बुधवार, 16 अप्रैल 2014

क्या एशिया का सबसे बड़ा बूचड़खाना कपिल सिब्बल की पत्नी का नहीं है?

16-04-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। क्या कपिल सिब्बल को हिंदू माना जा सकता है? कानून उनको या उनकी पत्नी को भले ही एशिया का सबसे बड़ा कत्लखाना खोलने से नहीं रोकता है लेकिन एक हिन्दू होने के नाते क्या उनको ऐसा करना चाहिए था? वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के समय श्री सिब्बल द्वारा दायर किए गए हलफनामे से पता चलता है साहिबाबाद स्थित एशिया का सबसे बड़ा बूचड़खाना जिसका नाम पहले अरिहंत एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड था की मालकिन कोई और नहीं बल्कि केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल की पत्नी है। हालाँकि इस बार के हलफनामे में श्री सिब्बल ने इसका जिक्र न जाने क्यों नहीं किया है जिसकी शिकायत भाजपा ने चुनाव आयोग से की भी है।
विदित हो कि सबसे पहले यह गोवधशाला तब चर्चा में आया था जब इसका नाम अरिहंत एक्सपोर्ट प्राइवेट रखे जाने के खिलाफ जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज ने ऐलान किया था कि वो २ अक्टूबर.2013 को अहमदाबाद मे लाखों लोगों की बड़ी रैली निकालेंगे और कांग्रेस को वोट न देने की अपील करेंगे। बाद में 16-17 सितंबर को दैनिक भास्कर में एक समाचार प्रकाशित हुआ जिसमें केप इंडिया के संयोजक डॉ.संदीप जैन ने एक बयान जारी कर केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल की पत्नी प्रोमिला सिब्बल द्वारा खोले गए बूचडख़ाने का नाम बदलने को जैन समाज की जीत बताया। डॉ.जैन ने बताया कि यह कारखाना साहिबाबाद में है और इसकी कंपनी अरिहंत एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड का कार्यालय दिल्ली में है। उन्होंने बताया कि 24 जैन तीर्थंकरों को अरिहंत के नाम से जाना जाता है, इसलिए यह शब्द जैन धर्म में पूजनीय है। मांस के व्यापार वाली कम्पनी के नाम से अरिहंत शब्द जुडऩे से जैन समाज की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंच रही थी।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

मेरे कर्जदार हैं सांसद-पत्रकार हरिवंश

15-04-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बात वर्ष 2010 की है। गर्मियों के दिन थे। मैं काफी परेशान था। अपनी छोटी बहन की शादी किए 1 साल से भी ज्यादा समय हो चुका था लेकिन अभी तक मेरी अपनी शादी का कहीं अता-पता नहीं था। अगुआ-वरतुहार (वर की तलाश में भटकनेवाले लड़कीवाले) आते और चले जाते। किसी की लड़की की तस्वीर हमें पसंद नहीं आती तो कोई हमारी बेरोजगारी देखकर खिसक लेता। तभी पिताजी ने सुझाव दिया कि कहीं नौकरी क्यों नहीं कर लेते।
मित्रों,तभी मेरे एक अभिन्न मित्र मीता ने बताया कि इस समय मुजफ्फरपुर में प्रभात खबर की यूनिट खुलने जा रही है। सीधे प्रधान संपादक हरिवंश जी बात करिए,काम हो जाएगा। मैं बात की तो मुझे यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वे मुझे जानते हैं और मेरी ब्रज की दुनिया के प्रशंसक भी हैं। उन्होंने मुझे राँची मिलने के लिए बुलाया। रातभर ट्रेन की सीट पर बैठे जागते-सोते हम सावन की रिमझिम फुहारों का आनंद लेते सहरसा-हटिया ट्रेन से राँची पहुँचे। रूकना मेरे मित्र धर्मेन्द्र कुमार सिंह के यहाँ रातु रोड में था। फ्रेश होकर हम प्रभात खबर कार्यालय के लिए रवाना हुए। वहाँ हमारा टेस्ट लिया गया जो मुझे बुरा भी लगा। फिर एचआर विभाग में पूछा गया कि कितना वेतन चाहिए। मैंने बताया दस हजार कम-से-कम। एचआर प्रधान ने कहा कि पिछले एक साल से आपकी आमदनी शून्य रुपया है तो फिर आपको हम इतना क्यों दें? मैंने छूटते ही कहा आपकी मर्जी। फिलहाल तो मुझे भूख लगी हुई है कोई होटल बताईए। उन्होंने झटपट प्रभात खबर के कैंटिन में फोन किया और कहा कि एक व्यक्ति को भेज रहा हूँ खाना खिला देना। मैंने टोंका जनाब जरा गौर से देखिए हम एक नहीं दो हैं और दूसरे ने भी सुबह से कुछ खाया नहीं है। उन्होंने कृपापूर्वक फिर से फोन किया। जब हम खाना खाने के बाद हरिवंश जी से मिलने गए तो उन्होंने कहा कि कुछ दिन बाद हम फोन करके आपको सूचना देंगे। रास्ते में धर्मेन्द्र ने बताया कि प्रभात खबर कई बार नौकरी के लिए ईच्छुक उम्मीदवारों को यात्रा-भत्ता भी देता है। मैंने कहा नहीं दिया तो नहीं दिया हमें तो नौकरी चाहिए।
मित्रों,कई दिनों तक जब फोन नहीं आया तो मैंने फिर से हरिवंशजी को फोन मिलाया तब उन्होंने एक नंबर दिया और बात करने को कहा। वह नंबर किसी मोहन सिंह का था जिनको अखबार लांच करने के लिए मुजफ्फरपुर भेजा गया था। नौकरी शुरू हुई। तब प्रभात खबर कार्यालय जूरन छपरा,रोड नं.1 मुजफ्फरपुर में था। कार्यालय क्या था कबाड़खाना था। कार्यालय में पर्याप्त संख्या में कुर्सियाँ तक नहीं थीं। लोग कंप्यूटर पाने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते रहते। वहाँ कई पुराने मित्र भी कार्यरत मिले और कई नए मित्र बने भी। हम घंटों फर्श पर पालती मारकर कंप्यूटर और कुर्सी के खाली होने का इंतजार करते। तब अखबार की छपाई शुरू नहीं हुई थी,प्रशिक्षण चल रहा था।
मित्रों,कार्यालय में न तो शुद्ध पेयजल था और न ही शौचालय में बल्ब। गंदा पानी पीने के चलते मेरा स्वास्थ्य लगातार गिरने लगा। फिर भी मैंने दो महीनों तक जमकर काम किया। इस बीच अगस्त या सितंबर में अखबार की छपाई भी शुरू हो गई। पहले दिन मुजफ्फरपुर पर विशेष परिशिष्ट प्रकाशित हुआ जो पूरी तरह से सिर्फ और सिर्फ मेरे द्वारा संपादित था।
मित्रों,तक कार्यलय में न तो किसी की हाजिरी ही बनती थी और न ही किसी को वेतन ही मिलता था। वहाँ के एचआर हेड से बात करता तो वो कहते कि आपके कागजात राँची भेज दिए गए हैं अभी वहाँ से कोई उत्तर नहीं आया है। सहकर्मियों ने बताया कि उनके कागजात के तो 6 महीने से उत्तर नहीं आए हैं। अब मुझे नौकरी करते दो महीने से ज्यादा हो चुके थे मगर वेतन का कहीं अता-पता नहीं था। नौकरी थी भी और नहीं भी। न कहीँ कोई नियुक्ति-पत्र और न ही कोई अन्य प्रूफ। कार्यालय का गंदा पानी पीने से मेरी तबियत भी बिगड़ती चली गई और अंत में मैंने निराशा और खींज में नौकरी छोड़ दी।
मित्रों,मुझे लगा कि पटना,हिन्दुस्तान की तरह प्रभात खबर भी खुद ही पहल करके मेरे दो महीने का वेतन दे देगा। इससे पहले जब मैंने पटना,हिन्दुस्तान की नौकरी छोड़ी थी तब हिन्दुस्तानवालों ने कई महीने बाद फोन करके बुलाकर मुझे मेरा बकाया दे दिया था। मगर यहाँ तो देखते-देखते तीन साल हो गए। न उन्होंने सुध ली न मैंने मांगे। फिर अगस्त,2013 में मुझे पैसों की सख्त जरुरत आन पड़ी। मैंने हरिवंशजी को फोन मिलाया तो पहली बार में तो वे चेन्नई में थे। दो-तीन दिन फिर से फोन मिलाया और अपनी व्यथा सुनाई। मैंने उनको याद दिलाया कि मैंने दो महीने तक मुजफ्फरपुर,प्रभात खबर में काम किया था जिसका मुझे पैसा नहीं मिला और उल्टे घर से ही नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने मुझे पहचान तो लिया मगर इस मामले में कुछ भी कर सकने में अपनी असमर्थता जताई। तब मैंने कहा कि मुझे पटना,प्रभात खबर में नौकरी ही दे दीजिए। उन्होंने सीट खाली नहीं होने की मजबूरी जताते हुए फोन काट दिया।
मित्रों,मैं हतप्रभ था कि हरिवंश जी भी ऐसा कर सकते हैं? महान समाजवादी,चिंतक,पत्रकार हरिवंश एक मजदूर का पैसा रख लेंगे? मगर यही सच था और आज भी यही सच है। वे आज भी मेरे कर्जदार हैं। दरअसल ये लोग छद्म समाजवादी हैं। चिथड़ा ओढ़कर ये लोग न सिर्फ मलाई चाभते हैं बल्कि अपने ही संस्थान के श्रमिकों का खून भी पीते हैं। ये लोग मुक्तिबोध के शब्दों में रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध,नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे लोग हैं। फिलहाल वे जदयू की तरफ से राज्य सभा सदस्य हैं अपनी सत्ता की चाटुकारिता कर सकने की अद्धुत क्षमता के बल पर। उम्मीद करता हूँ कि वे संसद में मजदूरों के पक्ष में लंबे-लंबे विद्वतापूर्ण भाषण देंगे और समाजवादी होने के अपने कर्त्त्वयों की इतिश्री कर लेंगे। धरातल पर पहले की तरह ही उनके अपने संस्थान में श्रमिकों का शोषण अनवरत जारी रहेगा,फिल्मी महाजन की तरह उनके पैसे पचाते रहेंगे और परिणामस्वरूप प्राप्त अधिशेष के बल पर उनकी चल-अचल सम्पत्ति में अभूतपूर्व अभिवृद्धि होती रहेगी। अंत में उनकी लंबी आयु की कामना करता हूँ जिससे आनेवाले समय में देश में समाजवाद दिन दूनी और रात चौगुनी प्रगति कर सके।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

अब कोई कैसे शरण देगा निर्भया को?

8-4-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। बिदुपुर थाना क्षेत्र के खजबत्ती निवासी राजदेव राय की हत्या से पूरा वैशाली जिला सन्न है। उस आदमी की हत्या हो गई जिसने निर्भया को सामूहिक बलात्कार से न केवल बचाया था बल्कि शरण भी दी थी और उसके हिस्से की लड़ाई भी लड़ी थी वह भी अकेले? लड़ाई में उसने राज्य सरकार से मदद भी मांगी थी। सुरक्षा और हथियार का लाइसेंस मांगा था लेकिन मिला कुछ भी नहीं। मिली तो सिर्फ मौत।

मुख्यमंत्री ने उसकी मांग को ध्यान से सुना और डीजीपी को कार्रवाई करने को कहा। पुलिस ने मामले के अनुसंधान पदाधिकारी को निलंबित भर कर दिया और अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर ली। दो बलात्कारियों की गिरफ्तारी हुई तो पूरा गांव थाने पर चढ़ बैठा उनके समर्थन में। क्या यह संकेत नहीं है हमारे गांवों के नैतिक पतन का? पहले तो गांवों में अपराधियों को बहिष्कृत कर देने की प्रथा थी।

स्थानीय विधायक सतीश कुमार कहते हैं कि अपराधी दूसरे क्षेत्रों से आए हुए लोग थे। अगर ऐसा था तो फिर उनको गांववालों का साथ कैसे मिल गया? राजदेव को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी किसकी थी? पुलिस ने समुचित कदम क्यों नहीं उठाया? हथियार का लाइसेंस अगर दे दिया गया होता तो राजदेव अपनी रक्षा स्वयं कर लेते। क्यों उनको लाइसेंस नहीं दिया गया? क्या बिना घूस लिए पुलिस-प्रशासन किसी को भी लाइसेंस नहीं देती है? जब किसी को राज्य का मुख्यमंत्री भी सुरक्षा नहीं दिला सकता तो फिर कोई जरुरतमंद किससे उम्मीद रखेगा? क्या मतलब है मुख्यमंत्री के जनता दरबार का? इन परिस्थितियों में क्या अब कोई राजदेव बनने की हिमाकत करेगा भी? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 6 अप्रैल 2014

अल्पसंख्यकवाद,आरक्षण और छद्म धर्मनिरपेक्षता

07-04-2014,ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। मित्रों,लाल किले के प्राचीर से अपने पहले संबोधन में भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है। भारत में अल्पसंख्यकों में सबसे ज्यादा जनसंख्या मुसलमानों की है फिर सिख,जैन,इसाई और पारसी आते हैं लेकिन मुसलमानों को छोड़कर बाँकी समुदायों की हालत हिन्दुओं से भी अच्छी है। मतलब कि भारत में अल्पसंख्यकों के लिए जो भी इंतजाम सरकार करती है तो वह वास्तव में मुसलमानों के लिए ही करती है।
मित्रों,बाद में सरकार ने मुसलमानों को पहला अधिकार दिया भी। 15 सूत्री कार्यक्रम बनाया जिससे सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों को ही लाभ हुआ कदाचित एकाध सिख,इसाई या पारसी ने भी लाभ उठाया हो। अगर रजिया या अहमद को पढ़ाई के लिए सस्ते ऋण या विशेष छात्रवृत्ति दी जाती है तो इससे बहुसंख्यकों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन यह पहला अधिकार वास्तव में सिर्फ पहला अधिकार ही नहीं रहा बल्कि केंद्र सरकार और उ.प्र. और कर्नाटक जैसी कई राज्य सरकारों ने इसे सिर्फ अल्पसंख्यकों का अधिकार ही बना दिया। वरना क्या कारण है कि रजिया को सुविधा मिले और गरीब हिन्दू की बेटी राधा को साधनों के अभाव में पढ़ाई बीच में ही छोड़कर घर बैठना पड़े? कोई भी कार्यक्रम कैसे सिर्फ एक समुदाय विशेष के लिए ही बनाया जा सकता है? क्या ऐसा करना एक नए तरह के भेदभाव को जन्म नहीं देता है? आजादी से पहले अंग्रेजों ने अपने काम आनेवाले होटलों और स्वीमिंग पुलों में लिखवा दिया था कि डॉग्स एंड इंडियन्स आर नॉट एलाउड और अब बिना बोर्ड लगाए ही केंद्र सरकार योजनाओं के लाभ से वंचित कर बहुसंख्यक हिन्दुओं के साथ डॉग्स एंड हिन्दुज आर नॉट एलाउड जैसा व्यवहार कर रही है।
मित्रों,इतना ही नहीं बाद में जब उ.प्र. के मुजफ्फरनगर में दंगे हुए तो वहाँ की वर्तमान राज्य सरकार ने कहा कि हम तो सिर्फ मुसलमानों को ही दंगा पीड़ित मानते हैं इसलिए हम तो सिर्फ उनको ही मुआवजा देंगे। पीड़ितों के दर्द और आँसुओं को भी अल्पसंख्यकवाद की छद्म धर्मनिरपेक्षता की सियासत ने संप्रदायों में बाँट दिया। बाद में इससे भी एक कदम आगे बढ़कर केंद्र सरकार ने संसद में सांप्रदायिकता विरोधी बिल पेश कर दिया जिसमें इस तरह के प्रावधान रखे गए कि अगर देश में कहीं भी दंगे होते हैं तो चाहे दंगों की शुरुआत कोई भी करे जिम्मेदारी सिर्फ बहुसंख्यकों पर आएगी। वाह,नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का भी सरेआम खून कर दिया गया। जबकि सच्चाई तो यह है कि देश के प्रत्येक हिस्से में साम्प्रदायिक दंगों की शुरुआत हमेशा मुसलमान ही करते हैं।
मित्रों,भारत में नौकरियों में आरक्षण देने का उद्देश्य क्या है? यही न कि जो सदियों से पिछड़े हैं उनको बराबरी में आने का अवसर दिया जाए लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार के लिए इसका बस इतना ही मतलब है कि बाँटो और राज करो। तभी तो उसने देश के सबसे समृद्ध समुदायों में से एक जैनों को आरक्षण का लाभ दे दिया जिनको वास्तव में इसकी जरुरत थी ही नहीं। फिर गरीब सवर्ण मुसलमानों को भी आरक्षण देने की कोशिश की गई केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों के द्वारा भी। क्या गरीब सवर्ण हिन्दुओं ने कोई जघन्य अपराध किया है जो आज तक उनको इस सुविधा से वंचित रखा गया है और वही सुविधा गरीब सवर्ण मुसलमानों को दे दी गई। हालाँकि कोर्ट ने सरकार को ऐसा करने नहीं दिया। बाद में मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद जब केंद्र सरकार ने देखा कि प्रशासनिक भेदभाव से जाट मतदाता नाराज हो गए हैं तो जाटों को बिना जरूरी कानूनी प्रक्रिया को पूरा किए ही,राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग से सिफारिश लिए बिना ही आरक्षण दे दिया। क्या भारत के संविधान में आरक्षण का प्रावधान गंदी सियासत का हथियार बनाने के लिए किया गया था? कई सवर्ण हिन्दू जातियों की आर्थिक स्थिति जाटों से ज्यादा खराब है फिर उनको आरक्षण क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? कुछ लोग कह सकते हैं कि आरक्षण का आधार तो सामाजिक पिछड़ापन है तो फिर जैनों,गरीब सवर्ण मुसलमानों और जाटों को कैसे आरक्षण दे दिया गया?
              मित्रों,हमारे देश की छद्म धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ जिसे धर्मनिरपेक्षता कहती हैं वह वास्तव में धर्मनिरपेक्षता है ही नहीं। वह वास्तव में अल्पसंख्यकवाद है और वोट बैंक की गंदी राजनीति है। इन पार्टियों ने सत्ता प्राप्ति के लिए कुछ हिन्दू जातियों और पूरे मुस्लिम समुदाय को अपने साथ रखकर एक समीकरण बनाया है और उसके अनुपालन को ही ये लोग धर्मनिरपेक्षता कहते हैं। यह आरक्षण भी उसी नीति का एक भाग मात्र है। वास्तव में इन पार्टियों को न तो देशहित से कोई मतलब है और न ही प्रदेशहित से कोई लेना-देना। इनके पास न तो देश-प्रदेश के विकास के लिए कोई योजना है और न ही कोई ईच्छा। कहाँ तो राजग की केंद्र सरकार ने 2020 तक भारत को विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में लाने का लक्ष्य रखा था और कहाँ तो यूपीए की वर्तमान केंद्र सरकार ने भारत की विकास दर को फिर से हिन्दू विकास दर से भी नीचे ला दिया। जिस अब्दुल्ला बुखारी पर दर्जनों आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं,जिस व्यक्ति को जेल में होना चाहिए यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी उसी बुखारी से अनुनय-विनय करके मुसलमानों से अपने पक्ष में मतदान करने की अपील जारी करवाती हैं। क्या इसको धर्मनिरपेक्षता का नाम दिया जाना चाहिए?
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

स्टिंग ऑपरेशन और लोकमंगल

04-04-2014,ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। मित्रों,कभी तुलसी और सूर की कविताओं और उन दोनों के आराध्यों की समीक्षा करते हुए हिन्दी के सबसे बड़े आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा था कि तुलसी लोकमंगल के कवि हैं और उनके राम के लिए भी लोकमंगल में ही अपना मंगल भी है। वहीं सूर के कृष्ण के लिए लोकमंगल प्राथमिकता नहीं है बल्कि आनन्द प्राथमिकता है। तुलसी के अनुसार आदर्श को सुधो मन,सुधो वचन,सुधो सब करतूती होना चाहिए।
मित्रों,आधुनिक युग संचार क्रांति का युग है। रोज-रोज नए-नए आविष्कार हो रहे हैं। विज्ञान और तकनीक का सदुपयोग या दुरुपयोग स्वाभाविक रूप से मानव के स्वविवेक पर निर्भर करता है। आज इतने सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक यंत्र आ चुके हैं कि आपको इस बात का भान तक नहीं होता कि आपको कैमरे में कैद किया जा रहा है। प्रश्न उठता है कि क्या किसी को धोखा देकर बिना उसकी मर्जी के उसका वीडियो बनाना नैतिक रूप से उचित है? क्या यह सूधो मन,सूधो वचन,सूधो सब करतूती के मान्य सिद्धांत पर खरा उतरता है? क्या इस तरह से बनाए गए वीडियो को न्यायालय सबूत के रूप में स्वीकार करेगा? अगर न्यायालय ऐसा करता है तो उसे ऐसा करना चाहिए या नहीं?
मित्रों,सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कुकुरमुत्ते की तरह उग आई स्टिंग करनेवाली कंपनियों का उद्देश्य क्या है? क्या वे सिर्फ लोकमंगल के लिए स्टिंग करवाते हैं या फिर उनके भी निहित स्वार्थ हैं? इतिहास के पृष्ठों को अगर हम उलटें तो हम देखते हैं कि कभी तहलका ने स्टिंग करके तहलका मचा दिया था और बताया था कि एनडीए की सरकार में होनेवाली रक्षा खरीदों में कमीशनखोरी हो रही है। परन्तु उससे हजार गुना ज्यादा कमीशनखोरी परवर्ती कांग्रेस सरकार के समय में होती रही,स्थिति यहाँ तक बिगड़ी कि कोई नहीं कह सकता कि कौन-सी पनडुब्बी या युद्धपोत कब जल समाधि ले लेगा मगर तब तहलका ने कोई स्टिंग नहीं किया और मुंदहूँ आँख कतहुँ कछु नाहि को अपना मूलमंत्र बना लिया। सवाल उठता है कि क्या स्टिंग करनेवाले लोगों को निष्पक्ष नहीं होना चाहिए? अगर एनडीए का भ्रष्टाचार गलत था तो फिर गलत तो कांग्रेस का भ्रष्टाचार भी है। इसी तरह 2009 में 'नोट फॉर वोट' नामक स्टिंग आईबीएन 7 ने करवाया था। दिनभर 'खबर किसी भी कीमत पर' को अपना आदर्श माननेवाले इस चैनल पर घोषणा होती रही कि रात में स्टिंग को प्रसारित करके बताया जाएगा कि किस तरह कांग्रेस सरकार ने पैसे देकर सांसदों के मत खरीदे लेकिन न जाने किस चीज की कीमत पर स्टिंग को दबा दिया गया और प्रसारित नहीं किया गया। इसी प्रकार एक स्टिंग पिछले साल दिल्ली विधानसभा चुनावों के समय आया था जिसमें आप पार्टी के ढोंग की पोल खोली गई थी। हालाँकि इससे आप पार्टी को फायदा हुआ या नुकसान यह आज भी विवाद का विषय है लेकिन इस प्रयास की निश्चित रूप से सराहना की जानी चाहिए क्योंकि इसके पीछे निश्चित रूप से लोकमंगल निहित था।
मित्रों,कई बार देखा गया है कि स्टिंग ऑपरेशन करनेवाले निजी शत्रुता में स्टिंग करते हैं और तथ्यों को तोड़-मरोड़ देते हैं। उदाहरण के लिए वर्ष 2007 में एक स्टिंग में दक्षिण दिल्ली स्थित सर्वोदय कन्या विद्यालय की शिक्षिका उमा खुराना पर छात्राओं की अश्लील वीडियो बनाने का आरोप लगा था जो बाद में पूरी तरह से झूठा भी पाया गया था। लेकिन इस बीच अभिभावकों ने उमा के साथ मारपीट और बदसलूकी की,कपड़े तक फाड़ डाले थे। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को कई बार लाठीचार्ज करना पड़ा था और आँसूगैस के गोले भी छोड़ने पड़े थे।
मित्रों,आज कोबरा पोस्ट ने जो स्टिंग प्रसारित किया है उसमें कोई भी नया तथ्य या खुलासा नहीं है। पूरा भारत जानता है कि घटना पूर्वनियोजित थी। सवाल उठता है क्या कोबरा पोस्ट इस मामले में कांग्रेस के इशारे पर काम कर रहा है। क्या बाबरी के ढहाने की तरह इस स्टिंग का इस समय प्रसारण भी पूर्वनियोजित है? कल-परसों सोनिया ने बुखारी से भेंट की,आज बुखारी कांग्रेस के पक्ष में मुसलमानों से अपील कर सकते हैं ऐसे में अगर हम सारी बिखरी हुई कड़ियों को जोड़कर देखें तो इस समय इस स्टिंग के आने से सबसे ज्यादा लाभ कांग्रेस को होनेवाला है भले ही कोबरा पोस्ट की कांग्रेस से मिलीभगत हो या नहीं।
मित्रों,मैं यह नहीं कहता कि प्रत्येक स्थिति में स्टिंग करना गलत है। अनैतिक लोगों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के लिए कभी-कभी अनैतिक कर्म करने पड़ते हैं लेकिन स्टिंग का एकमात्र उद्देश्य लोकमंगल होना चाहिए,देशोद्धार होना चाहिए। शुद्ध व्यावसायिक हित के लिए इसका दुरुपयोग करना निहायत गैरजिम्मेदाराना और गलत है। उस पर उनलोगों के पक्ष में इसका जाने-अनजाने में इस्तेमाल करना तो और भी गलत है जो देश को लगातार नुकसान पहुँचा रहे हैं और जिन्होंने घोटालों की वर्णमाला ही तैयार कर दी है। तुलसी के राम राज्याभिषेक के बाद प्रतिज्ञा करते हुए कहते हैं कि 'निशिचरहीन करौं महि हथ उठाई पण कीन्ह'। पृथ्वी को निशिचरहीन करते समय किसी तरह का भेदभाव नहीं किया था राम ने। उन्होंने केवल उनके कर्म देखकर उनको सजा दी थी न कि अपना-पराया के आधार पर उनमें भेदभाव किया था। अगर भाजपा का भ्रष्टाचार नुकसानदायक है तो कांग्रेस का भ्रष्टाचार भी नुकसानदेह होगा। अगर बाबरी मस्जिद को तोड़ना सुनियोजित था तो 2009 में वोट के लिए पैसे बाँटना भी सुनियोजित था। अगर भूतकाल में भाजपा की सांप्रदायिकता बुरी थी तो भूत और वर्तमान काल में कांग्रेस की सांप्रदायिकता भी उतनी ही बुरी है।
मित्रों,इसलिए स्टिंग करते समय एक तो स्टिंग करनेवाले लोगों को निष्पक्ष तो होना ही चाहिए और इसके साथ ही देशहित और लोकमंगल का भी ध्यान रखना चाहिए। अगर इस स्टिंग से कांग्रेस को अप्रत्याशित लाभ हो जाता है और वह एक बार फिर से सत्ता में वापस आ जाती है तो निश्चित रूप से वह अपने उसी एजेंडे को आगे बढ़ाएगी जिस पर उसकी सरकार पिछले 10 सालों से काम करती रही है अर्थात् देश को लूटने की गति और तरीका और भी आक्रामक और निर्लज्ज हो जाएगा और इस प्रकार भारत वैश्विक और क्षेत्रीय विकास की दौड़ में क्रमशः काफी पीछे होता जाएगा। और यह तो आप भी जानते हैं कि इससे भारत की एकता,अखंडता और संप्रभुता निश्चित रूप खतरे में पड़ जाएगी क्योंकि निर्बल की पत्नी सबकी लुगाई हो जाती है। क्या स्टिंग करनेवाले कोबरा पोस्ट को सोंचना नहीं चाहिए था कि अगर ऐसा हुआ तो इस पाप में उसे भी हमेशा भागीदार माना जाएगा। 'राम की शक्ति पूजा' में निराला के राम इस बात पर क्षोभ प्रकट करते हैं कि 'जिधर अधर्म है उधर शक्ति'। क्या वर्तमान भारत में भी स्थिति ऐसी ही नहीं है? क्या कांग्रेस 10 साल की उत्तरोत्तर आक्रामक होती सतत लूट के बाद भी शर्मिंदा होने के बदले पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक नहीं हो गई है जैसे कि रावण सीता-हरण के बाद होता गया था? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 31 मार्च 2014

कौन हैं कांग्रेस के समलैंगिक?


31-03-2014,ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। मित्रों, आपने ऩकलची बंदर की कहानी जरूर पढ़ी होगी परंतु हो सकता है कि आपको कहानी को जीने का अवसर नहीं मिला हो। अगर सचमुच में ऐसा है तो भी घबराने की कोई जरुरत नहीं है। बंदर को नकल करते हुए नहीं देखा तो क्या आप जब चाहे एक राजनैतिक दल को ऐसा करते हुए देख सकते हैं। आपने एकदम ठीक समझा है! मैं भारत की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की ही बात कर रहा हूँ। उसी कांग्रेस की जिसकी नीतियों में हमेशा मौलिकता की कमी रही है और जो हमेशा से विदेशी सरकारों की नकल करती रही है। इसकी सरकारों के मंत्री सरकार चलाने के गुर सीखने के लिए अक्सर विदेश जाते रहे हैं और फिर वापस आकर उन विदेशी नीतियों को बिना थोड़ा-सा दिमाग खर्च किए लागू करने लगते हैं जबकि भारत की स्थितियाँ अमेरिका-यूरोप से साफ इतर होती हैं। जाहिर है कि फिर उन आयातित योजनाओं का अंजाम वही होता है जो होना होता है।
मित्रों,नकल की यह कहानी पं. नेहरू के समय से ही कांग्रेसी नेताओं द्वारा बार-बार दोहराई जा रही है। बात सिर्फ आर्थिक नीतियों तक सीमित होती तो फिर भी गनीमत थी लेकिन अब कांग्रेस नेता जबर्दस्ती भारत के समाज को अमेरिकी-यूरोपियन समाज बना देना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि भारत में भी यौन-क्रांति की स्थिति उत्पन्न हो जाए। तभी तो बलात्कार की बाढ़ आने के बाद भी कांग्रेस सरकार ने सनी लियोन को भारत आने और फिल्में बनाने से नहीं रोका। तभी तो दिल्ली के रेप कैपिटल बन जाने के बाद भी भारत में अच्छे-अच्छों के दिमाग खराब कर देनेवाली पोर्न वेबसाईटों पर रोक नहीं लगाई गई। तभी तो समस्या मस्तिष्क-प्रदूषण से है लेकिन ईलाज कानून बनाकर किया जा रहा है। तभी तो जबसे केंद्र में माँ-बेटे का शासन कायम हुआ है बार-बार समलैंगिकता का समर्थन किया जा रहा है। तभी तो अभी कुछ महीने पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को सामाजिक अपराध कहा था तब कांग्रेस के युवराज ने झटपट समलैंगिकता का पक्ष लेते हुए इस पर भाजपा से उसके विचार पूछ लिए थे। तभी तो पार्टी के घोषणा-पत्र में भी समलैंगिकता को वैधानिकता प्रदान करने के नायाब व क्रांतिकारी वादे किए गए हैं।
मित्रों, कांग्रेस के युवराज और महारानी को यह मालूम नहीं है कि भारत भारत है नार्वे या इंग्लैंड नहीं जहाँ की जनसंख्या के 20-30 प्रतिशत लोग घोषित समलैंगिक हो चुके हैं और इस तरह बहुत बड़े वोटबैंक में तब्दील हो चुके हैं। मैं समझता हूँ कि भारत में अभी भी कुछ सौ या कुछ हजार से ज्यादा घोषित समलैंगिक नहीं हैं। फिर राहुल और सोनिया गांधी क्यों समलैंगिकता ही नहीं बल्कि वेश्यावृत्ति को भी वैधानिक मान्यता देने की हड़बड़ी में हैं? कांग्रेस में ऐसे कौन-से समलैंगिक लोग हैं जिनको खुश करने के लिए इस तरह के गंदे प्रयास किए जा रहे हैं? आखिर एक स्त्री एक स्त्री से और एक पुरुष एक पुरुष से विवाह करके समाज के लिए कौन-सा अमूल्य योगदान कर पाएगा? क्या ईश्वर ने हमें जो अंग जिस काम के लिए दिए हैं उसको उसी काम के लिए प्रयोग में नहीं लाया जाना चाहिए? क्या ऐसा नहीं करना प्रकृति के नियमों के साथ मजाक नहीं होगा? क्या कांग्रेसी मुँह से मलत्याग या गुदा से भोजन कर सकते हैं? अगर नहीं तो फिर अप्राकृतिक यौनाचार को मान्यता देने पर वे इतना जोर क्यों दे रहे हैं? क्या इन अश्लील,घोर भोगवादी और विनाशकारी प्रवृत्तियों को कानून बनाकर बढ़ावा देने से भारतीय समाज के ताने-बाने के बिखर जाने का खतरा उत्पन्न नहीं हो जाएगा? क्या कांग्रेस को उस भारतीय संस्कृति की कोई चिंता नहीं है,क्या उसको उस भारतीय संस्कृति पर गर्व नहीं है जिस पर गर्व करते हुए कभी इकबाल ने कहा था कि यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गए जहाँ से, अब तक मगर है बाकी नाम-ओ-निशाँ हमारा, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 30 मार्च 2014

संतोष की जगह खीझ पैदा करती है वैशाली जिले की सरकारी वेबसाईट

30-03-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कई साल पहले लालू जी बिहार में चीख-चीखकर कहा करते थे कि विकास करने से कहीं वोट मिलता है और यह आईटी-फाईटी क्या है। सत्ता बदली तो बदली हुए सरकार ने जनता को सूचना-क्रांति और इंटरनेट के जरिए सरकारी योजनाओें और जानकारियों तक आसानी से पहुँच बनाने की पहल शुरू की। प्रदेश के सभी जिलों की सरकारी वेबसाइटें बनाई गईं जिससे बहुत से जिलों की जनता को लाभ भी हुआ लेकिन दुनिया के सबसे पुराने गणतंत्र वाला वैशाली जिला इसका अपवाद ही बना रहा।
मित्रों,न जाने क्यों जबसे इस जिले की सरकारी वेबसाईट बनी है तभी से पिछले 8-10 सालों से इस वेबसाईट की सारी महत्त्वपूर्ण लिंक काम नहीं करती हैं। अर्थात् आप क्लिक करते-करते परेशान हो जाईएगा लेकिन वह लिंक नहीं खुलेगा। उदाहरण के लिए वेबसाईट पर District Vaishali welcomes you all,DISTRICT PROFILE,AT A GLANCE,MNREGA Yojna,IMPORTANT CONTACTS,Citizen Services/Online Registration,BPL SURVEY,IAY,SMS MONITERING SYSTEM,DPMC,RTI ACT,ASSET DECLARATION,PUBLIC UTILITY SERVICES,मतदाता जागरुकता अभियान जैसी दर्जनों जनता के काम आनेवाली लिंक हैं जो काम नहीं करतीं। परिणामस्वरुप जो जनता का जो काम घर बैठे हो जाना चाहिए उसके लिए उनको महीनों दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और जो जानकारियाँ उनको इस वेबसाईट से घर बैठे मिल जानी चाहिए उसके लिए उनकों सैंकड़ों आरटीआई डालने पड़ते हैं। कदाचित् उसके बाद भी उनके कई काम नहीं हो पाते और वांछित जानकारी भी नहीं मिल पाती। विडंबना यह है कि इस समय राज्य के सूचना और जनसंपर्क मंत्री इसी जिले के रहनेवाले हैं।
मित्रों,वेबसाईट पर सबसे नीचे एक स्क्रॉल चलती रहती है जिसमें जिले में चल रही विभिन्न सरकारी गतिविधियों से संबंधित करीब एक दर्जन लिंकें हैं पूरी वेबसाईट में सिर्फ यही चंद लिंकें काम कर रही हैं। जाहिर है कि जिन लोगों के मजबूत कंधों पर इस वेबसाईट के चलाने की जिम्मेदारी दी गई है वे घोर लापरवाह और आलसी हैं। उन्होंने लिंकों की जगह कोरे शब्द डाल दिए हैं लिंकों के लिंक नहीं डाले। लिंक काम करेगा तो डाटा को बराबर अपडेट भी करना पड़ेगा न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी। लेकिन इस वेबसाईट के सारे महत्त्वपूर्णों लिंकों के काम नहीं करने के कारण वैशाली जिले के निवासियों की जिन्दगी जरूर बेसुरी हो गई है। जबसे वेबसाईट का निर्माण हुआ है तभी से यही हालत है और आश्चर्य की बात है कि जिले के किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने अबतक इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया। लिंकों के काम नहीं करने से फायदा तो उनको भी है। जाहिर है कि SMS MONITERING और UTILITY SERVICES जैसी सेवाओं के लिंकों के काम करने पर उनकी जिम्मेदारी भी काफी बढ़ जाती जिससे वे फिलहाल बच जा रहे हैं।
मित्रों,बिहार में चाहे सूचना तकनीक से जनता को फायदा पहुँचाने की योजनाएँ हों या फिर कोई भी अन्य योजना यहाँ आकर वे दम तोड़ देती हैं। कारण बस इतना-सा है कि उनके क्रियान्वयन पर ध्यान नहीं दिया जाता। दुर्भाग्यवश इस समय बिहार के जो मुख्यमंत्री हैं वे देश के सबसे बड़े फोकसबाज नेता हैं। कागज पर तो वे सबकुछ कर दे रहे हैं लेकिन धरातल पर कुछ भी नहीं करते। मैं इस आलेख की एक कॉपी उनको भी भेजने जा रहा हूँ शायद वे इस दिशा में पहल कर ही दें और वैशाली जिले की वेबसाईट जिले की जनता को सिर्फ संतोष प्रदान करने लगे और भविष्य में उनके मन में आक्रोश और खींझ उत्पन्न न करे। मैं आपको वैशाली जिले की वेबसाईट का लिंक भी दे रहा हूँ जिससे आप खुद ही अनुभव करके जान जाईएगा कि राज्य में सुशासन कैसे काम कर रहा है-http://vaishali.bih.nic.in/
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 25 मार्च 2014

जागो वतन खतरे में है


25-03-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,किसी शायर ने क्या खूब कहा कि "ले आई जिन्दगी हमें कहाँ पर कहाँ से, ये तो वही जगह है गुजरे थे हम जहाँ से।"  शायर ने कहा तो था यह खुद के बारे में लेकिन दुर्भाग्यवश यह शेर हमारे देश भारत की वर्तमान स्थिति पर भी खूब खरा उतर रहा है। हमारा देश एक बार फिर से सन् 1962 में पहुँच गया। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने देश की सुरक्षा को जानबूझकर खतरे में डाला था। पहले 1948 में पाकिस्तान और बाद में 1962 में चीन से भारत को मुँह की खानी पड़ी।  हाल ही में युद्ध के समय नई दिल्ली मे उस वक्त विदेशी पत्रकार के रूप में तैनात मैक्सवैल द्वारा प्रकाशित की गई पुस्तक "इंडियाज चाइना वार" के अनुसार नेहरू जानते थे कि चीन भारत पर हमला करने वाला है लेकिन उन्होंने जानते हुए भी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। नतीजा यह हुआ कि भारत के सैनिकों को बिना गोली-बारूद के ही जंग के मैदान में उतार दिया गया। खुद मेरे मामा स्व. अरविन्द कुमार सिंह कई महीनों तक बंदूक लिए अरूणाचल के जंगलों में छिपे रहे और पेड़ के पत्ते खाकर जान बचाई।
मित्रों,एक बार फिर से भारतीय सेना के लिए गोला-बारुद की भारी कमी हो गई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस समय हमारी सेना के पास इतना भी गोला-बारुद शेष नहीं बचा है कि हम 20 दिनों तक लड़ सकें। उसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत सरकार ने इस दिशा में जो कदम उठाए हैं उसके अनुसार अपेक्षित परिणाम आने में कम-से-कम 5 साल लगेंगे। भगवान न करे इस बीच अगर चीन और पाकिस्तान ने संयुक्त मोर्चाबंदी करके एकसाथ भारत पर हमला कर दिया तो देश की रक्षा कैसे हो पाएगी? क्या देश की सुरक्षा को खतरे में डालना हमारी वर्तमान केंद्र सरकार का आपराधिक कदम नहीं है और इस देशद्रोह के लिए इसमें शामिल सभी संबद्ध मंत्रियों को सजा नहीं दी जानी चाहिए? अगर कोई सैनिक या सैन्य अधिकारी युद्ध के दौरान गलतियाँ करता है तो उसका कोर्ट मार्शल कर दिया जाता है तो क्या उन लोगों को जिन्होंने जानबूझकर देश की सेना को कमजोर किया है को सजा नहीं मिलनी चाहिए?
मित्रों,मैं पहले भी इस केंद्र सरकार पर अपने आलेखों में आरोप लगा चुका हूँ कि इसने जानबूझकर न केवल देश की अर्थव्यवस्था को बल्कि देश की सुरक्षा को भी कमजोर किया है। यह वैसी ही बात है जैसे कि मेड़ खेत को खाने लगे। मैंने यह आरोप भी लगाए थे कि केंद्र सरकार में शामिल लोग एक साथ चीन,अमेरिका और पाकिस्तान के एजेंट हैं। वास्तव में देश पर इस समय ऐसे लोगों का शासन है जो चाहते हैं कि देश टूट जाए,समाप्त हो जाए। नहीं तो क्या कारण है कि हमारे समुद्रों में खड़े-खड़े ही एक-के-बाद-एक युद्धपोत और पनडुब्बियाँ डूबते जा रहे हैं? मैं नहीं मानता कि रक्षा मंत्री एके एंटनी ईमानदार व्यक्ति हैं। अगर ऐसा है भी तो वे मनमोहन सिंह की तरह के ईमानदार हैं जिनकी नाक के नीचे बेईमान जमकर लूट मचाए हुए हैं और श्रीमान इस्तीफा देने तक की जहमत नहीं उठा रहे हैं जबकि भारत के नौसेना अध्यक्ष कई हफ्ते पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं।
मित्रों,जैसा कि मैंने आलेख की शुरुआत में ही कहा था कि हम फिर से 1962 में पहुँच गए हैं। ऐसा हुआ कैसे? आज हम शत-प्रतिशत साक्षरता के काफी निकट पहुँच चुके हैं फिर हमने ऐसे अयोग्य और देशद्रोहियों के हाथों में देश को सौंप कैसे दिया? तो क्या सिर्फ पढ़ा-लिखा होने से ही कोई कौम समझदार नहीं हो जाती? क्या भारत की जनता आज भी उतनी ही मूर्ख नहीं है जितनी कि वह 1962 में थी? पढ़ी-लिखी तो दिल्ली की जनता भी थी फिर लंपट-देशद्रोही-अराजकतावादी-सीआईए एजेंटों के हाथों में पिछले साल दिल्ली की सत्ता कैसे सौंप दी? क्या एक देशद्रोही पार्टी कांग्रेस को हटाकर दूसरी देशद्रोही पार्टी के हाथों देश को सौंप देना बुद्धिमानी कही जाएगी? भूलिए मत कि तब भी एक मेनन भारत-चीन दोस्ती के तराने गा रहा था और अब भी एक मेनन वैसे ही तराने गा रहा है। मैं नहीं जानता कि इस मेनन और इस मेनन में कोई सीधा रक्त संबंध है या नहीं लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूँ कि उस नेहरू और इस राहुल गांधी के बीच जरूर सीधा रक्त संबंध है। मेनका गांधी ने एकदम सही सवाल उठाया है कि सोनिया अपने मायके से तो कुछ भी लेकर नहीं आई थी फिर वो कैसे दुनिया की सबसे अमीर छठी महिला बन गई? क्या देश की बर्बादी और सोनिया की समृद्धि के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है?
मित्रों,जागिए नहीं तो फिर कभी चैन से सो नहीं पाईएगा। संकट अब सिर पर आ गया है। देश की सुरक्षा खतरे में है,देश खतरे में है। देश के दुश्मनों को पहचानिए और आनेवाले चुनावों में सिर्फ और सिर्फ एनडीए को वोट दीजिए क्योंकि आपने दिल्ली के विधानसभा चुनावों में भी देखा है कि एनडीए गठबंधन को वोट न देने का सीधा मतलब होता है कांग्रेस को वोट देना। क्योंकि चुनावों के बाद बाँकी सारे दल फिर से एकसाथ हो जाते हैं देश को लूटने के लिए। क्योंकि बाँकी किसी भी दल को कोई मतलब नहीं है कि देश बचेगा या देश का नामोनिशान मिट जाएगा। भूल जाईए कि आपके क्षेत्र से एनडीए का उम्मीदवार कौन है क्योंकि अब प्रश्न हमारे आपके लोकसभा क्षेत्र भर के विकास का नहीं है बल्कि अब प्रश्न-चिन्ह लग गया है भारत और भारत के वजूद पर,अस्तित्व पर। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 19 मार्च 2014

मूल स्वरुप से भटक गई है होली

18-03-2014,ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। मित्रों,कहते हैं कि परिवर्तन संसार का नियम है लेकिन जब बात पर्वों-त्योहारों या परंपरा की हो तो कभी-कभी परिवर्तन की गति या मात्रा हमें चिंतित भी करने लगती है। होली को ही लें जो भारत का सबसे बड़ा त्योहार है। शहरों में तो पहले से भी होली सांकेतिक ही थी लेकिन अब तो गाँवों में भी शहरी होली मनाई जाने लगी है। इस बार की होली में हाजीपुर शहर में होली के कई दिन पहले से ही विभिन्न व्यवसायी संगठनों द्वारा होली-मिलन समारोहों का आयोजन होने लगा था। मैं उनमें से एक समारोह में निमंत्रित भी था। होलिका-दहन के दिन जाने पर देखा कि सामुदायिक भवन हाजीपुर में जगह-जगह बिजली कंपनियों की होर्डिंग्स लगी हुई थी। स्टेज पर दो-चार लोग बैठे हुए थे और एक स्थान पर डीजे पर भोजपुरी गीत बज रहा था और कई लोग बेसुरा डांस कर रहे थे। सामने कुर्सियाँ लगी हुई थीं जिन पर कई सौ लोग बैठे हुए थे। मैंने दो गिलास दूध पिया,कुछ तस्वीरें लीं और चल दिया। वहाँ मेरा दम घुटने लगा। दरअसल वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा था जिसको कि मैं होली मानता और रुकता।
मित्रों,कल होकर होली के दिन मैं दोपहर दो बजे अपनी ससुराल के लिए रवाना हुआ। रास्ते में जितने भी गाँव मिले लगभग सभी गाँवों में लोग साउंड बॉक्स पर गंदे भोजपुरी होली गीतों की धुन पर थिरकते मिले। आयु यही कोई 8-10 से 30 तक की। उनके लड़खड़ाते पाँव यह बताने को काफी थे कि वे अहले सुबह से ही शराब पी रहे थे। रास्ते में कई स्थानों पर युवक मोटरसाईकिल पर हंगामा करते हुए भी देखे गए। कई स्थानों पर कीचड़ और गोबर से सने युवक हुल्लड़बाजी करते हुए भी देखे गए। मैंने अपनी ससुराल पहुँचते ही सालों से पूछा कि आपके गाँव में तो लोग हर दरवाजे पर घूम-घूमकर होली गाते ही होंगे तो उन्होंने बताया कि यहाँ कई साल पहले तक तो ऐसा होता था लेकिन अक्सर गायन मारपीट में बदल जाता था इसलिए अब इस परंपरा को बंद कर दिया गया। सुनकर मैं सन्नाटे में आ गया। फिर गाँव और शहर की होली में फर्क ही क्या रह गया? मैं तो होली गीतों का आनंद लेने ही ससुराल गया था लेकिन वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी। शाम में कुछ बच्चे जरूर मुझसे मिलने आए लेकिन मेरी होली तो पहले ही फीकी हो चुकी थी। दरअसल,गाँव से लेकर शहर तक होली इतनी बदल चुकी थी और मुझे पता तक नहीं चला। जिस तरह ग्रामीण समाज में नैतिकता का ह्रास हुआ है,लोगों ने अपनी माँ-बहनों और रिश्तों की अहमियत को भुला दिया है उससे एक दिन तो ऐसा होना ही था। शहरी समाज में तो रक्त-संबंध होते ही नहीं इसलिए वहाँ तो परंपरागत होली की सोंचना भी नहीं चाहिए। अब गाँवों में भी लोग घूम-घूमकर ढोलक-झाल की थाप पर होली नहीं गाते और न ही घर-घर जाकर होली ही खेलते हैं। अब गाँवों में भी नववधुओं को रंगों में स्नान नहीं करवाया जाता। अब गाँवों में भी हर घर में प्रणाम करने या अबीर लगाने पर लोग सूखे नारियल,किशमिश आदि मेवों का मिश्रण नहीं खिलाते। अब गाँवों में भी होली के बाद भी आपसी दुश्मनी और रंजिश बनी रहती है और उसमें कमी लाने के बदले होली उसमें बढ़ोतरी ही कर जाती है। जब पूरा समाज ही अपने मूल स्वरुप से भटक गया हो तो होली को तो अपने मूल स्वरुप से दूर हो ही जाना था,सो हुआ। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 15 मार्च 2014

क्या मोदी मिट्टी के शेर हैं?

15-03-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अगर आपने भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार श्री नरेन्द्र मोदी को किसी रैली के मंच पर आते हुए देखा होगा तो यह भी देखा होगा कि जब वे मंच पर आते हैं तो उनके समर्थक नारा लगाते हैं कि शेर आया,शेर आया। मोदी ने गुजरात में अपने काम से और रैलियों में अपने भाषणों से ऐसा दर्शाया भी है कि वे दिलेर मर्द हैं और उनका सीना सचमुच 56 ईंच का है।
मित्रों,फिर ऐसा क्या हो गया है कि वही नरेंद्र मोदी इन दिनों एक-के-बाद-एक आत्मघाती कदम उठाते चले जा रहे हैं। पहले उन्होंने घोर अवसरवादी रामविलास पासवान से बिहार में गठबंधन कर लिया वो भी तब जबकि सीबीआई ने उनके खिलाफ बोकारो कारखाना नियुक्ति घोटाला में तगड़े सबूत जुटा लिए थे। इतना ही नहीं रामविलास पासवान ने जिन उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा है वे या तो उनके परिजन हैं या फिर राज्य के सबसे बड़े अपराधी। आप ही सोंचिए कि क्या समाँ बंधेगा जब स्वच्छ छविवाले वरिष्ठ नेता डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह के खिलाफ अपराधी-शिरोमणि रामा सिंह चुनाव लड़ेंगे?! हमारे कुछ मोदी समर्थक मित्र फेसबुक पर कह रहे हैं कि चाहे कुत्ता खड़ा हो या गदहा हम तो उसे ही जिताएंगे क्योंकि मोदी को प्रधानमंत्री बनाना है। क्या ऐसा करने से ही लोकसभा में अपराधियों का प्रतिशत कम होगा? आज अगर हम चुप रहे तो फिर अगले 5 सालों तक हम किस मुँह से आँकड़ा दिखाकर आरोप लगाएंगे कि देखिए कैसे लोकसभा अपराधियों का जमावड़ा बनती जा रही है?
मित्रों,इतना ही नहीं हरियाणा में विनोद शर्मा,कर्नाटक में श्रीरामुलु को टिकट देने की बेताबी से तो ऐसा ही लग रहा है कि नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनावों में हार के डर से यानि 272 का आँकड़ा प्राप्त नहीं होने के भय से भयभीत हो गए हैं और इसलिए ताबड़तोड़ उल्टे-सीधे गठबंधन करते जा रहे हैं। क्या मोदी नहीं जानते कि लंपट राज ठाकरे से महाराष्ट्र में गठबंधन करने की स्वाभाविक प्रतिक्रिया बिहार में होगी? अगर इसी तरह भयभीत होकर वे उल्टे-सीधे कदम उठाते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब उनके पक्ष में बनी-बनाई हवा हवा हो जाएगी क्योंकि हवा बनाने में जहाँ महीनों लग जाते हैं वहीं हवा के खराब होने के लिए एक रात ही काफी होती है। कितना विडंबनापूर्ण सत्य है कि एक तरफ तो मोदी कांग्रेसी शहजादे की आलोचना करते रहे हैं वहीं दूसरी ओर खुद उनकी ही पार्टी ने इतने शहजादों को टिकट बाँटे हैं कि शहजादों की एक फौज ही खड़ी हो गई है।
मित्रों,युद्ध के मैदान में या तो हार होती या फिर जीत। शेरदिल योद्धा वही होता है जिसके मन में हार का भय एक क्षण के लिए भी घर न करने पाए। अधर्मियों की सेना जमा करके कोई धर्मयुद्ध कैसे लड़ सकता है? जब चुनावों से पहले भाजपा भी वही कर रही है जो कांग्रेस और आप पार्टी कर रही है तो फिर कैसे यकीन किया जाए कि चुनावों के बाद वह वह सब नहीं करेगी जो कांग्रेसनीत केंद्र सरकार पिछले 10 सालों से करती आ रही है? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 11 मार्च 2014

राजीव गांधी के नाम पर स्विस बैंक में 198000 करोड़ रुपया-विकीलिक्स

नई दिल्ली (एजेंसी)। विकीलिक्स ने स्विस बैंक में पैसा रखनेवाले 29 भारतीयों की सूची जारी की है जिसके अनुसार बैंक में राजीव गांधी के नाम पर एक लाख अंठानबे हजार करोड़ रुपया जमा है। विकीलिक्स ने दावा किया है उसके पास इन कालाधन धारकों के खिलाफ ठोस सबूत भी मौजूद हैं। सूची में उल्लिखित मुख्य नाम इस प्रकार हैं-
राजीव गाँधी (198000)
ए राजा (7800)
हर्षद मेहता (135800)
केतन पारीख (8200)
रामदेव पासवान (3500)
एच डी कुमारस्वामी (14500)
लालू प्रसाद यादव (29800)
पवन सिंह घटोवार (3908)
नीरा राडिया (289990)
एम के स्टालिन (10500)
ज्योतिरादित्य सिंधिया (9000)
कलानिधि मारन (15000)
एम् करूणानिधि (35000)
शरद पवार (28000)
सुरेश कलमाड़ी (5900)
पी चिदम्बरम (32000)
राज फाउंडेशन (189008)।
सूची का लिंक इस प्रकार हैः-http://www.hoaxorfact.com/images/jreviews/36_listofblackmoneyholders-1328610253.JPG
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 10 मार्च 2014

क्या सुशासन का मतलब कदाचार भी है?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों पूरे बिहार में मैट्रिक की परीक्षा चल रही है। जैसा कि आप जानते हैं कि परीक्षा का मतलब होता है पराये की ईच्छा लेकिन बिहार ने इस साल सुशासन ने इसकी परिभाषा ही बदल दी है और मैट्रिक की परीक्षा में इस शब्द का मतलब हो गया है स्वेच्छा। चाहे चुनावी मौसम में वोट-बैंक के नाराज हो जाने का खतरा हो या फिर कुछ और इस साल बिहार की मैट्रिक-परीक्षा में कदाचार की गंगा बह रही है।
मित्रों,राज्य के लगभग प्रत्येक केंद्र पर विद्यार्थियों के साथ 5 स्टार मेहमानों जैसा सलूक किया जा रहा है। भीतर में तो किताब खोलकर लिखने की आजादी है ही बाहर से उनके परिजनों को भी चिट-पुर्जे पहुँचाने की पूरी छूट दी जा रही है। अलबत्ता इस प्रक्रिया में होम गार्ड और बिहार पुलिस के जवानों को जरूर कुछ आमदनी हो जा रही है। एक बार फिर से प्रत्येक केंद्र पर परीक्षार्थियों से इस लाजवाब सुविधा के बदले में हजारों रुपए की सुविधा-शुल्क परीक्षा-केंद्र के शिक्षकों व प्राचार्यों ने वसूली है।
मित्रों,सवाल उठता है कि सुशासन की तुगलकी शिक्षा-नीति ने सरकारी स्कूलों में शिक्षा को समाप्त तो पहले ही कर दिया था अब उसने परीक्षा को भी मजाक बनाकर रख दिया है। प्रश्न उठता है कि इस माहौल में कोई विद्यार्थी पढ़ाई करे भी तो क्यों करे? जिन चंद विद्यार्थियों ने पढ़ाई की भी है वे भी मजबूरन किताबों की सहायता से परीक्षा दे रहे हैं क्योंकि उनको लगता है कि किताब में तो सही लिखा होगा ही याद्दाश्त का क्या भरोसा? मैं श्री नीतीश कुमार जी से पूछना चाहता हूँ कि क्या जरुरत है ऐसी परीक्षा लेने की? सीधे क्यों नहीं विद्यार्थियों को डिग्री थमा देते? ऐसा करने से तो वोट-बैंक और भी ज्यादा मजबूत होगा। क्यों परीक्षार्थियों को घर से 30-40 किलोमीटर दूर आकर परीक्षा देने को मजबूर किया? उनके खुद के विद्यालय में ही क्यों नहीं ले ली गई परीक्षा? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

केजरीवाल के 16 सवालों के 17 जवाब

07-03-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,गुजरात में विकास के दावों की पड़ताल करने पहुंचे आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने 2 दिन प्रदेश में घूमने के बाद नरेंद्र मोदी की तरफ से 16 सवाल उछाल दिए और कहा कि मैं इन सवालों का जवाब मांगने उनसे मिलने जा रहा हूं। हालांकि, पहले से मिलने का समय नहीं लेने की वजह से उनके काफिले को गांधीनगर में सीएम ऑफिस से पहले ही रोक लिया गया। इसके बाद पार्टी नेता मनीष सिसोदिया मुख्यमंत्री के सेक्रेटरी से मिलने पहुंचे और वक्त मांगा, लेकिन फिलहाल मिलने का समय नहीं मिला।
गुजरात में दो दिनों के दौरे के बाद अरविंद केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि गुजरात में विकास के बारे में नरेंद्र मोदी जो दावे करते हैं, वे खोखले हैं। केजरीवाल ने कहा कि मोदी के तमाम दावे झूठ की बुनियाद पर टिके हैं। उन्होंने कहा कि मोदी कहते हैं कि यहां रोजगार के अवसर सबसे ज्यादा हैं, लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। प्रदेश में भारी बेरोजगारी है।
केजरीवाल ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि मोदी को बताना होगा कि उनका मुकेश अंबानी से क्या रिश्ता है? उन्हें बताना होगा कि आखिर करप्शन के आरोपों के बाद भी बाबू भाई बुखेरिया और पुरुषोत्तम सोलंकी जैसे लोगों को अब तक मंत्री क्यों बना रखा है?
साथ ही अरविंद केजरीवाल ने गुजरात में मोदी के 11 फीसदी कृषि विकास दावे को भी बेबुनियाद करार दिया। उन्होंने पूछा कि अगर गुजरात में कृषि क्षेत्र में विकास इतना ज्यादा है तो सैकड़ों की संख्या में किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? उन्होंने कहा कि गुजरात में किसानों को पानी नहीं मिल पा रहा है।
इतना ही नहीं उन्होंने यह पूछा है कि नरेंद्र मोदी बताएं कि उनके पास कितने हवाई जहाज और कितने हेलिकॉप्टर हैं? अगर अपने नहीं हैं तो किनके हैं? क्या वह इसके लिए पैसे देते हैं या फिर मुफ्त में इसका इस्तेमाल करते हैं?
केजरीवाल के मोदी से 16 सवाल
1. क्या आप प्रधानमंत्री बनने के बाद केजी बेसिन से निकली गैस के दाम बढ़ाएंगे?
2.पढ़े-लिखे युवाओं को ठेके पर नौकरी क्‍यों दे रहे हैं और उन्‍हें मात्र 5300 रुपये प्रति महीना दे रहे हैं, इतने में कोई कैसे जिंदगी चलाएगा?
3. गुजरात के सरकारी अस्‍पतालों में इलाज की सुविधा क्‍यों नहीं है?
4. पिछले दस सालों में राज्‍य में लघु उद्योग क्‍यों बंद हुए हैं?
5. किसानों की जमीनें बड़े उद्योगपतियों को कौड़ियों के भाव क्‍यों दिए जा रहे? आपने किसानों की जमीन छीनकर अडानी और अंबानी को दे दी है।
6. आपके पास कितने निजी हेलिकॉप्‍टर या प्लेन हैं? आपने ये खरीदे हैं या बतौर तोहफा मिला है? आपकी हवाई यात्राओं पर कितना खर्च आता है और इसके लिए पैसे कहां से आते हैं?
7.आपने हाल में पंजाब में कहा था कि कच्छ के सिख किसानों की जमीन नहीं छीनी जाएगी, तो इस मामले में गुजरात सरकार सुप्रीम कोर्ट क्यों गई है?
8.गुजरात में विकास के दावे झूठे हैं, मोदी जी आप बताइए कि गुजरात में कहां विकास हुआ है?
9. आपके मंत्रिमंडल में दागी मंत्री क्यों शामिल है, बाबू भाई बुखेरिया और पुरुषोत्तम सोलंकी जैसे दागी मंत्री सरकार का हिस्सा कैसे बने हुए हैं?
10. गुजरात के किसान बेहाल है। किसान खुदकुशी कर रहे हैं। हाल के वर्षों में गुजरात में 800 किसानों ने खुदकुशी की, क्यों?
11. प्रदेश में रोजगार का बुरा हाल क्यों है और बेरोजगारी क्यों बढ़ी है?
12.चार लाख किसानों ने बिजली के लिए कई साल से आवेदन दिया है, उन्हें अब तक बिजली क्यों नहीं मिली है?
13. मुकेश अंबानी से आपके क्या रिश्ते हैं, आपने अंबानी परिवार के दामाद सौरभ पटेल को मंत्रिमंडल में क्यों जगह दी?
14. गुजरात में सरकारी स्कूलों के हालात बदहाल क्यों है?
15. सरकारी दफ्तरों में बहुत ज्यादा करप्शन है, विभागों में भारी भ्रष्टाचार क्यों है?
16. कच्छ के किसानों को पानी नर्मदा बांध के बावजूद आज तक क्यों नहीं मिला? सारा पानी उद्योगपतियों को दे दिया गया।
झूठ-शिरोमणि श्री अरविन्द केजरीवाल ने जो सवाल उछाले हैं उनकी सच्चाई का परीक्षण करते हुए अब हम उनके 16 सवालों का बारी-बारी से जवाब देंगे-
1) उस स्थिति में गैस के दाम बिल्कुल नहीं बढ़ाए जाएंगे बल्कि उनको तर्कसंगत रखा जाएगा जैसे कि अटल जी के समय में था। महंगाई को कम करने के लिए दाम में कमी भी की जा सकती है उसी तरह के उपायों द्वारा जैसे कि केजरीवाल ने दिल्ली में बिजली और पानी के दाम कम किए थे।
2) ठीक उसी तरह चलाएंगे जैसे कि दिल्ली में ठेके और फिक्स वेतन पर बहाल शिक्षक और परिवहन कर्मचारी केजरीवाल जी के 49 दिनों के महान शासन के बाद भी चला रहे हैं।
3) कहाँ देख लिया आपने कि गुजरात के अस्पतालों में इलाज की सुविधा नहीं है? गुजरात के ज्यादातर अस्पतालों में दिल्ली के अस्पतालों से भी ज्यादा अच्छी सुविधा है केजरीवाल के 49 दिनों के शासन के बाद भी।
4) जो लघु उद्योग प्रतिस्पर्धा में नहीं टिकेंगे वे बंद तो होंगे ही। क्या उनके बंद होने के लिए गुजरात सरकार सीधे-सीधे जिम्मेदार है? अभी पूरी दुनिया में मंदी का दौर था ऐसे में मांग कम होने पर लघु उद्योगों की हालत तो खराब होनी ही थी। भारत की विकास दर 5 प्रतिशत से भी कम हो गई है तो गुजरात अछूता कैसे रह सकता है?
5) किसानों की जमीनें बाजार भाव पर खरीदी गई हैं न कि कौड़ियों के भाव में। अगर ऐसा होता तो वहाँ के किसान भी प. बंगाल के किसानों की तरह विरोध जरूर करते।
6) जैसा कि अमित शाह पहले ही बता चुके हैं कि गुजरात सरकार के पास 3 जेट विमान और 8 हेलीकॉप्टर हैं और मोदी गुजरात सरकार के विमानों में उड़ान भरते हैं। जहाँ तक इसमें होनेवाले व्यय का सवाल है तो सारा खर्च पार्टी उठाती है जिसके फंड में पार्टी के करोड़ों कार्यकर्ता प्रति वर्ष 1000,5000 और 10000 रुपए का सदस्यता शुल्क देते हैं। इसके अलावा अभी पार्टी फंड में करोड़ों देशवासी खुलकर अपना योगदान दे रहे हैं।
7) सुप्रीम कोर्ट में तो सरकार पहले ही चली गई थी इसलिए अच्छा होगा कि दूध-का-दूध और पानी-का-पानी कोर्ट में ही हो जाए। जहाँ तक जमीन छीनने का सवाल है तो जमीन कोई कानून का उल्लंघन करके कैसे छीन सकता है गुजरात कोई कश्मीर तो है नहीं?
8) यह भी बताना पड़ेगा कि गुजरात में विकास कहाँ हुआ है? गुजरात की सड़कें और आधारभूत संरचना,वहाँ की विकास-दर खुद ही बताती है कि राज्य का कितना विकास हुआ है? आज भारतभर के मजदूरों की पसंदीदा कार्यस्थली गुजरात क्यों बना हुआ है अगर वहाँ का विकास नहीं हुआ है?
9) क्या सिर्फ आरोप लगने से ही कोई भ्रष्ट हो जाता है? क्या किसी कोर्ट ने उनको इसके लिए दोषी ठहराया है? क्या केजरीवाल के पास उनके पास कोई सबूत है जैसे कि कभी शीला दीक्षित के खिलाफ हुआ करते थे तो वे प्रस्तुत करें? भाजपा के आंतरिक लोकपाल ने अपनी जाँच में पाया है कि ये लोग पाक-साफ हैं।
10) आत्महत्या तो आईएएस भी करते हैं तो क्या वे गरीबी के कारण ऐसा करते हैं? आधुनिक जीवन-शैली ने आदमी के अकेलेपन को बढ़ा दिया है और आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण तनाव है न कि गरीबी। अगर गरीबी इसका कारण होता तो गरीब राज्यों के किसान ज्यादा आत्महत्या करते। क्या केजरीवाल जी बताएंगे कि उनको ये झूठे आँकड़े कहाँ से मिले और कितने सालों में उनके कथनानुसार 800 किसानों ने आत्महत्या की? क्या वे बताएंगे कि विदर्भ में पिछले एक साल में कितने किसानों ने आत्महत्या की है?
11) जब रोजगार-कार्यालय में निबंधित 99 प्रतिशत बेरोजगारों को रोजगार मिल रहा है तो फिर कहाँ बेरोजगारी बढ़ रही है? गुजरात तो दूसरे राज्यों के भी लाखों बेरोजगारों को रोजगार दे रहा है तो वहाँ के लोग कैसे बेरोजगार हो सकते हैं?
12) फिर से झूठ। गुजरात में बिजली के पेंडिंग आवेदनों की संख्या हजारों में है न कि लाखों में और इन सबका निपटारा शायद कुछ महीनों में ही कर दिया जाएगा।
13) क्या अंबानी के दामाद को मंत्री बनने का अधिकार नहीं है? क्या वह अच्छा प्रशासक नहीं हो सकता? केजरीवाल बताएंगे कि सोनिया के दामाद को क्लिनचिट देनेवाले युद्धवीर सिंह को उन्होंने टिकट क्यों दिया? सोनिया के दामाद से उनका क्या रिश्ता है? अंबानी के दामाद पर तो फिर भी भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है।
14) सरकारी स्कूल तो हर जगह बदहाल हैं। गुजरात के स्कूलों की हालत तो फिर भी अच्छी है। जब तक समाज के सम्मानित लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाएंगे इनकी स्थिति नहीं सुधरेगी। क्या केजरीवाल बताएंगे कि उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ने के लिए सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं भेजा?
15) कोई ऐसा दावा नहीं कर सकता कि गुजरात के दफ्तरों में भ्रष्टाचार है ही नहीं लेकिन वहाँ पूरे भारत में सबसे कम भ्रष्टाचार जरूर है। ऐसा हम ऐसे ही नहीं बल्कि वहाँ रहनेवाले अपने रिश्तेदारों की आपबीति के आधार पर दावा कर रहे हैं।
16) कच्छ के किसानों को अगर सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल रहा है तो फिर पंजाब के उन सिख किसानों के खेत में पानी क्या केजरीवाल पटाते हैं जिनका कि जिक्र उन्होंने अपने सवालों में किया है? नहरों में जब पानी आएगा तो उसमें से ही किसानों के साथ-साथ उद्योगपतियों को भी पानी दिया जाएगा। केजरीवाल जी बताएंगे कि क्या उनको उद्योग-धंधों से नफरत है? क्या वे चाहते हैं कि भारत की औद्योगिक विकास-दर ऋणात्मक हो जाए? भारत गुलाम हो जाए और पूरी तरह से बर्बाद हो जाए? क्या सीआईए ने आपको ऐसा ही करने को कहा है?
17) अब हम पूछेंगे और उत्तर देंगे आप केजरीवाल जी। आपका समय हुआ समाप्त और हमारा हुआ शुरू-क्या आप बताएंगे कि क्या आप सचमुच सीआईए के एजेंट हैं? क्या आदेश दिया है आपको अमेरिका में बैठे हुए आपके आकाओं ने? क्या आपका पाकिस्तानी आईएसआई के साथ भी कोई संबंध है? क्या इस खेल में आपके साथ-साथ कांग्रेस पार्टी भी शामिल है? क्या दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी में खटमल है फिर उसने शीला दीक्षित को क्यों नहीं काटा? आपने अपना दिल्लीवाला सरकारी आवास तय समय में क्यों खाली नहीं किया? क्या आप उसको कभी खाली करेंगे भी? क्या आपको पता नहीं कि सामान्य शिष्टाचार कहता है कि किसी से मिलना हो तो पहले से समय ले लेना चाहिए? मोदी तो मोदी आप मुझ जैसे बेरोजगार से भी अगर बिना पहले से समय लिए मिलना चाहेंगे तो मैं भी आपसे नहीं मिलूंगा। यकीन नहीं हो तो प्रयास करके देख लीजिए। परसों आपकी कार का शीशा क्या सचमुच आपने खुद ही फोड़ा था जैसा कि कार के मालिक मनीष ब्रह्मभट्ट दावा कर रहे? आपने सच की तरह झूठ बोलना इसी जन्म में सीखा है या आपने कई जन्मों के परिश्रम के बाद इस काम में प्रवीणता प्राप्त की है?
हमको कोई हड़बड़ी नहीं है आप इत्मीनान से मेरे सवालों के उत्तर दे सकते हैं लेकिन उत्तर देने में झूठ नहीं बोलिएगा क्योंकि हमको झूठ से सख्त नफरत है। चलिए हम आपको एक सप्ताह का समय देते हैं मेरे इन आसान सवालों का उत्तर देने के लिए। हम नहीं मानते कि आपको इस सवालों के जवाब मालूम नहीं हैं बल्कि हम तो मानते हैं कि इन प्रश्नों के सबसे उम्दा जवाब आप ही दे सकते हैं। सवाल और भी हैं लेकिन मैं जानता हूँ कि आपको उत्तर देने की आदत नहीं है और आप मेरे द्वारा पूछे गए इन प्रश्नों के उत्तर नहीं देने जा रहे हैं इसलिए अभी इतना ही। जब आप मेरे इन प्रश्नों के उत्तर दे देंगे तो मैं आपसे निश्चित रूप से और भी सवाल पूछूंगा जो इन्हीं प्रश्नों की तरह अति सरल होंगे। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 6 मार्च 2014

मेरी सरकार खो गई है हुजूर

06-03-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैं इन दिनों बहुत परेशान चल रहा हूँ। होऊँ भी क्यों नहीं मेरी सरकार जो खो गई है। आप कहेंगे कि मुझे थाना जाना चाहिए मगर वहाँ तो पहले से ही सरकार नहीं थी। सरकार को इंटरनेट पर भी ढूंढ़ा मगर वहाँ भी नहीं मिली।
मित्रों,दरअसल कुछ महीने पहले तक बिहार में सरकार नाम की चीज थी लेकिन अब नहीं है। ऐसा भाजपा के सरकार से हटने के कारण हुआ है या इसका कोई और कारण है मुझे नहीं पता। आज से बिहार में दसवीं की परीक्षा होनेवाली है। हजारों छात्र-छात्राओं को एडमिट कार्ड नहीं मिला। कहते हैं कि उनको स्कूल ने अंडर एज बना दिया है। कैसे बना दिया,क्यों बना दिया और बनानेवालों पर क्या कार्रवाई होगी या नहीं या इन बच्चों का क्या होगा कोई नहीं बता रहा है क्योंकि सरकार खो गई है हुजूर! मैं अब तक भ्रम में था कि बिहार में संवैधानिक सरकार चल रही है। तभी एक दिन ससुराल गया,कुबतपुर (भिखनपुरा)। लैपटॉप लेकर गया कि जेनरेटर की सायंकालीन बिजली से बैट्री चार्ज कर लूंगा और वहीं से समाचार डालूंगा। मगर उस शाम जेनरेटर की बिजली आई ही नहीं। फिर सोंचा कि गांव में बिजली लाई जाए।  सो हाजीपुर वापस लौटते ही पहले वैशाली जिले के बिजली विभाग के कार्यपालक अभियंता को फोन लगाया। श्रीमान को बताया कि इस गांव में 8 साल से ट्रांसफार्मर जला हुआ है और ठेकेदार 20000 रुपया घूस में मांग रहा है। महोदय ने छूटते ही कहा कि वे इस बारे में कुछ नहीं कर सकते। मैंने पूछा कि फिर कौन कर सकता है तो बताया गया कि वहाँ ट्रांसफार्मर पॉवर ग्रिड कारपोरेशन ऑफ इंडिया के माध्यम से लग रहा है। फिर इंटरनेट पर खोजखाज कर ग्रिड कारपोरेशन का नंबर निकाला। फोन करने पर फोन उठानेवाले महाशय ने एक नंबर देकर बताया कि इस नंबर पर फोन करिए कोई झा जी उठाएंगे। फिर मैं दिनभर फोन करता रहा मगर किसी ने फोन नहीं उठाया। फिर मैंने सोंचा कि हाजीपुर के सांसद रामसुंदर दास से शिकायत करता हूँ मगर उनका तो फोन ही ऑफ था शायद रमई राम ने मीडिया में कोई बयान दे दिया था जिससे दासजी नाराज हो गए थे। वैसे इससे पहले भी मैं इसी मामले में उनको फोन कर चुका हूँ लेकिन तब भी उनके पीए ने उनसे बात नहीं होने दी थी और टाल दिया था। उनके पुत्र और राजापाकर के विधायक संजय कुमार जी का नंबर तो चुनाव जीतने के बाद से ही हमेशा ऑफ रहता है इसलिए उस दिन भी ऑफ था। बिजली बोर्ड के संजय अग्रवाल को भी फोन मिलाया तो पता चला कि वे मीटिंग में हैं। फिर फोन लगाया बिजली मंत्री को। पीए ने कहा कि मंत्रीजी हाऊस में हैं फैक्स कर दीजिए। अंत में थकहारकर एक समाचार बनाया 17 फरवरी को 'एक गांव सुशासन ने जिसकी रोशनी छीन ली' शीर्षक से और उसको बिहार के मुख्यमंत्री,ऊर्जा मंत्री,संजय अग्रवाल जी,पावर ग्रिड ऑफ इंडिया को भी ईमेल कर दिया। कुछ दिन बाद बिजली विभाग से अधिकारी गांव आए भी और सतही पूछताछ करके वापस चले गए और गांववालों की जीते जी दोबारा बिजली देखने की उम्मीद धरी-की-धरी रह गई। दोबारा भी एक खबर बनाई 3 मार्च को 'फिर किस मुँह से वोट मांगेंगे नीतीश कुमार?' शीर्षक से,फिर से सबको ईमेल किया लेकिन अभी तक ट्रांसफार्मर और ट्रांसफार्मर लगानेवाले ठेकेदार का कहीं अता-पता नहीं है। सोंच रहा हूँ कि अब किसको ईमेल करूँ एंजिला मार्केल को या ओबामा को?
मित्रों,इसी बीच मेरे वयोवृद्ध चाचाजी हाजीपुर आए और बताया कि मेरे गांव जुड़ावनपुर बरारी में पिछले 2 सालों से न तो वृद्धावस्था पेंशन का और न ही विधवा पेंशन का ही वितरण हुआ है। मैं सुनकर सन्नाटे में आ गया यह सोंचकर कि ऐसा कैसे हो सकता है? सरकार तो वृद्धों और महिलाओं का बहुत सम्मान करती है। तुरंत बीडीओ को फोन मिलाया। उसने बताया कि हमारी पंचायत का पंचायत सेवक रविशंकर प्रसाद कई महीनों से ड्यूटी पर नहीं आ रहा है। मैंने पूछा कि वेतन कैसे पा जाता है तो उन्होंने बताया कि उनको पता नहीं। फिर किसे पता होगा तो कहने लगे कि यह भी मुझे नहीं पता। फिर मैंने कहा कि शशिभूषण जी आपके प्रखंड कार्यालय में तो लाभार्थियों की सूची होगी न उससे क्यों नहीं बँटवाते हैं तो उन्होंने आश्वासन दिया कि इसी आगामी सोमवार से बँटवा देंगे। लेकिन देखते-देखते कई सोमवार बीत गए पेंशन नहीं बँटा। इसी बीच मेरे चाचाजी फिर से हाजीपुर आए और बताया कि एक-एक व्यक्ति का 10-10 हजार से ज्यादा का पेंशन मद में सरकार पर बकाया हो गया है। मैंने फिर से सरकार को ढूंढ़ने की कोशिश की और इस बार सीधे डीएम को फोन किया। तारीख थी-28 फरवरी।  उन्होंने बड़ा छोटा-सा उत्तर दिया कि देखता हूँ। अभी कल चाचाजी ने बताया कि अब तक भी पैसा नहीं मिला है ऊपर से बच्चों को छात्रवृत्ति भी नहीं मिली है। कल ही फिर से मैंने डीएम को फोन लगाया तो फिर से उनका वही उत्तर था कि देखते हैं। वह कैसे देखते हैं कि देखते ही नहीं हैं यह तो उनको ही पता होगा। फिर मैंने राघोपुर विधायक सतीश कुमार को फोन लगाया। उन्होंने फोन तो नहीं उठाया लेकिन उधर से पलटकर फोन जरूर किया। मैंने जब समस्या बताई तो कहा कि वे अकेले क्या करें यहाँ तो हर कोई भ्रष्ट है। पहलेवाला बीडीओ पूरा गोबर था। उसकी बदली करवा दी है। नई बीडीओ आई है अब शायद पेंशन बँट जाए। जब मैंने छात्रवृत्ति का मुद्दा उठाया तो उन्होंने बताया कि सरकार ने ही स्कूलों में कम पैसा भेज दिया है। शिक्षक छात्रों द्वारा पीटे जाने के डर से बाँटने को तैयार ही नहीं हैं सो उन्होंने नियमावली बना दी है कि सबसे पहले पैसा एससी को,फिर अतिपिछड़ों को,फिर पिछड़ों को और अगर फिर भी पैसा बच जाए तो सामान्य वर्ग को दिया जाए मगर शिक्षक फिर भी हंगामे से डर रहे हैं।
मित्रों, तत्क्षण मेरी समझ में आ गया कि जिले के विभिन्न स्कूलों में छात्रवृत्ति को लेकर हंगामा क्यों हो रहा है। यह आग तो खुद सरकार ने ही लगाई है। उसी सरकार ने जिसको मैं ढूंढ़ रहा हूँ और जो मेरे खोजने से भी नहीं मिल रही है। न जाने कहाँ गुम हो गई है हमारी सरकार? कहाँ जाकर ढूंढूँ समझ में नहीं आता? मैं कोई अफीमची तो हूँ नहीं कि पैसा कहीं भी अंधेरे में गिरे उसे उजाले में जाकर ही ढूंढूंगा नहीं तो अमेरिका या जर्मनी जाकर ढूंढ़ता। इसी बीच राघोपुर का पीपा पुल फिर से टूट गया है मगर मुझमें इतनी हिम्मत नहीं बची है कि मैं किसी को फोन करूँ। वैसे आपने अगर कहीं हमारी सरकार को देखा तो जरूर बताईगा। मुझे अपने गांव में पेंशन और छात्रवृत्ति बँटवानी है और अपनी ससुराल में बिजली लानी है। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 3 मार्च 2014

फिर किस मुँह से वोट मांगेंगे नीतीश कुमार?

3-3-2014,कुबतपुर (भिखनपुरा) (देसरी)। ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,वर्ष 1995 में विधानसभा चुनाव का प्रचार पूरे शबाब पर था। नीतीश कुमार जनता दल से अलग हो चुके थे और समता पार्टी का गठन कर चुके थे। नीतीश हरनौत से विधानसभा सदस्यता के लिए उम्मीदवार भी थे। तब उनका भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन नहीं हुआ था। तभी नीतीश ने लालू को चुनौती दी कि वे एक बार भी वोट मांगने हरनौत नहीं जाएंगे और फिर भी चुनाव जीत जाएंगे। बाद में उन्होंने ऐसा किया भी और चुनाव भी जीते। हालांकि लालू ने उनकी चुनौती स्वीकार तो कर ली लेकिन बाद में बात से मुकरते हुए कई-कई बार राघोपुर का दौरा किया।
मित्रों,एक बार फिर से उन्हीं नीतीश कुमार ने उसी तरह का दावा किया है। मुख्यमंत्री जी का कहना है कि वर्ष 2015 के विधानसभा चुनावों की घोषणा से पहले अगर बिहार के प्रत्येक गांव में बिजली नहीं पहुँची तो वे विधानसभा चुनावों में जनता से वोट ही नहीं मांगेंगे। जाहिर है इस बार नीतीश कुमार जी के समक्ष चुनौती 1995 के मुकाबले काफी कठिन है। बिहार में अभी भी हजारों गांव ऐसे हैं जो बिजली की रोशनी से वंचित हैं और विधानसभा चुनावों की घोषणा होने में डेढ़ साल से भी कम समय बचा है। चुनौती इसलिए भी ज्यादा कड़ी है क्योंकि बिहार की अफसरशाही नहीं चाहती कि बिहार के प्रत्येक गांव में बिजली पहुँचे। बिहार राज्य विद्युत बोर्ड के अधिकारी नहीं चाहते कि बिहार के प्रत्येक गांव में रहनेवालों तक विकास की रोशनी पहुँचे।
मित्रों,जैसा कि आप जानते हैं कि मैंने 17 फरवरी,2014 को एक समाचार 'एक गांव सुशासन ने जिसकी रोशनी छीन ली' लिखा था जिसमें मैंने एक ऐसे गांव कुबतपुर (भिखनपुरा) के दर्द को शब्द प्रदान किया था जिसकी बिजली सुशासन बाबू के शासन में ही छिन गई लगभग 700 की आबादी वाले इस गांव ने वर्ष 2006 से बिजली की रोशनी नहीं देखी। पिछले 8 साल से दिन ढलते ही पूरा गांव अंधेरे के महासागर में डूब जाता है। मेरे लिखने और समाचार को मुख्यमंत्री, ऊर्जा मंत्री और बिजली विभाग के आला अधिकारियों को ई-मेल करने के कुछ दिन बाद विभाग अधिकारियों की एक टीम गांव पहुँची और पूछताछ की। पता चला कि वे लोग वहाँ मुझे खोज रहे थे।
मित्रों,मैं एक पत्रकार हूँ क्या यह संभव है कि मैं हर जगह मौजूद रहूँ? वैसे अगर कोई चाहे तो मुझसे मेरे नंबर 7870256008 पर जब चाहे बात कर सकता है। गांववालों को लगा कि अब उनकी मुश्किलों के हल होने के दिन निकट आ गए हैं लेकिन फिर सबकुछ पूर्ववत हो गया। न तो गांव में ठेकेदार आया और न ही जला हुआ ट्रांसफॉर्मर ही लगा। कदाचित् बिजली बोर्ड वाले भी चाहते हैं कि गांववाले ठेकेदार की रिश्वत की मांग को मान लें या फिर वे चाहते हैं कि अंधेरा कायम रहे। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर इस गांव सहित बिजली से वंचित हजारों गांवों में विधानसभा चुनावों की घोषणा तक बिजली नहीं आई तो फिर नीतीश कुमार चुनावों में वोट किस मुँह से मांगेंगे? 1995 में तो उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा की पूरे मनोयोग से रक्षा की थी तो क्या वे इस बार अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ देंगे? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

यह 24000 करोड़ किसका है सहारा श्री जी?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हम काफी दिनों से यह सुनते आ रहे थे कि अपने देश में काले धन को सफेद धन में बदला जाता है। अभी तक तो हम सुनते ही थे अब अपनी आँखों से देख भी रहे हैं कि कैसे सहारा श्री अज्ञात सफेदपोश लोगों के धन को काला से उजला बना रहे हैं। वे बताते हैं कि उनकी कंपनी में लाखों निवेशकों ने 24000 करोड़ रुपये लगाए हैं लेकिन सेबी के पूछने पर वे यह नहीं बता पाते कि वे लाखों निवेशक हैं कौन? प्रश्न अब यह नहीं है कि 24000 करोड़ रुपये हैं भी या नहीं बल्कि उससे भी बड़ा सवाल अब यह पैदा हो गया है कि निवेशक हैं भी या नहीं? अगर हैं तो उनका नाम और पता क्या है? किसी निवेशक का पता सिर्फ एनएच 2 या 4 तो नहीं हो सकता।
मित्रों,तो क्या यह 24000 करोड़ रुपया नेताओं का है जिसको सुब्रत राय अवैध तरीके से सफेद धन में बदलने का असफल प्रयास कर रहे थे? देखना तो यह भी है कि सुब्रत राय को उनकी खुद की चहेती सरकार की पुलिस किस प्रकार से हिरासत में रखती है। उनको आम आदमी की तरह हिरासत में रखती है या फिर पाँच सितारा सुविधाएँ उपलब्ध करवाती है और कानून की नजर में सबके समान होने के सिद्धांत का खुलेआम मखौल उड़ाती है? जाहिर है कि सहारा श्री देश के बड़े रसूखदार लोगों में से हैं ऐसे में उनको सजा दिलवाना किसी भी तरह आसान नहीं रहनेवाला है क्योंकि आज कानून गांधी के जमाने से भी ज्यादा पैसेवालों की रखैल बन चुका है। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

भाजपा के लिए आत्मघाती होगा रामविलास से गठबंधन

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों, पिछले दो दिनों से ऐसी चर्चा बिहार में जोरों पर है कि भारतीय जनता पार्टी और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के बीच लोकसभा चुनावों के लिए चुनावी गठबंधन हो गया है। सूत्रों के अनुसार इस गठबंधन के लिए पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का ज्यादा जोर है। पता नहीं सुशील कुमार मोदी को ऐसा क्यों लगता है कि भाजपा बिहार में अकेली चुनावों में जा ही नहीं सकती है। यह वहीं मोदी हैं जिन्होंने बिहार में कभी भाजपा का गठबंधन उस पार्टी से करवाया था जिसको 1995 के चुनावों में मात्र 6 विधानसभा सीटें मिली थीं और वो भी बड़ा भाई बनाकर और अपनी पार्टी से ज्यादा सीटें देकर जबकि 1995 में भाजपा के पास 30 विधानसभा सीटें थीं। यह वही छोटे मोदी हैं जिनको अभी कुछ महीने पहले तक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पीएम पद के लिए योग्यतम व्यक्ति नजर आते थे।
मित्रों,छोटे मोदी ने एकबार फिर से भाजपा को बेमेल और आत्मघाती गठबंधन की आग में झोंकने की नापाक कोशिश की है। उपेंद्र कुशवाहा से गठबंधन किया कोई बात नहीं क्योंकि उनपर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है लेकिन रामविलास पासवान से गठबंधन क्यों? ऊपर से छोटे मोदी रामविलास पासवान के खिलाफ सीबीआई जाँच के मामले में उनका खुलकर बचाव भी कर रहे हैं जबकि बोकारो स्टील कारखाने के प्रस्तावित बेतिया इकाई में बहाली में केंद्रीय मंत्री रहते उनके खिलाफ जमकर भ्रष्टाचार करने के सबूत सामने आ चुके हैं। ऊपर से रामविलास पासवान का बिहार में कोई खास वोट-बैंक भी नहीं है। पिछले लोकसभा चुनावों में तो हाजीपुर में उनको उनकी अपनी जाति ने भी एकजुट होकर वोट नहीं दिया था ऐसे में यह तो निश्चित है कि इस गठबंधन से भाजपा को मतों की दृष्टि से कोई लाभ नहीं होने जा रहा है। गठबंधन से जो भी लाभ होगा वह एकतरफा होगा और लोजपा को होगा।
मित्रों,हम सभी जानते हैं रामविलास पासवान राज्य के ही नहीं देश के भी महानतम अवसरवादी नेता है। वे सत्ता से दूर रह ही नहीं सकते। उनको केंद्र में मंत्री बनकर मलाई काटने की पुरानी बीमारी है। भूतकाल में अगर हम झाँककर देखें तो  1998 में रामविलास ने भाजपा के साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा था और केंद्र सरकार में महत्त्वपूर्ण विभागों के मंत्री भी रहे थे। बाद में जब उनको संचार मंत्रालय से हटा दिया गया तो उन्होंने गुजरात दंगों का बहाना बनाकर मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। 1999 में लोकसभा में विश्वास-प्रस्ताव पर मतदान के दौरान उन्होंने राजग को धोखा दिया जिससे वाजपेयी जी की सरकार एक मत से गिर गई थी। फिर आज तो गुजरात दंगों के समय मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी भाजपा के पीएम उम्मीदवार हैं फिर रामविलास भाजपा के साथ कैसे गठबंधन कर सकते हैं और भाजपा भी ऐसे धोखेबाज के साथ कैसे गठबंधन बना सकती है? शायद रामविलास जी कांग्रेस पर ज्यादा सीटों के लिए दबाव बनाने के लिए भाजपा से गठबंधन का झूठा स्वांग कर रहे हैं या फिर कांग्रेस पर उनके खिलाफ सीबीआई जाँच रोकने के लिए बीजेपी से गठबंधन का नाटक कर रहे हैं। अगर वे भाजपा से सचमुच में गठबंधन करना चाहते हैं तो इसका एक कारण तो मोदी लहर हो सकती है और दूसरा कारण चुनावों के बाद बननेवाली एनडीए सरकार के समय सीबीआई के शिकंजे में आने से खुद को बचाना। श्री पासवान से गठबंधन करते समय भाजपा को इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि रामविलास मूलतः लालू-मुलायम-येचुरी-सोनिया-ममता-जया आदि की तरह मुस्लिमपरस्त नेता हैं और स्वार्थवश अभी वे भले ही एनडीए की बारात में डांस करने को तैयार हो जाएँ लेकिन कभी भी बारात से भाग सकते हैं और पिटवा भी सकते हैं। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

क्या केजरीवाल और अंबानी में साँठगाँठ है?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। रविवार को रोहतक में रैली करने पहुंचे अरविन्द केजरीवाल ने क्या बातों ही बातों में अपनी ही पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष की पोल खोल दी है? अगर घटनाओं को सही मानें तो शायद हां। रविवार को रोहतक में रैली करने पहुंचे अरविन्द केजरीवाल के साथ आईबीएन-7 के पूर्व एडीटर इन चीफ आशुतोष भी थे। उन्होंने वहां अरविन्द से पहले रैली को संबोधित भी किया। लेकिन जब खुद केजरीवाल संबोधित करने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने ऐसी बात कह दी जिससे शक हुआ कि कहीं वे यह बात अपनी ही पार्टी के नेता आशुतोष के बारे में तो नहीं कह गए?
असल में रोहतक की रैली में अरविन्द केजरीवाल ने मुकेश अंबानी और मोदी के साथ साथ मीडिया पर भी जमकर हमला बोला और कहा कि मीडिया का एक हिस्सा जानबूझकर उन्हें और उनकी पार्टी को बदनाम कर रहा है। केजरीवाल ने मीडिया पर सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि यह सब मुकेश अंबानी के इशारे पर हो रहा है क्योंकि मीडिया में आज हर जगह मुकेश अंबानी का पैसा लगा हुआ है।
मुकेश और मीडिया के रिश्तों पर बोलते बोलते अरविन्द केजरीवाल बोल गये कि कैसे एक एडीटर इन चीफ उनके पास आया और कहने लगा कि उसके ऊपर दबाव बनाया जा रहा है कि वह मोदी के बारे में ही खबरें दिखाएं। उस एडीटर इन चीफ से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई और उसने अरविन्द से कहा कि इसलिए उसने इस्तीफा दे दिया है।
अगर अरविन्द की बात को सही मानें और मीडिया में मुकेश अंबानी की मौजूदगी को देखें तो निश्चित रूप से यह एडीटर इन चीफ कोई और नहीं बल्कि खुद आशुतोष ही हो सकते हैं क्योंकि आशुतोष जिस आईबीएन-7 के संपादक थे वह नेटवर्क-18 का हिस्सा है जिसमें मुकेश अंबानी ने पैसा निवेश कर रखा है। तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आशुतोष के आम पार्टी ज्वाइन करने की पोल खुद केजरीवाल ने ही खोल दी?
हालांकि ऐसा पहली बार हुआ है जब अरविन्द केजरीवाल खुद मीडिया के एक हिस्से पर जमकर बरसे और अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि अगर कोई खबर ऐसी दिखे जिसे देखकर लगे कि यह जानबूझकर गलत खबर चलाई जा रही है तो पार्टी कार्यकर्ता टीवी चैनलों के दफ्तर में फोन करके अपना विरोध दर्ज करवाएं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर ये लोग गलत खबर दिखाना बंद नहीं करते हैं तो मीडियावालों को भी ठीक करना पड़ेगा।
हालाँकि अधिकतर टीवी दर्शकों का यह मानना है कि आईबीएन 7 आशुतोष के होते हुए तो केजरीवाल का समर्थक था ही उनके हटने के बाद तो और भी अंधसमर्थक ही हो गया है। दिन-रात नॉन स्टॉप सिर्फ केजरीवाल के पक्ष में ही समाचार और कार्यक्रम चलाता रहता है। तो क्या केजरीवाल और अंबानी में भी भीतर-ही-भीतर साँठगाँठ है? अगर ऐसा नहीं है तो फिर आईबीएन 7 आज केजरीवाल का सबसे बड़ा समर्थक चैनल क्यों बना हुआ है? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

फिर तो आईपीएल इंडियन फिक्सिंग लीग बन जाएगा?

22-2-14,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जैसा कि बीसीसीआई सूत्रों ने मीडिया को बताया है कि इस साल का आईपीएल यानि आईपीएल 7 दक्षिण अफ्रीका में होने जा रहा है तो अगर ऐसा हुआ तो इस साल का आईपीएल इंडियन प्रीमियर लीग के बदले इंडियन फिक्सिंग लीग बन जाएगा। ऐसा होना सिर्फ इसलिए ही तय नहीं माना जा रहा क्योंकि दक्षिण अफ्रीका में सट्टेबाजी प्रतिबंधित नहीं है बल्कि इसलिए भी क्योंकि जस्टिस मुद्गल समिति ने आईपीएल सट्टेबाजी की जांच रिपोर्ट में बताया है कि सारी सट्टेबाजी के पीछे कुख्यात डॉन दाऊद इब्राहिम का हाथ है। रिपोर्ट में न सिर्फ मयप्पन को बल्कि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान धोनी और रैना को भी संदेह के घेरे में रखा है। विदित हो कि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में फिक्सिंग का गंदा खेल सबसे पहले दक्षिण अफ्रीका में ही उजागर हुआ था।
मित्रों,जिस तरह से दाऊद आसानी से आईपीएल सट्टेबाजी में भाग लेकर मैचों को फिक्स कर ले रहा है उससे आम जनता के मन में ऐसी आशंका भी उत्पन्न हो रही है कि न सिर्फ आईपीएल और बीसीसीआई में उसकी पैठ बनी हुई है बल्कि केंद्र सरकार के एक से ज्यादा मंत्री भी उसके ही इशारों पर नाचते रहे हैं। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सामने आने लगे केजरीवाल के 'मृत-दल' के छिपे हुए उद्देश्य

22-2-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपनी सबसे प्रसिद्ध कविता 'अंधेरे में' में कहा है कि
'भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब
साफ़ उभर आया है,
छिपे हुए उद्देश्य
यहाँ निखर आये हैं,
यह शोभायात्रा है किसी मृत-दल की।'
चुनावी महासमर नजदीक आने के साथ ही अरविंद केजरीवाल के छिपे हुए उद्देश्य भी सामने आने लगे हैं। केजरीवाल ने अपनी रणनीति बदलते हुए अपने 'मृत-दल' के निशाने पर नरेंद्र मोदी को राहुल गांधी से भी ऊपर कर लिया है। कांग्रेस को बचाने का उनका राक्षसी स्वार्थ अब साफतौर पर उभर आया है। भाजपा के पीएम प्रत्याशी की चौतरफा घेराबंदी के लिहाज से उन पर आरोपों की बौछार कर दी है। साथ ही उनके खिलाफ महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी के रूप में एक सशक्त उम्मीदवार उतारने की तैयारी भी कर ली है।
अरविंद केजरीवाल ने शुक्रवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रमुख मुकेश अंबानी के साथ रिश्तों को लेकर मोदी पर सवाल खड़े कर दिए। साथ ही उन्होंने अपने और अपने दल के ऊपर लगनेवाले किसी भी आरोप का स्पष्टीकरण न देने की महान परंपरा की रक्षा भी की है। उन्होंने यह नहीं बताया है कि वो ली कौन थी और उसका उद्देश्य क्या था? मोदी को पत्र लिखकर केजरीवाल ने कहा है, ‘लोग कहते हैं कि संप्रग की सरकार मुकेश अंबानी चला रहे हैं। अगर आपके पीछे भी मुकेश ही हैं तो लोगों के साथ धोखा हो जाएगा। किसी तरह आप प्रधानमंत्री बन भी जाते हैं तो क्या आपकी सरकार भी मुकेश ही चलाएंगे? चर्चा है कि आपकी एक-एक रैली पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि मुकेश अंबानी आपको फंड कर रहे हैं। क्या यह सच है?’ आप और राहुल गांधी देश-विदेश में घूमने के लिए हेलीकॉप्टर व निजी हवाई जहाजों का उपयोग करते हैं। खबरों के मुताबिक ये जहाज मुकेश अंबानी के हैं। ये फ्री में मिलते हैं या आप इनका किराया देते हैं? इस बीच परम प्रपंची और बुढ़ापे में नग्न नवयुवतियों के साथ शयन कर ब्रह्मचर्य संबंधी प्रयोग करनेवाले मोहनदास करमचंद गांधी के प्रपौत्र राजमोहन गांधी ने शुक्रवार को आम आदमी पार्टी की सदस्यता ली। उन्होंने कहा कि पार्टी का जो आदेश होगा उसका पालन करेंगे। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

क्या अन्ना विश्वसनीय व्यक्ति हैं?

19-2-18,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कथित गांधीवादी अन्ना हजारे ने एक बार फिर से अपने विचार बदल लिए हैं। कदाचित यू-टर्न लेने की उनमें और उनके कथित चेले अरविन्द केजरीवाल में होड़-सी लगी हुई है। कभी अन्ना को नीतीश कुमार अच्छे लगने लगते हैं तो कभी अरविन्द केजरीवाल और कभी ममता बनर्जी। आजकल ममता बनर्जी की बारी आई हुई है। इतना ही नहीं कभी अन्ना को संसद द्वारा पारित लोकपाल अच्छा लगने लगता है तो कभी केजरीवाल का जनलोकपाल। समझ में नहीं आता कि अन्ना आखिर चाहते क्या हैं? क्या उनका चित्त स्थिर है? क्या उनके ऊपर विश्वास किया जा सकता है? अन्ना की कौन-सी बात सही है और कौन-सी गलत?
मित्रों,आपको याद होगा कि जब अरविन्द केजरीवाल ने राजनैतिक दल के गठन की घोषणा की थी तो अन्ना ने खुलकर उसका विरोध किया था। फिर कभी उन्होंने केजरीवाल का विरोध किया तो फिर अगले ही दिन समर्थन भी कर दिया। अभी कुछ दिन पहले कांग्रेस ने संसद से लोकपाल को पास करने की घोषणा की। यह जानने के बावजूद अन्ना अनशन पर बैठ गए। फिर राहुल गांधी ने लोकपाल की जरुरत पर बल दिया और सरकार ने बिल लाकर उसे पारित करवा लिया। जब अन्ना और पूरे देश को पता था कि उक्त सत्र में सरकार लोकपाल लाने जा रही है तो फिर समझ में नहीं आता कि अन्ना क्यों अनशन पर बैठे? क्या वे इसका श्रेय पूरी संसद के स्थान पर सिर्फ राहुल गांधी को दिलवाना चाहते थे?
मित्रों,अभी तक अन्ना का जो विचित्र व्यवहार रहा है उससे ऐसा प्रतिध्वनित होता है कि अन्ना कहीं-न-कहीं कांग्रेसी हैं और वे चाहते हैं कि केंद्र में किसी-न-किसी तरह से कांग्रेस की ही सरकार रहे। हम अपने अनुभव के आधार पर जानते हैं कि चुनावों से पहले ये कथित धर्मनिरपेक्ष दल चाहे जितनी भी तू तू मैं मैं कर लें चुनावों के बाद सबके सब कांग्रेस से मिल जाते हैं। यहाँ तक कि सपा और बसपा जैसे धुर विरोधी दल भी कांग्रेसी घाट पर एकसाथ पानी पीने लगते हैं। फिर अन्ना की ऐसी क्या मजबूरी है कि वे हमेशा इन कथित धर्मनिरपेक्ष दलों का ही समर्थन करते हैं? पहले केजरीवाल अच्छे लगे लेकिन जब देखा कि यह बंदा तो अब काफी बदनाम हो चुका है तो उन्होंने एक अन्य ऐसे दल का समर्थन कर दिया जिसके नाम में भी कांग्रेस लगा हुआ है और जिसका चाल,चरित्र और चेहरा तो कांग्रेसवाला है ही। अन्ना को कैसे ममता का शासन अच्छा लग रहा है जबकि पश्चिम बंगाल के अस्पतालों में सरकारी भ्रष्टाचार के चलते जबसे ममता शासन में आई हैं मौत का तांडव चल रहा है।
मित्रों,मूलतः ममता और साम्यवादी दलों के शासन में कोई अंतर नहीं है। जो गुंडागर्दी और सामूहिक बलात्कार पहले साम्यवादी कार्यकर्ता कर रहे थे वही गुंडागर्दी और सामूहिक बलात्कार अब तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता कर रहे हैं। आखिर वो कौन-सा चश्मा है जिससे देखने पर अन्ना को ममता बनर्जी दूध की धुली नजर आ रही हैं?
मित्रों,प्रश्न उठता है कि क्या अन्ना दिल से भारत का भला चाहते हैं? क्या वे चाहते हैं कि भारत का तीव्रतर विकास हो और भारत से भ्रष्टाचार का समूल नाश हो जाए? अगर हाँ तो फिर उनको नरेंद्र मोदी और भाजपा से शत्रुता क्यों है? मुझे तो लगता है कि अन्ना उस दिलफेंक आशिक की तरह चलंतमति हैं जिसका दिल रह-रहकर कभी इस पर तो कभी उस पर आता रहता है। सिर्फ वंदे मातरम का नारा भर लगा देने से भारत महान नहीं हो जाएगा। ममता ने पश्चिम बंगाल में ऐसा क्या कर दिया है कि अन्ना उस पर मोहित हो गए? ममता का शासन तो इतना निर्मम है कि उसने एक बिहारी बेटी को जिसका कि बंगाल में सामूहिक बलात्कार हुआ था अपने हाल पर छोड़ दिया। यहाँ तक कि घटना के बाद लंबे समय तक बलात्कारियों को गिरफ्तार तक नहीं किया,ममता की पुलिस ने साक्ष्यों को नष्ट हो जाने दिया और जब बिहार सरकार ने उसकी मदद करनी चाही तो उसके एक मंत्री ने उसका भी विरोध किया।
मित्रों,हमें कोरे नारे नहीं चाहिए। नारे तो पिछले 65 सालों से लग रहे हैं। अब हमें मजबूर की जगह मजबूत सरकार चाहिए,अब हमें गठबंधन की जगह एकदलीय सरकार चाहिए,अब हमें नीति नहीं नीयत चाहिए, कोरे नारे नहीं धरातल पर काम चाहिए,योजनाएँ नहीं उनका सटीक और पारदर्शी क्रियान्वन चाहिए,ममता जैसी 10-20 सांसदों वाला कमजोर और पिलपिला प्रधानमंत्री नहीं 273 प्लस वाला सिंहनाद करनेवाला शेर चाहिए जिसकी गर्जना से चीन से लेकर अमेरिका तक काँपने लगे। वही अमेरिका जिसका एजेंट होने के आरोप इन दिनों यू टर्न गुरू अन्नाजी के चेले पर लग रहे हैं। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

क्या केजरीवाल सीआईए के एजेंट हैं?

नई दिल्ली (एजेंसी)।  आज दिल्ली भाजपा नेता डॉ. हर्षवर्धन ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से मिले होने के आरोप लगाए हैं और पूछा है कि उनका शिमिरित ली से किस तरह का संबंध रहा है? ऐसे में प्रश्न उठता है कि यह शिमिरित ली कौन है, शोधार्थी या सीआईए एजेंट? दस्तावेज बताते हैं कि वह बतौर शोधार्थी ‘कबीर’ संस्था से जुड़े थी। इस संस्था के गॉड-फादर अरविंद केजरीवाल रहे हैं। विदित हो कि अरविन्द केजरीवाल को जब रमन मैग्सेसे पुरस्कार दिया गया था तो विस्तार से बताया नहीं गया था कि उन्होंने ऐसी कौन-सी महान उपलब्धि प्राप्त की है। वैसे मैग्सेसे पुरस्कार की फंडिंग भी अमेरिकी संस्था फोर्ड फाउंडेशन ही करती है जिससे भारी मात्रा में चंदा लेने के आरोप केजरीवाल की संस्था कबीर पर लग रहे हैं।
शिमरित ली को लेकर अटकलें लग रही हैं, क्योंकि शिमरित ली कबीर संस्था में रहकर न केवल भारत में आंदोलन का तानाबाना बुन रही थी, बल्कि लंदन से लेकर काहिरा और चाड से लेकर फिलिस्तीन तक संदिग्ध गतिविधियों में संलिप्त थी। शिमिरित ली दुनिया के अलग-अलग देशों में विभिन्न विषयों पर काम करती रही है। भारत आकर उसने नया काम किया। कबीर संस्था से जुड़ी। प्रजातंत्र के बारे में उसने एक बड़ी रिपोर्ट महज तीन-चार महीनों में तैयार की। फिर वापस चली गई। आखिर दिल्ली आने का उसका मकसद क्या था? इसे एक दस्तावेजी कहानी और अरविंद केजरीवाल के संदर्भ में समझा जा सकता है।
बहरहाल कहानी कुछ इस प्रकार है। जिस स्वराज के राग को केजरीवाल बार-बार छेड़ रहे हैं, वह आखिर क्या है? साथ ही सवाल यह भी उठता है कि अगर इस गीत के बोल ही केजरीवाल के हैं तो गीतकार और संगीतकार कौन है? यही नहीं, इसके पीछे का मकसद क्या है? इन सब सवालों के जवाब ढूंढ़ने के लिए हमें अमेरिका के न्यूयार्क शहर का रुख करना पड़ेगा। न्यूयार्क विश्वविद्यालय दुनिया भर में अपने शोध के लिए जाना जाता है। इस विश्वविद्यालय में ‘मध्यपूर्व एवं इस्लामिक अध्ययन’ विषय पर एक शोध हो रहा है। शोधार्थी का नाम है, शिमिरित ली। शिमिरित ली दुनिया के कई देशों में सक्रिय है। खासकर उन अरब देशों में जहां जनआंदोलन हुए हैं। वह चार महीने के लिए भारत भी आई थी। भारत आने के बाद वह शोध करने के नाम पर ‘कबीर’ संस्था से जुड़ गई। सवाल है कि क्या वह ‘कबीर’ संस्था से जुड़ने के लिए ही शिमिरित ली भारत आई थी? अभी यह रहस्य है। उसने चार महीने में एक रिपोर्ट तैयार की। यह भी अभी रहस्य है कि शिमरित ली की यह रिपोर्ट खुद उसने तैयार की या फिर अमेरिका में तैयार की गई थी।
बहरहाल, उस रिपोर्ट पर गौर करें तो उसमें भारत के लोकतंत्र की खामियों को उजागर किया गया है। रिपोर्ट का नाम है ‘पब्लिक पावर-इंडिया एंड अदर डेमोक्रेसी’। इसमें अमेरिका, स्विट्जरलैंड और ब्राजील का हवाला देते हुए ‘सेल्फ रूल’ की वकालत की गई है। अरविंद केजरीवाल की ‘मोहल्ला सभा’ भी इसी रिपोर्ट का एक सुझाव है। इसी रिपोर्ट के ‘सेल्फ रूल’ से ही प्रभावित है, अरविंद केजरीवाल का ‘स्वराज’। अरविंद केजरीवाल भी अपने स्वराज में जिन देशों की व्यवस्था की चर्चा करते हैं, उन्हीं तीनों अमेरिका, ब्राजील और स्विट्जरलैंड का ही जिक्र शिमिरित भी अपनी रिपोर्ट में करती हैं।
‘कबीर’ के कर्ताधर्ता अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया हैं। यहां शिमरित के भारत आने के समय पर भी गौर करने की जरूरत है। वह मई 2010 में भारत आई और कबीर से जुड़ी। वह अगस्त 2010 तक भारत में रही। इस दौरान ‘कबीर’ की जवाबदेही, पारदर्शिता और सहभागिता पर कार्यशालाओं का जिम्मा भी शिमरित ने ही ले लिया था। इन चार महीनों में ही शिमरित ली ने ‘कबीर’ और उनके लोगों के लिए आगे का एजेंडा तय कर दिया। उसके भारत आने का समय महत्वपूर्ण है।
यहूदी परिवार से ताल्लुक रखने वाली शिमिरित ली को 2007 में कविता और लेखन के लिए यंग आर्ट पुरस्कार मिला। उसे यह पुरस्कार अमेरिकी सरकार के सहयोग से चलने वाली संस्था ने नवाजा। यहीं वह सबसे पहले सीआईए अधिकारियों के संपर्क में आई। जब उसे पुरस्कार मिला तब वह जेक्शन स्कूल फॉर एडवांस स्टडीज में पढ़ रही थी। यहीं से वह दुनिया के कई देशों में सक्रिय हुई।
जून 2008 में वह घाना में अमेरिकन ज्यूश वर्ल्ड सर्विस में काम करने पहुंचती। नवंबर 2008 में वह ह्यूमन राइट वॉच के अफ्रीकी शाखा में बतौर प्रशिक्षु शामिल हुई। वहां उसने एक साल बिताए। इस दौरान उसने चाड के शरणार्थी शिविरों में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा संबंधी दस्तावेजों की समीक्षा और विश्लेषण का काम किया। जिन-जिन देशों में शिमिरित की सक्रियता दिखती है, वह संदेह के घेरे में है। हर एक देश में वह पांच महीने के करीब ही रहती है। उसके काम करने के विषय भी अलग-अलग होते हैं। उसके विषय और काम करने के तरीके से साफ जाहिर होता है कि उसकी डोर अमेरिकी अधिकारियों से जुड़ी है। दिसंबर 2009 में वह ईरान में सक्रिय हुई। 7 दिसंबर, 2009 को ईरान में छात्र दिवस के मौके पर एक कार्यक्रम में वह शिरकत करती है। वहां उसकी मौजूदगी भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि इस कार्यक्रम में ईरान में प्रजातंत्र समर्थक अहमद बतेबी और हामिद दबाशी शामिल थे।
ईरान के बाद उसका अगल ठिकाना भारत था। यहां वह ‘कबीर’ से जुड़ी। चार महीने में ही उसने भारतीय लोकतंत्र पर एक रिपोर्ट संस्था के कर्ताधर्ता अरविंद केजरावाल और मनीष सिसोदिया को दी। अगस्त में फिर वह न्यूयार्क वापस चली गई। उसका अगला पड़ाव होता है ‘कायन महिला संगठन’। यहां वह फरवरी 2011 में पहुंचती। शिमिरित ने वहां “अरब में महिलाएं” विषय पर अध्ययन किया। कायन महिला संगठन में उसने वेबसाइट, ब्लॉग और सोशल नेटवर्किंग का प्रबंधन संभाला। यहां वह सात महीने रही। अगस्त 2011 तक। अभी वह न्यूयार्क विश्वविद्यालय में शोध के साथ ही ‘अर्जेंट एक्शन फंड’ से बतौर सलाहकार जुड़ी हैं। पूरी दुनिया में जो सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और स्त्री संबंधी मुद्दों पर जो प्रस्ताव आते हैं, उनकी समीक्षा और मूल्यांकन का काम शिमिरित के जिम्मे है। अगस्त 2011 से लेकर फरवरी 2013 के बीच शिमिरित दुनिया के कई ऐसे देशों में सक्रिय थी, जहां उसकी सक्रियता पर सवाल उठते हैं। इसमें अरब देश शामिल हैं। मिस्र में भी शिमिरित की मौजूदगी चौंकाने वाली है। यही वह समय है, जब अरब देशों में आंदोलन खड़ा हो रहा था।
शिमिरित ली 17वें अरब फिल्म महोत्सव में भी सक्रिय रहीं। इसका प्रीमियर स्क्रीनिंग सेन फ्रांसिस्को में हुआ। स्क्रीनिंग के समय शिमिरित ने लोगों को संबोधित भी किया। इस फिल्म महोत्सव में उन फिल्मों को प्रमुखता दी गई, जो हाल ही में जन आंदोलनों के ऊपर बनी थी।
शिमिरित ली के कबीर संस्था से जुड़ने के समय को उसके विदेशी वित्तीय सहयोग के नजरिए से भी देखने की जरुरत है। एक वेबसाइट ने ‘सूचना के अधिकार’ के तहत एक जानकारी मांगी। उस जानकारी के मुताबिक कबीर को 2007 से लेकर 2010 तक फोर्ड फाउंडेशन से 86,61,742 रुपए मिले। 2007 से लेकर 2010 तक फोर्ड ने कबीर की आर्थिक सहायता की। इस बीच केजरीवाल को वर्ष 2006 में रमन मैग्सेसे पुरस्कार के माध्यम से 50000 डॉलर देकर उपकृत किया जा चुका था। इससे पहले केजरीवाल सरकारी नौकरी छोड़ चुके थे। इसके बाद 2010 में अमेरिका से शिमिरित ली ‘कबीर’ में काम करने के लिए आती हैं। चार महीने में ही वह भारतीय प्रजातंत्र का अध्ययन कर उसे खोखला बताने वाली रिपोर्ट केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को देकर चली जाती है। शिमिरित ली के जाने के बाद ‘कबीर’ को फिर फोर्ड फाउंडेशन से दो लाख अमेरिकी डॉलर का अनुदान मिला। इसे भारत की खुफिया एंजेसी ‘रॉ’ के अपर सचिव रहे बी. रमन की इन बातों से समझा जा सकता है।
एक बार बी. रमन ने एनजीओ और उसकी फंडिंग पर आधारित एक किताब के विमोचन के समय कहा था कि “सीआईए सूचनाओं का खेल खेलती है। इसके लिए उसने ‘वॉयस ऑफ अमेरिका’ और ‘रेडियो फ्री यूरोप’ को बतौर हथियार इस्तेमाल करती है।” अपने भाषण में बी. रमन ने इस बात की भी चर्चा की थी कि विदेशी खुफिया एजेंसियां कैसे एनजीओ के जरिए अपने काम को अंजाम देती हैं। किसी भी देश में अपने अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए सीआईए उस देश में पहले से काम कर रही एनजीओ का इस्तेमाल करना ज्यादा सुलभ समझती है। उसे अपने रास्ते पर लाने के लिए वह फंडिंग का सहारा लेती है। जिस क्षेत्र में एनजीओ नहीं है, वहां एनजीओ बनवाया जाता है। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

यह अंतरिम बजट नहीं यह पार्टी का घोषणापत्र है

18-2-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों, किसी भी आम बजट में दो बातें प्रमुख होती हैं. पहला, बजट से सरकार और पार्टी की आर्थिक और राजनीतिक सोच का पता चलता है और दूसरा, देश की वित्तीय नीतियों के बारे में पता चलता है। बजट के प्रावधानों से पता चल जाता है कि केंद्र सरकार की आर्थिक नीति कैसी होगी। दुर्भाग्यवश चिदंबरम अपनी सरकार और पार्टी की सोंच और नीतियों की बात तब करने चले हैं जबकि इस सरकार के दिऩ पूरे हो गए हैं।
यह साफ है कि वित्त मंत्री पी चिदंबरम द्वारा पेश अंतरिम बजट सिर्फ लोकसभा चुनाव को ध्यान में रख कर तैयार किया गया है। इस बजट का न  तो देश के वर्तमान से ही कुछ लेना-देना है और न ही भविष्य से ही।  हमें ध्यान रखना चाहिए कि ‘वोट ऑन एकाउंट’ में करों से संबंधित विशेष प्रावधान नहीं किये जाते हैं। चुनाव से पहले सरकारी खर्च के लिए ही अंतरित बजट पेश किया जाता है।
2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार और 2009 में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी अंतरिम बजट में करों का कोई नया प्रावधान नहीं किया था, लेकिन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इस बार ऐसा कर दिया। पहली बात तो यह कि यह संसदीय परंपराओं के खिलाफ है।
कुछ महीने बाद आम चुनाव होनेवाले हैं और मई, 2014 तक नयी सरकार का गठन हो जायेगा। नयी सरकार अपना पूर्ण बजट पेश करेगी। अगर यूपीए की सरकार फिर से बनती है और पी चिदंबरम ही फिर से वित्त मंत्री बनते हैं, तब भी अंतरिम बजट में की गयी घोषणाओं को लागू करना मुश्किल होगा। नियमों के तहत चिदंबरम यूपीए सरकार की दस साल की उपलब्धियों के बारे में बखानभर कर सकते थे।
हालांकि इस बात के लिए भी उनकी आलोचना होती, लेकिन चुनावी साल में अमूमन सभी ऐसा करते हैं। अंतरिम बजट में चिदंबरम द्वारा की गयी कुछ घोषणाओं को वास्तविकता में लागू नहीं किया जा सकता है। अब देश की जनता जागरूक हो गयी है। चुनावी साल में लोक लुभावन घोषणाओं से उसे बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है। आर्थिक लिहाज से भी इन घोषणाओं का कोई मतलब नहीं है।
यह ध्यान देने की बात है कि 2008-09 तक आर्थिक मंदी का सामना करने में भारत इसलिए सफल हो पाया था, क्योंकि तब उसकी बुनियाद मजबूत थी। वर्ष 2008 के बाद घरेलू निवेश का हिस्सा 65 फीसदी, जबकि घरेलू बचत 35 फीसदी था। वर्ष 2014 में कमरतोड़ महंगाई के कारण निवेश 34 फीसदी रह गया है। आज भारत के बड़े-बड़े उद्योगपति ही देश में निवेश नहीं  कर रहे हैं। पिछले पांच साल में भारत की आर्थिक बुनियाद काफी कमजोर हो गयी है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कमजोर और संकटग्रस्त है। भारतीय अर्थव्यस्था संस्थागत चुनौती का सामना कर रही है।  राजकोषीय घाटे को जिस तरह से कम करके बताया जा रहा है वह सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी है क्योंकि चिदंबरम ने बड़ी धूर्तता से सब्सिडी के 35000 करोड़ रुपए को अगले साल पर डाल दिया है। इतना ही नहीं इसके लिए आधारभूत संरचना और सामाजिक क्षेत्र पर होनेवाले खर्च में भी 90 हजार करोड़ रुपए की कटौती की गई है। ईंधन के लिए जो 65000 करोड़ रुपए की सब्सिडी रखी गई उसको प्राप्त करना तभी संभव होगा जबकि या तो सब्सिडी में अभूतपूर्व कमी कर दी जाए या फिर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के मूल्य धराशायी हो जाएँ। जाहिर है कि सब्सिडी कम करने की महती जिम्मेदारियों से आनेवाली सरकार को जूझना होगा। यूपीए-2 सरकार ने इस चुनौती का ख्याल नहीं रखा। महंगाई को कम करने पर ध्यान नहीं दिया गया। सिर्फ महंगाई रिजर्व बैंक की नीतियों से नियंत्रित नहीं हो सकती है। रिजर्व बैंक सिर्फ रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट को घटाने और बढ़ाने जैसे छोटे कदम उठा सकता है। महंगाई को कम करने के लिए सरकार को व्यापक कदम उठाने की जरुरत है। इसके लिए सरकार को पीडीएस व्यवस्था को दुरुस्त करने की कोशिश करनी चाहिए थी, लेकिन विभिन्न सेक्टरों में महंगाई को काबू में करने की कोशिश नहीं की गई। यह कोशिश न तो पिछले दस साल में दिखी, और न ही अंतरिम बजट में कोई प्रावधान किया गया। प्रणव दा द्वारा प्रस्तावित सब्सिडी को सीधे लाभार्थियों के खाते में डालने की योजना का अभी तक कहीं अता-पता नहीं है। आज देश के सामने आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ाने और महंगाई को कम करने की विकराल चुनौती है। यह आगे भी बनी रहेगी।
यूपीए सरकार के पूरे कार्यकाल में आधारभूत संरचना के विकास की गति काफी धीमी हो गयी। इससे रोजगार के अवसर भी कम हुए हैं। बड़ी परियोजनाएं कानूनी अड़चनों के कारण परवान नहीं चढ़ पायी। घोटालों के कारण नीतिगत स्तर पर ठहराव आ गया। रक्षा क्षेत्र की जरुरतों की छोटी-छोटी सामग्री भी विदेशों से आयात किए जाने लगे। इस कारण दूसरे दौर की सुधार प्रक्रियाओं को लागू करने में सरकार विफल रही। सरकार की इस नाकामी के कारण निवेशकों का विश्वास डोल गया जिसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा और आर्थिक विकास दर सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। अंतरिम बजट में आर्थिक विकास दर को बढ़ाने की कोई ठोस घोषणा नहीं की गयी। कुल मिला कर यह यूपीए सरकार का अंतरिम बजट नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी का अंतरिम घोषणापत्र है। सरकार ने इस बजट में लोकलुभावन नीतियों द्वारा ज्यादा-से-ज्यादा जनता को अपने पक्ष में करने का प्रयासभर किया है जिनमें किसान,पूर्व सैनिक,छात्र,अल्पसंख्यक आदि शामिल हैं। यह आरोप इसलिए भी सच लगता है क्योंकि पूर्व सैनिकों के लिए समान रैंक के लिए समान पेंशन की पार्टी युवराज राहुल गांधी द्वारा की गई मांग को अभी 48 घंटे भी पूरे नहीं हुए थे और मांग को तमाम परंपराओं को ताक पर रखते हुए पूरा भी कर दिया गया। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

एक गांव सुशासन ने जिसकी रोशनी छीन ली

17-2-14,भिखनपुरा (कुबतपुर),ब्रजकिशोर सिंह। कैसी बिडंबना है कि एक तरफ तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जोर-शोर से घोषणा करते फिर रहे हैं कि 250 की आबादी तक के गांवों को भी बिजली से जोड़ा जाएगा वहीं वैशाली जिले का एक गांव भिखनपुरा (कुबतपुर) ऐसा भी है जिसकी रोशनी खुद सुशासन ने छीन ली। वर्ष 2006 तक हाजीपुर-महनार मुख्य सड़क पर बिलट चौक के पास स्थित यह गांव दिन ढलते ही बिजली की रोशनी में नहा उठता था। उसी साल दुर्भाग्यवश ट्रांसफार्मर जल गया और तभी से गांव के 700 लोग बिजली का इंतजार कर रहे हैं। बीच में राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण परियोजना आई और चली भी गई लेकिन इस अभिशप्त गांव की किस्मत में मानो अंधेरा ही लिखा था। बगल के गांव खोरमपुर में इस परियोजना के अंतर्गत बिजली आ गई लेकिन कुबतपुर को इस परियोजना का लाभ नहीं मिल पाया।

पिछले साल गांव के लोगों में तब उम्मीद जगी जब गांव में बिजली लाने के लिए किसी को ठेका दे दिया गया। पोल गाड़े गए और टूटे हुए तारों को ठीक भी कर दिया गया मगर मामला फिर ट्रांसफार्मर पर आकर अँटक गया। ठेकेदार का मुंशी रंजन कुमार ट्रांसफार्मर लगाने के ऐवज में 20 हजार रुपए की रिश्वत मांग रहा है जिससे बाँकी के सारे काम पूरे हो जाने के बावजूद पिछले 6 महीने से गांव दिन ढलते ही अंधेरे में डूब जाता है। इस संबंध में जब जिले के कार्यपालक अभियंता रामेश्वर सिंह को जानकारी दी गई तो उन्होंने बताया कि वहाँ पर विद्युतीकरण का काम पावर ग्रिड कारपोरेशन ऑफ इंडिया कर रहा है इसलिए वे इस मामले में कुछ नहीं कर सकते। जब पावर ग्रिड कारपोरेशन ऑफ इंडिया के नंबर-0124-2571845 पर फोन किया गया तो कहा गया कि कंपनी के डीएमएस विभाग में 0124-2571929 पर फोन किया जाए कोई झा जी फोन उठाएंगे। हमने इस नंबर पर भी कई बार फोन किया मगर किसी ने फोन नहीं उठाया। हमने हाजीपुर के सांसद रामसुंदर दास और राजापाकर के विधायक श्री दास के पुत्र संजय कुमार के नंबर पर भी कई बार बात करने का प्रयास किया लेकिन हर बार मोबाईल बंद मिला।

इसके बाद हमने बिजली मंत्री,बिहार विजेंद्र प्रसाद यादव को फोन मिलाया तो कहा गया कि मंत्री जी इस समय हाउस में हैं इसलिए हम चाहें तो समस्या को फैक्स कर सकते हैं। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

मोदी,केजरीवाल और अंबानी

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,लोकसभा चुनाव के लिए चल रहा चुनाव प्रचार अब निर्णायक दौर में प्रवेश करने जा रहा है। भाजपा के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी अभी भी प्रधानमंत्री पद के अपने निकटतम अघोषित उम्मीदवार कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी से काफी आगे चल रहे हैं। तीसरे स्थान के लिए काफी जद्दोजहद है और इस स्थान पर आने के लिए इन दिनों जो व्यक्ति सबसे ज्यादा व्याकुल हो रहा है उसका नाम है रणछोड़ अरविन्द केजरीवाल।
मित्रों,श्री केजरीवाल ने 40000 रुपए मासिक की पेंशन और दिल्ली में ताउम्र एक बंगले पर अपने कब्जे को सुनिश्चित करते हुए मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया है। श्रीमान का झूठा और आधारहीन आरोप है कि भारत के सबसे धनवान व्यक्ति मुकेश अंबानी ने कांग्रेस और भाजपा को एक कर दिया है। यह तो नीरा राडिया प्रकरण में ही साबित हो गया था कि भारत की वर्तमान केंद्र सरकार को वास्तव में मुकेश अंबानी चला रहे हैं। यह तो स्थापित तथ्य है फिर नए सिरे से कांग्रेस पर आरोप लगाकर केजरीवाल क्या साबित करना चाहते हैं और क्या प्राप्त करना चाहते हैं? इससे पहले जब भाजपा की सरकार केंद्र में थी तब तो अंबानी परिवार की नहीं चलती थी और उसको बाँकी उद्योगपतियों से इतर कोई विशेष लाभ नहीं पहुँचाया गया था। फिर इस मामले में भाजपा को घसीटने का केजरीवाल का क्या औचित्य है? क्या यह आरोप भी आप विधायक मदनलाल के माध्यम से लगाए गए आरोपों की तरह मात्र पब्लिसिटी स्टंट नहीं है?
मित्रों,श्री केजरीवाल ने मोदी से अंबानी के बारे में राय मांगी है। क्या उन्होंने ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं किया है क्योंकि अंबानी भी मूल रूप से गुजराती है? मोदी ने तो टाटा,बिरला सहित सारे बड़े उद्योगपतियों के कारखाने गुजरात में स्थापित करवाए हैं और खुद पहल करके करवाए हैं फिर सिर्फ अंबानी पर ही मोदी से क्यों राय मांगी जा रही है? अगर मोदी ने बाँकी उद्योगपतियों की उपेक्षा करके अंबानी को कोई लाभ पहुँचाया है और इस तरह का कोई सबूत झूठ शिरोमणि श्री श्री केजरीवाल के पास है तो हम मीडिया के लोग उसका स्वागत करेंगे उसे अविलंब मीडिया के सामने प्रस्तुत किया जाए। वरना केजरीवाल जी बेबुनियाद बातें करना बंद करें क्योंकि उनकी कलई दिल्ली के 49 दिन के उनके कुशासन ने खोलकर रख दी है। श्री केजरीवाल न तो देश को सुशासन दे सकते हैं,न ही भ्रष्टाचार ही दूर कर सकते हैं वे तो बस अराजकता पैदा कर सकते हैं और जनता को दिन-रात झूठ बोलकर गुमराह कर सकते हैं,धोखा दे सकते हैं। देश-विदेश की भारतविरोधी ताकतों से अरबों-खरबों का बेहिसाब चंदा इकट्ठा कर सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि केजरीवाल ने पिछले 49 दिनों में यह साबित कर दिया है कि वे सिर्फ हंगामा कर सकते हैं सूरत को बदलना उनके बूते का रोग है ही नहीं। हम उन चंद भाग्यशाली व्यक्तियों में से हैं जिसने केजरीवाल की असलियत को तभी समझ लिया था जब वे दिल्ली विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार कर रहे थे।
मित्रों,इन दिनों कांग्रेस पार्टी जोर-शोर से प्रचार कर रही है कि मोदी के चाचा ने कैंटिन का ठेका ले रखा था। मैं उन कांग्रेस के झूठे,लफ्फाज अहमकों से पूछना चाहता हूँ कि प्रधानमंत्री तो श्री वरूण गांधी के चाचा भी थे फिर युवराज का दर्जा सिर्फ राहुल जी को ही क्यों प्राप्त है? क्यों कांग्रेस ने राजीव के छोटे भाई संजय को भुला दिया है? क्यों आज भी उनकी विधवा श्रीमती मेनका गांधी को गांधी परिवार में सदस्य का दर्जा प्राप्त नहीं है? जब वरूण के लिए पिता और चाचा में इतना बड़ा अंतर है तो फिर मोदी के लिए चाचा और पिता एकसमान कैसे हो गए? हो सकता है कि मोदी के चाचा धनवान हों मगर पिता गरीब हों जैसे कि राहुल कांग्रेस के युवराज है और वरूण कुछ भी नहीं हैं।
मित्रों,कांग्रेस ने किसी चायवाले के संगठन से यह प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लिया है। मैंने तो बिहार में कहीं भी चायवालों का संगठन नहीं देखा फिर गुजरात में उनका कौन-सा संगठन इस चुनावी मौसम में पैदा हो गया और अगर ऐसा कोई संगठन है भी तो क्या वह 40-45 साल पुराना है और क्या श्री मोदी के पिता दामोदर मोदी उसके सदस्य थे? वास्तव में कांग्रेस के ये अहमक नेता मोदी पर चाय संबंधी बयान देकर फँस गए हैं और इसलिए इन्होंने चायवालों का झूठा संगठन खड़ा करके और उसको प्रलोभन देकर ऐसा बयान दिलवाया है। अभी तो कांग्रेस पार्टी ने यह साबित करने की कोशिश ही की है कि मोदी की चाय की दुकान नहीं थी हमें तो उस दिन का भी इंतजार है जब वह यह कहेगी कि चाय पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और ऐसा वो चायपत्ती के पैकेटों पर भी छपवाएगी।
मित्रों,यह कोई संयोग नहीं है कि कांग्रेस ने मोदी के बारे झूठ की यह खेती तब नए सिरे से शुरू की है जबकि केजरीवाल सरकार ने खुदकुशी कर ली है और लोकसभा के चुनाव में हाथ आजमाने के लिए ताल ठोंकना शुरू कर दिया है। जाहिर है कि पहले भी कांग्रेस और केजरीवाल में मिलीभगत थी और आज भी है। अंत में एक शेर कलियुगी रणछोड़,हर बार अपनी जिम्मेदारियों को छोड़कर पलायन कर जानेवाले केजरीवाल सर के नाम-
झूठ और मक्कारी है यह इसे ईबादत का नाम न दो,
तुमने खुदकुशी की है इसे शहादत का नाम न दो।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)