सोमवार, 19 जून 2017

टीम इंडिया हाय-हाय!

मित्रों,१९३२ का ओलंपिक चल रहा था. भारत और अमेरिका की hockey टीमें आमने-सामने थीं. मेजर ध्यानचंद गोल-पर-गोल दाग रहे थे. अंततः भारत ने अमेरिका को २४-१ से हरा दिया. इस करारी और शर्मनाक हार का असर यह हुआ कि उसके बाद अमेरिका ने hockey खेलना ही बंद कर दिया. हो सकता है कि आपमें से कुछ मित्र कहें कि अमेरिका ने सही किया लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता. खेल खेल होता है और उसको खेल की तरह ही लेना चाहिए. जिस दिन जो टीम अच्छा खेलेगी जीतेगी.
मित्रों, हमने देखा है कि जब भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच होता है तब वो मैच रह ही नहीं जाता बल्कि हम क्रिकेट प्रशंसक उसे युद्ध बना देते हैं. मानों एक मैच जीत जाने से भारत का पाकिस्तान पर कब्ज़ा हो जाएगा या फिर हार जाने से हम पाकिस्तान के गुलाम हो जाएँगे. एक समय कोलकाता में दर्शकों ने गावस्कर का घोर अपमान किया था और फिर गावस्कर कोलकाता में कभी नहीं खेले.
मित्रों, कल रात जबसे भारतीय क्रिकेट टीम चैम्पियंस ट्राफी के फाइनल में पाकिस्तान से हारी है पूरे भारत में टीम इण्डिया के खिलाफ गुस्से का तूफ़ान आया हुआ है. मानों क्रिकेट ही देश के लिए सबकुछ हो या फिर देश में क्रिकेट के अलावा कुछ और खेला ही नहीं जाता हो. कल ही भारत ने hockey में पाकिस्तान को ७-१ से धूल चटाई है क्या यह कम गौरव की बात है? बैडमिंटन में भी भारत के अग्रणी पुरुष बैडमिंटन खिलाड़ी किदांबी श्रीकांत ने कल इंडोनेशिया ओपन जीत लिया है और वह यह खिताब जीतने वाले भारत के पहले पुरुष खिलाड़ी बन गए हैं।  क्या यह हमारे लिए गौरव की बात नहीं है? कल एशियाड या ओलंपिक में बैडमिंटन और hockey ही खेले जाएंगे क्रिकेट नहीं फिर सिर्फ क्रिकेट के लिए ऐसी दीवानगी क्यों?
मित्रों, इतना ही नहीं क्रिकेट तो कई-कई बार कलंकित भी चुका है. लोग रिश्वत खाकर मैच हार जाते हैं. अब कल के मैच को ही लें तो भारत के तरफ से पांड्या को छोड़कर किसी ने भी कोशिश भी की क्या? क्या मैच देखकर ऐसा नहीं लग रहा था कि टीम इण्डिया जान-बूझकर हारने के लिए खेल रही है?

गुरुवार, 15 जून 2017

शिक्षक बोझ हैं तो उन पर कृपा क्यों?

मित्रों, क्या आपने कभी ऐसा देखा है कि कोई एक दिन किसी को बेकार और बोझ बताए और दूसरे ही उस पर कृपा और पुरस्कारों की बरसात कर दे? नहीं देखा है तो विडम्बनाओं के प्रदेश बिहार आ जाईए. ताजा प्रसंग यह है कि आपने भी सुना-पढ़ा होगा कि कुछ ही दिन पहले यहाँ के बडबोले शिक्षामंत्री ने कहा था कि नियोजित शिक्षक राज्य पर बोझ बन गए हैं. ग्राउंड पर वास्तविकता को देखते हुए हमें पता है कि उन्होंने जो भी कहा था एकदम सही कहा था २०० प्रतिशत से भी अधिक सही. बिहार के ९०-९५ प्रतिशत नियोजित शिक्षकों को पहाड़ा और महीनों के नाम तक लिखने नहीं आते. इस तरह की रिपोर्ट हमें अक्सर मीडिया में देखने को मिलती है. कल भी जी पुरवैया पर एक खबर प्रसारित हुई हैं जिसमें दिखाया गया है कि गया जिले के एक मध्य विद्यालय के शिक्षकों को जनवरी-फरवरी की स्पेलिंग भी मालूम नहीं हैं. अब आप ही बताईए कि जब शिक्षकों को ही कुछ पता नहीं होगा तो वो पढ़ाएंगे क्या?
मित्रों, ऐसे शिक्षकों को न कहा जाता तो क्या कहा जाता? लेकिन आश्चर्य होता है कि उसके अगले ही दिन सरकार ने यह घोषणा करके कि अब नियोजित शिक्षक भी प्रधानाध्यापक बन सकेंगे जैसे उनको उनकी नालायकी के लिए पुरस्कृत ही कर दिया.
मित्रों, सवाल उठता है कि सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है कि उसने उनको हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के बदले उन पर कृपा कर दी? कोई वेतनभोगी राज्य पर बोझ बन गया है तो उनकी छंटनी होनी चाहिए न कि उनको खुश कर दिया जाए. अगर सरकार को कृपा ही करनी थी तो फिर शिक्षा मंत्री ने उनको बोझ क्यों बताया? क्या किसी ने उनको ऐसा बयान देने के लिए मजबूर किया था या फिर वे उस समय नशे में थे क्योंकि कई बार ऐसा देखा गया है कि लोग नशे में सच बोलने लगते हैं? लेकिन इस समय तो कागजों पर बिहार में पूर्ण शराबबंदी है. फिर आखिर सच्चाई क्या है? क्या शिक्षा मंत्री इस पर रौशनी डालने की कृपा करेंगे? वैसे उनको शिक्षा मंत्री कहना भी सच्चाई को झुठलाने जैसा होगा क्योंकि बिहार में अब पढाई होती ही नहीं है सिर्फ परीक्षा होती है इसलिए उनको अगर हम परीक्षा मंत्री कहेंगे तो ज्यादा सही होगा.

सोमवार, 12 जून 2017

नियोजित शिक्षकों को कब तक ढोएगी बिहार सरकार?

मित्रों, बात साल २००८ की है. तब हम पटना हिंदुस्तान में कॉपी एडिटर थे. पृष्ठ संख्या १ के मुख्य पेजिनेटर दिलीप मिश्र भैया को घर जाना था. वे हमेशा हाजीपुर जंक्शन से ट्रेन पकड़ते थे. उनके कहने पर प्रादेशिक प्रभारी गंगा शरण झा ने हमें तत्क्षण छुट्टी दे दी. रास्ते में मैंने दिलीप भैया से कहा कि भैया यूपी के कानून-व्यवस्था की हालत बहुत ख़राब है जबकि बिहार में सुधार आ गया है. भैया का घर बलिया यूपी था. दिलीप भैया ने कहा कि दरअसल बिहार में जो ग्राम पंचायत मुखिया द्वारा शिक्षकों की नियुक्ति हुई है उसमें सारे गुंडे-बदमाश तमाम हेरा-फेरी के बल पर शिक्षक बन गए हैं. मैंने तत्काल भविष्यवाणी करते हुए कहा कि भैया भले ही अभी आपको इस तुगलकी नियुक्ति में बिहार का भला होता हुआ दिख रहा हो लेकिन सरकार का यह कदम बिहार के भविष्य को बर्बाद करके रख देगा और एक दिन ऐसा भी आएगा जब बिहार सरकार अपने इस कदम पर पछताएगी.
मित्रों. यह बहुत ही ख़ुशी की बात है कि वह दिन आ गया है और देर से ही सही नीतीश सरकार ने माना है कि उससे गलती हुई है. अपनी बेवाकी के लिए जाने जानेवाले बिहार के शिक्षामंत्री अशोक चौधरी ने एक ट्विट के माध्यम से जारी अपने बयान में स्वीकार किया है कि नियोजित शिक्षक बिहार के लिए बोझ बन गए हैं और शिक्षा तंत्र पर भारी पड़ रहे हैं.
मित्रों, मैंने अपने गाँव के मध्य विद्यालय वैशाली जिले के राघोपुर प्रखंड के राजकीय मध्य विद्यालय रामपुर जुड़ावनपुर बरारी में खुद देखा है कि एक-दो शिक्षकों को छोड़कर ज्यादातर नियोजित शिक्षक स्कूल आते ही नहीं हैं. कभी-कभी तो स्कूल में एक भी शिक्षक नहीं होता. एडवांस में हाजिरी बना लेते हैं या फिर औचक निरीक्षण से बचने के लिए अधिकारी को ही मैनेज कर लेते हैं. एक उपाय और भी किया जाता है कि छुट्टी का बिना तारीखवाला आवेदन-पत्र अपने किसी साथी को दे दिया जाता है कि अगर जाँच हो तो लगा दीजिएगा अन्यथा जेब में ही रखे रहिएगा. हाँ,चाहे स्कूल का ताला खुले या न खुले कागज पर सारे बच्चों के लिए उत्तम भोजन रोज जरूर बन रहा है. कुल मिलाकर इन नियोजित शिक्षकों की कृपा से बिहार के विद्यालयों में इन दिनों बांकी सबकुछ हो रहा है सिर्फ पढाई नहीं हो रही है.
मित्रों, इस बार का इंटर का रिजल्ट देखकर बिहार सरकार को भले ही आश्चर्य हुआ हो कि कैसे ५०० से ज्यादा स्कूलों के एक भी परीक्षार्थी उत्तीर्ण नहीं हुए लेकिन हमें तो नहीं हुआ. जब पढाई होगी ही नहीं तो अच्छा परिणाम कहाँ से आएगा?  सवाल उठता है कि अब बिहार सरकार के पास विकल्प क्या है? विकल्प तो बस एक ही है कि बोझ को उतार फेंका जाए यानि सारे नियोजित शिक्षकों को हटाकर उनके स्थान पर टीईटी पास युवाओं को नियुक्त किया जाए. मगर क्या बिहार सरकार के पास ऐसा ऐसा करने का जिगर है? अगर नीतीश कुमार शराबबंदी पर तमाम विरोध के बावजूद अड़ सकते हैं तो अपनी सबसे बड़ी गलती को सुधार क्यों नहीं सकते? मुझे नहीं लगता कि अगर सरकार इस मामले में भूल-सुधार करती है तो उसका उसके वोटबैंक पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. बल्कि ऐसा होने पर इन निकम्मों से आजिज और अपने बच्चों के भविष्य के प्रति निराश हो चुके ग्रामीणों में ख़ुशी की लहर दौड़ जाएगी.

शनिवार, 10 जून 2017

किसानों की कर्जमाफी समस्या या समाधान

मित्रों, मान लीजिए आप एक गाँव में रहते हैं और बहुत दयालु हैं. गाँव में कोइ बेहद गरीब है और आप उसकी सहायता करना चाहते हैं तो आप क्या करेंगे? सामान्यतया तो आप भी वही करेंगे जो बांकी लोग करते हैं. उसको कुछ पैसे दे देंगे और वो उसको खा जाने के बाद फिर से आपके दरवाजे पर आ जाएगा. फिर यह सिलसिला बार-बार चलेगा मगर ऐसा करने से न तो आपको संतोष मिलेगा न ही उसकी स्थिति ही सुधरेगी. तो इसका क्या समाधान निकालेंगे? आप देखेंगे कि क्या उसको कहीं नौकरी  मिल सकती है या वो कोई व्यवसाय कर सकता है.
मित्रों, ठीक यही स्थिति इस समय हमारे देश में किसानों की है. सरकारें आती हैं और चली जाती हैं. लगभग हर सरकार ने किसानों के कर्ज माफ़ किए हैं लेकिन किसी ने भी कृषि को लाभकारी बनाने के बारे में नहीं सोंचा है. पहली बार केंद्र में एक ऐसी सरकार आई है जो इस दिशा में ठोस कदम उठाने के बारे में सोंच रही है. चूंकि संविधान की सातवीं अनुसूची में कृषि को राज्य सूची में रखा गया है इसलिए यह काम काफी मुश्किल है.
मित्रों, मान लीजिए केंद्र सरकार ने मिट्टी स्वास्थय कार्ड जारी करने की योजना बनाई या फसल बीमा योजना को विस्तार देने की घोषणा की लेकिन राज्य सरकार जिसको योजनाओं को लागू करना है ने पर्याप्त अभिरुचि नहीं दिखाई तो? केंद्र सरकार राज्य सरकारों से अपील ही कर सकती है उनमें जबरदस्ती अभिरुचि तो नहीं पैदा कर सकती.
मित्रों, फिर भी ऐसा नहीं कि केंद्र कुछ कर ही नहीं सकती. वो न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ा सकती है और विभिन्न उपायों द्वारा कृषि लागत को भी कम कर सकती है लेकिन इन दोनों के लिए उसको भारी मात्रा में सब्सिडी देनी पड़ेगी.
मित्रों, साथ ही केंद्र सरकार को चाहिए कि नए इलाकों में ज्यादा मुनाफा देनेवाली फसलों की खेती के लिए अनुसन्धान करवाए. उदाहरण के लिए अगर झारखण्ड के जामताड़ा में काजू की शौकिया खेती हो सकती है जो पूरे झारखण्ड या उसकी जैसी जलवायुवाले इलाकों में क्यों नहीं हो सकती? हमें याद है कि एक समय कटिहार और नौगछिया में केले और मखाने की खेती बिलकुल नहीं होती थी और तब वह इलाका बेहद गरीब था लेकिन आज उसका कायाकल्प को चुका है. नए इलाकों में ज्यादा लाभ देनेवाली फसलों की खेती करवाते समय यह भी ध्यान में रखना होगी कि उन फसलों को बाजार भी मिले. उदाहरण के लिए गोभी के मौसम में जब हाजीपुर में गोभी १५ रूपए किलो थी तब हाजीपुर से ३० किलो मीटर दूर महनार के किसान उसे ३ रूपये किलो बेचने के लिए मजबूर थे. जाहिर है कि उनको घाटा लग रहा था. कई बार किसान ऐसी स्थिति में फसल को बेचने के बदले सड़कों पर फेंकने लगते हैं.
मित्रों,  कहने का लब्बोलुआब यह है कि चाहे केंद्र लाख माथापच्ची कर ले लेकिन वो तब तक खेती को लाभकारी नहीं बना सकती जब तक उसको राज्य सरकारों का सहयोग नहीं मिलेगा. सिर्फ बजट आवंटित करने से अगर किसी क्षेत्र का भला हो जाता तो भारत आज भी विकासशील नहीं होता. सबसे बड़ी चीज है ईच्छाशक्ति और समन्वय. मगर ये होगा कैसे जब विपक्ष हिंसा फ़ैलाने पर आमदा हो? कई राज्यों में तो विपक्षी दलों की सरकार है और उन्होंने केंद्र के साथ सहयोग नहीं किया तो? हम जानते हैं कि अंत में जो लोग आज कृषि को लाभकारी बनाने के पवित्र कार्य में सबसे ज्यादा अडंगा लगा रहे हैं वे लोग ही कल को कहेंगे कि मोदी सरकार तो ऐसा नहीं कर पाई.
मित्रों, अंत में दो सुझाव और देना चाहूँगा. पहले यह कि केंद्र यह नहीं देखे कि कौन-सा कृषि विशेषज्ञ किस खेमे का है बल्कि अगर उसके सुझाव अच्छे हैं तो उन पर बेहिचक अमल करे और दूसरा सुझाव केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह जी के लिए है कि उनको अभी बाबा रामदेव के गाईड का काम करना बंद कर मध्य प्रदेश का दौरा करना चाहिए. बाबा कोई बच्चा नहीं हैं वे अकेले भी चंपारण का भ्रमण कर सकते हैं.

गुरुवार, 8 जून 2017

किसान आन्दोलन स्वतःस्फूर्त या साजिश?

मित्रों, इतिहास साक्षी है कि केंद्र में जब-जब भाजपा की सरकार बनती है देशविरोधी शक्तियों की जान पर बन आती है और वे अतिसक्रिय हो उठती हैं. वाजपेयी के समय भी ऐसा देखने को मिला था और अब एक बार फिर से दिख रहा है. कांग्रेसी नेताओं ने तो मोदी सरकार के आगमन के तत्काल बाद खुलेआम पाकिस्तान जाकर मोदी सरकार को अपदस्थ करने के लिए पाकिस्तान से सीधे-सीधे मदद ही मांग ली थी. हमें तभी ऐसा लगा था कि कांग्रेस पाकिस्तान से और चीन से भी मिली हुई है और इनसे उसको ठीक उसी तरह पैसे मिलते हैं जैसे हुर्रियत को कश्मीर में. तब भी मिलते थे जब केंद्र में उसकी सरकार थी और अब भी मिलते हैं जब वो विपक्ष में है वर्ना पाकिस्तान कांग्रेस की और किस तरह से मदद कर सकता है? जो पाकिस्तान कश्मीर में पत्थरबाजी के लिए पैसे दे सकता है वो कांग्रेस समर्थित किसान आन्दोलन को प्रायोजित क्यों नहीं कर सकता?
मित्रों, पहले जंतर-मंतर पर मूत्र-सेवन की नौटंकी और अब मध्य प्रदेश में हिंसा. अगर हम दोनों घटनाओं की टाईमिंग देखें तो हमें आसानी-से साजिश दिख जाएगी. २३ अप्रैल को जैसे ही दिल्ली नगर निगम के लिए मतदान समाप्त हुआ जंतर मंतर पर चल रहा फाइव स्टार आन्दोलन भी स्वतः समाप्त हो गया. ठीक उसी तरह अभी जब कांग्रेस केरल में सरेआम गाय काटकर और खाकर चौतरफा घिरी हुई थी तब मध्यप्रदेश में किसानों का आन्दोलन अचानक हिंसक हो उठा.
मिर्त्रों, इन किसान आन्दोलनों की एक और विशेषता है कि ये केवल वही हो रहे हैं जहाँ भाजपा की सरकार है. तो क्या सिर्फ उन्हीं राज्यों के किसान परेशान हैं जहाँ भाजपा का शासन है? खैर इन किसान आंदोलनों के आगे-पीछे चाहे जो भी हो लेकिन यह भी सच है कि आज भारत में कृषि खतरे में है जिसको बचाना चाहे जितना भी मुश्किल हो लेकिन बचाना तो पड़ेगा ही. यह भी सच है कि मोदी सरकार के लिए अगले लोकसभा चुनावों में कृषि और बेरोजगारी की समस्या गले की फांस बनने जा रही है क्योंकि इन दोनों को लेकर सरकार ने जो वादे किए थे उस दिशा में उसको कोइ खास सफलता मिलती दिख नहीं रही है. दूसरी बात कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश में चुनाव जीतने के लिए किसानों की कर्ज माफ़ी का वादा किया था जिसे उसने पूरा भी किया. स्वाभाविक था कि बांकी राज्यों के किसान भी इसकी मांग करते और ऐसा हुआ भी. आखिर यूपी के किसानों के साथ वीआईपी ट्रीटमेंट क्यों?  

मंगलवार, 6 जून 2017

प्रणव राय पर छापा अभिव्यक्ति पर हमला कैसे?

मित्रों,कहते हैं कि पत्रकारिता लोकतंत्र का वाच डॉग होती है. देश के बहुत सारे पत्रकार इस कहावत पर खरे भी उतरते हैं इसमें संदेह नहीं. लेकिन कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जो मूलतः पत्रकार हैं नहीं. वे पहरा देनेवाले कुत्ते नहीं हैं बल्कि अपने निर्धारित कर्तव्यों के विपरीत चोरों के मदद करनेवाले कुत्ते बन गए हैं. ये रुपयों की बोटी पर पूँछ तो हिलाते ही हैं बोटी की दलाली में भी संलिप्त हैं. अब जाकर ऐसे ही एक पत्रकार के खिलाफ वैसी कानूनी कार्रवाई की गयी है जिसकी प्रतीक्षा हमें २०१० से ही थी जब नीरा रादिया प्रकरण सामने आया था.
मित्रों, जो लोग दूसरी तरह के डॉग हैं वे एकजुट होकर भारत में लोकतंत्र और अभिव्यिक्ति की आजादी के खतरे में होने का रूदाली-गायन करने में लग गए हैं लेकिन सवाल उठता है कि पत्रकार होने से क्या किसी को दलाली-धोखाधड़ी करने,देशद्रोहियों का समर्थन करने की असीमित स्वतंत्रता मिल जाती है? भारत के संविधान में तो ऐसा कुछ भी नहीं लिखा गया है.
मित्रों,सवाल यह भी उठता है कि कार्रवाई किसके खिलाफ की गयी है? क्या एनडीटीवी को या उसके किसी कार्यक्रम को बैन किया गया है? नहीं तो फिर यह कैसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला हो गया? प्रणव राय ने धोखाधड़ी की,बैंक को नुकसान हुआ और उसने इसकी शिकायत सीबीआई से की. सीबीआई ने तो वही किया जो उसे करना चाहिए था. फिर चाहे आरोपी प्रणव राय हो या कोई और. ऐसा कैसे हो सकता है कि आम आदमी करे तो उसे जेल में डाल तो और ब्रजेश पांडे की तरह रसूख वाला करे तो आखें बंद कर लो? कोई जरूरी तो नहीं कि जैसा बिहार पुलिस करती है वैसा ही सीबीआई करे.
मित्रों,जो लोग आज सीबीआई पर सवालिया निशान लगा रहे हैं वे भूल गए हैं कि इसी सीबीआई की विशेष अदालत ने कुछ दिन पहले ही बाबरी-विध्वंस मामले में भाजपा के भीष्म पितामह सहित बड़े-बड़े नेताओं को दोषी घोषित किया है. अगर सीबीआई दबाव में होती तो क्या ऐसा कभी हो सकता था? हद है यार जब सीबीआई भाजपाईयों पर कार्रवाई करे तो ठीक जब आप पर करे तो लोकतंत्र पर खतरा? बंद करो यह दोगलापन और हमसे सीखो कि तमाम अभावों के बीच अपना अनाज खाकर पत्रकारिता कैसे की जाती है? हम इस समय वैशाली महिला थाना के पीछे घर बना रहे हैं और वो भी अपनी पैतृक संपत्ति बेचकर. हमने अपनी जमीन बेचना मंजूर किया लेकिन अपना जमीर नहीं बेचा. कबीर कबीर का रट्टा लगाना आसान है लेकिन कबीर बनना नहीं इसके लिए अपने ही घर को फूंक देना पड़ता है.

शनिवार, 3 जून 2017

टॉप हुए तो गए बेटा

मित्रों,हम बिहारी वर्षों से गाड़ियों के पीछे एक चेतावनी लिखी हुई पढ़ते आ रहे हैं-लटकले त गेले बेटा यानि अगर गाड़ी के पीछे लटके तो गए. मगर कहाँ? शायद यहाँ जाने से मतलब सुरधाम या अस्पताल होगा. खैर गाड़ियों के पीछे लटकना खतरनाक कर्म है इसलिए ऐसी चेतावनी उचित भी है लेकिन बिहार तो बिहार है और बतौर रवीश कुमार बिहार में आकर बहार की गाड़ी पंक्चर हो गयी है. तो इसलिए यहाँ रोजाना कुछ-न-कुछ उलट होता रहता है.
मित्रों,आपने भारत तो क्या पूरी दुनिया में ऐसा कोई देश-प्रदेश नहीं देखा होगा जहाँ टॉप करने वालों को अनिवार्य तौर पर जेल जाना पड़ता है. टॉप हुए नहीं कि हाथों में हथकड़ी लगी समझिए. मुश्किल यह है कि किसी-न-किसी को टॉप तो होना ही होता है. फिर जब पता चलता है कि टॉप करनेवाले को तो विषय का कुछ अता-पता ही नहीं है तो सरकार हर साल इंटर रिजल्ट के बाद कटते-कटते तोला से माशा हो चुकी अपनी नाक को बचाने के लिए टॉपर को ही जेल भेज देती है.
मित्रों,वैसे टॉप होने के लिए सिर्फ टॉपर दोषी हो ऐसा भी नहीं है. जहाँ इंटर गणित की कॉपी मिडिल स्कूल का हिंदी का टीचर जांचे वहां कोई भी टॉप हो सकता है और कोई भी फेल हो सकता है. शायद इसलिए लालू जी के दोनों पुत्रों ने कभी बिहार से मैट्रिक या इंटर पास करने का प्रयास नहीं किया. अभी तो अच्छे भले मंत्री हैं पता नहीं अपनी या फिर परीक्षक की गलती से टॉप-वॉप कर गए तो जेल तो जाएँगे ही मंत्री-पद से भी हाथ धोना पड़ेगा.
मित्रों,वैसे एक सलाह आपके लिए भी है. या तो आप खुद ही मैट्रिक-इंटर में पढ़ रहे होंगे या फिर हो सकता है कि आपके बच्चे पढ़ रहे हों. तो मैं कह रहा था कि अगर आपके बच्चे ने जेईई वगैरह क्रैक किया हो या इस तरह की क्षमता रखता हो तो कदापि बिहार बोर्ड से उसका फॉर्म न भरवाएं. क्योंकि अगर उसको हिंदी या उर्दू के मिडिल स्कूल के टीचर ने गणित,भौतिकी या रसायन शास्त्र में फेल कर दिया तो आपके बच्चे का तो भविष्य ही बर्बाद हो जाएगा. फिर दौड़ते रह जाईएगा बिहार बोर्ड के दफ्तर में मगर होगा कुछ नहीं.
मित्रों,आप कह सकते हैं कि जब बिहार में हमेशा इतना कुछ होता रहता है तो इसके लिए कोई-न-कोई तो दोषी होगा. तो आपको बता दें कि अपने नीतीश कुमार तो खुद को कभी दोषी मानते ही नहीं हैं इसलिए वे दोषी नहीं हैं. हर विवाद के बाद वे किसी लालकेश्वर या परमेश्वर को बलि का बकरा बना देते हैं लेकिन यह नहीं बताते कि लालकेश्वर और परमेश्वर खुद उनकी नाक के बाल क्यों थे? वैसे अगर आपके बच्चे भी मैट्रिक-इंटर में बिहार बोर्ड से पढ़ रहे हों तो उनको कम पढने के लिए बोलिए क्योंकि कहीं गलती से टॉप कर गए तो आप भी फजीहत में पड़ जाईएगा. वैसे जब हिंदी-उर्दू का टीचर गणित की कॉपी जांचेगा तो हो सकता है कि आपका बेटा कॉपी में फ़िल्मी गाना लिखकर भी टॉप कर जाए. भैया बिहार में तो बहार है इसलिए कभी भी किसी के साथ भी ऐसा हादसा हो सकता है.

शुक्रवार, 2 जून 2017

क्या गोहत्या ही असली धर्मनिरपेक्षता है?

मित्रों,क्या आपको पता है कि दुनिया में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा क्या है? दुनिया में राज्य का कोई घोषित राजकीय धर्म न होना और सभी धर्मों के प्रति सर्वधर्मसमभाव रखना ही धर्मनिरपेक्षता होती है. लेकिन अपने भारत में कथित धर्मनिरपेक्षतावादी दलों की मानें तो हिंदुविरोधी कृत्यों में संलिप्त रहना ही धर्मनिरपेक्षता मानी जानी चाहिए.. दुनिया के किसी भी दूसरे देश में ऐसा नहीं होता कि बहुसंख्यक धर्म वाले की उपेक्षा की जाए और अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए दीवानगी की हद तक जाकर कुछ भी कर गुजरने की तत्परता राजनैतिक दलों में रहे. 
मित्रों,वामपंथी तो शुरू से ही हिन्दूविरोधी रहे हैं लेकिन सवाल उठता है कि इन दिनों उस कांग्रेस पार्टी को क्या हो गया है जिसे आज़ादी की लडाई के समय जिन्ना सहित भारत के तमाम मुसलमान हिन्दुओं की पार्टी मानते थे. इतिहास गवाह है कि आजादी की लडाई के समय कांग्रेस ने गोहत्या रोकने को भी एक मुद्दा बनाया था और हर शहर में इसके लिए गोरक्षिणी सभा की स्थापना की थी. इतना ही नहीं पंजा छाप से पहले गाय और बछड़ा ही कांग्रेस का चुनाव निशान था. फिर ऐसा क्या हो गया कि आज कांग्रेस के नेता सरेआम गाय की हत्या करके गोमांस का भोज आयोजित करने लगे हैं? क्या ऐसा उस आलाकमान के कहने पर किया जा रहा है जो विदेश से आई हुई गोभक्षक विधर्मी है? क्या कांग्रेस पार्टी को अब कभी भी बहुसंख्यकों का वोट नहीं चाहिए? क्या कांग्रेस ४४ सीटों से संतुष्ट नहीं है और ४ पर आना चाहती है?
मित्रों,हालाँकि कांग्रेस ने केरल के कई उन कांग्रेस नेताओं को पार्टी से निलंबित कर दिया है जो उस दिन लाईव गोहत्या कार्यक्रम में सहभागी थे लेकिन क्या यह सही नहीं है इसी कांग्रेस की सरकार ने कोर्ट में हलफनामा दिया था कि राम तो कभी हुए ही नहीं? क्या इसी कांग्रेस ने हिन्दुओं के प्रति भेदभाव करनेवाला सांप्रदायिक अधिनियम नहीं बनाया था? क्या इसी कांग्रेस ने भगवा आतंकवाद का नकली हौवा खड़ा करने की कुत्सित कोशिश नहीं की थी?
मित्रों,पिछले १३ सालों के कांग्रेस के कारनामों पर अगर हम सरसरी तौर पर भी नजर डालें तो पाते हैं कि कांग्रेस एक हिन्दूविरोधी राजनैतिक दल है जो भारत से उस महान हिन्दू धर्म को ही समाप्त कर देना चाहती है जिसके चलते सदियों से दुनियाभर में भारत का गौरव रहा है. हमारा दर्शन वहां से शुरू ही होता है जहाँ जाकर दुनिया के तमाम दूसरे धर्म मौन हो जाते हैं. हिन्दू धर्म पर हमला तो सन ७१२ ई. से ही जारी है जब मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर कब्ज़ा किया था और हिन्दुओं का भयकर नरसंहार किया था. उसके बाद सैंकड़ों बार आतताइयों ने हिंदुस्तान की धरती को हिन्दुओं के खून से रक्तरंजित किया लेकिन कुछ बात है कि वे लाख अत्याचार ढाकर भी हिन्दू धर्म को मिटा नहीं पाए. आज कहाँ हैं गोरी,तैमूर,ऐबक,बलबन,खिलजी,बाबर आदि के वंशज? कोई नामोनिशान तक बचा उनका? क्या कांग्रेस भी अपने आपको गुलाम वंश,खिलजी वंश,तुगलक वंश,मुग़ल वंश की तरह  सिर्फ इतिहास के पन्नों में देखना चाहती है?

सोमवार, 29 मई 2017

मोदी सरकार, काम बहुत है समय है थोडा

मित्रों, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को तीन साल पहले गुजरात छोड़कर केंद्रीय राजनीति में आए.  यह पहली बार हुआ कि एक वर्तमान मुख्यमंत्री देश का प्रधानमंत्री बना. उनको चुनने का कारण साफ था गुजरात के बाहर मोदी की कार्यशैली, निर्णय लेने की क्षमता, कुछ नया करने की इच्छाशक्ति और भविष्य को ध्यान में रखकर तकनीक का प्रयोग आदि की खबरें जो आई उसने लोगों के दिलोदिमाग पर एक ही छाप छोड़ी, अबकी बार मोदी सरकार.पहले लोग गुजरात के बाहर मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के जानते थे. अब लोग एक पीएम के रूप में नरेंद्र मोदी को जानते और समझने लगे हैं. पिछले तीन सालों में पीएम मोदी के प्रति लोगों का लगाव कुछ ऐसा बढ़ा है कि उनकी लोकप्रियता का ग्राफ नीचे आने का नाम ही नहीं ले रहा है. विपक्ष आज भी इस बात से परेशान है.

मित्रों,शायद ही इससे पहले किसी प्रधानमंत्री का स्वच्छता के प्रति इतना झुकाव देश ने देखा होगा. खुद झाड़ू लेकर मैदान में उतरना और लाखों लोगों को इसके लिए प्रेरित करना आसान काम नहीं है. लेकिन पीएम मोदी ने बखूबी कर दिया. परिणाम कितना मिला इस बारे में ज्यादा नहीं कहा जा सकता, लेकिन देश में लोग इस बारे में प्राथमिकता से विचार जरूर करने लगे हैं.

मित्रों,पीएम नरेंद्र मोदी काफी मेहनती है. कहा जाता है कि दिन में 18 घंटे वह काम करते हैं. समय की पाबंदी पसंद करते हैं. जब से सत्ता में आए इन्होंने सरकारी कर्मचारियों में इसे लागू करवाने की प्रक्रिया आरंभ कर दी. कई मंत्रालयों में जहां कर्मचारी १२  बजे के बाद दिखाई देते थे और 3 बजे तक कुर्सियां खाली होना शुरू हो जाती वहां की परिस्थिति बिल्कुल बदल गई है. पीएम मोदी ने आदेश देकर सभी केंद्रीय सरकारी कार्यालयों में बायोमेट्रिक मशीन लगाने के आदेश दे दिए.

मित्रों,नरेंद्र मोदी सरकार ने पाकिस्तान के नियंत्रण वाले कश्मीर के हिस्से में सर्जिकल स्ट्राइक की मंजूरी दी और भारतीय सेना ने पहली यह कारनामा कर पूरी दुनिया को अचरज में डाल दिया.

मित्रों,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आते ही यह प्रयास आरंभ किए कि भ्रष्टाचार पर पूर्णतया अंकुश लगे. इसके लिए सरकार ने सभी सरकारी भुगतान ऑनलाइन करने का निर्णय लिया. टेंडरों को पूरी तरह ऑनलाइन करने का आदेश दिया. इस प्रकार के कई आदेश सरकार दिए और इसकी उपलब्धि कितनी है इस बारे में ठोस नहीं कहा जा सकता है. कहा जा सकता है तो सिर्फ इतना कि पिछले तीन साल में अभी  तक सरकार पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा है. जबकि पिछली सरकार में मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक पर आरोप लगते रहे.

मित्रों,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 नवंबर को तत्कालीन 500 और 1000 के नोट को बंद करने का ऐलान किया. देश की पूरी अर्थव्यवस्था जैसे रुक गई. पीएम ने लोगों ने दो महीने का समय मांगा और लोगों ने दिया. लोगों को काफी कष्ट झेलने पड़े. विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाने का प्रयास किया. नोटबंदी को गलत कदम करार दिया. चुनाव में भुनाने का प्रयास भी लेकिन यह लोगों का मोदी से विश्वास कम नहीं हुआ.

मित्रों,पीएम मोदी अपने स्वास्थ्य के प्रति काफी सजग हैं. वह सुबह उठकर योग करते हैं. उन्होंने पूरी दुनिया में योग दिवस मनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र से संपर्क किया और भारत के नाम एक अंतरराष्ट्रीय सफलता लगी. इतना ही नहीं वह लगातार लोगों से यह अपील कर रहे हैं कि वे अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दें.

मित्रों,जब प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम थे तभी से वह लगातार सोशल मीडिया के जरिए लोगों से जुड़े रहे हैं. मोबाइल तकनीक और सूचना तकनीक का प्रयोग कामकाज में करने के वे तभी से पक्षधर रहे हैं ताकि पारदर्शिता बने और काम सहज हो. यह प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की देश को एक देन है कि भारत में राष्ट्रपति का एक ट्विटर हैंडल  बना. पीएमओ का ट्वीटर हैंडल, पीएम का, सभी मंत्रालयों और मंत्रियों को ट्वटीर से लोगों से जुड़ने का आदेश दिया गया और सभी को सक्रियता से इससे जुड़ने की बात कही गई. परिणाम साफ है कि विदेश मंत्रालय से लेकर रेल, और कई अन्य मंत्रालयों में लोगों ने ट्विटर के जरिए अपनी समस्याओं का समाधान किया. कई बार तो बड़ी समस्याओं का समाधान एक ट्वीट से हो गया. उससे से बड़ी बात समय पर लोगों को सुविधा मिली और लोगों ने पीएम की इस मुहिम का लाभ उठाया।

मित्रों,मोदी डिजिटल भारत के सपने को लेकर आगे बढ़ रहे हैं. सरकार के सभी विभागों को डिजिटलाइजेशन के लिए प्रेरित कर रहे हैं. उनका मानना है कि इससे पर्यावरण से लेकर धन की हानि दोनों को बचाया जा सकता है. कई सरकारी काम अब इस माध्यम से होने लगे हैं. इतना ही नहीं कई ऐसे फॉर्म को सरल किया जिसके चलते पहले लोगों को समस्याओं का सामना करना पड़ता था.

मित्रों,पीएम ने न्यू इंडिया की संकल्पना की है. उन्होंने इसके लिए कैशलेस भारत की बात कही है. वह चाहते हैं कि देश में नकदी का चलन कम-से-कम हो. यह सबसे बड़ा माध्यम है भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का. पीएम को कितनी कामयाबी मिली, या मिलेगी यह तो साफ नहीं कहा जा सकता है, लेकिन लोगों ने माना कि पीएम भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत किलेबंदी की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

मित्रों,आजादी के पहले अंग्रेजों ने भारत के लिए कई कानून बनाए. आजादी के बाद भी हजारों की संख्या में इस प्रकार के कानून भारत में चलते रहे. कई ऐसे कानून भी हैं जिनकी अब आवश्यकता ही नहीं रही. आजादी के 70 से भी ज्यादा साल हो गए. कई सरकारें आईं लेकिन किसी ने भी इस ओर विचार नहीं किया. नरेंद्र मोदी सरकार ने कई ऐसे कानून रद्द कर दिए जिनकी अब कोई जरुरत नहीं है. इस तरह 1000 से ज्यादा कानून रद्द कर दिये गए हैं. वे अपनी इस मुहिम में रोज आगे बढ़ रहे हैं. उनका मानना है कि कई गैरजरूरी कानून लोगों के लिए दिक्कत पैदा करते हैं.

मित्रों,योजना आयोग अब इतिहास हो गया है. इसके स्थान पर पीएम मोदी ने नीति आयोग का गठन किया है. जब मोदी गुजरात के सीएम थे तब योजना आयोग, उसकी कार्यशैली और राज्यों से व्यवहार उन्हें उचित नहीं लगा. राज्यों से केंद्र के बेहतर समन्वय के लिए उन्होंने नीति आयोग का गठन किया.

मित्रों,अंतरराष्ट्रीय मंच पर आतंकवाद को नीति के रूप में प्रयोग कर रहे पाकिस्तान को भारत ने अलग-थलग कर दिया. आज पाकिस्तान पर अमेरिका से लेकर कई देशों ने दबाव बनाया है कि वह आतंकवाद को प्रशय देना बंद करे. इस काम में मोदी सरकार को बड़ी कामयाबी मिली है.

मित्रों,पिछले काफी समय से चीन भारत के बड़े भाई की भूमिका में आने के प्रयास में रहा. एक तरफ जहां वह पाकिस्तान की मदद कर रहा है वहीं भारत के कई हिस्से पर अपना दावा करता रहा है. एलएसी को वह स्वीकार नहीं कर रहा है. लेकिन कई दशकों बाद भारत ने लेह में 100 टैंक भेजे और युद्धाभ्यास किया. वहीं अरुणाचल प्रदेश के विकास और सीमा पर सड़क निर्माण कार्य को तेजी से आगे बढ़ाया गया.

मित्रों,मगर ऐसा भी नहीं है कि मोदी सरकार किसी मोर्चे पर विफल न हुई हो. टूटे और अधूरे वादों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है, ख़ास तौर पर रोज़गार और विकास के मामले में, सरकारी आँकड़े ही चुगली कर रहे हैं कि रोज़गार के नए अवसर और बैंकों से मिलने वाला कर्ज़, दोनों इतने नीचे पहले कभी नहीं गए । स्वयं केंद्र सरकार के लेबर ब्यूरो के आँकड़े कहते है कि मोदी सरकार अब तक सिर्फ 9 लाख 97 हजार नौकरियां दी हैं। रोजगार को बढ़ाना तो दूर की बात है, बड़े महकमे में जो पद सालों से खाली है वो भी अब तक नहीं भरे जा पाए हैं।

मित्रों,भाजपा के घोषणा पत्र में जो वायदे किए गए थे उनमें हर साल दो करोड़ युवाओं को रोज़गार देना, किसानों को उनकी उपज का समर्थन मूल्य लागत से दोगुना मूल्य देना, विदेशों में जमा कालेधन की सौ दिनों के भीतर वापसी, भ्रष्टाचार के आरोपी सांसदों-विधायकों के मुकदमों का विशेष अदालतों के जरिए एक साल में निपटारा, महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण, गंगा तथा अन्य नदियों की सफाई, जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 का खात्मा, समान नागरिक संहिता लागू करना, कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी, गुलाबी क्रांति यानी गोकशी और मांस निर्यात पर प्रतिबंध, देश में सौ शहरों को स्मार्ट सिटी के रूप में तैयार करना आदि प्रमुख वायदे थे। इन सभी वादों में से अधिकांश वादों में मोदी सरकार असफल है और कुछ मुद्दों पर प्रयासरत है किंतु अब तक कोई ठोस परिणाम नहीं मिले है। हालाँकि कई स्टार्ट अप और आवास योजनाएं चलाईं गयी हैं लेकिन आज भी बैंक से इनका लाभ उठाना आसान नहीं है.

मित्रों,कई बार लगता है कि जैसे यह सरकार जनता से कुछ छिपाना चाहती है. पता नहीं वो नोट बंदी के आंकड़े क्यों छिपाना चाहती है? इसी तरह सवाल उठता है कि क्या सरकार लोकपाल को सचमुच में नियुक्त करना चाहती है? हम तो समझे थे कि यूपी की भाजपा सरकार देशभर की राज्य सरकारों के लिए एक उदाहरण साबित होगी लेकिन वहां की योजनाओं में आज भी अल्पसंख्यक कोटा बना हुआ है? मोदी सरकार ने नई जातियों को ओबीसी कोटे में शामिल करने के राज्य सरकार के अधिकार को संसद को सुपुर्द कर दिया है लेकिन क्या गारंटी है कि मोदी सरकार इसका दुरूपयोग नहीं करेगी? जिस तरह मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा समाप्त कर दिए गए प्रोन्नति में आरक्षण को फिर से लागू करने जा रही है उससे तो यही संदेह उत्पन्न होता है.

मित्रों,जिस तरह से बड़े पैमाने पर कांग्रेस के नेताओं को भाजपा में शामिल किया जा रहा है उससे तो लगता है कि आने वाले समय में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना होगी कि उसका कांग्रेसीकरण तो नहीं हो रहा है. और यह साबित करना भी होगी कि उसके लिए आज भी नेशन फर्स्ट है कुर्सी नहीं? और ये सब साबित करने के लिए उसके पास बहुत कम समय शेष बचा है,बहुत कम.

शनिवार, 13 मई 2017

न्यायपालिका में कितने कर्णन?

मित्रों,न्याय करना बच्चों का खेल नहीं है. इसके लिए अतिसूक्ष्म बुद्धि की आवश्यकता होती है. प्राचीन काल में कई बार राजा चुपके से वेश बदलकर घटनास्थल पर जाकर सच्चाई का पता लगाते थे. एक प्रसंग प्रस्तुत है. एक बार अकबर के पास एक मुकदमा आया जिसमें एक व्यक्ति दूसरे पर कर्ज लेकर न लौटाने के आरोप लगा रहा था. सारे गवाह कथित कर्जदार के पक्ष में थे लेकिन कर्जदाता की बातों से सच्चाई जैसे छलक-छलक रही थी. अब फैसला हो कैसे? तभी बीरबल ने दोनों को सुनसान सड़क पर एक लाश के पास बैठा दिया और आधे घंटे बाद लाश उठाकर लाने को कहा. दोनों बेफिक्र होकर लाश के पास बैठकर बातें करने लगे. कर्जदार ने कहा मैंने कहा था न कि मैं तुमको ही झूठा साबित कर दूंगा. क्या जरुरत थी तुमको बेवजह अपनी मिट्टी पलीद करवाने की? तुम्हारे पैसे तो मैंने लौटाए नहीं ऊपर से तुम्हारी ईज्ज़त को भी तार-तार कर दिया. दूसरा बेचारा चुपचाप सुनता रहा. आधे घंटे बाद जब वे दोनों लाश लेकर दरबार में पहुंचे तो फिर से सुनवाई शुरू हुई. फिर से बेईमान का पलड़ा भारी था कि तभी लाश बना गुप्तचर उठ बैठा और सच्चाई सामने आ गयी.
मित्रों,अब बताईए कि हमारी वर्तमान न्यायपालिका किस तरह काम करती है? क्या वो गवाहों के बयानात,जांच अधिकारी की रिपोर्ट, कानून की विदेशी किताबों में दर्ज लफ्जों और वकीलों की दलीलों के आधार पर अपने फैसले नहीं सुनाती है? अगर उसके समक्ष उपर्लिखित मामला या उसके जैसा कोई मामला जाता तो वो क्या करती? न्याय या अन्याय? हमारी आज की जो न्याय-व्यवस्था है उसमें निश्चित रूप से अन्याय होता और होता भी होगा.
 मित्रों,हमारे देश में विलंबित मुकदमों की भारी संख्या होने के पीछे एक कारण यह भी है कि कई दशकों की देरी के बाद जब फैसला आता है तो पीड़ित पक्ष को न्याय नहीं मिलता. कौन देगा न्याय की गारंटी? किसकी जिम्मेदारी है यह? मैं मानता हूँ कि निश्चित रूप से यह उच्च न्यायपालिका, सरकार यानि कार्यपालिका और व्यवस्थापिका की संयुक्त जिम्मेदारी है.
मित्रों,लेकिन हमारे उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश क्या कहते हैं? कदाचित उनका तो यह मानना है कि वे निरंकुश हैं. संविधान क्या कहता है इससे उनको फर्क नहीं पड़ता वे जो कहते हैं वही संविधान है और कानून भी. जब जैसा चाहा वैसी व्यवस्था दे दी और कई बार तो वे खुद ही अपने लिए नई व्यवस्था बना लेते हैं जबकि ऐसा करने से व्यवस्थापिका के अधिकार-क्षेत्र का अतिक्रमण होता है. जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने संसद और 20 विधानसभाओं से एक सुर में पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून को असंवैधानिक करार देकर रद्द कर दिया उसके बाद तो यह सवाल उठने लगा है कि संसद और विधान-सभाओं की आवश्यकता ही क्या है? क्या जजों की नियुक्ति की कोलेजियम व्यवस्था आसमानी है जिसमें लाख कमियों के बावजूद कोई बदलाव नहीं हो सकता? अगर इसी तरह अतिनिराशाजनक स्थिति को बदलने के लिए उच्चतर न्यायपालिका कुछ करेगी नहीं और कार्यपालिका और व्यवस्थापिका को करने भी नहीं देगी तो यथास्थिति बदलेगी कैसे? क्या इसी तरह कर्णन जैसे विचित्र स्थिति पैदा करनेवाले विचित्र लोग जज बनते रहेंगे? जब जज ऐसे होंगे तो फैसले कैसे सही हो सकते हैं? कितने महान निर्णय हमारी उच्च न्यायपालिका देती है उदाहरण तो देखिए. कोई मुसलमान १५ साल की उम्र में शादी तो कर सकता है लेकिन बलात्कारी या हत्यारा नहीं हो सकता. बलात्कारी या हत्यारा होने के लिए उसको १७ साल,११ महीने और ३० दिन का होना होगा. सोंचिए अगर निर्भया के सारे बलात्कारी हत्यारे नाबालिग होते तो? तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या होता? तब सुप्रीम कोर्ट कहता कि हत्या हुई ही नहीं,बलात्कार भी नहीं हुआ वो तो बच्चों से गलती हो गई? इसी तरह से बतौर न्यायपालिका जलिकट्टू क्रूरता है क्योंकि इसमें जानवर घायल हो जाते हैं लेकिन सरकार को वधशालाओं को बंद नहीं करना चाहिए क्योंकि पशुओं का मांस खाना लोगों का जन्मसिद्ध अधिकार है. क्या फैसला है? हत्या अपराध नहीं लेकिन घायल करना अपराध है. इसी तरह से हमारी न्यायपालिका मानती है कि कुरान में जो कुछ भी लिखा गया है सब सही है लेकिन यही बात वेद-पुराणों के लिए लागू नहीं हो सकती.
मित्रों,कितने उदाहरण दूं भारत की महान न्यायपालिका के महान फैसलों के? पूरी धरती को पुस्तिका बना लूं फिर भी स्थान की कमी रह जाएगी. जब तक कर्णन जैसे कर्णधार जज बनते रहेंगे उदाहरणों की कमी नहीं रहेगी. वो कहते हैं न कि बर्बादे गुलिस्तान के लिए बस एक ही उल्लू काफी है,हर डाल पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तान क्या होगा.. आप कहेंगे कि न्यायाधीशों के लिए ऐसा कहना उचित नहीं होगा. मगर क्यों? क्या गाली सुनना सिर्फ नेताओं का जन्मसिद्ध अधिकार है? मुलायम बोले तो गलत और जज बोले तो सही? क्या जज आदमी नहीं होते, जन्म नहीं लेते? सीधे धरती पर स्वर्ग से आ टपकते हैं?

सोमवार, 8 मई 2017

कोई उम्मीद बर नहीं आती

मित्रों,भगत चा यानि शिव प्रसाद भक्त उसी आरपीएस कॉलेज,चकेयाज,महनार रोड,वैशाली  में दफ्तरी हैं जहाँ से मेरे पिताजी साल २००३ में प्रधानाचार्य बनकर रिटायर हो चुके हैं.उनसे मेरा परिचय तब हुआ जब १९९२ में हमारा परिवार जगन्नाथपुर छोड़कर महनार आ गया.यह उनके व्यक्तित्व का ही जादू था कि वे बहुत जल्द हमारे परिवार का हिस्सा बन गए.मेरी छोटी दीदी की शादी में लगभग सारा इंतजाम उन्होंने ही किया था.
मित्रों,भगत चा १९८० से कॉलेज में हैं लेकिन उनको वेतन नहीं मिलता है. इन ३७ सालों में उन्होंने अनगिनत कष्ट झेले हैं लेकिन क्या मजाल की एक दिन के लिए भी कॉलेज से गैरहाजिर हुए हों. मैंने उनको उदास तो कई बार देखा लेकिन हताश कभी नहीं. जेब और पेट भले ही खाली हों चेहरे की मुस्कान हरदम बनी रही.पत्नी और बच्चों को भी हरपर अपनी जरूरतों में कटौती करनी पड़ी लेकिन उन्होंने भी हमेशा उनका साथ दिया.आरपीएस में ऐसे लगभग डेढ़ दर्जन लोग थे जिनको वेतन नहीं मिलता था.पिछली पंक्ति में हैं की जगह थे का प्रयोग मैंने इसलिए किया है क्योंकि उनमें से २ अभाव और भूख से लड़ते हुए शहीद हो चुके हैं.एक बार नहीं दो-दो बार पटना उच्च न्यायालय ने उनको वेतन और बकाया देने का आदेश दिया.मौत आ गयी लेकिन वेतन नहीं आया.वेतन का इंतजार जिन्दगी को होती है जनाब मौत को नहीं.
मित्रों,अभी पिछले साल बीआरए बिहार विवि के रजिस्ट्रार की तरफ से कॉलेज के प्रधानाचार्य के पास पत्र आया कि इन लोगों को वेतन भुगतान शुरू किया जाए लेकिन बड़ी ही चालाकी से यह नहीं बताया गया कि किस मद से.लिहाजा फिर से गेंद को विवि के पाले में डाल दिया गया. अब रजिस्ट्रार साहब को ४ लाख रूपये चाहिए तभी वे फिर से कॉलेज में पत्र भेजेंगे मद को स्पष्ट हुए.मगर यह पैसा देगा कौन और कहाँ से? ४० साल की अवैतनिक गृहस्थी के बाद किसी के पास कुछ बचा ही कहाँ होता है साहेब बहादुर को नजराना देने के लिए.बूढ़े और जर्जर हो चुके जिस्मों में खून तक तो शेष नहीं वर्ना वही पिला दिया जाता.
मित्रों,तो मैं बात कर रहा था भगत चाचा यानि भगत चा की.भगत चा इन दिनों मृत्यु शैया पर हैं शर शैया पर तो १९८० से ही थे.उनको लीवर का कैंसर है जो अंतिम स्टेज में है.कुछ भी नहीं पच रहा.नसों में खून नहीं बचा जिसके चलते स्लाईन चढ़ाना भी मुमकिन नहीं.डॉक्टरों ने ३ महीने की समय-सीमा तय कर दी है.पहले से ही कर्ज में चल रही गृहस्थी अब और भी ज्यादा कर्ज में है.घर में सिवाय चंद बर्तनों और कपड़ों के पहले भी कुछ नहीं था और आज भी नहीं है. कभी जिस भगत चा को उनके शिक्षक सितारे हिन्द कहकर बुलाते थे वही भगत चा आज डूबता हुआ तारा हैं.६० साल की जिंदगी में ४० साल का भीषण संघर्ष अब समाप्ति की ओर है.भगवान का एक अनन्य भक्त अब भगवान से निराश होकर भगवान के पास जा रहा है.देखना यह है कि मौत पहले आती है या वेतन पहले आता है.देखना है कि विश्वास जीतता है या हारता है?देखना यह है कि क्या भगत चा भी बिना वेतन पाए ही ३ महीने में जिंदगी से रिटायर हो जाने वाले हैं वैसे नौकरी अब भी ६ महीने की बची है.देखना यह भी है कि चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी समारोह में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेनेवाले ऊपर से नीचे तक आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे  विवि प्रशासन का जमीर जागता है या नहीं. वैसे सच पूछिए तो मुझे तो इस चमत्कार की कोई उम्मीद नजर नहीं आती. बतौर ग़ालिब-

कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

मौत का एक दिन मु'अय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती

जानता हूँ सवाब-ए-ता'अत-ओ-ज़हद
पर तबीयत इधर नहीं आती

है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती

क्यों न चीख़ूँ कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती

दाग़-ए-दिल नज़र नहीं आता
बू-ए-चारागर नहीं आती

हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुमको मगर नहीं आती

मंगलवार, 2 मई 2017

बड़े बेआस होकर हम पटना एम्स से निकले

मित्रों,जब हम दिल्ली में थे तो एक बार 2006 में दिल्ली एम्स में पूर्व विधायक महेंद्र बैठा जी जो मेरे मित्र अजय के पिता हैं के साथ जाने का अवसर मिला था. सुअवसर नहीं बोलूँगा क्योंकि तब उनकी तबीयत बहुत खराब थी. वहाँ की व्यवस्था देखकर मैं दंग था और तभी से सोचने लगा कि ऐसा कोई अस्पताल बिहार में होता तो कितना अच्छा होता.
मित्रों,शायद यही कारण था कि जब ४ साल पहले पटना में एम्स का उद्घाटन हुआ तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था और स्वाभाविक रूप से मेरे मन में पटना एम्स को लेकर कई कल्पनाओं ने जन्म ले लिया. मैं सोचता था कि यहाँ भी दिल्ली एम्स की तरह लाजवाब व्यवस्था होगी और दिल्ली की तरह ही पैरवी लेकर आनेवालों से कहा जाता होगा कि हम राष्ट्रपति की भी नहीं सुनते लाईन में जाइए. और शायद यही कारण था कि जब मेरी पत्नी विजेता की तबियत ख़राब हुई तो मैंने आँख बंद कर पटना एम्स का रूख किया। १७ अप्रैल को हम वहां सुबह-सुबह जा पहुंचे लेकिन तब तक रजिस्ट्रेशन की लाईन हनुमान जी की पूँछ की तरह काफी लम्बी हो चुकी थी. मेरी पत्नी विजेता महिलाओं वाली पंक्ति में खड़ी हो गयी. ८ बजे से १२ बजे तक पंक्ति में खड़े रहने के बाद उसका रजिस्ट्रेशन हुआ और कहा गया कि नई वाली ओपीडी में चली जाए. पता नहीं क्यों वहां रजिस्ट्रेशन के लिए और काउंटर नहीं खोला जाता. शायद वहां के प्रशासक को धक्का-मुक्की अच्छी लगती है. वहां से उसे १०९ नंबर कमरे में जाकर पेशाब जाँच कराने को कहा गया. वहां भी पैसा जमा करने में वही धक्का-मुक्की. जब हम जाँच रिपोर्ट लेकर गए तब लांच ब्रेक हो चुका था. हम काफी खुश थे क्योंकि जाँच रिपोर्ट बता रही थी कि मैं एक बार फिर से बाप बनने जा रहा हूँ. लंच ब्रेक के बाद जब डॉक्टर विराजमान हुई तो एक नया खेल देखने को मिला। लोग जान-पहचानवाले स्टाफ को साथ में लेकर आते और दिखलाकर चले जाते. हमारी कोई पहचान तो है नहीं सो हमारे पास विरोध करने के और नरेंद्र मोदी ऐप पर जाकर शिकायत करने के सिवाय और कोई उपाय नहीं था. किसी तरह से साढ़े ५ बजे विजेता का बुलावा आया. डॉक्टर साहिबा को तब तक घर जाने की जल्दी हो चुकी थी. सो उन्होंने कुछेक जाँच और सिर्फ फोलिक एसिड लिखकर अपनी ड्यूटी पूरी कर ली. उनका भी क्या दोष बांकी के स्टाफ भी तो यही कर रहे थे. हम फिर से १०९ की तरफ भागे. वहां मौजूद स्टाफ को भी शायद घर भागने की जल्दी थी. उसने जाँच के लिए खून तो ले लिया लेकिन यह नहीं बताया कि एक जाँच बच गयी है जिसके लिए खाली पेट आना होगा.
मित्रों,कल होकर मुझे भी अपना खून खाली पेट में जाँच के लिए देना था सो मैं पटना एम्स गया और लौट भी आया. लेकिन अगली बात जब २१ तारीख को पत्नी जाँच रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के पास गयी तो डॉक्टर ने बताया कि यह रिपोर्ट अधूरी है क्योंकि एक जाँच होनी तो बांकी ही रह गयी. हमारे पास भिन्नाए मन से घर लौट जाने के सिवाय और कोई उपाय नहीं था. हम फिर से कल होकर एम्स गए और खून दिया. अंततः वह दिन भी आया जब हम सारी जाँच रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के समक्ष उपस्थित हुए. मगर यह क्या डॉक्टर ने एक घटिया कंपनी की मल्टीविटामिन वीटा गोल्ड के सिवा और कुछ लिखा ही नहीं. मैं जानता था कि यह दवा भले ही ए टू जेड से ज्यादा मंहगी थी मगर क्वालिटी में उससे हलकी थी. शायद कमीशन का कोई चक्कर होगा.
मित्रों,अब तक हम एम्स का चक्कर लगाते-२ थक चुके थे. बाईक से ५० किलोमीटर आना और ५० किलोमीटर जाना. जाँच-फाँच में भी पांच-६ हजार की अच्छी-खासी राशि खर्च हो चुकी थी. अब हमने एम्स से तोबा ही कर लिया था. वहां से वापस आते हुए रास्ते में हम सोंच रहे थे कि अगर एम्स में भी यही सब होना था तो पीएमसीएच और आईजीएमएस तो पटना में पहले से था ही. हम सोंच रहे थे कि एम्स किसी बिल्डिंग का नाम है या सोंच का या फिर एक कोरे सपने का? फिर हमने जो दिल्ली एम्स में देखा था वो क्या था?

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

चीन,नेहरु और माओवादी बुद्धिजीवी

मित्रों,अभी कल ही चीन ने भारत को सलाह दी है कि भारत अपने विकास पर ध्यान दे और चीन क्या कर रहा है इस बात से पूरी तरह से आँखें बंद कर ले. कुछ इसी तरह की सलाह कभी नेहरु को भी दी गयी थी और नेहरु ने आँख मूंदकर इसे मान भी लिया था. परिणाम यह हुआ कि भारत को शर्मनाक पराजय का सामना तो करना ही पड़ा हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन से भी हमेशा के लिए हाथ धोना पड़ा. खता एक व्यक्ति ने की लेकिन सजा पूरे देश को मिली और आज भी मिल रही है.
मित्रों,शायद चीन मोदी को भी नेहरु और आज के भारत को तब का भारत समझ रहा है. सच्चाई तो यह है कि आज अगर मोदी नेहरु बनना भी चाहेंगे तो हम उनको कदापि बनने नहीं देंगे. वैसे मुझे नहीं लगता कि मोदी नेहरु बनने की सपने में भी सोंच सकते हैं. वैसे चीन की तिलमिलाहट यह दर्शाती है कि वो भारत की सैन्य तैयारियों से परेशान है और यह भी दर्शाती है कि इस समय मोदी वही सबकुछ कर रहे हैं जो तब नेहरु को करना चाहिए था.
मित्रों,इन दिनों तिलमिलाए हुए वे लोग भी हैं जो खुद को चीन का मानस-पुत्र मानते हैं. माओ ऐसे बुद्धिजीवियों के खून में बहता है. इनको शहरी नक्सली भी कहा जा सकता है. जब-जब भारत के सुरक्षा-बलों पर हमला होता है तो ये बाग़-बाग़ हो उठते हैं.
मित्रों,मैं हमेशा से अपने ब्लॉग के माध्यम से कहता रहा हूँ कि देश के लिए सीमापार आतंकवाद से भी बड़ी समस्या माओवादी हिंसा है. क्या यह सिर्फ एक संयोग-मात्र है कि कल ही माओ के देश ने भारत को सलाहरुपी धमकी दी और कल ही माओवादी हमला हो गया? संयोग तो तमिलनाडु के हवाईयात्री किसानों का प्रदर्शन भी नहीं था. आज चीन एक आर्थिक महाशक्ति है. उसके पास हमारे देश के जयचंदों और मान सिंहों को खरीदने के लिए अपार पैसा है और हमारे आज के भारत में सबसे सस्ता अगर कुछ मिलता है तो वो ईमान है. पूरी-की-पूरी पिछली सरकार ही गद्दारों की थी. वैसे गद्दार आपको मीडिया में भी खूब मिलेंगे,एक को ढूंढो तो हजार. विश्वविद्यालयों में भी मिलेंगे किस डे और बीफ डे मनाते हुए. एनजीओ खोलकर बैठे हुए भी मिलेंगे. इनका मानना है कि रूपये पर कहाँ लिखा होता है कि यह देश को बेचकर कमाया गया है. मोदी सरकार को चाहिए कि इन घुनों की संपत्तियों की गहराई से जाँच करवाए जिससे इनकी समझ में आ जाए कि हर पैसे पर लिखा होता है कि यह पैसा खून-पसीने की कमाई है और यह पैसा देश और ईमान को बेचकर कमाया गया है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि १९६२ में भी कई बुद्धिजीवी ऐसे थे जिन्होंने चीन के भारत पर हमले को उचित माना था.
मित्रों,भारत सरकार और भारत को यह समझना होगा कि जब तक इन शहरी माओवादियों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती जंगल में छिपे माओवादियों की कमर टूटनी मुश्किल है. माओवाद की जड़ जंगल में नहीं बल्कि जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में है, नकली किसान आन्दोलन को बहुत ही क्रान्तिकारी साबित करनेवाले टीवी चैनलों में है,कविता कृष्णन जैसे शिक्षकों,अरुंधती जैसे लेखकों,केजरीवाल जैसे नेताओं के दिमाग में है. जड़ पर प्रहार होगा तो पेड़ खुद ही सूख जाएगा.

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

राक्षस धर्म और संस्कृति

मित्रों,हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं कि लम्बे समय तक धरती पर देवों और दानवों में युद्ध होता रहा. दानवों यानि राक्षसों की अपनी संस्कृति थी.वे परपीड़क थे और परपीड़कता ही उनका धर्म था.वे सर्वभक्षी थे यहाँ तक कि नरभक्षी भी थे.वे दुनिया पर जबरदस्ती अपनी संस्कृति थोपना चाहते थे.वैदिक यज्ञों और पूजा-पाठ में बाधा डालते थे और ऋषि-मुनियों की हत्या कर देते थे.परस्त्रियों को अपहृत कर जबरन उनको अपनी पत्नी बना लेते थे.हरिभक्तों को जेलों में बंद कर असीम यातनाएं देते थे.यहाँ तक कि हिरन्यकश्यप ने अपने हरिभक्त बेटे को भी मारने की कोशिश की.हिरन्यकश्यप ने घोषणा कर दी कि वही भगवान है इसलिए केवल उसकी ही पूजा की जाए.अन्य देवी-देवताओं को पूजनेवाले कठोर दंड के भागी होंगे क्योंकि ऐसा करना उसकी नजर में पापकर्म होगा.
मित्रों,वेद-पुराण बताते हैं कि फिर कई उतार-चढाव के बाद अंत में राक्षसों की हार होती है और देव-संस्कृति की स्थापना होती है.हम यह नहीं कहते कि ऐसा होते ही अचानक हमारा सनातन धर्म पूरी तरह से अवगुणरहित हो गया.लेकिन सत्य यह भी है कि हमने बदलते समय के साथ खुद को बदला है.हमने खुले दिल से माना कि हममें कमियां हैं और उनको दूर भी किया और आज भी कर रहे हैं.हमने ऐसा कभी नहीं कहा कि हम तो सिर्फ वही मानेंगे या करेंगे जो इस आसमानी पुस्तक-विशेष में लिखा हुआ है.बल्कि इसके उलट हमने कहा कि एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति और कहा ब्रह्मास्मि तत त्वमसि.उसी तरह ऋग्वेद से लेकर पुरानों और स्मृतियों तक में विभिन्न पशु-पक्षियों को पूज्य कहा गया है.और चूंकि हम मानते हैं कि हर जीव में ईश्वर का वास है या हर जीव ईश्वर का अंश है इसलिए जीवहत्या को भयंकर पाप भी मानते है.हालांकि आज भी कुछ हिन्दू पशुओं की बलि देते हैं लेकिन यह गलत है.हमारा कोई भी शास्त्र इसकी अनुमति नहीं देता और तामसी भोजन को हर दृष्टिकोण से त्याज्य माना जाता है.
मित्रों,यह हमारा दुर्भाग्य है कि समकालीन विश्व में कई ऐसे संप्रदाय मौजूद हैं जिनमें वेद-पुरानों में वर्णित राक्षस-संस्कृति के लक्षण आसानी से देखे जा सकते हैं.वे कुछ भी भक्षण कर जाते हैं.हालाँकि उनमें से ज्यादातर इंसानों पर अत्याचार नहीं करते और अपनी ही दुनिया में मगन रहते हैं.परन्तु एक पंथ ऐसा भी है जिनके चलते पूरी दुनिया में अशांति है और फिर भी वे अपने कथित धर्म को शांति का धर्म बताते हैं.कुरान पढने के बाद मेरी समझ में जो आया है वो यह है कि मोहम्मद साहब मुसलमानों के आपसी झगड़ों से काफी परेशान थे.इसलिए उन्होंने आतंरिक शांति के लिए नए नियमों की घोषणा की और पंथ का नाम इस्लाम यानि शांति रखा.इसका यह मतलब कतई नहीं है कि उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा कि दूसरे पंथों का आदर करो और सबके साथ मिलजुलकर रहो.(९.५ फिर जब हराम महीने बीत जाएँ तो बहुदेववादियों की हत्या करो जहाँ पाओ,९.१४ उनसे युद्ध करो अल्लाह तुम्हारे हाथों उनको दंड देगा.४.८९ तुम उनमें से किसी को भी मित्र या सहायक न बनाओ,जहाँ कहीं उनको पाओ उनकी हत्या करो) बल्कि कहा कि उनके अनुसार ईश्वर अतिकठोर ह्रदयवाला है और जो लोग कुरान में विश्वास नहीं रखते या कुरान में दिए गए आदेशों को नहीं मानते उनको खुद या अपने बन्दों के माध्यम से दण्डित करता है.(४७.४ तो अवज्ञाकारियों से तुम्हारी मुठभेड़ हो तो उनकी गर्दन पर मारो.८.४८ मैं अल्लाह से डरता हूँ और अल्लाह कठोर दंड देनेवाला है. ८.५० और यदि तुम देखते जबकि फ़रिश्ते अवज्ञाकारियों के प्राण निकालते हैं,मारते हुए उनके चेहरों और उनकी पीठों पर और यह कहते हुए कि अब जलने की यातना चखो). अल्लाह इतना क्रूर है कि निरीह पशुओं पर भी कृपा नहीं करता.(८.२२ निश्चय ही उसके निकट सबसे बुरे पशु हैं और जो बहरे,गूंगे हैं और बुद्धि से काम नहीं लेते.२.६७ जब मूसा ने अपनी कौम से कहा कि अल्लाह तुमको आदेश देता है कि तुम गाय जबह करो) और हम हिन्दू हैं कि हजार साल से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि एक दिन मुसलमान हमारी भावनाओं का आदर करते हुए गाए-बैल खाना बंद कर देंगे.अगर वे ऐसा करेंगे तो कुरान की अवमानना के दोषी नहीं हो जाएंगे और इसके लिए उनका शक्तिशाली और कठोर अल्लाह उनको नरक की आग में नहीं जलाएगा? पता नहीं वह नरक कहाँ है? (5.3 तुम्हारे लिए अवैध किया गया मुर्दा और खून और सूअर का मांस बाँकी सारे पशु-पक्षी-जलजीव तुम्हारे लिए सूथर और हलाल हैं).
मित्रों,कुरान को पढ़कर हमने जाना है कि इस्लाम धर्म नहीं है, सेना है; लुटेरों की सेना जिसको कथित अवज्ञाकारियों से लड़ने के लिए हमेशा तत्पर रहना है (८.६०).तभी तो आठवें अध्याय में विस्तार से अनफ़ाल यानि युद्ध में लूट के माल के बंटवारे की विस्तार से चर्चा की गयी है.(८.४१ और जान लो कि जो कुछ माल-गनीमत तुम्हे प्राप्त हुआ है उसका ५वां भाग अल्लाह और उसके संदेष्टा के लिए है.
६१.११ ऐ ईमानवालों तुम अल्लाह के मार्ग में अपनी संपत्ति और अपनी जान से युद्ध करो).जीत गए तो अल्लाह की जीत और हार गए तो अल्लाह की ईच्छा.जीवित रहते हुए शराब नहीं पीओ लेकिन मरने के बाद तुमको स्वर्ग में शराब की नदियाँ अता की जाएंगी (३७.४५). इसी तरह स्त्रियों को पुरुषों की खेती कहा गया है और विस्तार से निकाह,तलाक और हलाला की चर्चा की गयी है.रक्तसम्बंधियों से विवाह को मान्यता दी गयी है और मेहर अदा करने को कहा गया है जो एक तरह से औरतों की कीमत है.
मित्रों,यहूदी धर्म और ईसाई धर्म भी तो इस्लाम की तरह यहूदी धर्म से ही निकले हैं फिर वे क्यों मेलमिलाप और प्रेम की बात करते हैं.कुरान में कहीं भी प्रेम का जिक्र तक क्यों नहीं है?उत्तर पाने के लिए हमें रामकृष्ण परमहंस के जाना होगा. भक्तप्रवर रामकृष्ण परमहंस ने कहा है कि हम जैसे देवता या भगवान को पूजते हैं खुद भी वैसे ही हो जाते हैं या फिर हम जैसे होते हैं हमारा आराध्य भी वैसा ही होता है.मोहम्मद साहब ने जो व्यवस्था दी वह तत्कालीन अरब की परिस्थितियों के अनुरूप थी.उन्होंने जो देखा,सुना और भोगा वैसा ही अल्लाह गढ़ लिया.कोइ भी किताब आसमानी नहीं हो सकती.कुरान की सीमा और कमियां अल्लाह की सीमा या कमी नहीं है बल्कि मोहम्मद साहब की सीमा या कमी है.अगर कुरान आसमानी होती तो अल्लाह को पता होता कि धरती गोल है न कि चटाई की तरह चपटी,आसमान शून्य है और उसमें कोइ सतह नहीं है,पहाड़ लम्बी भूगर्भीय प्रक्रिया से बने हैं और पूरी दुनिया २ या ४ दिन में नहीं बनी है.कुरान अगर अल्लाहरचित होता तो अल्लाह को पता होता कि आत्मा क्या है और चन्द्रमा का आकार कैसे बढ़ता-घटता है.ग्रहण क्यों लगता है और सूरज धरती का चक्कर नहीं लगाता बल्कि धरती सूरज के चक्कर लगाती है.
मित्रों,मैंने आलेख के शुरू में राक्षसी संस्कृति का जिक्र किया था.क्या इस्लाम और राक्षसी संस्कृति में अद्भुत  समानता नहीं है? सवाल उठता है कि क्या इस्लाम को बदला जा सकता है? स्वयं कुरान की मानें तो कदापि नहीं (१०.३७).मगर सवाल उठता है कि लम्बे संघर्ष के बाद इसाई धर्म में बदलाव आ सकता है तो इस्लाम में सुधार क्यों नहीं हो सकता?क्या कारन है कि तुर्की,ईराक,सीरिया,ईरान,अफगानिस्तान,लेबनान,मालदीव आदि देशों में या तो कट्टरपंथी इस्लामिक क्रांति या तो घटित हो चुकी या अभी प्रक्रिया में है?पूरी दुनिया जबकि आगे जा रही है तो मुसलमान पीछे क्यों जा रहे?आखिर १४०० साल पहले दी गयी व्यवस्था को आज कैसे लागू किया जा सकता है?परिवर्तन तो संसार का नियम है फिर इस्लाम को क्यों नहीं बदलना चाहिए?क्या इसी तरह से धरती अल्लाह के नाम पर निर्दोष इंसानों और पशुओं के खून से लाल होती रहेगी और काल्पनिक स्वर्ग के लिए वास्तविक स्वर्ग धरती को नरक बना दिया जाएगा.क्या इसी तरह स्त्रियों को हलाला जैसी वेश्यावृत्ति और पर्दा प्रथा को भोगते रहना पड़ेगा.सवाल यह भी उठता है कि जिस तरह का व्यवहार मुसलमान अन्य धर्मावलम्बियों के साथ अपने अल्लाह के नाम पर सीरिया और इराक सहित पूरी दुनिया में कर रहे हैं अगर हम भी उनके साथ अपने भगवान के नाम पर वैसा ही करें तो क्या उनको पसंद आएगा? 

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

कल्पवृक्ष हैं नरेन्द्र मोदी

मित्रों,आपको याद होगा कि पिछली केंद्र सरकार के समय देश की स्थिति कैसी थी. भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद जिस तरह से पाकपरस्त बयान दे रहे थे उससे कई बार संदेह होता था कि वे भारत के विदेश मंत्री हैं या पाकिस्तान के. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भारत के प्रधानमंत्री को गंवार झगडालू महिला का ख़िताब अता फरमा रहे थे. तब हमें २४ फरवरी २०११ को अपने ब्लॉग ब्रज की दुनिया पर महाकवि गोपाल सिंह नेपाली की लम्बी कविता ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से के माध्यम से याद दिलाते हुए लिखना पड़ा था कि
ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से
चरखा चलता है हाथों से,शासन चलता तलवार से
यह रामकृष्ण की जन्मभूमि,पावन धरती सीताओं की  
फिर कमी रही कब भारत में,सभ्यता-शांति सद्भावों की
पर नए पडोसी कुछ ऐसे,पागल हो रहे सिवाने पर
इस पार चराते गौएँ हम,गोली चलती उस पार से
ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से ..............
मित्रों,तब सीआरपीएफ के जवानों को कांग्रेस-अब्दुल्ला की साझा सरकार ने कश्मीर में निहत्थी ड्यूटी करने के लिए बाध्य किया था. जब १३ मार्च,२०१३ को हमारे ५ सीआरपीएफ जवानों को आतंकियों ने मार डाला था तब हमें क्रोधित स्वर में अपने उसी ब्लॉग पर लिखना पड़ा  था कि आज खुश तो बहुत होंगे उमर अब्दुल्ला. क्या आपने कहीं सुना है कि सेना बिना हथियार के लडती है?
मित्रों,इसी प्रकार से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने  १५ अगस्त,२००४ को लाल किले के प्राचीर से अपना पहला भाषण देते हुए घोषणा की थी कि 'देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों' का है और हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की गहरी साजिश के संकेत दिए थे. फिर जब तक उनकी सरकार दिल्ली में रही हिन्दुओं के खिलाफ लगातार साजिश रचती रही. मानों उनके और देश के सबसे बड़े दुश्मन पाकिस्तान और चीन नहीं हों हिन्दू हों. यहाँ तक कि पूरी दुनिया को काल्पनिक जन्नत की चाह में जहन्नुम बना देनेवाले जेहादी आतंकवाद के जवाब में हिन्दू आतंकवाद की कल्पना तक कर ली गयी और नए हिन्दू-विरोधी दंगा कानून को प्रस्तावित किया गया. तब हमें  10 फ़रवरी 2011 को अपने आलेख क्या भारत में हिन्दू होना अपराध नहीं है? और  6 अप्रैल 2014 को अल्पसंख्यकवाद,आरक्षण और छद्म धर्मनिरपेक्षता के माध्यम से कड़ा प्रतिकार करना पड़ा था.
मित्रों,जब २जी घोटाला हुआ और ए. राजा घोटालेबाजों के राजा बन गए थे तब हमें बाध्य होकर 13 नवंबर 2010 को लिखना पड़ा था कि राजा तुम कब जाओगे.
मित्रों,कुल मिलाकर जब भारत की आत्मा आहत थी, हिन्दू मन हताश था, योजना आयोग ऑंखें बंद कर रेवड़ी बाँट रहा था, घोटालों की लाईन लगा दी गयी थी और तर्क दिया जा रहा था कि ये घोटाले देशहित में किए जा रहे हैं (सोमवार, 27 अगस्त 2012 देशहित में किए जा रहे हैं घोटाले), कानून के राज के प्रति विश्वास क्षीण हो रहा था, भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा न्यूनतम विन्दु पर थी, राजनैतिक दल चंदे का हिसाब देने से कतरा रहे थे, वेश्यावृत्ति और समलैंगिकता को कानूनी मान्यता देने की तैयारी हो रही थी, सीबीआई सरकारी तोता बनकर रह गयी थी, मुंबई, हैदराबाद, बंगलौर में रोजाना आतंकी हमले हो रहे थे, रोज कोई-न-कोई नौसैनिक जहाज और पनडुब्बी डूब रहे थे, अन्ना और केजरीवाल से जनता का मोहभंग होने लगा था ऐसे अति निराशाजनक माहौल में २० दिसंबर,२०१२ को गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के साथ ही केंद्रीय राजनीति में उदय हुआ नरेन्द्र मोदी का. उस दिन उनको सुना तो लगा जैसे सिंह गर्जना कर रहा हो. हमने उसी दिन उनका राजतिलक करते हुए आलेख लिखा कि नरेन्द्र मोदी भारत के अगले प्रधानमंत्री होंगे. फिर आया २७ अक्तूबर,२०१३ का दिन. पटना के गाँधी मैदान में बम धमाकों के बीच मोदी जी में भाषण दिया. ८ बम फटे, ५ लोग मारे गए लेकिन न तो जनता विचलित हुई और न ही नरेन्द्र मोदी का विश्वास डगमगाया. (ब्रज की दुनिया, रविवार, 27 अक्तूबर 2013,धमाकों के बीज गूंजी शेर की दहाड़ ). फिर आया १६ मई,२०१४ नए सूरज के साथ. भारत में रक्तहीन क्रांति घटित हो चुकी थी. तब हमने एक भारतीय आत्मा के उछाहों को स्वर देते हुए लिखा कि छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी.
मित्रों,नई सरकार ने ताबड़तोड़ फैसले लेते हुए कैबिनेट की पहली बैठक में कालाधन के खिलाफ एसआईटी का गठन किया.भूमि अधिग्रहण अध्यादेश जैसे उसके कुछ फैसले गलत भी साबित हुए और उसको यूटर्न भी लेना पड़ा लेकिन सरकार की नीयत में खोट नहीं थी. जब मोदी जी ने देश की सक्षम जनता से गरीब परिवारों के पक्ष में रसोई गैस की सब्सिडी त्यागने की अपील की तब कई लोगों ने कहा कि जब लोकसभा कैंटीन की सब्सिडी बंद होगी तभी वे ऐसा करेंगे और मोदी जी ने कहा तथास्तु. लोकसभा कैंटीन की सब्सिडी समाप्त कर दी गयी. इसी तरह हमने ७ अप्रैल,२०११ को एक आलेख कैसे बांधे बिल्ली खुद अपने ही गले में घंटी के माध्यम से और बाद में भी कई आलेखों के द्वारा मांग की कि राजनैतिक दलों को भी चंदे का ब्यौरा देना चाहिए. हमने शनिवार, 4 फ़रवरी 2017 को शुभस्य शीघ्रम मोदी जीआलेख द्वारा सवाल उठाया कि जब सामान्य लेन-देन को कैशलेस किया जा रहा है तो राजनैतिक दलों को मिलनेवाले चंदे को क्यों नहीं कैशलेस कर दिया जाए और मोदी जी ने कहा तथास्तु. पहले हम अपने गाँव में बिजली नहीं होने की समस्या उठाते थे (सोमवार, 17 फ़रवरी 2014, एक गांव सुशासन ने जिसकी रोशनी छीन ली) मोदी जी ने एक बारगी भारत के सभी बिजलीविहीन गांवों को बिजलीयुक्त कर दिया. आज भारत चीन सहित पूरी दुनिया के सामने गर्व से सिर उठाकर न सिर्फ खड़ा है बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता पाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. देश और विदेश-स्थित कालेधन के खिलाफ जंग छेड़ दी गयी है. वन रैंक वन पेंशन लागू कर दिया गया है, रेल विकास प्राधिकरण प्रणाली को स्वीकृति दे दी गयी है, बुलेट ट्रेन का सपना सच होने जा रहे है, पुलिस को जवाबदेह बनाने के लिए विधेयक आने जा रहा है, न्यायपालिका, पुलिस और जेल को नई तकनीक द्वारा जोड़ा जा रहा है, अवैध गोवधशालाओं को बंद करवाया जा रहा है, मनचलों पर कार्रवाई हो रही है, शशिकला जेल में है, हमारी सेना का मनोबल आठवें आसमान पर है, पूँजी निवेश में भारत नंबर एक बन चुका है,मेक ईन इंडिया द्वारा भारत को सोने की चिड़िया के बजाए सोने का शेर बनाया जा रहा है, कभी चुनाव नहीं लड़नेवाले राजनैतिक दलों की मान्यता समाप्त कर दी गयी है. हालाँकि अभी भी गायों के नर शिशुओं के रक्षण, कृषि, गंगा, रोजगार-सृजन, शिक्षा, मनमोहन,सोनिया,लालू,मुलायम,मायावती को जेल, मंत्रिमंडल पुनर्गठन, राजनैतिक दलों के लिए आय के साथ-साथ व्यय की जानकारी देना अनिवार्य करना आदि ऐसे कई क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें मोदी जी से तथास्तु कहवाना बांकी है. हमारे साथ-साथ आप भी विश्वास रखिए कि एक-न-एक दिन ऐसा जरूर होगा क्योंकि मोदी सरकार में देर है लेकिन अंधेर नहीं है.

गुरुवार, 30 मार्च 2017

बुझी हुई मोमबत्ती के मोम हैं नीतीश


मित्रों,कुछ दिन पहले आए सीएजी की रिपोर्ट ने बिहार में मुख्यमंत्री के सात निश्चय योजना पर सवाल खड़ा किया है. बिहार विधान सभा के पटल पर रखे गये इस रिपोर्ट में कई वित्तीय अनियमितताओं के साथ ये खुलासा किया गया है कि 2015-16 के बजट की लगभग 35 प्रतिशत राशि बिहार में खर्च ही नहीं की गयी.
मित्रों,सीएम नीतीश कुमार के सात निश्चयों में से एक निश्चय हर घर जल का नल योजना का सीएजी के एक वर्ष का सर्वे कराया जिसमें पाया गया कि योजना के एक वर्ष बीत जाने के बाद भी कार्य प्रारंभ भी नहीं कराया जा सका है. महालेखा परीक्षक धर्मेन्द्र कुमार ने सीएजी रिपोर्ट को लेकर पत्रकारों को संबोधित किया. 
रिपोर्ट के कुछ मुख्य तथ्यों पर एक नजर ड़ालते हैं ....
1. बिहार राज्य जल विद्युत् निगम लिमिटेड के वित्तीय कुप्रबंधन के कारण 2011 -16 के बीच 147.66 करोड़ की हानि.
2.साउथ बिहार पॉवर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी की त्रुटिपूर्ण आतंरिक नियंत्रण प्रणाली की वजह से 3.20 करोड़ के राजस्व की हानि.
3.नार्थ बिहार पॉवर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी द्वारा उपभोक्ताओं के अनुचित वर्गीकरण के कारण 5.55 करोड़ के राजस्व की हानि.
4.बिहार राज्य पथ विकास निगम ने अनुबंध के प्रावधानों का उल्लंघन कर संवेदकों को छूट देने से 1.66 करोड़ राजस्व की हानि
5. पटना में वाहन प्रदूषण में भारी वृद्धि. पटना विश्व का छठा सबसे प्रदूषित शहर.
6. पाइप जलापूर्ति योजना बिहार में बुरी तरह फेल. राज्य के केवल 6 प्रतिशत जनसंख्या को ही पाइप जलापूर्ति उपलब्ध.
7. मध्याह्न भोजन योजना की बड़ी विफलता उजागर 33 से 57 प्रतिशत नामांकित बच्चे मध्याह्न भोजन से वंचित रहे.
8. बिहार सरकार के कार्यालयों के व्यक्तिगत जमा खातो में 4126.37 करोड़ की राशि पड़ी रही.
सीएजी की रिपोर्ट की एक जो अहम बात है वो ये है कि 2015- 16 के बजट का लगभग 35 प्रतिशत राशि सरकार खर्च करने में नाकाम रही है. बजट का 35 हजार 13 करोड रुपया खर्च ही नहीं हुआ है जबकि 25 हजार करोड रुपया सरेंडर हुआ है. 
मित्रों,जब २०१५ में महागठबंधन सरकार के गठन के बाद राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ७ निश्चयों की घोषणा की थी तब हमने अपने ब्लॉग ब्रज की दुनिया पर उनको चुनौती देते हुए कहा था कि नीतीश सिर्फ एक निश्चय हर घर नल का जल को पूरा करके दिखा दें. ऐसा हमने इसलिए कहा था क्योंकि हमें पता था कि न तो नीतीश और न ही उनकी सरकार के पास वो कुव्वत है कि वे इस एक निश्चय को भी पूरा कर सकें बाँकी की तो बात ही छोडिये.
मित्रों,हमने तब यह भी कहा था कि २००५ से २०१३ तक बिहार में काम सिर्फ उन्हीं विभागों में हुआ है जिनकी बागडोर भाजपा के पास थी. जदयू नेताओं की बात कि राजद और कांग्रेस के मंत्रियों के ठीक से काम नहीं करने के चलते ७ निश्चयों का कबाड़ा हुआ है अगर हम मान भी लें तो जो विभाग जदयू के पास हैं उनमें चार चांद क्यों नहीं लग गए? क्यों दिनदहाड़े श्रीनूज एंड कंपनी से रंगदारी मांगकर उसे बंद करवाने वाले बिहार के श्रम मंत्री जेल से बाहर हैं और मंत्रिमंडल से बाहर नहीं हैं? क्या नीतीश कुमार बिहार के गृह मंत्री नहीं हैं? क्या मुख्यमंत्री का पद भी राजद के पास है?
मित्रों,आपको याद होगा कि नीतीश पहले जनता दरबार लगाया करते थे. बाद में इसे बंद कर दिया गया और दिनांक 05 जून 2016 से बिहार लोक शिकायत  निवारण अधिकार अधिनियम लागू किया गया.
इसके लिए एक वेबसाईट बनाया गया जिस पर कोई भी परिवाद दर्ज करवा सकता है. परिवाद दर्ज करने से पहले आपसे आपका मोबाईल नंबर माँगा जाता है OTP भेजने के लिए मगर OTP भेजा ही नहीं जाता. मतलब कि पहले जनता दरबार द्वारा और अब जनशिकायत अधिनियम के माध्यम से बिहार की जनता की आँखों में धूल झोंका जा रहा है.
मित्रों,कारण चाहे राष्ट्रपति चुनाव हो या कुछ और नीतीश को एनडीए में लाना है तो लाया जाए लेकिन उनको बिहार का मुख्यमंत्री हरगिज न बनाए रखा जाए. किसी नए ऊर्जावान-स्वप्नदर्शी और उद्दाम देशभक्त को बिहार का सीएम बनाया जाए. पिछले ५-सात सालों में यह साबित हो चुका है कि नीतीश आग नहीं हैं बुझी हुई राख हैं, अँधेरे घर की रौशनी नहीं हैं बल्कि बुझी हुई मोमबत्ती के मोम हैं, वे अच्छा रायता बना नहीं सकते सिर्फ फैला सकते हैं. उनके लिए कुर्सी नाम परमेश्वर (राम) है राज्य या देश के विकास से उनका कुछ भी लेना-देना नहीं है. वे कभी भी फिर से भाजपा को धोखा दे सकते हैं क्योंकि वे नफादार हैं वफादार नहीं, चोखेलाल नहीं धोखेलाल हैं, सेवालाल नहीं मेवालाल हैं, सच्चा नहीं बच्चा यादव हैं, जयप्रकाश नारायण नहीं विजय प्रकाश यादव हैं, बिहार के लाल नहीं लालकेश्वर हैं, बिहार के माथे पर गौरव की बिंदी नहीं बिंदी यादव हैं, हर स्थिति में अटल रहने वाले रॉकी पर्वत नहीं बल्कि रॉकी यादव हैं, बिहार की शान नहीं झूठ,फरेब और ढोंग की खान हैं, चन्दन-वृक्ष नहीं विषबेल हैं जो सहारा देनेवाले वृक्ष को ही ठूंठ बना देता है.

सोमवार, 27 मार्च 2017

मोदी मोदी योगी योगी

मित्रों,पता नहीं किन परिस्थितियों में अतिस्पष्टवादी योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाए गए. जितने मुंह उतनी कहानियां. लेकिन अन्दरखाने चाहे जो कुछ भी हुआ हो परिणाम बहुत अच्छा हुआ. यह उन लोगों के मुंह पर करारा तमाचा है जो अब तक ऐसा मानते थे कि नरेन्द्र मोदी अपने समक्ष किसी और को उभरने नहीं देना चाहते. हालाँकि मोदी मंत्रिमंडल में आज भी परिवर्तन वांछनीय है क्योंकि अभी भी उसमें कई अपात्र-कुपात्र बने हुए हैं. माना कि कप्तान हरफनमौला है लेकिन कम-से-कम फील्डिंग के लिए और बैटिंग-बौलिंग में साथ देने के लिए तो अच्छी टीम चाहिए ही. जिस तरह से मनोहर पर्रीकर को वापस गोवा भेजना पड़ा है उससे यह तो साबित हो ही गया है कि एक अकेले नेता के नाम पर भारत के सभी २८ राज्यों और २ केन्द्रशासित प्रदेशों में चुनाव नहीं जीते जा सकते.दिल्ली में मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखना भी समझ से परे है.
मित्रों,योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने के बाद पहली बार ऐसा लग रहा है कि किसी राज्य की गाड़ी में जब दो-दो शक्तिशाली ईंजन लग जाते हैं तो क्या होता है. योगी जी हर गेंद पर छक्का मार रहे हैं मानो वे पहले ओवर में ही मैच समाप्त कर देना चाहते हैं. यह सही है कि गाय हिन्दुओं के लिए पूज्या है लेकिन गाय सहित सभी जानवरों को मारने के बारे में कई साल पहले ही एनजीटी दिशा-निर्देश जारी कर चुकी है. यह अलग बात है कि अखिलेश सरकार ने उन्हें लागू तो नहीं ही करवाया बल्कि मूक पशुओं के प्रति पशुता को और बढ़ावा दिया. जहाँ तक एंटी रोमियो स्क्वायड के गठन का सवाल है तो ऐसा यूपी सरकार को तभी करना चाहिए था जब मुलायम सिंह बच्चों से गलती हो जाने की वकालत कर रहे थे. स्वच्छता में तो हर युग में ईश्वर का वास रहा है फिर चाहे वो गाँधी युग हो या आज का समय.
मित्रों,योगी के यूपी के सीएम बनने के बाद से कुछ लोगों को ऐसा लगने लगा है कि अब लोकप्रियता में योगी जी मोदी जी से आगे निकल जाएँगे. हो भी सकता है लेकिन इससे नए भारत के निर्माण और भारत के वैश्विक-उभार पर कोई फर्क नहीं पड़नेवाला है क्योंकि दोनों ही देश और देशहित के प्रति समान रूप से समर्पित हैं. दोनों ही संन्यासी हैं और दोनों के पास ही खोने के लिए अपना कुछ भी नहीं है.

रविवार, 12 मार्च 2017

यूपी की जीत के सबक

मित्रों,बहुत पुरानी कहावत है कि जो जीता वही सिकंदर.

अर्थात सफलता सारे अवगुणों को छिपा देती है.यह कहावत अपनी जगह सही है लेकिन एक और कहावत है जिसे हम सीख का नाम भी दे सकते हैं कि फूलो मत भूलो मत. मतलब कि सुख में फूलो मत और दुःख के दिनों को भूलो मत.वैसे बुद्धिमान लोग जीत से भी सबक लेते हैं और मूर्ख हार से भी नहीं लेते.
मित्रों,हम जानते हैं कि अभी भारतीय जनता पार्टी फूले नहीं समा रही है.उसने उत्तर प्रदेश में अद्भूत, अविश्वसनीय, अभूतपूर्व और अकल्पनीय जीत दर्ज की है.भविष्य में कोई दल या गठबंधन यूपी में ऐसी जीत दर्ज कराएगा या नहीं यह तो भविष्य में ही पता चलेगा लेकिन भूतकाल में तो निश्चित रूप से ऐसा नहीं हुआ था.दुनिया के अधिकतर देशों से ज्यादा जनसंख्या को धारण करनेवाले उत्तर प्रदेश में बहुमत प्राप्त करना ही बड़ी उपलब्धि होती है फिर इस तरह की एकतरफ़ा जीत!!!निश्चित रूप से भाजपा बधाई की पात्र है.जीत का जश्न मनाने में कुछ भी गलत नहीं लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ४ अन्य राज्यों में भी चुनाव हुए थे और उनमें से २ में भाजपा सत्ता में थी.उनमें से एक पंजाब में पार्टी की करारी हार भी हुई है.गोवा में भी पार्टी हारी है फिर भी ईज्ज़त बचा ले गयी है.इन पाँचों राज्यों के चुनाव-परिणामों का अगर हम विश्लेषण करें तो आसानी से देख सकते हैं कि इन राज्यों में कहीं-न-कहीं सत्ता-विरोधी लहर चल रही थी और इसलिए चल रही थी क्योंकि जनता से किए गए वादों में से शतांश को भी पूरा नहीं किया गया था.
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि इन चुनावों से सबक लेते हुए भाजपा को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड समेत उन सभी राज्यों में वादों पर खरा उतरना पड़ेगा जहाँ उसकी पहले से सरकार है या अब जहाँ बनने जा रही है.यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार खुद शराब बेचने की फ़िराक में है जबकि उसके १3 सालों के शासन के बावजूद राज्य के एक बड़े हिस्से पर नक्सलियों का आतंक कायम है.कल एक तरफ भाजपा जीत के जश्न मना रही थी तो वहीं दूसरी ओर कल ही भाजपा-शासित छत्तीसगढ़ में हमारे १७ जवानों को मौत के घाट उतार दिया गया.
मित्रों,राजनैतिक दांव-पेंच अपनी जगह हैं और उनका भी अपना महत्व है लेकिन देशहित सर्वोपरि है.सौभाग्यवश मोदी जी ने नेशन फर्स्ट को अपना ध्येय वाक्य घोषित भी कर रखा है.भ्रष्टाचार की समाप्ति की दिशा में जब मोदी सरकार को नोटबंदी जैसा छोटा कदम उठाने पर इतना विराट जनसमर्थन मिल सकता है तो सोंचिए कि तब क्या होगा जब सरकार बड़े कदम उठाएगी.
मित्रों,तुलसी बाबा कहते हैं कि प्रभुता पाई कोऊ मद नाहीं.अभी तक जिस तरह मोदी सरकार काम कर रही है उससे ऐसा तो लगता नहीं कि उसमें सत्ता का मद घर कर पाया है.फिर अभी तो भारत-निर्माण शुरू ही हुआ है.अभी देश और सरकार को बहुत-बहुत-बहुत लम्बा रास्ता इस दिशा में तय करना बांकी है.काम बहुत कठिन है और समय बहुत कम क्योंकि ६७ साल के मोदी जी अनंतकाल तक न तो जवान ही रहनेवाले हैं और न ही जीवित.जनता के धैर्य का तो कहना ही क्या? निस्संदेह रफ़्तार बढ़ानी होगी.