शनिवार, 23 जुलाई 2016

क्या लालूजी बिहार को कश्मीर बनाना चाहते हैं?



मित्रों,हम आपको पहले भी बता चुके हैं हमारा बचपन ननिहाल में बीता है। जाहिर है कि मेरे मामा लोग मुझे चिढ़ाते थे कि तेरा बाप चोर है तो तेरा बाप मोची है आदि। मैं तब अबोध बालक था सो तुरंत पलटकर कह देता कि तेरा बाप भी चोर है या मोची है। मुझे तब पता नहीं था कि उनके पिता मेरे नाना होते हैं। तब का एक और संस्मरण याद आ रहा है। मेरे ननिहाल में एक घर था जिसे हम गिदड़बा अंगना या गीदड़ों का आंगन कहकर बुलाते थे। क्योंकि उस आंगन के एक व्यक्ति पर हाथ डालिए तो पूरा घर एकजुट होकर हुआँ-2 करने लगता था। उस घर की एक लड़की एक दलित के साथ भाग गई। गाँव के लोग उसके दरवाजे पर जमा हो गए। तभी लड़की की बड़ी बहन ने गजरते हुए कहा कि यहाँ कोई तमाशा हो रहा है क्या? मैं नहीं जानती हूँ क्या कि गाँव की कौन-कौन-सी लड़की ने छुप-छुप कर क्या-क्या गुल खिलाए हैं? अब कौन जाता उससे मुँह लगाने सो सारे गाँववाले तितर-बितर हो गए।
मित्रों,हम यह आप पर छोड़ते हैं कि इन दोनों में से आप महान बिहार के महान नेता लालू प्रसाद जी को किस श्रेणी में रखेंगे। बेचारे की अब काफी उम्र हो चुकी है। साठ भी पार कर चुके हैं सो उनको उनकी खुद की परिभाषानुसार यानि कि यादवों को 60 की उम्र में जाकर बुद्धि आती है अबोध तो कतई नहीं कहा जा सकता। तो क्या इसका सीधा मतलब यह नहीं निकालना चाहिए कि लालू जी उस भाग गई लड़की की बड़ी बहन की तरह थेथरई बतिया रहे हैं।
मित्रों,लालू के लाल यही काम तबसे ही कर रहे हैं जबसे बिहार के उपमुख्यमंत्री बने हैं। बिहार में कहीं कोई आपराधिक घटना हुई नहीं,बिहार से किसी घपले-घोटाले-अव्यवस्था की खबर आई नहीं कि तुरंत अपने श्रीमुख से विषवमन करना शुरू कर देते हैं कि ऐसा हमारे यहाँ ही होता है क्या? वहाँ उस राज्य में भी तो हुआ है?मतलब यह कि भला जो देखन मैं चला,भला न दीखा कोय। जो दिल ढूंढ़ा आपना, मुझसा भला न कोय।। अब आप ही बताईए कि फिर किस माई के लाल में दम है कि ऐसे स्वनामधन्य महामूढ़ को उसकी गलती का अहसास दिला दे?
मित्रों,लेकिन हमारे लालू प्रसाद जी ठहरे महातेजस्वी तेजस्वी यादव जी के पिता सो इस मामले में बेटे से पीछे कैसे रह जाते? सो बिहार के सबसे शरीफ नगर बिहार शरीफ में पाकिस्तान झंडा फहराए जाने की घटना सामने आते ही थेथरई के मैदान में नया कीर्तिमान स्थापित कर ही तो दिया। बिहार की तुलना सीधे जन्नत से जहन्नुम बना दिए गए कश्मीर से करते हुए कह ही तो दिया कि इसमें कौन-सी बड़ी बात है ऐसा तो कश्मीर में रोजे होता है। मानो बिहार और कश्मीर दोनों एकसमान हों। मानो कश्मीर की तरह बिहार की भी 70 प्रतिशत आबादी मुस्लिम हो। मानो बिहार में भी पाकिस्तान की शह पर वर्षों से अलगाववादी आतंकवाद चल रहा हो।
मित्रों,यद्यपि हम लालू से नाराज हैं कि पूरी तरह से सक्षम होते हुए भी उन्होंने पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी या पाकिस्तान का झंडा फहराए जाने की घटना के मामले में बिहार की तुलना पाकिस्तान, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका, इराक, सीरिया, मिस्र, नाइजीरिया आदि देशों में घटी घटनाओं से क्यों नहीं की। वैसे,हमें लालूजी की महान सूक्ष्मबुद्धि को देखते हुए उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है कि वे भविष्य में किसी-न-किसी प्रसंग में कभी-न-कभी ऐसा जरूर करेंगे। आखिर कब तक बिहार की तुलना देसी राज्यों से होती रहेगी? बिहार की ईज्जत का सवाल है भाई।

सोमवार, 18 जुलाई 2016

बिहार के विकास दर का कड़वा सच

मित्रों,महाभारत की लड़ाई अंतिम खंड में थी। महारथी कर्ण और अर्जुन आमने-सामने थे। तभी अर्जुन ने भयंकर वाणों का प्रयोग कर कर्ण के रथ को कई योजन पीछे पटक दिया। मगर अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण निश्चल बने रहे। जवाब में कर्ण ने भी वाण चलाए और अर्जुन के रथ को कुछेक अंगुल पीछे कर दिया। मगर यह क्या! श्रीकृष्ण कर्ण के इस कृत्य पर बाँसों उछलने लगे और उसकी तारीफ के पुल बांध दिए। अर्जुन हतप्रभ। पूछ ही तो दिया। ऐसा क्यों माधव? श्रीकृष्ण ने कहा कि तुम्हारे रथ की पताका पर रूद्रावतार हनुमान विराजमान हैं और मैं खुद भी तीनों लोकों का भार लेकर बैठा हूँ। फिर भी महावीर कर्ण ने तुम्हारे रथ को कई अंगुल पीछे धकेल दिया।
मित्रों,हमारे महान लालूजी का महान परिवार इन दिनों खासे उत्साह में हैं। वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि गुजरात अर्जुन का रथ है और बिहार कर्ण का। गुजरात पहले ही विकास कर चुका है और संतृप्तावस्था को प्राप्त कर चुका है जबकि बिहार ने अभी  विकास का ककहरा पढ़ना शुरू ही किया है। शून्य के मुकाबले 1 अनन्त गुना होता है जबकि 1 के मुकाबले दो सिर्फ दोगुना। तो क्या शून्य से 1 प्रतिशत पर पहुँचनेवाला राज्य यह कहेगा कि हमने पिछले साल के मुकाबले इस साल अनन्त गुना विकासदर प्राप्त कर लिया है? खैर,5 बार मैट्रिक में फेल लालू और उनके नौवीं फेल बच्चे अगर ऐसा करें भी तो इसमें उनका क्या दोष?
मित्रों,समय और दूरी में आपने पढ़ा होगा कि एक कार इतने किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलना शुरू करती है। इतने घंटे बाद दूसरी कार इतने किमी प्रति घंटे की गति से उसका पीछा करना शुरू करती है तो दूसरी कार पहली कार को कितने घंटे में पकड़ लेगी। गुजरात काफी पहले से विकास के पथ पर सरपट दौड़ रहा है जबकि बिहार ने कथित रूप से अब दौड़ना शुरू किया है। बिहार प्रति व्यक्ति आय में 34 हजार रूपये प्रति वर्ष के साथ अभी भी सबसे पीछे है। अभी तो उसको भारत के सबसे पिछड़े राज्यों को ही पीछे करने में कई दशक लगनेवाले हैं। अभी तो उसको भारत की प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय औसत आय 72889 रूपये तक पहुँचने में ही कई दशक लग जानेवाले हैं फिर देश के अग्रणी राज्यों को पीछे छोड़ने की तो बात ही दूर है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जनसंख्या-घनत्व और जनसंख्या वृद्धि में बिहार देश में सबसे आगे है। इसलिए कुल जीडीपी बढ़ने का यह मतलब कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए कि बिहार की प्रति व्यक्ति आय भी उसी दर से बढ़ रही है।
मित्रों,बिहार प्रति व्यक्ति औसत आय के मामले में तब सबसे पीछे से आगे बढेगा जबकि बिहार सरकार द्वारा तैयार किए गए विकास दर के आंकड़े सही हों। बिहार में धरातल पर जो कुछ घटित हो रहा है उससे तो ऐसा नहीं लगता कि बिहार की जीडीपी इतनी तेज गति से बढ़ रही है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जो लोग बाईक पर भैंस को ढो सकते हैं उनके लिए आंकड़ों में हेरा-फेरी करना कौन-सी बड़ी बात है। यहाँ हम आपको बता दें कि जीडीपी विकास दर के आंकड़े राज्य खुद तैयार करते हैं राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन सिर्फ उन पर मुहर लगाता है।

रविवार, 17 जुलाई 2016

कौन हैं देश के सबसे बड़े दुश्मन,बुरहान या ये सफेदपोश

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हम वर्षों से कहते आ रहे हैं कि सदियों से भारत के सबसे बड़े दुश्मन मोहम्मद गोरी नहीं रहे हैं बल्कि भारत को हमेशा से सबसे ज्यादा खतरा जयचंदों से था,है और रहेगा। यह हमारा दुर्भाग्य है कि भारत कभी ऐसे जयचंदों से मुक्त नहीं रहा। वरना मरता एक क्रूर आतंकी है और घुटनों तक से आँसू बहने लगते हैं छद्मधर्मनिरपेक्षतावादियों के।
मित्रों,जब सेना या अर्द्धसैनिकों की आतंकी हमले में मौत होती है तब ये महासंवेदनशील लोग कुंभकर्णी निद्रा में निमग्न होते हैं जैसे इन्होंने मान रखा हो कि सेना और अर्द्धसैनिक बलों में तो लोग मरने के लिए ही आते हैं। लेकिन जैसे ही बुरहान जैसा कोई भयंकर दानव मारा जाता है ये अकस्मात् रूदाली बन जाते हैं। कोई बुरहान को हेडमास्टर का बेटा बताती है तो कोई कहता है कि बेचारे ने गरीबी के कारण आतंकवाद का रास्ता चुना होगा। जैसे यह अमीर हेडमास्टर का गरीब बेटा गरीब बच्चों को महान इंसान बनने की तालीम देता हुआ शहीद हो गया। मानो बुरहान मलाला हो गया और भारतीय सेना तालिबान।
मित्रों, जब सैनिक प्राचीन हथियार पत्थर का जवाब प्राचीन हथियार गुलेल से देते हुए घायल हो जाते हैं या मारे जाते हैं तब तो इन महादयालुओं को दया नहीं आती। तब इनको यह दिखाई नहीं देता कि इन्हीं सैनिकों ने बाढ़ के समय अपनी पीठ और कंधों के ऊपर रास्ता देकर इनकी जान बचाई थी। तब इनको यह दिखाई नहीं देता कि सिर्फ 500 रूपये के बदले ये लोग कितनी बड़ी कृतघ्नता कर रहे हैं लेकिन जैसे ही भारतीय सैनिकों के हाथों में गुलेल के बदले छर्रे उगलनेवाली बंदूक पकड़ा दी जाती है ये महापाखंडी जैसे दयासागर बन जाते हैं। इनको यह नहीं दिखता कि छोटे-छोटे बच्चे भी कैसे मृत्योपरांत हूरों से मिलने की बेचैनी में और कुछ सौ रूपयों के लिए उन सैनिकों पर पत्थर फेंक रहे हैं जिन्होंने अपनी पीठों और कंधों पर चढ़ाकर जलप्रलय के समय इनकी जान बचाई थी। हालाँकि महिलाओं को हूरों के बदले सुंदर पुरूषों के मिलने की कोई संभावना नहीं है बावजूद इसके संगसारी में वे भी किसी से पीछे रहना नहीं चाहतीं। उनको भूलना नहीं चाहिए कि यही महिलायें जयप्रलय के समय सैनिकों को दुआयें देते थक नहीं रही थीं। खैर,भूल तो छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी भी गए हैं कि वे हिंदुस्तानी हैं या पाकिस्तानी।
मित्रों,आपको याद होगा कि हमारे रक्षा राज्य मंत्री ने ऐसे लोगों को प्रेश्या कहा था। परंतु मुझे लगता है कि ये लोग उससे भी गये-बीते हैं। इनको प्रेश्या कहना कदाचित अजीजन बाई जैसी वेश्याओं का अपमान होगा जिन्होंने आजादी की लड़ाई में देश के लिए शहादत दी थी। मुझे बरखा,राजदीप,सागरिका जैसे पत्रकारों के ऊपर पूरी तरह से सटीक बैठनेवाले शब्द की तलाश तो है ही साथ ही उस शब्द में ऐसा गुण भी होना चाहिए कि वो भारत के सारे छद्मधर्मनिरपेक्षतावादियों की विशेषताओं को समाहित कर सके। क्या आप इस काम में मेरी मदद करेंगे?

शनिवार, 16 जुलाई 2016

सुप्रीम कोर्ट मेहरबान तो सिब्बल पहलवान

मित्रों,एक समय था जब सुप्रीम कोर्ट का जज या मुख्य न्यायाधीश बनने के लिए केंद्रीय कानून मंत्री का नजदीकी होना एकमात्र योग्यता बन गई थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने खुद पहल करके कॉलेजियम सिस्टम बनाया। सोंचा गया था कि ऐसा होने से जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता आएगी और सरकारी दखलंदाजी कम होगी। लेकिन समय के साथ कार्यपालिका और व्यवस्थापिका की तरह न्यायपालिका भी भ्रष्ट होने लगी। न्यायमूर्ति अन्यायमूर्ति बनने लगे। जज अब मनमाफिक फैसला देने के बदले धन के साथ-साथ लड़कियों की मांग करने लगे। देश और लोगों की आखिरी उम्मीद न्यायपालिका में भी कॉलेजियम सिस्टम की आ़ड़ में जमकर भाई-भतीजावाद होने लगा।
मित्रों,पिछली मनमोहन सरकार में तो हमने यह भी देखा कि बेडरूम में जाँच-परीक्षण कर कांग्रेस के नेता वकीलों को जज बनाने लगे। न जाने इस दिशा में उनलोगों को कहाँ तक सफलता मिली और न जाने अभी कितने जज हमारे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ऐसे हैं जो इस प्रक्रिया द्वारा जज बने और बनाए गए हैं।
मित्रों,पिछले कुछ महीनों से ऐसा देखा जा रहा है सुप्रीम कोर्ट मनमोहन सरकार में कानून मंत्री रहे कपिल सिब्बल पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान है। यहाँ तक कि श्री सिब्बल फोन पर ही कोर्ट से फैसला करवा ले रहे हैं। ऐसा न तो पहले कभी देखा गया था और न ही सुना ही गया था। जबकि व्यक्ति विशेष के मामले में कोर्ट का ऐसा व्यवहार संविधानप्रदत्त समानता के अधिकार का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है। उनके कहने पर सुप्रीम कोर्ट के जज घड़ी की सूई को पीछे करके स्पष्ट बहुमत वाले मुख्यमंत्री को विपक्ष में बैठा दे रहे हैं। उनके कहने पर सुप्रीम कोर्ट के जज यह जानते हुए कि एक राज्य का मुख्यमंत्री खुलेआम विधायकों की खरीद-ब्रिक्री में लगा हुआ है राज्य से राष्ट्रपति शासन हटा देते हैं। उनके कहने पर सुप्रीम कोर्ट अगस्ता मामले में सीबीआई को घोटालों की महारानी सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से रोक देता है जबकि उनको उनकी मदरलैंड इटली का कोर्ट पहले ही दोषी करार दे चुका है।
मित्रों,मेरी तो समझ में नहीं आ रहा है कि सुप्रीम कोर्ट क्यों सिब्बल की ऊंगलियों पर नाच रहा है? क्या यह कॉलेजियम के माध्यम से पूर्व में उनके द्वारा की गई कृपा का कमाल है या पैसे का या फिर यौनोपहार का? कहा गया है कि अति सर्वत्र वर्जयेत। अब कॉलेजियम भी अति करने लगा है और इस पर लगाम लगानी ही होगी। संविधान के अनुसार तो संसद सर्वोच्च है फिर न्यायपालिका कैसे संसद द्वारा बनाए गए किसी ऐसे कानून को गैरकानूनी घोषित कर सकती है जो उसकी मनमानी पर रोक लगाती हो?
मित्रों,कोई भी संस्था महान या गर्हित नहीं होती बल्कि महान या गर्हित होते हैं उसको चलानेवाले। अब समय आ गया है कि जब जजों की नियुक्ति के लिये मनमाने कॉलेजियम सिस्टम के स्थान पर ज्यादा पारदर्शी और संतुलित व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए। साथ ही न्यायपालिका को जवाबदेह भी बनाना जाना चाहिए जिससे जजों को भी सरासर गलत फैसला देने के बदले दंडित किया जा सके। आखिर जज भी इंसान है और उनमें भी इंसानी कमजोरियाँ है। वे कोई आसमानी तो हैं नहीं। अगर ऐसा होता है तो भविष्य में कोई भी जज किसी सीतलवाड़ पर मेहरबान और कोई भी भ्रष्टाचार का सिंबल पहलवान नहीं हो पाएगा।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

एक पाती रवीश कुमार जी के नाम!

ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। मित्रों,यूँ तो चिट्ठी लिखने की परंपरा दम तोड़ने कगार पर है लेकिन हमारे महान पत्रकार रवीश कुमार जैसे कुछेक लोग धरती पर हैं जिनके चलते यह कला अबतक जीवित है। पहले जहाँ पत्र व्यक्तिगत होते थे आजकल खुल्ले होने लगे हैं। पत्र मैंने भी एक जमाने से किसी को नहीं लिखा लेकिन रवीश जी के पत्र-प्रेम ने पत्रों के प्रति मेरे सोये हुए प्यार को जगा दिया है और मैंने तय किया है कि उनको एक पत्र मैं भी लिख ही डालूँ। वैसे यह महती कार्य कल जी न्यूज के लोकप्रिय व सचमुच में मर्दाना राष्ट्रवादी एंकर रोहित सरदाना भी कर चुके हैं।
मित्रों,तो मैं पत्र शुरू करने जा रहा हूँ। कहा भी गया है शुभस्य शीघ्रम्-
श्रद्धेय श्री रवीश कुमार जी,
प्रणाम।
मैं न केवल कुशल हूँ बल्कि मस्त भी हूँ और उम्मीद ही नहीं विश्वास करता हूँ कि आप भी जहां भी होंगे मोदी सरकार के दो साल गुजर जाने के बावजूद मस्ती में होंगे? रवीश जी आप कौन-से पंथी हैं पता नहीं लेकिन लोग आपको वामपंथी कहकर बुलाते हैं। अगर यह सच है तो मैं जानता हूँ कि वामपंथ और राष्ट्रवाद में घरघोर विरोध हमेशा से रहा है। कुछ लोग भगत सिंह को वामपंथी कहते हैं लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता क्योंकि भगत सिंह के लिए देश ही सबकुछ था विचारधारा का कोई मोल नहीं था। वामपंथियों के साथ एक और समस्या है कि वो हिंदू-विरोधी और तदनुसार राष्ट्रविरोधी भी होते हैं इसलिए अगर आप भी ऐसे हैं तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं बशर्ते आप वामपंथी हैं। मगर याद रखिए कि अगर पूरी दुनिया में भारत अपने सर्व धर्म सद्भाव के लिए उदाहरण के रूप में जाना जाता है,दलाई लामा और ब्लादिमीर पुतिन इसके लिए भारत की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं तो इसलिए क्योंकि यह हिंदूबहुल है वरना भारत से अलग हुए पाकिस्तान और बांग्लादेश के हालातों से आप भी अपरिचित तो नहीं ही होंगे।
रवीश जी मैं आपका तब प्रशंसक बना जब आपने संकटमोचन मंदिर पर आतंकी हमले की रिपोर्टिंग की थी। हर शब्द से मानो दर्द-ही-दर्द छलक रहा था। लग रहा था कि जैसे आपने परकायाप्रवेश कर लिया हो। आपको याद हो कि न याद हो कि एक बार आप अयोध्या से रिपोर्टिंग कर रहे थे। शायद 6 दिसंबर का दिन था। तब आपने मंदिर के शिखरों को मीनार कहा था। मेरे द्वारा फेसबुक पर ऐतराज जताने पर आपने कहा था कि आप स्क्रिप्ट को एकबार लिखने के बाद चेक नहीं करते हैं। वैसे मैं नहीं मानता कि आप अब भी वैसा नहीं करते होंगे।
फिर 2014 का लोकसभा चुनाव आया और दुनिया के सामने आया आपका असली चेहरा। चुनावों के बाद आपको लगा कि चुनावों में कांग्रेस की नहीं आपकी व्यक्तिगत हार हुई है। आपकी सरकार-समर्थक कलम अकस्मात् सरकार-विरोधी हो गई। वैसे आप भी आरोप लगा सकते हैं कि मैं सरकार-समर्थक हूँ लेकिन मैंने समय-समय पर सरकार के गलत कदमों का खुलकर विरोध भी किया है। लेकिन आप और आपके चैनल ने तो जैसे सरकार का विरोध करने की कसम ही खाई हुई है यहाँ तक कि अक्सर आपलोगों का सरकार-विरोध भारत-विरोध बन जाता है। यद्यपि एक लंबे समय के बाद एनएसजी के मुद्दे पर आपके द्वारा सरकार का साथ देना अच्छा लगा।
रवीश जी आप फरमाते हैं कि आपको गालियाँ दी जाती हैं। क्यों दी जाती हैं इसके बारे में आपने कभी विचार किया है? नहीं किया होगा अन्यथा आपको अकबर साहब को पत्र लिखने की जहमत उठानी ही नहीं पड़ती। समय की महिमा का बखान करनेवाली फिल्म वक्त का एक डॉयलॉग तो आपने सुना ही होगा कि शीशे के घरों में रहनेवाले दूसरे के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते। मैं आपको गंभीर इंसान मानता हूँ इसलिए दुःख होता है और बेशुमार होता है जब मैं देखता हूँ कि आपके चैनल और चैनल से जुड़े लोगों पर कई गंभीर आर्थिक अपराधों के आरोप हैं। बरखा दत्त जैसी पत्रकार आपके चैनल में है जो सत्ता की दलाली करती हुई रंगे हाथों पकड़ी जा चुकी हैं और आप ताबड़तोड़ सवाल अकबर साहब पर उठाए जा रहे हैं।
रवीश जी पार्टी बदलना कोई पति या पत्नी बदलना नहीं होता बस नीयत साफ होनी चाहिए। क्या आपको अकबर साहब की नीयत पर कोई शक है। है तो उसको लोगों के सामने रखिए और सतही बातें नहीं करिए क्योंकि ऐसा करना कम-से-कम आपको शोभा नहीं देता। मैं समझता हूँ कि अकबर साहब जब कांग्रेस में थे तब भी उदारवादी और राष्ट्रवादी थे और आज भी हैं।  गांधीजी ने अपनी पुस्तक मेरे सपनों का भारत में कहा है कि अगर मेरे पहले के विचार और बाद के विचारों में टकराहट दिखाई दे तो मेरे बाद के विचारों को मेरा विचार माना जाए। फिर यहां तो अकबर साहब के पहले और बाद के विचारों में टकराव है भी नहीं।
रवीश जी पत्रकारिता के क्षेत्र में अंधभक्ति गलत थी,है और रहेगी। क्या आपके पास कोई सबूत है कि अकबर साहब जब पत्रकार थे तब उन्होंने किसी पार्टी या व्यक्ति का अंधसमर्थन या अंधविरोध किया? आपने अकबर साहब से कहा है कि वे आपको सिखाएँ कि उन्होंने किस तरह से पत्रकारिता और राजनीति के बीच संतुलन साधा कि उनके हिस्से सिर्फ वाहवाही आई गाली नहीं।
रवीश जी ये चींजें सिखाने की होती ही नहीं हैं। आप अपने अतीत को खंगालिए और दृष्टिपात करके देखिए कि ऐसा आपमें क्या था,आपकी रिपोर्टिंग में ऐसा क्या था कि आपको लोग सिर-माथे पर लेते थे और आपमें-आपके तर्कों में तबसे अबतक क्या बदलाव आया है? इन दिनों आप तर्क कम जबर्दस्ती के कुतर्क ज्यादा देने लगे हैं। बहस के दौरान आप हिस्सा लेनेवालों पर अपने तर्कों और निष्कर्षों को जबरन थोपते हुए से लगते हैं? फिर आप उनको बुलाते ही क्यों हैं? एक शायर ने कहा है कि कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी कोई यूँ ही बेवफा नहीं होता। न जाने आपकी क्या मजबूरियाँ थीं कि आप भी बदल गए और इतना बदल गए कि यकीन ही नहीं होता कि आप वही रवीश हैं जिनकी पवित्र भावनाओं को पढ़कर दिल भर आता था? दिल है कि मानता ही नहीं कि आप वही रवीश हैं जिनसे प्रभावित होकर हमने ब्रज की दुनिया नाम से ब्लॉग बनाकर  लिखना शुरू किया था?
रवीश जी आतंकियों को भटके हुए युवक,शेख हसीना वाजेद के बयान में मुसलमानों को शब्द बदलकर इंसान कहना पता नहीं कहाँ तक आपके चैनल की नीति है और इसके लिए आप कहाँ तक दोषी हैं? हो सकता है ढाका-आतंकी-हमले के बाद आपने और आपके चैनलवालों ने कुरान को कंठस्थ कर लिया हो और इसलिए आपको और आपके चैनलवालों को जेहादी आतंकवाद से डर नहीं लगता हो लेकिन इसकी क्या गारंटी है कि आतंकी आपसे या हमसे भी कुरान की आयत सुनाने को कहेंगे ही अगर हम उनकी गिरफ्त में आ जाते हैं तो? मुंबई-हमले में तो उन्होंने लोगों से ऐसा करने को नहीं कहा था।
रवीश जी अपने नीर क्षीर विवेक को फिर से जिंदा करिए जो काफी पहले मर चुका है। अगर इसमें आपका चैनल बाधा बनता है तो छोड़ दीजिए चैनल को। सरकार जब गलत करती है यहाँ गलत से मेरा मतलब सीधे-सीधे ऐसे कदमों से है जो देश को कमजोर बनाता हो तो उसका विरोध करिए और जब सही करती है तो जबर्दस्ती का केजरीवाल टाईप विरोध करना त्यागकर खुले दिल से,तहे दिल से समर्थन करिए आपको स्वतः गाली के स्थान पर ताली मिलने लगेगी। हमें तो आज भी उस पुराने रवीश की तलाश है जिसकी रिपोर्ट देखने के लिए हम देर रात तक जागा करते थे। क्या आप हमें वही पुरानावाला रवीश देंगे जिसकी पंक्तियों में गंगाजल की पवित्रता,प्रवाह और गहराई तीनों होते थे।
                                                                                                                                                                         शुभेच्छा सहित
                                                                                                        आपका पूर्व प्रशंसक और वर्तमान आलोचक ब्रजकिशोर

रविवार, 26 जून 2016

चीन,भारत,आपी-पापी और हम

मित्रों,एशिया के साथ-साथ दुनिया भी इस समय संक्रमण-काल से गुजर रही है। इस समय दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है। एक का नेतृत्व अमेरिका कर रहा है,दूसरी तरफ रूस है और तीसरी तरफ चीन-पाकिस्तान और उत्तर कोरिया। हमने हाल में भारत के मुद्दे पर एनएसजी में जो खींचातानी देखी उसके लिए इन तीनों ध्रुवों के बीच चल रहा शीत-युद्ध जिम्मेदार है।
मित्रों.जहाँ तक भारत का सवाल है तो भारत के पास अमेरिका से नजदीकी बढ़ाने के सिवा और कोई विकल्प है ही नहीं। भारत चीन की तरफ जा नहीं सकता क्योंकि चीन न तो कभी भारत का मित्र था और न ही कभी होगा। बल्कि वो भारत का चिरशत्रु था,है और रहेगा। रूस चीन के खिलाफ एक सीमा से आगे 1962 में भी नहीं गया था और अब भी नहीं जा सकता। तो फिर भारत करे तो क्या करे वो भी ऐसी स्थिति में जब दशकों से भारत की बर्बादी के सपने देखनेवाला चीन अब एक महाशक्ति बन चुका है और भारत को चारों तरफ से घेरकर अभिमन्यु की तरह तबाह कर देना चाहता है?
मित्रों,वैसे अगर हम देखें तो निरंतर आक्रामक होते चीन से निबटने के लिए अमेरिका के पास भी भारत से मित्रता बढ़ाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। जापान चीन के मुकाबले क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों ही दृष्टिकोणों से काफी छोटा है। चीन भी अब कोई 1930-40 वाला चीन नहीं रहा कि जिसको जिस इलाके पर मन हुआ कब्जा कर लिया। ताईवान,वियतनाम आदि चीन के पड़ोसी देश भी अकेले आज के चीन के आगे नहीं ठहर सकते। सिर्फ और सिर्फ भारत ही ऐसा है जिसकी अगर सहायता की जाए तो चीन को हर मामले हर तरह से ईट का जवाब पत्थर से दे सकता है। जिन लोगों को भ्रम है वे भ्रम में रहें लेकिन सच्चाई तो यही है कि आज नहीं तो कल भारत को चीन और पाकिस्तान दोनों से एक साथ सैन्य संघर्ष का सामना करना पड़ेगा। जो लोग आज प्रत्येक आतंकी हमले के बाद कहते हैं कि भारत सीमापार स्थित आतंकी शिविरों पर हमले क्यों नहीं करता वे भूल जाते हैं कि इस समय चीन कितनी आक्रामकता के साथ पाकिस्तान के साथ खड़ा है। इसलिए पहले हमें अपने देश को आर्थिक और सैनिक दोनों क्षेत्रों में इतना सक्षम बनाना होगा कि पाकिस्तान तो क्या चीन को भी हमारी तरफ आँख उठाकर देखने में लाखों बार सोंचना पड़े।
मित्रों,मैंने ओबामा की भारत-यात्रा के समय अपने एक आलेख के माध्यम से कहा था कि भारत को अमेरिकी राष्ट्रपति की इस बात को लेकर किसी भुलावे में नहीं आना चाहिए कि भारत एक महाशक्ति बन चुका है। सच्चाई तो यह कि हमें आर्थिक और सैनिक मामलों में चीन की बराबरी में आने में अभी कम-से-कम 15-बीस साल लगेंगे वो भी तब जब भारत की जीडीपी वर्तमान गति से बढ़ती रहे और एफडीआई का भारत में प्रवाह लगातार त्वरित गति से बढ़ता रहे।
मित्रों,जो आपिए और पुराने पापिए यानि छद्मधर्मनिरपेक्ष एनएसजी का सदस्य बनने में भारत की नाकामी पर ताली पीट रहे हैं और जश्न मना रहे हैं उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि एनएसजी का सदस्य भारत को बनना था न कि नरेंद्र मोदी को। कल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में अगर स्थायी सदस्यता मिलेगी तो वो सवा सौ करोड़ जनसंख्यावाले भारत को मिलेगी न कि नरेंद्र मोदी को। नरेंद्र मोदी तो आज हैं कल पीएम तो क्या धरती पर भी नहीं रहेंगे। उनकी कोशिशों का स्थायी लाभ भारत को मिलेगा,भारतवासियों को मिलेगा,भारतवासियों का सीना 56 ईंच का होगा,सिर गर्वोन्नत होगा और यह हमेशा के लिए होगा। नाकामी के लिए मोदी की आलोचना करके लोग क्या साबित करना चाहते हैं? अरे भाई,गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग में! जिसने कोशिश की वही तो सफल-असफल होगा? क्या इससे पहले किसी ने कभी एनएसजी का नाम भी सुना था? 48 में से 42 देश हमारे समर्थन में थे फिर हम असफल कैसे हैं? संगठन में सर्वसम्मति की जगह अगर वोटिंग का नियम होता तो हम विजयी होते। साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि NSG में असफलता के बावजूद भारत MTCR का सदस्य बनने जा रहा है जबकि चीन इसका सदस्य बनने के लिए 2004 से ही असफल प्रयास कर रहा है। अब अगर भारत चाहे तो चीन को MTCR का सदस्य बनने ही नहीं दे क्योंकि वहाँ भी सर्वसम्मति से निर्णय लेने का नियम है। जहाँ तक चीन को भारत के कदमों में झुकाने का सवाल है तो इसके लिए मोदी सरकार को प्रयास करने की जरुरत ही कहां है? वो काम तो हमलोग भी कर सकते हैं बस आज से अभी से हमें प्रण लेना होगा कि चाहे लगभग मुफ्त में ही क्यों न मिले हम चीन में बने सामानों को न तो खरीदेंगे और न ही उसका इस्तेमाल ही करेंगे।

गुरुवार, 16 जून 2016

परीक्षा बच्चों की थी फेल सरकार हो गई

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,ऐसा आपने कम ही देखा होगा कि परीक्षा कोई और दे और फेल कोई और हो जाए। मगर बिहार में कुछ भी मुमकिन है। यहाँ ऐसे चमत्कार होते ही रहते हैं। पिछले साल परीक्षा बच्चों की थी और फेल अभिभावक हो गए थे। परंतु इस बार तो हद की भी भद्द हो गई। परीक्षा बच्चों ने दी और रिजल्ट निकला तो फेल सरकार हो गई थी।
मित्रों,पहले तो इस साल के उत्तीर्णता प्रतिशत ने सरकार को नंगा करके रख दिया। जब स्कूल में योग्य शिक्षक होंगे ही नहीं,पढ़ाई होगी ही नहीं तो बच्चे परीक्षा के समय लिखेंगे कहाँ से और फेल तो होंगे ही। सो इस साल चूँकि परीक्षा केंद्रों पर बाहर से मदद को पूरी तरह से रोक दिया गया था बच्चे बड़ी संख्या में फेल हो गए। लेकिन असली खुल्ला खेल दरबारी का पता तो तब चला जब लगभग अंगूठा छाप रूबी राय कला में और सौरभ श्रेष्ठ विज्ञान के क्षेत्र में टॉप कर गए और पत्रकारों द्वारा पूछे गए साधारण सवालों का भी जवाब नहीं दे पाए।
मित्रों,पहले तो जाँच समिति बनाकर मामले को रफा-दफा करने की सोंची गई। लेकिन जब मामला तूल पकड़ने लगा तो सरकार की चूलें हिलने लगीं। मुख्यमंत्री को स्वयं सामने आकर अपने परम प्रिय स्नेहिल लालकेश्वर प्रसाद सिन्हा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर आपराधिक जाँच का आदेश देना पड़ा। लेकिन सवाल उठता है कि इतने बड़े पैमाने पर चलनेवाले खेल से क्या मुख्यमंत्री सचमुच पूरी तरह से नावाकिफ थे? क्या वे पहले से ही नहीं जानते थे कि लालकेश्वर दम्पति नटवरलाल है? अगर मुख्यमंत्री को पता था तो फिर लालकेश्वर को हटाकर पहले ही उसके,बच्चा राय और अन्य घोटालेबाजों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई? और अगर पता नहीं था हालाँकि मानने को जी तो नहीं चाहता है फिर अगर मान भी लिया जाए तो क्यों पता नहीं था? फिर राज्य सरकार की खुफिया एजेंसियाँ क्या कर रही थीं?
मित्रों,जैसा कि मैंने पिछले पाराग्राफ में कहा कि मानने को जी नहीं कर रहा है तो इसके पीछे भी ठोस कारण हैं। बतौर पूर्व सीएम जीतनराम मांझी जी नीतीश सरकार एक लंबे समय से पैसे लेकर अफसरों का ट्रांसफर-पोस्टिंग कर रही है। फिर अगर प्रत्येक पद को पैसे के लिए बेचा जाता है तो फिर खरीददार जब गड़बड़ करेगा तो विक्रेता को सूचना मिलने पर भी नजरंदाज करना ही पड़ेगा। लेकिन अपने नीतीश बाबू का कातिलाना अंदाज तो देखिए। पहले तो कई दिनों तक पूरी तरह से चुप्पी साधे रहे। फिर अचानक प्रकट हुए और अपने ही आदमी और आदमी की औरत को नटवरलाल कहकर मामले से पूरी तरह से पल्ला झाड़ लिया जैसे कि बेचारे को लता की तरह कुछ पता ही नहीं हो। मगर क्या दुश्शासन की गंध फैलने पर खबरों में शाहे बेखबर बन जाने मात्र से शासक अपराधमुक्त हो जाता है? क्या अपराधबोध से पूरी तरह से मुक्त होकर थेथर बन जाने से अपराध भी समाप्त हो जाता है? क्या जनता ने प्रदेश में अपराधवृद्धि होने पर उनसे और उनके डिप्युटी से यही सुनने के लिए उनके हाथों में सत्ता सौंपी थी कि ऐसा कहाँ नहीं होता है,किस राज्य में नहीं होता है?या फिर मामला उजागर होने के बाद जाहिर में यह सुनने के लिए कि किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा और भीतरखाने राजवल्लभ का बिछावन और तकिया डिटर्जेंट में धुलवा देने के लिए?
मित्रों,मैं कई साल पहले भी बिहार के बारे में लिए चुका हूँ कि मेरी सरकार खो गई है हुजूर! उस समय तो अराजकता का आगाज भर हुआ था। अब तो अराजकता अंजाम तक पहुँचने लगी है। उस समय सरकार यह नहीं कहती थी कि कहाँ नहीं हो रहा है कि झुठ्ठो खाली बिहार को बदनाम कर रहे हैं? नीतीश सरकार निश्चय-अनिश्चय हर मोर्चे पर फेल थी,फेल है और विषयवार फेल है। बात लीजिए हमसे और काम लीजिए हमारे पिताजी से की महान नीति पर चलने वाली सरकार के पास अगर उपलब्धि के नाम पर कुछ है तो सिर्फ दारू की खाली बोतल और सदियों से ताड़ी बेचकर जीविका उपार्जित करनेवाली पासी जाति की भुखमरी। 

सोमवार, 6 जून 2016

राहुल को कुछ भी बना दो वो रहेगा तो राहुल ही

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह.मित्रों,हमारे एक दादाजी थे.नाम था शिवबल्लभ सिंह.उनके ही एक ग्रामीण मेरे पिताजी के साथ महनार के आर.पी.एस. कॉलेज में इतिहास के प्रोफ़ेसर थे.बेचारे बस नाम के ही प्रोफेसर थे.अकबर का बाप कौन था और भारत छोडो आन्दोलन कब हुआ ये भी उनको पता नहीं था.नाम था कामता सिंह.एक बार हमने दादाजी से मजाक में कहा कि कामता बाबू तो अब प्रिंसिपल बनने वाले हैं.सुनते ही दादाजी ने कहा कि कमतावा पनिसपल भी बन जतई त कमतवे न रहतई यानि कामता प्रिंसिपल भी बन जाएगा तो कामता ही रहेगा.
मित्रों,मैं इस उदाहरण द्वारा कांग्रेस के उन नेताओं को सचेत करना चाहता हूँ जो इन दिनों राहुल गाँधी को पार्टी का अध्यक्ष बनाने का रट्टा लगाने में लगे हैं.वे लोग यह समझने को तैयार ही नहीं हैं कि राहुल गाँधी पार्टी और देश को नेतृत्व देने के लायक हैं ही नहीं.क्या पार्टी अध्यक्ष बनते ही राहुल अचानक सुपर इंटेलिजेंट बन जाएंगे? फिर तो पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी न हुई जादू हो गया? अगर ऐसा है तो फिर सोनिया जी तो अब तक इंटेलिजेंट नहीं हुईं जबकि वे १८ साल से कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष हैं?और अगर वे सचमुच इंटेलिजेंट थीं या अध्यक्ष बनने के बाद बन गयी हैं तो फिर उनको हटाने की जरुरत ही कया है?
मित्रों,वास्तविकता हो यह है कि कांग्रेस के दरबारी नेता नेहरु-गाँधी परिवार से आगे सोंच ही नहीं पाते हैं जबकि उनको भी पता है नेतृत्व का गुण आदमी अपने साथ लेकर पैदा होता है.न तो यह बाजार में बिकता है और न ही इसको जादू-मंत्र से किसी के अन्दर डाला जा सकता है.हमारे प्रधानमंत्री को तो नेतृत्व क्षमता प्राप्त करने के लिए किसी राजनैतिक परिवार में जन्म नहीं लेना पड़ा? उनमें यह गुण है और इतना ज्यादा है कि उन्होंने भारत को दुनिया का सिरमौर बनाने की ओर भी बला की तेजी से कदम बढ़ा दिया है.
मित्रों,अगर सिर्फ किसी खास कुर्सी पर बैठने से आदमी का कायाकल्प हो जाता तो फिर क्या जरुरत भी स्कूल,कॉलेजों और प्रशिक्षण संस्थानों की?दरअसल गुण कुर्सी में नहीं होता उसपर बैठनेवाले व्यक्ति में होता है.वर्ना इसी भारत के पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समय देश की क्या हालत थी और आज क्या है.
मित्रों,यूं तो मैं भविष्यवक्ता कतई नहीं हूँ लेकिन मुझे इस बात का आभास २०१४ के लोकसभा चुनाव के समय ही होने लगा था कि राहुल को अगर पीएम बनना है तो मनमोहन को हटाकर २४ घंटे के लिए भी बन जाएँ फिर ये दिन आए न आए.इसलिए तब ब्रज की दुनिया पर एक आलेख के द्वारा हमने उनसे ऐसा कर लेने की सलाह दी थी.लेकिन हमारी वे सुनने ही क्यों लगें?नहीं सुना तो अब तरसते रहिए अपने नाम से आगे प्रधानमंत्री लिखवाने के लिए.
मित्रों,अंत में मैं अपनी आदत के अनुसार कांग्रेसजनों को सलाह देना चाहूंगा कि भैये अध्यक्ष बनना तो खुद बन जाओ.काहे को बेचारे नादान परिंदे के पीछे पड़े हो?बेचारे को विदेश घूमने दो,दलितों के घर जाकर अपने साथ लाया खाना खाने दो और कुत्ते के द्वारा पवित्र किया हुआ बिस्किट खाने दो.काहे बेचारे की जिन्दगी ख़राब करने पर तुले हो? कहीं ऐसा न हो कि बिहारी टॉपर सौरभ श्रेष्ठ की तरह राहुल जी को भी कहना पड़ जाए कि अध्यक्ष बनाओगे कि मैं ......................

सोमवार, 30 मई 2016

ISIS करा रहा यूपी में दंगे!

लखनऊ (सं.सू.)। यूपी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को शक है कि आजमगढ़ में हाल में हुए दंगे में आईएस (इस्लामिक स्टेट) का हाथ हो सकता है। सुरक्षा एजेंसियों व यूपी पुलिस इस बात की जांच कर रही है। सूत्रों के मुताबिक यूपी के कई शहर इस्लामिक स्टेट की रडार पर है और इस्लामिक स्टेट इन शहरों में दंगे करवा सकता है। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक आजमगढ़ में हुए दंगे में सोशल नेटवर्किंग साइट्स का जमकर इस्तेमाल किया गया और इसके पीछे आईएस का हाथ हो सकता है क्योंकि इस्लामिक स्टेट को सोशल नेटवर्किंग का इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए करने में महारत हासिल है।

हाल में ही आतंकी संगठन आईएसआईएस के वीडियो में दिखे दो आतंकियों की पहचान हो गई है। जबसे सुरक्षा एजेंसियो को पता चला है कि दोनों आतंकी यूपी के आजमगढ़ के रहने वाले हैं। उसके बाद से एनआईए और उत्तर प्रदेश पुलिस चौकस हो गयी है। ये दोनों आतंकी इंडियन मुजाहिदिन के भगोड़े हैं।

सूत्रों की मानें, तो पुलिस ने वीडियो में दिखे दोनों आतंकी अबु राशिद अहमद और मोहम्मद बड़ा साजिद के आजमगढ़ स्थित घर पहुंचकर उनके घरवालों से पूछताछ की है और उनको इन दोनों का वीडियो दिखकर उनकी पहचान भी करवाई है। इस दौरान दोनों ही आतंकियों के घरवालों ने इन दोनों की पहचान भी की है।

गौरतलब है कि आईएस ने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें भारत में बाबरी मस्जिद, कश्मीर, गुजरात और मुजफ्फरनगर दंगे का बदला लेने की धमकी दी गई थी। ये वीडियो दक्षिण-एशिया जिहादियों पर आधारित आईएस का पहला वीडियो है। इस वीडियो में महाराष्ट्र में ठाणे के इंजीनियर के छात्र रहे अमन टंडेल का इंटरव्यू भी दिखाया गया है।

साथ ही शाहीम टंकी और फहाद शेख की कुछ तस्वीरें भी हैं। इस वीडियो में इन लोगों ने देश के कई बम धमाकों में अपनी भूमिका की बात कही है। इसके साथ ही इस वीडियो में अंजाम दी गई आतंकी घटनाओं, भारत से भागने और योजनाओं के बारे में बात की गई है।

एनआईए के मुताबिक आजमगढ़ निवासी राशिद वर्ष 2005 से 2008 तक इंडियमन मुजाहिदिन द्वारा किए गए बम धमाकों का संदिग्ध है। दूसरा आतंकी मोहम्मद साजिद भी आजमगढ़ का है, साजिद अहमदाबाद और जयपुर में हुए सीरियल बम ब्लास्ट में संदिग्ध है।

सूत्रों के मुताबिक इस वीडियो के बाद से एनआईए की एक टीम आजमगढ़ में कैम्प कर रही है और पुलिस की मदद से इन दोनों आतंवादियों के बारे में और जानकारी इकट्ठा कर रही है। टीम खुफिया तौर पर इस बात की भी जांच कर रही है कि कही इस इलाके के और भी लड़के इनके टच में तो नहीं आ गए हैं। टीम उस इलाके की सोशल मीडिया पर भी नज़र रख रही है।

कोहली का सपना टूटा, सनराइजर्स हैदराबाद आईपीएल-9 चैंपियन

बेंगलुरू (सं.सू.)। बेन कटिंग के आलराउंड खेल और गेंदबाजों की सही समय पर दिलाई गई शानदार वापसी से सनराइजर्स हैदराबाद ने क्रिस गेल के तूफान के सामने कुछ विषम पलों से गुजरने के बावजूद आज यहां बड़े स्कोर वाले फाइनल में सनराइजर्स हैदराबाद को आठ रन से हराकर पहली बार आइपीएल चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया। सनराइजर्स के गेंदबाजों का प्रदर्शन निर्णायक साबित हुआ क्योंकि एक समय गेल के 38 गेंदों पर चार चौकों और आठ छक्कों की मदद से बनाये गये 76 रन और कोहली (54) के एक और अर्धशतक से आरसीबी तेजी से जीत की तरफ बढ़ रहा था। आरसीबी का स्कोर 13वें ओवर में एक समय एक विकेट पर 140 रन था लेकिन इसके बाद सनराइजर्स के गेंदबाजों ने शिकंजा कसा और आखिर में कोहली की टीम को सात विकेट पर 200 रन तक ही पहुंचने दिया।

इससे पहले सनराइजर्स ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए डेविड वार्नर, कटिंग और युवराज सिंह के प्रयासों से सात विकेट पर 208 रन का मजबूत स्कोर खड़ा किया था। कप्तान वार्नर ने 38 गेंदों पर आठ चौकों और तीन छक्कों की मदद से 69 रन बनाये। कटिंग ने 15 गेंदों पर नाबाद 39 रन बनाये जिसमें तीन चौके और चार छक्के शामिल हैं। युवराज ने 23 गेंदों पर 38 रन की दमदार पारी खेली। सनराइजर्स पहली ऐसी टीम बन गई है जिसने लगातार तीन प्लेआफ जीतकर खिताब अपने नाम किया। उसने एलिमिनिटेर में कोलकाता नाइटराइडर्स और फिर दूसरे क्वालीफायर में गुजरात लायन्स को हराया था।

टूर्नामेंट में सर्वाधिक 23 विकेट लेने वाले भुवनेश्वर कुमार को आज भले ही कोई विकेट नहीं मिला लेकिन उनकी 13 गेंदों पर रन नहीं बने। उन्होंने चार ओवर में केवल 25 रन दिये। कटिंग ने 25 रन देकर दो विकेट लिये। गेल ने हालांकि एक समय सनराइजर्स के खेमे में चिंता की लहर दौड़ा दी थी। वेस्टइंडीज के इस विस्फोटक बल्लेबाज ने फाइनल से पहले 9 पारियों में 151 रन बनाये थे लेकिन आज उन्होंने शुरू में ताबड़तोड़ रन जुटाकर टीम पर से दबाव हटा दिया। पहले विकेट के लिये 114 रन की साझेदारी निभायी गयी जिसमें कोहली का योगदान 32 रन था। गेल ने बरिंदर सरां को शुरू में निशाने पर रखा और इस तेज गेंदबाज के पहले दो ओवरों में तीन गगनदायी छक्के लगाये। कटिंग का स्वागत उन्होंने छक्के और चौके से किया और जब मोएजेस हेनरिक्स ने गेंद थामी तो लांग आन पर सीधा छक्का जड़कर 25 गेंदों में अर्धशतक पूरा किया। हेनरिक्स के अगले ओवर में उन्होंने लगातार दो चौके और छक्के जड़कर उनके हताश कर दिया। आखिर में कटिंग की गेंद पर उन्होंने थर्डमैन पर हवा में लहराता कैच थमाया।

कोहली ने रणनीतिक बल्लेबाजी। उन्होंने वार्नर के तुरूप के इक्के मुस्तफिजुर रहमान को निशाना बनाया जिससे सनराइजर्स की टीम पर दबाव बनना स्वाभाविक था। आरसीबी कप्तान ने सरां पर छक्के से अपना अर्धशतक पूरा किया लेकिन इसी ओवर में उनकी गिल्लियां बिखर गयी जिससे उनका एक सत्र में 1000 रन पूरे करने का सपना अधूरा रह गया। कोहली ने 16 मैचों में 973 रन बनाये।

बिपुल शर्मा ने अगले ओवर में एबी डिविलियर्स (5) को आउट करके सनराइजर्स की कुछ उम्मीदें जगायी। केएल राहुल (11) भी नहीं चल पाये। कटिंग ने उनका आफ स्टंप थर्राया। उम्मीद थी कि वाटसन गेंदबाजी की अपनी कमी की यहां भरपायी करेंगे लेकिन वह भी 11 रन बनाकर पवेलियन लौट गये। स्टुअर्ट बिन्नी (9) ने मुस्तफिजुर के इस ओवर में छक्का जड़कर आरसीबी खेमे में कुछ जोश भरा लेकिन आखिरी दो ओवर में 30 रन बनाना आसान नहीं था। ऐसे में बिन्नी रन आउट हो गये। सचिन बेबी ने मुस्तफिजुर की गेंद छह रन के लिये भेजी जिससे अंतिम ओवर में 18 रन का लक्ष्य रह गया था और भुवनेश्वर ने नौ रन देकर अपनी टीम को जीत दिलायी।

इससे पहले वार्नर ने अपने गेंदबाजों पर पूरा भरोसा जताकर टास जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया और फिर अपनी शानदार फार्म जारी रखकर शिखर धवन 25 गेंदों पर 28 रन के साथ पहले विकेट के लिये 40 गेंदों पर 63 रन की साझेदारी करके ठोस शुरूआत दी। नयी गेंद संभालने वाले क्रिस गेल ने शुरू में किफायती गेंदबाजी की लेकिन आज शेन वाटसन का दिन नहीं था जो शुरू से आखिर तक रन लुटाते रहे।

वाटसन को शुरू में वार्नर ने निशाना बनाया जबकि डेथ ओवरों में कटिंग ने उन पर चार छक्के जड़े। वाटसन ने चार ओवर में 61 रन लुटाये। इनमें से 24 रन उन्होंने पारी के आखिरी ओवर में दिये जिसमें कटिंग के तीन छक्के शामिल हैं। वार्नर ने शुरू में वाटसन ही नहीं बल्कि गेल को भी आक्रमण से हटवाया था। उन्होंने एस अरविंद की गेंद पर थर्डमैन पर कैच थमाने से पहले केवल 24 गेंदों पर अपना अर्धशतक पूरा किया। आरसीबी को हालांकि पहली सफलता यजुवेंद्र चहल ने धवन को डीप स्क्वायर लेग पर कैच आउट कराकर दिलायी थी जबकि पिंच हिटर मोएजेस हेनरिक्स (चार) नहीं चल पाये थे। वार्नर ने आईपीएल नौ में कुल 848 रन बनाये।

युवराज ने क्रिस जोर्डन 45 रन देकर तीन विकेट और चहल की गेंदों को छक्के लगाये लेकिन सनराइजर्स की डेथओवरों में तेजी से रन बनाने की उम्मीदों को तब करारा झटका लगा जब दीपक हुड्डा (03) और युवराज तीन गेंद के अंदर पवेलियन लौटे। जोर्डन की गेंद पर युवराज सही टाइमिंग से शाट नहीं लगा पाये और एक्स्ट्रा कवर में वाटसन ने आगे गोता लगाकर कैच कर दिया। उन्होंने अपनी पारी में चार चौके और दो छक्के लगाये।

आखिरी ओवरों में रन बनाने का जिम्मा कटिंग ने बखूबी संभाला। उन्होंने वाटसन पर मिडविकेट पर खूबसूरत छक्का और फिर चौका लगाया लेकिन कोहली ने पारी का आखिरी ओवर फिर से इसी आलराउंडर को सौंप दिया। कटिंग ने अपने इस आस्ट्रेलियाई साथी पर कोई रहम नहीं दिखाया। पहली गेंद चार तो अगली दो गेंद छक्के के लिये गयी। इनमें से पहला छक्का तो 117 मीटर लंबा था जो स्टेडियम के बाहर चला गया। आखिरी गेंद भी कटिंग ने छक्का जड़ा।

-स्कोर कार्ड-
रायल चैलेंजर्स बेंगलूर
क्रिस गेल का बिपुल बो कटिंग 76
विराट कोहली बो सरां 54
एबी डिविलियर्स का हेनरिक्स बो बिपुल 05
लोकेश राहुल बो कटिंग 11
शेन वाटसन का हेनरिक्स बो मुस्तफिजुर 11
सचिन बेबी नाबाद 18
स्टुअर्ट बिन्नी रन आउट 09
क्रिस जोर्डन रन आउट 03
इकबाल अब्दुल्ला नाबाद 04
अतिरिक्त 09
कुल : 20 ओवर में, सात विकेट पर : 200
विकेट पतन : 1-114, 2-140, 3-148, 4-160, 5-164, 6-180, 7-194

गेंदबाजी
भुवनेश्वर 4-0-25-0
सरां 3-0-41-1
कटिंग 4-0-35-2
मुस्तफिजुर 4-0-37-1
हेनरिक्स 3-0-40-0
बिपुल 2-0-17-1

रायल चैलेंजर्स बेंगलूर
क्रिस गेल का बिपुल बो कटिंग 76
विराट कोहली बो सरां 54
एबी डिविलियर्स का हेनरिक्स बो बिपुल 05
लोकेश राहुल बो कटिंग 11
शेन वाटसन का हेनरिक्स बो मुस्तफिजुर 11
सचिन बेबी नाबाद 18
स्टुअर्ट बिन्नी रन आउट 09
क्रिस जोर्डन रन आउट 03
इकबाल अब्दुल्ला नाबाद 04
अतिरिक्त 09
कुल : 20 ओवर में, सात विकेट पर : 200

विकेट पतन : 1-114, 2-140, 3-148, 4-160, 5-164, 6-180, 7-194
गेंदबाजी
भुवनेश्वर 4-0-25-0
सरां 3-0-41-1
कटिंग 4-0-35-2
मुस्तफिजुर 4-0-37-1
हेनरिक्स 3-0-40-0
बिपुल 2-0-17-1
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कृषि क्षेत्र से बिचौलियों को समाप्त करने के लिए संकल्पित है सरकार-पीएम


नई दिल्ली (सं.सू.)। राष्ट्रीय कृषि बाजार को कृषि क्षेत्र के लिए क्रांतिकारी कदम करार देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि इससे किसानों को भरपूर फायदा होगा। किसानों की अर्थव्यवस्था में बड़ा परिवर्तन आने वाला है। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ेगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार कृषि से बिचौलियों को समाप्त करने के लिए संकल्पित है।

राष्ट्रीय कृषि बाजार पोर्टल के उदघाटन अवसर पर किसानों को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा कि यह कदम आर्थिक दृष्टि से कृषि जगत के लिए टर्निंग प्वाईंट होगा। उन्होंने कहा कि अब देश का किसान खुद फैसला करेगा कि उसका माल कब और कहां बिकेगा। उन्होंने देश के सभी राज्यों से आह्वान किया है कि वे इस पहल को प्राथमिकता दें। पीएम ने कहा कि वर्ष 2018 तक देश की सभी कृषि मंडियां राष्ट्रीय कृषि बाजार पोर्टल से जुड़ जाएंगी। इससे बाजार बढ़ेगा।

पीएम मोदी ने कहा कि बाजार के बढ़ने से किसानों को लाभ होगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय कृषि बाजार पोर्टल से किसान, बिचौलिए और उपभोक्ता तीनों को ही लाभ मिलेगा। किसानों को मंडी में अपना उत्पाद बेचने का विकल्प नहीं रहता था। लेकिन अब वह दूसरे मंडियों में भी अपना उत्पाद बेच सकेगा। इससे उसकी परेसानियां भी कम होंगी। उन्होंने देश के किसानों से भी आग्रह किया है कि वे खेती को टूकडों में बांट कर न देखें। बल्कि कृषि क्षेत्र में सोलर क्रांति का भी लाभ उठाएं।

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी के किसानों से पीएम ने आग्रह किया है कि वे पुआल जलाना बंद करें। इससे दिल्लीवालों को भी राहत मिलेगी। पर्यावरण बेहतर होगा। उन्होंने किसानों से कहा है कि वे पुआल से बेहत्तर खाद्द बना सकते हैं। इसके लिए कई वैज्ञानिक तरीके हैं। तो गन्ना किसानों से भी पीएम ने कहा है कि वे खेती में ड्रीप सिंचाई का इस्तेमाल करें। खेती में पानी की कम खपत का आग्रह करते हुए पीएम ने किसानों से कहा है कि जो स्वभाव बच्चों का होता है। वही पौधों का भी होता है। इसलिए अफरात पानी के बजाय पौधों में बूंद-बूंद पानी दें। किसानों से उन्होंने खेत की सेहत का भी ध्यान रखने का आग्रह किया है।

इस अवसर पर पीएम के साथ कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह, राज्य मंत्री संजीव बालियान भी उपस्थित थे। राष्ट्रीय कृषि बाजार पोर्टल अभी 8 राज्यों गुजरात, तेलंगाना, राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश, उत्‍तर प्रदेश, हरियाणा, झारखंड और हिमाचल प्रदेश के 21 मंडियों में शुरू हुआ है। इसे सफल बनाने के लिए राज्यों को अपने मंडी कानून में संशोधन करना पडेगा। पहले चरण में यह पोर्टल 12 राज्यों के 365 मंडियों में 25 सितंबर 2016 तक लागू होगा। मार्च 2018 तक देश की 585 मंडियों को पोर्टल से जोड़ा जाएगा। इसके जरिए 25 कृषि उत्पादों चना, कैस्‍टर सीड, धान, गेहूं, मक्‍का, हल्‍दी, प्‍याज, सरसों, महुआ फूल, इमली आदि की खरीद बेच की जा सकेगी।

विशेषज्ञ सरकार के इस दावे से पूरी तरह से सहमत नहीं दिख रहे कि यह व्यवस्था कृषि के स्वरुप को ही बदलकर रख देगी।

दावा: कृषि उत्‍पादों की खरीद-बिक्री में बिचौलियों की भागीदारी नहीं होगी, जिससे किसानों को बेहतर कीमत मिलेगी।

सवाल: यह कौन तय करेगा कि इस प्‍लेटफॉर्म पर खरीदार बिचौलिया नहीं है। बिचौलियों को रोकने के लिए सरकार ने क्‍या व्‍यवस्‍था की है?

दावा: खरीदारों के लिए खरीद लागत कम होगी, वहीं किसानों को कई मंडी-शुल्‍कों से राहत मिलेगी।

सवाल: दिल्‍ली का व्‍यापारी यदि उत्‍तर प्रदेश के किसान से फसल खरीदेगा तो उस फसल की ट्रांसपोर्टेशन लागत कौन वहन करेगा। किसानों के पास भंडारण की अपनी व्‍यवस्‍था नहीं है, तो वह फसल न बिकने तक उसे कहां रखेगा?

दावा: खरीदार और विक्रेता के लिए गुणवत्‍ता जांच प्रक्रिया लाई जाएगी।

सवाल: उत्‍पाद की गुणवत्‍ता जांच का खर्च कौन वहन करेगा?

रविवार, 29 मई 2016

ईमानदार सरकार के शानदार दो साल


मित्रों, मेरे एक मौसा थे। नाम था नवलकिशोर सिंह। फारबिसगंज में ठेकेदारी करते थे। बड़े ठेकेदार थे इसलिए उनके दरवाजे पर अक्सर लोगों का जमघट लगा रहता था। उनका एक नौकर था विशु। मौसा अक्सर विशु को घर से चाय बनवाकर लाने को कहते और जब तक वो आंगन में दाखिल भी नहीं हुआ होता कि आवाज लगाते विशु चाय लेकर आओ। कुछ ऐसी ही व्यग्रता की बीमारी हमारे देशवासियों को भी लग गई है। वे भी भूल गए हैं कि शीघ्रता को भी समय चाहिए।
मित्रों,भूलने से याद आया कि आपकी याद्दाश्त मुझसे तो जरूर अच्छी होगी क्योंकि अपने घर में मैं महाभुलक्कड़ के रूप में जाना जाता हूँ। जब भी बाजार से 4 चीजें लाने के लिए कहा जाता है तो शर्तिया मैं 2 चीजें ही लाता हूँ। तो मैं कह रहा था कि क्या आपको याद है कि दो साल पहले जब आपने मोदी सरकार के हाथों में देश की कमान दी थी तब क्यों दी थी और तब देश की हालत क्या थी?
मित्रों,आपको याद होगा कि तब घोटाले रोजाना की बात हो गए थे और उनमें से कुछ तो अब जाकर उजागर हो रहे हैं। आपको याद होगा कि नेवी के जहाजों और पनडुब्बियों का डूबना भी तब रोज-रोज का कार्यक्रम हो गया था। बिजलीघरों में कोयला नहीं था और सेना के पास गोला-बारूद। भारत की अर्थव्यवस्था भी ध्वस्त होने के कगार पर थी। देश के विकास को न केवल लूट-खसोट द्वारा व जानबूझकर अवरूद्ध कर दिया गया था बल्कि देश रिवर्स गियर में जाने लगा था। चीन हमें चारों तरफ से घेर रहा था और हमारी तत्कालीन केंद्र सरकार मौन समर्थन देने का कार्य कर रही थी। केंद्र सरकार अपने कार्यों और नीतियों के द्वारा बहुसंख्यक हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बना डालने पर आमादा थी। मानो हिंदू होना ही अपराध हो। पूर्वोत्तर और माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में भारत विरोधी शक्तियों का मनोबल इस कदर बढ़ गया था कि लगने लगा था कि सचमुच भारत तेरे टुकड़े होंगे हजार। 
मित्रों,कुल मिलाकर भारत को एक असफल राष्ट्र बना दिया गया था। हमारा प्राणों से भी प्यारा देश कई तरह के असाध्य रोगों से पीड़ित 21वीं सदी के एशिया का मरीज बन चुका था। अंधकार के ऐसे ही विकराल क्षणों में नरेंद्र मोदी उम्मीद की सतरंगी किरण बनकर हमारे सामने प्रकट हुए। उनके ओजस्वी भाषणों और गुजरात में उनके द्वारा किए गए कल्पनातीत विकास-कार्यों को देखते हुए आपने-हमने उन पर अपना विश्वास व्यक्त किया।
मित्रों,यह सही है कि किसी भी सरकार के लिए 2 साल कम नहीं होते लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि किस स्थिति में उनके हाथों में बागडोर सौंपी गई थी। आखिर असाध्य रोगी को ठीक करने और क्षयरोगी से महाबली बनाने में समय तो लगता ही है। इस सरकार ने बीमार को फिर से स्वस्थ बनाते हुए विदेशी पूंजी निवेश,ऊर्जा और आधारभूत संरचना के विकास के क्षेत्र में तो लाजवाब काम किया ही है विदेश नीति के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। सरकारी मिशनरी को त्वरित बनाने के लिए कई दर्जन आलसी अफसरों को घर बैठा दिया गया है। भ्रष्टाचार-नियंत्रण के क्षेत्र में भी विशेष काम हुआ है। डीबीटीएल के माध्यम से हजारों करोड़ रुपये तो बचाए ही गए हैं साथ ही विपक्ष भी परेशान है क्योंकि वह पिछले 2 सालों में सरकार पर 1 पैसे के घोटाले के भी आरोप नहीं लगा पाया है। मुद्दाविहीन विपक्ष कभी पीएम मोदी के सूट की बात करता है तो कभी टोपी की तो कभी पगड़ी की तो भी डिग्री की।
मित्रों,इसमें कोई संदेह नहीं कि अभी थोड़ा-सा ही काम हुआ है और काफी कुछ होना बाँकी है लेकिन फिर भी सिर्फ इसी कारण से हम सरकार की नीयत पर संदेह नहीं कर सकते फिर अभी तो सरकार के पास हमारे दिए हुए तीन साल का समय भी बचा हुआ है। हमें पूरा विश्वास है कि बचे हुए तीन सालों में बैंकिंग,कृषि,शिक्षा,कालाधन,स्वास्थ्य,पुलिस,महँगाई,रोजगार-निर्माण आदि के क्षेत्र में प्रभावकारी और युगांतरकारी कार्य होंगे। मेरे विचार से कृषि को लाभकारी बनाने की दिशा में काम करना सबसे ज्यादा जरूरी है क्योंकि हमारा अन्नदाता उत्पादन के घटने और ज्यादा होने दोनों की दशाओं में मारा जा रहा है। अभी-अभी महाराष्ट्र से आई एक खबर ने पूरे भारत तो झकझोर कर रख दिया है कि वहाँ के एक किसान ने एक टन प्याज बेचा तो उसे उसके बदले में मात्र 1 रुपया मिला। इस स्थिति को बदलना ही होगा क्योंकि पिछली सरकारों के शुतुरमुर्गी रवैये का ही यह नतीजा है कि आज हमारे किसानों के समक्ष जीने का कोई रास्ता शेष नहीं बचा है। अकेले महाराष्ट्र के नासिक जिले के लासलगांव में ही जनवरी 2015 से अब तक 26 प्याज-उत्पादक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। साथ ही हम चाहते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कानून बने जिससे राज्य सरकार के नाकारा और भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों की भी छँटनी की जा सके।
मित्रों,जब हम तीनों लोकों में जमकर घोटाले करनेवाले चोर-लुटेरों को लगातार 2 बार चुन सकते हैं तो फिर हम एक स्वच्छ,देशभक्त और ईमानदार सरकार को क्यों उसके अधिकार के 3 और साल नहीं देना चाहते? एक 66 साल का बूढ़ा आखिर हमारे लिए,हमारे देश और हमारे जीवन को बदलने के लिए ही तो साल के तीन सौ पैंसठो दिन दिन और रात के 20-20 घंटे लगातार अनथक परिश्रम कर रहा है। आपको याद है कि पहले कभी इतिहास में भारत एफडीआई के मामले में दुनिया का सिरमौर बना था? यहाँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 2014 में भारत सूची में 5वें स्थान पर था। क्या पहले कभी भारत मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में दुनिया में छठे स्थान पर आया था? चीन और पाकिस्तान को छोड़ ईरान समेत पूरी दुनिया ने क्या कभी इस तरह भारत को हाथोंहाथ लिया था? क्या पहले कभी भारत विकास दर के मामले में दुनिया में नंबर 1 हुआ था? यह उसी लौहमानव की मेहनत और अनुशासन का तो परिणाम है कि इतिहास में पहली बार दुनिया की एकमात्र महाशक्ति अमेरिका भारत-पाकिस्तान को एक ही तराजू पर तोलने की बजाए खुलकर भारत का समर्थन कर रहा है। क्या पाकिस्तान और चीन भारत से और भ्रष्टाचारी तत्त्व केंद्र सरकार से कभी इतने भयभीत थे जितने कि आजकल हैं? क्या ये इस बात के संकेत नहीं हैं कि भारत न केवल बदल रहा है बल्कि दुनिया को बदलने की क्षमता भी हासिल कर रहा है। वो भी धीरे-धीरे नहीं बिजली की गति से।

शनिवार, 7 मई 2016

डिग्री न देखो,योग्यता को देखो,डिग्री ने भारत को लूटा

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह.मित्रों,काफी दिन पहले हमने छठी जमात की अपनी पाठ्य-पुस्तक में आचार्य विनोबा भावे द्वारा लिखित एक निबंध पढ़ा था-जीवन और शिक्षण.उसमें लेखक ने कहा था कि हमारी शिक्षा-प्रणाली एकदम बेकार है क्योंकि पढाई गयी बातें जीवन में काम नहीं आती हैं.जब विद्यार्थी पढाई पूरी कर लेता है तो उसके सामने आजीविका की भयंकर समस्या खडी हो जाती है.एकदम से व्यक्ति को आँख बंद कर हनुमान जी की तरह जीवन के क्षेत्र में कूदा दिया जाता है.
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि जिंदगी में योग्यता ही काम आती है,हुनर काम आता है डिग्री काम नहीं आती लेकिन इन दिनों देखने में आ रहा है कि कुछ लोग भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री और अन्य केंद्रीय मंत्रियों की डिग्रियों और जन्मतिथि के पीछे पड़े हुए हैं.ऐसा लगता है जैसे पीएम और उनके मंत्री सरकारी नौकरी में हैं जहाँ से उनको निर्धारित वेतन मिलता है और जहाँ से वे एक दिन रिटायर हो जाएँगे और उसके बाद उनको पेंशन मिलेगा.
मित्रों,भारत ने इससे पहले भारी-भरकम डिग्रियों वाले कम-से-कम तो पी.एम. तो देखे ही हैं-१.पीवी नरसिंह राव और २.मनमोहन सिंह.भारत ने यह भी देखा कि दोनों के समय में उनकी डिग्रियों से कई गुना ज्यादा घोटाले हुए. देश को पी.एम. का काम चाहिए न कि डिग्री.बिना व्यावहारिक ज्ञान और ईमानदारी के भारी-भरकम डिग्री वाला नेता लेकर क्या देश को उसकी डिग्रियों को लेकर चाटना है? क्या देश के लिए इतना ही काफी नहीं है कि २ साल में ही भारत चीन की आँख में आंख डालकर बात करने लगा है,एफ.डी.आई. का दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है,विनिर्माण के क्षेत्र में ८वें से ६ठे स्थान पर आ गया है,पिछले दो सालों में कोई घोटाला नहीं हुआ है,गरीबों को पहली बार बैंकों से जोड़ा गया है और बिचौलियों को समाप्त करने की दिशा में पहली बार काम हो रहा है,पहली बार हर खेत को पानी देने की दिशा में सही तरीके से काम हो रहा है,एन.एच. और रेल लाईन निर्माण में अभूतपूर्व तेजी आई है,चलती ट्रेन में ही ट्विटर के जरिए समस्या का समाधान हो जाता है,पहली बार भ्रष्टाचारी नेता जेल भेजे जाने लगे हैं इत्यादि-इत्यादि?
मित्रों,इतिहास गवाह है कि भारत में ऐसे सैकड़ों महान व्यक्ति हो चुके हैं जो मैट्रिक तक पास नहीं थे.आज कबीर,निराला और जयशंकर प्रसाद को कौन नहीं जानता?राजकपूर से बड़ा कोई फ़िल्मकार हुआ भी है क्या?कहने का तात्पर्य यह है कि मोदी और उनके मंत्रियों की डिग्रियों के पीछे वही लोग पड़े हुए हैं जिनका काम ही सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना है और प्रत्येक स्थिति में आलोचना करनी है.खुद तो आलोचक जी आई.आई.टी. से जिंदल की कृपा से पढ़े हैं शायद इसलिए उन्होंने अब तक दिल्ली में ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे साबित होता हो कि उनको दिल्ली की जनता और जनता की भलाई से कोई मतलब भी है.जबसे ये सत्ता में आए हैं कभी औड तो कभी इवेन के चक्कर में जनता को उलझाए रखा है.जहाँ ये लोग करना थोडा और ढिंढोरा बहुत का करने में लगे हैं वहीं मोदी सरकार चुपचाप काम करने में लगी है.अब उसका काम धरातल पर दिखने भी लगा है और भारत की जनता अंधी तो बिल्कुल भी नहीं है.जनता देख रही है कि कौन दिन-रात बिना छुट्टी लिए देश के लिए काम कर रहा है और कौन बिना विभाग का मुख्यमंत्री बनकर फिल्मों की समीक्षा लिख रहा है,स्वीटजरलैंड में छुट्टियाँ मना रहा है और रायता फैला रहा है.

रविवार, 1 मई 2016

भगवा आतंकवाद गढ़नेवालों को मिले मृत्युदंड

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह।मित्रों,हमारी आशंका ५ साल बाद सही साबित हुई है। हमने ५ साल पहले २ जनवरी,२०११ को जब तत्कालीन केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी जबरदस्ती भगवा आतंकवाद शब्द गढ़ने और शब्द को सही साबित करने के लिए झूठी अफवाह फैला रही थी,कई निर्दोष हिन्दू नेताओं और सन्यासियों को प्रताड़ित कर रही थी तब अपने आलेख

हिन्दू आतंकवाद सच्चाई कम साजिश ज्यादा

में

कहा था कि कोई गोब्यल्स चाहे कितनी ही बार इस शब्द और इससे जोड़ी जानेवाली अंतर्कथा को क्यों न दोहराए मैं नहीं मानूंगा कि भारत में कोई भगवा आतंकवाद जैसी चीज अस्तित्व में भी है।
मित्रों,सौभाग्यवश आज यह दिवार पर लिखी ईबारत की तरह साफ हो चुका है कि कांग्रेस ने जान-बूझकर पहले इस विरोधाभासी शब्द को गढ़ा और फिर उसको सही साबित करने की साजिश रची।खुलासे तो यह भी बता रहे हैं कि दुनिया के सबसे सहिष्णु धर्म हिन्दू को बदनाम करने के लिए कांग्रेस ने पाकिस्तान और पाकिस्तानी आतंकी संगठनों की भी मदद ली।संकेत तो ऐसे भी हैं कि हिंदुस्तान के १ अरब से भी ज्यादा हिन्दुओं को बदमान करने और नीचा दिखाने की यह अति घिनौनी साजिश १० जनपथ में रची गयी।
मित्रों,बहुत जल्द इस साजिश में कारण बेवजह जेल में अपने जीवन के बहुमूल्य सालों को गुजारने को मजबूर किए गए लोग बाहर भी आ जाएंगे लेकिन क्या इसके साथ ही इस मामले का पटाक्षेप हो जाएगा या हो जाना चाहिए? मेरी मानें तो कदापि नहीं! आखिर यह १ अरब लोगों की मानहानि का सवाल है जिनको एक ऐसे संप्रदाय के साथ एक ही तराजू पर तोलने की कोशिश की गयी जिनसे आज पूरी दुनिया परेशान है।
मित्रों,सवाल उठता है कि हम हिन्दुओं की ईज्जत और जज्बात के साथ छेड़छाड़ करनेवालों को क्या दंड मिलना चाहिए।मेरे हिसाब से तो उनको सीधे मृत्युदंड मिलना चाहिए।हो सके तो इसके लिए संविधान और कानून में बदलाव किया जाए।अगर ऐसा करना किसी भी तरीके से संभव न हो तो उनको कानूनन जितनी अधिकतम सजा मिल सकती है मिलनी चाहिए।उनमें से कोई भी बचना नहीं चाहिए जिससे उनको और उनकी तरह देशविरोधी सोंच रखनेवाले शरारती तत्त्वों को एक सबक मिल सके और वे भविष्य में इस तरह की शरारत न कर सकें।साथ ही इस बात की भी गहराई से जाँच करवाई जाए कि अभी भी देश में ऐसे कौन-से लोग हैं जो भारत विरोधी सीमापार और सुदूर की शक्तियों के इशारे पर नागिन डांस कर रहे हैं।

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

ताड़ी व्यवसायियों के पक्ष में आज धरना देंगे पासवान

पटना (सं.सू.)। केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान ताड़ी की बिक्री पर प्रतिबंध के खिलाफ सोमवार को राजधानी में धरना देंगे। रविवार को लोजपा कार्यालय में पासवान ने इसकी घोषणा की। संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने ताड़ी की खूब वकालत की और गर्दनीबाग के धरनास्थल पर धरना पर बैठने का ऐलान किया। वहीं जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर राजनीतिक हमला भी किया। पासवान ने कहा कि राजनीतिक कलाकारी करना तो कोई नीतीश कुमार से सीखे।

उन्होंने कहा कि गजब का बुद्धि है, 17 साल तक भाजपा और आरएसएस  के गोद में  बैठे रहे। अब संघ मुक्त भारत की बात करते हैं। दस साल तक लोगों को शराब पिलाया और अब बंद करने की बात कर रहे  हैं। दोपहर बाद भाजपा कार्यालय पहुंचे पासवान ने कहा कि नीतीश कुमार से बड़ा कलाकार कोई हो नहीं सकता। प्रधानमंत्री के सवाल पर पासवान ने कहा कि नीतीश कुमार संघमुक्त के पहले बिहार के अपराध मुक्त करें। उन्हें देश में घूमने की सलाह भी दी। जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद पर निशाना साधते हुए कहा कि आज जो लोग मंडल मसीहा बन  रहे हैं उनका पहले कहीं पता नहीं था। वीपी सिंह को ये लोग भूल गए।  इसके पहले लोजपा कार्यालय में पासवान ने कहा है कि ताड़ी शराब नहीं है। यह आम, लीची की तरह रस है।

गांधी जी ने इसे नीरा कहा था। इसकी तुलना शराब से नहीं की जा सकती है। 1991 में लालू प्रसाद ने इस पर छुट दी थी। जब लालू प्रसाद ने ताड़ी पर छुट दी थी तो चुनाव के दौरान हाजीपुर में मेरे पक्ष में नारा लगता था - एक रुपया में तीन गिलास-जीतेगा भाई राम विलास। पता नहीं लालू प्रसाद अब नीतीश कुमार से क्यों डर रहे है। शायद कह दिया होगा कि हम पीएम होंगे और बिहार तुम्हारे लिए छोड़ देंगे। पासवान ने चुनौती दी कि कोई सुबह पांच बजे का ताड़ी एक साल तक पीये, यदि उसका हेल्थ खराब होगा तो हम राजनीति छोड़ देंगे। पासवान ने कहा कि जब उनकी आंख खराब हो गयी थी तो डॉक्टर ने उन्हें ताड़ी पीने के लिए कहा था। जब हमें अच्छा नहीं लगा तो पीना छोड़ दिया।

पीएम नरेंद्र मोदी की ग्रामोदय से भारत उदय की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि नरेंद्र माेदी पहला विजनरी पीएम है जिसने बाबा साहेब अंबेडकर से जुड़े पांच स्थलों को विकसित करने का निर्णय लिया। जिसमें उनके जन्म स्थान महु, 26 अलीपुर रोड जहां उन्होंने संविधान लिखा, चैत्य भूमि, जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ, लंदन में जहां उन्होंने पढ़ाई की उसे सरकार ने खरीद कर राष्ट्रीय  स्मारक घोषित किया और नागपुर जहां उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार घूम -घूम कर कहते हैं कि लोगों को दो रुपये किलो अनाज दे रहे हैं, हकीकत है कि शत-प्रतिशत सबसिडी केंद्र सरकार देती है। हमने तो विधानसभा चुनाव के दौरान घोषणा भी की थी कि बिहार में सरकार बनी तो लोगों को मुफ्त अनाज देंगे। केंद्र अनाज पर एक लाख तीस हजार करोड़ रुपये सब्सिडी देती है।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

गिरगिटों के ताऊ नीतीश कुमार

मित्रों,राजनैतिक साहित्य में जंतु अलंकारों का अपना ही महत्व है. फिर बिहार का तो कहावतों की प्रचुरता में भी कोई सानी नहीं है.जैसे गंगा गए तो गंगा दास और जमुना गए तो जमुना दास या फिर जिधर देखी खीर उधर गए फिर,दोमुंहा सांप,गिरगिट.मगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश जी तो काफी पहले ही जंतु विज्ञान और अन्य कहावतों से ऊपर उठ चुके हैं.
मित्रों,आपको याद होगा कि नीतीश कुमार १८ सालों तक संघ के साथ रहे.आज नीतीश कुमार जो कुछ भी हैं वो निवर्तमान बड़े भाई लालू जी की वजह से नहीं हैं बल्कि संघ परिवार की देन है.सच तो यह भी है कि पहली बार जब लालू जी बिहार के सीएम बने थे तो भाजपा के ही समर्थन से.फिर वही नीतीश अब किस मुंह से भारत से संघ परिवार के खात्मे की बात कर रहे हैं?इससे पहले नीतीश जी लालू जी से हाथ मिला कर भी पूरी दुनिया के गिरगिटों को शर्मिंदा कर चुके है. कभी हमने कांग्रेस को ७ घूंघटों वाला चेहरा कहा था लेकिन अब समझ में नहीं आता है कि नीतीश कुमार जी के लिए उपमा कहाँ से लाऊं?लगता है कि हमें नीतीश कुमार जी की रंग बदलने की कला की तुलना दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल से करके काम चलाना पड़ेगा जो १ दिन में ही कई-कई बार रंग बदल लेते हैं.
मित्रों,इन दिनों नीतीश कुमार जी पीके अर्थात प्रशांत किशोर की सलाह पर शराबबंदी को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की मुहिम चलाने में पिले हुए हैं मानों बिहार में पहले किसी ने शराबबंदी के लिए कदम ही नहीं उठाया या फिर किसी और की सरकार ने बिहार के गाँव-गाँव में शराब की दुकानें खोल दी थी जबकि सच्चाई यह है कि कई दशक पहले कर्पूरी ठाकुर ने भी कोशिश की थी लेकिन भ्रष्ट प्रशासन के कारण होनेवाली तस्करी ने उनके सद्प्रयास पर गरम पानी फेर दिया था.सच्चाई यह भी है कि हर चौक-चौराहे पर शराब की दुकानें और किसी ने नहीं बल्कि स्वयं नीतीश कुमार की सरकार ने ही खुलवाई थी.वैसे ये बात भी किसी से छिपी हुई नहीं है कि बिहार आज भी भारत के सबसे ज्यादा भ्रष्ट राज्य है फिर नीतीश कुमार कैसे सफल होंगे?वैसे चाहते तो हम भी हैं कि बिहार सही मायनों में अल्कोहल मुक्त प्रदेश बने और भारत अल्कोहल मुक्त देश.
मित्रों,अच्छा रहेगा कि पीके की सलाह पर कोरा दिखावा करना बंद करके और केजरी सर के साथ गिरगिटपने में प्रतियोगिता करना छोड़कर नीतीश जी सरकार के कामकाज पर ध्यान दें क्योंकि इन दिनों बिहार में सारे विकासपरक कार्य बंद हैं.कहीं अदालत परिसर में बम फट रहे हैं तो कहीं निर्माण एजेंसियों के यंत्रों को आग के हवाले किया जा रहा है तो कहीं रामनवमी के जुलूस पर हमले हो रहे हैं.यहाँ तक कि विधायक की बहन भी सुरक्षित नहीं रह गयी है.दारोगा भी सुरक्षित नहीं रह गए हैं.हर जगह,हर विभाग में अराजकता और कुव्यवस्था है.लगता है जैसे वह समय आ गया है कि जिस तरह से बसों में लिखा होता है कि यात्री अपने सामान की रक्षा स्वयं करें उसी तरह से बिहार के सारे सार्वजनिक स्थानों पर नीतीश कुमार उर्फ़ डेंटिंग पेंटिंग मास्टर को लिखवा देना चाहिए कि बिहारवासी अपने माल के साथ-साथ अपनी जान की भी रक्षा स्वयं करें.उधर राज्य के हैंड पम्प जिनमें भ्रष्टाचार के चलते आधे-अधूरे पाईप लगाकर पूरा पैसा बनाने का काम आजादी के बाद से ही लगातार चल रहा है सूखने लगे हैं और ईधर नीतीश कुमार जी अगले ५ सालों में सभी घरों में नलके का पानी उपलब्ध करवाने के वादे करने में लगे हैं.मतलब कि मिल तो चावल का माड़ भी नहीं रहा है और सपने बिरयानी के दिखाए जा रहे हैं क्योंकि भारत में हमेशा से न तो सपने देखने और न ही दिखाने पर कभी कोई रोक रही है.उस पर नीतीश कुमार जी तंज कस रहे हैं नरेन्द्र मोदी के ऊपर कि कालाधन का क्या हुआ?नीतीश जी को अपने हिस्से का १५ लाख भी चाहिए.कालाधन सहित सारे क्षेत्रों में जो होना चाहिए मोदी सरकार कर रही है और पूरी तरह से साफ़-सुथरे तरीके से जी-जान से कर रही है और इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि इन दिनों पिछले ७५ सालों में सत्ता में रहे सारे भ्रष्टाचारी १ ही नाव पर सवार हो गए हैं.वर्ना आज से २ साल पहले किसने कल्पना की थी कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट और लालू और नीतीश एकसाथ चुनाव लड़ेंगे? नीतीश जी चाहे जितनी सफाई से शब्दों की हेरा-फेरी कर लें सच्चाई तो यह है कि आज भारत में लोकतंत्र बिल्कुल भी खतरे में नहीं है बल्कि अगर कुछ खतरे है तो वो है छद्मधर्मनिरपेक्षता और तुष्टिकरण की गन्दी और भारतविरोधी राजनीति.नीतीश जी को इन दिनों जिसका अगुआ बनने का चस्का लगा हुआ है.

रविवार, 3 अप्रैल 2016

साम्यवाद,समाजवाद,गांधीवाद और राष्ट्रवाद

मित्रों,भारत ने हमेशा से ही स्वतंत्र विचारों और विचारधाराओं को सम्मान दिया है। हमारे भारत में कभी किसी मंसूर बिन हल्लाज को देश और समाज से अलग सोंच रखने के कारण जिंदा आग में नहीं झोंका गया,न तो किसी सुकरात को विषपान कराया गया और न ही किसी ईसा को सूली पर ही चढ़ाया गया। हमारा वेद कहता है मुंडे मुंडे मति भिन्नाः और जैन तीर्थंकर कहते हैं स्याद अस्ति स्याद नास्ति यानि शायद मैं कहता हूँ वह ठीक है या हो सकता है कि आप जो कहते हैं वह सही है।
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है भारत में हमेशा से प्रवृत्ति और निवृत्तिवादी दोनों तरह की विचारधाराएँ एकसाथ पल्लवित-पुष्पित होती रही हैं। वर्तमान भारत में भी कई तरह के वाद प्रचलन में हैं जिनमें साम्यवाद,समाजवाद,गांधीवाद और राष्ट्रवाद प्रमुख हैं। इनमें से ढोंगी तो सारे वाद वाले हैं। उत्पत्ति की दृष्टि से विचार करें तो इनमें से साम्यवाद और समाजवाद की उत्पत्ति विदेश की है जबकि गांधीवाद और राष्ट्रवाद ने भारत में जन्म लिया है।
मित्रों,साम्यवाद कहता है कि संसार में दो तरह के वर्ग हैं और उन दोनों में संघर्ष चलता रहता है। एक दिन यह संघर्ष चरम पर पहुँचेगा और तब दुनिया पर सर्वहारा वर्ग का शासन होगा और तब न तो कोई गरीब होगा और न ही कोई अमीर क्योंकि निजी संपत्ति भी नहीं होगी। साम्यवाद हिंसा की खुलकर वकालत करता है और मुसलमानों की तरह उसके लिए भी देशों की सीमाओं का कोई मतलब नहीं है बल्कि वह आह्वान करता है कि दुनिया के मजदूरों एक हो। यही कारण है कि आज देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा साम्यवादी हिंसा की चपेट में है। यही कारण है कि जब चीन ने भारत पर हमला किया तब भारत के साम्यवादियों ने चीन का समर्थन किया। यही कारण है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय चूँकि रूस इंग्लैंड एक साथ लड़ रहे थे इसलिए भारतीय साम्यवादियों ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया। चाहे वो दंतेवाड़ा के जंगलों के बर्बर नरपशु साम्यवादी हों या फिर संसद में घंटों बहस लड़ानेवाले सीताराम येचुरी वैचारिक रूप से सब एक हैं। जिस तरह आतंकवाद बुरा या अच्छा नहीं होता उसी तरह से साम्यवाद भी बुरा या भला नहीं होता सबके सब भारतविरोधी और अंधे होते हैं। अंधे इसलिए क्योंकि उनको अभी भी यह नहीं दिख रहा कि करोड़ों लोगों के नरसंहार के बाद शासन में आए साम्यवाद ने रूस,पोलैंड,चीन,पूर्वी जर्मनी,उत्तरी कोरिया आदि का क्या हाल करके रख दिया था और बाद में लगभग सभी साम्यवादी देशों को अस्तित्वरक्षण हेतु किस तरह पूंजीवाद की ओर अग्रसर होना पड़ा। भारत के साम्यवादी लालची और भ्रष्ट भी कम नहीं हैं। वे चिथड़ा ओढ़कर घी पीने में लगे हैं।
मित्रों,इसके बाद बारी आती है समाजवाद की यानि ऐसी विचारधारा की जो साम्यवाद की ही तरह मानती है कि सबकुछ सारे समाज का होना चाहिए लेकिन लक्ष्यप्राप्ति अहिंसक तरीके से होनी चाहिए,लोकतांत्रिक तरीके से होना चाहिए। मगर भारतीय समाजवाद बहुत पहले ही अपने मार्ग से भटक चुका है। आरंभ में लोहिया-जेपी का झंडा ढोनेवाले समाजवादी आज निहायत सत्तावादी और आत्मवादी हो चुके हैं। लगभग सारी-की सारी समाजवादी पार्टियाँ किसी-न-किसी परिवार की निजी सम्पत्ति बनकर रह गई हैं और अपने-अपने परिवारों के साथ राज भोग रही हैं। उनका न तो देशहित से ही कुछ लेना-देना है,न तो प्रदेशहित से और न ही गरीबों से। सबै भूमि गोपाल की के पवित्र सिद्धांत से शुरू हुआ यह आंदोलन आज सबै कुछ मेरे परिवार की के आंदोलन में परिणत हो चुका है। बहुजनवादी और दलितवादी पार्टियों का भी कमोबेश यही हाल है।
मित्रों,भारत में अगर सबसे ज्यादा किसी वाद का दुरूपयोग किया गया है वह है गांधीवाद। कांग्रेस ने गांधीजी के नाम को तो अपना लिया लेकिन गांधी की विचारधारा को विसर्जित कर दिया। आज कांग्रेस ने घोर राष्ट्रवादी रहे गांधीजी को प्रिय रहे नारों वंदे मातरम् और भारत माता की जय तक से किनारा कर लिया है। आज कांग्रेस पार्टी सिर्फ मुस्लिम हितों की बात करनेवाली मुसलमानों की पार्टी बनकर रह गई है। उसका एकमात्र लक्ष्य हिंदू समाज और भारतीय संस्कृति के विरूद्ध बात करना, ऐन-केन-प्रकारेण सत्ता प्राप्त करना और फिर जमकर भ्रष्टाचार करना रह गया है। कांग्रेस गांधीवाद को पूरी तरह से छोड़ चुकी है बल्कि उसके लिए गांधीछाप ही सबकुछ हो गया है। उसकी प्राथमिकता सूची में न तो देश के लिए ही कोई स्थान है और न तो देशहित के लिए ही। जहाँ समाजवादी पार्टियाँ एक-एक संयुक्त परिवारों की संपत्ति बन चुकी हैं वहीं दुर्भाग्यवश कांग्रेस एक एकल परिवार की निजी संपत्ति बनकर रह गई है। आज कांग्रेस किसी विचारधारा का नाम नहीं है बल्कि पारिवारिक प्राईवेट कंपनी का नाम है। जहाँ तक तृणमूल कांग्रेस का सवाल है तो यह कांग्रेस और साम्यवाद के समन्वय से उपजी क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी है इसलिए उसमें एक साथ इन दोनों के अवगुण उपस्थित हैं।
मित्रों,अंत में बारी आती है राष्ट्रवाद की। एकमात्र यही एक विचारधारा है जो तमाम कमियों के बावजूद भारत के उत्थान की बात करती है। भारत को फिर से विश्वगुरू बनाने,एक विकसित राष्ट्र बनाने के सपने देखती है फिर भी यह देश का दुर्भाग्य है कि इस विचारधारा को देश की जनता हाथोंहाथ नहीं ले रही है। एक तरफ तो राष्ट्रवादियों को इस बात पर गहराई से विचार करना होगा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और अपने संगठन और सोंच के भीतर वर्तमान सारी कमियों को दूर करना होगा। तो वहीं भारत की महान जनता को समझना होगा कि देश और देशवासियों से समक्ष एकमात्र विकल्प राष्ट्रवाद ही है क्योंकि बांकी के वाद अलगाववादियों का समर्थन करते हैं, देश को बर्बाद करने की बात करते हैं। राष्ट्र की बात नहीं करते देश के किसी न किसी भूभाग या जनता के किसी-न-किसी हिस्सेभर की बात करते हैं। उन सभी वादों के मजबूत होने अथवा राष्ट्रवाद के कमजोर होने का अर्थ है भारत का कमजोर होना।

जो गलतियों को बार-बार दोहराये उसे भाजपा कहते हैं

मित्रों,मिड्ल स्कूल में मेरे गुरू रहे श्री श्रीराम सिंह कहा करते थे कि जो गलती को दोहराता नहीं उसे भगवान कहते हैं,जो गलतियों को दोहराए उसे इंसान कहते हैं और जो गलतियों को बार-बार दोहराए उसे शैतान कहते हैं। परंत अप्रैल-मई में चार राज्यों में चुनाव होनेवाले हैं और दुर्भाग्यवश भारत की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी भाजपा जिस पर पूरे देश की उम्मीदें टिकी हुई हैं वो भी बार-बार उन्हीं गलतियों को दोहरा रही है जो उसने पिछले यूपी और हालिया दिल्ली व बिहार चुनावों के समय किए थे।
मित्रों,आपको याद होगा कि पिछले विधानसभा चुनावों में जबकि चुनाव-प्रचार अपने पूरे उरूज पर था तब भाजपा ने बसपा के दागी मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा में अपनी पार्टी में शामिल कर लिया था। चुनावों में इस गलती का जो परिणाम भाजपा को और यूपी की जनता को भुगतना पड़ा वह पिछले 4 सालों से आपलोग भी देख रहे हैं। ठीक उसी तरह की गलती भाजपा ने केरल में दागी क्रिकेट खिलाड़ी एस. श्रीसंत को पार्टी में शामिल करके की है। लगता है जैसे भाजपाइयों का दिमाग ऐन चुनाव के वक्त घास चरने चला जाता है।
मित्रों,अगर हम चुनावी जुमलों की बात करें तो आपको याद होगा कि 2014 के लोकसभा चुनावों के समय नरेंद्र मोदी सहित तमाम भाजपा नेताओं ने चीख-चीखकर कहा था कि बांग्लादेशी घुसपैठी अब बोरिया-बिस्तर बांधना शुरू कर दें क्योंकि केंद्र में भाजपा की सरकार के बनते ही उनकी घर-वापसी की प्रकिया शुरू हो जाएगी लेकिन हम देखते हैं कि अब जबकि प. बंगाल और असम जहाँ कि घुसपैठ ने जनसांख्यिकी को बिगाड़कर रख दिया है में चुनाव-प्रचार जारी है भाजपा घुसपैठ पर लगाम लगाने के वादे कर रही है घर-वापसी का जिक्र तक नहीं कर रही। ऐसे में जनता इस बात को लेकर कैसे मुतमईन हो सकती है कि वर्तमान चुनावों में भाजपा जो वादे कर रही है वो चुनावी जुमला नहीं है।
मित्रों,तमाम मीडिया-सर्वेक्षण बता रहे हैं कि चार राज्यों में से सिर्फ असम में भाजपा टक्कर में है वरना प. बंगाल,केरल और तमिलनाडु में उसका खाता भी खुल जाए तो गनीमत है। हमने देखा कि ग्रासरूट लेवल तक गहन जनसंपर्क करके आप पार्टी ने कैसे दिल्ली में भाजपा को करारी शिकस्त दी। आखिर वही रणनीति अपनाने में भाजपा को समस्या क्या है? पार्टी के मिस्ड कॉल अभियान के बाद हमने पार्टी को सलाह दी थी कि अब पार्टी को उन लोगों से सीधा संपर्क करके सदस्यता प्रपत्र भरवाना चाहिए लेकिन लगता है कि पार्टी नेताओं को एसी में रहने की बीमारी हो गई है। मोदी और शाह यह तो चाहते हैं कि भाजपा इतनी शक्तिशाली हो जितनी कि 50 के दशक में कांग्रेस थी लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं से पसीना बहवाना नहीं चाहते। उनको अभी भी भ्रम है कि हर ब्लॉक या जिला मुख्यालय में पीएम की सभा आयोजित कर देने मात्र से ही चुनाव जीता जा सकता है। उधर यूपी से भी ओपिनियन पोल के नतीजे यही बता रहे हैं कि भाजपा वहाँ दूसरे नंबर पर भी नहीं आने जा रही है फिर उसका सरकार बनाने की बात तो दूर ही रही।
मित्रों,पार्टी को कैसे चलाना है,जिताना है या हराना है मोदी और शाह जानें लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि चुनाव नतीजों का दुष्प्रभाव उस राज्य की सारी जनता को झेलना पड़ता है,पूरे देश को झेलना पड़ता है। अब बिहार को ही लें तो पहले शराब बंद करके,फिर बालू खनन पर रोक लगाकर और अब जमीन की रजिस्ट्री को ऑनलाईन करके नीतीश-लालू की सरकार ने चुनावों के बाद से लाखों लोगों को भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। इसी तरह यूपी का पहले बसपा ने और बाद में कथित समाजवादियों ने क्या हाल करके रख दिया है किसी से छिपा हुआ नहीं है। इसलिए अच्छा हो कि पार्टी नेतृत्व अपनी रणनीति को बदले और बात को नेहरू की गलत साबित हो चुकी ट्रिकल डाऊन थ्योरी की तरह ऊपर से नीचे पहुँचाने के बदले नीचे से ऊपर पहुँचाने के उपाय करे। यह सही है कि पार्टी ने पहले भी हमारी सलाहों पर किंचित भी ध्यान देने की जरुरत नहीं समझी है लेकिन हम भी क्या करें हमसे तो भारत दुर्दशा देखी न जाई।

मंगलवार, 29 मार्च 2016

बर्बाद हो रहा बिहार है,नीतीशे कुमार है

मित्रों, कभी-कभी नारों का जादू जनता के सर पर इस कदर चढ़कर बोलता है जनता भले-बुरे की पहचान करने की क्षमता भी खो देती है. जनता यह भी भूल जाती है कि जब वही व्यक्ति १० साल में बहार नहीं ला पाया तो अब ५ साल में कहाँ से ला देगा? जनता यह भी भूल जाती है कि पूरे भारत में भ्रष्टाचार और कुशासन के प्रतीक बन चुके व्यक्ति की गोद में बैठकर कोई कैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ सकता है और सुशासन की स्थापना कर सकता है?
मित्रों,परिणाम सामने है.बिहार में फिर से नीतीश कुमार है लेकिन बर्बाद हो रहा बिहार है.आज के बिहार में (नवादा में पांच परमेश्वरों द्वारा लगाई गयी रेप की कीमत ) महिलाओं की ईज़्ज़त की कीमत मात्र २००० रु. रह गई है,रेप के आरोपी विधायक को पुलिस गिरफ्तार नहीं करती बल्कि वो खुद ही पंडित से दिन दिखाकर आत्मसमर्पण करता है. इतना ही नहीं वो जेल में भी ठाठ से रहता है,होली के दिन नवादा जेल के सभी कैदियों को अपनी तरफ से मीट का महाभोज देता है और जेल मैन्युअल की ऐसी की तैसी किये रहता है. जब तक वो कृपा करके कथित समर्पण नहीं करता कोरे नारों के माध्यम से बिहार में बहार लाने का दावा करनेवाले नीतीश जी कहते हैं कि उसको बख्शा नहीं जाएगा और उसके खिलाफ फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चलाया जाएगा लेकिन जब वो जेल पहुँचता है तो पूरा जेल प्रशासन उसके साथ इस तरह के व्यवहार करते हैं जैसे वो घोषित तौर पर सरकारी दामाद हो.
मित्रों,जबसे राजबल्लभ जेल में पधारे हैं पता नहीं नीतीश जी का फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट कहाँ चला गया है? डर लगता है कि कहीं नीतीश जी के सात महान जुमलों (कथित निश्चयों) की तरह यह भी एक जुमला तो नहीं? नीतीश जी ने अपने ७ जुमलों को ही सरकारी नीति बना दी है.  इसको पूरा करने के लिए १ बिहार मिशन नामक विभाग बना दिया है और इसको सारे मंत्रियों और अधिकारियों के ऊपर बिठा दिया है. सवाल उठता है कि फिर भारी-भरकम मंत्रिमंडल की जरुरत ही क्या है? सवाल यह भी उठता है कि जिस बिहार की ९९.९  प्रतिशत जनता नीतीश के १० साल के शासन के बावजूद पानी के नाम पर जहर पी रही है उसको अगले ४.५ सालों में नीतीश कैसे शुद्ध पेयजल मुहैया करवा देंगे? यह १ निश्चय ही वे शर्तिया पूरा नहीं कर पाएंगे फिर बाँकी के ६ के १ प्रतिशत भी पूरा होने की बात दूर ही रही (चित्र में देखें ७ निश्चय ).
मित्रों,खैर,ये तो हुई उन जुमला कुमार जी के ७ महान जुमलों की बात जिनका २०१४ -१५ का बजट ही जुमला साबित हो चुका है लेकिन बिहार के लिए सबसे दुःखद पहलु यह है कि नीतीश कुमार को बिहार के समक्ष आ चुकी सबसे बड़ी समस्या दिख ही नहीं रही,उसे जुमलों में भी शामिल नहीं किया गया है. वो समस्या है जलवायु परिवर्तन के कारण बिहार का राजस्थान में बदल जाना।  बिहार में कई सालों से सूखे जैसी स्थिति है,भूगर्भीय जलस्तर ५० फ़ीट तक नीचे जा चुका है. बिहार की खेती जो बिहार की जान है बर्बादी के कगार पर है और नीतीश जी प्रधानमंत्री सिंचाई योजना से युद्धस्तर पर लाभ उठाने के बदले अभी भी चुनावी मोड में हैं और आरोप-आरोप का गन्दा खेल खेल रहे हैं. जागिए प्रभु और बिहार की खेती को बचाईये यानि बिहार को बचाईये। जबकि जमीन के अंदर पानी ही नहीं रहेगा तो हर घर को सप्लाई क्या करेंगे? मतलब नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या? अगर आपको बिहार से किंचित मात्र भी प्यार है तो बिहार को  बचाईये,बिहार को बचा लीजिए। प्रधानमंत्री सिंचाई योजना में कोई कमी है तो केंद्र को बताईये,मिल-जुलकर नए बिहार का निर्माण करिए. अगर मिल-जुलकर बिहार को लूटना है तब तो कोई बात नहीं,तब तो आपके पास लालू प्रसाद एन्ड फैमिली है ही.