सामग्री तक सबकुछ भयंकर महंगाई रुपी चक्रवात की तरह जन-जीवन को तहस-नहस करने पर तुली है लेकिन मोदी सरकार का जैसे इस तरफ ध्यान ही नहीं है. पहले के मुकाबले रेलयात्रा भी काफी महँगी की जा चुकी है. पेट्रोलियम पदार्थ जहाँ पहले रुला रहे थे अब झुलसा रहे हैं. अर्थव्यवस्था इस समय आईसीयू में है. हालात इतने ख़राब हैं कि सरकार जमीन, बैंक, रेलवे स्टेशन और एअरपोर्ट बेचने पर मजबूर हो गई है. उस पर गजब यह कि अपनी महारत के अनुसार मोदी सरकार ने देश के लोगों को राम मंदिर में उलझा रखा है जिससे देश के वास्तविक मुद्दे इस समय भी गौण हैं. जाहिर-सी बात है कि इस समय कहीं भी अच्छे दिन आनेवाले हैं गाना या नारा कहीं सुनाई नहीं देता. हाँ, जनता जरूर यह समझ चुकी है कि आगे और भी बुरे दिन आनेवाले हैं.

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

बिहार में रौलेट एक्ट

मित्रों, मैं जानता हूँ कि आप सभी रौलेट एक्ट से वाकिफ हैं. १९१८ में ब्रिटिश सरकार ने यह कानून हम भारतीयों के लिए बनाया था जिसके अंतर्गत प्रावधान किया गया था कि पुलिस किसी भी भारतीय को बिना न्यायालय में मुकदमा चलाए अनिश्चित काल के लिए जेल में रख सकती थी. आप लोग यह भी जानते हैं कि इसी रौलेट एक्ट के खिलाफ जालियांवाला बाग़ में जनसभा हो रही थी जिस पर गोलियां चलाकर हजारों निरपराध और निशस्त्र लोगों को बेमौत मार दिया गया था. मित्रों, इन दिनों बिहार की नीतीश सरकार ने भी कुछ इसी तरह के कानून लागू करने का निर्णय लिया है. इस कानून के द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद १९ (क) में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छीनने का जघन्य पाप किया गया है. बिहार के पुलिस प्रमुख अर्थात डीजीपी द्वारा जारी ३ फरवरी के आदेश के अनुसार अगर कोई व्यक्ति बिहार सरकार के खिलाफ प्रदर्शन या सड़क जाम करता है तो उसे सरकारी नौकरी या टेंडर पाने का अधिकार नहीं रह जाएगा. मित्रों, सवाल उठता है कि बिहार के लोग आजाद हैं या अभी भी गुलाम हैं? लोकतंत्र में लोकतान्त्रिक विधि से चुनी गई सरकार भला कैसे लोगों से विरोध करने का अधिकार छीन सकती है? क्या नीतीश कुमार ने खुद १९७४ के प्रदर्शनों में भाग नहीं लिया था? नीतीश जी भूल गए कि तब देश में आपातकाल था अब नहीं है? मित्रों, अगर किसी सरकार के शासन में ऊपर से नीचे तक घूस की गंगा बह रही हो, बिना रिश्वत दिए कोई काम नहीं होता हो, जनता की कोई सुननेवाला नहीं हो, डीजीपी खुद मुख्यमंत्री का फोन नहीं उठाता हो, एफआईआर दर्ज करने में हफ़्तों लग जाते हों, बिना पैसे दिए एक भी नियुक्ति नहीं होती हो तो जनता खुश होगी या नाराज? ऐसे में असंतोष नहीं पनपेगा तो क्या पनपेगा? जनता सडकों पर नहीं आएगी तो और क्या करेगी? क्या अंग्रेजी राज के खिलाफ स्वातंत्र्यवीरों ने प्रदर्शन नहीं किया था? फिर आज के बिहार की हालत तो अंग्रेजों के समय से भी ज्यादा ख़राब है फिर जनता से विरोध करने का अधिकार क्यों छीना जा रहा है? अगर फिर भी बिहार में लोकतंत्र है तो फिर उत्तर कोरिया और चीन में क्या है? क्या इसलिए बिहार की जनता ने नीतीश कुमार को लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनाया था? नीतीश जी को अपने इस कार्यकाल में अपनी पुरानी गलतियों को सुधारना है या जनता के मुंह को बंद करना है? मैं यह भी जानता हूँ कि यह कानून न्यायालय में एक मिनट भी नहीं टिकेगा और शायद नीतीश जी भी इस तथ्य को जानते हैं फिर उन्होंने यह नई गलती क्यों की? कहीं यह दूसरे आंतरिक राष्ट्रीय आपातकाल की आहट तो नहीं?

बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

साईबर अपराध रोकने में पूरी तरह विफल मोदी सरकार

मित्रों, जबसे केंद्र में मोदी जी की सरकार बनी है डिजिटल इंडिया का शोर है. मोदी सरकार प्रत्येक भारतीय को इन्टरनेट से जोड़ना चाहती है जिसकी तारीफ होनी चाहिए लेकिन जैसे-जैसे भारत के लोग इन्टरनेट से जुड़ते जा रहे हैं वैसे-वैसे इन्टरनेट से जुड़े अपराध भी काफी तेजी से बढ़ रहे हैं. स्थिति ऐसी है कि कब किसकी जमा पूँजी पर डाका पड़ जाए कोई नहीं जानता. मित्रों, सिर्फ २०१९ में भारत के १४ करोड़ लोग साईबर ठगी के शिकार हुए जिनके सवा लाख करोड़ रूपये ख़ामोशी से लूट लिए गए. आप समझ सकते हैं कि १४ करोड़ लोग और सवा लाख करोड़ रूपये का आंकड़ा कोई छोटा नहीं होता बहुत बड़ा होता है. यहाँ हम आपको बता दें कि २०१९ में पूरी दुनिया में जहाँ ३५ करोड़ लोग साईबर ठगी के शिकार हुए वहीँ सिर्फ भारत में १४ करोड़ लोगों से लूट हुई. कभी पुणे के कोसमोस बैंक का ९४ करोड़ रूपया उड़ा लिया जाता है तो कभी झारखण्ड के मेदनीनगर स्थित भारतीय स्टेट बैंक की शाखा से एकमुश्त १० करोड़ रूपये गायब कर दिए जाते हैं. विदित हो भारत में साईबर अपराधों में सालाना ४० प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है. मित्रों, रोजाना होने वाली लाखों की संख्या में आम जनता की दस-बीस हजार की लूट की तो बात ही छोडिये स्टेट बैंक में रखा हुआ पैसा भी आज सुरक्षित नहीं है लेकिन भारत सरकार का इस ओर ध्यान ही नहीं है. timejobsservice.com नामक वेबसाइट जैसे अनेक वेबसाइट खुलेआम रोजगार देने के नाम पर गरीब-बेरोजगार लोगों के बैंक खातों में जमा पैसा उड़ा ले रहे हैं लेकिन इससे मोदी सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता. जैसे उसका मूल-मंत्र यही है कि भाड़ में जाए जनता, अपना काम बनता. मित्रों, अभी हाजीपुर से सटे कंचनापुर में एक्सिस बैंक में ४८ लाख का डाका पड़ा. मेरे घर के पास महिला थाना के सामने पुलिस लोगों की डिक्की चेक करने लगी. क्या अपराधी लूट के बाद जिला मुख्यालय की मुख्य सड़क से होकर गुजरेंगे? मित्रों, इसी तरह मोदी सरकार भी पुराने तरीके से साईबर क्राइम रोकने में लगी है. उसके पास इसको रोकने की कोई स्वदेशी तकनीक नहीं है बल्कि वो इसके लिए पूरी तरह से दूसरे देशों पर निर्भर है. स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि लोग-बाग़ अब बैंकों में पैसा रखने से भी डरने लगे हैं. जब स्टेट बैंक जो भारत सरकार और राज्य सरकारों का समस्त सरकारी लेनदेन करता है ही सुरक्षित नहीं है तो कोई कहाँ पैसा जमा करे? सिर्फ नेशनल साईबर क्राइम पोर्टल बना देने की औपचारिकता मात्र से तो साईबर अपराध रूकने से रहे बल्कि भविष्य में जब ५जी आएगा तो स्थिति और भी भयावह हो जाएगी. इसलिए मोदी जी से अनुरोध है कि सिर्फ भाषण देना बंद कर इस दिशा में प्रभावी कदम उठाएं जिससे इस तरह के अपराध को पूरी तरह से रोका जा सके न कि अपराध हो जाने के बाद लाठी पटकने की औपचारिकता का निर्वहन किया जाए.