रविवार, 12 मार्च 2017

यूपी की जीत के सबक

मित्रों,बहुत पुरानी कहावत है कि जो जीता वही सिकंदर.

अर्थात सफलता सारे अवगुणों को छिपा देती है.यह कहावत अपनी जगह सही है लेकिन एक और कहावत है जिसे हम सीख का नाम भी दे सकते हैं कि फूलो मत भूलो मत. मतलब कि सुख में फूलो मत और दुःख के दिनों को भूलो मत.वैसे बुद्धिमान लोग जीत से भी सबक लेते हैं और मूर्ख हार से भी नहीं लेते.
मित्रों,हम जानते हैं कि अभी भारतीय जनता पार्टी फूले नहीं समा रही है.उसने उत्तर प्रदेश में अद्भूत, अविश्वसनीय, अभूतपूर्व और अकल्पनीय जीत दर्ज की है.भविष्य में कोई दल या गठबंधन यूपी में ऐसी जीत दर्ज कराएगा या नहीं यह तो भविष्य में ही पता चलेगा लेकिन भूतकाल में तो निश्चित रूप से ऐसा नहीं हुआ था.दुनिया के अधिकतर देशों से ज्यादा जनसंख्या को धारण करनेवाले उत्तर प्रदेश में बहुमत प्राप्त करना ही बड़ी उपलब्धि होती है फिर इस तरह की एकतरफ़ा जीत!!!निश्चित रूप से भाजपा बधाई की पात्र है.जीत का जश्न मनाने में कुछ भी गलत नहीं लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ४ अन्य राज्यों में भी चुनाव हुए थे और उनमें से २ में भाजपा सत्ता में थी.उनमें से एक पंजाब में पार्टी की करारी हार भी हुई है.गोवा में भी पार्टी हारी है फिर भी ईज्ज़त बचा ले गयी है.इन पाँचों राज्यों के चुनाव-परिणामों का अगर हम विश्लेषण करें तो आसानी से देख सकते हैं कि इन राज्यों में कहीं-न-कहीं सत्ता-विरोधी लहर चल रही थी और इसलिए चल रही थी क्योंकि जनता से किए गए वादों में से शतांश को भी पूरा नहीं किया गया था.
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि इन चुनावों से सबक लेते हुए भाजपा को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड समेत उन सभी राज्यों में वादों पर खरा उतरना पड़ेगा जहाँ उसकी पहले से सरकार है या अब जहाँ बनने जा रही है.यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार खुद शराब बेचने की फ़िराक में है जबकि उसके १3 सालों के शासन के बावजूद राज्य के एक बड़े हिस्से पर नक्सलियों का आतंक कायम है.कल एक तरफ भाजपा जीत के जश्न मना रही थी तो वहीं दूसरी ओर कल ही भाजपा-शासित छत्तीसगढ़ में हमारे १७ जवानों को मौत के घाट उतार दिया गया.
मित्रों,राजनैतिक दांव-पेंच अपनी जगह हैं और उनका भी अपना महत्व है लेकिन देशहित सर्वोपरि है.सौभाग्यवश मोदी जी ने नेशन फर्स्ट को अपना ध्येय वाक्य घोषित भी कर रखा है.भ्रष्टाचार की समाप्ति की दिशा में जब मोदी सरकार को नोटबंदी जैसा छोटा कदम उठाने पर इतना विराट जनसमर्थन मिल सकता है तो सोंचिए कि तब क्या होगा जब सरकार बड़े कदम उठाएगी.
मित्रों,तुलसी बाबा कहते हैं कि प्रभुता पाई कोऊ मद नाहीं.अभी तक जिस तरह मोदी सरकार काम कर रही है उससे ऐसा तो लगता नहीं कि उसमें सत्ता का मद घर कर पाया है.फिर अभी तो भारत-निर्माण शुरू ही हुआ है.अभी देश और सरकार को बहुत-बहुत-बहुत लम्बा रास्ता इस दिशा में तय करना बांकी है.काम बहुत कठिन है और समय बहुत कम क्योंकि ६७ साल के मोदी जी अनंतकाल तक न तो जवान ही रहनेवाले हैं और न ही जीवित.जनता के धैर्य का तो कहना ही क्या? निस्संदेह रफ़्तार बढ़ानी होगी.

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

लोकतंत्र की विडंबना हैं बिहार-उत्तर प्रदेश

मित्रों,इन दिनों उत्तर प्रदेश में चुनावी मौसम चल रहा है और कांग्रेस,सपा और आधुनिक मुद्राराक्षस पीके की तरफ से फिर से बिहार को दोहराने का प्रयास चल रहा है.कांग्रेस एक बार फिर से अपनी बर्बादी की कीमत पर प्रधानमंत्री को नीचा दिखाना चाहती है.आजकल कांग्रेस की बस इतनी ही रणनीति और ध्येय रह गया है.यह कांग्रेस न तो नेहरूवाली है और न ही इंदिरा-राजीव या नरसिंह राव वाली बल्कि यह इटलीवाली है जो जब १० साल तक सत्ता में थी तब भी देश को सिर्फ नुकसान पहुँचा रही थी और जब अब विपक्ष में है तब भी नुकसान पहुँचा रही है.वास्तविकता तो यह है कि यह सोनिया वाली इटालियन कांग्रेस भारतविरोधी ताकतों के हाथों का मोहरा बनकर रह गयी है.
मित्रों,आज एक समय में विश्व इतिहास और गणतंत्र का पालना रहे बिहार और उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र की क्या हालत है?कल जब बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की पुण्यतिथि पर पुष्पांजलि अर्पित कर रहे थे तब एक युवक जो पटना जिले का ही रहनेवाला था उनसे मिलने की कोशिश कर रहा था.बेचारे की बहन की ईज़्ज़त को दबंगों ने तार-तार कर दिया था और पुलिस केस दर्ज करने के लिए पैसे मांग रही थी.एक भाई जिसकी ज़िन्दगी को एक गाली बना दिया गया हो उसको मुकदमा दर्ज तक करवाने के लिए मुख्यमंत्री के यहाँ फरियाद लगानी पड़े इससे बड़ी विडंबना उस लोकतंत्र के लिए और क्या हो सकती है जिसको किताबों में जनता का,जनता द्वारा और जनता के लिए शासन बताया जाता है.
मित्रों,उत्तर प्रदेश की स्थिति तो और भी विचित्र है.वहाँ तो बलात्कार को मामूली ग़लती माना जाता है और ऐसी ग़लती मंत्री भी करते रहते है.हास्यस्पद तो यह है कि मंत्री का नाम प्रजापति है यानी प्रजा के रक्षक. वहाँ तो मंत्री के ऊपर केस दर्ज करवाने के लिए पीडिता को सर्वोच्च न्यायालय जाना पड़ता है.जाहिर है कि इन दिनों उत्तर प्रदेश में गुण्डों का,गुण्डों द्वारा और गुण्डों के लिए शासन है.
 मित्रों,पता नहीं आज कर्पूरी या लोहिया जीवित होते तो क्या प्रतिक्रिया करते लेकिन इतना तो तय है कि इस समय जो शासन बिहार और उत्तर प्रदेश में है वो किसी भी दृष्टि से लोकतंत्र नहीं है.बिहार में भ्रष्टतंत्र है और उत्तर प्रदेश में गुंडातंत्र.बिहार के लोग तो गलती कर चुके हैं मगर क्या उत्तर प्रदेश के लोग भी वही गलती करने की गलती करेंगे? इसी तरह से बिहार में भी बिहारी और बाहरी का वितण्डावाद खड़ा किया गया था लेकिन आज आम बिहारी कहाँ है और उसकी ईज़्ज़त कहाँ है?थाने के बाहर उसको नंगा करके खड़ा कर दिया गया है कथित सू शासन की उपलब्धि के रूप में. शायद अगली बार सुप्रीम कोर्ट में जाने के बाद भी कार्रवाई तो दूर एफआईआर तक दर्ज न हो.

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

पहले बीएसईबी, अब बीएसएससी, नेक्स्ट?



मित्रों,कई साल पहले २०११ की बात है.तब हमें बिहार सचिवालय सहायक परीक्षा जो बीएसएससी लेती थी देने बेगुसराय जाना था.एक दिन पहले ही हम बेगुसराय पहुँच गए.परीक्षा अच्छी जानी थी सो गयी.आखिर हम आईएएस के साक्षात्कार तक फेस किए अभ्यर्थी थे.उधर से वापस हाजीपुर आने में हमारी हालत ख़राब हो गयी.ट्रेन में इतनी भीड़ कि पेशाब करने तक जाना मुश्किल ही नहीं असंभव जैसा था.किसी तरह से हम हाजीपुर पहुंचे.
मित्रों,परीक्षा के कुछ ही दिन बाद हमारा एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से मिलने जाना हुआ.हमने जब उनसे बताया कि हमने ये परीक्षा दी है जो काफी अच्छी भी गयी है तो उन्होंने सीधे-सीधे कहा कि आप कतई पास नहीं होने जा रहे हैं क्योंकि सारी सीटें बेचीं जा चुकी हैं.जब रिजल्ट आया तो उनका कहा सच साबित हुआ.मैं क्या करता?हाथ में कलम थी मन में गुस्सा सो बिहार कर्मचारी आयोग है या बिहार कुर्मी चयन आयोग शीर्षक से एक आलेख ब्रज की दुनिया पर लिख डाला.
मित्रों,जाहिर था कि आयोग में सारा खेल सीएम की मर्जी से खेला जा रहा था इसलिए कोई प्रभाव नहीं हुआ.लेकिन वो कहते हैं न कि पाप का घड़ा एक-न-एक दिन भर जाता है सो एक दिन इंटर आर्ट्स की बिहार टॉपर का मामला मीडिया के सामने आ गया और सामने आ गयी सुशासन की मखमली कालीन के नीचे छिपी हुई सड़ांध.जाँच की आंच बोर्ड के अध्यक्ष लालकेश्वर तक पहुँच गयी और पता चला कि नीतीश के लाल सह दलाल लालकेश्वर के सर पर स्वयं सुशासन बाबू का हाथ था.धीरे-धीरे घोटाले में जेल गए सारे लोग सरकार की मिलीभगत से बाहर भी आने लगे हैं.लालकेश्वर भी आ जाएँगे और मीडिया चीखती-चिल्लाती रह जाएगी.
मित्रों,बीएसईबी के बाद पाप का घड़ा भरा बीएसएससी का.इंटरस्तरीय परीक्षा से पहले ही उत्तर सोशल मीडिया पर वाईरल हो गया.इस बार भी सचिव तक घोटाले के तार पहुँच चुके हैं और श्रीमान जेल भेजे जा चुके हैं लेकिन सवाल उठता है कि हर डाल पर उल्लुओं को बिठाया किसने है?पूर्व मुख्यमंत्री मांझीजी कई बार कह चुके हैं कि बिहार में धडल्ले से अध्यक्ष और सचिव की कुर्सियां बेचीं जाती हैं.कहते हैं कि अगलगी में कुत्ते नहीं जलते ठीक उसी तरह जब कोइ घोटाला उजागर होता है तो अध्यक्ष या सचिव को कुछ दिनों के लिए पकड कर अन्दर कर दिया जाता है और सुशासन बाबू का बाल भी बांका नहीं होता. पता नहीं अगली बार किस विभाग के पाप का घड़ा भरकर फूटनेवाला है? जस्ट वेट एंड वाच.

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

शुभस्य शीघ्रम मोदी जी.


मित्रों,दूरदर्शी सरकार का दूरंदेशी बजट आ चुका है.बजट में एक तर खेती-किसानी को फिर से लाभकारी व्यवसाय बनाने पर जोर दिया गया है तो वहीँ दूसरी ओर देश की आधारभूत संरचना के विकास के साथ-साथ रोजगार-सृजन पर भी पर्याप्त बल दिया गया है.लेकिन अगर आम बजट की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है तो वो एक खास प्रावधान के लिए जो इस सरकार को निश्चित रूप से पूर्ववर्ती सरकारों से अलग करता है और वह प्रावधान यह है कि अब देश के राजनैतिक दलों को २००० रु. से ज्यादा चंदा लेने पर उसका हिसाब देना होगा.यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूं कि अब तक यह सीमा २०००० रु. की थी और हमारे देश में राजनैतिक दलों को मिलनेवाले चंदे में से ८५ प्रतिशत २०००० रु. से कम होते हैं.यहाँ मैं आपको यह भी बता दूं कि बहुजन समाज पार्टी तो शत-प्रतिशत चंदा २०००० रु. से कम की राशि में प्राप्त करती है अर्थात हिसाब देने की जरुरत ही नहीं.
मित्रों,लेकिन सवाल उठता है कि राजनैतिक दलों को २००० रु. तक का चंदा नकद में और बिना हिसाब-किताब के लेने की छूट दी ही क्यों जाए जबकि सरकार पूरे आर्थिक कारोबार को यथासंभव कैशलेस बनाना चाहती है?रास्ता बतानेवाले को आगे तो चलना पड़ेगा.भ्रष्टाचार की गंगा को अगर सुखाना है तो पहले गंगोत्री को भ्रष्टाचारविहीन करना होगा और वह गंगोत्री हैं राजनैतिक दल.पहले ही केंद्र सरकार की सिफारिश पर चुनाव आयोग ऐसे सैंकड़ों पंजीकृत राजनैतिक दलों की मान्यता रद्द कर चुका है जिन्होंने कभी चुनाव ही नहीं लड़ा और जिनका धंधा ही चंदा लेकर कालेधन को सफ़ेद बनाना था.
मित्रों,अगर दिल पर हाथ रखकर कहें तो आज से चार-पांच साल पहले हम भ्रष्टाचार को लेकर पूरी तरह से निराश हो चुके थे और ऐसा मानने लगे थे कि चंदा प्राप्त करने के मामले में सारे राजनैतिक दल एक-से हैं.हमने मान लिया था कि इस मामले में कभी पारदर्शिता आ ही नहीं सकती क्योंकि ऐसा भी कहीं होता है कि बिल्ली खुद ही अपने गले में घंटी बांध ले.लेकिन सौभाग्यवश वर्तमान केंद्र सरकार ने इस दिशा में प्रचलित मान्यता को विखंडित करने का साहस किया है.लेकिन क्या २०००० की सीमा को २००० में बदल देना काफी होगा?क्या ऐसा कर देने से सारी पार्टियाँ ईमानदार हो जाएंगी? नहीं ऐसा लगता तो नहीं है.फिर क्यों नहीं राजनैतिक दलों के चंदों को पूरी तरह से कैशलेस कर दिया जाए?सौभाग्यवश कमोबेश बांकी के सारे दल भी इस मामले में सरकार का समर्थन कर रहे हैं.तो फिर देरी किस बात की है?शुभस्य शीघ्रम.पता नहीं फिर ऐसा अवसर आए न आए.
मित्रों,इतना ही नहीं सरकार को चाहिए कि राजनैतिक दलों के लिए न सिर्फ आय का शत-प्रतिशत ब्यौरा देना अनिवार्य कर दे बल्कि व्यय का हिसाब देना भी जरूरी कर दिया जाए.जनता को पता तो चले कि राजनैतिक दल चंदे में प्राप्त भारी-भरकम राशि का करते क्या हैं.

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

देश को देखो जाति न देखो

मित्रों,बिहार में एक नेता हुए हैं कर्पूरी ठाकुर.परसों-तरसों उनकी जयंती भी थी.श्रीमान जब चुनाव प्रचार में जाते तो लोगों से कहते कि वोट बेटी जात को.श्रीमान के बारे में कहा जाता था कि भारी ईमानदार थे.होंगे भी लेकिन उन्होंने यह नारा देकर बिहार प्रदेश और देश को जरूर भारी नुकसान पहुँचाया.उनका साध्य भले ही ठीक हो लेकिन साधन गलत था.
मित्रों,कर्पूरी जी को मरे हुए आज २९ साल बीत चुके हैं.१९९० से ही यूपी-बिहार पर उनके चेलों का शासन है.लेकिन आज यूपी-बिहार है कहाँ.चुनाव देश-प्रदेश को विकास के मार्ग पर ले जाने का साधन होता है न कि किसी खास जाति के व्यक्ति को एमएलए-एमपी या मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री बनाने का.जातिवादी नेता अपने परिवार की उन्नति के लिए काम करते हैं न कि जाति की. बिहार में लंबे समय तक लालू परिवार का शासन रहा है लेकिन मेरे शहर हाजीपुर में ही यादव लोग अगर एक दिन मजदूरी करने नहीं जाएँ तो शाम में चूल्हा ठंडा रह जाए.ऊपर आसमान नीचे पासवान का नारा देनेवाले रामविलास पासवान की जाति के लोग आज भी हाजीपुर में रिक्शा-ठेला खींच रहे हैं.स्वयं कर्पूरी की जाति के लोगों की दशा भिखारियों जैसी है. हालाँकि कर्पूरी के बेटे जरूर राज भोग रहे हैं और अरबपति हो गए हैं.इसी तरह राजपूतों ने १९८९ में जाति के नाम पर वीपी सिंह को एकतरफा वोट दिया था,क्या मिला?
मित्रों,कहने का मतलब यह है कि जो भी नेता जाति के नाम पर राजनीति कर रहे हैं वे हमें उल्लू बनाकर सिर्फ अपना उल्लू सीधा करते हैं.सवाल उठता है कि चुनावों में हम देश-प्रदेश चलाने के लिए शासक चुनते हैं या दामाद जो जाति को वोट दें? जब हम दामाद चुनेंगे तो फिर दामाद ही मिलेगा वो भी सिर्फ लूटनेवाला. आज भी जब कोई यूपी-बिहार का युवा मुम्बई-अहमदाबाद नौकरी करने जाता है तो उसे हिकारत की नजरों से देखा जाता है. आखिर हम क्यों जाते हैं मुम्बई-अहमदाबाद? क्यों हमारा प्रदेश आज भी उद्योग-विहीन है? क्या इसलिए नहीं क्योंकि हम लंबे समय से विकास की जगह जाति के नाम पर वोट डालते आ रहे हैं?
मित्रों,एक और बात.यूपी में सारी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने मुस्लिम वोट बैंक को ध्यान में रखकर टिकट बांटे हैं. यह कैसी धर्मनिरपेक्षता है? कोई मुस्लिम तुष्टीकरण करे तो धर्मनिरपेक्षता और कोई सर्वधर्मसमभाव की बात करे तो साम्प्रदायिकता? मैं पहले भी ताल ठोंक के कह चुका हूँ कि देश की चिंता अगर कोई कौम करेगा तो वो हिन्दू होगा मुसलमानों के लिए कभी भी नेशन फर्स्ट नहीं रहा है इंडिया फर्स्ट की तो बात ही दूर है.मैं आज फिर से डंके की चोट पर कहता हूँ कि अगर हम यूपी-बिहार के हिन्दू ऐसे ही दामाद जी को वोट देते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हर शहर हर बस्ती में धूलागढ़ और कैराना होगा.वैसे भी इन समाजवादियों की नज़रों में हमारी बेटियों की ईज़्ज़त की क्या कीमत है शरद यादव कर्पूरी जयंती के दिन अर्ज कर चुके हैं.आज पूरी दुनिया में भारत का झंडा फहरा रहा है और जनाब फरमाते हैं कि देश की ईज़्ज़त खतरे में है.

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

सिर्फ़ बीपीएल को मिले आरक्षण

मित्रों,प्रत्येक चुनाव की तरह पिछले कई दिनों से एक बार फिर से आरक्षण का मुद्दा गरमाया हुआ है.लोग कहते हैं कि काठ की हांड़ी एक बार ही आग पर चढ़ती है लेकिन कई अन्य चुनावी मुद्दों की तरह इसे भी बार-बार चुनावी चूल्हे पर चढ़ाया जाता रहा है.बिहार चुनावों से लेकर अब तक के अंतराल को अगर देखें तो आपने ध्यान दिया होगा कि इस बीच आरक्षण की पैदाईश लालू प्रसाद यादव जी जुबान पर एक बार भी आरक्षण शब्द नहीं आया.लेकिन यूपी चुनाव के आते ही फिर से वे शहीदी मुद्रा  में आ गए हैं. 
मित्रों,वास्तविकता तो यह है कि आरक्षण आज आर्थिक सशक्तिकरण से ज्यादा भ्रष्ट नेताओं के सशक्तिकरण का हथियार बना दिया गया है. वास्तविकता तो यह भी है कि वर्तमान काल में आरक्षण से इसके वास्तविक जरूरतमंदों को लाभ हो ही नहीं रहा है बल्कि इससे फायदा वे लोग उठा रहे हैं जो पिछड़ी और दलित जातियों में पैसेवाले हैं. फिर चाहे वो नौकरियों में आरक्षण हो या चुनावों में.
मित्रों,अच्छा तो रहता कि उपरोक्त दोनों तरह के आरक्षणों के लिए लाभार्थियों के निर्धारण के मानदंड को ही बदल दिया जाता.जिनका नाम बीपीएल सूची में हो केवल उनको ही आरक्षण का लाभ मिले.मायावती जैसी दौलत की बेटियाँ सामान्य सीट से चुनाव लड़ें। साथ ही बीपीएल सूची का निर्माण भी पूरी सावधानी से करना होगा अन्यथा क्रीमी लेयर की अवधारणा की तरह ही ये भी बेकार हो जाएगा.
मित्रों,अगर ऐसा किया जाता है तभी आरक्षण का कोई मतलब होगा. हालाँकि मैं जानता हूँ कि यह एक आदर्श स्थिति है और ऐसा हो पाना नामुमकिन तो नहीं लेकिन मुश्किल जरूर है. इसका सबसे बड़ा फायदा तो यह होगा कि जाति और धर्म-आधारित राजनीति का भारत से अंत हो जाएगा.

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

नोटबंदी में चैम्पियन रहा यूको बैंक,इलाहाबाद बैंक सबसे फिसड्डी

मित्रों,यह स्वाभाविक था कि जब ८ नवम्बर को नोटबंदी की घोषणा की गयी तो हाजीपुर में भी पैसों के लिए अफरातफरी का माहौल उत्पन्न हो गया.खुद हमारे पास भी तब हजार-१२०० से ज्यादा के खुल्ले नहीं थे.मैं भी ९ तारीख को नोट बदलने पहले प्रधान डाकघर फिर एसबीआई की मुख्य शाखा में गया लेकिन भारी भीड़ देखकर हिम्मत जवाब दे गयी.संयोगवश ८ नवम्बर को ही पिताजी का पेंशन आया था और हमलोग वो पैसा भी घर बनाने के लिए बैंक से निकाल चुके थे पर उसमें भी सिर्फ हजार और पांच सौ के नोट थे.सो मरता क्या न करता मैंने फिर से वो सारा पैसा और साथ ही गाँव की जमीन को बेचने से आया पैसा अपने बैंक अकाउंट में डाल दिया.फिर कसमकश शुरू हुई खाते से पैसा निकालने की.दुर्भाग्यवश शुरू के कई दिनों तक एसबीआई की मुख्य शाखा,यूको बैंक के एटीएम को छोड़कर सारे-के-सारे एटीएम बंद और खाली थे.इस दौरान मैंने यूको बैंक की गुदरी बाज़ार शाखा से कई बार पैसे निकाले.अभी तक मैंने यूको बैंक से न तो चेकबुक और न ही डेबिट कार्ड ही लिया था सो आनन-फानन में आवेदन दिया.दोनों ही चीजें मुझे तत्काल उपलब्ध भी करवा दी गईं.इस दौरान मैंने आईसीआईसीआई की हाजीपुर शाखा से भी कई बार पैसे निकाले.यहाँ हालाँकि यूको बैंक के मुकाबले ज्यादा भीड़ रहती थी लेकिन मुझे कभी खाली हाथ लौटना नहीं पड़ा.इस दौरान मैंने जमकर कार्ड से खरीदारी की और चेक का भी भरपूर उपयोग किया.
मित्रों,जब २००० के नोट बैंकों में आने लगे तो एक्सिस बैंक के एटीएम में भी नियमित रूप से पैसा निकलने लगा.इस दौरान मैंने पाया कि नोटबंदी के तत्काल बाद इलाहाबाद बैंक की आरएन कॉलेज शाखा में भीतर से ताला बंद कर दिया गया और ग्राहकों से लगातार कई हफ्ते तक कहा गया कि बैंक में नकद आ ही नहीं रहा है.कदाचित इस दौरान मैनेजर अपने निकटतम लोगों को खुश करने में लगा हुआ था.कई लोगों को मैंने देखा कि वे सुबह में ही आ जाते और फिर दिन ढलने के बाद उदास मन से वापस चले जाते.इनमें से कई तो वयोवृद्ध पुरुष और महिलायें भी होते थे. लगभग सारे बैंकों के ग्राहक सेवा केन्द्रों में जिन ग्राहकों के खाते थे वे और भी ज्यादा परेशान रहे.इस दौरान स्टेट बैंक में काफी भीड़ रही लेकिन फिर भी उसका काम सराहनीय रहा.
मित्रों,बैंक किसी भी अर्थव्यवस्था की धमनी होते हैं और भारत भी इसका अपवाद नहीं है.मैं पहले भी अर्ज कर चुका हूँ कि बिहार के प्रति बैंकों का व्यवहार हमेशा से सौतेला रहा है.लेकिन इसके लिए बैंकों के बिहारी स्टाफ भी कम जिम्मेदार नहीं हैं जो ग्राहकों के साथ भिखारियों जैसा व्यवहार करते हैं और रिश्वत की उम्मीद करते हैं.

रविवार, 22 जनवरी 2017

नेशन फर्स्ट से इंडिया फर्स्ट की ओर प्रयाण



मित्रों,आपने अगर अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के शपथ-ग्रहण के बाद दिए गए पहले संबोधन को देखा-सुना होगा तो एक बात पर जरूर गौर किया होगा कि उन्होंने देशवासियों से एक बार फिर से अमेरिका को दुनिया का सिरमौर बनाने की दिशा में कार्य करने की अपील की.
मित्रों,सौभाग्यवश आज भारत में भी एक ऐसा स्वप्नदर्शी प्रधान सेवक है जो नेशन फर्स्ट की बात करता है.परन्तु सिर्फ नेशन फर्स्ट की बात करने से काम नहीं चलनेवाला है.वह समय आ गया है जब भारत भी नेशन फर्स्ट से इंडिया फर्स्ट की ओर प्रस्थान करे.सोंचनेवाली बात यह है कि अगर अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति बन सकता है तो भारत क्यों नहीं बन सकता? भारत के पास ऐसा क्या नहीं है जो अमेरिका के पास है? मानव संसाधन से लेकर प्राकृतिक संसाधन तक प्रत्येक मामले में हमारा भारत प्राचीन काल से ही धनी रहा है.अगर हमारे पास कोई कमी है तो वो है जोश,ईमानदारी,एकता और निःस्वार्थता की और इन सब कमियों को पूरा करने के लिए हमें अपने ज्यादा-से-ज्यादा देशवासियों में नेशन फर्स्ट का जज्बा भरना होगा.दो-चार प्रतिशत लोग तो हर देश में यहाँ तक कि अमेरिका में भी हमेशा-से देशविरोधी रहे हैं.
मित्रों,जब हम २०१४ के लोकसभा चुनाव् के परिणामों को देखें तो हमें मानना ही पड़ता है कि आज भी देश की बहुसंख्यक जनसंख्या की प्राथमिकता सूची में कहीं-न-कहीं देश मौजूद है भले ही पहले स्थान पर नहीं हो.अगर केंद्र सरकार वास्तव में भारतीयों के लिए देश को सर्वोच्च स्थान पर लाना चाहती है तो उसे लगतार ऐसे कदम उठाने पड़ेंगे जिससे ऐसा प्रतीत होता रहे कि वो वास्तव में नेशन फर्स्ट की नीति पर पूरी गंभीरता के साथ अग्रसर है.जिस दिन सवा सौ करोड़ भारतीयों में से सौ करोड़ लोगों के लिए राष्ट्र सर्वोपरि हो जाएगा भारत के दुनिया में सर्वप्रथम होने का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाएगा बस जरुरत पड़ेगी देश को सही दिशा देने की.तब किसी नरश्रेष्ठ नरेन्द्र को न तो राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनावों के लिए चिंता करनी पड़ेगी और न ही लोकसभा चुनाव परिणामों की.

सोमवार, 16 जनवरी 2017

मेरी सरकार मर गयी है हुजूर



मित्रों,मैंने ६ मार्च,२०१४ को एक आलेख लिखा था जिसका शीर्षक था मेरी सरकार खो गयी है हुजूर. यद्यपि वह आलेख भी मैंने बिहार सरकार की घनघोर अकर्मण्यता से परेशान होकर लिखा था तथापि उन दिनों मैं परेशान केंद्र सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार और उसकी देशविरोधी नीतियों से भी था. नरेन्द्र मोदी जी और भारत की जनता-जनार्दन की कृपा से इन दिनों केंद्र में तो जरूर एक ऐसी सरकार आ गयी है जो सिर्फ और सिर्फ देश की भलाई के लिए काम कर रही है लेकिन बिहार में अभी भी न सिर्फ स्थिति वही है जो ६ मार्च,२०१४ को थी बल्कि उस समय की तुलना में और भी ख़राब ही हो गयी है.
मित्रों,हमारे गाँवों में जब कोई घर छोड़कर भाग जाता है और १२ सालों तक वापस नहीं आता है तो गाँव के लोग मान लेते हैं कि वो मर गया होगा और तब उसका श्राद्ध कर दिया जाता है. पता नहीं सरकार के लापता हो जाने के कितने दिनों के बाद मान लेना चाहिए कि सरकार मर गयी है. शास्त्र और स्मृति भी इस बारे में खामोश हैं. वैसे बिहार सरकार में मृतकों वाले सारे लक्षण मौजूद जरूर हैं. अब कोई डीका नौकरशाही द्वारा मुन्नीबाई के कोठे में बदल दिए गए अंबेकर छात्रावास में दुष्कर्म के बाद मार दी जाती है और प्रशासन पूरे मामले की लीपा-पोती कर देता है, गुजरात की देखा-देखी राज्य सरकार पतंग-उत्सव का आयोजन तो कर लेती है लेकिन लोग आयोजन-स्थल पर कैसे आएंगे-जाएंगे का इंतजाम नहीं करती और जब कई दर्जन परिवार तबाह हो जाते हैं तो बलि का बकरा गरीब-लाचार नाववाले को बना देती है. मार्च,२०१४ में लोग-बाग़ हमसे कहा करते थे कि बिहार की नौकरशाही इन दिनों सिर्फ मीडिया से ही डरती है. मगर आज स्थिति यह है कि राजदेव रंजन की दिनदहाड़े हत्या के बाद वो मीडिया का भय भी उसके मन से जाता रहा. मतलब कि अब बिहार की सरकार पूरी तरह से संवेदनहीन हो चुकी है.
मित्रों,कहने का मतलब यह है कि अबतक जो सरकार उलटी सांस ले रही थी उसकी पूरी तरह से मौत हो चुकी है. अब बिहार में ऐसी कोई संस्था नहीं रही जो जनता को नौकरशाही के क्रूर दमन-चक्र से बचा सके. अब तो हालत ऐसी है कि हम मीडियावाले खुद ही अफसरशाही से डरने लगे हैं. ऐसा भी नहीं है कि बिहार के लोग इस बात से अनभिज्ञ हैं कि ऐसा परिवर्तन कैसे आया. सीधी-सी बात है कि जब राजा ने ही मीडिया पर ध्यान देना बंद कर दिया है और उसे बेकार में कांव-कांव करनेवाला कौआ मानकर पूरी तरह से अनसुना करना शुरू दिया है तो फिर अफसरशाही क्योंकर उसे भाव देगी. लेकिन राजा साब यह भूल गए हैं कि यह मीडिया को उनके द्वारा दिया जानेवाला महत्व ही था जो उसके शासन को जीवंत बनाता था. बात इतनी होती तो फिर भी गनीमत थी लेकिन अब तो लगता है कि राजा साब ने मीडिया को अपना हितैषी तो दूर दुश्मन ही मानना शुरू कर दिया है. कदाचित राजा साब खुद को सचमुच में चुना हुआ नुमाईन्दा मानने के बदले राजा मानने लगे हैं. इतना ही नहीं वे लुई १४वें की तरह यह भी मानने लगे हैं कि वे हीं राज्य हैं और उनके कहे शब्द ही कानून. आगे मैं यह नहीं कह सकता कि बिहार में कब क्रांति होगी और किस रूप में और किस तरह होगी लेकिन होगी तो जरूर लुई १४वें न सही १६वें के समय ही सही लेकिन बास्तिल का किला ढहेगा,जरूर ढहेगा.