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सोमवार, 1 अप्रैल 2013
आज भी प्रासंगिक हैं भवानी प्रसाद मिश्र
मित्रों,हम हिन्दीभाषियों को अपनी भाषा और अपने लेखकों-कवियों से कितना प्रेम है कहने की जरूरत नहीं है। हम एक तरफ तो हिंदी की बदहाली का रोना रोते हैं वहीं दूसरी ओर अपने बच्चों को सिर्फ अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने भेजते हैं। आज हममे से कितने लोगों को याद होगा या पता होगा कि इस साल हमारे किन-किन लेखकों-कवियों की जन्मशताब्दी है? भले ही हमें याद हो या नहीं हो लेकिन सच तो यही है कि अगर अभी महाकवि भवानी प्रसाद मिश्र जीवित होते तो सौ साल के होते। आज से 100 साल पहले 29 मार्च,1913 को भारत का हृदय कहे जानेवाले मध्य प्रदेश में सतपुड़ा के घने जंगलों के बीच अपनी धुन के पक्के एक महाकवि का जन्म हुआ था। माता-पिता ने उसको माता भवानी का आशीर्वाद मानते हुए नाम रखा भवानी प्रसाद अर्थात् भवानी प्रसाद मिश्र। बड़ा होकर यही बच्चा कवि बना,महाकवि। उसकी भाषा जनभाषा के अत्यंत निकट थी और उसके शब्द उसकी ही तरह सरल होते थे लेकिन उतने ही अर्थपूर्ण। वो जिस तरह सोंचता था उसी तरह से बोलता था और जिस तरह से बोलता था उसी तरह से लिखता था और ताल ठोंककर लिखता था। उसकी अपने समकालीन कवियों को खुली चुनौती थी-
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