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रविवार, 24 फ़रवरी 2013
जबर्दस्ती की यौन-कुंठा
मित्रों,कई साल हुए उन दिनों मैं पटना,हिन्दुस्तान में कार्यरत था। बड़े मस्ती भरे दिन थे। उन दिनों मुझ पर हर पल बड़े-बड़े पत्रकारों से परिचय करने का जुनून सवार रहता था। उन्हीं दिनों मैं एक दिन दैनिक ****, पटना गया था एक पांडेजी से मिलने। पांडेजी उस अखबार में वरिष्ठ पद पर थे। बड़ी ही गर्मजोशी से उन्होंने मेरा स्वागत किया। उस समय वे चार-पाँच सहकर्मियों के साथ बैठे थे जिनमें से मैं किसी को भी नहीं पहचानता था। मैंने उनसे पत्रकारिता जगत की दशा और दिशा पर चर्चा छेड़ी लेकिन वे लगे नॉन स्टॉप नॉन भेज चुटकुले सुनाने। मैं पूर्णतया भेजीटेरियन हूँ भोजन से भी और बातों से भी परन्तु उनका तो प्रत्येक वाक्य शिश्न से शुरू होता था और योनि पर समाप्त। वे बार-बार न जाने क्यों अपनी नौकरानी की देहयष्टि का अश्लील वर्णन करते। उनका तो यहाँ तक दावा था कि वे उसके साथ संभोग भी करते हैं। मैं स्तब्ध था और अपने-आपको फँसा हुआ पा रहा था। कोई एक घंटा किसी तरह काटकर मैं वहाँ से भागा और फिर कभी उनसे मिलने की गुस्ताखी नहीं की। बाद में पता चला कि पांडेजी को अपने लिं* के आकार पर बड़ा अभिमान है और इसलिए उनके सहकर्मी उनकी अनुपस्थिति में उनको *डाधिपति कहकर बुलाते हैं। पांडेजी अधेड़ थे यही कोई 50-55 साल के और राम जी की देनी से शादी-शुदा और बाल-बच्चेदार भी थे परन्तु पटना में रहते थे अकेले ही।
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