रविवार, 20 मई 2018

साई बाबा पर विवाद क्यों?

मित्रों, पिछले कई सालों से मैं देख रहा हूँ कि हमारे देश में दशकों पहले स्वर्ग सिधार चुके महापुरुषों के चरित्रहनन का अभियान-सा चल पड़ा है. कभी गाँधी, कभी नेहरू, कभी अकबर तो कभी चिश्ती हद तो यह है कि छिद्रान्वेषियों ने साई बाबा तक को नहीं छोड़ा है.
मित्रों, मैं दिन-रात सिर्फ विषवमन करनेवाले नितांत नकारात्मक सोंच रखनेवाले लोगों से पूछना चाहता हूँ कि साई बाबा की पूजा हो रही है तो इससे हिंदुत्व और मानवता को क्या नुकसान हो रहा है? क्या साई भक्त देश में कहीं भी किसी अनैतिक गतिविधि में संलिप्त पाए गए हैं? क्या वे जेहादियों की तरह आतंक फैला रहे हैं?
मित्रों, इसके उलट मैं देखता हूँ कि साई भक्त हर जगह मानवता की सेवा में लगे हैं. कहीं भंडारा हो रहा है तो कहीं अस्पताल चल रहा है कहीं रक्तदान शिविर का आयोजन हो रहा है फिर साई का विरोध क्यों?
मित्रों, मैं नहीं जानता और जानना भी नहीं चाहता कि साई जन्मना हिन्दू थे या मुसलमान। मैं तो बस यह जानना चाहता हूँ और इसे ही पर्याप्त समझता हूँ कि साई के उपदेश क्या थे और सबसे बढ़कर कि साई के कर्म क्या थे?
मित्रों, सदियों पहले तुलसी बाबा कह गए हैं कि कर्म प्रधान विश्व करि राखा फिर जन्म की बात कहाँ से उठने लगी और वो भी २१वीं सदी में. मैं समझता हूँ कि इस तरह के सवाल हमारे विवेक पर सवाल उठाते हैं. और सवाल उठाते हैं हमारी आधुनिकता पर.
मित्रों, जहाँ तक मेरा मानना है और मैं मानता हूँ कि आपका भी यही मानना होगा कि जन्म और जाति का आज के ज़माने में कोई महत्व नहीं होना चाहिए। हजारों सालों से रावण ब्राह्मण होकर भी निंदनीय है और हनुमान बन्दर होकर भी परम पूज्य। आखिर क्यों? मैं यह भी मानता हूँ कि हमें अकबर, गाँधी या नेहरू की सिर्फ कमियों को नहीं देखना चाहिए बल्कि उनकी अच्छाइयों को भी मद्देनजर रखना चाहिए. इसी तरह से जो लोग वीर सावरकर और आरएसएस को दिन-रात गालियाँ देते रहते हैं और यही जिनका पुश्तैनी धंधा बन चुका है मैं उनसे भी अपेक्षा रखता हूँ कि सावरकर के योगदान की भी कभी चर्चा कर लें. इसी तरह मैंने देखा है कि कहीं भी कोई दुर्घटना हो जाए या प्राकृतिक आपदा आ जाए तो आपदा विभाग के सक्रिय होने से काफी पहले और सबसे पहले आरएसएस वाले ही वहाँ पहुँचते हैं. क्यों कांग्रेस सेवा दल वाले उन स्थलों पर दिखाई नहीं देते?
मित्रों, बहुत से महापुरुषों में कुछ मानवोचित कमियाँ थीं लेकिन साई में तो कोई कमी थी ही नहीं इसलिए मैं समझता हूँ कि इस तरह के प्रयास तत्काल बंद होने चाहिए. इस तरह के प्रयासों की जितनी भी निंदा की जाए कम है. वैसे सूरज पर थूकने से जिन लोगों को संतोष मिलता है उनको मैं दूर से ही नमस्कार करना चाहूंगा क्योंकि
उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये, पयःपानः हि भुजङ्गानाम केवलं विषवर्द्धनं। 

कर्नाटक का नाटक

मित्रों, पता नहीं आज हमारे तपोधर्मी संविधाननिर्माताओं की आत्माएँ हमसे कितनी शर्मिंदा होगी! हमने उनके बनाए संविधान को पूरी तरह से बेमानी जो साबित कर दिया है. यह हमारा दुर्भाग्य है कि शासन के तीनों ही भाग व्यवस्थापिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका अपनी-अपनी मनमानी पर इस बेशर्मी से उतारू हैं कि नैतिकता, गरिमा और मर्यादा जैसे महान शब्द अर्थहीन हो चुके हैं. द्रौपदी का चीरहरण तो एक बार हुआ था संविधान का तो रोजाना हो रहा है और सबसे घृणास्पद तो यह है कि इसमें न सिर्फ पांडव बल्कि भीष्म और विदुर भी शामिल हो गए हैं. मोदी सरकार को लगता है कि चूंकि कांग्रेस ने गलत किया था इसलिए उसकी गलती सही मान ली जाएगी। अगर ऐसा होता तो कांग्रेस आज ४०४ से ४४ पर नहीं आ गयी होती. जनता ने उसे गलत माना और दण्डित किया. भाजपा गलत करेगी तो उसके साथ भी निश्चित रूप से वही होगा।
मित्रों, यह सर्वविदित है कि सत्ता का गन्दा खेल भारत में कॉंग्रेस ने ही शुरू किया था. जिस तरह बिना पानी के मछली जीवित नहीं रह सकती उसी तरह कांग्रेस को भी विपक्ष की राजनीति रास नहीं आती है. क्योंकि विपक्ष की राजनीति संघर्ष और त्याग का मार्ग है और चूँकि कांग्रेस देश की आजादी के भी पहले से ही लगातार सत्ता में रही इसलिए संघर्ष उसके स्वाभाव में ही नहीं है. कदाचित इसलिए अपनी सरकार के खिलाफ जनादेश होने के बावजूद वो उसी दल के साथ मिलकर सरकार बनाने जा रही है जिसके विरुद्ध उसने चुनाव के दौरान जमकर विषवमन किया था. कांग्रेस की इसी तरह की धोखेबाजी की राजनीति हमने लालू के दौर में बिहार में न सिर्फ देखा है बल्कि भोगा भी है. हर चुनाव से पहले कांग्रेस लालू से अलग हो जाती थी. जमकर आरोप-प्रत्यारोप चलते। चुनाव को हर बार बहुकोणीय बनाकर लालू की जीत सुनिश्चित करती और चुनावों के बाद सरकार में शामिल हो जाती. हालाँकि इस तरह कांग्रेस लम्बे समय तक भाजपा को सत्ता से दूर रहने में कामयाब भी हुई लेकिन धीरे-धीरे उसका जनाधार घटता रहा और आज कांग्रेस बिहार में लगभग समाप्त हो चुकी है.
मित्रों, जो लोग आज कर्नाटक में साझा सरकार के गठन को कांग्रेस की जीत मान रहे हैं वे मेरी इस बात को गाँठ बांधकर रख लें कि कांग्रेस का यह कदम भविष्य में आत्मघाती सिद्ध होगा और उसकी हालत वहां भी बिहार जैसी हो जाएगी.
मित्रों,जहाँ तक कर्नाटक में भाजपा की रणनीति का सवाल है  तो  मैं यह मानता हूँ कि उसने सरकार गठित करके ठीक किया. वो सबसे बड़ी पार्टी थी इसलिए उसके लिए जनता में यह सन्देश देना आवश्यक था कि हम तो आपकी सेवा करना चाहते थे लेकिन कमी आपकी तरफ से ही रह गई. पता नहीं उन अफवाहों में कितनी सच्चाई थी कि भाजपा विधायकों की खरीद-फरोख्त में लगी है. क्योंकि कल जो कुछ हुआ उससे तो ऐसा लगता है कि उन अफवाहों में कोई सच्चाई थी ही नहीं.
मित्रों, हम यह नहीं कहते कि वाजपेयी के नक्शेकदम पर चलने से येदुरप्पा अचानक वाजपेयी हो गए हैं क्योंकि वाजपेयी आदर्श थे जैसे रामराज्य आदर्श है. यद्यपि किसी भी आदर्श को पूरी तरह से प्राप्त करना असंभव होता है तथापि उस दिशा में प्रयासरत होना ही बड़ी बात है वो भी चौतरफा पतन के इस विडंबनाओं, संत्रास और प्रच्छन्नताओं के युग में. भले ही वो आदर्श महज दिखावा हो और ज़माने को दिखाने के लिए हो. 

रविवार, 8 अप्रैल 2018

मेरा देश जल रहा है

मित्रों, बात पुरानी है. यही कोई ११ साल पुरानी. तब हम माखनलाल के नोएडा परिसर में पढ़ते थे. जनमत चैनल के एक कार्यक्रम में तेलंगाना राष्ट्र समिति के चंद्रशेखर राव जी आए हुए थे. तब हमने उनसे पूछा था कि आपकी पार्टी के नाम में राष्ट्र क्यों लगा हुआ है? क्या आपलोग भी भविष्य में अलग राष्ट्र की मांग करनेवाले हैं? तब उन्होंने कहा था कि तेलुगु में राज्य को ही राष्ट्र कहा जाता है इसलिए यहाँ पर राष्ट्र शब्द है.
मित्रों, अभी हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता से मिलने का अवसर मिला तो उनसे भी हमने यही सवाल किया कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब क्या है. मैं हैरान था कि उनके लिए राष्ट्र का अर्थ हिन्दू राष्ट्र था और देश का मतलब सरकार था. देश अलग और राष्ट्र अलग. साम्यवादियों और कांग्रेसियों ने भी इसी तरह से राष्ट्र की अलग-अलग परिभाषा बना रखी है. हद हो गई! राष्ट्र न हुआ ब्रह्म हो गया. जितने संगठन उतनी व्याख्याएँ।
मित्रों, मैं राष्ट्रवादी नहीं राष्ट्रप्रेमी हूँ. इसलिए मेरे लिए मेरा राष्ट्र किसी भी तरह से संकुचित अर्थ नहीं रखता. जाहिर है कि मेरे लिए राष्ट्रवाद का अर्थ काफी व्यापक है. मेरा राष्ट्रवाद धर्मवाद नहीं है. यह भगत सिंह, तिलक, लाला लाजपत राय, गाँधी का राष्ट्रवाद है तो अशफाकुल्ला खान, अजीमुल्ला खान, मज़हरुल हक़ का राष्ट्रवाद भी है. इसमें अगर तुलसी,सूर के लिए जगह है तो खुसरो, जायसी, रहीम और रसखान के लिए भी है, अटल जी के लिए है तो नेहरू जी के लिए भी है, मैथिलीशरण गुप्त के लिए स्थान है तो ग़ालिब के लिए भी है, प्रताप के लिए है तो इब्राहिम गार्दी के लिए भी है, प्रेमचंद के लिए है तो मंटो के लिए भी है. मेरे लिए राष्ट्रवाद भारतमाता से निःस्वार्थ भाव से प्रेम करने का नाम  है.
मित्रों, इन दिनों देश की हालत देखकर मेरा राष्ट्रवाद बुरी तरह से आहत है. चार साल पहले भाजपा द्वारा नारा दिया गया था कि मेरा देश बदल रहा है, आगे चल रहा है. आजकल यह नारा पूरे परिदृश्य से गायब है. शायद इसलिए क्योंकि न तो देश बदल रहा है और न ही किसी मामले में आगे ही नहीं चल रहा है. हाँ, मेरा देश जल जरूर रहा है.  सबसे दुःखद तथ्य तो यह है कि दंगे हो नहीं रहे करवाए जा रहे हैं. इसी आश्विन महीने की बात है. महानवमी की रात हाजीपुर के मड़ई चौक पर दुर्गा पूजा पंडाल में दो हिन्दू युवकों के बीच झगड़ा हो गया. मुझे आश्चर्य तो तब हुआ जब हिन्दू युवा वाहिनी ने यह अफवाह उड़ाकर कि मुसलमानों ने हिन्दू युवक को पंडाल में घुसकर मारा हिन्दू-मुसलमान का मुद्दा बना दिया. कल होकर मुहर्रम था. जाहिर है कि हिन्दू उबल उठे और शहर में मुहर्रम का जुलूस नहीं निकल पाया. मैं हतप्रभ था कि क्या हो रहा है. अभी कुछ दिनों पहले ही बिहार के नवादा में रात में किसी ने हनुमान जी की मूर्ती तोड़ दी. तोड़नेवाला कौन था किसी ने भी नहीं देखा लेकिन मुसलमानों  पर हमला शुरू हो गया. भागलपुर के दंगों में तो केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे का बेटा जेल में है. इसी तरह से पश्चिम बंगाल के आसनसोल में भी दंगे तब शुरू हुए जब स्थानीय मौलवी के बेटे की अपहरण के बाद बेरहमी से हत्या कर दी गई. रही-सही कसर मायावती ने २ अप्रैल को बंद आयोजित करके पूरी कर दी और पहले से जल रहे देश को एक बार फिर से धधकती हुई आग में झोंक दिया. मेरा दिल-दिमाग यह देखकर जल रहा कि कोई दल सद्भावना की बात नहीं कर रहा. सारे नेता देश को जलाकर जलती हुई आग में राजनीति की रोटी सेंकने की फ़िराक में हैं. क्या इस तरह से मेरा देश आगे बढ़ेगा? इस तरह से तो मेरा देश आगे बढ़ने से रहा जल जरूर जाएगा.
मित्रों, मेरा राष्ट्रवाद इन दिनों एक शोध से सामने आई सच्चाई से भी आहत है. यह शोध किया है किंग्स कॉलेज लंदन के विद्यार्थियों ने और पता लगाया है कि भारत की जनता किस आधार पर मतदान करती है. आश्चर्य की बात है कि शराब और पैसे लेकर तो वोट दिए ही जा रहे हैं एक किलोग्राम सब्जी लेकर भी मतदान किया जा रहा है. जब तक राष्ट्र और राष्ट्रहित मतदाताओं की पहली प्राथमिकता नहीं बनेगा मैं डंके की चोट पर कहता हूँ कि भारत कदापि विश्वगुरु नहीं बन सकता. वास्तविकता तो यह है कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा के हाथों हम इसलिए ठगे जाते हैं क्योंकि हम निहायत स्वार्थी और लालची हैं. और याद रखिए मित्रों लोकतंत्र में राजतन्त्र की तरह यथा राजा तथा प्रजा नहीं चलता बल्कि यथा प्रजा तथा राजा चलता है. चर्चिल आई सैल्यूट यू टुडे, तुम ही सही थे, आजादी के ७५ साल बाद भी हम लोकतंत्र के लायक नहीं हुए हैं!!!

रविवार, 25 मार्च 2018

न मैं सोऊंगा और न सोने दूंगा

मित्रों, यकीन मानिए मैं भी बाबा नागार्जुन की तरह एक कविता ही लिखना चाहता था मोदी जी सच-सच बताना........................। लेकिन क्या करूँ घंटों बीत गए शीर्षक से आगे नहीं बढ़ पाया. हाँ मेरी मेहनत में कोई कमी नहीं थी. ठीक उसी तरह से जैसे हमारे प्रधानमंत्री जी की मेहनत में कोई कमी नहीं है. बेचारे पता नहीं रात में सोते भी हैं या नहीं? पहरेदार का काम होता ही बड़ा कठिन है. दिन-रात जगे रहिए भले ही चोरी को नहीं रोकिए लेकिन इससे मेहनत तो कम नहीं हो जाती!
मित्रों, नाराज न होईए क्योंकि मैं तबसे मित्रों लिख रहा हूँ जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. तो मैं कह रहा था कि मित्रों, अभी देश में हो क्या रहा है. अब कोई नहीं कह रहा कि मैं विकास हूँ, मैं मोदी हूँ या मैं भारत हूँ. बल्कि भावनात्मक मुद्दे उछाले जा रहे हैं. एक बार फिर से हमें मुसलमानों के नाम पर डराया जा रहा है कि मुसलमान ज्यादा हो गए तो ये होगा और वो होगा. मैं मोदी और योगी सरकार से पूछना चाहता हूँ कि क्या वो एक भी मुसलमान को भारत से बाहर भेज सकती है? भारतीय मुसलमानों की तो छोड़िए क्या वो एक भी बांग्लादेशी या हाल में भारत में घुस आए रोहिंग्या घुसपैठियों को अब तक भारत से निकाल-बाहर कर सकी है? अगर नहीं, तो फिर फालतू का शोर-शराबा क्यों? अरे भाई आप जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून बनाईए किसने रोका है? आप मदरसों पर नियंत्रण करिए किसने रोका है? लेकिन आप ये सब नहीं कर रहे. कोशिश तक नहीं कर रहे. इससे सम्बद्ध कोई विधेयक आपने पेश नहीं किया.
मित्रों, फिर आपने किया क्या? आपने देश को क्रॉनिक कैपिटलिज्म के और गरीबों को मौत के मुंह में धकेल दिया. सरकारी बैंकों की क्या दशा कर दी है आपने? बैंक नए खाते नहीं खोल रहे और कहते हैं कि सरकार ने रोक दिया है. फिर लोग पैसे रखेंगे कहाँ? मैंने नई नौकरी पकड़ी है मुझे कैसे वेतन मिलेगा? अगर आधार से लिंक्ड सिर्फ एक ही खाता होगा तब तो हजारों खाते बंद हो जाएंगे और सरकारी बैंकों का भट्ठा बैठ जाएगा. फिर आप उसका निजीकरण कर देंगे. इसी तरह से आपकी सरकार में पीएसयूज की हालत ख़राब है और जानबूझकर हालत ख़राब की गई है. बाँकी एयरलाइन्स मजे में हैं लेकिन एयर इंडिया क्रैश लैंडिंग की स्थिति में है क्यों? जिओ जी रहा है लेकिन बीएसएनएल मर रहा है क्यों?
मित्रों, क्या इसी को कहते हैं देश का बदलना? सचमुच बदल ही तो रहा है मेरा देश. क्रॉनिक कैपिटलिज्म की बदौलत अमेरिका बन रहा है मेरा देश. गरीब और गरीब और अमीर और अमीर हो रहे हैं. अब कुछ भी सरकारी नहीं रहेगा और हमारा जीवन अमीरों की रहमो करम पर होगा. हर चीज रेल, डाक, फोन, सड़क, बिजली, पानी, जंगल, हवा, बैंक, जमीन सब पर अमीरों का अधिकार होगा. तो फिर हम क्या करेंगे? पकौड़े तलेंगे और क्या? खैर, खुदा खैर करे. तो मैं कह रहा था कि मैं इस बार तो यह कविता नहीं लिख पाया लेकिन लिखूंगा जरूर. यकीन मानिए हमारे बैंक खातों में १५ लाख आने से पहले लिख लूँगा. चाहे इसके लिए मुझे मोदी जी की तरह २४ घंटे जागना क्यों न पड़े. तब तक आप भी जागते रहो और लोगों को भी जगाते रहो. ख़बरदार जो किसी ने सोने की हिम्मत की. न मैं सोऊंगा और न सोने दूंगा.

रविवार, 11 मार्च 2018

मोदी की कथनी और करनी

मित्रों,पिछले ४ सालों से भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार है. सत्ता संभालने से पहले और संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने खूब बोला है-हम यह करेंगे और वह करेंगे. मोदी जी से ज्यादा शायद ही कोई इंसान ने इस दौरान बोला हो रेडियो ने बोला हो तो बोला हो. मगर सवाल उठता है कि क्या मोदी ने इस दौरान वही किया है जो उन्होंने बोला है? पहले कुछ मुद्दों पर उनकी कथनी और करनी का विश्लेषण कर लेते हैं.

१. मित्रों,मोदीजी ने कहा था कि उनकी सरकार हर साल २ करोड़ रोजगार पैदा करेगी। लेकिन हुआ इसका उल्टा। आज रोजगार-निर्माण की हालत पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार से भी ख़राब है और मोदी लोगों से पकौड़ा तलने को बोल रहे हैं.
२. मोदी जी कहते हैं कि वे कोई भी काम चुनाव को ध्यान में रखकर नहीं करते लेकिन वास्तविकता तो यह है कि उनका प्रत्येक काम सिर्फ और सिर्फ चुनाव को ध्यान में रखकर किया जा रहा है. आज उन्होंने महिला दिवस राजस्थान में मनाया क्योंकि वहां चुनाव होना है.
३. मोदी जी ने नारा दिया था नेशन फर्स्ट। आश्चर्य है कि आजकल वे इस नारे का जिक्र तक नहीं करते। असलियत तो यह है कि अब उनके लिए चुनाव फर्स्ट और लास्ट हो गया है. सरकार ने जानबूझकर एयर इंडिया को बर्बाद करके रख दिया है और शायद अगली बारी बीएसएनएल की है. इसके साथ ही सरकारी बैंकों को बर्बाद किया जा रहा है. आज रेलवे की साख भी रसातल में है. यह सरकार ट्रेनों को चला काम रही है रद्द ज्यादा कर रही है.
४. मोदी जी ने २०१४ में कहा था कि उनकी पार्टी अपने गठबंधन सहयोगियों के प्रति अच्छा व्यवहार करेगी लेकिन उनका रवैया यूज एंड थ्रो का है.
५. मोदी सरकार ने पत्रकारों की पीएमओ में नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाला था जिसको अब कई साल बीत गए हैं लेकिन आज तक हुआ कुछ नहीं है.
६. मोदी जी ने भ्रष्टाचार के ऊपर मरणांतक प्रहार करने का वादा किया था लेकिन आज तक उसने लोकपाल की नियुक्ति नहीं की और रोज इससे बचने के लिए नए-नए बहाने बना रही है. यह सरकार भी सीबीआई का इस्तेमाल अपने लोगों को बचाने और विपक्षियों को डराने के लिए कर रही है.
७. मोदी जी ने कहा था कि गरीबों का पैसा सीधे उसके खाते में जाएगा लेकिन आज वही खाता उनके लिए गले की फ़ांस बन चुका है क्योंकि बैंक न्यूनतम शेष राशि के नाम पर उनके सारे पैसे चट कर जा रहा है.
८. मोदी जी ने कहा था कि वे १०० दिनों में विदेशों से कालाधन वापस लाएंगे लेकिन एक पैसा वापस नहीं आया. हाँ, कोशिश करने का नाटक जरूर किया गया.
९. मोदी जी ने कहा था कि वे पाकिस्तान से बातचीत नहीं करेंगे और चीन से भी उसी की भाषा में बात करेंगे लेकिन इस समय गुपचुप तरीके से पाकिस्तान से एनएसए स्तर की बातचीत चल रही है और चीन को खुश करने के लिए दलाई लामा पर प्रतिबन्ध लगाना शुरू कर दिया है.
१०. मोदी जी को कभी गंगा माँ ने बुलाया था लेकिन गंगा आज भी उतनी ही मैली है जितनी २०१४ में थी.
११. मोदी जी ने वादा किया था कि वो सालभर में दागी सांसदों और विधायकों पर मुकदमा चलाकर सजा दिलवाएंगे लेकिन किया इसका उल्टा। दूसरे दलों से दागियों को धड़ल्ले से भाजपा में आयातित किया गया और किया जा रहा है.
१२. मोदी जी कहते हैं कि उनकी सरकार ने पद्म पुरस्कारों की गरिमा पुनस्थापित की लेकिन सवाल उठता है कि शरद पवार को पुरस्कार क्यों किया? इसी तरह से सारे सरकारी पद ठीक मंत्री पद की तरह अयोग्य लोगों के बीच बाँट दिया गया. इनके राज्यपाल भी पिछली सरकार की तरह यौनापराधों में संलिप्त पाए जा रहे हैं.
१३. मोदी जी ने कहा था कि वे भारत से वीआईपी संस्कृति को समाप्त कर देंगे लेकिन हालत यह है कि बीएसएफ के एक जवान का वेतन सिर्फ इसलिए काट लिया गया क्योंकि उसने मोदी के नाम में श्री नहीं लगाया था.
१४. चुनावों के समय मोदी हर राज्य को या तो विशेष दर्जा या विशेष पैकेज देने का वादा कर देते हैं और बाद में भूल जाते हैं. अभी ऐसे ही वादे के लिए उनका चंद्रबाबू नायडू से विवाद चल रह है.
कहने का तात्पर्य यह है कि जहाँ राउडी राठौर फिल्म में अक्षय कुमार ने कहा था कि मैं जो बोलता हूँ वो मैं करता हूँ और मैं जो नहीं बोलता, वो मैं डेफिनेटली करता हूँ वहीँ मोदी के बारे यह कहा जा सकता है कि वे जो बोलते हैं डेफिनेटली उसका उल्टा करते हैं.

नरेंद्र मोदी की कृत्रिम बुद्धि


मित्रों,आपको याद होगा कि पिछले साल राहुल गाँधी जी ने अमेरिका जाकर अपना पहले भाषण दिया था. यह उनका अमेरिका में पहला भाषण था. तब मुझे बड़ी हंसी आई थी क्योंकि उनकी वक्तृता का विषय था कृत्रिम बुद्धि. लेकिन आज २५ फरवरी, २०१८ को मैं फिर से हँसते-२ रोने को विवश हूँ. आज हमारे कथित प्रधान सेवक जी ने अपने मन की बात में कृत्रिम बुद्धि के महत्व पर बोला है. इससे पहले भी वे कुछ दिन पहले किसी कार्यक्रम में कृत्रिम बुद्धि का महिमामंडन कर चुके हैं.

मित्रों,यह विडंबना है कि हमारे लगभग सारे राजनेता भारत को अमेरिका बनाने की बात करते हैं. क्यों करते हैं पता नहीं जबकि अमेरिका और भारत के हालात में कोई तुलना ही नहीं है. जहाँ अमेरिका में बेरोजगारों की कमी है वहीँ भारत में रोजगारों की कमी है. अमेरिका में इंसानों की कमी को कृत्रिम बुद्धि से युक्त मशीनों से पूरी करना मजबूरी है लेकिन जिस भारत में जहाँ आज भी एक किलोग्राम चावल चुराने पर एक भूखे को पीट-२ कर मार डाला जाता हो उस भारत में कृत्रिम बुद्धि के प्रति प्रधानमंत्री के प्रेम को सिर्फ दीवानगी ही कहा जा सकता है.


मित्रों,क्या योजना बनाई है भारत प्राइवेट लिमिटेड के वर्तमान सीईओ नरेन्द्र मोदी जी ने? जबरदस्त, मुंहतोड़. इन्सान पकौड़े तलेंगे और देश चलाएंगी मशीनें. स्टेशनों पर टिकट मशीन काटेगी मशीन, मशीन बुलेट ट्रेन चलाएगी और मशीन ही उसमें यात्रा करेगी, मशीन ही हवाई जहाज उड़ाएगी और मशीन ही हवाई चप्पल पहन कर उनमें उड़ान भरेंगी, होटलों में खाना मशीन पहुंचाएगी, खेती करेगी और कराएगी मशीनें, सीमा पर गोली मशीन चलाएगी, इंडियन रेलवे और मेट्रो निगमों की ट्रेनें मशीन चलाएगी, मशीन बताएगी कि मंदी कैसे दूर होगी, मशीन बताएगी कि नीरव मोदी कैसे भारत वापस आएगा और मशीन ही उसे वापस भी लाएगी. भविष्य में मोदी मंत्रिमंडल में सिर्फ प्रधानमंत्री इन्सान होंगे बांकी सारे विभाग मशीनें संभालेंगी आखिर वे खुद में स्वतः सुधार करना जो सीख गई हैं, सेल्फ इंटेलिजेंस का गुण आ गया है उनमें.


मित्रों,इस तरह भारत सरकार जो पैसे बचाएगी उसको बराबर-बराबर जनता के खाते में डाल दिया जाएगा. पहले १५ पैसा से शुरू करके अंत में १५ लाख. जैसे कि अभी-अभी सिंगापुर की सरकार ने अपने देशवासियों के खातों में डाला है. लेकिन तब तक हमको-आपको पकौड़े बेचकर, खाकर, खरीदकर जिंदा रहना पड़ेगा.


मित्रों,अच्छा हुआ कि नेहरु-शास्त्री ने भारत को अमेरिका बनाने का सपना नहीं देखा और भारत की भुखमरी-गरीबी और बेरोजगारी को ध्यान में रखा नहीं तो हम भारतवासी नहीं होते भारत की नागरिक होती सिर्फ मशीनें. सऊदी अरब ने तो एक रोबोट को अपने देश की नागरिकता दे भी दी है. वैसे हमें इस बात की ख़ुशी है कि कम-से-कम इस एक मुद्दे पर तो भारत के पक्ष-विपक्ष के बीच आम सहमति है. अंत में हम आपको बता दें कि बोला तो पीएम ने गोबर पर भी है लेकिन उस पर आम सहमति नहीं है गोबर विशेषतया गाय का गोबर सांप्रदायिक पदार्थ जो है.

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

कर्नाटक का अलग झंडा और मूर्तिभंजन की घटनाएं

मित्रों, यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि हमारे देश की राजनीतिक पार्टियां सत्ता के लिए क्या कुछ नहीं कर सकती. दुर्भाग्यवश इस मामले में हमारे देश में कोई भी पार्टी विथ डिफरेंस नहीं है. चूँकि कुछ ही दिन बाद कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होनेवाला है इसलिए वहां के दल एक से एक गन्दा खेल खेलने में लगे हुए हैं.
मित्रों, सारी हदों को तोड़ते हुए कल कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने राज्य के लिए एक अलग झंडे की घोषणा कर दी है. यहाँ हम आपको बता दें पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने भी अपने समय में राज्य के लिए एक अलग झंडे की घोषणा की थी लेकिन आलोचना होने के बाद उसे वापस ले लिया था.
मित्रों, सवाल उठता है कि जब देश एक है, एक संविधान है और राष्ट्रीय ध्वज भी एक है फिर कर्नाटक को अलग क्षेत्रीय झंडा क्यों चाहिए? सवाल यह भी उठता है कि यदि राज्य का झंडा अलग होगा तो क्या यह हमारे राष्ट्रिय ध्वज के महत्त्व को कम नहीं करेगा?  क्या ऐसा होने पर लोगों में प्रांतवाद की भावना नहीं बढ़ेगी?  प्रश्न यह भी उठता है कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित कैसे करेगी कि अलग क्षेत्रीय झंडे के बावजूद वहां के नागरिकों की आस्था राष्ट्रीय ध्वज के प्रति पूर्ववत बनी रहे?
मित्रों, हालाँकि इन सवालों का जवाब जानना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह समझना है कि क्षेत्रीय झंडे को महत्त्व देने का मतलब राष्ट्रीय झंडे को अस्वीकृति देना कतई नहीं होता. अमेरिका, जर्मनी तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे संघीय व्यवस्था वाले अनेक देशों में राष्ट्रीय अस्मिता के साथ राज्यों को अलग क्षेत्रीय पहचान बनाए रखने की छूट दी गई है. म्यांमार में तो हर क्षेत्र के अलग झंडे हैं.
मित्रों, इस आधार पर है देखते हैं तो कर्नाटक मांग जायज लगती है लेकिन दूसरी तरफ प्रश्न यह भी उठेंगे कि एक राष्ट्रीय झंडे से राज्य सरकार को परेशानी क्या है? झंडे के प्रति प्रेम और आदर का भाव होना जरूरी है जब, तिरंगे के प्रति सम्मान की भावना नहीं रह पा रही है तो, उस लाल-पीले झंडे के प्रति कैसे रहेगी, जिसे अपनाने के लिए कर्नाटक सरकार संविधान का हवाला तक दे रही है. कर्नाटक के बाद अन्य राज्य भी ऐसी मांग करेंगे. इस तरह देश में क्षेत्रीयता की भावना हावी होती जाएगी और राष्ट्र के तौर पर हम भीतर से खोखले होते जाएंगे.
कहना न होगा इस तरह की विभाजनकारी राजनीति राष्ट्रीय एकता और प्रगति में बाधक साबित होगी.
मित्रों, प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का अपना एक चिन्ह या प्रतीक होता है,जिससे उसकी पहचान बनती है.  राष्ट्रीय ध्वज हर राष्ट्र के गौरव तथा देश की एकता, अखंडता और सम्प्रभुता का प्रतीक भी होता है. राष्ट्रीय ध्वज एक ही तो और उनके प्रति आस्था बनी रहनी चाहिए. वैसे हमें यह भी देखना होगा कि भारत के एकमात्र राज्य जम्मू और कश्मीर जिसका अलग झंडा है में तिरंगे के प्रति प्रेम और आस्था का क्या हाल है.
मित्रों, अंत में मैं भाजपा को पूर्वोत्तर में मिली ऐतिहासिक जीत के लिए बधाई देते हुए देशभर में महापुरुषों के मूर्तिभंजन की घटनाओं की घोर निंदा करता हूँ चाहे वो लेलिन ही क्यों न हो हालाँकि सत्य यह भी है उसके नेतृत्व में रूस में बड़े पैमाने पर नरसंहार की घटनाओं को अंजाम दिया गया था. 

सोमवार, 5 मार्च 2018

भाजपा में कौन ला रहा है कांग्रेस संस्कृति?

मित्रों, यह बहुत अच्छी बात है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भाजपा के कांग्रेसीकरण की चिंता है. अब बिना आग के धुआँ तो उठता नहीं है इसलिए प्रधानमंत्री जी को कुछ तो जरूर ऐसा दिखा होगा जिसने उनको चिंतित कर दिया.
मित्रों, आपने भी इतिहास पढ़ा है और जानते हैं कि पृथ्वीराज ने मोहम्मद गोरी को हराने के बाद उच्चादर्शों का पालन करते हुए जीवनदान दे दिया था लेकिन जब गोरी ने पृथ्वीराज को हराया तब उसने आदर्शवाद का प्रदर्शन नहीं किया बल्कि कमीनापंथी की. पृथ्वीराज को अँधा कर दिया और उसके अन्तःपुर की स्त्रियों के साथ घनघोर अमानुषिक अत्याचार किया जैसा कि पिछले दिनों आईएसआईएस ने यजीदी महिलाओं के साथ किया है.
मित्रों, इसके बाद भी हिन्दू राजे-महाराजे लम्बे समय तक आदर्शवादी बने रहे जिसका लाभ मुस्लिम हमलावरों ने जमकर उठाया. पहली बार महाराणा प्रताप ने इस सच्चाई को समझा और गोरिल्ला या छापामार विधि से युद्ध की शुरुआत की. बाद में शिवाजी, छत्रसाल और गुरु गोविन्द सिंह ने भी इसे अपनाया और मुग़ल साम्राज्य की जड़ें हिला दीं.
मित्रों, कहने का तात्पर्य यह है कि जब आपका सामना निहायत कमीनों से हो तब आप आदर्शवादी नहीं बने रह सकते. कहना न होगा युद्धिष्ठिर को भी धर्म की जीत के लिए छल का सहारा लेना पड़ा था. लेकिन इसके बावजूद वे युद्धिष्ठिर ही बने रहे थे दुर्योधन नहीं बने थे.
मित्रों, हम जानते हैं कि भाजपा का सामना भी दुष्टों से है जिसकी अगुवाई कांग्रेस कर रही है. आज कांग्रेस भ्रष्टाचार, अहंकार, वंशवाद, तुष्टिकरण, चापलूसी का पर्याय बनकर रह गयी है. बहुत-से कांग्रेसी इनदिनों स्वाभाविक तौर पर भाजपा में आ रहे हैं. जाहिर है कि उनके साथ कांग्रेस संस्कृति जिसके लक्षणों का वर्णन हमने पिछली पंक्ति में किया है भी भाजपा में आ रही है. इसके अलावा सत्ता में रहने पर हर दल में स्वतः कई तरह के दोष उत्पन्न हो जाते हैं.
मित्रों, सवाल उठता है कि भाजपा को कांग्रेसीकरण से बचाने की जिम्मेदारी किसके ऊपर है? जाहिर है कि खुद मोदी और शाह पर. बनाना-बिगाड़ना सबकुछ तो उनके हाथों में ही है फिर मोदी जी किससे इस बीमारी से बचने की अपील कर रहे हैं और क्यों?
मित्रों, अभी भारी संख्या में केंद्र सरकार ने रिक्तियों की घोषणा की है. उनमें से लगभग हर विभाग के बारे में पैसे लेकर सीट बेचने की शिकायतें आ रही हैं. एसएससी के खिलाफ तो बच्चों को अनशन तक करना पड़ा है. यही तो है कांग्रेस संस्कृति जिसको समाप्त करने का वादा मोदी जी ने किया था. मोदी जी को यह देखना होगा कि इस तरह के और हर तरह से भ्रष्टाचार का अंत कैसे हो. उनको ऐसा होना चाहिए की भाषा बंद करनी होगी और ऐसा ही होगा की भाषा अपनानी होगी. ऐसी भाषा तो मनमोहन सिंह बोला करते थे और उनको शोभा भी देती थी क्योंकि उनके पास सीमित शक्ति थी और वे कठपुतली मात्र थे लेकिन मोदी जी के साथ तो ऐसा नहीं है फिर वही भाषा क्यों?

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

एक किलो चावल के लिए हत्या

मित्रों, रामचरितमानस में एक प्रसंग है. भक्तराज हनुमान माता सीता की खोज में लंका जाते है. माता सीता से भेंट होने के बाद हनुमान भूख मिटाने के लिए पास के बगीचे से फल तोड़कर खाने लगते हैं. लेकिन उनका ऐसा करना राक्षसों को नागवार गुजरता है. फिर युद्ध होता है और अंततः हनुमान को बंदी बनाकर राक्षसराज रावण के दरबार में पेश किया जाता है. तब हनुमान रावण से पूछते हैं कि उनको किस अपराध में बंदी बनाया गया है. क्योंकि भूख लगने पर भूख मिटाने के लिए की गई चोरी अपराध नहीं होता क्योंकि अपनी जान की रक्षा करना हर प्राणी का कर्त्तव्य होता है.
मित्रों, इसी तरह का एक प्रसंग महाभारत में भी है जब रंतिदेव नामक एक ब्राह्मण का परिवार जो कई दिनों से भूखा होता है एक भिक्षुक की जठराग्नि को बुझाने के लिए अपना भोजन दान कर देता है और खुद दम तोड़ देता है. इसी प्रकार राजा शिवि द्वारा एक कबूतर की प्राणरक्षा के लिए अपना मांस अपने हाथों से काट-काटकर बाज को खिला देने का इसी महाकाव्य का प्रसंग भी हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं.
मित्रों, फिर उसी भारत में अगर किसी भूखे, लाचार गरीब को एक किलो चावल चुराने के चलते बेरहमी से पीट-पीट मनोरंजन के तौर पर मार दिया जाए तो इससे बुरा और क्या होगा. क्या आज के भारत में रामायण काल के राक्षसों का राज है? हाँ, हुज़ूर मैं बात कर रहा हूँ सर्वहारा पार्टी द्वारा शासित केरल में घटी घटना की जहाँ मधु नाम के एक गरीब आदिवासी की हत्या कर उनकी गरीबी और अभाव से भरे जीवन का भी अंत कर दिया गया है. शायद सर्वहारा के पैरोकार दल ने गरीबी मिटाने का यह नया तरीका ढूंढ निकाला है. क्या तरीका है! गजब!! अनोखा!!! जब गरीब ही नहीं रहेंगे तो गरीबी कहाँ से रहेगी, जब भूखे ही नहीं रहेंगे तो भूख कहाँ रहेगी? वैसे आश्चर्य है कि मार्क्स इस तरीके की खोज क्यों और कैसे खोज नहीं पाए?
मित्रों, आश्चर्य तो इस बात को लेकर भी है कि अभी तक किसी भी अतिसंवेदनशील ने अपने पुरस्कार वापस नहीं किए? करेंगे भी कैसे मधु ने कोई गाय की हत्या थोड़े ही की थी? चावल चुरानेवाले तो इन्सान होते ही नहीं हैं इन्सान तो गोहत्या करनेवाले होते हैं, मुम्बई में बम फोड़नेवाले होते हैं. यह बात अलग है कि मुझे आज तक कोई पुरस्कार दिया नहीं गया है वर्ना मैं कब का वापस कर चुका होता शायद तभी जब केरल में पहले आरएसएस प्रचारक की बेवजह नृशंस हत्या हुई थी.
मित्रों, इसी तरह से बंगाल में हिन्दू विद्यालयों पर रोक लगा दी गई है लेकिन फिर भी कोई असहिष्णुता नहीं फैली क्योंकि हिन्दू तो आदमी होते ही नहीं. हद तो यह है कि केंद्र की मोदी सरकार चुपचाप इस तरह की घटनाओं को मूकदर्शक बनी आँखें फाडे देखे जा रही है. क्या यही है उसका रामराज्य? उनके आदर्श राम ने तो सत्ता सँभालते ही घोषणा की थी कि निशिचरहीन करौं महि हथ उठाए पण कीन्ह. राम ने तो हर अन्याय का प्रतिकार किया. जब सत्ता में नहीं थे तब भी रावण जैसे सर्वशक्तिशाली से युद्ध किया. तो क्या आज की भाजपा के लिए राम भी सिर्फ एक वोटबैंक हैं? उनके आदर्शों का उसके लिए कोई महत्त्व नहीं है? तो क्या इसी तरह मधु रोटी के लिए मारे जाते रहेंगे? अगर यही सब होना था तो क्या लाभ है भाजपा के केंद्र और १८ राज्यों में सत्ता में होने से? क्या लाभ है???

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

बच्चों के खून की कीमत लगाईए सुशासन बाबू

मित्रों, होली को अभी कई दिन बांकी हैं लेकिन बिहार में तो कई हफ्ते पहले से होली शुरू है. मुजफ्फरपुर के धरमपुर गाँव के बच्चों के साथ तो गजब की होली खेली गई है,खून की होली. पूरी तरह से सर्वधर्मसमभाव जो भाजपा का मूल मंत्र है का पालन करते हुए यह होली खेली गई है. हिन्दू-मुसलमान दोनों ही समुदाय के ९ बच्चों के जिस्म को लाल टेसू रंग में दलित भाजपा नेता मनोज बैठा ने इस कदर सराबोर कर दिया कि बेचारे हमेशा के लिए नींद की आगोश में सो गए. उनकी माँ-उनके पापा रो-रो कर उनको जगा रहे हैं, दुहाई दे रहे हैं कि अब वे किसके लिए जीएंगे लेकिन बच्चे इतने ढीठ हैं कि सुन ही नहीं रहे. कई बच्चे अस्पताल में हैं और राम जाने कि उनमें से कितने वहां से वापस घर आएंगे.
मित्रों, मैं सुशासन बाबू से जिनकी बिहार में बड़ी हनक है से विनती करता हूँ कि हुज़ूर आप कोशिश करिए न जगाने की. आपकी बात बिहार में कौन काट सकता है फिर ये तो बच्चे ठहरे सरकार. सरकार विपक्ष के कई नेता आकर जा चुके हैं मगर बच्चों ने उनकी तो मानी नहीं. आप इस बार भी नहीं आएँगे क्या सरकार? पिछली बार जब गोपालगंज में बच्चे मिड डे मिल खाकर सो गए थे तब भी तो आप नहीं आए थे?सरकार कसम से आप आते तो बच्चे उठ बैठते और आपसे सवाल पूछते कि सरकार ने तो छोटे पौधों के काटने पर भी रोक लगा रखी है फिर कोई हमको चीटियों की तरह मसलकर कैसे मार सकता है?  सरकार आप तो जानते होंगे कि बच्चे अब सरकारी स्कूलों में पढने नहीं जाते क्योंकि वो तो होती ही नहीं है वे बेचारे तो खाना खाने के लालच में जाते हैं मगर उनको कहाँ पता होता है कि स्कूल का खाना उनके लिए बलि के बकरे के आगे रखा अक्षत साबित हो सकता है. सरकार सुना था कि आपने बिहार में शराबबंदी कर रखी है, फिर उस नेताजी ने कहाँ से पी ली? सरकार क्या आपने सत्ता पक्ष के नेताओं को इस बंदी से छूट दे दी है?
सरकार आपने अभी तक हमारी जान की और हमारे माँ-बाप के अरमानों की कोई कीमत नहीं लगाई? सरकार लगाईये न कीमत. हमें भी तो पता चले कि हमारे खून की कीमत क्या है. सरकार अभी तक आपने जाँच की घोषणा भी नहीं की है. सरकार जाँच का नाटक भी तो होना चाहिए. ऐसा रस्म रहा है दस्तूर रहा है जनाब. सीबीआई कैसी रहेगी? सृजन घोटाले की तरह पूरा लीपा-पोती कर देगी जनाब. विशेषज्ञता है इसको इसमें. सालों साल बीत जाएंगे मगर नतीजा नहीं आएगा. फिर आप न्यायिक जाँच करवा लीजिएगा, फिर एसआईटी और फिर फिर से सीबीआई और अंत में नो वन किल्ड जेसिका.

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

मोदी सरकार का मूर्ख बनाओ कार्यक्रम

मित्रों, मोदी सरकार के ५ साल पूरे होनेवाले हैं. अगर आपसे सरकार के काम-काज का निष्पक्ष होकर आकलन करने के लिए कहा जाए तो आपका निष्कर्ष क्या होगा राम जाने लेकिन हमारा तो वही आकलन होगा जो एक सच्चे राष्ट्रवादी का होना चाहिए.
मित्रों, क्या आपको याद है कि २०१४ में श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी ने क्या-क्या वादे किए थे? चलिए मैं याद दिला देता हूँ-१. मोदी जी ने वादा किया था कि वे १०० दिनों में विदेशों से कालाधन वापस लाएंगे.
२. एक साल में सारे दागी सांसदों-विधायकों पर मुकदमा चलवाकर फैसला करवाएंगे.
३. देश के पूर्वी हिस्से के तीव्र विकास के लिए प्रयास करेंगे.
४. भ्रष्टाचारियों को सजा दिलवाएँगे और उनके द्वारा लूटे गए धन-सम्पत्ति को बिना भेदभाव के जब्त करेंगे.
५. गंगा को फिर से प्रदूषण-मुक्त बनाया जाएगा.
६. महंगाई कम की जाएगी.
७. हर साल २ करोड़ रोजगार पैदा किए जाएँगे.
८. सरकारी अस्पतालों की स्थिति में सुधार किया जाएगा.
९. कृषकों की आमदनी की दोगुना किया जाएगा.
१०. पुलिस में सुधार किया जाएगा.
११. न्यायिक प्रक्रिया को सरल और तीव्र किया जाएगा.
१२. पाक समर्थित आतंकवाद का स्थायी ईलाज किया जाएगा.
१३. भारत न तो किसी को आँख दिखाएगा न ही किसी से आँखें चुराएगा बल्कि हर किसी से आँखों में ऑंखें डालकर बात करेगा.
१४. सबको अपना आवास उपलब्ध करवाया जाएगा.
१५. भारत की शिक्षा को वैश्विक स्तर का बनाया जाएगा.
१६. गरीबों का पैसा सीधे उनके खाते में डाला जाएगा.
१७. भारत से गरीबी का नामोनिशान मिटा दिया जाएगा. सबको अमीर बनाया जाएगा.
१८. देश के खजाने को सुरक्षित किया जाएगा और कोई खूनी पंजा इस पर हाथ नहीं डाल पाएगा.
१९. सारे बंगलादेशी घुसपैठियों को चिन्हित कर वापस भेजा जाएगा.
२०. भारत को वैज्ञानिक और तकनीकी अनुसन्धान में अग्रणी बनाया जाएगा.
२१. वे प्रधानमंत्री की तरह नहीं बल्कि प्रधान सेवक की तरह व्यवहार करेंगे.
२२. रुचि और प्रतिभा के आधार पर नामांकन को सुनिश्चित किया जाएगा.
२३. स्वायल हेल्थ कार्ड बनाया जाएगा और कृषि ऋण और फसल बीमा को सस्ता और सरल बनाया जाएगा.
२४. आधारभूत संरचना में सुधार किया जाएगा.
२५. २४ घंटे बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी.
आदि आदि.
मित्रों, चुनाव जीतने के बाद देश की प्रगति को समर्पित कई गीत मोदी सरकार ने बनाए-जैसे कि मेरा देश बदल रहा है, आगे चल रहा है. दुर्भाग्यवश आज यह गीत एक नारा भर बनकर रह गया है. देश तो नहीं बदला लेकिन भाजपा बदल गई, उसका कार्यालय बदल गया. भाजपा आज पापी नेताओं के पापों का नाश करनेवाली गंगा बन गई है. उसका कार्यालय दुनिया का सबसे बड़ा कार्यालय है और वो खुद दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी.
मित्रों, बांकी किस क्षेत्र में क्या काम हुआ है आप ऊपर वर्णित वायदों को सरसरी निगाह से देखकर भी आसानी से मूल्यांकन कर सकते हैं. बर्बादे गुलिस्ताँ के लिए बस एक ही उल्लू काफी है, हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामें गुलिस्तान क्या होगा. यानि देश को बर्बाद करना है तो वित्त मंत्री किसी मूर्ख को बना दीजिए. बस वो अर्थव्यवस्था का नाश कर देगा और बांकी विभाग खुद ही बर्बाद हो जाएँगे, पूरा देश तबाह हो जाएगा. नोटबंदी से क्या लाभ हुआ राम जाने लेकिन जीएसटी से व्यापक नुकसान जरूर हुआ है. राज्यों की कर वसूली तो घटी ही है केंद्र की भी घट गयी है. राज्य सरकार व विश्वविद्यालयों  के कर्मियों को ६-६ महीने से वेतन नहीं मिला है. बिहार और दिल्ली का तो मैं प्रत्यक्ष गवाह हूँ बांकी राज्यों का आपलोगों को बेहतर पता होगा. और उस पर तुर्रा यह है कि ऐसी हालत तब है जब अभी नए वेतनमान को लागू करना बांकी है उसके बाद वेतन चालू रहेगा या बिलकुल ही बंद हो जाएगा अरुण जेटली जाने या हमारी पॉकेटमार सरकार जाने जो इन दिनों टेलकॉम कंपनियों की तरह ग्राहकों के बैंक खातों से चुपके से पैसा खिसकाने में लगी हुई है. १५ लाख तो आए नहीं १५०० भी गए.
मित्रों, आपने ध्यान दिया होगा कि मोदी सरकार २०१९ की बात ही नहीं कर रही बल्कि २०२२ की बात कर रही है. ५ साल में कुछ अच्छा होता दिख नहीं रहा तो ३ सालों में क्या हो जाएगा और भारत को क्या बना दिया जाएगा? मुझे तो लगता है कि सिवाय मूर्ख के और कुछ नहीं. आपको क्या लगता है?
मित्रों, कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि मैंने पार्टी बदल ली है लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है. मैंने आज भी घनघोर राष्ट्रवादी हूँ. मेरे लिए मोदिभक्ति कभी देशभक्ति नहीं थी, नहीं है और न ही होगी.

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

वित्तीय आपातकाल की ओर अग्रसर भारत

मित्रों,  भारतीय संविधान में तीन आपातकाल वर्णित हैं- 1. राष्ट्रीय आपात - अनुच्छेद 352) राष्ट्रीय आपात की घोषणा काफ़ी विकट स्थिति में होती है. इसकी घोषणा युद्ध, बाह्य आक्रमण और राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर की जाती है.

2. राष्ट्रपति शासन अथवा राज्य में आपात स्थिति- अनुच्छेद 356) इस अनुच्छेद के अधीन राज्य में राजनीतिक संकट के मद्देनज़र, राष्ट्रपति महोदय संबंधित राज्य में आपात स्थिति की घोषणा कर सकते हैं. जब किसी राज्य की राजनैतिक और संवैधानिक व्यवस्था विफल हो जाती है अथवा राज्य, केंद्र की कार्यपालिका के किन्हीं निर्देशों का अनुपालन करने में असमर्थ हो जाता है, तो इस स्थिति में ही राष्ट्रपति शासन लागू होता है. इस स्थिति में राज्य के सिर्फ़ न्यायिक कार्यों को छोड़कर केंद्र सारे राज्य प्रशासन अधिकार अपने हाथों में ले लेती है.

3. वित्तीय आपात - अनुच्छेद 360) वित्तीय आपातकाल भारत में अब तक लागू नहीं हुआ है. लेकिन संविधान में इसको अच्छी तरह से परिभाषित किया गया है. अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपात की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा तब की जाती है, जब राष्ट्रपति को पूर्ण रूप से विश्वास हो जाए कि देश में ऐसा आर्थिक संकट बना हुआ है, जिसके कारण भारत के वित्तीय स्थायित्व या साख को खतरा है. अगर देश में कभी आर्थिक संकट जैसे विषम हालात पैदा होते हैं, सरकार दिवालिया होने के कगार पर आ जाती है, भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त होने की कगार पर आ जाए, तब इस वित्तीय आपात के अनुच्छेद का प्रयोग किया जा सकता है. इस आपात में आम नागरिकों के पैसों एवं संपत्ति पर भी देश का अधिकार हो जाएगा. राष्ट्रपति किसी कर्मचारी के वेतन को भी कम कर सकता है. गौरतलब है कि संविधान में वर्णित तीनों आपात उपबंधों में से वित्तीय आपात को छोड़ कर भारत में बाकी दोनों को आजमाया जा चुका है. भारत में कभी वित्तीय आपात लागू न हो, इसकी हमें प्रार्थना करनी चाहिए.

मित्रों, क्या इस समय भारत सरकार की साख और वित्तीय स्थायित्व को खतरा नहीं है? चार दिन पहले तक तो सरकार दावा कर रही थी कि उसके समय एक पैसे का भी गलत लोन नहीं दिया गया है और आज देश के सारे-के-सारे बैंक गलत लोन के चलते दिवालिया होने की स्थिति में हैं. कल अगर बैंक नकदी के अभाव में बंद हो जाते हैं या लोगों की जमाराशि को लौटाने से मना कर देती है तो सरकार ने सोंचा है कि तब वो क्या करेगी? जनता ने बैंकों पर अपने जमा धन की निकासी के लिए अगर धावा बोल दिया और बैंकों को आग के हवाले करना शुरू कर दिया तो क्या होगा क्या सरकार सोंचा है?

मित्रों, सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या सरकार पूरे मामले को गंभीरता से ले भी रही है? वो इन दिनों जिस तरह का व्यवहार कर रही है उससे तो ऐसा लगता नहीं। मोदी जी को तत्काल सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए और विपक्ष से भी न केवल परामर्श करना चाहिए बल्कि उसको विश्वास में भी लेना चाहिए. यह संकट कोई सरकार मात्र का संकट नहीं है बल्कि राष्ट्रीय संकट है. लेकिन सरकार कर क्या रही है? वित्त मंत्री घोटाला सामने आने के बाद भी २ दिनों तक देश में थे लेकिन वे मीडिया के सामने नहीं आए और विदेश चले गए. प्रधानमंत्री कभी बच्चों से परीक्षा कैसे देनी चाहिए पर बात करते हैं तो कभी कृत्रिम बुद्धि पर व्याख्यान दे रहे हैं. अर्थात उनको जो करना चाहिए और प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए वे नहीं कर रहे हैं. इसी को बिहार में कहते हैं हंसिया के लगन में खुरपी का गीत. आप ही बताईए अगर कोई श्राद्ध में शामिल होने जाए और विवाह के गीत गाने लगे तो आपको ख़ुशी होगी या गम, गायक पर प्यार आएगा या क्रोध?

मित्रों, इसलिए मैं कहता हूँ कि स्थिति की गंभीरता को समझते हुए सरकार तुरंत सर्वदलीय बैठक बुलाए और उसके बाद प्रेस वार्ता करके देशवासियों के समक्ष स्थिति को स्पष्ट करना चाहिए और विश्वास दिलाना चाहिए कि स्थिति नियंत्रण में है इसलिए भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है. विदेशों में तो ऐसी स्थिति में सर्वदलीय राष्ट्रीय सरकारों का भी गठन हो चुका है फिर सरकार को यशवंत सिन्हा, सुब्रमण्यम स्वामी और अरुण शौरी जैसे अपने लोगों से सलाह लेने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. कुछ लोग फिर से बैंकों के निजीकरण की मांग भी कर सकते हैं लेकिन मैं नहीं मानता कि यह कोई समाधान है क्योंकि दिवालिएपन के कगार पर तो निजी बैंक भी हैं.

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

क्या यह मोदी के अंत का आरम्भ है?

मित्रों, अगर आपने मेरे आलेखों को लगातार पढ़ा होगा तो देखा होगा कि जब भी केंद्र की मोदी सरकार ने अच्छा काम किया है मैंने पूरे मन से उसका समर्थन किया है और जब भी उसका काम मुझे देशहित में नहीं लगा है मैंने पूरी ताक़त से उसका प्रतिकार किया है. चाहे कश्मीर में गठबंधन का मामला हो या फिर भूमि-अधिग्रहण कानून पर आगे बढ़कर पीछे हट जाने का सवाल हो या फिर पापियों-प्रलापियों को मंत्रिमंडल में स्थान देने का प्रश्न हो या फिर सैनिकों की शहादत मेरी कलम ने कभी मोदी सरकार पर प्रहार करने में देर ने नहीं की.
मित्रों, मैं मानता हूँ कि अर्थशास्त्र का अच्छा ज्ञान होने के बावजूद मैं न सिर्फ नोटबंदी के पीछे मोदी सरकार की छिपी हुई मंशा को नहीं समझ पाया बल्कि जीएसटी को अब तलक भी नहीं समझ पाया हूँ. फिर भी ऐसा मानकर कि इस सरकार की नीति तो गलत हो सकती है लेकिन नीयत गलत नहीं होगी इन दोनों मुद्दों पर सरकार के कहे को सच मानकर उसकी पैरोकारी की यह जानते हुए भी कि नीतिगत गलती भी अक्षम्य होती है. लेकिन जैसे गर्म शीशे के टुकड़े पर ठंडा पानी पड़ने से शीशा टूटकर बिखर जाता है वैसे ही पीएनबी घोटाला के सामने आने बाद हमारा भोला-भाला भक्त-ह्रदय पूरी तरह से भग्न-ह्रदय में परिवर्तित हो गया है.
मित्रों, मोदी खुद को खजाने का पहरेदार कहते हैं अन्ना चौबीस घंटे चौकन्ना फिर कैसे कोई खूनी पंजा खजाने को लूट गया.  और सबसे दुखद समाचार तो यह है कि वो खूनी पंजा कोई और नहीं है बल्कि प्रधान सेवक सह चौकीदार जी का मेहुल भाई और उन मेहुल भाई का भांजा है. हो सकता है कि जनता के पैसे की खुली लूट का यह मामला २०११ तक जाता हो लेकिन तथ्य तो यही बताते हैं कि ९० प्रतिशत से ज्यादा लूट २०१६ और उसके बाद हुई. हमने यह भी माना कि पहले की सरकारों के समय भी बैंकों में जमा जनता की मेहनत की कमाई को लूटा और लुटाया गया लेकिन मैं मोदी जी से पूछना चाहता हूँ कि अगर आपकी सरकार में भी चलता है चलता रहा तो फिर आपकी और पहले की सरकार में क्या अंतर रहा?  तो क्या जनता ने आपको मन की बात के जरिये कोरे प्रवचन करने के लिए ही चुना था?
मित्रों, स्वर्गीय संजय गाँधी जिनका पूरा परिवार अभी भाजपा में शरणार्थी है कहते थे कि बातें कम काम ज्यादा। लगता है कि मोदी जी का मूल मंत्र है बातें ही बातें और काम शून्य. बिहार में इस सन्दर्भ में एक बहुत ही खूबसूरत कहावत प्रचलन में है कि बात हमसे लीजिए और काम हमारे दादाजी से. दरअसल बिहार में कुछ ऐसे महारथी भी हैं जो बातों से न सिर्फ मन भर देते हैं बल्कि पेट भी भर देते हैं और होशियार-से-होशियार लोग भी उनके झांसे में आ जाते हैं.
मित्रों, अब जब अगला लोकसभा चुनाव दरवाजे से कुछेक फर्लांग ही दूर रह गया है तब मुझे एक किस्सा याद आ रहा है. किसी गांव में एक डॉक्टर था जो था तो डिग्री के अनुसार सर्जन लेकिन अल्पज्ञ और बातूनी था. शुरुआत में जो भी उसके संपर्क में आता उससे बिना ईलाज कराए रह नहीं पाता. कभी वो किसी का पेट खोल देता तो कभी किसी का फेफड़ा तो किसी का ब्रेन लेकिन आतंरिक अंगों की जटिलता को समझ नहीं पाता और मरीज मरघट पहुँच जाता. धीरे-२ लोग उसकी परछाई से भी डरने लगे और डॉक्टर शहर छोड़कर चला गया.
मित्रों, आज मोदी सरकार हर मोर्चे पर असफल है लेकिन यह उसकी असफलता नहीं है बल्कि भारत की असफलता है. समझ में नहीं आता कि अगले चुनाव में हम किसे वोट डालेंगे? आपकी समझ में कुछ आ रहा है क्या? यह सरकार या आनेवाले चुनाव में उपस्थित विकल्प? कुछ भी?

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

मोदी सरकार की टच एंड रन की नीति

मित्रों, हमारे बिहार में एक कहावत है कि मंत्र तो बिच्छू का भी नहीं पता और चले हैं सांप के बिल में हाथ डालने. पता नहीं आपके यहाँ इसके बदले कौन-सी कहावत प्रचलन में है. इसी तरह एक और कहावत भी बिहार में चलती है कि झोली में दाम नहीं और सराय में डेरा अर्थात अपने बारे में ओवरस्टीमेट होना.
मित्रों, दुर्भाग्यवश ये दोनों कहावतें इन दिनों केंद्र में सत्ता संभाल रही मोदी सरकार पर लागू हो रही है. चाहे वो नोटबंदी हो या जीएसटी, गंगा-सफाई हो या मेक इन इंडिया, हरित क्रांति हो या स्वास्थ्य क्रांति हो या पुलिस और न्यायपालिका में सुधार हो या सबके लिए आवास उपलब्ध करवाना या भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई हो या कालाधन या रोजगार-सृजन या कश्मीर हर मामले में मोदी सरकार पूरी तरह से असफल है या फिर आंशिक रूप से सफल है. उसने हर मामले को छेड़ जरूर दिया है लेकिन सच्चाई यह भी है कि किसी भी मामले को अंत तक नहीं ले जा पाई है और अधूरा छोड़ दिया है या छोड़ना पड़ा है.
मित्रों, पता नहीं सरकार के दिमाग में कैसा केमिकल लोचा चल रहा है? बेवजह सुरेश प्रभु का मंत्रालय बदल दिया, स्मृति ईरानी को लगातार महत्वपूर्ण मंत्रालय दिया जा रहा है, राफेल पर पर्दादारी की जा रही है, रोजगार की नई परिभाषा ही गढ़ दी गई है. कदाचित मोदी जी अपने बारे में ओवरस्टीमेटेड थे और हैं या फिर देश की जनता ने ही उनकी क्षमताओं के बारे में जरुरत से ज्यादा अनुमान लगा लिया. आज भी मोदी जी के पास सिवाय जन-धन खातों और उज्ज्वला के कुछ भी नहीं है और अगर कुछ है भी तो अभी परिणति से कोसों दूर है. सबसे हद तो कश्मीर में की जा रही है. भाजपा और महबूबा दोनों निहायत विपरीत ध्रुवों की राजनीति करते हैं और और अभी भी कर रहे हैं जिससे वहां विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई है.
मित्रों, गांवों में एक और कहावत है कि नीम हकीम खतरे जान. अब अपने देश की अर्थव्यवस्था को ही लीजिए जो आगे जाने के बदले पीछे जा रही है. जैसे कोई झोला छाप डॉक्टर किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त मरीज का ईलाज करता है और बार-बार दवा बदलकर प्रयोग करता है वैसे ही जेटली जी भी अंदाजन दवा-पर-दवा बदलते जा रहे हैं. मरीज ठीक हो गया तो श्रेय लूट लेंगे और ठीक नहीं हुआ तो वैश्विक स्थिति पर सारा ठीकरा फोड़ देंगे.
मित्रों, जो गलती बिहार में नीतीश ने नौकरशाही के बल पर शासन सुधारने की कोशिश करके की वही गलती इन दिनों मोदी सरकार कर रही है. सरकार तो वाजपेयी जी ने भी चलाई थी और हर मंत्रालय में उसके विशेषज्ञों को बैठाया था तो क्या वाजपेयी पागल थे? बल्कि मेरा तो यहाँ तक मानना है कि अगर जरूरी हो तो विपक्षी खेमे में शामिल योग्य लोगों से भी सलाह लेनी चाहिए. मुझे एक दृष्टान्त याद आ रहा है. १८६१ में लिंकन जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने दास प्रथा को समाप्त कर दिया. दक्षिणी राज्यों ने विद्रोह कर दिया और भयंकर युद्ध छिड़ गया. उस समय पूरे अमेरिका में सबसे बड़े सैन्य जनरल थे ग्रांट लेकिन समस्या यह थी कि वे लिंकन के विरोधी थे. इसके बावजूद लिंकन ने उनको ही सेनाध्यक्ष बनाया. जब लिंकन के दोस्तों ने इस पर आपत्ति की तो उनका जवाब था कि भले ही वो मेरा विरोधी है लेकिन पूरे अमेरिका में उससे ज्यादा योग्य सेनानायक नहीं है इसलिए मैंने अहम पर देशहित को अहमियत दी. चूंकि लिंकन यह मानते थे कि वे सर्वज्ञ नहीं थे इसलिए उनका नाम विश्व इतिहास में गर्व से लिया जाता है.
मित्रों, आज भारत को भी लिंकन सरीखे व्यक्तित्व की आवश्यकता है लेकिन क्या मोदी जी उनके समकक्ष भी हैं? यह अद्बभुत संयोग है कि लिंकन 16वें राष्ट्रपति थे तो मोदी 16वें प्रधानमंत्री हैं। तो मुझे यह भी लगता है कि मोदी जी ने मार्गदर्शक मंडल की स्थापना करके ठीक नहीं किया. बल्कि देशहित में यही ठीक रहता कि आडवाणी जी और जोशी जी को भी मंत्रिमंडल में लिया जाता. वे कम-से-कम गिरिराज और स्मृति ईरानी से तो बेहतर ही सिद्ध होते. क्योंकि मुझे लगता है कि मोदी जी के इर्द-गिर्द जो लोग हैं और जिनकी सलाह पर वे चलते हैं वे सही नहीं हैं और मुझे यह भी लगता है कि मोदी जी को पता नहीं है कि टीम वर्क करते समय खुद १६-१८ घंटे काम करने से ज्यादा जरूरी होता है दूसरों से काम करवाना.

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

बढ़ते भारत का प्रतीक पकौड़ा साहित्य

मित्रों, मैं वर्तमान पकौड़ा-विमर्श को देखते हुए झूठ नहीं बोलूंगा कि मैं पकौड़ों से प्रेम नहीं करता हूँ लेकिन सच यह भी है कि जबसे मेरे शरीर के भीतर डाईबीटिज का बसेरा हुआ है प्रेम में कमी आ गई है. अगर पकौड़ा जरूरी है तो उससे ज्यादा जीना जरूरी है. धीरे-धीरे हालात इतने ख़राब हो गए हैं कि मैं पकौड़ों की तरफ देखना तो दूर, जुबाँ पर उसका नाम लेना तो दूर, उसका नाम भी नहीं सुनना चाहता.
मित्रों, मगर मुझे क्या पता था कि देश में कई दशकों से चल रहे दलित-विमर्श के स्थान पर पकौड़ा-विमर्श आरम्भ हो जाएगा और मुझे भी मजबूरन पकौड़ावादी बनना पड़ेगा. जो साहित्य किसी वाद का हिस्सा न हो अर्थात निर्विवाद हो वो कम-से-कम हिंदी वांग्मय में तो साहित्य कहला ही नहीं सकता. पहले राष्ट्रवाद आया, फिर छायावाद, फिर प्रगतिवाद, फिर नव प्रयोगवाद, फिर नई कहानी नई कविता, फिर उत्तरवाद और नव उत्तरवाद, फिर समकालीन साहित्य, फिर दलित साहित्य और अब पकौड़ावाद.
मित्रों, मैं अपने देश के प्रधानमंत्री जी का इस बात के लिए आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्होंने सबका साथ सबका विकास के अपने मूलमंत्र पर चलते हुए निहायत उपेक्षित पकौड़े को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया. साथ ही उम्मीद करता हूँ कि वे भविष्य में भिक्षा और कटोरे का जिक्र करके कटोरावादी साहित्यिक आंदोलन की शुरुआत का मार्ग भी प्रशस्त करेंगे. अगर वे ऐसा करते हैं तो हिंदी साहित्य उनका हमेशा ऋणी रहेगा.
मित्रों, लेकिन हम अपने विमर्श को फ़िलहाल पकौड़ा साहित्य तक ही सीमित रखना चाहेंगे क्योंकि मैं वर्तमान में जीता हूँ. तो मैं कह रहा था कि मैं चाहता हूँ कि भविष्य में पकौड़े पर कविता, कहानी ही नहीं वरन महाकाव्य और उपन्यास भी लिखे जाएं. बल्कि मैं तो चाहता हूँ कि पकौड़ा साहित्य साहित्यिक आंदोलन का रूप ले और देश के निमुछिए से लेकर कब्र में पाँव डाल चुके साहित्यकार तक फिर चाहे वो किसी भी लिंग, वर्ग, प्रदेश या संप्रदाय का हो दशकों तक पकौड़ा साहित्य रचे. पकौड़ों पर थीसिस लिखे जाएं और पकौड़ों पर पीएचडी हो. जब रसगुल्ले को लेकर दो राज्य सरकारों में मुकदमेबाजी हो सकती है तो फिर ऐसा क्यों नहीं हो सकता? अभी दो दिन पहले मैंने प्रधानमंत्री निवास के निकटवर्ती लोक कल्याण मार्ग मेट्रो स्टेशन पर एक विचित्र मशीन को देखा. वो मशीन न केवल इच्छित स्टेशन के टोकन ही दे रही थी बल्कि पैसे काटकर वापस भी कर रही थी. अगर इसी तरह सरकारी सेवाओं का मशीनीकरण होता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब कटोरावाद पकौड़ावाद का स्थान लेकर हिंदी साहित्य के कारवां को आगे बढ़ाएगा।
मित्रों, अंत में मैं एक भविष्यवाणी करना चाहूंगा. वो यह कि जिस तरह से आधार को ऑक्सफ़ोर्ड ने २०१७ का शब्द घोषित किया है मैं इस बात की अभी से ही मोदी जी की तरह जापानी ढोल पीटकर भविष्यवाणी कर सकता हूँ कि ऑक्सफ़ोर्ड इस चलंत साल यानि २०१८ का शब्द पकौड़ा को ही घोषित करेगा, करना पड़ेगा. अंत में मैं चाहूंगा कि आप भी दोनों मुट्ठी बंद कर जोरदार नारा लगाएं-जय पकौड़ा, जय पकौड़ावाद. इतनी जोर से कि हमारी आवाज पश्चिमी देशों तक पहुंचे और वहां भी पकौड़ावादी साहित्यिक आंदोलन शुरू हो जाए. कब तक हम साहित्यिक आंदोलनों के मामले में पश्चिम के पीछे चलेंगे? गाना तो बजाओ भाई मेरा देश बदल रहा है, पकौड़े तल रहा है. 

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

बजट:दुरुस्त आयद मगर देर से आयद

मित्रों, एक जमाना था जब हम क्रिकेट के दीवाने हुआ करते थे और भारत की हार हमारे लिए नाकाबिले बर्दाश्त हुआ करती थी. कई बार तो ऐसा भी होता कि भारतीय टीम को अंतिम ओवर में जीत के लिए ४०-५० रन बनाने होते थे लेकिन हमें तब भी पूरी उम्मीद होती थी कि जीत भारत की ही होगी. जाहिर है असंभव तो असंभव ही होता है इसलिए हार के बाद हम टूट-से जाते थे.
मित्रों, हमारी कुछ ऐसी ही मनःस्थिति इन दिनों केंद्र में काबिज नरेंद्र मोदी की सरकार को लेकर हो रही थी. सरकार के चार साल बीत चुके हैं. काम कुछ खास हो नहीं पाया है लेकिन लगता था जैसे एक साल में ही क्रांति हो जाएगी, चमत्कार हो जाएगा. जैसे दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बॉलर अंतिम ओवर में लगातार कई दर्जन नोबॉल फेंकेगा और भारत का दसवां बल्लेबाज उन हरेक नोबॉल पर सिर्फ छक्के ही जड़ेगा।
मित्रों, अब इस साल के बजट को ही लें. बेहतरीन दस्तावेज है, जबरदस्त, सुपर. लेकिन सवाल उठता है कि ऐसा बजट तो पहले साल आना चाहिए था. बजट में जो प्रावधान किए गए हैं एक साल में उनपर काम होगा कैसे? माना कि सरकार ने उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा दिया लेकिन वो किसानों को मिलेगा कैसे? माना कि सरकार ने उद्योंगों को करों में छूट दे दी लेकिन एक साल में करोड़ों रोजगार कहाँ से आ जाएंगे? इसी तरह आदिवासियों की शिक्षा के लिए, शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए भी जो कुछ किया गया है वो भी स्वागत योग्य है लेकिन इनके परिणाम आने में कई साल लग जाएंगे फिर इस काम में देरी क्यों की गई?
मित्रों, कई मामलों में यह बजट सरकार की लाचारी और नाकामी को भी दर्शाता है. जैसे सरकार ने जो न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की जो घोषणा की है उससे साबित होता है सरकार कृषि के क्षेत्र में कुछ नया नहीं कर पाई. बल्कि वही सब कर रही है जो पिछली सरकारें कर रही थीं. कहाँ है पर ड्राप मोर क्रॉप और मृदा स्वास्थ्य कार्ड? कहाँ हैं नदियों को जोड़नेवाली नहरें?
मित्रों, इसी तरह सरकार ने जो स्वास्थ्य बीमा की राशि बढ़ाने की घोषणा की है उसको भी सरकार की नाकामी का प्रतीक मानता हूँ. आखिर कोई क्यों जाए निजी अस्पतालों में? फिर इसकी क्या गारंटी है कि निजी अस्पताल उन पैसों को बेईमानी कर हजम नहीं कर जाएंगे? बिहार में तो अविवाहित लड़कियों के गर्भाशय तक उनकी बिना जानकारी के लापता कर दिए गए.
मित्रों, इसी तरह इस बजट में रक्षा क्षेत्र को ज्यादा राशि दी गयी है जो स्वागतयोग्य है लेकिन रोजाना पाकिस्तानी सीमा पर जो कैप्टेन कपिल कुंडू मारे जा रहे हैं उनकी मौतों को रोकने के लिए सरकार के पास कोई योजना है क्या? युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं हौसलों से जीते जाते हैं. क्या है इस सरकार के पास हौसला? अगर है तो फिर कश्मीर में सेना पर एफआईआर क्यों हो रहे हैं और क्यों सेना पर पत्थर फेंकनेवालों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लिए जा रहे हैं? सरकार का गठन देश की सुरक्षा के लिए हुआ था या वोटों की सुरक्षा के लिए?
मित्रों, तमाम सवालों के बावजूद इस सरकार ने आधारभूत संरचना के क्षेत्र में अद्भुत काम किया है. रेलवे की सिग्नल प्रणाली बदलने से, नई पटरियों के बिछने से आनेवाले वर्षों में उम्मीद की जानी चाहिए कि पटना से दिल्ली आने में जाड़े में भी १२ से १४ घंटे ही लगेंगे न कि दो-दो दिन. इसी तरह भारत भविष्य में अपनी बेहतरीन ६ लेन सडकों, पुलों, और फ्लाईओवरों के लिए जाना जाएगा.
मित्रों, बड़े ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि सरकार त्वरित न्याय की दिशा में कार्यकाल के चार साल बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं कर पाई है. इस बजट में भी इस बारे में शून्य बटा सन्नाटा ही है. बड़े ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि देश में अभी भी हर कदम पर भ्रष्टाचार है, अराजकता है जबकि १८ राज्यों में भाजपा की सरकार है. पुराने पापी मजे में हैं. बड़े ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है मोदी सरकार भी जातिवादी राजनीति में आकंठ डूब गई है. ये दलित, वो पटेल तो यहाँ आरक्षण, वहां आरक्षण. पता नहीं देश समझ पाया या नहीं कि मध्यम वर्ग को आयकर में छूट नहीं दी जा सकती क्योंकि देश को पैसा चाहिए लेकिन मैं यह नहीं समझ पाया कि बजट द्वारा आखिर राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति और सांसदों के वेतन को बढ़ाने की जरुरत क्या थी? क्या ये लोग भूखों मर रहे थे? क्या इनका वेतन बढ़ाने से खजाने पर कोई बोझ नहीं पड़ेगा? प्रधानमंत्री के आग्रह पर करोड़ों लोगों ने गैस की सब्सिडी छोड़ दी लेकिन अमीर सांसद कब वेतन और सुविधा लेना बंद करेंगे?
मित्रों,  राजस्थान तो पहली झांकी है पूरा भारत बांकी है. पता नहीं सरकार कैसे एक साल में सरकार जनता का दिल जीत पाएगी? कैसे साबित कर पाएगी कि मोदी सिर्फ जुमलावीर नहीं हैं?

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

विराट कोहली और नरेंद्र मोदी

मित्रों, इन दिनों भारतीय क्रिकेट टीम द. अफ्रीका के दौरे पर है. तीन टेस्ट मैचों की श्रृंखला में भारत पहले दोनों मैच हारकर बाहर हो चुका है लेकिन भारतीय कप्तान को इसका जरा भी मलाल नहीं है और वे अपने आलोचकों के ऊपर ही भड़क रहे हैं.
मित्रों, ठीक यही हालत इस समय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की है. नाच न जाने आँगन टेढ़ा और अगर कोई नाचने पर टिपण्णी कर दे तो बंटाधार. पहले टेस्ट मैच में भुवनेश्वर कुमार ने शानदार प्रदर्शन किया तो कोहली ने उन्हें अगले मैच में बाहर ही बैठा दिया. न तो मोदी और न ही कोहली को ही पता है कि उनको करना क्या है और उनको चाहिए क्या. अपनी जिद में दोनों ने अच्छे खिलाडियों और नेताओं को बाहर बिठा रखा है मगर चाहते हैं कि टीम हर मैच को जीते. टीम मोदी में शामिल जो लोग ख़ामोशी से अपना काम रहे हैं वे हाशिए पर हैं और जो मोदी की ठकुरसुहाती छोड़ और कुछ नहीं कर रहे या नहीं कर सकते वे मजे में हैं. कोहली तो रेफरी तक से होटल के कमरे में जाकर झगड़ने लगते हैं. वैसे यह काम अभी टीम मोदी नहीं बल्कि विपक्ष कर रहा है जो बार-बार चुनाव आयोग और ईवीएम पर आरोप लगाता रहता है.
मित्रों, भारतीय क्रिकेट टीम और मोदी टीम दोनों में ही आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जो सिर्फ इस कारण से टीम में हैं क्योंकि वे मोदी और कोहली को पसंद हैं भले ही उनका प्रदर्शन कितना भी ख़राब क्यों न हो. कोहली और मोदी दोनों ही कदाचित चाहते हैं कि सिर्फ उनको ही वाहवाही मिले और कोई उनसे अच्छा खेलने या प्रदर्शन करने की हिमाकत न करे जबकि क्रिकेट मैच खेलना हो या देश को चलाना दोनों टीम वर्क होता है और इसके लिए अच्छी टीम की आवश्यकता होती है.
मित्रों, इस समय शेयर बाजार पूरे उफान पर है लेकिन मेरा हमेशा से मानना रहा है कि शेयर बाजार अर्थव्यवस्था का आईना नहीं हो सकता। ऐसा हमने तब भी कहा था जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे. एक बार फिर से कर्णाटक में भाजपा दूसरे दलों से नेताओं का आयात करने में जुट गई है जैसा कि वो हर राज्य के चुनाव से पहले करती है. मोदी जी और भाजपा को समझना पड़ेगा कि येन-केन-प्रकारेण सिर्फ चुनाव-दर-चुनाव जीत लेने से देश न तो बदल जाएगा और न ही आगे हो जाएगा. यह घनघोर निराशाजनक है कि मोदी भी वोट बैंक की गन्दी राजनीति के कीचड़ में कूद गए हैं. काम बहुत कम हो रहा है और दिखावा बहुत ज्यादा. शोर मचाकर और आक्रामकता दिखाकर मोदी कोहली की तरह यह साबित करने में लगे हैं कि सब कुछ शानदार है जबकि परिणाम बता रहे हैं कि हालात चिंताजनक है.
मित्रों, वैसे प्रदर्शन के मामले में दोनों टीमों की हालत बिलकुल उलट है. जहाँ मोदी की विदेश नीति शानदार है वहीँ टीम कोहली का विदेशों में प्रदर्शन शून्य रहा है वहीँ टीम कोहली का घरेलू मैदानों पर प्रदर्शन अच्छा है लेकिन टीम मोदी का आतंरिक क्षेत्रों में प्रदर्शन चिंताजनक है. गंगा माँ आज भी मोदी जी को बुला रही हैं किन्तु भाजपा स्वयं गंगा बन गई है डुबकी लगाई नहीं कि भ्रष्टाचारी से परम पवित्र हो गए देश तो बदला नहीं भाजपा जरूर बदल गयी. मंदी और बेरोजगारी पहले से भी ज्यादा है, सरकारी कर्मियों तक को कई-कई महीनों तक वेतन नहीं मिल रहा, बैंक ब्याज देने के बदले खाता खाली कर रहे हैं, चारों तरफ भुखमरी है लेकिन मोदी सरकार कह रही है आप खुश होईए क्योंकि आप मोदी राज में रह रहे हैं. जैसे कोहली कहते हैं कि आप खुश होईए क्योंकि आपके देश की क्रिकेट टीम का कप्तान मेरे जैसा महान खिलाडी है भले ही टीम शर्मनाक तरीके से मैच हारती रहे. 

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

बहरीन में राहुल गाँधी का बेहया भाषण

मित्रों, हमारे बुजुर्गों ने फ़रमाया है कि किसी भी संगठन का चेहरा बदल जाने से कोई जरुरी नहीं है कि उसका चाल और चरित्र भी बदल जाए. उदाहरण के लिए अलकायदा या लश्कर का कमांडर कोई भी रहे करेगा तो वही जो उनका संगठन करता आया है. कुत्ता जब भी पेशाब करेगा तो खम्भे पर ही चाहे वो विलायती ही क्यों न हो. ठीक यही बात कांग्रेस के ऊपर भी लागू होती है. जब माँ अध्यक्ष थी तब पार्टी देशविरोधी गतिविधियों में लीन थी और आज जब बेटा अध्यक्ष बन गया है तब भी पार्टी वही कर रही है.
मित्रों, क्या आपको याद है कि इससे पहले किसी विपक्षी नेता ने विदेश जाकर देश के खिलाफ कोई बयान दिया है या देश के खिलाफ कोई अभियान छेड़ा है? दरअसल कांग्रेस मोदी विरोध और भारत विरोध का अंतर पूरी तरह से भूल गई है. नहीं तो क्या कारण था कि राहुल गाँधी विदेशी धरती पर जाकर यह कहते कि इस समय भारत में संकट की स्थिति है और प्रवासी भारतीय देश की मदद कर सकते हैं. पता नहीं राहुल जी को बहरीन से कैसी मदद चाहिए. कहीं उनको वैसी मदद तो नहीं चाहिए जैसी मदद मांगने मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान गए थे?
मित्रों, राहुल जी का कहना है कि वे ऐसे भारत की कल्पना भी नहीं कर सकते, जहां देश का हर नागरिक खुद को देश का हिस्सा न समझे. राहुल जी कल्पना तो हम भी नहीं करना चाहते लेकिन यही सच है कि एक खास विचारधारा और एक खास मजहब में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो खुद को भारत का नागरिक नहीं समझते. उनको कल तक राष्ट्र गीत से परेशानी थी, आज राष्ट्र गान से है और कल भारत राष्ट्र से होगी. लेकिन सवाल उठता है कि क्या इसके लिए राष्ट्रवादी दोषी हैं? अगर कोई वानी सरकारी सुविधाओं से लाभ उठाकर अलीगढ मुस्लिम विवि में पीएचडी की पढाई करने के बावजूद हिजबुल में शामिल हो जाता है या कोई उमर खालिद वर्षों सरकारी सब्सिडी पर जेएनयू में गुलछर्रे उड़ाने के बाद भी भारत तेरे टुकड़े होंगे हजार का नारा लगाता है तो इसके लिए कौन दोषी है? राहुल जी क्या किसी के ह्रदय में जबरदस्ती देशप्रेम पैदा किया जा सकता है? क्या आपके ह्रदय में ही पैदा किया जा सकता है? कदापि नहीं. इसी तरह से किसी के ह्रदय में जबरदस्ती देश के प्रति नफरत भी नहीं भरी जा सकती बल्कि प्रेम हो या नफरत ये तो उधो मन माने की बात होती है. अब कोई अगर अपने को देश का हिस्सा नहीं समझता है तो हमारी पहली कोशिश होती है समझाने की, सुविधा देकर मुख्य धारा में लाने की और अगर फिर भी वो नहीं मानता तो न माने अपनी बला से. और अगर फिर वो एक कदम आगे बढ़कर किसी देशविरोधी गतिविधि में संलिप्त पाया जाता है तो फिर हम देश की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकते हैं. 
मित्रों, राहुल जी फरमाते हैं कि भारत में रोजगार सृजन पिछले आठ सालों के निम्नतम स्तर पर है. सही है लेकिन इस साल ऐसी स्थिति नहीं रहेगी और रोजगार के इतने अवसर पैदा होंगे जितने पहले कभी किसी खास वर्ष में पैदा नहीं हुए. दरअसल राहुल जी अधूरा सच बोल रहे हैं. उनको सिर्फ खाली गिलास दिख रहा है या फिर वे जानबूझकर सिर्फ खाली गिलास को ही देखना और दिखाना चाहते हैं.
मित्रों, सच्चाई तो यह है कि आज तक भारत में जितना भी विदेशी पूँजी निवेश हुआ है उसका आधा सिर्फ पिछले ३ सालों में हुआ है. जाहिर है कि पैसा आ रहा है तो रोजगार भी आएगा ही. यह जानते हुए कि फैक्ट्रियों को स्थापित करने में समय लगता है राहुल गाँधी धूर्तता का प्रदर्शन करते हुए सरकार को बिलकुल भी समय नहीं देना चाहते.
मित्रों, राहुल जी को यह तो दिख रहा है कि देश में बैंक क्रेडिट ग्रोथ पिछले 63 सालों के निम्नतम स्तर पर है लेकिन यह नहीं दिख रहा कि इस समय नई रेल लाईनों के निर्माण, रेल लाईनों के दोहरीकरण, राष्ट्रीय उच्च पथ के निर्माण, शिपिंग क्षमता वृद्धि, नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन की गति पिछली सरकार के मुकाबले दोगुनी है. वे इतनी हारों के बाद भी जिद पर अड़े हैं कि नोटबंदी से देश की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा है. झटका तो लगा जरुर है लेकिन कालेधन की अर्थव्यस्था को लगा है न कि देश की अर्थव्यवस्था को.
मित्रों, राहुल जी फरमाते हैं कि सड़कों पर लोग गुस्से में दिखाई दे रहे हैं. विभाजनकारी ताकतें तय कर रही हैं कि लोगों को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं. चारों ओर नफरत फैलाई जा रही है. कैसी नफरत भाई? जातीय विभाजन तो कांग्रेस ही कर रही है. गोहत्या पर तो रोक लगाने की बात स्वयं गाँधी जी करते थे और यही कारण था कि संविधान के अनुच्छेद ४८ में इसकी व्यवस्था भी की गई है. तो क्या राहुल अब हिन्दू नहीं रहे? गाँधी तो वो कभी नहीं थे. उनका जनेऊ कहाँ गया? कहीं उन्होंने उसका पाजामे का नाडा तो नहीं बना लिया? आखिर कोई भी सच्चा हिन्दू और उसमें भी ब्राह्मण गोहत्या का समर्थन कैसे कर सकता है?
मित्रों, राहुल जी का कहना है कि दलितों को पीटा जा रहा है, पत्रकारों को धमकाया जा रहा है और जजों की रहस्यमयी हालतों में मौत हो रही है. इक्का-दुक्का घटनाओं को चलन कैसे माना जा सकता है? लड़ाई-झगडे में कभी एक पक्ष भारी पड़ता है तो कभी दूसरा. कौन-सा जज मर गया पता नहीं. क्या पहले जज नहीं मरते थे,अमर होते थे? पत्रकार अगर कानून तोड़ेंगे तो फिर कानून उनको तोड़ेगा क्योंकि वे कानून से ऊपर तो होते नहीं हैं.
मित्रों, जब भी कोई किसी को धमकाता है कानून अपना काम करता है. कई बार तो प्रधानमंत्री ने बडबोले नेताओं को चुप रहने की हिदायत दी है. क्या राहुल बताएँगे कि जब इमरान मसूद ने पीएम को बोटी-बोटी करके काटने की धमकी दी थी तब उन्होंने उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की और उसको कांग्रेस का टिकट क्यों दे दिया?
मित्रों, क्या इमरान मसूद जैसे बयानों से देश में फिर से भाईचारा आएगा और अहिंसा फैलेगी? अगर राहुल ऐसा समझते हैं तो हमें उनकी समझ पर तरस आता है. क्या गुजरात में पटेल हिंसा और महाराष्ट्र में दलित हिंसा को बढ़ावा देकर राहुल जी ने देश में सहिष्णुता को बढ़ावा दिया है?
मित्रों, मेरा मानना है कि राहुल जी को अगर अपने देश की सरकार से कोई शिकायत थी तो उनको संसद में सरकार को घेरना चाहिए था न कि विदेश में जाकर अपने ही देश के खिलाफ माहौल बनाना चाहिए था. लेकिन उनकी पार्टी संसद को तो चलने ही नहीं देती फिर चर्चा कैसे होगी. घर के झगडे को घर में ही निपटाया जाता है दूसरा देश इसमें क्या कर लेगा सिवाय दो के झगडे से लाभ उठाने के? बड़े ही दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि कांग्रेस बेवफा तो पहले से ही थी लेकिन अब लगता है कि वो बेहया भी हो गई है और अपने-पराए का अंतर भूल गई है.

शनिवार, 6 जनवरी 2018

कांग्रेस की भारतविरोधी गन्दी राजनीति

मित्रों, हम पहले भी कह चुके हैं कि कांग्रेस भारत के लिए खतरनाक थी और अब पहले से भी ज्यादा खतरनाक हो गयी है. हम पहले भी कह चुके हैं कि कांग्रेस जो दिखाती है सिर्फ वही उसका चेहरा नहीं है बल्कि एक के भीतर एक उसके कई सारे घूंघट हैं. हमेशा उसकी निगाहें जाहिर तौर पर कहीं और होती हैं और निशाना कहीं और होता है.
मित्रों, भारत में कई सौ राजनैतिक दल हैं. इन दलों को हम दो श्रेणियों में बाँट सकते हैं. पहली श्रेणी में वे हैं जिनकी प्राथमिकता में देश भले ही पहले स्थान पर नहीं हो लेकिन है जरूर और दूसरी श्रेणी में वैसे दल आते हैं जिनकी प्राथमिकता में सिर्फ सत्ता और देश को लूटना है देश कहीं है ही नहीं. दुर्भाग्यवश इस समय पहली श्रेणी में भाजपा आती है तो वहीँ दूसरी श्रेणी में वो कांग्रेस आती है जिसका इतिहास १३२ साल पुराना है.
मित्रों, आज की कांग्रेस न तो गाँधीजी वाली कांग्रेस है और न ही तिलक या पटेल वाली बल्कि आज की कांग्रेस राहुल-सोनिया वाली कांग्रेस है. यह हमारा दुर्भाग्य है कि इंदिरा के समय से ही कांग्रेस पारिवारिक संपत्ति बनकर रह गई है. पिछले २० सालों का इतिहास गवाह है कि जब भी कांग्रेस सत्ता में होती है तब तो देश को दोनों हाथों से लूटती है और जब विपक्ष में होती है तो वापस फिर से सत्ता पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार होती है फिर चाहे उससे देश को कितना भी बड़ा नुकसान ही क्यों न हो जाए. १९९९ में कांग्रेस ने कथित ताबूत घोटाले को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा लेकिन चुनाव के बाद मुद्दे को ही भूल गयी क्योंकि सारे आरोप फर्जी और मनगढ़ंत थे.
मित्रों, २०१९ के लिए कांग्रेस ने जो रणनीति बनाई है वो देश को १९९९ से भी ज्यादा महँगी पड़नेवाली है. कांग्रेस ने हिन्दुओं को जहाँ तक हो सके आपस में लड़ाने-भिड़ाने की कुत्सित योजना बनाई है और उसके इस काम में सारे छद्मधर्मनिरपेक्ष और साम्यवादी शक्तियां उसकी मदद कर रही हैं. कांग्रेस ने पटेलों के नाम पर पहले गुजरात को जलाया और अब महाराष्ट्र को जला रही है आगे पता नहीं कौन-कौन सा जिला जलेगा क्योंकि कांग्रेस को पता है कि हिन्दू अगर संगठित रहे तो भारत मजबूत होगा और महाशक्ति बन जाएगा. कांग्रेस को पता है कि मुसलमान हर स्थिति में झक मारकर उसको ही वोट देंगे और चीन-पाकिस्तान के साथ-साथ कांग्रेस को भी पता है कि मोदी की ताक़त का राज मशरूम नहीं है बल्कि हिन्दुओं की चट्टानी एकता है.
मित्रों, कांग्रेस को तो यह भी पता था कि भीमा कोरेगांव में भारत की हार और अंग्रेजों की जीत का जश्न मनाने का क्या असर होगा. आखिर इस महोत्सव को मनाने की जरुरत ही क्या थी? इतिहास गवाह है कि सिखों के खिलाफ अंग्रेजों ने पूर्वी भारत के सैनिकों को लडवाया और बाद में १८५७ के विद्रोह के समय पूर्वी भारत के सैनिकों को दबाने के लिए सिखों का प्रयोग किया. अंग्रेजों की तो नीति ही यही थी कि फूट डालो और शासन करो तो क्या सिखों और पूर्वी भारतियों को एक-दूसरे के खिलाफ जीत का जश्न मनाना चाहिए?
मित्रों, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिग्नेश मेवानी और उमर खालिद शुरू से ही कांग्रेस को लाभ पहुँचाने की दिशा में काम करते रहे हैं, भले ही ये कांग्रेस के कागजी सदस्य नहीं हैं. इतने सालों में तो कोई बड़ा कांग्रेस नेता इस मौके पर भीमा कोरेगांव नहीं गया फिर इस साल इन दोनों को क्या आवश्यकता थी दलितों के कथित विजयोत्सव में शामिल होकर तनाव को बढाने की?
मित्रों, कांग्रेस और उसके समान विचारधारा वाली पार्टियों के एजेंडे को समझिए. उनके निशाने पर न तो राजपूत हैं, न ही जाट, न ही गुज्जर या ब्राह्मण या यादव या पटेल या सिख या जैन या बनिया बल्कि उनके निशाने पर सिर्फ और सिर्फ भारत है. कांग्रेस पहले भी सत्ता के लिए भारत के टुकड़े कर चुकी है और आज भी भारतीय समाज को विभाजित कर रही है. कही भी पहले विभाजन की रेखा ह्रदय और मन में खींची जाती है बाद में जमीन पर. इसलिए भारत के सारे देशप्रेमियों को सचेत रहने की जरुरत है. इतना ही नहीं भारत के सबसे बड़े शत्रु चीन के प्रति कांग्रेस की प्रीति भी संदेह पैदा कर रही है. वैसे भी जैसे अभी पाकिस्तान के नेता विदेश भाग रहे हैं ये भारतीय अंग्रेज भी अपने पूरे कुनबे और चमचों के साथ जब देश बर्बाद हो चुका होगा क्वात्रोची की तरह इटली या माल्या की तरह लन्दन निकल लेंगे लेकिन हमें और हमारे वंशजों को तो इसी मिट्टी की खाक में मिलना है और यहीं पर रहना है इसलिए सचेत रहिए कि कहीं कांग्रेस आपके प्रदेश में भी जातीय विभाजन का गन्दा खेल तो नहीं खेल रही. जनेऊ-मंदिर धोखा है, दरअसल रावण साधू के वेश में घात लगाए घूम रहा है.

रविवार, 31 दिसंबर 2017

अलविदा २०१७ स्वागतम २०१८

मित्रों, आज साल २०१७ का अंतिम दिन है. समझ में नहीं आता कि इस साल को किस तरह याद करूँ? व्यक्तिगत जीवन की अगर बात करूँ तो ये साल हमारे लिए काफी अच्छा रहा. साल की शुरुआत में हमने अधूरा ही सही घर बनाया. भगवान ने हमें साल के अंत में दिसंबर की सात तारीख को ७ बजकर ७ मिनट पर एक और पुत्र दिया जिसका नाम उसके बड़े भाई भगत सिंह ने कुंवर सिंह रखा. लेकिन हमारा कुछ भी व्यक्तिगत तो होता नहीं है बल्कि हमारा दिल तो देश के लिए धडकता है इसलिए आगे हम बीते हुए साल की व्याख्या देश के सन्दर्भ में करेंगे.
मित्रों, इस साल हमारे देश में सबसे बड़ी घटना हुई जीएसटी लागू होना. इसे हम एक आर्थिक क्रांति का नाम भी दे सकते हैं हालाँकि वर्तमान में इसका अल्पकालिक दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि बहुत जल्दी केंद्र और प्रदेशों की सरकारें मिलकर तात्कालिक मंदी को दूर कर लेंगी और न सिर्फ जीडीपी दहांई के अंकों में दहाडेगी बल्कि तेजी से बढती बेरोजगारी भी घटेगी और भारत २०१८ में एक बार फिर से वर्ष १८१३ से पहले के भारत की तरह दुनिया की फैक्ट्री बन सकेगा.
मित्रों, इस साल में देश में जो दूसरी सबसे बड़ी घटना घटी वो थी तीन तलाक पर प्रतिबन्ध. इसे हम रक्तहीन सामाजिक क्रांति की संज्ञा भी दे सकते हैं. इस क्रांति का नेत्रित्व किया स्वयं मुस्लिम बहनों ने लेकिन उनके पीछे चट्टान की तरह खड़ी दिखी केंद्र सरकार. पहले सुप्रीम कोर्ट ने स्वाधीनता दिवस के ठीक एक सप्ताह बाद इसे प्रतिबंधित कर दिया और करोड़ों मुस्लिम महिलाओं को डेढ़ हजार साल की लैंगिक गुलामी से आजादी दे दी . परन्तु फिर भी जब तीन तलाक जारी रहा तब केंद्र सरकार ने दो कदम आगे बढ़कर संसद में तत्सम्बन्धी नया कानून पेश किया. कानून लोकसभा से ध्वनिमत से पारित भी हो चुका है, उम्मीद की जानी चाहिए कि नए साल में राज्यसभा से पारित होने के बाद लागू भी हो जाएगा. गौरतलब है कि नए कानून में तीन तलाक को गैरजमानती अपराध बना दिया गया है और इसके लिए शौहर को ३ साल की जेल हो सकती है.
मित्रों, मुस्लिम पारिवारिक और विवाह कानून में बदलाव करने की हिम्मत आज तक न तो अंग्रेजों ने की थी और न ही पिछले ७० सालों में आनेवाली सरकारों ने. अब अगर लगे हाथों जनसंख्या स्थिरीकरण की दिशा में भी कोई कानून आ जाता है तो भारत को महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता.
मित्रों, इस साल भी नरेन्द्र मोदी अपराजेय बने रहे. गोवा और मणिपुर में यद्यपि भाजपा को बहुमत नहीं मिला फिर भी अमित शाह ने अनहोनी को होनी में बदलते हुए भाजपा की सरकार बनवा दी तथापि देश के यशस्वी रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर को फिर से गोवा भेजना पड़ा. उत्तर प्रदेश में एक बार फिर से मोदी लहर चली और राजग गठबंधन ने ४०३ में से ३२५ सीटें जीत लीं और रामजी जी की कृपा से योगी सरकार अच्छा काम भी कर रही है. पंजाब,उत्तराखंड और हिमाचल में हर बार सत्ता बदली की परम्परानुसार सत्ताविरोधी लहर चली. पंजाब में भाजपा को झटका लगा तो वहीँ उत्तराखंड में उसने सरकार बनाई.
मित्रों, सबसे आश्चर्यजनक राजनैतिक बदलाव देखने को मिला बिहार में. नीतीश कुमार ने लालू परिवार को झटका देते हुए एक बार फिर से भाजपा का हाथ थाम लिया. हालाँकि अभी तक बिहार में कुव्यवस्था और कुशासन का दौर ही जारी है और न जाने नीतीश कुमार जी किस बात और किस तरह की समीक्षा के लिए एक बार फिर से यात्रा पर निकले हुए हैं. इससे तो अच्छा होता कि वे एक बार पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल की औचक यात्रा कर लेते. चिराग तले ही अँधेरा है, बालू पर रोक के चलते लाखों ट्रक मालिक और करोड़ों मजदूर भुखमरी को मजबूर हैं और नीतीश सुशासन का बुझा हुआ दीपक लेकर घूम रहे हैं चंपारण और जमुई में.
मित्रों, साल का अंत हुआ गुजरात और हिमाचल के बहुचर्चित चुनावों से. हिमाचल की बात हम पहले ही कर चुके है. गुजरात में इस बार कांग्रेस ने बिहार वाला कुत्सित फार्मूला अपनाया जिससे भाजपा को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. ईधर भाजपा का हिन्दू वोट बैंक बंट गया तो उधर सारी जातिवादी और सांप्रदायिक शक्तियां कांग्रेस के पक्ष में एकजुट हो गईं. कांग्रेस ने अपनी रणनीति में मौलिक परिवर्तन करते हुए यहाँ सॉफ्ट हिन्दू कार्ड खेला जिसका उसे लाभ भी मिला तथापि देखना है कि कांग्रेस कब तक अपने नए रूख पर कायम रहती है और कब तक फिर से भगवा आतंकवाद के अपने हिंदूविरोधी एजेंडे पर नहीं जाती है. राहुल की ताजपोशी को मैंने बहुत बड़ी घटना नहीं मानता. अंतर बस इतना आया है कि पहले बेटा छुट्टी पर जाता था अब माँ जा रही है. हालाँकि गुजरात में भाजपा जीत गई है लेकिन उसके कमजोर होने का असर अब भी दिख रहा है क्योंकि उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल अभी से ही आँखें दिखाने लगे हैं. आगे क्या होगा रामजी ही जानें.
मित्रों, बीते साल में अदालतों की निरंकुशता जारी रही. जिसको जी चाहा छोड़ दिया जिसको जी चाहा जेल भेज दिया. उच्च न्यायालय के एक जज ने तो घनघोर क्रांतिकारिता दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ ही अवमानना का मुकदमा चलाने का आदेश दे दिया. श्रीमान ६ महीने की सजा काटकर बाहर आए हैं. देश की जनता २०१७ में भी न्यायिक सुधार की प्रतीक्षा करती रही लेकिन निराशा ही हाथ लगी. कोलेजियम सिस्टम को लेकर भी गतिरोध बना रहा अलबत्ता राममंदिर की रोजाना सुनवाई का रास्ता जरूर साफ़ हो गया है.
मित्रों, कूटनीति के परिपेक्ष्य में भारत ने चीनी सेना को डोकलाम में पीछे हटने के लिए बाध्य करके अभूतपूर्व सफलता पाई. ईरान के चाबहार बंदरगाह से अफगानिस्तान माल पहुंचाकर भारत ने एक मील का पत्थर स्थापित किया. साल के मध्य में प्रधानमंत्री ने इजराईल की यात्रा की जिससे भारत की सामरिक शक्ति में अकूत वृद्धि का मार्ग खुला. ऐसा करनेवाले वे भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं. साल के अंत में येरुसलम के सवाल पर भारत ने यूएनओ में इजराईल के खिलाफ वोट दिया लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि इसका दोनों देशों के संबंधों पर बुरा असर नहीं पड़ेगा. तथापि फिलिस्तीन के राजदूत ने हाफिज सईद के साथ खड़े होकर भारत सरकार की फिलिस्तीन नीति पर सवालिया निशान जरूर लगा दिया है. श्रीलंका ने हम्बनतोता बंदरगाह चीन के हवाले करके भारत को करारा झटका दिया तो वहीँ मालदीव भी चीन के नजदीक जाता दिखा. रोहिंग्या शरणार्थियों की समस्या ने भी भारत के सामने नई चुनौतियाँ पेश की. देखना है कि भारत सरकार इससे कैसे निबटती है. कुलभूषण जाधव की रिहाई बीते साल भी नहीं हो पाई और पाकिस्तानी गोलीबारी में रोजाना जवान कालकवलित होते रहे. नए साल में देखना है कि भारत सरकार चीन और पाकिस्तान से कैसे निबटती है.
मित्रों, आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर गत वर्ष सुधार हुआ और नक्सली हमले में प्रभावी कमी आई. कश्मीर में दो सौ से ज्यादा आतंकियों को जहन्नुम का रास्ता दिखाया गया और स्थिति ऐसी भी आई कि कोई जैस और लश्कर का कमांडर बनने को ही तैयार नहीं था.
मित्रों, कुल मिलाकर देश के लिए भी २०१७ अच्छा रहा यद्यपि अर्थव्यवस्था की हालत नाजुक बनी रही और बेरोजगारी घटने के बजाए बढ़ी. लगा जैसे जीएसटी लागू करने से पहले भी सरकार ने नोटबंदी की तरह ही पूरी तैयारी नहीं की थी. जहाँ तक साल २०१८ का सवाल है तो यह साल मोदी सरकार के लिए काफी महत्वपूर्ण रहनेवाला है क्योंकि २०१९ के लोकसभा चुनाव में जनता का जो भी निर्णय होगा वो केंद्र और १९ राज्यों में सत्तासीन भाजपा सरकारों के आगामी वर्ष में प्रदर्शन पर निर्भर करेगा. आशा करनी चाहिए कि नए साल में जो भी होगा देश और देशवासियों के लिए अच्छा ही होगा क्योंकि उम्मीद पर ही दुनिया कायम है.

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

पगड़ी संभालिए मोदी जी

मित्रों, हम भारतीयों के लिए पगड़ी का बड़ा महत्व है. सौभाग्यवश इस बात को हमारे प्रधान सेवक जी भी खूब समझते हैं. तभी तो लगभग हर भाषण में पगड़ी धारण किए रहते हैं. पगड़ी एक कपडा-मात्र नहीं होती वो एक जिम्मेदारी भी होती हैं.
मित्रों, जाहिर हैं कि हमारे प्रधान सेवक जी को जिम्मेदारियां देना नहीं लेना ज्यादा पसंद है. ऐसा जज्बा होना भी चाहिए लेकिन क्या वे इसमें सफल भी हो रहे हैं? क्या एक अकेली जान सबकुछ कर सकता है? अगर ऐसा संभव होता तो भगवत और देव मंडली में पोर्टफोलियो सिस्टम नहीं होता. फिर आदमी की तो औकात ही क्या!
मित्रों, जब मोदी सरकार ने शपथ ली थी तब और बाद में भी मैं बार-बार कहता आ रहा हूँ कि प्रधान सेवक जी आपका मंत्रिमंडल सही नहीं है. चाहे आप कपिलदेव को कप्तान बना दीजिए या इमरान खान को या फिर क्लाईब लायड को जब टीम अच्छी नहीं होगी कप्तान कुछ नहीं कर सकता. जब कई महीने पहले कई मंत्रियों से प्रधान सेवक जी ने इस्तीफा लिया तो लगा कि देर से ही सही उन्होंने हमारी बातों पर ध्यान दे दिया है लेकिन हुआ कुछ नहीं. एक रूडी भैया की बलि देकर सुधार की खानापूरी कर ली गई. जो मजबूत पड़े बच गए कमजोर पड़े नप गए.
मित्रों, फिर तो देश की जो स्थिति होनी थी हो रही है. देश इस समय एक साथ मंदी और महंगाई की विकट स्थिति को झेल रहा है. उधर किसान १० पैसे किलो आलू और ४ रूपये किलो मूंगफली बेचने को बाध्य हैं तो ईधर उपभोक्ताओं को वही आलू १२० गुना महंगा १२ रूपये किलो और मूंगफली २५ गुना महंगा १०० रूपये किलो मिल रहा है. दोनों छोर पर बैठे लोग मर रहे हैं और बीचवाला माल छाप रहा है. सरकार कहती है कि जीएसटी कम कर दिया लेकिन एक तरफ उपभोक्ताओं को सामान पुराने दरों पर ही मिल रहा है वहीँ दूसरी ओर सरकार को जीएसटी का भुगतान नए दर से किया जा रहा है. सेल टैक्स, इनकम टैक्स आदि सारे विभागों के बाबुओं का हफ्ता फिक्स है इसलिए सब आँखवाले अंधे बने हुए हैं. पाकिस्तान की गोलीबारी में आज भी रोजाना हमारे जवान बेमौत मारे जा रहे हैं. धंधा मंदा है और बेरोजगारी बढती ही जा रही है.
मित्रों, न्यायपालिका निरंकुश है, न्याय दुर्लभ है, कदम-२ पर घूसखोरी और कमीशनखोरी है, सार्वजानिक शिक्षा की मौत हो चुकी है और निजी विद्यालय लूट मचाए हुए हैं, परीक्षा दिखावा बनकर रह गई है, असली से ज्यादा नकली दावा बाजार में है, सरकारी अस्पतालों में कुत्ते टहल रहे हैं और निजी अस्पतालों से तो लुटेरे कहीं ज्यादा भले, पुलिस खुद ही अपराध कर और करवा रही है, सारे धंधे मंदे हैं लेकिन अवैध शराब और गरम गोश्त का व्यापार दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति कर रहा है. पुलिस छापा मारती भी है तो सरगने को भगा देती है और बांकी लोग भी एक-दो महीने में ही न जाने कैसे बाहर आ जाते हैं. कुल मिलकर स्थिति इतनी बुरी है कि पीड़ित may I help you का बोर्ड लेकर घूमनेवाली पुलिस के पास जाने से भी डरते हैं. बैंकों की तो पूछिए ही नहीं पहले १० %  कमीशन काट लेते हैं बाद में लोन की रकम देते हैं. बिहार में तो यही रेट है इंदिरा आवास तक में और प्रधान सेवक समझते हैं कि १००% पैसा गरीबों तक पहुँच गया. इतना ही नहीं क्या अमीर और क्या गरीब बैंक न्यूनतम राशि खाते में न होने के बहाने बिना हथियार दिखाए सबको लूट रहे हैं.
मित्रों, बिहार की स्थिति तो और भी बुरी है. यहाँ छोटे भाई नीतीश और छोटे मोदी मिलकर बालू से तेल निकालने का अनथक प्रयास कर रहे है जिससे गृह-निर्माण से जुड़े सारे दिहाड़ी मजदूर फांकाकशी को मजबूर हैं. खजाना खाली होने से सरकारी कर्मियों तक को कई-२ महीने तक वेतन के दर्शन नहीं होते. कुल मिलाकर जो गति तोरा सो गति मोरा रामा हो रामा. आम आदमी मर रहा है वहीँ तंत्र शराब बेचकर और घूस खाकर अपनी तोंद फुला रहा है.
मित्रों, सवाल उठता है कि इसका ईलाज क्या है? ईलाज तो यही है कि मोदी जी को समझ लेना होगा कि उनकी सरकार का हनीमून पीरियड अब समाप्त हो चुका है. जनता की आँखों में कुछ समय के लिए धूल जरूर झोंका जा सकता है लेकिन उनको स्थाई रूप से अंधा नहीं किया जा सकता. नोटा का सोंटा अभी गुजरात में चला है कल पूरे हिंदुस्तान में चलेगा. आज गुजरात में मोदी जी की पगड़ी उछलने से बच गई है लेकिन क्या पूरे देश में बच पाएगी? न जाने मोदी जी किससे और क्यों भयभीत हैं जबकि उनके पीछे सवा सौ करोड़ भारतीयों का न सही नए सर्वे के अनुसार कम-से-कम ८० करोड़ भारतीयों का समर्थन है? कहीं ऐसा न हो कि नेहरु जैसी ताकत पाने के चक्कर में मोदी जी की हालत सब साधै सब जाए वाली हो जाए. जागिए मोदी जी और अपनी और हमारी पगड़ी संभालिए क्योंकि हमने अपनी पगड़ी आपके हवाले कर रखी है. कुछ ऐसी धरातल पर दिखनेवाली योजनाएं भी बनाईए जिनकी समय सीमा २०१९ हो २०२२ नहीं क्योंकि २०१९ २०२२ से पहले आता है बाद में नहीं. साथ ही सरकार GDP के आंकड़े दिखाना बंद करे क्योंकि मुकेश अम्बानी की आय में तो हजारों करोड़ की वृद्धि हो गई लेकिन आम आदमी की हालत आज २०१४ से कहीं ज्यादा ख़राब है.

रविवार, 24 दिसंबर 2017

कब तक बेवजह शहीद होते रहेंगे जवान?

मित्रों, वैसे तो देश पर शहीद होना गर्व की बात होती है. हम राजपूतों से ज्यादा इस बात को कौन जानता है? लेकिन हमें याद है कि जब हमारे छोटे चचेरे भाई वीरमणि ने १९९९ में अप्रतिम वीरता का प्रदर्शन करते हुए शहादत दी थी तब हमारे परिवार की क्या हालत हो गई थी. जी में आता था कि अभी हाथ में बन्दूक उठाऊँ और पाकिस्तान का नामोनिशान मिटा दूं. शहादत से १० दिन पहले ही तो हमसे मिलकर वो गया था और पांव छूकर हमसे आशीर्वाद लिया था.
मित्रों, खैर मेरे भाई ने तो तब शहादत दी थी जब पाकिस्तान के साथ घोषित युद्ध चल रहा था लेकिन आजकल तो कोई युद्ध नहीं चल रहा फिर रोजाना हमारे जवान क्यों शहीद हो रहे?  पिछले तीन वर्ष में देश के अन्दर और बाहर 425 भारतीय सशस्त्र बल के जवान शहीद हो चुके हैं। इस बात की जानकारी लोकसभा में रक्षा राज्यमंत्री डॉक्टर सुभाष भामरे ने दी। उन्होंने बताया कि 2014 से 2016 के बीच भारतीय सेना के 291, नौसेना के 105 और वायुसेना के 29 जवानों ने शहादत दी है।
मित्रों, हमारे प्रधान मंत्री कहते हैं कि हमें चलता है की आदत को बदलना पड़ेगा तो हम पलटकर उनसे से पूछना चाहते हैं कि सैनिकों की शहादत के मामले में कब चलता है बंद होगा और कब तक बिना घोषित युद्ध के ही हमारे बहुमूल्य जवान मरते रहेंगे? अपने निजी अनुभव के आधार पर हम जानते हैं कि जब कोई जवान शहीद होता है तो वो अकेला शहीद नहीं होता बल्कि उसके साथ उसका परिवार भी शहीद होता है. माँ-बाप आजीवन अपने बेटे, पत्नी अपने पति, भाई-बहन अपने भाई के लिए तरसते रहते हैं. बच्चों के भी अरमानों का खून हो जाता है.
मित्रों, नेताओं का क्या है वो तो पहले भी कहते रहे हैं कि जवान सेना में जाता ही है शहीद होने के लिए. आज भी वे उतनी ही आसानी से यह बात कह सकते हैं क्योंकि उनका कोई सगा तो सेना में जाता नहीं.
मित्रों, कल जिस तरह से दिन के १२ बजे एक मेजर सहित हमारे ४ जवानों को पाकिस्तानी गोलीबारी में जान देनी पड़ी वो यह बताने के लिए काफी है कि अब पानी सर से होकर गुजर रहा है. अब वो वक़्त आ गया है कि पाकिस्तान को यह बता दिया जाना चाहिए कि हम उसकी शरारतों को और बर्दाश्त कर सकने की स्थिति में नहीं हैं. हमारे जितने जवान कारगिल युद्ध में मारे गए थे लगभग उतने जवान पिछले ३ सालों में बेवजह मारे जा चुके हैं और हम हैं कि अभी भी ट्विट-ट्विट खेल रहे हैं. कब बंद होगी हमारे जवानों की शहादत? कब एक सर के बदले १०० नरमूंडों को लाया जाएगा? अगर एक और कारगिल जरूरी है और हो जाए लेकिन पाकिस्तानी बंदूकों का मुंह बंद होना ही चाहिए जल्द-से-जल्द. सेना और भारत सरकार अगर उम्र में छूट देती है तो माँ भवानी की कसम हम खुद भी इसमें हिस्सा लेंगे. जब ८० साल की आयु में बाबू कुंवर सिंह जंग लड़ सकते हैं तो हम तो अभी उनसे आधी उम्र के ही हैं.  

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

कानून के साथ एक साक्षात्कार

मित्रों, कल हमारी अचानक मुलाकात उस शक्सियत के साथ हो गई जिसके बारे में अक्सर कहा जाता है कि उसका भारत में राज है. दरअसल कल मैं सदर अस्पताल के दौरे पर था खबर की तलाश में तभी मैंने एक अपाहिज वृद्धा को अस्पताल के सामने लगे कूड़े के ढेर के पास कराहते हुए देखा. बेचारी के अंग-अंग से खून टपक रहा था. वो कराह भी रही थी लेकिन जैसे मारे कमजोरी के उसके मुंह से कोई आवाज ही नहीं निकल रही थी. लोग-बाग़ आ-जा रहे थे लेकिन कोई उनकी तरफ देख तक नहीं रहा था.
मित्रों, मेरे मन में दया का सागर उमड़ पड़ा और मैं जा पहुँचा उसके पास. लेकिन जब उसने अपना परिचय दिया तो जैसे मुझे ४४० वोल्ट का झटका लगा. उनसे बताया कि वो कानून है. फिर मैंने पूछा कि नेताओं का तो यह कहते मुंह नहीं दुखता कि देश में कानून का राज है फिर आपकी ऐसी हालत कैसे हो गई तो उसकी आँखों से जैसे गंगा-जमुना की धारा बह निकली. उसने रूंधे हुए गले से कहा कि झूठ बोलते हैं सारे. सच्चाई तो यह है कि कभी मेरा राज था ही नहीं. जब अंग्रेजी शासन था तब मैं अमीरों की रखैल थी. हालाँकि पत्नी का दर्जा तो मुझे नहीं मिला हुआ था लेकिन मेरा ख्याल जरूर रखा जा रहा था लेकिन जबसे देश में मेरे अपनों का शासन आया है लगातार मेरी उपेक्षा बढती गई है. अब तो मेरी स्थिति इतनी बुरी हो गई है कि मेरा प्रत्येक अंग सड़ने लगा है लेकिन घर में देखभाल तो दूर की बात है अस्पताल तक में मुझे जगह नहीं मिल रही है. कभी कोई जूठन फेंक गया तो खा लेती हूँ. कुत्ते अलग मुझे नोच लेने के चक्कर में रहते है. सहायता के लिए चिल्लाते-चिल्लाते मेरा गला भी बैठ गया है लेकिन कोई नहीं सुन रहा. मैं जब अपना धौंस दिखाकर धमकाती हूँ तो चोर-उच्चके तक ताना देते हैं कि हमने तेरे परिजनों, तेरे रक्षकों को ही खरीद लिया है तू हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती.
मित्रों, हमसे रहा नहीं गया और हम इमरजेंसी वार्ड की तरफ लपके और अधिकारियों से कहा कि बेचारी बुढ़िया को भर्ती कर लो तो उन्होंने टका-सा जवाब दिया कि टका है क्या?  उसने यह भी पूछा कि वो तेरी क्या लगती है? उन्होंने मुझे फटकार लगाई कि जब उसको उसके अपनों ने ही मरने के लिए छोड़ दिया है तो तू क्यों उसकी चिंता में दुबले हो रहे हो? मैं भला कहाँ से पैसे लाता मैं खुद फटेहाल इसलिए वहां से चुपचाप टरक लेने में ही भलाई समझी. लेकिन दूर तक उस गरीब-लाचार बुढ़िया की आँखें मेरा पीछा कर रही थीं और ईधर मेरी आँखें भी जैसे छलकने को बेताब हो रही थीं.

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

मोदी सरकार की साख पर बट्टा है २जी पर कोर्ट का फैसला

मित्रों, आज ही २जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर कोर्ट का फैसला आया है और क्या फैसला आया है! आरुषि हत्याकांड, सलमान खान हिट एंड रन केस,जेसिका लाल केस, प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड, शशिनाथ झा मर्डर केस की तरह बिल्कुल अप्रत्याशित. जिस तरह जेसिका लाल के मामले में कोर्ट ने कहा था कि नो वन किल्ड जेसिका अर्थात किसी ने भी जेसिका की हत्या नहीं की बल्कि उसकी हत्या उसी तरह से हो गई जैसे मुहब्बत हो जाती है की नहीं जाती उसी तरह आज कोर्ट ने कहा है कि किसी ने घोटाला नहीं किया घोटाला हो गया. लेकिन सवाल उठता है कि कोर्ट ने आज जो पागलपंथी भरा फैसला सुनाया है क्या उसके लिए अकेले कोर्ट ही जिम्मेदार है?

मित्रों, देख रहे हैं और देखकर लगातार निराश हो रहे हैं कि सरकारी तोते सीबीआई के कामकाज करने का तरीका आज भी वही है जो सोनिया-मनमोहन के समय था. बिहार के सृजन घोटाले को सबसे पहले उजागर करनेवालों में मेरा नाम भी आता है लेकिन मुझे भारी दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि इस मामले में सीबीआई ने जानबूझकर समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं किया जिससे लगभग सारे बाघडबिल्ले बाहर आ गए. इतना ही नहीं आगे भी लगता है कि सीबीआई मामले की सिर्फ लीपापोती ही करनेवाली है. सवाल उठता है कि क्या यही रिकॉर्ड लेकर प्रधानमंत्री २०१९ में जनता के समक्ष जानेवाले हैं? अगर यहीसब करना था तो फिर जनता को ठगा क्यों? क्यों भ्रष्टाचार मुक्त समाज और देश के सपने दिखाए?

मित्रों, माननीयों के लिए अलग से कोर्ट बना देने मात्र से क्या सरकार की जिम्मेदारियां समाप्त हो जाती हैं? उनके खिलाफ निष्पक्ष तरीके से मुकदमा कौन लडेगा कौन जाँच करेगा? क्या वहां भी सरकार उसी तरह केस लड़ेगी जैसे उसने २जी मामले में लड़ा है या सृजन घोटाले में लड़ रही है? मोदी जी २०१९ देखते-देखते सर पर आकर खड़ा हो जाएगा इसलिए न्यायपालिका और शिक्षा में सुधार, रोजगार-सृजन, कालाधन आदि की दिशा में जो भी करना जल्दी करिए। ऐसा न हो कि फिर देर हो जाए और जिस खूनी पंजे के हाथों से आपने देश को निकाला है फिर से देश उन्हीं देशद्रोही हाथों में चला जाए. मैं सीधे आपसे पूछना चाहता हूँ कि आप जिन लोगों पर सार्वजानिक मंचों से गंभीर आरोप लगाते रहते हैं वे आजाद हवा में साँस कैसे ले रहे हैं? क्या आपको सिर्फ और सिर्फ आरोप लगाना ही आता है?

मित्रों, जो लोग आज फिर से जीरो लॉस थ्योरी की बात कर रहे हैं उनको मैं बता देना चाहता हूँ कि घोटाला तो हुआ था और जरूर हुआ था क्योंकि अगर सही तरीके से स्पेक्ट्रम अलॉटमेंट होता तो सरकार को ज्यादा फायदा होता। नियम बदलकर पहले आओ, पहले पाओ पॉलिसी अपनाई गई। मोदी सरकार ने नीलामी की तो न केवल ज्यादा पैसा मिला बल्कि आज फोन और डाटा की दर उस समय की अपेक्षा काफी सस्ती भी है। सनद रहे कि बाद में मोदी सरकार ने स्पेक्ट्रम को नीलाम किया। नतीजा यह हुआ कि जिस स्पेक्ट्रम के पहले 1734 करोड़ मिल रहे थे 2015 में 1.10 लाख करोड़ रुपए मिले। कुल मिलकर पूरे घटनाक्रम को अगर देखा जाए तो बिना नीलामी के स्पेक्ट्रम कुछ लोगों को दे दिया गया। पहले आओ पहले पाओ की पॉलिसी को भी बदलकर पहले पेमेंट करो, पहले पाओ कर दिया गया। यह पूरी तरह से भ्रष्ट पॉलिसी थी। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी यही कहा था और आगे भी मामला सुप्रीम कोर्ट तक जानेवाला है।

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

क्या कांग्रेस आतंकी संगठन नहीं है?

मित्रों, हमारे पूर्वजों ने जो आजादी की लडाई के समय गर्व से सीना चौड़ा करके कहते थे कि मैं कांग्रेसी हूँ कभी सपने में भी नहीं सोंचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब कांग्रेस देशविरोधी आतंकवादियों की पार्टी बन जाएगी. क्या विडंबना है कि पाकिस्तान में जब भारत का सबसे बड़ा घोषित शत्रु आतंकी संगठन जमात उद दावा का संस्थापक हाफिज सईद चुनाव लडेगा तब लडेगा भारत में तो कांग्रेस पार्टी कई दशकों से न केवल चुनाव लडती आ रही है बल्कि देश पर अधिकांश समय राज भी किया है.

मित्रों, आतंकी सिर्फ वही नहीं होता जो फसाद करता है और निर्दोषों की हत्या करता है बल्कि वो भी आतंकी है जो उनको आर्थिक या नैतिक समर्थन देता है. हाफिज सईद अगर आतंकी है तो उससे सहानुभूति रखनेवाला हर व्यक्ति और हर संगठन आतंकी है. मौलाना मसूद अजहर अगर आतंकी है तो उसको लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ में वीटो करनेवाला चीन भी आतंकी है. चीन और पाकिस्तान तो फिर भी हमारे जानी दुश्मन है लेकिन यह समझ में नहीं आता कि स्वर्णिम इतिहास वाली कांग्रेस पार्टी कैसे भारतविरोधी आतंकियों से सहानुभूति रख सकती है. क्या उसको अब भारत में राजनीति नहीं करनी है? पाकिस्तान से चुनाव लड़ना है?

मित्रों, क्या कारण है जब भी किसी आतंकी का मुकदमा कोर्ट में जाता है तो कांग्रेसी वकीलों की फ़ौज उनके बचाव में खड़ी हो जाती है? कपिल सिब्बल का सोनिया और राहुल गाँधी के लिए वकालत करना तो समझ में आता है लेकिन सिमी, याकूब मेनन , कन्हैया, ख़ालिद उमर के लिए उनका व अन्य कांग्रसियों का कोर्ट में पैरवी करना समझ में नहीं आता. यहाँ तक कि तीन तलाक और राम मंदिर के मुद्दे पर भी सिब्बल कट्टरपंथी मुस्लिमों के पक्ष में खड़े होने से नहीं चूकते। यहाँ तक कि जब पाकिस्तान की अदालत हाफिज सईद को रिहा करती है तो कांग्रेस के होनेवाले महाराज राहुल गाँधी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता. वे इसके लिए पाकिस्तान की आलोचना करने और भारत सरकार के साथ मिलकर एकजुटता दिखाने के बदले उसका मजाक उड़ाने लगते हैं वो भी निहायत फूहड़ शब्दों में कि मोदी जी आपको ट्रम्प से और गले मिलना होगा हाफिज बाहर आ गया है. हद तो यह है कि कश्मीर में कांग्रेस का साझीदार फारूख अब्दुल्ला इन दिनों लगातार भारत के खिलाफ बोल रहा है फिर भी कांग्रेस चुप लगाए हुए है जैसे वो उसके ही मन की बात बोल रहा हो. सैयद अली शाह गिलानी के साथ कांग्रेसी नेताओं के कितने मधुर सम्बन्ध हैं यह हमलोग कई बार समाचार चैनलों पर देख चुके हैं.

मित्रों, कांग्रेस इतने पर ही रूक जाती तो फिर भी गनीमत थी जब चीन और भारत की सेना डोकलाम में आमने-सामने थी तब राहुल जा पहुंचे चीनी दूतावास में चीन के राजदूत से गले मिलने और कदाचित उनको यह बताने कि चढ़ बैठो भारत पर मैं तुम्हारे साथ हूँ. सिर्फ ऊपर के नेताओं तक बात थम जाती तो फिर भी गनीमत थी आज स्थिति इतनी बुरी हो गई है कि कांग्रेस के जिला और प्रखंड स्तर के कार्यकर्त्ता लश्कर के आतंकी निकल रहे हैं. जिस नोटबंदी के चलते कश्मीर में आतंकवाद में कमी आई है कांग्रेस अभी भी उसकी आलोचना किए जा रही है. समझ में नहीं आता कि अगर कश्मीर में आतंकवाद में कमी आती है तो इससे कांग्रेस को कैसी हानि हो रही है? क्या आपने कभी कांग्रेस को कश्मीर में होनेवाली किसी आतंकी घटना की निंदा करते हुए देखा है? आपको यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि हिज्बुल चीफ सैयद सलाऊद्दीन १९८७ में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुका है. आपको यह जानकर भी आश्चर्य होगा कि जब केंद्र में मनमोहन और कश्मीर में छोटे अब्दुल्ला की सरकार थी तब सीआरपीएफ़ के जवानों को कश्मीर में बिना हथियार के ड्यूटी करने के लिए बाध्य किया गया था. इतना ही नहीं आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने पर सेना के अधिकारियों को जेल जाना पड़ता था और कई तो अभी भी जेल में हैं.

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

कांग्रेसी कसमें और वादे बातें हैं बातों का क्या

मित्रों, क्या आपने कभी सब्जियों के दरख्तों का बगीचा देखा है? नहीं, क्या बात करते हैं? लगता है कि आपने चुनाव-दर-चुनाव कभी कांग्रेस पार्टी का घोषणा-पत्र नहीं पढ़ा है या फिर आपकी याददाश्त कमजोर है भारत की उस जनता की तरह जो ३ साल में ही भूल जाती है कि कांग्रेस ने केंद्र में यूपीए सरकार के समय कैसे-२ और कौन-२ से घोटाले किए थे. क्या कहा आपने कि आप उस पार्टी को झूठी व ठग पार्टी मानते हैं इसलिए आप उसका घोषणापत्र पढ़ते ही नहीं. वाह फिर तो आप बहुत समझदार हैं लेकिन तभी जब आप उसको वोट भी नहीं दें.

मित्रों, अब देखिए और सोंचिए न कि कांग्रेस पार्टी अपने घोषणापत्र में जो वादे लेकर आई है उसमें दूरदर्शिता क्या है? क्या इसमें कहीं यह बताया गया है कि वो राज्य के विकास के लिए क्या करेगी,राज्य के लोगों का जीवन-स्तर सुधारने के लिए क्या करेगी? बल्कि वो तो कहती है कि गुजरात के लोगों को पता है कि खुद का विकास कैसे करना है। अच्छा फिर आपकी जरुरत ही क्या है? वो यह भी भरमाते हैं कि विकास की अंधी दौड़ नहीं होनी चाहिए, विकास का मतलब खुश रहना होता है।

मित्रों, केंद्र में जब यूपीए की सरकार थी तो इसने सबको क्या मस्त खुश किया था? ए राजा खुश मतलब जनता खुश, एयर चीफ मार्शल त्यागी खुश जनता खुश, माल्या खुश पूरा देश खुश हाथ में किंगफिशर की बोतल पकड़कर. मतलब कि इन मतलबी लोगों का तो नारा ही यही है कि स्वयं जेब फाड़कर खाऊँगा और सबको पेट फाड़कर खाने दूंगा. खुद खुश रहूंगा और सारे घोटालेबाजों को खुश रखूंगा. जनता को चाटने के लिए लोल्लीपॉप थमा दूंगा. वैसे भी राहुल बाबा के अनुसार सुख और कुछ तो है नहीं मन की एक अवस्था मात्र है.

मित्रों, स्वतंत्र भारत के चुनावी इतिहास पर जब हम नजर डालते हैं तो घनघोर आश्चर्य होता है कि कांग्रेस पार्टी बार-२ काठ की हांडी में चुनावी खिचड़ी कैसे पका ले रही है और जनता कैसे उनके हाथों ख़ुशी-२ ठगी जाती है. कैसे जनता हो पता ही नहीं होता कि उसको ठगा गया है.

मित्रों, हमारे प्रधान सेवक जी को भी इन दिनों जो कहना चाहिए नहीं कह रहे हैं हालाँकि कर तो वही रहे हैं जो उनको करना चाहिए. हम जानते हैं कि भारत के कुछेक लोगों के लिए अभी भी नेशन फर्स्ट नहीं है लेकिन प्रधान सेवक जी को इसके लिए आह्वान करने से किसने रोका है? जब उनके मन में कोई खोट या छल नहीं है तो फिर देश की जनता से खुलकर और साफ़-२ बात करनी चाहिए कि हम जो भी अलोकप्रिय कदम उठा रहे हैं आपके लिए उठा रहे हैं, हम जो कुछ भी कर रहे हैं वो आपके लिए और आपके देश के लिए कर रहे हैं इसलिए कष्ट के खेद है और उसके बाद उनको बोलना चाहिए कि कांग्रेस के कैरेक्टर सर्टिफिकेट में छेद ही छेद है. ठीक उसी तरह से निर्भय होकर जनता से बात करनी चाहिए जैसे वो २०१४ में करते थे.

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

पढ़े फारसी बेचे तेल

मित्रों, जबसे १९९१ में भारत में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई तभी से देश में रोजगाररहित विकास के आरोप लगते रहे हैं हालाँकि इस दौरान देश की जीडीपी में तीव्र और अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिली है. २०१४ में जब नरेन्द्र मोदी की सरकार सत्ता पर काबिज हुई तो इस वादे के साथ कि वो हर साल १ करोड़ लोगों को रोजगार देगी. लेकिन अब तक इस दिशा में जो काम हुआ है वो कहीं से भी सराहनीय या संतोषजनक नहीं कहा जा सकता. तथापि अगर प्रति वर्ष १ करोड़ रोजगारों का सृजन कर भी लिया जाता है तो भी बेरोजगारी बढ़ेगी ही क्योंकि खुद केंद्र सरकार के आकंडे बताते हैं कि तेज जनसंख्या-वृद्धि के चलते देश में हर साल १२ मिलियन यानि १ करोड़ २० लाख नए श्रमिक जुड़ रहे हैं.

मित्रों, सीआईआई के अनुसार, वित्त वर्ष 2012 से 2016 के बीच भारत में रोजगार के 1.46 करोड़ मौके बने थे. यानी हर साल 36.5 लाख अवसर. साल 2016 की श्रम मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, बावजूद इसके पिछले सात सालों में टेक्सटाइल्स और आॅटोमोबाइल सहित आठ सेक्टर में रोजगार सृजन सबसे धीमा रहा है। 

मित्रों, प्रौद्योगिकी में उभरती तकनीकी के चलते भी नौकरियों में गिरावट देखने को मिली है।  मैककिंसे एंड कंपनी की एक रिसर्च आर्म्स ने 46 देशों में 800 से अधिक व्यवसायों को रिकवर किया, जिसके अनुसार 2030 तक दुनियाभर के कुल 800 मिलियन श्रमिक रोबोट और आॅटोमेटेड तकनीक के चलते अपनी नौकरियां खो सकते हैं। यह संख्या पूरी दुनिया के मजदूरों का पांचवा हिस्सा है. देश की सबसे बड़ी भर्ती कंपनी टीमलीज सर्विसेज लिमिटेड के मुताबिक रोबोटिक्स के चलते पिछले साल की तुलना भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के जॉब्स में 30 से 40 फीसदी की कमी देखी जा सकती है। साथ ही नोटबंदी और जीएसटी के चलते भी बहुत-से लघु और माध्यम उद्योग बंद हो गए हैं. उदाहरण के लिए सूरत के साड़ी और हीरा उद्योग, कानपुर के चमड़ा उद्योग, भदोही के कालीन उद्योग, लुधियाना के रेडीमेड-वस्त्र उद्योग, मुरादाबाद के पीतल उद्योग, फिरोजाबाद के चूड़ी उद्योग और अलीगढ के ताला उद्योग से जुड़ी कई फैक्ट्रियों पर ताले लग चुके हैं. यहाँ मैं आपको बता दूं कि लघु और माध्यम उद्योग कृषि के बाद भारत में सबसे ज्यादा रोजगार देनेवाला क्षेत्र है और इसमें लगभग ४५ करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है. साथ ही भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इसकी हिस्सेदारी भी ४५ प्रतिशत की है.

मित्रों, अगस्त महीने में, औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग द्वारा जारी एक परिपत्र में कहा गया है कि भारत को भविष्य के लिए एक नई औद्योगिक नीति बनाने की जरूरत है, ताकि देश में प्रतिवर्ष कम से कम 100 अरब डॉलर की एफडीआई आकर्षित की जा सके। इस परिपत्र में यह दर्शाया गया है कि भारत में रोजगार सृजन ग्रोथ बिल्कुल धीमी है। इस नई औद्योगिक नीति के लिए केंद्र सरकार ने एक टास्क फ़ोर्स गठित किया है।

मित्रों, आर्थिक वृद्धि के साथ रोजगार के मौके बनने की रफ्तार बढ़ाने के लिए नीति आयोग ने भी तीन साल का एक ऐक्शन प्लान पेश किया है, जिसमें विभिन्न सेक्टरों में रोजगार सृजित करने की बात की गई है.

मित्रों, देखना यह है कि सरकार २०१९ तक सिर्फ योजनाएं और टास्क फ़ोर्स ही बनाती रहती है या फिर इस दिशा में धरातल पर कुछ काम भी होता है? वास्तव में संघ सरकार की असली परीक्षा इसी मोर्चे पर होनेवाली है. कल की तिमाही रिपोर्ट में जीडीपी भले ही उड़ान भर रही हो लेकिन इस समय पूरे भारत में रोजगार के क्षेत्र में मंदी है क्योंकि जिन क्षेत्रों में वृद्धि के चलते जीडीपी ने गति पकड़ी है उनमें रोजगार-सृजन न के बराबर है.

मित्रों, पढ़े फारसी बेचे तेलवाली कहावत यक़ीनन आपने भी सुनी होगी. हम पर तो यह बखूबी चरितार्थ भी हो रही है. आज ही मैंने हाजीपुर में ५००० रूपये मासिक पर नौकरी पकड़ी है बैठे से बेगारी भला. वैसे अगर भाजपा यूपी निकाय चुनाव जीतने के बाद इस मुगालते में है कि नोटबंदी और जीएसटी के बावजूद जैसे उसने यह चुनाव जीत लिया वैसे ही लोकसभा चुनाव भी आसानी से और प्रचंड बहुमत-से जीत जाएगी भले ही बेरोजगारी कम होने के बदले पहले से भी ज्यादा हो जाए तो निश्चित रूप से वो गलत है और इस दिशा में उसे परिणामात्मक कार्य करके दिखाना ही होगा वो भी २०२२ नहीं बल्कि २०१९ तक.

सोमवार, 13 नवंबर 2017

आसां नहीं है आदमी का मोदी होना

मित्रों, मिर्जा ग़ालिब ने कहा था कि बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना. कितने दूरदर्शी थे ग़ालिब जो यूरोप-अमेरिका से काफी पहले ही दो पंक्तियों में पूरे-के-पूरे अस्तित्ववादी दर्शन को कह डाला था.
मित्रों, अस्तित्ववाद कहता है कि हम जीवनभर अप्रामाणिक जीवन जीते हैं. हम बनना कुछ और चाहते हैं लेकिन बनते कुछ और हैं,हम करना कुछ और चाहते हैं लेकिन करते कुछ और हैं. मसलन मुकेश दिल्ली से मुंबई नायक बनने जाते हैं लेकिन परिस्थितिवश गायक बन जाते हैं. वैसे आरक्षण भी इन दिनों पढ़े फारसी बेचे तेल को चरितार्थ करने में अपना महती योगदान दे रहा है. अस्तित्ववाद तो यहाँ तक कहता है कि अगर हम प्रामाणिक जीवन नहीं जी सकते तो जिए ही क्यों?
मित्रों, सौभाग्यवश हमारा भारतीय दर्शन इस मामले में भी अतिवादी नहीं है. गीता में श्रीकृष्ण ने साफ शब्दों में हजारों साल पहले ही कहा था कि तेरे वश में परिणाम है ही नहीं बस कर्म है यद्यपि परिणाम वैसे ही होते हैं जैसे हमारे कर्म होते हैं.
मित्रों, तो हम बात कर रहे थे ग़ालिब की और आदमी के चाहकर भी इंसां नहीं हो पाने की मजबूरी की. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो मजबूरियों के आगे मजबूर नहीं होते बल्कि उत्तरोत्तर मजबूत होते जाते हैं. ऐसी ही एक शख्सियत का नाम है नरेन्द्र दामोदरदास मोदी. घनघोर गरीबी में उनका बचपन गुजरा लेकिन गरीबी उनके मनोबल को तोड़ न सकी और उसका बालमन सपना देखने लगा गरिबीविहीन भारत का. गृहस्थजीवन के छोटे-से दायरे में सिमटना उसने स्वीकार नहीं किया और पत्नी की रजामंदी से गृह त्याग दिया.
मित्रों, विवेकानंद की तरह हर क्षण भारत के लिए चिंतित रहनेवाला वो युवक पूरी जवानी भारत की खाक छानता रहा और भारत को समझने का प्रयास करता रहा. फिर अचानक उसके जीवन में गुजरात के भूकंप के रूप में भूकंप आया और उसने खुद को तबाह गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पाया. पहले से कोई राजनैतिक अनुभव नहीं. कभी विधायक भी नहीं रहा था लेकिन वो घबराया नहीं और कुछ ही महीनों में गुजरात को फिर से खड़ा कर दिया और खड़ा भी कहाँ किया-चीन के आगे ले जाकर.
मित्रों, फिर ट्रेन में आग लगाकर आततायी मुसलमानों ने जिनमें से कई कांग्रेस पार्टी से जुड़े थे कई दर्जन निर्दोष हिन्दुओं को जिंदा जलाकर मार डाला और भड़क उठी दंगे की आग. जिन लोगों ने ट्रेन में यात्रियों को जलाकर दंगों की शुरुआत की उनको बचाने और मोदी को फंसाने की साजिश प्रधानमंत्री निवास और १० जनपथ में रची जाने लगी क्योंकि तब तक दिल्ली में सोनिया-मनमोहन की सरकार बन चुकी थी. वे लोग भूल गए कि हिन्दू कभी दंगों की शुरुआत नहीं करते. मोदी को रोजाना दरिंदा, खूनी, खूंखार आदि कहा जाने लगा. मानो उस समय केंद्रीय सत्ता के पाम दो ही काम रह गए थे-एक घोटाला करना और दूसरा योजना बनाना कि मोदी को कैसे जेल में डाला जाए और गुजरात से उखाड़ फेंका जाए. लेकिन मोदी डरे नहीं, घबराए नहीं, लडखडाए भी नहीं और ६ करोड़ गुजरातियों के विश्वास के बल पर सारी साजिशों को नाकाम कर दिया.
मित्रों, मोदी जब भारत के प्रधानमंत्री बने तब उनके माथे पर उम्मीदों का भारी बोझ नहीं पहाड़ था. जीडीपी को गति देनी थी, भ्रष्टाचार को कम करना था, बेरोजगारी दूर करनी थी, दुनिया में भारत के मान को पुनर्स्थापित करना था आदि. कुछ मोर्चों पर काम हुआ है तो कुछ पर अभी बहुत-कुछ होना है.
मित्रों, मोदी से इस दौरान कुछ गलतियाँ भी हुई हैं फिर भी हम ऐसा नहीं कह सकते कि मोदी की नीयत में खोट है यद्यपि उनसे नीतिगत भूल हुई है. मोदी का सीना कल भी भारत के लिए धड़कता था और आज भी केवल भारत के लिए ही धड़कता है. वाजपेयी की तरह ही आगे नाथ न पीछे पगहा. आज भी भारत की जनता ही मोदी का परिवार है, भारत के लोगों का प्यार ही मोदी की संपत्ति है.
मित्रों, इस बीच कुछ नेता मोदी की नक़ल करके खुद को मोदी साबित करने में जुट गए हैं. मोदी मंदिर जाते हैं इसलिए वे भी मंदिर जाते हैं जबकि वे न तो जन्मना और न ही कर्मना हिन्दू हैं. वे लोग जो इन दिनों अपने आपको विशुद्ध हिन्दू साबित करने में लगे हैं कुछ समय पहले ही सभी हिन्दुओं को आतंकवादी सिद्ध करने में जीजान से लगे थे और कहते थे कि लोग मंदिरों में पूजा करने नहीं लड़कियों के साथ छेड़खानी करने जाते हैं. जाहिर है कि रावन साधू बनकर सीतारुपी जनता को ठगने के लिए फिर से आया हुआ है और हर दरवाजे को खटखटाता फिर रहा है. शायद इस रावन को पता नहीं है कि नक़ल करके कोई मोदी नहीं बन सकता बल्कि ५६ ईंच का सीना लेकर जियाले माँ के पेट से पैदा होते हैं.
मित्रों, हो सकता है कि भविष्य में मोदी के लिए भी आज का मोदी बने रह पाना संभव न रह जाए. सब जनता के विश्वास पर निर्भर करेगा कि आगे मोदी और मजबूत होंगे या फिर खूँटी में टंगे अपने झोले को उठाकर फिर से देशाटन पर चल देंगे जैसा कि वे पहले कह भी चुके हैं. यद्यपि अगर ऐसा होता है तो यही समझा जाएगा कि भारत की जनता मोदी जैसे महान राष्ट्रभक्त के नेतृत्व के लायक है ही नहीं उसे तो लल्लू-पंजू चोर-बेईमान-लुटेरा-राष्ट्रद्रोही नेतृत्व ही चाहिए.

रविवार, 12 नवंबर 2017

राहुल गाँधी को ज्ञान प्राप्ति

मित्रों, सारी दुनिया जानती है कि आज से ढाई हजार साल पहले सिद्धार्थ गौतम को भारी तपस्या के बाद बोधगया के बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. सारी दुनिया यह भी जानती है कि गौतम अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल अर्थात बाधा को घर पर छोड़ कर रात्रि के समय गृहस्थ जीवन से पलायन कर गए थे.
मित्रों, बुद्ध के ढाई हजार साल बाद एक और राहुल भारतभूमि पर अवतरित हुए हैं और इनको भी ज्ञानप्राप्ति की तलाश है. लेकिन इसके लिए ये जंगल नहीं जा रहे बल्कि बार-बार थाईलैंड और यूरोप के चक्कर काट रहे हैं. यहाँ तक कि विदेशी बिगडैल महिलाओं के साथ होटल में कमरा भी साझा करते हैं. ऐसा लगता कि इनको रजनीश के दिए सम्भोग से समाधि के सिद्धांत पर कुछ ज्यादा ही यकीन है. 
मित्रों, यह मेरा व्यक्तिगत मत कदापि नहीं है कि इस अबोध बालक के उलटे क्रियाकलाप में इसका किंचित भी दोष नहीं है. दोषी तो इसके लिए आलेख और भाषण लिखनेवाले अथवा इसको सलाह देनेवाले हैं क्योंकि ये बेचारा तो आज से ३०-३५ साल पहले भी सादा स्लेट था और आज भी है. अब आज से कुछ दिन पहले ८ नवम्बर को अख़बारों में प्रकाशित इस चिरबालक के नाम से प्रकाशित आलेख को ही लें जिसमें सिवाय झूठ के और कुछ है ही नहीं. आलेख कहता है मोदी सरकार ने काफी तेज गति से आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर दिया है.
मित्रों, जबकि वास्तविक आंकड़े तो यही बता रहे हैं कि जब अर्थव्यवस्था अर्थशास्त्र के डॉक्टर मनमोहन सिंह के हाथों में थी तब उसकी हालत २०१० के बाद से ही दिन-ब-दिन ख़राब होती जा रही थी. देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर 2012-13 के दौरान तो 4.5 फ़ीसदी रही थी जो कि पिछले एक दशक की सबसे कम थी. इससे पहले विकास दर वर्ष २०१० में ८.९, २०११ में ६.७ प्रतिशत थी. सोनिया-मनमोहन सरकार के अंतिम वर्ष २०१३ में विकास दर हांफती हुई ४.७ प्रतिशत रही थी.
मित्रों, मोदी सरकार के शुभागमन के बाद वित्‍त वर्ष 2014-15 में देश की विकास दर लम्बी छलांग लगाती हुई 7.2 फीसदी पर पहुँच गयी. फिर 2015-16 में भारतीय अर्थव्यवस्था में 7.6 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई और वास्तविक प्रति व्यक्ति आय भी 6.2 फीसदी बढ़कर 77,435 रुपए हो गई। २०१६-१७ में विकास दर में हल्की सी गिरावट आई और यह ७.१ प्रतिशत पर रही. मगर ऐसा होना किसी भी प्रकार से अप्रत्याशित नहीं था क्योंकि अर्थव्यवस्था के शुद्धिकरण के लिए की गई नोटबंदी के बाद ऐसा होना अपेक्षित ही था.
मित्रों, अब आप ही बताईए कि राहुल के आलेख में सच का लेश भी है? अर्थव्यवस्था की हालत तो घोटालों के चहुमुखी विकास के चलते उनकी सरकार के समय ही ज्यादा ख़राब थी और मृत्युगामी थी. आश्चर्यजनक तरीके से बाद में और ८ नवम्बर से पहले गुजरात में दिए गए अपने कई भाषणों में भी राहुल ने मोदी सरकार को तेज गति से आगे बढती अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर देने का आरोप लगाया.
मित्रों, चूंकि हम उनको आज भी अबोध बालक समझते हैं इसलिए हमें उनसे कोई गिला-शिकवा नहीं है बल्कि हम तो उस व्यक्ति के परम पवित्र चरणों को ढूंढ रहे हैं जो उनके लिए भाषण और आलेख तैयार करता है. वैसे सोनिया ताई हमारे जैसे अकुलीन की सुननेवाली नहीं हैं फिर भी हम उनसे अनुरोध करना चाहते हैं कि ताई उधार के ज्ञान से न तो कोई बुद्धत्व की प्राप्ति कर पाया है और न ही भविष्य में कर पाएगा बैशाख पूर्णिमा तो हर साल आता है और चला जाता है. फिर काहे उपले में घी लपेट रही हो इस उम्मीद में कि एक दिन उपला रोटी बन जाएगा? हो सकता है कि राहुल गुजरात चुनाव जीत भी जाएं लेकिन इसके लिए उसकी बौद्धिक योग्यता नहीं बल्कि सीधे तौर पर बुद्धिमान गुजरातियों की मूर्खता जिम्मेदार होगी.