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मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

चीन,नेहरु और माओवादी बुद्धिजीवी

मित्रों,अभी कल ही चीन ने भारत को सलाह दी है कि भारत अपने विकास पर ध्यान दे और चीन क्या कर रहा है इस बात से पूरी तरह से आँखें बंद कर ले. कुछ इसी तरह की सलाह कभी नेहरु को भी दी गयी थी और नेहरु ने आँख मूंदकर इसे मान भी लिया था. परिणाम यह हुआ कि भारत को शर्मनाक पराजय का सामना तो करना ही पड़ा हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन से भी हमेशा के लिए हाथ धोना पड़ा. खता एक व्यक्ति ने की लेकिन सजा पूरे देश को मिली और आज भी मिल रही है.
मित्रों,शायद चीन मोदी को भी नेहरु और आज के भारत को तब का भारत समझ रहा है. सच्चाई तो यह है कि आज अगर मोदी नेहरु बनना भी चाहेंगे तो हम उनको कदापि बनने नहीं देंगे. वैसे मुझे नहीं लगता कि मोदी नेहरु बनने की सपने में भी सोंच सकते हैं. वैसे चीन की तिलमिलाहट यह दर्शाती है कि वो भारत की सैन्य तैयारियों से परेशान है और यह भी दर्शाती है कि इस समय मोदी वही सबकुछ कर रहे हैं जो तब नेहरु को करना चाहिए था.
मित्रों,इन दिनों तिलमिलाए हुए वे लोग भी हैं जो खुद को चीन का मानस-पुत्र मानते हैं. माओ ऐसे बुद्धिजीवियों के खून में बहता है. इनको शहरी नक्सली भी कहा जा सकता है. जब-जब भारत के सुरक्षा-बलों पर हमला होता है तो ये बाग़-बाग़ हो उठते हैं.
मित्रों,मैं हमेशा से अपने ब्लॉग के माध्यम से कहता रहा हूँ कि देश के लिए सीमापार आतंकवाद से भी बड़ी समस्या माओवादी हिंसा है. क्या यह सिर्फ एक संयोग-मात्र है कि कल ही माओ के देश ने भारत को सलाहरुपी धमकी दी और कल ही माओवादी हमला हो गया? संयोग तो तमिलनाडु के हवाईयात्री किसानों का प्रदर्शन भी नहीं था. आज चीन एक आर्थिक महाशक्ति है. उसके पास हमारे देश के जयचंदों और मान सिंहों को खरीदने के लिए अपार पैसा है और हमारे आज के भारत में सबसे सस्ता अगर कुछ मिलता है तो वो ईमान है. पूरी-की-पूरी पिछली सरकार ही गद्दारों की थी. वैसे गद्दार आपको मीडिया में भी खूब मिलेंगे,एक को ढूंढो तो हजार. विश्वविद्यालयों में भी मिलेंगे किस डे और बीफ डे मनाते हुए. एनजीओ खोलकर बैठे हुए भी मिलेंगे. इनका मानना है कि रूपये पर कहाँ लिखा होता है कि यह देश को बेचकर कमाया गया है. मोदी सरकार को चाहिए कि इन घुनों की संपत्तियों की गहराई से जाँच करवाए जिससे इनकी समझ में आ जाए कि हर पैसे पर लिखा होता है कि यह पैसा खून-पसीने की कमाई है और यह पैसा देश और ईमान को बेचकर कमाया गया है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि १९६२ में भी कई बुद्धिजीवी ऐसे थे जिन्होंने चीन के भारत पर हमले को उचित माना था.
मित्रों,भारत सरकार और भारत को यह समझना होगा कि जब तक इन शहरी माओवादियों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती जंगल में छिपे माओवादियों की कमर टूटनी मुश्किल है. माओवाद की जड़ जंगल में नहीं बल्कि जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में है, नकली किसान आन्दोलन को बहुत ही क्रान्तिकारी साबित करनेवाले टीवी चैनलों में है,कविता कृष्णन जैसे शिक्षकों,अरुंधती जैसे लेखकों,केजरीवाल जैसे नेताओं के दिमाग में है. जड़ पर प्रहार होगा तो पेड़ खुद ही सूख जाएगा.

रविवार, 26 जून 2016

चीन,भारत,आपी-पापी और हम

मित्रों,एशिया के साथ-साथ दुनिया भी इस समय संक्रमण-काल से गुजर रही है। इस समय दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है। एक का नेतृत्व अमेरिका कर रहा है,दूसरी तरफ रूस है और तीसरी तरफ चीन-पाकिस्तान और उत्तर कोरिया। हमने हाल में भारत के मुद्दे पर एनएसजी में जो खींचातानी देखी उसके लिए इन तीनों ध्रुवों के बीच चल रहा शीत-युद्ध जिम्मेदार है।
मित्रों.जहाँ तक भारत का सवाल है तो भारत के पास अमेरिका से नजदीकी बढ़ाने के सिवा और कोई विकल्प है ही नहीं। भारत चीन की तरफ जा नहीं सकता क्योंकि चीन न तो कभी भारत का मित्र था और न ही कभी होगा। बल्कि वो भारत का चिरशत्रु था,है और रहेगा। रूस चीन के खिलाफ एक सीमा से आगे 1962 में भी नहीं गया था और अब भी नहीं जा सकता। तो फिर भारत करे तो क्या करे वो भी ऐसी स्थिति में जब दशकों से भारत की बर्बादी के सपने देखनेवाला चीन अब एक महाशक्ति बन चुका है और भारत को चारों तरफ से घेरकर अभिमन्यु की तरह तबाह कर देना चाहता है?
मित्रों,वैसे अगर हम देखें तो निरंतर आक्रामक होते चीन से निबटने के लिए अमेरिका के पास भी भारत से मित्रता बढ़ाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। जापान चीन के मुकाबले क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों ही दृष्टिकोणों से काफी छोटा है। चीन भी अब कोई 1930-40 वाला चीन नहीं रहा कि जिसको जिस इलाके पर मन हुआ कब्जा कर लिया। ताईवान,वियतनाम आदि चीन के पड़ोसी देश भी अकेले आज के चीन के आगे नहीं ठहर सकते। सिर्फ और सिर्फ भारत ही ऐसा है जिसकी अगर सहायता की जाए तो चीन को हर मामले हर तरह से ईट का जवाब पत्थर से दे सकता है। जिन लोगों को भ्रम है वे भ्रम में रहें लेकिन सच्चाई तो यही है कि आज नहीं तो कल भारत को चीन और पाकिस्तान दोनों से एक साथ सैन्य संघर्ष का सामना करना पड़ेगा। जो लोग आज प्रत्येक आतंकी हमले के बाद कहते हैं कि भारत सीमापार स्थित आतंकी शिविरों पर हमले क्यों नहीं करता वे भूल जाते हैं कि इस समय चीन कितनी आक्रामकता के साथ पाकिस्तान के साथ खड़ा है। इसलिए पहले हमें अपने देश को आर्थिक और सैनिक दोनों क्षेत्रों में इतना सक्षम बनाना होगा कि पाकिस्तान तो क्या चीन को भी हमारी तरफ आँख उठाकर देखने में लाखों बार सोंचना पड़े।
मित्रों,मैंने ओबामा की भारत-यात्रा के समय अपने एक आलेख के माध्यम से कहा था कि भारत को अमेरिकी राष्ट्रपति की इस बात को लेकर किसी भुलावे में नहीं आना चाहिए कि भारत एक महाशक्ति बन चुका है। सच्चाई तो यह कि हमें आर्थिक और सैनिक मामलों में चीन की बराबरी में आने में अभी कम-से-कम 15-बीस साल लगेंगे वो भी तब जब भारत की जीडीपी वर्तमान गति से बढ़ती रहे और एफडीआई का भारत में प्रवाह लगातार त्वरित गति से बढ़ता रहे।
मित्रों,जो आपिए और पुराने पापिए यानि छद्मधर्मनिरपेक्ष एनएसजी का सदस्य बनने में भारत की नाकामी पर ताली पीट रहे हैं और जश्न मना रहे हैं उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि एनएसजी का सदस्य भारत को बनना था न कि नरेंद्र मोदी को। कल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में अगर स्थायी सदस्यता मिलेगी तो वो सवा सौ करोड़ जनसंख्यावाले भारत को मिलेगी न कि नरेंद्र मोदी को। नरेंद्र मोदी तो आज हैं कल पीएम तो क्या धरती पर भी नहीं रहेंगे। उनकी कोशिशों का स्थायी लाभ भारत को मिलेगा,भारतवासियों को मिलेगा,भारतवासियों का सीना 56 ईंच का होगा,सिर गर्वोन्नत होगा और यह हमेशा के लिए होगा। नाकामी के लिए मोदी की आलोचना करके लोग क्या साबित करना चाहते हैं? अरे भाई,गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग में! जिसने कोशिश की वही तो सफल-असफल होगा? क्या इससे पहले किसी ने कभी एनएसजी का नाम भी सुना था? 48 में से 42 देश हमारे समर्थन में थे फिर हम असफल कैसे हैं? संगठन में सर्वसम्मति की जगह अगर वोटिंग का नियम होता तो हम विजयी होते। साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि NSG में असफलता के बावजूद भारत MTCR का सदस्य बनने जा रहा है जबकि चीन इसका सदस्य बनने के लिए 2004 से ही असफल प्रयास कर रहा है। अब अगर भारत चाहे तो चीन को MTCR का सदस्य बनने ही नहीं दे क्योंकि वहाँ भी सर्वसम्मति से निर्णय लेने का नियम है। जहाँ तक चीन को भारत के कदमों में झुकाने का सवाल है तो इसके लिए मोदी सरकार को प्रयास करने की जरुरत ही कहां है? वो काम तो हमलोग भी कर सकते हैं बस आज से अभी से हमें प्रण लेना होगा कि चाहे लगभग मुफ्त में ही क्यों न मिले हम चीन में बने सामानों को न तो खरीदेंगे और न ही उसका इस्तेमाल ही करेंगे।