रविवार, 18 जनवरी 2026

झुनझुना बन चुका है नमो ऐप

मित्रों, जब देश में सोनिया-मनमोहन की सरकार थी तब देश की हालत क्या थी याद है आपको? पूरे भारत में निराशा का माहौल था. पूरी दुनिया भारत को असफल राष्ट्र मानने लगी थी. भारत में लोकतंत्र फेल हो चुका था. सरकार क्या थी घोटालों की सरकार थी. जनता की कहीं कोई सुननेवाला नहीं था. मजबूरन देश की जनता ने सरकार बदलने का निर्णय किया और एक ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाया जो देश को बदल देने के वादे और दावे कर रहा था. उसका दावा था कि अब चलता है को देश में चलने नहीं देगा. काला धन देश में वापस लाएगा. लेकिन हुआ क्या? मित्रों, ऐसे ही उम्मीद भरे माहौल में १८ जून, २०१५ को नमो ऐप लांच किया गया. शहर-शहर कार्यक्रमों का आयोजन करके इस ऐप का प्रचार भी किया गया. सच पूछिए तो मुझे इसके बारे में जानकर अपार ख़ुशी हुई. मैंने कई बार इस मंच पर अपनी समस्याएँ रखीं और हर बार त्वरित समाधान हो गया. यहाँ तक कि मेरे हाजीपुर शहर में कचरे के उठान से सम्बंधित समस्या का भी समाधान किया गया. इस बीच मैं मुज़फ्फरनगर के श्रीराम कॉलेज में अध्यापक बन गया. एक बार जब मैंने मुज़फ्फरनगर के लिए दिल्ली से बस पकड़ी तब पता चला कि बस पहले हापुड़ जाएगी, फिर मेरठ जाएगी और उसके बाद मुजफ्फरनगर. उस समय गर्मी का मौसम था और बस भी ठसाठस भरी हुई थी. मुझे खड़े होकर यात्रा करनी पड़ी और वह भी सिर्फ इसलिए क्योंकि उस दिन भारत के तत्कालीन गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह सड़क मार्ग से दिल्ली से मेरठ जा रहे थे और इसलिए बसों का रूट बदल दिया गया था. मैंने मुज़फ्फरनगर पहुँचते ही नमो ऐप पर इसकी शिकायत की. कुछ दिनों के बाद मुझे फोन आया तब मैंने कहा कि मेरी समस्या का समाधान तो तब होगा जब आगे से किसी मंत्री या अन्य वीआईपी के चलते यातायात का रूट नहीं बदला जाएगा. मित्रों, कुछ समय बाद मेरे कॉलेज का सफाईकर्मी हमारे पत्रकारिता विभाग में आया और बताया कि उसके गाँव की दबंग जाति के लोगों ने उसके वाल्मीकि समुदाय के लोगों के मोहल्ले का रास्ता रोक दिया है. पंचायत चुनाव में उन लोगों ने एक मुसलमान को प्रधान पद के लिए वोट दिया था जो जीतने के बावजूद मामले में हाथ डालने से भाग रहा है. मैंने तत्काल नमो ऐप पर शिकायत दर्ज करवा दी. कुछ दिनों के बाद मुज़फ्फरनगर के जिलाधिकारी का मुझे फोन आया और समस्या का समाधान कर दिया गया. मित्रों, इसके बाद ऐप में कई बदलाव कर दिए गए. अब शिकायत करने पर जिस विभाग या राज्य सरकार से शिकायत सम्बंधित है उसके बारे में भी बताना पड़ता था. इतना ही नहीं शिकायत करने के बाद अब मामले को प्रदेश लोक शिकायत विभाग में भेज दिया जाता था और मैसेज भेज दिया जाता था कि आपकी समस्या का समाधान कर दिया गया है और तबसे जनसमस्याओं के समाधान का यह मंच झुनझुना बनकर रह गया है. उसके बाद आपके पास बार-बार फोन करके पूछा जाता है कि क्या आप समाधान से संतुष्ट हैं लेकिन उसके बाद होता कुछ भी नहीं है. मतलब फोन करके पूछना भी सिर्फ औपचारिकता होती है. तबसे मैंने कई बार कई तरह की समस्याओं के बारे में शिकायत की जिनमें से अधिकतर बिहार के राजस्व व पुलिस विभाग से सम्बंधित थी. हर बार मैसेज आता रहा कि आपकी समस्या का समाधान कर दिया गया है हालाँकि अधिकतर समस्याओं का कोई समाधान नहीं हुआ. मामले को जनशिकायत में भेजकर औपचारिकता पूरी कर ली गई. एक मामले में तो मुझे वैशाली जिला जनशिकायत विभाग द्वारा कई महीने तक तारीख-पे-तारीख देकर मामले की मेरी अनुपस्थिति में सुनवाई कर ली गई और फैसला मेरे खिलाफ सुना दिया गया. मामला महनार के अंचलाधिकारी द्वारा घूस नहीं देने पर दस्तावेज के अपठनीय होने का बहाना बनाकर दाखिल-ख़ारिज के आवेदन को रद्द कर देने से सम्बंधित था. मित्रों, कुल मिलाकर जो मंच जनता को प्रधानमंत्री जी द्वारा उपलब्ध करवाया गया था वो अब बेकार हो साबित चुका है. ऐसे में सवाल उठता है कि अब लोग अपनी शिकायतों को लेकर जाएँ तो कहाँ जाएँ. बिहार में तो प्रदेश स्तर पर जन शिकायतों के लिए ऐसा कोई मंच है भी नहीं. मुझे लगा था कि नेता लोग भले भी मोटी चमड़ी वाले होते हैं लेकिन मोदी जी ऐसे नहीं हैं लेकिन इस नमो ऐप की दुर्गति देखकर तो ऐसा लगता है कि मोदी जी भी बांकी नेताओं की तरह ही मोटी चमड़ी वाले हैं.

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