रविवार, 26 जून 2016

चीन,भारत,आपी-पापी और हम

मित्रों,एशिया के साथ-साथ दुनिया भी इस समय संक्रमण-काल से गुजर रही है। इस समय दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है। एक का नेतृत्व अमेरिका कर रहा है,दूसरी तरफ रूस है और तीसरी तरफ चीन-पाकिस्तान और उत्तर कोरिया। हमने हाल में भारत के मुद्दे पर एनएसजी में जो खींचातानी देखी उसके लिए इन तीनों ध्रुवों के बीच चल रहा शीत-युद्ध जिम्मेदार है।
मित्रों.जहाँ तक भारत का सवाल है तो भारत के पास अमेरिका से नजदीकी बढ़ाने के सिवा और कोई विकल्प है ही नहीं। भारत चीन की तरफ जा नहीं सकता क्योंकि चीन न तो कभी भारत का मित्र था और न ही कभी होगा। बल्कि वो भारत का चिरशत्रु था,है और रहेगा। रूस चीन के खिलाफ एक सीमा से आगे 1962 में भी नहीं गया था और अब भी नहीं जा सकता। तो फिर भारत करे तो क्या करे वो भी ऐसी स्थिति में जब दशकों से भारत की बर्बादी के सपने देखनेवाला चीन अब एक महाशक्ति बन चुका है और भारत को चारों तरफ से घेरकर अभिमन्यु की तरह तबाह कर देना चाहता है?
मित्रों,वैसे अगर हम देखें तो निरंतर आक्रामक होते चीन से निबटने के लिए अमेरिका के पास भी भारत से मित्रता बढ़ाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। जापान चीन के मुकाबले क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों ही दृष्टिकोणों से काफी छोटा है। चीन भी अब कोई 1930-40 वाला चीन नहीं रहा कि जिसको जिस इलाके पर मन हुआ कब्जा कर लिया। ताईवान,वियतनाम आदि चीन के पड़ोसी देश भी अकेले आज के चीन के आगे नहीं ठहर सकते। सिर्फ और सिर्फ भारत ही ऐसा है जिसकी अगर सहायता की जाए तो चीन को हर मामले हर तरह से ईट का जवाब पत्थर से दे सकता है। जिन लोगों को भ्रम है वे भ्रम में रहें लेकिन सच्चाई तो यही है कि आज नहीं तो कल भारत को चीन और पाकिस्तान दोनों से एक साथ सैन्य संघर्ष का सामना करना पड़ेगा। जो लोग आज प्रत्येक आतंकी हमले के बाद कहते हैं कि भारत सीमापार स्थित आतंकी शिविरों पर हमले क्यों नहीं करता वे भूल जाते हैं कि इस समय चीन कितनी आक्रामकता के साथ पाकिस्तान के साथ खड़ा है। इसलिए पहले हमें अपने देश को आर्थिक और सैनिक दोनों क्षेत्रों में इतना सक्षम बनाना होगा कि पाकिस्तान तो क्या चीन को भी हमारी तरफ आँख उठाकर देखने में लाखों बार सोंचना पड़े।
मित्रों,मैंने ओबामा की भारत-यात्रा के समय अपने एक आलेख के माध्यम से कहा था कि भारत को अमेरिकी राष्ट्रपति की इस बात को लेकर किसी भुलावे में नहीं आना चाहिए कि भारत एक महाशक्ति बन चुका है। सच्चाई तो यह कि हमें आर्थिक और सैनिक मामलों में चीन की बराबरी में आने में अभी कम-से-कम 15-बीस साल लगेंगे वो भी तब जब भारत की जीडीपी वर्तमान गति से बढ़ती रहे और एफडीआई का भारत में प्रवाह लगातार त्वरित गति से बढ़ता रहे।
मित्रों,जो आपिए और पुराने पापिए यानि छद्मधर्मनिरपेक्ष एनएसजी का सदस्य बनने में भारत की नाकामी पर ताली पीट रहे हैं और जश्न मना रहे हैं उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि एनएसजी का सदस्य भारत को बनना था न कि नरेंद्र मोदी को। कल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में अगर स्थायी सदस्यता मिलेगी तो वो सवा सौ करोड़ जनसंख्यावाले भारत को मिलेगी न कि नरेंद्र मोदी को। नरेंद्र मोदी तो आज हैं कल पीएम तो क्या धरती पर भी नहीं रहेंगे। उनकी कोशिशों का स्थायी लाभ भारत को मिलेगा,भारतवासियों को मिलेगा,भारतवासियों का सीना 56 ईंच का होगा,सिर गर्वोन्नत होगा और यह हमेशा के लिए होगा। नाकामी के लिए मोदी की आलोचना करके लोग क्या साबित करना चाहते हैं? अरे भाई,गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग में! जिसने कोशिश की वही तो सफल-असफल होगा? क्या इससे पहले किसी ने कभी एनएसजी का नाम भी सुना था? 48 में से 42 देश हमारे समर्थन में थे फिर हम असफल कैसे हैं? संगठन में सर्वसम्मति की जगह अगर वोटिंग का नियम होता तो हम विजयी होते। साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि NSG में असफलता के बावजूद भारत MTCR का सदस्य बनने जा रहा है जबकि चीन इसका सदस्य बनने के लिए 2004 से ही असफल प्रयास कर रहा है। अब अगर भारत चाहे तो चीन को MTCR का सदस्य बनने ही नहीं दे क्योंकि वहाँ भी सर्वसम्मति से निर्णय लेने का नियम है। जहाँ तक चीन को भारत के कदमों में झुकाने का सवाल है तो इसके लिए मोदी सरकार को प्रयास करने की जरुरत ही कहां है? वो काम तो हमलोग भी कर सकते हैं बस आज से अभी से हमें प्रण लेना होगा कि चाहे लगभग मुफ्त में ही क्यों न मिले हम चीन में बने सामानों को न तो खरीदेंगे और न ही उसका इस्तेमाल ही करेंगे।

गुरुवार, 16 जून 2016

परीक्षा बच्चों की थी फेल सरकार हो गई

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,ऐसा आपने कम ही देखा होगा कि परीक्षा कोई और दे और फेल कोई और हो जाए। मगर बिहार में कुछ भी मुमकिन है। यहाँ ऐसे चमत्कार होते ही रहते हैं। पिछले साल परीक्षा बच्चों की थी और फेल अभिभावक हो गए थे। परंतु इस बार तो हद की भी भद्द हो गई। परीक्षा बच्चों ने दी और रिजल्ट निकला तो फेल सरकार हो गई थी।
मित्रों,पहले तो इस साल के उत्तीर्णता प्रतिशत ने सरकार को नंगा करके रख दिया। जब स्कूल में योग्य शिक्षक होंगे ही नहीं,पढ़ाई होगी ही नहीं तो बच्चे परीक्षा के समय लिखेंगे कहाँ से और फेल तो होंगे ही। सो इस साल चूँकि परीक्षा केंद्रों पर बाहर से मदद को पूरी तरह से रोक दिया गया था बच्चे बड़ी संख्या में फेल हो गए। लेकिन असली खुल्ला खेल दरबारी का पता तो तब चला जब लगभग अंगूठा छाप रूबी राय कला में और सौरभ श्रेष्ठ विज्ञान के क्षेत्र में टॉप कर गए और पत्रकारों द्वारा पूछे गए साधारण सवालों का भी जवाब नहीं दे पाए।
मित्रों,पहले तो जाँच समिति बनाकर मामले को रफा-दफा करने की सोंची गई। लेकिन जब मामला तूल पकड़ने लगा तो सरकार की चूलें हिलने लगीं। मुख्यमंत्री को स्वयं सामने आकर अपने परम प्रिय स्नेहिल लालकेश्वर प्रसाद सिन्हा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर आपराधिक जाँच का आदेश देना पड़ा। लेकिन सवाल उठता है कि इतने बड़े पैमाने पर चलनेवाले खेल से क्या मुख्यमंत्री सचमुच पूरी तरह से नावाकिफ थे? क्या वे पहले से ही नहीं जानते थे कि लालकेश्वर दम्पति नटवरलाल है? अगर मुख्यमंत्री को पता था तो फिर लालकेश्वर को हटाकर पहले ही उसके,बच्चा राय और अन्य घोटालेबाजों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई? और अगर पता नहीं था हालाँकि मानने को जी तो नहीं चाहता है फिर अगर मान भी लिया जाए तो क्यों पता नहीं था? फिर राज्य सरकार की खुफिया एजेंसियाँ क्या कर रही थीं?
मित्रों,जैसा कि मैंने पिछले पाराग्राफ में कहा कि मानने को जी नहीं कर रहा है तो इसके पीछे भी ठोस कारण हैं। बतौर पूर्व सीएम जीतनराम मांझी जी नीतीश सरकार एक लंबे समय से पैसे लेकर अफसरों का ट्रांसफर-पोस्टिंग कर रही है। फिर अगर प्रत्येक पद को पैसे के लिए बेचा जाता है तो फिर खरीददार जब गड़बड़ करेगा तो विक्रेता को सूचना मिलने पर भी नजरंदाज करना ही पड़ेगा। लेकिन अपने नीतीश बाबू का कातिलाना अंदाज तो देखिए। पहले तो कई दिनों तक पूरी तरह से चुप्पी साधे रहे। फिर अचानक प्रकट हुए और अपने ही आदमी और आदमी की औरत को नटवरलाल कहकर मामले से पूरी तरह से पल्ला झाड़ लिया जैसे कि बेचारे को लता की तरह कुछ पता ही नहीं हो। मगर क्या दुश्शासन की गंध फैलने पर खबरों में शाहे बेखबर बन जाने मात्र से शासक अपराधमुक्त हो जाता है? क्या अपराधबोध से पूरी तरह से मुक्त होकर थेथर बन जाने से अपराध भी समाप्त हो जाता है? क्या जनता ने प्रदेश में अपराधवृद्धि होने पर उनसे और उनके डिप्युटी से यही सुनने के लिए उनके हाथों में सत्ता सौंपी थी कि ऐसा कहाँ नहीं होता है,किस राज्य में नहीं होता है?या फिर मामला उजागर होने के बाद जाहिर में यह सुनने के लिए कि किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा और भीतरखाने राजवल्लभ का बिछावन और तकिया डिटर्जेंट में धुलवा देने के लिए?
मित्रों,मैं कई साल पहले भी बिहार के बारे में लिए चुका हूँ कि मेरी सरकार खो गई है हुजूर! उस समय तो अराजकता का आगाज भर हुआ था। अब तो अराजकता अंजाम तक पहुँचने लगी है। उस समय सरकार यह नहीं कहती थी कि कहाँ नहीं हो रहा है कि झुठ्ठो खाली बिहार को बदनाम कर रहे हैं? नीतीश सरकार निश्चय-अनिश्चय हर मोर्चे पर फेल थी,फेल है और विषयवार फेल है। बात लीजिए हमसे और काम लीजिए हमारे पिताजी से की महान नीति पर चलने वाली सरकार के पास अगर उपलब्धि के नाम पर कुछ है तो सिर्फ दारू की खाली बोतल और सदियों से ताड़ी बेचकर जीविका उपार्जित करनेवाली पासी जाति की भुखमरी। 

सोमवार, 6 जून 2016

राहुल को कुछ भी बना दो वो रहेगा तो राहुल ही

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह.मित्रों,हमारे एक दादाजी थे.नाम था शिवबल्लभ सिंह.उनके ही एक ग्रामीण मेरे पिताजी के साथ महनार के आर.पी.एस. कॉलेज में इतिहास के प्रोफ़ेसर थे.बेचारे बस नाम के ही प्रोफेसर थे.अकबर का बाप कौन था और भारत छोडो आन्दोलन कब हुआ ये भी उनको पता नहीं था.नाम था कामता सिंह.एक बार हमने दादाजी से मजाक में कहा कि कामता बाबू तो अब प्रिंसिपल बनने वाले हैं.सुनते ही दादाजी ने कहा कि कमतावा पनिसपल भी बन जतई त कमतवे न रहतई यानि कामता प्रिंसिपल भी बन जाएगा तो कामता ही रहेगा.
मित्रों,मैं इस उदाहरण द्वारा कांग्रेस के उन नेताओं को सचेत करना चाहता हूँ जो इन दिनों राहुल गाँधी को पार्टी का अध्यक्ष बनाने का रट्टा लगाने में लगे हैं.वे लोग यह समझने को तैयार ही नहीं हैं कि राहुल गाँधी पार्टी और देश को नेतृत्व देने के लायक हैं ही नहीं.क्या पार्टी अध्यक्ष बनते ही राहुल अचानक सुपर इंटेलिजेंट बन जाएंगे? फिर तो पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी न हुई जादू हो गया? अगर ऐसा है तो फिर सोनिया जी तो अब तक इंटेलिजेंट नहीं हुईं जबकि वे १८ साल से कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष हैं?और अगर वे सचमुच इंटेलिजेंट थीं या अध्यक्ष बनने के बाद बन गयी हैं तो फिर उनको हटाने की जरुरत ही कया है?
मित्रों,वास्तविकता हो यह है कि कांग्रेस के दरबारी नेता नेहरु-गाँधी परिवार से आगे सोंच ही नहीं पाते हैं जबकि उनको भी पता है नेतृत्व का गुण आदमी अपने साथ लेकर पैदा होता है.न तो यह बाजार में बिकता है और न ही इसको जादू-मंत्र से किसी के अन्दर डाला जा सकता है.हमारे प्रधानमंत्री को तो नेतृत्व क्षमता प्राप्त करने के लिए किसी राजनैतिक परिवार में जन्म नहीं लेना पड़ा? उनमें यह गुण है और इतना ज्यादा है कि उन्होंने भारत को दुनिया का सिरमौर बनाने की ओर भी बला की तेजी से कदम बढ़ा दिया है.
मित्रों,अगर सिर्फ किसी खास कुर्सी पर बैठने से आदमी का कायाकल्प हो जाता तो फिर क्या जरुरत भी स्कूल,कॉलेजों और प्रशिक्षण संस्थानों की?दरअसल गुण कुर्सी में नहीं होता उसपर बैठनेवाले व्यक्ति में होता है.वर्ना इसी भारत के पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समय देश की क्या हालत थी और आज क्या है.
मित्रों,यूं तो मैं भविष्यवक्ता कतई नहीं हूँ लेकिन मुझे इस बात का आभास २०१४ के लोकसभा चुनाव के समय ही होने लगा था कि राहुल को अगर पीएम बनना है तो मनमोहन को हटाकर २४ घंटे के लिए भी बन जाएँ फिर ये दिन आए न आए.इसलिए तब ब्रज की दुनिया पर एक आलेख के द्वारा हमने उनसे ऐसा कर लेने की सलाह दी थी.लेकिन हमारी वे सुनने ही क्यों लगें?नहीं सुना तो अब तरसते रहिए अपने नाम से आगे प्रधानमंत्री लिखवाने के लिए.
मित्रों,अंत में मैं अपनी आदत के अनुसार कांग्रेसजनों को सलाह देना चाहूंगा कि भैये अध्यक्ष बनना तो खुद बन जाओ.काहे को बेचारे नादान परिंदे के पीछे पड़े हो?बेचारे को विदेश घूमने दो,दलितों के घर जाकर अपने साथ लाया खाना खाने दो और कुत्ते के द्वारा पवित्र किया हुआ बिस्किट खाने दो.काहे बेचारे की जिन्दगी ख़राब करने पर तुले हो? कहीं ऐसा न हो कि बिहारी टॉपर सौरभ श्रेष्ठ की तरह राहुल जी को भी कहना पड़ जाए कि अध्यक्ष बनाओगे कि मैं ......................

सोमवार, 30 मई 2016

ISIS करा रहा यूपी में दंगे!

लखनऊ (सं.सू.)। यूपी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को शक है कि आजमगढ़ में हाल में हुए दंगे में आईएस (इस्लामिक स्टेट) का हाथ हो सकता है। सुरक्षा एजेंसियों व यूपी पुलिस इस बात की जांच कर रही है। सूत्रों के मुताबिक यूपी के कई शहर इस्लामिक स्टेट की रडार पर है और इस्लामिक स्टेट इन शहरों में दंगे करवा सकता है। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक आजमगढ़ में हुए दंगे में सोशल नेटवर्किंग साइट्स का जमकर इस्तेमाल किया गया और इसके पीछे आईएस का हाथ हो सकता है क्योंकि इस्लामिक स्टेट को सोशल नेटवर्किंग का इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए करने में महारत हासिल है।

हाल में ही आतंकी संगठन आईएसआईएस के वीडियो में दिखे दो आतंकियों की पहचान हो गई है। जबसे सुरक्षा एजेंसियो को पता चला है कि दोनों आतंकी यूपी के आजमगढ़ के रहने वाले हैं। उसके बाद से एनआईए और उत्तर प्रदेश पुलिस चौकस हो गयी है। ये दोनों आतंकी इंडियन मुजाहिदिन के भगोड़े हैं।

सूत्रों की मानें, तो पुलिस ने वीडियो में दिखे दोनों आतंकी अबु राशिद अहमद और मोहम्मद बड़ा साजिद के आजमगढ़ स्थित घर पहुंचकर उनके घरवालों से पूछताछ की है और उनको इन दोनों का वीडियो दिखकर उनकी पहचान भी करवाई है। इस दौरान दोनों ही आतंकियों के घरवालों ने इन दोनों की पहचान भी की है।

गौरतलब है कि आईएस ने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें भारत में बाबरी मस्जिद, कश्मीर, गुजरात और मुजफ्फरनगर दंगे का बदला लेने की धमकी दी गई थी। ये वीडियो दक्षिण-एशिया जिहादियों पर आधारित आईएस का पहला वीडियो है। इस वीडियो में महाराष्ट्र में ठाणे के इंजीनियर के छात्र रहे अमन टंडेल का इंटरव्यू भी दिखाया गया है।

साथ ही शाहीम टंकी और फहाद शेख की कुछ तस्वीरें भी हैं। इस वीडियो में इन लोगों ने देश के कई बम धमाकों में अपनी भूमिका की बात कही है। इसके साथ ही इस वीडियो में अंजाम दी गई आतंकी घटनाओं, भारत से भागने और योजनाओं के बारे में बात की गई है।

एनआईए के मुताबिक आजमगढ़ निवासी राशिद वर्ष 2005 से 2008 तक इंडियमन मुजाहिदिन द्वारा किए गए बम धमाकों का संदिग्ध है। दूसरा आतंकी मोहम्मद साजिद भी आजमगढ़ का है, साजिद अहमदाबाद और जयपुर में हुए सीरियल बम ब्लास्ट में संदिग्ध है।

सूत्रों के मुताबिक इस वीडियो के बाद से एनआईए की एक टीम आजमगढ़ में कैम्प कर रही है और पुलिस की मदद से इन दोनों आतंवादियों के बारे में और जानकारी इकट्ठा कर रही है। टीम खुफिया तौर पर इस बात की भी जांच कर रही है कि कही इस इलाके के और भी लड़के इनके टच में तो नहीं आ गए हैं। टीम उस इलाके की सोशल मीडिया पर भी नज़र रख रही है।

कोहली का सपना टूटा, सनराइजर्स हैदराबाद आईपीएल-9 चैंपियन

बेंगलुरू (सं.सू.)। बेन कटिंग के आलराउंड खेल और गेंदबाजों की सही समय पर दिलाई गई शानदार वापसी से सनराइजर्स हैदराबाद ने क्रिस गेल के तूफान के सामने कुछ विषम पलों से गुजरने के बावजूद आज यहां बड़े स्कोर वाले फाइनल में सनराइजर्स हैदराबाद को आठ रन से हराकर पहली बार आइपीएल चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया। सनराइजर्स के गेंदबाजों का प्रदर्शन निर्णायक साबित हुआ क्योंकि एक समय गेल के 38 गेंदों पर चार चौकों और आठ छक्कों की मदद से बनाये गये 76 रन और कोहली (54) के एक और अर्धशतक से आरसीबी तेजी से जीत की तरफ बढ़ रहा था। आरसीबी का स्कोर 13वें ओवर में एक समय एक विकेट पर 140 रन था लेकिन इसके बाद सनराइजर्स के गेंदबाजों ने शिकंजा कसा और आखिर में कोहली की टीम को सात विकेट पर 200 रन तक ही पहुंचने दिया।

इससे पहले सनराइजर्स ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए डेविड वार्नर, कटिंग और युवराज सिंह के प्रयासों से सात विकेट पर 208 रन का मजबूत स्कोर खड़ा किया था। कप्तान वार्नर ने 38 गेंदों पर आठ चौकों और तीन छक्कों की मदद से 69 रन बनाये। कटिंग ने 15 गेंदों पर नाबाद 39 रन बनाये जिसमें तीन चौके और चार छक्के शामिल हैं। युवराज ने 23 गेंदों पर 38 रन की दमदार पारी खेली। सनराइजर्स पहली ऐसी टीम बन गई है जिसने लगातार तीन प्लेआफ जीतकर खिताब अपने नाम किया। उसने एलिमिनिटेर में कोलकाता नाइटराइडर्स और फिर दूसरे क्वालीफायर में गुजरात लायन्स को हराया था।

टूर्नामेंट में सर्वाधिक 23 विकेट लेने वाले भुवनेश्वर कुमार को आज भले ही कोई विकेट नहीं मिला लेकिन उनकी 13 गेंदों पर रन नहीं बने। उन्होंने चार ओवर में केवल 25 रन दिये। कटिंग ने 25 रन देकर दो विकेट लिये। गेल ने हालांकि एक समय सनराइजर्स के खेमे में चिंता की लहर दौड़ा दी थी। वेस्टइंडीज के इस विस्फोटक बल्लेबाज ने फाइनल से पहले 9 पारियों में 151 रन बनाये थे लेकिन आज उन्होंने शुरू में ताबड़तोड़ रन जुटाकर टीम पर से दबाव हटा दिया। पहले विकेट के लिये 114 रन की साझेदारी निभायी गयी जिसमें कोहली का योगदान 32 रन था। गेल ने बरिंदर सरां को शुरू में निशाने पर रखा और इस तेज गेंदबाज के पहले दो ओवरों में तीन गगनदायी छक्के लगाये। कटिंग का स्वागत उन्होंने छक्के और चौके से किया और जब मोएजेस हेनरिक्स ने गेंद थामी तो लांग आन पर सीधा छक्का जड़कर 25 गेंदों में अर्धशतक पूरा किया। हेनरिक्स के अगले ओवर में उन्होंने लगातार दो चौके और छक्के जड़कर उनके हताश कर दिया। आखिर में कटिंग की गेंद पर उन्होंने थर्डमैन पर हवा में लहराता कैच थमाया।

कोहली ने रणनीतिक बल्लेबाजी। उन्होंने वार्नर के तुरूप के इक्के मुस्तफिजुर रहमान को निशाना बनाया जिससे सनराइजर्स की टीम पर दबाव बनना स्वाभाविक था। आरसीबी कप्तान ने सरां पर छक्के से अपना अर्धशतक पूरा किया लेकिन इसी ओवर में उनकी गिल्लियां बिखर गयी जिससे उनका एक सत्र में 1000 रन पूरे करने का सपना अधूरा रह गया। कोहली ने 16 मैचों में 973 रन बनाये।

बिपुल शर्मा ने अगले ओवर में एबी डिविलियर्स (5) को आउट करके सनराइजर्स की कुछ उम्मीदें जगायी। केएल राहुल (11) भी नहीं चल पाये। कटिंग ने उनका आफ स्टंप थर्राया। उम्मीद थी कि वाटसन गेंदबाजी की अपनी कमी की यहां भरपायी करेंगे लेकिन वह भी 11 रन बनाकर पवेलियन लौट गये। स्टुअर्ट बिन्नी (9) ने मुस्तफिजुर के इस ओवर में छक्का जड़कर आरसीबी खेमे में कुछ जोश भरा लेकिन आखिरी दो ओवर में 30 रन बनाना आसान नहीं था। ऐसे में बिन्नी रन आउट हो गये। सचिन बेबी ने मुस्तफिजुर की गेंद छह रन के लिये भेजी जिससे अंतिम ओवर में 18 रन का लक्ष्य रह गया था और भुवनेश्वर ने नौ रन देकर अपनी टीम को जीत दिलायी।

इससे पहले वार्नर ने अपने गेंदबाजों पर पूरा भरोसा जताकर टास जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया और फिर अपनी शानदार फार्म जारी रखकर शिखर धवन 25 गेंदों पर 28 रन के साथ पहले विकेट के लिये 40 गेंदों पर 63 रन की साझेदारी करके ठोस शुरूआत दी। नयी गेंद संभालने वाले क्रिस गेल ने शुरू में किफायती गेंदबाजी की लेकिन आज शेन वाटसन का दिन नहीं था जो शुरू से आखिर तक रन लुटाते रहे।

वाटसन को शुरू में वार्नर ने निशाना बनाया जबकि डेथ ओवरों में कटिंग ने उन पर चार छक्के जड़े। वाटसन ने चार ओवर में 61 रन लुटाये। इनमें से 24 रन उन्होंने पारी के आखिरी ओवर में दिये जिसमें कटिंग के तीन छक्के शामिल हैं। वार्नर ने शुरू में वाटसन ही नहीं बल्कि गेल को भी आक्रमण से हटवाया था। उन्होंने एस अरविंद की गेंद पर थर्डमैन पर कैच थमाने से पहले केवल 24 गेंदों पर अपना अर्धशतक पूरा किया। आरसीबी को हालांकि पहली सफलता यजुवेंद्र चहल ने धवन को डीप स्क्वायर लेग पर कैच आउट कराकर दिलायी थी जबकि पिंच हिटर मोएजेस हेनरिक्स (चार) नहीं चल पाये थे। वार्नर ने आईपीएल नौ में कुल 848 रन बनाये।

युवराज ने क्रिस जोर्डन 45 रन देकर तीन विकेट और चहल की गेंदों को छक्के लगाये लेकिन सनराइजर्स की डेथओवरों में तेजी से रन बनाने की उम्मीदों को तब करारा झटका लगा जब दीपक हुड्डा (03) और युवराज तीन गेंद के अंदर पवेलियन लौटे। जोर्डन की गेंद पर युवराज सही टाइमिंग से शाट नहीं लगा पाये और एक्स्ट्रा कवर में वाटसन ने आगे गोता लगाकर कैच कर दिया। उन्होंने अपनी पारी में चार चौके और दो छक्के लगाये।

आखिरी ओवरों में रन बनाने का जिम्मा कटिंग ने बखूबी संभाला। उन्होंने वाटसन पर मिडविकेट पर खूबसूरत छक्का और फिर चौका लगाया लेकिन कोहली ने पारी का आखिरी ओवर फिर से इसी आलराउंडर को सौंप दिया। कटिंग ने अपने इस आस्ट्रेलियाई साथी पर कोई रहम नहीं दिखाया। पहली गेंद चार तो अगली दो गेंद छक्के के लिये गयी। इनमें से पहला छक्का तो 117 मीटर लंबा था जो स्टेडियम के बाहर चला गया। आखिरी गेंद भी कटिंग ने छक्का जड़ा।

-स्कोर कार्ड-
रायल चैलेंजर्स बेंगलूर
क्रिस गेल का बिपुल बो कटिंग 76
विराट कोहली बो सरां 54
एबी डिविलियर्स का हेनरिक्स बो बिपुल 05
लोकेश राहुल बो कटिंग 11
शेन वाटसन का हेनरिक्स बो मुस्तफिजुर 11
सचिन बेबी नाबाद 18
स्टुअर्ट बिन्नी रन आउट 09
क्रिस जोर्डन रन आउट 03
इकबाल अब्दुल्ला नाबाद 04
अतिरिक्त 09
कुल : 20 ओवर में, सात विकेट पर : 200
विकेट पतन : 1-114, 2-140, 3-148, 4-160, 5-164, 6-180, 7-194

गेंदबाजी
भुवनेश्वर 4-0-25-0
सरां 3-0-41-1
कटिंग 4-0-35-2
मुस्तफिजुर 4-0-37-1
हेनरिक्स 3-0-40-0
बिपुल 2-0-17-1

रायल चैलेंजर्स बेंगलूर
क्रिस गेल का बिपुल बो कटिंग 76
विराट कोहली बो सरां 54
एबी डिविलियर्स का हेनरिक्स बो बिपुल 05
लोकेश राहुल बो कटिंग 11
शेन वाटसन का हेनरिक्स बो मुस्तफिजुर 11
सचिन बेबी नाबाद 18
स्टुअर्ट बिन्नी रन आउट 09
क्रिस जोर्डन रन आउट 03
इकबाल अब्दुल्ला नाबाद 04
अतिरिक्त 09
कुल : 20 ओवर में, सात विकेट पर : 200

विकेट पतन : 1-114, 2-140, 3-148, 4-160, 5-164, 6-180, 7-194
गेंदबाजी
भुवनेश्वर 4-0-25-0
सरां 3-0-41-1
कटिंग 4-0-35-2
मुस्तफिजुर 4-0-37-1
हेनरिक्स 3-0-40-0
बिपुल 2-0-17-1
- See more at: http://www.jansatta.com/cricket/ipl-2016-final-sunrisers-hyderabads-moment-in-the-sun/100726/#sthash.wucSXGwU.dpuf

कृषि क्षेत्र से बिचौलियों को समाप्त करने के लिए संकल्पित है सरकार-पीएम


नई दिल्ली (सं.सू.)। राष्ट्रीय कृषि बाजार को कृषि क्षेत्र के लिए क्रांतिकारी कदम करार देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि इससे किसानों को भरपूर फायदा होगा। किसानों की अर्थव्यवस्था में बड़ा परिवर्तन आने वाला है। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ेगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार कृषि से बिचौलियों को समाप्त करने के लिए संकल्पित है।

राष्ट्रीय कृषि बाजार पोर्टल के उदघाटन अवसर पर किसानों को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा कि यह कदम आर्थिक दृष्टि से कृषि जगत के लिए टर्निंग प्वाईंट होगा। उन्होंने कहा कि अब देश का किसान खुद फैसला करेगा कि उसका माल कब और कहां बिकेगा। उन्होंने देश के सभी राज्यों से आह्वान किया है कि वे इस पहल को प्राथमिकता दें। पीएम ने कहा कि वर्ष 2018 तक देश की सभी कृषि मंडियां राष्ट्रीय कृषि बाजार पोर्टल से जुड़ जाएंगी। इससे बाजार बढ़ेगा।

पीएम मोदी ने कहा कि बाजार के बढ़ने से किसानों को लाभ होगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय कृषि बाजार पोर्टल से किसान, बिचौलिए और उपभोक्ता तीनों को ही लाभ मिलेगा। किसानों को मंडी में अपना उत्पाद बेचने का विकल्प नहीं रहता था। लेकिन अब वह दूसरे मंडियों में भी अपना उत्पाद बेच सकेगा। इससे उसकी परेसानियां भी कम होंगी। उन्होंने देश के किसानों से भी आग्रह किया है कि वे खेती को टूकडों में बांट कर न देखें। बल्कि कृषि क्षेत्र में सोलर क्रांति का भी लाभ उठाएं।

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी के किसानों से पीएम ने आग्रह किया है कि वे पुआल जलाना बंद करें। इससे दिल्लीवालों को भी राहत मिलेगी। पर्यावरण बेहतर होगा। उन्होंने किसानों से कहा है कि वे पुआल से बेहत्तर खाद्द बना सकते हैं। इसके लिए कई वैज्ञानिक तरीके हैं। तो गन्ना किसानों से भी पीएम ने कहा है कि वे खेती में ड्रीप सिंचाई का इस्तेमाल करें। खेती में पानी की कम खपत का आग्रह करते हुए पीएम ने किसानों से कहा है कि जो स्वभाव बच्चों का होता है। वही पौधों का भी होता है। इसलिए अफरात पानी के बजाय पौधों में बूंद-बूंद पानी दें। किसानों से उन्होंने खेत की सेहत का भी ध्यान रखने का आग्रह किया है।

इस अवसर पर पीएम के साथ कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह, राज्य मंत्री संजीव बालियान भी उपस्थित थे। राष्ट्रीय कृषि बाजार पोर्टल अभी 8 राज्यों गुजरात, तेलंगाना, राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश, उत्‍तर प्रदेश, हरियाणा, झारखंड और हिमाचल प्रदेश के 21 मंडियों में शुरू हुआ है। इसे सफल बनाने के लिए राज्यों को अपने मंडी कानून में संशोधन करना पडेगा। पहले चरण में यह पोर्टल 12 राज्यों के 365 मंडियों में 25 सितंबर 2016 तक लागू होगा। मार्च 2018 तक देश की 585 मंडियों को पोर्टल से जोड़ा जाएगा। इसके जरिए 25 कृषि उत्पादों चना, कैस्‍टर सीड, धान, गेहूं, मक्‍का, हल्‍दी, प्‍याज, सरसों, महुआ फूल, इमली आदि की खरीद बेच की जा सकेगी।

विशेषज्ञ सरकार के इस दावे से पूरी तरह से सहमत नहीं दिख रहे कि यह व्यवस्था कृषि के स्वरुप को ही बदलकर रख देगी।

दावा: कृषि उत्‍पादों की खरीद-बिक्री में बिचौलियों की भागीदारी नहीं होगी, जिससे किसानों को बेहतर कीमत मिलेगी।

सवाल: यह कौन तय करेगा कि इस प्‍लेटफॉर्म पर खरीदार बिचौलिया नहीं है। बिचौलियों को रोकने के लिए सरकार ने क्‍या व्‍यवस्‍था की है?

दावा: खरीदारों के लिए खरीद लागत कम होगी, वहीं किसानों को कई मंडी-शुल्‍कों से राहत मिलेगी।

सवाल: दिल्‍ली का व्‍यापारी यदि उत्‍तर प्रदेश के किसान से फसल खरीदेगा तो उस फसल की ट्रांसपोर्टेशन लागत कौन वहन करेगा। किसानों के पास भंडारण की अपनी व्‍यवस्‍था नहीं है, तो वह फसल न बिकने तक उसे कहां रखेगा?

दावा: खरीदार और विक्रेता के लिए गुणवत्‍ता जांच प्रक्रिया लाई जाएगी।

सवाल: उत्‍पाद की गुणवत्‍ता जांच का खर्च कौन वहन करेगा?

रविवार, 29 मई 2016

ईमानदार सरकार के शानदार दो साल


मित्रों, मेरे एक मौसा थे। नाम था नवलकिशोर सिंह। फारबिसगंज में ठेकेदारी करते थे। बड़े ठेकेदार थे इसलिए उनके दरवाजे पर अक्सर लोगों का जमघट लगा रहता था। उनका एक नौकर था विशु। मौसा अक्सर विशु को घर से चाय बनवाकर लाने को कहते और जब तक वो आंगन में दाखिल भी नहीं हुआ होता कि आवाज लगाते विशु चाय लेकर आओ। कुछ ऐसी ही व्यग्रता की बीमारी हमारे देशवासियों को भी लग गई है। वे भी भूल गए हैं कि शीघ्रता को भी समय चाहिए।
मित्रों,भूलने से याद आया कि आपकी याद्दाश्त मुझसे तो जरूर अच्छी होगी क्योंकि अपने घर में मैं महाभुलक्कड़ के रूप में जाना जाता हूँ। जब भी बाजार से 4 चीजें लाने के लिए कहा जाता है तो शर्तिया मैं 2 चीजें ही लाता हूँ। तो मैं कह रहा था कि क्या आपको याद है कि दो साल पहले जब आपने मोदी सरकार के हाथों में देश की कमान दी थी तब क्यों दी थी और तब देश की हालत क्या थी?
मित्रों,आपको याद होगा कि तब घोटाले रोजाना की बात हो गए थे और उनमें से कुछ तो अब जाकर उजागर हो रहे हैं। आपको याद होगा कि नेवी के जहाजों और पनडुब्बियों का डूबना भी तब रोज-रोज का कार्यक्रम हो गया था। बिजलीघरों में कोयला नहीं था और सेना के पास गोला-बारूद। भारत की अर्थव्यवस्था भी ध्वस्त होने के कगार पर थी। देश के विकास को न केवल लूट-खसोट द्वारा व जानबूझकर अवरूद्ध कर दिया गया था बल्कि देश रिवर्स गियर में जाने लगा था। चीन हमें चारों तरफ से घेर रहा था और हमारी तत्कालीन केंद्र सरकार मौन समर्थन देने का कार्य कर रही थी। केंद्र सरकार अपने कार्यों और नीतियों के द्वारा बहुसंख्यक हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बना डालने पर आमादा थी। मानो हिंदू होना ही अपराध हो। पूर्वोत्तर और माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में भारत विरोधी शक्तियों का मनोबल इस कदर बढ़ गया था कि लगने लगा था कि सचमुच भारत तेरे टुकड़े होंगे हजार। 
मित्रों,कुल मिलाकर भारत को एक असफल राष्ट्र बना दिया गया था। हमारा प्राणों से भी प्यारा देश कई तरह के असाध्य रोगों से पीड़ित 21वीं सदी के एशिया का मरीज बन चुका था। अंधकार के ऐसे ही विकराल क्षणों में नरेंद्र मोदी उम्मीद की सतरंगी किरण बनकर हमारे सामने प्रकट हुए। उनके ओजस्वी भाषणों और गुजरात में उनके द्वारा किए गए कल्पनातीत विकास-कार्यों को देखते हुए आपने-हमने उन पर अपना विश्वास व्यक्त किया।
मित्रों,यह सही है कि किसी भी सरकार के लिए 2 साल कम नहीं होते लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि किस स्थिति में उनके हाथों में बागडोर सौंपी गई थी। आखिर असाध्य रोगी को ठीक करने और क्षयरोगी से महाबली बनाने में समय तो लगता ही है। इस सरकार ने बीमार को फिर से स्वस्थ बनाते हुए विदेशी पूंजी निवेश,ऊर्जा और आधारभूत संरचना के विकास के क्षेत्र में तो लाजवाब काम किया ही है विदेश नीति के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। सरकारी मिशनरी को त्वरित बनाने के लिए कई दर्जन आलसी अफसरों को घर बैठा दिया गया है। भ्रष्टाचार-नियंत्रण के क्षेत्र में भी विशेष काम हुआ है। डीबीटीएल के माध्यम से हजारों करोड़ रुपये तो बचाए ही गए हैं साथ ही विपक्ष भी परेशान है क्योंकि वह पिछले 2 सालों में सरकार पर 1 पैसे के घोटाले के भी आरोप नहीं लगा पाया है। मुद्दाविहीन विपक्ष कभी पीएम मोदी के सूट की बात करता है तो कभी टोपी की तो कभी पगड़ी की तो भी डिग्री की।
मित्रों,इसमें कोई संदेह नहीं कि अभी थोड़ा-सा ही काम हुआ है और काफी कुछ होना बाँकी है लेकिन फिर भी सिर्फ इसी कारण से हम सरकार की नीयत पर संदेह नहीं कर सकते फिर अभी तो सरकार के पास हमारे दिए हुए तीन साल का समय भी बचा हुआ है। हमें पूरा विश्वास है कि बचे हुए तीन सालों में बैंकिंग,कृषि,शिक्षा,कालाधन,स्वास्थ्य,पुलिस,महँगाई,रोजगार-निर्माण आदि के क्षेत्र में प्रभावकारी और युगांतरकारी कार्य होंगे। मेरे विचार से कृषि को लाभकारी बनाने की दिशा में काम करना सबसे ज्यादा जरूरी है क्योंकि हमारा अन्नदाता उत्पादन के घटने और ज्यादा होने दोनों की दशाओं में मारा जा रहा है। अभी-अभी महाराष्ट्र से आई एक खबर ने पूरे भारत तो झकझोर कर रख दिया है कि वहाँ के एक किसान ने एक टन प्याज बेचा तो उसे उसके बदले में मात्र 1 रुपया मिला। इस स्थिति को बदलना ही होगा क्योंकि पिछली सरकारों के शुतुरमुर्गी रवैये का ही यह नतीजा है कि आज हमारे किसानों के समक्ष जीने का कोई रास्ता शेष नहीं बचा है। अकेले महाराष्ट्र के नासिक जिले के लासलगांव में ही जनवरी 2015 से अब तक 26 प्याज-उत्पादक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। साथ ही हम चाहते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कानून बने जिससे राज्य सरकार के नाकारा और भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों की भी छँटनी की जा सके।
मित्रों,जब हम तीनों लोकों में जमकर घोटाले करनेवाले चोर-लुटेरों को लगातार 2 बार चुन सकते हैं तो फिर हम एक स्वच्छ,देशभक्त और ईमानदार सरकार को क्यों उसके अधिकार के 3 और साल नहीं देना चाहते? एक 66 साल का बूढ़ा आखिर हमारे लिए,हमारे देश और हमारे जीवन को बदलने के लिए ही तो साल के तीन सौ पैंसठो दिन दिन और रात के 20-20 घंटे लगातार अनथक परिश्रम कर रहा है। आपको याद है कि पहले कभी इतिहास में भारत एफडीआई के मामले में दुनिया का सिरमौर बना था? यहाँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 2014 में भारत सूची में 5वें स्थान पर था। क्या पहले कभी भारत मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में दुनिया में छठे स्थान पर आया था? चीन और पाकिस्तान को छोड़ ईरान समेत पूरी दुनिया ने क्या कभी इस तरह भारत को हाथोंहाथ लिया था? क्या पहले कभी भारत विकास दर के मामले में दुनिया में नंबर 1 हुआ था? यह उसी लौहमानव की मेहनत और अनुशासन का तो परिणाम है कि इतिहास में पहली बार दुनिया की एकमात्र महाशक्ति अमेरिका भारत-पाकिस्तान को एक ही तराजू पर तोलने की बजाए खुलकर भारत का समर्थन कर रहा है। क्या पाकिस्तान और चीन भारत से और भ्रष्टाचारी तत्त्व केंद्र सरकार से कभी इतने भयभीत थे जितने कि आजकल हैं? क्या ये इस बात के संकेत नहीं हैं कि भारत न केवल बदल रहा है बल्कि दुनिया को बदलने की क्षमता भी हासिल कर रहा है। वो भी धीरे-धीरे नहीं बिजली की गति से।

शनिवार, 7 मई 2016

डिग्री न देखो,योग्यता को देखो,डिग्री ने भारत को लूटा

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह.मित्रों,काफी दिन पहले हमने छठी जमात की अपनी पाठ्य-पुस्तक में आचार्य विनोबा भावे द्वारा लिखित एक निबंध पढ़ा था-जीवन और शिक्षण.उसमें लेखक ने कहा था कि हमारी शिक्षा-प्रणाली एकदम बेकार है क्योंकि पढाई गयी बातें जीवन में काम नहीं आती हैं.जब विद्यार्थी पढाई पूरी कर लेता है तो उसके सामने आजीविका की भयंकर समस्या खडी हो जाती है.एकदम से व्यक्ति को आँख बंद कर हनुमान जी की तरह जीवन के क्षेत्र में कूदा दिया जाता है.
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि जिंदगी में योग्यता ही काम आती है,हुनर काम आता है डिग्री काम नहीं आती लेकिन इन दिनों देखने में आ रहा है कि कुछ लोग भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री और अन्य केंद्रीय मंत्रियों की डिग्रियों और जन्मतिथि के पीछे पड़े हुए हैं.ऐसा लगता है जैसे पीएम और उनके मंत्री सरकारी नौकरी में हैं जहाँ से उनको निर्धारित वेतन मिलता है और जहाँ से वे एक दिन रिटायर हो जाएँगे और उसके बाद उनको पेंशन मिलेगा.
मित्रों,भारत ने इससे पहले भारी-भरकम डिग्रियों वाले कम-से-कम तो पी.एम. तो देखे ही हैं-१.पीवी नरसिंह राव और २.मनमोहन सिंह.भारत ने यह भी देखा कि दोनों के समय में उनकी डिग्रियों से कई गुना ज्यादा घोटाले हुए. देश को पी.एम. का काम चाहिए न कि डिग्री.बिना व्यावहारिक ज्ञान और ईमानदारी के भारी-भरकम डिग्री वाला नेता लेकर क्या देश को उसकी डिग्रियों को लेकर चाटना है? क्या देश के लिए इतना ही काफी नहीं है कि २ साल में ही भारत चीन की आँख में आंख डालकर बात करने लगा है,एफ.डी.आई. का दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है,विनिर्माण के क्षेत्र में ८वें से ६ठे स्थान पर आ गया है,पिछले दो सालों में कोई घोटाला नहीं हुआ है,गरीबों को पहली बार बैंकों से जोड़ा गया है और बिचौलियों को समाप्त करने की दिशा में पहली बार काम हो रहा है,पहली बार हर खेत को पानी देने की दिशा में सही तरीके से काम हो रहा है,एन.एच. और रेल लाईन निर्माण में अभूतपूर्व तेजी आई है,चलती ट्रेन में ही ट्विटर के जरिए समस्या का समाधान हो जाता है,पहली बार भ्रष्टाचारी नेता जेल भेजे जाने लगे हैं इत्यादि-इत्यादि?
मित्रों,इतिहास गवाह है कि भारत में ऐसे सैकड़ों महान व्यक्ति हो चुके हैं जो मैट्रिक तक पास नहीं थे.आज कबीर,निराला और जयशंकर प्रसाद को कौन नहीं जानता?राजकपूर से बड़ा कोई फ़िल्मकार हुआ भी है क्या?कहने का तात्पर्य यह है कि मोदी और उनके मंत्रियों की डिग्रियों के पीछे वही लोग पड़े हुए हैं जिनका काम ही सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना है और प्रत्येक स्थिति में आलोचना करनी है.खुद तो आलोचक जी आई.आई.टी. से जिंदल की कृपा से पढ़े हैं शायद इसलिए उन्होंने अब तक दिल्ली में ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे साबित होता हो कि उनको दिल्ली की जनता और जनता की भलाई से कोई मतलब भी है.जबसे ये सत्ता में आए हैं कभी औड तो कभी इवेन के चक्कर में जनता को उलझाए रखा है.जहाँ ये लोग करना थोडा और ढिंढोरा बहुत का करने में लगे हैं वहीं मोदी सरकार चुपचाप काम करने में लगी है.अब उसका काम धरातल पर दिखने भी लगा है और भारत की जनता अंधी तो बिल्कुल भी नहीं है.जनता देख रही है कि कौन दिन-रात बिना छुट्टी लिए देश के लिए काम कर रहा है और कौन बिना विभाग का मुख्यमंत्री बनकर फिल्मों की समीक्षा लिख रहा है,स्वीटजरलैंड में छुट्टियाँ मना रहा है और रायता फैला रहा है.

रविवार, 1 मई 2016

भगवा आतंकवाद गढ़नेवालों को मिले मृत्युदंड

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह।मित्रों,हमारी आशंका ५ साल बाद सही साबित हुई है। हमने ५ साल पहले २ जनवरी,२०११ को जब तत्कालीन केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी जबरदस्ती भगवा आतंकवाद शब्द गढ़ने और शब्द को सही साबित करने के लिए झूठी अफवाह फैला रही थी,कई निर्दोष हिन्दू नेताओं और सन्यासियों को प्रताड़ित कर रही थी तब अपने आलेख

हिन्दू आतंकवाद सच्चाई कम साजिश ज्यादा

में

कहा था कि कोई गोब्यल्स चाहे कितनी ही बार इस शब्द और इससे जोड़ी जानेवाली अंतर्कथा को क्यों न दोहराए मैं नहीं मानूंगा कि भारत में कोई भगवा आतंकवाद जैसी चीज अस्तित्व में भी है।
मित्रों,सौभाग्यवश आज यह दिवार पर लिखी ईबारत की तरह साफ हो चुका है कि कांग्रेस ने जान-बूझकर पहले इस विरोधाभासी शब्द को गढ़ा और फिर उसको सही साबित करने की साजिश रची।खुलासे तो यह भी बता रहे हैं कि दुनिया के सबसे सहिष्णु धर्म हिन्दू को बदनाम करने के लिए कांग्रेस ने पाकिस्तान और पाकिस्तानी आतंकी संगठनों की भी मदद ली।संकेत तो ऐसे भी हैं कि हिंदुस्तान के १ अरब से भी ज्यादा हिन्दुओं को बदमान करने और नीचा दिखाने की यह अति घिनौनी साजिश १० जनपथ में रची गयी।
मित्रों,बहुत जल्द इस साजिश में कारण बेवजह जेल में अपने जीवन के बहुमूल्य सालों को गुजारने को मजबूर किए गए लोग बाहर भी आ जाएंगे लेकिन क्या इसके साथ ही इस मामले का पटाक्षेप हो जाएगा या हो जाना चाहिए? मेरी मानें तो कदापि नहीं! आखिर यह १ अरब लोगों की मानहानि का सवाल है जिनको एक ऐसे संप्रदाय के साथ एक ही तराजू पर तोलने की कोशिश की गयी जिनसे आज पूरी दुनिया परेशान है।
मित्रों,सवाल उठता है कि हम हिन्दुओं की ईज्जत और जज्बात के साथ छेड़छाड़ करनेवालों को क्या दंड मिलना चाहिए।मेरे हिसाब से तो उनको सीधे मृत्युदंड मिलना चाहिए।हो सके तो इसके लिए संविधान और कानून में बदलाव किया जाए।अगर ऐसा करना किसी भी तरीके से संभव न हो तो उनको कानूनन जितनी अधिकतम सजा मिल सकती है मिलनी चाहिए।उनमें से कोई भी बचना नहीं चाहिए जिससे उनको और उनकी तरह देशविरोधी सोंच रखनेवाले शरारती तत्त्वों को एक सबक मिल सके और वे भविष्य में इस तरह की शरारत न कर सकें।साथ ही इस बात की भी गहराई से जाँच करवाई जाए कि अभी भी देश में ऐसे कौन-से लोग हैं जो भारत विरोधी सीमापार और सुदूर की शक्तियों के इशारे पर नागिन डांस कर रहे हैं।

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

ताड़ी व्यवसायियों के पक्ष में आज धरना देंगे पासवान

पटना (सं.सू.)। केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान ताड़ी की बिक्री पर प्रतिबंध के खिलाफ सोमवार को राजधानी में धरना देंगे। रविवार को लोजपा कार्यालय में पासवान ने इसकी घोषणा की। संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने ताड़ी की खूब वकालत की और गर्दनीबाग के धरनास्थल पर धरना पर बैठने का ऐलान किया। वहीं जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर राजनीतिक हमला भी किया। पासवान ने कहा कि राजनीतिक कलाकारी करना तो कोई नीतीश कुमार से सीखे।

उन्होंने कहा कि गजब का बुद्धि है, 17 साल तक भाजपा और आरएसएस  के गोद में  बैठे रहे। अब संघ मुक्त भारत की बात करते हैं। दस साल तक लोगों को शराब पिलाया और अब बंद करने की बात कर रहे  हैं। दोपहर बाद भाजपा कार्यालय पहुंचे पासवान ने कहा कि नीतीश कुमार से बड़ा कलाकार कोई हो नहीं सकता। प्रधानमंत्री के सवाल पर पासवान ने कहा कि नीतीश कुमार संघमुक्त के पहले बिहार के अपराध मुक्त करें। उन्हें देश में घूमने की सलाह भी दी। जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद पर निशाना साधते हुए कहा कि आज जो लोग मंडल मसीहा बन  रहे हैं उनका पहले कहीं पता नहीं था। वीपी सिंह को ये लोग भूल गए।  इसके पहले लोजपा कार्यालय में पासवान ने कहा है कि ताड़ी शराब नहीं है। यह आम, लीची की तरह रस है।

गांधी जी ने इसे नीरा कहा था। इसकी तुलना शराब से नहीं की जा सकती है। 1991 में लालू प्रसाद ने इस पर छुट दी थी। जब लालू प्रसाद ने ताड़ी पर छुट दी थी तो चुनाव के दौरान हाजीपुर में मेरे पक्ष में नारा लगता था - एक रुपया में तीन गिलास-जीतेगा भाई राम विलास। पता नहीं लालू प्रसाद अब नीतीश कुमार से क्यों डर रहे है। शायद कह दिया होगा कि हम पीएम होंगे और बिहार तुम्हारे लिए छोड़ देंगे। पासवान ने चुनौती दी कि कोई सुबह पांच बजे का ताड़ी एक साल तक पीये, यदि उसका हेल्थ खराब होगा तो हम राजनीति छोड़ देंगे। पासवान ने कहा कि जब उनकी आंख खराब हो गयी थी तो डॉक्टर ने उन्हें ताड़ी पीने के लिए कहा था। जब हमें अच्छा नहीं लगा तो पीना छोड़ दिया।

पीएम नरेंद्र मोदी की ग्रामोदय से भारत उदय की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि नरेंद्र माेदी पहला विजनरी पीएम है जिसने बाबा साहेब अंबेडकर से जुड़े पांच स्थलों को विकसित करने का निर्णय लिया। जिसमें उनके जन्म स्थान महु, 26 अलीपुर रोड जहां उन्होंने संविधान लिखा, चैत्य भूमि, जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ, लंदन में जहां उन्होंने पढ़ाई की उसे सरकार ने खरीद कर राष्ट्रीय  स्मारक घोषित किया और नागपुर जहां उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार घूम -घूम कर कहते हैं कि लोगों को दो रुपये किलो अनाज दे रहे हैं, हकीकत है कि शत-प्रतिशत सबसिडी केंद्र सरकार देती है। हमने तो विधानसभा चुनाव के दौरान घोषणा भी की थी कि बिहार में सरकार बनी तो लोगों को मुफ्त अनाज देंगे। केंद्र अनाज पर एक लाख तीस हजार करोड़ रुपये सब्सिडी देती है।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

गिरगिटों के ताऊ नीतीश कुमार

मित्रों,राजनैतिक साहित्य में जंतु अलंकारों का अपना ही महत्व है. फिर बिहार का तो कहावतों की प्रचुरता में भी कोई सानी नहीं है.जैसे गंगा गए तो गंगा दास और जमुना गए तो जमुना दास या फिर जिधर देखी खीर उधर गए फिर,दोमुंहा सांप,गिरगिट.मगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश जी तो काफी पहले ही जंतु विज्ञान और अन्य कहावतों से ऊपर उठ चुके हैं.
मित्रों,आपको याद होगा कि नीतीश कुमार १८ सालों तक संघ के साथ रहे.आज नीतीश कुमार जो कुछ भी हैं वो निवर्तमान बड़े भाई लालू जी की वजह से नहीं हैं बल्कि संघ परिवार की देन है.सच तो यह भी है कि पहली बार जब लालू जी बिहार के सीएम बने थे तो भाजपा के ही समर्थन से.फिर वही नीतीश अब किस मुंह से भारत से संघ परिवार के खात्मे की बात कर रहे हैं?इससे पहले नीतीश जी लालू जी से हाथ मिला कर भी पूरी दुनिया के गिरगिटों को शर्मिंदा कर चुके है. कभी हमने कांग्रेस को ७ घूंघटों वाला चेहरा कहा था लेकिन अब समझ में नहीं आता है कि नीतीश कुमार जी के लिए उपमा कहाँ से लाऊं?लगता है कि हमें नीतीश कुमार जी की रंग बदलने की कला की तुलना दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल से करके काम चलाना पड़ेगा जो १ दिन में ही कई-कई बार रंग बदल लेते हैं.
मित्रों,इन दिनों नीतीश कुमार जी पीके अर्थात प्रशांत किशोर की सलाह पर शराबबंदी को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की मुहिम चलाने में पिले हुए हैं मानों बिहार में पहले किसी ने शराबबंदी के लिए कदम ही नहीं उठाया या फिर किसी और की सरकार ने बिहार के गाँव-गाँव में शराब की दुकानें खोल दी थी जबकि सच्चाई यह है कि कई दशक पहले कर्पूरी ठाकुर ने भी कोशिश की थी लेकिन भ्रष्ट प्रशासन के कारण होनेवाली तस्करी ने उनके सद्प्रयास पर गरम पानी फेर दिया था.सच्चाई यह भी है कि हर चौक-चौराहे पर शराब की दुकानें और किसी ने नहीं बल्कि स्वयं नीतीश कुमार की सरकार ने ही खुलवाई थी.वैसे ये बात भी किसी से छिपी हुई नहीं है कि बिहार आज भी भारत के सबसे ज्यादा भ्रष्ट राज्य है फिर नीतीश कुमार कैसे सफल होंगे?वैसे चाहते तो हम भी हैं कि बिहार सही मायनों में अल्कोहल मुक्त प्रदेश बने और भारत अल्कोहल मुक्त देश.
मित्रों,अच्छा रहेगा कि पीके की सलाह पर कोरा दिखावा करना बंद करके और केजरी सर के साथ गिरगिटपने में प्रतियोगिता करना छोड़कर नीतीश जी सरकार के कामकाज पर ध्यान दें क्योंकि इन दिनों बिहार में सारे विकासपरक कार्य बंद हैं.कहीं अदालत परिसर में बम फट रहे हैं तो कहीं निर्माण एजेंसियों के यंत्रों को आग के हवाले किया जा रहा है तो कहीं रामनवमी के जुलूस पर हमले हो रहे हैं.यहाँ तक कि विधायक की बहन भी सुरक्षित नहीं रह गयी है.दारोगा भी सुरक्षित नहीं रह गए हैं.हर जगह,हर विभाग में अराजकता और कुव्यवस्था है.लगता है जैसे वह समय आ गया है कि जिस तरह से बसों में लिखा होता है कि यात्री अपने सामान की रक्षा स्वयं करें उसी तरह से बिहार के सारे सार्वजनिक स्थानों पर नीतीश कुमार उर्फ़ डेंटिंग पेंटिंग मास्टर को लिखवा देना चाहिए कि बिहारवासी अपने माल के साथ-साथ अपनी जान की भी रक्षा स्वयं करें.उधर राज्य के हैंड पम्प जिनमें भ्रष्टाचार के चलते आधे-अधूरे पाईप लगाकर पूरा पैसा बनाने का काम आजादी के बाद से ही लगातार चल रहा है सूखने लगे हैं और ईधर नीतीश कुमार जी अगले ५ सालों में सभी घरों में नलके का पानी उपलब्ध करवाने के वादे करने में लगे हैं.मतलब कि मिल तो चावल का माड़ भी नहीं रहा है और सपने बिरयानी के दिखाए जा रहे हैं क्योंकि भारत में हमेशा से न तो सपने देखने और न ही दिखाने पर कभी कोई रोक रही है.उस पर नीतीश कुमार जी तंज कस रहे हैं नरेन्द्र मोदी के ऊपर कि कालाधन का क्या हुआ?नीतीश जी को अपने हिस्से का १५ लाख भी चाहिए.कालाधन सहित सारे क्षेत्रों में जो होना चाहिए मोदी सरकार कर रही है और पूरी तरह से साफ़-सुथरे तरीके से जी-जान से कर रही है और इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि इन दिनों पिछले ७५ सालों में सत्ता में रहे सारे भ्रष्टाचारी १ ही नाव पर सवार हो गए हैं.वर्ना आज से २ साल पहले किसने कल्पना की थी कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट और लालू और नीतीश एकसाथ चुनाव लड़ेंगे? नीतीश जी चाहे जितनी सफाई से शब्दों की हेरा-फेरी कर लें सच्चाई तो यह है कि आज भारत में लोकतंत्र बिल्कुल भी खतरे में नहीं है बल्कि अगर कुछ खतरे है तो वो है छद्मधर्मनिरपेक्षता और तुष्टिकरण की गन्दी और भारतविरोधी राजनीति.नीतीश जी को इन दिनों जिसका अगुआ बनने का चस्का लगा हुआ है.

रविवार, 3 अप्रैल 2016

साम्यवाद,समाजवाद,गांधीवाद और राष्ट्रवाद

मित्रों,भारत ने हमेशा से ही स्वतंत्र विचारों और विचारधाराओं को सम्मान दिया है। हमारे भारत में कभी किसी मंसूर बिन हल्लाज को देश और समाज से अलग सोंच रखने के कारण जिंदा आग में नहीं झोंका गया,न तो किसी सुकरात को विषपान कराया गया और न ही किसी ईसा को सूली पर ही चढ़ाया गया। हमारा वेद कहता है मुंडे मुंडे मति भिन्नाः और जैन तीर्थंकर कहते हैं स्याद अस्ति स्याद नास्ति यानि शायद मैं कहता हूँ वह ठीक है या हो सकता है कि आप जो कहते हैं वह सही है।
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है भारत में हमेशा से प्रवृत्ति और निवृत्तिवादी दोनों तरह की विचारधाराएँ एकसाथ पल्लवित-पुष्पित होती रही हैं। वर्तमान भारत में भी कई तरह के वाद प्रचलन में हैं जिनमें साम्यवाद,समाजवाद,गांधीवाद और राष्ट्रवाद प्रमुख हैं। इनमें से ढोंगी तो सारे वाद वाले हैं। उत्पत्ति की दृष्टि से विचार करें तो इनमें से साम्यवाद और समाजवाद की उत्पत्ति विदेश की है जबकि गांधीवाद और राष्ट्रवाद ने भारत में जन्म लिया है।
मित्रों,साम्यवाद कहता है कि संसार में दो तरह के वर्ग हैं और उन दोनों में संघर्ष चलता रहता है। एक दिन यह संघर्ष चरम पर पहुँचेगा और तब दुनिया पर सर्वहारा वर्ग का शासन होगा और तब न तो कोई गरीब होगा और न ही कोई अमीर क्योंकि निजी संपत्ति भी नहीं होगी। साम्यवाद हिंसा की खुलकर वकालत करता है और मुसलमानों की तरह उसके लिए भी देशों की सीमाओं का कोई मतलब नहीं है बल्कि वह आह्वान करता है कि दुनिया के मजदूरों एक हो। यही कारण है कि आज देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा साम्यवादी हिंसा की चपेट में है। यही कारण है कि जब चीन ने भारत पर हमला किया तब भारत के साम्यवादियों ने चीन का समर्थन किया। यही कारण है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय चूँकि रूस इंग्लैंड एक साथ लड़ रहे थे इसलिए भारतीय साम्यवादियों ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया। चाहे वो दंतेवाड़ा के जंगलों के बर्बर नरपशु साम्यवादी हों या फिर संसद में घंटों बहस लड़ानेवाले सीताराम येचुरी वैचारिक रूप से सब एक हैं। जिस तरह आतंकवाद बुरा या अच्छा नहीं होता उसी तरह से साम्यवाद भी बुरा या भला नहीं होता सबके सब भारतविरोधी और अंधे होते हैं। अंधे इसलिए क्योंकि उनको अभी भी यह नहीं दिख रहा कि करोड़ों लोगों के नरसंहार के बाद शासन में आए साम्यवाद ने रूस,पोलैंड,चीन,पूर्वी जर्मनी,उत्तरी कोरिया आदि का क्या हाल करके रख दिया था और बाद में लगभग सभी साम्यवादी देशों को अस्तित्वरक्षण हेतु किस तरह पूंजीवाद की ओर अग्रसर होना पड़ा। भारत के साम्यवादी लालची और भ्रष्ट भी कम नहीं हैं। वे चिथड़ा ओढ़कर घी पीने में लगे हैं।
मित्रों,इसके बाद बारी आती है समाजवाद की यानि ऐसी विचारधारा की जो साम्यवाद की ही तरह मानती है कि सबकुछ सारे समाज का होना चाहिए लेकिन लक्ष्यप्राप्ति अहिंसक तरीके से होनी चाहिए,लोकतांत्रिक तरीके से होना चाहिए। मगर भारतीय समाजवाद बहुत पहले ही अपने मार्ग से भटक चुका है। आरंभ में लोहिया-जेपी का झंडा ढोनेवाले समाजवादी आज निहायत सत्तावादी और आत्मवादी हो चुके हैं। लगभग सारी-की सारी समाजवादी पार्टियाँ किसी-न-किसी परिवार की निजी सम्पत्ति बनकर रह गई हैं और अपने-अपने परिवारों के साथ राज भोग रही हैं। उनका न तो देशहित से ही कुछ लेना-देना है,न तो प्रदेशहित से और न ही गरीबों से। सबै भूमि गोपाल की के पवित्र सिद्धांत से शुरू हुआ यह आंदोलन आज सबै कुछ मेरे परिवार की के आंदोलन में परिणत हो चुका है। बहुजनवादी और दलितवादी पार्टियों का भी कमोबेश यही हाल है।
मित्रों,भारत में अगर सबसे ज्यादा किसी वाद का दुरूपयोग किया गया है वह है गांधीवाद। कांग्रेस ने गांधीजी के नाम को तो अपना लिया लेकिन गांधी की विचारधारा को विसर्जित कर दिया। आज कांग्रेस ने घोर राष्ट्रवादी रहे गांधीजी को प्रिय रहे नारों वंदे मातरम् और भारत माता की जय तक से किनारा कर लिया है। आज कांग्रेस पार्टी सिर्फ मुस्लिम हितों की बात करनेवाली मुसलमानों की पार्टी बनकर रह गई है। उसका एकमात्र लक्ष्य हिंदू समाज और भारतीय संस्कृति के विरूद्ध बात करना, ऐन-केन-प्रकारेण सत्ता प्राप्त करना और फिर जमकर भ्रष्टाचार करना रह गया है। कांग्रेस गांधीवाद को पूरी तरह से छोड़ चुकी है बल्कि उसके लिए गांधीछाप ही सबकुछ हो गया है। उसकी प्राथमिकता सूची में न तो देश के लिए ही कोई स्थान है और न तो देशहित के लिए ही। जहाँ समाजवादी पार्टियाँ एक-एक संयुक्त परिवारों की संपत्ति बन चुकी हैं वहीं दुर्भाग्यवश कांग्रेस एक एकल परिवार की निजी संपत्ति बनकर रह गई है। आज कांग्रेस किसी विचारधारा का नाम नहीं है बल्कि पारिवारिक प्राईवेट कंपनी का नाम है। जहाँ तक तृणमूल कांग्रेस का सवाल है तो यह कांग्रेस और साम्यवाद के समन्वय से उपजी क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी है इसलिए उसमें एक साथ इन दोनों के अवगुण उपस्थित हैं।
मित्रों,अंत में बारी आती है राष्ट्रवाद की। एकमात्र यही एक विचारधारा है जो तमाम कमियों के बावजूद भारत के उत्थान की बात करती है। भारत को फिर से विश्वगुरू बनाने,एक विकसित राष्ट्र बनाने के सपने देखती है फिर भी यह देश का दुर्भाग्य है कि इस विचारधारा को देश की जनता हाथोंहाथ नहीं ले रही है। एक तरफ तो राष्ट्रवादियों को इस बात पर गहराई से विचार करना होगा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और अपने संगठन और सोंच के भीतर वर्तमान सारी कमियों को दूर करना होगा। तो वहीं भारत की महान जनता को समझना होगा कि देश और देशवासियों से समक्ष एकमात्र विकल्प राष्ट्रवाद ही है क्योंकि बांकी के वाद अलगाववादियों का समर्थन करते हैं, देश को बर्बाद करने की बात करते हैं। राष्ट्र की बात नहीं करते देश के किसी न किसी भूभाग या जनता के किसी-न-किसी हिस्सेभर की बात करते हैं। उन सभी वादों के मजबूत होने अथवा राष्ट्रवाद के कमजोर होने का अर्थ है भारत का कमजोर होना।

जो गलतियों को बार-बार दोहराये उसे भाजपा कहते हैं

मित्रों,मिड्ल स्कूल में मेरे गुरू रहे श्री श्रीराम सिंह कहा करते थे कि जो गलती को दोहराता नहीं उसे भगवान कहते हैं,जो गलतियों को दोहराए उसे इंसान कहते हैं और जो गलतियों को बार-बार दोहराए उसे शैतान कहते हैं। परंत अप्रैल-मई में चार राज्यों में चुनाव होनेवाले हैं और दुर्भाग्यवश भारत की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी भाजपा जिस पर पूरे देश की उम्मीदें टिकी हुई हैं वो भी बार-बार उन्हीं गलतियों को दोहरा रही है जो उसने पिछले यूपी और हालिया दिल्ली व बिहार चुनावों के समय किए थे।
मित्रों,आपको याद होगा कि पिछले विधानसभा चुनावों में जबकि चुनाव-प्रचार अपने पूरे उरूज पर था तब भाजपा ने बसपा के दागी मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा में अपनी पार्टी में शामिल कर लिया था। चुनावों में इस गलती का जो परिणाम भाजपा को और यूपी की जनता को भुगतना पड़ा वह पिछले 4 सालों से आपलोग भी देख रहे हैं। ठीक उसी तरह की गलती भाजपा ने केरल में दागी क्रिकेट खिलाड़ी एस. श्रीसंत को पार्टी में शामिल करके की है। लगता है जैसे भाजपाइयों का दिमाग ऐन चुनाव के वक्त घास चरने चला जाता है।
मित्रों,अगर हम चुनावी जुमलों की बात करें तो आपको याद होगा कि 2014 के लोकसभा चुनावों के समय नरेंद्र मोदी सहित तमाम भाजपा नेताओं ने चीख-चीखकर कहा था कि बांग्लादेशी घुसपैठी अब बोरिया-बिस्तर बांधना शुरू कर दें क्योंकि केंद्र में भाजपा की सरकार के बनते ही उनकी घर-वापसी की प्रकिया शुरू हो जाएगी लेकिन हम देखते हैं कि अब जबकि प. बंगाल और असम जहाँ कि घुसपैठ ने जनसांख्यिकी को बिगाड़कर रख दिया है में चुनाव-प्रचार जारी है भाजपा घुसपैठ पर लगाम लगाने के वादे कर रही है घर-वापसी का जिक्र तक नहीं कर रही। ऐसे में जनता इस बात को लेकर कैसे मुतमईन हो सकती है कि वर्तमान चुनावों में भाजपा जो वादे कर रही है वो चुनावी जुमला नहीं है।
मित्रों,तमाम मीडिया-सर्वेक्षण बता रहे हैं कि चार राज्यों में से सिर्फ असम में भाजपा टक्कर में है वरना प. बंगाल,केरल और तमिलनाडु में उसका खाता भी खुल जाए तो गनीमत है। हमने देखा कि ग्रासरूट लेवल तक गहन जनसंपर्क करके आप पार्टी ने कैसे दिल्ली में भाजपा को करारी शिकस्त दी। आखिर वही रणनीति अपनाने में भाजपा को समस्या क्या है? पार्टी के मिस्ड कॉल अभियान के बाद हमने पार्टी को सलाह दी थी कि अब पार्टी को उन लोगों से सीधा संपर्क करके सदस्यता प्रपत्र भरवाना चाहिए लेकिन लगता है कि पार्टी नेताओं को एसी में रहने की बीमारी हो गई है। मोदी और शाह यह तो चाहते हैं कि भाजपा इतनी शक्तिशाली हो जितनी कि 50 के दशक में कांग्रेस थी लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं से पसीना बहवाना नहीं चाहते। उनको अभी भी भ्रम है कि हर ब्लॉक या जिला मुख्यालय में पीएम की सभा आयोजित कर देने मात्र से ही चुनाव जीता जा सकता है। उधर यूपी से भी ओपिनियन पोल के नतीजे यही बता रहे हैं कि भाजपा वहाँ दूसरे नंबर पर भी नहीं आने जा रही है फिर उसका सरकार बनाने की बात तो दूर ही रही।
मित्रों,पार्टी को कैसे चलाना है,जिताना है या हराना है मोदी और शाह जानें लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि चुनाव नतीजों का दुष्प्रभाव उस राज्य की सारी जनता को झेलना पड़ता है,पूरे देश को झेलना पड़ता है। अब बिहार को ही लें तो पहले शराब बंद करके,फिर बालू खनन पर रोक लगाकर और अब जमीन की रजिस्ट्री को ऑनलाईन करके नीतीश-लालू की सरकार ने चुनावों के बाद से लाखों लोगों को भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। इसी तरह यूपी का पहले बसपा ने और बाद में कथित समाजवादियों ने क्या हाल करके रख दिया है किसी से छिपा हुआ नहीं है। इसलिए अच्छा हो कि पार्टी नेतृत्व अपनी रणनीति को बदले और बात को नेहरू की गलत साबित हो चुकी ट्रिकल डाऊन थ्योरी की तरह ऊपर से नीचे पहुँचाने के बदले नीचे से ऊपर पहुँचाने के उपाय करे। यह सही है कि पार्टी ने पहले भी हमारी सलाहों पर किंचित भी ध्यान देने की जरुरत नहीं समझी है लेकिन हम भी क्या करें हमसे तो भारत दुर्दशा देखी न जाई।

मंगलवार, 29 मार्च 2016

बर्बाद हो रहा बिहार है,नीतीशे कुमार है

मित्रों, कभी-कभी नारों का जादू जनता के सर पर इस कदर चढ़कर बोलता है जनता भले-बुरे की पहचान करने की क्षमता भी खो देती है. जनता यह भी भूल जाती है कि जब वही व्यक्ति १० साल में बहार नहीं ला पाया तो अब ५ साल में कहाँ से ला देगा? जनता यह भी भूल जाती है कि पूरे भारत में भ्रष्टाचार और कुशासन के प्रतीक बन चुके व्यक्ति की गोद में बैठकर कोई कैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ सकता है और सुशासन की स्थापना कर सकता है?
मित्रों,परिणाम सामने है.बिहार में फिर से नीतीश कुमार है लेकिन बर्बाद हो रहा बिहार है.आज के बिहार में (नवादा में पांच परमेश्वरों द्वारा लगाई गयी रेप की कीमत ) महिलाओं की ईज़्ज़त की कीमत मात्र २००० रु. रह गई है,रेप के आरोपी विधायक को पुलिस गिरफ्तार नहीं करती बल्कि वो खुद ही पंडित से दिन दिखाकर आत्मसमर्पण करता है. इतना ही नहीं वो जेल में भी ठाठ से रहता है,होली के दिन नवादा जेल के सभी कैदियों को अपनी तरफ से मीट का महाभोज देता है और जेल मैन्युअल की ऐसी की तैसी किये रहता है. जब तक वो कृपा करके कथित समर्पण नहीं करता कोरे नारों के माध्यम से बिहार में बहार लाने का दावा करनेवाले नीतीश जी कहते हैं कि उसको बख्शा नहीं जाएगा और उसके खिलाफ फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चलाया जाएगा लेकिन जब वो जेल पहुँचता है तो पूरा जेल प्रशासन उसके साथ इस तरह के व्यवहार करते हैं जैसे वो घोषित तौर पर सरकारी दामाद हो.
मित्रों,जबसे राजबल्लभ जेल में पधारे हैं पता नहीं नीतीश जी का फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट कहाँ चला गया है? डर लगता है कि कहीं नीतीश जी के सात महान जुमलों (कथित निश्चयों) की तरह यह भी एक जुमला तो नहीं? नीतीश जी ने अपने ७ जुमलों को ही सरकारी नीति बना दी है.  इसको पूरा करने के लिए १ बिहार मिशन नामक विभाग बना दिया है और इसको सारे मंत्रियों और अधिकारियों के ऊपर बिठा दिया है. सवाल उठता है कि फिर भारी-भरकम मंत्रिमंडल की जरुरत ही क्या है? सवाल यह भी उठता है कि जिस बिहार की ९९.९  प्रतिशत जनता नीतीश के १० साल के शासन के बावजूद पानी के नाम पर जहर पी रही है उसको अगले ४.५ सालों में नीतीश कैसे शुद्ध पेयजल मुहैया करवा देंगे? यह १ निश्चय ही वे शर्तिया पूरा नहीं कर पाएंगे फिर बाँकी के ६ के १ प्रतिशत भी पूरा होने की बात दूर ही रही (चित्र में देखें ७ निश्चय ).
मित्रों,खैर,ये तो हुई उन जुमला कुमार जी के ७ महान जुमलों की बात जिनका २०१४ -१५ का बजट ही जुमला साबित हो चुका है लेकिन बिहार के लिए सबसे दुःखद पहलु यह है कि नीतीश कुमार को बिहार के समक्ष आ चुकी सबसे बड़ी समस्या दिख ही नहीं रही,उसे जुमलों में भी शामिल नहीं किया गया है. वो समस्या है जलवायु परिवर्तन के कारण बिहार का राजस्थान में बदल जाना।  बिहार में कई सालों से सूखे जैसी स्थिति है,भूगर्भीय जलस्तर ५० फ़ीट तक नीचे जा चुका है. बिहार की खेती जो बिहार की जान है बर्बादी के कगार पर है और नीतीश जी प्रधानमंत्री सिंचाई योजना से युद्धस्तर पर लाभ उठाने के बदले अभी भी चुनावी मोड में हैं और आरोप-आरोप का गन्दा खेल खेल रहे हैं. जागिए प्रभु और बिहार की खेती को बचाईये यानि बिहार को बचाईये। जबकि जमीन के अंदर पानी ही नहीं रहेगा तो हर घर को सप्लाई क्या करेंगे? मतलब नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या? अगर आपको बिहार से किंचित मात्र भी प्यार है तो बिहार को  बचाईये,बिहार को बचा लीजिए। प्रधानमंत्री सिंचाई योजना में कोई कमी है तो केंद्र को बताईये,मिल-जुलकर नए बिहार का निर्माण करिए. अगर मिल-जुलकर बिहार को लूटना है तब तो कोई बात नहीं,तब तो आपके पास लालू प्रसाद एन्ड फैमिली है ही.

रविवार, 27 मार्च 2016

डॉ. नारंग की हत्या के सबक


मित्रों,हमने कई महीने पहले एक आलेख में लिखा था कि भारत की भ्रष्ट मीडिया के लिए सांप्रदायिक हिंसा तभी होती है जब मरनेवाला मुसलमान और मारनेवाला हिंदू होता है। इसके उलट जब हिंदू को मुसलमान मारता है तो धर्मनिरपेक्ष हिंसा सांप्रदायिक हिंसा न भवति। जब एक केंद्रशासित प्रदेश का अघोषित देशद्रोही मुख्यमंत्री 250 करोड़ सालाना मीडिया में बाँटेगा तो फिर बिकाऊ वेश्या मीडिया की नीयत तो खराब होगी ही।
मित्रों,लेकिन सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति आई ही क्यों? क्यों आज कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उनकी भजभज मंडली मीडिया की नजर में हिंदुओं की जान की कोई कीमत नहीं है जबकि हिंदुओं की आबादी 80 प्रतिशत है? क्या इसके लिए स्वयं हिंदू भी या हिंदू ही जिम्मेदार नहीं हैं? एक बेवजह के विवाद में कुछ दर्जन लोग आते हैं और एक प्रतिष्ठित व्यक्ति की हत्या करके चले जाते हैं। जब डॉक्टर की हत्या हो रही थी तब उसके पड़ोसी कहाँ थे? क्यों कोई डॉक्टर को बचाने के लिए घर से बाहर नहीं निकला?
मित्रों,यह एक कटु सच्चाई है कि आज हिंदू अपने घर में हथियार नहीं रखता। अगर घर में कोई साँप भी घुस आए तो उसको मारने के लिए घर में लाठी तक नहीं होती। अहिंसा परमो धर्मः के सिद्धांत ने हिंदुओं को निर्बल बना कर रख दिया है। लेकिन इसी श्लोक में आगे यह भी कहा गया है कि धर्म हिंसा तथैव च अर्थात अहिंसा परम धर्म है परन्तु हिंसा का, धर्म के अनुसार प्रतिकार करना भी उतना ही परम धर्म है। मैं यह नहीं कहता कि हिंदुओं को कानून का उल्लंघन करके अवैध हथियार रखने चाहिए लेकिन ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि 50 लाख की संपत्ति अर्जित कर ली और उसकी रक्षा के लिए 50 हजार का लाइसेंसी हथियार भी नहीं खरीदा और सरकार के भरोसे पड़े हैं। यह तो फिर दैव दैव आलसी पुकारा सदृश बात हो गई जिसकी बात सवा सौ साल पहले भारतीयों के लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भारत दुर्दशा में की थी।
मित्रों,यह कटु सच्चाई है कि सरकार चाहे किसी की भी हो वो तो वोट बैंक देखकर ही काम करेगी और हिंदू वोट बैंक तो हैं नहीं। हिंदू तो जाट हैं,दलित है,क्षत्रिय हैं,ब्राह्मण हैं,कोयरी हैं,कुर्मी हैं,दलित हैं,यादव आदि आदि आदि हैं लेकिन हिंदू नहीं हैं। इससे भी आगे हिंदू लालची हैं जो साल में कुछ सौ रुपये के मुफ्त के बिजली-पानी के लिए अपना वोट देश के दुश्मनों से मिलीभगत रखनेवाले तत्त्वों को भी दे देते हैं। क्या कारण है कि जो अरविंद केजरीवाल दादरी और हैदराबाद जाने में तनिक भी देरी नहीं लगाता वही अपने ही राज्य में कथित असांप्रदायिक गुंडों द्वारा निहायत निर्दोष की बेवजह हत्या हो जाने पर अपने घर से 5 किमी दूर जहाँ कि वो एक घंटे में पैदल भी जा सकता है जाने की जहमत भी नहीं उठाता?
मित्रों,आज एक भाजपा को छोड़कर कोई भी दल ऐसा नहीं है जो राष्ट्रीय स्तर पर खुलकर हिंदू हितों की बात करता हो जबकि ऐसे दलों की एक लंबी सूची है जो मुसलमानों के सही-गलत सारे कृत्यों का पृष्ठपोषण करते हैं और दिन-रात मुसलमान-मुसलमान की रट लगाए रहते हैं। आगे कई राज्यों में चुनाव होनेवाले हैं लेकिन ऐसा लगता नहीं कि एक नारंग की हत्या हो जाने से पूरा हिंदू समाज अखिल भारतीय स्तर पर जागृत और एकजुट हो जाएगा। सतर्क रहिए,सावधान रहिए क्योंकि हो सकता है दुर्घटनावश डॉ. नारंग के बाद आपकी ही बारी आ जाए।

शनिवार, 26 मार्च 2016

प्रशांत किशोर,ए स्प्यॉल्ड जीनियस

मित्रों,अगर आपने विशाखदत्त रचित मुद्राराक्षस नाटक पढ़ा होगा तो देखा होगा कि उसमें दो पक्ष हैं-एक का नेतृत्व चंद्रगुप्त मौर्य के हाथों में है और दूसरे की बागडोर है घनानंद के हाथों में। दोनों के पास एक-एक महान रणनीतिकार है चंद्रगुप्त के लिए चाणक्य सारी योजनाएँ बनाते हैं तो घनानंद के लिए मुद्राराक्षस रणनीति बनाते हैं। यद्यपि मुद्राराक्षस भी महान राजनीतिज्ञ है लेकिन वह अन्यायी का साथ दे रहा है,एक ऐसे राजा का साथ दे रहा है जिसका उद्देश्य भोग-विलास मात्र है तो वहीं चाणक्य और चंद्रगुप्त महान उद्देश्य की प्राप्त के लिए अथक परिश्रम कर रहे हैं। वे दोनों माँ भारती का विदेशी आक्रांताओं से उद्धार और अखंड भारत की स्थापना करना चाहते हैं। अंत में जीत चाणक्य और चंद्रगुप्त की होती है और घनानंद मृत्यु को प्राप्त होता है।
मित्रों,अगर हम वर्तमान भारत के परिदृश्य को देखें तो कुछ वैसी ही स्थिति देखने को मिलेगी जो 2500 साल पहले थी। आज एक तरफ तो नरेंद्र मोदी हैं जो माँ भारती का उद्धार करना चाहते हैं तो दूसरी ओर वे तमाम प्रतिगामी शक्तियाँ हैं जो वर्षों से देश को लूटती आ रही हैं।
एक तरफ नरेंद्र मोदी खुद ही अपनी रणनीतियाँ बना रहे हैं तो प्रतिगामी घनानंद सदृश शक्तियों को सहारा है महान रणनीतिकार प्रशांत किशोर का। निश्चित रूप से प्रशांत अपने काम में गजब के माहिर हैं और उन्होंने बिहार के चुनावों में इसको साबित भी किया है लेकिन सवाल उठता है कि क्या प्रशांत जो कर रहे हैं वह देशहित में है? महान तो शुक्राचार्य भी थे,रावण भी था लेकिन वे लोग पूज्य तो नहीं हैं। क्यों? क्योंकि उनके कृत्य समाजविरोधी,धर्मविरोधी थे।
मित्रों,हम मानते हैं कि हमारे लिए भी पैसा बहुत बड़ी चीज है लेकिन पैसा न तो कभी सबकुछ रहा है और न ही हो सकता है। प्रशांत को कदाचित पैसे के साथ-साथ शुक्राचार्य की तरह पावर भी चाहिए था जो दर्जा प्राप्त कैबिनेट मंत्री बनने से मिल भी गया है। परंतु इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद सवाल उठता है प्रशांत जो कुछ भी कर रहे हैं उससे देश का भला होगा? अगर भला नहीं होगा तो फिर उनको क्या कहा जाए? क्यों उनकी तुलना रावण या शुक्राचार्य से नहीं होनी चाहिए? अगर उनकी अंतरात्मा मानसिंह की अंतरात्मा की तरह उनको नहीं धिक्कारती है तो क्या यह देशभक्त प्रबुद्ध लोगों का कर्तव्य नहीं है कि उनकी निंदा करे और उनको आत्मावलोकन के लिए बाध्य करने का प्रयास करे? आखिर अपना भारत आज भी घास की रोटी खाकर देश के लिए लड़नेवाले प्रताप की ही पूजा करता है न कि सोने-चांदी की थाली में छप्पन भोग खानेवाले मानसिंह की।

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

महापुरुषों का चरित्र-हनन कांग्रेस के नैतिक पतन की पराकाष्ठा

मित्रों,किसी शायर ने लिखा है कि शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,वतन पे मरनेवालों का यही बांकी निशां होगा। लेकिन हमारी राजनैतिक पार्टियों का इतना अधिक नैतिक पतन हो चुका है कि शहीदों और महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के बजाए वे उनका ही चरित्र-हनन करने लगी हैं और जब वो पार्टी वो कांग्रेस होती है जिसने कभी देश को आजादी दिलवाने में मुख्य भूमिका निभाई थी तो दुःख और भी ज्यादा होता है। सवाल उठता है कि देश बड़ा है या कुर्सी बड़ी है?
मित्रों,प्रश्न यह भी उठता है कि कांग्रेस पार्टी का वर्तमान नेतृत्व क्या उन महापुरुषों के चरणों की धूल के बराबर भी है जिनके ऊपर वो आज कीचड़ उछाल रही है। पहले तो हमारे पतित नेताओं ने महापुरुषों को जाति में बाँटा और अब पार्टी में बाँट रहे हैं। आखिर वह कौन-सी सोंच है जिसके तहत कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी संसद में कहते हैं कि गांधी हमारे हैं और सावरकर आपके। क्या महापुरुष किसी जाति-विशेष या पार्टी विशेष के होते हैं या हो सकते हैं? क्या चंद्रशेखर आजाद या बिस्मिल ने सिर्फ ब्राह्मणों की आजादी के लिए या भगत सिंह ने सिर्फ सिखों की आजादी के लिए या अशफाकुल्लाह खान ने सिर्फ मुसलमानों की स्वतंत्रता के लिए शहादत दी थी? क्या गांधी जी ने सिर्फ कांग्रेस समर्थकों को आजाद करवाने के लिए आंदोलन किया था? अगर नहीं तो फिर गंदी राजनीति करके महापुरुषों के त्याग और बलिदान का मजाक क्यों उड़ाया जा रहा है?
मित्रों,कांग्रेस के प्रवक्ता से जब विनायक दामोदर सावरकर जिनको भारत की जनता प्यार से वीर सावरकर कहकर पुकारती है के चरित्र-हनन के संबंध में सवाल किया गया तो कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी ने अजीबोगरीब तर्क दिया। उनका कहना था कि 1924 से पहले के सावरकर तो वंदनीय हैं लेकिन उसके बाद के सावरकर निंदनीय हैं। हद हो गई कुतर्क की। कांग्रेस कहती है कि सावरकर ने 1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजों के लिए सैनिकों की बहाली करवाई थी तो सच तो यह भी है कि 1914 के प्रथम विश्वयुद्ध में कांग्रेस ने भी तन-मन-धन से अंग्रेजों को समर्थन दिया था तो क्या 1914 का कांग्रेस या 1914 के गांधी निंदनीय हैं और 1942 के वंदनीय।
मित्रों,हिंदी के महान नाटककार मोहन राकेश ने एक नाटक लिखा था आधे अधूरे। नाटक कहता है कि इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है बल्कि हर कोई अधूरा है फिर महापुरुष कैसे पूर्ण हो सकते हैं? स्वयं गांधी में भी कई कमियाँ थीं और उन्होंने भी कई गलतियाँ कीं जिनमें से कइयों का खामियाजा तो देश आज भी भुगत रहा है लेकिन उन गलतियों के बावजूद गांधी महान थे क्योंकि उन्होंने तमाम मानवीय कमजोरियों के बावजूद जो किया वह महान है,प्रातःस्मरणीय है। चूँकि इंसान गलतियों का पुतला होता है इसलिए ऐसा कोई इंसान नहीं है जिसकी आलोचना नहीं की जा सकती हो। क्या कांग्रेस का आज का नेतृत्व पूर्ण होने का दावा कर सकता है? क्या उसने आलोचना करने के लायक कोई गलती कभी की ही नहीं है?
मित्रों,कांग्रेस पार्टी चंद पत्रों के आधार पर वीर सावरकर को देशद्रोही साबित करना चाहती है लेकिन पत्र तो गांधी-नेहरू ने भी जेलों से अंग्रेजों को थोक में लिखे थे और उन पत्रों की भाषा भी कमोबेश वैसी ही थी जैसी कि सावरकर के पत्र की है तो क्या गांधी और नेहरू भी देशद्रोही थे? नेहरू ने आजाद भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अंग्रेजी सरकार को सुभाषचंद्र बोस से संबंधित जो पत्र लिखे थे उसकी भाषा गुलामों जैसी क्यों है क्यों कांग्रेस पार्टी बताएगी?
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि कांग्रेस पार्टी ने महापुरुषों को पार्टियों में बाँटकर और उन पर कीचड़ उछालकर,सूरज पर थूकने जैसी जिस नई राजनैतिक परंपरा की शुरुआत की है वह खुद उस पर ही भारी पड़नेवाली है। लगता है कि कांग्रेस नेतृत्व सत्ता की पुनर्प्राप्ति की बैचैनी में पागल हो गया है। वह पूरी तरह से किंकर्त्तव्यविमूढ़ की अवस्था में है। कभी उसको देशद्रोही कन्हैया में देशभक्तों के सिरमौर भगत सिंह नजर आने लगते हैं तो कभी भगत सिंह के लिए भी आदर्श रहे सावरकर में देशद्रोही दिखने लगता है। अच्छा हो कि पार्टी नेत्तृत्व अपने पागलपन का समय रहते स्वयं ईलाज कर ले अन्यथा भारत की जनता को अगर यह काम करना पड़ा तो इस बार तो शवयात्रा में साथ जाने के लिए 44 लोगों को जनता ने भेज भी दिया था शायद अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की अर्थी को कंधा देने के लिए चार सांसद भी शेष न बचें।

बुधवार, 23 मार्च 2016

ई थरूरवा भांग खा के भकुआईल है का?


मित्रों,होली मस्ती का त्योहार है,उमंग का महापर्व है। होली और भांग का सदियों से बड़ा ही गहरा संबंध रहा है। अब तो ज्यादातर लोग होली में फोकटिया दारू गटकने के चक्कर में रहते हैं जबकि पहिले सिर्फ भांग घोटने का ही प्रचलन था। हमारे एक दादाजी कहा करते थे कि भांग खाए भकुआए गाँजा पिए झुक्के,दारू पिए ... मरावे कुत्ता जईसन भुक्के। अब आप कहिएगा कि इस महान दोहे में हमने जो रिक्त स्थान छोड़ा है वहाँ क्या होगा तो अगर आप पूर्वी उत्तर प्रदेश या बिहार के हैं तो आप दोहे को पढ़ते ही पहली नजर में ही रिक्त स्थान की पूर्ति कर लेंगे। उन दादाजी का तो यह भी कहना था कि शराबियों की बातों पर कभी यकीन नहीं करना चाहिए क्योंकि उनके बाप का भले ही पता हो बात का पता नहीं होता।
मित्रों,हम बात कर रहे थे भांग की। उपरोक्त दोहा कहता है कि भांग खाने से लोग भकुआ जाते हैं। लेकिन हमको यकीन नहीं होता कि शशि थरूर भांग खाते होंगे। ऊ तो महंगी-महंगी विदेशी शराब का सेवन करते होंगे। भांग तो गरीबों का नशा है कि घर के पिछवाड़े में गए और दस गो पौधा उखाड़ लाए हर्रे लगे न फिटकिरी और रंग भी चोखा होए। भले ही थरूर जी भांग नहीं खाते होंगे लेकिन दोहा में शराबी लोग के भी कौन-सी बड़ाई की गई है। अब आप समझ गए होंगे कि थरूरवा काहे फागुन महीने में कुत्ते की तरह भौंकने लगा।
मित्रों,अब बात करते हैं होली की। होली है तो बात होली की ही होनी चाहिए थरूरवा जाए चूल्ही के भाँड़ में चाहे हाथी के ... में। वैसे तो बिहार के हर जिले के होली गीतों की अपनी विशेषता है लेकिन अपना गौरवशाली वैशाली जिला भी किसी से कम थोड़े ही है। वैशाली के गांवों में पहिले से सुबह में नाली साफ करने का कार्यक्रम चलता है। कीचड़ में सराबोर सफाईकर्मी लोग दूसरे लोगों को भी कीचड़ से सौंदर्यीकृत करते हैं। फिर दोपहर में लोग स्नान करते हैं। घर के कुछ लोग मीट-मुर्गा के जुगाड़ में सुबह-सुबह ही निकल जाते हैं और पीनेवालों को तो बस पीने का बहाना चाहिए और होली से अच्छा बहाना और कौन होगा सो पीनेवाले लोग जीजान से सुबह से ही पीना शुरू कर देते हैं। फिर शाम में दरवाजे-दरवाजे घूमकर होली गाई जाती है। होली की शुरुआत होती है गणेश वंदना से-पहिले सुमिर गणेश के,राम होरी हा मथुरा में बाजे बधाई। फिर बाबा हरिहर नाथ को याद किया जाता है-बाबा हरिहर नाथ सोनपुर में रंग खेले। फिर भगवान राम के गीत गाए जाते हैं-राम खेले होरी लछुमन खेले होरी,लंका गढ़ में रावण खेल होरी। उसके बाद होली के असली रस श्रिंगार रस से सराबोर गीतों की बारी आती है। भर फागुन बुढ़वा देवर लागे भर फागुन,होरी राम हो हो हो हो। फिर बुढ़वा जाईछऊ नेपाल अब कैसे रहबे बुढ़िया या फिर चोलिया बुटेदार ई रंग कहवाँ से लएलअ या गोरिया पातरी गोरिया पातरी जईसे लचके जमुनिया के डार या फिर बुढ़वा बड़ बईमान मांगेला बैगन के भर्ता। इन गीतों में मुख्य निशाने पर होते हैं गाँव के बड़े-बूढ़े लोग।
मित्रों,इस दौरान जिस दरवाजे पर गायन मंडली जमा रहती है उस घर की महिलाएँ बाल्टी और लोटे में भर-भरकर रंग लाती हैं और होली गायकों पर उड़ेलती रहती हैं। साथ ही सूखे मेवों का आपस में आदान-प्रदान होता है और सेब जैसे लाल गालों पर रंग-गुलाल मलने का सिलसिला तो चलता ही है। खास तौर पर नववधुओं,साला-सालियों या जीजाओं की तो जान पर ही बन आती है। गांव के दो-चार नए पियक्कड़ पीकर बकवास भी करते हैं जिससे खासकर बच्चों का खूब मनोरंजन होता है। रात में लोग जमकर मांस-मदिरा का भक्षण करते हैं और फिर सो जाते हैं होली की मधुर यादों को आँखों में लिए।
मित्रों,हम बात शुरू किए थे भांग और शशि थरूर के प्रसंग से और एक लोकप्रचलिए दोहे से। आप चाहें तो इस दोहे का नेताओं पर या दूसरे लोगों पर भी परीक्षण कर सकते हैं। जैसे जो नेता कम बोलते हैं लेकिन जब बोलते हैं तो उटपटांग ही बोलते हैं तो आप मान सकते हैं ऊ भांग घोटते हैं जैसे कि राहुल बाबा। जो नेता सदन में आकर सो जाते हैं उनके बारे में मान सकते हैं ऊ गाँजा पीते हैं और जो नेता कुत्ते की तरह आएँ-बाएँ भूँकते रहते हैं उनके बारे में आँख मूँदकर मान सकते हैं कि ऊ दारू पीते हैं वैसे ई काम तो लगभग सारे नेता ही करते हैं कुछ पार्ट टाईम और कुछ तो फुल टाईम। वैसे तो इस फार्मूले को आप सालोंभर आजमा सकते हैं लेकिन ई फार्मूला फागुन में ज्यादा काम करता है जब फगुनहट वाली मस्ती भरी हवा चलती है और आप तो जानते ही हैं कि होली के दिन तो किसी बात का बुरा मानना ही नहीं चाहिए क्योंकि इस दिन तो सब माफ होता है। तो हमको भी साल भर की बकवास के लिए माफ करिए और आज्ञा दीजिए काहे कि अब दरवाजे-दरवाजे होली गाने का समय हो गया है और हम गाते तो अच्छा हैं ही बजाते भी अच्छा हैं।

शनिवार, 19 मार्च 2016

वित्तीय अराजकता की ओर बढ़ा बिहार,नहीं खर्च हो पायी बजटीय राशि

पटना (सं.सू.)। सीएजी की रिपोर्ट ने साबित किया है कि बिहार कितनी तेजी से वित्तीय अराजकता के दौर में जा रहा है। एक लाख चालीस हजार करोड़ रुपये का बजट और 43 हजार करोड़ खर्च ही नहीं कर पाये तो ऐसे बजट का का क्या फायदा। ये 43 हजार करोड़ इस प्रदेश के गरीबों पर खर्च होने वाले थे जो खर्च नहीं हो पाये। ऐसी अराजकता तेजी से प्रशासनिक अराजकता में बदल जाती है। इसी अराजकता का नतीजा शिक्षा विभाग में दिखाई पड़ा है। वित्तरहित शिक्षकों का अनुदान चार साल से बाकी है, नियोजित शिक्षकों को वेतन नहीं मिल रहा है, स्कूलों के भवन खंडहर में बदल रहे हैं और विभाग विधायकों को मंहगे उपहार बांट रहा है।

विदित हो कि बिहार विधानसभा में शुक्रवार को सदन पटल पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की वित्तवर्ष 2014-15 की रिपोर्ट रखी गई। रिपोर्ट में सरकार के वित्तीय प्रबंधन को विफल बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार सरकार के वर्ष 2014-15 के कुल बजट 140022.59 करोड़ रुपये में से 27334.02 करोड़ रुपये वापस कर दिए गए।

बिहार विधानसभा में रिपोर्ट के पेश होने के बाद लेखाकार परीक्षक पी़ क़े सिंह ने संवाददाताओं को बताया कि 2014-15 के कुल बजट 140022.59 करोड़ रुपये में से सरकार 43925.80 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं कर पायी, जो सरकार के पूरे बजट का बड़ा हिस्सा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार ने खर्च के अनुपात में बहुत ज्यादा बजट बना लिया था, जिस कारण यह स्थिति आई। ऐसे में कुल 27334.02 करोड़ रुपये वापस कर दिए गए, इसमें से 22740.73 करोड़ रुपये 31 मार्च, 2015 यानी वित्तवर्ष के आखिरी दिन वापस किए गए।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस वित्तवर्ष में राजकोषीय घाटा 11178.50 करोड़ रुपये रहा जो पिछले वर्ष से 34 प्रतिशत ज्यादा था। रिपोर्ट में विभाग द्वारा खर्च के बिल नहीं दिए जाने की भी बात कहीं है।

लेखाकार परीक्षक ने बताया कि बिहार में पुल निर्माण में भी विलंब हो रहा है। उन्होंने कहा कि पांच वर्ष में 1252 पुलों के निर्माण का लक्ष्य था, जबकि मात्र 821 पुलों का ही निर्माण समय पर हुआ। 155 पुलों के निर्माण में एक से लकर 84 महीने तक का विलंब हो रहा है।

थैंक यू वेरी मच,नीतीश कुमार जी,मुख्यमंत्री बिहार।

मित्रों,यूँ तो जबसे मैंने करीब 35 साल पहले रामचरित मानस के वर्षा ऋतु वर्णन में जिमि पाखंडवाद से लुप्त होहिं सदपंथ पढ़ा कदाचित उसके भी पहले से पाखंडवाद का सख्त विरोधी रहा हूँ लेकिन बाद के वर्षों में नेताओं का पाखंडयुक्त व्यवहार और चिथड़ा ओढ़कर घी पीने की प्रवृत्ति को देखकर मेरा खून उबाल खाने लगा और फिर जैसे ही ब्लॉगिंग की शुरुआत हुई मैंने ब्लॉगिंग करना शुरू कर दिया। पहले अन्ना और केजरीवाल का समर्थन किया लेकिन उनके प्रति अपने मन में संदेह उत्पन्न होने के बाद नरेंद्र मोदी का खुलकर साथ दिया। मैं हमेशा से तटस्थता की नीति का घोर विरोधी रहा हूँ और राम को अपना आदर्श मानते हुए हमेशा अन्याय का बेखौफ होकर प्रतिकार किया है।
मित्रों,सबसे पहले मुझे ब्लॉगिंग में समस्या हुई 2014 के लोकसभा चुनावों के समय। तब नवभारत टाईम्स ने मेरे आलेखों को प्रकाशित करने से मना करना शुरू कर दिया। शायद,नरेंद्र मोदी का विरोध करना ही उस अखबार की नीति थी और आज भी है। मैने बार-बार की रोक-टोक से परेशान होकर नवभारत टाईम्स में लिखना ही बंद कर दिया।
मित्रों,पिछले साल बिहार विधानसभा चुनावों के समय एक दिन मैंने पाया कि मेरे ब्लॉगों की सूची से भड़ास गायब है। मैं स्तब्ध था क्योंकि कड़वा सच प्रकाशित करना ही उस ब्लॉग का घोषित उद्देश्य था। यूँ तो भड़ास के मालिक यशवंत की जेलयात्रा से भी मैं वाकिफ था तथापि भड़ास पर लिखने से रोक दिए जाने से मुझे गहरा धक्का लगा। जब तत्काल भड़ास 4 मीडिया वेबसाईट पर गया तो पाया वेबसाईट पर सबसे ऊपर नीतीश कुमार जी का प्रसिद्ध विज्ञापन बिहार में बहार हो नीतीशे कुमार हो लगा हुआ था। जाहिर था कि यशवंत को उन्होंने खरीद लिया था। इसके बाद यही विज्ञापन दैनिक जागरण की वेबसाईट पर भी विराजमान हो गया और उसके बाद से दैनिक जागरण ने मेरे किसी भी ब्लॉग को अपने अखबार में स्थान नहीं दिया। उस पर जले पर नमक यह कि किसी विरोधी ने मेरे अखबार हाजीपुर टाईम्स की वेबसाईट को ही हैक कर लिया।
मित्रों,इस बीच मैं आर्थिक संकट के दौर से भी गुजर रहा था इसलिए जनवरी से ही पटना की दौड़ लगानी शुरू कर दी। अपने उन मित्रों से भी बातचीत की जिनकी कभी मैंने कड़की के समय मदद की थी लेकिन सब बेकार। पटना के किसी भी बड़े अखबार ने मुझे नौकरी नहीं दी। दे भी क्यों जबकि मैं सीधे सीएम के निशाने पर हूँ। हालाँकि मैं अपनी माली हालत के चलते इन दिनों बेहद परेशान हूँ जिसके चलते मैंने बीच में लिखना काफी कम कर दिया था लेकिन अब मैंने फिर से देशहित में धड़ल्ले से लिखने का निर्णय किया है और नीतीश जी को खुली चुनौती देता हूँ कि जब तक मेरे जिस्म में खून की एक-एक बूंद बाँकी है कसम अपने पूर्वजों की भूमि महोबा की पवित्र मिट्टी की मैं आप और आपके जैसे चिथड़ा ओढ़कर घी पीनेवाले महापाखंडी,महाभ्रष्ट नेताओं के खिलाफ लिखता रहूंगा। नीतीश जी थैंक यू वेरी मच मेरे इरादों को और भी मजबूत करने के लिए। अगर आपमें दम है तो मुझे लिखने से पूरी तरह से रोक कर बताईए लेकिन इसके लिए आपको मेरी साँसें रोकनी पड़ेगी।

शनिवार, 5 मार्च 2016

अपनी सगी बहन का यौन शोषण करता था हसनैन

मुंबई (सं.सू.)। मुंबई से सटे ठाणे में अपने परिवार के 14 सदस्यों की हत्या करने के बाद खुदकुशी करने वाले हसनैन पर लाखों का कर्ज था। यही नहीं वह मानसिक रूप से बीमार अपनी बहन का शारीरिक शोषण भी करता था। यह बात इस हत्याकांड की इकलौती चश्मदीद और हसनैन की बहन सुबिया ने पुलिस को दिए अपने बयान में कही है।

ठाणे के कासरवडवली में हर शख्स यही सवाल पूछ रहा है कि क्या 35 साल का हसनैन सच में दोहरी ज़िंदगी जीता था, दुनिया के लिए अलग ...परिवार के लिए बिल्कुल जुदा। इस खौफनाक हत्याकांड की इकलौती चश्मदीद हसनैन की बहन सुबिया के बयान पर यकीन करें तो जवाब है ... हां। ठाणे के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर आशुतोष डुमरे के मुताबिक सुबिया ने अपने बयान में कहा है कि " हसनैन पर 70 लाख रुपये के करीब कर्ज था। वह दो साल से बेरोजगार था। स्वभाव से चिड़चिड़ा था, घर में दहशत थी बाहर शांत रहता था।"

सात बच्चों सहित 14 लोगों के कत्ल की इस कहानी के कई पेंच अब खुल रहे हैं। इसमें लाखों रुपये कर्ज से लेकर बहन के शारीरिक शोषण तक की कहानी है। आशुतोष डुमरे ने कहा " सुबिया ने हमें बताया कि हसनैन बैतुल का शारीरिक शोषण करता था, जिसकी हम पुष्टि करने की कोशिश कर रहे हैं। 6 फरवरी को एक शादी में सारी बहनें मिली थीं, हसनैन ने उन्हें बातें करते सुना था। उसे लगता था कि उन्होंने रिश्तेदारों को भी यह बात बताई होगी।"

हसनैन ने ठाणे के माजीवाड़ा में भी एक फ्लैट किराये पर ले रखा था लेकिन पुलिस को वहां कुछ संदेहास्पद नहीं मिला है। फिलहाल वह हसनैन की बहन सुबिया के बयानों को सबूतों की कसौटी पर कसने में जुटी है।

कन्हैया को किससे और कैसी आजादी चाहिए?


मित्रों,आजादी किसे अच्छी नहीं लगती? फिर वो पशु हो,पक्षी हो या इंसान लेकिन कभी-कभी हम पाते हैं कि फिल्म बंटी और बबली के एक दृश्य जैसी हास्यास्पद स्थिति भी उत्पन्न कर दी जाती है या हो जाती है। आपको याद होगा कि फिल्म में हीरो बंटी ताजमहल को ही बेच डालता है। मंत्री समय पर कार्यालय न पहुँचें इसके लिए वो कुछ किराये के नारेबाजों को ठीक करता है जो मंत्री की गाड़ी के आगे जमकर नारेबाजी करते हैं। हमारी मांगें पूरी करो चाहे जो मजबूरी हो। मंत्री गाड़ी रोककर पूछती है कि आप लोगों की मांगें क्या हैं लेकिन वे लोग कोई मांग नहीं बताते और बार-बार वही नारा दोहराते रहते हैं।
मित्रों,ठीक यही स्थिति इस समय जेएनयू में है। वहाँ पहले तो नारा लगाया गया कि हमें भारत से आजादी चाहिए और अब नारा लगाया जा रहा है कि हमें भारत में आजादी चाहिए लेकिन यह नहीं बताया जा रहा है कि आजादी किससे चाहिए और किस बात की आजादी चाहिए? ऐसी कौन-सी आजादी है जो अन्य लोगों को तो प्राप्त है लेकिन जेएनयू में पढ़नेवाले चंद लोगों को प्राप्त नहीं है। बल्कि उन्होंने तो खुद ही अन्य भारतवासियों से ज्यादा आजादी ले रखी है। वे सरेआम दिनदहाड़े सामूहिक चुम्मा-चाटी का कार्यक्रम करते हैं और उसको किस ऑफ लव का नाम देते हैं। गोया जो लोग पर्दे में किस करते हैं उनके बीच आपस में प्यार होता ही नहीं है। अगर उनको सरेआम इससे ज्यादा करने की आजादी चाहिए तो वे हम भारतवासियों को माफ ही करें क्योंकि हम आए दिन स्वच्छंदता के दुष्परिणामों से जुड़ी खबरें पढ़ते ही रहते हैं। कई बार तो गैंगरेप की घटनाओं के पीछे दुल्हे के साथ-साथ बारातियों द्वारा भी सुहागदिन मना डालने की मंशा छिपी होती है।
मित्रों,फिर हम इंसान हैं कोई कुत्ता या बकरी नहीं कि कहीं भी कुछ भी शुरू कर दिया। अगर कन्हैया एंड कंपनी को इस तरह की आजादी चाहिए तो वे किसी और मुल्क जहाँ साम्यवादी शासन है का रूख कर सकते हैं। बाँकी तो भारत के आम नागरिकों की तरह उनको भी मत डालने का,सरकार बनाने का अधिकार प्राप्त है ही नारेबाजी करने का भी अधिकार मिला हुआ है लेकिन एक दायरे के भीतर। देशविरोधी और देशविभाजक नारे लगाने का अधिकार,आतंकवादियों का समर्थन करने या समर्थन में कार्यक्रम आयोजित करने का अधिकार न तो किसी को दिया गया है न ही दिया जा सकता है,न तो रोहित वेमुला को था और न ही कन्हैया को है क्योंकि जब देश है तो हम हैं। क्योंकि हमारी सीमाओं पर रोज-रोज दर्जनों जवान देशरक्षा में शहीद होते हैं और वे इसलिए शहादत नहीं देते कि कोई राजधानी दिल्ली में उनके महबूबे वतन के टुकड़े करने के समर्थन में नारे लगाए। क्योंकि देश के करदाता इसलिए कर अदा नहीं करते के कोई उनकी गाढ़ी कमाई के पैसों से दी गई सब्सिडी पर पलकर और पढ़कर उनके ही देश के सर्वनाश के उद्देश्य से कार्यक्रमों के आयोजन करे।
मित्रों,दरअसल कन्हैया एंड कंपनी और कुछ नहीं बंटी और बबली गिरोह है। उनके पास न तो कोई ठोस दर्शन है और न ही तर्क उनको तो बस नारेबाजी करनी है। वैसे अगर जैसा कि वे लोग दावा कर रहे हैं कि वे भी देशभक्त हैं तो उनको केंद्र सरकार के लोककल्याणकारी कार्यों का,देश को विकसित बनानेवाले कदमों का समर्थन करना चाहिए। अगर उनको सरकार की किसी योजना या काम में कोई कमी महसूस होती है तो उसको मुखरित होकर देश-दुनिया और सरकार के सामने उठाना चाहिए लेकिन उनको अगर देश को हजार टुकड़ों में बाँटने का नारा लगाना है तो कृपया वे जेएनयू ही नहीं भारत से बाहर चले जाएँ। क्योंकि अगर वे भारत में ऐसा करेंगे तो टुकड़े भारत के नहीं होंगे उनके नापाक ईरादों के होंगे। कह तो हम यह भी सकते हैं कि उनके होंगे लेकिन हम उनकी तरह हिंस्र पशु नहीं हैं और हिंसा में विश्वास नहीं करते।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

वाराणसी से रूम के 600 रुपये दिए बिना ही निकल लिए केजरीवाल

वाराणसी (सं.सू.)। रविदास जयंती पर काशी पहुंचे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल स्पेशल सुइट का किराया दिए बिना ही वापस लौट गए। केजरीवाल पर सुइट के 600 रुपये देने अभी बाकी हैं। लेकिन यह चुकाए बिना ही वह वहां से निकल गए।

इससे पहले आप और बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच हुई मारपीट-पथराव मामले में दोनों तरफ से लंका थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई है। सोमवार को संत रविदास जयंती के मौके पर बनारस आए दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल का काफिला नेवादा इलाके से गुजरते समय आप व बीजेपी कार्यकर्ता भिड़ गए थे। आप के जिला संयोजक अब्दुल्ला खान की ओर से दी गई तहरीर पर पुलिस ने बीजेपी पार्षद के पति विनीत सिंह, अजय गुप्ता, किशोर, अजित सिंह, रंजीत सिंह और गोलू के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है। अब सुइट के 600 रुपये दिए बिना ही वापस आने पर विरोधियों को उन्हें घेरने का एक और मिल गया है।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

बिहार में किसका राज,कानून का या राजवल्लभों का?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैंने करीब दो साल पहले एक आलेख लिखा था 'मेरी सरकार खो गई है हुजूर'। वह आलेख भी बिहार और बिहार की कथित सरकार के बारे में था। तब से लेकर आज तक मुझे बिहार में सरकार की तलाश थी जो अब समाप्त हो गई है। क्योंकि उसकी जगह राज्य में अब नई सरकार आ गई है-अपराधियों की सरकार। इस सरकार में न तो कोई कोर्ट है,न ही कोई सुनवाई होती है,फैसला ऑन द स्पॉट,फटाफट।
मित्रों,दीगर अहवाल यह है कि जबसे बिहार में नई सरकार का गठन हुआ है बिहार में अपराधियों की तो जैसे बहार ही आ गई है और बिहार के मुख्यमंत्री इन दिनों कौआ टरटराता है और धान सूखता रहता है नामक अतिप्रसिद्ध बिहारी कहावत को चरितार्थ करने में लगे हैं। मुख्यमंत्री जी लगभग रोजाना पुलिस अधिकारियों के साथ कानून-व्यवस्था को लेकर मीटिंग कर रहे हैं और रोजाना बिहार की स्थिति और भी बुरी से बुरी होती जा रही है। अब यह भी लगने लगा है कि या तो मुख्यमंत्री सिर्फ दिखावे के लिए मीटिंग करते हैं या फिर इतने कमजोर हो गए हैं कि दारोगा तक पर भी उनकी डाँट-फटकार का कोई प्रभाव नहीं हो रहा। मगर सवाल उठता है कि नीतीश कुमार जी ऐसा क्यों कर रहे हैं या बिहार में ऐसा क्यों हो रहा है?
मित्रों,अभी भी बृजनाथी के हत्यारों का कोई अता-पता नहीं है। सत्तारूढ़ दल का कोई विधायक लड़की का अपहरण कर रहा है तो कोई ट्रेन में छेड़खानी तो कोई 30000 रू. में अपनी सबसे छोटी संतान से भी छोटी लड़की खरीदकर रातभर पोर्न वीडियो देख-देखकर बलात्कार कर रहा है। इधर,नीतीश कुमार जी जाहिर तौर पर तो राज्य में कानून का राज होने की माला जप रहे हैं लेकिन हो यह रहा है कि बारी-बारी से उन सभी बिगड़ैल विधायकों से संबंधित मामलों की लीपा-पोती कर दी जा रही है। पहले सिद्धार्थ,फिर सरफराज और अब राजवल्लभ। लगता है जैसे पुलिस और सरकार का एकमात्र कार्य सत्तारूढ़ दल के अपराधी विधायकों की सेवा करना है। कानून के रखवाले कानून तोड़नेवालों को ही कानून के शिकंजे से बचाने में लगे हैं लेकिन मुख्यमंत्री जी का हमेशा की तरह मानना,कहना यही है कि राज्य में कानून का राज था, है और रहेगा। नीतीश कहते हैं कि बलात्कारी राजवल्लभ यादव को स्पीडी ट्रायल चलाकर सजा दिलवाई जाएगी लेकिन उनकी सरकार राजवल्लभ को पकड़ती ही नहीं है या पकड़ ही नहीं पाती है फिर कैसे चलेगा स्पीडी ट्रायल?
मित्रों,नीतीश जी चाहे जितनी भी गलथेथरी (कुतर्क देना) करते रहें वास्तविकता तो यही है कि राज्य में इन दिनों अगर सबसे ज्यादा कोई लाचार है तो वह यह बेचारा कानून-व्यवस्था ही है। रोज ही राज्य में कानून-व्यवस्था के साथ छेड़खानी हो रही है,अपहरण हो रहा है,हत्या हो रही है और बलात्कार हो रहा है और करनेवाले कोई और नहीं बल्कि नीतीश कुमार के समर्थक विधायक ही है। बिहार इन दिनों जंगलराज एक बार फिर से जंगलराज की चपेट में है। एक बार फिर से बिहार में कानून का नहीं बल्कि राजवल्लभों का राज है।

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

क्या नीतीश विपक्षविहीन बिहार का निर्माण कर रहे हैं?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जैसी कि हमने 8 नवंबर को मतों की गिनती के दिन ही अपने आलेख में भविष्यवाणी की थी कि अब बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति इतनी बुरी होनेवाली है कि लोग लालू-राबड़ी राज यानि जंगलराज को भी भूल जाएंगे। यूँ तो नई सरकार के शपथ-ग्रहण करने के पहले से ही राज्य में अपराधियों का तांडव शुरू हो गया था लेकिन अब जो हो रहा है वह अगर यूँ ही चलता रहा तो निकट भविष्य में बहुत जल्दी ही बिहार विपक्षविहीन हो जाएगा क्योंकि सारे विपक्षी नेताओं की हत्या करवा दी जाएगी,कर दी जाएगी।
मित्रों,लोकतंत्र में विपक्ष का भी अपना महत्त्व होता है। विपक्ष सत्ता पक्ष को निरंकुश होने से रोकता है लेकिन लगता है कि लंबे समय तक विपक्ष की राजनीति कर चुके लालू-नीतीश को बिहार में विपक्ष चाहिए ही नहीं। तभी तो सत्ता पक्ष द्वारा कदाचित पृष्ठपोषित अपराधी एक के बाद एक विपक्षी नेताओं की हत्या करते जा रहे हैं। आश्चर्य का विषय तो यह है कि राघोपुर में 1995 से ही लालू-राबड़ी परिवार के खिलाफ लगातार चुनाव लड़नेवाले बृजनाथी सिंह की राजधानी पटना में एके-47 से सरेआम दिनदहाड़े हत्या कर दी जाती है और बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव जो अभी राघोपुर से विधायक भी हैं बयान देते हैं कि लोजपा में अपराधियों की भरमार है। सवाल उठता है कि अपराधी किस पार्टी में नहीं हैं? सवाल यह भी उठता है कि जो राजनेता सीधे-सीधे अपराधी नहीं हैं क्या वे बेड़ा-मौका काम आने के लिए अपराधियों का लालन-पालन नहीं करते? आखिर ऐसे कौन-से लोग बृजनाथी सिंह की हत्या के पीछे थे कि हत्या के दस दिन बाद भी पुलिस ने कोई गिरफ्तारी नहीं की है और अंधेरे में ही तलवार भाँज रही है? क्या यह हत्या सीधे-सीधे बिहार के उपमुख्यमंत्री ने करवाई है? उपमुख्यमंत्री ने हत्या के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है उससे तो यह शक और भी पुख्ता हो जाता है।
मित्रों,इतना ही नहीं पिछले 48 घंटों में एनडीए के दो और ऐसे नेताओं की हत्या 'अज्ञात' अपराधियों द्वारा कर दी गई है जिन्होंने पिछले दिनों संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में महागठबंधन के खिलाफ चुनाव लड़ा था। इनमें से एक तो मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष भी थे और एक समय लालू के हनुमान रहे शिवानंद तिवारी के बेटे राहुल के खिलाफ चुनाव लड़े थे। इनकी हत्या के बाद भी राहुल तिवारी की प्रतिक्रिया ठीक वैसी ही रही जैसी कि बृजनाथी सिंह की हत्या के बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री की थी। इन श्रीमान् का कहना था कि मरनेवाले की पृष्ठभूमि को भी देखना चाहिए। तो क्या सत्तापक्ष ने इस तरीके से बिहार को अपराधमुक्त बनाने का निर्णय लिया है? क्या कोई शरीफ या बिना राजनैतिक पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति बिहार में चुनाव जीत सकता है? क्या राहुल तिवारी के पिताजी या खुद राहुल तिवारी ने शाहपुर विधानसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में अपराधियों को प्रश्रय नहीं दे रखा है? अपराधियों का पालन ठीक लेकिन अपराधियों का चुनाव लड़ना गलत यह कौन-सा नैतिक सिद्धांत है?
मित्रों,मैं पूछता हूँ कि क्या नीतीश कुमार या तेजस्वी यह बताएंगे कि ये दोनों हत्याएँ किसने की और पुलिस उनको कब तक गिरफ्तार कर लेगी? या फिर उन्होंने बिहार के अपराधियों को विपक्षी नेताओं का आखेट करने की खुली छूट दे दी है जैसी छूट भारतीयों को मारने की कभी अंग्रेजों को प्राप्त थी या फिर जैसी कि राज्य में नीलगायों के बारे में हाल में दी गई है? अगर ऐसा है तो मुबारक हो भारतीय लोकतंत्र को न्याय के साथ विकास! और वर्ष 2020 के विधानसभा चुनावों में सभी सीटों पर निर्विरोध जीत के लिए महागठबंधन को अग्रिम बधाई! आज मैं बिहार की महान जनता को कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि जब उसने विकास और विनाश में से विनाश का पथ प्रचंड बहुमत से चुना है तो फिर राज्य का विनाश ही होगा। बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय!

शनिवार, 23 जनवरी 2016

लालू जी के मामले में कानून अपना काम क्यों नहीं करेगा नीतीश जी?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिेंह। मित्रों,हम वर्षों से यह पढ़ते चले आ रहे हैं कि अंग्रेजों की भारत को सबसे बड़ी देन देश में कानून का शासन और कानून के समक्ष समानता है। आपको याद होगा कि जब बिहार के निवर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नया-नया मुख्यमंत्री बने थे तब कानून-व्यवस्था से संबंधित प्रत्येक मामले में उनका एक ही रटा-रटाया उत्तर होता था कि कानून अपना काम करेगा। कानून ने अपना काम भी किया था और बिहार की कानून-व्यवस्था की स्थिति में एक लंबे समय के बाद सुधार देखने को मिला था।
मित्रों,लेकिन अभी दो-तीन दिन पहले उन्हीं नीतीश कुमार की सरकार ने पिछले साल बिहार बंद के दौरान राजद कार्यकर्ताओं द्वारा तोड़-फोड़,मारपीट और कानून के उल्लंघन से संबंधित मामलों को वापस ले लिया है। चूँकि इन मामलों में आरोपी रहे लालू प्रसाद यादव और उनके बेटे अब उनके गठबंधन और उनकी सरकार में हैं इसलिए नीतीश कुमार जी ने इस मामले यह नहीं कहा कि कानून अपना काम करेगा बल्कि उनके द्वारा लिए गए निर्णय का लब्बोलुआब यह था कि इस मामले में कानून अपना काम नहीं करेगा क्योंकि वे कानून को अपना काम करने ही नहीं देंगे।
मित्रों,दूसरी तरफ जदयू विधायक सरफराज आलम के मामले में लालू-नीतीश-तेजस्वी-तेजप्रताप सभी एक स्वर में कह रहे हैं कि विधायक के खिलाफ कानूनसम्मत कार्रवाई होनी चाहिए। अगर हम दोनों घटनाक्रम को एक साथ जोड़कर देखें तो हमारी समझ में आ जाएगा कि अब नीतीश कुमार जी का कहना है कि कानून उन्हीं मामलों में अपना काम करेगा जिन मामलों में वे चाहेंगे कि वो अपना काम करे और जिन मामलों में वे नहीं चाहेंगे कि कानून अपना काम नहीं करे कानून अपना काम नहीं करेगा। घटनाक्रम को देखकर आसानी से विश्वास नहीं होता कि ये वही नीतीश कुमार जी हैं जिन्होंने कभी राज्य में कानून का शासन स्थापित करने के लिए काफी लंबी लड़ाई लड़ी थी।
मित्रों,इस प्रकार हम पाते हैं कि नीतीश कुमार की सरकार कानून के समक्ष समानता के संवैधानिक अधिकार का तो उल्लंघन कर ही रही है साथ ही कानून के शासन का भी खुलकर मजाक उड़ा रही है। कहने को तो वे और उनके गठबंधन और सरकार के साझीदार एक स्वर में कह रहे हैं कि राज्य में कानून का शासन है और रहेगा लेकिन वास्तविकता यही है कि राज्य में कानून का शासन है ही नहीं,मनमाना शासन है। अब जब मुख्यमंत्री और कैबिनेट ही कानून के शासन और कानून के समक्ष समानता के मौलिक सिद्धान्त की खिल्ली उड़ा रहे हैं तो फिर निचले स्तर पर क्यों नहीं अधिकारी खिल्ली उड़ाएंगे? फिर क्यों नहीं घूसखोरी और रसूखदारी का बाजार गर्म होगा? संस्कृत में कहा भी गया है कि महाजनो येन गतः स पंथाः अर्थात् बड़े लोग जिस मार्ग का अनुशरण करते हैं बाँकी लोग भी उसी मार्ग पर चलते हैं।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

रोहित की कायरता पर छाती पीटनेवाले सावन पर खामोश क्यों?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बंगाल और असम का चुनाव सिर पर है। ऐसे में पुरस्कार-सम्मान लौटाऊ गैंग और कथित पंथनिरपेक्ष मीडिया का आर्तनाद फिर से प्रारंभ हो गया है। इस बार इन भारतविरोधियों ने इसके लिए बहाना लिया है हैदराबाद में आत्महत्या जैसी सबसे बड़ी कायरता का प्रदर्शन करनेवाले कथित दलित रोहित का। बिहार चुनाव के बाद अर्द्धनिद्रा में चले गए धूर्त बुद्धि से अटे-पटे और अक्ल से हीन शकुनिसदृश लोग फिर से अपने रंग में आकर रंगभूमि में पधार चुके हैं।
मित्रों,मैं अपने पहले के आलेखों में भी इन मक्कारों की पोल खोलता रहा हूँ। आप भी जानते-मानते हैं कि आत्महत्या से बड़ी कोई कायरता हो ही नहीं सकती। भले ही आप 84 लाख योनियों में भटकने के शास्त्रीय सिद्धांत को नहीं मानें लेकिन इतना तो जरूर मानेंगे कि जीवन अनमोल होता है और यूँ ही खो देने के लिए नहीं होता। संघर्ष तो राम को भी करना पड़ा था,राजा हरिश्चंद्र को भी करना पड़ा था फिर हम किस खेत की मूली हैं। फिर हमें यह भी देखना चाहिए कि खुदकुशी करनेवाले की विचारधारा क्या थी,उसकी सोंच कैसी थी।
मित्रों,यह अबतक जगजाहिर हो चुका है कि रोहित वेमुला चाहे वो पिछड़ी जाति से आता हो या दलित जाति से ओवैसी जैसे भारतविरोधियों के गंदे हाथों का खिलौना था। ब्रेनवॉश करके उसके मन में अपने ही पंथ के प्रति इस कदर जहर भर दिया गया था कि वो हिन्दुओं को देखना तक पसंद नहीं करता था। यहाँ तक वह इस कदर मानसिक विकृति का शिकार था कि जाने-अनजाने में याकूब मेनन जैसे आतंकवादियों का न केवल प्रशंसक बल्कि भक्त बन चुका था।
मित्रों,आश्चर्य है कि फिर भी वोट-बैंक की गंदी राजनीति करनेवाले लोग उसके लिए हाय-हाय कर रहे हैं। वोट-बैंक की राजनीति की पहली शर्त ही यही होती है कि उस वोट-बैंक से आनेवाला व्यक्ति चाहे कितना ही गिरा-पड़ा क्यों न हो उनका पृष्ठपोषण करना है और दूसरा पक्ष चाहे पीड़क की जगह पीड़ित ही क्यों न हो उसकी उपेक्षा या उसका विरोध करना है। कुछ इसी तरह के कार्य इशरत जहाँ की मौत के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया था जिससे लाभ उठाकर वे तीसरी बार मुख्यमंत्री भी बन चुके हैं।
मित्रों,इसी दौरान पुणे के पंढ़रपुर में भी एक घटना घटी है। आत्महत्या की नहीं नृशंस हत्या की जिसको देखकर जंगली,हिंसक पशुओं को भी शर्म आ जाए लेकिन छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी गिद्ध तो बहुत पहले ही शरमोहया को तिलांजलि दे चुके हैं। सावन राठौड़ नामक एक 17 साला महादलित युवक नाली साफ करने के दौरान 13 जनवरी को पुणे के बिठोबानगरी पंढ़रपुर में सड़क किनारे पेशाब कर रहा था। तभी इब्राहिम महबूब शेख,जुबेर तंबोली (26) और इमरान तंबोली (28) ने उससे पूछा कि वो हिंदू है या मुसलमान और हिंदू बताते ही उनलोगों ने घनघोर असहिष्णुता और क्रूरता का परिचय देते हुए बिना किसी पूर्व परिचय के पूर्व शत्रुता की दूर की बात रही पहले तो पटककर उसको पेट्रोल पिलाया और फिर आग लगा दी।
मित्रों,पुणे के सासून अस्पताल में घर से बाप से झगड़ाकर भागे गरीब ने दो दिन बाद दम तोड़ दिया। उसके पिता एक ईट भट्ठे में मजदूरी करते हैं। पीड़ित ने मरने से पहले अपने आखिरी बयान में जो कहा है बस उतना ही कहा है जितना ऊपर हमने आपको बताया। लेकिन आश्चर्य है कि रोहित वेमुला की कायरता पर चीत्कार करने वाले लोग सावन के परिवार के आस-पास भी नहीं फटक रहे हैं। खैर उनको तो लगता है कि सावन के घर जाने से छोटे वोटबैंक के चक्कर में बड़ा वोटबैंक नाराज हो जाएगा। लेकिन आश्चर्य तो इस बात को लेकर है कि महाराष्ट्र में सरकार चला रही भाजपा भी इस घनघोर सांप्रदायिक घटना को कानून-व्यवस्था से संबंधित छोटी घटना बता रही है जबकि उसको यह अच्छी तरह से पता है कि उसको मुसलमानों ने न कभी वोट दिया है और न कभी देंगे।
मित्रों,मेरा हमेशा से ऐसा मानना रहा है कि हिंदुस्तान को असली खतरा मुसलमानों से नहीं है,न ही पाकिस्तान या चीन से हैं बल्कि उन हिंदुओं से है जो क्षुद्र स्वार्थ के वशीभूत होकर देशहित में नहीं सोंचते हैं और छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी,भेदभावपूर्ण व्यवहार करने लगते हैं और करने लगे हैं। जिनको दादरी तो दिखाई देती है लेकिन मालदा और पूर्णिया नजर नहीं आते। मैं यह नहीं कहता कि दादरी की घटना की प्रशंसा की जानी चाहिए लेकिन मैं यह भी नहीं कहता कि मुसलमानों को हिंदुओं को चिढ़ाने के लिए खुलेआम सरेबाजार गोवध करना चाहिए। खाने के लिए उनके खुदा ने इतनी चीजें दी हैं क्या वे उसमें से केवल एक का त्याग नहीं कर सकते? यहाँ मैंने उनके खुदा शब्द का प्रयोग न चाहते हुए भी इसलिए किया क्योंकि पिछले सप्ताह मिस्र की एक विद्वान महिला मुसलमान प्रोफेसर ने कहा है कि उनका खुदा मुसलमानों को गैरमुस्लिम महिलाओं के साथ गैंग रेप करने की ईजाजत देता है। पता नहीं उनका खुदा हमारे भगवान से कब और कैसे अलग हो गया जो दया को ही धर्म कहता है,अपनी स्त्री के अलावे सारी स्त्रियों को माता मानने की हिदायत देता है। वैसे पता नहीं भारत के छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी हिंदुओं का कौन-सा वो खुदा है जो कहता है कि आत्मघाती रोहित के लिए हल्ला बोल दो और वास्तविक पीड़ित सावन के परिवार के आसपास भी नहीं फटको क्योंकि उनका अगर कोई भगवान होता तो वे यकीनन इसका उलट कर रहे होते।

बुधवार, 20 जनवरी 2016

छाती पीटिए क्योंकि नीतीश सरकार काम कर रही है


वैधानिक चेतावनी-यद्यपि यह रचना व्यंग्य नहीं है तथापि अगर पढ़ते समय या पढ़ने के बाद आपको लगे कि यह व्यंग्य ही है तो इसे हम आपकी कृपा समझेंगे।
हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आप कहेंगे कि जब नीतीश सरकार काम कर रही है तो ताली पीटना चाहिए छाती क्यों पीटें? लगता है आप नहीं समझे आजकल वाला विकास के बिहार मॉडल को। पहले वाला मॉडल भाजपा का था अब वाला भाई-भतीजा का है। नीतीश जी का अपना कोई मॉडल न पहले था और न अब है। जब जिसके साथ रहे तब उसका वाला मॉडल ले लिए।
मित्रों,पहले नीतीश जी की सहयोगी भाजपा मानती थी कि सुशासन स्थापित करने से और विकास करने से वोट मिलता है। वोट मिला भी 2010 के विधानसभा चुनाव में नीतीश और भाजपा दोनों को मिला। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को ज्यादा मिला और नीतीश जी को कम। मतलब यह कि जिसका विकास मॉडल था लोग बिहार की लगभग सब सीट भी उसी को दे दिया।
मित्रों,तब नीतीश जी का माथा ठनका और वो होश में आ गए। सारा भ्रम टूट गया कि जिसको लोग बिहार का विकास मॉडल कहते हैं वो उनका था। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद नीतीश जी के पास न तो वोट था और न ही कोई मॉडल ही बचा था। तब उन्होंने लालू जी से संपर्क किया जिनके पास उनसे ज्यादा वोट भी था और एक विकास का मॉडल भी था जिसको एक समय नीतीश जी भी विनाश का मॉडल,जंगलराज और आतंकराज कहते थे।
मित्रों,लेकिन अब स्थितियाँ अलग थीं। नीतीश जी लंबे समय से सत्ता में थे और किसी भी कीमत पर बिहार के राजपाठ को हाथ से जाना नहीं देना चाहते थे। अबतक वे अच्छी तरह से समझ चुके थे कि न तो विकास का कोई मतलब होता है और न ही विकास मॉडल का असली सार तो सत्ता में बने रहने में हैं। फिर चाहे इसके लिए घिनौने बड़े भैया की गोद में बैठना पड़े या फिर शरारती-बदनाम भतीजों को अपनी गोद में बैठाना पड़े।
मित्रों,आपको याद होगा कि साल 1990 से 2005 तक लालू-राबड़ी स्टाईल बिहार मॉडल से कैसे बिहार का विकास हुआ था। जनता का एक वर्ग जो साध था छाती पीट रहा था और दूसरा वर्ग जो अपराधी था वो पहले वर्ग को पीट रहा था। ताली सिर्फ लालू-राबड़ी और उनके दरबारी पीट रहे थे। अब नीतीश कुमार जी अगर कहते हैं कि जितनी छाती पीटनी है पीटिए हम तो अपना काम करेंगे तो इसका कोई और मतलब नहीं निकालिए। उनके कहने का मतलब बस इतना है कि 1990 से 2005 तक जो लोग छाती पीट रहे थे एकबार फिर से पीट सकते हैं उनको फर्क नहीं पड़ता क्योंकि अब उनके साथ ताली पीटने के लिए वे सारे लोग आ गए हैं जो उस महान् कालखंड में ताली पीट रहे थे। और जब छाती और ताली पीटनेवाले मौजूद हैं तो फिर जबतक छाती पीटनेवालों को पीटनेवाले नहीं हों तो विकास का मॉडल पूरा कैसे होगा,अधूरा नहीं रह जाएगा? सो अब बिहार में खून-तून सब माफ होगा लेकिन नीतीश जी बस इतना ही गुनगुनाते रहेंगे कि आबो हवा बिहार की बहुत साफ है, कायदा है कानून है इंसाफ है,अल्ला मियाँ जाने कोई जिए या मरे,बिहार में खून-तून सब माफ है। इसे ही तो कहते हैं कानून के राज के साथ-साथ न्याय के साथ विकास भी और गरीबों का राज भी। अब बिहार में कोई जंगलराज नहीं बोलेगा और नीतीश जी के सामने तो हरगिज नहीं क्योंकि इस शब्द को बिहार में प्रतिबंधित कर दिया गया है। बोला नहीं कि गया बेट्टा!!! कहाँ जाने की बात हो रही है अगर जानना है तो पहले उस बस वाले से पूछिए जो बस के पीछे लिखवाए हुए है कि लटकले त गेले बेटा।