मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

किस जन्म का बदला ले रही है यू.जी.सी.

बदला भारतीय फिल्मों में सबसे ज्यादा नजर आने वाला तत्त्व है.वैसे यह गांधी का देश है और बतौर गांधीजी अगर कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल बढ़ा दो.लेकिन ये किताबी बातें हैं और किताबों में ही अच्छी लगती हैं क्योंकि वास्तविकता हो यह है कि अपने देश में हर कोई हमेशा ईंट का जवाब पत्थर से देने की फ़िराक में लगा रहता है.बदला लेने के भी एक-से-एक तरीके हैं उनमें से कुछ आपकी शान में पेश करने की अनुमति चाहूँगा.यदि आपका किसी से एक पुश्त का झगड़ा हो तो उसे मुकदमे में फँसा देने से आपका बदला पूरा हो जायेगा.यदि दुश्मनी दो पुश्तों की हो तो उसे साहित्यकार बना दीजिये वह एक साथ पागल और भिखारी दोनों बन जायेगा.और यदि दुश्मनी इससे भी ज्यादा पुरानी हो यानी तीन पुश्तों की हो तो उसे चुनाव में खड़ा करवा दीजिये लेकिन सावधानी भी रखिये कि वह किसी भी हालत में चुनाव जीतने न पाए.लेकिन यू.जी.सी.ने हमारे साथ जो व्यवहार किया है वैसा तो तभी किया जाता है जब शत्रुता पुश्तों की नहीं बल्कि जन्मों की हो.यू.जी.सी. ने इस बार की नेट की परीक्षा के लिए परीक्षा शुल्क के रूप में हमसे स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया का बैंक चालान माँगा है.इससे तो कहीं अच्छा होता कि वह हमसे चांद मांग लेती.यूं तो हम जहाँ तक हो सके स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की हाजीपुर मुख्य शाखा को ओर रूख करने से बचते हैं लेकिन जब यू.जी.सी. ने एस.बी.आई. का चालान मांग ही दिया था तो हम तो चाहकर भी वहां जाने से नहीं बच सकते थे.आप सोंच रहे होंगे कि बैंक कहीं भूतिया जगह पर स्थित तो नहीं है कि मैं वहां जाने से डरता हूँ तो आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि वह कोई भूतिया जगह नहीं है बल्कि मैं वहां इसलिए नहीं जाना चाहता हूँ क्योंकि वह अपनी अव्यवस्था के लिए कुख्यात है बल्कि हमारा वश चले तो मैं सारे शब्दकोशों में अव्यवस्था का अर्थ एस.बी.आई., हाजीपुर मुख्य शाखा कर दूं.तो मैं हनुमान चालीसा का मन-ही-मन पाठ करता हुआ बैंक में घुसा.घुसते ही एक अजीब-से उमस महसूस हुई.दो पंक्तियों में कुछ-कुछ देर खड़ा होने के बाद पता चला कि इन काउंटरों पर चालान नहीं बनता.मैनेजर से मिलने पर बताया गया कि जेनेरल लाइन में लगना पड़ेगा.अब आपको मैं जेनेरल लाइन की क्या महिमा सुनाऊँ!वहां दो पंक्तियाँ जेनेरल थीं अजी लाइन क्या थीं हनुमानजी की पूंछ थीं.एक-एक ग्राहक को निबटाने में बैंककर्मी आधा-आधा घंटा का वक़्त ले रहे थे.लाइन में लगे लोंगों के चेहरों पर घोर चिंता के भाव थे मानों उनके किसी प्रिय का देहावसान हो गया हो.हर कोई चिंतित था कि कहीं उसका नंबर आने से पहले कहीं भोजन के लिए मध्यांतर न हो जाए.बीच-बीच में किनारे से घुसपैठिये भी सक्रिय हो जा रहे थे जिन्हें रोकने पर अंतहीन बहस का सिलसिला शुरू हो जाता था जो एक-दूसरे को देख लेने की बात पर जाकर समाप्त होता.जब मेरी बारी आई तो एक वर्दीधारी सैप का जवान जबरन आगे घुसने की कोशिश करने लगा.मेरे रोकने पर वह दिखा देने की बात करने लगा.मैंने जब कहा कि दिखा भी दे भाई क्या दिखायेगा तो वह एक अन्य साथी को बुला लाया और एक डंडा भी ले आया.लेकिन मेरे और भी आक्रामक हो जाने और जनविरोध की स्थिति उत्पन्न हो जाने के बाद वह मनुहार की भाषा बोलने लगा.वैसे मैं तो उसकी राईफल की गोली तक झेलने का मन बना चुका था.किसी तरह हम एस.बी.आई. से जीवित अवस्था में बाहर आ सके.अब आप समझ गए होंगे कि यू.जी.सी.ने स्टेट बैंक का चालान मांग कर हमारे साथ एक जनम की नहीं बल्कि कई जन्मों की दुश्मनी निकाली है.अगर उनके पास थोड़ी-सी भी दया-धरम बची हुई है तो मैं उम्मीद करता हूँ कि अगली बार यू.जी.सी. पोस्टल ऑर्डर या फ़िर बैंक ड्राफ्ट मांगेगी वो भी किसी भी बैंक का नहीं तो फ़िर से एस.बी.आई., हाजीपुर की मुख्य शाखा में हमें जाना पड़ेगा जहाँ जाने की तो गारंटी है लेकिन जहाँ से सही-सलामत लौटने की कोई गारंटी नहीं है.

2 टिप्‍पणियां:

manu ने कहा…

Lagbhag sabhi sarkaari daftaro ka yahi haal hai.

manu ने कहा…

SAME SITUATION IN EACH GOVERNMENT OFFICE.