रविवार, 30 अगस्त 2015

पोस्ट डेटेड चेक है नीतीश कुमार का पैकेज

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों बिहार में पैकेज-पैकेज का खेल चल रहा है। तेरा पैकेज इतने का तो मेरा इतने का। मगर सवाल उठता है कि पैकेज होता क्या है? क्या अपने घर में रखे पैसे को विभिन्न मदों में खर्च करना पैकेज देना होता है या फिर पैकेज का मतलब है कहीं बाहर से पैसों की प्राप्ति कर फिर उसको खर्च करना? जहाँ तक मैं समझता हूँ कि अपने दांयें हाथ से पैसे उठाकर बांयें हाथ को दे देने को किसी भी तरह से पैकेज देना तो नहीं ही कहा जाना चाहिए।
मित्रों,फिर भी अगर हम यह मान भी लें कि नीतीश कुमार जी ने बिहार के खजाने से बिहार के लोगों को 2 लाख करोड़ से ऊपर का पैकेज दे दिया तो क्या बिहार सरकार इस पैकेज तो तुरंत लागू करने जा रही है? इतिहास के आईने में अगर हम झाँकें तो पाते हैं कि 1942 में सर स्टेफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में क्रिप्स मिशन ने भारत का दौरा किया था। मिशन का कहना था कि हम भारत को डोमिनियन स्टेटस तो देंगे लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति व विजय-प्राप्ति के बाद। जाहिर है कि ब्रिटिश सरकार द्वितीय विश्वयुद्द में किसी भी तरह भारतीयों की सहायता चाहती थी। चूँकि प्रथम विश्वयुद्ध से पहले और के दौरान किए गए अपने वादों से ब्रिटिश सरकार युद्ध जीतने के बाद मुकर चुकी थी और उसका दमन-चक्र पहले से भी ज्यादा भीषण हो गया था इसलिए कांग्रेस ने अतीत से सीख लेते हुए क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव को पूरी तरह से नकार दिया। जवाहर लाल नेहरू ने प्रस्ताव को पोस्ट डेटेड चेक की संज्ञा दी अर्थात् यह प्रस्ताव एक ऐसे बैंक चेक के समान है जिस पर वर्तमान की नहीं बल्कि भविष्य की तारीख डाली गई है। अब क्या पता कि खातेदार तब तक अपने खाते में पैसा रखेगा भी कि नहीं या फिर खाते को चालू रखेगा कि बंद ही कर देगा।
मित्रों,नीतीश कुमार जी का कथित पैकेज भी एक पोस्ट डेटेड चेक के समान है जिसको जनता तभी भुना पाएगी जब वो नीतीश  कुमार जी की बातों पर भरोसा करके एक बार फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज कर देती है। अगर हम सन् 1942 के भारत से आज के बिहार की तुलना करें तो पाते हैं क्रिप्स मिशन यानि नीतीश सरकार बिहार के लोगों से कह रही है कि हमने जो-जो पिछली बार नहीं किया इस बार जरूर कर देंगे लेकिन पहले हमें जिताओ तो। तब तो भारत की जनता ने क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को सिरे से नकार दिया था तो क्या इस बार बिहार की जनता पोस्ट डेटेड चेक पर भरोसा कर लेगी? दूसरी ओर नरेंद्र मोदी के पैकेज पर अमल शुरू हो भी गया है।
मित्रों,अब हम जरा-सा विश्लेषण कर लेते हैं कथित पैकेज में निहित कथ्य का भी। वास्तव में यह पैकेज सिर्फ व्यय का पैकेज है इसमें आय की बात कहीं की ही नहीं गई है। पैकेज में यह तो कहा गया है हम यह फ्री देंगे,वह फ्री देंगे लेकिन कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि हम इतने उद्योग स्थापित करेंगे या बिहार की आय में इतने की वृद्धि करेंगे या फिर इतने लोगों को रोजगार देंगे। पूरी दुनिया जानती है कि बिहार के युवाओं को रोजगार चाहिए न कि फ्री की वाई-फाई,फ्री का बिजली-पानी। बिहार के युवाओं को बेरोजगारी भत्ता नहीं चाहिए बल्कि रोजगार चाहिए,औद्योगिकृत-विकसित बिहार चाहिए जिसमें वे स्वाभिमान के साथ अपने घर-परिवार के साथ एक अच्छी और स्तरीय जिंदगी जी सकें। वास्तव में जिस दिन ऐसा होगा उसी दिन से बिहार स्वाभिमान के साथ सिर उठाकर जी सकेगा। एक क्या हजारों स्वाभिमान रैलियों का आयोजन भी बिहार के प्राचीन और मध्यकालीन स्वाभिमान को पुनर्स्थापित नहीं कर सकती।
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शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

बेतुकी है वन रैंक वन पेंशन की मांग

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आप सोंच रहे होंगे कि मुझे क्या हो गया है। क्या अब मैं देशभक्त नहीं रहा? अगर आप ऐसा सोंच रहे हैं तो बिल्कुल गलत सोंच रहे हैं। दरअसल मैं इस तरह की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मेरा दिल आज भी देश के लिए धड़कता है। दरअसल आप रोज टीवी पर देखते हैं कि सैनिक वन रैंक वन पेंशन की मांग कर रहे हैं। टीवी वाले बस इतना ही दिखाते हैं और आप इतना ही देखते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि वन रैंक वन पेंशन की मांग है क्या और इसका देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?
मित्रों,मैं पहेलियाँ बुझाने में यकीन नहीं रखता इसलिए मैं आपको बताता हूँ कि वन रैंक वन पेंशन की मांग क्या है और इसे लागू करने से पिछली सरकार क्यों हिचकती थी और वर्तमान सरकार भी क्यों संकोच कर रही है। दरअसर सैनिकों की मांग है कि जो व्यक्ति कर्नल या किसी भी पद से 1980 में 250 रुपये प्रतिमाह के वेतन पर रिटायर हुआ उसका पेंशन उनके उन समकक्षों के बराबर हो जो अब एक-डेढ़ लाख प्रतिमाह के वेतन पर रिटायर हो रहे हैं।
मित्रों,आप जानते हैं कि हमारे देश में सारी सरकारी नौकरियों में पेंशन का निर्धारण उनके तत्कालीन वेतन के आधार पर होता है। उदाहरण के लिए मेरे पिताजी डॉ. विष्णुपद सिंह,कॉलेज रीडर के पद से वर्ष 2003 में 18000 रुपये के वेतन पर रिटायर हुए। अभी उनको 45000 का पेंशन मिल रहा है लेकिन अभी दो महीने पहले रामसुरेश गिरि रीडर के पद पर ही सवा लाख के वेतन पर रिटायर हुए हैं और उनका पेंशन 60 हजार से भी ज्यादा है। अब अगर पिताजी को वन रैंक वन पेंशन चाहिए तो उनका पेंशन भी कम-से-कम 60 हजार तो होना ही चाहिए।
मित्रों,अब सोंचिए कि अगर सैनिकों की वन रैंक वन पेंशन की मांग को केंद्र सरकार ने मान लिया तो क्या अन्य विभाग के लोग भी अपने लिए यही मांग नहीं करेंगे? फिर देश की अर्थव्यवस्था का क्या हाल होगा? वैसे भी अगले साल नए वेतनमान के आने के बाद अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़नेवाला है। क्या वन रैंक वन पेंशन लागू होने के बाद रचनात्मक कार्यों के लिए देश के खजाने में पर्याप्त पैसा बचेगा? फिर देश के विकास का क्या होगा? हो सकता है कि सैनिकों की मांग सैद्धांतिक रूप से सही हो लेकिन क्या वह व्यावहारिक तौर पर सही है? इसलिए सैनिकों को जिद छोड़ते हुए उस देश की भलाई के लिए बीच में कहीं समझौते को मान लेना चाहिए जिस देश के लिए उन्होंने अपना खून बहाया है। दरअसल वन रैंक वन पेंशन की मांग मधुमक्खी का छत्ता है जिस पर हाथ डालने का मतलब होगा सभी विभागों के सारे सरकारी पेंशनधारियों को धरना,प्रदर्शन,अनशन और आंदोलन के लिए भड़काना,प्रेरित करना। वैसे इसके लागू होने से मुझे भी लाभ होगा क्योंकि मेरे पिताजी भी पेंशनधारी हैं लेकिन मुझे देश की कीमत पर यह लाभ नहीं चाहिए,कतई नहीं।

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गुरुवार, 27 अगस्त 2015

कौन कहता है बिहार बीमारू राज्य नहीं है?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,एक समय था जब भारत के अर्थशास्त्री बिहार,मध्य प्रदेश,राजस्थान और उत्तर प्रदेश को भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बोझ मानते थे और इनको इकट्ठे बीमारू राज्य कहा करते थे। राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्य अब दावा करने लगे हैं कि वे बीमारू नहीं रहे लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि ठीक ऐसा ही दावा इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी बिहार के बारे में कर रहे हैं। शायद इसी तरह के घटनाक्रम में कभी यह कहावत बनी थी कि जब सारी लड़कियाँ नृत्य करने लगीं तो लंगड़ी-लूली ने कहा कि इनसे अच्छा नृत्य तो वो कर लेती है।
खैर,अब नीतीश कुमार उर्फ बिहार कुमार (कृपया इस नामकरण को मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार के प्रसंग से जोड़कर न देखें ) को जो दावा करना था उन्होंने कर लिया,दस साल तक जो हवाबाजी करनी थी कर ली। हवाबाजी में तो पूरी वसुधा पर उनका कोई जोड़ ही नहीं है। लेकिन क्या नीतीश कुमार जी बताएंगे कि बिहार बीमारू राज्य कैसे नहीं रहा? जहाँ भारत की प्रति व्यक्ति औसत आय 80388 रुपया है वहीं बिहार की प्रति व्यक्ति औसत आय 31229 रुपया है। जहाँ बिहार में बिजली की प्रति व्यक्ति खपत 144 किलोवाट प्रति घंटा है. वहीं देश में औसतन प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 927 किलोवाट प्रति घंटा है। जहाँ राज्य की साक्षरता का औसत है 63.8 फीसदी है वहीं राष्ट्रीय औसत 74 फीसदी।  जहाँ बिहार में 43.85 फीसदी लोग अनपढ़ हैं वहीं देश का औसत 35.73 फीसदी है। जहाँ बिहार के 70 फीसदी ग्रामीण परिवार दिहाड़ी मजदूर हैं, वहीं देश का औसत 51 फीसदी है। जहाँ भारत में सिंचित क्षेत्र का औसर 28 प्रतिशत है वहीं कृषि योग्य कुल 93.6 लाख हेक्टेयर भूमि में से मात्र 15 लाख हेक्टेयर भूमि ही वास्तविक रूप से सिंचित है। आज नीतीश कुमार उर्फ बिहार कुमार बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं तो लगे हाथ वे यह भी बता दें कि आज उनके दस साल के शासन के बाद भी राज्य में कितने प्रतिशत सरकारी नलकूप चालू अवस्था में हैं? जहाँ भारत में गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करनेवाले लोगों की संख्या जहाँ 36 प्रतिशत वहीं बिहार में आजादी के 70 साल बाद भी 55 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं और जहालत और जलालत की जिंदगी जी रहे हैं।
मित्रों,अब बात करते हैं उद्योगों की। बिहार में देश की आबादी 9 प्रतिशत है जबकि राज्य के कारखानों से रोजगार पाने वाले लोगों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रलय की एक रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में 1.79 लाख कारखाने हैं जिनमें से बिहार में मात्र तीन हजार कारखाने ही हैं। बिहार में एक कारखाने से औसतन 40 लोगों को रोजगार मिल रहा है जबकि देश में यह औसत 72 है। राज्य में एक भी ऐसा कारखाना नहीं है जो 2,000 से अधिक लोगों को रोजगार देता हो। प्रदेश में जो भी कारखाने हैं उनमें से आधे ऐसे हैं जिनमें 15 से कम लोगों को रोजगार मिलता है। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में बिहार में बरौनी रिफाइनरी ही प्रमुख औद्योगिक इकाई है। इसके अलावा छिटपुट खाद्य उत्पाद बनाने वाली इकाइयां हैं और नीतीश कुमार हैं कि बिहार को बीमारू मानने को तैयार ही नहीं हैं। जो राज्य पूरे देश में सबसे पिछड़ा है अगर उसे बीमारू नहीं कहा जाएगा तो क्या महाराष्ट्र,गुजरात और पंजाब को बीमारू कहा जाएगा? कुछ क्षेत्र जैसे शिक्षा ऐसे भी हैं जिनमें बिहार की स्थिति लालू-राबड़ी के आतंक-राज के मुकाबले और खराब ही हुई है। भले ही बिहार में साक्षर लोगों की संख्या बढ़ी है लेकिन सरकारी स्कूल-कॉलेजों में शिक्षा का स्तर गिरा ही है।
मित्रों,हम नीतीश कुमार उर्फ बिहार कुमार जी से सविनय निवेदन करते हैं कि वे बिहार की हकीकत को देखते हुए मान लें कि बिहार आज से 25-30 साल पहले भी बीमारू था और आज भी बीमारू है। उनके जिद पकड़ने से सत्य और तथ्य बदल नहीं जाएगा। बिहार अधिकांश क्षेत्रों में 5-6 दशक पहले भी नीचे से अव्वल था और आज भी है लेकिन नीतीश कुमार जी को गांठ बांध लेनी चाहिए कि आगे ऐसा नहीं होगा। बिहार अब जाग चुका है और जनता परिवार कैसे बिहार को खंता (गड्ढे ) में फेंक देना चाहती समझ चुका है। अब बिहार नीचे से अव्वल नहीं ऊपर से अव्वल बनना चाहता है। बिहार को अब लालटेन की रोशनी और तीर-धनुष का युग नहीं चाहिए और न ही भारत-विरोधी खूनी पंजा चाहिए बल्कि अब हर बिहारी को विकास चाहिए,24 घंटे बिजली चाहिए,हर खेत को पानी चाहिए,हर हाथ को बिहार में ही काम चाहिए,हर बच्चे को साईकिल और पैसे के बदले बेहतरीन शिक्षा चाहिए,दिवाला नहीं दिवाली चाहिए,कमल पर सवार लक्ष्मी चाहिए।

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बुधवार, 12 अगस्त 2015

मोदी विरोध के बहाने देश को नुकसान पहुँचा रहे हैं लालू-नीतीश-कांग्रेस

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,नाना पाटेकर ने यशवंत फिल्म में एक डॉयलॉग कहा था कि गिरना है तो झरने की तरह गिरो लेकिन हमारे कुछ राजनेता कुत्ते की तरह गिर गए हैं। इनलोगों की प्राथमिकता सूची में देशहित कहीं है ही नहीं। वे दिखाने के लिए तो विरोध कर रहे हैं प्रधानमंत्री मोदी का लेकिन वास्तविकता यह है कि वे देश को भी नुकसान पहुँचाना चाहते हैं और पहुँचा भी रहे हैं। क्या लालू-नीतीश और कांग्रेस को पता नहीं है कि संसद के ठप्प होने से सरकार अर्थव्यवस्था को गति देनेवाले दोनों महत्वपूर्ण विधेयकों जीएसटी बिल और भूमि अधिग्रहण बिल को पास नहीं करवा पाएगी और जब तक ये दोनों विधेयक पारित नहीं होते हैं देश में देसी-विदेशी निवेश को द्रुत-गति मिलना असंभव है? निश्चित रूप से लालू-नीतीश और कांग्रेस को यह पता है। तो फिर संसद को ठप्प करने का क्या मतलब है? क्या इसका यह मतलब नहीं है कि ये नेता भारत को बर्बाद कर देना चाहते हैं। इनको यह भी पता है कि पीएम मोदी जो रोजगार-निर्माण और अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए जाने जाते हैं संसद को ठप्प कर देने से ऐसा नहीं कर पाएंगे और तब उन पर इस बाबत आरोप लगाना आसान हो जाएगा कि कहाँ कि 10 प्रतिशत की विकास दर और कहाँ हैं रोजगार?
मित्रों,दुर्भाग्यवश उसी फिल्म में नाना पाटेकर ने एक और डॉयलॉग बोला था कि एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है। क्या मुट्ठी-भर राजद,जदयू और कांग्रेस के सदस्यों ने अपनी मनमानी और देशविरोध नीति से पूरे भारत को हिजड़ा नहीं बना दिया है? आखिर कब तक हम आँखें बंद कर देखते रहेंगे कि चंद लोगों ने किस तरह भारत के विकास के पहिए को अवरूद्ध करके रख दिया है? एक अकेले जीएसटी के आने से भारत की जीडीपी में 2 प्रतिशत का उछाल आ जाएगा। आखिर कब तक हम इन भारतविरोधी पार्टियों की मनमानी को बर्दाश्त करते रहेंगे? लालू-नीतीश को अगर बिहार और बिहारियों को अमीर बनाना है तो उनको किसकी तरफ होना चाहिए? उनलोगों की तरफ जिनकी राजनीति आजादी के बाद से ही गरीबों को गरीब बनाकर रखने से चलती है या फिर उनलोगों के पाले में जो सबको अमीर बनाना चाहते हैं? कल तो इन विपक्षी दलों ने हर सीमा को पार कर लिया। अब इनको मनाने का समय बीत चुका है। अगर ये लोग चाहते हैं कि प्रत्येक विधेयक को संयुक्त सत्र बुलाकर ही पास कराया जाए तो मोदी-सरकार बिना ज्यादा सोंच-विचार किए ऐसा भी करना चाहिए और ऐसे प्रत्येक कदम उठाने चाहिए जिससे देश के आर्थिक विकास को नई गति मिले क्योंकि देश संसदीय परंपराओं से भी ऊपर है,सबसे ऊपर है।

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मंगलवार, 11 अगस्त 2015

सावधान,मोदी जी,ई बिहार है,जुबान संभाल के!

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जब लोकसभा का चुनाव-प्रचार चल रहा था तब नरेंद्र मोदी अक्सर कहा करते थे कि मेरे हिसाब से पानी से आधा भरा गिलास पूरा भरा हुआ है यानि कि नरेंद्र मोदी जी सुपर आशावादी हैं लेकिन बिहार की दो रैलियों में नरेंद्र मोदी जी ने जो भाषण दिया है वह कदापि उनके इस पूर्व के बयान का समर्थन नहीं करता। उनके दोनों ही भाषणों में घबराहट है,पराजय का भय है मगर आत्मविश्वास नहीं है। मैं यह नहीं कहता कि मोदी का गिलास पूरी तरह से खाली है लेकिन आधा खाली तो जरूर है।
मित्रों,इन दोनों ही भाषणों में वही गलती की है जो कभी उन्होंने दिल्ली में केजरीवाल को अराजकतावादी और धरना विशेषज्ञ बताकर किया था। सकारात्मक सोंचवाले लोग दूसरों की आलोचना करने में समय बर्बाद नहीं करते बल्कि जनता को यह बताते हैं कि वे राज्य को क्या देने जा रहे हैं या उनकी झोली में राज्य के लिए कौन-कौन सी योजनाएँ हैं। मगर बिहार में मोदी जी ने अपने दोनों ही भाषणों में गाली-गलौज ही ज्यादा की है। शायद मोदी जी को पता नहीं है कि बिहार में गाली-गलौज को कितना बुरा माना जाता है और अक्सर गाली-गलौज के चलते हत्या तक हो जाया करती है। इसलिए उनको जो भी बोलना चाहिए जुबान संभाल के बोलना चाहिए अन्यथा भगवान न करे उनको एक बार फिर से दिल्ली का अनुभव करना पड़ सकता है। अगर ऐसा होता है तो वो भारत के पीएम के लिए तो झटका होगा ही बिहार की जनता के लिए भी दुःस्वप्न के समान होगा और बर्बाद बिहार और भी बर्बाद हो जाएगा।
मित्रों,इसलिए हम नरेंद्र मोदी जी से अनुरोध करते हैं कि जब वे अगली बार बिहार आएँ तो पूरी तरह भरे गिलासवाला भाषण दें। जनता को गठबंधन और गठबंधन करनेवालों की हकीकत पता है और उनसे ज्यादा पता है इसलिए आपादमस्तक कीचड़ में डूबे लोगों पर ढेला फेंकने की कोई जरुरत नहीं है बल्कि उनको सिर्फ यह बताना चाहिए कि वे बिहार के लिए क्या करने जा रहे हैं और इसके लिए उनके पास किस तरह की योजनाएँ हैं। मोदी जी पहले अपने मन में विश्वास उत्पन्न करें कि विकास के मुद्दे पर भी चुनाव जीते जा सकते हैं जनता खुद ही उनपर विश्वास कर लेगी। भयभीत व्यक्ति कभी जंग नहीं जीतते क्योंकि घबराहट बुद्धि और प्रतिउत्पन्नमतित्व को नष्ट कर देती है। कभी-कभी अतिआत्मविश्वास भी नुकसानदेह होता है क्योंकि वो आदमी को लापरवाह बना देता है।
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रविवार, 9 अगस्त 2015

लालू और नीतीश में कौन चंदन और कौन सांप?

मित्रों,पिछले दिनों रहीम कवि का एक दोहा बिहार के राजनैतिक जगत में काफी चर्चा में रहा। एक जिज्ञासु ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी से सवाल पूछा था कि लालू जी के साथ रहकर आप किस तरह बिहार का विकास करवा पाएंगे। जवाब में लालू जी ने रहीम कवि का दोहा जड़ दिया कि जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग,चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग। जाहिर है कि न तो सवाल का और न ही जवाब का भाजपा से कोई लेना-देना था लेकिन जब नीतीश कुमार की तरफ से दोहे का भावार्थ बताया गया तो कहा गया कि उन्होंने तो भाजपा को सांप कहा था। खैर बिहार की जनता इतनी हिंदी तो जरूर जानती है कि वो समझ सके कि नीतीश जी ने किसको सांप और किसको चंदन कहा था।
मित्रों,वास्तविकता तो यह है कि लालू जी और नीतीश जी में से कोई भी चंदन नहीं है या चंदन कहे जाने के लायक नहीं है। तो क्या दोनों ही सांप हैं? जैववैज्ञानिक रूप से तो नहीं लेकिन अगर हम दोनों की करनी को देखें तो अवश्य ही दोनों सांप हैं। दोनों घनघोर अवसरवादी हैं। समय आने पर,अपने स्वार्थ के लिए दोनों किसी से भी हाथ मिला सकते हैं या किसी की भी गोद में जाकर बैठ सकते हैं। दोनों ने ही अपने-अपने समय में बिहार की जनता को धोखा दिया है,डँसा है।
मित्रों,आपको याद होगा कि 1990 के विधानसभा चुनाव लालू जी ने कांग्रेस-विरोध का नारा देकर जीता था। मगर हुआ क्या 1995 आते-आते लालू जी ने बिहार की जनता के जनादेश का अपमान करते हुए,बिहार की जनता को धोखा देते हुए उसी कांग्रेस के हाथ से हाथ मिला लिया जिसके खिलाफ लड़कर वे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचे थे। मैं लालू जी को सलाह देना चाहूंगा कि कृपया बदली हुई परिस्थितियों में वे अपनी बड़ी बेटी मीसा का नाम भी बदल दें क्योंकि अब यह नाम शोभा नहीं देता है। अब यह नाम उनके कांग्रेस-विरोध को नहीं दर्शाता बल्कि उनकी अवसरवादिता का परिचायक बन गया है।
मित्रों,आपको यह भी याद होगा कि इन्हीं लालू जी के जंगल राज से बिहार को मुक्त करवाने के लिए मुक्तिदाता बनकर आए बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी लेकिन इन्होंने भी वही किया जो कभी लालू जी ने बिहार की जनता के साथ किया था यानि धोखा। ये श्रीमान भी आजकल उन्हीं लालू जी की गोद में जा बैठे हैं जो इनके बारे में कहा करते थे कि ऐसा कोई सगा नहीं जिसको नीतीश ने ठगा नहीं,या फिर नीतीश कुमार के पेट में भी दाँत है। हमने तो तब तक मुँह में ही दाँत देखे-सुने थे लालूजी ने पहली बार बताया था कि किसी-किसी के पेट में भी दाँत होते हैं। खैर,व्यक्तिगत रूप से नीतीश जी ने जिसको धोखा दिया सो दिया अब तो पूरे बिहार को भी इन्होंने नहीं छोड़ा। जनादेश का इतना बड़ा अपमान कि बिहार की जनता ने जिससे मुक्ति के लिए मत दिया उसी के हो बैठे! कथनी और करनी में इतना बड़ा फर्क! छोटा-मोटा नेता पाला बदले तो क्षम्य है लेकिन जिसको राज्य की जनता ने जिससे बचाने के लिए राज्य की बागडोर सौंप दी वही उसी कातिल की बाहों में समा जाए ऐसा तो सिर्फ फिल्मों में ही देखने को मिलता है। पहले भी इन दोनों ने एक-दूसरे को धोखा दिया है लेकिन इन्होंने साथ ही अपने-अपने वक्त में राज्य की जनता के जनादेश के साथ भी धोखा किया। अब आप ही बताईए कि दोनों में से कौन साँप है और कौन चंदन? अलबत्ता चंदन तो कोई नहीं है बल्कि दोनों-के-दोनों ही सांप हैं और वो भी दोमुँहा। दोनों के बारे में बस इतना ही कहा जा सकता है वो भी रहीम कवि के समकालीन तुलसी बाबा की सहायता से कि
को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू॥
देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥2॥
भावार्थ:-इन (नाम और रूप) में कौन बड़ा है, कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है। इनके गुणों का तारतम्य (कमी-बेशी) सुनकर साधु पुरुष स्वयं ही समझ लेंगे।

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शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

एफआईआर दर्ज करवाकर पछता रहे हैं सुरेश बाबू

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों, सही पहचाना आपने! मैंने बताया तो था आपको 13 मार्च,2015 को उनके बारे में। हमने खबर लगाई तो थी। शीर्षक था-कानून नहीं थानेदारों की मर्जी से चलते हैं बिहार के थाने
ये वही सुरेश बाबू हैं मेरे मित्र रंजन के ससुर,पिता का नाम-स्व. रामदेव सिंह,साकिन-गुरमिया,थाना-सदर थाना,हाजीपुर,जिला-वैशाली। बेचारे के साथ इसी साल के 10 मार्च को सदर थाना परिसर से दक्षिण सटे एक्सिस बैंक के एटीएम के साथ धोखा हुआ और किसी लफंगे ने उनकी मदद करने के बहाने उनके खाते से 16000 रुपये निकाल लिए। बेचारे भागे-भागे हमारे पास आए। हमने लगे हाथों 12 मार्च,2015 को सदर थाने में एफआईआर के लिए अर्जी डाल दी ताकि पुलिस से अपराधी का पता लगाकर बुजुर्ग सुरेश बाबू को न्याय मिल सके।
मित्रों,उसके बाद कई दिनों तक रोज सुबह-शाम सुरेश बाबू का फोन मेरे पास आता कि एफआईआर दर्ज हुआ कि नहीं। फिर मैं इंस्पेक्टर को फोन करता। जब थाने के चक्कर लगाते दो दिन बीत गए तब मैंने एसपी को फोन किया। एसपी साहब से जब भी बात होती लगता जैसे वे सोकर उठे हों। इस प्रकार किसी तरह से दिनांक 17 मार्च को एफआईआर दर्ज हुआ। थाने में मौजूद एक फरियादी से पता चला कि बिना हजार-500 रुपये लिए एफआईआर दर्ज ही नहीं किया जाता।
मित्रों,हमने तुरंत सुरेश बाबू को सूचित किया और कहा कि कल जाकर एफआईआर की कॉपी ले जाईए। मगर यह क्या जब वे थाने में एफआईआर की कॉपी लेने गये तो मुंशी ने उनसे 500 रुपये की रिश्वत की मांग कर दी। मैंने उनको मुंशी से बात करवाने को कहा तो मुंशी फोन पर ही नहीं आया। फिर मैंने उनसे कहा कि आराम से घर जाईए क्योंकि यह पुलिस कुछ नहीं करनेवाली है क्योंकि हम उसे एक चवन्नी की भी रिश्वत नहीं देंगे और वे बिना पैसे लिए कुछ करेंगे नहीं। सुरेश बाबू बेचारे दिल पर पत्थर रखकर अपने घर चले गए और ठगे गए 16000 रुपयों से संतोष कर लिया।
मित्रों,फिर परसों अचानक सुरेश बाबू का फोन आया कि सदर थाने से उनको फोन गया था। वे काफी घबराए हुए थे। कहा कि पुलिस ने पैसा तो ऊपर किया नहीं फिर तंग क्यों कर रही है? मैंने कल उनको सदर थाने में आने को कहा। कल जब हम सदर थाने पहुँचे तो इंस्पेक्टर साहब अपने चेंबर में नहीं थे। मैंने अन्य पुलिसवालों से फोन के बारे में पूछा तो उन्होंने हमलोगों पर ही इल्जाम लगाया कि हम एफआईआर करके सो गए। हमने सीधे-सीधे कहा कि मुंशी ने एफआईआर की कॉपी देने के पैसे मांगे और घूस देना हमारी फितरत में नहीं है इसलिए हम निराश होकर थाने नहीं आए।
मित्रों,उनलोगों की सलाह पर जब हमने उस नंबर पर पलटकर फोन किया जिससे हमें फोन गया था तो पता चला कि श्रीमान् थाने के पीछे केस डायरी के पन्ने काले कर रहे हैं। पिछवाड़े में जाने पर पता चला कि उनका नाम लक्ष्मण यादव है और वे गया जिले के रहनेवाले हैं। वे हमारे केस के आईओ यानि अनुसंधान अधिकारी हैं। बेचारे काफी परेशान दिखे। अरे,हमारे लिए नहीं बल्कि खुद के लिए। उनको अपनी नौकरी बचाने की फिक्र थी। उन्होंने हमसे दरख्वास्त की कि हम उनको सुरेश बाबू के चार परिचितों के नाम लिखवा दें जिनका नाम वे गवाह के रूप में केस डायरी में लिखेंगे और केस को समाप्त करने के लिए कोर्ट में अर्जी दे देंगे। सुरेश बाबू से पूछा तो बोले कि पैसा तो अब मिलने से रहा गवाह के नाम लिखवा देते हैं झंझट खत्म हो जाएगा।
मित्रों,इस तरह सुरेश बाबू का मुकदमा हाजीपुर की पुलिस ने खल्लास कर दिया। हमने कहा लक्ष्मण बाबू कम-से-कम अब तो हमें एफआईआर की कॉपी दे दीजिए। बेचारे ने मना भी नहीं किया वो भी बिना रिश्वत लिए। हमने पूछा कि इस केस में आपको क्या करना चाहिए था आप जानते हैं क्या तो वे बोले नहीं। फिर हमने अपनी तरफ से पहल करके बताया कि आपको एटीएम का सीसीटीवी फुटेज देखना चाहिए था और अपराधी को पकड़ना चाहिए था क्योंकि जबतक वो अपराधी बाहर रहेगा थाना क्षेत्र में इस तरह की ठगी की घटनाएँ होती ही रहेंगी। बेचारे लक्ष्मण यादव कुछ बोले नहीं सिर्फ सुनते रहे और हम भी आहिस्ता-आहिस्ता चलते हुए थाने से बाहर आ गए। वैसे सुरेश बाबू को एफआईआर दर्ज करवाने का पछतावा तो है लेकिन इस घटना से उन्होंने एक सीख भी ली है। और अब बेचारे ने एटीएम कार्ड से पैसा निकालना ही छोड़ दिया है।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित।

रविवार, 19 जुलाई 2015

बिहार सरकार स्वयं दे रही है बिजली कंपनी में भ्रष्टाचार को प्रश्रय!

मित्रों,बिहार सरकार की मानें तो गत 5 वर्षों में बिजली चोरी से बिहार के सरकारी खजाने को लगभग 7000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। ऐसी स्थिति में किसी भी सुशासनी सरकार से ऐसी उम्मीद की जाती है कि वो चोरी रोकने के लिए कठोर कदम उठाएगी लेकिन बिहार सरकार कर रही है इसका ठीक उल्टा।  बिहार सरकार ने बिजली चोरी में उत्तरोत्तर वृद्धि के मद्देनजर बड़े धनवानों द्वारा बिजली चोरी को बढ़ावा देने के लिए ऐसे कदम उठाए हैं जिनसे गरीब राज्य बिहार के खजाने को अरबों का धक्का लगा है वहीं सरकार के कृपापात्र व्यवसायियों को काफी लाभ हुआ है। मुलाहिजा फरमाईए।
1.बिजली सरकार ने कई दशकों से कार्यरत विद्युत निगरानी कोषांग को बंद कर दिया है। यह कोषांग विशिष्ट रूप से ऊर्जा चोरी एवं बोर्ड के वैसे जनसेवक जो कदाचारपूर्ण कृत्यों में लिप्त होकर बिजली चोरी में सहायता करते थे,उन पर निगरानी रखने के लिए गठित किया था।
2. बिहार राज्य ने निगरानी पुलिस को बिजली चोरी के मामले में हस्तक्षेप को निषेध कर दिया है।
3. बिहार राज्य ने बिजली कंपनी के वैसे जनसेवक जो कदाचारपूर्वक उपभोक्ताओं से बिजली चोरी करवाकर नाजायज लाभ पहुँचाते हैं उन्हें भ्रष्टाचार अधिनियम 1988 के दायरे से मुक्त कर दिया है।
4. बिहार राज्य विद्युत नियामक आयोग ने वर्ष 2007 में बिहार विद्युत आपूर्ति अधिनियम की कंडिका 114 के तहत यह प्रावधान किया है कि बिजली चोरी करते हुए पकड़े जाने के बाद भी अगर कोई उपभोक्ता स्वैच्छिक घोषणा करता है तो उसे एक निश्चित अवधि के लिए औसत विपत्र देकर आपराधिक कांड और जुर्माना एवं दंडात्मक विपत्र से मुक्ति मिल सकती है। इस बात की पुष्ट जानकारी है कि कम-से-कम एक बड़े उपभोक्ता को निगरानी कोषांग के द्वारा 21 करोड़ रुपये की बिजली चोरी करते हुए रंगे हाथ पकड़े जाने के बाद भी एक करोड़ रुपये की स्वैच्छिक घोषणा कर आपराधिक कांड से मुक्त कर दिया गया है। 2007 से अब तक इसका लाभ सिर्फ बड़े HHT/HT एवं रसूख वाले उपभोक्ताओं ने ही उठाया है या फिर उनको ही उठाने दिया गया है।
5.बिजली बोर्ड ने प्रभावशाली और बड़े उपभोक्ताओं तथा साधारण उपभोक्ताओं के लिए अलग-अलग विधिक प्रावधान बना रखा है।
6.वर्ष 2007 में बोर्ड ने टोका फंसाकर 60000 रुपये की बिजली चोरी करनेवाले उपभोक्ताओं पर कांड दर्ज कराया। उपभोक्ता के पक्ष में उच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि पुलिस को नए विद्युत अधिनियम 2003 में कांड दर्ज कर अनुसंधान करने का कोई अधिकार ही नहीं है। बोर्ड ने इस मामले के विरूद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की और यह कहा कि बिजली अधिनियम 2007 में प्रावधान संशोधित हो चुके हैं। परिणामस्वरूप उच्चतम न्यायालय ने फैसला बोर्ड के पक्ष में सुनाया और अभियुक्त आरोपपत्रित होकर जेल चले गए। इतना ही नहीं हाजीपुर में कई बिजली उपभोक्ताओं पर मीटर को बाईपास कर बिजली जलाने पर मुकदमा कर दिया गया। बाद में बिल जमा कर देने के बाद कहा गया कि कोर्ट फीस जमा कर देने पर मामले को समाप्त कर दिया जाएगा। लेकिन 3000 रुपये से भी ज्यादा कोर्ट फीस के नाम पर जमा करवाने के बाद भी 7000रुपये बकाये का नोटिस भेजा जाता रहा।
7.परंतु बोर्ड ने 20 करोड़ रुपये की चोरी के मामले में दायर सी.डबल्यू.जे.सी. 921/09 आदि में बोर्ड ने उच्चतम न्यायालय में अपने इस स्टैंड से बिल्कुल भिन्न स्टैंड लेते हुए कहा कि निगरानी (पुलिस) को बिजली चोरी का कांड दर्ज करने का अधिकार ही नहीं है तथा भारतीय विद्युत अधिनियम 1910 के तहत जारी यह अधिसूचना विद्युत अधिनियम 2003 के लागू होने के बाद प्रभावी नहीं रही। इस मामले में 20 करोड़ रुपये की राशि की बिजली चोरी का मामला था। बिजली बोर्ड के इस स्टैंड से अतिधनवान उपभोक्ता एवं उनकी मदद करनेवाले बोर्ड के अध्यक्ष और अन्य इंजीनियर बरी हो गए। बोर्ड ने उच्चतम न्यायालय में एस.एल.पी. दायर करना भी मुनासिब नहीं समझा।
मित्रों,यह घोर आश्चर्य का विषय है कि जहाँ वर्ष 2012-13 में बोर्ड ने 4000 छोटी चोरी में शामिल उपभोक्ताओं से कई करोड़ रुपयों की वसूली की वहीं इसी वर्ष में बिजली बोर्ड की निगरानी कोषांग द्वारा वर्ष 2003 से 2006 में दर्ज किए गए 6 मुकदमें जिनमें कई सौ करोड़ की राशि निहित थी माननीय उच्च न्यायालय द्वारा खारिज कर दिए गए। बिजली बोर्ड ने न तो औपचारिक रूप से इसका विरोध किया और न ही उच्चतम न्यायालय में अपील ही की।
मित्रों,बिजली बोर्ड एक षड्यंत्र के तहत कई सालों से बड़े उपभोक्ताओं की चोरी को संस्थागत संरक्षण देकर कदाचारपूर्ण कृत्य करता है परंतु यह दिखाने के लिए कि वह बिजली चोरी रोकने के लिए कृतसंकल्पित है गरीब उपभोक्ताओं पर महत्तम शक्ति एवं निरोधात्मक कार्रवाइयाँ करता है। बिजली बोर्ड ने आज भी बहुत सूझबूझ तथा शातिराना ढंगे से बड़े-बड़े उपभोक्ताओं को पुराने मामले से भी मुक्त कराने का जो अभियान चला रखा है,उसकी शुरुआत वस्तुतः तत्कालीन अध्यक्ष स्वप्न मुखर्जी के कार्यकाल में वर्ष 2008 में हुई थी और इस दुरभिसंधि में उन्हें सरकार के शीर्षस्थ स्तर पर पदासीन पदाधिकारियों का पूरा सहयोग मिला था। तब माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी को भी इस मामले की पूरी जानकारी थी और उन्होंने भी इस भ्रष्टाचार के खेल को रोकने के बजाए प्रश्रय ही दिया था। बाद में विद्युत निगरानी कोषांग के महानिदेशक आनंद शंकर द्वारा दीना आयरन स्टील,दीना मेटल्स और दादीजी स्टील जैसे बड़े चोरों पर कांड दर्ज होने और इनकी अवैध तरीके से मदद करने के आरोप में बोर्ड अध्यक्ष के खिलाफ कोषांग के उनके बाद महानिदेशक बने मनोजनाथ द्वारा मुकदमा दर्ज करने के बाद कोषांग को बिहार सरकार ने वर्ष 2012 में बंद ही कर दिया। इसके बाद से ही जहाँ से बोर्ड के अध्यक्ष और इंजीनियरों की मोटी कमाई हो रही है वहाँ बिजली चोरी जारी है और बाँकी जगहों पर तड़ातड़ छापेमारी की जा रही है।

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गुरुवार, 16 जुलाई 2015

अगले 25 सालों में भारत बन सकता है आर्थिक महाशक्ति मगर.......

मित्रों,अभी दो दिन पहले ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के एक बयान पर काफी हो-हल्ला हुआ। श्री शाह ने कहा था कि भारत को दुनिया में नंबर एक राष्ट्र बनाने में कम-से-कम 25 साल लगेंगे। श्री शाह ने इसके लिए एक शर्त भी रखी कि इसके लिए  भाजपा को पंचायत से लेकर केंद्र तक हर स्तर पर जिताना होगा। खैर,यह तो रही भाजपा की शर्त लेकिन सिर्फ ऐसा कर देने से ही देश विकसित और दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति हो जाएगा ऐसा बिल्कुल भी नहीं होनेवाला। बल्कि इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को बहुत सारे सुधार और बदलाव करने पड़ेंगे जिनमें से अपनी क्षमतानुसार मैं कुछेक का जिक्र इस आलेख में करने जा रहा हूँ।
मित्रों,सबसे पहले तो हमें अपनी सोंच को बदलना होगा। सबको गरीब बनाकर रखना न तो समाजवाद है और न ही साम्यवाद बल्कि सबको अमीर बनाना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। अबतक भारत में शासन करनेवाली सभी सरकारों का मूलमंत्र सबको गरीब बनाकर रखना रहा है हमें इस मूलमंत्र को सिरे से पलट देना होगा और ऐसे कदम उठाने पड़ेंगे जिससे सबको अमीर बनाया जा सके। जो अमीर हैं वे तो अमीर रहें ही जो गरीब हैं उनको भी अमीर बनाया जाए।
मित्रों,इसके लिए सबसे पहले तो हमें कृषि-क्रांति करनी होगी। आजादी के 70 साल बाद भी हमारी 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। हम इनको गरीब रखकर कभी अमीर राष्ट्रों की श्रेणी में नहीं आ सकते इसलिए हमें ऐसे प्रबंध करने होंगे जिससे कृषि-उत्पादकता में भारी वृद्धि हो। प्रत्येक खेत को सिंचित करना होगा,भूमिगत जल को रिचार्ज करना होगा और किसानों खाद और बीज समय पर उपलब्ध करवाना होगा। साथ ही उनको अपने उत्पादों का सही मूल्य प्राप्त हो इसकी भी व्यवस्था करनी होगी। भूमि स्वास्थ्य कार्ड और प्रधानमंत्री सिंचाई योजना को अविलंब लागू करना होगा। कुल मिलाकर कृषि एक बार फिर से सबसे उत्तम व्यवसाय बने सुनिश्चित करना होगा।
मित्रों,हमें अगर महाशक्ति बनना है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि हमें औद्योगिक क्रांति करनी होगी। सेवा क्षेत्र की अपनी सीमाएँ हैं। फिर उसमें भारत की युवा जनसंख्या के लिए रोजगार देने की संभावनाएँ भी नहीं हैं। इसलिए अगर हमें भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाना है तो देश को दुनिया की फैक्ट्री में बदलना होगा। पूरी दुनिया को मेड इन इंडिया वाले सामानों से पाट देना होगा। इस कार्य को शुरू करने के लिए यह समय भी एकदम उपयुक्त है। क्योंकि दुनिया की फैक्ट्री चीन में श्रमिक अब महंगे हो गए हैं। इसके लिए भूमि अधिग्रहण बिल में बदलाव करना होगा और बड़े-बड़े एसईजेड की स्थापना के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण करना होगा। एक-एक एसईजेड हजारों हेक्टेयर के होने चाहिए न कि दो-चार सौ हेक्टेयर के। जिन किसानों की जमीनें इसमें जाएंगी उनको इनमें नौकरी दी जा सकती है या फिर बाजार-मूल्य से कई गुना ज्यादा दाम देना होगा जिससे वे नए सिरे से अपना जीवन शुरू कर सकें। हमें श्रम-कानूनों को इस प्रकार का बनाना होगा जिससे न तो श्रमिकों का शोषण हो और न ही लगातार हड़ताल-पर-हड़ताल हो। एसईजेड को करों में छूट के अतिरिक्त हर तरह की आधारभूत संरचना यथा सुपरफास्ट सड़क-रेल-जल परिवहन,चौबीसों घंटे बिजली,भ्रष्टाचारमुक्त त्वरित समस्या-समाधान प्रणाली उपलब्ध करवानी होगी।
मित्रों,एसईजेड की जरुरतों के मुताबिक हमें श्रमिक भी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध करवाना होगा। इसके लिए हमें देश के हर प्रखंड,विकास-खंड में आईटीआई की स्थापना करनी होगी जिनमें अच्छे प्रशिक्षक हों। आईटीआई को भविष्य की औद्योगिक आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम बनाना होगा तदनुसार सारी प्रायोगिक सुविधाएँ भी उपलब्ध करवानी होगी। इस दिशा में कल ही भारत सरकार ने कदम भी उठाया है।
मित्रों, इसके साथ ही उद्यमियों को ऋण देने की प्रणाली को सरल और रिश्वतमुक्त बनाना होगा। अभी तो स्थिति ऐसी है कि कुटीर और लघु उद्यमियों को जो 35 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है वो घूस देने में ही चली जाती है। उसके बाद जब वो पैसे वापस करने जाता है तो पता चलता है 10 लाख के ऋण के बदले उसको सूद समेत 15 लाख भरना होगा और वो हक्का-बक्का रह जाता है। इसके साथ ही हमें कारखानों में ऐसी चीजों का उत्पादन करना होगा जिसकी फैक्ट्री के आसपास और हमारे देश के आसपास के क्षेत्रों में मांग है। हमें उत्पादित वस्तुओं की गुणवत्ता पर भी पर्याप्त ध्यान देना होगा।
मित्रों,जनसंख्या-विस्फोट भारत की बहुत बड़ी समस्या है और बहुत सारी समस्याओं की जड़ भी है। इसलिए हमें सख्ती के साथ बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करना होगा अन्यथा लाख कोशिशों के बावजूद भी हम अपने देश की प्रति व्यक्ति आय नहीं बढ़ा पाएंगे। और जब तक प्रति व्यक्ति आय नहीं बढ़ेगी जीवन-स्तर में भी सुधार नहीं होगा। हम यह नहीं कहते कि हम चीन की तरह हम दो हमारे एक की नीति अपनाएँ लेकिन हम दो हमारे दो की नीति का तो पूरी सख्ती से पालन करवाना ही होगा। हम जानते हैं कि एक संप्रदाय-विशेष इसका विरोध करेगा लेकिन 13 प्रतिशत लोगों की मनमानी के चलते हम देश को बर्बादी की आग में नहीं झोंक सकते।
मित्रों,गांवों से शहरों की ओर पलायन आज बहुत बड़ी समस्या बन गई है। बड़े-बड़े शहरो में झुग्गियों की संख्या में तेजी से ईजाफा हो रहा है। मजदूर अपने परिवार को शहर तो ले आते हैं लेकिन गुणवत्तापूर्ण जीवन नहीं दे पाते। हमें इस प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी और मजदूरों को अपने गांव के आसपास ही नौकरी देनी होगी। साथ ही गांवों में ही वो सारी सुविधाएँ भी देनी होंगी जो शहरों में मिलती हैं जैसे उत्तम व निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा,गुणवत्तापूर्ण व रोजगारपरक शिक्षा,बिजली,बैंकिंग सेवा आदि।
मित्रों,इसके साथ ही हमें अपनी ट्रेनों की रफ्तार को न्यूनतम किराये के साथ इतनी तेज करना होगा कि लोग 500-700 किमी दूर जाकर भी काम करके शाम को घर वापस आ जाएँ।
मित्रों,आरक्षण के चलते हम गुणवत्ता से समझौता करते हैं। मेधावी छात्र घर बैठे रह जाते हैं और औसत लोगों को नौकरी मिल जाती है। हमें इस स्थिति को बदलना होगा। आरक्षण को 50 प्रतिशत से कम करके 10-15 प्रतिशत करना होगा। इसके साथ ही आरक्षण के आधार को भी जातीय से बदलकर आर्थिक करना होगा क्योंकि गरीबी हर जाति,हर तबके और हर मजहब में है।
मित्रों,अंत में हमें अपनी शिक्षा-प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा। मैकाले की शिक्षा-प्रणाली ऐसी है कि वो सिर्फ किरानी पैदा करती है कुशल श्रमिक या उद्यमी नहीं। हमें इस स्थिति को पूरी तरह से पलटना होगा और कुशल श्रमिकों और उद्यमियों का निर्माण करना होगा। जो लोग कला या विज्ञान या अन्य कोई अव्यावसायिक कोर्स लेते हैं उनको भी एक-न-एक ऐसा विषय लेना होगा जिसके बल पर वे अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम कर सकें। साथ ही पाठ्यक्रम को वैश्विक-बाजार की भविष्यगत जरुरतों के मुताबिक समय-समय पर बदलना पड़ेगा। इसके साथ ही युवाओं को नैतिक-शिक्षा भी देनी होगी क्योंकि आज दुनिया में आदमियों की आबादी तो खूब बढ़ी है लेकिन उसी अनुपात में उनके भीतर आदमियत की कमी भी हो गई है।
मित्रों,मेरे हिसाब से अगर केंद्र सरकार और राज्य सरकारें इतने कदम उठा लें तो भारत अगले 20-पच्चीस सालों में जरूर दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन जाएगा। हमारे पास प्राकृतिक संसाधन हैं,मानव संसाधन हैं बस जरुरत है सही व्यवस्था कायम करने की और उनको सही दिशा देने की।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

रविवार, 12 जुलाई 2015

मानवता को आईएस से बचाने को समय रहते एकजुट हो दुनिया

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों दुनिया एक बार फिर से उसी स्थिति में पहुँच गई है जिस स्थिति में वो आज से 76 साल द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले थी। तब जर्मन तानाशाह हिटलर यूरोप के एक के बाद एक देश पर कब्जा करता जा रहा था,लाखों यहुदियों का सामुहिक जनसंहार कर रहा था और दुनिया व यूरोप की तत्कालीन दोनों महाशक्तियाँ फ्रांस और इंग्लैंड उसके प्रति तुष्टिकरण की नीति पर अमल कर रहे थे क्योंकि उनको लग रहा था कि हिटलर ही सोवियत संघ के विस्तारवाद पर लगाम लगा सकता है। परिणाम यह हुआ कि हिटलर का लालच और साहस बढ़ता गया और जब फ्रांस और इंग्लैंड की नींद खुली तब तक काफी देर हो चुकी थी और दुनिया विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ी थी।
मित्रों,आज भी इस्लामिक चरमपंथी संगठन आईएस एक के बाद एक देश पर कब्जा करता जा रहा है। रोजाना सैंकड़ों लोगों के सिर कलम कर रहा है। यजीदी महिलाओं व पुरूषों का बर्बरतापूर्ण सामुहिक बलात्कार किया जा रहा है,सेक्स गुलाम बनाया जा रहा है,यौनेच्छा पूरी करने से मना करने पर उनके बच्चों को मारा-पीटा जा रहा है,उनकी जांघों के बीच गरम पानी डाल दिया जा रहा है और अमेरिका और पूरी दुनिया मूकदर्शक बने हुए हैं क्योंकि सऊदी अरब आईएस का समर्थन कर रहा है।
मित्रों,हमारे शास्त्रों में राक्षसों के बारे में काफी कुछ लिखा गया है लेकिन यह आईएस तो हिटलर और राक्षसों से भी कई कदम आगे जा चुका है। आज आईएस से न सिर्फ विश्वशांति को खतरा है बल्कि मानवता व मानवीय मूल्यों को भी खतरा उत्पन्न हो गया है। अतिशय पाशविकता व क्रूरता कभी भी मानवीय मूल्य नहीं हो सकते बल्कि दया,करूणा,संयम और क्षमा ही मानवीय मूल्य हो सकते हैं। ऐसे में अगर दुनिया ने एकजुट होकर समय रहते आईएस पर लगाम नहीं लगाया तो वह दिन दूर नहीं जब पूरी दुनिया पर राक्षसी संस्कृति के छा जाने का खतरा मंडराने लगेगा और तब तक काफी देर हो चुकी होगी ठीक उसी तरह जिस तरह से 3 सितंबर,1939 तक जर्मनी के खिलाफ फ्रांस और इंग्लैंड द्वारा युद्ध की घोषणा करने तक हो गई थी।
मित्रों,अगर ऐसा होता है वह निश्चित रूप से नितांत दुर्भाग्यपूर्ण होगा क्योंकि आज दुनिया तृतीय विश्वयुद्ध को झेल सकने की स्थिति में नहीं है। विश्व-जनसंख्या का एक बड़ा भाग आज भी गरीबी से जूझ रहा है। साथ ही आज दुनिया के देशों के पास सामुहिक विनाश के अस्त्र-शस्त्रों की संख्या 1939 के मुकाबले कहीं ज्यादा है। इतनी ज्यादा कि दुनिया की पूरी मानव-आबादी को तीन-तीन बार पूरी तरह से समाप्त किया जा सके।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

बिहार में सरकार बनी तो शराब बैन करेंगे नीतीश कुमार,फिर बिहार में किसकी सरकार है?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,महिलाओं की ओर से की जा रही मांग के आगे झुकते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वादा किया कि यदि अगली बार वे सत्ता में आए तो शराब पर पाबंदी लगा देंगे। समाज कल्याण विभाग के एक ग्राम्य वार्ता कार्यक्रम के दौरान नीतीश के संबोधन के दौरान कुछ महिलाओं ने यह मांग की और फिर मुख्यमंत्री ने शराब पर पाबंदी लगाने का वादा किया।

मित्रों,नीतीश ने कहा, ‘‘जब मैं अगली बार सरकार बनाऊंगा तो शराब पर पाबंदी लगाई जाएगी।’’ इस वादे को सुनकर महिलाएं खुशी से झूम उठीं। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में महिला सशक्तिकरण को लेकर अपनी सरकार की कोशिशें गिनाईं। उन्होंने कहा कि सरकार का प्रयास स्वयं-सहायता समूह (एसएचजी) से डेढ़ करोड़ महिलाओं को जोड़ने का है।

मित्रों, सवाल यह उठता है कि इस समय बिहार में सरकार किसकी है? क्या नीतीश कुमार जी अभी बिहार के नहीं नेपाल के मुख्यमंत्री हैं? अगर उनको उनकी सरकार की शराब नीति से बिहार को हुई क्षति से इतनी ही शर्मिंदगी हो रही है तो उनको चाहिए कि वे कल से ही बिहार में पूर्ण शराबबंदी की घोषणा कर दें और जिन लोगों को शराब दुकानों की बंदोबस्ती की गई है उनको हर्जाना देकर चलता करें।

मित्रों,अभी पूर्ण शराबबंदी लागू करने में नीतीशजी को कौन-सी परेशानी हो रही है? अभी तो राज्य में किसी तरह की आचार-संहिता भी लागू नहीं है फिर नीतीश जी ऐसी बरगलानेवाली बातें क्यों कर रहे हैं? अगर वे अभी सत्ता में होते हुए ऐसा नहीं कर सकते या नहीं कर रहे तो क्या गारंटी है कि वे अगली बार जीतने के बाद ऐसा करेंगे ही? हद हो गई कि जिस व्यक्ति ने राजस्व के चलते पूरे बिहार में किराने की दुकानों से भी कहीं ज्यादा संख्या में शराब की दुकानें खुलवा दीं और पूरे बिहार को शराबी बना दिया आज कह रहा है कि मुझे एक बार और जितवाओ तब शराब पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दूंगा? ये तो वही बात हुई कि कोई बलात्कारी नेता कहे कि मुझे एक बार और जितवाओ तो मैं लड़कियों को बहन मानने लगूंगा।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

शनिवार, 4 जुलाई 2015

संपूर्ण विनाश हो,रक्तरंजित बिहार हो,फिर से नीतीश कुमार हो

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के छोटे-छोटे पाँव जमीन पर पड़ ही नहीं रहे हैं। दरअसल उनके हाथ एक ऐसा नारेबाज लग गया है जो नारे और प्रचार की योजना बनाने में बला का माहिर है। पिछले 2 सालों से बिहार को अच्छा शासन देने में विफल रहे नीतीश जी को लग रहा है कि वे कोरे नारों के बल पर ही फिर से बिहार का चुनाव जीत जाएंगे। जबकि चुनाव जीतने के लिए उनको जनता को यह भी बताना पड़ेगा कि उन्होंने बिहार को अब तक दिया क्या है। अगर जनता इससे संतुष्ट हो जाती है तो उनको बताना चाहिए कि वे आगे क्या करने की सोंच रहे हैं।
मित्रों,अब हम चलते हैं फ्लैश बैक में। बात वर्ष 2007 की है। तब हम हिंदुस्तान के पटना कार्यालय में कॉपी एडिटर हुआ करते थे। एक दिन वहाँ चर्चा छिड़ गई कि बिहार की कानून-व्यवस्था में सुधार आने के कारण क्या हैं। तब दिलीप भैया ने कहा था कि चूँकि बिहार सरकार ने सारे बदमाशों को शिक्षामित्र बना दिया है इसलिए अपराध कम हो गया है। उत्तर सुनते ही मैं काँप गया था। इस आशंका से कि बदमाशों की अगली पीढ़ी जब आएगी तब कानून-व्यवस्था का क्या होगा। बदमाश शिक्षक शरीफ बच्चों का निर्माण तो करेंगे नहीं। नीतीश राज में स्कूली शिक्षकों की बहाली में किस कदर मनमानी और भ्रष्टाचार का बोलबाला रहा इसका अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी कल-परसों ही हाईकोर्ट के भय से 1400 ऐसे शिक्षामित्रों ने इस्तीफा दे दिया है जिनकी डिग्रियाँ फर्जी थीं।
मित्रों,आज के बिहार के कानून-व्यवस्था की स्थिति कमोबेश नीतीश कुमार की उसी गलती का परिणाम है जिसकी ओर तब दिलीप भैया ने ईशारा किया था। सिर्फ राजधानी पटना की ही बात करें तो कल पूर्व मंत्री एजाजुल हक के फ्लैट में घुसकर उनको चाकू मार दिया गया, नीतीश सरकार की नाक के नीचे जीपीओ गोलंबर के पास कल रात गोविंद ढाबा के मालिक गोविंद से 50 हजार रुपये छीन लिए गए, कपड़ा व्यवसायी से नक्सली संगठन के नाम पर 10 लाख रुपये की रंगदारी मांगी गई और एयरपोर्ट थानान्तर्गत किसी जज साहब की धर्मपत्नी से चेन छीन ली गई। ये तो हुई बिहार के कानून-व्यवस्था की खबर अब हम बात करेंगे बिहार पुलिस पर बिहार की जनता के विश्वास की। आज आप बिना घूस दिए या बिना कोर्ट के आदेश के बिहार के थानों में एफआईआर भी दर्ज नहीं करवा सकते। बिहारवासियों का पुलिस पर विश्वास इतना कम हो गया है कि लोगों ने अपराधियों को पकड़ने के बाद पुलिस के हवाले करना ही बंद कर दिया है और ऑन द स्पॉट अपराधियों का निपटारा कर दे रहे हैं। आज एक बार फिर से बिहार में जंगलराज कायम हो चुका है और लोग बिहार में निवेश करने से डरने लगे हैं।
मित्रों,जब नीतीश कुमार ने बिहार का राजपाट संभाला था तब नक्सलवाद सिर्फ गंगा के दक्षिण में ही सक्रिय था। आज नक्सलवाद उत्तर बिहार के अधिकांश क्षेत्रों में भी अपने पाँव पसार चुका है। हमारा वैशाली जिला जो नक्सलवाद के मायने भी नहीं जानता था का बहुत बड़ा इलाका इस समय नक्सलवाद की चपेट में आ चुका है। जिले के कई प्रखंडों में बिना लेवी दिए कोई ठेकेदार न तो सड़क ही बनवा सकता है और न ही कोई उद्योगपति फैक्ट्री ही डाल सकता है। क्या यही है नीतीश कुमार का सुशासन? हमारे हाजीपुर शहर में ही लूट रोजाना की घटना बन गई है।
मित्रों,बिहार की आम जनता का मानना है कि लालू-राबड़ी राज के मुकाबले राज्य में घूसखोरी घटी नहीं है बल्कि बढ़ी है। पहले लालू-राबड़ी राज में खद्दरधारी लोग बिना पैसे के भी काम करवा देते थे लेकिन आज बिना पैसे दिए कोई काम नहीं होता। पहले 250 रुपये में जमीन की दाखिल खारिज हो जाती थी आज 5 हजार से कम में नहीं होती। बिजली विभाग बिजली कम देती है अनर्गल बिलिंग के झटके ज्यादा देती है। नीतीश राज में बने पुल 5 साल में ही गिर जा रहे हैं। क्यों? इतना ही नहीं नीतीश जी ने शासन में आने के बाद कहा था कि ठेकेदारों को सड़कों के निर्माण के समय गारंटी देनी पड़ेगी कि सड़कें कितने सालों तक चलेगी। अब नीतीश सरकार जनता पर यह जिम्मेदारी छोड़ रही है कि कहीं पर सड़क टूट जाती है तो टॉल फ्री नंबर पर फोन करे। सरकार उसके बाद ठेकेदार को ब्लैक लिस्ट में डाल देगी और इस प्रकार भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा। सरकारी अस्पतालों की स्थिति में नीतीश राज की शुरुआत में जो सुधार आया था अब फिर से स्थिति बिगड़ चुकी है। कहीं दवा घोटाला है तो कहीं यंत्र खरीद घोटाला। जहाँ नजर डालिए बस घोटाला ही घोटाला। सरकार किसानों से धान खरीदती है तो वहाँ भी घोटाला हो जाता है। यानि जहाँ भी कोई काम राज्य सरकार अपने हाथ में लेती है वहीं पर एक घोटाला हो जाता है और इस तरह से राज्य में सुशासन का राज स्थापित किया जा रहा है।
मित्रों,जहाँ तक शिक्षा का सवाल है तो मैंने शुरू में ही अर्ज किया कि बिहार के स्कूलों में नीतीश कुमार ने अयोग्य और असामाजिक तत्त्वों को शिक्षक बना दिया इसलिए प्राथमिक शिक्षा का जो हाल होना चाहिए था वही हो गया है। किसी भी सरकारी स्कूल में यूँ तो पहले से ही पढ़ाई न के बराबर हो रही थी अब दूरदर्शी नीतीश जी ने उपस्थिति की अनिवार्यता को समाप्त करके हालत को और भी चौपट करने की दिशा में महान कदम उठा दिया है। अब जबकि छात्र स्कूलों में आएंगे ही नहीं तो पठन-पाठन का माहौल कहाँ से बनेगा? यही कारण है कि जब बिहार में मैट्रिक या इंटर या बीए की परीक्षा आयोजित होती है तो बिहार को शर्मशार होना पड़ता है। पिछले 10 सालों में प्राइमरी स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक शिक्षा के माहौल को षड्यंत्रपूर्वक नीतीश सरकार द्वारा समाप्त कर दिया है। बिहार सरकार प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन करती है और बहाली कर दी जाती है कभी मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष के परिजनों की तो कभी स्वास्थ्य मंत्री की सुपुत्री की।
मित्रों,नीतीश कुमार जी ने कल-परसों ही एक बार फिर से आरक्षण और अपने भेजा का बेजा इस्तेमाल किया है। नीतीश जी ने ठेकों में आरक्षण लागू कर दिया है। इससे पहले भी मोहम्मद बिन तुगलक के 21वीं शताब्दी अवतार श्रीमान ने पंचायती राज में विचित्र आरक्षण व्यवस्था लागू की थी। आप सभी जानते हैं कि लोकतंत्र बहुमत से चलता है लेकिन बिहार की पंचायती राज व्यवस्था में लोकतंत्र तुगलकी आरक्षण से चलता है। किसी पंचायत में भले ही सवर्णों या यादवों की आबादी 99 प्रतिशत रहे लेकिन गाँव का मुखिया बनेगा कोई दलित या महादलित ही भले ही उस पंचायत में उनका एक ही परिवार क्यों न रहता हो।
मित्रों,तो ये है संक्षेप में नीतीश राज में बिहार की स्थिति। अब आप ही बताईए कि बिहार में बहार हो,नीतीश कुमार हो नारा लगा देने मात्र से कैसे बिहार में बहार आ सकती है? ठीक इसी तरह से यूपी सरकार कहती है कि यूपी में दम है क्योकि यूपी में जुर्म कम है। क्या यूपी सरकार के ऐसा कह देने या ऐसे नारे लगा देने भर से यूपी में जुर्म कम हो गया या हो जाएगा। वास्तविकता तो यह है कि यह नारा बिहार की स्थिति पर फिट तो नहीं ही हो रही है बल्कि पूरी तरह से विरोधाभासी है। नारा तो कुछ इस तह से होना चाहिए कि संपूर्ण विनाश हो,रक्तरंजित बिहार हो,फिर से नीतीश कुमार हों।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

आडवाणी जी यूपी में तो कई साल से आपातकाल लागू है

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अपने भीष्मपितामह लालकृष्ण आडवाणी जब भी कुछ बोलते हैं तो उसके अनगिनत अर्थ लगाए जाते हैं। श्री आडवाणी ने कहा कि आपातकाल लगाने वाली प्रवृत्तियाँ आज भी हमारे देश में मौजूद हैं और लोगों ने इसे सीधे-सीधे केंद्र की मोदी सरकार से जोड़ दिया जबकि अभी तक मोदी सरकार ने ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाया है जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरा पैदा होता हो। अगरचे भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जरूर वर्ष 2012 से ही यानि समाजवादी सरकार के आने के बाद से ही अघोषित आपातकाल लागू है।

मित्रों,अगर आप यूपी में रहते हैं तो आप सुपर चीफ मिनिस्टर आजम खान के खिलाफ लिखने की सोंच भी नहीं सकते हैं। पता नहीं कब आपको पुलिस घर से उठा ले। अभी पिछले दिनों एक पत्रकार जगेंद्र सिंह को तो यूपी सरकार के कद्दावर मंत्री राममूर्ति वर्मा के खिलाफ लिखने पर खुद जनता की रक्षा की शपथ लेनेवाले पुलिसवालों ने ही घर में घुसकर जिंदा जला दिया और वर्मा यूपी सरकार में आज भी मंत्री बना हुआ है। संकेत साफ है कि हमारे खिलाफ लिखोगे तो जिंदा जला दिए जाओगे और हमारा कुछ भी नहीं बिगड़ेगा। मैं समझता हूँ कि ऐसा तो 1975 के आपातकाल में भी नहीं हुआ था।

मित्रों,कल ही पूर्व बसपा सांसद शफीकुर्ररहमान बर्क के खिलाफ दो साल पहले फेसबुक पर की गई टिप्पणी के चलते एक स्वतंत्र टिप्पणीकार को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस बार यूपी पुलिस ने 66 ए के तहत मामला दर्ज नहीं किया है बल्कि सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने के ज्यादा संगीन धारा के तहत मुकदमा किया है। अगर यह प्रयोग सफल रहता है और पूर्व की तरह सुप्रीम कोर्ट मामले में हस्तक्षेप कर पीड़ित पत्रकार को नहीं छुड़वाता है तो आगे उम्मीद की जानी चाहिए कि धड़ल्ले से इस सूत्र का यूपी पुलिस द्वारा प्रयोग किया जाएगा और यूपी में पत्रकार बिरादरी का जीना मुश्किल कर दिया जाएगा।

मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि देश में आपातकाल लागू करने के लिए न तो संसद की अनुमति चाहिए और न ही केंद्र सरकार की पहल ही जरूरी है बल्कि राज्य सरकारें भी चाहें तो बिना घोषणा किए ही आपातकाल जैसी परिस्थितियाँ पैदा कर सकती हैं और यूपी की समाजवादी सरकार यही कर रही है। यूपी में पिछले तीन सालों से लोकतंत्र को खूंटी पर टांग दिया गया है और एक पार्टी की सरकार चल रही है। उसी एक पार्टी के लोग प्रतियोगिता परीक्षाओं में पास हो रहे हैं,उसी एक पार्टी के लोग रंगदारी वसूल रहे हैं,उसी एक पार्टी के लोग थानेदारों को हुक्म दे रहे हैं और उसी एक पार्टी के लोग पत्रकारों को जिंदा जला भी रहे हैं। सवाल यह है कि इस एक पार्टी के सरकार-समर्थित गुंडाराज को रोका कैसे जाए? फिलहाल तो कोई मार्ग दिख नहीं रहा। वैसे भी जनता ने जब बबूल का पेड़ लगाया है तो उसको आम खाने को कहाँ से मिलेगा? गिनते रहिए गिनती कि कितने पत्रकार अंदर कर दिए गए और कितनों को मोक्षधाम पहुँचा दिया गया।
 

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

मंगलवार, 23 जून 2015

सिर्फ नदी द्वीप नहीं भ्रष्टाचार का टापू भी है राघोपुर

राघोपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अपने गृह-प्रखंड राघोपुर (वैशाली) के बारे में हम बचपन से ही पढ़ते आ रहे हैं कि यह एक नदी द्वीप है जिसके चारों तरफ से गंगा बहती है। लेकिन अब राघोपुर को देखता हूँ तो पाता हूँ कि यह न सिर्फ एक नदी द्वीप है बल्कि भ्रष्टाचार का टापू भी है। एक ऐसा टापू जहाँ आकर केंद्र और राज्य सरकार की सारी योजनाएँ दम तोड़ जाती हैं या फिर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं।
मित्रों,हरि अनंत हरि कथा अनंता अर्थात राघोपुर में व्याप्त अव्यवस्था के बारे में मैं तो क्या श्रीगणेशजी भी संपूर्णता से वर्णित नहीं कर सकते। हमारे प्रखंड में करीब एक-डेढ़ दशक पहले सामुदायिक शौचालय निर्माण की योजना आई। आज अगर आप प्रखंड में घूमेंगे तो पाएंगे कि कहीं भी सामुदायिक शौचालय बना ही नहीं। ठेकेदारों ने बदले में अपने-अपने घरों में शौचालय बनवा लिए। इसी तरह इस प्रखंड में उनलोगों को भी इंदिरा आवास योजना के तहत पूरी की पूरी राशि दे दी गई जिनके पहले से ही छतदार मकान थे।
मित्रों,इसी तरह आपको इस प्रखंड में कई ऐसे पंचायत मिल जाएंगे जहाँ कि पिछले कई सालों से वृद्धावस्था या विधवा पेंशन का वितरण ही नहीं हुआ है। पूछने पर अधिकारी बताते हैं कि लाभान्वितों का रिकार्ड ही नहीं मिल रहा। पिछले वर्षों में कई बीडीओ यहाँ आए और चले भी गए लेकिन यह गुत्थी आज भी अनसुलझी की अनसुलझी ही है।
मित्रों,अगर आप चकौसन घाट से नदी पार करने के बाद चकसिंगार की तरफ बढ़ेंगे तो देखेंगे कि चकसिंगार में एक पुलिया गिरी पड़ी है। यह एक ऐसी पुलिया है जो बनने के साथ ही धराशायी हो गई जाहिर है कि निर्माण में गुणवत्ता को ध्यान में रखा ही नहीं गया बल्कि पैसा निर्माण पर ज्यादा जोर दिया गया। पुलिया बनी और गिरी। कई साल बीत गए लेकिन न तो ठेकेदार के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई और न ही संबंधित अभियंता के विरूद्ध ही।
मित्रों,चाहे नीतीश कुमार जितने भी दावे कर लें लेकिन सच्चाई तो यही है कि राघोपुर प्रखंड का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी लालटेन युग में जीने को विवश है। रात होते ही राघोपुर के कई पंचायत अंधेरे में डूब जाते हैं। कहीं ट्रांसफॉर्मर नहीं है तो कहीं तार।
मित्रों,राघोपुर प्रखंड में अगर सबसे खराब स्थिति किसी चीज की है तो वह है सरकारी शिक्षा। बीआरसी यानि ब्लॉक रिसोर्स सेंटर और क्लस्टर रिसोर्स सेंटरों की मिलीभगत से यहाँ के विद्यालयों के अधिकतर शिक्षक सिर्फ वेतन लेने विद्यालय आते हैं। हर महीने सीआरसी के समन्वयक को निर्धारित राशि पहुँचाते रहिए और घर पर खेती कराईए या फिर दुकान चलाईए। हाँ,अगर आप महिला हैं या स्कूलवाले गांव के ही हैं तो फिर और भी सोने पर सुहागा। अब जब शिक्षक रहेगा ही नहीं तो पढ़ाएगा कौन? प्रखंड के कई गांवों के स्कूलों में तो इतना अधिक नामांकन है जितने कि गांव में बच्चे भी नहीं हैं। नहीं समझे क्या? ज्यादा नामांकन होगा तभी तो भ्रष्टाचार की खिचड़ी ज्यादा से ज्यादा मात्रा में पकाई जा सकेगी और हेडमास्टरों और सहायक शिक्षकों के वारे-न्यारे हो सकेंगे।
मित्रों,संभवतः पूरे वैशाली जिले में राघोपुर प्रखंड ही ऐसा इकलौता प्रखंड है जहाँ कि पुलिस पब्लिक के रहमोकरम पर जीती है। कभी थाने में घुसकर कोई दारोगा को मार जाता है और प्रशासन उसका बाल बाँका भी नहीं कर पाता तो कभी कोई बाजाप्ता फोन करके दारोगा को जान से मारने की धमकी देता है और दारोगा उसका कुछ भी नहीं उखाड़ पाता।
मित्रों,जहाँ हाजीपुर शहर की जनवितरण प्रणाली की दुकानों में हर महीने सामानों का वितरण किया जाता है वहीं राघोपुर में साल में दो बार भी अगर वितरण हो जाए तो लोग भगवान का शुक्रिया अदा करते हैं। प्रखंड के आंगनबाड़ियों का तो कहना ही क्या? कई स्थानों पर तो आंगनबाड़ी का धरातल पर अस्तित्व ही नहीं है और हर महीनों हजारों बच्चे लाभान्वित भी हो जा रहे हैं। कुपोषण को तो आंगनबाड़ियों ने प्रखंड से निकाल बाहर ही कर दिया है।
मित्रों,यूँ तो वैशाली प्रशासन के लिए राघोपुर हमेशा से टेढ़ी खीर रहा है लेकिन मैं नहीं मानता कि राघोपुर को चुस्त-दुरूस्त नहीं किया जा सकता। इसकी भौगोलिक स्थिति इस दिशा में उतनी बड़ी बाधा नहीं है जितनी बड़ी बाधा बिहार सरकार और उसके अधिकारियों की ईच्छा-शक्ति की कमजोरी है। माना कि साल के 6 महीने तक इस क्षेत्र में सिर्फ नावों के जरिए ही पहुँचा जा सकता है लेकिन बाँकी के 6 महीनों तक तो दो-दो पीपा पुलों की मदद से कभी भी कहीं भी अधिकारी आ-जा सकते हैं। इन 6 महीनों में तो प्रखंड में बहुत-कुछ सुधार लाया जा सकता है। एक और बात,जब तक राघोपुर से होकर पक्के पुल का निर्माण नहीं हो जाता तब तक गंगा के उत्तर पार से भी कम-से-कम एक पीपा पुल का निर्माण तो होना ही चाहिए क्योंकि वैशाली पुलिस-प्रशासन को पीपा पुल चालू होने की स्थिति में भी पटना होकर राघोपुर जाना पड़ता है जो कि गंगा सेतु पर महाजाम लगा होने पर लगभग असंभव-सा हो जाता है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 22 जून 2015

बाबू मोशाय,ब्रांड से नहीं खेल से मैच जीते जाते हैं

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,पूरी दुनिया जानती है कि बंगाली बाबू जगमोहन डालमिया का भारतीय और विश्व क्रिकेट में क्या योगदान है। आपको याद होगा कि आज से दो दशक पहले तक पूर्व क्रिकेट खिलाड़ियों की भुखमरी के किस्से कैसे समाचार पत्रों में छाये रहते थे। यह डालमिया की ही देन है कि आज भारत दुनिया के क्रिकेट का गढ़ बन गया है और भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों की गिनती दुनिया के सबसे धनी खिलाड़ियों में की जाती है। लेकिन अगर हम यह कहें कि क्रिकेट के इसी व्यवसायीकरण ने भारतीय क्रिकेट का बंटाधार करके रख दिया है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज भारतीय क्रिकेट के लिए खिलाड़ियों का चयन कदाचित यह देखकर नहीं किया जाता कि कौन खिलाड़ी अभी कैसा खेल रहा है बल्कि यह देखकर किया जाता है कि किस खिलाड़ी का ब्रांड वैल्यू कितना है।

मित्रों,अगर हम भारत-बांग्लादेश एकदिवसीय शृंखला के नतीजों और दोनों देशों की टीमों पर सरसरी नजर भी डालेंगे तो पाएंगे कि जहाँ बांग्लादेश की टीम में सारे फॉर्म में चल रहे खिलाड़ियों को रखा गया था वहीं भारत की टीम में बड़े-बड़े ब्रांड खेल रहे थे और उनमें से अधिकतर लंबे समय से आउट ऑफ फॉर्म चल रहे थे।

मित्रों,शायद यही कारण था भारत के कागजी शेर बांग्लादेश के नौजवान,जोशीले और देशभक्त खिलाड़ियों के आगे ढेर हो गए और इस प्रकार दोनों ही मैच एकतरफा हो गए। हम यह नहीं कहते कि भारतीय खिलाड़ी देशभक्त नहीं हैं लेकिन सवाल उठता है कि क्या कारण है कि जब भारतीय टीम विश्वकप के सेमीफाईनल में हारती है तो टीम के किसी भी खिलाड़ी की आँखों से आँसू नहीं बहते लेकिन जब वही खिलाड़ी आईपीएल के मैच हारते हैं तो मैदान पर फूट-फूटकर रोने लगते हैं? खेल में पैसा होना तो चाहिए मगर उसके प्रति इतना भी पागलपन नहीं हो कि देश के लिए खेलते समय खिलाड़ियों की प्रतिबद्धता ही खतरे में पड़ जाए।

मित्रों,इसलिए तो हम कहते हैं कि बाबू मोशाय भारतीय क्रिकेट को अगर बचाना है तो टीम से निकाल फेंकिए सारे बिस्कुट-पेप्सी-शैंपू आदि बेचनेवाले चुके हुए ब्रांडों को सिर्फ और सिर्फ उन्हीं खिलाड़ियों को टीम में रखिए जो पूरी तरह से फिट हों,फॉर्म में हों और देश के लिए खेलने में गौरव अनुभव करते हों। देश को ब्रांडों से भरी दिशाहारा टीम नहीं चाहिए बल्कि मैच जितानेवाली,देश का गौरव बढ़ानेवाली मजबूत टीम चाहिए।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 10 जून 2015

अब तेरा क्या होगा लालू?


मित्रों,हिंदी में एक कहावत है और है महाभारतकालीन कि मनुष्य बली नहीं होत हैं समय होत बलवान,भीलन लूटी गोपिका वही अर्जुन वही बान। 15 सालों तक बिहार पर एकछत्र राज करनेवाले लालू प्रसाद को देखकर एकबारगी स्वभाववश दया भी आती है और इस कहावत पर हमारा विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है। दरअसल मानव करण कारक है लेकिन वो खुद को समझ बैठता कर्त्ता है। श्री लालू प्रसाद यादव जी को भी किस्मत ने मौका दिया लेकिन जनाब खुद को खुदा समझ लेने की भूल कर बैठे। बिहार को उन्होंने फैमिली प्रॉपर्टी समझ लिया। दरवाजे पर बंधी गाय समझकर जब जितना चाहा दूहा।
मित्रों,इस लालू के शासन में बिहार का विकास नहीं हुआ विनाश हुआ। बिहार को इन्होंने सीधे रिवर्स गियर में चला दिया। जिस दौर में पूरी दुनिया इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी के पीछे पागल थी उस दौर में यह श्रीमान इसका मजाक उड़ाते हुए कहा करते कि ये आईटी-फाईटी क्या होता है? उनका एक और जुमला उन दिनों काफी मशहूर हुआ करता था कि कहीँ विकास करने से वोट मिलता है वोट तो जात-पात के नाम पर मिलता है?
मित्रों,धीरे-धीरे कैलेन्डर के साथ-साथ वक्त बदला,बिहारियों की सोंच बदली,मानसिकता बदली और आज इन लालू प्रसाद जी की स्थिति ऐसी हो गई है,ये इतने कमजोर हो गए हैं कि इन श्रीमान जो कभी बिहार के साथ-साथ दिल्ली की कुर्सी के भी किंग मेकर हुआ करते थे से खुद सड़कछाप हो चुके सोनिया और राहुल गांधी मिलना तक नहीं चाहते। जिस व्यक्ति ने बिहार पर 40 सालों तक शासन करनेवाली कांग्रेस पार्टी को अपना पिछलगुआ बनाकर रख दिया था आज खुद ही पिछलग्गू बनने को बाध्य है। जिन लोगों को ऐसा लगता था या लगता है कि मुलायम लालू के रिश्तेदार होने के नाते उनका समर्थन करेंगे उनको यह याद रखना चाहिए कि देवगौड़ा और गुजराल के जमाने में मुलायम ही लालू के सबसे बड़े दुश्मन हुआ करते थे और लालू जी जेल भेजवाने में भी सबसे बड़ा हाथ उनका ही था। वैसे भी लालू से मुलायम का यूपी में कुछ बनने-बिगड़ने को नहीं है।
मित्रों,एक बात हमेशा याद रखिएगा कि बिहार में जो पार्टी एक बार पिछलगुआ बन जाती है वह समाप्त ही हो जाती है। यानि अब लालू जी के राजनैतिक जीवन का तो अंत हो ही गया समझिए। भविष्य में बेचारे शरद यादव की तरह नीतीश कुमार की हाँ में हाँ मिलाने का ही एकमात्र काम किया करेंगे। यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि भाजपा बिहार में सत्ता में साझीदार थी लेकिन पिछलग्गू नहीं थी। उसके नेता बराबर नीतीश कुमार को पसंद न आनेवाले बयान तो देते रहते ही थे साथ ही उस तरह के काम भी करते रहते थे। लेकिन यहाँ लालूजी की स्थिति वैसी नहीं है। उनको नीतीश जी को अपना नेता मानने के साथ ही खुद अपनी ही पार्टी के नेताओं को नीतीश को नागवार लगनेवाले बयान देने से रोकना पड़ा है। मतलब साफ है कि लालू जी ने अपने साथ-साथ पूरी पार्टी के स्वाभिमान को नीतीश कुमार के चरण कमलों में समर्पित कर दिया है।
मित्रों,लालू जी ने इस अवसर पर यह भी कहा कि भाजपा को हराने के लिए वे जहर पीने को भी तैयार हैं। वास्तविकता भी यही है कि लालू जी ने जहर ही पिया है,एक ऐसा जहर जो न सिर्फ उनकी राजनीति की बल्कि उनकी पार्टी की भी जान ले लेगा। वैसे हमारी लालू जी के साथ कोई हमदर्दी नहीं है। इस आदमी ने बिहार को बर्बाद करके रख दिया और जो कुछ भी थोड़ा-बहुत बिहार बचा हुआ था उसको समाप्त कर दिया उनके छोटे भाई नीतीश कुमार जी ने। आज तो हालत यह कि बिहार फिर से वहीं पर आकर खड़ा हो गया है जहाँ कि 2005 में तब था जब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। मैं पूछता हूँ  कि नीतीश कुमार जी जीतन राम मांझी जी के एस्टीमेट घोटाले पर कोई जवाब या सफाई क्यों नहीं देते? चाहे सरकारी पुल हो,सड़क या मकान उनके निर्माण में खर्च होता है 1 करोड़ तो एस्टीमेट बनाया जाता है 5 करोड़ का। मांझी जी का तो यह व्यक्तिगत अनुभव था कि कमीशन का पैसा मुख्यमंत्री रहते हुए उनके पास भी पहुँचता था तो क्या नीतीश कुमार तक मांझी जी से पहले और मांझी जी के बाद भी कमीशन का पैसा पहुँचता था या पहुँचता है? अगर नहीं तो बरसात के दिनों में बिहार के कोने-कोने से नीतीश काल में निर्मित पुलों के गिरने की खबरें क्यों आती हैं? नीतीश जी ने पूरे बिहार में बोर्ड लगवा दिए हैं कि इन-इन सड़कों के टूटने की सूचना इस नंबर दें? आप कमीशन खाईए और पब्लिक दिन-रात पागलों की तरह नंबर डायल करती रहे?
मित्रों,वैसे आपको अबतक मेरे द्वारा उठाये गए सवाल का जवाब तो मिल ही गया होगा कि अब लालू जी का क्या होने वाला है। अब लालूजी बिहार से समाप्त हो चुके हैं,उन्होंने आत्मघाती गोल मारकर अपने द एंड को सुनिश्चित कर लिया है। चुनावों में चाहे जीते कोई लालूजी ने चुनाव लड़ने से पहले ही अपनी हार सुनिश्चित कर ली है। लालू जी अब मदारी नहीं रहे जमूरा बन गए हैं जो दूसरों के इशारे पर नाचता है। लेकिन यह मेरे उस सवाल का पूरा जवाब नहीं है। पूरा उत्तर यह है कि अगले कुछ महीनों में लालू जी कदाचित फिर से जेल की शोभा बढ़ाएंगे। अब दिल्ली में उनकी माई-बाप की सरकार नहीं है जो उनको खुल्ला छोड़ देगी। जब छोटे घोटालेबाज चौटाला को चुनावों के दौरान ही जेल भेज दिया गया तो लालू जी तो बहुत ही बड़े घोटालेबाज हैं पीएचडी डिग्रीधारी।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 4 जून 2015

देश की राजनीति का डिब्बा नहीं ईंजन रहा है बिहार

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आप बिहार को गरीब कहकर हँसी भले हीं उड़ा लें लेकिन इस बात से आप इंकार नहीं कर सकते कि बिहार के लोगों में जो राजनैतिक विवेक है वो कई पढ़े-लिखे और समृद्ध कहलानेवाले राज्यों के मतदाताओं में भी नहीं है। यही कारण है कि चाहे छठी सदी ईसा पूर्व के बौद्ध और जैन धर्म आंदोलन हों या चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य का भारत को एक राष्ट्र में बदलने का अभियान या 1857 का पहला स्वातंत्र्य संग्राम हो या 1920 का असहयोग आंदोलन हो या 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन या 1974 का जेपी आंदोलन बिहार ने ईंजन बनकर देश की राजनीति को दिशा दिखाई है। बिहार के लोग इतिहास को दोहराने में नहीं नया इतिहास बनाने में विश्वास रखते हैं।
मित्रों,अब से कुछ ही महीने बाद बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और बिहार की सारी यथास्थितिवादी शक्तियों ने एकजुट होना शुरू कर दिया है। उनको लगता है कि बिहार में 1995 और 2000 ई. जैसे चुनाव-परिणाम आएंगे। ये विकास-विरोधी,बिहार की शिक्षा को रसातल में पहुँचा देनेवाले,भ्रष्टाचार को सरकारी नीति बना देनेवाले और बिजली,चारा,अलकतरा,दवा-खरीद,धान-खरीद,पुल-निर्माण,एस्टीमेट आदि घोटालों की झड़ी लगा देनेवाले घोटालेबाज लोग सोंचते हैं कि बिहार में अगले चुनावों में भी लोग जाति के नाम मतदान करेंगे और इन जातिवादियों की नैया फिर से किनारे लग जाएगी। नीतीश जी ने तो कई बार मंच से कहा था कि अगर साल 2015 तक बिहार के हर घर में बिजली नहीं पहुँचती है तो वे वोट मांगने ही नहीं जाएंगे। बिजली तो मेरी पंचायत जुड़ावनपुर बरारी में ही नहीं है। शाम होते ही पूरी पंचायत अंधेरे के महासागर में डूब जाती है तो क्या नीतीश जी सचमुच इस चुनाव में वोट नहीं मांगेंगे? नीतीश जी ने 2010 के चुनाव जीतने के बाद कहा था कि इस कार्यकाल में उनकी सरकार भ्रष्टाचार के विरूद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति अख्तियार करेगी तो क्या बिहार से भ्रष्टाचार समाप्त हो गया? फिर क्यों बिहार में रोजाना नए-नए घोटाले सामने आ रहे हैं? क्या यही है जीरो टॉलरेंस की नीति?
मित्रों,कितने आश्चर्य की बात है कि पूरी दुनिया में सत्ता-पक्ष को हराने के लिए मोर्चे बनाए जाते हैं,गठबंधन किए जाते हैं लेकिन बिहार में विपक्ष को रोकने के लिए पहले महाविलय का नाटक किया गया और अब गठबंधन की नौटंकी की जा रही है। कल तक लालू-राबड़ी राज आतंकराज था और लालू-राबड़ी आतंकवादी थे लेकिन आज बड़े भाई और भाभी हो गए हैं। लालू जी भी मंचों से कहा करते थे कि ऐसा कोई सगा नहीं जिसको नीतीश ने ठगा नहीं और खुद पहुँच गए उस आदमी की शरण में जिसने पूरे बिहार की जनता को ठगा है और आज लालू भी खुद को ठगे हुए महसूस कर रहे हैं। नीतीश ने लालू को किनारे लगाकर कांग्रेस से खुद को मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित करवा लिया है और खुद को राजनीति का पीएचडी कहनेवाले लालू जी की समझ में ही नहीं आ रहा है कि अब करें तो क्या करें?
मित्रों,यह सच्चाई है कि जबतक बिहार में भाजपा नीतीश सरकार में शामिल थी तब तक बिहार ने 14 प्रतिशत की दर से विकास किया। तब भी नीतीश कुमार कहा करते थे कि इस रफ्तार से विकास करने पर भी बिहार को अन्य विकसित राज्यों की बराबरी में आने में 20 साल लग जाएंगे और उनके पास 20 साल तक इंतजार करने  लायक धैर्य नहीं है। आज उन्होंने जबसे भाजपा को सरकार से निकाल-बाहर किया है बिहार की विकास दर आधी हो चुकी है और 7 प्रतिशत तक लुढ़क चुकी है। जाहिर है कि अब तो नीतीश जी को 100 सालों तक इंतजार करने लायक धैर्य एकत्रित करना पड़ेगा। लेकिन सवाल उठता है कि क्या बिहार की जनता 100 सालों तक इंतजार करेगी? क्या भारत की तीसरी सबसे बड़ी युवा आबादी को धारण करनेवाले बिहार के लोगों के पास आज 100 सालों तक विकास का इंतजार करने लायक धैर्य है?
मित्रों,कदापि नहीं,कदापि नहीं!!  इतना ही नहीं भाजपा को हटाने के बाद से बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति में इतनी गिरावट हो चुकी है कि लगता है कि बिहार फिर से नीतीशकथित आतंकराज में पहुँच गया है। लालू-नीतीश बिहारी होकर भी बिहार को नहीं समझ पाए हैं। बिहार कोई दिल्ली नहीं है जो बार-बार मूर्खता करे और अपने विकास के मार्ग को रायता विशेषज्ञों को मत देकर खुद ही अवरूद्ध कर ले। बिहार के लोग कम पढ़े-लिखे भले हीं हों लेकिन बिहार का अनपढ़ चायवाला या रिक्शावाला भी इतनी समझ रखता है कि कौन उसका और उसके राज्य का वास्तविक भला चाहता है। बिहार की जनता में अब विकास की भूख जग चुकी है। वैसे भी केंद्र की मोदी सरकार ने बिहार की सारी मांगों को एकसिरे से न सिर्फ मंजूर कर लिया है बल्कि उससे भी ज्यादा दे दिया है जितने कि नीतीश कुमार की सरकार ने मांग की थी। इतिहास गवाह है कि बिहार की जनता लगातार नए प्रयोग करने में विश्वास रखती है। वो लालू और नीतीश दोनों को देख चुकी है,परख चुकी है इसलिए ये दोनों तो इसबार के चुनाव में शर्तिया माटी सूंघते हुए ही दिखनेवाले हैं। भाजपा अगर बिहार में जीतती है तो निश्चित रूप से भारतमाता की बांयीं बाजू को मजबूत बनाने के नरेंद्र मोदी के संकल्प पर तेज गति से काम होगा और दुनिया में भारत अतुल्य भारत तो बनेगा ही वसुधा पर बिहार का भी जोड़ा नहीं मिलेगा। 1947 में जो बिहार प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश में दूसरा स्थान रखता था 2047 आते-आते कदाचित पहला स्थान प्राप्त कर लेगा और बिहार की जनता इस बात को बखूबी जानती और समझती है। ये बिहार की पब्लिक है बाबू और ये जो पब्लिक है वो सब जानती है,कौन बुरा है कौन भला है ये न सिर्फ पहचानती है बल्कि देश में सबसे ज्यादा पहचानती है।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

बुधवार, 20 मई 2015

मोदी के एक साल बनाम सौ दिन के केजरीवाल

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अब कुछ ही दिन बचे हैं जब भारत में रक्तहीन क्रांति को हुए एक साल पूरे हो जाएंगे। एक साल पहले भारत ने कांग्रेस की फूट डालो और शासन करो की नीति को पूरी तरह से नकारते हुए नरेंद्र मोदी की सबका साथ सबका विकास की नीति पर अपनी मुहर लगाई थी।
मित्रों,दूसरी तरफ दिल्ली में केजरीवाल सरकार के सौ दिन भी दो-तीन दिन में ही पूरे हो जाएंगे। जहाँ नरेंद्र मोदी ने शपथ-ग्रहण से पहले ही काम करना शुरू कर दिया था वहीं दिल्ली में केजरीवाल सरकार के काम शुरू करने का अभी भी इंतजार हो रहा है। हम यह तो नहीं कह सकते कि मोदी सरकार ने एक साल में ही उतना काम कर दिया है जितना कि उसको 5 साल में करना था लेकिन हम यह जरूर दावे के साथ कह सकते हैं कि मोदी सरकार ने पिछले एक साल में उतना काम तो जरूर किया है जितना कि एक साल में कर पाना किसी भी सरकार के लिए संभव था और जब आगाज अच्छा होता है तो अंजाम भी अच्छा ही होता है।
मित्रों,आपको याद होगा कि मोदी सरकार ने पहला फैसला लिया था कालाधन पर एसआईटी के गठन का। फिर भारत के इतिहास में पहली बार मेक इन इंडिया अभियान का आगाज किया गया । फिर लाई गई प्रधानमंत्री जनधन योजना और तत्पश्चात् एलपीजी सब्सिडी को सीधे ग्राहकों के खातों में डालने की शुरुआत की गई। और अब लाई गई है 12 रुपये सालाना वाली लाजवाब प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना एवं प्रधानमंत्री जीवन सुरक्षा बीमा योजना । आगे उम्मीद की जानी चाहिए सारी सब्सिडी आधारित योजनाओं की सब्सिडी सीधे लाभान्वितों के खातों में डाल दी जाएगी और इस तरह दिल्ली से चला 1 रुपये में से 1 रुपया ही लाभुकों तक पहुँचेगा न कि 15 पैसे। इसी तरह ऐसी उम्मीद भी की जानी चाहिए कि निकट-भविष्य में पूरी सरकार हमारे मोबाईल में होगी,हमारी मुट्ठी में होगी। सबकुछ ऑटोमैटिक, न तो रिश्वत देनी पड़ेगी और न ही टेबुल-टेबुल दौड़ना ही पड़ेगा। जहाँ तक कालेधन का सवाल है तो संस्कृत का एक श्लोक तो आपने पढ़ा ही होगा कि पुस्तकेषु तु या विद्या परहस्तगतं धनं। आपतकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनमं।। इसलिए अगर मोदी सरकार देसी-विदेशी कालाधन के निर्माण पर ही रोक लगा दे तो देश का कायाकल्प हो जाएगा। इसके लिए आयकर विभाग को चुस्त-दुरूस्त बनाना होगा और आयकर अधिकारियों की सम्पत्ति की जाँच करवानी होगी और कदाचित सरकार ऐसा करेगी भी। इसके साथ ही कृषि को लाभकारी बनाने की दिशा में भी कई योजनाएँ बनाई जा रही हैं जिनको जल्दी ही लागू किया जाएगा। अगर भारत को विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में लाना है तो हमें कृषि को लाभकारी बनाने के साथ-साथ कृषि पर से जनसंख्या के भार को भी कम करना होगा और मोदी सरकार की महत्त्वाकांक्षी योजना मेक इन इंडिया इसी दिशा में किया जा रहा सार्थक प्रयास है।
मित्रों,जहाँ सोनिया-मनमोहन-राहुल की सरकार इसलिए चर्चा में रहती थी क्योंकि उसमें रोज ही कोई-न-कोई घोटाला होता था वहीं आज विपक्ष शोर मचा रहा है सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी के कपड़ों को लेकर। बेचारे करें तो क्या करें सरकार के खिलाफ और कोई मुद्दा मिल भी तो नहीं रहा। हल्ला भी एक ऐसे नेता के कपड़ों को लेकर किया जा रहा है जो हर साल अपने कपड़ों की नीलामी का आयोजन करता है और उससे होनेवाली आय को हर साल सरकारी खजाने में जमा कर देता है। भारत के किसी भी अन्य नेता ने कभी ऐसा किया था क्या?
मित्रों,एक और कारण से मोदी सरकार के खिलाफ हल्ला मचाया जा रहा है और वह है भूमि अधिग्रहण बिल। आरोप लगाया जा रहा है कि मोदी सरकार किसान-विरोधी है और किसानों की जमीनों को छीनकर राबर्ट वाड्राओं और जिंदलों को सौंप देगी। आश्चर्य तो इस बात को लेकर है कि आरोप लगानेवाले वही लोग हैं जिन्होंने पिछले 50 सालों में किसानों की जमीनों को मनमानी शर्तों पर बिना कुछ दिए छीनने का काम किया है और वाड्राओं और जिंदलों को देने का काम किया है। केंद्र सरकार आश्वस्त कर रही है कि अधिगृहित भूमि सरकार के पास ही रहेगी,पहली बार प्रभावित किसानों को चार गुना मुआवजा दिया जाएगा और देश के इतिहास में पहली बार नौकरी भी दी जाएगी फिर भी चोर शोर मचा रहे हैं। वास्तव में ये लोग चाहते ही नहीं हैं कि देश का विकास हो और इनक्रेडिबल इंडिया वास्तव में इनक्रेडिबल इंडिया बने। नई सड़कों,नए उद्योगों,पावर-प्लांटों,रेलवे-लाइनों के लिए जमीन के अधिग्रहण की आवश्यकता है और विपक्ष नहीं चाहता कि मोदी सरकार भारत की आधारभूत संरचना का विकास करे,भारत को उत्पादन में,जीडीपी में दुनिया में नंबर एक बनाए जैसे कि भारत 1813 ईस्वी तक था। हम उम्मीद करते हैं कि चालू वित्त वर्ष में मोदी सरकार बहुत जल्दी किसी-न-किसी तरह भूमि अधिग्रहण बिल को संसद से पारित करवा लेगी और वास्तविक भारत के निर्माण की दिशा में रॉकेट की गति से अग्रसर होगी। मोदी सरकार को यह बात समझ लेनी चाहिए कि चाहे उनका मूलमंत्र सबका साथ सबका विकास कितना ही पवित्र क्यों न हो उनके मार्ग में,यज्ञ में राष्ट्रीय और वैश्विक दोनों स्तर पर कुछ राहु(ल)-केतु हमेशा विघ्न डालते ही रहेंगे।
मित्रों,अब बात करते हैं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में सौ दिन पूरे करनेवाली केजरीवाल सरकार की जिसने वेलेन्टाईन दिवस को पदभार संभाला था। पिछले सौ दिनों अगर इस सरकार ने कुछ किया है तो बस रायता फैलाने का काम किया है। पहले आपस में ही झगड़ने का काम किया और अब संविधान और केंद्र सरकार से झगड़ा कर रही है। हमने विधानसभा चुनावों के समय दिल्ली की जनता को इसकी बाबत सचेत भी किया था लेकिन जनता ने हमारी नहीं सुनी और एक ऐसी सरकार चुनी जो सरकार है ही नहीं बल्कि अराजकतावादियों का जमघट है फर्जी डिग्रीवाले फर्जी लोगों की भीड़ है। जिसके लिए कसमें वादे प्यार वफा सब बातें हैं और बातों का क्या! केजरी सर के लिए न तो कसमों का कोई मोल है,न ही पुराने साथियों का और न तो चुनावी वादों का ही। केजरी बाबू तो यही चाहते हैं कि उनके मन-मुताबिक फिर से भारत के संविधान का निर्माण हो जिसके अनुसार राबर्ट मुगाबे,किंग जोंग इल या सद्दाम हुसैन के चुनावों की तरह प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति पद के लिए सीधा चुनाव हो और उस चुनाव में राबर्ट मुगाबे,किंग जोंग इल या सद्दाम हुसैन के चुनावों की तरह केवल केजरी सर ही उम्मीदवार हों।
(हाजीपुर टाईम्स पर प्रकाशित)

शनिवार, 9 मई 2015

आज मेरे पास न बंगला है, न गाड़ी है, न बैंक बैंलेन्स है और न माँ है

मित्रों,आज की ही तरह पहले भी मैं यही मानता था कि माँ के कदमों के नीचे स्वर्ग होता है। जब भी दुर्गा सप्तशती का पाठ करता तो सबसे ज्यादा श्रद्धाभाव से इसी श्लोक का पाठ करता कि माता कुमाता न भवति। दीवार फिल्म को दर्जनों बार टीवी पर देखता और सोंचता कि मेरी माँ भी फिल्म की सुमित्रा की तरह ही कभी मेरा साथ नहीं छोड़ेगी। तब भी नहीं जब मेरे पास कुछ भी नहीं होगा लेकिन हुआ उल्टा। आज मेरे पास न बंगला है, न गाड़ी है, न बैंक बॅलेन्स है और माँ भी नहीं है। आज मेरे पास अगर कुछ है तो वो हैं मेरे यानि रवि के कोरे आदर्श। खुद को बदलकर पूरी दुनिया को रामराज्य में बदल देने का सपना। खुद विष पीकर दुनिया को अमरत्व प्रदान करने का शिवभाव।
मित्रों,बचपन में मैं भी अंधेरे से बहुत डरता था। डरकर आँखें बंदकर लेता और माँ के सीने से चिपक जाता। सोंचता कि चाहे कोई भी संकट हो मेरी माँ उस संकट को खुद पर झेल लेगी लेकिन मुझे बचा लेगी। जब भी बीमार होता और माँ एक मिनट के लिए भी आँखों से ओझल हो जाती तो छटपटाने लगता ठीक वैसे ही जैसे पानी से बाहर निकाल देने पर मछली छटपटाने लगती है। मेरी माँ ने मुझे दूध पिलाकर नहीं बल्कि अपना खून पिलाकर पाला। कुछ बड़ा हुआ तो देखा कि घर-परिवार के मामलों के चलते माँ-पिताजी में झगड़ा अक्सर झगड़ा होता। मैंने कभी पिताजी का पक्ष नहीं लिया बल्कि हमेशा माँ का पक्ष लिया। हाँ,एक मुद्दे पर मैंने कभी माँ का समर्थन नहीं किया और वो मुद्दा था दो नंबर के पैसे का मुद्दा। मेरी माँ को न जाने क्यों एक नंबर के पैसों से ज्यादा दो नंबर के पैसों से प्यार था। वो हमेशा पिताजी को गलत तरीके से पैसे कमाने के लिए उकसाती लेकिन तब तक मैं पिताजी की ही तरह आदर्शवादी हो चुका था और हमेशा कहता कि नहीं माँ पिताजी ठीक कर रहे हैं। भले ही मेरे पाँव में चप्पल हो या नहीं,मेरे जिस्म पर अच्छे कपड़े नहीं हों,होली में पुराने कपड़ों से काम चलाना पड़े,सिर्फ पर्व-त्योहारों में मिठाई खाने को मिले लेकिन मुझे अपने पिता के आदर्शवाद पर तब भी गर्व था और आज भी है।
मित्रों,जब 1982 में मेरा हाथ टूटा तो मुझसे ज्यादा दर्द मेरी माँ को हुआ,जब 1991 में मैंने माँ से अंतिम विदा ले ली और उसके पैरों पर सर पटककर फिल्मी स्टाईल में बेहोश हो गया तब मेरी माँ पागलों की तरह जहर खोज रही थी। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि आज माँ दीवार फिल्म के रवि को छोड़कर विजय के घर जा बैठी है। साथ ही,साथ न देने पर आत्महत्या कर लेने की धमकी देकर मेरे पिताजी को भी साथ ले गई है। उसी पिताजी को जो कभी मुझसे एक दिन भी दूर नहीं रह पाते थे और ऐसा होने पर उनकी हालत अयोध्यापति दशरथ जैसी हो जाती थी। उसी पिताजी को जो मुझसे फोन पर बात करते-करते रोने लगते थे। मैं तो राम बन गया लेकिन अब कौशल्या और दशरथ को कहाँ से लाऊँ।
मित्रों,जो माँ कभी मेरे ऊपर तीनों लोक न्योछावर करती थी मेरी शादी के बाद वो क्यों मेरे सुख में सुख और मेरे दुःख में दुःख का अनुभव नहीं करती? क्यों जब भी मैं ससुराल पत्नी से मिलने जाता तो मेरी माँ कहती कि दिन रहते जाओ और शाम होने से पहले वापस आ जाओ? क्यों मेरी माँ मेरी शादी के बाद मुझे एक मिठाई या एक मैगी खाते हुए भी नहीं देखना चाहती? मैं तो हमेशा वही करता रहा जो करने के लिए उसने कहा फिर आज वो क्यों मुझे देखना तक नहीं चाहती? क्या इसलिए क्योंकि मेरी माँ मुझे अब बेटा नहीं अपना गुलाम मानने लगी है? क्या इसलिए क्योंकि मेरी माँ को अपने पैसों का घमंड हो गया है? क्या इसलिए क्योंकि मेरी माँ नहीं चाहती थी कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊँ और उसकी गुलामी से मुक्त हो जाऊँ? क्या इसलिए क्योंकि मैं आज भी सच बोलता हूँ और प्यार का झूठा दिखावा नहीं करता बल्कि जो सच लगता है वही बोल देता हूँ? क्या इसलिए नहीं क्योंकि मेरी माँ का मानना था कि उसके पास पैसा रहेगा तो थक-हारकर बेटे-बहू की हाँ-में-हाँ मिलायेंगे ही और मैं जान दे सकता हूँ लेकिन हाँ-में-हाँ नहीं मिला सकता और तब तो हरगिज नहीं जब असत्यभाषण किया जा रहा हो या किसी तरह के अभिमान का प्रदर्शन किया जा रहा हो। मुझे याद है कि वर्ष 2007-08 में मेरी माँ के ऐसा कहने पर कि उसके पास पैसा होगा तो झक मारकर बहू प्यार करेगी ही मेरी छोटी बहन रूबी ने उसे चेताया था कि ऐसा नहीं होता है और नहीं होगा बल्कि कोई भी बहू व्यवहार को देखकर सास को पूजती है पैसे को देखकर नहीं।
मित्रों,यह सही है कि आज मैं अंधेरों से नहीं डरता बल्कि इंसानों के मन का अंधेरा मिटाने की कोशिश कर रहा हूँ। यह भी सही है कुछ ही दिनों में मेरे कारोबार से पैसा आना शुरू हो जाएगा लेकिन फिर भी माँ की कमी तो हमेशा रहेगी। आज भले ही रवि के पास बंगला, गाड़ी और बैंक बैंलेन्स नहीं है लेकिन कल होगा जरूर लेकिन शायद तब भी उसके पास माँ नहीं होगी और न ही पिताजी होंगे क्योंकि उन दोनों को विजय की झूठ,फरेब और धोखे की दुनिया कहीं ज्यादा रास आ रही है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 7 मई 2015

आपका कानून और आपकी अदालत आज भी अमीरों की रखैल है,मी लॉर्ड!

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आज से लगभग 100 साल पहले जिन दिनों हमारा देश अंग्रेजों का गुलाम था महात्मा गांधी ने भारत के कानून और अदालतों के बारे में गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ये दोनों ही दुर्भाग्यवश अमीरों की रखैल बनकर रह गई हैं। और दुर्भाग्यवश हमें आज भी,आजादी के 70 साल बाद भी अपने आलेख में यह कहना पड़ रहा है कि आज भी हमारे देश में दो तरह के कानून हैं-एक अमीरों के लिए और दूसरे गरीबों के लिए। हमारी अदालतों का रवैया भी अमीरों और गरीबों के लिए अलग-अलग दो तरह का है।
मित्रों,हम सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दत्तू साहब के शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने 27 नवंबर,2014 को बिना किसी लाग-लपेट के स्वीकार किया कि भारत की न्याय-प्रणाली गरीब और कमजोरविरोधी है लेकिन हमें 13 फरवरी,2015 को यह देखकर तब भारी दुःख हुआ जब इन्हीं दत्तू साहब की खंडपीठ ने तीस्ता शीतलवाड़ को जेल जाने से बचाने के लिए कपिल सिब्बल से फोन पर बात करने के दौरान ही फोन पर ही याचिका स्वीकार करते हुए फोन पर ही यह आदेश सुना दिया कि तीस्ता शीतलवाड़ की गिरफ्तारी पर हम रोक लगाते हैं।
मित्रों,दत्तू साहब ने न्यायपालिका की बीमारी तो बता दी लेकिन किया वही जिसको करने से बीमार की हालत और भी गंभीर होती हो। सवाल उठता है कि जब चीफ जस्टिस का रवैया ऐसा है तो कौन करेगा न्यायपालिका का ईलाज? कौन न्याय-प्रणाली को कमजोर और गरीबपरस्त बनाएगा।
मित्रों,इसी तरह कल भी वॉलीबुड अभिनेता सलमान खान को सजा मिलने के चंद घंटों के भीतर ही बंबई हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करके,सुनवाई करके जमानत दे दी। सजा मिलने में जहाँ 13 साल लग गए वहीं जमानत मिलने में 13 घंटे भी नहीं लगे। सवाल उठता है कि देश के सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जो 11 लाख मुकदमे लंबित हैं उनपर भी इसी तरह तात्कालिकता क्यों नहीं दिखाई जाती? क्यों एक आम आदमी को दशकों तक कहा जाता है कि अभी आपके मुकदमें का नंबर नहीं आया है और किसी रसूखदार लालू,माया,तीस्ता या सलमान के मामले की सुनवाई तमाम लाइनों को तोड़कर तत्काल कर ली जाती है?
मित्रों,कल जब सलमान खान को सजा सुनाई गई तो हमें खुशी हुई कि आखिर अदालत ने 13 साल की देरी के बाद भी यह तो साबित कर ही दिया कि कानून के समक्ष क्या अमीर क्या गरीब,क्या रामदेव और क्या रमुआ सभी एक समान हैं लेकिन कुछ ही घंटों के बाद हाईकोर्ट ने हमारे सभी भ्रमों को तोड़ते हुए गांधी जी द्वारा एक शताब्दी पहले की गई शिकायत को ही उचित ठहरा दिया। सवाल उठता है कि ऐसा कब तक चलेगा? कब तक पुलिस,सीबीआई,कानून और अदालतें चांदी के सिक्कों की खनखनाहट पर थिरकते रहेंगे? कब और कैसे कानून और अदालतें गरीबपरस्त होंगे? शायद कभी नहीं!!!

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 3 मई 2015

मोदी सरकार में कुछ तो गड़बड़ है

मित्रों,केंद्र में मोदी सरकार कुछ ही दिनों में अपना एक साल पूरा करने जा रही है। इस अवधि में सरकार ने कई उपलब्धियाँ प्राप्त कीं मगर सवाल उठता है कि क्या वे उपलब्धियाँ जनता की आकांक्षाओं पर पूरी तरह से पूरा कर पाईँ या कहीं-न-कहीं उम्मीद से कम रहीं। विदेशों में तो मोदी सरकार की खूब धूम रही लेकिन देश में वही धूम देखने को क्यों नहीं मिल रही है? पहले दिल्ली विधानसभा,फिर प. बंगाल निकाय चुनाव और अव यूपी के उपचुनावों में पार्टी का प्रदर्शन क्यों शर्मनाक रहा? अगर इसी तरह से राज्यों में भाजपा का फ्लॉप शो चलता रहेगा तो फिर कैसे पार्टी को राज्यसभा में बहुमत प्राप्त होगा?
मित्रों,इसका सीधा मतलब है कि मोदी सरकार जिस तरह उम्मीदों के पहाड़ चढ़कर सत्ता में आई थी उनको पूरा कर पाने में कहीं-न-कहीं कोई-न-कोई त्रुटि रह गई। यह त्रुटि नीतिगत स्तर पर तो है ही नीयत के स्तर पर भी है। हमने सरकार गठन के समय ही सरकार में दागियों को शामिल करने पर सवाल खड़े किए थे लेकिन तब कहा गया था कि इनके ऊपर कड़ा अंकुश रखा जाएगा। कोई भी संसदीय प्रणाली में कोई भी सरकार वास्तव में वन मैन शो बनकर अच्छा काम कर ही नहीं सकती। सरकार चलाना एक टीम वर्क था,है और रहेगा। इसलिए अच्छे प्रदर्शन के लिए अच्छी और योग्य लोगों की टीम का होना जरूरी है। नरेंद्र मोदी कोई सुपरमैन नहीं हैं कि अकेले सारे मंत्रालयों की फाइलें रोजाना चेक कर लेंगे और उन पर निर्णय भी ले लेंगे। इसलिए मंत्रालयों में ईमानदार,भरोसेमंद और कर्मठ मंत्रियों का होना जरूरी है। कुछ इसी तरह के प्रयोग बिहार में नीतीश कुमार ने भी किया था और लंबे समय तक एक साथ 18 विभागों के मंत्री रहे थे लेकिन परिणाम क्या हुआ यह सारी दुनिया जानती है।
मित्रों,इसलिए नरेंद्र मोदी जी को चाहिए कि वे अपने मंत्रिमंडल की समीक्षा करें और नकारा मंत्रियों को बाहर निकालकर वास्तव में जो लोग ईमानदार,कर्मठ और देशभक्त हैं उनको मंत्री बनाएँ। मोदी सरकार की दूसरी कमजोरी मेरे हिसाब से रही है भ्रष्टाचार के मामले में कड़क और जीरो टॉलरेंस की नीति का पालन नहीं कर पाना। यह सही है कि मोदी सरकार के एक साल के कार्यकाल में भ्रष्टाचार का कोई भी मामला सामने नहीं आया है लेकिन सच यह भी है कि अभी भी ईमानदार अधिकारियों को परेशान किया जा रहा है। अशोक खेमका को तो हरियाणा की भाजपा सरकार ने भी स्थानान्तरित कर दिया। अभी कल ही भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठानेवाले कर्नाटक के वरिष्ठ आइएएस एमएन विजय कुमार को केंद्र सरकार की सहमति से राज्य सरकार ने जबरिया रिटायर कर दिया। इस तरह के कदमों से भ्रष्टाचार घटेगा नहीं बल्कि बढ़ेगा मोदी सरकार को यह समझना होगा। ईमानदार अधिकारियों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए न कि दंडित।
मित्रों,फिर,भ्रष्टाचार के मामले में भाजपाशासित पंजाब, छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश और राजस्थान में स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं है। मोदी अपने इन क्षत्रपों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार पर कैसे अंकुश लगाएंगे अभी तक स्पष्ट नहीं है। मोदी कहते हैं कि सभी तरह की सब्सिडियों को सीधे लाभान्वितों के खातों में डाला जाएगा लेकिन ऐसा कब तक होगा कोई नहीं बताता। बैंक अधिकारी हों या प्रशासनिक अधिकारी बिना घूस लिए वे किसानों,छात्रों या अन्य ऋण के ईच्छुक लोगों का कोई काम नहीं करते हैं इस पर मोदी सरकार कैसे पूर्ण विराम लगाएगी? क्या ऋण देने की प्रक्रिया को ऑनलाईन नहीं किया जा सकता? सच्चाई तो यह है कि किसानों को केसीसी के जरिए मिलने वाले लाभ या सब्सिडी का एक बड़ा हिस्सा रिश्वत की भेंट चढ़ जाता है। इसी तरह आंगनबाड़ी,मध्याह्न भोजन योजना और मनरेगा के दी जानेवाली राशि का आधा से भी ज्यादा बड़ा हिस्सा मोदी सरकार के एक साल हो जाने के बाद भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। जनवितरण प्रणाली तो भ्रष्टाचार की नाली बनी हुई है ही। आज भी कोई युवा नए उद्यम स्थापित करने से घबराता है क्योंकि बिना रिश्वत लिए ऋण नहीं मिलता और अगर सब्सिडी है भी तो सरकारी सब्सिडी घूस देने में ही चली जाती है।
मित्रों,हमने मोदी सरकार के गठन के समय ही कहा था कि भारत की जनता को मोदी सरकार से कोशिश नहीं चाहिए बल्कि परिणाम चाहिए। कोशिशें जनता ने बहुत देख लीं और अब इंतजार की हद की भी हद हो चुकी है। सरकार काम करे,परिणाम दे और तेजी से परिणाम दे। यह सही है कि मोदी सरकार यह दिखाना चाहती है कि वो कालाधन को विदेशों से वापस लाने के लिए प्रयासरत है लेकिन जनता को प्रयास नहीं चाहिए बल्कि जनता तो यह जानना चाहती है कि पिछले एक साल में कितना कालाधन विदेश से भारत में वापस लाया गया? फिर भले हीं भारत के हर व्यक्ति के खाते में 15-पन्द्रह लाख रुपये डाले नहीं जाएँ या भले ही करदाताओं को कर देने से कुछ दिनों के लिए मुक्ति न मिले लेकिन देश के खजाने में तो पैसा वापस आए। साथ ही मोदीजी को और उनकी मंडली को यह भी समझ लेना होगा कि राजनीति में जुमले नहीं चलते इसलिए भाषण देते समय जुमलों से बचना चाहिए। इसी तरह मोदी सरकार के एक मंत्री जितेंद्र सिंह ने सरकार गठन के तत्काल बाद कहा कि धारा 370 पर पुनर्विचार किया जाएगा और अब कुछ ही दिन पहले वही मंत्री संसद में कहते हैं कि धारा 370 पर पुनर्विचार की सरकार की कोई योजना नहीं है। अगर यही करना था तो फिर सालभर पहले इस संबंध में सनसनीखेज बयान देने की क्या आवश्यकता थी? इसी तरह नरेंद्र मोदी ने खुद ही लोकसभा चुनावों के समय कहा था कि बांग्लादेशी घुसपैठी बोरिया-बिस्तर बांध लें लेकिन अब तक ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा। शायद यह भी एक वजह है कि भाजपा को नगरीय निकाय चुनावों में प. बंगाल में धूल चाटनी पड़ी है जबकि वह वहाँ सरकार गठन के सपने देखने लगी थी। इसी तरह सैनिकों और पूर्व सैनिकों को भी मोदी सरकार के एक साल पूरा कर लेने के बाद भी एक रैंक एक वेतन और पेंशन का इंतजार है।
मित्रों,मोदी सरकार का सबसे ज्यादा नुकसान पिछले एक साल में अगर किसी ने किया है तो वो लोग हैं मोदी के सबसे बड़े कथित हितचिंतक बड़बोले नेता। चाहे वो आदित्यनाथ हों या साक्षी महाराज या फिर गिरिराज सिंह या साध्वी निरंजना ये लोग रह-रहकर ऐसी भाषा का प्रयोग करते रहते हैं जिसको किसी भी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता। सरकार को चाहिए कि अपनी इस लगातार विषवमन करनेवाली मंडली की जुबान पर ताला लगाए फिर चाहे इसके लिए उनको कितने ही सेंटर फ्रेश क्यों न खिलाना पड़े। इसी तरह कई बार मोदी जी अपने इन हितचिंतकों की बकवास पर पूरी तरह से चुप्पी लगा जाते हैं वो भी कुछ इस तरह कि कई मर्तबा तो गुमाँ हो जाता है कि क्या अभी भी मनमोहन सिंह ही भारत के प्रधानमंत्री हैं?
मित्रों,एक गलती मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण बिल और कृषकों के मामले में भी की है। भूमि अधिग्रहण विधेयक के मामले को इतना लंबा खींचने की आवश्यकता ही नहीं थी। दोबारा अध्यादेश लाने की तो कतई जरुरत नहीं थी जबकि उसको पता है कि उसका राज्यसभा में बहुमत नहीं है। अब अगर विपक्ष ने विधेयक को फिर से राज्यसभा में पारित नहीं होने दिया तो क्या वो तीसरी बार अध्यादेश लाएगी? बल्कि सरकार को चाहिए था कि वो शुरू में ही संसद का संयुक्त सत्र बुलाती और विधेयक को पारित करवा लेती। सरकार की दूसरी विफलता यह है कि वो हताश-निऱाश हो चुके किसानों के मन में आशा का संचार नहीं कर पाई है। कृषि को अगर लाभकारी बनाना है तो उत्पादकता में क्रांतिकारी बढ़ोतरी करनी होगी ही साथ ही कृषि पर से जनसंख्या के भार को भी कम करना होगा और ऐसा तब तक संभव नहीं है जबतक कि देश में बड़े पैमाने पर छोटे-बड़े उद्योग-धंधों की स्थापना नहीं की जाती और उद्योग-धंधों की बड़े पैमाने पर तब तक स्थापना नहीं हो सकती जब तक कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को संभव न बना दिया जाए। वर्तमान कानून जो 2013 में बना था के तहत तो भूमि-अधिग्रहण कर पाना लगभग असंभव ही कर दिया गया है। मैं यह नहीं कहता कि जनता से जबर्दस्ती जमीन छीन ली जाए लेकिन स्थिति ऐसी भी नहीं हो कि विकास-कार्यों के लिए जमीन प्राप्त कर पाना नितांत असंभव ही हो जाए। मोदी सरकार को यह समझना होगा कि देश के युवा प्रतीक्षा कर पाने की स्थिति में कतई नहीं हैं इसलिए मेक इन इंडिया पर काम तेजी से और तुरंत होना चाहिए। बार-बार भूमि-अधिग्रहण अध्यादेश लाना सिर्फ समय की बर्बादी है और इसके अलावा और कुछ नहीं क्योंकि अब तक इस कानून को बन जाना चाहिए था और मेक इन इंडिया का काम पूरे जोर-शोर से शुरू हो जाना चाहिए था।
मित्रों,इसके साथ ही गांव-गांव में अनाज गोदामों,शीतभंडार गृहों की व्यवस्था भी करनी होगी और कृषि के क्षेत्र से बिचौलियों को समाप्त करना होगा तभी किसानों को उनके उत्पादों का उचित मूल्य मिल पाएगा और उपभोक्ताओं को भी महंगाई से स्थायी रूप से निजात मिलेगी। साथ ही अगर हो सके तो कृषि और कृषि संबंधी कार्यों में केंद्र सरकार के दखल को बढ़ाना होगा क्योंकि देखा जाता है राज्य सरकार के मातहत काम करनेवाला भ्रष्ट प्रशासन केंद्र सरकार के सद्प्रयासों को असफल कर देता है। आज ही यूपी में एक किसान की उस समय हृदयगति रूक जाने से लेखपाल के दरवाजे पर ही मौत हो गई जब उस प्राकृतिक आपदा के मारे किसान से लेखपाल ने मुआवजे का चेक देने के बदले रिश्वत की मांग कर दी।

मित्रों,इसी तरह से भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दत्तू साहब ने यह कह तो दिया है कि मुकदमों के निबटारे के लिए समय-सीमा का निर्धारण किया जाएगा लेकिन ऐसा तब तक संभव नहीं होगा जब तक राज्य सरकारें और केंद्र सरकार इस दिशा में सहयोग नहीं करतीं। अच्छा होता कि नया कानून बनाकर अधीनस्थ न्यायालयों में नियुक्ति को भी केंद्र या सर्वोच्च न्यायालय के जिम्मे कर दिया जाता। साथ ही न्यायालयों में जो प्रक्रियागत देरी होती है को भी रोकना होगा और प्रक्रिया को सरल करना होगा। इस दिशा में भी मोदी सरकार ने पिछले एक साल में कुछ नहीं किया है।

मित्रों,तीसरी बात कि मोदी जी बार-बार कौशल-विकास पर जोर दे रहे हैं लेकिन देश की सच्चाई क्या है? जब तक अवसर पैदा नहीं किया जाएगा तब तक कुशलता प्राप्त लोगों को योग्यतानुसार वेतन पर नौकरी मिलेगी कैसे? नरेंद्र मोदी बार-बार वैश्विक स्तर पर डॉक्टरों,इंजीनियरों की कमी का जिक्र करते हैं लेकिन हम तब तक दुनिया को अच्छे डॉक्टर और इंजीनियर नहीं दे सकते जब तक हम हमारी शिक्षा-प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन नहीं करें या फिर सरकारी शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण और विश्वस्तरीय न कर दें। हम भारत को तब तक विश्वगुरू नहीं बना सकते जब तक देश में शोध और अनुसंधान का माहौल नहीं बनेगा। क्या कारण है कि हमारे देश में नोबेल जीतने लायक वैज्ञानिक खोज नहीं हो पा रही है या विश्वस्तरीय शोध-अनुसंधान नहीं पा रहे हैं?
मित्रों,अंतिम बात यह कि मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी को राज्यों में गलत लोगों के साथ गठबंधन करने से बचना चाहिए था। भाजपा ने पहले महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ और बाद में जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन करके भयंकर गलती की है। शिवसेना बराबर बेलगाम बयान देती रहती है तो पीडीपी अलगाववादियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपना रही है जिससे भाजपा के साथ-साथ मोदी सरकार की भी फजीहत हो रही है। इससे तो अच्छा रहता कि जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन ही रहता।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

किसानों के नाम पर राजनीति और किसानी की समस्याएँ

मित्रों,इन दिनों भारत देश की राजनीति अजीबोगरीब स्थिति से गुजर रही है। पूरा का पूरा विपक्ष एकजुट होकर किसान नाम केवलम् का जाप कर रहा है और केंद्र सरकार पर किसान विरोधी होने के आरोप लगा रहा है। जबकि वास्तविकता यह है कि आप जो पार्टियाँ विपक्ष में हैं यह उनकी ही करनी का परिणाम है कि आज किसानों को जीवन जीना कठिन और मौत को गले लगा लेना आसान लगने लगा है। आज खेती-किसानों की जो हालत है वह आज अचानक पैदा नहीं हुई बल्कि आजादी के बाद से ही धीरे-धीरे पैदा हुई,पिछले 60 सालों में पैदा हुई। केंद्र सरकार कह रही है और संसद में कह रही है कि विपक्ष हमें सुझाव दे,हम उस पर विचार करेंगे लेकिन विपक्ष सुझाव देने के बदले केंद्र के खिलाफ सिर्फ नारेबाजी किए जा रही है।
मित्रों,सवाल उठता है कि शोर-शराबे,नारेबाजी और बकवास भाषणबाजी करने से ही क्या किसानों का भला हो जाएगा? आज अमेरिका में 2 फीसदी जनसंख्या खेती-किसानी पर निर्भर है तो वहीं भारत में 65 फीसदी। आजादी के 70 साल बाद भी ये आँकड़े क्यों नहीं बदले? क्यों जो खेती आजादी के समय सबसे उत्तम व्यवसाय मानी जाती थी आज मजबूरी का पर्यायवाची बन गई है? इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं? आजादी के बाद कौन लोग और दल सत्ता में रहे? किसानों की दुरावस्था के लिए किन पार्टियों और नेताओं की नीतियाँ जिम्मेदार हैं?
मित्रों,राजनीति तो इस बात को लेकर होनी चाहिए कि किसानों की समस्याएँ क्या हैं और उनका समाधान क्या हो सकता है? लेकिन राजनीति हो रही है कि कैसे किसानों की समस्याएँ जस-की-तस बनी रहें और कैसे किसानों को बरगलाकर,उनके हितैषी होने का दिखावा करके उनके वोट प्राप्त किए जाएँ। कोई जंतर-मंतर पर किसान से फाँसी लगवाकर तालियाँ बजा रहा है तो कोई पूर्व में देश को बेचने में सबसे आगे रह चुका नेता जेनरल बोगी में यात्रा करके खुद को किसानों का सच्चा हमदर्द साबित करने में लगा हुआ है। लेकिन इस बात पर कोई भी विपक्षी दल विचार नहीं कर रहा कि किसानों की असल या मौलिक समस्याएँ क्या हैं और उनका समाधान क्या हो सकता है। तो क्या सिर्फ कोरी नारेबाजी और घड़ियाली आँसू बहानेभर से किसानों का भला हो जाएगा? हमें इस बात पर भी विचार करना होगा कि पिछले 60 सालों में जनसंख्या बढ़ने से किसानों के पास प्रति परिवार जोत का आकार काफी कम हो गया है,इतना कम कि उतनी जमीन से एक परिवार का पेट नहीं भरा जा सकता। राहुल गांधी कहते हैं कि भविष्य में कृषि-भूमि का मूल्य सोने का बराबर हो जाएगा। अगर ऐसा भविष्य में हो सकता है तो अब तक क्यों नहीं हुआ? क्यों 4 गुना 5 फीट की 'लोहे' की दुकान में बैठा आदमी 'सोना' हो गया और 5 बीघा सुनहरी फसलों में खड़ा किसान 'मिट्ठी' हो गया?
मित्रों,भारत के सामने इस समय दो ही रास्ते हैं। पहला यथास्थितिवाद का रास्ता है कि जैसी हालत है वैसी ही बनी रहे और दूसरा रास्ता है विकास का कि खेती पर से कैसे जनसंख्या का भार कम किया जाए। कैसे भारत को दुनिया की फैक्ट्री बनाया जाए,कैसे भारत के युवाओं को रोजगार मिले,कैसे किसानों के युवा पुत्रों को योग्यतानुसार काम मिले,कैसे खेती को लाभकारी व्यवसाय में बदला जाए,कैसे सरकार और राजनीतिज्ञों के प्रति किसानों के मन में विश्वास पैदा किया जाए जिससे वे आत्महत्या के मार्ग पर न जाएँ।
मित्रों,केंद्र सरकार सुझाव मांग रही है और पूरा भरोसा भी दे रही है कि वह विपक्ष के सुझावों पर अमल करेगी लेकिन विपक्ष है कि चाहती ही नहीं कि किसानों का भला हो,किसानी का भला हो। अच्छा होता कि विपक्ष सरकार के साथ बैठकर इस बात पर विचार करती कि अतीत में जो भी सरकारें सत्ता में रही हैं उनकी कृषि-नीतियों में कहाँ-कहाँ, कौन-कौन-सी गलतियाँ हुईं और उनका परिमार्जन किस तरह से इस प्रकार किया जाए कि कृषि फिर उत्तम खेती हो जाए,सबसे ज्यादा लाभकारी व्यवसाय हो जाए। आजादी के सत्तर साल बाद भी किसान क्यों सिंचाई के लिए बरसात पर निर्भर है? इस दिशा में केंद्र की प्रधानमंत्री सिंचाई योजना किस तरह से फायदेमंद हो सकती है या फिर इस योजना में कौन-कौन से सुधार किए जाने की आवश्यकता है? पानी का ज्यादा-से-ज्यादा संरक्षण कैसे संभव हो जिससे कि जरुरत के दिनों में पानी की कमी नहीं हो? कृषि की ऐसी कौन-सी विधियाँ हैं जिससे कम पानी में ज्यादा पैदावार प्राप्त हो सकती हैं? गांव-गांव में कृषि-आधारित उद्योगों की स्थापना कैसे हो? मृदा का संरक्षण कैसे हो और केंद्र सरकार की स्वायल हेल्थ कार्ड योजना इस दिशा में किस तरह लाभकारी सिद्ध हो सकती है? आदि-आदि। लेकिन विपक्ष सरकार के साथ खेती-किसानी की समस्याओं के समाधान में सहयोग करने की बात तो दूर ही रही साथ बैठकर समस्या पर विचार तक करने को तैयार नहीं है।
मित्रों,अगर आपने कजरारे-कजरारे वाली 'बंटी और बबली' फिल्म देखी होगी तो आपको याद होगा कि उसके एक दृश्य में बंटी अभिषेक बच्चन ताजमहल का सौदा करके एक विदेशी जोड़े को ठगता है। वो कुछ भाड़े के नेता टाईप लोगों को कुछ पैसे देता है और असली मंत्री की कार के आगे उनसे नारेबाजी करवा देता है। भाड़े के नेता नारेबाजी करते हैं कि हमारी मांगें पूरी हों चाहे जो मजबूरी हो। मंत्री कार से उतरकर पूछती है कि आपकी मांगें क्या हैं तो वे मांग नहीं बताते बल्कि वही नारा दोहराते रहते हैं कि हमारी मांगें पूरी हो चाहे जो मजबूरी है। इस बीच बंटी बबली रानी मुखर्जी को मंत्री बनाकर मंत्रालय में बैठा देता है और विदेशी जोड़े से मोटी रकम हासिल करके फरार हो जाता है।
मित्रों,कुछ ऐसा ही भाड़े के नेताओं जैसा काम इन दिनों विपक्ष कर रहा है। केंद्र सरकार कह रही है कि आपकी क्या मांगें हैं और उनका क्या समाधान हो सकता है पर आईए मिल-बैठकर विचार करते हैं लेकिन विपक्ष कुछ भी नहीं सुन रहा है और लगातार सिर्फ नारेबाजी करता जा रहा है। दरअसल विपक्ष भी बंटी और बबली फिल्म के नारेबाजों की तरह समस्या का समाधान नहीं चाहता बल्कि सरकार का मार्ग अवरूद्ध करना चाहता है,विपक्ष चाहता है कि सरकार काम नहीं कर पाए,देश का विकास नहीं कर पाए जिससे फिर से सत्ता पर उनका कब्जा हो सके,बस।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित