सोमवार, 16 जुलाई 2012

बच के रहना रे बाबा

मित्रों,ठगने या फुसलाने की क्रिया या प्रथा कदाचित उतनी ही पुरानी है जितनी कि मानव सभ्यता.शुरुआत में यह व्यक्तिगत कर्म था परन्तु बाद में इसने संस्थागत स्वरुप ग्रहण कर लिया.मध्यकाल में ठगों की एक जाति का भी जन्म हुआ जिसका दमन लॉर्ड विलियम वेंटिंक के समय १८३० के दशक में जून सुलिमैन ने किया.तब से ठगी मजबूरन व्यक्तिगत कर्म बनी हुई थी.वो कहते हैं न कि कुत्ते का भी वक़्त आता है.धीरे-धीरे ही सही पर वक़्त ने करवट बदली और पूरी दुनिया एक विश्वग्राम में परिवर्तित हो गयी.इसका अतिउर्वर मस्तिष्कवाले ठगों ने भी फायदा उठाया और अब ठगी तकनीक आधारित बिना किसी पूँजीगत लागत के लाभ-ही-लाभ देनेवाली संस्थागत पेशा बनकर उभरी है.
             मित्रों,आपने ई-मेल खोला नहीं कि बिना मांगे दहेज़ देनेवालों के सन्देश प्राप्त होने लगते हैं.कोई सन्देश कथित रूप से कोका कोला कंपनी की ओर से आया हुआ होता है तो कोई सन्देश संयुक्त राष्ट्र संघ विकास कार्यक्रम की ओर से.कोई बिना टिकट ख़रीदे ही दस लाख पौंड की लॉटरी आपके नाम निकलने की सूचना देता है तो कोई चुपके से हमारे जीवन की सबसे बड़ी घोषणा करता है कि आपको संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की ओर से दक्षिण एशिया में लोगों के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने की योजना के तहत 9 लाख पौंड दिया जा रहा है.गजब की योजना है भाई जिसके बारे में न तो कभी पढ़ा गया और न ही सुना ही गया.साथ में एक फॉर्म भी संलग्न होता है जिसके माध्यम से आपसे आपका नाम,उम्र,पेशा,मोबाईल नंबर,लिंग और पता पूछा जाता है.अगर आपने गलती से भी जवाब दे दिया तो फिर आपको पहले तो ई-मेल द्वारा ही एक एकाउंट नंबर देकर उसमें कस्टम ड्यूटी या किसी और चीज के नाम पर कुछ हजार रूपये डालने के लिए कहा जाता है और अगर आपने पैसा डाल दिया तो फिर उनसे संपर्क करते रहिए और खुद को और उस मनहूस घडी को कोसते रहिए जब आप लालच में आ गए थे.न तो आपकी उनसे बात ही हो पाती है और न ही आपको करोड़ों रूपये का कथित;सपनो से सुन्दर ड्राफ्ट ही कभी प्राप्त हो पाता है.
                      मित्रों,अब इन साईबर ठगों ने अपनी रणनीति बदल ली है.अब वे ई-मेल द्वारा विश्वास में लेने के बाद मोबाईल से फोन भी करते हैं और एक ब्रिटिश लहजे में अंग्रेजी बोलनेवाले भारतीय या यूरोपियन से फोन करवाते हैं जिससे शिकार पर पूरा विश्वास जमाया जा सके.      
           मित्रों,यूं तो मुझे मेरे brajvaishali@gmail.com पर हमेशा इस तरह का लालच दिया जाता रहा है कभी कोका कोला कम्पनी का नाम लेकर तो कभी पेप्सी कोला कम्पनी या अन्य प्रतिष्ठित कम्पनियों का नाम लेकर और मैं इस तरह के ई-मेलों को पूरी तरह से नजरंदाज भी करता रहा हूँ लेकिन जब संयुक्त राष्ट्र संघ की एक सर्वज्ञात संस्था संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम अर्थात UNDP के नाम से पिछले सप्ताह ७ जुलाई को एक ई-मेल मिला तो मैं एकबारगी अविश्वास नहीं कर पाया और ई-मेल का जवाब दे दिया.ई-मेल में कुछ भी नहीं लिखा गया था लेकिन संलग्नक कुछ इस प्रकार था-
 
United Nations Development Programme (UNDP)
Department of Humanitarian Affairs / Information Centre
Millbank Tower, 21st Floor
21-24 Millbank
London SW1P 4QH
United Kingdom
Dear Sir / Madam,
This is a very big congratulation and to inform you that we
have selected you as an individual to stand for the 2012 UNDP
Humanitarian Donation in your locality. We collected email
address from world databases for a random pick up, to choose
some few individual and charities home, for wealth distribution
in urban area.
Please do not take this notice as a junk because this might be
a life time opportunity, so we advice you to accept this
donation with good faith because your email address has been
selected and you will be receiving a donation of £900,000 GBP
(Nine Hundred Thousand Great British Pound) as one of this
year lucky beneficiary.
This amount is been giving to you as a lucky recipient to
enhance your personal life, so congratulation once again.
YOU ARE TO FILL THE CLAIMS VERIFICATION FORM TO
FACILITATE THE REMITTANCE OF YOUR FUND.
Full Name:-----------------------------
Forwarding Addresses:---------------
City/State:----------------------------
Country:-------------------------------
Marital Status:------------------------
Sex:----------------------------------
Date of birth:------------------------
Occupation:----------------------------
Tel/Mobil:-----------------------------
Secure Email:--------------------------
Please send your responds to Dr. Conklin Myers via email at:
(undp173@9.cn) with your complete particulars and if possible
also send your id proves for recognition.
Best Regards,
Asli Parker
Regional Resettlement Director.United Nations Development Programme, (UNDP)
 

इसके बाद 12 जून को जवाबी ई-मेल में बताया गया कि एक व्यक्ति लन्दन से आपका ड्राफ्ट लेकर हवाई जहाज से रवाना होने जा रहा है.कल वह भारत पहुंचकर आपसे संपर्क कर लेगा-


United Nations Development Programme (UNDP)
Department of Humanitarian Affairs / 
Information Centre
Millbank Tower, 21st Floor
21-24 Millbank
London SW1P 4QH
United Kingdom

 
Dear Braj kishore Singh,
Sequel to the decision from the 2012 UNDP online grant committee, we hereby wish to inform you that your demand draft will be dispatch Today the 12th of July 2012. Because it’s our obligation to make sure that your entitlement gets to you without any problem or delay; so a senior officer from the office for the Coordination of Humanitarian Affairs (OCHA) has been assigned to help deliver your parcel containing a draft payment of £900,000.00 Great British Pound Sterling from the United Nation Online Grant Donation Sponsored by World Bank.
All information most be kept confidential until you have receive your parcel and you are advice to take guidelines from Mr. Patrick Moses.



FIND MR. PATRICK MOSES FLIGHT INFORMATION BELOW:
Departure Date /Time: 12th July 2012 -11:45:00 PM (UK TIME)
Arrival Date /Time: 13th 
July 2012 -9:15:00 am (INDIA TIME)


Please remember that the objective of this donation to beneficiaries is to make a notable change in the standard of living around the global before 2020 and also note that you have been chosen to receive this donation just once, which means our yearly donation might not get to you again so we advise you to spend your Money wisely. Email us or call this number + (44) 701-006-7047 if you did not receive your demand draft after 2 working days. 

Note: You will only be responsible for the India Governmental Tax / Custom Clearance which is 19,800 India rupees for the clearance of your consignment at the point of entry. Account details will be provided to you for this payment once Mr. Patrick Moses arrive India by tomorrow and you are advice to act as instructed to avoid any problem or delay regarding this remittance process.  

We wish you good luck.

Best regards,
Dr. Conklin Myers
Payment Verifications officer.

Kindly allow me to inform you that last year we discovered a huge number of double claims due to beneficiary's informing close friend’s relatives, attorneys and third parties about their donations. As a result, these close friends, relatives, attorneys and third parties tried to claim the donation sum on behalf of the real recipients thereby causing problems for the pay-out bank.
Please be informed that any double claim discovered in the disbursement process will certainly result to the cancellation of that particular donation, making a loss for both the double claimer and the real beneficiary, as it is taken that the real recipient was the informer to the double claimer about the donation. So you are hereby advised to keep your information
                                  
                मित्रों,परसों 13 तारीख को मेरे मोबाईल नंबर 7870256008 पर मोबाइल नंबर +919920313360 से फोन करके कहा गया कि मेरा एक ड्राफ्ट मुम्बई कस्टम कार्यालय में आया हुआ है और अगर मैं 19800 रूपया कस्टम क्लीयरेन्स के लिए जमा कर दूँ तो वे मेरा ड्राफ्ट मुझे भेज देंगे.इसके लिए मुझे एस.एम.एस. द्वारा भारतीय कस्टम के बदले किसी नदीम करीम के ICICI बैंक की मलाड (w) शाखा का एक अकाउंट न. 015801541606 में उक्त राशि को जमा करने के लिए कहा गया.एस.एम.एस. rohita_indiacustom@consultant.com के नाम से किया गया था.फोन करनेवाले दो व्यक्ति थे एक पुरुष और एक महिला.पुरुष धाराप्रवाह अंग्रेजी अंग्रेजी लहजे में बोलता था और महिला उतनी ही अच्छी हिंदी बोल ले रही थी.मुझे पैसा तो जमा करना था नहीं क्योंकि मेरे पास किसी तरह का लिखित या कागजी सबूत नहीं था कि मुझे UNDP द्वारा 9 लाख   पौंड जैसी बड़ी राशि बेवजह प्रदान की जा रही है.इसलिए मैंने पैसा जमा नहीं किया.लेकिन बार-बार यह जरूर कहता रहा कि मैं पैसा जमा करने जा रहा हूँ.फलतः मेरे मोबाईल पर +919920313360 नंबर से फोन करके तीन-तीन बार तगादा करके जल्द-से-जल्द पैसा जमा करने के लिए कहा गया.तीनों बार फोन पुरुष ने किया था.
         मित्रों,कल फिर से एक ई-मेल उसी पते से यानि UNDP से प्राप्त हुआ है जिसमें मुझे यह बहुमूल्य और दिलतोड़ जानकारी दी गयी है कि उक्त व्यक्ति को ड्राफ्ट लेकर मुम्बई से वापस लन्दन जाने के लिए कह दिया गया है.साथ ही मुझसे पैसा जमा करने के लिए पुनर्विचार करने के लिए भी कहा गया है-
United Nations Development Programme (UNDP)
Department of Humanitarian Affairs / 
Information Centre
Millbank Tower, 21st Floor
21-24 Millbank
London SW1P 4QH
United Kingdom

Dear Beneficiary, 

 We have been made to understand that you were not acting as instructed and for that simple reason to avoid unwarranted abuse of this program, we have asked Mr. Patrick Moses to retune back to the United Kingdom by Monday with your Demand Draft since you said will not be responsible for the India Governmental Tax / Custom Clearance which is 19,800 India rupees for the clearance of your parcel at the Custom department.

 You should be very happy that you were selected among beneficiaries to receive this year 2012 UNDP online grant allocation and by now you supposed to be thinking on how to make arrangement to complete your funds remittance process instead of watching your prize go. Well, I will personally like to confirm from you if you are interested to pay for the Custom Clearance Charges to receive this grant or not? Because I don’t want to be responsible for non-remittance of fund to beneficiaries, so please I wait for your timely response to proceed further. 

Thanks and have a lovely weekend. 

Best regards,
Dr. Conklin Myers
Payment Verifications officer.
       मित्रों,बंसी (कांटे) में आटा या केंचुए का चारा लगाकर मछली तो मैंने भी बचपन में पकड़ी है लेकिन लालच देकर साबुत आदमी को इस तरह फांसते हुए पहली बार देख रहा हूँ वो भी संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी प्रतिष्ठित संस्था के नाम पर.आप सभी पाठकों से भी मैं करबद्ध निवेदन करता  हूँ कि आपलोग भी इन अंतर्राष्ट्रीय ठगों से सावधान रहें.20000 रू. की रकम हम भारतीयों के लिए बहुत बड़ी होती है जबकि हम भारत सरकार की मूर्खतापूर्ण महाकृपा से सिर्फ 32 रू. प्रतिदिन में ही अमीरों की देवदुर्लभ श्रेणी में आ जा रहे हैं.इसलिए आप अपनी सभी छहों इन्द्रियों को खुला रखिए,सचेत रहिए,सावधानी रखिए जिससे कोई लुटेरा दूर बैठा-बैठा आपकी गाढ़ी कमाई पर डाका नहीं डाल सके.साथ ही मैं मुम्बई पुलिस से मोबाईल न. +919920313360 की जाँच कर शीघ्रतापूर्वक कार्रवाई करने की भी प्रार्थना करता हूँ और ICICI से उसकी मलाड (w) शाखा के खाता न.015801541606 में जमा सारी राशि को जब्त कर इसके मालिक नदीम करीम के विरूद्ध धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज करवाने और चलाने का भी अनुरोध करता हूँ जिससे भविष्य में इसका इस्तेमाल लोगों को ठगने में नहीं किया जा सके.

सोमवार, 9 जुलाई 2012

धरती अब भी घूम रही है


मित्रों,सौभाग्यवश बिहार सरकार में वरिष्ठ मंत्री रमई राम की क्रूरता के मारे अनंदू पासवान की जान बच गयी है.कई सप्ताह तक मुजफ्फरपुर के माँ जानकी अस्पताल में बंधक बने रहने के बाद जिला पार्षद मुक्तेश्वर प्रसाद सिंह के प्रयासों से वह अब घर आ गया है.लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इसके साथ ही उसकी समस्त चिंताओं का अंत हो गया हो.जहाँ पहले चिंता जान की थी अब चिंता अपने और अपने परिवार के पेट भरने की है.दुर्घटना ने शरीर को लगभग बेकार करके रख दिया है ऐसे में मेहनत-मजदूरी तो होने से रही.उसका पूरा परिवार इस चिंता से मरा जा रहा है कि अब कैसे पहाड़ जैसी जिंदगी कटेगी?सरकार का सहारा भी मिल सकता था लेकिन अनंदू तो सरकार का (मंत्री रमई राम) ही मारा है इसलिए उसे शायद ही सरकारी मदद मिले.
                 मित्रों,अगर अनंदू को सुशासन से मदद मिलनी ही होती या फिर सुशासन को उसकी मदद करनी ही होती तो गाय का दूध पीने से खुद को तेज बुद्धि का माननेवाले (ऐसा दावा उन्होंने आज ९ जुलाई के अख़बार में खुद ही किया है) बिहार के राजस्व और भूमि सुधार मंत्री रमई राम उसे मरने के लिए उसके घर पर नहीं फेंकवा देते.सड़क पर घायल पड़े व्यक्ति को भी लोग अपना मानवीय फर्ज समझकर अस्पताल तक पहुंचा देते हैं फिर अनंदू को तो मंत्री जी के आवास में उनकी उसी गाय ने मारकर घायल कर दिया था जिसका दूध पीकर वे अपनी बुद्धि को धारदार बना रहे हैं.इस तरह तो किसी घायल और लाचार की मदद नहीं की जाती अलबत्ता उनका यह कर्म हत्या की श्रेणी में जरूर आ सकता है.हत्या भी उन्होंने सिर्फ एक गरीब मानव की ही नहीं की है वरन मानवता और इंसानियत की भी की है अथवा हत्या का प्रयास तो किया ही है वो भी गैरईरादतन तो हरगिज नहीं.
                मित्रों,पहली गलती करने के बाद भी सरकार को अनंदू की मदद ही करनी थी तो इसके लिए और भी अवसर मौजूद थे.सरकार चाहती या मंत्री रमई बाबू चाहते तो अपने खर्चे पर उसके उत्तम ईलाज की व्यवस्था करवा सकते थे लेकिन ऐसा भी नहीं हो सका या फिर नहीं किया गया.अनंदू अस्पताल का भारी-भरकम बिल नहीं चुका सकने के कारण कई सप्ताह तक बेवजह अस्पताल में बंधक बना पड़ा रहा.बिल भी कोई कम नहीं था-पूरा डेढ़ लाख रूपया.इतना पैसा तो बेचारे ने कभी देखा भी नहीं था;सिर्फ सुना था;फिर लाता कहाँ से?सरकार या मंत्रीजी रमई बाबू चाहते तो उस समय भी रकम चुकाकर अपने पापों का प्रायश्चित कर सकते थे लेकिन उन्होंने तब भी ऐसा नहीं किया.अंत में प्रशासन ने हस्तक्षेप कर उसे जबरन रात के दो बजे अस्पताल से छुड़ा लिया और घर पहुंचा दिया.इस प्रकार दयालुता और सदाशयता का बेवजह दंड भुगतना पड़ा माँ जानकी अस्पताल को.अब भविष्य में शायद ही यह अस्पताल किसी फटी जेब वाले गरीब को अपने यहाँ भर्ती करे.
               मित्रों,रमई बाबू आज भी मंत्री हैं और आज ही (९ जुलाई को) उन्होंने लालू को अपनी तेज और प्रखर बुद्धि से पटखनी देने का दावा भी किया है.उनकी तेज बुद्धि को भगवान और भी तेज करे (अगर वह होता है तो) परन्तु क्या वे कभी इसका सही इस्तेमाल भी करेंगे?बुद्धि तो एक ईश्वरीय देन है और उसका सदुपयोग या दुरुपयोग करना उसके स्वामी के विवेक पर निर्भर करता है और मैं नहीं समझता कि अपने किसी मरणासन्न और लहू-लुहान गरीब नौकर को अस्पताल भेजने के बदले उसके झोपड़ीनुमा-अभावग्रस्त घर पर फेंकवा देने को किसी भी तरह से बुद्धि का सदुपयोग करना कहा जाना चाहिए,अलबत्ता यह उसका दुरुपयोग जरूर है.
           मित्रों,मैं यह नारा लगभग प्रत्येक जुलूस-प्रदर्शन में सुनता रहा हूँ-"खून तो खून है बहेगा तो जम जाएगा;जुल्म तो जुल्म है बढ़ेगा तो मिट जाएगा."परन्तु क्या ऐसा सचमुच हो रह है?क्या जुल्म जब इन्तहां (अंतिम सीमा) तक पहुँच जाता है तो सचमुच जुल्म करनेवाले समाप्त हो जाते हैं?जुल्म की अंतिम सीमा क्या है या फिर उसकी कोई अंतिम सीमा होती भी है?क्या अनंदू पर हुआ जुल्म जुल्म की अंतिम सीमा नहीं है?अगर हाँ तो फिर रमई राम जैसा दानव आज की तारीख में भी क्यों मंत्री बना हुआ है?क्या उनका कृत्य किसी भी तरह से सुशासन को बढ़ावा देने का काम कर रहा है?अगर नहीं तो फिर सुशासन बाबू यानि नीतीश कुमार क्यों उनकी तरफ से धृतराष्ट्र बने हुए हैं?क्यों उन्होंने स्वयं हस्तक्षेप करके अनंदू की मदद नहीं की?क्यों??फिर सेवा-यात्रा निकालने का क्या मतलब है?आखिर कब तक ऐसे ही अनंदू जैसे लाचारों और पेट के मारों का खून जमीन पर बहता रहेगा और बह-बहकर जमता रहेगा और आखिर कब तक इन सब बातों से बेखबर होकर धरती ऐसे ही अपनी धुरी पर घूमती रहेगी?कब तक??कब तक???

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

बूड़ा वंश राजीव का

मित्रों,बहुत दिन नहीं हुए जब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव अपनी चुनावी सभाओं में गरज-गरज कर घोषणाएं करते फिरते थे कि "अब राजा रानी के पेट से पैदा नहीं होता है बल्कि आज का राजा पैदा होता है मतदान-पेटी से".कितनी बड़ी बिडम्बना है कि वही लालू आज सचमुच की रानी के पेट से जन्म लेनेवाले कांग्रेसी युवराज राहुल गाँधी के दिवाने हुए जा रहे हैं.
               मित्रों, यहाँ इस लेख में हमारा उद्देश्य लालू का चरित्र-चित्रण करना कतई नहीं है लेकिन उन्होंने जो कुछ भी कहा था बिलकुल ठीक कहा था.लोकतंत्र का मतलब ही यही होता है कि राजा का जन्म रानी के पेट से नहीं बल्कि मतपेटी (आजकल ई.वी.एम.) से होना चाहिए.रानी के पेट से तो राजा मध्यकाल में अर्थात कथित सामंतवादी युग में जन्म लेता था.परन्तु हमारे आज के भारत में भी जो प्रवृत्तियां उभर रही हैं या जिनका विकास हो भी चुका है उनको हम किसी भी तरह स्वस्थ लोकतान्त्रिक प्रवृत्ति या फिर सामंतवाद से अलग नहीं कह सकते.हमारे अधिकतर नेता आज २१वीं सदी में भी अपने पूर्वजों की राजनैतिक विरासत को संभाल रहे हैं.यह तो विशुद्ध लोकतंत्र नहीं हुआ.आज भारत में लोकतंत्र के होने पर ही प्रश्न-चिन्ह लग रहा है.प्रश्न यह उठ रहा है कि भारत में लोकतंत्र है या सामंतवाद या फिर लोकतंत्र और सामंतवाद का अशुद्ध मिश्रण??
                मित्रों,हमारे नेता बहुत चतुर है.जब वे देखते है कि जनता उनके भ्रष्टाचार और कुशासन से उब चुकी है तो वे चुपके से अपने उत्तराधिकारी को आगे कर देते हैं और जनता भी उनसे यह झूठी उम्मीद पाल लेती है कि चलो बाप बुरा था तो क्या हुआ बेटा कदाचित अच्छा होगा.उसे लगता है कि जब puranon में हिरण्यकश्यप के घर में प्रह्लाद पैदा हो सकता है अथवा फिल्मों में खलनायकों के बेटे-बेटियां भलेमानुष हो सकते है तो बुरे नेताओं के घर में अच्छे संस्कारों वाले नेता क्यों नहीं पैदा हो सकते?vah यह नहीं समझ नहीं पा रही है कि बबूल के पेड़ में आम कहाँ से फलेगा?और इस तरह वे ठगी का शिकार हुई जा रही है बार-बार,बार-बार.
                   मित्रों, कुछ समय पहले तक न जाने क्यों भारतीय जनता के एक हिस्से को राहुल गाँधी में भारत का भविष्य नजर आ रहा था.निहायत स्वप्नदर्शी लेकिन राजनैतिक व्यावहारिकता से पूर्णतया शून्य पिता की मतिमंद संतान होते हुए भी लोग न जाने क्यों और कैसे उन्हें अतिप्रतिभावान समझ बैठे थे.शुरू में जब उन्होंने देश का नेतृत्व नहीं संभाला तो लोगों ने समझा कि पूरी तरह से जवान हो चुके बबुआ जी शायद देश और देश की राजनीति को समझने का प्रयास कर रहे हैं.लम्बे समय से विदेश में जो रह रहे थे.देखते-देखते अब एक दशक बीत चुके हैं और बबुआजी अधेड़ावस्था में भी पहुँच गए हैं लेकिन उनकी राजनैतिक समझ है कि अब भी बालपन में अंटकी हुई है.अब वे चंद्रकांता के क्रूर सिंह तो हैं नहीं कि थोड़ी-सी मेहनत करके जब चाहे बचपन में पहुंचा दो और जब चाहे वापस वर्तमान में ले आओ इसलिए हम देशवासियों के पास सिवाय अंतहीन इन्तजार करने के और कोई उपाय नहीं है.इन्हीं महाशय ने जब पहली बार राजनीति की राहों में अपने सुन्दर पैर उतारे थे तो यह कहते नहीं थकते थे कि अगर किसी नेतापुत्र में नेतृत्व करने की योग्यता है तो उसे राजनीति में क्यों नहीं आना चाहिए?लेकिन हमारी मोटी बुद्धि में आज यह बात नहीं समा पा रही है कि अगर युवराज में सचमुच में शासन की योग्यता और नेतृत्व की क्षमता है तो क्यों नहीं आगे बढ़कर देश की बागडोर को इस मुश्किल घड़ी में संभाल लेते है?कम-से-कम चुके हुए और बेकार सिद्ध हो चुके वयोवृद्ध प्रधानमंत्री का मार्गदर्शन करने की जहमत ही क्यों नहीं उठाते हैं जिससे देश की नैया लगातार गहराते जा रहे भंवर से बाहर निकल सकती?
                   मित्रों,कभी फ़्रांस के एक साधारण परिवार में जन्मे नेपोलियन से उसके कुलीन सहपाठियों ने अकड़ कर पूछा था कि बता तेरा खानदान किससे शुरू होता है तो उसने भी अपने अतिआत्मविश्वास भरे शब्दों में कहा था कि मेरा खानदान मुझसे शुरू होता है.मेरे कहने का तात्पर्य है यह है कि योग्यता खानदान की मोहताज नहीं होती और मात्र अच्छे खानदान का हो जाने मात्र से ही योग्यता नहीं आ जाती.अब नेहरु खानदान को ही लें.जो बात,ईमानदारी और योग्यता नेहरु में थी क्या वो इंदिरा में थी और फिर इन्दिरावाली योग्यता राजीव में थी क्या या फिर राजीव वाली योग्यता राहुल में है क्या?नहीं न??तो फिर खानदानी उत्तराधिकार के प्रति मोह क्यों?दूसरी ओर इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे देश से मूल्यों और विचारधाराओं वाली राजनीति नदीतमा सरस्वती की तरह विलुप्त हो गयी है और सिर्फ एक ही विचारधारा शेष बची है सत्तावाद.न तो समाजवाद और न ही हिन्दुवाद और न ही राष्ट्रवाद.ऐसे में जबकि उत्तराधिकारियों की न तो कोई निश्चित नीति ही होती है और न तो कोई विचारधारा ही तो फिर कैसे उनसे देश और प्रदेश के हालात में किसी तरह के बदलाव लाने की उम्मीद रख सकते हैं?क्या ऐसी कोई उम्मीद मन में पालना बेमानी और बेईमानी नहीं है?
              मित्रों,अभी-अभी उत्तर प्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित और कथित रूप से सामंतवाद विरोधी राजनैतिक परिवार मुलायम सिंह यादव परिवार के युवराज अखिलेश सिंह यादव ने शासन के १०० दिन पूरे किए हैं.जब वे सत्ता में आए थे तो बड़े जोर-शोर से यह दावा किया जा रहा था कि उत्तर प्रदेश में बदलाव अगले १०० दिनों में दिखाई देने लगेगा.१०० दिन तो बीत गए कहाँ है बदलाव?कहाँ है परिवर्तन?जैसा कुशासन मुलायम का था वैसा ही मायावती का और फिर वैसे ही निरंकुश और भ्रष्ट शासन का नेतृत्व कर रहे हैं इन दिनों अखिलेश सिंह यादव.जब उनकी कोई विचारधारा नहीं है और उनके पास कोई योग्यता है ही नहीं तो परिवर्तन क्या सिर्फ गाल बजाने से आ जाएगा?
       मित्रों,राजनैतिक उत्तराधिकार से सम्बंधित एक अलग तरह की और दुखद घटना का भुक्तभोगी मैं खुद भी हूँ.बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में वैशाली जिले के राजापाकर विधानसभा क्षेत्र से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और अपनी ईमानदारी के लिए जाने जानेवाले रामसुंदर दास के पुत्र संजय दास जदयू से खड़े हुए.लोगों ने सोंचा कि शायद यह भी अपने पिता की तरह कर्मठ और ईमानदार होगा.परन्तु आज चुनाव को संपन्न हुए दो साल बीत चुके हैं विधायक जी ने जनता को एक बार भी दर्शन तक नहीं दिया है.अब सुनने में यह भी आ रहा है कि वे उच्च स्तर के मधुप्रेमी हैं और दिन-रात उसी के प्रेम में डूबे रहते हैं सो जनता के बीच जाने का समय ही नहीं निकाल पा रहे हैं.और तो और खुद मेरे ससुराल कुबतपुर में जो उनके ही निर्वाचन क्षेत्र में आता है बिजली नहीं है और वहां के लोग किरासन का दिया जलाकर आदरणीय विधायक जी को ढूंढते फिर रहे हैं.
                  मित्रों,जनता के राजनैतिक उत्तराधिकारियों के प्रति अन्धमोह का ही यह प्रतिफल है कि देश की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस ने हाल ही में कथित रूप से कर्नाटक राज्य में राज्य के दिवंगत दिग्गज कांग्रेसियों के पुत्रों की बैठक बुलाई और उनसे पार्टी हित में अपना-अपना वर्तमान व्यवसाय छोड़कर राजनीति में आने का अनुरोध किया.जबकि देश में पहले से ही ऐसे राजनैतिक उत्तराधिकारियों की लम्बी सूची मौजूद है जिन्होंने राजनीति में मुँह की खाई है.उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजीत सिंह,हरियाणा में तीनों लालों के बेटे,कर्नाटक में देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी,बिहार में अनुग्रह बाबू के बेटे सत्यंद्र बाबू और फिर उनके बेटे और नागालैंड के वर्तमान राज्यपाल निखिल कुमार सिंह,रामानंद तिवारी के बडबोले बेटे शिवानन्द तिवारी वगैरह-वगैरह.
          मित्रों,इस पूरे आलेख में हमने विश्लेषनोपरांत पाया कि लोकतंत्र में सिर्फ योग्यता को ध्यान में रखकर ही वोट डालना बेहतर रहता है न कि उम्मीदवार का खून-खानदान देखकर.लोकतंत्र में राजनैतिक उत्तराधिकार एक मिथक है और इसे यथार्थ समझनेवाले मतदाता ठगे जाते रहे हैं और ठगे जाते रहेंगे.लोकतंत्र का मतलब और उद्देश्य दोनों सबको प्रतिनिधित्व और सबको लाभ पहुँचाना होता है न कि चंद परिवारों को प्रतिनिधित्व और चंद परिवारों को लाभ पहुँचाना.अगर ऐसा होता है तो फिर लोकतंत्र और सामंतवाद में कोई तात्विक अंतर रह ही नहीं जाएगा और ऐसी अवस्था में लोकतंत्र लोकतंत्र नहीं सामंतवाद बनकर रह जाएगा.आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि हमारी सवा अरब आबादी वाले देश को सिर्फ 30000 राजनैतिक घराने चला रहे हैं.क्यों?क्योंकि हम राजनैतिक उत्तराधिकार के मोह में पड़े हुए हैं.इसका यह मतलब बिलकुल भी नहीं है कि राजनीतिज्ञों के बेटो-पोतों को राजनीति में आना ही नहीं चाहिए.जरूर आना चाहिए लेकिन सिर्फ अपनी योग्यता और कामकाज के आधार पर.एक बार में अगर वे असफल सिद्ध होते हैं तो जनता को उनको सीधे बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए.अन्यथा वे बार-बार जनता की अवहेलना करते रहेंगे और फिर चुनाव के समय क्षमा याचना कर लेंगे और इस प्रकार यह सिलसिला बन जाएगा.वे चुनाव जीतते रहेंगे और जनता हारती रहेगी और कबीर की तरह गाती रहेगी-बूड़ा बंस कबीर का उपजे पूत कमाल.                        

शुक्रवार, 29 जून 2012

पोस्टमार्टम के बहाने रक्तपायी तंत्र का पोस्टमार्टम

मित्रों, सरविन्द नाम था उनका। वे मेरे चचेरे साले थे। उम्र ४० के आसपास थी। मोटरसाइकिल चलाना उनका पैशन था। उन्होंने मोटरसाइकिल से ही अपने गाँव कुबतपुर जो महनार के पास है से कोलकाता तक का सफ़र तय किया था और वो भी एक बार नहीं बल्कि कई-कई बार। वो भी बेदाग़, बिना किसी दुर्घटना के। परन्तु २५ अप्रैल,२०१२ को जब वे अपने गाँव कुबतपुर से 15-२० किलोमीटर दूर पानापुर दिलावरपुर के लिए निकले तो फिर घर वापस नहीं लौट सके और पानापुर चौक पर ही भीषण दुर्घटना का शिकार हो गए। घर पर जब उनके घायल होने की सूचना पहुँची तो जैसे पूरे परिवार पर वज्रपात ही हो गया। वे सात-सात भाइयों वाले परिवार के मालिक थे और सबसे कमाऊ पूत भी। प्राथमिक उपचार के बाद प्रखंड अस्पताल,बिदुपुर द्वारा उन्हें पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर कर दिया गया। एम्बुलेंस में भी परिजनों के बीच विचार-विनिमय हुआ कि कहाँ भर्ती करवाना ठीक रहेगा-राजेश्वर नर्सिंग होम में अथवा पीएमसीएच में? उनके दोनों चचेरे भाई रोहित और राहुल उसे राजेश्वर नर्सिंग होम ले जाना चाह रहे थे लेकिन उनके सगे भाई-बहन ही इस प्रस्ताव पर चुप्पी साधे रहे, रहस्यमय चुप्पी। अंततः उन्हें पीएमसीएच के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती करवा दिया गया। तब तक उनके सगे चाचा जय बहादुर सिंह जो बेऊर जेल पटना में डॉक्टर हैं भी  पीएमसीएच आ चुके थे और आ चुके थे उनके पिताजी के फुफेरे भाई पूर्व पुलिस महानिरीक्षक रवीन्द्र कुमार सिंह भी। जोर-शोर से ईलाज चला लेकिन होनी के आगे किसकी चली है? उन्होंने किसी तरह रात काटी परन्तु अगला दिन नहीं कट सका। दोपहर में उन्हें जब अल्ट्रासाऊंड के लिए ले जाया जा रहा था भी उन्होंने बातें करते-करते ही दम तोड़ दिया। तब शायद अपराह्न के ३ बज रहे थे।
                मित्रों, उसके बाद उनकी लाश के साथ जो कुछ भी किया गया वह मानवता को शर्मसार करनेवाला था। लाश को उठाकर पोस्टमार्टम कक्ष के बाहर फेंक दिया गया। तब तक ४ बज चुके थे और पोस्टमार्टम करनेवाला डॉक्टर चम्पत हो चुका था। तभी मुझे मेरी पत्नी विजेता जो इस समय मायके में है,ने फोन पर रोते हुए बताया कि अब सरविन्द भैया इस दुनिया में नहीं है। उसने मुझे एक नंबर दिया और कहा कि रौशन से बात कर लीजिए क्योंकि लाश को बाहर ही छोड़ दिया गया है। यह मेरे लिए दोहरा आघात था। मैं शोकमिश्रित क्रोध से भर गया। मैंने अपने एक मित्र मनोज को फोन मिलाया जो इन दिनों दैनिक जागरण,पटना का आउटपुट हेड है। उसने कुछ करने का आश्वासन दिया लेकिन शायद चाहकर भी कुछ कर नहीं सका। प्रेसवालों के साथ और खासकर डेस्कवालों के साथ अक्सर ऐसा होता है। रौशन का कहना था कि अगर पटना के जिलाधिकारी से पैरवी हो जाए तो पोस्टमार्टम इस समय भी हो सकता है परन्तु मैं तो यह भी नहीं जानता था कि उस समय पटना का डीएम था कौन। इस बीच मैंने स्वास्थ्य मंत्री श्री अश्विनी चौबे से उनके सरकारी मोबाईल पर संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन उनका मोबाईल 'मुन्दहूँ आँख कतहूँ कछु नाहीं' की तर्ज पर बंद था। फिर उनके निवास-स्थान पर फोन मिलाया तब फोन उठानेवाले शख्स से पता चला मंत्रीजी अभी मुख्यमंत्री की सेवा-यात्रा में उनके साथ हैं लेकिन उनका फोन क्यों बंद था उसे पता नहीं था। शायद फोन चालू रखने से जनता की सेवा में बाधा आती होगी। मुझे मंत्री पर काफी गुस्सा आ रहा था कि जब मंत्री ही सरकारी फोन पर बात करना पसंद नहीं करेंगे तो फिर अधकारी क्यों अपने सरकारी नंबर को चालू रखें? तब तक मेरे सगे साले रौशन ने वहाँ उपस्थित दिनेश डोम को ५०० रू. घूस देकर लाश को भीतर फ्रीजर में रखने के लिए राजी कर लिया था। इस तरह सरविन्द भैया की लाश सड़ने और कुत्ते-बिल्लियों-चूहों का ग्रास बनने बच गई। मैंने उसे भी मनोज का मोबाईल नंबर दे दिया और सोने का प्रयास करने लगा लेकिन नींद का आँखों में नामोनिशान भी नहीं था। हालाँकि उनसे मेरा परिचय बहुत पुराना नहीं था। १० महीने पहले ही तो मेरी शादी हुई थी। उनकी पहली पत्नी कई साल पहले आत्महत्या कर चुकी थी। उनके दो बेटे थे जो अब युवावस्था की दहलीज पर दस्तक दे रहे थे। उन्होंने दो-तीन महीने पहले ही दूसरी शादी की थी जिसे हम गन्धर्व-विवाह की श्रेणी में रख सकते हैं। उनकी दूसरी पत्नी भी तब तक जमशेदपुर से कुबतपुर के लिए रवाना हो चुकी थी। 
           मित्रों,अभी सबकुछ जला देने को उद्धत नए दिन का सूरज ठीक से आसमान में दृष्टिगोचर भी नहीं हुआ था कि फिर से मेरा मोबाईल घनघना उठा। रौशन पीएमसीएच में आ चुका था और उसे दिनेश डोम ने बताया था कि पहले पुलिसिया कार्रवाई होगी फिर पोस्टमार्टम संभव हो सकेगा। पुलिस का नाम सुनते ही वह किसी भी आम बिहारी की तरह बुरी तरह से घबरा गया। चूँकि मनोज रातभर प्रेस में जगा रहता है इसलिए मैंने उसे फोन करना मुनासिब तो नहीं समझा फिर भी चूँकि और कोई उपाय था भी नहीं इसलिए उसे फोन करना ही पड़ा। उसकी बातों से मुझे कोई स्पष्टता या निश्चितता का पुट नहीं मिल पाया तब मैंने मामले को सीधे अपने हाथों में लेते हुए "आपरेशन पोस्टमार्टम" की शुरुआत की। आखिर मैं भी तो पत्रकार ही था। भले ही इन दिनों किसी अख़बार या चैनल की गुलामी में नहीं था लेकिन ब्लॉग की आजादी-भरी दुनिया का एक नामचीन हस्ताक्षर तो था ही। मेरे आलेख तब तक पूरे भारत के लगभग सभी हिंदी अख़बारों में प्रकाशित हो चुके थे और भारत के सबसे बड़े अख़बार दैनिक जागरण में तो दर्जनों बार। सबसे पहले मैंने रौशन से पीएमसीएच की दीवार पर उल्लिखित पीरबहोर थाना का नंबर लिया और नंबर मिलाया। मोबाइल किसी ने उठाया नहीं तब लैंडलाइन डायल किया। पहले तो जिस व्यक्ति ने फोन उठाया उसने टालने की भरसक कोशिश की परन्तु मेरी आक्रामकता के चलते टाल नहीं सका। उसने एपी यादव का नंबर दिया और बताया कि इनसे संपर्क किया जाए यही पीएमसीएच जाते हैं। साथ ही उसने पीएमसीएच के फोरेंसिक विभाग के प्रभारी डॉ. आरकेपी सिंह का भी नंबर दिया। मैंने बारी-बारी से दोनों महापुरुषों का नंबर मिलाया। यादव जी ने कहा कि डॉक्टर से काम शुरू करने के लिए कहिए बशर्ते वे आ गए हों;अगरचे वे ११ बजे से पहले तो आएँगे नहीं,हालाँकि उनकी ड्यूटी १० बजे ही शुरू हो जाती है। मैंने उनसे पूछा कि डॉक्टर की छोडिए आप कब तक अस्पताल पहुच रहे हैं? उन्होंने बड़े ही मीठे स्वर में बताया कि वैसे तो उनकी ड्यूटी भी १० बजे ही शुरू होती है लेकिन वे आज मेरी खातिर कुछ पहले ही आ जाएँगे। 
             मित्रों,दूसरे महानुभाव ने फोन नहीं उठाया। तब मैंने इंटरनेट से उस पीएमसीएच के निदेशक डॉ. ओपी चौधरी का नंबर निकाला जिसकी गिनती कभी भारत के सर्वश्रेष्ठ अस्पतालों में होती थी। उनसे जब डॉ. सिंह द्वारा फोन नहीं उठाने की शिकायत की तो उन्होंने यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि फोरेंसिक विभाग उनके अधिकार-क्षेत्र में नहीं आता। तब तक श्री यादव आकर सवा नौ बजे ही अपने कक्ष में विराज चुके थे। मैंने उनको पहले ही मृतक का नाम और पता लिखवा दिया था। मेरे साला रौशन फिर भी वर्दी से डर रहा था और इसलिए उसने मुझे एक बार फिर से यादवजी से बात करने को कहा। तब मैंने यादवजी से फोन पर पूछा कि अगर इजाजत हो तो अपने साले को भीतर भेज दूँ। वे बेचारे शायद पुलिस की नौकरी में अपवाद थे इसलिए बिना कोई पैसा लिए ही कागजी कार्रवाई पूरी कर दी। तब तक पोस्टमार्टम में होनेवाली देरी के लिए पुलिस को दोषी ठहरनेवाला दिनेश डोम चुप्पी लगा गया था। थाना पीरबहोर, यादव जी और डॉ. चौधरी तीनों ने मुझसे पूछा था कि क्या डोम आ गया है। उन्होंने यह भी बताया था कि उसका नाम योगेन्द्र है और वह सुल्तानगंज मजार पर रहता है। अभी तक हम दिनेश को ही पोस्टमार्टम का डोम समझ रहे थे जबकि वह इमरजेंसी वार्ड का डोम था। मैंने डॉ. सिंह को फिर से फोन लगाया। तब तक साढ़े दस बज चुके थे। इस बार उन्होंने फोन उठाया और मुझ पर ही फट पड़े। जनाब को शिकायत थी कि मैं उनको तंग कर रहा था। इसे ही तो कहते है कूदे बैल न कूदे तंगी। बदले में जब मैं भी डबल नाराज हो गया तो उन्होंने आश्वासन दिया कि वे ११ बजे अस्पताल जरूर पहुँच जाएँगे। उनका मानना था कि ११ बजे से ही उनकी ड्यूटी शुरू होती है। उन्होंने भी योगेन्द्र डोम के बारे में पूछा। सौभाग्यवश या दुर्भाग्यवश क्या कहूँ समझ में नहीं आता उस दिन डॉ. सिंह सिर्फ १५ मिनट ही लेट थे और तब तक योगेन्द्र डोम भी आ चुका था। लेकिन अब एक नई समस्या सिर पर थी। योगेन्द्र डोम लाश के पोस्टमार्टम में डॉक्टर की सहायता करने के ऐवज में २००० रू. की रिश्वत मांग रहा था। खैर, किसी तरह एक बार फिर बिना मुझे संज्ञान में लिए रौशन ने १५०० में मामला तय किया। मुझे नहीं पता की कि इस १५०० रू. में डॉ. सिंह की भी हिस्सेदारी थी या नहीं और अगर थी तो कितनी थी? रौशन ने पिछले २० घंटे से कुछ भी खाया-पीया नहीं था इसलिए पोस्टमार्टम होते ही १२ बजे वह घर के लिए रवाना हो गया।
              मित्रों,यही कोई सात-आठ दिन के बाद फिर से रौशन का फोन आया कि पोस्टमार्टम की रिपोर्ट चाहिए,कहाँ से और कैसे मिलेगी? तब तक मैं ससुराल से मातमपुर्सी करके वापस आ गया था। पहले तो मैंने पीएमसीएच के अधीक्षक डॉ. चौधरी को फोन मिलाया लेकिन जब उन्होंने फोन नहीं उठाया तब डॉ. आरकेपी सिंह को फोन किया। शाम का समय था और डॉ. सिंह उस समय महावीर मंदिर में पूजा-अर्चना कर रहे थे। फिर भी उन्होंने फोन उठाया और जानकारी दी कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट पीरबहोर थाना से मिलेगा। जब मैंने पीरबहोर थाने में फोन लगाया तो टेलीफोन उठानेवाले महाशय ने बताया कि कल ११ बजे थाने में आकर मो.शमीम से मिल लीजिए। कल होकर जब रौशन शमीम जी से मिला तो उन्होंने उसे ८-१० दिन बाद आने के लिए कहा।
          मित्रों, दस दिनों के बाद अचानक दोपहर ११ बजे रौशन का फोन आया कि चिंटू भैया चिलचिलाती धूप में पीरबहोर थाना के गेट पर खड़े हैं और दरबान उन्हें भीतर नहीं जाने दे रहा। मैंने उससे चिंटू भैया का नंबर लिया और उसे खुद थाने पर जाने के लिए कहा। तब तक मैंने चिंटू भैया जो मृतक सरविन्द भैया के छोटे भाई हैं को फोन लगाया और उन्हें दरबान को फोन देने के लिए और उससे उसका नाम पूछने के लिए कहा। दरबार ने फोन लिया ही नहीं और उन्हें भीतर जाने की अनुमति दे दी। तब तक रौशन भी थाना में पहुँच चुका था। रजिस्टर देखकर शमीम ने बताया कि रिपोर्ट आ गयी है लेकिन उससे उसने ३०० रू. की रिश्वत भी मांगी और कहा कि अगर वे लोग ३०० रू. दे देते हैं तो उन्हें पोस्टमार्टम रिपोर्ट का फोटोस्टेट करवाने की अनुमति दे दी जाएगी। मूल प्रमाण-पत्र लेना है तो विधवा द्वारा आवेदन लिखवा कर लाईए और साथ में देसरी थाना के स्टाफ को भी लेकर आईए। मेरे सालों ने जब रिश्वत मांगे जाने का विरोध किया तब दर कम कर दी गयी और १५० रू. यह कहकर माँगा गया कि इससे कम में तो काम नहीं होगा। परन्तु वे लोग तैयार नहीं हुए और मुझे फोन किया। मैंने फिर थाने के नंबर पर फोन किया और फोन उठानेवाले से रिश्वत मांगने पर अपनी नाराज़गी जताई। फिर तो उन वक़्त के मारों को प्रॉपर चैनल से आने के लिए कहा गया। बाद में कथित प्रॉपर चैनल से जाकर उन्होंने पीरबहोर थाने से पोस्टमार्टम प्रमाण-पत्र और बिहार के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल पीएमसीएच से मृत्यु प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लिया। 
             मित्रों,इस प्रकार यहाँ पर आकर यह पोस्टमार्टम-कथा समाप्त हुई लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने मेरे जमीर को हिला कर रख दिया है। हमारा तंत्र कितना संवेदनहीन हो गया है? आज तक अगर मानवता ने विकास की अनगिनत सीढियों को पार किया है तो सिर्फ इसलिए कि मानव मानव के काम आता रहा है। लेकिन आज हालत क्या हैं? आज मानव मानव का ही खून चूस रहा है। पुलिस से लेकर स्वास्थ्यकर्मी तक सभी मृतक के अर्द्धमृत परिजन को लूटने में लगे हैं। आदमी जब तक जीवित रहता है तब तक तो उसका भ्रष्टाचार से रोजाना साबका पड़ता ही है मरने के बाद भी यह मुआ भ्रष्टाचार उसका पीछा नहीं छोड़ता। जब राजधानी पटना के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल और राजधानी के ही एक पुलिस स्टेशन में इस तरह खुलेआम रिश्वत का खेल चल रहा है तो बाँकी बिहार की स्थिति का तो महज अनुमान ही लगाया जा सकता है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी बात तो यह रही कि मेरे यानि एक मीडियाकर्मी के हस्तक्षेप करने के बाद भी घूस मांगी गयी और दुस्साहसपूर्वक ली भी गयी। इस स्थिति में फँसे आम आदमी की क्या हालत होती होगी इसके बारे में उनको भी बेहतर पता होगा जिनको इस स्थिति से गुजरना पड़ा है। फर्ज कीजिए कि अगर दिवंगत काफी गरीब पृष्ठभूमि से है माधव और घिस्सू की तरह तो फिर उसका क्या होता होगा?क्या उसकी लाश को यूं ही सड़ने के लिए छोड़ नहीं दिया जाता होगा और फिर पोस्टमार्टम में अनावश्यक देरी नहीं की जाती होगी? शायद इसलिए भी लोग कई बार लाश लेने ही नहीं जाते होंगे या फिर लाश को लावारिश छोड़कर अस्पताल से फरार हो जाते होंगे?यूँ तो नीतीश सरकार में मुख्यमंत्री को छोड़कर (जाने क्यों मुख्यमंत्री ने अपना मोबाइल नंबर जनता को नहीं दिया है?) सभी मंत्रियों को सरकारी मोबाइल नंबर दिया गया है लेकिन जब वह नंबर बंद रहे तो जनता कहाँ  जाए और क्या करे? फिर मृतक के परिजन जब अस्पतालों में तोड़-फोड़ पर उतारू हो जाते हैं तो डॉक्टर ही हड़ताल पर चले जाते हैं। बिहार में आज ही डॉक्टरों की ऐसी ही एक हड़ताल समाप्त हुई है। हालाँकि ऐसा होना नहीं चाहिए लेकिन ऐसा होता रहता है और आगे भी शायद होता रहेगा। पुलिसवालों को क्या कहा जाए? ये बेचारे तो लोकमान्य तिलक से भी एक कदम आगे के क्रान्तिकारी हैं। तिलक स्वतंत्रता को जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे और ये लोग रिश्वत लेने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। वर्दी न हुई रिश्वत लेने का अधिकार-पत्र हो गया। दारोगा यानि दो रोकर या फिर गाकर मगर दो जरूर। इनके हाथों में लाठी भी है और बंदूक भी और किसी को भी बेवजह अन्दर कर देने का विशेषाधिकार तो इनके पास है ही। सरकार चाहे जितने भी सपने देख ले ये लोग पीपुल्स फ्रेंडली बन ही नहीं सकते। ये लोग तो राक्षसों से भी गए-गुजरे हैं। पाँच साल पहले इसी पुलिस ने वैशाली जिले के राजापाकर थाने के ढेलफोड़वा कांड में मृतक १० अभागों की लाशों को गंगा में बिना जलाए ही बहा दिया था और अंत्येष्टि-राशि हजम कर गयी थी। तब से आज तक उसी गंगा में जाने कितना पानी बह चुका है लेकिन इस पुलिस का चाल और चरित्र नहीं बदला। यह तब भी रक्तपायी थी और आज भी रक्तपायी है। वास्तव में सिर्फ पुलिस या स्वास्थ्य-विभाग ही नहीं बल्कि हमारा पूरा का पूरा तंत्र ही रक्तपायी है और लगातार जनता का खून चूस रहा है। जब तक व्यवस्था नहीं बदलती हमारा यह तंत्र इसी तरह निर्ममतापूर्वक हमारा रुधिर पीता रहेगा और हम चाहते हुए भी उसे अपना खून पिलाते रहेंगे। अंत में मैं आप मित्रों के लिए भगवान से प्रार्थना करूंगा कि आपके घर में कभी किसी की अकालमृत्यु नहीं हो और आपको कभी पोस्टमार्टम के झमेले से नहीं गुजरना पड़े। बिहार में तो हरगिज नहीं।            

बुधवार, 20 जून 2012

क्या मनमोहन देशभक्तों से घिरे हैं?

मित्रों, कहते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है। यानि खाली बैठने पर अच्छा-खासा आदमी भी शैतानी करने के लिए स्वयं अपने ही दिमाग द्वारा दुष्प्रेरित होने लगता है। परन्तु जब कोई शैतान खाली-खाली बैठा हो,तब? तब तो फिर भगवान ही पीड़ित की रक्षा करें? और जब उस शैतान के हाथों में काफी ज्यादा शक्तियां भी हों तब तो जो बर्बादी होती है उसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। इन दिनों हमारे दुर्भाग्य से हमारी मनमोहिनी-जनमोहिनी-नित्यमहाघोटालाकरनी-भ्रष्टाचारसम्पोषिनी-महंगाईवर्द्धिनी-जनाकांक्षामर्दिनी-नित्यअसत्यसंभाषिणी-.......... केंद्र सरकार खाली बैठी है,बिलकुल निठल्ली। कोई निर्णय नहीं ले पा रही और अगर निर्णय ले भी ले रही है तो सिर्फ लेने के लिए ले रही है अमल नहीं हो पा रहा। सारा काम-काज ठप्प। जैसे मंत्रिपरिषद किसी अघोषित हड़ताल पर हो। ऐसा सिर्फ हम ही नहीं नहीं कह रहे हैं बल्कि प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार श्री कौशिक बसु के भी कुछ ऐसे ही पुनीत विचार हैं। इतना ही नहीं भारत के कई लब्धप्रतिष्ठित उद्योगपतियों का भी कुछ ऐसा ही मानना है। 
         मित्रों,आपने कभी खाली बैठे किराना दुकानदार को देखा है। अगर हाँ तब आपने यह भी देखा होगा कि ऐसे वक़्त को वह काटता कैसे है? वह ऐसे में ज्यादा कुछ नहीं करता बस इस डिब्बे के दाल-चावल को उस डिब्बे में और उस डिब्बे के आटा-शक्कर को इस डिब्बे में करता रहता है। और जब कोई सरकार खाली बैठी हो तब? तब वह घोटाले-पर-घोटाले-पर-घोटाले........घोटाले करती रहती है। हमरी न मानो तो ललुआ से पूछो और अब 'मनमोहना बड़े झूठे' से भी पूछ सकते हो। इनकी सरकार ने भी अपने दूसरे कार्यकाल में सिवाय घोटालों के और कुछ नहीं किया है और शायद अपने बचे हुए दो सालों में भी वो सिवाय घोटालों के और कुछ भी नहीं करने जा रही है। घोटाला-पर-घोटाला,घोटाला-दर-घोटाला। हर प्रजाति का,हर आकार का, हर प्रकार का घोटाला। इस मनमोहन सरकार ने इतने बड़े-बड़े घोटाले इस अल्पावधि में किए हैं किए हैं कि इनमें से प्रत्येक को दुनिया के आठवें आश्चर्य के रूप में आसानी से स्थान मिल सकता है। पहले राष्ट्रमंडल घोटाला १५००० करोड़ रूपये का,फिर २जी घोटाला १७५००० करोड़ रूपये का, उसके बाद उससे भी बड़ा देवास घोटाला और अब अब तक का सबसे बड़ा कोयला घोटाला १०.५ लाख करोड़ रूपये का।
         मित्रों,आपने देखा कि यहाँ सिर्फ एक शैतान ही खाली-खाली बैठा हुआ नहीं है बल्कि उसकी एक पूरी मंडली या टीम ही खाली बैठी है जिसे हम कांग्रेस पार्टी या केंद्र सरकार दोनों में से किसी भी नाम से संबोधित कर सकते हैं। दोनों दो होते हुए भी एक हैं और एक होते हुए भी दो हैं। कुछ समय पहले तक आसमान छूती भारतीय अर्थव्यवस्था आज "चिड़िया की जान जाए और बच्चों का खिलौना" की तर्ज पर नेस्तनाबूत होने के कगार पर पहुँच चुकी है। अर्थव्यवस्था की दुरावस्था की मैं यहाँ विस्तार से चर्चा नहीं करूंगा क्योंकि वह तो आप रोजाना अख़बारों में पढ़ते ही होंगे। इसके लिए जिम्मेदार कौन है? जिम्मेदार है केंद्र सरकार का निठल्लापन और ऊपर से घोटालापन। यहाँ घोटालापन एक नितांत नया शब्द है लेकिन है बड़ा सार्थक। घोटालापन यानि घोटाला करने की प्रवृत्ति। इस सरकार में भ्रष्टाचार इस कदर चरमसीमा पर पहुँच चुका है कि ऊपर वर्णित घोटालों में से बाद के दोनों घोटालों में प्रधानमंत्री कार्यालय भी सीधे-सीधे शामिल है। पहले वर्णित दोनों घोटालों में भी उसकी भूमिका संदेह पर परे नहीं है। अब आप ही बताईए कि जब प्रधानमंत्री ही संलिप्त हो गया तो बचा क्या? कुछ बचा क्या? कहने का तात्पर्य यह है कि इस शैतानी सरकार का प्रदर्शन तो ख़राब है ही इसका दर्शन भी गड़बड़ है,विचारधारा ही भ्रष्ट है। फिर भ्रष्टाचार क्यों न हो और क्यों न बढे? रही राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय शाख की बात तो वह तो इन परिस्थितियों में स्वाभाविक तौर पर नीचे जाएगी ही और जा भी रही है।
                मित्रों, यह शैतानों से भरी टीम इंडिया सिर्फ शैतान ही नहीं है थेथर भी है। यह थेथर बिहार-यू.पी. में स्वतः उग जानेवाला एक पौधा होता है जिसे आप जितना भी काट दीजिए वह फिर से पनप आता है। इसे समूल नष्ट किया ही नहीं जा सकता। थोड़ी-सी भी जड़ जमीन में छूटी नहीं कि यह फिर से पनप आएगा। ठीक इसी तरह कांग्रेस और उसकी वर्तमान केंद्र सरकार पर किसी भी लानत-मलामत का कोई असर नहीं हो रहा है। ये लोग उस थेथर की तरह थेथर हैं जो एक क्षण में मार खाता है और दूसरे ही क्षण में इस तरह से पेश आता है मानो कुछ हुआ ही नहीं हो। एक तो इसे अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं करना है और अगर किसी ने इनकी आलोचना कर दी तो ये उस पर ततैये के झुण्ड की तरह पिल जाते हैं और डंक मार-मार कर उसकी सूरत ही बिगाड़कर रख देते हैं (मेरा मतलब असत्याधारित चरित्र-हनन से है)। आपने देखा होगा कि किस तरह इन लोगों ने पहले तो सीधे अन्ना हजारे पर ही मनगढ़ंत आरोप लगा दिए। आरोप क्या लगाए आरोपों की झड़ी ही लगा दी और जब उनके झूठ के पाँव उखाड़ने लगे तो टीम अन्ना के बाँकी सदस्यों पर अनर्गल आरोप लगाने शुरू कर दिए जिसका सिलसिला आज भी जारी है। ऐसा ही कुछ इन्होंने बाबा रामदेव के साथ भी किया।
                मित्रों, प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री पी. नारायणस्वामी ने हाल ही में टीम अन्ना के पत्र के उत्तर में अपने अद्भुत प्रतिउत्पन्नमतित्व का परिचय देते हुए आरोप लगाया है कि अन्ना हजारे देशद्रोहियों से घिरे हैं। इन सत्तामार्का ऐनकधारी श्रीमान के सड़ियल दिमाग के अनुसार किरण बेदी और अरविन्द केजरीवाल भी देशद्रोही हैं। अपनी पुलिस की नौकरी के दौरान समाजसेवा,ईमानदारी और समाजसुधार के नए मानदंड स्थापित करनेवाली भारत की पहली महिला आई.पी.एस. किरण बेदी देशद्रोही हैं और देशद्रोही हैं देशसेवा के लिए अपनी भारतीय राजस्व सेवा की अतिकमाऊ नौकरी को क्षणभर में लात मार देनेवाले अरविन्द केजरीवाल। तो फिर भारत में देशभक्त कौन है? क्या टीम मनमोहन? इस पूरे मंत्रिपरिषद में ऐसे कितने लोग हैं जो देशभक्ति को सोनिया-भक्ति से ऊपर मानते हैं और तदनुसार आचरण भी करते हैं? कितने?? क्या जो सोनियाभक्त हैं केवल वही देशभक्त हैं या हो सकते है या फिर होने की योग्यता को धारण करते हैं? इसका मतलब तो यही है कि जो लोग सोनियाभक्त नहीं हैं वे देशद्रोही हैं. देशभक्ति की ऐसी घटिया अव्याप्ति दोष से युक्त परिभाषा सिर्फ और सिर्फ नारायण स्वामी जैसे चापलूस और स्वार्थी लोग ही गढ़ सकते हैं जिन्हें वास्तव में पता ही नहीं है कि देशभक्ति किस शह का नाम है। देशभक्ति घोटालों के द्वारा देश को बेच देना नहीं है बल्कि देश पर और देश के लिए मर-मिटने का नाम देशभक्ति है। सुभाष,गाँधी और भगत के मार्ग पर चलने का नाम देशभक्ति है और मैं नहीं समझता कि हम विशुद्ध देशभक्तों और टीम अन्ना को देशभक्त होने के लिए किसी नारायण स्वामी जैसे गुलाम और स्वार्थी मानसिकतावाले व्यक्ति के प्रमाण-पत्र की कोई आवश्यकता पहले कभी थी और आगे ही कभी होगी।
                मित्रों,देश की जो वर्तमान राजनैतिक हालत है उसमें लगता तो यही है कि अगले लोकसभा चुनावों तक हमें इस शैतान सरकार और इसकी शैतानी करतूतों को झेलना ही पड़ेगा। फिर फैशन के इस दौर में इस बात की गारंटी भी तो नहीं दी जा सकती है कि अगली सरकार भलेमानुषों की ही होगी इसलिए हमारे लिए यानि नारायण स्वामी की नजर में जो लोग भी देशद्रोही हैं उनके लिए मुफीद यही होगा कि हम पूरे दमखम के साथ अन्ना हजारे का समर्थन करें। टीम अन्ना से भी हमारी विनती होगी कि वह कृपया अपना एजेंडा सिर्फ व्यवस्था-परिवर्तन तक ही सीमित रखे जिसका एक भाग सत्ता परिवर्तन भी हो क्योंकि भारतीय लोकतंत्र के अपने ६५ साला अनुभव से हम यह जानते हैं कि भारत में सत्ता का बदलना हमेशा नाकाफी रहा है। इस प्रक्रिया में एक भ्रष्ट हटता है और उसकी जगह दूसरा भ्रष्ट ले लेता है। इस प्रकार स्थिति सुधरने के बदले बिगडती चली गयी है। इसलिए अब वक़्त आ गया है कि सिर्फ सत्ता को बदलने के लिए नहीं बल्कि व्यवस्था को बदल देने के लिए आन्दोलन चलाया जाए। किसी एक पार्टी की सरकारों को नहीं बल्कि सभी पार्टियों की भ्रष्ट सरकारों को निशाना बनाया जाए। पहले व्यवस्था बदलेगी,विधान-संविधान बदलेगा। फिर भारत भी बदलेगा। जय हिंद,जय भारत!!!

शुक्रवार, 15 जून 2012

लंगड़ा सवार अंधी घोड़ी

लंगड़ा सवार अंधी घोड़ी,
सोनिया-मनमोहन की जोड़ी।

बतकही में बहादुर,
काम में फिसड्डी;
थेथरई में महारथी,
तोड़ी देश की हड्डी;
घोटालों से बना दिया भारत को अतुल्य,
पर निर्लज्जों ने कुर्सी न छोड़ी;
लंगड़ा सवार अंधी घोड़ी,
सोनिया-मनमोहन की जोड़ी।

झूठों का सरदार सरदार मनमोहन,
सोनिया तानाशाह;
सिर्फ कुर्सी की फिक्र है इनको,
चाहे देश हो जाए तबाह;
भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को बचाने में दोनों ने,
कोई कसर नहीं छोड़ी;
लंगड़ा सवार अंधी घोड़ी,
सोनिया-मनमोहन की जोड़ी।

हे गोविन्द राखो शरण,
हम तो हिम्मत हारे;
तुम्हीं सत्ता से हटाओ
इन दोनों को;
लगाओ भारत की
डूबती नैया किनारे;
करबद्ध हो करें हम प्रार्थना,
सुन लो विनती मोरी,
सुन लो विनती मोरी।
प्रभुजी सुन लो विनती मोरी ।।
लंगड़ा सवार अंधी घोड़ी,
सोनिया-मनमोहन की जोड़ी।