शुक्रवार, 16 अगस्त 2019

पहलू खान मामला सिस्टम की मौत का परिचायक


मित्रों, मैं एक बार नहीं हजारों बार कह चुका हूँ कि अपने प्यारे भारत में कानून तो बहुत हैं लेकिन व्यवस्था नाम की चीज नहीं है. आप कहेंगे कि यह अव्यवस्था आई कहाँ से? तो दोस्तों वास्तविकता तो यह है कि यह कहीं से आई नहीं बल्कि हमेशा से यहीं थी अंग्रेजों के समय से ही. दरअसल अंग्रेजों ने जो प्रशासनिक व्यवस्था भारत में स्थापित की थी उसका उद्देश्य कहीं से भी भारत में रामराज्य स्थापित करना नहीं था बल्कि लूटना था. यह अंग्रेजों की नहीं बल्कि यह तो हमारी गलती है कि आजतक हमने शासन-प्रशासन और न्यायपालिका में कोई बदलाव नहीं किया है या बदलाव नहीं कर पाए हैं. यहाँ तक कि आजादी के ७५ साल बाद तक भी हमारी पुलिस भी वही है और पुलिस को चलानेवाले कानून भी. साथ ही हमारी अदालतें भी उन्हीं कानूनों का पालन करने के लिए बाध्य हैं जो अंग्रेजों के समय भारतवासियों को लूटने के लिए बनाए गए थे.
मित्रों, अगर ऐसा नहीं होता तो कल पहलू खान हत्याकांड में वो फैसला नहीं आता जो आया है. मैं पूछता हूँ कि आखिर क्यों आज भी हमारा कानून ऑडियो-वीडियो प्रूफ को प्रूफ नहीं मानता जबकि आज का युग ही मोबाइल का युग है? आप समझ सकते हैं कि यह कितनी बड़ी विडम्बना है हमारे वक़्त की? हम कहीं भी कुछ भी होते हुए देखते हैं फिर चाहे हो अच्छी घटना हो या बुरी हम सबसे पहले अपना मोबाइल निकालते हैं और उसका वीडियो बना लेते हैं लेकिन हमारा कानून उसे प्रूफ मानता ही नहीं और सारी सुनवाई के बाद कहता है कि पहलू खान की हत्या हुई है और उसका विडियो प्रूफ भी है लेकिन हमारे कानून के अनुसार पहलू खान को किसी ने नहीं मारा. मैं इसी मंच पर मुन्ना सिंह नामक गरीब की हत्या का मुद्दा कई बार उठा चुका हूँ जो वैशाली जिले के चांदपुरा ओपी के खोरमपुर का रहनेवाला था और जिसकी २०१४ में ही घर में घुसकर हत्या कर दी गई थी लेकिन क्या मजाल कि इस मामले में एक गिरफ़्तारी भी हुई हो न्याय मिलना तो दूर की बात रही.
मित्रों, ऐसा नहीं है कि पहलू खान ऐसा इकलौता भारतीय है जिसे न्याय नहीं मिला बल्कि हम रोजाना ऐसी ख़बरों को पढ़ते हैं कि रेप पीडिता थानों के चक्कर लगाती रही लेकिन उनका केस दर्ज नहीं किया गया. अभी पटना में एक रिटायर्ड आईपीएस को कुछ लोगों ने पीटा और पुलिस बुलाने पर भी नहीं आई. मुझे तो लगता है कि हमारे चंद थानेदारों को छोड़कर ज्यादातर इतने भ्रष्ट हैं कि अगर उनकी खुद की माँ-बहन के साथ भी बलात्कार हो जाए तो उनसे भी मुकदमा दर्ज करने के लिए पैसे मांगेगे. ऐसे माहौल में हम कैसे न्याय की उम्मीद कर सकते हैं? क्या ऐसा करना बेईमानी नहीं होगी दफा ४२० के तहत?
मित्रों, आपमें से जो लोग भीड़ के द्वारा न्याय को उचित मानते हैं उनसे मैं कहना चाहूँगा कि मैं नहीं जानता कि पहलू खान निर्दोष था. साथ ही मैं यह भी नहीं जानता कि वो दोषी था लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि भीड़ के पास दिमाग नहीं होता. जब भीड़ हिंसक हो जाती है तो उसे मुजफ्फरपुर और गोपालगंज के डीएम के बीच कोई फर्क नहीं दिखता. उसका शिकार मैं भी हो सकता हूँ और आप भी, यहाँ तक कि पुलिस इंस्पेक्टर भी या फिर जज साहब भी. इसलिए कृपया इसका समर्थन न करें. वैसे विचारणीय यह भी है कि इस तरह की घटनाओं को बढ़ावा क्यों मिल रहा है? कहीं इसके पीछे हमारी कानून-व्यवस्था के प्रति लोगों के विश्वास का कम होना तो नहीं. वैसे अपने मोदीजी को सबका विश्वास चाहिए. देखते हैं कि वो इस दिशा में कब और कौन-सा कदम उठाते हैं. -इन्तहां हो गयी इंतज़ार की, आई न कुछ खबर पुलिस सुधार की...........

गुरुवार, 15 अगस्त 2019

बच्चों को कब मिलेगी आज़ादी


मित्रों, कहते हैं कि बचपन हर गम से बेगाना होता है लेकिन सच्चाई तो यह है कि आज बच्चे जैसे ही स्कूल जाना शुरू करते हैं उनके ऊपर भारी-भरकम बोझ डाल दिया जाता है. उदाहरण के लिए मेरे बेटे भगत को ही लें तो वो साढ़े सात-पौने आठ बजे स्कूल बस से अपने स्कूल श्रीराम इंटरनेशनल स्कूल मुस्ताफापुर-चकौसन, वैशाली, बिहार के लिए रवाना हो जाता है और वापस लौटता है साढ़े तीन-पौने चार बजे. इस तरह कुल मिलाकर उस ६ साल के प्रेप में पढनेवाले बच्चे को ८ घंटे स्कूल में रहना पड़ता है. जब मैंने स्कूल प्रशासन से इस बारे में शिकायत की और कहा कि बच्चे के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड रहा है तो उनका कहना था कि सीबीएसई के नियमानुसार ऐसा करना जरूरी है. तथापि मुझे नहीं लगता कि ऐसा कोई निर्देश सीबीएसई ने कभी जारी किया है और वो भी प्रेप के विद्यार्थियों के लिए. कम-से-कम मुझे सीबीएसई की वेबसाईट पर तो ऐसा कुछ नहीं मिला.
मित्रों, इतना ही नहीं शिक्षा के बाजारीकरण ने बच्चों की शिक्षा को बेहद महंगा बना दिया है.  बिहार और भारत के सबसे गरीब ईलाकों में से एक वैशाली जिले के निरा देहात में मुझे अपने बच्चे के लिए ३००० महीने की फीस भरनी पड़ती है. १९८० के दशक में जब मैं स्कूल में पढता था तब शायद पूरे दस साल में कुल मिलाकर भी मुझे इतनी फीस नहीं देनी पड़ी थी. लेकिन वह दौर सरकारी स्कूलों का था और आज सरकारी स्कूलों में बांकी सबकुछ होता है बस पढाई नहीं होती. ऐसे माहौल में कोई गरीब कहाँ से और कैसे अपने बच्चे को पढ़ाएगा. उस पर तुर्रा यह कि इन स्कूलों में बराबर कोई-न-कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम होता रहता है जिसके कारण अभिभावकों को अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है. आज स्थिति इतनी ख़राब है कि पहले लोग बिमारियों के कारण गरीबी रेखा के नीचे चले जाते थे और आज बच्चों को पढ़ाने के चक्कर में भी महाजनों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं. और कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि बंधक रखा गहना छूट भी नहीं पाता और डूब जाता है. मुझे खुद भगत के नामांकन में २५००० रू. से ज्यादा खर्च करने पड़े और गहना बंधक रखना पड़ा.
मित्रों, यह बहुत अच्छी बात है कि गरीबों के स्वास्थ्य को लेकर सरकार चिंतित है लेकिन यह उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि बच्चों की शिक्षा को लेकर सरकार कतई चिंतित नहीं है. निजी स्कूलों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर सरकार का रवैया हम मुजफ्फरपुर में फैले चमकी बुखार के समय अभी कुछ हफ्ते पहले ही देख चुके हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि देश के उन बच्चों का क्या होगा जिनके हाथों में देश का भविष्य है? वैसे भी हमारे संविधान का सार कहा जानेवाले प्रस्तावना के अनुसार भारत एक लोककल्याणकारी गणराज्य है. ऐसे में सरकार कैसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को निजी क्षेत्र के हवाले कर सकती है? फिर तो भारत लोककल्याणकारी राज्य के बदले धनपतिकल्याणकारी राज्य बनकर रह जाएगा.
मित्रों, हम बार-बार दम भरते हैं कि हमें भारत को अमेरिका बनाना है तो मैं बता दूं कि अमेरिका में भी १९३९ में महामंदी आई थी और तब वहां की सरकार को भी घनघोर पूंजीवाद के स्थान पर कई लोककल्याणकारी कदम उठाने पड़े थे. यकीं न हो तो वित्त मंत्री अमेरिका का इतिहास पढ़ सकती हैं. मैं समझता हूँ कि इस समय हमारी अर्थव्यवस्था भी महामंदी की तरफ अग्रसर है.
मित्रों, विषयांतर के लिए क्षमा मांगते हुए आज ७३ वें स्वाधीनता दिवस के अवसर पर मैं भारत सरकार से अनुरोध करता हूँ कि वो ऐसे प्रबंध करे जिससे देश के मासूम बच्चों को भी सही मायने में आजादी मिल सके-अज्ञानता से आजादी, कुपोषण से आजादी, शिक्षा के नाम पर किए जानेवाले आर्थिक शोषण से आजादी.

सोमवार, 5 अगस्त 2019

धारा ३७०-मोदी सरकार का अत्यंत प्रशंसनीय कदम


मित्रों, आज और अबसे कुछ ही देर पहले भारत की संघ सरकार ने एक अत्यंत प्रशंसनीय प्रस्ताव संसद में रखा है. जिसके अनुसार अब बहुत जल्द भारतीय संविधान से धारा ३७० के एक उपखंड को छोड़कर बांकी समाप्त हो जाएगी. साथ ही उसने संविधान की धारा ३५ ए को समाप्त कर दिया है. इतना ही नहीं जम्मू-कश्मीर को दो भागों में बांटने का प्रस्ताव भी संसद के समक्ष रखा गया है. अबसे जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश होगा यद्यपि वहां विधानसभा बनी रहेगी. जबकि लद्दाख अब बिना विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश होगा. सबसे अच्छी बात प्रस्ताव में यह है कि अबसे संसद द्वारा १९५२ से लेकर आज तक पारित किए गए सारे कानून जम्मू-कश्मीर में भी लागू हो जाएंगे. 
मित्रों, मोदी सरकार के इस कदम की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी क्योंकि इस धारा के कारण जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ था जिसके चलते भारत की एकता और अखंडता को क्षति पहुँच रही थी. आज अमर शहीद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आत्मा को निश्चित रूप से शांति मिल गई होगी जिन्होंने एक राष्ट्र दो विधान, दो प्रधान, दो निशान का विरोध करते हुए अपनी शहादत दी थी. यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूं उस समय भारत के तत्कालीन विधि मंत्री डॉ. भीमराव रामजी अम्बेदकर ने संविधान में धारा ३७० को शामिल करने को देशद्रोह कहते हुए ऐसा करने से मना कर दिया था. लेकिन नेहरु ने अम्बेडकर जी की उपेक्षा करते हुए इसे लागू करवाया था. बाद में धारा ३७० नेहरु की सबसे बड़ी भूल साबित हुई और जम्मू-कश्मीर में इस्लामिक आतंकवाद का उदय हुआ जिसने हिन्दुस्तान के इस हिस्से में हिन्दुओं का जीना मुश्किल कर दिया.
मित्रों, दूसरी तरफ धारा ३७० के चलते जम्मू-कश्मीर का विकास प्रभावित हो रहा था क्योंकि कोई भी ऐसा व्यक्ति जो जम्मू-कश्मीर का निवासी नहीं था वहां संपत्ति नहीं खरीद सकता था. ऐसे में कोई उद्योगपति वहां उद्योगों की स्थापना नहीं कर सकता था. अब यह प्रतिबन्ध समाप्त हो गया है ऐसे में निश्चित रूप से जम्मू-कश्मीर का तेज़ औद्योगिक व आर्थिक विकास होगा.
मित्रों, धारा ३७० पर जम्मू-कश्मीर के उन दो परिवारों का विरोध तो फिर भी समझ में आता है जिन्होंने इसे अपनी निजी जागीर बना लिया था लेकिन कांग्रेस द्वारा विरोध कहीं से भी समझ में नहीं आता है. क्या कांग्रेस आज जिस स्थिति में है आगे उससे भी ख़राब स्थिति में जाना चाहती है?
मित्रों, कुल मिलाकर जबसे केंद्र में मोदी सरकार आई है तबसे ही उसने जम्मू-कश्मीर में बहुमुखी कदम उठाए हैं. एक तरफ तो वो वहां के शांतिप्रिय लोगों का समर्थन कर रही है वहीँ दूसरी तरफ आतंकवादियों के खिलाफ करारा प्रहार भी किया जा रहा है. कुल मिलाकर मोदी सरकार ने पंडित नेहरु द्वारा की गई कई ऐतिहासिक भूलों में से एक को दूर कर दिया है. इतना ही नहीं जिस तरह से ९ अगस्त को हम अगस्त क्रांति दिवस कहते हैं उसी प्रकार आज ५ अगस्त के दिन को भारतीय इतिहास में भारतीय संविधान भूल सुधार दिवस के रूप में याद किया जाएगा. इस समय पूरे भारत से जश्न मनाए जाने के समाचार प्राप्त हो रहे हैं और मैं भी मिठाई, पटाखे और रंग लाने जा रहा हूँ क्योंकि आज एक साथ होली और दिवाली मनाने का दिन है और इसके लिए केंद्र सरकार निश्चित रूप से बधाई की पात्र है.

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

मोदीजी को अर्थव्यवस्था के लुढकने की बधाई


मित्रों, कई दशक पहले ७वीं कक्षा में मैंने गणित का एक प्रश्न पढ़ा था कि एक बन्दर एक खम्भे पर एक मिनट में १० मीटर चढ़ता है और दूसरे मिनट में ५ मीटर फिसल जाता है तो वो कितनी देर में खम्भे पर चढ़ जाएगा. अब अगर इस सवाल को उलट दें मतलब कि पहले मिनट में बन्दर ५ मीटर चढ़े और दूसरे मिनट में १० मीटर फिसल जाए तो? तो शायद बन्दर कभी खम्भे पर नहीं चढ़ पाएगा.
मित्रों, आजकल यही स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था की है. एक तिमाही में यह जितनी चढ़ रही है दूसरी तिमाही में उससे ज्यादा उतर जा रही है. पिछले साल से ही प्रत्येक सेक्टर में खासकर विनिर्माण में भारी गिरावट आ रही है जिससे रोजगार की स्थिति काफी ख़राब है और दिन-ब-दिन ख़राब ही होती जा रही है. शेयर बाज़ार को अर्थव्यवस्था का थर्मामीटर कहा जाता है और वहां भी स्थिति कत्लेआम वाली ही है. और अब तो विश्वबैंक के नए आंकड़े यह भी बता रहे हैं कि हमने २०१७ में जो पाया था उसे २०१९ में गँवा दिया है. अर्थात हम जिस सातवें स्थान से उछलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था में ५वें स्थान पर पहुंचे थे एक बार फिर से पुनर्मूषिको भव की तरह उसी ७ वें स्थान पर पहुँच गए हैं.
मित्रों, आगे मुझे लगता है कि हमारी स्थिति उस बन्दर वाली होनेवाली है जो पहले मिनट में ५ मीटर चढ़ता था और दूसरे मिनट में १० मीटर फिसल जाता था. ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि सरकार खुद ही अर्थव्यवस्था की बाट लगानेवाले कदम उठा रही है और लगातार उठा रही है. बैटरीचालित गाड़ियों की कीमत पर ऑटोमोबाइल उद्योग का भट्ठा बैठाने की पूरी व्यूह-रचना तैयार है. मैं पूछता हूँ कि क्या इस काम को ऑटोमोबाइल सेक्टर को बचाते हुए नहीं किया जा सकता था या किया जा सकता है? इससे पहले रियल स्टेट सेक्टर को प्रयत्नपूर्वक बर्बाद कर दिया गया. सरकार उत्पादन बढ़ाने की दिशा में तो काम कर रही है लेकिन यह नहीं समझ पा रही है कि मांग कैसे पैदा होगी? राजकोषीय घाटे का कम होना जरूरी है लेकिन इतना भी नहीं कि मांग ही समाप्त हो जाए. इतना ही नहीं एक-एक कर सारी सरकारी नवरत्न कंपनियों को काफी मेहनत करके बीमार किया जा रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि जब मांझी ही नाव को डुबो देना चाहता है तो उसे बचाया कैसे जाए? इसी तरह परिवहन कानूनों में बदलाव कर जुर्माने को बढ़ाने से किसी भी तरह सरकार की आमदनी नहीं बढ़ेगी बल्कि पुलिसवालों की बढ़ेगी.
मित्रों, मैंने कई साल पहले ही मोदी जी को अपने एक आलेख में कहा था कि एक वित्त मंत्रालय चाहे तो पूरे देश को बर्बाद कर सकता है और आपने उसी को अरुण जेटली जैसे नासमझ अर्थशास्त्री के हाथों में दे दिया है. लेकिन अब मुझे लगता है कि इस सरकार में चाहे वित्त मंत्री कोई भी रहे नीति वही रहेगी जिससे सिर्फ-और-सिर्फ मंदी आएगी. कदाचित इस सरकार के ईंजन में सिर्फ बैक गियर है फॉरवर्ड गियर है ही नहीं. मैं यह नहीं कहता कि सरकार को सामाजिक सुधारों को नहीं करना चाहिए लेकिन उसके साथ-साथ अर्थव्यवस्था की अनदेखी भी नहीं की जा सकती है यह भी समझना होगा. वैसे अगर हर मामले में पाकिस्तान के साथ तुलना करके खुश होना है तो होईए और होते रहिए लेकिन तब विश्वगुरु बनने के सपने को भूल समझ कर भूल जाना होगा. वैसे कभी-कभी मेरे दिल में यह ख्याल भी आता है कि क्या बन्दर खम्भे पर बिना फिसले नहीं चढ़ सकता था? 

गुरुवार, 25 जुलाई 2019

बख्तियार खिलजी टू नीतीश कुमार वाया बख्तियारपुर


मित्रों,  गुलाम वंश के पहले शासक कुतुबुद्दीन ऐबक के एक सिपहसालार का नाम था बख्तियार खिलजी. जी हाँ वही बख्तियार खिलजी जिसने महान नालंदा विश्वविद्यालय को जलाकर राख कर दिया था. दरअसल हुआ यह कि ११९३ के आरम्भ तक बख्तियार खिलजी ने पूर्वी भारत के कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था तभी वह काफी बीमार पड़ा. उसने अपने हकीमों से काफी इलाज करवाया मगर वह ठीक नहीं हो सका और मरणासन्न स्थिति में पहुँच गया. तभी किसी ने उसको सलाह दी कि वह नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र को दिखाए और इलाज करवाए. परन्तु खिलजी इसके लिए तैयार नहीं था. उसे अपने हकीमों पर ज्यादा भरोसा था. वह यह मानने को तैयार नहीं था की भारतीय वैद्य उसके हकीमों से ज्यादा ज्ञान रखते हैं या ज्यादा काबिल हो सकते हैं. लेकिन मरता क्या नहीं करता? अंत में अपनी जान बचाने के लिए उसको नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र को बुलवाना पड़ा. फिर बख्तियार खिलजी ने वैद्यराज के सामने एक अजीब सी शर्त रखी और कहां कि वह उनके द्वारा दी गई किसी भी प्रकार की दवा नहीं खाएगा. बिना दवा के वो उसको ठीक करें. वैद्यराज ने सोच कर उसकी शर्त मान ली और कुछ दिनों के बाद वो खिलजी के पास एक कुरान लेकर पहुंचे और कहा कि इस कुरान की पृष्ठ संख्या.. इतने से इतने तक पढ़ लीजिये ठीक हो जायेंगे.

मित्रों, बख्तियार खिलजी ने वैद्यराज के बताए अनुसार कुरान को पढ़ा और ठीक हो गया. ऐसा कहा जाता हैं कि राहुल श्रीभद्र ने कुरान के कुछ पन्नों पर एक दवा का लेप लगा दिया था, वह थूक के साथ उन पन्नों को पढ़ता गया और ठीक होता चला गया. कथित महान शांतिप्रिय धर्म का झंडाबरदार अहसानफरामोश खिलजी इस तथ्य से परेशान रहने लगा कि एक भारतीय विद्वान और शिक्षक को उनके हकीमों से ज्यादा ज्ञान था. फिर उसने देश से ज्ञान और आयुर्वेद की जड़ों को नष्ट करने का फैसला किया. परिणाम स्वरूप खिलजी ने नालंदा की महान पुस्तकालय में आग लगा दी और लगभग 9 मिलियन पांडुलिपियों को जला दिया.  ऐसा कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय में इतनी किताबें थीं कि वह तीन महीने तक जलती रहीं. इसके बाद खिलजी के आदेश पर तुर्की आक्रमणकारियों ने नालंदा के हजारों धार्मिक विद्वानों और भिक्षुओं की भी हत्या कर दी जिसमें आचार्य राहुल श्रीभद्र भी शामिल थे.
मित्रों, तबाकत-ए-नासिरी, फारसी इतिहासकार 'मिनहाजुद्दीन सिराज' द्वारा रचित की गई पुस्तक है. इसमें मुहम्मद ग़ोरी की भारत विजय तथा तुर्की सल्तनत के आरम्भिक इतिहास की लगभग 1260 ई. तक की जानकारी मिलती है. उस समय मिनहाज दिल्ली का मुख्य क़ाज़ी था. इस पुस्तक में 'मिनहाजुद्दीन सिराज' ने नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में भी बताया है कि खिलजी और उसकी तुर्की सेना नें हजारों भिक्षुओं और विद्वानों को जला कर मार दिया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि बौद्ध धर्म का विस्तार हो. वह इस्लाम धर्म का प्रचार प्रसार करना चाहता था. शिक्षक और विद्यार्थियों के लहू से पूरी धरती को लहू-लुहान कर भी जब अहसानफरामोश खिलजी को चैन नहीं मिला, तो उसने तत्कालीन विश्व के सबसे भव्य शिक्षण संस्था में आग लगा दी। बख्तियारपुर, जहां खिलजी को दफन किया गया था, वह जगह अब पीर बाबा का मजार बन गया है। दुर्भाग्य से कुछ मूर्ख हिन्दू भी उस लुटेरे और नालंदा के विध्वंसक के मजार पर मन्नत मांगने जाते हैं। दुर्भाग्य तो यह भी है कि इस लुटेरे के मजार का तो संरक्षण किया जा रहा है, लेकिन नालंदा विश्‍वविद्यालय का नहीं।

मित्रों, आप अनुमान लगा सकते हैं कि अगर नालंदा विश्वविद्यालय में जला दी गईं पुस्तकें जलाई नहीं गयी होती तो हमारा भारत हमेशा विश्वगुरु ही रहता और उसको पतन के दिन नहीं देखने पड़ते. लेकिन हम भारतीय अतीत से शिक्षा तो लेते नहीं हैं तभी तो आज महान बिहार में एक बार फिर से मानवता की सबसे बड़ी धरोहर पुस्तकों को नष्ट किया जा रहा है और संयोग यह है कि इस बार भी यह काम कोई और नहीं कर रहा बल्कि बख्तियार खिलजी के शहर बख्तियारपुर के रहनेवाले नीतीश कुमार जी कर रहे हैं. जी हाँ, बिहार के निवर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी भी बख्तियारपुर के ही निवासी हैं और पिछले विधानसभा चुनावों तक वहीँ जाकर मतदान भी करते रहे हैं. दरअसल मैं पिछले दिनों एक समय बिहार और भारत के गौरव रहे पटना के सिन्हा लाइब्रेरी में गया था और वहां की वर्तमान स्थिति को देखकर स्तब्ध रह गया. मैं यहाँ आपको बता दूं कि मैं २००८-०९ में भी इसका सदस्य था और तब इसकी रौनक देखते बनती थी. एक बिल्डिंग में पुस्तकें थीं तो दूसरी में समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ. ऐसी कोई भी पत्रिका या पत्र नहीं था जो यहाँ नहीं आता था. लेकिन अब पुस्तकालय सिर्फ एक बिल्डिंग में सिमट गया है. पत्रिकाओं के नाम पर चार-पांच पत्रिकाएँ आती हैं और पत्र के नाम पर आठ-दस अख़बार. मैं आठ-दस सालों की आजकल पत्रिका पढना चाहता मगर मुझे बताया गया कि आजकल पत्रिका सिर्फ पिछले पांच-छः महीने की ही उपलब्ध है. मैं स्तब्ध था कि यह हो क्या रहा है और क्यों हो रहा है? पूछने पर पुस्तकालय कर्मियों ने बताया कि पहले वहां ५० स्टाफ थे और अब ३ हैं. साथ ही सरकार ने पुस्तकालय के लिए आवंटन भी कम कर दिया है. 

मित्रों, फिर मैंने पुस्तक-सूची से कुछ पुस्तकों के नाम नोट किए और कर्मियों से उनको उपलब्ध करवाने को कहा तो उन्होंने ऊपर पहली मंजिल पर जाकर स्वयं ढूंढ लेने को कहा. मैंने भी उनकी मजबूरी को देखते हुए ऊपर का रूख किया. ऊपर स्थिति और भी भयावह थी. छत दो स्थानों पर टपक रही थी और किताबों पर धूल जमी हुई थी. बहुत-सारी किताबों के नाम मिट गए थे और वे फट रही थीं. ऐसे में हुआ वही जिसका मुझे डर था. मैं जो किताबें ढूंढ रहा था उनमें से कोई भी नहीं मिली. मैंने मन मसोसकर दो किताबें ऐसे ही पढने के लिए अपने कार्ड पर जारी करवा ली. 

मित्रों, बख्तियार खिलजी तो विदेशी था और वहशी व धर्मांध मुसलमान था फिर उसके मरे ८०० साल बीत चुके हैं लेकिन नीतीश कुमार तो विदेशी नहीं हैं फिर बिहार का गौरव सिन्हा लाइब्रेरी बंदी के कगार पर क्यों पहुँच गया है? सवाल उठता है कि माननीयों के पास खुद के पेंशन के लिए तो पैसा है लेकिन पुस्तकालय के लिए नहीं है? यह अपराध अगर लालू जी के बेटों ने किया होता तो फिर भी क्षम्य था लेकिन नीतीश जी तो पढ़े-लिखे हैं क्या उनको भी पुस्तकों की महत्ता के बारे में ज्ञान नहीं है? क्या उन्होंने कभी सोंचा है कि बिहार के शोधार्थी कहाँ जाकर अध्ययन करेंगे अगर उनको सिन्हा लाइब्रेरी से अपेक्षित सामग्री नहीं मिलेगी?



गुरुवार, 18 जुलाई 2019

डूबता बिहार बचा लो सरकार


मित्रों, बिहार में एक कहावत है कि अंधे के आगे रोए अपना दीदा (दृष्टि) खोए. हाँ, मैं उसी बिहार की बात कर रहा हूँ जहाँ से इन दिनों रोजाना तटबंधों के टूटने और गांवों के बह जाने की ख़बरें आ रही हैं. बिहार डूब रहा है लेकिन यह कौन-सी नई बात है बिहार के लिए? बिहार तो सालोंभर आंसुओं के समंदर में डूबा रहता है. अभी महाराष्ट्र के एक मंत्री ने बांध टूटने के बाद बयान दिया कि केकड़ों ने बांध में छेद कर दिया जिससे बांध टूट गया. हालांकि बिहार के किसी नेता या बयानवीर मंत्री ने अभी तक इस तरह की महान घोषणा नहीं की है लेकिन मुझे लगता है कि बिहार में अगर ऐसा हुआ भी तो आरोप चूहों पर जाएगा क्योंकि बिहार के चूहे बड़े बदमाश हैं. हजारों लीटर शराब तक पी जाते हैं. वैसे भी बिहार में केंकड़े खाने की चीज हैं आरोप लगाने की नहीं. वैसे बिहार के विभिन्न डूबे हुए जिलों से चूहों को खाने की ख़बरें भी आ रही हैं क्योंकि राहत या तो नदारद है या फिर जारी है भी तो उन बस्तियों से दूर जहाँ लोग फंसे हुए हैं निर्जन स्थानों पर भोजन और पानी के पैकेट गिराए जा रहे हैं. वैसे भी जिस बिहार में बिना रिश्वत के एक पत्ता तक नहीं हिलता भोजन देने से पाप नहीं लगेगा क्या?
मित्रों, मैं पूछना चाहता हूँ बिहार सरकार से कि बिहार के तटबंध इन दिनों बम क्यों बने हुए हैं? क्या इन तटबंधों की मरम्मत सिर्फ कागज़ पर नहीं की गयी? क्या सरकार के मंत्री भी इस कागज़ के खेल में शामिल होकर हर साल गाँधी छाप कागज नहीं कमा रहे? मैं पूछना चाहता हूँ बिहार सरकार से कि अगर देखभाल नहीं कर सकते तो तटबंध बनाए ही क्यों गए और नदियों के नैसर्गिक प्रवाह में बाधा क्यों डाली गयी? क्या यह बाढ़ भ्रष्टाचार की बाढ़ नहीं है?
मित्रों, मैं बिहार की सरकार को कई बार अंधी-बहरी मगर बडबोली सरकार कह चुका हूँ इसलिए मुझे उससे तो कोई उम्मीद नहीं है वो तो पूछने की आदत है इसलिए पूछ लिया था लेकिन क्या केंद्र की सरकार भी अंधी-बहरी और बडबोली है? अभी तक उसने बिहार के लिए किसी भी पैकेज की घोषणा नहीं की, क्यों? क्या बिहार कश्मीर, केरल और उड़ीसा की तरह भारत का हिस्सा नहीं है? क्या बिहार में ईन्सान नहीं रहते कीड़े-मकोड़े रहते हैं? क्या भाजपा बिहार को अपनी जमींदारी मानती है और सोंचती है कि चाहे इनको रामभरोसे छोड़ दो वोट तो ये हमें ही देंगे? वैसे मैं आपको याद दिला दूं कि बिहार में २००८ के कोशी महाप्रलय के समय मोदी जी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार ने बिहार को ५ करोड़ का सहायता पैकेज भेजा था और नीतीश जी ने तब उसे स्वीकार नहीं किया था. खैर अब तो वो पुरानी बात हो गयी. मोदी जी को पैकेज की घोषणा कर देनी चाहिए, शायद इस बार नीतीश जी पैकेज को अस्वीकार नहीं करेंगे. कहीं ऐसा तो नहीं कि मोदी जी इस बार इसी डर से पैकेज की घोषणा तो नहीं कर रहे हैं कि कहीं नीतीश जी इस बार ले ही न लें. कुछ भी हो सकता है.
मित्रों, प्रधानमंत्री जी ने दो दिन पहले भाजपा सांसदों को बैठक आयोजित कर निर्देश दिया कि वे अपने क्षेत्रों में जाकर लोगों को सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी दें. भाजपा सांसदों की धृष्टता तो देखिए अभी तक कोई सांसद बिहार नहीं आया जिससे उन लोगों को सरकारी योजनाओं के बारे में भरपूर जानकारी मिलती जिनके परिजन भ्रष्टाचार की बाढ़ में बह गए या फिर जिनकी जिंदगी भर की जमा पूँजी पानी बहा ले गया. आएं भी कैसे संसद का सत्र जो चल रहा है और संसद का सत्र आगे तो बढाया नहीं जा सकता भले ही बिहार में महाप्रलय ही क्यों न आ जाए. वैसे बिहार सरकार ने बड़ी दरियादिली दिखाते हुए घोषणा की है कि हर बाढ़प्रभावित परिवार को ६-६ हजार रूपये दिए जाएंगे. ६-६ हजार रूपये भाई. बिहारियों के आंसुओं की कीमत ६ हजार, एक परिवार के वोट की कीमत ६ हजार, असहनीय भ्रष्टाचार को चुपचाप आंसू पी-पीकर सहने की कीमत मात्र ६ हजार रूपये. इसमें से भी न जाने कितने रूपये फिर से भ्रष्टाचार के मौसेरे भाई घोटाले की भेंट चढ़ जाएंगे हर वर्ष की भांति.
मित्रों, इस आलेख के साथ मैंने जो तस्वीर लगाई है वह कोई मामूली तस्वीर नहीं है. वह तस्वीर है बिहार के गौरव और अभिमान की. ऐसी ही एक तस्वीर कई साल पहले सीरिया में एक बच्चे की आई थी और तब पूरी मानवता अपने-आपको शर्मसार महसूस कर रही थी लेकिन मैं जानता हूँ कि बाढ़ में डूब गए इस निष्प्राण बिहारी के लिए कोई भी शर्मिंदा नहीं होगा. जब बिहार सरकार और भारत सरकार का कलेजा ही बिहार की जनता के लिए पत्थर का हो रहा है तो दुनिया क्यों अपने आंसुओं का अपव्यय करे.  वैसे भी रफ़ी साब कह गए हैं कि दुनिया पागल है या फिर मैं दीवाना.

रविवार, 14 जुलाई 2019

40 में ३९ फिर भी बदहाल बिहार


मित्रों, अगर हम २००५ से २०१० के कालखंड को अलग कर दें तो बिहार में २०१० से ही जंगलराज पार्ट २ चल रहा है. बीच में जब २०१४ का लोकसभा चुनाव आया तब बिहारियों के मन में जरूर लड्डू फूटने लगे. खुद प्रधानमंत्री के उम्मीदवार ने वादा किया था कि अब बिहारियों को बिहार से बाहर जाकर काम करने की जरुरत नहीं होगी क्योंकि वे चाहते हैं कि भारत का न सिर्फ पश्चिमी भाग विकसित हो बल्कि पूर्वी भाग भी बराबरी का विकास करे और यहाँ भी उद्योग-धंधों की स्थापना हो. तब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश जी भाजपा का दामन छोड़कर लालू जी की गोद में जा बैठे थे. फिर भी बिहार की जनता ने मोदी जी के वादों पर यकीन करते हुए उनके गठबंधन को ३२ सीटें दे दीं.
मित्रों, फिर मौसम बदला, साल बदला और नीतीश जी ने एक बार फिर पाला बदल लिया. इस बार उन्होंने भाजपा की अगुवाई में चुनाव लड़ा. एक बार फिर से प्रधानमंत्री जी बिहार आए और फिर से वही वादे किए जो पिछली बार किए थे. साथ ही उन्होंने एक बार फिर से बिहार सहित पूरे भारत की जनता से आह्वान किया कि वे समझें कि भारत की प्रत्येक सीट से मोदी जी ही खड़े हैं और भूल जाएं कि उनके क्षेत्र से कौन खड़ा है. बिहार की जनता ने एक बार फिर से मोदी जी पर भरोसा किया और पिछली बार से ज्यादा किया और ४० में से ३९ सीटें एनडीए की झोली में डाल दी.
मित्रों, लेकिन सवाल उठता है कि २०१४ के बाद से बिहार में कोई बदलाव भी आया है या फिर बिहार के लोग खुद को ठगा-सा महसूस कर रहे हैं? सौभाग्यवश पूरे डेढ़ साल बाद मैं पिछले एक महीने से बिहार में हूँ और इस बीच मुझे एक बार फिर से बिहार को देखने-समझने का मौका मिला है. जहाँ तक मैंने पिछले एक महीने में महसूस किया है बिहार में जंगलराज अपने पूरे शिखर पर है. पिछले १०-१५ दिनों में सिर्फ वैशाली जिले में जो एक समय बिहार का सबसे शांत जिला होता था लगभग आधा दर्जन व्यवसायियों की हत्या हो चुकी है. अर्थात एक तो बिहार में नौकरियों की पहले से ही भारी कमी है तो वहीँ दूसरी तरफ आप व्यवसाय करके भी शांतिपूर्ण तरीके से कमा-खा नहीं सकते. कोई व्यवसायी नहीं जानता कि उनके जीवन का कौन-सा पल अपराधियों द्वारा मौत की अमानत बना दी जाए.
मित्रों, आप समझ गए होंगे कि इन दिनों बिहार में कानून और व्यवस्था की हालत अभूतपूर्व तरीके से ख़राब है. साथ ही पूरे बिहार में अव्यवस्था और भ्रष्टाचार का बोलवाला है. अगर ऐसा नहीं होता तो २०० से ज्यादा बच्चों की अकाल मृत्यु नहीं हुई होती और न ही इन दिनों जगह-जगह तटबंध टूट रहे होते. पिछले कुछ दिनों में मैंने महसूस किया है कि हाजीपुर जैसे महत्वपूर्ण शहर में भी बिजली की स्थिति अत्यंत ख़राब है और दिन-रात मिलाकर १२ घंटे भी बिजली नहीं रहती. अब कल रात को ही ले लें तो ९ बजे बिजली कट गयी और आई सुबह ७ बजे. इस तरह पूरे हाजीपुर को आँखों-आँखों में रात काटनी पड़ी.
मित्रों, इतना ही नहीं इन दिनों भाजपा समर्थित नगर प्रधान की मेहरबानी से पूरा हाजीपुर नरक बना हुआ है. नालियों से गन्दा निकालकर सड़क किनारे रखकर छोड़ दिया गया है जो लगातार बरसात के कारण पूरी सड़क पर पसर गया है. इतना ही नहीं पूरे हाजीपुर में इस समय जलजमाव की स्थिति है.
मित्रों, अगर आपको पटना जाना हो तो पता नहीं कि आपको कितने घंटे लग जाएँ. महात्मा गाँधी सेतु की दाहिनी लेन पुनर्निर्माण के लिए तोड़ दी गयी है और सारी गाड़ियाँ सिर्फ बायीं लेन से आ-जा रही हैं. हमें बार-बार सुनाया जाता है कि महात्मा गाँधी सेतु के समानांतर दूसरा पुल भी बनेगा लेकिन ऐसा कुछ होता हुआ धरातल पर दिख नहीं रहा है. जब नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तब बिहार की जनता को उम्मीद थी कि बंद पड़े ३० चीनी कारखानों को फिर से चालू किया जाएगा लेकिन उसमें भी घोटाला होने लगा. साथ ही बिहार का ऐसा कोई विभाग नहीं होगा जिसमें कोई-न-कोई घोटाला न हुआ हो. सृजन और मुजफ्फरपुर बालिका गृह काण्ड के तार तो बिहार के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री तक भी जाते दिखाई दिये.
मित्रों, वैसे तो नीतीश कुमार मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड पर जमकर बोले हैं. लेकिन खुलकर नहीं बहुत कुछ छुपा कर बोले हैं. जैसे उन्होंने यह नहीं बताया कि ब्रजेश ठाकुर से उनका क्या और कैसा संबंध है. यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि नीतीश जी मुख्यमंत्री बनने के बाद ब्रजेश ठाकुर के पुत्र के जन्मदिन का केक काटने पटना से चलकर मुज़फ़्फ़रपुर गये थे. ब्रजेश ठाकुर के साथ नीतीश कुमार का राजनीतिक संबंध तो दिखाई नहीं दे रहा है. क्योंकि बताया गया है कि ब्रजेश ठाकुर नीतीश जी की पार्टी से नहीं बल्कि आनंदमोहन जी की पार्टी से जुड़े हुए थे. ऐसे में मुख्यमंत्री द्वारा जन्मदिन जैसे नितांत घरेलू और पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पटना से मुज़फ़्फ़रपुर जाना ठाकुर के साथ उनके संबंध की प्रगाढ़ता को ही दर्शाता है. नीतीश जी से बिहार की जनता यह जानना चाहेगी कि ब्रजेश ठाकुर के यहां जाकर उनको कृतार्थ करने के बाद उनके यानी ठाकुर के अख़बारों को मिलने वाले विज्ञापनों में कितना इज़ाफ़ा हुआ. यह भी बताना चाहिए कि मुख्यमंत्री जी द्वारा ठाकुर के घर को पवित्र करने के बाद बालिका गृह की तरह और कितने गृह के संचालन का ठेका ठाकुर को मिला.
मित्रों, जाहिर है कि बिहार भारत के सामने पहले भी बड़ा सवाल था, चुनौती था और आज भी है. साथ ही जाहिर है कि अगर मोदी जी बिहार की जनता से बिहार की प्रत्येक सीट पर अपने नाम पर वोट मांगते हैं तो बिहार से जुड़े सारे सवालों के जवाब भी उनको ही देने होंगे और पूरी संवेदनशीलता दिखाते हुए देने होंगे न कि वैसी संवेदनहीनता दिखाना होगा जैसा कि उन्होंने चमकी बुखार के मामले में प्रदर्शित किया है. बिहार की जनता के पास सिवाय मोदी जी की शरण में जाने के और कोई उपाय है भी नहीं क्योंकि नीतीश जी को तो न ही बिहार के शासन-प्रशासन से कुछ भी लेना-देना है और न ही बिहार की जनता के दुःख-दर्द से ही.

पुनश्च-हमें नहीं पता और पता नहीं कि किसे पता है कि प्रधानमंत्री जी २० घंटे जागकर करते क्या हैं? लेकिन इतना तो निश्चित है कि उनके जागरण से बिहार को कोई लाभ नहीं हुआ है.

शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

नालों में शहीद होते सफाईकर्मी


मित्रों, पिछले दिनों लोकसभा चुनावों के समय जब भारत के प्रधानमंत्री ने मीडिया के सामने समाज के सबसे निचले पायदान पर आने वाले सफाईकर्मियों के पांव पखारे तो पूरा भारतवर्ष जैसे रोमांचित हो उठा। इतना सम्मान,अद्भुत, अभूतपूर्व!
मित्रों, सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री द्वारा सम्मानित होने के बाद हूं इन सफाईकर्मियों की जिंदगी में कोई बदलाव भी आया है?अगर खबरों की मानें तो नहीं। बल्कि इन निरीह सफाईकर्मियों की जिन्दगी का कल भी कोई ठिकाना नहीं था और आज भी नहीं है. इनमें से कोई भी नहीं जानता कि नाले की सफाई करते हुए कब इनकी मौत दम घुट जाने से हो जाए. कभी-कभी तो नालियां इन बेचारों की सामूहिक कब्र भी बन जाती है. फिर घंटे-दो-घंटे तक मीडिया में शोर और फिर सब कुछ सामान्य जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं हो या फिर इनका मरना कोई रोजाना घटित होनेवाली अतिसामान्य घटना हो.
मित्रों, प्रधानमंत्री जी क्या समझते हैं कि इन बेचारों को सिर्फ सम्मान की आवश्यकता है? निश्चित रूप से इनको सम्मान भी चाहिए लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है इनकी प्राण-रक्षा और मैं समझता हूँ कि इसमें खर्च भी कोई ज्यादा नहीं लगेगा. बस इनको गोताखोरों वाला गैस-सिलेंडर उपलब्ध करवा दिया जाए. प्रधानमंत्री जी कोई भी व्यक्ति जब तक पेट से बहुत लाचार न हो,निरुपाय न हो इस तरह के काम नहीं करेगा. हम जैसे ऊंचीं जाति के लोग तो मर जाएँगे किन्तु ऐसा काम नहीं करेंगे. फिर ये बेचारे तो पीढ़ियों से समाज को साफ़-सुथरा रखने का महान कार्य करते आ रहे हैं. क्या हमारी नगरपालिकाएं या नगर-निगम इनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कुछेक लाख रूपये खर्च नहीं कर सकते? क्या ऐसा करना सरकार और निगमों और पालिकाओं का कर्तव्य नहीं होना चाहिए?
मित्रों, हमारे यहाँ एक कहावत है कि जाके पैर न फटे बिवाई सो क्या जाने पीड पराई. आपने कभी गंदे नाले में डुबकी लगाई हो या मल की टंकी में उतरे हों तब आपको पता चलेगा कि सफाईकर्मी कितना बड़ा काम करते हैं. इसी तरह जब एक साथ १०-१० सफाईकर्मियों की नाली में दम घुटने के कारण सामूहिक मौत हो जाती है तब उनके परिजनों पर क्या गुजरती है यह उनके परिजन ही बता सकते हैं हम जैसे दूर दर्शक तो बस उनके दर्द को महसूस भर कर सकते हैं.
मित्रों, अब मैं प्रधानमंत्री जी से इन सफाईकर्मियों से सम्बद्ध सबसे बड़ा सवाल पूछने जा रहा हूँ. प्रधानमंत्री जी सच-सच बताईएगा कि आपने जो लोकसभा चुनावों के समय इन सफाईकर्मियों के पाँव पखारे थे क्या ऐसा आपने भावनाओं में बह कर सच्ची श्रद्धा से किया था या फिर यह दलितों का वोट प्राप्त करने का एक उपाय मात्र था? मैं ऐसा इसलिए पूछ रहा हूँ कि लगभग हर रोज कहीं-न-कहीं सफाईकर्मी नालियों में दम तोड़ रहे हैं लेकिन आपका एक बयान तक नहीं आ रहा सुरक्षा के उपाय करना तो दूर की बात रही. कहीं आपका सफाईकर्मियों के प्रति प्यार ठेठ बिहारी भाषा में छूंछ दुलार की श्रेणी में तो नहीं आता? यहाँ मैं पाठकों को बता दूं कि छूंछ दुलार का मतलब दिखावे वाला, फुसलाने-बहलानेवाला प्यार होता है. 

बुधवार, 10 जुलाई 2019

बजट जैसा बजट

मित्रों, काफी दिन पहले एक गजल मुझे काफी पसंद था, आज भी है-वो प्यार था या कुछ और था न मुझे पता न तुझे पता. कुछ ऐसा ही मुझे अभी कुछ दिन पहले आए बजट को देखकर लग रहा है कि यह बजट है या कुछ और है न मुझे पता न तुझे पता. कुछ लोगों ने इसे बही-खाता भी कहा है लेकिन मुझे लगता है कि बजट तो पिछले वित्त मंत्री पीयूष गोयल जी ने १ फरवरी को ही पेश कर दिया था यह बजट तो महज एक औपचारिकता था.
मित्रों, फिर भी अगर हम इस बजट पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि इसमें दो-तीन घोषणाएं काफी महत्वपूर्ण थीं-पहली सरकारी कंपनियों में विनिवेश, दूसरी रेलवे का निजीकरण और तीसरी भारत को ५ ट्रिलियन यानि ५० ख़राब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना.
मित्रों, जैसे वर्तमान सरकार शुरू से ही कहती आ रही है कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं है वैसे ही मैं भी शुरू से ही कहता आ रहा हूँ कि अगर सरकार चाहे तो सरकारी क्षेत्र की कंपनियों की हालत को सुधारा जा सकता है. लेकिन सवाल फिर वही है कि सरकार चाहती क्या है? क्या वो चाहती है कि सरकारी कंपनियों की हालत सुधरे या वो चाहती है कि उनकी हालत बिगड़े और जो चंद सरकारी कम्पनियाँ शेष रह गई हैं वो भी इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएँ? सबकुछ सरकार की मंशा पर निर्भर करता है. अगर आप सरकारी कंपनी बीएसएनएल के ऑफर्स को देखेंगे तो खुद ही समझ जाएँगे कि यह कंपनी क्यों बंद होने की तरफ अग्रसर है-१८७ रु. में २८ दिन तक १ जीबी प्रतिदिन डाटा और अनलिमिटेड बातें. कहाँ जियो १४९ रु. में १.५ जीबी प्रतिदिन डाटा दे रहा है और कहाँ बीएसएनएल १ जीबी और वो भी १८७ रु में. अब बताईए कि कैसे चलेगी यह कंपनी? इसी तरह बीएसएनएल ३१९ रु. में ८४ दिनों तक अनलिमिटेड बात करने की सुविधा दे रहा है लेकिन डाटा नहीं दे रहा. डाटा दे भी रहा है तो ३४९ रु. में मगर ५४ दिनों के लिए और वो भी १ जीबी प्रतिदिन. क्या अब भी आपको सन्देह है कि बीएसएनएल का कैसे सुनियोजित तरीके से राम नाम सत है किया जा रहा है?
मित्रों, ठीक इसी तरीके से बांकी सरकारी कंपनियों की भी बाट लगाई जा रही है क्योंकि सरकार उनको रखना ही नहीं चाहती है और चाहती है कि पूरी-की-पूरी अर्थव्यवस्था निजी हाथों में चली जाए. अन्यथा क्या कारण था कि सरकार रेलवे का निजीकरण करने जा रही है. यह सही है कि रेलवे में सुविधाओं की कमी है, रेलगाड़ियों की रफ़्तार धीमी है लेकिन क्या कभी आपने सोंचा है कि निजी हाथों में जाने के बाद रेलवे से सफ़र करना कितना महंगा हो जाएगा? क्या इसके बारे में सरकार ने कभी सोंचा है कि गरीबों की सवारी में गरीब किस प्रकार सफ़र कर पाएंगे?
मित्रों, अब बात करते हैं भारत के ५ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने पर. ऐसा होने पर हमें भी ख़ुशी होगी और होनी भी चाहिए, होनी ही चाहिए मगर सवाल उठता है कि जिस तरह सरकार अर्थव्यवस्था का पूर्ण निजीकरण करने की तरफ कदम बढ़ा रही है उसमें आम आदमी ५ ट्रिलियन यानि ५० ख़राब डॉलर की अर्थव्यवस्था में कहाँ होगा? मान लिया कि अम्बानी के पड़ोस में कोई डॉक्टर साब हैं और डॉक्टर साब के घर में एक नौकर है. मान लिया कि एक महीने में तीनों की कुल आमदनी १०० करोड़ रु है और इसमें अम्बानी का हिस्सा ९९ करोड़, डॉक्टर साब का ९९ लाख ५० हजार है और बांकी का ५० हजार उनके नौकर का. अब अगर इन तीनों की कुल आमदनी दोगुनी हो जाती है तो अम्बानी तो १९८ करोड़ पर पहुँच जाएंगे जबकि डॉक्टर साब १ करोड़ ९९ लाख रु पर और नौकर तो १ लाख पर ही पहुँच पाएगा. ठीक यही हालत भारतीय अर्थव्यवस्था की होगी अगर वो २.७ ट्रिलियन से ५ ट्रिलियन पर पहुँचती है. कहने का तात्पर्य है कि तब भी गरीब न सिर्फ गरीब और अमीर न सिर्फ अमीर रहेंगे बल्कि अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और भी चौड़ी हो जाएगी. तब भी सबकुछ वैसा का वैसा रहेगा बल्कि गरीबों और किसानों का जीवन आज से कहीं ज्यादा कठिन हो जाएगा क्योंकि सबकुछ सरकार के हाथों से पूँजी के हाथों में जानेवाला है और पूँजी हृदयहीन होती है. सवाल उठता है कि क्या यही पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का अन्त्योदय दर्शन था?

गुरुवार, 4 जुलाई 2019

मोदी है तो क्या मुमकिन है?


मित्रों, कभी-कभी कुछ नारे काफी लोकप्रिय हो जाते हैं जैसे इस बार के लोकसभा चुनावों में एक नारा काफी लोकप्रिय हुआ-मोदी है तो मुमकिन है.  पता नहीं इस नारे का निर्माता कौन था लेकिन इतना तय है कि मोदी जी को फिर से जीत दिलाने में इस नारे की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही.
मित्रों, अगर हम इस नारे के सन्दर्भ में सीबीआई का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि मोदी जी के आने के बाद वह सीबीआई जिसे मनमोहन काल में सुप्रीम कोर्ट ने पिंजरे का तोता कहा था पूरी तरह से मरा हुआ तोता बन गया है. सवाल उठता है कि जिस सीबीआई का नाम सुनकर एक समय बड़े-बड़े राजनेताओं की हवा ख़राब हो जाती थी इन दिनों हत्या के छोटे-मोटे मामलों का भी उद्भेदन क्यों नहीं कर पाती? आखिर मोदीराज में सीबीआई पूरी तरह से समाप्त कैसे हो गयी? जैसा कि हम सब जानते हैं कि सीबीआई सीधे प्रधानमंत्री के मातहत होती है तो क्या प्रधानमंत्री जी ने स्वयं यत्नपूर्वक सीबीआई को मृतप्राय और औचित्यहीन बना दिया है?
मित्रों, आप कहेंगे कि एक बार फिर से सीबीआई पर मेरा गुस्सा फूटने का कारण क्या है. तो मैं आपको बता दूं कि इसके दो तात्कालिक कारण हैं. पहला यह कि रणवीर सेना के संस्थापक बरमेश्वर सिंह की हत्या हुए ७ साल बीत गए और अभी तक सीबीआई सुराग ही ढूंढ रही है. पिछले दिनों उसने इस्तहार जारी किया है कि इस हत्याकांड के बारे में सुराग देनेवालों को १० लाख का ईनाम दिया जाएगा. वाह री सीबीआई घटना के सात साल बाद भी सुराग ही खोज रही हो.  इसी तरह बिहार के जिन मामलों को सीबीआई को सौंपा गया है उन सभी मामलों में नौ दिन चले अढाई कोस वाली हालत है. शायद ७ साल बीतने का इन्तजार हो रहा है जब सीबीआई सुराग के लिए ईश्तहार जारी करेगी.
मित्रों, दूसरा कारण है कृष्णानंद हत्याकांड में मोख्तार अंसारी का बरी हो जाना. इस मामले में फैसला लगभग वैसा ही आया है जैसा जेसिका लाल हत्याकांड में आया था. हम जानते हैं कि मोख्तार अंसारी राजनेता भी है और हत्यारा भी. तो क्या नेताओं के मामले में सीबीआई कुछ कर ही नहीं सकती. मतलब कि नेताओं को मोदी जी ने घपले-घोटालों (२ जी घोटाला) के साथ-साथ खून-तून भी माफ़ कर दिया है?
मित्रों, इन दिनों लालू परिवार के सुर भी बदले-बदले से हैं. तेजस्वी यादव दिल्ली से भाजपा नेताओं से गुप्त मुलाकात करके लौटे हैं. हो सकता है कि निकट-भविष्य में इस मुलाकात का भी असर दिखे और सीबीआई के माध्यम से पूरा लालू परिवार पाक-साफ़ घोषित हो जाए जैसे माया-मुलायम-पप्पू यादव-साधू यादव आदि घोषित हो चुके हैं. यहाँ हम आपको बता दें कि माया-मुलायम-पप्पू यादव-साधू यादव मनमोहन काल में ही सीबीआई के माध्यम से अपना पवित्रीकरण करवा चुके हैं.
मित्रों, इस प्रकार हमने देखा कि मोदी है तो मुमकिन है सिर्फ एक नारा है इसमें कोई सच्चाई नहीं. कम-से-कम सीबीआई के मामले में तो स्थिति मनमोहन काल से भी ज्यादा चिंताजनक है. हम मोदी जी से हाथ जोड़कर विनती करते हैं कि या तो आप सीबीआई की स्थिति को सुधारिए या फिर उसे समाप्त ही कर दीजिए. वैसे भी आपको स्थापित संस्थाओं को समाप्त करने में महारत हासिल है. मोदी है तो मुमकिन है.

सोमवार, 1 जुलाई 2019

काम का तरीका बदलिए मोदी जी


मित्रों, पांच साल पहले जब मोदी जी ने पहली बार केंद्रीय मंत्रिमंडल का गठन किया था तब निस्संदेह मुझे घनघोर निराशा हुई थी क्योंकि मंत्रिमंडल गठन में योग्यता को नहीं जाति-पांति को प्रधानता दी गई थी. मोदी सरकार के पांच साल के कामकाज से भी मैं खुश नहीं था तथापि विकल्पहीनता की स्थिति को देखते हुए फिर से उनको ही समर्थन और वोट देने का फैसला किया. मुझे पता था और पता है कि जिस तरह से विपक्ष छद्मधर्मनिरपेक्षता की पाखंडपूर्ण नीति पर चल रही है उसी तरह से मोदी सरकार भी छद्मराष्ट्रवाद की नीति पर चल रही है. कमोबेश दोनों का लक्ष्य सत्ता-सुख प्राप्त करना है.
मित्रों, मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि मुझे इस बार के मोदी मंत्रिमंडल से भी निराशा हुई है और पिछली बार से कही ज्यादा हुई है. मैं पहले भी कह चुका हूँ कि मोदी जी करना क्या चाहते हैं कदाचित उनको खुद भी पता नहीं है अन्यथा सुब्रह्मण्यम स्वामी को वित्त मंत्री होना चाहिए था. मैंने पिछली मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की भी जमकर आलोचना की थी और कहा था कि यह सरकार गलत आर्थिक आंकड़े पेश कर रही है. सुरेश प्रभु जैसा योग्य व्यक्ति इस बार के मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किए गए हैं जो आश्चर्यजनक है.
मित्रों, मैंने ५ साल पहले भी कहा था कि जब टीम ही अच्छी नहीं होगी तो काम अच्छा कहाँ से होगा?  पिछली सरकार ने देश को दिया क्या? रोजगार के बदले बेरोजगारी, ईलाज के बदले बिहार में बच्चों की मौत और अंधाधुंध निजीकरण. अर्थव्यवस्था ठीकठाक प्रदर्शन नहीं कर रही थी तो जीडीपी मापने के पैमाने को ही बदल दिया और बेरोजगारी के आंकड़ों को महीनों तक जनता के आगे आने ही नहीं दिया. हाँ, एक काम जरूर मोदी जी की सरकार बड़े भी मनोयोग से कर रही है और वो है मूर्तियों का निर्माण मगर अफ़सोस लौह पुरुष सरदार पटेल की मूर्ति पहली बरसात का भी सामना नहीं कर पाई और रिसने लगी. अब मोदी सरकार तैयारी में है अयोध्या में  भगवान राम की विशालकाय प्रतिमा स्थापित करने की. जबकि आवश्यकता है जनसामान्य के मन में राम के आदर्शों की स्थापित करने की. जब तक राम के आदर्शों को जन-जन के मन तक स्थापित नहीं कर दिया जाता तब तक नित्य घटित हो रही रेप की घटनाओं को कोई नहीं रोक सकता चाहे कितने ही कानून क्यों न बना दिए जाएँ? वैसे बनाना ही है तो सरकार राम मंदिर बनाए।
मित्रों, कभी-कभी तो मोदी सरकार के कदमों से ऐसा भी लगता है कि जैसे हमने बन्दर के हाथों में उस्तरा थमा दिया हो. कुछ उदाहरण आपके पास भी होंगे कुछ मेरे पास भी हैं. पिछले साल तक नेट की परीक्षा से व्याख्याता बनने की योग्यता निर्धारित होती थी लेकिन पिछले साल से ठीक उसी तरह जैसे नीतीश जी ने बिहार में प्राथमिक शिक्षकों की बहाली में किया था और बिहार की शिक्षा का बड़े धूम से सत्यानाश कर दिया था मोदी सरकार ने कहा कि अब स्कोर के आधार पर कॉलेजों में बहाली होगी योग्यता गई तेल लेने और हम सोचते थे कि ये लोग बदलेंगे देश.
मित्रों, इतना ही नहीं जब लाल किले से पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा की थी कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ देश के अल्पसंख्यकों का है तब इसी भाजपा ने सख्त विरोध किया था और आज जब मोदी दोबारा चुनाव जीतते हैं तो कहते हैं कि अल्पसंख्यकों को अलग से ५ करोड़ छात्रवृत्तियां दी जाएंगी तब क्या इस कदम के पीछे मुस्लिम तुष्टिकरण की कुत्सित मानसिकता नहीं होती है? अगर नहीं तो कैसे? मैं मनमोहन सिंह के समय भी मांग कर चुका हूँ कि रजिया की मदद करनी है तो की जाए लेकिन साथ-साथ सरकार राधा की भी मदद करे. क्या अपने इस तरह के कदमों से मोदी सरकार भी हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाना चाहती है जो कभी मनमोहन चाहते थे? वैसे मोदीजी के सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास नारे की पोल कल अल्ला हो अकबर के नारे के साथ दिल्ली के लाल कुआं के ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर की देव प्रतिमाओं को खंडित कर मुसलमानों ने खोल दी है।
मित्रों, मोदी सरकार ने एक और भी महान मूर्खतापूर्ण कदम उठाने की सोंची है. दरअसल यूपीएससी ने फैसला किया है कि अब सामान्य वर्ग के लोग सिर्फ २६ साल की उम्र तक ही सिविल सेवा परीक्षा में भाग ले पाएँगे. हद तो यह है कि बांकी वर्गों के लिए उम्रसीमा पूर्ववत है. मतलब कि मोदी सरकार मानती है कि सिर्फ सामान्य वर्ग के लोग मात्र २६ साल की उम्र में बूढ़े हो जाते हैं. क्या वो बताएगी कि वो इस निष्कर्ष पर किस शोध के आधार पर पहुंची है?
मित्रों, मोदी जी का एक कदम तो ऐसा है जिससे पता चलता है कि वे खुद को बाकियों से विशिष्ट मानते हैं जबकि ऐसा है नहीं। मोदीजी भी मानव हैं और समस्त मानवीय क्रिया-कलाप करते हैं। आपने भी ध्यान दिया होगा कि मोदीजी जब विमान पर चढ़ते हैं या विमान पर से उतरते हैं तो अकेले दिखाई देते हैं। क्या ऐसा करके वे यह दिखाना चाहते हैं कि उनके बराबर कोई नहीं है या फिर यह प्रर्दशित करना चाहते हैं कि वे अकेले ही सरकार चला रहे हैं? मोदी सरकार के एक और कदम से मैं निराश हुआ हूं और वह कदम यह है कि मोदी सरकार ने अपनी विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग करके उन तीन अखबारों को विज्ञापन देना बंद कर दिया है जो लगातार उसके खिलाफ लिखते रहे हैं। पता नहीं ऐसा करके मोदी कौन से लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना करना चाहते हैं? मैंने बिहार में देखा है कि किस तरह नीतीश विज्ञापन की बीन पर अखबारों को नचाते रहे हैं। तो क्या मोदी जी भी अब वैसा ही करेंगे? एक और मामले में नीतीश जी मोदी जी के गुरु हैं और वो यह है कि नीतीश जी शुरू से ही दिखावे की सरकार चलाते रहे हैं. जब बिहार में नीतीश जी की सरकार बनी तो महात्मा गाँधी सेतु का रंग-रोगन किया गया लेकिन पुल की सेहत पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। परिणाम यह कि पुल अब गिरने के कगार पर पहुंच चुका है। मोदी भी नीतीश की तरह दिखावा कर रहे हैं काम कुछ भी नहीं हो रहा है। पुलिस और न्यायिक सुधार, जनसंख्या-नियंत्रण, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण सभी आज सरकारी प्राथमिकता से गायब हैं।
मित्रों, मोदी सरकार के एक-एक कदम पर नजर रखनेवाले निश्चित रूप से हमसे सहमत होंगे कि मोदी जी ने अब तक जो भी कदम उठाए हैं वोटबैंक को ध्यान में रखकर उठाए हैं. शायद वे नेहरु जैसी ताक़त चाहते हैं और इस बार के संसद में दिए अपने पहले भाषण में उन्होंने पहली बार नेहरु जी का जिक्र भी किया है. बस मोदी जी यहीं तक रूक जाएँ जो बेहतर होगा अन्यथा मुझे तो ऐसा भी लगता है कि कहीं सबका विश्वास पाने के चक्कर में मोदी जी सबका विश्वास न खो दें. यानि नेहरु जैसी ताक़त पाना है तो पाएं लेकिन अगर वे नेहरु बनने  का प्रयास करेंगे तो निश्चित रूप से बहुत जल्दी उनको अपना झोला उठाकर सचमुच दिल्ली छोड़कर चल देना होगा और केदारनाथ की गुफाओं में बुढ़ापा गुजारना होगा.

मंगलवार, 25 जून 2019

मोदी, राष्ट्रवाद और दम तोड़ते बच्चे


मित्रों, आपको याद होगा कि मोदी जी ने २०१४ के लोकसभा चुनावों के भाषण में कहा था कि उनके समय में चलता है नहीं चलेगा और वे हर क्षेत्र में ऐसे इंतजाम करेंगे जिससे वही हो जो होना चाहिए. परन्तु हम देखते हैं कि मोदी जी के शासन के दूसरे कार्यकाल में भी वही सब हो रहा है जो मनमोहन सिंह के समय में हो रहा था. शासकों का वही ऐश-मौज और जनता के दुखों के प्रति वही अक्षम्य संवेदनहीनता.
मित्रों, बचपन में मैंने केनोपनिषद में एक बोध कथा पढ़ी थी कि एक बार लम्बे युद्ध के बाद देवताओं ने दानवों पर विजय प्राप्त की.  उस विजय से देवताओं को अहंकार हो गया । वे समझने लगे कि यह उनकी ही विजय है। उनकी ही महिमा है और वे अपने कर्तव्यों को भूलकर मौज-मस्ती में डूब गए. यह देखकर वह (ब्रह्म) उनके सामने प्रादुर्भूत हुआ और वे (देवता) उसको न जान सके कि ‘यह यक्ष कौन है’
तब उन्होंने (देवों ने) अग्नि से कहा कि, ‘हे जातवेद ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । अग्नि ने कहा – ‘बहुत अच्छा’. अग्नि यक्ष के समीप गया । उसने अग्नि से पूछा – ‘तू कौन है’ ? अग्नि ने कहा – ‘मैं अग्नि हूँ, मैं ही जातवेदा हूँ’. ‘ऐसे तुझ अग्नि में क्या सामर्थ्य है ?’ अग्नि ने कहा – ‘इस पृथ्वी में जो कुछ भी है उसे जलाकर भस्म कर सकता हूँ’. तब यक्ष ने एक तिनका रखकर कहा कि ‘इसे जला’ । अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को जलाने में समर्थ न होकर वह लौट गया । वह उस यक्ष को जानने में समर्थ न हो सका.  तब उन्होंने ( देवताओं ने) वायु से कहा – ‘हे वायु ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । वायु ने कहा – ‘बहुत अच्छा’. वायु यक्ष के समीप गया । उसने वायु से पूछा – ‘तू कौन है’ । वायु ने कहा – ‘मैं वायु हूँ, मैं ही मातरिश्वा हूँ’. ‘ऐसे तुझ वायु में क्या सामर्थ्य है’ ? वायु ने कहा – ‘इस पृथ्वी में जो कुछ भी है उसे उड़ा सकता हूँ’.
तब यक्ष ने एक तिनका रखकर कहा कि ‘इसे उड़ा’। अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को उड़ाने में समर्थ न होकर वह लौट गया। इस प्रकार वह उस यक्ष को जानने में समर्थ न हो सका. 
तब उन्होंने (देवताओं ने) इन्द्र से कहा – ‘हे मघवन् ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । इन्द्र ने कहा – ‘बहुत अच्छा’ । वह यक्ष के समीप गया । उसके सामने यक्ष अन्तर्धान हो गया.
वह इन्द्र उसी आकाश में अतिशय शोभायुक्त स्त्री, हेमवती उमा के पास आ पहुँचा, और उनसे पूछा कि ‘यह यक्ष कौन था’. उसने स्पष्ट कहा – ‘ब्रह्म है’ । ‘उस ब्रह्म की ही विजय में तुम इस प्रकार महिमान्वित हुए हो’ । तब से ही इन्द्र ने यह जाना कि ‘यह ब्रह्म ही है जो सारी शक्तियों का मूल है.'
मित्रों, मुझे लगता है कि कुछ ऐसी ही स्थिति इन दिनों मोदी सरकार की है. मोदी और उनके साथी यह भूल गए हैं कि लोकतंत्र में जनता ही ब्रह्म है और जनता ने उनकी जीत में अपनी जीत को देखा तभी उनको यह प्रचंड जीत मिली है. एक तरह बिहार में बच्चे मर रहे हैं और दूसरी तरफ मोदी पांच सितारा होटल में पार्टी कर रहे हैं. क्या इससे भी बड़ी कोई संवेदनहीनता हो सकती है? क्या सभी चौक-चौराहों और रेलवे स्टेशनों पर १००-१०० फीट ऊंचा तिरंगा फहरा देने मात्र से देश की सारी समस्याएँ दूर हो जाएंगी. मैंने बचपन में देखा है कि जब श्रीमती इन्दिरा गाँधी का शासन था तब सरकारी स्कूल में पढाई का स्तर गजब का था. इसी तरह सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था भी बहुत अच्छी थी. आज सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत क्या है और क्यों है  और इसमें सुधार लाना किसकी जिम्मेदारी है? क्या सबकुछ निजी क्षेत्र के हाथों सौंप देने से देश की जनता का भला हो जाएगा? मैंने खुद भी अनुभव किया है कि निजी क्षेत्र को सिर्फ लाभ से मतलब होता है नैतिकता के लिए उसके पास कोई जगह नहीं होती. कार्ल मार्क्स ने जो कहा था कि पूँजी हृदयहीन होती है कोई गलत नहीं कहा था. ऐसी स्थिति में मोदी कैसे देश को पूँजी यानि निजी क्षेत्र के कदमों में डालकर कह सकते हैं कि अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों.
मित्रों, सबसे दुखद स्थिति तो यह है कि जिस बिहार ने मोदी के एक आह्वान पर ४० में से ३९ सीटें उनके झोले में डाल दिया उसी बिहार के बच्चे समुचित व्यवस्था के बिना दम तोड़ते रहे और मोदी जी के मुंह से सहानुभूति के एक शब्द तक न फूटे. मोदी जी होंगे आप दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति लेकिन शक्तिशाली तो बगदादी भी है और लादेन भी था. हमने तो आपको राम समझ के वोट किया था. वही राम जिसके लिए प्रजा का सुख ही अपना सुख था और प्रजा का हित ही अपना हित था. जिसका सबकुछ प्रजा का था जिसका सबकुछ प्रजा थी. आप खुद ही निर्णय लीजिए मोदी जी कि आपको क्या बनना है राम या बगदादी. भूलिएगा नहीं कि देव जनता आपके पतंग को एक चुनाव में आसमान दिखा सकती है तो दूसरे चुनाव में जमीन भी सूंघा सकती है.

मंगलवार, 18 जून 2019

साहेब, मौसम और गुलाम


मित्रों, आप सोंच रहे होंगे कि क्या उटपटांग शीर्षक लगाया है मैंने. साहेब हैं तो बीवी भी होनी चाहिए. लेकिन इसमें मेरा कोई दोष नहीं. साहेब की बीवी है मगर नहीं है तो इसमें मैं क्या कर सकता हूँ? साहेब, बीवी और गुलाम में बीवी साहेब के घर में रहती थी लेकिन यहाँ बीवी उनके साथ नहीं रहती. दोनों में दशकों से भेंट तक नहीं हुई. साहेब बीवी के बदले मौसम से काम चला रहे हैं.
मित्रों, ७०-८० के दशक में ही जब हम विज्ञान प्रगति पढ़कर विज्ञान की प्रगति करवा रहे थे तब पढने को मिलता था कि भविष्य बड़ा भयावह होनेवाला है. जलवायु परिवर्तन के कारण उन स्थानों पर सूखा पड़ेगा जहाँ बाढ़ आती है और उन स्थानों पर बाढ़ आएगी जहाँ मौसम सूखा रहता है. नदियों के ग्लेशियर सूख जाएँगे और गंगा-यमुना समेत सारी नदियाँ खुद पानी के लिए तरसेंगी. जब जल पुरुष राजेंद्र सिंह राजस्थान में हरियाली ला रहे थे तब देश के नेता वोटों की फसल काट रहे थे. अब जबकि भविष्यवाणी किसी तोतेवाले पंडित के बदले वैज्ञानिकों ने की थी तो मौसम ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है. पूरा बिहार जो एक समय अप्रैल के महीने से ही बरसात से सराबोर रहता था इन दिनों भयंकर लू की चपेट में है और दर्जनों लोग रोजाना सिर्फ लू से मर रहे हैं. हैण्ड पम्प सूख गए हैं. तालाबों और कुँओं को तो हमने वर्षों पहले ही सुखा दिया. हैण्ड पम्प और नलकूप के आगे उनकी क्या बिसात मगर सरकार यह भूल गयी कि हैण्ड पम्प जमीन से सिर्फ पानी निकालना जानते हैं रिचार्ज नहीं कर सकते.
मित्रों, अब जबकि लगभग पूरे देश में त्राहिमाम की स्थिति है तब साहेब ने एक वक्तव्य जारी करके पूरे भारत के ग्राम प्रधानों को निर्देश दिया है कि बरसात के पानी को जमा करने का इंतजाम किया जाए. इधर साहेब ने वक्तव्य दिया और उधर पानी जमा हो गया. उन सारे तालाबों का क्षण भर में पुनरूद्धार हो गया जिनमें जलकुम्भी ने अड्डा जमा लिया है और उन सारे तालाबों का अतिक्रमण भी समाप्त हो गया जिनमें मिटटी भर-भर के सरकारी दफ्तर और घर बना दिए गए हैं. साहेब इसी तरह से काम करते हैं और कहते भी हैं कि मोदी है तो मुमकिन है. पता नहीं यहाँ मुमकिन से उनका तात्पर्य है क्या आबादी या बर्बादी?
मित्रों, आबादी से याद आया कि भारत के लिए आबादी भी बहुत सारी बरबादियों का कारण है. ऐसा नहीं है साहेब को यह पता नहीं है लेकिन साहेब इस तरफ से आँखें पूरी तरह से बंद किए हुए हैं और उनलोगों को अपनी तरफ करने में लगे हुए हैं जो आबादी बढाने में सबसे ज्यादा योगदान कर रहे हैं. लगता है कि साहेब को मौसम की नहीं सिर्फ चुनावी मौसम की चिंता है.
मित्रों, हमारा क्या है हम तो ठहरे गुलाम और हमारा काम तो सिर्फ सिर हिलाना है और वो भी हाँ के स्वर में. नहीं में हिलाना भी चाहें तो नहीं हिला सकते क्योंकि साहेब को सम्मोहिनी विद्या आती है. तथापि मुझे पर्यावरणविदों की भविष्यवाणियों से चिंता हो रही है जो कहते हैं कि भविष्य में गरीब लोग जलवायु-परिवर्तन से उत्पन्न अकाल की स्थिति में अनाज और पानी नहीं खरीद पाएँगे और मर जाएँगे. इसी तरह अभी बिहार में जिनके पास कूलर और एसी है उनका लू क्या बिगड़ ले रही है लेकिन जो गरीब हैं वे मर रहे हैं और लू और मस्तिष्क ज्वर से केवल वही मर रहे हैं. ऐसे में अगर गुलामों को अपनी जान बचानी है तो जल-संरक्षण को जनांदोलन का रूप देना होगा और इसके लिए एक नहीं लाखों राजेंद्र सिंह की जरुरत होगी. क्योंकि पानी नहीं होगा तो पीयोगे क्या और खेती कैसे करोगे और खेती नहीं होगी तो खाओगे क्या? साहेब का क्या है अभी ग्राम-प्रधानों से आह्वान किया है और मानसून के आते ही भूल जाएंगे. फिर तो वे विमान और हेलीकाप्टर से बाढ़ग्रस्त ईलाकों का हवाई-सर्वेक्षण करेंगे. हर साल यही तो होता है.

रविवार, 16 जून 2019

बर्बाद बिहार है नीतीशे कुमार हैं-२


मित्रों, यकीन मानिए मैं कभी भी नहीं चाहता कि बिहार की कुव्यवस्था पर कुछ लिखूं. जब भी मैंने ऐसा किया है बड़े ही भारी मन से किया है और आज मैं जिन हालातों में लिखने बैठा हूँ मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरा दिल जार-जार रो रहा है. और सिर्फ मेरा दिल ही नहीं रो रहा बल्कि मेरे साथ पूरा भारत रो रहा है.
मित्रों, आप समझ गए होंगे कि मैं बात कर रहा हूँ बिहार में रोजाना समुचित चिकित्सा के अभाव में दम तोड़ रहे छोटे-मासूम बच्चों की. पिछले कई सालों से इस मौसम में बिहार के मुजफ्फरपुर और उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक अनजान बीमारी से सैकड़ों की संख्या में छोटे-छोटे बच्चों की अकाल मृत्यु होती रही है. पिछले साल तक गोरखपुर में भी इस बीमारी का प्रकोप देखा गया लेकिन इस साल जागरूकता और सघन टीकाकरण अभियान के कारण उत्तर प्रदेश की स्थिति बेहतर है जबकि बिहार की हालत आपलोगों के सामने है. मैं कई बार कह चुका हूँ कि बिहार में अंधों और बहरों का शासन है जो गजब के बडबोले हैं.
मित्रों, मुझे ऐसा भी लगता है कि मंगल पांडे जी जो बिहार के स्वास्थ्य मंत्री हैं पिछले हफ़्तों में पार्टी का काम कन्धों पर होने के चलते विभाग के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं. इन दिनों वे झारखण्ड के पार्टी प्रभारी थे और स्वाभाविक है कि लोकसभा चुनावों के चलते उनके ऊपर झारखण्ड में ज्यादा-से-ज्यादा सीते जीतने का दबाव रहा होगा. लेकिन चुनाव संपन्न हुए भी अब एक महीना बीतने पर है और उनको चुनावी मोड से अब तक बाहर आ जाना चाहिए था और अपने विभाग के काम-काज पर भी ध्यान देना चाहिए था. सरकार चाहती तो जैसे ही इस रहस्यमय बीमारी का प्रकोप शुरू हुआ एम्स के टॉप चिकित्सकों को बच्चों के ईलाज में लगा देती. अगर सरकार उन माँ-बाप के बच्चों की जीवन-रक्षा के प्रति थोड़ी-सी भी गंभीर होती तो बच्चों को एयर एम्बुलेंस से दिल्ली और अन्य महानगरों में स्थित बड़े अस्पतालों में स्थानांतरित कर देती. अगर मंगल पांडे जी थोड़े-से भी संवेदनशील होते तो उनके काफिले को बच्चे का एम्बुलेंस रोककर पास न कराया गया होता.
मित्रों, मैं नहीं बता सकता कि उन माता-पिताओं पर इस समय क्या गुजर रही होगी जिन्होंने अपने नौनिहाल खोए हैं. भगवान न करें कि किसी के साथ भी ऐसा हो. मैं सरकार से सवाल पूछना चाहता हूँ कि अगर मंत्रियों के बच्चों को यही बीमारी हुई होती तब भी क्या सरकार का व्यवहार वही होता जो अभी है? क्या सरकार इसी प्रकार से उदासीन होती?
मित्रों, मुझे याद है कि जब यूपीए सरकार में इस्पात मंत्री रहते हुए रामविलास पासवान जी पटना में बीमार हो गए थे तब दो-दो एयर एम्बुलेंस उनको लेने पहुंचे थे. तो क्या राजा की जान बहुत कीमती होती है और प्रजा की जान की कीमत जानवरों की जान से भी कम कीमत की होती है? साथ ही मैं नरेन्द्र मोदी जी से सवाल पूछना चाहता हूँ कि बिहार की जनता ने आपको ४० की ४० सीटों पर सीधा उम्मीदवार मानते हुए ३९ सीटें दे दीं क्या यही दिन देखने के लिए? अगर यही मौतें गुजरात में होती तो भी क्या आप चुप्पी साधे रहते और ११वें दिन केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को भेजते?
मित्रों, अब मैं रवीश कुमार जी पर व्यंग्य नहीं करूंगा. बहुत व्यंग्य कर लिया उन पर अब तो परिस्थितियां हम पर व्यंग्य कर रही हैं, अट्टहास कर रही हैं कि देख तू जिनका समर्थक है वे राजनेता क्या कर रहे हैं? वे हमसे जैसे पूछ रही है कि बता क्या इस तरह की अक्षम्य संवेदनहीनता को ही राष्ट्रवाद कहते हैं. अंत में मैं नीतीश कुमार जी को कुछ नहीं कहना चाहूँगा क्योंकि उनको न तो बिहार से और न ही बिहार की जनता से कोई मतलब रह गया है उनको तो बस धारा ३७० और ३ तलाक से मतलब है लेकिन मैं मंगल पांडे जी से जरूर यह कहना चाहूँगा कि कम-से-कम आपने इस बात का तो ख्याल रखा होता कि आपके नाम का एक महापुरुष भारत के इतिहास में पहले भी हुआ है. मंगल भैया कम-से-कम अपने नाम की तो ईज्जत कर लिए होते.

बुधवार, 12 जून 2019

बर्बाद बिहार है नीतिशे कुमार हैं-१


मित्रों, साल २०१५ के बिहार विधान-सभा चुनाव का प्रचार चल रहा था. नीतीश जी लालू जी की गोद में बैठे थे और एनडीटीवी के रवीश कुमार जी पूरे बिहार में घूम-घूम कर जनता से पूछ रहे थे और उसके आधार पर दावा कर रहे थे कि बिहार में बारहमासी बहार है जो नीतीश कुमार के कारण है.
मित्रों, वक़्त बदला, हालात बदले यहाँ तक कि नीतीश जी ने पार्टनर भी बदल लिया मतलब सबकुछ बदला बस नहीं बदला तो बिहार की फूटी तक़दीर. इस आलेख में जो इस शृंखला की पहली कड़ी है हम सिर्फ नीतीश जी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का विश्लेषण करेंगे.
मित्रों, आपको भी पता होगा कि अपने नीतीश जी घनघोर ईमानदार हैं इतने कि हम उनको इस मामले में चरम आदरणीय अरविन्द केजरीवाल जी का गुरु भी कह सकते हैं. नीतीश ने मुख्यमंत्री बनते ही निगरानी विभाग का पुनर्गठन किया और आदेश दिया कि ताबड़तोड़ छापे मारो. फिर तो जैसे रिश्वतखोरों की शामत ही आ गयी. सबसे ज्यादा चपेट में आए पुलिसवाले, भू राजस्व और शिक्षा विभाग वाले क्योंकि हमेशा से इनमें ही ज्यादा भ्रष्टाचार है. पहले लोगों में को सिर्फ निलंबित करके छोड़ दिया जाता था लेकिन देखा गया कि वही आदमी दोबारा और कई बार तो तिबारा घूस लेते हुए पकड़ा गया. इसी बीच बक्सर के किसी जिलाधिकारी ने रिश्वतखोरों को सीधे बर्खास्त करने की परंपरा को जन्म दिया और इसके बाद जो भी घूस लेता हुआ पकड़ा गया उसे सीधे बर्खास्त कर दिया जाने लगा.
मित्रों, इसी बीच वर्ष २००६-०७ में मेरे चचेरे मामा राजेश्वर प्रसाद सिंह जो उस समय वैशाली जिले के जन्दाहा प्रखंड के नाडी गाँव के मध्य विद्यालय के प्रधानाध्यापक थे भी रिश्वत लेते रंगे हाथों पकडे गए. मुझे लगा अब राम राज्य आकर रहेगा क्योंकि मैं जानता था कि मेरे मामा दशकों से बहुत बड़े रिश्वतखोर थे. मामा पहले निलंबित और बाद में बर्खास्त भी किये गए. लेकिन इस बार जब मैं ननिहाल गया तो पाया कि मामा जी काफी खुश हैं. पता लगा कि वे पटना उच्च न्यायालय से मुकदमा जीत गए हैं और उनका पेंशन तो बहाल हो ही गया है साथ ही सेवानिवृत्ति लाभ की राशि भी सूद सहित मिली है वो भी ८० लाख. मैं सुनकर स्तब्ध था. जो व्यक्ति रंगे हाथों घूस लेता हुआ पकड़ा गया हो वो बरी कैसे हो सकता है. तो क्या नीतीश जी की सरकार में जितने भी लोग रंगे हाथों घूस लेते हुए पकडे गए हैं वे सब बारी-बारी से चुपके-चुपके कोर्ट से बरी होते जा रहे हैं? प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या? मेरे मामा खुद ही प्रमाण हैं.
मित्रों, नीतीश जी के बारे में कभी लालू जी ने कहा था कि इसके पेट में भी दांत है. मुझे लगता है कि पेट के अतिरिक्त नीतीश जी के हाथी की तरह दो और भी दांत हैं जो सिर्फ दिखाने के काम आते हैं. अब मैं मुखतिब होना चाहूँगा रवीश जी की तरफ और उनको बताना चाहूँगा कि बिहार में सचमुच बहार है. जैसा कि आपने देखा कि बिहार में भ्रष्टाचारियों की बहार है. आगे और भी प्रकार के बहारों की हम आपको सैर करवाएंगे. आओ हुजुर तुमको बहारों में ले चलूँ दिल झूम जाए ऐसे नजारों में ले चलूँ....

रविवार, 9 जून 2019

खतरे में उच्च शिक्षा का भविष्य


मित्रों, सर्वप्रथम मैं भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को दोबारा भारत का प्रधानमंत्री चुने जाने पर बधाई देता हूँ. मैं उनका बहुत पुराना भक्त हूँ और इसलिए उनके प्रधानमंत्री रहते हुए जब देखता हूँ कि कई सारे क्षेत्रों में स्थिति चिंतनीय और दयनीय है तो मन गहरी व्यथा से भर जाता है. उदाहरण के लिए अभी-अभी एनएसएसओ की रिपोर्ट आई है कि देश में नौकरीपेशा लोगों की स्थिति दैनिक मजदूरों से भी ज्यादा खस्ता है. जहाँ दैनिक मजदूर रोजाना १००० रूपये कमा रहे हैं और फिर भी आसानी से उपलब्ध नहीं होते वहीँ शिक्षित बेरोजगारों की स्थिति पिछले पांच सालों में काफी ख़राब हो गयी है. आज पीएचडी धारक युवाओं को भी १०००० मासिक की नौकरी आसानी से नहीं मिल रही. और ऐसा आरोप सिर्फ विपक्ष लगा रहा होता तो गनीमत थी खुद एनएसएसओ जैसी प्रतिष्ठित सरकारी सर्वेक्षण एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में ऐसा कहा है.
मित्रों, सवाल उठता है कि इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है? सरकार अगर अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगी तो कौन समझेगा? अब उच्च शिक्षा से सम्बंधित सरकारी आदेश को ही लें. पिछले साल मानव संसाधन मंत्रालय भारत सरकार ने राजपत्र जारी कर घोषणा की कि अब से कॉलेज प्राध्यापकों की नियुक्ति में यूजीसी नेट को मात्र ५ अंक का वजन मिलेगा जबकि पीएचडी को ३० अंक का वजन मिलेगा. सवाल उठता है कि फिर नेट का मतलब ही क्या रह गया? सरकार क्या समझती है कि नेट करना आसान है या पीएचडी करना? भारत में हर साल इतने सारे लोग शोध करते हैं फिर किसी को नोबेल क्यों नहीं मिलता? क्या भारत में शोध का मतलब कॉपी, कट, पेस्ट नहीं है? क्या भारत की डीम्ड यूनिवर्सिटीज पैसे लेकर पीएचडी की डिग्री नहीं बेच रही? क्या सरकारी यूनिवर्सिटीज में पीएचडी करने के लिए विभिन्न तरह की घूसखोरी नहीं चल रही जिसमें यौन-शोषण भी शामिल है?
मित्रों, मुझे याद आता है कि लालू जी के समय बिहार में व्याख्याताओं की बहाली हुई थी. कुल ३०० अंक की परीक्षा थी. मगर बेहद हास्यास्पद तरीके से इनमें से १०० अंक लिखित के और २०० अंक साक्षात्कार के रखे गए थे. फिर तो लालू के लगभग सारे विधायक और मंत्री यहाँ तक कि विधायक-मंत्रियों के साले-सालियाँ भी कॉलेज प्राध्यापक बन गए. मुझे लगता है कि पिछली मोदी सरकार के मानव संसाधन मंत्री श्री प्रकाश जावड़ेकर जी ने भी अपने किसी साला-साली को फायदा पहुँचाने के लिए ही यह मनमाना कदम उठाया था.
मित्रों, अब श्री जावड़ेकर मानव संसाधन विकास मंत्री नहीं रह गए हैं और नई सरकार में उनका स्थान हिंदी के जाने-माने साहित्यकार रमेश पोखरियाल निश्शंक जी ने ले लिया है. इसलिए मैं समझता हूँ कि अब उनसे निवेदन करना ही समीचीन होगा. मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि नेट उत्तीर्ण व्यक्ति अध्यापन के लिए ज्यादा उपयुक्त होगा या पीएचडी किया हुआ व्यक्ति. माना कि शोध भी पाठ्यक्रम का हिस्सा होता है लेकिन बहुत छोटा जबकि नेट किये हुए व्यक्ति के पास पूरे विषय का ज्ञान होता है अन्यथा वो नेट उत्तीर्ण ही नहीं कर पाएगा.
मित्रों, सरकार यदि उच्च शिक्षा का स्तर वास्तव में ऊँचा उठाना चाहती है तो आज के समय की मांग है कि पीएचडी और नेट दोनों को अनिवार्य करते हुए नेट की वैल्यू को पीएचडी से ज्यादा कर देना चाहिए क्योंकि नेट उत्तीर्ण व्यक्ति को पूरे विषय का ज्ञान होता है जबकि पीएचडी वाले व्यक्ति को केवल शोध का ज्ञान होता है और जब शिक्षक कक्षा में पढ़ाने जाता है तो उसे ९० प्रतिशत विषय और १० प्रतिशत शोध के बारे में ज्ञान देना होता है. भारत के युवाओं की दूसरी मांग यह है कि इसी राजपत्र में सरकार ने कहा है कि २०२१ से नेट उत्तीर्ण लोग सिर्फ कॉलेजों में नियुक्त हो पाएँगे विश्वविद्यालयों में नहीं. ऐसा करने का आधार क्या है? किसी भी सरकारी कदम का कोई तार्किक आधार तो होना चाहिए? क्या विश्वविद्यालयों में सिर्फ शोध की पढाई होती है विषय की पढाई नहीं होती?
मित्रों, अभी-अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने कहा है कि मुझ पर इतना दबाव डालो कि मैं खुद अपने खिलाफ भी छापा मरवाने के लिए बाध्य हो जाऊं. सवाल उठता है कि क्या सरकार दबाव में आती भी है या फिर मोदी जी का ऐसा कहना सिर्फ जुमलेबाजी है? मैं समझता हूँ कि मेरे इस आलेख के बाद जो भारत के सारे युवाओं की मांग को धारण करता है मोदी जी के इस बयान की सच्चाई की परीक्षा भी हो जाएगी. हालाँकि मेरा आज भी विश्वास है कि मोदी है तो कुछ भी मुमकिन है.

रविवार, 26 मई 2019

जीत की बधाई मगर .........


मित्रों, मैं सर्वप्रथम भारतवर्ष की समस्त जनता को लोकसभा चुनाव-परिणामों के लिए बधाई देता हूँ. साथ भारत के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी को भी बधाई और शुभकामनाएँ देता हूँ. जिन लोगों ने मोदी जी की हार के बारे में कल्पना कर रखी थी उन लोगों के लिए यह चुनाव-परिणाम अवश्य आश्चर्यजनक है परन्तु मेरे लिए तो अवश्यम्भावी है क्योंकि मुझे कभी इस बात को लेकर कोई संदेह रहा ही नहीं कि श्री नरेन्द्र मोदी दोबारा पहले से भी प्रचंड बहुमत से चुनाव जीतने जा रहे हैं.
मित्रों, ऐसा मेरा भी मानना रहा है कि जो जीता वही सिकंदर तथापि अपने भारतवर्ष में ऐसे-ऐसे नेता लगातार चुनाव जीतते रहे हैं जिससे यह साबित होता है कि कोई सिर्फ चुनाव जीत जाने से ही महान नहीं हो जाता बल्कि इसके लिए उसको महान कार्य भी करने होते हैं. उदाहरण के लिए बिहार को पिछले गियर में चला देनेवाले लालू प्रसाद यादव और उनकी अनपढ़ पत्नी ने मिलकर बिहार पर १५ साल तक एकछत्र राज किया. इसी तरह बंगाल को देश के सबसे अमीर राज्य से सबसे कंगाल राज्य में बदल देनेवाले ज्योति बसु ने भी पश्चिम बंगाल पर लगातार ३० सालों तक शासन किया. इसी तरह दुनिया के कई देशों में कई-कई दशकों तक तानाशाहों का शासन रहा है. कहने का मतलब यह है कि मोदी जी को अपनी जीत पर इतराना नहीं चाहिए बल्कि उन सारे कार्यों को पूरा करना होगा जो पहले कार्यकाल में अधूरे रह गए थे.
मित्रों, मैं एक बार भारत के परम प्रतापी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को याद दिलाना चाहूँगा कि उनको कौन-कौन से कामों को प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखना है. मैं जहाँ तक समझता हूँ कि प्रधानमंत्री जी को अपनी प्राथमिकता सूची में जनसँख्या-नियन्त्रण को सबसे ऊपर रखना चाहिए. मैं मानता हूँ कि यह अकेले समस्त समस्याओं की जननी है. प्रत्येक साल हमारी जनसँख्या २ करोड़ बढ़ जाती है. दुनिया की कोई भी सरकार हर साल दो करोड़ अतिरिक्त लोगों के लिए सुविधाएँ और रोजगार उपलब्ध नहीं करवा सकती भले ही वो कितनी भी अमीर क्यों न हो फिर भारत तो एक गरीब देश है. इसके साथ-साथ पिछली जनगणनाओं में हम देख रहे हैं कि हिन्दुओं की देश की जनसँख्या में भागीदारी लगातार घट रही है और मुसलमानों की लगातार बढ़ रही है. हम जानते और मानते हैं कि जब तक देश में हिन्दू ज्यादा हैं तभी तक देश और इसकी संस्कृति सुरक्षित है नहीं तो फिर तलवार के बल पर देश का इस्लामीकरण कर दिया जाएगा. दुनिया का इतिहास भी इस बात की तस्दीक करता है. इसलिए मोदी सरकार को कड़े कानून बनाकर जनसँख्या-वृद्धि पर लगाम लगानी चाहिए. और मैं समझता हूँ कि ऐसा अन्य कोई नेता या पार्टी नहीं कर सकती थी बल्कि ऐसा सिर्फ और सिर्फ मोदी जी ही कर सकते थे और कर सकते हैं क्योंकि मोदी है तो मुमकिन है.
मित्रों, इसके बाद मोदी जी को अनुच्छेद ३७० की समाप्ति पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए. न जाने पंडित नेहरु ने क्या खाकर या पीकर इस अनुच्छेद को संविधान का हिस्सा बनाया था. क्या विडंबना है कि रोहिंग्या या पाकिस्तानी तो जम्मू-कश्मीर में मजे में बस सकते हैं लेकिन एक गैर कश्मीरी भारतीय वहां नहीं बस सकता क्योंकि अनुच्छेद ३७० ऐसा करने नहीं देता. जबकि जम्मू-कश्मीर के जमीनी हालात इस बात की मांग करते हैं कि जम्मू-कश्मीर में गैर मुसलमानों को बसाकर वहां की जनसांख्यिकी को बदला जाए. जिस दिन वहां हिन्दू मतदाता ज्यादा हो जाएँगे आतंकवाद खुद-ब-खुद रूक जाएगा. वैसे इस बार के चुनाव प्रचार में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अनुच्छेद ३७० को समाप्त करने का वादा भी काफी जोर-शोर के साथ किया है और जनता ने भी उनको ऑफर किया था कि ३७० हटाओ ३७० सीटें पाओ.
मित्रों, इसके साथ ही मोदी जी को रोजगार उत्पन्न करने और व्यवसाय के लिए आसान ऋण देने पर भी ध्यान देना चाहिए. मैं नहीं जानता कि मुद्रा-ऋण के आंकडे कहाँ तक सही हैं लेकिन मैंने खुद अनुभव किया है कि हाजीपुर में यह योजना तेल के माथा तेल की नीति का अनुशरण करते हुए चलाई जा रही है. कहने का तात्पर्य यह है कि नए लोगों को बिलकुल भी ऋण नहीं दिया जा रहा बल्कि उन लोगों को मुद्रा-ऋण दिया जा रहा है जिनका पहले से ही रोजगार है. मोदी सरकार को इस स्थिति को बदलना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि उन लोगों को इसका लाभ मिले जिनके लिए वास्तव में यह योजना लाई गई थी.
मित्रों, मोदी सरकार को जलवायु-परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निबटने की विस्तृत योजना बनानी होगी. पिछले सालों में हमने देखा है कि भारत का पूर्वी हिस्सा जो अतिवृष्टि के लिए जाना जाता था जल संकट और सूखे जैसी स्थितियों का सामना कर रहा है जबकि राजस्थान जहाँ दशकों में कभी एकाध बार बरसात होती थी वहां प्रत्येक साल बाढ़ आ रही है. अभी कल-परसों मुझे बिहार के वैशाली जिले के जन्दाहा प्रखंड में जाने का सुअवसर मिला और मैंने पाया कि स्थिति बड़ी भयावह है. सारे हैण्डपम्प सूख चुके हैं और लोग एक-एक बूँद पानी के लिए तरस रहे हैं. सरकार चाहे तो चेक डैम और नए तालाबों का निर्माण करवाकर और पुराने कुओं और तालाबों का जीर्णोद्धार कर इस स्थिति को बदल सकती है. अगर अविलम्ब ऐसा नहीं किया गया तो देश में बहुत जल्द खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो जाएगा क्योंकि जब पीने को ही पानी नहीं होगा तो खेती के लिए कहाँ से आएगा.
मित्रों, इसके अलावा समान नागरिक संहिता को लागू करना भी समय की मांग है. एक देश में दो समुदायों के लिए दो कानून बेहद मूर्खतापूर्ण तो है ही इससे भविष्य में देश के टुकड़े-टुकड़े होने का मार्ग भी प्रशस्त होता है. जब तक समाज के एक वर्ग को बहुविवाह की अनुमति होगी तब तक जनसँख्या-नियंत्रण के सारे उपाय विफल होंगे इसमें कोई शक नहीं. इसके साथ ही देश में लगातार हिन्दुओं की जनसँख्या-प्रतिशत में कमी होने के पीछे एक कारण समान नागरिक संहिता का नहीं होना भी है.
मित्रों, राम मंदिर हिन्दुओं के लिए सिर्फ एक स्वप्न नहीं है बल्कि स्वाभिमान का प्रतीक भी है. कोई और देश होता तो कब का राम मंदिर बन चुका होता लेकिन अपने देश की तो बात ही निराली है. यहाँ वर्षों तक हिन्दुओं को झूठी धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ा कर बेवकूफ बनाया गया और एक प्रधानमंत्री ने तो यहाँ तक कह दिया कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार देश के अल्पसंख्यकों का है. बाबरी मस्जिद हिन्दुओं की हार का प्रतीक थी और उसे आज नहीं तो कल टूटना ही था लेकिन आज उससे भी ज्यादा जरूरी है राम मंदिर का बनना. राम भारत और भारतवासियों के रोम-रोम में बसते हैं. राम अत्याचारी नहीं हैं बल्कि अत्याचार के खिलाफ लड़ते हैं, राम सबके सुख-समृद्धि और सबको न्याय के प्रतीक हैं फिर चाहे वो हिन्दू हो या मुसलमान या अन्य.
मित्रों, मैं समझता हूँ कि यह आलेख पर्याप्त रूप से लम्बाई को प्राप्त हो चुका है. अभी तो मोदी सरकार का दोबारा गठन भी नहीं हुआ है और हम भी कहीं जा तो रहे नहीं. इसलिए आगे भी हम मोदी जी को मुफ्त की सलाह देते रहेंगे. वैसे यह मुफ्त की सलाह पूरी तरह से मुफ्त है भी नहीं आखिर मेरा समय और श्रम तो लगता ही है जिसे मैं देशहित को ध्यान में रखते हुए व्यय करता हूँ अपने कई बेहद जरूरी कामों और अपने हितों की कीमत पर.

शुक्रवार, 17 मई 2019

क्या गाँधी भगवान थे और गोडसे दानव?


मित्रों, हम भारतीयों में एक अजीब आदत है. वो यह कि हम भयंकर अतिवादी हैं. हम या तो किसी भी भगवान बना देते हैं या फिर दानव. इतिहास गवाह है कि महात्मा बुद्ध के समय से ही बहुत सारे ऐसे महापुरुष भारत में पैदा हुए जिन्होंने अपने अनुयायियों को सख्ती से ताकीद किया कि मुझे इन्सान ही रहने देना भगवान नहीं बना देना परन्तु उनके मरने के बाद भारतीयों ने उन्हें भगवान बना दिया. आश्चर्य की बात तो यह है कि बुद्ध और कबीर ने आजीवन मूर्ति पूजा का विरोध किया और आज हर जगह उनकी मूर्तियाँ नजर आती हैं. यहाँ तक कि गाँधी और अंबेडकर को भी हमने नहीं छोड़ा.
मित्रों, गाँधी जी की आत्मकथा तो मैंने पढ़ी ही हैसाथ ही गाँधी दर्शन का भी अध्ययन किया है. मैंने जहाँ तक अनुभव किया है गाँधी में भी वो सारी कमजोरियां थीं जो एक इन्सान में होती हैं. गाँधी ने लिखा है कि जब उनके पिता अंतिम सांसें ले रहे थे तब वे अपनी पत्नी के साथ रतिक्रिया में लीन थे. इसी तरह गाँधी जी ने अपने ब्रम्हचर्य के साथ प्रयोग के बारे में लिखकर विस्तार से बताया है कि वे किस तरह ६०-७० साल की उम्र में नंगी लड़कियों के साथ सोते थे. इतना ही नहीं भारत के बंटवारा के लिए भी काफी हद तक गाँधी जी भी जिम्मेदार थे. दरअसल उन्होंने १९१६ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता करके मुस्लिम लीग को मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था के रूप में न केवल मान्यता दे दी बल्कि इस रूप में उसे स्थापित होने का सुअवसर भी दे दिया.
मित्रों, बाद में भी जिन्ना और नेहरु के प्रति उनके झुकाव का नुकसान भारत को उठाना पड़ा. वास्तव में उम्र ढलने के साथ गाँधी जिद्दी हो गए थे. उनकी इसी जिद के चलते सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने का बावजूद इस्तीफा देना पड़ा था और उन्होंने जिद करके न केवल उस पाकिस्तान को ५५ करोड़ रूपये दिलवाए जो तब तक कश्मीर पर कब्ज़ा कर चुका था बल्कि नेहरु को जबरन प्रधानमंत्री भी बनवा दिया जबकि कांग्रेस कार्यसमिति सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाना चाहती थी. क्या विडंबना है कि मो. अली जिन्ना गाँधी को हिन्दुओं का नेता मानते थे मगर गाँधी खुद को सर्वधर्मसमभाव का पुजारी मानते थे. सवाल उठता है कि अगर गाँधी सबके नेता थे तो फिर वे हिन्दू-मुस्लिम दंगों को क्यों नहीं रोक पाए? जब मुस्लिम लीग ने १६ अगस्त १९४६ को प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस की घोषणा की तब मुसलमानों ने गाँधी की क्यों नहीं सुनी? मैं समझता हूँ कि मेरे साथ-साथ आपने भी पढ़ा होगा कि आइन्स्टीन ने गाँधी की मृत्यु के बाद क्या कहा था यही कि आनेवाली पीढियां आसानी से यह विश्वास नहीं करेगी कि कोई इस तरह का हाड़-मांस का आदमी भी कभी धरती पर हुआ करता था. माना कि आइन्स्टीन गाँधी के अनन्य प्रशंसक थे लेकिन वे गाँधी को इन्सान ही मानते थे भगवान नहीं.
मित्रों, मैंने गोडसे को भी पढ़ा है. उनकी पुस्तक मैंने गाँधी वध क्यों किया शायद आपलोगों ने भी पढ़ी होगी. उसमें गोडसे कहते हैं कि वे गाँधी के आलोचक नहीं प्रशंसक हैं लेकिन गाँधी के कारण देश को जो क्षति हो रही थी उससे वे परेशान थे. यहाँ तक कि गाँधी पर गोली चलाने के दिन भी उसने पहले गाँधी का चरणस्पर्श किया था और बाद में उनपर गोली चला दी थी. गाँधी की हत्या तो गलत थी लेकिन उसके बदले में महाराष्ट्र में सैंकड़ों चितपावन ब्राम्हणों की जो सामूहिक हत्या कर दी गई वो कैसे सही थी? गलत तो वो भी था. जिस गाँधी की जिंदगी अहिंसा का पाठ पढ़ाते हुए बीती उसी की मौत का बदला हिंसा से लिया गया.
मित्रों, तात्पर्य यह कि न तो गाँधी जी भगवान थे और न ही नाथूराम राक्षस था बल्कि हमने एक को भगवान और दूसरे को राक्षस बना दिया. यहाँ तक कि हमने अपने आँख और कान बंद कर लिए और नाथूराम की आवाज को दबा दिया जबकि नाथूराम न तो पेशेवर हत्यारा था और न ही उसकी गाँधी जी के साथ कोई निजी दुश्मनी थी और न ही गाँधी को मारने में उसका कोई निजी स्वार्थ था. मैं यह नहीं कहता कि गाँधी की हत्या करके उसने कोई महान कार्य किया लेकिन महात्मा गाँधी और इंदिरा गाँधी की मौत का बदला हमने जिस तरह नरसंहार के द्वारा लिया मैं समझता हूँ वो भी सही नहीं था. न जाने हम कब यह समझेंगे कि दुनिया न तो पूरी तरह से ब्लैक है और न ही वाइट बल्कि दुनिया ग्रे है अर्थात वो थोड़ी काली भी है और थोड़ी उजली भी. श्रीलंका में जिस तरह प्रभाकरन के बेटे को बिस्कुट खिलाने के बाद गोली मार दी गई वो भी तो गलत था न, उसका बाप आतंकवादी था इसमें उस अबोध बच्चे का क्या दोष था?

गुरुवार, 16 मई 2019

ध्रुव त्यागी की हत्या पर इतना सन्नाटा क्यों है भाई?


मित्रों, आपको शोले फिल्म का एक दृश्य जरूर याद होगा.उसमें मौलाना के बेटे की डाकू हत्या कर देते हैं और तब मौलाना चुपचाप खड़े गांववालों से पूछते हैं कि इतना सन्नाटा क्यों है भाई?
मित्रों, परसों रात में भारत की राजधानी दिल्ली में एक हिन्दू बाप स्कूटी पर अपनी बेटी को लिए घर जा रहा था. तभी कुछ मुसलमानों से उसकी बेटी के साथ छेडछाड की. वो बेचारा उसकी शिकायत लेकर उसके बाप के पास पहुंचा तो उसका बाप अपने बेटे का पक्ष लेकर उसी से लड़ने लगा और अपनी बुढिया माँ को जानवरों को काटने में काम आनेवाला चाकू ले आने को कहा. बुढिया बड़े ही उत्साह में हथियार ले आई और फिर ध्रुव त्यागी को डरे हुए लोगों ने मिलकर मार डाला. इतना ही नहीं बाप को बचाने गए बेटे को भी चाकुओं के वार से छलनी कर उनलोगों ने अच्छे पडोसी होने धर्म बखूबी निभाया.सवाल उठता है कि उस महान मुस्लिम परिवार में किसी ने हत्या का विरोध क्यों नहीं किया बल्कि सभी इस कुकर्म में शामिल क्यों हो गए? क्या इस्लाम यही शिक्षा देता है? क्या इस्लाम में हत्या करना पवित्र और महान कार्य है? क्या ध्रुव त्यागी को इसलिए पूरे परिवार ने रमजान के महीने में घेर कर मार डाला क्योंकि वो उनकी नज़रों में काफ़िर था?
मित्रों, आपको अखलाख तो याद होगा. वही जिसने अपने हिन्दू पडोसी की गाय चुराकर उसे मार डालने का महान कार्य किया था और हिन्दुओं ने चौरकर्म और गोहत्या जैसे महान कार्य में बाधा डाली थी और वो भी उस कालखंड में जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी सरकार थी. इसी क्रम में मारपीट में उसकी मौत हो गई थी और तब पूरे भारत में अवार्डवापसी का क्रम शुरू हो गया था. लोग कहने लगे थे कि मुसलमान भारत में डरे हुए हैं. आज उन्हीं डरे हुए लोगों ने भारत की राजधानी दिल्ली में हत्या की है तो मानों वही शोले वाला सन्नाटा पसर गया है. कोई कुछ नहीं बोल रहा. सारे धर्मनिरपेक्षतावादी मानों कछुए की तरह अपने खोल में समा गए हैं. अब कोई नहीं बोल रहा कि भारत के मुसलमान डरे हुए हैं.
मित्रों, मैं पूछता हूँ कि ध्रुव त्यागी का अपराध क्या था? क्या भारत में हिन्दू होना सबसे बड़ा अपराध है या मुसलमानों के पड़ोस में बसना सबसे बड़ा अपराध है? या फिर अपनी बेटियों की ईज्जत बचाना हिन्दुओं के लिए अपराध है? जब भारत में हिन्दुओं के साथ ऐसा हो रहा है तो पाकिस्तान में तो क्या नहीं होता होगा?
मित्रों, सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि न तो राहुल गाँधी, न ही अरविन्द केजरीवाल ने अभी तक इस घटना पर कुछ बोला है पीड़ित परिवार से मिलने की बात तो दूर रही. जबकि अखलाख की हत्या के समय इन्होने आसमान सर पे उठा लिया था. ऐसा भेदभाव क्यों है भाई? क्या इसलिए नहीं है क्योंकि हम हिन्दू एकजुट नहीं हैं और जाति-पाति और स्वार्थ में बंटे हुए हैं? बंगाल में जो लोग ममता के पीछे पागल हैं वो भी हिन्दू हैं, बिहार में जो घोटालाशिरोमणि लालू को वोट कर रहे हैं वो भी हिन्दू ही हैं. इसी तरह पूरे भारत में हिन्दू खेमों में बंटे हुए हैं जबकि मुसलमान एकजुट थे और एकजुट हैं. उनके सामने बस एक ही लक्ष्य है कि हिंदुत्ववादी सरकार को हराओ.
मित्रों, अब आते हैं मूल सन्दर्भ पर. श्रीलंका में ईस्टर के दिन जो भयंकर हत्याकांड हुआ उस पर भी भारत के धर्मनिरपेक्षता वादी चुप ही रहे. क्यों? न्यूज़ीलैंड पर शोर और श्रीलंका पर सन्नाटा. यह कैसी धर्मनिरपेक्षता है? तथापि हमें यह देखकर आश्चर्यमिश्रित ख़ुशी हो रही है कि श्रीलंका में इस तरह की कोई प्रजाति नहीं पाई जाती है. श्रीलंका बम विस्फोटों में पकडे गए लोगों को वहां वकील नहीं मिल रहे जबकि भारत में तो वकीलों की लाईन लग जाती. लोग लड़ पड़ते कि हम इनका मुकदमा लड़ेंगे.भारत की वर्तमान स्थिति को देखते हुए हम आसानी से समझ सकते हैं कि भारत १००० सालों तक गुलाम क्यों रहा.

मंगलवार, 14 मई 2019

लोकसभा चुनाव:गए माघ २९ दिन बांकी


मित्रों, हुआ यह कि उस साल बिहार में काफी ठण्ड थी,कंपकंपानेवाली. आपलोग भी जानते हैं कि माघ की ठण्ड हाड़ गलानेवाली ठण्ड होती है. साथ ही यह ठण्ड का आखिरी महीना भी होता है. ऐसे में माघ के पहले दिन एक बार एक बुढिया से जब यह पूछा गया कि तू इस ठण्ड में जिंदा तो बच जाएगी न तो उसने यही जवाब दिया था कि अब क्या, गए माघ २९ दिन बांकी. ठीक उसी तरह लोकसभा चुनावों के बारे में अगर हम यह कहें कि सूई तो निकल ही चुकी है धागे का भी सिर्फ अंतिम सिरा ही बचा हुआ है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. 2019 का महासमर अब समाप्ति की ओर अग्रसर है. कुल 543 सीटों में से अब मात्र 59 सीटें ऐसी बची हैं जिन पर मतदान होना शेष है. 23 मई को किसको कितनी सींटें मिलनेवाली है यह अभी तो काल भी नहीं बता सकता जो हमारा पल-पल का हिसाब रखता है लेकिन पूरा भारत एकमत होकर इस समय यही कह रहा है कि आएगा तो मोदी ही.
मित्रों, जहाँ तक हमारा सवाल है तो हमने तो चुनाव से बहुत पहले ही कहा था कि आएगा तो मोदी ही. इतना ही नहीं हमारा यह भी मानना है कि एक बार फिर से भाजपा को अकेले ही बहुमत आएगा. कहीं कोई संदेह और खरीद-फरोख्त की गुंजाईश इस बार भी जनता छोड़ने नहीं जा रही. इस बीच खबर यह भी आ रही है कि उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने प्रधानमंत्री के पद पर अपना दावा ठोंक दिया है. अब ऐसी गैरजिम्मेदाराना हरकत को क्या नाम दिया जाए? पानी में मछली और बंटवारे के लिए लठ्ठम लठ्ठा. अरे बहन जी अभी तो एक चरण का मतदान भी शेष है कुछ सब्र कर लिया होता. वैसे भी कांग्रेस के सुपरस्टार नेता मणिशंकर अय्यर ने फिर से एक बार शानदार वापसी की है और इस बार वे कदाचित इस प्रण के साथ वापस आए हैं कि अबकी बार ४०० पार, कौन कांग्रेस? नहीं भाई भाजपा. दरअसल मणिशंकर चाचा हैं तो कांग्रेस में लेकिन अंदरखाने वे भाजपा से मिले हुए हैं. इसलिए आते ही उन्होंने उस कांग्रेस पार्टी को अपने पुराने नीच वाले बयान को दोहराकर फिर से संकट में डाल दिया है जिसने अभी-अभी बड़ी मुश्किल से सैम पित्रोदा के हुआ तो हुआ वाले बयान से पीछा छुड़ाया था.
मित्रों, इन दिनों इन बुड्ढों ने जिस तरह से कांग्रेस का बेडा गर्क कर रखा है उसे देखते हुए मुझे तो लगता है कि कांग्रेस को भी अविलम्ब से मार्गदर्शक मंडल बना ही देना चाहिए वरना ये बुड्ढे अपने श्राद्ध से पहले पार्टी का ही श्राद्ध करवा डालेंगे. खैर अब तो जो नुकसान कांग्रेस को होना था हो चुका. देखना यह है कि २३ मई के बाद राहुल थाईलैंड जाते हैं या जेल. वैसे हमने तो कानों कान सुना है कि प्रियंका अपने पूरे परिवार सहित १९ मई को
ही स्विट्जर्लैंड के लिए निकल लेनेवाली है. खैर हमारा क्या हम तो कहीं नहीं जानेवाले जी. वो बिहार में कहते हैं न कि झोली में दाम न सराय में डेरा. हम तो पहले भी लूट लाते थे और कूट खाते थे और आगे भी इसी परंपरा का निर्वाह करते रहेंगे. बस कभी हमारे देश का सिर दुनिया में कहीं भी न झुके हमारा तो बस इतना-सा ख्वाब है.

शुक्रवार, 3 मई 2019

विपक्ष का एक सूत्री एजेंडा


मित्रों, हमें तो पहले दिन से ही शक था कि कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष चाहता क्या है. अब जब कांग्रेस के ताश की गड्डी के दूसरे कथित तुरुप के पत्ते प्रियंका गाँधी ने यह स्वीकार कर लिया है कि कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार जीतने के लिए नहीं उतारे हैं बल्कि भाजपा के वोट काटकर भाजपा को हराने के लिए उतारे हैं तो जैसे एकबारगी सच का सूरज सामने आ गया. तात्पर्य यह कि कांग्रेस और पूरे-के-पूरे विपक्ष के पास देश के विकास को लेकर कोई कार्ययोजना नहीं है क्योंकि यह कभी न तो उनके एजेंडे में था और न ही अब है.
मित्रों, सवाल उठता है कि पूरा का पूरा विपक्ष बस इसी एक एजेंडे को लेकर क्यों चल रहा कि मोदी हटाओ, मोदी हराओ? मैं आपको बताता हूँ कि ऐसा क्यों है. दरअसल मोदी ने पहले से चले आ रहे इस समझौते को भंग कर दिया है कि जब मैं जीतूँ तो तुम्हें बचाऊंगा और जब तुम जीतो तो मुझे बचा लेना. इस तरह दोनों पक्ष बारी-बारी से जीतते रहेंगे और घोटाले करते रहेंगे. मोदी की सरकार के समय पहली बार भ्रष्ट नेता जेल जा रहे हैं जबकि पहले जांच का नाटक चलता था इसलिए उन सभी नेताओं में हडकंप है जिन्होंने घोटाले कर रखे हैं. कुछ लोग कह सकते हैं कि विपक्ष भी जिन राज्यों में सत्ता में है अगर पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के घोटालों की जाँच करवाने लगे तो? अगर विपक्षी पार्टी की सरकारें ऐसा करती हैं तो हम उनका स्वागत करेंगे क्योंकि हम मानते हैं कि देश सर्वोपरि है न कि कोई नेता. हमारा स्पष्ट रूप से मानना है कि किसी नेता ने अगर कभी गड़बड़ी की है तो उसे सार्वजानिक जीवन में नहीं होना चाहिए बल्कि उसकी सही जगह जेल है.
मित्रों, विपक्ष के मोदी हटाओ एजेंडे का दूसरा कारण है मोदी का मूल-मंत्र सबका साथ सबका विकास. भारत के इतिहास में पहली बार गरीबों को भेजा गया पैसा सीधे गरीबों तक पहुँच रहा है और वो भी बिना किसी भेदभाव के. विपक्ष डर रहा है कि इस तरह अगर मोदी गरीबों के दिलों में जगह बना लेगा तो उनकी गन्दी सांप्रदायिक और जातीय राजनीति का क्या होगा? प. बंगाल में उनके तानाशाहीपूर्ण शासन का क्या होगा जहाँ भाजपा को वोट देने का मतलब मृत्यु को आमन्त्रण देना है.
मित्रों, इन दिनों पूरे देश में अगर लोकतंत्र कहीं खतरे में है तो तीन इलाकों में है-एक प. बंगाल, दूसरे छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र-तेलंगाना-उड़ीसा के माओवादी इलाकों में और तीसरे केरल में. एक में कहा जा रहा है कि ख़बरदार जो भाजपा को वोट दिया, दूसरे इलाके में वोट गिराने पर ही रोक है और तीसरे इलाके में भी वही स्थिति है जो बंगाल में है यानि भाजपा को वोट दिया तो जान से गए. मगर आश्चर्य है कि न तो मीडिया और न ही विपक्षी नेता इन दानवों के खिलाफ कोई आवाज उठा रहे. बल्कि वे उस व्यक्ति का समर्थन कर रहे हैं जो नायक नहीं खलनायक है और बीएसएफ द्वारा भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता के चलते बर्खास्त किया गया है, जिसने शराबखोरी के चलते अपने पूरे परिवार का सत्यानाश कर लिया. जी हाँ मैं बात कर रहा तेजबहादुर यादव की. आम तौर पर फौज या पुलिस दल में भगोड़े, अनुशासनहीन और बर्खास्त किए जाने वाले आदमी की कोई पूछ नहीं होती. लेकिन चुनाव का मौसम है और अगर ऐसे में तेज बहादुर के सहारे बंदूक दागी जा सकती है तो फिर भला इससे विरोधी दलों को इनकार कैसे हो सकता है. वो भी तब जब निशाने पर नरेंद्र मोदी हों. लेकिन तेज बहादुर में नायक या अपना प्रतिनिधि तलाशने में लगी पार्टियों ने राजनीति को उस स्तर पर पहुंचा दिया है, जहां यह फर्क करना मुश्किल है कि आखिर किस तरह के फौजी को आप अपना हीरो मानेंगे. तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों में देश की सेवा और सुरक्षा करने वाले जवान को या फिर उस शख्स को, जिसने अपनी पूरी नौकरी के दौरान लगातार अनुशासनहीनता का परिचय दिया हो. तेज बहादुर के बारे में देश का लोगों का तब ध्यान गया, जब उसने 2017 के जनवरी महीने में अपने फेसबुक अकाउंट पर एक वीडियो पोस्ट किया, वो भी बीएसएफ की वर्दी पहने हुए. तेज बहादुर ये बयान कर रहा था कि बीएसएफ में कितना खराब खाना परोसा जा रहा है, जली हुई रोटी और पतली दाल का हवाला देकर. उस वीडियो ने सनसनी मचा दी और सोशल मीडिया में वायरल हो गया. ये पहला मौका था, जब फौज या किसी अर्द्धसैनिक बल में काम करने वाले किसी जवान ने इस तरह की हरकत की हो. ध्यान जाना स्वाभाविक था. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस मामले में जांच के आदेश भी दिए. इस वाकये से आलोचना के घेरे में आई बीएसएफ ने एक स्वतंत्र संस्था से अपने यहां परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता की जांच करवाई. डीआरडीओ से जुड़े संगठन डीआईपीएएस ने यह जांच की. इस संगठन ने जो अपनी रिपोर्ट सौंपी, उसमें साफ तौर पर ये बताया गया कि बीएसएफ के मेस या चौकियों में परोसे जाने वाले भोजन में कोई खराबी नहीं है और उसकी गुणवत्ता बेहतर है.
मित्रों, सवाल ये उठता है कि आखिर तेज बहादुर यादव ने ऐसा क्यों किया. इसके लिए ये आवश्यक है कि बीएसएफ से फरवरी 2018 में बर्खास्त हो चुके इस शख्स के करियर की पड़ताल की जाए. रिकॉर्ड के तौर पर तेज बहादुर का संबंध हरियाणा के महेंद्रगढ़ से है और उसके पिता का नाम शेर सिंह है. शेर सिंह के पांच बेटों में तेज बहादुर सबसे छोटा है. तेज बहादुर ने 20 जनवरी 1996 को बीएसएफ ट्रेनी रिक्रूट के तौर पर ज्वाइन की. शुरुआती ट्रेनिंग के बाद उसे 30 अक्टूबर 1996 को बीएसएफ की 29वीं बटालियन में बतौर कांस्टेबल शामिल किया गया. बटालियन में शामिल होने के पहले और ट्रेनिंग के दौरान ही तेज बहादुर के लक्षण दिखने शुरू हो गए थे. ट्रेनिंग के दौरान नए जवानों को सबसे पहले अनुशासित होना सिखाया जाता है. ट्रेनिंग के दौरान ही तेज बहादुर बिना अनुमति के गायब हो गया था, जिसे फौज की भाषा में भगोड़ा होना कहा जाता है. इस वजह से बीएसएफ एक्ट के सेक्शन 19ए के तहत तेज बहादुर को 25 सितंबर 1996 को 14 दिनों की सख्त कैद की सजा सुनाई गई. लेकिन ये तो बस शुरुआत थी.
मित्रों, इसके बाद भी तेज बहादुर की अनुशासंहिना का सिलसिला रुका नहीं. नियमित अंतराल पर वो एक के बाद एक गंभीर किस्म की अनुशासनहीनता करता रहा और उसकी सजा भी पाता रहा. मसलन 28 सितंबर 2003 को उसे 7 दिन की सख्त कैद की सजा सुनाई गई. ये सजा बीएसएफ एक्ट के सेक्शन 40 के तहत सुनाई गई यानी दिशा-निर्देशों को न मानना और इस तरह अनुशासन तोड़ना. इसके 4 साल बाद फिर से तेज बहादुर ने अनुशासनहीनता बरती और इस बार बीएसएफ एक्ट के सेक्शन 26 और 40 के तहत उसे 27 सितंबर 2007 को 28 दिनों की सख्त कैद की सजा सुनाई गई. अमूमन 3 ऐसी गंभीर हरकतों के बाद फौज या बीएसएफ जैसे संगठन से बर्खास्त कर दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन अपने परिवार का अकेला पालनहार होने की बात कर तेज बहादुर ने दया की भीख मांगी और इस तरह वो बर्खास्तगी से बचा. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. तेज बहादुर ने 3 साल बाद फिर से एक बड़ा बखेड़ा किया. जब उसकी बटालियन मार्च 2010 में भारत-बांग्लादेश सीमा पर किशनगंज के पास तैनात थी, उस वक्त उसने अपने कंपनी कमांडर को न सिर्फ मां-बहन की गालियां दीं, बल्कि आगे जाकर गश्त करने के आदेश को मानने से भी मना कर दिया. हद तो ये हुई कि उसने अपने कंपनी कमांडर इंस्पेक्टर मोहन सिंह को गोली मारने की धमकी तक दे डाली. इस मामले में एक बार फिर से तेज बहादुर का कोर्ट मार्शल हुआ और बीएसएफ एक्ट के सेक्शन 20ए और सी के तहत उसे न सिर्फ 89 दिन की सख्त कैद की सजा सुनाई गई, बल्कि उसकी सेवा अवधि में भी 3 साल की कटौती कर दी गई.

मित्रों, ये किस्सा ये बताने के लिए काफी है कि जिस तेज बहादुर को देशभक्त वीर जवान के आदर्श मॉडल के तौर पर पेश किया जा रहा है, उसका अपना व्यक्तित्व कितना दागदार रहा है. जहां तक फेसबुक पर खाने की शिकायत वाला वीडियो पोस्ट कर सनसनी मचाने वाली तेज बहादुर की हरकत का सवाल है, उसके पीछे की कहानी भी रोचक है. बीएसएफ के उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि तेज बहादुर की सीमा की कठिन परिस्थितियों में ड्यूटी करने की इच्छा नहीं होती थी. ऐसे में जब उसे जनवरी 2017 में जम्मू सेक्टर के तहत नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पास बटालियन के एडमिन बेस पर रखा गया, तो वो नाराज हो गया और उसने अपनी पोस्टिंग कहीं कम दबाव वाली जगह पर करने की मांग अपने अधिकारियों के सामने रखी. जब उसकी ये मांग नहीं मानी गई, तो आदत से मजबूर उसने एक बार फिर से ड्रामा किया और घटिया भोजन की कहानी सोशल मीडिया पर वायरल की. तेज बहादुर के इस ड्रामे के बाद जब बीएसएफ ने इस मामले में जांच-पड़ताल शुरू की, तो घबराये तेज बहादुर ने भूख हड़ताल कर डाली और कह दिया कि अगर उसको स्वैच्छिक सेवानिवृति नहीं दी गई, तो वो आमरण अनशन करेगा. जाहिर है उसे साफ पता था कि जांच-पड़ताल के बाद उसे एक बार फिर सजा होगी और भविष्य अंधकारमय रहने वाला है, ऐसे में अगर बर्खास्तगी की जगह वीआरएस मिल जाता, तो पेंशन और बाकी सुविधाएं नौकरी छोड़ने के बाद उसे मिलती, जिसका हकदार वो बर्खास्तगी के बाद नहीं होता. बीएसएफ अधिकारियों ने तेज बहादुर की इस ब्लैकमेलिंग पर ध्यान नहीं दिया और मार्च से अप्रैल 2017 के दौरान उसका कोर्ट मार्शल हुआ समरी सिक्योरिटी फोर्स कोर्ट यानी एसएसएफसी में. इस कानूनी प्रक्रिया के बाद उसे कुल 6 आधार पर अनुशासनहीनता और कर्तव्य में लापरवाही का दोषी पाया गया. इसी के बाद आखिरकार फरवरी 2018 में उसकी बीएसएफ से विदाई हो गई, लेकिन शान-शौकत से नहीं, बल्कि बर्खास्तगी के साथ, जिसकी भूमिका वो खुद नौकरी ज्वाइन करने के साथ ही बनाने में लगा हुआ था.

मित्रों, सवाल ये उठता है कि आखिर तेज बहादुर का ये करियर जो किसी भी आदर्श जवान के लिए प्रेरणा नहीं, बल्कि शर्मिंदगी का सबब हो सकता है. उसको इस तरह से महिमामंडित किया जाना क्या सही है. राजनीति में सब कुछ जायज है, शायद यही इसका एकमात्र जवाब हो सकता है. जब देश की सीमा की सुरक्षा करने वाले बल से बर्खास्त सिपाही को यूपी की सियासत में तेज बहादुर यादव के तौर पर पेश कर नायक तलाशने की असफल ही सही, लेकिन सनसनीखेज कोशिश की जाए. अब तो कांग्रेस पार्टी एक और झूठ बोलने पर उतारू है कि मनमोहन सरकार में सर्जिकल स्ट्राइक रोजाना की बात थी और उनकी सरकार में यह अनगिनत बार हुआ था. सवाल उठता है कि फिर जाकिर नायक उनकी सरकार में हीरो कैसे था और उसकी पहुँच १० जनपथ तक कैसे थी, सवाल उठता है कि कश्मीर के अलगाववादी नेता उस समय बार-बार कांग्रेस पार्टी के नेताओं की निजी पार्टियों की शोभा क्यों बढा रहे थे? चीन ने तब क्यों मसूद अजहर पर प्रस्ताव को पारित नहीं होने दिया? कांग्रेस के नेता तब क्यों एक आतंकवादी को फांसी से बचाने के लिए रात के दो बजे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे थे? तब क्यों एक बार भी जैशे मोहम्मद के कमांडर का पद खाली नहीं हुआ? तब क्यों पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भारत के प्रधानमंत्री को रोती रहनेवाली देहाती महिला कहकर संबोधित कर रहे थे? तब क्यों पाकिस्तान कंगाल नहीं हुआ और चीन ने भारत के नक़्शे में तब क्यों अरुणाचल और जम्मू और कश्मीर को नहीं दर्शाया?
मित्रों, वास्तव में यह २०१९ का पूरा चुनाव राम और रावण के बीच का चुनाव है. राम तब भी अकेले थे और अब भी अकेले हैं. दूसरी तरफ उस रावण के तो महज दस सर थे इस रावण के कई दर्जन हैं क्योंकि मोदी हराओ, मोदी हटाओ अभियान में सैकड़ों दल एक साथ लगे हुए हैं. सवाल उठता है कि भारत की जनता किसको चुनेगी राम को जिसका लक्ष्य है-दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज काहू नहीं व्यापा. या फिर उस रावण को जो सीरिया से लेकर,भारत और श्रीलंका तक अटूट अट्टहास करता हुआ घोषणा कर रहा है कि दानव हूँ भगवान नहीं हूँ, रावण हूँ मैं राम नहीं हूँ, इंसानी खून की नदियों में स्नान करना जिसका जूनून है, जिसके शब्दकोश में इंसानियत शब्द है ही नहीं सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार है. अवरोध ही अवरोध है हिन्दू विरोध है.  जिसका सपना भारत का विकास नहीं विनाश है, सर्वनाश है. रावण की तो २० भुजाएँ थी इसकी अनगिनत हैं इतनी जितनी हमारी गिनती में समा ही नहीं सकती. सवाल उठता है कि इस रावण का विनाश कैसे होगा? दोस्तों इस रावण का विनाश कठिन भी है और आसान भी. कठिन है रावण के लालच से खुद को बचाना और आसान है मतदान केंद्र तक जाना और कमल का बटन दबाना. और यह बात प. बंगाल, केरल और माओवाद प्रभावित इलाकों पर भी लागू होती है. बस आज थोड़ी-सी हिम्मत करनी पड़ेगी,वक़्त को बदले के लिए थोडा-सा वक़्त निकलना होगा फिर राम के बदले रावण को वनवास पर जाना होगा, राम का राज होगा, राम-राज्य होगा.