शनिवार, 20 अप्रैल 2019

साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की उम्मीदवारी पर बवाल क्यों?


मित्रों, जबसे भोपाल लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी ने अपने उम्मीदवार की घोषणा की है पूरा विपक्ष जैसे सर के बल खड़े होकर विधवा-विलाप कर रहा है. कारण आप भी जानते हैं, दरअसल भाजपा ने वहां से प्रखर राष्ट्रवादी और देशभक्त साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को टिकट दिया है. यह वही प्रज्ञा सिंह ठाकुर हैं जिसे सोनिया-मनमोहन की सरकार ने भगवा आतंकवाद की झूठी व पूर्णतया परिकल्पित थ्योरी के लिए बलि का बकरा बनाने का असफल किन्तु वीभत्स प्रयास किया था.
मित्रों, हुआ यह था कि मालेगांव की मक्का मस्जिद में आठ सितंबर, 2006 को हुए विस्फोटों में 37 लोग मारे गए तथा 125 घायल हुए। मालेगांव में 29 सितंबर, 2008 को भी विस्फोट हुआ जिसमें सात लोगों की मौत हो गई। विस्फोटों की जाँच के लिए गठित एटीएस ने नौ लोगों को प्रतिबंधित संगठन सिमी का सदस्य बताते हुए गिरफ्तारी की। उसका कहना था कि इन सभी ने पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की मदद से संवेदनशील कस्बे मालेगांव में विस्फोट करवाए। गिरफ्तार लोगों के नाम थे-नूरुल हुदा, रईस अहमद, सलमान फारसी, फारुख मकदूमी, शेख मोहम्मद अली, आसिफ खान, मोहम्मद जाहिद, अबरार अहमद और शब्बीर अहमद। बाद में जांच सीबीआइ को सौंप दी गई और उसने भी एटीएस की जांच पर ही मुहर लगा दी। उधर, महाराष्ट्र एटीएस ने मुंबई पुलिस कमिश्नर हेमंत करकरे के नेतृत्व में भी इसकी समानान्तर जांच की और इस नतीजे पर पहुँची कि विस्फोटों के तार प्रज्ञा ठाकुर से जुड़े थे. साध्वी प्रज्ञा को गिरफ्तार कर लिया गया और उसे उस अपराध में शामिल होने के लिए अपनी संलिप्तता स्वीकार को बाध्य करने के लिए अंतहीन और अकल्पनीय यातना की हरेक सीमा पार कर ली गई. उसे नंगा करके उल्टा टांग कर पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा इतना पीटा गया कि उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गयी और कैंसर भी हो गया. न सिर्फ पीटा बल्कि जबरन अंडा खिलाया गया और अश्लील पोर्न विडियो दिखाया गया. मुम्बई के पुलिस कमिश्नर हेमंत करकरे पर तो जैसे धुन सवार थी कि कैसे मालेगांव कांड में उसकी संलिप्तता को किसी भी तरह और किसी भी कीमत पर यहाँ तक कि मानवता की कीमत पर भी साबित कर दे और कांग्रेस नेतृत्व की भगवा आतंकवाद की परिकल्पना को जबरन सच साबित कर दे जिससे कांग्रेस नेतृत्व खुश हो जाए.
मित्रों, बाद में हमने और आपने जब दिल्ली में सरकार बदली और जांच में हिन्दू आतंकवाद का कोई सबूत नहीं मिला तब १३ अप्रैल २०१६ को अदालत ने क्लीन चिट देकर साध्वी को रिहा करने का आदेश दिया. इसी बीच हेमंत करकरे २६/११ के मुम्बई हमले में मारा गया.
मित्रों, साध्वी को क्लीनचिट देने का अर्थ है कि बमकांड में उनके ख़िलाफ़ जांच एजेंसियों के पास ऐसे सबूत नहीं थे, जिससे उन्हें दोषी साबित किया जा सकता। इसका यह भी मतलब होता है कि साध्वी और अन्य दूसरे पांच आरोपियों को बिना ठोस सबूत के ही गिरफ़्तार कर लिया गया था। यानी जिस अपराध ने उनकी ज़िंदगी के आठ कीमती साल छीन लिए, उस अपराध को उन्होंने किया ही नहीं था।
मित्रों, अब आप ही बताईए कि भाजपा ने भोपाल से साध्वी को टिकट देकर क्या गलत किया? हमारे देश की पुलिस कैसे काम करती है इसके बारे में मैं आपको अपनी एक आपबीती सुनाना चाहूँगा. हुआ यह कि मैं अपना घर बनवा रहा था और वो भी हाजीपुर में वैशाली महिला थाने के पीछे. थानेदार थी पूनम कुमारी. अब उसका प्रोन्नति देकर तबादला हो चुका है. मैंने घर बनाने के दौरान ईटें मंगवाई. काम कुछ कारणों से रूका हुआ था. एक दिन सुबह जब मैं निर्माण-स्थल पर पहुंचा तो पाया कि मेरी ईटें गायब है. मैंने थाने में पूछा तो कोई बताने को तैयार नहीं. फिर मैंने देखा कि थाने में फूलों के नए पौधे लगाए गए हैं और उनकी घेराबंदी के लिए मेरी ईटें लगा दी गई हैं. फिर मैंने मजदूर बुलवाए ईंटें उठवाने के लिए. मजदूरों को देखते ही महिला थानेदार मुझे गालियाँ देने लगीं और धमकी दी कि बलात्कार के झूठे में मुकदमे में फंसा देगी. फिर मैंने पहले बिहार के डीजीपी को और फिर वैशाली एसपी गौरव कुमार को फोन किया. पत्रकार होने के कारण दोनों मुझसे परिचित थे. गौरव जी ने फोन उठाया और फोन करने का कारण पूछा. फिर उन्होंने थानेदारनी को फोन पर वो डांट लगाई कि वो कमरे की सिटकनी अन्दर से बंद करके कैद हो गयी.
मित्रों, अब आप ही बताईए कि अगर मैं पत्रकार नहीं होता तो मेरा क्या होता और मैं आज कहाँ होता? एक बार हाजीपुर, हिंदुस्तान के तत्कालीन ब्यूरो चीफ मानपुरी जी ने मुझे बताया था कि उनके पास ऐसी सैंकड़ों सच्ची कहानियां हैं जिनमें पुलिस ने ऐसे लोगों को हत्या-डाका आदि मामलों में गिरफ्तार किया और सजा दिलवाई जिनका उन मामलों से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध ही नहीं था. अगर हमारी न्यायपालिका, सीबीआई, पुलिस आदि सही होती तो सरेआम राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कनाट प्लेस में हत्या कर दी गई जेसिका लाल मामले में कोर्ट यह नहीं कहती कि जेसिका की हत्या तो हुई मगर उसकी किसी ने हत्या नहीं की. इसी तरह न जाने पुलिस द्वारा रिश्वत लेकर हमारे देश में कितनी हत्याओं को आत्महत्या में बदल जा चुका है.
मित्रों, अब बात करते हैं कांग्रेस की. कांग्रेस के बारे में जितना कहा जाए उतना ही कम है. कांग्रेस पूरी तरह से हिन्दू-विरोधी पार्टी है और भारत को हिन्दू-विहीन बनाना चाहती है. कांग्रेस को पता ही नहीं था कि भाजपा आधुनिक जयचंद दिग्विजय सिंह के खिलाफ उसी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को चुनाव में खड़ा कर देगी जिस पर अपने हिन्दू-विरोधी एजेंडे को पूरा करने के लिए उसने अनगिनत जुल्म करवाए थे. ऐसा भी नहीं है कि मैंने कभी कांग्रेस को आदतन मुफ्त की सलाह नहीं दी लेकिन हम करें तो क्या करें-
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम. लोचनाभ्याम विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति.
अब कांग्रेस की प्रज्ञा यानि बुद्धि को बहन प्रज्ञा सिंह ठाकुर ही ठिकाने पर लाएगी और ठिकाने पर लाएगी भारत की सवा अरब जनता.

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

श्रद्धा, भक्ति और मोदी


मित्रों, एक बार फिर से भारत में लोकसभा चुनाव प्रगति पर है और एक बार फिर से नरेन्द्र मोदी भारत का प्रधानमंत्री बनने को ओर अग्रसर हैं.  ऐसा मैं ही नहीं बल्कि सारे सर्वे भी कह रहे हैं और इसका कारण यह है कि मोदी जी ने पिछले ५ सालों में जितने दुश्मन बनाए हैं उससे कहीं अधिक संख्या में उनसे श्रद्धा करने वाले लोग उनके प्रशंसक बन गए हैं.
मित्रों, कुछ लोग कहते हैं कि मोदी जी ने प्रयत्नपूर्वक अपने श्रद्धालु बनाये हैं जबकि हिंदी के सार्वकालिक सबसे बड़े आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ऐसा मानते हैं कि श्रद्धा स्वतःस्फूर्त होती हैं. वे कहते हैं कि किसी मनुष्य में जनसाधारण से विशेष गुण या शक्ति का विकास देख उसके सम्बन्ध में जो एक स्थायी आनंद-पद्धति ह्रदय में स्थापित हो जाती है उसे श्रद्धा कहते हैं. श्रद्धा महत्व की आनंदपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य-बुद्धि का संचार है. यदि हमें निश्चय हो जाएगा कि कोई मनुष्य बड़ा वीर, बड़ा सज्जन, बड़ा गुणी, बड़ा दानी, बड़ा विद्वान, बड़ा परोपकारी व बड़ा धर्मात्मा है तो वह बड़े आनंद का एक विषय हो जाएगा. हम उसका नाम आने पर प्रशंसा करने लगेंगे, उसे सामने देख आदर से सिर नवाएंगे, किसी प्रकार का स्वार्थ न रहने पर भी हम सदा उसका भला चाहेंगे, उसकी बढती से प्रसन्न होंगे और अपनी पोषित आनंद-पद्धति में व्याघात पहुँचने के कारण उसकी निंदा न सह सकेंगे. इससे सिद्ध होता है कि जिन कर्मों के प्रति श्रद्धा होती है उनका होना संसार को वांछित है. यही विश्व-कामना श्रद्धा की प्रेरणा का मूल है.
मित्रों, आप कहेंगे कि लोग मोदी जी से प्रेम करने लगे हैं और प्रेम तो अँधा होता है तो इस बारे में आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि प्रेम और श्रद्धा में अंतर यह है कि प्रेम प्रिय के स्वाधीन कार्यों पर उतना निर्भर नहीं-कभी-कभी किसी का रूप मात्र,जिसमें उसका कुछ हाथ भी नहीं, उसके प्रति प्रेम उत्पन्न होने का कारण होता है. पर श्रद्धा ऐसी नहीं है. किसी की सुन्दर आँख या नाक देखकर उसके प्रति श्रद्धा नहीं उत्पन्न होगी, प्रीति उत्पन्न हो सकती है. प्रेम के लिए इतना ही बस है कि कोई मनुष्य हमें अच्छा लगे; पर श्रद्धा के लिए आवश्यक यह है कि कोई मनुष्य किसी बात में बढ़ा हुआ होने के कारण हमारे लिए सम्मान का पात्र हो. श्रद्धा का व्यापार-स्थल विस्तृत है, प्रेम का एकांत. प्रेम में घनत्व अधिक है और श्रद्धा में विस्तार.
मित्रों, जहाँ तक भक्ति का सवाल है तो आचार्य शुक्ल के अनुसार श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है. जब पूज्यभाव की वृद्धि के साथ श्रद्धा-भाजन के सामीप्य-लाभ की प्रवृत्ति हो, उसकी सत्ता के कई रूपों के साक्षात्कार की वासना हो, तब ह्रदय में भक्ति का प्रादुर्भाव समझना चाहिए.
मित्रों, अब आप ही बताईए कि अगर कोई मोदी जी के प्रति श्रद्धा रखता है तो क्या ऐसा वो अपनी मर्जी से करता है या फिर मोदी जी के कर्म ही ऐसे हैं जो उसे ऐसा करने के लिए उसे बाध्य करते हैं? जहाँ तक मोदी जी की भक्ति करने का सवाल है तो जैसा कि हमने देखा कि जब श्रद्धा में प्रेम भी मिश्रित हो जाता है तो उसे भक्ति कहते हैं. अब अगर देश की जनता ऐसा कर रही है तो इसके लिए मोदी जी कहाँ से और कैसे दोषी हो गए? भारत एक आजाद मुल्क है, प्रत्येक नेता जनता के मन-मंदिर में अपना स्थान बनाने को स्वतंत्र है. अब कोई निरंतर गर्हित कार्यों में लगा रहे और फिर भी ऐसी उम्मीद करे कि जनता मोदी जी को छोड़ कर उसकी भक्ति करे और ऐसा न होने पर मोदी जी के प्रति ईर्ष्या रखने लगे तो रखे उसकी मर्जी लेकिन ऐसा करके वो खुद अपने ही स्वास्थ्य की हानि करेगा और बदले में कुछ सार्थकता प्राप्त भी नहीं कर पाएगा. चोर-चोर चिल्लाने से कोई चोर साध नहीं हो जाता बल्कि इसके लिए उसे सन्मार्ग पर और त्याग के मार्ग पर चलना भी होगा. सबकुछ छोड़ कर ही सबकुछ पाया जा सकता है.

गुरुवार, 11 अप्रैल 2019

इमरान के बयान के पीछे की चाल


मित्रों, मैं हमेशा से मानता रहा हूँ कि कूटनीति में पाकिस्तान का जवाब नहीं. वो ६५ की लडाई मैदान में हार जाता है लेकिन बातचीत की मेज पर मजे से जीत जाता है. साथ ही हमारे प्रधानमंत्री बेहद संदेहास्पद परिस्थितियों में मृत पाए जाते हैं. इसी तरह से ७१ की लडाई हार जाता है, उसके दो टुकड़े हो जाते हैं लेकिन एक बार फिर से बातचीत की मेज पर जीत उसी की होती है. १९९९ में विमान का अपहरण होता है. पाकिस्तानी ही अपहरण करते हैं. बातचीत में मध्यस्थ भी पाकिस्तान ही होता है. छोड़ा भी पाकिस्तानी आतंकवादियों को जाता है. है न गजब. मुझे याद है कि कारगिल की लडाई के समय वाजपेयी जी की सरकार ने एक ऑडियो जारी किया था. जिसमें चीन की यात्रा पर गए पाकिस्तान के तत्कालीन सेनाध्यक्ष पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री से फोन पर बात करते हैं. नवाज शरीफ कहते हैं कि भारत आरोप लगा रहा है कि हमने घुसपैठ की है और उसकी चोटियों पर कब्ज़ा जमा लिया है. तब मुशर्रफ कहता है कि आप ऐसे क्यों नहीं कहते कि वे पाकिस्तानी सैनिक नहीं हैं बल्कि मुजाहिदीन हैं.
मित्रों, इन दिनों जब भारत में लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं तब उसी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने बयान दिया है कि भारत में अगर नरेन्द्र मोदी चुनाव जीत जाते हैं तो सबसे ज्यादा ख़ुशी उन्हें होगी. हद तो यह है कि हमारे कुछ राजनेता जो इमरान खान को महापवित्र और सत्यवादी मानते हैं काफी उछल रहे हैं. जबकि मैंने समझता हूँ कि पाकिस्तान का कोई भी नेता या अधिकारी जब भी बोलता है उल्टा ही बोलता है और झूठ ही बोलता है. क्यांकि पाकिस्तान कभी भारत का भला चाह ही नहीं सकता,भारत के भले के बारे में सोंच ही नहीं सकता फिर इमरान खान को तो वहां का प्रधानमंत्री बनाया ही वहां की सेना ने है. ऐसे में उनके बयान को सीधे-सीधे लेना हमारे लिए न केवल मूर्खता होगी बल्कि खतरनाक भी होगा.
मित्रों, इस बीच बालाकोट एयर स्ट्राइक के ४३ दिनों के बाद पश्चिमी पत्रकारों को उस मदरसे की यात्रा करवाई गई है जिस पर भारतीय वायुवीरों ने २६ फरवरी को हमला किया था.मगर पत्रकारों को चुनिन्दा स्थानों तक ही ले जाया गया और किसी से बात नहीं करने दी गई जबकि पाकिस्तान ने हमले के कल होकर ही कहा था कि वो पत्रकारों को उसी दिन वहां ले जाएगा. इस बीच जब रायटर के संवाददाता कई हफ्ते बाद वहां पहुंचे तो उनको भगा दिया गया. सवाल उठता है कि अगर हमला हुआ ही नहीं तो पाकिस्तान को पत्रकारों को वहां ले जाने में ४३ दिन क्यों लगे और मीडिया को वहां पढ़ रहे बच्चों से बात क्यों नहीं करने दिया गया? क्या इमरान के पास इन सवालों का जवाब है?
मित्रों, इमरान कहता है कि मोदी अगर जीतते हैं तो कश्मीर-समस्या हल करने में सहूलियत होगी. कितना शरारती बयान है ये? जबकि सच्चाई तो यह है कि जहाँ एक तरफ पाकिस्तान मोदी से बातचीत करने को बेहाल है वहीँ मोदी तो कश्मीर के मामले में पाकिस्तान को पार्टी या फरीक मानते ही नहीं बल्कि कश्मीर मुद्दे को वो भारत का आंतरिक मामला मानते हैं. हाँ, मोदी की वापसी के बाद कश्मीर-समस्या जरूर हल होगी और वो इस तरह कि आतंकवाद का अंत हो जाएगा-कश्मीर से भी और पाकिस्तान से भी. ज्यादा से भी ज्यादा लगभग पूरी सम्भावना तो यह है कि मोदी की वापसी के बाद शायद पाकिस्तान ही नक्शे से गायब हो जाए.जहाँ तक मुझे लगता है कि चूंकि पीएम मोदी पिछले दिनों चुनाव प्रचारों में यह कहते रहे हैं कि अगर वे हार जाते हैं तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे इसलिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से कांग्रेस और भाजपा विरोधी अन्य दलों ने संपर्क करके इमरान खान से ऐसा बयान दिलवाया है जिससे विपक्ष को यह कहने का मौका मिल सके कि देखो पाकिस्तान क्या चाहता है अर्थात पाकिस्तान के हित में किसकी जीत है.
मित्रों, मैं इस लोकसभा चुनाव में जिस व्यक्ति की सबसे ज्यादा कमी महसूस कर रहा हूँ वो है कांग्रेस नेता मणिशंकरअय्यर. बंदा न जाने कहाँ चला गया? क्या अब वो पाकिस्तान से मदद नहीं मांगेगा मोदी को हटाने में? हो सकता है उसी के कहने पर इमरान ने यह शरारतपूर्ण बयान दिया हो और बंदा पाकिस्तान में ही अड्डा जमाए बैठा हो.
मित्रों, मैं कांग्रेस पार्टी से पूछना चाहता हूँ कि जिस प्रशांत भूषण को आगे करके वो राफेल का खेल खेल रही है क्या वो नहीं जानती कि कश्मीर के बारे में उसके ख्याल कितने खतरनाक हैं? वैसे खतरनाक ख्याल तो कांग्रेस के भी हैं न सिर्फ कश्मीर के बारे में बल्कि पूरे भारतवर्ष के बारे में.
मित्रों, अंत में मैंने मुज़फ्फरनगर में जो देखा उसका जिक्र करना चाहूँगा. लगभग सारे सजीव चुनाव प्रसारण हमारे कॉलेज श्रीराम कॉलेज से ही प्रसारित हुए. एक दो को छोड़कर किसी में भी रालोद उम्मीदवार अजित सिंह ने अपना प्रतिनिधि नहीं भेजा. लेकिन कांग्रेस के प्रतिनिधि सारे कार्यक्रमों में आए जबकि अजीत सिंह जिस गठबंधन का हिस्सा हैं कांग्रेस उसमें है ही नहीं. इतना ही नहीं कांग्रेस प्रतिनिधि लगातार बिन बुलाए मेहमान की तरह आकर भाजपा के खिलाफ बोलते रहे. सवाल उठता है कि कांग्रेस ने जब यहाँ से अपना उम्मीदवार ही नहीं दिया और वो गठबंधन में भी नहीं है तो फिर वो कूद-फांद क्यों कर रही है? सच्चाई तो यह है कि हिन्दुकूश पर्वत से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक और जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारतविरोधी तत्व एकजुट हो गए हैं और चाहते हैं कि किस तरह से मोदी को हराकर भारत को विकसित और मजबूत होने से रोका जाए और पापिस्तान की रक्षा की जाए. जाहिर है पापिस्तान का नापाक प्रधानमंत्री इमरान खान भी इस खेल में शामिल हैं.

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

जीतेगा मोदी जीतेगा भारत


मित्रों,आप जानते हैं कि भविष्यवाणी करना काफी कठिन काम है और फिर जब बात भारत के चुनावों की हो तब तो बड़े-बड़े विश्लेषक भी भविष्यवाणी करने से डरते हैं.  फिर भी पिछले दिनों जो सर्वेक्षण सामने आ रहे हैं और मैं खुद भी जितने लोगों से मिला हूँ उसके आधार भी यह बिना किसी लाग-लपेट के कहा जा सकता है कि इस बार के लोकसभा चुनावों में निश्चित रूप से वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शानदार वापसी करने जा रहे हैं.
मित्रों, कांग्रेस और भाजपा सहित सभी प्रमुख दलों का घोषणापत्र सामने आ चुका है और अगर हम दोनों दलों के घोषणापत्रों की तुलना करें तो स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ भाजपा के पास दूरदृष्टि और भारत के तीव्र व सर्वांगीण विकास का पूरा खाका है वहीँ कांग्रेस के पास सिर्फ झूठ, लालच और फरेब है. कांग्रेस कितनी झूठी पार्टी है और कितनी वादाखिलाफ है यह उन तीनों राज्यों में उसकी सरकार के कामकाज से भी जनता जनार्दन के सामने प्रकट हो चुका है जिन तीन राज्यों में हाल में उसने चुनाव जीते थे. उन तीनों राज्यों में जनता के साथ जबरदस्त धोखा हुआ है.
मित्रों, यह कांग्रेस देशद्रोह को अपराध नहीं मानती और इसकी धारा को ही समाप्त कर देने का वादा उसने अपने घोषणापत्र में किया है जबकि देशद्रोह से बड़ा कोई अपराध हो ही नहीं सकता. इसी तरह कांग्रेस ने धारा ३७० की रक्षा करने का वादा भी किया है जबकि भाजपा ने इसे समाप्त करने का और कश्मीर की रक्षा करने का वादा किया है और पिछले दिनों मोदी सरकार ने इस धारा में कुछ बदलाव किए भी हैं.
मित्रों, सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस भारतीयों को कुत्ता समझती है कि वो ७२००० के लालच में उसके पीछे भाग लेंगे और देश को एक बार फिर से बहुरूपिये लुटेरों के हवाले कर देंगे? सवाल यह भी उठता है कि भारतीय भारत की जय चाहते हैं या चीन और पाकिस्तान की जो इस समय कांग्रेस की ही तरह मोदी सरकार की हार की मन्नतें मांग रहे हैं और कांग्रेस जिनकी गोद में बैठी है? मैं नहीं समझता कि वर्तमान भारत की जनता इतनी मूर्ख है कि वो कांग्रेस पार्टी के फरेब को समझ नहीं सके. वो यह अच्छी तरह से जानती है कि कांग्रेस को गरीबों से नहीं बल्कि उनकी गरीबी से प्यार है. कांग्रेस को कालाधन और भ्रष्टाचार से भी बेईन्तिहाँ मुहब्बत है और वो खुद तो भ्रष्ट है ही उसके सारे सहयोगी भी जाने-माने भ्रष्ट हैं और एक-से-बढ़कर-एक भ्रष्ट हैं. साथ ही तीसरे मोर्चे में भी सिर्फ-और-सिर्फ भ्रष्टाचारियों का जमावड़ा है. इन दलों का उद्देश्य कहीं से भी जनहित और देशहित नहीं है बल्कि इनका सिर्फ एक ही एजेंडा है कि कैसे मोदी को हराया और हटाया जाए और खुद को जेल जाने से बचाया जाए. जो दल मोदी सरकार पर कालाधन के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने के आरोप लगा रहे थे वही दल मध्य प्रदेश में बदले की भावना से कमलनाथ के निकटतम सहयोगियों पर आयकर का छापा पड़वाने के आरोप लगा रहे हैं. अभी कल ही कांग्रेस के दत्तक पुत्र माओवादियों ने कांग्रेसशासित दंतेवाडा में भाजपा विधायक की हत्या कर दी है और उनके साथ हमारे ५ सीआरपीएफ जवान भी शहीद हो गए हैं. साथ ही कल जम्मू-कश्मीर में प्रखर राष्ट्रवादी चंद्रकांत शर्मा जी की भी जेहादियों ने हत्या कर दी है. ऐसे में अगर कांग्रेस की सरकार बनती है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि वो पूरे देश को माओवादियों और जेहादियों के हवाले कर देगी. साथ ही दोनों हाथों से लूटेगी सो अलग. और तब शायद आपके पास पछताने तक का भी समय न रहे.
मित्रों, पिछले दिनों घटे घटनाक्रम से यह स्वतः स्पष्ट है कि चौकीदार चोर नहीं है बल्कि चौकस है न सिर्फ सीमा पर बल्कि देश के भीतर सत्ता में रहकर देश को लूटनेवालों पर भी उनकी पैनी नजर है. उसने न सिर्फ सैनिकों के साजो-सामान पर ध्यान दिया है बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में परिवहन के साधन भी विकसित किए हैं जिससे चीन के किसी भी संभावित हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके. इसके साथ ही किसानों को वेतन,मजदूरों को पेंशन, उज्ज्वला, आयुष्मान, सीधे खाते में सब्सिडी, रेलवे की रफ़्तार बढाने, नई रेल लाईनें बिछाने और पुरानी लाईनों के दोहरीकरण, तीव्र गति से सड़क-निर्माण, बिजली की कमी को पूरी तरह से दूर करने की दिशा में भी इस सरकार ने काफी सराहनीय काम किया है इसमें कोई संदेह नहीं. मैं मानता हूँ कि रोजगार-सृजन कम हुआ है लेकिन मैं पहले भी कह चूका हूँ कि आज भारत दुनिया में सबसे ज्यादा विदेशी प्रत्यक्ष निवेश प्राप्त करनेवाला देश बन चुका है और पूँजी आ रही है तो रोजगार भी आ रहा है बस थोड़े दिनों तक धैर्य रखने की आवश्यकता है.
मित्रों, परसों से मतदान का महापर्व शुरू होनेवाला है. आप सभी देशवासियों से मैं अपील करता हूँ कि आपलोग इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लें और भारत की पूरी दुनिया पर जीत और भारत के विश्वगुरु बनने के मार्ग को फिर से प्रशस्त करें. फिर से कमल खिलाएँ और खूनी पंजे से देश को बचाएँ. मेरे इस आह्वान में मेरा कोई स्वार्थ नहीं है बल्कि सबका सवा सौ करोड़ भारतियों का स्वार्थ है. मैं आज तक किसी भी पार्टी का सदस्य नहीं रहा हूँ और न ही किसी दल से कभी एक पैसे का लाभ ही प्राप्त किया है. मेरे लिए मेरा देश सर्वोपरि और सर्वस्व था, है और हमेश रहेगा. वन्दे मातरम, भारतमाता की जय.

रविवार, 31 मार्च 2019

यह आचार संहिता है या लाचार संहिता


मित्रों, जब संविधान निर्माण का महान कार्य संपन्न हो रहा था तब हमारे संविधान-निर्माताओं ने सपने में भी सोंचा नहीं होगा कि एक दिन ऐसा आएगा जब गरीबों के लिए चुनाव लड़ना चाँद को छूने के समान नामुमकिन हो जाएगा.
मित्रों, जब हम बच्चे थे तो सुनते थे कि यह नेता पहले बकरी चराता था और पैदल ही बिना एक पैसा खर्च किये न सिर्फ चुनाव लड़ा थे बल्कि जीत भी हासिल की थी. बड़े ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि वर्तमान समय में कोई गरीब व्यक्ति लोकसभा तो दूर की बात रही ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत वार्ड सदस्य का चुनाव लड़ना भी पहुँच से बाहर हो चुकी है. आज पंचायत चुनावों में भी एक-एक ग्राम प्रधान उम्मीदवार एक-एक करोड़ रूपये खर्च कर रहे हैं. अब आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं कि जब पंचायत चुनावों में ऐसी हालत है तो विधानसभा और लोकसभा चुनावों में क्या हालत रहती होगी और किस स्तर पर धनबल का प्रयोग होता होगा आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं.
मित्रों, ऐसा भी नहीं है कि चुनाव आयोग इस समस्या से अनभिज्ञ है. उसने प्रत्येक स्तर के चुनाव के लिए खर्च की सीमा तय कर रखी है. उम्मीदवारों से खर्च का लिखित हिसाब भी लिया जाता है लेकिन वास्तविकता तो यह है कि सबकुछ दिखावा होता है, औपचारिकता होती है. चुनावों के दौरान पैसे जब्त भी होते हैं लेकिन वो बहुत कम होते हैं.
मित्रों, कहने को तो चुनावों की घोषणा के साथ ही आचार-संहिता लागू हो जाती है लेकिन उनका पालन नहीं होता. कई बार उद्दण्ड उम्मीदवारों के खिलाफ आचार-संहिता उल्लंघन के मुकदमे भी दर्ज होते हैं लेकिन आज तक किसी नेता को इन मामलों में सजा मिली हो देखा नहीं गया. मैं पूछता हूँ कि आखिर क्या आवश्यकता है ऐसी आचार-संहिता की जो वास्तव में लाचार-संहिता हो? कहना न होगा कि जैसे हमारे देश में कानून बनते ही टूटने के लिए हैं.
मित्रों, भारतीय लोकतंत्र में विकसित हो चुकी एक और प्रवृत्ति भी काफी चिंता का विषय है. पिछले कुछ सालों में पार्टियाँ पैसे लेकर टिकट बेचने लगी हैं. बोली लगती है और जो जितना ज्यादा पैसा देता है उसे टिकट दे दिया जाता है. फिर जीतनेवाला एक तो टिकट खरीदने का दाम और दूसरा चुनाव लड़ने का खर्च भ्रष्टाचार द्वारा जनता से वसूलता है. टूटी सड़कें,सुख-सुविधाओं का अभाव,सांसद-निधि की लूट सबके पीछे यही कारण है. 
मित्रों, ऐसा नहीं है कि इस तरह की स्थिति के लिए हमलोग यानि आम जनता बिलकुल ही जिम्मेदार नहीं हैं. हम भी तो चुनावों के आते ही इन्तजार में होते हैं कि उम्मीदवार आएँ और हमें पैसे या कोई अन्य सामान दें. चूंकि हमारे पूर्वज हमारी तरह लालची नहीं थे इसलिए उनके ज़माने में बकरी चरानेवाले लोग भी चुनाव जीत जाते थे. हमने अपने लालच द्वारा खुद ही खुद के लिए ऐसी स्थिति पैदा कर ली है कि अब खुद हम ही चाहकर भी चुनाव लड़ नहीं सकते क्योंकि बिना पैसा खर्च किए जो चुनाव लडेगा वो आज के हालात में निश्चित रूप से हारेगा क्योंकि उसे निर्दलीय लड़ना पड़ेगा क्योंकि उसके पास टिकट खरीदने के लिए पैसे नहीं होंगे. 

गुरुवार, 28 मार्च 2019

साँपों और कांग्रेसियों से सावधान


मित्रों, आप सोंच रहे होंगे कि लोग तो कुत्ते से सावधान का बोर्ड लगवाते हैं फिर साँपों से सावधान क्यों? वो इसलिए क्योंकि कुत्ता वफ़ादारी का प्रतीक होता है. मर भले ही जाता है कभी मालिक के प्रति धोखेबाजी नहीं करता. मतलब कि कुत्ता जिसकी रोटी खाता है जीता भी उसी के लिए है और मरता भी उसी के लिए है लेकिन यह जो कांग्रेस पार्टी है खाती तो भारत की है गाती पाकिस्तान और चीन की है. इसने तो रिकार्डतोड़ घोटालों के द्वारा न केवल भारत का खाया है वरन भारत को भी खाया है. कांग्रेस पार्टी जब सत्ता में थी तब भी पाकिस्तान और चीन के लिए जीती-मरती थी और आज जब विपक्ष में है तब भी भारत के दुश्मनों के ही लिए जी-मर रही है. इसे न तो भारत की मजबूत सेना चाहिए और न ही सेना का पराक्रम.
मित्रों, इसलिए मैंने शीर्षक में कुत्ते का नाम नहीं लिया. नाम तो मैं साँपों का भी नहीं लेना चाहता था क्योंकि वो बेचारा भी तब तक किसी को नहीं काटता जब तक उसे छेडा न जाए लेकिन एक बात में कांग्रेस और साँपों में जबरदस्त समानता है कि जहरीले दोनों ही हैं. एक सीधे-सीधे काटता है तो दूसरा लोगों में अपने जाल में उलझाकर मारता है.
मित्रों, अभी कुछ दिन पहले मैं एक चूहेदानी खरीदकर लाया और उसमें रोटी लगा दी. फिर तो चूहों का फंसना रोजाना की बात हो गई. कदाचित कांग्रेस भी हमें चूहा समझती है. नेहरु के समय से ही यह देश से गरीबी को मिटाने का वादा कर रही है लेकिन अमीर हो रहे हैं खुद कांग्रेस पार्टी के नेता. अभी कुछ ही महीने पहले कांग्रेस ने राजस्थान और मध्य प्रदेश में किसानों की कर्जमाफ़ी का वादा किया था. मगर किया क्या? प्रत्येक किसान के दो-दो लाख माफ़ करने के बदले किसी के ५० रूपये माफ़ किए गए तो किसी के १०० रूपये. ऊपर से बिजली का बिल न्यूनतम ५०० रूपया महीना बढ़ा दिया गया. बेटा मांगने गई थी और पति को भी गँवा आई. मध्य प्रदेश की सरकार बेरोजगारों को रोजगार अथवा १०००० रूपये का बेरोजगारी भत्ता देने के बदले भैंस चराने और बैंड बजाने का प्रशिक्षण दे रही है. कहना न होगा इसी तरह हम उनके दांव में पिछले ७० सालों से फंसते आ रहे हैं और वे इसी तरह हमें चराते आ रहे हैं और हमारी बैंड बजाते आ रहे हैं. अब दोनों ही राज्यों के लोग पछता रहे हैं लेकिन अब पछताए होत क्या.
मित्रों, अगर आपको भी भविष्य में पछताना है तो बेशक आप भी कांग्रेस को वोट करिए. मगर उससे पहले मैं आपको कुछ और भी याद दिलाना चाहूँगा. मैं आपको याद दिलाना चाहूँगा कि २००४ के चुनावों के समय किस तरह कांग्रेस ने ताबूत घोटाले की कहानी रचकर आपको बेवकूफ बनाया था और देशभक्त और ईमानदार अटल बिहारी वाजपेई के स्थान पर एक कठपुतली को प्रधानमंत्री बनाकर जल,थल, नभ और अंतरिक्ष सर्वत्र कैसे जमकर घोटाले किए थे. घोटालों की पूरी-की-पूरी वर्णमाला बनाकर देश को दोनों हाथों से लूटा था. मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि क्या आप फिर से २००४ को दोहराना पसंद करेंगे? जिस तरह वाजपेई की हार के कारण भारत कई साल पीछे चला गया क्या आप चाहेंगे कि देश फिर भी रिवर्स गियर में चला जाए?
मित्रों, भारत मेहनतकशों का देश है, कर्मवीरों, श्रमवीरों का देश है लेकिन यह कांग्रेस पार्टी हमें हमेशा से भिखारी समझती है. यह हमें काम देने की बात नहीं कर रही बल्कि भीख देने के वादे कर रही जबकि हम भारतीय तो आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाते. क्या आपने कभी पढ़ा-सुना है कि पैसे बांटकर किसी देश का विकास हुआ है,चाहे तो अमेरिका हो, जापान हो या चीन या जर्मनी हो? माना कि गाँव में किसी किसान की ५ एकड़ जमीन है. अगर वो सारी जमीन बेचकर अपने ५ बेटों के बीच पैसे बाँट देता है और पाँचों बेटे उस पैसे को उड़ा देते हैं तो क्या आप इसे उस किसान और उसके बेटों की बुद्धिमानी कहेंगे? 
मित्रों, असल में कांग्रेस को लगता है कि हम उसकी गन्दी सोंच से वाकिफ ही नहीं हैं. जैसे हमें पता ही नहीं कि कांग्रेस राजस्थान और मध्य प्रदेश में क्या कर रही. जबकि सच यह है कि हम समझ रहे कि कांग्रेस सिर्फ-और-सिर्फ झूठ बोल रही है. कांग्रेस जब देश की नहीं हुई और पाकिस्तान की टीवी पर अपनी जय-जयकार करवा कर खुश हो रही है तो वो देशवासियों का क्या होगी? चूंकि कांग्रेस के सारे जहरीले सांप जल्दी ही पिंजरे में जानेवाले हैं और जमानत पर हैं इसलिए फ़िलहाल तो वे किसी भी तरह, कोई भी संभव-असंभव वादा करके जेल जाने से बचना चाहते हैं. इसलिए आप ७२००० के लालच को लालच नहीं सीधे चूहेदानी में रखा चारा समझिए जिसके लालच में आए तो हम उनका ग्रास बन जाएँगे क्योंकि वे नकली हिन्दू सह गोभक्षी हमें भी बिना पकाए जिन्दा खा जाएँगे और हमारे देश को भी.

गुरुवार, 14 मार्च 2019

कांग्रेस के तुरुप का आखिरी पत्ता प्रियंका वाड्रा

मित्रों, पिछले कई सालों से भारत की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस अजीब संक्रमण और संकट की स्थिति से गुजर रही है. राजीव गाँधी की हत्या के बाद पार्टी को जब लगा कि फिर से पार्टी की बागडोर नकली गाँधी परिवार के हाथों में सौंपे बिना पार्टी का पुनरुत्थान नहीं हो सकता तब १९९८ में वयोवृद्ध अध्यक्ष सीताराम केसरी को जबरदस्ती हटाकर सोनिया गाँधी को पार्टी अध्यक्ष बना दिया गया. इसी बीच जैसे बिल्ली के भाग्य से छींका टूटता है वैसे ही २००४ के लोकसभा चुनावों के समय भारतीय जनता पार्टी द्वारा की गई अक्षम्य गलतियों के चलते कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई. इसी बीच सोनिया गाँधी ने सही अवसर को भांपते हुए २००७ में अपने बेटे राहुल गाँधी को पार्टी महासचिव बना दिया. इससे पहले कई बार राहुल गाँधी की लौन्चिंग के कयास लगे लेकिन हर बार वह टालती रही. हर बार यह कहा गया कि अभी राहुल राजनीति का ककहरा सीख रहे हैं. २००७ में राहुल गाँधी के आगमन के कुछ सालों के भीतर ही ऐसा प्रतीत होने लगा कि राहुल गाँधी कतई तुरुप का पत्ता नहीं हैं बल्कि जोकर हैं और उनमें वो दम नहीं है जिसके दम पर वे कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व संभाल सकें. बाद में जब इंतज़ार की हद हो गई तब थक हार कर राहुल गाँधी को २०१७ में यानि पिछले साल पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया. इस बीच २००९ में पार्टी की जीत का श्रेय बेवजह इन्हीं राहुल गाँधी को दिया गया जबकि पार्टी जीती थी मनमोहन सरकार के कामकाज से.
मित्रों, इसी बीच मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में अभूतपूर्व घोटालों के चलते कांग्रेस बदनाम हो गयी और देश की जनता ने उसे ४४ पर समेट दिया. पार्टी इतनी बुरी तरह से हारी कि भारत के इतिहास में पहली बार उसे प्रतिपक्षी पार्टी तक का दर्जा नहीं मिला. तभी से जब भी पार्टी जीतती है तो पार्टी के लोग कहते हैं कि जीत का श्रेय सिर्फ राहुल जी को जाता है और जब भी पार्टी हारती है तो कहा जाता है कि पार्टी अपनी गलतियों या इवीएम के कारण हारी है न कि राहुल गाँधी के चलते.
मित्रों, अभी कुछ दिन पहले जब कांग्रेस यह समझने लगी कि पार्टी की नैया लोकसभा चुनावों में पार लगाना अकेले राहुल गाँधी के वश की बात नहीं है तब उनकी छोटी बहन प्रियंका गाँधी को तुरुप के आखिरी पत्ते के रूप में ७ फरवरी २०१९ को पार्टी का महासचिव बना दिया गया. एक लम्बे इंतजार और गैरहाजिरी के बाद अभी कुछ दिन पहले से प्रियंका ने पार्टी के प्रचार करना शुरू किया है. इस बीच यह दावा भी किया गया कि उनकी नाक की लन्दन में प्लास्टिक सर्जरी करवाई गई है ताकि उनकी नाक देखने में उनकी दादी इंदिरा गाँधी की तरह लगे. उनकी पुरानी तस्वीर को देखकर ऐसा लगता भी है कि शायद ऐसा करवाया गया है. लेकिन पिछले कुछ दिनों में उनके द्वारा दिए गए भाषण को देखकर ऐसा लगता नहीं है कि प्रियंका अपनी दादी की छाया मात्र भी है दादी जैसी होना तो बहुत दूर की बात रही. मुझे लगता है कि वो कदाचित राजनीति में आती भी नहीं अगर उसके पति पर संकट नहीं आता क्योंकि उसे अपनी सीमाएं पता है. वो शायद इसलिए मजबूरन राजनीति में आई है क्योंकि उसे अपने पति को जेल जाने से बचाना है वर्ना कहाँ इंदिरा गाँधी और कहाँ प्रियंका. इसमें न तो दादी वाली सूक्ष्म बुद्धि है और न ही ज्ञान. साथ ही उसमें दादी वाली सम्प्रेषण क्षमता, साहस और दृढ़ता भी नहीं है. पिछले दो-तीन दिनों में किए गए विश्लेषण के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि प्रियंका राहुल गाँधी से ज्यादा योग्य नहीं है बल्कि अगर उसे हम लेडी राहुल कहें तो किसी भी दृष्टिकोण से ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा. वैसे यह तुरुप का पत्ता नहला, दहला, दुग्गी, तिग्गी या क्या निकलती है यह तो समय बताएगा लेकिन यह पत्ता राजा या रानी नहीं है इतना तो निश्चित है क्योंकि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते है. पता नहीं अब आगे कांग्रेस क्या करेगी? वैसे हो सकता है कि वो भविष्य में रोबर्ट वाड्रा में अपने भविष्य की तलाश करे, वैसे भी वाड्रा ने राजनीति में प्रवेश की अपनी ईच्छा जता भी दी है. मुझे पता है कि कांग्रेस मेरी सलाह को मानेगी नहीं लेकिन मैं उसे सलाह देना चाहूँगा कि परिवार के बाहर भी तो देखो. पार्टी में ऐसे कई नेता हैं जो काफी योग्य हैं उनमें नेतृत्व-क्षमता कूट-कूटकर भरी है.

मंगलवार, 12 मार्च 2019

राहुल जी के मसूद अजहर जी


मित्रों, आजकल कांग्रेस की जो छवि जनता के बीच बन रही है वह कोई अच्छी छवि नहीं है. पिछले कुछ सालों में भारत की जनता ऐसा मानने लगी है कि कांग्रेस किसी-न-किसी तरह पाकिस्तान और पाकिस्तान के बल पर पलने और आतंकी हमले करनेवाले संगठनों का समर्थन करती है. वैसे विश्वास तो नहीं होता कि यह वही कांग्रेस है जो एक समय कट्टर राष्ट्रवादी पार्टी थी और उसने देश की आजादी के लिए चलनेवाले आन्दोलन को नेतृत्व दिया था. मगर क्या करें साहब इतिहास को तो हम बदल नहीं सकते.
मित्रों, जरा कल्पना कीजिए कि आज से ठीक १०० साल पहले कांग्रेस क्या कर रही थी. तब वह रौलेट एक्ट के खिलाफ पूरे देश में आन्दोलन चला रही थी. चारों तरफ आसमान वन्दे मातरम और भारत माता की जय के नारों से गूँज रहा था. गाँधी तब कांग्रेस के सर्वमान्य नेता नहीं बने थे बल्कि बनने की प्रक्रिया में थे. और ठीक १०० साल बाद वही कांग्रेस जैसे राष्ट्रवाद से नफरत करने लगी है. जो सैनिक देश पर अपने प्राण न्योछावर कर देने में जरा-सी भी झिझक नहीं दिखाते कांग्रेस को उन पर भी भरोसा नहीं है. वो कभी सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगती है तो कभी एयर स्ट्राइक के. आखिर ऐसा क्या कारण है कि कांग्रेस को आज भारतीय सेना से ज्यादा यकीन शत्रु देश पाकिस्तान के नेताओं पर है जो एक ही दिन में कई बार अपने बयानों से पलट जाते हैं? कभी-कभी तो ऐसा लगता ही नहीं कि कांग्रेस भारत की पार्टी है बल्कि उसका रवैया देश के प्रति इतना गैरजिम्मेदाराना होता है कि वो पाकिस्तान की राजनैतिक पार्टी लगती है और ऐसा लगता है कि जैसे उसे भारत में नहीं पाकिस्तान में चुनाव लड़ना है.
मित्रों, पुलवामा हमले के बाद मुझे जब मीडिया में पढने को मिला कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी जी ने अपने बकवादी नेताओं को बयान देने से पूरी तरह से मना कर दिया है तो मुझे काफी ख़ुशी हुई. लेकिन यह क्या? एक बार जो भारत और भारतीय सेना के खिलाफ कांग्रेस के नेताओं ने बोलना शुरू किया तो जैसे उनके बीच होड़-सी मच गई. लगा जैसे इस तरह की कोई प्रतियोगिता चल रही है कि कौन भारत और भारतीय सेना के खिलाफ कितनी संख्या में और कितने घटिया बयान देता है. कोई सिद्धू नामक कथित सरदार कहने लगा कि आतंकी हमले के लिए पाकिस्तान जिम्मेदार ही नहीं है. भारत को उसके ऊपर कार्रवाई करने के बदले उसके साथ बातचीत करनी चाहिए. तो वहीँ राहुल गाँधी जी के राजनैतिक गुरु दिग्विजय सिंह ने पुलवामा हमले को सीधे-सीधे दुर्घटना बता दिया मानों वहां पर सीआरपीएफ के जवान बस के पलट जाने से मारे गए.
मित्रों, अब जब होड़ लगी ही है तो कांग्रेस के अध्यक्ष महोदय कैसे पीछे रहने वाले थे तो कल उन्होंने भी जैश सरगना मौलाना मसूद अजहर को मसूद अजहर जी कहकर अपना पेट का दर्द मिटा लिया. मौलाना मसूद अजहर जी? वो भी ऐसे जैसे मसूद अजहर जो जीता जगता दरिंदा है के लिए उनके मन में कितनी ईज्ज़त है, कितनी श्रद्धा है. आज शर्म आती है मुझे भी यह कहते हुए कि मेरे दादा जी कांग्रेसी थे और १९४२ में जेल गए थे ठीक उसी तरह जैसे बिहार कांग्रेस के प्रवक्ता विनोद शर्मा को शर्म आई और उन्होंने यह कहने हुए अपनी पार्टी और पद से इस्तीफा दे दिया कि लोग कांग्रेस को आतंकवादियों की पार्टी मानने लगे हैं.
मित्रों, आपने गौर किया होगा कि मैंने अपने पूरे आलेख में सिर्फ राहुल गाँधी जी के नाम के बाद जी लगाया है. मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि ऐसा मैंने इसलिए कतई नहीं किया है क्योंकि मैं उनका आदर करता हूँ बल्कि मैंने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि क्या करें मौसी अपना तो दिल ही कुछ ऐसा है.

सोमवार, 11 मार्च 2019

जनता का घोषणा-पत्र

मित्रों,चुनाव का डंका बज चुका है. पूरा कार्यक्रम आपने टीवी पर देख भी लिया होगा. कुछ ही दिनों में देश की सभी पार्टियाँ अपना घोषणा-पत्र जारी करना शुरू करेंगी. मैं जानता हूँ यह काफी मुश्किल काम है. और शायद उससे भी मुश्किल काम है जनता का घोषणा-पत्र तैयार करना कि जनता क्या चाहती है.
मित्रों, जहाँ तक मुझे लगता है इस बार के चुनावों में पाकिस्तान सबसे बड़ा मुद्दा रहनेवाला. पुलवामा और एयर स्ट्राइक के बाद देश की जनता जानना चाहती है कि कौन-सी पार्टी किस तरफ है? किसकी जीत से पाकिस्तान में दिवाली के पटाखे फूटेंगे और किसकी जीत पर वहां के लोग मुहर्रम मनाएंगे? कौन-सा दल पाकिस्तान का राम नाम सत करना चाहता है और कौन-सा दल मजबूत पाकिस्तान के पक्ष में है? कौन-सा दल भारतीय सेना पर गर्व करता है और कौन-सा दल भारतीय सेना को बलात्कारियों का संगठन मानता है? कौन-सा दल चीन को भारत का दीर्घकालिक शत्रु मानता है और कौन-से दल को चीन भारत से भी ज्यादा जान से प्यारा है? कहना नहीं होगा इस बार देश की जनता पाकिस्तान से आर या पार के मूड में है और चाहती है कि देश में इस तरह की सरकार बने कि २०२४ के चुनाव आते-आते पाकिस्तान दुनिया के नक़्शे से ही समाप्त हो जाए और अगर बचा भी रहे तो उसका क्षेत्रफल एक-चौथाई रह जाए. मैं समझता हूँ कि आज भी देश की जनता के लिए राष्ट्र और राष्ट्र का सम्मान सर्वोपरि है और आगे भी रहेगा.
मित्रों, देश की जनता जानती है और मानती है कि जनसँख्या-विस्फोट भारत की समस्त समस्याओं की जड़ है. जब तक देश की जनसंख्या-वृद्धि अनियंत्रित रहेगी देश असंख्य समस्याओं से जूझता रहेगा. कृषि के लिए जमीन घटती जाएगी और अंत में फिर से देश में उसी तरह के अकाल पड़ेंगे जैसे १०० साल पहले पड़ा करते थे. इसलिए देश की जनता चाहती है कि सरकार अविलम्ब ऐसी जनसँख्या नीति लाए जिससे जनसँख्या-विस्फोट पर प्रभावी लगाम लग सके. मैं समझता हूँ कि ट्राफिक जाम, अस्पतालों में भीड़, ट्रेनों में सीटों का न मिलना, बेरोजगारी आदि समस्याओं पर तभी लगाम लगाया जा सकता है जब जनसँख्या-वृद्धि को रोका जाएगा. सवाल उठता है कि जब जानवरों की संख्या बढती है तो उसपर लगाम लगाने की मांग भी उठने लगती है तो फिर आदमी की संख्या को भी क्यों नहीं  नियंत्रित किया जा रहा?
मित्रों, देश की जनता के लिए तीसरा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है शिक्षा. हम जानते हैं कि दुनिया के २०० सर्वोत्तम विश्वविद्यालयों में भारत का कोई विश्वविद्यालय नहीं है जबकि आजादी मिले ७५ साल हो चुके हैं. जबसे आर्थिक उदारीकरण शुरू हुआ सरकारों ने शिक्षा की तरफ ध्यान ही देना बंद कर दिया. आज भी देश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षकों की आधी सीटें खाली है. प्राथमिक शिक्षा का स्तर इतना गिर गया है कि अब गरीब-से-गरीब व्यक्ति भी उनमें अपने बच्चों का नामांकन नहीं करवाना चाहते. दूर-दराज के इलाकों में भी माउंट लिटेरा, गोयनका जैसे बड़े-बड़े उद्योगपतियों के स्कूल खुल गए हैं जो वास्तव में लुटेरे हैं. जिनका मकसद सिर्फ और सिर्फ पैसे कमाना है और शिक्षा के प्रचार-प्रसार से जिनका दूर-दूर तक कोई भी लेना-देना नहीं है. सवाल उठता है कि अमीरों के बच्चे तो इन स्कूलों में पढ़ लेंगे लेकिन गरीबों के बच्चों को कौन पढ़ाएगा? और अगर उनको पार्टियाँ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं दे सकती तो हटा दें संविधान से समानता शब्द को उन प्रत्येक स्थानों से जहाँ-जहाँ भी यह शब्द आया है और लिख दें कि भारत में लोकतंत्र नहीं है कुलीनतंत्र है.
मित्रों, देश की जनता के समक्ष आज भी न्याय का मिल पाना टेढ़ी खीर है. डॉक्टर, उद्योगपति, पुलिस, जज, क्लर्क, अधिकारी, जनप्रतिनिधि सभी भ्रष्ट हैं. हालाँकि वर्तमान सरकार ने सीधे लाभार्थी के खाते में पैसे डालकर इस पर लगाम लगाने की कोशिश की है लेकिन अभी तक भ्रष्टाचार और विलंबित न्याय की समस्या पर प्रभावी नियंत्रण लगता दिख नहीं रहा है. पूरा देश परेशान है कि अन्याय होने पर जाएँ तो जाएँ कहाँ और तब कहाँ जाएँ जब अन्यायी सत्ता पक्ष का बड़ा नेता हो?
मित्रों, इसके अतिरिक्त खेती-किसानी से जुड़े मुद्दे भी इस बार के चुनावों में काफी महत्वपूर्ण रहनेवाले हैं.  सांढ़ों-नीलगायों से पूरे देश के किसान परेशान हैं और खेती छोड़ना चाहते हैं. साथ ही देश पर जान न्योछावर करनेवालों अर्द्धसैनिकों को शहीद का दर्जा और पूरा पेंशन भी जनता की मांगों में शामिल रहने वाला है.
मित्रों,इसके साथ ही भारत की जनता चाहती है कि देश में प्रत्येक व्यक्ति को उसकी योग्यतानुसार पारिश्रमिक और काम मिले. आज भी देश का क्रीम विदेश पलायन कर जाता है क्योंकि अपने देश कोई उसकी क़द्र ही नहीं करता. इस समय देश में सबसे ख़राब हालात शिक्षित बेरोजगारों की है. या तो उनको काम नहीं मिल रहा और अगर मिल भी रहा है तो काफी कम वेतन पर. बैंक भी लोन नहीं दे रहे. बेचारे क्या करें और कहाँ जाएँ?
मित्रों, जहाँ तक मेरी सोंच की सीमा है मैंने अपने दिमागी घोड़े दौडाए. मैं बहुत छोटा आदमी हूँ और मेरी क्षमता काफी कम है इसलिए अगर आपको ऐसा लगता है कि मुझसे कुछ छूट गया है तो बिलकुल भी संकोच न करें और टिपण्णी द्वारा इस सूची को पूर्ण करने में सहयोग दें.

गुरुवार, 7 मार्च 2019

फाइल चोरों से सावधान

मित्रों, उस समय मैं कॉलेज में पढता था. उस समय हमारे एक सीनियर हुआ करते थे जो कॉलेज प्रशासन से नाखुश रहा करते थे. श्रीमान रोज पुस्तकालय जाते मगर किताब पढने नहीं बल्कि इस किताब चुराने. मौका मिला नहीं कि थैले में किताब रखकर निकल लिए. हद तो यह थी कि दो-चार दिन बीत जाने के बाद लाइब्रेरियन से वो वही किताब निर्गत करने के लिए कहते जो किताब वे चुरा चुके थे. स्वाभाविक था कि वो किताब तो लाइब्रेरी से चोरी हो चुकी थी इसलिए लाइब्रेरियन उसे खोजता-खोजता थक जाता तब मेरा वो सीनियर उस पर किताब घर ले जाने के आरोप लगाता, चीखता-चिल्लाता और लाइब्रेरियन को मजबूरन उसकी बकवास को सर झुकाए सुनना पड़ता.
मित्रों, कदाचित हमारी मोदी सरकार भी कुछ इसी तरह से हालात से गुजर रही है. जिन लोगों ने फाइल चोरी करवाई वही लोग अब सरकार से फाइल मांग रहे हैं. अब जब फाइल सरकार से पास है ही नहीं तो वो देगी कहाँ से? अब गलती सरकार से हुई है तो शर्मिंदा भी उसे ही होना पड़ेगा जैसे कि कभी मेरे कॉलेज के उन लाइब्रेरियन सर को होना पड़ता था.
मित्रों, अभी कुछ दिन पहले मुझे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की प्रशंसा में इंडिया टीवी पर एक कार्यक्रम देखने का सुअवसर मिला. उसमें बताया गया था कि मोदी जी ने प्रधानमंत्री निवास और प्रधानमंत्री कार्यालय में उन्हीं कर्मचारियों-आदेशपालों और अधिकारियों को रखा है जो पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी के समय वहां कार्यरत थे. उस दिन तो मैं भी प्रधानमंत्री मोदी जी की भलमनसाहत देखकर काफी खुश हुआ लेकिन जब कल-परसों फाइल चोरी का प्रकरण सामने आया तो समझा कि ज्यादा अच्छा होना भी कभी-कभी उसी तरह से नुकसानदेह होता है जैसे प्राचीन यूनानी नाटकों में होता था जब नायक अपनी अच्छाई और दयाभाव के चलते पराजित हो जाता था और मारा जाता था यकीं न हो तो जूलियस सीजर नाटक देख-पढ़ लीजिए.
मित्रों, आलेख के अंत में मैं प्रधानमंत्री मोदी जी को एक बार फिर से आदतन मुफ्त में चंद सलाह देना चाहूँगा कि वे किसी पर भी आँखे बंद कर विश्वास न करें चाहे तो अधिकारी हो या चपरासी क्योंकि यह घनघोर कलियुग है और आज के ज़माने में न अमीर और न गरीब पर विश्वास किया जा सकता है. साथ ही मोदी जी को चाहिए कि जहाँ तक हो सके विभिन्न विश्वसनीय पदों पर सिर्फ अपने लोगों को रखें और वैसे लोगों को तो कभी अपने कार्यालय में नहीं रखें जो पिछली सरकार के प्रति घनघोर वफादार रहे हों. आगे प्रधानमंत्री जी की मर्जी. वैसे भी मेरी कौन-सी बात पर उन्होंने अब तक ध्यान दिया है? करवाते रहें फाइल चोरी और होते रहें शर्मिंदा और हमें भी करवाते रहें.

रविवार, 3 मार्च 2019

शहीदों की मजारों पर मूतेंगे अब कुत्ते


मित्रों,आपलोगों को मैं कई बार बता चुका हूँ कि मेरा छोटा चचेरा भाई वीरमणि १९९८ में आतंकवादियों से लड़ता हुआ मृत्यु को प्राप्त हो गया था. उसके बाद मेरे बड़े भैया और मेरी चाची को मुआवजे और पेंशन के लिए कई सालों तक जो भाग-दौड़ करनी पड़ी थी उसका मैं खुद चश्मदीद गवाह हूँ. मेरा छोटा भाई बीएसएफ में था इसलिए मैंने उसके नाम के साथ शहीद शब्द का प्रयोग नहीं किया क्योंकि भारत सरकार उनको शहीद मानती ही नहीं. २००५ के बाद अर्द्धसैनिक बल में जानेवाले को पेंशन भी नहीं मिलता जबकि मैं समझता हूँ कि उनकी नौकरी सेना के मुकाबले कहीं से भी कम जोखिमवाली नहीं है. आखिर यह भेदभाव क्यों? क्या अपने को उग्र राष्ट्रवादी कहनेवाली पार्टी और उस पार्टी के महान नेताओं के पास इसका जवाब है? कौन बताएगा कि अर्द्धसैनिक बलों के जवानों की शहादत किस तरह सेना के जवानों की शहादत के कमतर होती है?
मित्रों, आपने भी पढ़ा होगा कि उस शहीद हेमराज के परिजन मुआवजे के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं जिसके सिर को पापिस्तान द्वारा काट लिए जाने को भारतीय जनता पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनावों में बड़ा मुद्दा बना दिया था. मरनेवाला मर गया. चुनाव जीतनेवाले जीत गए मगर क्या किसी ने शहीद के परिवार की सुध ली? अगर नहीं तो क्यों? क्या यह हमारी यानि जनता की संवेदनहीनता और झूठी देशभक्ति को उजागर करनेवाली शर्मनाक घटना नहीं है? न जाने कितने ही हेमराज के परिजन अगर आज देश के विभिन्न दफ्तरों में उपेक्षा और जलालत का जहर पीकर चक्कर काटते फिर रहे हैं तो इसमें किसकी गलती है? क्या हम और आप भी इसके लिए किसी-न-किसी प्रकार से दोषी नहीं हैं?
मित्रों, आज एक और शर्मनाक घटना मेरे राज्य बिहार में घटी है. आपने अख़बारों में पढ़ा होगा कि बिहार का एक वीर नौजवान पिंटू सिंह पिछले दिनों आतंकवादियों से लोहा लेता हुआ जम्मू और कश्मीर में शहीद हो गया. आज उसका शव जब पटना पहुंचा तो बिहार के किसी भी मंत्री के पास उसके शव पर माल्यार्पण करने के लिए समय नहीं था. यहाँ तक कि सत्तारूढ़ दलों के किसी छुटभैय्ये नेता के पास भी आज शहीद के लिए वक़्त नहीं था जबकि अबसे कुछ देर बाद जब भारत के प्रधानसेवक जब पटना में जनसभा को संबोधित करने के लिए उसी पटना हवाई अड्डे पर उतरेंगे तो बिहार के सारे मंत्री उनकी अगवानी में पलक पांवड़े बिछाए एक पैर पर खड़े मिलेंगे. क्या यही सम्मान है हमारे सियासतदानों की नज़रों में शहीदों के सर्वोच्च बलिदान का? क्या यही उनका राष्ट्रवाद है?
मित्रों, पिछले दिनों एक ऐसी खबर मुझे अख़बार में पढने को मिली जिसने मुझे उद्वेलित करके रख दिया. खबर बिहार के शहर मुजफ्फरपुर से थी. आप जानते होंगे कि स्वतंत्रता आन्दोलन के प्रथम शहीद खुदी राम बोस को यहाँ ११ अगस्त १९०८ को फांसी दी गई थी. तब १९ वर्षीय खुदी राम ने कहा था कि वो जल्द-से-जल्द फांसी पर चढ़ना चाहता है ताकि दोबारा जन्म लेकर दोबारा देश के लिए फांसी पर चढ़ सके. उसी खुदीराम का समाधि-स्थल आज बदहाल है और कुत्ते उस पर पेशाब कर रहे हैं. वो शहर भर के आवारा कुत्तों का विश्रामालय बन गया है.
मित्रों, जगदम्बा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ ने १९१६ में लिखा था कि
उरूजे कामयाबी पर कभी हिन्दोस्ताँ होगा
रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियाँ होगा
चखाएँगे मज़ा बर्बादिए गुलशन का गुलचीं को
बहार आ जाएगी उस दम जब अपना बाग़बाँ होगा
ये आए दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ ख़ंजरे क़ातिल
पता कब फ़ैसला उनके हमारे दरमियाँ होगा
जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज़
न जाने बाद मुर्दन मैं कहाँ औ तू कहाँ होगा
वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है
सुना है आज मक़तल में हमारा इम्तिहाँ होगा
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा
कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे
जब अपनी ही ज़मीं होगी और अपना आसमाँ होगा.
मित्रों, हमने सुना है कि इन दिनों पूरी दुनिया में भारत की कामयाबी पूरे उरूज और शबाब पर है फिर क्यों शहीदों की मजारों पर मेले नहीं लग रहे बल्कि कुत्ते पेशाब कर रहे हैं? जब भी मुझे यह पढने-सुनने को मिलता है कि सैनिक की जमीन पर गाँव के दबंगों ने कब्ज़ा कर लिया और शिकायत कर पर थानेदार ने उसे अपमानित किया तो क्या बताऊँ कि मेरे दिल पर क्या गुजरती है? ऐसे सलूक तो उनके साथ अंग्रेजों के राज में भी नहीं होता था.
मित्रों, कुल मिलाकर मैं चाहता हूँ कि अर्द्धसैनिक बलों को भी पेंशन दिया जाए हमें भले ही नहीं दिया जाए, अर्द्धसैनिक बल के उन जवानों  को भी शहीद का दर्जा दिया जाए जो देश की रखवाली करते हुए हँसते-हँसते अपने प्राण उत्सर्ग करते हैं, साथ ही सैनिकों-अर्द्धसैनिकों को सामजिक सम्मान मिले, उनकी संपत्ति की समाज उसी तरह रक्षा करे जैसे वे हमारे सरहदों की करते हैं न कि राष्ट्रवाद वोट बटोरने का साधन मात्र बनकर रह जाए;राष्ट्रवाद सिर्फ एक नारा बनकर रह जाए.

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019

मोदी है तो मुमकिन है


मित्रों, पिछले तीन दिन भारतीय उपमहाद्वीप और पूरी दुनिया के इतिहास में काफी महत्वपूर्ण साबित होने जा रहे हैं. इन तीन दिनों में भारत और दुनिया को जो देखने का सुअवसर मिला उसके बारे में आज से ५ साल पहले कोई सोंच भी नहीं सकता था. भारत ने परसों पाकिस्तान के ८० किलोमीटर भीतर तक स्थित आतंकी ठिकानों को न सिर्फ एयर स्ट्राइक करके उड़ा दिया बल्कि पूरी दुनिया के समक्ष उसकी घोषणा भी की और पापिस्तान पाकिस्तान परमाणु बम की धमकी देता रह गया. कल पापिस्तान ने जब भारत के सैन्य ठिकानों पर जवाबी एयर स्ट्राइक करने की कोशिश की तो भारत ने तकनीकी रूप से ६० साल पीछे के विमानों के द्वारा पाकिस्तान के अत्याधुनिक एफ १६ विमान को मार गिराया. दुर्भाग्यवश जिस जाबांज वायुसैनिक ने यह असंभव कारनामा कर दिखाया खुद उसके विमान में भी आग लग गई क्योंकि मिग विमान एयर क्रैश के लिए ही जाना जाता है और उसे पापिस्तान में उतरना पड़ा. हद तो यह हुई कि पापिस्तान की पापी जनता ने अपने ही पायलट की पीट-पीटकर हत्या कर दी।
मित्रों, इसके बाद पापिस्तान ने सोंचा कि वायुसैनिक अभिनन्दन को ढाल बनाकर वो मोदी सरकार को उसी तरह से ब्लैक मेल कर लेगा जैसे १९९९ में कंधार विमान अपहरण के समय वाजपेयी सरकार को किया था. लेकिन मोदी जी की सरकार ने दहाड़ते हुए कहा कि हमारे सैनिक को बिना शर्त अविलम्ब रिहा कर वर्ना गंभीर परिणाम भुगतने को तैयार रह. यह अपार हर्ष का विषय है कि पापिस्तान कल अभिनन्दन को बिना शर्त रिहा करने जा रहा है.
मित्रों, इससे पहले जब बालाकोट में जैश के सबसे बड़े प्रशिक्षण शिविर को भारतीय वायुसैनिकों ने उड़ा दिया तब पापिस्तान की हालत देखने लायक थी. पापिस्तान न तो यह कह सकता था कि भारत ने उसके नागरिकों को मारा है और न ही यह कह सकता था कि नहीं मारा है. अंत में उसने यह कहना शुरू कर दिया कि भारत ने खाली स्थानों पर बम गिराया है मगर उसकी पोल खुद बालाकोट के निवासियों ने ही खोल दी यह कहकर कि ऊपर पहाड़ पर स्थित मदरसे पर बम गिरा है मगर पापिस्तान की सेना उस तरफ किसी को जाने नहीं दे रही. पापिस्तान ने यह बार-बार कहा कि वो पूरी दुनिया की मीडिया को उस स्थान पर ले जाएगी जहाँ भारत ने बम गिराए हैं लेकिन उसने अब तक भी ऐसा नहीं किया है. इस बीच गुप्त सूत्रों से सूचना मिल रही है कि पापिस्तान मारे गए आतंकवादियों के शवों को ठिकाने लगाने में जुटा हुआ है.
मित्रों, कुल मिलाकर मोदी पापिस्तान को मार भी रहे हैं और हद तो यह है कि रोने भी नहीं दे रहे. यह नया भारत है न कि मनमोहन का २००८ का भारत जब वायुसेना सरकार से एयर स्ट्राइक की अनुमति मांगती रह गई और सरकार ने अनुमति नहीं दी. आज का भारतीय नेतृत्व न सिर्फ पापिस्तान बल्कि चीन से भी आँखों में आँखें डालकर बातें करता है डरने का तो प्रश्न ही नहीं उठता.
मित्रों, वास्तव में भारत की सेना कभी कमजोर थी ही नहीं १९६२ में भी नहीं जब चीन के हाथों भारत को हार का सामना करना पड़ा था तब भी नहीं बल्कि कमजोर था तो हमारा नेतृत्व. यह हमारा सौभाग्य है कि आज भारत का जितना वैश्विक रूतबा है पहले कभी नहीं था. इतिहास के पन्नों को अगर हम पलट कर देखें तो १९६९ में इस्लामिक राष्ट्रों की बैठक में से भारत के प्रतिनिधियों को बैठक स्थल से वापस लौटा दिया गया था क्योंकि पापिस्तान ने बैठक के बहिष्कार की धमकी दी थी और कल उसी इस्लामिक राष्ट्रों की बैठक में भारत पहली बार गेस्ट ऑफ़ ऑनर बनने जा रहा है. पापिस्तान एक बार फिर से बहिष्कार की धमकी दे रहा लेकिन उसकी तरफ कोई ध्यान ही नहीं दे रहा.
मित्रों, तत्काल यह प्रसंग नरकेसरी अभिनन्दन की रिहाई के बावजूद मुझे नहीं लगता कि समाप्त होने है क्योंकि नया भारत तब तक अपने बढ़ते कदम को नहीं रोकेगा जब तक पापिस्तान की धरती से आतंकवाद को जड़-मूल से समाप्त नहीं कर दिया जाता और मसूद, सईद जैसे आतंकी सरगनाओं को भारत के हवाले नहीं कर दिया जाता. पापिस्तान को यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि भारत की दुश्मनी पापिस्तान के साथ नहीं है, बिलकुल नहीं है बल्कि उसकी दुश्मनी सिर्फ और सिर्फ आतंकवाद से है. हालाँकि इस बीच भारत ने पिछले ३ दिनों में विश्व समुदाय को यह जरूर बता दिया है कि भविष्य में विश्व का नेतृत्व कोई और देश नहीं बल्कि हमारा भारत करेगा. सूरज हमेशा पूरब से उगता है और इस बार भी दुनिया को अपनी धमक और चमक से चकाचौंध कर देनेवाला सूरज पूरब से उदित हो रहा है और उसका नाम है भारत. अंत में भारत की जय, भारत की सेना की जय और भारत के उस तेजस्वी नेतृत्व की जय जिसके सिर पर फिलहाल भारत के मान-सम्मान की पगड़ी गर्व से सुशोभित हो रही है. भारतमाता के वीरपुत्र अभिनन्दन के साथ-साथ पूरे भारत का अभिनन्दन.

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

हिंदुस्तान में कितने पाकिस्तान?


मित्रों, आपकी नज़रों में पाकिस्तान क्या है? शायद एक ऐसे मुल्क का नाम जो बेवजह भारत को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझता है! पर मेरे लिए पाकिस्तान का मतलब है घर में बंटवारा करने या करवानेवाले लोग, दूसरों की संपत्ति पर कब्ज़ा जमाना, दूसरों को धोखा देना अपना धर्म समझनेवाले लोग.
मित्रों, आपके पाकिस्तान का निर्माण हुए ७५ साल बीत चुके हैं लेकिन इन दिनों हमारे देश में जो कुछ भी घटित हो रहा है उसे देखते हुए तो यही लगता है कि इस बीच आपकेवाले हिंदुस्तान में न जाने कितने मेरेवाले पाकिस्तान बन चुके हैं. मेरा मतलब आप शायद समझ गए होंगे कि हिंदुस्तान भी एक मुल्क है जैसे कि पाकिस्तान एक मुल्क है लेकिन मेरे लिए हिंदुस्तान सिर्फ एक मुल्क नहीं है बल्कि मेरा धर्म है, मेरी भक्ति है, मेरी शक्ति है, मेरी पूजा है, मेरा सबकुछ है. मतलब कि मेरे लिए हिंदुस्तान का मतलब है ऐसा घर जिसमें सिर्फ प्रेम ही प्रेम हो, ऐसी पवित्र भावना जो दूसरों के सुख में ही अपना सुख समझती हो हिंदुस्तान है.
मित्रों, तो मैं कह रहा था कि हिंदुस्तान में दुर्भाग्यवश कई सारे पाकिस्तान बन चुके हैं. पुलवामा में प्रेम दिवस के दिन यानि १४ फरवरी, २०१९ को नफरत की खून भरी होली खेली गयी और इसके पीछे था भारत का पडोसी मुल्क पाकिस्तान. पाकिस्तान का तो काम ही नफरत करना है क्योंकि उसका निर्माण ही नफरत की नींव पर हुआ है इसलिए वो अगर ऐसा करता है तो किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए. लेकिन मुझे तब घोर आश्चर्य हुआ जब मैंने पाया कि भारत से नफरत करनेवालों में से कई हमारे पड़ोस में भी रहते हैं. उनमें से कई सिर्फ इसलिए मेरे पड़ोस में पाकिस्तान को आबाद कर रहे हैं, जिंदाबाद कर रहे हैं क्योंकि वे मुसलमान हैं, कईयों ने सिर्फ इसलिए मेरे पड़ोस में पाकिस्तान बना लिया है क्योंकि वे वामपंथी हैं या फिर भाजपा के राजनैतिक विरोधी हैं और वे यह भूल गए हैं कि भाजपा विरोध का मतलब कतई भारत विरोध नहीं होता. उनको नरेन्द्र मोदी से इतनी चिढ है कि वे मोदी की हर बात का तत्काल विरोध करते हैं. इनमें से कई तो कदाचित पाकिस्तान से प्रेम भी करने लगे हैं.
मित्रों, एक और तरह का पाकिस्तान है और वो पाकिस्तान है भारत की राजनीति में काफी लोकप्रिय. इसका इस्तेमाल दक्षिणपंथी राजनीति से जुड़े ऐसे नेता करते हैं जो सिवाय बेहूदा बयानबाजी करने के और कुछ और करना जानते ही नहीं. वो दिन-रात पाकिस्तान-पाकिस्तान की रट लगाए रहते हैं और बात-बात में यह कहते रहते हैं कि इसे पाकिस्तान चले जाना चाहिए, उसे पाकिस्तान भेज दिया जाना चाहिए जैसे उन्होंने लोगों को पाकिस्तान भेजने का ठेका ले रखा है. वे २४ घंटे इस भ्रम में रहते हैं कि पाकिस्तान को गाली देने से हिन्दू खुश हो जाएंगे और उनको वोट दे देंगे. इस तरह की सोंच रखनेवाले कुछ लोग आजकल केंद्रीय मंत्री और राज्यपाल के पद को सुशोभित कर रहे हैं.
मित्रों, आपको लग रहा होगा कि संज्ञा की तरह पाकिस्तान के पांच ही प्रकार होते होंगे. वैसे मैं भी समझ रहा हूँ यह प्रसंग लंबा होने लगा है. इसलिए एक और प्रकार के पाकिस्तान का जिक्र इस शब्द विलास को समाप्त करने की अनुमति चाहूँगा. दरअसल हमारे भारत में एक और खूंखार प्रजाति है नेताओं की जिनके लिए पाकिस्तान तीर्थस्थल है, वोटबैंक है, दुधारू गाय है, वोटों की एटीएम मशीन है. ये नेता हैं छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी गिद्ध सदृश जिनका नेतृत्व आजकल बंगाल की अतिनिर्मम नेता ममता बनर्जी करती हैं. इन लोगों को लगता है कि पाकिस्तान की बड़ाई या बचाव करने से देश-प्रदेश के मुसलमान खुश होते हैं और इन लोगों को अगर ऐसा लगता है शायद काफी हद तक सही भी लगता है क्योंकि ऐसा करने से इनको सचमुच में मुसलमानों का प्रचंड समर्थन मिल जा रहा है. इनके बयान अधिकतर पाकिस्तान को लाभ पहुंचानेवाले होते हैं क्योंकि ये लोग अक्सर अपनी ही सरकार या देशवासियों या अपनी ही सेना पर आरोप लगाते रहते हैं।
मित्रों, मैं समझता हूँ कि अब तक हमने पाकिस्तान की पर्याप्त से भी ज्यादा चर्चा कर ली है. वास्तव में पाकिस्तान इस लायक है ही नहीं कि हम उसके बारे में लिखें. वो तो दुनिया का सबसे घृणित राष्ट्र है, धवल मानवता के चेहरे पर पुती कालिख है जो वेश्या की तरह कभी इसकी गोद में बैठ जाता है तो कभी उसकी गोद में. पहले वो अमेरिका की गोद में बैठा था फिर चीन की गोद में जा बैठा और आजकल सऊदी अरब की गोद में बैठने के चक्कर में है. लेकिन इस बार उसकी दाल गलेगी नहीं जलेगी क्योंकि उसने गलत समय पर भारत से पंगा ले लिया है अब उसे कोई खुदा, भगवान या ईश्वर नहीं बचा सकता.

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2019

अबकी बार आर या पार


मित्रों, कल जम्मू-कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला किया गया है जिसे कश्मीर में अब तक का सबसे बड़ा हमला बताया जा रहा है. मृतकों की संख्या ४४ हो चुकी है. पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद ने इसकी जिम्मेदारी ली है.
मित्रों, अब समय आ गया है कि हम इस तरह की घटनाओं की सिर्फ निंदा करना बंद करें और आतंक की जड़ पर प्रहार करें क्योंकि यह लडाई किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह से नहीं है बल्कि विचारधारा से है. उस विचारधारा से है जिसको सऊदी अरब वित्तपोषित करता है और फिर उन पैसों से पूरी दुनिया में मस्जिदों और मदरसों का जाल बिछाया जाता है जहाँ बच्चों को बचपन से ही जन्नत के सुनहरे सपने दिखाए जाते हैं.
मित्रों, मैं नहीं जानता कि इस धरती से अलग कहीं स्वर्ग या नरक है या नहीं क्योंकि अब तक तो कहीं और जीवन मिला ही नहीं है लेकिन इतना जानता हूँ कि इस्लामिक कट्टरपंथियों ने धरती को नरक बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है और विडंबना तो यह है कि उनको इस बात का लालच दिया जाता है कि निर्दोषों को मारने के जब वो मरेगा तो मरने के बाद उसे स्वर्ग मिलेगा. इन मूर्खों की समझ में यह क्यों नहीं आ रहा कि जब शरीर ही नहीं रहेगा तो सुख और दुःख का सवाल ही नहीं उठता. और अगर जीवनोपरांत जीवन होता भी है तो भगवान क्या पागल या राक्षस है जो निर्दोषों को मारने और सतानेवालों को ईनाम देगा?
मित्रों, अब कल के हमले की जिम्मेदारी जिस संगठन ने ली है उसके नाम पर गौर फरमाईए-जैश ए मोहम्मद अर्थात मोहम्मद की सेना. मतलब कि इस संगठन का निर्माण ही इस्लाम के प्रवर्तक मोहम्मद साहब के नाम पर हुआ है फिर भी इस्लामिक विश्व मौन है. अगर कुरान या इस्लाम में आतंकवाद के लिए कोई स्थान नहीं है तो बहुत पहले पूरी दुनिया में इसके खिलाफ आवाज उठनी चाहिए थी और लोगों को सडकों पर उतरना चाहिए था लेकिन दुर्भार्ग्यावश ऐसा नहीं हो रहा है जबकि हम उस देश के वासी हैं जहाँ पाकिस्तान से भी ज्यादा मुसलमान रहते हैं. मैं पूछता हूँ कि कल से आज तक या उससे पहले कितनी मस्जिदों के ईमामों ने इस आतंकी हमले की निंदा की? अगर नहीं की तो क्यों नहीं की? मैं केजरीवाल से जो दिल्ली का मुख्यमंत्री है से पूछता हूँ कि क्या इसीलिए वो दिल्ली के मस्जिदों के ईमामों को वेतन देने जा रहा है जिससे कि वे ईमाम इस्लाम में होनेवाले हर सुधार का विरोध करें और आतंकवाद को मौन समर्थन दें?
मित्रों, इस बार हमें आर या पार चाहिए. हम देखना चाहते हैं कि यह सरकार वास्तव में ५६ ईंची है या नहीं. दुर्भाग्य है कि रोजाना हमारे जवान सीमा पार से होनेवाले हमलों में मारे जा रहे हैं. फिर क्यों नहीं एक युद्ध ही लड़ लिया जाए जब हम लगातार युद्ध जैसी स्थिति का सामना कर रहे हैं? साथ ही हमें अपने देश में कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे मस्जिदों और मदरसों की भी जाँच करनी होगी और जरुरत पड़ने पर तोडना होगा और बंद करना होगा अन्यथा भविष्य में भारत में भी जैश ए मोहम्मद जैसे संगठन बनने लगेंगे. केरल में इस तरह के संगठनों के बनने के समाचार मिल भी रहे हैं. साथ ही भारत सरकार को बिना कोई देरी किए जनसँख्या नियंत्रण कानून बनाना होगा क्योंकि जनगणना के आकडे बताते हैं कि मुसलमानों की जनसँख्या हिन्दुओं के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है. साथ ही देश की राष्ट्रभक्त जनता से अपील करता हूँ कि वे #अबकीबारआरयापार के अंतर्गत जमकर पोस्ट करें जिससे सरकार पर दबाव बनाया जा सके।

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

फिर एक बार मोदी सरकार


मित्रों, पिछले दिनों भारत के राजनैतिक मंच पर काफी कुछ घटित हुआ है. उनमें से कुछ घटनाएँ तो ऐसी भी हैं जो इससे पहले कभी देखी ही नहीं गई. कहते हैं कि जब कोई ईमानदार फंसता है तो उसको कोई नहीं बचाता लेकिन जब कोई बेईमान फंसता है तो दुनिया के सारे बेईमान उसे बचाने के लिए आगे आ जाते हैं.
मित्रों, कुछ ऐसा ही घटित हुआ बंगाल में और कुछ ऐसा ही घटित हो रहा है पूरे देश में भी. इन दिनों सारे निशानदार नेता जबरजस्त और शानदार एकजुटता का परिचय दे रहे हैं. इनमें से ज्यादातर तो ऐसे हैं जिनका पूरा राजनैतिक जीवन ही एक-दूसरे को गालियाँ देते हुए बीता है. मैं गंगा किनारे के गाँव का रहनेवाला हूँ इसलिए गंगा में बाढ़ के आने का मुझे काफी पूरा और पुराना अनुभव रहा है. मैंने देखा है कि जब बाढ़ आती है तो डूबने से बचने के लिए चूहे, सांप, नेवले, बिच्छू सभी एक ही पेड़ पर चढ़ जाते हैं. वो कहते हैं न कि मरता क्या नहीं करता.
मित्रों, कुछ ऐसी ही स्थिति इन दिनों ममता बनर्जी के घर पर जमावड़ा लगाने वाले नेताओं की है. इनमें से को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू॥ इन लोगों में तो कोई गुणभेद है ही नहीं.सब एक से एक बढ़कर एक चोर. अगर इनके इतिहास पर नजर डालें तो इनमें ज्यादातर कांग्रेस के खिलाफ कमाएगा लंगोटीवाला और खाएगा धोतीवाला नहीं चलेगा नहीं चलेगा कहकर सत्ता में आए थे लेकिन आज इनमें से सारे-के-सारे धोतीवाला तो छोडिये कोठीवाला बन गए हैं. ऐसे में जब पहली बार केंद्र में एक ऐसी ईमानदार सरकार आई है जो इनसे इनके बेहिसाब गुनाहों का हिसाब मांग रही है तो ये सारे चौकीदार चोर है का नारा लगाते हुए एक जगह पर जमा हो गए हैं. 
मित्रों, हम समझ सकते हैं कि यह उनकी मजबूरी है लेकिन जनता के लिए उनको वोट देना बिल्कुल भी जनता की मजबूरी नहीं है. जनता ने देखा है कि किस तरह आज तक किसी भी राजनेता को उसी तरह से किसी भी भ्रष्टाचार के मामले में कभी सजा नहीं हुई जैसे कि अगलगी में कुत्ता नहीं जलता है. जनता ने देखा है कि किस तरह केजरीवाल २०१३-१५ में कांग्रेस नेताओं के खिलाफ ३५०-४०० पृष्ठों का आरोप-पत्र लिए घूमता था और किस तरह वही केजरीवाल इन दिनों कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए छान-पगहा तोड़ रहा है. 
मित्रों, हमने माना कि जनता की कुछ नाराजगी है मोदी सरकार के साथ लेकिन क्या जनता विपक्ष से किसी भी तरह की उम्मीद रख भी सकती है? नहीं, कदापि नहीं. बल्कि जनता यह अच्छी तरह से समझती है कि देश के लिए कुछ करने का जज्बा अगर किसी में है तो वो सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी में है. कुछ अच्छा अगर सकती है वो सिर्फ और सिर्फ भाजपा ही कर सकती है. जो काम अब नहीं हुए थे उनको अगर आज तक किसी ने किया है तो वो सिर्फ और सिर्फ भाजपा ने किया है वरना किसने सोंचा था कि छगन भुजबल, लालू, सज्जन कुमार जैसे लोग जेल में सड़ेंगे. भारत को बनाना रिपब्लिक कहनेवाले राष्ट्रीय दामाद रोबर्ट वाड्रा से कभी पूछताछ भी होगी और उसके सहित कभी वो पूरी गन्दी गाँधी फैमिली जमानत पर भी होगी जिसको देश को लूटने का खानदानी लाईसेंस मिला हुआ था. किसने सोंचा था कि भारत एफडीआई के मामले में दुनिया का सरताज होगा, किसने सोंचा था कि फोन पर बातचीत मुफ्त में भी हो सकती है और ३ रूपये में १ जीबी मोबाईल डाटा भी मिल सकता है, किसने सोंचा था कि सवर्ण गरीबों की पीड़ा को भी कोई समझेगा और किसने सोंचा था कि किसानों को वेतन भी मिल सकता है, किसने सोंचा था कि पाकिस्तान कंगाल हो सकता है और भारत में हाई स्पीड ट्रेनें चलेंगी. किसने सोंचा था कि एमएसपी को एकबारगी डेढ गुना कर दिया जाएगा, किसने सोंचा था कि देश के सारे परिवारों का बैंकों में खाता होगा और सब्सिडी का पैसा सीधे खाते में जाएगा. किसने सोंचा था कि सारे पेमेंट और ट्रांजैक्शन पलक झपकते मोबाईल से ही हो जाएंगे, किसने सोंचा था कि सौर ऊर्जा और मोबाईल निर्माण के मामले में भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर होगा, किसने सोंचा था कि गौमाता के कल्याण के लिए भी कोई आयोग बनेगा, किसने सोंचा था कि तीन तलाक समाप्त भी होगा, किसने सोंचा था कि केंद्रीय और राज्य मंत्रिमंडल की बैठक कुम्भ के मेले में भी हो सकती है, किसने सोंचा था कि राहुल गाँधी कभी मंदिर भी जाएँगे और अखिलेश-मुलायम कुम्भ में स्नान भी करेंगे..........
मित्रों, कुल मिलाकर देश की जनता के समक्ष और कोई विकल्प है ही नहीं इसलिए दोनों मुठ्ठी बांधकर पूरे भारत की जनता को नारा लगाना होगा फिर से जोड़दार फिर एक बार मोदी सरकार.

रविवार, 3 फ़रवरी 2019

बंगाल में राष्ट्रपति शासन में हो चुनाव


मित्रों, भारत का भद्रलोक कहे जानेवाले बंगाल में १९७७ से सत्ताधारित गुंडागर्दी चल रही है. २० मई २०११ को जब साम्यवादियों की रंगदारी भरे लम्बे शासन का ममता बनर्जी ने अंत किया तभी मैंने कहा था कि ममता की जय-जयकार बंद करो और यह सोंचो कि क्या बंगाल में अब सत्ताधारित गुंडागर्दी समाप्त को जाएगी. क्योंकि मुझे तभी ममता के काम करने का तरीका वही लगा था जो साम्यवादियों का था. आज बंगला में कथित ममता का अतिनिर्मम शासन स्थापित हुए ८ साल हो चुके हैं और वहां दिन-ब-दिन विपक्ष समर्थक मतदाताओं का साँस तक लेना दूभर होता जा रहा है.
मित्रों, मैंने इससे पहले भी केंद्र सरकार से बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाकर दम तोड़ते लोकतंत्र की प्राणरक्षा करने की गुजारिश कर चुका हूँ लेकिन न जाने केंद्र सरकार किस बात का इंतजार कर रही है. आज तो बंगाल पुलिस ने पूछताछ के लिए पहुंची सीबीआई की टीम को ही पकड़कर हिरासत में डाल दिया. जब सीबीआई की बंगाल में यह गति है तो ममताविरोधी मतदाताओं के साथ क्या नहीं हो रहा होगा. बेचारे डर के मारे अपने घरों पर अपनी पार्टी का झंडा तक नहीं लगा सकते क्योंकि ऐसा करने पर उनकी हत्या हो जाएगी.
मित्रों, मैं केंद्र सरकार से पूछना चाहता हूं कि क्या बंगाल में संवैधानिक शासन चल रहा है? अगर नहीं तो क्यों वहां राष्ट्रपति शासन लगाने में देर की जा रही है. सीबीआई भारत की सर्वोच्च जांच एजेंसी और संप्रभुता की प्रतीक है. उसके काम में बाधा डाली जा रही है फिर ऐसे में केंद्र सरकार कैसे मुंह ताकती रह सकती है? क्या इस समय बंगाल का पूरा प्रशासन ममता के इशारों पर काम नहीं कर रहा? क्या ऐसे माहौल में बंगाल में निष्पक्ष मतदान की सोंचना दिवास्वप्न देखने के समान नहीं है?
मित्रों, फिर केंद्र सरकार ने तो भारत की एकता, संप्रभुता और संविधान की रखा की शपथ भी ली है. क्या केंद्र सरकार का यह संवैधानिक कर्त्तव्य नहीं है कि वो बंगाल में संविधान और प्रजातंत्र के मौलिक गुण विरोध करने के अधिकार की रक्षा करे? जब जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लग सकता है तो बंगाल में क्यों नहीं? आखिर संविधान में अनुच्छेद ३५६ को शामिल करने का क्या औचित्य रह गया है जबकि केंद्र सरकार संविधान के चीरहरण को भी मूकदर्शक बनी देखती रहेगी?
मित्रों, मैंने अवार्ड वापसी गैंग से भी एक सवाल पूछना चाहता हूँ कि बंगाल में चल रही सत्ताधारित गुंडागर्दी को लेकर उनकी जुबान क्यों नहीं खुल रही? कल अगर वहां राष्ट्रपति शासन लग जाता है तो यही लोग सडकों पर मुहर्रम मनाते और स्यापा करते नजर आएँगे. थू है तेरे दोपाया होने पर तुम लोग तो चौपाया होने के लायक भी नहीं हो. साथ ही थू है ५६ ईंची सीने वाली केंद्र सरकार पर जिसके सत्ता में होते हुए भी पिछले ५ साल से बंगाल में लोकतंत्र कैद है.

शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

सबके मतलब का बजट

 

मित्रों, मोदी सरकार का अंतिम तथा अंतरिम बजट आज देश के सामने आ चुका है. बजट हमारे हिसाब से उम्मीद से ज्यादा अच्छा रहा है. हमें ऐसी उम्मीद नहीं थी कि यह सरकार इस तरह का बजट पेश भी कर सकती है. क्या गरीब, क्या किसान, क्या मजदूर, क्या महिला, क्या माई और क्या गाय, क्या खानाबदोश, क्या कूड़ा बीननेवाला, क्या युवा, क्या मध्यम वर्ग सबका अप्रत्याशित रूप से इस बजट में ख्याल रखा गया है. साथ ही ख्याल रखा गया है देश का और देश की सुरक्षा का.


मित्रों, बजट में सबसे अच्छी बात जो है वो यह है कि पहली बार देश के किसानों को सीधा पैसा दिया गया है. हालांकि यह राशि ६००० रूपये सालाना काफी कम है लेकिन कम-से-कम किसी ने तो पहली बार किसानों की जेब में सीधे-सीधे पैसा डालने का काम किया है. अपने बजट भाषण के दौरान गोयल ने असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए बड़ा एलान किया है. बजट पेश करते हुए पीयूष गोयल ने शुक्रवार को कहा कि असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को 3,000 रुपये हर महीनें पेशन दी जाएगी. इस योजना से 10 करोड़ कामगारों को लाभ होगा और यह अगले पांच सालों में असंगठित क्षेत्र के लिए विश्व की सबसे बड़ी पेंशन योजना बन सकती है. इस योजना के तहत, कामगारों को 60 साल की उम्र के बाद 3,000 रुपये की मासिक पेंशन मिलेगी. इस योजना का लाभ लेने के लिए सभी मजदूरों को हर महीने 100 रुपये सरकार के खाते में जमा करवाना होगा. इतना ही नहीं मध्यम वर्ग के लोगों को टैक्स से राहत देते हुए गोयल ने टैक्स की सीमा को 2.5 लाख से बढ़ाकर 5 लाख कर दिया है. विदित हो कि भारत के कुल ६.८७ करोड़ करदाताओं में से ३ करोड़ ऐसे हैं जिनकी आय ५ लाख सालाना से कम है. अंतरिम बजट में श्रमिकों का बोनस बढ़ाकर 7 हजार रुपए और 21 हजार रुपए तक के वेतन वालों को बोनस दिए जाने की घोषणा की गई है। इसके अलावा पीएम श्रमयोगी मानधन योजना की घोषणा भी की गई है, जिसके तहत 15 हजार रुपए तक कमाने वाले 10 करोड़ श्रमिकों को इस योजना का लाभ मिलेगा। उनकी ग्रेच्युएटी को बढाकर १० से २० लाख कर दिया गया है. पशुपालन और मत्स्य पालन के लिए कर्ज में 2 फीसदी ब्याज छूट की घोषणा की गई है। अंतरिम बजट में ईन्सानों के साथ-साथ गो वंश को लेकर भी बड़ा ऐलान किया गया है। केंद्र सरकार राष्ट्रीय कामधेनु योजना शुरू करेगी। इसके अलावा घूमंतू समाज के लिए एक वेलफेयर बोर्ड बनाने का फैसला किया गया है।  बजट के मुताबिक, सही पहचान होने के बाद सरकार की योजनाओं का लाभ इन्हें भी मिलेगा।

मित्रों, अगर आप भी दो घर खरीदने का प्लान कर रहे हैं तो मोदी सरकार ने बड़ी राहत दी है। गोयल ने फोर्डेबल हाउसिंग को बढ़ावा देने के लिए बड़ा ऐलान किया। टैक्स छूट एक और साल तक रहेगी जारी। 2020 तक रजिस्ट्रेशन कराने वालों को कोई आयकर नहीं देना होगा। इसके अलावा, दूसरे मकान के नोशनल रेंट पर टैक्स नहीं देना होगा। रेंटल इनकम पर टीडीएस को भी 1.8 लाख से बढ़ाकर 2.4 लाख करने का ऐलान किया गया है। इससे रियल स्टेट सेक्टर को एक बार फिर से गति मिलेगी जो पिछले सालों में मंदी से जूझती रही है.

मित्रों, बजट में रेलवे, रक्षा, शिक्षा, मनरेगा और स्वास्थय के मद में पहले से ज्यादा आवंटन किया गया है. पहली बार भारत का रक्षा व्यय ३ लाख करोड़ रूपये को पार कर गया है.

मित्रों, कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने पूर्वोत्तर राज्यों के लिए बजट आवंटन को 21 प्रतिशत बढ़ाने का प्रस्ताव किया है। गोयल ने शुक्रवार को लोकसभा में 2019-20 का अंतरिम बजट पेश करते पूर्वोत्तर क्षेत्र में सरकार की विकास पहलों को आगे बढ़ाने के लिए 58,166 करोड़ रुपए का आवंटन करने की घोषणा की। गोयल ने कहा कि बुनियादी ढांचे के विकास से पूर्वोत्तर के लोगों को काफी लाभ मिला है। विदित हो कि पूर्वोत्तर का क्षेत्र देश के लिए रणनीतिक दृष्टिकोण से तो महत्वपूर्ण है ही चुनावी दृष्टि से भी कम महत्त्व का नहीं है.

मित्रों, अब बात कर लेते हैं कि सरकार खर्च के लिए पैसे कहाँ से लाएगी. सरकार के खजाने में आने वाले हर एक रुपए में 70 पैसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के जरिए आएंगे। इसी तरह सरकार हर एक रूपए के व्यय में 23 पैसे राज्यों को करों एवं शुल्कों में उनके हिस्से के रूप में दिया जाएगा।  वित्त मंत्री पीयूष गोयल द्वारा शुक्रवार को लोकसभा में पेश अंतरिम बजट 2019-20 के अनुसार सरकार की आय का सबसे बड़ा स्रोत माल एवं सेवा कर (जीएसटी) होगा और हर एक रूपए की प्राप्ति में इसका योगदान 21 पैसे होगा। कॉरपोरेट कर से 21 पैसे, आयकर से 17 पैसे और सीमा शुल्क से चार पैसे प्राप्त होंगे। इसी तरह कर्ज एवं अन्य देनदारियों से 19 पैसे, केंद्रीय उत्पाद शुल्क से सात पैसे, गैर कर स्रोतों से आठ पैसे तथा कर्ज से इतर पूंजीगत आय से तीन पैसे प्राप्त होंगे। इसी तरह प्रति एक रुपए के खर्च में केंद्रीय करों एवं शुल्कों में राज्यों की हिस्सेदारियों का अंतरण है और इस मद में 23 पैसे खर्च होंगे। ब्याज भुगतान पर 18 पैसे, रक्षा क्षेत्र पर आठ पैसे, केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं पर 12 पैसे तथा केंद्र द्वारा वित्तपोषित योजनाओं पर नौ पैसे खर्च होंगे। वित्त आयोग तथा अन्य हस्तांतरण पर आठ पैसे, छूट (सब्सिडी) पर नौ पैसे और पेंशन पर पांच पैसे खर्च होंगे। आठ पैसे अन्य मदों पर खर्च होंगे।

मित्रों, कुल मिलाकर हम इस बजट को सर्वस्पर्शी और सर्वसमावेशी कह सकते हैं. भारत के कुल ९० करोड़ मतदाताओं में से इसमें ६० करोड़ लोगों का सीधा ख्याल रखा गया है. इस बजट से सबको लाभ होगा चाहे वो किसी भी जाति-धर्म का हो किसी भी दल का समर्थक हो. मध्यमवर्ग, किसानों, मजदूरों के हाथों में पैसा आने से जहाँ नोटबंदी और जीएसटी के दुष्प्रभाव दूर होंगे वहीँ दूसरे घर पर टैक्स माफ़ी से रियल स्टेट सेक्टर को एक बार फिर से जी नया जीवन मिलेगा. हालाँकि जिस तरह से वित्त वर्ष 2018-19 के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य से लगातार चूक के बावजूद वित्त वर्ष 2019-20 के लिए लक्ष्य को उसी स्तर पर कायम रखना आश्चर्यजनक है। सारांश यह कि यह  गरीबों, किसानों, मध्यवर्ग और असंगठित मजदूरों का बजट है. विपक्ष इसे चुनावी बजट कह सकता है लेकिन यह साल यह साल राजनैतिक गुना-भाग का है न कि आर्थिक गुना-भाग का.

गुरुवार, 31 जनवरी 2019

अबकि बार अगर मोदी जी गए हार

मित्रों, इस समय देश की हालत काफी नाजुक है. न तो केंद्र की वर्तमान सरकार और न ही विपक्ष देश की वास्तविक समस्याओं के प्रति गंभीर है. दोनों तरफ से ही बेसिर-पैर की बातें हो रहीं हैं. कल राहुल जी ने कैंसरग्रस्त मनोहर पर्रिकर से हुई शिष्टाचारवश की गई मुलाकात का घटिया
राजनीति के लिए इस्तेमाल करके स्तरहीनता के प्रत्येक संभव स्तरों को भी पार कर लिया. आज अगर हमारी आजादी की लडाई के शहीदों की आत्मा कहीं होगी तो वो जरूर वर्तमान भारत के हालात पर रो रही होंगी. मित्रों, हमारी केंद्र सरकार कहती है कि हमारी नीयत पर शक मत करो. क्यों नहीं करो?
क्या इसलिए क्योंकि आपके मंत्रिमंडल में गिनती के लोग ही योग्य हैं और बहुमत आपकी चापलूसी करनेवालों का है. हमने तो समझा था कि आप बांकियों से अलग हैं और आपको चापलूसी के स्थान पर काम पसंद है फिर गिरिराज सिंह, स्मृति ईरानी, अल्फ़ान्सो जैसे लोग आपके मंत्रिमंडल
में क्या कर रहे हैं? क्यों वित्त मंत्रालय, सांख्यिकी आयोग, रिजर्व बैंक आदि महत्वपूर्ण संस्थानों से योग्य लोग इस्तीफा देकर भाग रहे हैं? क्यों आपको या तो आंकड़े बदलने पड़ रहे हैं या फिर उनको दबाना पड़ रहा है? क्यों मेरा देश बदल रहा है वाला गाना अब आपलोगों के मधुर कंठ से सुनाई नहीं दे रहा?
मित्रों, मैं यह नहीं कह रहा कि मोदी सरकार ने बिलकुल भी काम नहीं किया है लेकिन उसने जो सबसे बड़ा काम किया है वो यह है कि उसने हम जैसे उसके हितचिंतकों की सीख पर कान देना बंद कर दिया है. हमने कई साल पहले कहा था कि जेटली जी को वित्त मंत्री से हटाओ नहीं तो ये
देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ तेरी भी बाट लगा देंगे लेकिन हमारी बात नहीं सुनी गई. आज हालत तो देखो खजाना खाली, बेरोजगारी चरम पर. इसे कहते हैं न खाया न पीया और गिलास तोडा पूरे सवा रूपये का. खजाना अगर बेरोजगारों को रोजगार देने में खाली होता, शिक्षा और स्वास्थ्य के
विश्वस्तरीय संस्थान बनाने में खर्च हुआ होता तो एक उपलब्धि होती लेकिन खजाना खाली हुआ बिना कोई तैयारी किए जनता को सरप्राईज देने वाली स्वप्निल योजनाओं नोटबंदी और जीएसटी लागू करने में. उद्योग और व्यापार की तो दुर्गति की ही गई सबसे तेजी से बढ़ोतरी कर रहे रियल स्टेट सेक्टर का तो
जैसे गला ही दबा दिया गया. अब जब व्यापार ही नहीं होगा तो कर कहाँ से आएगा वो तो घटेगा ही न. पता नहीं क्यों जब पहले से भी ज्यादा नोट छापने थे तो क्यों नोटबंदी की? अब क्या फिर से २००० के नोट बंद करेंगे प्रधानसेवक जी? वैसे भी प्रधानसेवक जी सिर्फ अपने मन की करने और अपने मन की कहने के अभ्यस्त रहे हैं. मन की बात, केवल अपने मन की बात. न जाने ये कैसे सेवक हैं कि वे चाहते ही नहीं कि मालिक उनसे कोई सवाल करे इसलिए शायद उन्होंने आजतक एक बार भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं किया.
मित्रों, कहाँ तो कहा जाता था कि भारत के लिए बढती जनसँख्या वरदान साबित होगी. सबको प्रशिक्षित करो, सबके सब उद्यमी बनेंगे कोई उपभोक्ता होगा ही नहीं, सबके-सब उद्यमी. सबके-सब मालिक कोई नौकर नहीं. साथ ही किसी को नौकरी भी नहीं. अगर इस सरकार को वास्तव में देश की चिंता होती तो वो सबसे पहले जनसँख्या नियंत्रण कानून बनाती, आवारा पशुओं की समस्या से निबटती. मैंने मानता हूँ कि गायों की रक्षा की जानी चाहिए लेकिन यह भी तो ठीक नहीं कि मरते हुए आदमी को अस्पताल बाद में पहुँचाया जाए और राजस्थान पुलिस गायों को भोजन पहले करवाए. अगर गायों की इतनी ही चिंता है तो क्यों राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सरकारी और सरकार द्वारा वित्तपोषित गौशालाओं में एक साथ सैकड़ों गाएँ दम तोड़ रही हैं? देश में ईन्सानियत के आंकड़ें रोजाना जमीन सूंघ रहे हैं लेकिन उसकी चिंता किसी को नहीं है. बालिका संरक्षण गृहों में
नेताओं द्वारा छोटी-छोटी बच्चियों का बलात्कार किया जा रहा है, डॉक्टर बेवजह आपरेशन कर रहे हैं, हर आदमी के भीतर एक बलात्कारी पल रहा है लेकिन सरकार को कोई चिंता नहीं. विपक्ष को भी सिर्फ कुर्सी नजर आ रही है और कुर्सी से प्राप्त होनेवाले लाभ दिखाई दे रहे हैं. अभी पांच राज्यों के चुनावों में से तीन सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव जीते २ महीने भी नहीं हुए और कांग्रेस पार्टी की सरकारों ने काफी तेज गति से २००० करोड से भी बड़ा घोटाला कर दिया. किसान कह रहे कि हमने तो लोन लिया ही नहीं और सरकार कह रही कि तुम चुप रहो हमने वादा किया है इसलिए हम
तुम्हारा भी लोन माफ़ करेंगे और करके रहेंगे.
मित्रों, कुल मिलाकर देश की स्थिति ऐसी है जैसी चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु की थी. न तो आगे जाना संभव और न हो पीछे हटना मुमकिन. इसलिए हमारा सुझाव है कि मोदी जी के स्थान पर भाजपा नया सेनापति नियुक्त करे. भाजपा सरकार की खुद की रिपोर्ट के अनुसार राजनाथ
सिंह का काम पूरे मंत्रिमंडल में सबसे अच्छा रहा है तो या तो भाजपा राजनाथ को सेनापति बनाए या फिर गडकरी जी को जिनका काम भी शानदार रहा है क्योंकि मुझे अभी तक ऐसा लग नहीं रहा है कि मोदी जी सवर्ण आरक्षण, राम मंदिर के लिए पहल के बावजूद चुनाव जिता सकने की स्थिति में हैं. पिछले कुछ समय में हुए सर्वेक्षण भी मेरे
मत की तस्दीक करते हैं. यह सही है कि पहले मैंने योगी आदित्यनाथ जी का समर्थन किया था लेकिन तब से लेकर अब तक उनकी लोकप्रियता में काफी कमी आ चुकी है लोग उनसे उबने लगे हैं. वैसे सच पूछिए तो मुझे कल आनेवाले मोदी सरकार के अंतिम मगर अंतरिम बजट से भी
कोई खास उम्मीद नहीं है क्योंकि जब दिशाज्ञान ही नहीं तो फिर मंजिल मिलने की सोंचना ही व्यर्थ है.
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें,
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें.
अबकि बार अगर मोदी जी गए हार,
तो न जाने फिर कब बने राष्ट्रवादी सरकार.

शनिवार, 26 जनवरी 2019

भारत का संविधान हूँ मैं

जिससे बनी पूरी दुनिया में तेरी पहचान हूँ मैं,
मुझे फालतू न समझना
भारत का संविधान हूँ मैं.
टूटा हूँ उदास भी हुआ हूँ
जब मेरे ही पन्नों पर बैठकर
उड़ाई गई है मेरी मर्यादा की धज्जियाँ
जब-जब ली है मानवता के हत्यारों ने
मेरे नाम की शपथ
और आ बैठे हैं संवैधानिक पदों पर
मेरी छाती पर मूंग दलते हुए
तब-तब लगा है मुझे
जैसे टूटा हुआ अरमान हूँ मैं,
भारत का संविधान हूँ मैं. 

मैंने कई बार खुद को
बेकार समझा है
जब किसी थाने के हाजत 
में बंद किया गया है कोई निर्दोष
कई बार रोया हूँ मैं जब घोषित हत्यारे 
को न्यायमूर्ति ने बताया है निर्दोष   
कई बार मेरे शब्द मुझे लगे हैं बेबस 
जब सदन में महीनों तक हुआ है 
सिर्फ हंगामा 
जैसे कि उनका निर्माण सिर्फ 
इसी एक काम के लिए हुआ हो 
यकीं नहीं होता मगर सच यही है
आजादी के दीवाने शहीदों की राख 
पर उपजा वर्तमान हूँ मैं,
भारत का संविधान हूँ मैं.

रविवार, 20 जनवरी 2019

जागो मोदी जागो

मित्रों, आपने जागो ग्राहक जागो वाला प्रचार काफी बार टीवी,रेडियो और समाचार-पत्रों में देखा होगा. पहले यह प्रचार पेट्रोल पम्पों पर भी लगा रहता था पर अब वहां सिर्फ मोदी जी नजर आते हैं वो भी खिलंदड अंदाज में हँसते-मुस्कुराते हुए. तो मैं कह रहा था कि आपको हमारे इस आलेख के शीर्षक को लेकर कतई परेशान नहीं होना चाहिए. दरअसल सरकार देश की जनता को जगाती है और हम बिगडैल पत्रकार सरकार को जगाते हैं. जब सरकार सो जाती है तब हमारी ड्यूटी शुरू होती है.
मित्रों,दरअसल हुआ यह कि पिछले दिनों मैंने फेसबुक पर फैक्ट्री सेल्स डॉट नेट नामक वेबसाइट का एक प्रचार देखा. कहा गया था कि ११०० रूपये में एक सैमसंग का २०५०० एमएएच का पॉवर बैंक और एक सैमसंग का ६४ जीबी का मेमोरी कार्ड प्राप्त करें. जब कूरियर वाले को भुगतान करने के बाद मैंने पैकेट फाड़ा तो पाया कि उसमें एमआई का १०००० एमएएच का पॉवरबैंक और सैमसंग का ६४ जीबी का मेमोरी कार्ड पड़ा था और दोनों ही नकली थे. दिल्ली में दोनों दो-तीन सौ रूपये में बिकते हुए देखे जा सकते हैं. खैर मैंने कंपनी के नंबर पर डायल किया तो वो भी बंद. फिर उसके ईमेल पर मेल किया मगर हफ़्तों तक कोई जवाब नहीं आया. फिर हमने नमो ऐप पर शिकायत कर दी. शिकायत करने के दो-तीन दिन के बाद एक नंबर से फोन आया और मुझसे ठगी का पूरा ब्यौरा माँगा गया. ट्रू कॉलर के अनुसार फोन जागो ग्राहक जागो से आया था. मुझे उन लोगों ने उपभोक्ता फोरम में जाने की सलाह दी. तब तक मैंने पूरा वृतांत फेसबुक पर डाल दिया था. शिकायत करनेवालों की लाईन लग गई कि मेरे साथ भी ऐसा हुआ है. मतलब कि लाइसेंस तो सरकार दे और मुकदमा लड़ते रहें हम. मुकदमा करने पर एक मेरा पैसा मिल भी जाता है तो बांकी लोग जो ठगे गए उनका क्या?
मित्रों, जाहिर है कि मैं अकेला नहीं ठगा गया था बल्कि मेरे जैसे हजारों थे और शायद ठगी करने वाली यह अकेली ऑनलाइन कंपनी भी नहीं है बल्कि कई सारी कंपनियां ऐसा कर रही होंगी. मैंने कहता हूँ कि ऑनलाइन ट्रेड को सरकार खूब बढ़ावा दे लेकिन ग्राहकों की सुरक्षा का भी इंतजाम करे. ऐसा नहीं होना चाहिए कि हम जब शिकायत करें तो उसकी जांच करने के बदले हमें अदालत जाने को कहा जाए. मैंने पूछता हूँ कि फिर सरकार की जरुरत ही क्या है? सब कुछ बाजार के हवाले कर दो बाज़ार चाहे तो लोगों को लूट ले, मार दे या छोड़ दे.
मित्रों, मोदी सरकार की एक और भी कमजोरी है और वो यह है कि मोदी सरकार से कोई गलती हो जाए तो वो अपनी गलती मानती ही नहीं जैसे मोदी और उनके साथी इंसान नहीं भगवान हों जिनसे कभी कोई गलती हो ही नहीं सकती. अब जब गलती मानेंगे ही नहीं तो उसे सुधारेंगे कैसे? उदाहरण के लिए नोटबंदी को ही लें तो सर्वेक्षणों के अनुसार इसके चलते हजारों लघु उद्योग बंद हो गए और १५ लाख लोग पूरी तरह से बेरोजगार हो गए. इतना ही नहीं करीब ५० लाख लोगों को इसके चलते रोजगार में घाटा उठाना पड़ा लेकिन सरकार ने आज तक नहीं माना कि नोटबंदी से कोई नुकसान भी हुआ जबकि इसका असर देश की जीडीपी पर भी पड़ा. मेरी समझ में आजतक यह नहीं आया कि ५०० और १००० के नोट तब क्यों प्रचालन से बाहर कर दिए गए जबकि नए नोट छापे ही नहीं गए थे और उनकी जगह नए नोट लाये भी गए क्यों २००० के नोट लाये गए? मतलब पहले से भी बड़े नोट. इतना ही नहीं नोटबंदी के चलते पडोसी मुल्क नेपाल से भारत के सम्बन्ध ख़राब हो गए लेकिन सरकार को जैसे कोई मतलब ही नहीं, कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा. इसी तरह से बेवजह और मूर्खतापूर्ण तरीके से जीएसटी की दरों को ऊँचा रखा गया जिसे अब कम किया जा रहा है.साथ ही नोटबंदी की तरह ही जीएसटी को भी बिना किसी पूर्व तैयारी के अचानक लागू कर दिया गया.
मित्रों, कुल मिलाकर देश के हालात ऐसे हैं कि इस समय जनता को जगाने की आवश्यकता कम खुद सरकार को जगाने की जरुरत ज्यादा है. गोया हमारे प्रधान सेवक अपने को २४ घंटे जागनेवाला चौकीदार बताते हैं मगर सरकार के काम-काज को देखकर लगता है कि सरकार कुम्भकर्णी निद्रा में सोयी पड़ी है. उसे अविलम्ब देश की सबसे बड़ी समस्या जनसँख्या-विस्फोट को रोकने के लिए कानून बनाना चाहिए था लेकिन नहीं बनाया गया, उसे भ्रष्टाचार पर प्रहार करना चाहिए था लेकिन वो खुद राफेल में उलझी पड़ी है, उसे न्यायिक प्रक्रिया में सुधार लाना चाहिए था जिससे लोगों के न्याय पाना संभव भी हो सके, उसे पुलिस के कामकाज में सुधार लाना चाहिए था, उसे न्यायाधीशों को जिम्मेदार बनाना चाहिए था, उसे राम मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश लाना चाहिए था, उसे कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए था, उसे १०० रूपये से ज्यादा के सारे नोटों के प्रचलन पर रोक लगा देनी चाहिए, उसे सीबीआई को पूरी तरह से स्वायत्तता से काम करने देना चाहिए था, उसे लोकपाल के पद की स्थापना करनी चाहिए थी, उसे मुख्य सूचना आयुक्त के आदेशों का पालन करना चाहिए था, उसे शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए कदम उठाने थे, उसे राजनैतिक दलों को मिलनेवाले चंदों को पूरी तरह से पारदर्शी बना देना चाहिए था, उसे एमपी फण्ड और सांसदों-विधायकों को मिलनेवाले पेंशनों को समाप्त कर देना चाहिए था,उसे सरकारी नौकरियों का खजाना खोल देना चाहिए था, उसे ऐसे काम करने चाहिए थे जिससे करोड़ों नए रोजगार पैदा होते,उसे योग्य लोगों को मंत्री बनाना चाहिए था इत्यादि. मैं नहीं जानता कि आगे मोदी सरकार क्या करने जा रही है. वो जागेगी भी या नहीं या फिर इसी तरह नीम बेहोशी की अवस्था में पड़ी-पड़ी  रुखसत हो जाएगी. फिर पोस्टमार्टम,अफ़सोस और रोना-धोना. फिर, फिर से वही नाउम्मीदी और मायूसी का गहन और निरंतर गहन होते जानेवाला अंधकार.
नित बढ़ रही आत्ममुग्धता को घटाना है, अतिआत्मविश्वास को भगाना है, बहुत मेहनत करनी होगी हमें सरकार को जगाना है.  रिक्त हो रहा भरोसा पवित्र फिर से गंगा को लाना है, निज अभिमान को भगाना है, बहुत मेहनत करनी होगी हमें सरकार को जगाना है. सरकार को जगाना है. ......

रविवार, 13 जनवरी 2019

आरम्भ है प्रचंड देशद्रोहियों में हडकंप

मित्रों, २०१९ का लोकसभा चुनाव अब जैसे आने-आने को है. इस बार का रण अत्यंत भीषण होनेवाला है. स्थितियां २००४ जैसी ही हैं. तथापि जब द्वापर में हुए महाभारत में धर्म का पालन नहीं हो पाया तो फिर आज का युग तो घोर कलियुग का है इसलिए युद्धक्षेत्र में आज धर्म की बात करना तो दूर सोंचना भी पाप है. माना कि अटल बिहारी वाजपेयी ने छल और प्रपंच का मार्ग चुनने के बदले अपनी सरकार का एक वोट से गिर जाना मन्जूर किया. लेकिन उसका खामियाजा देश को १० सालों के भ्रष्टतम शासन से चुकाना पड़ा हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए. मैं जानता था कि मोदी २०१९ को आसानी से २००४ नहीं बनने देंगे इसलिए मैंने कहा था और बार-बार कहा था कि २०१९ में पराजय संभावित तो है लेकिन हमें मोदी और वाजपेयी के फर्क को भी देखना होगा. मोदी कदापि वाजपेयी नहीं है फिर धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भी एक बार युधिष्ठिर को विजय का अन्य कोई मार्ग दिखाई नहीं देने की अवस्था में झूठ बोलना पड़ा था-अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा. इसलिए अगर आज धर्म के विजय के लिए मोदी साम, दाम, दंड और भेद का इस्तेमाल करते हैं तो ऐसा करना उचित ही नहीं अपेक्षित भी होगा.

मित्रों, इस समय मोदी सरकार द्वारा अनारक्षित जातियों को दिए गए १० प्रतिशत आरक्षण से पूरा-का-पूरा राजनैतिक परिदृश्य ही बदल गया है. ऐसा करके मोदी ने कदाचित आरक्षण की पूरी राजनीति को ही समाप्त कर दिया है. लगभग देश की सारी जनता,सारे धर्म और सारी जातियां अब आरक्षण के दायरे में आ गए हैं. अब ऐसा कोई बचा ही नहीं जिसे आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा हो बस उसके परिवार की सालाना आय ८ लाख से कम होनी चाहिए.
मित्रों, यह भी सत्य है कि मोदी और शाह की जोड़ी ५ राज्यों में मिली चुनावी हार के बाद काफी कुछ बदली-बदली सी नजर आ रही है. अभी दिल्ली के रामलीला मैदान से जो ख़बरें मिल रही हैं उसके अनुसार मोदी ने पहली बार अपने भाषण में लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी का नाम लिया है. मैदान में चल रहे भाजपा के राष्ट्रीय सम्मलेन में सारे क्षत्रपों को भी पोस्टरों में भरपूर स्थान दिया गया है. उधर गडकरी जी और आरएसएस के बदलते तेवरों ने भी मोदी-शाह की जोड़ी को बैक फुट पर ला दिया है. परन्तु मुझे पहले भी लगता था और अब भी लगता है कि मोदी बिना लड़े हार माननेवालों में से हैं ही नहीं. यह सही है कि उन्होंने पिछले ५ सालों में कई सारी गलतियाँ की हैं, चाहे वो मंत्रिमंडल के गठन के स्तर पर हो या आर्थिक मोर्चों पर लेकिन सत्य यह भी है कि मोदी आज भी देश की आवश्यकता हैं, जरुरत हैं. क्योंकि मोदी के नेतृत्व में देश ने बहुत कुछ पाया है और उसे आगे बहुत-कुछ पाना है
आज मोदी के नेतृत्व में भारत चीनी उत्पादन में नंबर एक, मोबाईल, स्टील उत्पादन और वस्त्र निर्यात में नंबर २, बिजली उत्पादन में नंबर ३, ऑटोमोबाइल उत्पादन में नंबर ४ और जीडीपी में नंबर ६ पर आ गया है. अगर मोदी हारते हैं तो यही नहीं पता कि उनकी जगह कौन प्रधानमंत्री बनेगा या बनेगी. फिर सारे चोर दलों का एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाया जाएगा कि किस प्रकार मिलकर देश को लूटना है.
मित्रों, वैसे मोदी सरकार में मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जिस तरह से संसद में गर्जना करते हुए कहा है कि अभी और भी छक्के आने वाले हैं क्योंकि अभी तो खेल शुरू हुआ है उससे तो यही लगता है कि अभी तो अर्जुन की गांडीव से और भी दिव्यास्त्र छूटने वाले हैं जिनकी गर्मी से विपक्ष को इस प्रचंड सर्दी में भी पसीना आने लगेगा.इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या,
आगे-आगे देखिये होता है क्या.

बुधवार, 2 जनवरी 2019

राम लला हम न आएंगे, मंदिर नहीं बनाएंगे

मित्रों, जो लोग भी चाहते हैं कि राम मंदिर बने उन लोगों को कल भारी झटका लगा होगा जब भारत के प्रधान सेवक जी ने एक प्रवचन-सदृश साक्षात्कार में साफ़-साफ़ लफ्जों में कह दिया कि उनकी सरकार का राम मंदिर को लेकर अध्यादेश लाने का कोई ईरादा नहीं है. पता नहीं इस सरकार का ईरादा है क्या? वैसे भी जो व्यक्ति ५ साल में रामलला के दर्शन की हिम्मत नहीं जुटा पाया वो मंदिर क्या बनवाएगा.
मित्रों, अभी तक के मोदी सरकार के प्रदर्शन पर अगर हम नजर डालें तो घनघोर निराशा की अनुभूति होती है. पता नहीं ये गुजरात मॉडल होता क्या है जिसको लेकर २०१४ के चुनावों में जमकर ढिंढोरा पीटा गया था. तब तो हम भी उनके झांसे में आ गए थे. शायद मंत्रियों को किनारे कर अपने चापलूस अधिकारियों के बल पर मनमाना शासन करने और विकास के आंकड़े मन-माफिक प्राप्त नहीं होने पर आंकड़ों को ही बदल देने को ही गुजरात मॉडल कहा जाता होगा.
मित्रों, समझ में नहीं आता कि मोदी सरकार के इस निर्णय पर खुश हुआ जाए या रोया जाए. पहली बार भारत के इतिहास में किसी दक्षिणपंथी दल को पूर्ण बहुमत मिला और फिर भी ५ साल के समय को यूं ही बर्बाद कर दिया गया. न तो कालाधन ही वापस आया, न तो पुलिस, न्यायपालिका या नौकरशाही में ही कोई बदलाव हुआ, न तो भ्रष्टाचार घटा और न ही धारा ३७० ही हटा और न ही समान नागरिक संहिता ही लागू हुआ. साथ ही, न तो जनसँख्या-नियंत्रण कानून ही आया. हाँ, इतना जरूर हुआ कि इस दौरान भाजपा ने कांग्रेस बनने का प्रयास खूब किया. एक तरफ तो जमकर कांग्रेसियों को भाजपा में शामिल किया गया वो वहीँ दूसरी ओर अपने परंपरागत वोट-बैंक को अंगूठा दिखाते हुए दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों को भाजपा के पक्ष में करने के मूर्खतापूर्ण प्रयास खूब किए गए जिसके दुष्परिणाम ५ राज्यों के चुनावों में सामने आ चुके हैं.
मित्रों, मैं बार-बार लिखता रहा हूँ कि जब भी भारत का इतिहास लिखा जाएगा तीन तलाक को लेकर भाजपा द्वारा किए जा रहे प्रयासों को मोदी की मूर्खता का स्मारक लिखा जाएगा जैसे कि दीने ईलाही को हम अकबर की मूर्खता का स्मारक बताते हैं. समझ में नहीं आता कि जो मुसलमान मोदी को क्षणभर के लिए भी प्रधानमंत्री के पद पर देखना नहीं चाहते उनकी महिलाएँ क्यों मोदी को वोट देंगी? फिर जबकि मोदी सरकार का राज्यसभा में बहुमत है ही नहीं तो कैसे वो इसको वहां से पारित करवाएगी? पता नहीं कि यह सरकार किन मूर्खों की दुनिया में जी रही है? हम देखते कि सरकार अगर राम मंदिर, धारा ३७०, जनसँख्या-नियंत्रण कानून और समान नागरिक संहिता से सम्बंधित विधेयक संसद में लाती तो उसको कौन माई का लाल रोकता? हम ठीक कह रहे हैं न शिवराज जी?
मित्रों, हम बचपन से ही कहानी पढ़ते आ रहे हैं कि एक चालाक कौए ने हंस की चाल चलने की कोशिश की और अपनी ही चाल भूल गया. लगता है कि मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने यह कहानी नहीं पढ़ी है. या हो सकता है कि गुजराती में यह कहानी होती ही नहीं होगी.  हम तो अब तक एक ही कांग्रेस से परेशान थे लेकिन मोदी जी ने कांग्रेस-मुक्त भारत की बात करते-करते भाजपा को ही कांग्रेस बना दिया. न जाने क्यों जबसे राहुल गाँधी मंदिर जाने लगा है मोदी जी ने मंदिर जाना बंद कर दिया है तो क्या मोदी जी का मंदिर जाना भी महज दिखावा था राहुल तो दिखावा कर ही रहा है?

गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

राम की तरह राम मंदिर भी बने आदर्श

मित्रों, 'राम’ भारतीय परंपरा में एक प्यारा नाम है. वह ब्रह्मवादियों का ब्रह्म है, निर्गुणवादी संतों का आत्माराम है, ईश्वरवादियों का ईश्वर है, अवतारवादियों का अवतार है. वह वैदिक साहित्य में एक रूप में आया है, तो बौद्ध जातक कथाओं में किसी दूसरे रूप में. एक ही ऋषि वाल्मीकि के ‘रामायण’ नाम के ग्रंथ में एक रूप में आया है, तो उन्हीं के लिखे ‘योगवसिष्ठ’ में दूसरे रूप में. ‘कम्बन रामायण’ में वह दक्षिण भारतीय जनमानस को भावविभोर कर देता है, तो तुलसीदास के रामचरितमानस तक आते-आते वह उत्तर भारत के घर-घर का बड़ा और आज्ञाकारी बेटा, आदर्श राजा और सौम्य पति बन जाता है. इस लंबे कालक्रम में रामायण और रामकथा जैसे 1000 से अधिक ग्रंथ लिखे जाते हैं. तिब्बती और खोतानी से लेकर सिंहली और फारसी तक में रामायण लिखी जाती है. 1800 ईसवी के आस-पास उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के मुल्ला मसीह फारसी भाषा के करीब 5000 छंदों में रामायण को छंदबद्ध करते हैं।
मित्रों, पिछले दिनों भारतीय संस्कृति की आत्मा उन्हीं राम के मंदिर को लेकर सोशल मीडिया पर सुझाव देनेवालों की भीड़ लगी रही. कोई कह रहा था कि वहां अस्पताल बनवा दो तो कोई कह रहा था स्कूल. लेकिन अभी भी बहुसंख्यक लोगों का मानना था कि वहां बने तो मंदिर ही बने. आखिर अयोध्या में रामलला का मंदिर नहीं बनेगा तो कहाँ बनेगा?
मित्रों, जैसा कि आप सभी जानते हैं कि अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण को लेकर पिछले कई दशकों से जमकर राजनीति हो रही है. पहले भाजपा कहती थी कि न तो दिल्ली में और न ही लखनऊ में हमारी सरकार है फिर हम क्या कर सकते हैं. आज दोनों की जगहों पर उसकी सरकार है फिर भी वो कह रही है कि हम कुछ भी नहीं कर सकते जो करेगा कोर्ट करेगा. बहाने पर बहाने. ऐसे में पता नहीं कि कब राम मंदिर बनेगा और कब रामलला को पक्का मकान मिलेगा. फिर भी मुझे पूरा यकीन है कि एक-न-एक दिन राम मंदिर बनेगा जरूर क्योंकि अब बहुत सारे मुसलमान भी खुलकर इसके पक्ष में आ रहे हैं.
मित्रों, राम मंदिर का निर्माण तो तय है पर यह जब भी बने मैं चाहता हूँ कि उसकी व्यवस्था कुछ उस तरह की हो जैसी अमृतसर के स्वर्ण मंदिर और पटना के महावीर मंदिर की है. यानि उसकी आमदनी से उसके पुजारी गोल्डन बाबा बनकर गुलछर्रे न उडाएँ बल्कि उससे भूखों को भोजन और बीमारों को ईलाज मुहैय्या कराई जाए. गरीब बच्चों के लिए स्कूल खोले जाएँ. भिखारियों और बेसहारों के लिए धर्मशालाएं बनाई जाएँ. साथ ही इनसे जो भी लाभान्वित हों उनकी जाति-पाति और धर्म का ख्याल न रखा जाए. और यह सबकुछ निःशुल्क हो. मंदिर की तरफ से हो. मतलब कि इन सबका खर्च मंदिर प्रबंधन उठाए. मेरा मानना है कि यही राम की सच्ची भक्ति होगी क्योंकि हमारे राम गरीबों के राम हैं और रामचरितमानस के लेखक तुलसीदास का उनके प्रति सबसे प्रिय संबोधन गरीबनवाज है. गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं रघुबर तुमको मेरी लाज।
सदा सदा मैं सरन तिहारी तुमहि गरीबनवाज।। 
हम जानते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास का आधा जीवन भूख और प्यास से लडते हुए बीता। तुलसी कहते हैं                                               किसबी ,किसान -कुल ,बनिक,भिखारी, भाट ,
चाकर ,चपल नट, चोर,  चार,  चेटकी  
पेटको पढ़त,गुन गढ़त ,चढत गिरि ,
अटत गहन -गन अहन अखेटकी 
ऊंचे -नीचे करम ,धर्म -अधरम  करि
पेट ही को पचत ,बेचत बेटा- बेटकी 
'तुलसी ' बुझायी एक राम घनश्याम ही ते ,
आगि बड़वागिते बड़ी है आगि पेटकी
(अर्थात श्रमिक ,किसान ,व्यापारी ,भिखारी ,भाट ,सेवक,चंचल नट ,चोर, दूत और बाजीगर अर्थात हम सभी इस कलियुग में पेट के लिए ही सब कर्म कुकर्म कर रहे हैं -पढ़ते ,अनेक उपाय रचते ,पर्वतों पर चढ़ते और शिकार की खोज में दुर्गम वनों का विचरण करते फिरते हैं ..सब लोग पेट ही के लिए ऊंचे नीचे कर्म तथा धर्म -अधर्म कर रहे हैं ,यहाँ तक कि अपने बेटे-बेटी को बेच तक दे रहे हैं (दहेज़ ?) ----अरे यह पेट की आग तो समुद्रों की बडवाग्नि से भी बढ गयी है ;इसे तो केवल राम रूपी श्याम मेघ के आह्वान से ही बुझाया जा सकता है. )
मित्रों, आज भी हमारे देश में गरीबों की स्थिति कोई अच्छी नहीं है. आज भी दुनिया में सबसे ज्यादा गरीब भारत में हैं. भूख, अभाव, कुपोषण, अशिक्षा, बेरोजगारी से देश की बहुसंख्यक जनता त्राहि-त्राहि कर रही है. इसलिए मैं चाहता हूँ कि क्या अच्छा रहे कि राम का मंदिर गरीबों की भूख मिटाए,उनके हर तरह के दुख दूर करे और भगवान राम के सबसे प्रिय भक्त तुलसीदास द्वारा दिए उनके नाम को सार्थक करे, राम की तरह राम का मंदिर भी मानवता के लिए आदर्श बने, प्रेरणास्रोत बने.