सोमवार, 25 अप्रैल 2016

ताड़ी व्यवसायियों के पक्ष में आज धरना देंगे पासवान

पटना (सं.सू.)। केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान ताड़ी की बिक्री पर प्रतिबंध के खिलाफ सोमवार को राजधानी में धरना देंगे। रविवार को लोजपा कार्यालय में पासवान ने इसकी घोषणा की। संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने ताड़ी की खूब वकालत की और गर्दनीबाग के धरनास्थल पर धरना पर बैठने का ऐलान किया। वहीं जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर राजनीतिक हमला भी किया। पासवान ने कहा कि राजनीतिक कलाकारी करना तो कोई नीतीश कुमार से सीखे।

उन्होंने कहा कि गजब का बुद्धि है, 17 साल तक भाजपा और आरएसएस  के गोद में  बैठे रहे। अब संघ मुक्त भारत की बात करते हैं। दस साल तक लोगों को शराब पिलाया और अब बंद करने की बात कर रहे  हैं। दोपहर बाद भाजपा कार्यालय पहुंचे पासवान ने कहा कि नीतीश कुमार से बड़ा कलाकार कोई हो नहीं सकता। प्रधानमंत्री के सवाल पर पासवान ने कहा कि नीतीश कुमार संघमुक्त के पहले बिहार के अपराध मुक्त करें। उन्हें देश में घूमने की सलाह भी दी। जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद पर निशाना साधते हुए कहा कि आज जो लोग मंडल मसीहा बन  रहे हैं उनका पहले कहीं पता नहीं था। वीपी सिंह को ये लोग भूल गए।  इसके पहले लोजपा कार्यालय में पासवान ने कहा है कि ताड़ी शराब नहीं है। यह आम, लीची की तरह रस है।

गांधी जी ने इसे नीरा कहा था। इसकी तुलना शराब से नहीं की जा सकती है। 1991 में लालू प्रसाद ने इस पर छुट दी थी। जब लालू प्रसाद ने ताड़ी पर छुट दी थी तो चुनाव के दौरान हाजीपुर में मेरे पक्ष में नारा लगता था - एक रुपया में तीन गिलास-जीतेगा भाई राम विलास। पता नहीं लालू प्रसाद अब नीतीश कुमार से क्यों डर रहे है। शायद कह दिया होगा कि हम पीएम होंगे और बिहार तुम्हारे लिए छोड़ देंगे। पासवान ने चुनौती दी कि कोई सुबह पांच बजे का ताड़ी एक साल तक पीये, यदि उसका हेल्थ खराब होगा तो हम राजनीति छोड़ देंगे। पासवान ने कहा कि जब उनकी आंख खराब हो गयी थी तो डॉक्टर ने उन्हें ताड़ी पीने के लिए कहा था। जब हमें अच्छा नहीं लगा तो पीना छोड़ दिया।

पीएम नरेंद्र मोदी की ग्रामोदय से भारत उदय की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि नरेंद्र माेदी पहला विजनरी पीएम है जिसने बाबा साहेब अंबेडकर से जुड़े पांच स्थलों को विकसित करने का निर्णय लिया। जिसमें उनके जन्म स्थान महु, 26 अलीपुर रोड जहां उन्होंने संविधान लिखा, चैत्य भूमि, जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ, लंदन में जहां उन्होंने पढ़ाई की उसे सरकार ने खरीद कर राष्ट्रीय  स्मारक घोषित किया और नागपुर जहां उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार घूम -घूम कर कहते हैं कि लोगों को दो रुपये किलो अनाज दे रहे हैं, हकीकत है कि शत-प्रतिशत सबसिडी केंद्र सरकार देती है। हमने तो विधानसभा चुनाव के दौरान घोषणा भी की थी कि बिहार में सरकार बनी तो लोगों को मुफ्त अनाज देंगे। केंद्र अनाज पर एक लाख तीस हजार करोड़ रुपये सब्सिडी देती है।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

गिरगिटों के ताऊ नीतीश कुमार

मित्रों,राजनैतिक साहित्य में जंतु अलंकारों का अपना ही महत्व है. फिर बिहार का तो कहावतों की प्रचुरता में भी कोई सानी नहीं है.जैसे गंगा गए तो गंगा दास और जमुना गए तो जमुना दास या फिर जिधर देखी खीर उधर गए फिर,दोमुंहा सांप,गिरगिट.मगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश जी तो काफी पहले ही जंतु विज्ञान और अन्य कहावतों से ऊपर उठ चुके हैं.
मित्रों,आपको याद होगा कि नीतीश कुमार १८ सालों तक संघ के साथ रहे.आज नीतीश कुमार जो कुछ भी हैं वो निवर्तमान बड़े भाई लालू जी की वजह से नहीं हैं बल्कि संघ परिवार की देन है.सच तो यह भी है कि पहली बार जब लालू जी बिहार के सीएम बने थे तो भाजपा के ही समर्थन से.फिर वही नीतीश अब किस मुंह से भारत से संघ परिवार के खात्मे की बात कर रहे हैं?इससे पहले नीतीश जी लालू जी से हाथ मिला कर भी पूरी दुनिया के गिरगिटों को शर्मिंदा कर चुके है. कभी हमने कांग्रेस को ७ घूंघटों वाला चेहरा कहा था लेकिन अब समझ में नहीं आता है कि नीतीश कुमार जी के लिए उपमा कहाँ से लाऊं?लगता है कि हमें नीतीश कुमार जी की रंग बदलने की कला की तुलना दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल से करके काम चलाना पड़ेगा जो १ दिन में ही कई-कई बार रंग बदल लेते हैं.
मित्रों,इन दिनों नीतीश कुमार जी पीके अर्थात प्रशांत किशोर की सलाह पर शराबबंदी को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की मुहिम चलाने में पिले हुए हैं मानों बिहार में पहले किसी ने शराबबंदी के लिए कदम ही नहीं उठाया या फिर किसी और की सरकार ने बिहार के गाँव-गाँव में शराब की दुकानें खोल दी थी जबकि सच्चाई यह है कि कई दशक पहले कर्पूरी ठाकुर ने भी कोशिश की थी लेकिन भ्रष्ट प्रशासन के कारण होनेवाली तस्करी ने उनके सद्प्रयास पर गरम पानी फेर दिया था.सच्चाई यह भी है कि हर चौक-चौराहे पर शराब की दुकानें और किसी ने नहीं बल्कि स्वयं नीतीश कुमार की सरकार ने ही खुलवाई थी.वैसे ये बात भी किसी से छिपी हुई नहीं है कि बिहार आज भी भारत के सबसे ज्यादा भ्रष्ट राज्य है फिर नीतीश कुमार कैसे सफल होंगे?वैसे चाहते तो हम भी हैं कि बिहार सही मायनों में अल्कोहल मुक्त प्रदेश बने और भारत अल्कोहल मुक्त देश.
मित्रों,अच्छा रहेगा कि पीके की सलाह पर कोरा दिखावा करना बंद करके और केजरी सर के साथ गिरगिटपने में प्रतियोगिता करना छोड़कर नीतीश जी सरकार के कामकाज पर ध्यान दें क्योंकि इन दिनों बिहार में सारे विकासपरक कार्य बंद हैं.कहीं अदालत परिसर में बम फट रहे हैं तो कहीं निर्माण एजेंसियों के यंत्रों को आग के हवाले किया जा रहा है तो कहीं रामनवमी के जुलूस पर हमले हो रहे हैं.यहाँ तक कि विधायक की बहन भी सुरक्षित नहीं रह गयी है.दारोगा भी सुरक्षित नहीं रह गए हैं.हर जगह,हर विभाग में अराजकता और कुव्यवस्था है.लगता है जैसे वह समय आ गया है कि जिस तरह से बसों में लिखा होता है कि यात्री अपने सामान की रक्षा स्वयं करें उसी तरह से बिहार के सारे सार्वजनिक स्थानों पर नीतीश कुमार उर्फ़ डेंटिंग पेंटिंग मास्टर को लिखवा देना चाहिए कि बिहारवासी अपने माल के साथ-साथ अपनी जान की भी रक्षा स्वयं करें.उधर राज्य के हैंड पम्प जिनमें भ्रष्टाचार के चलते आधे-अधूरे पाईप लगाकर पूरा पैसा बनाने का काम आजादी के बाद से ही लगातार चल रहा है सूखने लगे हैं और ईधर नीतीश कुमार जी अगले ५ सालों में सभी घरों में नलके का पानी उपलब्ध करवाने के वादे करने में लगे हैं.मतलब कि मिल तो चावल का माड़ भी नहीं रहा है और सपने बिरयानी के दिखाए जा रहे हैं क्योंकि भारत में हमेशा से न तो सपने देखने और न ही दिखाने पर कभी कोई रोक रही है.उस पर नीतीश कुमार जी तंज कस रहे हैं नरेन्द्र मोदी के ऊपर कि कालाधन का क्या हुआ?नीतीश जी को अपने हिस्से का १५ लाख भी चाहिए.कालाधन सहित सारे क्षेत्रों में जो होना चाहिए मोदी सरकार कर रही है और पूरी तरह से साफ़-सुथरे तरीके से जी-जान से कर रही है और इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि इन दिनों पिछले ७५ सालों में सत्ता में रहे सारे भ्रष्टाचारी १ ही नाव पर सवार हो गए हैं.वर्ना आज से २ साल पहले किसने कल्पना की थी कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट और लालू और नीतीश एकसाथ चुनाव लड़ेंगे? नीतीश जी चाहे जितनी सफाई से शब्दों की हेरा-फेरी कर लें सच्चाई तो यह है कि आज भारत में लोकतंत्र बिल्कुल भी खतरे में नहीं है बल्कि अगर कुछ खतरे है तो वो है छद्मधर्मनिरपेक्षता और तुष्टिकरण की गन्दी और भारतविरोधी राजनीति.नीतीश जी को इन दिनों जिसका अगुआ बनने का चस्का लगा हुआ है.

रविवार, 3 अप्रैल 2016

साम्यवाद,समाजवाद,गांधीवाद और राष्ट्रवाद

मित्रों,भारत ने हमेशा से ही स्वतंत्र विचारों और विचारधाराओं को सम्मान दिया है। हमारे भारत में कभी किसी मंसूर बिन हल्लाज को देश और समाज से अलग सोंच रखने के कारण जिंदा आग में नहीं झोंका गया,न तो किसी सुकरात को विषपान कराया गया और न ही किसी ईसा को सूली पर ही चढ़ाया गया। हमारा वेद कहता है मुंडे मुंडे मति भिन्नाः और जैन तीर्थंकर कहते हैं स्याद अस्ति स्याद नास्ति यानि शायद मैं कहता हूँ वह ठीक है या हो सकता है कि आप जो कहते हैं वह सही है।
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है भारत में हमेशा से प्रवृत्ति और निवृत्तिवादी दोनों तरह की विचारधाराएँ एकसाथ पल्लवित-पुष्पित होती रही हैं। वर्तमान भारत में भी कई तरह के वाद प्रचलन में हैं जिनमें साम्यवाद,समाजवाद,गांधीवाद और राष्ट्रवाद प्रमुख हैं। इनमें से ढोंगी तो सारे वाद वाले हैं। उत्पत्ति की दृष्टि से विचार करें तो इनमें से साम्यवाद और समाजवाद की उत्पत्ति विदेश की है जबकि गांधीवाद और राष्ट्रवाद ने भारत में जन्म लिया है।
मित्रों,साम्यवाद कहता है कि संसार में दो तरह के वर्ग हैं और उन दोनों में संघर्ष चलता रहता है। एक दिन यह संघर्ष चरम पर पहुँचेगा और तब दुनिया पर सर्वहारा वर्ग का शासन होगा और तब न तो कोई गरीब होगा और न ही कोई अमीर क्योंकि निजी संपत्ति भी नहीं होगी। साम्यवाद हिंसा की खुलकर वकालत करता है और मुसलमानों की तरह उसके लिए भी देशों की सीमाओं का कोई मतलब नहीं है बल्कि वह आह्वान करता है कि दुनिया के मजदूरों एक हो। यही कारण है कि आज देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा साम्यवादी हिंसा की चपेट में है। यही कारण है कि जब चीन ने भारत पर हमला किया तब भारत के साम्यवादियों ने चीन का समर्थन किया। यही कारण है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय चूँकि रूस इंग्लैंड एक साथ लड़ रहे थे इसलिए भारतीय साम्यवादियों ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया। चाहे वो दंतेवाड़ा के जंगलों के बर्बर नरपशु साम्यवादी हों या फिर संसद में घंटों बहस लड़ानेवाले सीताराम येचुरी वैचारिक रूप से सब एक हैं। जिस तरह आतंकवाद बुरा या अच्छा नहीं होता उसी तरह से साम्यवाद भी बुरा या भला नहीं होता सबके सब भारतविरोधी और अंधे होते हैं। अंधे इसलिए क्योंकि उनको अभी भी यह नहीं दिख रहा कि करोड़ों लोगों के नरसंहार के बाद शासन में आए साम्यवाद ने रूस,पोलैंड,चीन,पूर्वी जर्मनी,उत्तरी कोरिया आदि का क्या हाल करके रख दिया था और बाद में लगभग सभी साम्यवादी देशों को अस्तित्वरक्षण हेतु किस तरह पूंजीवाद की ओर अग्रसर होना पड़ा। भारत के साम्यवादी लालची और भ्रष्ट भी कम नहीं हैं। वे चिथड़ा ओढ़कर घी पीने में लगे हैं।
मित्रों,इसके बाद बारी आती है समाजवाद की यानि ऐसी विचारधारा की जो साम्यवाद की ही तरह मानती है कि सबकुछ सारे समाज का होना चाहिए लेकिन लक्ष्यप्राप्ति अहिंसक तरीके से होनी चाहिए,लोकतांत्रिक तरीके से होना चाहिए। मगर भारतीय समाजवाद बहुत पहले ही अपने मार्ग से भटक चुका है। आरंभ में लोहिया-जेपी का झंडा ढोनेवाले समाजवादी आज निहायत सत्तावादी और आत्मवादी हो चुके हैं। लगभग सारी-की सारी समाजवादी पार्टियाँ किसी-न-किसी परिवार की निजी सम्पत्ति बनकर रह गई हैं और अपने-अपने परिवारों के साथ राज भोग रही हैं। उनका न तो देशहित से ही कुछ लेना-देना है,न तो प्रदेशहित से और न ही गरीबों से। सबै भूमि गोपाल की के पवित्र सिद्धांत से शुरू हुआ यह आंदोलन आज सबै कुछ मेरे परिवार की के आंदोलन में परिणत हो चुका है। बहुजनवादी और दलितवादी पार्टियों का भी कमोबेश यही हाल है।
मित्रों,भारत में अगर सबसे ज्यादा किसी वाद का दुरूपयोग किया गया है वह है गांधीवाद। कांग्रेस ने गांधीजी के नाम को तो अपना लिया लेकिन गांधी की विचारधारा को विसर्जित कर दिया। आज कांग्रेस ने घोर राष्ट्रवादी रहे गांधीजी को प्रिय रहे नारों वंदे मातरम् और भारत माता की जय तक से किनारा कर लिया है। आज कांग्रेस पार्टी सिर्फ मुस्लिम हितों की बात करनेवाली मुसलमानों की पार्टी बनकर रह गई है। उसका एकमात्र लक्ष्य हिंदू समाज और भारतीय संस्कृति के विरूद्ध बात करना, ऐन-केन-प्रकारेण सत्ता प्राप्त करना और फिर जमकर भ्रष्टाचार करना रह गया है। कांग्रेस गांधीवाद को पूरी तरह से छोड़ चुकी है बल्कि उसके लिए गांधीछाप ही सबकुछ हो गया है। उसकी प्राथमिकता सूची में न तो देश के लिए ही कोई स्थान है और न तो देशहित के लिए ही। जहाँ समाजवादी पार्टियाँ एक-एक संयुक्त परिवारों की संपत्ति बन चुकी हैं वहीं दुर्भाग्यवश कांग्रेस एक एकल परिवार की निजी संपत्ति बनकर रह गई है। आज कांग्रेस किसी विचारधारा का नाम नहीं है बल्कि पारिवारिक प्राईवेट कंपनी का नाम है। जहाँ तक तृणमूल कांग्रेस का सवाल है तो यह कांग्रेस और साम्यवाद के समन्वय से उपजी क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी है इसलिए उसमें एक साथ इन दोनों के अवगुण उपस्थित हैं।
मित्रों,अंत में बारी आती है राष्ट्रवाद की। एकमात्र यही एक विचारधारा है जो तमाम कमियों के बावजूद भारत के उत्थान की बात करती है। भारत को फिर से विश्वगुरू बनाने,एक विकसित राष्ट्र बनाने के सपने देखती है फिर भी यह देश का दुर्भाग्य है कि इस विचारधारा को देश की जनता हाथोंहाथ नहीं ले रही है। एक तरफ तो राष्ट्रवादियों को इस बात पर गहराई से विचार करना होगा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और अपने संगठन और सोंच के भीतर वर्तमान सारी कमियों को दूर करना होगा। तो वहीं भारत की महान जनता को समझना होगा कि देश और देशवासियों से समक्ष एकमात्र विकल्प राष्ट्रवाद ही है क्योंकि बांकी के वाद अलगाववादियों का समर्थन करते हैं, देश को बर्बाद करने की बात करते हैं। राष्ट्र की बात नहीं करते देश के किसी न किसी भूभाग या जनता के किसी-न-किसी हिस्सेभर की बात करते हैं। उन सभी वादों के मजबूत होने अथवा राष्ट्रवाद के कमजोर होने का अर्थ है भारत का कमजोर होना।

जो गलतियों को बार-बार दोहराये उसे भाजपा कहते हैं

मित्रों,मिड्ल स्कूल में मेरे गुरू रहे श्री श्रीराम सिंह कहा करते थे कि जो गलती को दोहराता नहीं उसे भगवान कहते हैं,जो गलतियों को दोहराए उसे इंसान कहते हैं और जो गलतियों को बार-बार दोहराए उसे शैतान कहते हैं। परंत अप्रैल-मई में चार राज्यों में चुनाव होनेवाले हैं और दुर्भाग्यवश भारत की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी भाजपा जिस पर पूरे देश की उम्मीदें टिकी हुई हैं वो भी बार-बार उन्हीं गलतियों को दोहरा रही है जो उसने पिछले यूपी और हालिया दिल्ली व बिहार चुनावों के समय किए थे।
मित्रों,आपको याद होगा कि पिछले विधानसभा चुनावों में जबकि चुनाव-प्रचार अपने पूरे उरूज पर था तब भाजपा ने बसपा के दागी मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा में अपनी पार्टी में शामिल कर लिया था। चुनावों में इस गलती का जो परिणाम भाजपा को और यूपी की जनता को भुगतना पड़ा वह पिछले 4 सालों से आपलोग भी देख रहे हैं। ठीक उसी तरह की गलती भाजपा ने केरल में दागी क्रिकेट खिलाड़ी एस. श्रीसंत को पार्टी में शामिल करके की है। लगता है जैसे भाजपाइयों का दिमाग ऐन चुनाव के वक्त घास चरने चला जाता है।
मित्रों,अगर हम चुनावी जुमलों की बात करें तो आपको याद होगा कि 2014 के लोकसभा चुनावों के समय नरेंद्र मोदी सहित तमाम भाजपा नेताओं ने चीख-चीखकर कहा था कि बांग्लादेशी घुसपैठी अब बोरिया-बिस्तर बांधना शुरू कर दें क्योंकि केंद्र में भाजपा की सरकार के बनते ही उनकी घर-वापसी की प्रकिया शुरू हो जाएगी लेकिन हम देखते हैं कि अब जबकि प. बंगाल और असम जहाँ कि घुसपैठ ने जनसांख्यिकी को बिगाड़कर रख दिया है में चुनाव-प्रचार जारी है भाजपा घुसपैठ पर लगाम लगाने के वादे कर रही है घर-वापसी का जिक्र तक नहीं कर रही। ऐसे में जनता इस बात को लेकर कैसे मुतमईन हो सकती है कि वर्तमान चुनावों में भाजपा जो वादे कर रही है वो चुनावी जुमला नहीं है।
मित्रों,तमाम मीडिया-सर्वेक्षण बता रहे हैं कि चार राज्यों में से सिर्फ असम में भाजपा टक्कर में है वरना प. बंगाल,केरल और तमिलनाडु में उसका खाता भी खुल जाए तो गनीमत है। हमने देखा कि ग्रासरूट लेवल तक गहन जनसंपर्क करके आप पार्टी ने कैसे दिल्ली में भाजपा को करारी शिकस्त दी। आखिर वही रणनीति अपनाने में भाजपा को समस्या क्या है? पार्टी के मिस्ड कॉल अभियान के बाद हमने पार्टी को सलाह दी थी कि अब पार्टी को उन लोगों से सीधा संपर्क करके सदस्यता प्रपत्र भरवाना चाहिए लेकिन लगता है कि पार्टी नेताओं को एसी में रहने की बीमारी हो गई है। मोदी और शाह यह तो चाहते हैं कि भाजपा इतनी शक्तिशाली हो जितनी कि 50 के दशक में कांग्रेस थी लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं से पसीना बहवाना नहीं चाहते। उनको अभी भी भ्रम है कि हर ब्लॉक या जिला मुख्यालय में पीएम की सभा आयोजित कर देने मात्र से ही चुनाव जीता जा सकता है। उधर यूपी से भी ओपिनियन पोल के नतीजे यही बता रहे हैं कि भाजपा वहाँ दूसरे नंबर पर भी नहीं आने जा रही है फिर उसका सरकार बनाने की बात तो दूर ही रही।
मित्रों,पार्टी को कैसे चलाना है,जिताना है या हराना है मोदी और शाह जानें लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि चुनाव नतीजों का दुष्प्रभाव उस राज्य की सारी जनता को झेलना पड़ता है,पूरे देश को झेलना पड़ता है। अब बिहार को ही लें तो पहले शराब बंद करके,फिर बालू खनन पर रोक लगाकर और अब जमीन की रजिस्ट्री को ऑनलाईन करके नीतीश-लालू की सरकार ने चुनावों के बाद से लाखों लोगों को भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। इसी तरह यूपी का पहले बसपा ने और बाद में कथित समाजवादियों ने क्या हाल करके रख दिया है किसी से छिपा हुआ नहीं है। इसलिए अच्छा हो कि पार्टी नेतृत्व अपनी रणनीति को बदले और बात को नेहरू की गलत साबित हो चुकी ट्रिकल डाऊन थ्योरी की तरह ऊपर से नीचे पहुँचाने के बदले नीचे से ऊपर पहुँचाने के उपाय करे। यह सही है कि पार्टी ने पहले भी हमारी सलाहों पर किंचित भी ध्यान देने की जरुरत नहीं समझी है लेकिन हम भी क्या करें हमसे तो भारत दुर्दशा देखी न जाई।

मंगलवार, 29 मार्च 2016

बर्बाद हो रहा बिहार है,नीतीशे कुमार है

मित्रों, कभी-कभी नारों का जादू जनता के सर पर इस कदर चढ़कर बोलता है जनता भले-बुरे की पहचान करने की क्षमता भी खो देती है. जनता यह भी भूल जाती है कि जब वही व्यक्ति १० साल में बहार नहीं ला पाया तो अब ५ साल में कहाँ से ला देगा? जनता यह भी भूल जाती है कि पूरे भारत में भ्रष्टाचार और कुशासन के प्रतीक बन चुके व्यक्ति की गोद में बैठकर कोई कैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ सकता है और सुशासन की स्थापना कर सकता है?
मित्रों,परिणाम सामने है.बिहार में फिर से नीतीश कुमार है लेकिन बर्बाद हो रहा बिहार है.आज के बिहार में (नवादा में पांच परमेश्वरों द्वारा लगाई गयी रेप की कीमत ) महिलाओं की ईज़्ज़त की कीमत मात्र २००० रु. रह गई है,रेप के आरोपी विधायक को पुलिस गिरफ्तार नहीं करती बल्कि वो खुद ही पंडित से दिन दिखाकर आत्मसमर्पण करता है. इतना ही नहीं वो जेल में भी ठाठ से रहता है,होली के दिन नवादा जेल के सभी कैदियों को अपनी तरफ से मीट का महाभोज देता है और जेल मैन्युअल की ऐसी की तैसी किये रहता है. जब तक वो कृपा करके कथित समर्पण नहीं करता कोरे नारों के माध्यम से बिहार में बहार लाने का दावा करनेवाले नीतीश जी कहते हैं कि उसको बख्शा नहीं जाएगा और उसके खिलाफ फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चलाया जाएगा लेकिन जब वो जेल पहुँचता है तो पूरा जेल प्रशासन उसके साथ इस तरह के व्यवहार करते हैं जैसे वो घोषित तौर पर सरकारी दामाद हो.
मित्रों,जबसे राजबल्लभ जेल में पधारे हैं पता नहीं नीतीश जी का फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट कहाँ चला गया है? डर लगता है कि कहीं नीतीश जी के सात महान जुमलों (कथित निश्चयों) की तरह यह भी एक जुमला तो नहीं? नीतीश जी ने अपने ७ जुमलों को ही सरकारी नीति बना दी है.  इसको पूरा करने के लिए १ बिहार मिशन नामक विभाग बना दिया है और इसको सारे मंत्रियों और अधिकारियों के ऊपर बिठा दिया है. सवाल उठता है कि फिर भारी-भरकम मंत्रिमंडल की जरुरत ही क्या है? सवाल यह भी उठता है कि जिस बिहार की ९९.९  प्रतिशत जनता नीतीश के १० साल के शासन के बावजूद पानी के नाम पर जहर पी रही है उसको अगले ४.५ सालों में नीतीश कैसे शुद्ध पेयजल मुहैया करवा देंगे? यह १ निश्चय ही वे शर्तिया पूरा नहीं कर पाएंगे फिर बाँकी के ६ के १ प्रतिशत भी पूरा होने की बात दूर ही रही (चित्र में देखें ७ निश्चय ).
मित्रों,खैर,ये तो हुई उन जुमला कुमार जी के ७ महान जुमलों की बात जिनका २०१४ -१५ का बजट ही जुमला साबित हो चुका है लेकिन बिहार के लिए सबसे दुःखद पहलु यह है कि नीतीश कुमार को बिहार के समक्ष आ चुकी सबसे बड़ी समस्या दिख ही नहीं रही,उसे जुमलों में भी शामिल नहीं किया गया है. वो समस्या है जलवायु परिवर्तन के कारण बिहार का राजस्थान में बदल जाना।  बिहार में कई सालों से सूखे जैसी स्थिति है,भूगर्भीय जलस्तर ५० फ़ीट तक नीचे जा चुका है. बिहार की खेती जो बिहार की जान है बर्बादी के कगार पर है और नीतीश जी प्रधानमंत्री सिंचाई योजना से युद्धस्तर पर लाभ उठाने के बदले अभी भी चुनावी मोड में हैं और आरोप-आरोप का गन्दा खेल खेल रहे हैं. जागिए प्रभु और बिहार की खेती को बचाईये यानि बिहार को बचाईये। जबकि जमीन के अंदर पानी ही नहीं रहेगा तो हर घर को सप्लाई क्या करेंगे? मतलब नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या? अगर आपको बिहार से किंचित मात्र भी प्यार है तो बिहार को  बचाईये,बिहार को बचा लीजिए। प्रधानमंत्री सिंचाई योजना में कोई कमी है तो केंद्र को बताईये,मिल-जुलकर नए बिहार का निर्माण करिए. अगर मिल-जुलकर बिहार को लूटना है तब तो कोई बात नहीं,तब तो आपके पास लालू प्रसाद एन्ड फैमिली है ही.

रविवार, 27 मार्च 2016

डॉ. नारंग की हत्या के सबक


मित्रों,हमने कई महीने पहले एक आलेख में लिखा था कि भारत की भ्रष्ट मीडिया के लिए सांप्रदायिक हिंसा तभी होती है जब मरनेवाला मुसलमान और मारनेवाला हिंदू होता है। इसके उलट जब हिंदू को मुसलमान मारता है तो धर्मनिरपेक्ष हिंसा सांप्रदायिक हिंसा न भवति। जब एक केंद्रशासित प्रदेश का अघोषित देशद्रोही मुख्यमंत्री 250 करोड़ सालाना मीडिया में बाँटेगा तो फिर बिकाऊ वेश्या मीडिया की नीयत तो खराब होगी ही।
मित्रों,लेकिन सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति आई ही क्यों? क्यों आज कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उनकी भजभज मंडली मीडिया की नजर में हिंदुओं की जान की कोई कीमत नहीं है जबकि हिंदुओं की आबादी 80 प्रतिशत है? क्या इसके लिए स्वयं हिंदू भी या हिंदू ही जिम्मेदार नहीं हैं? एक बेवजह के विवाद में कुछ दर्जन लोग आते हैं और एक प्रतिष्ठित व्यक्ति की हत्या करके चले जाते हैं। जब डॉक्टर की हत्या हो रही थी तब उसके पड़ोसी कहाँ थे? क्यों कोई डॉक्टर को बचाने के लिए घर से बाहर नहीं निकला?
मित्रों,यह एक कटु सच्चाई है कि आज हिंदू अपने घर में हथियार नहीं रखता। अगर घर में कोई साँप भी घुस आए तो उसको मारने के लिए घर में लाठी तक नहीं होती। अहिंसा परमो धर्मः के सिद्धांत ने हिंदुओं को निर्बल बना कर रख दिया है। लेकिन इसी श्लोक में आगे यह भी कहा गया है कि धर्म हिंसा तथैव च अर्थात अहिंसा परम धर्म है परन्तु हिंसा का, धर्म के अनुसार प्रतिकार करना भी उतना ही परम धर्म है। मैं यह नहीं कहता कि हिंदुओं को कानून का उल्लंघन करके अवैध हथियार रखने चाहिए लेकिन ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि 50 लाख की संपत्ति अर्जित कर ली और उसकी रक्षा के लिए 50 हजार का लाइसेंसी हथियार भी नहीं खरीदा और सरकार के भरोसे पड़े हैं। यह तो फिर दैव दैव आलसी पुकारा सदृश बात हो गई जिसकी बात सवा सौ साल पहले भारतीयों के लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भारत दुर्दशा में की थी।
मित्रों,यह कटु सच्चाई है कि सरकार चाहे किसी की भी हो वो तो वोट बैंक देखकर ही काम करेगी और हिंदू वोट बैंक तो हैं नहीं। हिंदू तो जाट हैं,दलित है,क्षत्रिय हैं,ब्राह्मण हैं,कोयरी हैं,कुर्मी हैं,दलित हैं,यादव आदि आदि आदि हैं लेकिन हिंदू नहीं हैं। इससे भी आगे हिंदू लालची हैं जो साल में कुछ सौ रुपये के मुफ्त के बिजली-पानी के लिए अपना वोट देश के दुश्मनों से मिलीभगत रखनेवाले तत्त्वों को भी दे देते हैं। क्या कारण है कि जो अरविंद केजरीवाल दादरी और हैदराबाद जाने में तनिक भी देरी नहीं लगाता वही अपने ही राज्य में कथित असांप्रदायिक गुंडों द्वारा निहायत निर्दोष की बेवजह हत्या हो जाने पर अपने घर से 5 किमी दूर जहाँ कि वो एक घंटे में पैदल भी जा सकता है जाने की जहमत भी नहीं उठाता?
मित्रों,आज एक भाजपा को छोड़कर कोई भी दल ऐसा नहीं है जो राष्ट्रीय स्तर पर खुलकर हिंदू हितों की बात करता हो जबकि ऐसे दलों की एक लंबी सूची है जो मुसलमानों के सही-गलत सारे कृत्यों का पृष्ठपोषण करते हैं और दिन-रात मुसलमान-मुसलमान की रट लगाए रहते हैं। आगे कई राज्यों में चुनाव होनेवाले हैं लेकिन ऐसा लगता नहीं कि एक नारंग की हत्या हो जाने से पूरा हिंदू समाज अखिल भारतीय स्तर पर जागृत और एकजुट हो जाएगा। सतर्क रहिए,सावधान रहिए क्योंकि हो सकता है दुर्घटनावश डॉ. नारंग के बाद आपकी ही बारी आ जाए।

शनिवार, 26 मार्च 2016

प्रशांत किशोर,ए स्प्यॉल्ड जीनियस

मित्रों,अगर आपने विशाखदत्त रचित मुद्राराक्षस नाटक पढ़ा होगा तो देखा होगा कि उसमें दो पक्ष हैं-एक का नेतृत्व चंद्रगुप्त मौर्य के हाथों में है और दूसरे की बागडोर है घनानंद के हाथों में। दोनों के पास एक-एक महान रणनीतिकार है चंद्रगुप्त के लिए चाणक्य सारी योजनाएँ बनाते हैं तो घनानंद के लिए मुद्राराक्षस रणनीति बनाते हैं। यद्यपि मुद्राराक्षस भी महान राजनीतिज्ञ है लेकिन वह अन्यायी का साथ दे रहा है,एक ऐसे राजा का साथ दे रहा है जिसका उद्देश्य भोग-विलास मात्र है तो वहीं चाणक्य और चंद्रगुप्त महान उद्देश्य की प्राप्त के लिए अथक परिश्रम कर रहे हैं। वे दोनों माँ भारती का विदेशी आक्रांताओं से उद्धार और अखंड भारत की स्थापना करना चाहते हैं। अंत में जीत चाणक्य और चंद्रगुप्त की होती है और घनानंद मृत्यु को प्राप्त होता है।
मित्रों,अगर हम वर्तमान भारत के परिदृश्य को देखें तो कुछ वैसी ही स्थिति देखने को मिलेगी जो 2500 साल पहले थी। आज एक तरफ तो नरेंद्र मोदी हैं जो माँ भारती का उद्धार करना चाहते हैं तो दूसरी ओर वे तमाम प्रतिगामी शक्तियाँ हैं जो वर्षों से देश को लूटती आ रही हैं।
एक तरफ नरेंद्र मोदी खुद ही अपनी रणनीतियाँ बना रहे हैं तो प्रतिगामी घनानंद सदृश शक्तियों को सहारा है महान रणनीतिकार प्रशांत किशोर का। निश्चित रूप से प्रशांत अपने काम में गजब के माहिर हैं और उन्होंने बिहार के चुनावों में इसको साबित भी किया है लेकिन सवाल उठता है कि क्या प्रशांत जो कर रहे हैं वह देशहित में है? महान तो शुक्राचार्य भी थे,रावण भी था लेकिन वे लोग पूज्य तो नहीं हैं। क्यों? क्योंकि उनके कृत्य समाजविरोधी,धर्मविरोधी थे।
मित्रों,हम मानते हैं कि हमारे लिए भी पैसा बहुत बड़ी चीज है लेकिन पैसा न तो कभी सबकुछ रहा है और न ही हो सकता है। प्रशांत को कदाचित पैसे के साथ-साथ शुक्राचार्य की तरह पावर भी चाहिए था जो दर्जा प्राप्त कैबिनेट मंत्री बनने से मिल भी गया है। परंतु इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद सवाल उठता है प्रशांत जो कुछ भी कर रहे हैं उससे देश का भला होगा? अगर भला नहीं होगा तो फिर उनको क्या कहा जाए? क्यों उनकी तुलना रावण या शुक्राचार्य से नहीं होनी चाहिए? अगर उनकी अंतरात्मा मानसिंह की अंतरात्मा की तरह उनको नहीं धिक्कारती है तो क्या यह देशभक्त प्रबुद्ध लोगों का कर्तव्य नहीं है कि उनकी निंदा करे और उनको आत्मावलोकन के लिए बाध्य करने का प्रयास करे? आखिर अपना भारत आज भी घास की रोटी खाकर देश के लिए लड़नेवाले प्रताप की ही पूजा करता है न कि सोने-चांदी की थाली में छप्पन भोग खानेवाले मानसिंह की।

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

महापुरुषों का चरित्र-हनन कांग्रेस के नैतिक पतन की पराकाष्ठा

मित्रों,किसी शायर ने लिखा है कि शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,वतन पे मरनेवालों का यही बांकी निशां होगा। लेकिन हमारी राजनैतिक पार्टियों का इतना अधिक नैतिक पतन हो चुका है कि शहीदों और महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के बजाए वे उनका ही चरित्र-हनन करने लगी हैं और जब वो पार्टी वो कांग्रेस होती है जिसने कभी देश को आजादी दिलवाने में मुख्य भूमिका निभाई थी तो दुःख और भी ज्यादा होता है। सवाल उठता है कि देश बड़ा है या कुर्सी बड़ी है?
मित्रों,प्रश्न यह भी उठता है कि कांग्रेस पार्टी का वर्तमान नेतृत्व क्या उन महापुरुषों के चरणों की धूल के बराबर भी है जिनके ऊपर वो आज कीचड़ उछाल रही है। पहले तो हमारे पतित नेताओं ने महापुरुषों को जाति में बाँटा और अब पार्टी में बाँट रहे हैं। आखिर वह कौन-सी सोंच है जिसके तहत कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी संसद में कहते हैं कि गांधी हमारे हैं और सावरकर आपके। क्या महापुरुष किसी जाति-विशेष या पार्टी विशेष के होते हैं या हो सकते हैं? क्या चंद्रशेखर आजाद या बिस्मिल ने सिर्फ ब्राह्मणों की आजादी के लिए या भगत सिंह ने सिर्फ सिखों की आजादी के लिए या अशफाकुल्लाह खान ने सिर्फ मुसलमानों की स्वतंत्रता के लिए शहादत दी थी? क्या गांधी जी ने सिर्फ कांग्रेस समर्थकों को आजाद करवाने के लिए आंदोलन किया था? अगर नहीं तो फिर गंदी राजनीति करके महापुरुषों के त्याग और बलिदान का मजाक क्यों उड़ाया जा रहा है?
मित्रों,कांग्रेस के प्रवक्ता से जब विनायक दामोदर सावरकर जिनको भारत की जनता प्यार से वीर सावरकर कहकर पुकारती है के चरित्र-हनन के संबंध में सवाल किया गया तो कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी ने अजीबोगरीब तर्क दिया। उनका कहना था कि 1924 से पहले के सावरकर तो वंदनीय हैं लेकिन उसके बाद के सावरकर निंदनीय हैं। हद हो गई कुतर्क की। कांग्रेस कहती है कि सावरकर ने 1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजों के लिए सैनिकों की बहाली करवाई थी तो सच तो यह भी है कि 1914 के प्रथम विश्वयुद्ध में कांग्रेस ने भी तन-मन-धन से अंग्रेजों को समर्थन दिया था तो क्या 1914 का कांग्रेस या 1914 के गांधी निंदनीय हैं और 1942 के वंदनीय।
मित्रों,हिंदी के महान नाटककार मोहन राकेश ने एक नाटक लिखा था आधे अधूरे। नाटक कहता है कि इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है बल्कि हर कोई अधूरा है फिर महापुरुष कैसे पूर्ण हो सकते हैं? स्वयं गांधी में भी कई कमियाँ थीं और उन्होंने भी कई गलतियाँ कीं जिनमें से कइयों का खामियाजा तो देश आज भी भुगत रहा है लेकिन उन गलतियों के बावजूद गांधी महान थे क्योंकि उन्होंने तमाम मानवीय कमजोरियों के बावजूद जो किया वह महान है,प्रातःस्मरणीय है। चूँकि इंसान गलतियों का पुतला होता है इसलिए ऐसा कोई इंसान नहीं है जिसकी आलोचना नहीं की जा सकती हो। क्या कांग्रेस का आज का नेतृत्व पूर्ण होने का दावा कर सकता है? क्या उसने आलोचना करने के लायक कोई गलती कभी की ही नहीं है?
मित्रों,कांग्रेस पार्टी चंद पत्रों के आधार पर वीर सावरकर को देशद्रोही साबित करना चाहती है लेकिन पत्र तो गांधी-नेहरू ने भी जेलों से अंग्रेजों को थोक में लिखे थे और उन पत्रों की भाषा भी कमोबेश वैसी ही थी जैसी कि सावरकर के पत्र की है तो क्या गांधी और नेहरू भी देशद्रोही थे? नेहरू ने आजाद भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अंग्रेजी सरकार को सुभाषचंद्र बोस से संबंधित जो पत्र लिखे थे उसकी भाषा गुलामों जैसी क्यों है क्यों कांग्रेस पार्टी बताएगी?
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि कांग्रेस पार्टी ने महापुरुषों को पार्टियों में बाँटकर और उन पर कीचड़ उछालकर,सूरज पर थूकने जैसी जिस नई राजनैतिक परंपरा की शुरुआत की है वह खुद उस पर ही भारी पड़नेवाली है। लगता है कि कांग्रेस नेतृत्व सत्ता की पुनर्प्राप्ति की बैचैनी में पागल हो गया है। वह पूरी तरह से किंकर्त्तव्यविमूढ़ की अवस्था में है। कभी उसको देशद्रोही कन्हैया में देशभक्तों के सिरमौर भगत सिंह नजर आने लगते हैं तो कभी भगत सिंह के लिए भी आदर्श रहे सावरकर में देशद्रोही दिखने लगता है। अच्छा हो कि पार्टी नेत्तृत्व अपने पागलपन का समय रहते स्वयं ईलाज कर ले अन्यथा भारत की जनता को अगर यह काम करना पड़ा तो इस बार तो शवयात्रा में साथ जाने के लिए 44 लोगों को जनता ने भेज भी दिया था शायद अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की अर्थी को कंधा देने के लिए चार सांसद भी शेष न बचें।

बुधवार, 23 मार्च 2016

ई थरूरवा भांग खा के भकुआईल है का?


मित्रों,होली मस्ती का त्योहार है,उमंग का महापर्व है। होली और भांग का सदियों से बड़ा ही गहरा संबंध रहा है। अब तो ज्यादातर लोग होली में फोकटिया दारू गटकने के चक्कर में रहते हैं जबकि पहिले सिर्फ भांग घोटने का ही प्रचलन था। हमारे एक दादाजी कहा करते थे कि भांग खाए भकुआए गाँजा पिए झुक्के,दारू पिए ... मरावे कुत्ता जईसन भुक्के। अब आप कहिएगा कि इस महान दोहे में हमने जो रिक्त स्थान छोड़ा है वहाँ क्या होगा तो अगर आप पूर्वी उत्तर प्रदेश या बिहार के हैं तो आप दोहे को पढ़ते ही पहली नजर में ही रिक्त स्थान की पूर्ति कर लेंगे। उन दादाजी का तो यह भी कहना था कि शराबियों की बातों पर कभी यकीन नहीं करना चाहिए क्योंकि उनके बाप का भले ही पता हो बात का पता नहीं होता।
मित्रों,हम बात कर रहे थे भांग की। उपरोक्त दोहा कहता है कि भांग खाने से लोग भकुआ जाते हैं। लेकिन हमको यकीन नहीं होता कि शशि थरूर भांग खाते होंगे। ऊ तो महंगी-महंगी विदेशी शराब का सेवन करते होंगे। भांग तो गरीबों का नशा है कि घर के पिछवाड़े में गए और दस गो पौधा उखाड़ लाए हर्रे लगे न फिटकिरी और रंग भी चोखा होए। भले ही थरूर जी भांग नहीं खाते होंगे लेकिन दोहा में शराबी लोग के भी कौन-सी बड़ाई की गई है। अब आप समझ गए होंगे कि थरूरवा काहे फागुन महीने में कुत्ते की तरह भौंकने लगा।
मित्रों,अब बात करते हैं होली की। होली है तो बात होली की ही होनी चाहिए थरूरवा जाए चूल्ही के भाँड़ में चाहे हाथी के ... में। वैसे तो बिहार के हर जिले के होली गीतों की अपनी विशेषता है लेकिन अपना गौरवशाली वैशाली जिला भी किसी से कम थोड़े ही है। वैशाली के गांवों में पहिले से सुबह में नाली साफ करने का कार्यक्रम चलता है। कीचड़ में सराबोर सफाईकर्मी लोग दूसरे लोगों को भी कीचड़ से सौंदर्यीकृत करते हैं। फिर दोपहर में लोग स्नान करते हैं। घर के कुछ लोग मीट-मुर्गा के जुगाड़ में सुबह-सुबह ही निकल जाते हैं और पीनेवालों को तो बस पीने का बहाना चाहिए और होली से अच्छा बहाना और कौन होगा सो पीनेवाले लोग जीजान से सुबह से ही पीना शुरू कर देते हैं। फिर शाम में दरवाजे-दरवाजे घूमकर होली गाई जाती है। होली की शुरुआत होती है गणेश वंदना से-पहिले सुमिर गणेश के,राम होरी हा मथुरा में बाजे बधाई। फिर बाबा हरिहर नाथ को याद किया जाता है-बाबा हरिहर नाथ सोनपुर में रंग खेले। फिर भगवान राम के गीत गाए जाते हैं-राम खेले होरी लछुमन खेले होरी,लंका गढ़ में रावण खेल होरी। उसके बाद होली के असली रस श्रिंगार रस से सराबोर गीतों की बारी आती है। भर फागुन बुढ़वा देवर लागे भर फागुन,होरी राम हो हो हो हो। फिर बुढ़वा जाईछऊ नेपाल अब कैसे रहबे बुढ़िया या फिर चोलिया बुटेदार ई रंग कहवाँ से लएलअ या गोरिया पातरी गोरिया पातरी जईसे लचके जमुनिया के डार या फिर बुढ़वा बड़ बईमान मांगेला बैगन के भर्ता। इन गीतों में मुख्य निशाने पर होते हैं गाँव के बड़े-बूढ़े लोग।
मित्रों,इस दौरान जिस दरवाजे पर गायन मंडली जमा रहती है उस घर की महिलाएँ बाल्टी और लोटे में भर-भरकर रंग लाती हैं और होली गायकों पर उड़ेलती रहती हैं। साथ ही सूखे मेवों का आपस में आदान-प्रदान होता है और सेब जैसे लाल गालों पर रंग-गुलाल मलने का सिलसिला तो चलता ही है। खास तौर पर नववधुओं,साला-सालियों या जीजाओं की तो जान पर ही बन आती है। गांव के दो-चार नए पियक्कड़ पीकर बकवास भी करते हैं जिससे खासकर बच्चों का खूब मनोरंजन होता है। रात में लोग जमकर मांस-मदिरा का भक्षण करते हैं और फिर सो जाते हैं होली की मधुर यादों को आँखों में लिए।
मित्रों,हम बात शुरू किए थे भांग और शशि थरूर के प्रसंग से और एक लोकप्रचलिए दोहे से। आप चाहें तो इस दोहे का नेताओं पर या दूसरे लोगों पर भी परीक्षण कर सकते हैं। जैसे जो नेता कम बोलते हैं लेकिन जब बोलते हैं तो उटपटांग ही बोलते हैं तो आप मान सकते हैं ऊ भांग घोटते हैं जैसे कि राहुल बाबा। जो नेता सदन में आकर सो जाते हैं उनके बारे में मान सकते हैं ऊ गाँजा पीते हैं और जो नेता कुत्ते की तरह आएँ-बाएँ भूँकते रहते हैं उनके बारे में आँख मूँदकर मान सकते हैं कि ऊ दारू पीते हैं वैसे ई काम तो लगभग सारे नेता ही करते हैं कुछ पार्ट टाईम और कुछ तो फुल टाईम। वैसे तो इस फार्मूले को आप सालोंभर आजमा सकते हैं लेकिन ई फार्मूला फागुन में ज्यादा काम करता है जब फगुनहट वाली मस्ती भरी हवा चलती है और आप तो जानते ही हैं कि होली के दिन तो किसी बात का बुरा मानना ही नहीं चाहिए क्योंकि इस दिन तो सब माफ होता है। तो हमको भी साल भर की बकवास के लिए माफ करिए और आज्ञा दीजिए काहे कि अब दरवाजे-दरवाजे होली गाने का समय हो गया है और हम गाते तो अच्छा हैं ही बजाते भी अच्छा हैं।

शनिवार, 19 मार्च 2016

वित्तीय अराजकता की ओर बढ़ा बिहार,नहीं खर्च हो पायी बजटीय राशि

पटना (सं.सू.)। सीएजी की रिपोर्ट ने साबित किया है कि बिहार कितनी तेजी से वित्तीय अराजकता के दौर में जा रहा है। एक लाख चालीस हजार करोड़ रुपये का बजट और 43 हजार करोड़ खर्च ही नहीं कर पाये तो ऐसे बजट का का क्या फायदा। ये 43 हजार करोड़ इस प्रदेश के गरीबों पर खर्च होने वाले थे जो खर्च नहीं हो पाये। ऐसी अराजकता तेजी से प्रशासनिक अराजकता में बदल जाती है। इसी अराजकता का नतीजा शिक्षा विभाग में दिखाई पड़ा है। वित्तरहित शिक्षकों का अनुदान चार साल से बाकी है, नियोजित शिक्षकों को वेतन नहीं मिल रहा है, स्कूलों के भवन खंडहर में बदल रहे हैं और विभाग विधायकों को मंहगे उपहार बांट रहा है।

विदित हो कि बिहार विधानसभा में शुक्रवार को सदन पटल पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की वित्तवर्ष 2014-15 की रिपोर्ट रखी गई। रिपोर्ट में सरकार के वित्तीय प्रबंधन को विफल बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार सरकार के वर्ष 2014-15 के कुल बजट 140022.59 करोड़ रुपये में से 27334.02 करोड़ रुपये वापस कर दिए गए।

बिहार विधानसभा में रिपोर्ट के पेश होने के बाद लेखाकार परीक्षक पी़ क़े सिंह ने संवाददाताओं को बताया कि 2014-15 के कुल बजट 140022.59 करोड़ रुपये में से सरकार 43925.80 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं कर पायी, जो सरकार के पूरे बजट का बड़ा हिस्सा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार ने खर्च के अनुपात में बहुत ज्यादा बजट बना लिया था, जिस कारण यह स्थिति आई। ऐसे में कुल 27334.02 करोड़ रुपये वापस कर दिए गए, इसमें से 22740.73 करोड़ रुपये 31 मार्च, 2015 यानी वित्तवर्ष के आखिरी दिन वापस किए गए।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस वित्तवर्ष में राजकोषीय घाटा 11178.50 करोड़ रुपये रहा जो पिछले वर्ष से 34 प्रतिशत ज्यादा था। रिपोर्ट में विभाग द्वारा खर्च के बिल नहीं दिए जाने की भी बात कहीं है।

लेखाकार परीक्षक ने बताया कि बिहार में पुल निर्माण में भी विलंब हो रहा है। उन्होंने कहा कि पांच वर्ष में 1252 पुलों के निर्माण का लक्ष्य था, जबकि मात्र 821 पुलों का ही निर्माण समय पर हुआ। 155 पुलों के निर्माण में एक से लकर 84 महीने तक का विलंब हो रहा है।

थैंक यू वेरी मच,नीतीश कुमार जी,मुख्यमंत्री बिहार।

मित्रों,यूँ तो जबसे मैंने करीब 35 साल पहले रामचरित मानस के वर्षा ऋतु वर्णन में जिमि पाखंडवाद से लुप्त होहिं सदपंथ पढ़ा कदाचित उसके भी पहले से पाखंडवाद का सख्त विरोधी रहा हूँ लेकिन बाद के वर्षों में नेताओं का पाखंडयुक्त व्यवहार और चिथड़ा ओढ़कर घी पीने की प्रवृत्ति को देखकर मेरा खून उबाल खाने लगा और फिर जैसे ही ब्लॉगिंग की शुरुआत हुई मैंने ब्लॉगिंग करना शुरू कर दिया। पहले अन्ना और केजरीवाल का समर्थन किया लेकिन उनके प्रति अपने मन में संदेह उत्पन्न होने के बाद नरेंद्र मोदी का खुलकर साथ दिया। मैं हमेशा से तटस्थता की नीति का घोर विरोधी रहा हूँ और राम को अपना आदर्श मानते हुए हमेशा अन्याय का बेखौफ होकर प्रतिकार किया है।
मित्रों,सबसे पहले मुझे ब्लॉगिंग में समस्या हुई 2014 के लोकसभा चुनावों के समय। तब नवभारत टाईम्स ने मेरे आलेखों को प्रकाशित करने से मना करना शुरू कर दिया। शायद,नरेंद्र मोदी का विरोध करना ही उस अखबार की नीति थी और आज भी है। मैने बार-बार की रोक-टोक से परेशान होकर नवभारत टाईम्स में लिखना ही बंद कर दिया।
मित्रों,पिछले साल बिहार विधानसभा चुनावों के समय एक दिन मैंने पाया कि मेरे ब्लॉगों की सूची से भड़ास गायब है। मैं स्तब्ध था क्योंकि कड़वा सच प्रकाशित करना ही उस ब्लॉग का घोषित उद्देश्य था। यूँ तो भड़ास के मालिक यशवंत की जेलयात्रा से भी मैं वाकिफ था तथापि भड़ास पर लिखने से रोक दिए जाने से मुझे गहरा धक्का लगा। जब तत्काल भड़ास 4 मीडिया वेबसाईट पर गया तो पाया वेबसाईट पर सबसे ऊपर नीतीश कुमार जी का प्रसिद्ध विज्ञापन बिहार में बहार हो नीतीशे कुमार हो लगा हुआ था। जाहिर था कि यशवंत को उन्होंने खरीद लिया था। इसके बाद यही विज्ञापन दैनिक जागरण की वेबसाईट पर भी विराजमान हो गया और उसके बाद से दैनिक जागरण ने मेरे किसी भी ब्लॉग को अपने अखबार में स्थान नहीं दिया। उस पर जले पर नमक यह कि किसी विरोधी ने मेरे अखबार हाजीपुर टाईम्स की वेबसाईट को ही हैक कर लिया।
मित्रों,इस बीच मैं आर्थिक संकट के दौर से भी गुजर रहा था इसलिए जनवरी से ही पटना की दौड़ लगानी शुरू कर दी। अपने उन मित्रों से भी बातचीत की जिनकी कभी मैंने कड़की के समय मदद की थी लेकिन सब बेकार। पटना के किसी भी बड़े अखबार ने मुझे नौकरी नहीं दी। दे भी क्यों जबकि मैं सीधे सीएम के निशाने पर हूँ। हालाँकि मैं अपनी माली हालत के चलते इन दिनों बेहद परेशान हूँ जिसके चलते मैंने बीच में लिखना काफी कम कर दिया था लेकिन अब मैंने फिर से देशहित में धड़ल्ले से लिखने का निर्णय किया है और नीतीश जी को खुली चुनौती देता हूँ कि जब तक मेरे जिस्म में खून की एक-एक बूंद बाँकी है कसम अपने पूर्वजों की भूमि महोबा की पवित्र मिट्टी की मैं आप और आपके जैसे चिथड़ा ओढ़कर घी पीनेवाले महापाखंडी,महाभ्रष्ट नेताओं के खिलाफ लिखता रहूंगा। नीतीश जी थैंक यू वेरी मच मेरे इरादों को और भी मजबूत करने के लिए। अगर आपमें दम है तो मुझे लिखने से पूरी तरह से रोक कर बताईए लेकिन इसके लिए आपको मेरी साँसें रोकनी पड़ेगी।

शनिवार, 5 मार्च 2016

अपनी सगी बहन का यौन शोषण करता था हसनैन

मुंबई (सं.सू.)। मुंबई से सटे ठाणे में अपने परिवार के 14 सदस्यों की हत्या करने के बाद खुदकुशी करने वाले हसनैन पर लाखों का कर्ज था। यही नहीं वह मानसिक रूप से बीमार अपनी बहन का शारीरिक शोषण भी करता था। यह बात इस हत्याकांड की इकलौती चश्मदीद और हसनैन की बहन सुबिया ने पुलिस को दिए अपने बयान में कही है।

ठाणे के कासरवडवली में हर शख्स यही सवाल पूछ रहा है कि क्या 35 साल का हसनैन सच में दोहरी ज़िंदगी जीता था, दुनिया के लिए अलग ...परिवार के लिए बिल्कुल जुदा। इस खौफनाक हत्याकांड की इकलौती चश्मदीद हसनैन की बहन सुबिया के बयान पर यकीन करें तो जवाब है ... हां। ठाणे के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर आशुतोष डुमरे के मुताबिक सुबिया ने अपने बयान में कहा है कि " हसनैन पर 70 लाख रुपये के करीब कर्ज था। वह दो साल से बेरोजगार था। स्वभाव से चिड़चिड़ा था, घर में दहशत थी बाहर शांत रहता था।"

सात बच्चों सहित 14 लोगों के कत्ल की इस कहानी के कई पेंच अब खुल रहे हैं। इसमें लाखों रुपये कर्ज से लेकर बहन के शारीरिक शोषण तक की कहानी है। आशुतोष डुमरे ने कहा " सुबिया ने हमें बताया कि हसनैन बैतुल का शारीरिक शोषण करता था, जिसकी हम पुष्टि करने की कोशिश कर रहे हैं। 6 फरवरी को एक शादी में सारी बहनें मिली थीं, हसनैन ने उन्हें बातें करते सुना था। उसे लगता था कि उन्होंने रिश्तेदारों को भी यह बात बताई होगी।"

हसनैन ने ठाणे के माजीवाड़ा में भी एक फ्लैट किराये पर ले रखा था लेकिन पुलिस को वहां कुछ संदेहास्पद नहीं मिला है। फिलहाल वह हसनैन की बहन सुबिया के बयानों को सबूतों की कसौटी पर कसने में जुटी है।

कन्हैया को किससे और कैसी आजादी चाहिए?


मित्रों,आजादी किसे अच्छी नहीं लगती? फिर वो पशु हो,पक्षी हो या इंसान लेकिन कभी-कभी हम पाते हैं कि फिल्म बंटी और बबली के एक दृश्य जैसी हास्यास्पद स्थिति भी उत्पन्न कर दी जाती है या हो जाती है। आपको याद होगा कि फिल्म में हीरो बंटी ताजमहल को ही बेच डालता है। मंत्री समय पर कार्यालय न पहुँचें इसके लिए वो कुछ किराये के नारेबाजों को ठीक करता है जो मंत्री की गाड़ी के आगे जमकर नारेबाजी करते हैं। हमारी मांगें पूरी करो चाहे जो मजबूरी हो। मंत्री गाड़ी रोककर पूछती है कि आप लोगों की मांगें क्या हैं लेकिन वे लोग कोई मांग नहीं बताते और बार-बार वही नारा दोहराते रहते हैं।
मित्रों,ठीक यही स्थिति इस समय जेएनयू में है। वहाँ पहले तो नारा लगाया गया कि हमें भारत से आजादी चाहिए और अब नारा लगाया जा रहा है कि हमें भारत में आजादी चाहिए लेकिन यह नहीं बताया जा रहा है कि आजादी किससे चाहिए और किस बात की आजादी चाहिए? ऐसी कौन-सी आजादी है जो अन्य लोगों को तो प्राप्त है लेकिन जेएनयू में पढ़नेवाले चंद लोगों को प्राप्त नहीं है। बल्कि उन्होंने तो खुद ही अन्य भारतवासियों से ज्यादा आजादी ले रखी है। वे सरेआम दिनदहाड़े सामूहिक चुम्मा-चाटी का कार्यक्रम करते हैं और उसको किस ऑफ लव का नाम देते हैं। गोया जो लोग पर्दे में किस करते हैं उनके बीच आपस में प्यार होता ही नहीं है। अगर उनको सरेआम इससे ज्यादा करने की आजादी चाहिए तो वे हम भारतवासियों को माफ ही करें क्योंकि हम आए दिन स्वच्छंदता के दुष्परिणामों से जुड़ी खबरें पढ़ते ही रहते हैं। कई बार तो गैंगरेप की घटनाओं के पीछे दुल्हे के साथ-साथ बारातियों द्वारा भी सुहागदिन मना डालने की मंशा छिपी होती है।
मित्रों,फिर हम इंसान हैं कोई कुत्ता या बकरी नहीं कि कहीं भी कुछ भी शुरू कर दिया। अगर कन्हैया एंड कंपनी को इस तरह की आजादी चाहिए तो वे किसी और मुल्क जहाँ साम्यवादी शासन है का रूख कर सकते हैं। बाँकी तो भारत के आम नागरिकों की तरह उनको भी मत डालने का,सरकार बनाने का अधिकार प्राप्त है ही नारेबाजी करने का भी अधिकार मिला हुआ है लेकिन एक दायरे के भीतर। देशविरोधी और देशविभाजक नारे लगाने का अधिकार,आतंकवादियों का समर्थन करने या समर्थन में कार्यक्रम आयोजित करने का अधिकार न तो किसी को दिया गया है न ही दिया जा सकता है,न तो रोहित वेमुला को था और न ही कन्हैया को है क्योंकि जब देश है तो हम हैं। क्योंकि हमारी सीमाओं पर रोज-रोज दर्जनों जवान देशरक्षा में शहीद होते हैं और वे इसलिए शहादत नहीं देते कि कोई राजधानी दिल्ली में उनके महबूबे वतन के टुकड़े करने के समर्थन में नारे लगाए। क्योंकि देश के करदाता इसलिए कर अदा नहीं करते के कोई उनकी गाढ़ी कमाई के पैसों से दी गई सब्सिडी पर पलकर और पढ़कर उनके ही देश के सर्वनाश के उद्देश्य से कार्यक्रमों के आयोजन करे।
मित्रों,दरअसल कन्हैया एंड कंपनी और कुछ नहीं बंटी और बबली गिरोह है। उनके पास न तो कोई ठोस दर्शन है और न ही तर्क उनको तो बस नारेबाजी करनी है। वैसे अगर जैसा कि वे लोग दावा कर रहे हैं कि वे भी देशभक्त हैं तो उनको केंद्र सरकार के लोककल्याणकारी कार्यों का,देश को विकसित बनानेवाले कदमों का समर्थन करना चाहिए। अगर उनको सरकार की किसी योजना या काम में कोई कमी महसूस होती है तो उसको मुखरित होकर देश-दुनिया और सरकार के सामने उठाना चाहिए लेकिन उनको अगर देश को हजार टुकड़ों में बाँटने का नारा लगाना है तो कृपया वे जेएनयू ही नहीं भारत से बाहर चले जाएँ। क्योंकि अगर वे भारत में ऐसा करेंगे तो टुकड़े भारत के नहीं होंगे उनके नापाक ईरादों के होंगे। कह तो हम यह भी सकते हैं कि उनके होंगे लेकिन हम उनकी तरह हिंस्र पशु नहीं हैं और हिंसा में विश्वास नहीं करते।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

वाराणसी से रूम के 600 रुपये दिए बिना ही निकल लिए केजरीवाल

वाराणसी (सं.सू.)। रविदास जयंती पर काशी पहुंचे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल स्पेशल सुइट का किराया दिए बिना ही वापस लौट गए। केजरीवाल पर सुइट के 600 रुपये देने अभी बाकी हैं। लेकिन यह चुकाए बिना ही वह वहां से निकल गए।

इससे पहले आप और बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच हुई मारपीट-पथराव मामले में दोनों तरफ से लंका थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई है। सोमवार को संत रविदास जयंती के मौके पर बनारस आए दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल का काफिला नेवादा इलाके से गुजरते समय आप व बीजेपी कार्यकर्ता भिड़ गए थे। आप के जिला संयोजक अब्दुल्ला खान की ओर से दी गई तहरीर पर पुलिस ने बीजेपी पार्षद के पति विनीत सिंह, अजय गुप्ता, किशोर, अजित सिंह, रंजीत सिंह और गोलू के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है। अब सुइट के 600 रुपये दिए बिना ही वापस आने पर विरोधियों को उन्हें घेरने का एक और मिल गया है।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

बिहार में किसका राज,कानून का या राजवल्लभों का?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैंने करीब दो साल पहले एक आलेख लिखा था 'मेरी सरकार खो गई है हुजूर'। वह आलेख भी बिहार और बिहार की कथित सरकार के बारे में था। तब से लेकर आज तक मुझे बिहार में सरकार की तलाश थी जो अब समाप्त हो गई है। क्योंकि उसकी जगह राज्य में अब नई सरकार आ गई है-अपराधियों की सरकार। इस सरकार में न तो कोई कोर्ट है,न ही कोई सुनवाई होती है,फैसला ऑन द स्पॉट,फटाफट।
मित्रों,दीगर अहवाल यह है कि जबसे बिहार में नई सरकार का गठन हुआ है बिहार में अपराधियों की तो जैसे बहार ही आ गई है और बिहार के मुख्यमंत्री इन दिनों कौआ टरटराता है और धान सूखता रहता है नामक अतिप्रसिद्ध बिहारी कहावत को चरितार्थ करने में लगे हैं। मुख्यमंत्री जी लगभग रोजाना पुलिस अधिकारियों के साथ कानून-व्यवस्था को लेकर मीटिंग कर रहे हैं और रोजाना बिहार की स्थिति और भी बुरी से बुरी होती जा रही है। अब यह भी लगने लगा है कि या तो मुख्यमंत्री सिर्फ दिखावे के लिए मीटिंग करते हैं या फिर इतने कमजोर हो गए हैं कि दारोगा तक पर भी उनकी डाँट-फटकार का कोई प्रभाव नहीं हो रहा। मगर सवाल उठता है कि नीतीश कुमार जी ऐसा क्यों कर रहे हैं या बिहार में ऐसा क्यों हो रहा है?
मित्रों,अभी भी बृजनाथी के हत्यारों का कोई अता-पता नहीं है। सत्तारूढ़ दल का कोई विधायक लड़की का अपहरण कर रहा है तो कोई ट्रेन में छेड़खानी तो कोई 30000 रू. में अपनी सबसे छोटी संतान से भी छोटी लड़की खरीदकर रातभर पोर्न वीडियो देख-देखकर बलात्कार कर रहा है। इधर,नीतीश कुमार जी जाहिर तौर पर तो राज्य में कानून का राज होने की माला जप रहे हैं लेकिन हो यह रहा है कि बारी-बारी से उन सभी बिगड़ैल विधायकों से संबंधित मामलों की लीपा-पोती कर दी जा रही है। पहले सिद्धार्थ,फिर सरफराज और अब राजवल्लभ। लगता है जैसे पुलिस और सरकार का एकमात्र कार्य सत्तारूढ़ दल के अपराधी विधायकों की सेवा करना है। कानून के रखवाले कानून तोड़नेवालों को ही कानून के शिकंजे से बचाने में लगे हैं लेकिन मुख्यमंत्री जी का हमेशा की तरह मानना,कहना यही है कि राज्य में कानून का राज था, है और रहेगा। नीतीश कहते हैं कि बलात्कारी राजवल्लभ यादव को स्पीडी ट्रायल चलाकर सजा दिलवाई जाएगी लेकिन उनकी सरकार राजवल्लभ को पकड़ती ही नहीं है या पकड़ ही नहीं पाती है फिर कैसे चलेगा स्पीडी ट्रायल?
मित्रों,नीतीश जी चाहे जितनी भी गलथेथरी (कुतर्क देना) करते रहें वास्तविकता तो यही है कि राज्य में इन दिनों अगर सबसे ज्यादा कोई लाचार है तो वह यह बेचारा कानून-व्यवस्था ही है। रोज ही राज्य में कानून-व्यवस्था के साथ छेड़खानी हो रही है,अपहरण हो रहा है,हत्या हो रही है और बलात्कार हो रहा है और करनेवाले कोई और नहीं बल्कि नीतीश कुमार के समर्थक विधायक ही है। बिहार इन दिनों जंगलराज एक बार फिर से जंगलराज की चपेट में है। एक बार फिर से बिहार में कानून का नहीं बल्कि राजवल्लभों का राज है।

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

क्या नीतीश विपक्षविहीन बिहार का निर्माण कर रहे हैं?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जैसी कि हमने 8 नवंबर को मतों की गिनती के दिन ही अपने आलेख में भविष्यवाणी की थी कि अब बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति इतनी बुरी होनेवाली है कि लोग लालू-राबड़ी राज यानि जंगलराज को भी भूल जाएंगे। यूँ तो नई सरकार के शपथ-ग्रहण करने के पहले से ही राज्य में अपराधियों का तांडव शुरू हो गया था लेकिन अब जो हो रहा है वह अगर यूँ ही चलता रहा तो निकट भविष्य में बहुत जल्दी ही बिहार विपक्षविहीन हो जाएगा क्योंकि सारे विपक्षी नेताओं की हत्या करवा दी जाएगी,कर दी जाएगी।
मित्रों,लोकतंत्र में विपक्ष का भी अपना महत्त्व होता है। विपक्ष सत्ता पक्ष को निरंकुश होने से रोकता है लेकिन लगता है कि लंबे समय तक विपक्ष की राजनीति कर चुके लालू-नीतीश को बिहार में विपक्ष चाहिए ही नहीं। तभी तो सत्ता पक्ष द्वारा कदाचित पृष्ठपोषित अपराधी एक के बाद एक विपक्षी नेताओं की हत्या करते जा रहे हैं। आश्चर्य का विषय तो यह है कि राघोपुर में 1995 से ही लालू-राबड़ी परिवार के खिलाफ लगातार चुनाव लड़नेवाले बृजनाथी सिंह की राजधानी पटना में एके-47 से सरेआम दिनदहाड़े हत्या कर दी जाती है और बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव जो अभी राघोपुर से विधायक भी हैं बयान देते हैं कि लोजपा में अपराधियों की भरमार है। सवाल उठता है कि अपराधी किस पार्टी में नहीं हैं? सवाल यह भी उठता है कि जो राजनेता सीधे-सीधे अपराधी नहीं हैं क्या वे बेड़ा-मौका काम आने के लिए अपराधियों का लालन-पालन नहीं करते? आखिर ऐसे कौन-से लोग बृजनाथी सिंह की हत्या के पीछे थे कि हत्या के दस दिन बाद भी पुलिस ने कोई गिरफ्तारी नहीं की है और अंधेरे में ही तलवार भाँज रही है? क्या यह हत्या सीधे-सीधे बिहार के उपमुख्यमंत्री ने करवाई है? उपमुख्यमंत्री ने हत्या के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है उससे तो यह शक और भी पुख्ता हो जाता है।
मित्रों,इतना ही नहीं पिछले 48 घंटों में एनडीए के दो और ऐसे नेताओं की हत्या 'अज्ञात' अपराधियों द्वारा कर दी गई है जिन्होंने पिछले दिनों संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में महागठबंधन के खिलाफ चुनाव लड़ा था। इनमें से एक तो मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष भी थे और एक समय लालू के हनुमान रहे शिवानंद तिवारी के बेटे राहुल के खिलाफ चुनाव लड़े थे। इनकी हत्या के बाद भी राहुल तिवारी की प्रतिक्रिया ठीक वैसी ही रही जैसी कि बृजनाथी सिंह की हत्या के बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री की थी। इन श्रीमान् का कहना था कि मरनेवाले की पृष्ठभूमि को भी देखना चाहिए। तो क्या सत्तापक्ष ने इस तरीके से बिहार को अपराधमुक्त बनाने का निर्णय लिया है? क्या कोई शरीफ या बिना राजनैतिक पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति बिहार में चुनाव जीत सकता है? क्या राहुल तिवारी के पिताजी या खुद राहुल तिवारी ने शाहपुर विधानसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में अपराधियों को प्रश्रय नहीं दे रखा है? अपराधियों का पालन ठीक लेकिन अपराधियों का चुनाव लड़ना गलत यह कौन-सा नैतिक सिद्धांत है?
मित्रों,मैं पूछता हूँ कि क्या नीतीश कुमार या तेजस्वी यह बताएंगे कि ये दोनों हत्याएँ किसने की और पुलिस उनको कब तक गिरफ्तार कर लेगी? या फिर उन्होंने बिहार के अपराधियों को विपक्षी नेताओं का आखेट करने की खुली छूट दे दी है जैसी छूट भारतीयों को मारने की कभी अंग्रेजों को प्राप्त थी या फिर जैसी कि राज्य में नीलगायों के बारे में हाल में दी गई है? अगर ऐसा है तो मुबारक हो भारतीय लोकतंत्र को न्याय के साथ विकास! और वर्ष 2020 के विधानसभा चुनावों में सभी सीटों पर निर्विरोध जीत के लिए महागठबंधन को अग्रिम बधाई! आज मैं बिहार की महान जनता को कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि जब उसने विकास और विनाश में से विनाश का पथ प्रचंड बहुमत से चुना है तो फिर राज्य का विनाश ही होगा। बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय!

शनिवार, 23 जनवरी 2016

लालू जी के मामले में कानून अपना काम क्यों नहीं करेगा नीतीश जी?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिेंह। मित्रों,हम वर्षों से यह पढ़ते चले आ रहे हैं कि अंग्रेजों की भारत को सबसे बड़ी देन देश में कानून का शासन और कानून के समक्ष समानता है। आपको याद होगा कि जब बिहार के निवर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नया-नया मुख्यमंत्री बने थे तब कानून-व्यवस्था से संबंधित प्रत्येक मामले में उनका एक ही रटा-रटाया उत्तर होता था कि कानून अपना काम करेगा। कानून ने अपना काम भी किया था और बिहार की कानून-व्यवस्था की स्थिति में एक लंबे समय के बाद सुधार देखने को मिला था।
मित्रों,लेकिन अभी दो-तीन दिन पहले उन्हीं नीतीश कुमार की सरकार ने पिछले साल बिहार बंद के दौरान राजद कार्यकर्ताओं द्वारा तोड़-फोड़,मारपीट और कानून के उल्लंघन से संबंधित मामलों को वापस ले लिया है। चूँकि इन मामलों में आरोपी रहे लालू प्रसाद यादव और उनके बेटे अब उनके गठबंधन और उनकी सरकार में हैं इसलिए नीतीश कुमार जी ने इस मामले यह नहीं कहा कि कानून अपना काम करेगा बल्कि उनके द्वारा लिए गए निर्णय का लब्बोलुआब यह था कि इस मामले में कानून अपना काम नहीं करेगा क्योंकि वे कानून को अपना काम करने ही नहीं देंगे।
मित्रों,दूसरी तरफ जदयू विधायक सरफराज आलम के मामले में लालू-नीतीश-तेजस्वी-तेजप्रताप सभी एक स्वर में कह रहे हैं कि विधायक के खिलाफ कानूनसम्मत कार्रवाई होनी चाहिए। अगर हम दोनों घटनाक्रम को एक साथ जोड़कर देखें तो हमारी समझ में आ जाएगा कि अब नीतीश कुमार जी का कहना है कि कानून उन्हीं मामलों में अपना काम करेगा जिन मामलों में वे चाहेंगे कि वो अपना काम करे और जिन मामलों में वे नहीं चाहेंगे कि कानून अपना काम नहीं करे कानून अपना काम नहीं करेगा। घटनाक्रम को देखकर आसानी से विश्वास नहीं होता कि ये वही नीतीश कुमार जी हैं जिन्होंने कभी राज्य में कानून का शासन स्थापित करने के लिए काफी लंबी लड़ाई लड़ी थी।
मित्रों,इस प्रकार हम पाते हैं कि नीतीश कुमार की सरकार कानून के समक्ष समानता के संवैधानिक अधिकार का तो उल्लंघन कर ही रही है साथ ही कानून के शासन का भी खुलकर मजाक उड़ा रही है। कहने को तो वे और उनके गठबंधन और सरकार के साझीदार एक स्वर में कह रहे हैं कि राज्य में कानून का शासन है और रहेगा लेकिन वास्तविकता यही है कि राज्य में कानून का शासन है ही नहीं,मनमाना शासन है। अब जब मुख्यमंत्री और कैबिनेट ही कानून के शासन और कानून के समक्ष समानता के मौलिक सिद्धान्त की खिल्ली उड़ा रहे हैं तो फिर निचले स्तर पर क्यों नहीं अधिकारी खिल्ली उड़ाएंगे? फिर क्यों नहीं घूसखोरी और रसूखदारी का बाजार गर्म होगा? संस्कृत में कहा भी गया है कि महाजनो येन गतः स पंथाः अर्थात् बड़े लोग जिस मार्ग का अनुशरण करते हैं बाँकी लोग भी उसी मार्ग पर चलते हैं।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

रोहित की कायरता पर छाती पीटनेवाले सावन पर खामोश क्यों?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बंगाल और असम का चुनाव सिर पर है। ऐसे में पुरस्कार-सम्मान लौटाऊ गैंग और कथित पंथनिरपेक्ष मीडिया का आर्तनाद फिर से प्रारंभ हो गया है। इस बार इन भारतविरोधियों ने इसके लिए बहाना लिया है हैदराबाद में आत्महत्या जैसी सबसे बड़ी कायरता का प्रदर्शन करनेवाले कथित दलित रोहित का। बिहार चुनाव के बाद अर्द्धनिद्रा में चले गए धूर्त बुद्धि से अटे-पटे और अक्ल से हीन शकुनिसदृश लोग फिर से अपने रंग में आकर रंगभूमि में पधार चुके हैं।
मित्रों,मैं अपने पहले के आलेखों में भी इन मक्कारों की पोल खोलता रहा हूँ। आप भी जानते-मानते हैं कि आत्महत्या से बड़ी कोई कायरता हो ही नहीं सकती। भले ही आप 84 लाख योनियों में भटकने के शास्त्रीय सिद्धांत को नहीं मानें लेकिन इतना तो जरूर मानेंगे कि जीवन अनमोल होता है और यूँ ही खो देने के लिए नहीं होता। संघर्ष तो राम को भी करना पड़ा था,राजा हरिश्चंद्र को भी करना पड़ा था फिर हम किस खेत की मूली हैं। फिर हमें यह भी देखना चाहिए कि खुदकुशी करनेवाले की विचारधारा क्या थी,उसकी सोंच कैसी थी।
मित्रों,यह अबतक जगजाहिर हो चुका है कि रोहित वेमुला चाहे वो पिछड़ी जाति से आता हो या दलित जाति से ओवैसी जैसे भारतविरोधियों के गंदे हाथों का खिलौना था। ब्रेनवॉश करके उसके मन में अपने ही पंथ के प्रति इस कदर जहर भर दिया गया था कि वो हिन्दुओं को देखना तक पसंद नहीं करता था। यहाँ तक वह इस कदर मानसिक विकृति का शिकार था कि जाने-अनजाने में याकूब मेनन जैसे आतंकवादियों का न केवल प्रशंसक बल्कि भक्त बन चुका था।
मित्रों,आश्चर्य है कि फिर भी वोट-बैंक की गंदी राजनीति करनेवाले लोग उसके लिए हाय-हाय कर रहे हैं। वोट-बैंक की राजनीति की पहली शर्त ही यही होती है कि उस वोट-बैंक से आनेवाला व्यक्ति चाहे कितना ही गिरा-पड़ा क्यों न हो उनका पृष्ठपोषण करना है और दूसरा पक्ष चाहे पीड़क की जगह पीड़ित ही क्यों न हो उसकी उपेक्षा या उसका विरोध करना है। कुछ इसी तरह के कार्य इशरत जहाँ की मौत के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया था जिससे लाभ उठाकर वे तीसरी बार मुख्यमंत्री भी बन चुके हैं।
मित्रों,इसी दौरान पुणे के पंढ़रपुर में भी एक घटना घटी है। आत्महत्या की नहीं नृशंस हत्या की जिसको देखकर जंगली,हिंसक पशुओं को भी शर्म आ जाए लेकिन छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी गिद्ध तो बहुत पहले ही शरमोहया को तिलांजलि दे चुके हैं। सावन राठौड़ नामक एक 17 साला महादलित युवक नाली साफ करने के दौरान 13 जनवरी को पुणे के बिठोबानगरी पंढ़रपुर में सड़क किनारे पेशाब कर रहा था। तभी इब्राहिम महबूब शेख,जुबेर तंबोली (26) और इमरान तंबोली (28) ने उससे पूछा कि वो हिंदू है या मुसलमान और हिंदू बताते ही उनलोगों ने घनघोर असहिष्णुता और क्रूरता का परिचय देते हुए बिना किसी पूर्व परिचय के पूर्व शत्रुता की दूर की बात रही पहले तो पटककर उसको पेट्रोल पिलाया और फिर आग लगा दी।
मित्रों,पुणे के सासून अस्पताल में घर से बाप से झगड़ाकर भागे गरीब ने दो दिन बाद दम तोड़ दिया। उसके पिता एक ईट भट्ठे में मजदूरी करते हैं। पीड़ित ने मरने से पहले अपने आखिरी बयान में जो कहा है बस उतना ही कहा है जितना ऊपर हमने आपको बताया। लेकिन आश्चर्य है कि रोहित वेमुला की कायरता पर चीत्कार करने वाले लोग सावन के परिवार के आस-पास भी नहीं फटक रहे हैं। खैर उनको तो लगता है कि सावन के घर जाने से छोटे वोटबैंक के चक्कर में बड़ा वोटबैंक नाराज हो जाएगा। लेकिन आश्चर्य तो इस बात को लेकर है कि महाराष्ट्र में सरकार चला रही भाजपा भी इस घनघोर सांप्रदायिक घटना को कानून-व्यवस्था से संबंधित छोटी घटना बता रही है जबकि उसको यह अच्छी तरह से पता है कि उसको मुसलमानों ने न कभी वोट दिया है और न कभी देंगे।
मित्रों,मेरा हमेशा से ऐसा मानना रहा है कि हिंदुस्तान को असली खतरा मुसलमानों से नहीं है,न ही पाकिस्तान या चीन से हैं बल्कि उन हिंदुओं से है जो क्षुद्र स्वार्थ के वशीभूत होकर देशहित में नहीं सोंचते हैं और छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी,भेदभावपूर्ण व्यवहार करने लगते हैं और करने लगे हैं। जिनको दादरी तो दिखाई देती है लेकिन मालदा और पूर्णिया नजर नहीं आते। मैं यह नहीं कहता कि दादरी की घटना की प्रशंसा की जानी चाहिए लेकिन मैं यह भी नहीं कहता कि मुसलमानों को हिंदुओं को चिढ़ाने के लिए खुलेआम सरेबाजार गोवध करना चाहिए। खाने के लिए उनके खुदा ने इतनी चीजें दी हैं क्या वे उसमें से केवल एक का त्याग नहीं कर सकते? यहाँ मैंने उनके खुदा शब्द का प्रयोग न चाहते हुए भी इसलिए किया क्योंकि पिछले सप्ताह मिस्र की एक विद्वान महिला मुसलमान प्रोफेसर ने कहा है कि उनका खुदा मुसलमानों को गैरमुस्लिम महिलाओं के साथ गैंग रेप करने की ईजाजत देता है। पता नहीं उनका खुदा हमारे भगवान से कब और कैसे अलग हो गया जो दया को ही धर्म कहता है,अपनी स्त्री के अलावे सारी स्त्रियों को माता मानने की हिदायत देता है। वैसे पता नहीं भारत के छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी हिंदुओं का कौन-सा वो खुदा है जो कहता है कि आत्मघाती रोहित के लिए हल्ला बोल दो और वास्तविक पीड़ित सावन के परिवार के आसपास भी नहीं फटको क्योंकि उनका अगर कोई भगवान होता तो वे यकीनन इसका उलट कर रहे होते।

बुधवार, 20 जनवरी 2016

छाती पीटिए क्योंकि नीतीश सरकार काम कर रही है


वैधानिक चेतावनी-यद्यपि यह रचना व्यंग्य नहीं है तथापि अगर पढ़ते समय या पढ़ने के बाद आपको लगे कि यह व्यंग्य ही है तो इसे हम आपकी कृपा समझेंगे।
हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आप कहेंगे कि जब नीतीश सरकार काम कर रही है तो ताली पीटना चाहिए छाती क्यों पीटें? लगता है आप नहीं समझे आजकल वाला विकास के बिहार मॉडल को। पहले वाला मॉडल भाजपा का था अब वाला भाई-भतीजा का है। नीतीश जी का अपना कोई मॉडल न पहले था और न अब है। जब जिसके साथ रहे तब उसका वाला मॉडल ले लिए।
मित्रों,पहले नीतीश जी की सहयोगी भाजपा मानती थी कि सुशासन स्थापित करने से और विकास करने से वोट मिलता है। वोट मिला भी 2010 के विधानसभा चुनाव में नीतीश और भाजपा दोनों को मिला। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को ज्यादा मिला और नीतीश जी को कम। मतलब यह कि जिसका विकास मॉडल था लोग बिहार की लगभग सब सीट भी उसी को दे दिया।
मित्रों,तब नीतीश जी का माथा ठनका और वो होश में आ गए। सारा भ्रम टूट गया कि जिसको लोग बिहार का विकास मॉडल कहते हैं वो उनका था। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद नीतीश जी के पास न तो वोट था और न ही कोई मॉडल ही बचा था। तब उन्होंने लालू जी से संपर्क किया जिनके पास उनसे ज्यादा वोट भी था और एक विकास का मॉडल भी था जिसको एक समय नीतीश जी भी विनाश का मॉडल,जंगलराज और आतंकराज कहते थे।
मित्रों,लेकिन अब स्थितियाँ अलग थीं। नीतीश जी लंबे समय से सत्ता में थे और किसी भी कीमत पर बिहार के राजपाठ को हाथ से जाना नहीं देना चाहते थे। अबतक वे अच्छी तरह से समझ चुके थे कि न तो विकास का कोई मतलब होता है और न ही विकास मॉडल का असली सार तो सत्ता में बने रहने में हैं। फिर चाहे इसके लिए घिनौने बड़े भैया की गोद में बैठना पड़े या फिर शरारती-बदनाम भतीजों को अपनी गोद में बैठाना पड़े।
मित्रों,आपको याद होगा कि साल 1990 से 2005 तक लालू-राबड़ी स्टाईल बिहार मॉडल से कैसे बिहार का विकास हुआ था। जनता का एक वर्ग जो साध था छाती पीट रहा था और दूसरा वर्ग जो अपराधी था वो पहले वर्ग को पीट रहा था। ताली सिर्फ लालू-राबड़ी और उनके दरबारी पीट रहे थे। अब नीतीश कुमार जी अगर कहते हैं कि जितनी छाती पीटनी है पीटिए हम तो अपना काम करेंगे तो इसका कोई और मतलब नहीं निकालिए। उनके कहने का मतलब बस इतना है कि 1990 से 2005 तक जो लोग छाती पीट रहे थे एकबार फिर से पीट सकते हैं उनको फर्क नहीं पड़ता क्योंकि अब उनके साथ ताली पीटने के लिए वे सारे लोग आ गए हैं जो उस महान् कालखंड में ताली पीट रहे थे। और जब छाती और ताली पीटनेवाले मौजूद हैं तो फिर जबतक छाती पीटनेवालों को पीटनेवाले नहीं हों तो विकास का मॉडल पूरा कैसे होगा,अधूरा नहीं रह जाएगा? सो अब बिहार में खून-तून सब माफ होगा लेकिन नीतीश जी बस इतना ही गुनगुनाते रहेंगे कि आबो हवा बिहार की बहुत साफ है, कायदा है कानून है इंसाफ है,अल्ला मियाँ जाने कोई जिए या मरे,बिहार में खून-तून सब माफ है। इसे ही तो कहते हैं कानून के राज के साथ-साथ न्याय के साथ विकास भी और गरीबों का राज भी। अब बिहार में कोई जंगलराज नहीं बोलेगा और नीतीश जी के सामने तो हरगिज नहीं क्योंकि इस शब्द को बिहार में प्रतिबंधित कर दिया गया है। बोला नहीं कि गया बेट्टा!!! कहाँ जाने की बात हो रही है अगर जानना है तो पहले उस बस वाले से पूछिए जो बस के पीछे लिखवाए हुए है कि लटकले त गेले बेटा।

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

धर्मनिरपेक्ष हिंसा हिंसा न भवति


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अगर आपने भारतेंदु साहित्य को पढ़ा होगा तो पाया होगा और कदाचित् पढ़ा भी होगा उनकी एक रचना को जिसका नाम है वैदिक हिंसा हिंसा न भवति। खैर ये तो बात हुई डेढ़ सौ साल पहले की लेकिन आज वोट बैंक और कुत्सित राजनीति की बदौलत इस श्लोक का स्वरूप बदल गया है और आजकल इस प्रसिद्ध श्लोक के उलट धर्मनिरपेक्ष हिंसा हिंसा न भवति वास्तविकता बन गई है।
मित्रों,आज भी चकरा गए होंगे कि हिंसा भी कहीं धर्मनिरपेक्ष और सांप्रदायिक होती है। परंतु सच्चाई यही है कि इस समय हिंसा भी भारत में दो प्रकार की हो गई है-एक जो हिंदू करें और दूसरी जो मुसलमान करें। जो हिंसा हिंदू करते हैं उसका आकार चाहे जितना छोटा हो,प्रभावित होनेवाले लोगों की संख्या चाहे जितनी कम हो वह हिंसा सांप्रदायिक हिंसा होती है और जो हिंसा मुसलमान करते हैं उससे चाहे हजारों लोग मारे जाएँ वह धर्मनिरपेक्ष होती है और जो हिंसा धर्मनिरपेक्ष हो वह हिंसा ही कैसे हो सकती है।
मित्रों,हमारी बिकाऊ मीडिया और धूर्त बुद्धिजीवियों का मानना है कि चाहे मुसलमान सैंकड़ों गोधरा कर डालें उनके खिलाफ किसी भी तरह के कदम नहीं उठाए जाने चाहिए। गोधरा की आगजनी,मानव-दहन धर्मनिरपेक्ष होता है। उस आग में जलनेवाले को दर्द नहीं होता, दर्द तो सिर्फ मुसलमानों को होता है। मुसलमान चाहें तो खुलेआम सड़कों पर गोहत्या करें क्योंकि वह हिंसा तो हिंसा होती ही नहीं है न। गाय भी अपने पूजक हिंदुओं की तरह सांप्रदायिक होती है इसलिए गाय के न तो खून होता है,न छटपटाहट और न ही दर्द। लेकिन कोई हजरत मोहम्मद के चरित्र के बारे में कुछ नहीं कह सकता भले ही वो सच्चाई पर आधारित हो,फैक्ट हो क्योंकि हजरत मोहम्मद मुसलमानों के पूज्य हैं और मुसलमान या उनके पूज्य तो गलती कर ही नहीं सकते क्योंकि वे तो एकजुट होकर वोट डालते हैं। लेकिन अगर कोई कला के नाम पर हिंदुओं के पूज्यों-पूजनीयों को अपमानित करता है ऐसा वो निर्भय होकर कर सकता है क्योंकि तब उसका कृत्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत माना जाएगा। क्या ऐसा इसलिए नहीं क्योंकि हिंदू एकजुट होकर वोट नहीं डालते??
मित्रों,प. बंगाल की मुख्यमंत्री का आँख मूंदकर मानना है कि मालदा में ढाई लाख मुसलमानों द्वारा हिंदुओं की संपत्ति के साथ की गई तोड़-फोड़ को सांप्रदायिक हिंसा नहीं कहा जाना चाहिए। तो फिर क्या कहा जाना चाहिए,धर्मनिरपेक्ष हिंसा??? हिंदुओं को जो नुकसान हुआ क्या वो नुकसान नहीं था,हिंदुओं ने जो खून-पसीना बहाकर धन कमाया क्या वो खून-पसीना खून-पसीना नहीं था? दादरी या कहीं भी एक मुसलमान की हत्या हो जाए तो वह धर्मनिरपेक्षता की हत्या होती है क्योंकि मुसलमान तो धर्मनिरपेक्ष होते हैं न। आज पूरी दुनिया मुसलमानों से परेशान है,जेहादी या फसादी हिंसा से परेशान है। अगर मुसलमान धर्मनिरपेक्ष होते तो ऐसा क्यों होता?? हम हिंदू गलत हो सकते हैं लेकिन क्या पूरी दुनिया के अन्य धर्मावलंबी भी गलत हैं? पूरी दुनिया गलत है? क्या एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में तलवार लेकर पूरी दुनिया में हिंसा का तूफान पैदा कर देना धर्मनिरपेक्षता है?? हमारे यहाँ कहावत है कि मरा घोड़ा घास नहीं खाता लेकिन कई मुसलमान मानते हैं कि वे निर्दोषों को मारने के क्रम में मरने के बाद स्वर्ग जाएंगे जहाँ उनको सुंदर लड़कों-लड़कियों के साथ सेक्स का आनंद लेने का अवसर मिलेगा। कई युवक तो यौनांगों पर लौह-कवच लगाकर मरना पसंद करते हैं। कितना मूर्खतापूर्ण विश्वास है!!! मरने के बाद क्या होता है किसने देखा है या जाना है? आप कहेंगे कि हिंदू भी तो मृत्योपरांत जीवन की बात करते हैं। जरूर करते हैं पुनर्जन्म की भी और स्वर्ग-नरक की भी। लेकिन सर्वोपरि हिंदू ग्रंथ गीता कहती है कि जैसा करोगे वैसा जरूर भरोगे और इसी जन्म में भरोगे। अगला जन्म भी होगा लेकिन वह जन्म आत्मा का होगा शरीर का नहीं इसलिए स्वर्ग में हूर या गिलमा मिलने का तो सवाल ही नहीं।
मित्रों,सांप्रदायिक हिंदुओं के ग्रंथ कहते हैं कि परोपकार से बड़ा कोई पुण्य नहीं है और परपीड़ा से बड़ा कोई पाप नहीं। हमारा कोई भी ग्रंथ यह नहीं कहता कि जो तुम्हारे धर्म को नहीं माने उसका गला रेत दो,उनकी स्त्रियों के साथ सामूहिक, नारकीय बलात्कार करो,उनको बेच दो और उनका मांस पकाकर खा जाओ। जो तुमसे भिन्न मत रखे उसे तड़पा-तड़पाकर मार डालो या जबरन हिंदू बना लो बल्कि वह तो कहता है कि मुंडे-मुंडे मति भिन्नाः।
मित्रों,अगर कोई धर्मग्रंथ या धर्म इस तरह के घोर पैशाचिक कुकर्मों का समर्थन करता है तो वह ईसानों का नहीं पिशाचों का धर्मग्रंथ है,धर्म है और उसको बदल देना चाहिए या फिर मिटा देना चाहिए। अमेरिका में तो इस बार का राष्ट्रपति चुनाव ही इस्लाम और इस्लामिक कट्टरता के मुद्दे पर होने जा रहा है। शायद ऐसा इसलिए क्योंकि बहुसंख्यक अमेरिकी जो ईसाई हैं एकजुट होकर मतदान करते हैं और उनके लिए देशहित ही सर्वोपरि है जाति-पाति या साईकिल राशि या छात्रवृत्ति या आरक्षण नहीं। कहने का तात्पर्य यह कि जबतक हिंदू बँटे रहेंगे तबतक क्षुद्र स्वार्थी नेताओं की नजरों में सांप्रदायिक बने रहेंगे और जिस दिन एकजुट हो जाएंगे उसी दिन से वे ममता-लालू-नीतीश-सोनिया-माया-मुलायम आदि के लिए धर्मनिरपेक्ष हो जाएंगे। तब कोई ममता बनर्जी हिंदू होते हुए भी निर्मम होकर यह नहीं कह सकेगी कि मालदा की हिंसा सांप्रदायिक हिंसा नहीं थी या लालू यादव यह नहीं कहेंगे गोधरा में ट्रेन में आग खुद कारसेवकों ने ही लगाई थी। उसी दिन से भारत में मुस्लिम तुष्टिकरण की राष्ट्रविरोधी,विनाशक नीति का अंत हो जाएगा और हमारे छद्म धर्मनिरपेक्ष नेता प्रत्येक समस्या और हर तरह की हिंसा का विश्लेषण भी सिर्फ और सिर्फ गुण-दोष के आधार पर करने लगेंगे। तब कोई नहीं कहेगा कि धर्मनिरपेक्ष हिंसा हिंसा न भवति बल्कि सब कहेंगे कि प्रत्येक हिंसा हिंसा भवति।

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

लालू-नीतीश का रणनीतिकार ब्राह्मण क्यों?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आज प्रशांत किशोर को कौन नहीं जानता? वे किसी परिचय के मोहताज नहीं है। वह एक ऐसी शख्सियत के रूप में उभरे हैं जिसका चुनावी रणनीति बनाने में कोई जवाब नहीं है।  जब प्रशांत ने मोदी के अभियान का नेतृत्व किया तब किसी को भी आश्चर्य नहीं हुआ लेकिन जब लालू-नीतीश ने उनको अपनी नैया का खेवनहार बनाया तो वह जरूर आश्चर्यचकित कर देनेवाला निर्णय था। आश्चर्यचकित कर देनेवाला इसलिए क्योंकि लालू-नीतीश हमेशा से ब्राह्मणविरोधी आरक्षणवादी व्यवस्था के कट्टर समर्थक रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि उन्होंने क्यों और कैसे एक ब्राह्मण प्रशांत किशोर को अपना रणनीतिकार बनाया।
मित्रों,जब इनलोगों को डॉक्टर बनाना होता है तो वे 100 में से 90 अंक लानेवाले डॉक्टर की जगह 10 नंबर लानेवाले को डॉक्टर बनाते हैं,गांवों में प्रतिभावान  पढ़े-लिखे नेतृत्व की जगह अंगूठाछाप को मुखिया-सरपंच बनाते हैं तो इनको अपना रणनीतिकार बनाने में भी तो आरक्षण लागू करना चाहिए था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि तब सवाल राज्य या पंचायत के विकास का नहीं था बल्कि अपनी कुर्सी का था,अपने भविष्य का था इसलिए किसी भी तरह का जोखिम नहीं लिया जा सकता था। इसलिए इनलोगों ने सर्वश्रेष्ठ दिमागवाले,प्रतिभावाले को अपनी रणनीति बनाने का भार सौंपा। मुझे पूरा यकीन है कि चाहे लालू-नीतीश हों या मुलायम-माया जब ये लोग बीमार होंगे तो ये सर्वश्रेष्ठ डॉक्टर के पास ही जाएंगे फिर वो डॉक्टर किसी वैसी जाति से ही क्यों न आता हो जिनको वे जीवनभर गालियाँ देते रहे हों। तब ये लोग 100 में से 10 अंक पाकर प्रवेश परीक्षा में जाति के बल पर सफल घोषित होनेवाले से अपना ईलाज हरगिज नहीं करवाएंगे बल्कि तब इनको 100 में से 91 अंक लानेवाले के पास ही जाएंगे फिर भले ही वो क्यों न तिलक,तराजू और तलवार या भूराबाल वाली जातियों से आते हों। माया ने तो पिछले दो चुनावों से अपना नारा भी बदल दिया है-ब्राह्मण शंख बचाएगा,हाथी बढ़ता जाएगा। बहनजी, 5 साल पहले तक आपके करकमलों से जूते खानेवाला ब्राह्मण क्यों शंख बजाएगा?
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि न कथित समाजवादी और कथित मनुवाद-विरोधी नेताओं का न तो कोई सिद्धांत है और न ही कोई मूल्य। इनको तो बस किसी भी तरह से चुनाव जीतना है। ये लोग जब राज्य का सवाल आएगा तब तो प्रतिभा की जगह वोटबैंक को प्राथमिकता देंगे,दूसरों की हजामत होनी हो तो बंदर के हाथ भी उस्तरा पकड़ा देंगे लेकिन जब सवाल खुद अपने भविष्य या अपनी जान का आएगा तब ये लोग किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेंगे और सर्वश्रेष्ठ को ही अपना सहायक या खेवनहार बनाएंगे। यहाँ मेरे कहने यह तात्पर्य नहीं है कि पिछड़ी जातियों या दलित-आदिवासियों में कोई प्रतिभावान है ही नहीं। मेरा उद्देश्य तो इन घनघोर जातिवादी नेताओं के दोहरे मापदंड यानि अपने लिए कुछ और राज्य के मामले में कुछ और की पोल खोलना मात्र है।

रविवार, 3 जनवरी 2016

राजगीर पे करम सही मगर वैशाली पे सितम क्यों?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,किसी को भी पता नहीं है कि बिहार सरकार का पर्यटन के लिए रोडमैप क्या है। अगर तनिक गौर से भी देखा जाए तो हम पाएंगे कि बिहार की वर्तमान सरकार के लिए राजगीर और नालंदा ही पर्यटन की दृष्टि से सबकुछ है। अगर हम यह कहें कि नालंदा जिला ही नीतीश कुमार के लिए पूरा बिहार है तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।
मित्रों,कोई भी नेता या सीएम पहली प्राथमिकता अपने इलाके को देता है इसलिए अगर नीतीश कुमार भी ऐसा करते हैं तो जरूर करें लेकिन न जाने क्यों वे बिहार के दूसरे सबसे महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल वैशाली से नाराज दिखते हैं। राजगीर तो वे बार-बार जाते हैं,टमटम की सवारी करते हैं,वहाँ नौका विहार भी करते हैं लेकिन कभी वैशाली के लिए वक्त नहीं निकालते। यहाँ तक कि वैशाली महोत्सव के उद्घाटन में भी नहीं आते। अभी वैशाली के जिला मुख्यालय हाजीपुर से सटे दुनिया के सबसे बड़े मेले सोनपुर मेले का समापन हुआ है नीतीश जी इसके उद्घाटन में तो नहीं ही आते हैं मेला घूमने भी नहीं आते। हम बराबर अखबार में पढ़ते हैं कि राजगीर में यह बन रहा है या यह बन चुका है लेकिन वैशाली में? इतिहास साक्षी है कि भगवान बुद्ध को वैशाली भी कम प्रिय नहीं थी फिर यह नीतीश कुमार जी और उनकी सरकार को अप्रिय क्यों है?
मित्रों,हद तो तब हो जाती है जब हम पाते हैं कि विगत कई वर्षों से बिहार सरकार जैनियों के अंतिम तीर्थंकर महावीर का जन्मोत्सव वैशाली के बाहर मगध के किसी स्थान पर मनाने लगी है। यह तो बहुत पहले ही सिद्ध हो चुका है और इतिहासकारों में निर्विवादित तथ्य भी है कि महावीर का जन्म वैशाली के लिच्छवी गणतंत्र के राजपरिवार में हुआ था। यह भी निर्विवादित तथ्य है कि लिच्छवी गणतंत्र गंगा के उत्तर में स्थित था फिर पिछले कुछ वर्षों में महावीर गंगा के दक्षिण मगध या अंग क्षेत्र में कैसे पैदा होने लगे हैं समझ में नहीं आता। क्या गंगा के दक्षिण दक्षिण बिहार में महावीर जन्मोत्सव मनाना वैशाली के खिलाफ कोई सरकारी साजिश है? यह सही है कि महावीर ने नालंदा जिले के पावापुरी में अपने प्राण त्यागे थे लेकिन जन्म तो उन्होंने वैशाली में ही लिया था और जैन और बौद्ध धर्मग्रंथ भी तो ऐसा ही मानते हैं। अगर बिहार सरकार या नीतीश कुमार के मन में वैशाली के खिलाफ कोई साजिश चल रही है तो बिहार के हित में उस पर तत्काल प्रभाव से रोक लगनी चाहिए। वैसे इतिहास साक्षी है कि नीतीश जी के मगध और हमारी वैशाली के बीच लंबे समय तक शत्रुता चलती रही लेकिन उसे समाप्त हुए तो हजारों साल बीत चुके हैं।
मित्रों,अब थोड़ी बात कर लेते हैं बिहार की बिगड़ती कानून-व्यवस्था पर। पिछले दिनों मुख्यमंत्री बिहार जो गृह मंत्री भी हैं ने राजधानी पटना में लगातार कई दिनों तक राज्य के वरीय पुलिस अधिकारियों के साथ मीटिंग की। एक मीटिंग से तो उन्होंने कई अधिकारियों को उसी तरह बाहर निकाल दिया जैसे कि अयोग्य शिक्षक कक्षाओं से शरारती बच्चों को निकाल देते हैं। यहाँ तात्पर्य उन शिक्षकों से है जिनको पढ़ाना तो आता नहीं सिर्फ अनुशासन का डंडा फटकारना आता है। कदाचित् नीतीश जी भी बिहार की कानून-व्यवस्था के मामले में कुछ इसी तरह का आडंबरपूर्ण रवैया अख्तियार किए हुए हैं। सारे योग्य अधिकारियों को तो उन्होंने संटिंग में डाल रखा है और जमकर ट्रांस्फर और पोस्टिंग के नाम पर पैसा भी बना रहे हैं। उनकी जिद है कि हम गदहों से ही घोड़ों का काम लेंगे। दूसरी तरफ उनके बड़े भाई लालू प्रसाद जी प्रसिद्ध पुलिस अधिकारी अभयानंद के पीछे पड़े हुए हैं जबकि यह बात किसी से भी छिपी हुई नहीं है कि नीतीश कुमार के सीएम बनने के बाद अभयानंद जी के फार्मूले पर चलने से ही बिहार की कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ था। यह बात भी किसी से छिपी हुई नहीं है कि लालू जी को अपने एकछत्र राज के समय से ही अभयानंद,डीएन गौतम और किशोर कुणाल जैसे वर्तमान और अवकाशप्राप्त जिद्दी, ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ अधिकारियों से चिढ़ है।
मित्रों,ऐसे में सोंचना नीतीश जी को है कि वे बिहार को किस बिहार मॉडल से चलाना चाहते हैं-अपने मॉडल से जिस पर उन्होंने शासन संभालने के आरंभिक वर्षों में अमल किया था या फिर लालू जी के मॉडल से जिस पर चलकर कोई दशकों तक लगातार किसी राज्य को बर्बाद करते हुए भी सत्ता में बना रह सकता है।

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

बिहार अपहरण औद्योगिक क्षेत्र में आपका स्वागत है


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह।
वैधानिक चेतावनी:यह रचना कदापि एक व्यंग्य नहीं है।
मित्रों,आपने अबतक विभिन्न शहरों के औद्योगिक क्षेत्रों के नाम सुने होंगे। उनमें से कईयों में इस तरह के बोर्ड भी पढ़े होंगे कि हाजीपुर,बक्सर,पटना,मुजफ्फरपुर,वाराणसी,इंदौर,नोएडा,गाजियाबाद आदि औद्योगिक क्षेत्रों में आपका स्वागत है। मगर आपने आजतक किसी अपहरण औद्योगिक क्षेत्र का नाम नहीं सुना होगा,बोर्ड पढ़ने की बात तो दूर रही। पढ़िएगा भी कैसे यह उद्योग तो सिर्फ बिहार में पाया जाता है या फिर आईएसआईएस के ईलाके में। बिहार में भी सौभाग्यवश इसके फलने-फूलने लायक मौसम 10 साल के लंबे इंतजार के बाद आया है।
मित्रों,बिहार के हर जिले में फिर से यानि पूर्ववर्ती लालू-राबड़ी सरकार की तरह फिर से इस उद्योग की वृद्धि-दर सबसे तेज हो गई है। शायद 100 या 200 प्रतिशत की वृद्धि-दर। दुर्भाग्यवश बिहार सरकार के आंकड़ों में इस उद्योग का कहीं भी उल्लेख नहीं होता। बिहार के प्रत्येक जिले और शहर में एक बार फिर से अपहरण कंपनियाँ स्थापित हो गई हैं जिनका एक सीईओ होता है और कई दर्जन निदेशक। पहले फोन या मैसेज कर पार्टी से पैसे मांगे जाते हैं। फिर घर पर गोली चलाई जाती है या बम फेंका जाता है। अगर अपहरण करना संभव नहीं हुआ तो पार्टी को सीधे यमपुरी की सैर करवा दी जाती है वैसे ही जैसे कल-परसों दरभंगा में एक पथ निर्माण कंपनी के दो इंजीनियरों को करवा दी गई।
मित्रों,इस उद्योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पूंजी न के बराबर लगती है। मशीन के नाम पर खर्च बहुत मामूली। बस कुछेक बंदूकों,पिस्तौलों,गाड़ियों,मोबाइलों और बमों का इंतजाम करना होता है। अगर आप एक विशेष सत्तारूढ़ जाति से हुए तो पुलिस का भी डर नहीं क्योंकि आपकी जाति का कोई-न-कोई नेता थोड़े-से पैसों के बदले आपकी मदद कर देगा। कभी-कभी तो एक कंपनी को माल (अपहृत) अपने पास रखने में खतरा लगे तो वो दूसरी कंपनी के हाथों उसे बेच भी देती है। कई बार पुलिस को भी सीधे तौर पर कारोबार में साझीदार बना लिया जाता है।
मित्रों,जैसे प्रत्येक उद्योग के कई सहायक उद्योग होते हैं वैसे इस महान उद्योग के भी हैं। इसका सबसे बड़ा सहायक उद्योग है-कुटीर कट्टा और बम निर्णाण उद्योग। इस उद्योग के विकास में कई बाधाएँ भी हैं। सबसे बड़ी बाधा है प्रशिक्षित लोगों का अभाव। इसे दूर करने के लिए सरकार को चाहिए कि वो राज्य के हर प्रखंड में प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने जहाँ गोलियाँ चलाने और उत्तम स्तर के देसी कट्टा बनाने और शालीनतापूर्वक अपहरण करने की ट्रेनिंग दी जाए। शालीनतापूर्वक अपहरण करने का सबसे बड़ा लाभ होगा कि दूसरे राज्यों और देशों के लोग भी बार-बार अपना अपहरण करवाने के लिए बिहार की यात्रा पर आएंगे जिससे पर्यटन को भारी बढ़ावा मिलेगा। इस उद्योग की तीव्र अभिवृद्धि में दूसरी सबसे बड़ी बाधा है बिजली। इसके लिए लालू-राबड़ी राज के बाद निष्क्रिय अवस्था में पड़े तरकट्टी गिरोह को सक्रिय करना होगा। वैसे भी अभी जाड़े का समय है जो तरकट्टी के लिए बहुत-ही माफिक है।
मित्रों,वैशाली जिले में इस उद्योग के महान पूर्व इतिहास को देखते हुए हम बिहार सरकार से विनती करेंगे कि राघोपुर में पक्का नदी पुल के निर्माण को अनंतकाल के लिए स्थगित कर दिया जाए। पिछले अनुभव से पता चलता है कि पीपा-पुल बनने से राघोपुर प्रखंड में गांजे की खेती को गहरा धक्का लगा।
मित्रों,इस समय इस महान् ऐतिहासिक उद्योग के पक्ष में सबसे अच्छी बात जो जा रही है वह यह है कि पिछले सालों में पैसे लेकर सरकार द्वारा पोस्टिंग करने के चलते राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति लगातार गिरती ही जा रही है। उदाहरणार्थ,पिछले साल वैशाली जिले के चांदपुरा ओपी थाने के खोरमपुर में मुन्ना सिंह नामक अति गरीब की हत्या हुई। हत्यारा धनवान था इसलिए पैसे लेकर गरीबों की सरकार की पुलिस कुछ इस तरह सोई कि आज तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। इसी तरह हाजीपुर नगर थाने के लोदीपुर चकवारा में दस दिन पहले राकेश नामक टेंपो चालक को मलद्वार में लाठी घुसाकर,हाथों में कीलें ठोंककर,करंट लगाकर पड़ोसी धनपतियों द्वारा मार दिया गया लेकिन सौभाग्यवश इस मामले में भी अभी तक गरीबों की सरकार की पुलिस ने कोई गिरफ्तारी नहीं की है और आगे भी ऐसा होने की कोई उम्मीद नहीं है।
मित्रों,मैं चाहता तो था कि इस आलेख को परिणति तक पहुँचाऊँ लेकिन मैं भी इंसान ही हूँ। स्वाभाविक है कि मुझे डर भी लगता है। आपसे भी एक विनती है कि किसी को भी नहीं बताईएगा कि मैंने अपहरण-उद्योग के महिमामंडम में कुछ लिखा है वरना खुद मेरा अपहरण होने का खतरा बढ़ जाएगा। वो क्या है कि इस उद्योग से जुड़े लोग विचित्र हैं विपक्ष में लिखनेवालों पर तो अपना गुस्सा उतारते ही हैं पक्ष में लिखनेवालों को भी नहीं छोड़ते क्योंकि ऐसे लेखों को वे गलती से व्यंग्य समझ लेते हैं भले ही हम कितनी ही वैधानिक चेतावनी क्यों न दे दें।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

मैला आँचल का दुलारचंद कापरा और राहुल-सोनिया

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आपने हिंदी फिल्मों में बहुत से ऐसे खलनायक-पुत्र देखे होंगे जो पुलिस में कार्यरत हीरो से कहते हैं कि मैं नहीं डरता तुम्हारे कायदे-कानून से क्योंकि मेरे पास बहस करने के लिए वकीलों की फौज है और जजों को खरीदने के लिए अफरात पैसा।
मित्रों,मुझे नहीं पता कि कांग्रेस उपाध्यक्ष नेहरू-गांधी परिवार के चश्मोचिराग राहुल गांधी के पास कितने पालतू अधिवक्ता हैं और उनके खानदानी खजाने में कितना पैसा है लेकिन उनकी भाषा और उनकी अकड़ जरूर वही है और वैसी ही है जैसी कि हिंदी फिल्मों के खलनायकों के बेटों में होती है।
मित्रों,राहुल जी की माँ अक्सर भाजपा पर यह आरोप लगाती हैं कि भारतीय जनता पार्टी के लोग देश की आजादी के लिए जेल नहीं गए। मैं सोनिया जी को उनके राजवंश के संस्थापक पं. जवाहर लाल नेहरू जी का एक प्रसंग सुनाना चाहूंगा जो मैंने प्रकाशन विभाग द्वारा कांग्रेस शासन में प्रकाशित किसी पुस्तक में पढ़ा था। हुआ यह कि नेहरू जी को किसी आंदोलन में भाग लेने के कारण जेल भेजा गया। जेलर अंग्रेज था और बला का जालिम भी।  वो आटे में मिट्टी मिलाकर रोटियाँ बनवाता और स्वतंत्रता-सेनानियों को खाने को देता।
मित्रों,जवाहर लाल जी ठहरे खानदानी रईस सो उनसे मिट्टी मिली रोटी खाई नहीं गई और पहुँच गए जेलर के पास शिकायत लेकर। जेलर ने कहा कि खुद को स्वतंत्रता-सेनानी कहते हो और देश की मिट्टी नहीं खा सकते?  तब नेहरू जी ने खूबसूरती से जवाब दिया था कि हम यहाँ देश की मिट्टी को आजाद कराने के लिए आए हैं न कि देश की मिट्टी को खाने के लिए। लेकिन तब नेहरू जी को यह पता नहीं था कि उनके वंशज देश की मिट्टी तो क्या देश का कोयला और हवा में तैरते तरंगों तक को खा जाएंगे।
मित्रों,मैं सोनिया जी को एक और कथा भी सुनाना चाहूंगा। प्रसंग प्रख्यात समाजवादी विचारक और कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु के विश्वप्रसिद्ध उपन्यास मैला आँचल से है। पृ.सं. 294,राजपाल प्रकाशन,आठवीं आवृत्ति:2003। कांग्रेस का सच्चा कार्यकर्ता,वास्तविक गांधी भक्त और स्वतंत्रता सेनानी बावनदास आजादी मिलने के बाद कांग्रेस के बदले हुए चरित्र से काफी परेशान है। वो परेशान है कि "कटना के दुलारचंद कापरा,वही जुआ कंपनीवाला,जिसकी जूए की दुकान पर नेवीलाल,भोलाबाबू और बावन ने फारबिसगंज मेला में पिकटिन किया था। जूआ भी नहीं,एकदम पाकिटकाट खेला करता था और मोरंगिया लड़कियों,मोरंगिया दारू-गाँजा का कारबार करता था। ...आज कटहा थाना काँग्रेस का सिकरेटरी है! .....उसी की गाड़ियाँ हैं।" उधर गाँव-ईलाके के लोग गांधीजी की हत्या के बाद उनके श्राद्ध का भोज आयोजित करने में तल्लीन हैं और ईधर महान कांग्रेसी दुलारचंद कापरा तस्करी का माल बोर्डर पार पहुँचाने की फिराक में है। पूरा प्रशासन उसकी मदद कर रहा है और बावन अंगुल का बावनदास खड़ा है उसकी गाड़ियों के काफिले के आगे उसका रास्ता रोककर। वो उसे याद दिलाता है कि कापरा जी आप भी तो कांग्रेसी ही हैं फिर भी वो नहीं सुनता और बावनदास पर गाड़ी चढ़ा देता है। ठीक गांधी जी के श्राद्ध के दिन उनके अनन्य भक्त की हत्या कर दी जाती है और वो भी नए-नवेले कांग्रेसी के हाथों।
मित्रों,यह हत्या बावनदास की हत्या नहीं थी बल्कि कांग्रेस पार्टी की हत्या थी,कांग्रेस के आदर्शों की हत्या थी। महान साहित्यकार फणीश्वर नाथ रेणु तो कांग्रेस के बदले हुए चरित्र को सन् 1954 ई. में ही समझ गए थे लेकिन आश्चर्य है कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी इसे आज तक नहीं समझ पाए हैं। हमारे बिहार में एक कहावत है कि जिसकी आँखों में ढेढर हो उसी को वो दिखाई नहीं देता है।
मित्रों,मैं ताल ठोंककर कहता हूँ कि कांग्रेस को मोदी तो क्या किसी से भी डरने की जरुरत नहीं है। यह विडंबना है कि सन् 1954 ई. में तो दुलारचंद कापरा कांग्रेस का छोटा-मोटा पदाधिकारी ही बना था लेकिन आज तो वो पार्टी का आलाकमान बन चुका है। कांग्रेस को डरना है कि खुद से डरे,खुद अपने चरित्र से डरे। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोई डरने-डराने की वस्तु नहीं है जिनसे कोई डरे। राहुल जी को चाहिए कि वे अपनी पार्टी के चाल,चरित्र और चेहरे को बदलें और अपने मन में विचारें कि उनकी पार्टी आजादी के पहले क्या थी और आज क्या हो गई है। जिस पार्टी के नेतृत्व में कभी भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी गई थी वही पार्टी आज भारत के सबसे बड़े शत्रु पाकिस्तान के हाथों का मोहरा या खिलौना बन गई है। देश को बताएँ कि खुर्शीद और अय्यर ने अभी हाल ही में पाकिस्तान जाकर क्या-क्या किया है और क्या-क्या बोला है। डरना है तो अपने मन के आईने से डरें राहुल जिसमें उनको अपना और अपनी पार्टी का वास्तविक चेहरा दिखाई देगा,अपनी अंतरात्मा से डरें जो उनको रात-दिन धिक्कारेगी। मगर इसके लिए तो मन की आँखें भी चाहिए,अन्तरात्मा चाहिए जो कदाचित् उनके पास है ही नहीं। हो सके तो अपनी माँ को भी समझाएँ कि माँ किसी संस्था की महानता के लिए सिर्फ स्वर्णिम इतिहास ही काफी नहीं होता बल्कि उससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है निष्कलंक वर्तमान।

रविवार, 15 नवंबर 2015

मोदी सरकार क्या करे क्या न करे

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,एक कहावत है छोटा मुँह बड़ी बात। लेकिन अपना तो स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि हम हमेशा अपने छोटे से मुँह से बड़ी-2 बातें करते रहते हैं। अब जो व्यक्ति इस देश को चला रहा है और दुनियाभर में जिसकी धूम है उसको हम सलाह दें तो जाहिर है ऐसा करना गुस्ताखी ही होगी। लेकिन करें तो क्या करें हमसे देश की बर्बादी नहीं देखी जाती इसलिए एक और गुनाह कर ही डालते हैं। हमारा जो कर्त्तव्य है सो कर लेते हैं बाँकी जानें मोदी जी कि वे हमारी बातों को मानते हैं या नहीं।
मित्रों,हमने मोदी सरकार के गठन के तत्काल बाद ही अपने एक आलेख द्वारा कहा था कि मंत्रिमंडल गठन में कई कमियाँ रह गई हैं। कई अयोग्य और दागी चेहरे भी मंत्री बना दिए गए हैं। यह चाहे सही भी हो कि सचिवों के माध्यम से अच्छा शासन दिया जा सकता है लेकिन जनता के बीच तो मंत्री ही जाएगा। फिर भारत के मतदाताओं का जो चरित्र है उसमें कोई एक व्यक्ति कभी भी सवा अरब लोगों को अकेला प्रभावित नहीं कर सकता।
मित्रों,बिहार के चुनावों ने यह भी साबित कर दिया है कि स्थानीय लोकप्रिय चेहरों का अपना महत्त्व होता है।  लोग मोदी जी रैली में भले ही भारी संख्या में उमड़ें लेकिन वोट तो वे उसी को और उसी के कहने पर देते हैं जिनके साथ वे सहजता से अपनत्त्व स्थापित कर पाते हैं। इसलिए मोदी जी और भाजपा को चाहिए कि सामूहिक नेतृत्व की जिद छोड़कर स्थानीय क्षत्रपों के विकास पर भी ध्यान दें और उनको पनपने के लिए उचित अवसर दें। फिर चाहे पश्चिम बंगाल हो या उत्तर प्रदेश एक सर्वसम्मत तेज-तर्रार ईमानदार चेहरे को चुन लिया जाए और उसके नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाए।
मित्रों,हमने बिहार और दिल्ली के चुनावों में देखा कि एक छोटी सी गलती भी कड़े परिश्रम का बंटाधार कर सकती है। क्या आवश्यकता थी लोकसभा चुनावों के बाद प्रशांत किशोर को अलग करने की। मैं यह नहीं कहता कि जो काम प्रशांत किशोर ने बिहार में किया वह केवल वही कर सकते थे। भारत में तेज-तर्रार लोगों की कोई कमी नहीं है। फिर जनसंपर्क कोई ऐसा काम नहीं है जो सिर्फ चुनावों के समय ही करणीय हो। यह तो सतत चलनेवाली प्रक्रिया है। मोदी जी को चाहिए कि 500-1000 ऐसे लोगों की टीम हर समय उनके लिए काम करती रहे जैसे लोगों की टीम प्रशांत किशोर चलाते हैं। देखा गया है कि कई बार पीएम किसी घटना या बयान पर प्रतिक्रिया देने में काफी विलंब कर देते हैं। अगर ऐसी टीम सक्रिय रहेगी तो उनकी ओर से जवाब दे दिया करेगी जिससे देरी होने से होनेवाला नुकसान नहीं हो पाएगा। उदाहरण के लिए मोदी सरकार को बार-2 जोर-शोर से बताना चाहिए था कि सरकार कालाधन विदेशों से लाने की दिशा में काम कर रही है।
मित्रों,काफी दिनों से हम देख रहे हैं कि मोदी जी जब भाषण देते हैं तो इंटरनेट पर वह अक्षरशः उपलब्ध नहीं हो पाता जबकि पहले ऐसा नहीं था। पहले ऑडियो-वीडियो और टेक्स्ट फॉरमेट में उनकी वक्तृता आसानी से उपलब्ध होती थी फिर चाहे वह भाषण विदेशों में ही क्यों न दिया गया हो। अच्छा हो कि इसकी व्यवस्था फिर से की जाए। मुझे ऐसा भी लग रहा है कि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के रूप में अकबरूद्दीन विकास स्वरूप से बेहतर थे और उनके पास संवाद-क्षमता ज्यादा थी। वे तात्कालिक रूप से विदेश दौरों की तस्वीरें और घटनाक्रम को ट्विट करते रहते हैं जो विकास जी नहीं कर पा रहे हैं। 
मित्रों,पिछले कुछ महीनों में भाजपा नेताओं में बकवास करने की एक होड़-सी लगी दिखती है। हमने पीएम को भी मुजफ्फरपुर की रैली के बाद एक आलेख के माध्यम से चेताया था कि उनको डीएनए वाला बयान नहीं देना चाहिए था। गिरिराज सिंह,साक्षी महाराज,आदित्यनाथ आदि तो बराबर बेवजह के बयान दे ही रहे हैं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी इस मामले में किसी से पीछे नहीं हैं। बिहार चुनावों के समय उनका पाकिस्तान वाला बयान जब हमने टीवी पर लाईव देखा तो हमें खुशी नहीं हुई थी बल्कि रंज हुआ था। अभी कल ही उन्होंने चित्रकूट में जो 60 साल वाला बयान दिया है उसकी कोई आवश्यकता थी क्या? मोदी जी तो खुद ही 65 साल के हैं तो क्या श्री शाह उनको भी रिटायर करना चाहते हैं? इसी तरह शाह द्वारा मोदी जी के कालाधन संबंधी बयान को सीधे-सीधे चुनावी जुमला बताना भी सही नहीं था और इसको विपक्ष ने बड़ा मुद्दा बना दिया जिससे जनता के मन में मोदी जी द्वारा किए जा रहे वायदों को लेकर संशय की स्थिति उत्पन्न हो गई। श्री शाह या स्वयं गोदी जी चाहिए था कि वे बताते कि हमने ऐसा कभी नहीं कहा कि हम हर व्यक्ति को 15-15 लाख रुपया देंगे। हाँ हमने ऐसा जरूर कहा था कि हम काला धन को वापस लाएंगे और उसका सदुपयोग देश-निर्माण में करेंगे। 30 अक्तूबर को नरेंद्र मोदी बिहार में हिंदू-मुसलमानों को बाँटनेवाली बातें करते हैं और 31 अक्तूबर तो अचानक एकता-अखंडता का राग आलापने लगते हैं जिससे जनता खुश नहीं होती बल्कि भ्रमित होती है।
मित्रों,यह अच्छा हुआ है कि केंद्र ने सुब्रहमण्यम स्वामी का कोर्ट में साथ नहीं दिया। आज फिर से श्री स्वामी दलाई लामा के बयान का खंडन कर एक बेवजह के विवाद को जन्म दे रहे हैं।
मित्रों,श्री स्वामी मानें या न मानें चुनाव परिणामों से यह बार-बार साबित होता रहा है कि हिंदू मन जन्मना उदार होता है। उसको तालिबानी नहीं बनाया जा सकता। अगर ऐसा करने की कोशिश होगी तो भाजपा को बार-बार बिहार जैसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा। फिर जिस चैनल पर शाह जैसे नेता मुसलमानों के खिलाफ बयान देते हैं,मोदी कहते हैं कि हम आरक्षण में धर्म के आधार पर हिस्सा नहीं लगने देंगे उसी चैनल पर जब अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं के लिए ऋण में सब्सिडी का विज्ञापन आता है तो लोग जरूर सोंचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि यह सब क्या है? एक तरफ तो धर्म के आधार पर गरीबों के बीच भेदभाव किया जा रहा है और दूसरी तरफ भेदभाव के खिलाफ बयान भी दिए जा रहे हैं। अच्छा होता कि केंद्र सरकार सभी गरीब बच्चों को एक समान सुविधा देती बिना धार्मिक भेदभाव के या फिर उसके नेता इस तरह के दोहरे मापदंड वाले बयान ही नहीं देते।
मित्रों,कोई माने या न माने बिहार के चुनावों के दौरान अगर किसी एक बयान ने एनडीए का सबसे ज्यादा नुकसान किया तो वो था भागवत जी का आरक्षण-संबंधी बयान। फिर अगर दे ही दिया तो भागवत जी को इसका स्पष्टीकरण दे देना चाहिए था न कि अड़ जाना। मोदी जी संघ को समझा देना होगा कि वो चुनावों के समय बयान देने में सावधानी बरते और अच्छा हो कि अपने को सिर्फ सांस्कृतिक कार्यों तक ही सीमित रखे।
मित्रों,हम देख रहे हैं कि मोदी सरकार ने अब तक लोकपाल की कुर्सी को खाली रखा है। पता नहीं ऐसा क्यों किया जा रहा है लेकिन इसका संदेश जनता के बीच में जरूर गलत जा रहा है कि क्या सरकार कुछ छिपाने की कोशिश कर रही है? अगर पीएम मोदी ताल ठोंककर कह रहे हैं कि उनकी सरकार में एक नये पैसे का भी घोटाला नहीं हुआ है तो फिर भावी लोकपाल से वे भयभीत क्यों हैं? इसलिए जितनी जल्दी हो सके केंद्र में लोकपाल को नियुक्त किया जाना चाहिए। आगे के पश्चिम बंगाल या उत्तर प्रदेश के चुनावों के लिए अगर प्रशांत किशोर एनडीए के लिए काम करने को तैयार हों तो इसके लिए तुरंत प्रयास करना चाहिए अन्यथा उनके जैसे दूसरे रणनीतिकार से संपर्क किया जाना चाहिए। अमित शाह अध्यक्ष के तौर पर फेल हो चुके हैं इसलिए उनको हटाकर राजनाथ सिंह जैसे किसी समझदार व्यक्ति को पार्टी का अध्यक्ष बनाना चाहिए जो न तो बकवास करता हो और न ही बकवास करनेवालों को पसंद ही करता हो। मंत्रिमंडल में भी अविलंब बदलाव किया जाए और योग्य-ईमानदार लोगों को स्थान दिया जाए और अयोग्य लोगों को निकाल-बाहर किया जाए। साथ ही पार्टी में पलते असंतोष को साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल कर दूर किया जाना चाहिए। जो लोग पुचकारने पर भी नहीं मानें पार्टी के खिलाफ बयान देनेवाले ऐसे लोगों को पार्टी से बाहर कर दिया जाए। जब लालू चार सांसदों में से एक पप्पू यादव को बाहर कर सकते हैं तो भाजपा ऐसा क्यों नहीं कर सकती क्योंकि उनके पार्टी विरोधी बयान पार्टी और पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल को कमजोर करते हैं?
मित्रों,मैं पहले भी मोदी सरकार से अर्ज कर चुका हूँ कि वो किसी भी मुद्दे पर यू टर्न नहीं ले। उदाहरण के लिए भूमि-अधिग्रहण के मुद्दे पर सरकार को जो नुकसान होना था वो हो चुका था फिर पल्टी मारने का कोई मतलब नहीं था। सरकार को चाहिए था कि वो संसद का संयुक्त सत्र बुलाकर दृढ़तापूर्वक उसको पारित करवाती। साथ ही सरकार को कुछ इस तरह से काम करना चाहिए कि जनता को उसका काम धरातल पर दिखाई दे क्योंकि हमारी जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो जीडीपी वगैरह का मतलब ही नहीं जानती।
मित्रों,हमने देखा कि भाजपा ने मिस्ड कौल द्वारा करोड़ों लोगों को अपना सदस्य बनाया। तब कहा गया था कि पार्टी कार्यकर्ता मिस्ड कौल सदस्यों से संपर्क करेंगे और उनसे सदस्यता का फार्म भरवाएंगे। लेकिन ऐसा किया नहीं गया जिससे मिस्ड कौल सदस्यों के मन में पार्टी के प्रति गुस्सा उत्पन्न हुआ। पार्टी को चाहिए कि अबसे भी पूरे देश में महाभियान चलाकर मिस्ट कौल सदस्यों से संपर्क कर फार्म भरवाया जाए। इतना ही नहीं समय-2 पर फोन द्वारा उनसे संपर्क किया जाए,शुभकामनाएँ दी जाए और स्थानीय स्तर पर उनकी बैठक आयोजित की जाए जिसमें वे पार्टी के लिए परामर्श दे सकें। साथ ही उनको पार्टी की तरफ से टास्क दिया जाए।
मित्रों,गाय को लेकर इन दिनों भारी विवाद चल रहा है। कुछ लोग तो स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त गायों के चमड़े से भी चप्पलादि बनाने पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं। ऐसा करना उचित नहीं होगा। सरकार को चाहिए कि पूरे भारत में गोवध पर रोक लगा दे। कोई अगर गोवध करता हुआ पकड़ा जाए तो उसको कानून के अनुसार सजा दी जाए न कि भीड़ को पीट-पीटकर उसकी हत्या कर देने की छूट दे दी जाए। गोतस्करों के खिलाफ कड़ाई से पेश आना तो आवश्यक है ही साथ ही ऐसी गाएँ जो अब दुधारू नहीं रह गई हैं के पालन-पोषण की भी व्यवस्था की जाए। महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का महिमामंडन तुरंत बंद होना चाहिए क्योंकि भारत का जनमत इसको अच्छा घटनाक्रम नहीं मानेगा और पार्टी को इसका नुकसान ही उठाना पड़ेगा।
मित्रों,बिहार के चुनावों में टिकट बाँटने के समय हमने देखा कि पार्टी ने टिकट बाँटा नहीं बेच दिया। इस तरह के कृत्य शर्मनाक हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं को टिकट वितरण में तरजीह दी जानी चाहिए। साथ ही हर विधानसभा का अलग-अलग बारीकी से विश्लेषण करना चाहिए। कौन टिकटाकांक्षी कितना लोकप्रिय है का गुप्त सर्वेक्षण भी करवाना चाहिए। मतदाताओं से घर-घर जाकर संपर्क करना चाहिए और उनकी समस्याएँ क्या हैं,आकाक्षाएँ क्या है का विस्तृत डाटाबेस बनाना चाहिए। अंत में उनके आधार पर ही पार्टी का घोषणापत्र तैयार किया जाना चाहिए। हो सके तो हर विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र के लिए अलग-2 घोषणापत्र बनाया जाना चाहिए और चुनाव जीतने के बाद उसको लागू भी किया जाना चाहिए।
मित्रों,धारा 370 को हटाने और समान नागरिक संहिता को लागू करना जरूरी तो है लेकिन अभी सरकार के पास ऐसा करने के लिए पर्याप्त बहुमत नहीं है इसलिए इनको ठंडे बस्ते में ही पड़ा रहने देना चाहिए। जहाँ तक राम मंदिर बनाने का सवाल है तो कोर्ट के निर्णय का इंतजार किया जाना चाहिए। वैसे भी राम को कंकड़-पत्थर के भवनों में नहीं अपने हृदय में बसाने की आवश्यकता है। अगर सबके मन-आत्मा में राम के आदर्शों को बसा दिया जाए तो भौतिक मंदिर की जरुरत ही कहाँ रह जाएगी और अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो मंदिर बनाकर भी कौन-सा अलौकिक लाभ हो जाएगा? जय श्रीराम।

सोमवार, 9 नवंबर 2015

बिहार ने चुना विनाश का पथ,विकासवाद को मारी ठोकर

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बिहार के विधानसभा चुनावों के परिणाम अप्रत्याशित रहे हैं। लोग समझ रहे थे कि 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह ही बिहार इन चुनावों में भी विकासवाद को चुनेगा और जातिवादी विनाशवाद को हमेशा के लिए लात मार देगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बिहार में 15 साल बाद एक बार फिर से लुम्पेन राजनीति के प्रतीक लालू प्रसाद यादव की पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। ऐसा क्यों हुआ,कैसे हुआ और आगे इसके दुष्परिणाम क्या होंगे?
मित्रों,यह तो 2014 के लोकसभा चुनावों के समय से ही स्पष्ट था कि लालू के साथ 18,नीतीश के साथ 18 और कांग्रेस के साथ 9 प्रतिशत वोट बैंक है। चूँकि तब तीनों अलग-अलग लड़े थे इसलिए उनको हराने में भाजपा को ज्यादा मुश्किल नहीं हुई लेकिन इस बार तीनों एकसाथ थे और पूरी ताकत के साथ एकसाथ थे। उन्होंने इस चुनाव में भी कुल मिलाकर 42 प्रतिशत ही वोट प्राप्त किया है जो उनके द्वारा 2014 के लोकसभा चुनावों में प्राप्त मतों के योग से कम ही है।
मित्रों,दूसरी तरफ भाजपा के पास ऐसा कोई बड़ा वोट बैंक नहीं था जो उसे चुनाव जितवाता। कुल मिलाकर पार्टी की सारी उम्मीदें वोटकटवाओं पर लगी हुई थीं जो फेल हो गए। पार्टी ने यद्यपि अकेले साढ़े 24 प्रतिशत मत प्राप्त किया लेकिन इतने मतों से चुनाव तो नहीं जीते जा सकते। उसके सहयोगी दलों के पास जितनी क्षमता थी उतने मत उन्होंने भी प्राप्त किए लेकिन वह भी नाकाफी था। अंत तक दोनों गठबंधनों के बीच 4 प्रतिशत का भारी अंतर रह गया।
मित्रों,जाहिर है कि बिहार ने एक बार फिर से जातीय समीकरण के दायरे में मतदान किया है और भाजपा के विकासवाद के नारे को ठुकरा दिया है। शुरू से ही भाजपा इस बात को समझ रही थी कि बिहार का रण काफी कठिन है फिर भी उसने कई गलतियाँ कीं। भाजपा ने प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार को नीतीश के पाले में चले जाने दिया। टिकट बाँटा नहीं बेच दिया। सूत्रों के अनुसार हाजीपुर से ही पार्टी टिकट के ऐवज में देव कुमार चौरसिया से 2 करोड़ रुपये मांग रही थी जबकि चौरसिया जदयू के जिलाध्यक्ष हैं। टिकट वितरण में विधानसभा क्षेत्रों के जातीय समीकरणों को भी ध्यान में नहीं रखा गया। रही-सही कसर सहयोगी दलों के साथ और सहयोगी दलों के बीच उभरे विवादों ने पूरी कर दी जिससे बिहार की जनता के बीच गलत संदेश गया। साथ ही भागवत पुराण ने अतिपिछड़ी जातियों के मन में शंका पैदा कर दी। केंद्र सरकार के कामों से गरीबों को अबतक सीधा फायदा नहीं हो पाया है जिससे गरीबों ने महागठबंधन को अपना ज्यादा हमदर्द समझा। बड़ी जाति के लोग भी इसी कारण से उदासीन से रहे। पीएम की रैलियों से जो भी लाभ होता उसको नीतीश-लालू ने रैलियों के तुरंत बाद प्रेसवार्ता करके समाप्त कर दिया। इतना ही नहीं बिहार की जनता खासकर महिलाओं ने इसलिए नीतीश को वोट दिया क्योंकि उनकी सरकार ने बच्चों को साइकिल दी थी,छात्रवृत्ति दी थी और महिलाओं को पंचायती राज संस्थाओं में 50 प्रतिशत का आरक्षण दिया था। नाराज शिक्षकों को भी वेतनमान देकर सरकार ने अपनी ओर कर लिया जो एक बहुत बड़ा वोटबैंक थे।
मित्रों,कुल मिलाकर बिहार की जनता ने साल 2014 को ही दोहराया है। अंतर इतना ही है कि तब तीनों पार्टियाँ अलग-अलग लड़ी थीं और अब एकसाथ थीं। भाजपा को जहाँ तब 22 प्रतिशत वोट मिले थे इस बार साढ़े 24 प्रतिशत मत मिले। इन चुनावों का सबसे बड़ा परिणाम यह है कि सजायाफ्ता लालू प्रसाद यादव की बिहार की राजनीति में फिर से वापसी हुई है और वो भी सबसे बड़े दल के रूप में। ऐसे में सवाल उठता है कि अब बिहार का आगे क्या होगा? क्या बिहार का विकास होगा या फिर विनाश होगा? जीतने के बाद भी लालू बैकवॉर्ड-फॉरवॉर्ड ही कर रहे हैं जिससे संदेह और भी बढ़ जाता है कि क्या बिहार एक बार फिर से बर्बादी के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है? इतिहास तो यही बताता है कि लालू जी का विकास के साथ 36 का रिश्ता है। आखिर बिहारियों ने जो बोया है वही तो काटने को मिलेगा। वैसे नीतीश ने भी बिहार को बनाया कम बर्बाद ही ज्यादा किया है।