रविवार, 25 सितंबर 2016

बोले राम सकोप तब भय बिनु होंहि न प्रीति

मित्रों,सर्वप्रथम हम आपलोगों से क्षमा चाहते हैं। क्योंकि हमने पहली बार झूठ को सच मान लेने का अपराध किया है। दरअसल खबर आई ही थी इतने बड़े-बड़े लोगों और पत्रकारों के माध्यम से कि हम भ्रमित हो गए। लेकिन कल जब हमने पीएम को सुना और गुना तो समझ गए कि खबर झूठी थी। पता नहीं यह खबर कहाँ से आई, क्यों आई या क्यों लाई गई कि भारत की सेना ने पाक सीमा में घुसकर आतंकी शिविरों पर कार्रवाई की है?
मित्रों,हमें तो पीएम के कल के भाषण से खासी निराशा हुई। इतनी निराशा हमें तब भी नहीं हुई थी जब हमारी सिविल सेवा की परीक्षा का अंतिम बार अंतिम परिणाम आया था। लगा जैसे मौका श्राद्ध का हो और गीत विवाह के गाए जा रहे हों। लगा जैसे हम एकबार फिर से अटल बिहारी वाजपेई को सुन रहे हों। लगा जैसे कुरूक्षेत्र के मैदान में श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध छोड़कर भाग जाने और गांडीव को त्यागकर कर में कमंडल लेकर संन्यास ले लेने के लिए प्रेरित कर रहे हों। लगा जैसे निर्बल राम रावण के आगे दंडवत होकर कह रहे हों कि सीता को आप ही रखिए हमें किसी भी स्थिति में युद्ध नहीं चाहिए। लगा जैसे हम दीवाली में फोड़ने के लिए बहुत महंगा पटाखा लाए हों। पूरे गांव को हमने हमने अपने दरवाजे पर जमा कर लिया हो और वो धमाका करने के बजाए फुस्स हो गया हो।
मित्रों,रामायण में एक प्रसंग है कि भगवान राम को सेनासहित सागर पार करना है। वे तीन दिनों तक विनत होकर सिंधु से रास्ता मांगते हैं। अंततः उनका धैर्य जवाब दे देता है और राम क्रोधित होकर अनुज लक्ष्मण से धनुष-वाण ले आने को कहते हैं। धनुष पर ब्रह्मास्त्र का संधान होते ही सिंधु त्राहिमाम करता हुए उनके चरणों में आ गिरता है। हमारे बिहार में भी कहावत है कि जैसा देवता वैसी पूजा। कहने का मतलब कि कुछ बात के देवता होते हैं और कुछ लात के। कई प्रधानमंत्री आए और गए। सबने पाकिस्तान से यही कहा कि हमें आपके साथ मिलकर गरीबी,अशिक्षा,बिमारी,कुपोषण और बेरोजगारी के खिलाफ लड़ाई लड़नी है लेकिन पाकिस्तान के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी। बदले में उसने कहा कि आपको इनके खिलाफ लड़ना है तो शौक से लड़िए मगर हमें तो पूरी मानवता के खिलाफ ही लड़ना है,पूरी धरती की शांति को नष्ट-विनष्ट करके रख देना है। ऐसे में भला कब तक इंतजार किया जाएगा कि पाकिस्तान का स्वतः हृदय-परिवर्तन हो जाए? मर्यादापुरूषोत्तम राम ने भी ताड़का जैसी कई राक्षसियों का संहार किया जबकि नीति कहती है कि स्त्री अवध्या होती है। क्या हमारे प्रधानमंत्री इतनी छोटी-सी बात भी नहीं समझ पा रहे हैं?
मित्रों,राष्ट्रकवि दिनकर कहते हैं क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,उसको क्या जो दंतहीन,विषहीन,विनीत,सरल हो। सहनशीलता,क्षमा,दया को तभी पूजता जग है,बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है। हम यह नहीं कहते कि भारत सरकार जल्दबाजी में कोई कदम उठाए लेकिन यह भी नहीं चाहते कि कोई कदम उठाया ही नहीं जाए। आखिर कब तक हम दुनियाभर में राक्षसी-संस्कृति के प्रसार में लगे लोगों के दुस्साहस को नजरंदाज करते रहेंगे? आखिर कब तक हमारे सैनिक बिना लड़े ही मारे जाते रहेंगे? आखिर कब तक हमारी धरती हमारे अपनों के खून से लाल होती रहेगी और हम मूकदर्शक होकर किंकर्त्तव्यविमूढ़ भाव को धारण किए राजकीय सम्मान के साथ अंतयेष्टि करते रहेंगे? आखिर कब तक??? आखिर कब तक प्रधानमंत्रीजी??? आप हमारी आखिरी उम्मीद थे और हैं। हमारी उम्मीदों को टूटने से बचा लीजिए प्लीज। अन्यथा हमें मानना पड़ेगा कि भारत एक सॉफ्ट स्टेट था और हमेशा रहेगा। हमें मानना पड़ेगा कि भारत में कभी कोई वीर पैदा ही नहीं हुआ। चंद्रगुप्त,प्रताप,पृथ्वीराज,सांगा,लक्ष्मीबाई,आल्हा-ऊदल,गोरा-बादल,शिवाजी आदि भारत में हुए ही नहीं थे। हमारा पूरा-का-पूरा इतिहास झूठ है। चंदवरदाई,जगनिक,महेश और भूषण झूठे हैं। लात खाना हमारी आदत और फितरत है और हमेशा रहेगी।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

POK में सैन्य कार्यवाही की खबर,सत्य या अफवाह?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कूटनीति की तुलना अगर हम करना चाहें तो दो कामों से कर सकते हैं। पहला नट की रस्सी और दूसरा सुनारी। दोनों को एकसाथ मिलाकर अगर हम कहें तो कूटनीति में एकसाथ संतुलन और महीनी दोनों की जरुरत होती है। साथ ही कूटनीति बर्फ की शिला के समान होती है जिसका 9/10 वाँ हिस्सा हमेशा दृष्टि से ओझल होता है और 1/10 वाँ हिस्सा आँखों के सामने। तथापि हमारे देश के कुछ लोग ऐसे हैं जो यह चाहते हैं भारत सरकार जो भी कूटनीतिक कदम उठाये उनको बताकर ही उठाए।
मित्रों,जो बातें पर्दे के पीछे करने योग्य होती हैं उनको पर्दे के पीछे करना ही उचित होता है वरना फिर मरियम शरीफ भी बस नाम की ही शरीफ रह जाती है। जबसे मीडिया में पाक अधिकृत कश्मीर में भारतीय सेना द्वारा आतंकी शिविरों पर कार्यवाही की खबरें आई हैं मोदी-विरोधी मानसिकता वाले लोग यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि भारत कभी ऐसा कर भी सकता है। जबकि भारत ही नहीं पाकिस्तान से भी जो संकेत सामने आ रहे हैं वे यही बता रहे हैं कि भारत की वर्तमान केंद्र सरकार ने इस परंपरागत मिथक को एक झटके में तोड़ डाला है कि भारतीय सेना कभी सीमापार जाकर कार्यवाही कर ही नहीं सकती। ऐसी खबरों की सच्चाई जानने के लिए सिर्फ संकेतों का ही सहारा होता है क्योंकि अलग-अलग कारणों से इस समय न तो भारत सरकार और न ही पाकिस्तान सरकार चाहती है कि सच सामने आए।
मित्रों,पहला संकेत तो यह है कि क्विंट नामक वेबसाईट जिस पर यह खबर सबसे पहले आई थी के मालिक राघव बहल कोई छोटे-मोटे व्यक्ति नहीं हैं। नेटवर्क 18 और टीवी 18 को जब तक रिलायंस ने खरीद नहीं लिया था तब तक वे ही इसके मालिक थे इसलिए उनके हवाले से आई कोई खबर अफवाह हो ही नहीं सकती है। बाद में हल्ला होने बाद जब वेबसाईट के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार संजय पुगलिया जी से ट्विट करके पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उनकी वेबसाईट अभी भी अपनी बात कायम है।

    .@sanjaypugalia sir can u reconfirm this news @TheQuint @QuintHindi

    — Varun (@sweetspottrader) September 21, 2016

    Our veteran investigative reporter @NandyGram has got this big scoop. More info is awaited. https://t.co/9dle3taGO7

    — Sanjay Pugalia (@sanjaypugalia) September 21, 2016

इतना ही नहीं भारत के रिटायर्ड एयर मार्शल और आर्म्ड फोर्सेस ट्राईब्युनल के सदस्य अनिल चोपड़ा (Aviator anil chopra) और रक्षा संवाददाता सुमन शर्मा ने भी ट्विट द्वारा खबर की पुष्टि की है।
  Quint story is correct https://t.co/Z7z5bAvWTh

    — Sumann Sharrma (@SumannSharrma) September 21, 2016
मित्रों,इंडिया टीवी,दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर भी कोई छोटे-मोटे मीडिया-ग्रुप नहीं है कि अपने सूत्रों से सत्यता प्रमाणित किए बिना किसी खबर को प्रकाशित-प्रसारित कर दें। फिर पाकिस्तान द्वारा व्यावसायिक उड़ानों पर रोक लगाना भी संकेत करता है कि पाकिस्तान ने ऐसा इसलिए किया जिससे पाकिस्तानी वायुक्षेत्र में घुस आए विमान या हेलीकॉप्टर को आसानी से पहचाना जा सके। कल रात इस्लामाबाद के आसमान पर एफ-16 विमानों की उड़ान और नगरवासियों में मची भगदड़ भी बताती है कि पाकिस्तान के साथ कुछ तो ऐसा किया गया है जिससे वे काफी ज्यादा भयभीत है। कदाचित इसी भय का परिणाम है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री न्यूयार्क में बार-बार अमेरिका और चीन के नेताओं से बात कर रहे हैं और निवेशक पाकिस्तान से धड़ाधड़ पैसा बाहर निकाल रहे हैं जिससे पाकिस्तानी शेयर बाजार जमीन सूंघ रहा है। भारत के रक्षा मंत्री द्वारा कहना कि दुश्मन को घुटनों पर लाना जरूरी है और प्रधानमंत्री का लगातार दूसरे दिन वार रूम में समय बिताना भी इशारों-इशारों में कहता है कि इशारों को तो समझो मगर राज को राज ही रहने दो। वैसे आपको याद है कि मनमोहन सिंह अपने कार्यकाल में कभी वार रूम में गए भी थे?

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

छोटे से गडकरी की गजभर की जुबान

मित्रों,जुबान की महिमा अपम्पार है। यही जुबान पान की खिलवाती है और यही लात भी। शायद इसलिए भगवान ने इंसान को छोटी जुबान दी है ताकि वो कम बोले और जो भी बोले सोंच-समझकर बोले। लेकिन कुछ लोग हैं कि मानते ही नहीं। बड़बोलों के वर्ल्ड चैंपियन केजरीवाल सर इन दिनों बंगलुरू में अपनी जुबान छोटी करवा रहे हैं। उनकी जीभ की सर्जरी का उनको और हमारे देश को कितना फायदा होता है यह तो तभी पता चलेगा जब वे वहाँ से वापस आ जाएंगे। परंतु अपने देश में तो प्रत्येक मामले में एक ढूंढ़ो हजार मिलते हैं वाली स्थिति है। यहाँ हम किस-किस का नाम लें समझ में नहीं आता क्योंकि एक का नाम लेने पर हजारों के नाराज हो जाने का खतरा है कि हमारा नाम क्यों नहीं लिया।
मित्रों,शायर कफील आजर ने कहा है कि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी लेकिन कुछ लोग हैं कि इन पंक्तियों में अंतर्निहित मर्म को समझने को तैयार ही नहीं हैं और बार-बार कुछ-न-कुछ ऐसा बोलते रहते हैं कि जिससे खुद उनके साथ-साथ देश को भी नुकसान होता है। अब अपने नितिन गडकरी को ही लें। आपको याद होगा कि जब बिहार विधानसभा का चुनाव-प्रचार चल रहा था तब शाह भाईसाब ने कहा था कि कालेधन पर लोकसभा चुनावों के समय पीएम ने जो कुछ भी वादा किया था वो तो चुनावी जुमला था और फिर बिहार में भाजपा तो हारी ही बिहार का भी बंटाधार हो गया। एक गलतबयानी से आज बिहार में फिर से खूनी-दरिंदों का राज कायम हो चुका है।
मित्रों,यूपी में चुनाव सिर पर है और गडकरी अनाप-शनाप बोल रहे हैं। उन्होंने यह कहकर प्रधानमंत्री की सारी अनथक मेहनत पर ही पानी फेर दिया है कि अच्छे दिन कभी नहीं आते। उनका यह भी कहना है कि अच्छे दिनवाला बयान तो मनमोहन ने दिया था भाजपा ने दिया ही नहीं। जबकि सच्चाई यह है जब 2014 का लोकसभा का चुनाव-प्रचार चल रहा था तब दिन-रात रेडियो-टीवी पर भाजपा का यही प्रचार-गीत बचता रहता था कि अब अच्छे दिन आनेवाले हैं। जब बेचना था तब तो भाजपा ने सपनों को बेचा और अब वो कैसे कह सकती है हमने जो सपने दिखाए थे वो सपने तो सपने थे और चूँकि सपने तो सपने होते हैं इसलिए लोग उनको भूल जाएँ?
मित्रों,अच्छे दिन के वादे में तो सबकुछ समाहित होता है तो क्या केंद्र सरकार में वरिष्ठ मंत्री गडकरी के बयान के बाद यह मान लिया जाए कि मोदी सरकार ने हार मान ली है और मान लिया है कि उनसे कुछ भी नहीं होनेवाला, जैसे चल रहा था सबकुछ वैसे ही चलता रहेगा? या फिर यह मान लिया जाए कि हर बड़े चुनाव के पहले गडकरी जानबूझकर ऐसे बयान देते हैं जिससे नरेंद्र मोदी कमजोर हों? तो क्या नरेंद्र मोदी इतने कमजोर हैं कि अपने मंत्रियों तक पर भी लगाम नहीं रख सकते? ऐसा इसलिए भी मानना पड़ेगा क्योंकि केजरीवाल की तरह गडकरी को गले की कोई बीमारी है ऐसा अबतक तो सुनने में नहीं आया।

शनिवार, 10 सितंबर 2016

साहेब खुश हुआ मगर चंदा बाबू मायूस

मित्रों,पता नहीं आपने मिस्टर इंडिया फिल्म कितनी बार देखी है लेकिन मैंने तो सैंकड़ों बार देखी है। बतौर गालिब दिल को बहलाने के लिए गालिब ये खयाल अच्छा है। उस फिल्म में एक मोगैम्बो होता है जो तभी खुश होता है जब किसी की मौत होती है या फिर कोई देशविरोधी खबर आती है। मोगैम्बो ने तेजाब के तालाब बना रखे हैं जिसमें उसके एक इशारे पर लोग बिना सोंचे-विचारे कूद जाते हैं और घुल जाते हैं। चूँकि फिल्म फिल्म होती है इसलिए उसमें एक हीरो भी होता है जिसके हाथ एक ऐसा गजेट लगता है जिसको पहनने से आदमी अदृश्य हो जाता है। अंत में बुराई की हार होती है और मोगैम्बो का उसके काले साम्राज्यसहित अंत हो जाता है।
मित्रों,ये तो हुई फिल्मों वाली बात। लेकिन असल जिंदगी में ऐसा नहीं होता और हो भी नहीं सकता। वैसे तो बिहार में अनगिनत मोगैम्बो हैं लेकिन आज हम बात करेंगे सारे मोगैम्बो के साहेब यानि कुख्यात शहाबुद्दीन की। श्रीमान् शहाबुद्दीन जो जेल में रहने के समय से ही राजद की कार्यकारिणी के सदस्य है भी हत्या करके लाश को तेजाब में घुला चुके हैं निरीह-वृद्ध सिवान निवासी चंदा बाबू के बड़े बेटे की लाश। बेचारे का दोष बस इतना था कि वो सिवान में रहता था और मुँह में जुबान रखता था। दूसरे बेटे ने जब साहेब के खिलाफ भाई की हत्या का मुकदमा किया तो उसे भी साहेब ने मरवा दिया। अब परिवार में बचे कुछ जमा 3 लोग। चंदा बाबू,उनकी बीमार पत्नी और विकलांग बेटा। अब कौन लड़ता साहेब के खिलाफ? फिर जिस साहेब के पीछे पूरी सरकार हो और जिसकी जेब में न्यायपालिका को खरीदने के लिए अकूत पैसा हो उससे कोई लड़ेगा भी कैसे? सो आज न कल साहेब की जमानत तो तय थी। जब साहेब जेल में रहते हुए राजदेव रंजन जैसे दिग्गज पत्रकार को आसानी से चींटी की तरह मसल देता है और उसका बाल भी बाँका नहीं होता तो चंदा बाबू जैसों की क्या बिसात?
मित्रों,कुल मिलाकर आज 11 साल बाद साहेब जेल से बाहर आ रहे हैं लेकिन चंदा बाबू मायूस हैं। क्या विडंबना है कि जिस नीतीश कुमार ने उनको जेल में बंद किया उनकी ही सरकार ने उसकी रिहाई का मार्ग भी प्रशस्त किया। डेढ़ हजार से ज्यादा गाड़ियाँ जिन पर साहेब की उनके कद के अनुसार ही बड़ी-सी और लालू-नीतीश की छोटी तस्वीरें लगी हुई हैं उनके स्वागत के लिए भागलपुर पहुँच चुकी हैं और पहुँच चुके हैं 4 मंत्री और 35 विधायक। इनमें से 500 गाड़ियाँ तो सिर्फ सिवान से गई हैं। आज असली मोगैम्बो की जयजयकार से पूरा बिहार गूंजायमान हो जानेवाला है। वैसे साहेब के लिए जेल का कोई मतलब था भी नहीं। वे तो जेल में भी दरबार लगाते थे। उनकी पार्टी दस साल के वनवास के बाद फिर से सत्ता में जो है। लेकिन अब चंदा बाबू क्या करेंगे? पूरी तरह से हताश चंदा बाबू कहते हैं कि अब वे ऊपर की अदालत में नहीं जाएंगे बल्कि ऊपरवाले की अदालत में जाएंगे। विश्वास ही उठ गया है तंत्र पर से। अब उन्होंने सबकुछ भगवान पर छोड़ दिया है। भगवान मन हो तो न्याय करें और न मन हो तो नहीं करें। जिंदगी है कोई मिस्टर इंडिया फिल्म नहीं कि कोई ऐसा गैजेट उनके हाथ लग जाएगा जिसको पहनने के बाद वे या कोई अन्य हीरोनुमा व्यक्ति अदृश्य हो जाए। वैसे अब सिवान की धरती से कई लोग हमेशा के लिए अदृश्य हो जानेवाले हैं। साहेब ने जेल में रहते हुए ही हिट लिस्ट तो तैयार की है। ये बात और है कि साहेब शिकार करने या करवाने के समय माई समीकरण का भी खयाल नहीं रखते,साहेब जो ठहरे। उन्होंने पहले भी ज्यादातर यादवों को मारा है और भविष्य में निश्चित रूप से ज्यादातर यादव ही उनके हाथों मारे जानेवाले हैं। यहाँ मैंने शिकार शब्द का प्रयोग इसलिए किया क्योंकि अगर साहेब ने हत्या की होती तो बाईज्जत बरी होकर यूँ भव्य तरीके से बाहर नहीं आते बल्कि जेल के भीतर ही सड़ा दिए जाते। अब ये मत कहिएगा कि ऐसे शासन से तो राजतंत्र या अंग्रेजों का राज ही अच्छा था।
मित्रों,मैं कह रहा था कि चंदा बाबू अब सीधे संसार के सबसे बड़े न्यायाधिकारी भगवान के शरणागत हैं। कमोबेश हर साधारण बिहारी की यही हालत होती है ऐसी हालत में। पूरा बिहार इन दिनों भगवान भरोसे है। धरती पर जब शैतानों का राज कायम हो तो कोई कर भी क्या सकता है भगवान को गुहारने के सिवा? पहले बिंदी यादव फिर राजवल्लभ यादव और अब साहेब सारे मोगैम्बो तो एक-एक कर जेल से बाहर आते जा रहे हैं। जेल-कोर्ट-कचहरी सब बेमतलब। रहें या न रहें कोई फर्क नहीं। कानून की मोटी-मोटी किताबें भी बेमानी।
मित्रों,इस बीच पता चला है कि पाखंड और ढोंग के मामले में शानदार तरीके से अपना नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज करवा चुके बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी जिन्होंने बिहार में बहार लाने का वादा और दावा किया था साहेब के स्वागत में गई गाड़ियों पर लगी तस्वीरों में कोने में स्थान मिलने के बावजूद परेशान हैं। बगुला भगत जी फरमाते हैं कि जहाँ अंडरवर्ल्ड का गढ़ है वहाँ तो पूँजी-निवेश हो रहा है लेकिन बिहार में नहीं हो रहा। शायद श्री महान जी का आशय मुंबई से है।
मित्रों,जिन लोगों को रात में नहीं दिखता उनके बारे में कहा जाता है कि उनको रतौंधी हो गई हैं। जिनको दिन में नहीं दिखता उनको लोग लक्ष्मीजी की सवारी के नाम से संबोधित करते हैं लेकिन जो लोग देखकर भी नहीं देखपाने का नाटक करते हों उनके बारे में क्या कहा जाए। वैसे तो हमारे शब्दकोश में भी कई शब्द हैं लेकिन सारे के सारे असंसदीय हैं। सवाल उठता है कि क्या नीतीश जी व्यवसायियों को बिहार में जबर्दस्ती लाएंगे? अगर ऐसा हो सकता तब तो नीतीश ने अपने मुकुट में एक से बढ़कर एक मोगैम्बो जड़ रखे हैं। काश,ऐसा हो सकता तो हमारा बिहार तरक्की की रेस में अमेरिका से भी आगे होता!!!

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

मलाला ने किया नोबेल सम्मान का अपमान

मित्रों,पता नहीं नोबेल का शांति पुरस्कार देने का आधार क्या है? मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि सन् 1901 ईं. से लेकर अबतक इसे प्राप्त करनेवालों की सूची में अराफात जैसे कई खुराफातियों के नाम हैं जिनका नाम इस सूची में कतई नहीं होना चाहिए। वर्ष 2014 में शांति का नोबेल सम्मान प्राप्त करनेवाली मलाला युसुफजई को ही लें। दुनिया में हर साल सैंकड़ों-हजारों लोगों पर आतंकी गोलियाँ चलाते हैं और उनमें से ज्यादातर इतने भाग्यशाली नहीं होते कि जीवित बच जाएँ। तो क्या उनमें से सबको नोबेल पुरस्कार दे दिया जाना चाहिए? इनमें से कई एक तो हमारी बिरादरी के यानि पत्रकार भी होते हैं लेकिन किसी पत्रकार को नोबेल नहीं मिलता।
मित्रों,मैं शुरू से ही नहीं मानता कि मलाला युसुफजई सिर्फ इस कारण से नोबेल की हकदार हो गई क्योंकि उसके ऊपर जेहादी आतंकवादियों ने गोलियाँ चलाईँ। हमें पुरस्कार देने के समय प्राप्तकर्ता की सोंच और विचारधारा की भी विस्तार से विवेचना करनी चाहिए। मैं समझता हूँ कि नोबेल चयन समिति से मलाला के मामले में यही गलती हुई है।
मित्रों,कल जिस तरह से मलाला ने कश्मीर में जेहादी आतंकवाद का खुलकर समर्थन किया है उससे साफ पता चलता है कि उसकी सोंच निहायत संकीर्ण और सांप्रदायिक है। मलाला इस्लाम से बाहर जाकर सोंच ही नहीं सकती है। वह सर्वधर्मसमभाव में भी विश्वास नहीं रखतीं। वरना क्या कारण है कि उसको कश्मीरी मुसलमानों द्वारा कश्मीरी पंडितों को दिए गए अनगिनत घाव नजर नहीं आए। वास्विकता तो यह है पिछले 2 दशक से कश्मीर में क्षेत्रीयताधारित अलगाववाद चल ही नहीं रहा है बल्कि धर्माधारित आतंकवाद चल रहा है। शायद मलाला को यह दिख नहीं रहा या फिर वो देखना ही नहीं चाहती क्योंकि उसको लगता है कि इस्लाम के नाम पर जो होता है हमेशा सही होता है। फिर सवाल यह भी उठता है कि अगर कश्मीर में इस्लाम के नाम पर हिंसा सही है तो उसी इस्लाम के नाम पर मलाला पर जिन लोगों ने गोलियाँ चलाईं वो कैसे गलत थे? क्या कश्मीरी मुसलमानों का इस्लाम तालिबान के इस्लाम से अलग है?
मित्रों,माना कि कश्मीर में कई हफ्तों से स्कूल बंद हैं लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या एक खूंखार आतंकी की मौत के बाद और उसके कई साल पहले से सेना-पुलिस पर पत्थर फेंकनेवाले लोग शांति के पुजारी हैं?  क्या मलाला के लिए कश्मीर में बसे मुसलमान ही सिर्फ मानव हैं? क्या कश्मीरी पंडितों और सेना-पुलिस के जवानों का कोई मानवाधिकार नहीं है? क्या कश्मीरी पंडितों के परिवारों की स्त्रियों के साथ सामूहिक बलात्कार मानवाधिकार का सम्मान करना है? जिन बच्चों को स्कूल जाना चाहिए क्या उनका चंद पैसों के लालच में आकर पत्थरबाजी करना किसी भी दृष्टि से सही है? कोई पत्थर फेंकेगा तो बदले में वो फूल की उम्मीद कैसे कर सकता है?
मित्रों,आश्चर्य की बात है खुद मलाला के देश में पीओके और बलुचिस्तान में सरकारी अमले द्वारा मानवाधिकारों का घनघोर उल्लंघन हो रहा है लेकिन मलाला को दिख नहीं रहा। इसका मतलब तो यही लगाना चाहिए कि मलाला मानती है कि जो मानवाधिकार-उल्लंघन पाकिस्तान की सरकार के समर्थन से हो या सीधे-सीधे पाकिस्तान की सरकार द्वारा हो वो सही है फिर चाहे वो बलुचिस्तान में हो,पीओके में हो या फिर जम्मू-कश्मीर में हो?
मित्रों,मैं मानता हूँ कि ऐसा बचकाना और बेवकूफाना बयान देकर मलाला ने साबित कर दिया है कि नोबेल सम्मान बच्चों को देने की चीज नहीं है। साथ ही उसने उसको दिए गए महान सम्मान को अपमानित किया है। मेरा मानना है कि शांति पुरस्कार ऐसे लोगों को दिया जाना चाहिए जो तू वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास रखते हों,सर्वधर्मसमभाव में यकीन रखते हों,मानवमात्र ही नहीं सभी जीवों के प्रति दयालु हों,सबका साथ सबका विकास चाहते हों ऐसे लोगों को नहीं जिनकी आँखों पर सांप्रदायिकता या क्षेत्रीयता का संकीर्ण चश्मा चढ़ा हो। आज निश्चित रूप से नोबेल सम्मान खुद पर शर्मिंदा हो रहा होगा और अल्फ्रेड नोबेल की आत्मा चित्कार कर रही होगी।

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

चीन से लेकर लाओस तक गूंजी भारतीय शेर की दहाड़


मित्रों,भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के बारे में कहा जाता रहा है कि उनको वैश्विक कूटनीति की काफी बेहतर समझ थी। कितनी समझ थी ये तो नेहरू ही जानें लेकिन महान नेहरू की महान गलतियों का खामियाजा भारत आज तक भुगत जरूर रहा है। दुर्भाग्यवश बाद में भी जो सरकारें केंद्र में काबिज हुईं उन्होंने भी नेहरूवादी कूटनीति का ही अनुस रण किया। इसलिए हमारे सैनिक मैदान मारते रहे फिर भी हम वार्ता की मेज पर हारते रहे।
मित्रों,पहली बार केंद्र में एक ऐसी सरकार आई है जिसने नेहरूवादी कूटनीति को पूरी तरह से विसर्जित कर बिल्कुल नई तरह की नीति अपनायी है। नेहरू को शायद नोबेल शांति पुरस्कार का लालच था लेकिन नरेंद्र मोदी को अपने देशवासियों से पुरस्कार का भी लालच नहीं है। उनको तो बस वही करना है जो देश के लिए जरूरी है। कुछ लोग उनकी कूटनीति की तुलना बिस्मार्क की विदेशनीति से करते हैं लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता क्योंकि बिस्मार्क विस्तारवाद में विश्वास रखता था और मोदी का मूल मंत्र वैश्विक स्तर पर भी सबका साथ सबका विकास का है।
मित्रों,जो लोग बात-बात पर फीता लेकर मोदी का सीना मापने की बात करते हैं मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि वे बाजार से और भी बड़ा फीता मंगवा लें क्योंकि 56 ईंच वाला फीता अब छोटा पड़ने लगा है। नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान ही अपनी भावी विदेश नीति का संकेत देते हुए कहा था कि हम ऐसा प्रबंध करेंगे कि कोई हमें आँख न दिखाए। साथ ही हम भी किसी को आँख नहीं दिखाएंगे और हर किसी से आँखों में आँखें डालकर बात करेंगे। अपनी इसी नीति पर खूबसूरती से अमल करते हुए एशिया की बिसात को ही पलट कर रख दिया है। आज भारत चीन से घिरा हुआ नहीं है बल्कि चीन भारत से घिरा हुआ है। जिस तरह से चीन के राष्ट्र प्रमुख भारत आने से पहले पाकिस्तान जाते हैं उसी तरह से प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जब दूसरी बार चीन गए तो उससे पहले वियतनाम गए।
जानकारों का कहना है कि साउथ चाइना सागर में चीन के विस्तार के कारण वियतनाम दबाव में है और मोदी के इस कदम को भारत और वियतनाम के बीच बढ़ती दोस्ती और साझेदारी के रूप में देखा जा रहा है। इसी साल जुलाई में अंतरराष्ट्रीय अदालत ने कहा था कि ऐसे कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं हैं कि चीन का इस समुद्र और इसके संसाधनों पर एकाधिकार रहा है। मोदी को लाओस में दक्षिण एशिया शिखर सम्मेलन की बैठक में शिरकत के लिए जाना ही था, लेकिन अगर चीन से जुड़ा पहलू इसमें शामिल है तो ये अच्छा सामरिक संदेश देने का प्रयास है। दशकों से वियतनाम हमारा सैन्य और सामरिक महत्व का सहयोगी रहा है।
हांगझाउ (चीन) में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के उलट पीएम मोदी का भव्य स्वागत हुआ। वहाँ जी-20सम्मेलन के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान पर बेहद तीखा हमला किया। पाकिस्तान का नाम लिए बिना मोदी बोले कि एक देश अकेले ही दक्षिण एशिया में आतंकवादियों के एजेंट फैलाने में जुटा है। पाकिस्तान को शह देने वाले चीन को भी मोदी ने उसी की धरती पर खरी-खरी सुनाई।

दुनिया की 20 ताकतवर अर्थव्यवस्थाओं के मंच जी-20 के सम्मेलन के अंतिम सत्र में मोदी ने विश्व समुदाय से आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की अपील की। उन्होंने कहा कि इस पर दोहरे मानदंड न अपनाएं। आतंकवाद को समर्थन दे रहे देशों को अलग-थलग करना चाहिए न कि उनका सम्मान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आतंकवाद पर भारत की नीति जीरो टोलरेंस की है, क्योंकि इससे कम कुछ नहीं चलेगा। इससे एक दिन पहले ब्रिक्स देशों से भी मोदी ने आतंकवाद के समर्थक और प्रायोजक देशों को अलग-थलग करने की अपील की थी। उन्होंने चेतावनी भी दी कि आतंकवाद के खिलाफ तमाम देश एकजुट नहीं हुए तो व्यापार और निवेश सब चौपट हो जाएगा। पीएम मोदी ने कहा कि आतंकियों के पास बैंक और हथियारों के कारखाने नहीं होते, ज़ाहिर है कि फंड और हथियार उन्हें कहीं और से मिलते हैं।

इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी-20 बैठक में भ्रष्टाचार और कालेधन पर लगाम कसने के लिए सदस्य देशों से मदद की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रभावी वित्तीय संचालन के लिए भ्रष्टाचार, कालाधन और कर चोरी से निपटना जरूरी है। इसके लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ आर्थिक अपराधियों की सुरक्षित पनाहगाह खत्म करनी होंगी। साथ ही मनी लांड्रिंग करने वालों का बिना शर्त प्रत्यर्पण, जटिल अंतरराष्ट्रीय नियम सरल बनाना और बहुत ज्यादा बैंकिंग गोपनीयता खत्म करने की दिशा में प्रयास जरूरी हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिंग से द्विपक्षीय वार्ता के दौरान भी आतंकवाद के मुद्दे पर बात की। सूत्रों के मुताबिक पीएम मोदी ने शी जिनपिंग से बातचीत के दौरान NSG यानी न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत की सदस्यता का मुद्दा भी उठाया और चीन से अपने रुख पर फिर से विचार करने को कहा। चीन NSG में भारत की सदस्यता का विरोध करता रहा है।
मोदी ने कहा कि आप विश्व का नेतृत्व तो करना चाहते हैं। लेकिन जहां चरमपंथ का सवाल है, ख़ासकार जिस देश के साथ आपके सबसे घनिष्ठ संबंध है, वहां से जो चरमपंथ आ रहा है उस पर आप कुछ नहीं कर रहे हैं। मोदी ने ये भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र में जब हम ये मुद्दा उठाते हैं तो आप उसमें भी बाधा डालते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने चीन और पाकिस्तान के बीच बन रहे आर्थिक कॉरिडोर के कश्मीर क्षेत्र से गुज़रने का मुद्दा भी उठाया।

चीनी नेता ने कहा कि भारत उनके लिए बहुत अहम और इस क्षेत्र का सबसे बड़ा देश है और उसकी बात को हम गंभीरता से लेते हैं।

मोदी ने ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल से द्विपक्षीय मुलाकात के दौरान भी आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता बढ़ाने पर ज़ोर दिया। उन्होंने NSG के मुद्दे पर भारत के समर्थन के लिए ऑस्ट्रेलिया को धन्यवाद भी दिया।

ब्रिक्स की अगली बैठक गोवा में होने वाली है। उससे पहले ये बात उठाने ये संकेत मिल रहे हैं कि भारत यह कोशिश कर रहा है कि गोवा की बैठक में 'आतंकवाद' और पाकिस्तानी घुसपैठ का मुद्दा उठाया जाए।

चीन से लाओस पहुंचने पर आसियान सम्मेलन में भी पीएम ने आतंकवाद पर चोट की और कहा कि आतंक का निर्यात बंद होना ही चाहिए। पीएम मोदी ने कहा कि आसियान इंडिया प्लान ऑफ एक्शन (2016-20) के तहत 54 गतिविधियों को पहले ही लागू किया जा चुका है। उन्होंने बढ़ती हिंसा और आतंकवाद और कट्टरवाद को समाज की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। ये तीसरा मौका है, जब पीएम मोदी इंडिया-आसियान समिट में शामिल हुए और उन्होंने इस बात का जिक्र अपने संबोधन में भी किया।

पीएम मोदी इस समिट के बाद कई देशों के राष्ट्रप्रमुखों से मुलाकात करेंगे, लेकिन इसमें सबसे अहम अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ होने वाली उनकी बैठक है। दोनों नेताओं के बीच विभिन्न क्षेत्रीय एवं बहुपक्षीय मुद्दों पर चर्चा किए जाने की संभावना है। व्हाइट हाउस की तरफ से भी इस बात की जानकारी दी गई कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ओबामा लाओस में द्विपक्षीय बैठक करेंगे। पिछले दो सालों में ये मोदी और ओबामा की 8वीं मीटिंग होगी। वैसे, रविवार को चीन में जी20 सम्मेलन से इतर भी प्रधानमंत्री मोदी और ओबामा की बैठक हुई थी।

इसके अलावा पीएम मोदी मेजबान देश के प्रधानमंत्री थोंगलोउन सिसोउलिथ, दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति पार्क गुन-हे और म्यांमा की स्टेट काउंसेलर आंग सान सू ची से भी मुलाकात करेंगे। मोदी ने बुधवार को अ पने जापानी समकक्ष शिंझो आबे के साथ द्विपक्षीय बैठक की । भारत और जापान ने आतंकवाद से मुकाबले, व्यापार और निवेश के क्षेत्र में सहयोग को और अधिक मजबूत करने का संकल्प लिया । साथ ही मोदी ने आबे से हाल ही में बांग्लादेश में हुए आतंकी हमलों में जापानी नागरिकों के मारे जाने को लेकर संवेदनाएं भी जाहिर कीं। बांग्लादेश में इस्लामी चरमपंथियों ने विदेशियों के बीच मशहूर एक कैफे पर हमला किया था, जिसमें 22 लोग मारे गए थे।

आबे ने कहा कि जापान आतंकवाद के समक्ष घुटने नहीं टेकने वाला है। उन्होंने आतंकवाद से निपटने के लिए भारत के साथ सहयोग को और अधिक मजबूत करने की इच्छा जाहिर की। गुरुवार दोपहर को लाओस के प्रधानमंत्री की ओर से आज एक भव्य भोज का आयोजन किया जाएगा। मोदी शाम के समय दिल्ली के लिए रवाना होंगे।

चीन से लेकर लाओस तक गूंजी भारतीय शेर की दहाड़

मित्रों,भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के बारे में कहा जाता रहा है कि उनको वैश्विक कूटनीति की काफी बेहतर समझ थी। कितनी समझ थी ये तो नेहरू ही जानें लेकिन महान नेहरू की महान गलतियों का खामियाजा भारत आज तक भुगत जरूर रहा है। दुर्भाग्यवश बाद में भी जो सरकारें केंद्र में काबिज हुईं उन्होंने भी नेहरूवादी कूटनीति का ही अनुशरण किया। इसलिए हमारे सैनिक मैदान मारते रहे फिर भी हम वार्ता की मेज पर हारते रहे।
मित्रों,पहली बार केंद्र में एक ऐसी सरकार आई है जिसने नेहरूवादी कूटनीति को पूरी तरह से विसर्जित कर बिल्कुल नई तरह की नीति अपनायी है। नेहरू को शायद नोबेल शांति पुरस्कार का लालच था लेकिन नरेंद्र मोदी को अपने देशवासियों से पुरस्कार का भी लालच नहीं है। उनको तो बस वही करना है जो देश के लिए जरूरी है। कुछ लोग उनकी कूटनीति की तुलना बिस्मार्क की विदेशनीति से करते हैं लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता क्योंकि बिस्मार्क विस्तारवाद में विश्वास रखता था और मोदी का मूल मंत्र वैश्विक स्तर पर भी सबका साथ सबका विकास का है।
मित्रों,जो लोग बात-बात पर फीता लेकर मोदी का सीना मापने की बात करते हैं मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि वे बाजार से और भी बड़ा फीता मंगवा लें क्योंकि 56 ईंच वाला फीता अब छोटा पड़ने लगा है। नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान ही अपनी भावी विदेश नीति का संकेत देते हुए कहा था कि हम ऐसा प्रबंध करेंगे कि कोई हमें आँख न दिखाए। साथ ही हम भी किसी को आँख नहीं दिखाएंगे और हर किसी से आँखों में आँखें डालकर बात करेंगे। अपनी इसी नीति पर खूबसूरती से अमल करते हुए एशिया की बिसात को ही पलट कर रख दिया है। आज भारत चीन से घिरा हुआ नहीं है बल्कि चीन भारत से घिरा हुआ है। जिस तरह से चीन के राष्ट्र प्रमुख भारत आने से पहले पाकिस्तान जाते हैं उसी तरह से प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जब दूसरी बार चीन गए तो उससे पहले वियतनाम गए।
जानकारों का कहना है कि साउथ चाइना सागर में चीन के विस्तार के कारण वियतनाम दबाव में है और मोदी के इस कदम को भारत और वियतनाम के बीच बढ़ती दोस्ती और साझेदारी के रूप में देखा जा रहा है। इसी साल जुलाई में अंतरराष्ट्रीय अदालत ने कहा था कि ऐसे कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं हैं कि चीन का इस समुद्र और इसके संसाधनों पर एकाधिकार रहा है। मोदी को लाओस में दक्षिण एशिया शिखर सम्मेलन की बैठक में शिरकत के लिए जाना ही था, लेकिन अगर चीन से जुड़ा पहलू इसमें शामिल है तो ये अच्छा सामरिक संदेश देने का प्रयास है। दशकों से वियतनाम हमारा सैन्य और सामरिक महत्व का सहयोगी रहा है।
हांगझाउ (चीन) में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के उलट पीएम मोदी का भव्य स्वागत हुआ। वहाँ जी-20सम्मेलन के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान पर बेहद तीखा हमला किया। पाकिस्तान का नाम लिए बिना मोदी बोले कि एक देश अकेले ही दक्षिण एशिया में आतंकवादियों के एजेंट फैलाने में जुटा है। पाकिस्तान को शह देने वाले चीन को भी मोदी ने उसी की धरती पर खरी-खरी सुनाई।

दुनिया की 20 ताकतवर अर्थव्यवस्थाओं के मंच जी-20 के सम्मेलन के अंतिम सत्र में मोदी ने विश्व समुदाय से आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की अपील की। उन्होंने कहा कि इस पर दोहरे मानदंड न अपनाएं। आतंकवाद को समर्थन दे रहे देशों को अलग-थलग करना चाहिए न  कि उनका सम्मान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आतंकवाद पर भारत की नीति जीरो टोलरेंस की है, क्योंकि इससे कम कुछ नहीं चलेगा। इससे एक दिन पहले ब्रिक्स देशों से भी मोदी ने आतंकवाद के समर्थक और प्रायोजक देशों को अलग-थलग करने की अपील की थी। उन्होंने चेतावनी भी दी कि आतंकवाद के खिलाफ तमाम देश एकजुट नहीं हुए तो व्यापार और निवेश सब चौपट हो जाएगा। पीएम मोदी ने कहा कि आतंकियों के पास बैंक और हथियारों के कारखाने नहीं होते, ज़ाहिर है कि फंड और हथियार उन्हें कहीं और से मिलते हैं।

इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी-20 बैठक में भ्रष्टाचार और कालेधन पर लगाम कसने के लिए सदस्य देशों से मदद की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रभावी वित्तीय संचालन के लिए भ्रष्टाचार, कालाधन और कर चोरी से निपटना जरूरी है। इसके लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ आर्थिक अपराधियों की सुरक्षित पनाहगाह खत्म करनी होंगी। साथ ही मनी लांड्रिंग करने वालों का बिना शर्त प्रत्यर्पण, जटिल अंतरराष्ट्रीय नियम सरल बनाना और बहुत ज्यादा बैंकिंग गोपनीयता खत्म करने की दिशा में प्रयास जरूरी हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिंग से द्विपक्षीय वार्ता के दौरान भी आतंकवाद के मुद्दे पर बात की। सूत्रों के मुताबिक पीएम मोदी ने शी जिनपिंग से बातचीत के दौरान NSG यानी न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत की सदस्यता का मुद्दा भी उठाया और चीन से अपने रुख पर फिर से विचार करने को कहा। चीन NSG में भारत की सदस्यता का विरोध करता रहा है।
मोदी ने कहा कि आप विश्व का नेतृत्व तो करना चाहते हैं। लेकिन जहां चरमपंथ का सवाल है, ख़ासकार जिस देश के साथ आपके सबसे घनिष्ठ संबंध है, वहां से जो चरमपंथ आ रहा है उस पर आप कुछ नहीं कर रहे हैं। मोदी ने ये भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र में जब हम ये मुद्दा उठाते हैं तो आप उसमें भी बाधा डालते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने चीन और पाकिस्तान के बीच बन रहे आर्थिक कॉरिडोर के कश्मीर क्षेत्र से गुज़रने का मुद्दा भी उठाया।

चीनी नेता ने कहा कि भारत उनके लिए बहुत अहम और इस क्षेत्र का सबसे बड़ा देश है और उसकी बात को हम गंभीरता से लेते हैं।

मोदी ने ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल से द्विपक्षीय मुलाकात के दौरान भी आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता बढ़ाने पर ज़ोर दिया। उन्होंने NSG के मुद्दे पर भारत के समर्थन के लिए ऑस्ट्रेलिया को धन्यवाद भी दिया।

ब्रिक्स की अगली बैठक गोवा में होने वाली है। उससे पहले ये बात उठाने ये संकेत मिल रहे हैं कि भारत यह कोशिश कर रहा है कि गोवा की बैठक में 'आतंकवाद' और पाकिस्तानी घुसपैठ का मुद्दा उठाया जाए।

चीन से लाओस पहुंचने पर आसियान सम्मेलन में भी पीएम ने आतंकवाद पर चोट की और कहा कि आतंक का निर्यात बंद होना ही चाहिए। पीएम मोदी ने कहा कि आसियान इंडिया प्लान ऑफ एक्शन (2016-20) के तहत 54 गतिविधियों को पहले ही लागू किया जा चुका है। उन्होंने बढ़ती हिंसा और आतंकवाद और कट्टरवाद को समाज की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। ये तीसरा मौका है, जब पीएम मोदी इंडिया-आसियान समिट में शामिल हुए और उन्होंने इस बात का जिक्र अपने संबोधन में भी किया।

पीएम मोदी इस समिट के बाद कई देशों के राष्ट्रप्रमुखों से मुलाकात करेंगे, लेकिन इसमें सबसे अहम अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ होने वाली उनकी बैठक है। दोनों नेताओं के बीच विभिन्न क्षेत्रीय एवं बहुपक्षीय मुद्दों पर चर्चा किए जाने की संभावना है। व्हाइट हाउस की तरफ से भी इस बात की जानकारी दी गई कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ओबामा लाओस में द्विपक्षीय बैठक करेंगे। पिछले दो सालों में ये मोदी और ओबामा की 8वीं मीटिंग होगी। वैसे, रविवार को चीन में जी20 सम्मेलन से इतर भी प्रधानमंत्री मोदी और ओबामा की बैठक हुई थी।

इसके अलावा पीएम मोदी मेजबान देश के प्रधानमंत्री थोंगलोउन सिसोउलिथ, दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति पार्क गुन-हे और म्यांमा की स्टेट काउंसेलर आंग सान सू ची से भी मुलाकात करेंगे। मोदी ने बुधवा को पने जापानी समकक्ष शिंझो आबे के साथ द्विपक्षीय बैठक की थी। भारत और जापान ने आतंकवाद से मुकाबले, व्यापार और निवेश के क्षेत्र में सहयोग को और अधिक मजबूत करने का संकल्प लिया था। साथ ही मोदी ने आबे से हाल ही में बांग्लादेश में हुए आतंकी हमलों में जापानी नागरिकों के मारे जाने को लेकर संवेदनाएं भी जाहिर कीं। बांग्लादेश में इस्लामी चरमपंथियों ने विदेशियों के बीच मशहूर एक कैफे पर हमला किया था, जिसमें 22 लोग मारे गए थे।

आबे ने कहा कि जापान आतंकवाद के समक्ष घुटने नहीं टेकने वाला है। उन्होंने आतंकवाद से निपटने के लिए भारत के साथ सहयोग को और अधिक मजबूत करने की इच्छा जाहिर की। गुरुवार दोपहर को लाओस के प्रधानमंत्री की ओर से आज एक भव्य भोज का आयोजन किया जाएगा। मोदी शाम के समय दिल्ली के लिए रवाना होंगे।

सोमवार, 5 सितंबर 2016

क्या मुस्लिम महिलाओं को मिल पाएगा सुप्रीम कोर्ट से न्याय?

मित्रों,मैंने यूपीए की सरकार के समय अपने ब्लॉग brajkiduniya.blogspot.com पर लिखा था कि रजिया को बेशक विशेष सुविधा दीजिए लेकिन राधा को उससे वंचित भी नहीं रखिए। लेकिन देखा जा रहा है कि सत्ता में आने के ढाई साल बाद भी नई सरकार ने पुरानी सरकार की उन विभेदपूर्ण व तुष्टीकारक नीतियों को ही जारी रखा है जिसके चलते हिंदू अपने ही देश में,बहुसंख्यक होते हुए भी द्वितीयक स्तर के नागरिक बना दिए गए हैं। जब कथित हिंदुत्त्ववादी केंद्र सरकार का ऐसा हाल है तो जिन प्रदेशों में समाजवादी या साम्यवादी पार्टियों या विचारधाराहीन कांग्रेस पार्टी की सरकार है उनके हालात का तो कहना ही क्या। आज भी यकीनन यकीन नहीं होता कि भारत एक हिंदूबहुल देश है।
मित्रों,बात सरकारों तक ही सीमित होती तो फिर भी गनीमत थी। देखा तो यह भी जा रहा है कि न्यायपालिका भी सिर्फ हिंदुओं के रीति-रिवाजों और हिंदुओं के मामलों में ही टांग अड़ाने में मजा आ रहा है। अब दही-हांडी की ऊँचाई और उसमें भाग लेनेवालों की उम्र तक भी सुप्रीम कोर्ट तय करने लगा है और यह गलत भी नहीं है। लेकिन जैसे ही मुसलमानों का मामला आता है सुप्रीम कोर्ट कोना पकड़ लेता है। कुछ ही दिनों बाद धर्म के नाम पर बकरीद पर हजारों बेजुबान-निर्दोष जानवरों का गला रेत दिया जाएगा लेकिन सुप्रीम कोर्ट इसमें कतई हस्तक्षेप नहीं करेगा।
मित्रों,ऐसे माहौल में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि भारत की करोड़ों मुस्लिम महिलाओं को तलाक और बहुविवाह के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिल पाता है या नहीं। गेंद 1986 के शाहबानो मामले के बाद एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट के पाले में है। सवाल उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कुरानाधारित इस कुतर्क को मानेगा कि पुरूष ज्यादा बुद्धिमान होते हैं और बहुविवाह को रोकने से पत्नियों की हत्या को बढ़ावा मिलेगा। देश के बाँकी संप्रदाय के लोग तो एक ही विवाह कर रहे हैं और फिर भी अपनी पत्नियों की हत्या नहीं कर रहे हैं तो फिर मुसलमानों में ही यह हत्या करने की पागलपनवाली बीमारी फैलने का भय क्यों है?
मित्रों,कुछ ऐसा ही तर्क यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने भी आज से ढाई हजार साल पहले दिया था कि चूँकि महिलाओं के मुँह में कम दाँत होते हैं इसलिए वे पुरुषों से कमतर होती हैं। लेकिन आज का पश्चिमी समाज तो इसे सही नहीं मानता। चर्च सदियों तक अड़ा रहा कि सूर्य और बाँकी के ग्रह-तारे धरती की परिक्रमा करते हैं क्योंकि बाईबिल में यही लिखा है लेकिन बाद में चर्च ने अपना मत बदल लिया क्योंकि पश्चिम में चर्च की रूढ़िवादिता के खिलाफ लंबे समय तक धर्मसुधार आंदोलन चला जिससे ऐसा नहीं करने पर उसकी अपनी प्रासंगिकता ही खतरे में पड़ जाने का खतरा था।
मित्रों,दुर्भाग्यवश हम देखते हैं कि ऐसा कोई सुधार आंदोलन अब तक मुस्लिम समाज में नहीं चला है। आंदोलन चला भी है तो बहावी आंदोलन जिसने कट्टरता और रूढ़िवादिता को बढ़ाया ही है घटाया नहीं है। सवाल उठता है कि अगर कुरान कहता है कि धरती चपटी है तो क्या मुसलमान अपने बच्चों को वैसे स्कूलों में नहीं पढ़ाएंगे जिनमें यह पढ़ाया जाता है कि धरती गोल है? ऐसे में अगर मुस्लिम समाज अपने रीति-रिवाजों और मान्यताओं में समयानुकूल बदलाव नहीं करता है और महिलाओं को पशुओं से भी घटिया जानवर मानते हुए 1400 साल पुरानी किताब कुरान का हवाला देकर उनके मानवाधिकारों का लगातार हनन करता रहता है तो सवाल उठता है कि न्याय और धर्म की भूमि भारत क्या उसे चुपचाप ऐसा करने देगा? मुस्लिम महिलाओं के उद्धार और उनके गरिमामय जीवन को सुनिश्चित करने की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट बखूबी कर सकता है। मगर वो ऐसा करेगा क्या? और क्या अपने समुचित उत्तर द्वारा केंद्र सरकार ऐसा करने में उसकी सहायता करेगी?

रविवार, 28 अगस्त 2016

कृपया धीरे चलें,भ्रष्टाचार प्रगति पर है

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आपने जहाँ कहीं भी सड़क-पुल-नाली का काम चल रहा होगा कृपया धीरे चलें,कार्य प्रगति पर है लिखा हुआ बोर्ड जरूर देखा होगा। आपने कभी सोंचा है कि जहाँ पर ये सुनहरे अक्षर लिखे होते हैं क्या वहाँ सचमुच कार्य प्रगति पर होता है या कार्य ही प्रगति पर होता है?
मित्रों,हाजीपुर को ही लीजिए। यहाँ की गलियों में पिछले तीन-चार सालों से नाली-निर्माण का कार्य चल रहा था। तब जगह-जगह आपको ये शब्द पढ़ने को मिल जाते। लेकिन अब न तो नालियों का कहीं अता-पता है और न ही इन अतिप्रचलित शब्दों का। 80 करोड़ की नाली-निर्माण योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। इसी बीच नगर-परिषद में नए चेयरमैन का आगमन हुआ। कुछ दिनों तक अखबारों में मोटे-मोटे अक्षरों में छपा कि नगर पार्षदों की बैठक में ठेकेदार कंपनी को डाँट सुनाई गई और चेतावनी के साथ काम जल्द-से-जल्द पूरा करने को कहा गया लेकिन जैसा कि शुरू से ही सरसरी निगाह से देखने से ही पता चल रहा था कि यह नाली कतई सफल नहीं होनेवाली है और नाली निर्माण के नाम पर पैसे नाली में बहाए जा रहे हैं आज कहीं भी पूरे हाजीपुर में उक्त निर्माण कंपनी द्वारा बनाई गई नालियों का कहीं नामो-निशान तक नहीं है।
मित्रों,इसी तरह से हाजीपुर में इन दिनों उसी तरह से लगातार सड़क बनते रहते हैं जैसे कि भारत की राजधानी दिल्ली में बनते रहते हैं। अंतर बस इतना है कि दिल्ली में दुरूस्त सड़कों को फिर से दुरूस्त किया जाता है जबकि हाजीपुर की सड़कें चूँकि पानी में घुलनशील होती हैं इसलिए हर साल बरसात के बाद विलुप्त हो जाती हैं। फिर से टेंडर,फिर से निर्माण और फिर से तख्ते पर वही ईबारत।
मित्रों,सवाल उठता है कि आखिर कब तक हम यूँ ही धीरे चलते रहेंगे प्रगति की प्रतीक्षा में? कब वास्तव में हमारा देश-प्रदेश प्रगति पर होगा? नहीं समझे क्या? मित्र,वास्तव में जब कार्य प्रगति पर होता है तो कार्य प्रगति पर होता ही नहीं है बल्कि भ्रष्टाचार प्रगति पर होता है। एक उदाहरण और ले लीजिए। अभी वैशाली जिले में बाढ़ आई हुई है। जिले के देसरी प्रखंड के भिखनपुरा पंचायत में राखी के आसपास की रात में बांध में रिसाव होने लगा। शायद चूहों की कारस्तानी थी। रात में कोई कहाँ जाता सरकार को ढूंढ़ने सो गाँव के लोगों ने खुद ही रातभर जगकर मिट्टी भर दिया। दिन निकलने के बाद गंडक प्रोजेक्ट के जूनियर इंजीनियर आए 80 हजार रुपये लेकर और अपने एक चहेते दलाल को बाँटने के लिए देकर चले गए। दलाल तो ठहरा दलाल और फिर पैसे के भी तो पाँव होते हैं सो पैसे लेकर रफूचक्कर हो गया। हालाँकि वहाँ किसी ने इस बात का बोर्ड नहीं लगाया था कि कार्य प्रगति पर है लेकिन फिर भी भ्रष्टाचार प्रगति पर था।
मित्रों,हमारे देश में हम जगे रहें या सोये,दिन हो या रात। हर समय भ्रष्टाचार प्रगति पर होता है क्योंकि हर समय कहीं-न-कहीं रोड-पुल-नाली-बांध-स्कूल-अन्य सरकारी भवन आदि बनता रहता है। वैसे भ्रष्टाचार तो हमारे भारत के नस-नस में है लेकिन पैसों का गबन यदि किसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा होता है तो वो है यही आधारभूत संरचना का क्षेत्र। आपके राज्य में क्या हालत है पता नहीं लेकिन हमारे बिहार में तो इस क्षेत्र में सालोंभर मार्च लूट मची रहती है। कहने को तो बिहार में हर साल मई-जून तक भारी मात्रा में सड़कें-पुल बनाकर राज्य की जीडीपी में भारी वृद्धि कर दी जाती है। दावे किए जाते हैं कि बिहार प्रदेश नंबर वन बन गया है लेकिन जुलाई-अगस्त में वह जीडीपी बरसात के पानी में बह जाती है।
मित्रों,मेरी चुनौती है कि सब्सिडी-नरेगा-इंदिरा आवास का पैसा सीधे लाभान्वितों के खाते में डाल कर मोदी सरकार ने इन क्षेत्रों में तो भ्रष्टाचार को रोक दिया लेकिन अगर वो आधारभूत संरचना में लूट को रोक सके तो जानें। वैसे भी रोड-पुल-नाली-बांध-स्कूल-अन्य सरकारी भवनों का निर्माण राज्यों के अधिकार-क्षेत्र में आते हैं। वैसे जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है वहाँ की वास्तविकता भी यही है कि भाजपा-शासित अधिकतर राज्यों में भ्रष्टाचार ही प्रगति पर है। हाँ,केद्र सरकार द्वारा हो रहे निर्माण-कार्यों में स्थिति जरूर अपेक्षाकृत अच्छी है।

सोमवार, 22 अगस्त 2016

कानून का डंडा या डंडे का कानून?

मित्रों,आपने रॉलेट एक्ट का नाम जरूर सुना होगा। 1919 ई. में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट कमेटी की रिपोर्ट को क़ानून का रूप दे दिया। इस विधेयक में सरकार को राजनीतिक दृष्टि से संदेहास्पद व्यक्तियों को बिना वारंट के बन्दी बनाने, देश से निष्कासित करने, प्रेस पर नियन्त्रण रखने तथा राजनीतिक अपराधियों के विवादों की सुनवाई हेतु बिना जूरी के विशेष न्यायालयों को स्थापित करने का अधिकार प्रदान किया गया था। केन्द्रीय विधान परिषद के सभी सदस्यों द्वारा विरोध करने के बावजूद अंग्रेज़ सरकार ने रॉलेट एक्ट पारित कर दिया। इस अधिनियम से सरकार वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार को स्थगित कर सकती थी। वैयक्तिक स्वतंत्रता का अधिकार ब्रिटेन में नागरिक अधिकारों का मूलभूत आधार था। रॉलेट एक्ट एक झंझावत की तरह आया। युद्ध के दौरान भारतीय लोगों को जनतंत्र के विस्तार का सपना दिखाया गया था। उन्हें ब्रिटिश सरकार का यह क़दम एक क्रूर मज़ाक सा लगा।
मित्रों,पिछले दिनों भारत में दो ऐसे कानून आए हैं जिनकी तुलना बेझिझक रॉलेट एक्ट से की जा सकती है हालाँकि ये कानून बनाए हैं भारतीयों द्वारा निर्वाचित लोगों की व्यवस्थापिका ने। पहला कानून है निर्भया कानून जिसमें प्रावधान किया गया है कि अगर कोई पुरूष किसी महिला को 14 सेकेंड से ज्यादा एकटक देखता है उसको इसके लिए दंडित किया जा सकता है। कितना बड़ा मजाक और हास्यास्पद है ऐसा प्रावधान करना!
मित्रों,ठीक इसी तरह बिना खोपड़ी का इस्तेमाल किए बिहार की विधायिका ने कुछ ही दिनों पहले शराबबंदी से संबंधित एक अधिनियम को पारित किया है। इसके अनुसार अगर आपके घर में शराब की बोतल मिलती है तो आपके परिवार के सभी बालिग सदस्यों को जेल भेज दिया जाएगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस अतार्तिक प्रावधान के पहले शिकार बने हैं पूर्णिया के वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार। किसी ने शरारतपूर्ण तरीके से उनके घर में शराब की बोतल रख दी और पुलिस को खबर कर दिया। बेचारे हाथ-पाँव जोड़ते रहे लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई जैसा कि रॉलेट एक्ट में होता था। क्या अजब कानून बनाया है बिहार विधानमंडल ने कि पीते हुए पकड़े जाओ तो सपरिवार जेल जाओ और पीकर मर जाओ तो परिजनों को पैसे मिलेंगे। आप सभी जानते हैं कि मैंने कभी कोई नशा नहीं किया लेकिन आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर कल मुझे भी मेरे घर से शराब बरामद करवाकर सपरिवार जेल भेज दिया जाए।
मित्रों,सवाल उठता है कि क्या हमारे माननीय कानून बनाते समय होश में नहीं रहते हैं? क्या कानून के डंडे के बल पर लोकरूचि और लोकव्यवहार को जबर्दस्ती बदला जा सकता है? सवाल उठता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में कानून का डंडा चलेगा या डंडे का कानून?

क्या इस तरह आएंगे खेलों में भारत के अच्छे दिन?

मित्रों,पता नहीं आपकी नजर में अच्छे दिनों की क्या परिभाषा है? मैं यह भी नहीं जानता कि वर्तमान केंद्र सरकार की अच्छे दिनों की परिभाषा क्या है लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूँ कि जब तक सुखद परिणाम नंगी आँखों से दृष्टिगोचर न होने लगे हम यह नहीं कह सकते कि अच्छे दिन आ गए हैं। दुर्भाग्यवश कई क्षेत्रों में जिनमें से खेल भी एक है संघ सरकार ने अब तक ऐसी कोई पहल ही नहीं की है जिससे कि हम सीना ठोंककर कह सकें कि भले ही वर्तमान परिदृश्य निराशाजनक हो भविष्य उज्ज्वल होने जा रहा है।
मित्रों,मुझे तो तभी रियो ओलंपिक में भारत के घटिया प्रदर्शन का आभास हो गया था जब नरसिंह यादव प्रकरण सामने आया। आश्चर्य है कि जिस खिलाड़ी से देश को सबसे ज्यादा उम्मीद थी उसी के खिलाफ देश में ही,प्रशिक्षण केंद्र में ही साजिश रच दी गई। सरकार को चाहिए कि वो पता लगाए कि नरसिंह यादव के भोजन में प्रतिबंधित दवा मिलाने के पीछे किन-किन बड़े-छोटे लोगों का हाथ था और उनको दंडित करे। और न केवल दंडित करे बल्कि उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाए।
मित्रों,मैं पहले भी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से निवेदन कर चुका हूँ कि सरकार चलाना वन मैन वर्क नहीं है बल्कि टीम वर्क है। फिर भी वे न जाने क्यों हमारी बातें सुन ही नहीं रहे हैं। उन्होंने न जाने क्या सोंचकर अपने मंत्रिमंडल में ऐसे नमूनों को थोक में इकट्ठा कर रखा है जो मंत्री तो क्या संतरी बनने के लायक भी नहीं हैं। अब अपने खेल मंत्री विजय गोयल जी को ही ले लीजिए। श्रीमान् का विवादों से जन्मजात का नाता रहा है। श्रीमान् 40 अधिकारियों की भारी-भरकम टीम लेकर रियो पहुँचे थे। क्या अंतर है सुरेश कलमाडी और विजय गोयल में? कलमाडी भी चमचों के काफिले के साथ जाते थे गोयल भी गए। उस पर तुर्रा यह कि गोयल साब ने वहाँ भी आयोजकों से झगड़ा कर विवाद खड़ा कर दिया ठीक उसी तरह से जैसे कुछ साल पहले शाहरूख खान ने आईपीएल में किया था। श्रीमान् जी खिलाड़ियों का हौंसला बढ़ाने गए थे कि आयोजकों पर अपना रोबदाब दिखाने? आश्चर्य तो इस बात का भी है कि श्रीमान् जी को विश्वप्रसिद्ध भारतीय खिलाड़ियों के नाम भी पता नहीं हैं। शायद उनके लिए खिलाड़ी उसी तरह से सब्जेक्ट मात्र हैं जिस तरह से मुन्ना भाई एमबीबीएस में डॉक्टरों और प्रोफेसरों के लिए मरीज थे। तो क्या गोयल सचमुच करेंगे खेलों में भारत की कायापलट?
मित्रों,मुझे कभी-कभी लगता है कि मोदी सरकार भी वोटबैंक की सस्ती व टुच्ची राजनीति पर उतर आई है। एक मंत्री इस जाति से ले लिया तो एक उससे। वो भी बिना यह देखे कि व्यक्ति मंत्री पद के योग्य है या नहीं। बिना विचार किए कि मंत्री स्थिति को बिगाड़ेगा या संवारेगा। मोदी जी को भले ही भ्रम हो लेकिन मुझे तो कभी इस बात को लेकर भ्रम नहीं रहा कि श्रीमान् विजय गोयल जी खेलमंत्री बनने लायक बिल्कुल भी नहीं हैं।
मित्रों,भारत का खेल मंत्री तो ऐसा होना चाहिए जो पारंपरिक तरीके से सोंचे ही नहीं। खिलाड़ियों को चयनित कर तैयार करने का काम चीन-रूस-अमेरिका की तरह बचपन में ही शुरू हो जाना चाहिए। खिलाड़ियों को हर कदम पर पर्याप्त सरकारी सहायता और सहयोग मिलना चाहिए। जिस दिन हमें यह सुनने को नहीं मिलेगा कि कोई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी ठेला खींच रहा है या कुली का काम कर रहा है उसी दिन हम समझेंगे कि भारत में खेलों के अच्छे दिन आ गए हैं। तब भारत का नाम पदक तालिका में खुर्दबीन लेकर खोजना नहीं पड़ेगा बल्कि दूर से ही सबसे ऊपर दिखाई देगा। इसके लिए पर्याप्त धन खर्च करना पड़ेगा और सही तरीके से व सही जगह पर खर्च करना पड़ेगा। सरकारें जितनी रकम जीतने के बाद खिलाड़ियों को देती हैं उतनी पहले खर्च कर दे तो स्वर्ण पदक क्या खिलाड़ी सोने की खान ले आएंगे। परंपरागत सोंच वाले किसी विजय गोयल से यह काम एक तो क्या सात जन्मों में भी नहीं होने वाला।
मित्रों,मैं समझता हूँ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को वोटबैंक की राजनीति का पूरी तरह से परित्याग कर अमेरिका की तरह सिर्फ विभिन्न क्षेत्रों के योग्य लोगों को मंत्री बनाना चाहिए। और न केवल बनाना चाहिए बल्कि उनको काम करने की छूट भी देनी चाहिए। मगध में भले ही विचारों की कमी थी वर्तमान भारत में न तो विचारों की कमी है न ही विचारकों की। विश्व के सबसे महान लोकतंत्र अमेरिका की तरह सोंचने से ही भारत अमेरिका की तरह बन पाएगा और सचमुच में सवा सौ करोड़ भारतीयों और भारत के अच्छे दिन आएंगे। न केवल खेल में बल्कि प्रत्येक क्षेत्र में।  अब केवल अपने मन की बात करने से काम नहीं चलेगा श्रीमान् प्रधानमंत्री जी बल्कि आपको जनता के मन की बात भी सुननी होगी। अभी नहीं सुनिएगा तो 2019 में तो सुनिएगा ही। तब तो सुनना पड़ेगा ही। जनता अंधी नहीं है कि आपकी आकाशवाणी पर कही गई बात को सचमुच की आकाशवाणी मान लेगी और मान लेगी कि ओलंपिक में भले ही देश ने पिछली बार से खराब प्रदर्शन किया हो भारत के अच्छे दिन आ गए हैं। मान लेगी कि रोजगार,शिक्षा,सार्वजनिक स्वास्थ्य,कृषि आदि-आदि के क्षेत्र में भले ही स्थिति पहले से और भी ज्यादा खराब हो गई हो लेकिन अच्छे दिन तो आ ही गए हैं। इस तरह से अच्छे दिन उत्तरी कोरिया में आ सकते हैं भारत में तो कदापि नहीं।

बुधवार, 17 अगस्त 2016

सलमान खुर्शीद पाकिस्तान क्यों नहीं चले जाते?

मित्रों,मैंने पहले भी मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता अंधेरे में से संदर्भ लेते हुए कहा है कि रात के अंधेरे में वे चेहरे भी बेनकाब हो गए हैं जो दिन के उजाले में छिपे हुए थे। कुछ ऐसी ही स्थिति इन दिनों देशद्रोहियों की है। मोदी सरकार के आने के बाद से ही उनके खौफनाफ उद्देश्यों और चेहरों का अनावृत्त होना अनवरत जारी है। इनमें से कुछेक को राष्ट्रवादी सरकार के समय देश में असहिष्णुता दिखाई देने लगती है तो कुछेक तो खुलकर हमारे चिरशत्रु पाकिस्तान के पाले में हो लिए हैं। कुछेक ऐसे भी हैं जिनको राक्षसी संस्कृति के उन्नायक आईएसआईएस का परोक्ष समर्थन करते हुए साफ-साफ देखा जा सकता है।
मित्रों,महाभारत में आपने भी पढ़ा होगा कि जब पांडव वनवास पर थे तब उनको नीचा दिखाने के इरादे से दुर्योधन सदल-बल वनभोज के लिए गया और जानबूझकर पांडवों के आवास के आसपास ही शिविर लगाया। इसी दौरान उसका किरातों के साथ झगड़ा हो जाता है और किरात उसे बंदी बना लेते हैं। जब यह सूचना एक सैनिक धर्मराज युधिष्ठिर को देता है तब धर्मराज अपने अनुजद्वय भीम और अर्जुन को आदेश देते हैं कि जाकर दुर्योधन को मुक्त करवाओ। भीम और अर्जुन जब इसका विरोध करते हैं तो धर्मराज कहते हैं कि हमारे बीच जो आपसी विवाद हो लेकिन दुर्योधन हमारे परिवार का हिस्सा है। इसलिए जब भी बाहरी लोगों से संघर्ष की स्थिति बनती है हमें दुर्योधन का साथ देना चाहिए।
मित्रों,हम नहीं समझते कि जो लोग मोदी-विरोध के नाम पर भारत-विरोध पर उतारू हैं और देश के हितों को गंभीर क्षति पहुँचाने का महापाप कर रहे हैं वे महाभारत के इस प्रसंग से सर्वथा अनभिज्ञ होंगे। इसके उलट वे लोग कुछ ज्यादा ही पढ़े-लिखे हैं और उनमें से कई तो विदेशों में पढ़े हैं।
मित्रों,जो पाकिस्तान पत्थर फेंकने के लिए प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति 500 रुपये खर्च कर सकता है वो क्या लगातार आत्मघाती गोल दाग रहे इन महाविद्वान देशद्रोहियों के ऊपर लाखों रुपये खर्च नहीं कर रहा होगा? हम तो सिर्फ इसके बारे में अनुमान ही लगा सकते हैं यद्यपि सुरक्षा व खुफिया एजेंसियाँ चाहें तो जाँच कर सकती हैं और जाँच होनी भी चाहिए,जाँच होनी ही चाहिए। भारत कोई निर्बला-अबला स्त्री नहीं कि कोई भी राहगीर-उठाईगीर-भाड़े का टट्टू छेड़कर चला जाए। नरेंद्र मोदी की सरकार को इन देशद्रोहियों के खिलाफ प्रभावी कदम उठाकर यह साबित कर देना चाहिए उनके सबल-सशक्त नेतृत्व में भारत एक सबल और मजबूत राष्ट्र है जिसको क्षति पहुँचाना तो दूर की रही कोई जयचंद या गोरी उसकी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देख सकता।
मित्रों,हमें यह स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं है कि जब गिरिराज सिंह ने कहा था कि जो लोग नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं करते उनको स्वयं पाकिस्तान चले जाना चाहिए तो हमें भी नाराजगी हुई थी। लेकिन अब लगता है कि उनका कथन पूरी तरह से तो नहीं लेकिन आंशिक तौर पर सही था। सारे मोदी विरोधियों को तो नहीं सलमान खुर्शीद,मणिशंकर अय्यर जैसे लोगों को जो मोदी-विरोध और भारत-विरोध के बीच का फर्क नहीं जानते-समझते या जानना-समझना नहीं चाहते सचमुच पाकिस्तान चले जाना चाहिए। हिंदुस्तान में रहकर कोई हिंदुस्तान को ही नुकसान पहुँचानेवाली राजनीति करे और मलाई चाभे यह आज के हिंदुस्तानी कदापि सहन नहीं करनेवाले हैं। गया वो जमाना जब हिंदुस्तान में गदहे भी जलेबी खाते थे।

सोमवार, 15 अगस्त 2016

जश्ने आजादी विथ डिफरेंस की शुभकामनाएँ

मित्रों,आज भारत अपना 70वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है जबकि कल पाकिस्तान अपना जन्मदिन मना चुका है। एक लंबे समय के बाद भारत में राष्ट्रवादी सरकार सत्ता में है। वैसे तो मोदी सरकार के कार्यकाल में यह तीसरा स्वाधीनता दिवस है लेकिन इस बार यह दिन अलग-सा है। यह जश्ने आजादी विथ डिफरेंस इसलिए नहीं है क्योंकि अभी केंद्र में खुद को पार्टी विथ डिफरेंस कहनेवाली पार्टी की सरकार है बल्कि इस बार सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की फिजाँ बदली-बदली सी है।
मित्रों,शायद यह भारत के इतिहास की पहली जश्ने आजादी है जब पाकिस्तान हम पर हावी नहीं है बल्कि हम उस पर हावी हैं। यह भारत के इतिहास की पहली जश्ने आजादी है जब एकसाथ पाकिस्तान के कई भागों में हिंदुस्तान जिंदाबाद, पाकिस्तान मुर्दाबाद और मोदी-मोदी के नारे लगाए जा रहे हैं। शायद यह हमारी पहली जश्ने आजादी है जब भारत का गृह मंत्री कह रहा है कि हम पाकिस्तान से बातचीत तो करेंगे लेकिन सिर्फ पीओके पर। शायद ऐसा पहली बार हुआ है जब भारत का प्रधानमंत्री कह रहा है कि हम पाकिस्तान से पीओके प्राप्त करेंगे और साथ ही पाकिस्तान को बलुचिस्तान पर भी जवाब देना होगा। शायद ऐसा पहली बार हुआ है जब पाकिस्तान का झंडा लहरानेवालों और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगानेवाले गद्दारों को मस्जिदों में घुस-घुसकर कूटा जा रहा है। शायद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी भारतीय सरकार की कूटनीति से चीन सकते में है और किंकर्त्तव्यविमूढ़ दिख रहा है। शायद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब समान नागरिक संहिता को लागू करने की दिशा में केंद्र सरकार ने पहल की है। शायद भारत में ऐसा पहली बार हुआ है जब अरहर की दाल चने की दाल से सस्ती है। शायद भारत में ऐसा पहली बार हुआ है जब पीएम खुलेआम कालाधन रखनेवालों को चेतावनी दे रहा हो। शायद भारत में ऐसा पहली बार हुआ है जब सब्सिडी का पैसा सीधे लाभुकों के खाते में जा रहा है। आज सऊदी अरब भारत के आग्रह को घमंड में आकर अनसुना नहीं करता बल्कि अपने पास से पैसे देकर अन्याय के शिकार भारतीय मजदूरों की मदद करता है। यह भी पहली बार हुआ है जब अमेरिका के राष्ट्रपतीय चुनावों में भारत का प्रधानमंत्री मुद्दा बना हुआ है जबकि एक समय था जब भारत के पीएम के अमेरिका दौरे को अमेरिकी अखबार पहले पृष्ठ पर जगह तक नहीं देते थे। निश्चित रूप से आज भारत इतिहास में पहली बार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और जीडीपी विकास दर में दुनिया का शिरमौर है।
मित्रों,जाहिर है कि मात्र दो सालों में मोदी सरकार ने भारत के मान को वैश्विक स्तर पर नई ऊँचाइयाँ दी है। आज विदेशों को भारतीय होना शर्म का नहीं बल्कि गर्व का विषय है। परन्तु कुछ मामलों में आज भी चिराग तले अंधेरा की स्थिति बनी हुई है। हमारी शिक्षा-व्यवस्था ध्वस्त होकर परीक्षा-व्यवस्था में तब्दील हो चुकी है,स्वास्थ्य-व्यवस्था खुद बीमार है,राजधानी दिल्ली तक में कानून-व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक है,रेलवे पटरी से उतर चुकी है और आज की ट्रेनें कल आ रही हैं,विदेशों से कालाधन वापस लाने की रफ्तार काफी धीमी है,न्याय पाना आज भी दुश्वार है,किसान के हाथ आज भी खाली हैं और वो आज भी आत्महत्या कर रहा है। दुर्भाग्यवश आज भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में ज्यादातर मंत्री नाकारा हैं। जहाँ यूपीए की सरकार का मूल मंत्र दाग अच्छे हैं था वहीं इस सरकार का मूल मंत्र नालायक लायक हैं बन गया है। अच्छा है कि योग्य मगर वयोवृद्ध नेताओं को ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया है लेकिन सवाल उठता है कि आखिर स्मृति ईरानी ने शिक्षा मंत्री के रूप में ऐसे कौन-से झंडे गाड़ दिए कि उनको प्रोन्नति देकर कपड़ा मंत्रालय दे दिया गया? जिन प्रकाश जावड़ेकर को खराब प्रदर्शन के कारण मंत्रिमंडल से हटाने की बात हो रही थी उनको कैसे शिक्षा मंत्री बना दिया गया? कदाचित हमारे प्रधानमंत्री अभी तक यह समझ ही नहीं पाए हैं कि सरकार चलाना टीम वर्क होता है और सिर्फ कप्तान अकेले किसी भी टीम को जीत नहीं दिला सकता। शायद वे अभी तक यह भी नहीं समझ पाए हैं कि जनता की उनसे कितनी अपेक्षाएँ हैं और अगर इसी तरह उनकी सरकार उपर्लिखित विषयों में समय रहते कोई काम नहीं करती है तो फिर अगले चुनावों में जीत के लिए उनको अंतिम गेंद पर छक्का नहीं मारना होगा बल्कि एक ही गेंद पर शतक मारना होगा जो क्रिकेट की दुनिया के साथ-साथ राजनीति की दुनिया में भी कदापि संभव नहीं।

बुधवार, 10 अगस्त 2016

राईटर्स मीट में उपलब्धि-वर्णन कम मजबूरियों का रोना ज्यादा

मित्रों,मेरे लिए वह क्षण घोर आश्चर्य का पल था जब मुझे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन की ओर से आयोजित होनेवाली राईटर्स मीट में भाग लेने के लिए बुलाया गया। मुझे उम्मीद थी कि मीट में भाग लेने के लिए मुझ जैसे अति गरीब को जो अपनी जेब से किसी तरह से इंटरनेट का खर्च उठाकर पिछले 9 सालों से देशहित में लेखन कर रहा है दोनों तरफ का टिकट उपलब्ध कराया जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। फिर भी चूँकि मुझ जैसे अकिंचन को पहली बार इस तरह कार्यक्रम में भाग लेने के लिए बुलाया गया था इसलिए अपने पास से पैसे लगाकर मैंने भाग लेने का फैसला किया।
मित्रों,चूँकि संघीय सरकार ने दो साल पूरे किए थे इसलिए मुझे उम्मीद थी कि जो भी वक्ता आनेवाले हैं वे सरकार की दो सालों की उपलब्धियों का बखान करेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। ज्यादातर वक्ताओं का जोर इस बात पर था कि केंद्र सरकार के हाथ बंधे हुए हैं और शिक्षा,भूमि,पुलिस,स्वास्थ्य जैसी जनकल्याण से जुड़ी सारी चीजें संविधान-निर्माताओं ने राज्य सरकारों के हवाले कर दिया है। लगभग सारे वक्ता ले-देकर जन-धन योजना और डीबीटीएल का ही जिक्र कर रहे थे।
मित्रों,हमने भी भारत का संविधान पढ़ा है,साथ ही भारत का इतिहास भी पढ़ा है और हम पहले से ही जानते हैं कि 1919 के अधिनियम के अनुसार भारत में द्वैध-शासन लागू किया गया था। संविधान-निर्माताओं ने सातवीं अनुसूची में जनकल्याण से संबद्ध लगभग सारे विषयों को फिर से राज्य-सरकार के जिम्मे कर दिया। बाद में जब 1993 में स्थानीय स्वशासन लागू किया गया तब लोककल्याण से संबद्ध कई कामों को स्थानीय निकायों के हवाले कर दिया गया। सवाल उठता है कि जिन राज्यों में भाजपा का सीधा या गठबंधन के अंतर्गत शासन है क्या वहाँ सचमुच में रामराज्य आ गया है? सवाल यह भी उठता है कि क्या केंद्र सरकार राज्य-सूची के विषयों में कोई संशोधन कर ही नहीं सकती है या फिर राज्य-सूची से संबद्ध विषयों पर कोई कानून बना ही नहीं सकती है? सवाल उठता है कि केजरीवाल की तरह रोना रोकर केंद्र सरकार के नीति-नियंताओं को क्या हासिल हो जानेवाला है? आखिर जनता ने उनको रोने के लिए नहीं बल्कि आंसू पोछने के लिए वोट दिया है। नीयत साफ हो,विश्वास में दृढ़ता हो,नीतियों के बारे में स्पष्टता हो तो ऐसी कौन-सी उपलब्धि है जो यह सरकार हासिल नहीं कर सकती?
मित्रों,विवेक ओबेराय जो महान अर्थशास्त्री हैं और नीति आयोग के सदस्य भी हैं का कहना था कि विधि-निर्माण समय बर्बाद करनेवाली प्रक्रिया है। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि विकल्प क्या है? जबकि भारत में विधि का शासन है तो विधि तो बनानी ही पड़ेगी और कोई उपाय है भी तो नहीं। आखिर कब तक अध्यादेश जारी करके काम चलाया जाएगा? संसद के समवेत होने के 6 सप्ताह के भीतर अध्यादेश को संसद से पारित तो करवाना पड़ेगा ही। इस संबंध में श्री ओबेराय ने भू-अर्जन अधिनियम,2013 का विस्तार से जिक्र भी किया।  श्री ओबेराय के अनुसार सरकार के पास सीमित राजकोषीय स्रोत हैं इसलिए जनाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए निजीकरण के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है।
मित्रों,राज्यसभा सदस्य और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री विनय सहस्रबुद्धे का जोर सुशासन की स्थापना पर रहा। उनका मानना था कि सिर्फ कागजों पर शिक्षा,स्वास्थ्य,सूचना आदि का अधिकार दे देने से जनता को कोई लाभ मिलनेवाला नहीं है। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि क्या जनता को जब मुस्कुराने का अधिकार दिया जाएगा तभी वे हँसेंगे? फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री ने समस्या-प्रधान फिल्मों के निर्माण पर जोर दिया। साथ ही मीडिया से छोटे शहरों के गायब होने पर चिंता जताई। उनका मानना था कि अगर भारत को फिर से विश्वगुरू बनाना है कि इसे दुनिया का इनोवेशन हब बनाना होगा। उनका कहना था कि विविधता में एकता का नारा अच्छा तो है लेकिन विविधता से देश के समक्ष कठिनाई भी पैदा होती है।
मित्रों,भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बेलाग तरीके से साफ-साफ कहा कि विचारधारा के बिना राजनीति करना असंभव है। ऐसा होने पर राजनीति की हालत वही होगी जो प्राण के बिना शरीर की होती है। उनका कहना था कि भारत में इस समय चार वैचारिक खेमे हैं-कांग्रेस,जनसंघ,कम्युनिस्ट और समाजवादी। इसी प्रकार भारत में तीन तरह की विचारधाराएँ प्रचलन में हैं-धर्मनिरपेक्ष समाजवादी,राष्ट्रवादी और साम्यवादी। इसमें से समाजवादी विचारधारा अब परिवारवाद में बदल गई है। कांग्रेस की विचारधारा में उसकी स्थापना के समय से ही मिट्टी की सुगंध और भारतीयता का अभाव है। उनका कहना था कि कांग्रेस की सोंच नवनिर्माण की थी। यहाँ तक कि उनलोगों ने संस्कृति के नवनिर्माण की दिशा में भी प्रयास किया। जबकि पूर्ववर्ती जनसंघ और वर्तमान की भाजपा नवनिर्माण में नहीं पुनर्निर्माण में यकीन रखती है। भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसने देशहित में आंदोलन किए व्यक्ति-विशेष के महिमामंडन के लिए कोई आंदोलन नहीं किया। उन्होंने कहा कि मोदी या मोदी सरकार देश में परिवर्तन नहीं ला सकती विचारधारा ही परिवर्तन ला सकती है। श्री शाह ने कहा कि केंद्र सरकार पहली बार सजीव जीडीपी के लिए प्रयास कर रही है। हर 15 दिन पर प्रधानमंत्री सरकार के कामकाज की कठोर समीक्षा करते हैं। उन्होंने बताया कि भारत सरकार चाहती है कि 2025 तक भारत की सेना दुनिया की सबसे आधुनिक सेना हो और 21वीं सदी भारत की सदी कहलाये।
मित्रों,वरिष्ठ पत्रकार और भारत सरकार में मंत्री एमजे अकबर ने अपने भाषण में रोटी की समानता पर जोर दिया। उनका कहना था कि भूख की न तो कोई जाति होती है और न ही कोई धर्म ही होता है। उन्होंने कहा कि इस्लाम सांप्रदायिक भाईचारे की बात करता है राष्ट्रवाद की बात नहीं करता। उन्होंने जोर देकर कहा कि जबसे भारत है तबसे भारत में समानता का अधिकार स्वतःस्फूर्त तरीके से प्रचलन में है। उन्होंने कहा कि तकनीक ने आज समय के अर्थ को बदल दिया है। श्री अकबर ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए बताया कि यद्यपि लार्ड कार्नवालिस अमेरिकी संग्राम में हार गया था फिर भी उसको प्रोन्नति देकर भारत भेज दिया गया वो भी यह कहकर कि अमेरिका से मुट्ठीभर कर प्राप्त कर लेने से ब्रिटेन को कुछ ज्यादा हासिल नहीं होनेवाला है जबकि जो भी देश या जाति भारत पर राज करेगी उसका पूरी दुनिया पर शासन होगा। राजीव श्रीनिवासन ने कहा कि चीन एक विकसित राष्ट्र तो है लेकिन आधुनिक राष्ट्र नहीं है क्योंकि वहाँ लोकतंत्र नहीं है। संविधान में सिद्धांतों का वर्णन हो सकता है नीतियों का नहीं। श्री श्रीनिवासन ने यह भी कहा कि दुनिया में तीन तरह की धर्मनिरपेक्षता प्रचलन में है-1.फ्रांस की,2.कम्युनिस्टों की और 3.भारत की। इनमें से सिर्फ भारत की धर्मनिरपेक्षता ही सर्वधर्मसमभाव और सहअस्तित्व की बात करती है। उनका यह भी कहना था कि इस्लाम में धर्मनिरपेक्षता के लिए कोई स्थान नहीं है।
मित्रों,राष्ट्रवादी दलित चिंतक अरविंद नीलकंठन ने उदाहरण देकर अंबेदकर को हिंदू राष्ट्रवादी साबित करने की सफल कोशिश की। उन्होंने बताया कि अंबेदकर की नजर में आर्य जाति नहीं था बल्कि श्रेष्ठता का प्रतीक था। उन्होंने बताया कि अंबेदकर की चिंता भारत में हिंदुओं की रक्षा करने की थी। अंबेदकर मुसलमानों या मुसलमानों की बहुलतावाले किसी भी इलाके को भारत में रखना नहीं चाहते थे क्योंकि वे समझते थे कि इससे भविष्य में हिंदुओं और भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि पंचशील समझौते के समय अंबेदकर ने नेहरू को पत्र लिखा था कि चीन धर्मविरोधी राज्य है इसलिए उसके मन में पंचशील के प्रति आदर हो ही नहीं सकता। श्री अंबेदकर ने समान सिविल संहिता को लागू करने का जमकर समर्थन किया था और स्पष्ट रूप से कहा था कि भारत को अनिवार्य तौर पर एक हिंदू राज्य होना चाहिए। अंबेदकर का साफ तौर पर कहना था कि हिंदू से बौद्ध बनना घर के एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने के समान है वहीं हिंदू से मुसलमान या इसाई बनने की तुलना एक घर से दूसरे घर में जाने से की जा सकती है। श्री नीलकंठन ने कहा कि स्वामी विवेकानंद और अंबेदकर के विचार एक जैसे हैं। अंबेदकर का साफ तौर पर मानना था कि अल्पसंख्यक समुदाय का निर्णय संप्रदाय के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक रूप से वंचित होने के आधार पर होना चाहिए। कश्मीर के बारे में अंबेदकर ने कहा कि कश्मीर में अपने लोगों की रक्षा की जानी चाहिए। यहाँ अपने लोगों से उनका मतलब हिंदुओं और सिक्खों से था।
मित्रों,अमेरिका से पधारे प्रो. जुलुरी ने क्या कहा यह अंग्रेजी में हाथ तंग होने के चलते मैं समझ ही नहीं पाया। महान लेखक व सांसद स्वप्न दासगुप्ता ने अमर्त्य सेन के इस कथन से कि अकबर भारत का पहला सम्राट था जिसने अल्पसंख्यकों के अधिकारों को मान्यता दी से असहमति जताई और कहा कि प्राचीन युग से ही भारत में अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक जैसी कोई समस्या रही ही नहीं है। बल्कि हमारे यहाँ तो सर्वे भवंतु सुखिनः और तु वसुधैव कुटुंबकम जीवन-पद्धित के हिस्सा रहे हैं। साथ ही हमें यह समझना चाहिए कि हिंदू हमेशा भारत में बहुसंख्यक थे और आज भी बहुसंख्यक हैं। उनका कहना था कि संविधान ही सबकुछ नहीं हो सकता बल्कि भारतीयता संविधान से भी ऊपर है। भारत का संविधान भले ही 26 जनवरी,1950 को लागू हुआ लेकिन भारत की या भारत में प्रजातंत्र की शुरुआत किसी 26 जनवरी या 15 अगस्त से नहीं हुई। बल्कि बहुलवाद और प्रजातंत्र भारत की संस्कृति में समाहित है। मीट के अंतिम वक्ता आरएसएस के सर कार्यवाह कृष्ण गोपाल ने आरएसएस और राष्ट्रवाद की विचारधारा के योगदान और महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि किस प्रकार से आरएसएस के सदस्यों में से कईयों ने देशहित में परिवार तक नहीं बनाया और उनका तर्पण करनेवाला भी कोई नहीं है।
मित्रों,हालाँकि सम्मेलन में भारत-सरकार की उपलब्धियों पर कम ही चर्चा हुई फिर भी मैं यह नहीं कह सकता कि इससे मुझे कोई लाभ नहीं हुआ। मैंने कई नए मुहावरों को सीखा,कई नए तर्कों से वाकिफ हुआ,कई नए विचारों से सन्नद्ध हुआ। फिर भोजन-नाश्ता और चाय का भी उत्तम प्रबंध किया गया था। एक और बात जिसने मुझे खासा परेशान किया वह थी मीट में अमित शाह और कृष्ण गोपाल जी को छोड़कर सारे वक्ताओं ने अंग्रेजी में अपना व्याख्यान दिया। राष्ट्रवादी संगठन होने के चलते कम-से-कम संघ परिवार से जुड़ी संस्था से तो हिंदी की उपेक्षा की उम्मीद नहीं ही की जानी चाहिए।

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

प्रभुजी,हमें रेलवे से बचाओ

मित्रों,अगर मैं यह कहूँ कि भारतीय रेल भारत का प्राण और प्रतीक है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारत का कोई ऐसा इंसान नहीं होगा जिसकी यादें रेलवे से जुड़ी हुई नहीं हों। रेलयात्रा का मतलब लोग आमतौर पर सुखद और आरामदेह यात्रा से लगाते हैं। लेकिन जब यही यात्रा हिटलर की यातना-शिविर की तरह दुःखद,थकाऊ और पकाऊ बन जाए तो? जब ट्रेनें जाने का समय पर आने लगे और अगले दिन आने के समय पर जाने लगे तो? जब यात्रियों व यात्रियों के समय का कोई मूल्य ही नहीं रह जाए तो?

मित्रों,इन दिनों  दिल्ली से बिहार आने-जानेवाली ट्रेनों का कुछ ऐसा ही हाल है। मैं पिछले हफ्ते 28 जुलाई को मगध एक्सप्रेस से दिल्ली गया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी फाउंडेशन के राईटर्स मीट @WritersMeet में भाग लेने जो 30-31 जुलाई को दिल्ली में आयोजित थी। ट्रेन पटना जंक्शन से 18:10 में खुलनेवाली थी लेकिन खुली 22:30 में। स्टेशन पर बैठे-2 मैंने देखा कि अपनी रफ्तार के लिए जानी जानेवाली संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस जो सुबह 7 बजे  दिल्ली से पटना जंक्शन आती है रात 8 बजे आई। यहाँ हम आपको बता दें कि यह वही संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस है जो जिसके पटना से दिल्ली के बीच में मात्र 3 स्टॉपेज हैं और जो मात्र 14 घंटे में निर्धारित समय से भी पहले पटना से दिल्ली पहुँचाती थी। तो ऐसा क्या हो गया कि वही ट्रेन अब 12-12 घंटे की देरी से चल रही है? अभी तो ठंड का मौसम भी नहीं है इसलिए कुहासा भी नहीं है फिर दिल्ली से बिहार आने-जानेवाली सारी ट्रेनों की यही दशा क्यूँ है?
मित्रों,फिर मैं खुद को संपूर्ण क्रांति के यात्रियों के मुकाबले ज्यादा खुशनसीब समझते हुए मगध से दिल्ली के लिए रवाना हुआ। लेकिन यह क्या,ट्रेन तो रफ्तार पकड़ ही नहीं रही थी। दस मिनट चलती थी और एक घंटे के लिए रूक जाती थी। अंततः ट्रेन रात के पौने नौ बजे दिल्ली के शिवाजी ब्रिज स्टेशन पर पहुँची। मेरे पास अब इतना धैर्य था नहीं कि मैं उस ट्रेन को और झेलता और उसके नई दिल्ली स्टेशन पहुँचने तक इंतजार करता सो वहीं पर मैंने ट्रेन को छोड़ दिया। यहाँ हम आपको यह बता दें कि ट्रेन को नई दिल्ली दोपहर के 11:50 में ही पहुँचना था। यानि ट्रेन अभी नई दिल्ली आई भी नहीं थी और साढ़े नौ घंटे लेट हो चुकी थी।
मित्रों,परंतु मेरे धैर्य की असली परीक्षा तो अभी बाँकी ही थी। @WritersMeet में भाग लेने के बाद मेरी हाजीपुर वापसी स्वतंत्रता सेनानी सुपर फास्ट एक्सप्रेस से 2 अगस्त को निर्धारित थी। शाम में इंटरनेट से सर्च करने पर पता चला कि ट्रेन रात के 8:30 बजे के बदले 10:30 बजे खुलेगी। परंतु स्टेशन आने पर रेलवे के फ्री वाई फाई के सौजन्य से पता चला कि ट्रेन अब रात के 12:30 जाएगी। कुछ देर के बाद स्टेशन की उद्घोषणा में बताया गया कि ट्रेन अब रात के 1:30 में रवाना होगी। लेकिन 1:30 बजे उद्घोषणा में कहा गया कि यात्रीगण धैर्य रखें ट्रेन शीघ्र प्लेटफार्म संख्या 13 पर लाई जाएगी। ट्रेन आई 2 बजे और सवा दो बजे उसने प्रस्थान किया। एक तो नीम खुद ही कड़वा और ऊपर से करेला। इस ट्रेन ने तो बैलगाड़ी को भी रफ्तार में मात दे दी भले ही उसके नाम में सुपर फास्ट जुड़ा हुआ था। चलती कम रूकती ज्यादा थी। दस मिनट चलती थी और 1 घंटा रूकती थी। यहाँ तक कि उसको रोककर माल गाड़ी और पैसेंजर ट्रेन को भी आगे जाने दिया जा रहा था। उस पर यात्रियों ने ट्रेन के शौचालय को इतना गंदा कर दिया कि साक्षात रौरव नरक का दृश्य उत्पन्न हो गया और सीट पर बैठना-लेटना भी मुश्किल हो गया। उससे भी दुःखद स्थिति यह थी कि हजार किलोमीटर के सफर में एक बार भी शौचालयों को साफ नहीं किया गया। सो रास्ते भर गैस रिलीज करते हुए मैं ठीक से खा-पी भी नहीं पाया। इस डर से कि अगर दीर्घशंका लगेगी तो करूंगा क्या? पहली नजर में मुझे रेलवे की मल-मूत्र शुद्धिकरण की नई व बहुचर्चित प्रणाली भी फेल लगी।
मित्रों,बार-बार मैं एस-थ्री बोगी की 56 नंबर अपर साईड सीट पर चढ़ता और उतरता। आखिर कितना सोता या कितना लेटता? मेरा पूरा शरीर दर्द करने लगा जैसे कि तेज बुखार में होता है। अंतत: ट्रेन 3 तारीख के दोपहर के 14:15 के बजाए 4 तारीख की सुबह के 3:30 बजे हाजीपुर स्टेशन पहुँची।
मित्रों,मैं पहले भी दिल्ली गया हूँ अटल जी और मनमोहन सिंह के राज में लेकिन कभी ट्रेन इतनी लेट नहीं हुई थी। फिर अभी जाड़े का मौसम भी नहीं है। आजकल हर रेल टिकट पर छपा रहता है कि रेलवे आपसे सिर्फ 57 प्रतिशत भाड़ा ही ले रही है। लेकिन हमारे तो बाँकी के 43 प्रतिशत पैसे भी ट्रेन के अतिशय लेट से चलने के कारण रास्ते में खाने-पीने में चले गए। मैं आदरणीय रेल मंत्री सुरेश प्रभुजी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी से अनुरोध करता हूँ कि कृपया रेलवे को यातना-गृह बनने से बचाईए। दिल्ली-यात्रा के बाद मेरी तो हालत यह है कि अब मैं रेलवे से यात्रा करने से पहले लाख बार सोचूंगा। सिर्फ मेरा देश बदल रहा है आगे चल रहा है के शीर्षक वाले गीत गाने से न तो देश बदलेगा और न ही आगे-आगे चलेगा। अगर केंद्र-सरकार को टिकट का बाँकी का 43 प्रतिशत पैसा भी चाहिए तो ले लीजिए लेकिन ट्रेनों का संचालन समय पर करिए। रेलगाड़ी को सही मायने में रेल गाड़ी बनाईए न कि ठेलगाड़ी। तभी देश बदलेगा और आगे भी चलेगा क्योंकि मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूँ कि रेलवे भारत का प्राण ही नहीं प्रतीक भी है।