गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

आरक्षण सही तो CAB गलत कैसे?

मित्रों, मेरा हमेशा से ऐसा मानना रहा है कि किसी भी सरकार के किसी भी कदम का विरोध औचित्यपूर्ण और तार्किक होना चाहिए. सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना न केवल मूर्खतापूर्ण हो सकता है बल्कि कई बार सारी सीमाओं को पार कर सीमापार बैठे हमारे दुश्मनों को लाभ पहुँचानेवाला भी साबित होता है.
मित्रों, अगर हम CAB अर्थात CITIZENSHIP AMENDMENT BILL यानि नागरिकता संशोधन विधेयक को ही लें तो इसका विरोध करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं लगता. बल्कि इसका स्वागत होना चाहिए. यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि इस्लाम दुनिया का सबसे असहिष्णु मजहब है अपितु अगर हम ऐसा कहें कि यह आतंकवादियों का मजहब बनकर ज्यादा प्रसिद्धि पा रहा है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. मैं यहाँ धर्म शब्द का प्रयोग इसलिए नहीं कर रहा है क्योंकि तब दुनिया में अधर्म कुछ भी नहीं रह जाएगा. धर्म शब्द एक बहुत पवित्र शब्द है और इसकी अपनी गरिमा है.
मित्रों, यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि १९४६ के १६ अगस्त को प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस के माध्यम से दंगों की शुरुआत मुसलमानों ने की थी. बाद में भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों का जीना दुश्वार कर दिया गया जिसके चलते उनकी आबादी विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गई. दूसरी तरफ भारत में स्थितियां इसके उलट रही. कांग्रेस और अन्य छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी दलों ने हिन्दू विवाह अधिनियम और अन्य समान कानूनों के माध्यम से हिंदुस्तान में हिन्दुओं को ही दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया. हालात कुछ ऐसे बने कि हिंदुस्तान में हिन्दू होना जैसे अपराध हो गया और निर्भया के साथ जानलेवा बलात्कार करनेवाले मुसलमान को सरकारें ईनाम देने लगी. पूरी दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जिसमें पिछले ७५ सालों में अल्पसंख्यकों की आबादी बढ़ी है और बहुसंख्यकों की घटी है.
मित्रों, ऐसे माहौल में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भारत आनेवाले हिन्दुओं और अन्य धर्मों के शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देता भी तो कौन देता? इनमें से कुछ तो पिछले ३० सालों से दिल्ली से जयपुर तक दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं. निश्चित रूप से CAB ऐसे दबे-कुचले सताए गए लोगों की जिंदगी में बहार बनकर आया है. सवाल यह भी है कि हिन्दू अपना धर्म बचाने के लिए भारत नहीं आएँगे तो जाएंगे कहाँ? क्या उनको भारत के १ अरब से भी ज्यादा हिन्दू उनके हाल पर छोड़कर तमाशा देखते रहेंगे? क्या ऐसा करना उचित होगा? मैं समझता हूँ कि ऐसा करना न तो १९४७ या १९७१ में उचित था और न अब उचित है.
मित्रों, जहाँ तक इस अधिनियम से मुसलमानों को बाहर रखने का प्रश्न है तो निस्संदेह उनकी स्थिति हिन्दुओं और अन्य शरणार्थियों से अलग है. वे पीड़ित नहीं है और न ही धर्म के आधार पर सताए गए हैं बल्कि वे भारत आए हैं और आते हैं रोजगार की अच्छी संभावनाओं के कारण. जबकि भारत खुद ही दुनिया के सबसे गरीब और बेरोजगार देशों में से एक है, भारत सरकार का यह कर्त्तव्य बनता है कि वो पहले अपने नागरिकों का ख्याल रखे. अगर मुसलमानों ने १९४७ में देश का बंटवारा नहीं करवाया होता तब स्थितियां निश्चित रूप से अलग होती लेकिन जो घटित हो चुका है उसे बदला तो नहीं जा सकता. इसलिए अच्छा होगा कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमान अपने देश में ही अपना भविष्य तलाशें.
मित्रों, कुछ लोग इस अधिनियम को भारतीय संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन मानते हैं. लेकिन ऐसा बताते हुए वे यह भूल जाते हैं कि पूरी दुनिया में सिर्फ भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ कदम-कदम पर जाति आधारित आरक्षण है. अगर हम समानता केअधिकार की दृष्टि से देखें तो आरक्षण भी इसका सरासर उल्लंघन है लेकिन वह लागू है और लगातार उसकी मात्रा भी बढती जा रही है. कहने का तात्पर्य यह है कि भारत के संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार में ही ऐसा प्रावधान किया गया है कि औचित्यपूर्ण आधार पर इस अधिकार का उल्लंघन किया जा सकता है. दूसरी बात यह कि CAB का उन मुसलमानों से कुछ भी लेना -देना नहीं है जो १९४७ में देश के बंटवारे के समय पाकिस्तान या बांग्लादेश नहीं गए अथवा १९ जुलाई १९४८ से पहले पाकिस्तान से भारत आ गए थे.
मित्रों, दूसरी तरफ बेवजह इस कानून को लेकर पूर्वोत्तर में उबाल आया हुआ है जबकि यह कानून पूर्वोत्तर में लागू ही नहीं होने जा रहा. ये कौन लोग हैं जो पूर्वोत्तर के लोगों को उकसा कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं? ठीक ऐसी ही स्थिति तब हुई थी जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एससी-एसटी एक्ट के तहत केस प्रारंभिक जांच के बाद ही दर्ज हो. तब इन जातियों के लोगों में यह अफवाह फैला दी गयी थी कि सरकार आरक्षण समाप्त करना चाहती है. आज जो लोग असम में आग लगा रहे हैं उनको यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि देश उनकी गतिविधियों पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं और आज नहीं तो कल उनको इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा.

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

हर हर मोदी हर जगह मोदी

मित्रों, अडोल्फ हिटलर का जन्म आस्ट्रिया के वॉन नामक स्थान पर 20 अप्रैल 1889 को हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा लिंज नामक स्थान पर हुई। पिता की मृत्यु के पश्चात् 17 वर्ष की अवस्था में वे वियना चले गए। कला विद्यालय में प्रविष्ट होने में असफल होकर वे पोस्टकार्डों पर चित्र बनाकर अपना निर्वाह करने लगे। इसी समय से वे साम्यवादियों और यहूदियों से घृणा करने लगे। जब प्रथम विश्वयुद्ध प्रारंभ हुआ तो वे सेना में भर्ती हो गए और फ्रांस में कई लड़ाइयों में उन्होंने भाग लिया। 1918 ई. में युद्ध में घायल होने के कारण वे अस्पताल में रहे। जर्मनी की पराजय का उनको बहुत दु:ख हुआ। 1918 ई. में उन्होंने नाजी दल की स्थापना की। इसका उद्देश्य साम्यवादियों और यहूदियों से सब अधिकार छीनना था। इसके सदस्यों में देशप्रेम कूट-कूटकर भरा था। इस दल ने यहूदियों को प्रथम विश्वयुद्ध की हार के लिए दोषी ठहराया। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण जब नाजी दल के नेता हिटलर ने अपने ओजस्वी भाषणों में उसे ठीक करने का आश्वासन दिया तो अनेक जर्मन इस दल के सदस्य हो गए। हिटलर ने भूमिसुधार करने, वर्साय संधि को समाप्त करने और एक विशाल जर्मन साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य जनता के सामने रखा जिससे जर्मन लोग सुख से रह सकें। इस प्रकार १९२२ ई. में हिटलर एक प्रभावशाली व्यक्ति हो गए। उन्होंने स्वास्तिक को अपने दल का चिह्र बनाया जो कि हिन्दुओं का शुभ चिह्र है. समाचारपत्रों के द्वारा हिटलर ने अपने दल के सिद्धांतों का प्रचार जनता में किया। भूरे रंग की पोशाक पहने सैनिकों की टुकड़ी तैयार की गई। 1923 ई. में हिटलर ने जर्मन सरकार को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न किया। इसमें वे असफल रहे और जेलखाने में डाल दिए गए। वहीं उन्होंने मीन कैम्फ ("मेरा संघर्ष") नामक अपनी आत्मकथा लिखी। इसमें नाजी दल के सिद्धांतों का विवेचन किया। उन्होंने लिखा कि आर्य जाति सभी जातियों से श्रेष्ठ है और जर्मन आर्य हैं। उन्हें विश्व का नेतृत्व करना चाहिए। यहूदी सदा से संस्कृति में रोड़ा अटकाते आए हैं। जर्मन लोगों को साम्राज्यविस्तार का पूर्ण अधिकार है। फ्रांस और रूस से लड़कर उन्हें जीवित रहने के लिए भूमि प्राप्ति करनी चाहिए। १९३०-३२ में जर्मनी में बेरोज़गारी बहुत बढ़ गई। संसद में नाजी दल के सदस्यों की संख्या २३० हो गई। १९३२ के चुनाव में हिटलर को राष्ट्रपति के चुनाव में सफलता नहीं मिली। जर्मनी की आर्थिक दशा बिगड़ती गई और विजयी देशों ने उसे सैनिक शक्ति बढ़ाने की अनुमति दी। १९३३ में हिटलर चांसलर बना और चांसलर बनते ही हिटलर ने जर्मन संसद को भंग कर दिया, साम्यवादी दल को गैरकानूनी घोषित कर दिया और राष्ट्र को स्वावलंबी बनाने के लिए ललकारा। हिटलर ने डॉ॰ जोज़ेफ गोयबल्स को अपना प्रचारमंत्री नियुक्त किया। नाज़ी दल के विरोधी व्यक्तियों को जेलखानों में डाल दिया गया। कार्यकारिणी और कानून बनाने की सारी शक्तियाँ हिटलर ने अपने हाथों में ले ली। १९३४ में उन्होंने अपने को सर्वोच्च न्यायाधीश घोषित कर दिया। उसी वर्ष हिंडनबर्ग की मृत्यु के पश्चात् वे राष्ट्रपति भी बन बैठे। नाजी दल का आतंक जनजीवन के प्रत्येक क्षेत्र में छा गया। १९३३ से १९३८ तक लाखों यहूदियों की हत्या कर दी गई। नवयुवकों में राष्ट्रपति के आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करने की भावना भर दी गई और जर्मन जाति का भाग्य सुधारने के लिए सारी शक्ति हिटलर ने अपने हाथ में ले ली। हिटलर ने १९३३ में राष्ट्रसंघ को छोड़ दिया और भावी युद्ध को ध्यान में रखकर जर्मनी की सैन्य शक्ति बढ़ाना प्रारंभ कर दिया। प्राय: सारी जर्मन जाति को सैनिक प्रशिक्षण दिया गया।
मित्रों, आप सोंच रहे होंगे कि मुझे हो क्या गया है? शीर्षक में तो हिटलर नहीं था फिर आलेख की शुरुआत हिटलर के जिक्र से क्यों. दरअसल कभी-कभी वर्तमान की जड़ें काफी गहरे तक भूतकाल तक गई हुई होती हैं इसलिए इतिहास के आईने में झांकना जरूरी हो जाता है. मैं नहीं जानता कि आपको याद है या नहीं लेकिन मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब मोदी जी २०१४ में प्रधानमंत्री बने थे तब उनका व्यवहार कैसा था. उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री की जगह प्रधानसेवक और चौकीदार बताया था. जब वे पहली बार संसद पहुंचे तो संसद को मंदिर का दर्जा देते हुए उसकी सीढियों पर मत्था टेका था. भाजपा के नवनिर्वाचित सांसदों की बैठक में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के चरण छुए थे और गले लगकर रोने लगे थे. लगा जैसे भारत की सत्ता एक संत के हाथों में आ गयी है. लेकिन धीरे-धीरे मोदी ने हिटलर की तरह वन मैन शो की तरफ बढ़ना शुरू किया. उम्र सीमा का बहाना बनाकर किसी भी बुजुर्ग को मंत्री नहीं बनाया. हर महीने के आखिरी रविवार को खुद ही देश के साथ सीधा संवाद करना शुरू कर दिया मानों उन्हें मीडिया की जरुरत ही नहीं. इसके साथ-साथ मीडिया पर अपना विरोधी होने का जमकर प्रचार भी किया. जब-जब चुनाव आया पाकिस्तान पर हमला करके देश में सैन्य राष्ट्रवाद की लहर पैदा कर दी. सारे आर्थिक-सामाजिक आंकड़ों को दबाने का प्रयास किया जिससे जनता को वास्तविकता का पता न चले. २०१९ के चुनाव में सारे बुजुर्गों के टिकट काट दिए गए. २०१९ के चुनावों के समय अपना टीवी चैनल नमो टीवी संचालित किया. जबसे प्रधानमंत्री बने कोई प्रेस वार्ता आयोजित नहीं की क्योंकि उनको बोलना और आदेश देना अच्छा लगता है सुनना और सवालों का उत्तर देना पसंद नहीं है. जब भी विदेश यात्रा पर गए अकेले हवाई जहाज में चढ़ते और उतरते हुए दिखे जैसे कि हवाई जहाज में वे अकेले थे और हवाई जहाज को स्वयं ही उड़ा रहे थे और जैसे कि भारत की विदेश नीति का सञ्चालन वे अकेले ही करते हैं. जब भी कोई मंत्री अच्छा काम करता हुआ दिखा या तो उसके पर क़तर दिए गए या फिर बाहर कर दिया गया. सर्वोच्च न्यायालय को अपने पक्ष में करने का भरसक प्रयास किया गया. राष्ट्रपति एक ऐसे व्यक्ति को बनाया जो कभी उनकी बात को टाल नहीं सके. सारे राज्यपाल आज मोदी के आदेशपाल बनकर रह गए हैं. देश में मोदी विरोध को देशद्रोह का पर्याय बना दिया गया मानों मोदी ही भारत हैं. एक ऐसी महिला को वित्त मंत्री बनाया जिसे इस विषय का कोई ज्ञान ही नहीं है. इस प्रकार देश की उडान भर रही अर्थव्यवस्था आज क्रैश लैंडिंग की स्थिति में पहुँच गयी है. पूरे मंत्रीमंडल में लगता है जैसे कोई मंत्री है ही नहीं सिर्फ मोदी हैं. सारे सरकारी निगमों, विश्वविद्यालयों को अपने भजनकर्ताओं से भर दिया. सारे पेट्रोलपम्पों और सार्वजनिक स्थानों पर सिर्फ अपनी तस्वीर लगवाई मानों एक अकेला व्यक्ति पूरे देश को चला रहा है और बांकी के लोग झक मार रहे हैं. हिन्दुओं के मन में श्रेष्ठता-भाव को उग्रता की हद तक ले जाने की कोशिश की गयी. देश में मुस्लिम-विरोधी माहौल उत्पन्न करने का यथासंभव प्रयास किया. यहाँ तक कि गाँधी-नेहरू का भी जमकर चरित्र-हनन किया गया. विपरीत और मध्यमार्गी विचारधाराओं के खिलाफ जमकर प्रचार किया गया. बार-बार देश में पहली बार वाक्य का प्रयोग किया गया जैसे २०१४ से पहले भारत था ही नहीं. अपनी और अपनी सरकार की सारी विफलताओं के लिए पिछली सरकार और पंडित नेहरु को दोषी ठहराया गया मानों इनको जनता ने बस इसी काम के लिए चुना था. मीडिया को अपने गुणगान करने के लिए येन-केन-प्रकारेन प्रभावित किया गया भले ही सरकार के कदम कितने ही मूर्खतापूर्ण क्यों न हों जैसे कि देश का अति तीव्र गति से निजीकरण, जीएसटी और पागलपन भरा नोटबंदी. अपने गठबंधन के सहयोगियों को समान मानने के बदले पिछलग्गू बनाकर रखने का प्रयास किया गया. वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह को गृह मंत्री से हटाकर अपने चहेते अमित शाह को गृह मंत्री बनाया. आज आकाशवाणी समाचार में सिर्फ नरेन्द्र मोदी के नाम के साथ भाजपा के वरिष्ठ नेता संबोधन बोला जाता है मानों वे भाजपा में अकेले वरिष्ठ नेता हैं. आज जिस भी पद पर नियुक्ति का अधिकार भारत सरकार को है हर जगह सिर्फ और सिर्फ मोदी की भजन मंडली के लोग बिठा दिए गए हैं और चूंकि साहेब को आलोचना से सख्त नफरत है इसलिए वे दिन-रात उनकी झूठी प्रशंसा करते रहते हैं.
मित्रों, कुल मिलाकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे इतिहास अपने को दोहरा रहा है. जो कुछ भी सौ साल पहले जर्मनी में हुआ था वैसा ही भारत में करने की कोशिश की जा रही है. मैं यह तो नहीं जानता कि इस दिशा में मोदी किस हद तक जाएंगे लेकिन इतना अवश्य जानता हूँ भारत जर्मनी नहीं है इसलिए बहुत जल्द उनका पराभव निश्चित है और कदाचित प्रारंभ हो भी चुका है. वैसे सत्ता आने पर अभिमान तो हर किसी में आ जाता है. गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के बाल काण्ड में दक्ष प्रजापति प्रसंग में कहा है कि- नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥4॥ तथापि सत्य तो यह भी है कि अहंकार भगवान का भोजन है.
भगवान किसी का अहंकार रहने नहीं देते। उसे नष्ट कर देते हैं जब उनकी इच्छा हो जाती है। जग छूट जाता है, बड़े-बड़ों का घमंड टूट जाता है। एक समय हिटलर का अहंकार भी टूटा था.

सोमवार, 25 नवंबर 2019

लोकतंत्र का चीरहरण करते उसके बेटे


मित्रों, हम भारत की जनता बहुत बड़े वाले अभागे हैं. हम चाहे जिस भी नेता पर दांव लगाएं आगे चलकर वो धोखेबाज ही निकलता है. अब नरेन्द्र मोदी को ही ले लें. हमने देखा था और गौरवान्वित हुए थे कि यह आदमी पहली बार जब संसद पहुंचा तो इसने उसकी सीढियों पर मत्था टेका जैसे वो संसद नहीं सचमुच का मंदिर हो. लेकिन आदमी जैसा दिखता है वैसा होता कहाँ है. बहुत जल्द परिदृश्य बदल गया और वही व्यक्ति लोकतंत्र का चीरहरण करता हुआ दिखने लगा. लगा जैसे लोकतंत्र द्रौपदी बन गई है और भरी सभा में विलाप कर रही है कि मुझे मेरे बेटों से बचाओ अन्यथा ये मेरी ईज्जत तार-तार कर देंगे. वह आर्तनाद कर रही है, बार-बार उनको याद दिला रही है कि तुमने मेरे ही गर्भ से जन्म लिया है लेकिन सत्ता के मद में चूर उनके बेटे उसकी एक नहीं सुन रहे. द्वापर होता तो योगेश्वर कृष्ण जरुर आते उसकी ईज्जत बचाने लेकिन कलियुग का भगवान तो कोई और है और वो है पैसा और पैसा सत्ता से आता है. अगर कलियुग में भगवान भगवान होते तो हमारे अख़बार रोजाना रंगे नहीं होते बलात्कार की खबरों से. भगवान ने चमत्कार करके बलात्कारियों के सर के सौ टुकड़े नहीं कर दिए होते? इसलिए वही प्रश्न शेष है कि ऐसे में कौन बचाएगा इस अबला नारी की ईज्जत? कैसे शेष बचेगा भारत में लोकतंत्र का अस्तित्व? हमने तो सोंचा था, इस देश की बहुसंख्य जनता ने सोंचा था, निराश-हताश मन में उम्मीद बाँधी थी कि ये लोग भारत को सचमुच विश्वगुरु बनाने के लिए आए हैं लेकिन इनके मन में कुछ और था और जुबान पर कुछ और. हम भारतीय इतने भोले और भावुक हैं कि हम एकल चेहरा नहीं पढ़ पाते फिर लोकतंत्र के इन बेटों के तो अनगिनत चेहरे थे और उनका अभिनय इतना उच्चस्तरीय था कि उनके समक्ष शायद भगवान भी होते तो धोखा खा जाते फिर आदम जात की क्या बिसात!

मित्रों, एक वो नारायण थे जिन्होंने धर्म की स्थापना के लिए बार-बार अवतार लिया और एक यह नारायण राणे है जो कहता है कि उसने लोकतंत्र को मंडी में, बाज़ार में बदल दिया है और इस बाज़ार में बिकने के लिए बहुत-सारे विधायक सज-धज कर तैयार बैठे हैं. ऐसे में आप ही बताईये कि कैसे बचेगी लोकतंत्र की जान और अगर जान बच भी गई तो ईज्जत खो चुकी यह आधुनिक द्रौपदी कैसे कर पाएगी दुनिया के प्रश्नवाचक-शरारत भरी नज़रों का सामना? इस बेचारी का जो अपमान बूथ लूट से शुरू हुआ था अब वो चरम पर पहुँच चुका है. अब सीधे सांसदों-विधायकों की लूट होने लगी है, सरकार की लूट होने लगी है. खुद बहुत-सारे सांसद-विधायक बिकने को तैयार बैठे हैं. नीलामी शुरू है,लोग बोलियाँ लगा रहे हैं, २० करोड़-३० करोड़-५० करोड़. जैसे दुनिया को शून्य देनेवाले देश में १ के बाद शून्य का कोई महत्त्व ही नहीं रह गया हो. पार्टियाँ विधायकों को जानवरों के बाड़े की तरह होटल में बंद करके रख रही हैं ताकि उनको बिकने से बचाया जा सके. संविधान और विधान बेमतलब हो गए हैं. लोकतंत्र का आधुनिक मंदिर संसद के स्थान पर होटल बन गए हैं और यह सब उनके इशारों पर हो रहा है जिन्होंने कभी संसद की सीढियों पर मत्था टेका था. इतना बड़ा धोखा! इस इंसान को क्या समझा था और क्या निकला! हा दैव, अब हम किसे पुकारें, कौन करेगा हमारी रक्षा जब सारे रक्षक ही भक्षक बन गए हैं. उल्लू तो फिर भी ठीक थे तुमने तो हर डाल पे गिद्ध बैठा दिए हैं प्रभु.

शनिवार, 23 नवंबर 2019

शून्य पर सवार भारतीय राजनीति


मित्रों, जबकि इस घनघोर कलियुग में भगवान की भक्ति तक को गंदा धंधा बना दिया गया है राजनीति के गन्दा हो जाने को बिलकुल भी अनपेक्षित नहीं कहा जा सकता. एक समय था जब दिल्ली में सोनिया माता का शासन था और उनका स्पष्ट रूप से मानना था कि दाग बुरे नहीं बल्कि अच्छे हैं. शायद इसलिए उनदिनों कांग्रेस में जो जितना ज्यादा बदनाम था वो सरकार में उतने ही बड़े पद पर था. फिर अन्ना हजारे केजरीवाल नामक स्वघोषित महासत्यवादी को साथ लेकर आए जिन्होंने अपने बच्चों की कसम खाकर अन्ना के मंच से घोषणा की कि वे कभी राजनीति में नहीं जाएंगे. लेकिन सारे कसमों को तोड़ते हुए केजरीवाल राजनीति में आ गए और यह कहते हुए आए कि उन्होंने ऐसा मजबूरी में किया है क्योंकि वे राजनीति से गंदगी को साफ़ करने आए हैं. बहुत जल्द उनकी बार-बार की बन्दरगुलाटी से जनता उब गयी और जो केजरीवाल केंद्र में सरकार गठन के सपने देख रहे थे सिर्फ दिल्ली में सिमट कर रह गए.
मित्रों, इस बीच जो शून्य भारतीय राजनीति में पैदा हुआ उससे जमकर लाभ उठाया भारतीय जनता पार्टी ने और मोदी ने २०१४ के लोकसभा चुनावों के समय वादों की झड़ी लगा दी. लगा जैसे अब भारत और भारतीय राजनीति में राम राज्य आकर रहेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं और भारत में रामराज्य के बदले अम्बानी-अडानी राज आ गया. जो सरकारी कंपनियां कभी नवरत्न थी आज नौ-नौ पैसे में बेची जा रही हैं. मोदी ने चुनावों के समय कांग्रेस पर देश में भ्रष्टाचार फ़ैलाने का आरोप लगाते हुए देश को कांग्रेसमुक्त करने का वादा किया था लेकिन चुनावों के बाद उन्होंने भाजपा को जैसे गंगा बना दिया. कांग्रेस के लोग झुण्ड-के-झुण्ड भाजपा के घाट पर आने लगे और डुबकी लगाकर पवित्र होने लगे.
मित्रों, आज की तारीख आते-आते देश की राजनीति में ऐसी स्थिति हो गयी है कि भाजपा विधायकों को खरीद कर हारा हुआ चुनाव भी जीत जा रही है. जैसे हमारे देश के राजनीतिज्ञों के शब्दकोश में नैतिकता शब्द है ही नहीं. बस येन-केन-प्रकारेण भाजपा को कुर्सी चाहिए. वैसे आज सुबह महाराष्ट्र में जो कुछ भी हुआ उसके लिए सिर्फ भाजपा ही दोषी हो ऐसा भी नहीं है. जब शिवसेना ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा तो उसे चुनावों के बाद भी भाजपा के साथ ही रहना चाहिए था लेकिन उसने जनादेश का अपमान करते हुए एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिला लिया.
मित्रों, आज सुबह जो खेल महाराष्ट्र में हुआ उसमें अगर सबसे ज्यादा नुकसान किसी को हुआ है वो है कांग्रेस पार्टी. शिवसेना को तो नुकसान हुआ ही है मगर कांग्रेस ने यह दिखा दिया कि सत्ता के लिए वो अपनी विचारधारा से भी समझौता कर सकती है. पवार फिर से महाराष्ट्र की राजनीति के सिकंदर बनकर उभरे हैं और सबसे ज्यादा फायदा उनको ही हुआ है. भाजपा के खेमे आ जाने से उनका पूरा परिवार अनगिनत घोटालों के आरोपों से रातोंरात मुक्त हो गया है. जहाँ तक भाजपा का सवाल है तो भाजपा के लिए महाराष्ट्र में सरकार का गठन भले ही तात्कालिक लाभ देनेवाला हो दीर्घकालिक रूप से उसके लिए नुकसानदेह ही साबित होगा क्योंकि अब उसका असली चेहरा भारत की जनता के समक्ष उजागर हो गया है और वो यह है कि भाजपा कहीं से भी पार्टी विथ डिफरेंस नहीं है बल्कि वो बांकी पार्टियों के मुकाबले कहीं ज्यादा लालची, अनैतिक और राजनैतिक शुचिता और मूल्यों से विहीन है. आज की भाजपा अटल-आडवाणी वाली भाजपा नहीं है बल्कि देश को बेच डालनेवाली महाभ्रष्ट पार्टी है और देश और देश की गरीब जनता के लिए हानिकारक हो चुकी है. निस्संदेह देश की राजनीति में फिर से बहुत बड़ा शून्य पैदा हो गया है.

सोमवार, 18 नवंबर 2019

आंकड़ों से भयभीत क्यों है मोदी सरकार?

मित्रों, जबसे केंद्र में मोदी सरकार का पदार्पण हुआ है तभी से ऐसा देखा जा रहा है कि जब भी कोई आर्थिक आंकड़ा सामने आता है सरकार के हाथ-पांव कांपने लगते हैं, सांसें फूलने लगती है और सरकार इस प्रयास में लग जाती है कि उन आकड़ों को कैसे जनता के सामने लाने से बचा जाए. कई बार तो सरकार ने आंकड़े तैयार करने का तरीका तक बदल डाला है.
मित्रों, जैसे ही २०१४ में मोदी सरकार सत्ता में आई इसने सबसे पहले जीडीपी का आधार वर्ष बदल दिया. सरकार समय-समय पर आधार वर्ष में बदलाव इसलिए करती है ताकि देश की अर्थव्यवस्था के बारे में आंकड़ों का दुनिया के हिसाब से तालमेल रखा जा सके. ऐसा माना जाता है अर्थव्यवस्था के सही आकलन के लिए हर पांच साल पर आधार वर्ष बदल देना चाहिए. साल 2015 में सरकार ने जीडीपी का आधार वर्ष 2004-05 से बदलकर 2011-12 कर दिया था. लेकिन सरकार इतने पर ही नहीं रुकी उसने कहा कि आधार वर्ष के बदलने के बाद उसके पिछले वर्षों में जारी जीडीपी आंकड़ों में भी बदलाव किए जाने चाहिए. इसकी वजह से वित्त वर्ष 2006 से 2012 के बीच के जीडीपी आंकड़ों में कटौती कर दी गई, जबकि वे मनमोहन सिंह के दौर के ऊंचे जीडीपी वाले साल थे. यूपीए सरकार के छह साल (वित्त वर्ष 2006 से 2012) के दौरान औसत जीडीपी बढ़त को 7.75 फीसदी से घटाकर 6.82 फीसदी कर दिया गया.
मित्रों, साल 2015 में सरकार ने जीडीपी की गणना के तरीके में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव भी किए थे जिसकी तुलना आप नाच न जाने आँगन टेढ़ा कहावत से कर सकते हैं. इसके पहले तक जीडीपी को नापने के लिए कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र को जगह दी जाती थी. इसके तहत कृषि क्षेत्र में पशुपालन, मछली पालन, बागवानी और अन्य कई सेक्टरों को जोड़ दिया गया, जिससे कृषि क्षेत्र में उत्पादन का आंकड़ा बढ़ गया. ठीक इसी तरह से उत्पादन क्षेत्र में पहले टीवी और स्मार्टफोन से आने वाले पैसे को जगह नहीं दी जाती थी. 2015 में हुए बदलाव में इन सेक्टरों को भी शामिल किया गया है.  इसको लेकर भी आलोचकों ने कहा कि सरकार किसी भी तरह से जीडीपी के आंकड़े बढ़ा- चढ़ाकर दिखाने की कोशि‍श कर रही है.
मित्रों, दूसरी बार आंकड़ों को लेकर सरकार की घबराहट तब देखी गई जब केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने सरकार से हरी झंडी मिलने के बाद मोदी सरकार की ताजपोशी के अगले ही दिन २७ मई २०१९ को बेरोजगारी के आंकड़े जारी कर दिए. चुनाव प्रचार के दौरान विपक्ष के दावों को खारिज करती रही सरकार ने आखिरकार यह मान लिया कि बेरोजगारी की दर 45 साल के सर्वोच्च स्तर पर है.जारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान देश में बेरोजगारी की दर 6.1 फीसदी रही. सवाल उठता है कि ये आंकड़े चुनाव-प्रचार के दौरान क्यों जारी नहीं किए गए या फिर सरकार इस दौरान क्यों झूठ बोलती रही कि रिपोर्ट में ऐसा नहीं कहा गया है? इस बीच नेशनल स्टेटिस्टिकल कमीशन यानी एनएससी के चेयरमैन समेत दो सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया था। इन लोगों का आरोप था कि सरकार ने इस रिपोर्ट को छिपाकर रखा है और सार्वजनिक करने में आनाकानी कर रही है। यहाँ हम यह बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान वादा किया था कि अगर उनकी सरकार बनी तो हर साल 2 करोड़ लोगों को रोजगार दिया जाएगा।
 
मित्रों, अब केंद्र सरकार ने एक बार फिर नेशनल स्टैस्टिकल ऑफिस यानी एनएसओ के 2017-18 के उपभोक्ता खर्च सर्वे डेटा को जारी नहीं करने का फ़ैसला किया है. सरकार ने कहा है कि डेटा की 'गुणवत्ता' में कमी के कारण इसे जारी नहीं किया जाएगा. सांख्यिकी और योजना कार्यान्वयन मंत्रालय ने बताया कि 'गुणवत्ता' को देखते हुए मंत्रालय ने 2017-18 के कंज्यूमर एक्सपेंडेचर सर्वे का डेटा नहीं जारी करने का फ़ैसला किया है. मंत्रालय ने कहा है, ''मंत्रालय 2020-21 और 2021-22 में उपभोक्ता खर्च सर्वे कराने की संभावनाओं पर विचार कर रही है.'' विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये डेटा जारी नहीं होता है तो भारत में दस सालों की ग़रीबी का अनुमान मुश्किल होगा. इससे पहले यह सर्वे 2011-12 में हुआ था. इस डेटा के ज़रिए सरकार देश में ग़रीबी और विषमता का आकलन करती है. इससे पहले बिज़नेस स्टैंडर्ड अख़बार ने उपभोक्ता खर्च सर्वे की अहम बातें १४ नवम्बर, २०१९ को प्रकाशित करने का दावा किया था. इसमें बताया गया है कि पिछले 40 सालों में लोगों के खर्च करने क्षमता पहली बार कम हुई है. नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (एनएसओ) के लीक हुए सर्वे के अनुसार एक महीने में एक भारतीय द्वारा खर्च की गई औसत राशि 2011-12 में 1,501 रुपये से गिरकर 2017-18 में 1,446 रुपये रह गई।
 
मित्रों, जब भी हम कोई परीक्षा देते हैं तो हम परिणाम का बेसब्री से इंतजार करते हैं. तब हम शिक्षक को यह नहीं कह सकते कि चूँकि मेरा प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है इसलिए परिणाम को जारी मत करो. ठीक उसी तरह ये आंकड़े सरकार के परीक्षा-परिणाम हैं फिर सरकार इनको जारी करने से कैसे बच सकती है? प्रश्न यह भी उठता है कि अगर दोबारा सर्वेक्षण कराने के बाद भी आंकड़ें सरकार के मन-मुताबिक नहीं आए तो सरकार क्या करेगी? ये तो वही बात हुई कि ६० के दशक से लेकर १९८९ तक जब रोमानिया में निकोलस चाचेस्कू नामक तानाशाह का शासन था तब उसकी पत्नी एलीना फ़ुटबाल मैच से पहले यह निर्धारित करती थी कि मैच में कौन जीतेगा और कितने गोल से जीतेगा.मित्रों, अब थोडा-सा परिचय चाचा चाचेस्कू का भी प्राप्त कर लिया जाए क्योंकि हमें लगता है कि भारत भी धीरे-धीरे उसी रास्ते पर अग्रसर है. बहुत से लोग अब शायद यकीन न करें लेकिन 60 के दशक से लेकर १९८९ तक रोमानिया में निकोलस चाचेस्कू ने न सिर्फ़ अपने देश के मीडिया की आवाज़ नहीं निकलने दी बल्कि खाने, पानी, तेल और यहाँ तक कि दवाओं तक पर राशन लगा दिया. नतीजा ये हुआ कि हज़ारों लोग बीमारी और भुखमरी के शिकार हो गए और उस पर तुर्रा ये कि उनकी ख़ुफ़िया पुलिस 'सेक्योरिटेट' ने लगातार इस बात की निगरानी रखी कि आम लोग अपनी निजी ज़िंदगी में क्या कर रहे हैं.  लोग सोते समय घर की खिड़कियाँ बंद नहीं कर सकते थे. नाटे क़द के चाचेस्कू का क़द था मात्र 5 फ़ीट 4 इंच, इसलिए पूरे रोमानिया के फ़ोटोग्राफ़रों को हिदायत थी कि वो उनकी इस तरह तस्वीरें खीचें कि वो सबको बड़े क़द के दिखाई दे. 70 की उम्र पार हो जाने के बाद भी उनकी वही तस्वीरें छपती थीं जो उनकी 40 साल की उम्र में खीचीं गई थीं. एलीना को तो ये तक पसंद नहीं था कि कोई सुंदर महिला उनके बग़ल में खड़े हो कर तस्वीर खिंचवाए. एलीना ने कई विषयों में फ़ेल होने के बाद 14 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी थी लेकिन रोमानिया की फ़र्स्ट लेडी बनने के बाद उन्होंने ऐलान करवा दिया था कि उनके पास रसायन शास्त्र में 'पीएचडी' की डिग्री है. ज़ाहिर है ये डिग्री जाली थी. चाचेस्कू की व्यक्ति पूजा का आलम ये था कि ये क़ानून बना दिया गया था कि हर पाठ्य पुस्तक के पहले पन्ने पर उनका चित्र होना ज़रूरी था. टेलीविजन पर सिर्फ़ एक चैनल से प्रसारण होता था. आधे कार्यक्रमों में सिर्फ़ चासेस्कू की गतिविधियाँ और उपलब्धियाँ दिखाई जाती थीं. किताबों की दुकानों और म्यूज़िक स्टोर्स के लिए उनके भाषणों का संग्रह रखना ज़रूरी था. देश में छोटे-से-छोटा फ़ैसला भी बिना चाचेस्कू की अनुमति के नहीं लिया जा सकता था. अंत में सबसे खास बात यह कि चाचेस्कू साम्यवाद और सोवियत संघ का घनघोर शत्रु था.

शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

आरक्षण के देश में वशिष्ठ बाबू


मित्रों, कई बार यह सवाल विभिन्न मंचों पर उठता रहता है कि भारत पिछड़ा क्यों है. साथ ही यह सवाल भी उठता रहा है कि आखिर जापान के पास ऐसा क्या है जो वह द्वितीय विश्वयुद्ध में पूरी तरह से बर्बाद होने के बाद कुछ ही दशकों में एक बार फिर से अर्थव्यवस्था के मामले में अमेरिका से टक्कर लेने लगा?
मित्रों, इन दोनों सवालों का बस एक ही उत्तर है और बड़ा ही संक्षिप्त उत्तर है कि जहाँ भारत में प्रतिभा की कोई क़द्र नहीं है और अँधा बांटे रेवड़ी वाली हालत है वहीँ जापान में सिर्फ प्रतिभा की क़द्र है. कल जबसे बिहार, भारत और दुनिया के महान गणितज्ञ डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह का देहावसान हुआ है तभी से मैं काफी उद्वेलित हूँ कि भगवान ने तो हमें हीरा सौंपा था लेकिन हमने उसकी पत्थर के बराबर भी क़द्र नहीं की. मैं सोंचता हूँ कि न जाने वो कौन-सी मनहूस घडी थी जब देशप्रेम की भावना में बहकर वशिष्ठ बाबू ने अमेरिका से वापस आने का निर्णय लिया था. इससे पहले वशिष्ठ बाबू को अमेरिका की वर्कले यूनिवर्सिटी जीनियसों का जीनियस घोषित कर चुकी थी और पूरा अमेरिका उनकी प्रतिभा के आगे न सिर्फ चमत्कृत था बल्कि नतमस्तक भी था.उस समय अगर हमारे वशिष्ठ नासा में नहीं होते तो चाँद पर ही नील आर्मस्ट्रांग की समाधि बन गई होती.
मित्रों, भारत वापस आते ही वशिष्ठ जैसे विशिष्ट का पाला पड़ा भारत के अशिष्ट तंत्र से. वे बार-बार संस्थान बदलते रहे लेकिन भागते रहने से भला किसी समस्या का समाधान हुआ है जो होता. दुर्भाग्यवश एक तरफ तो दमघोंटू तंत्र उनका गला घोंट रहा था वहीँ दूसरी तरफ पत्नी की बेवफाई ने उनको इस कदर तोड़कर रख दिया कि वे पागलखाने पहुँच गए.
मित्रों, इसके बाद तो स्थिति और भी बिगड़ गयी. तब तक उनकी नौकरी जाती रही थी जिससे रोटी तक के लाले पड़ गए थे ईलाज कहाँ से होता. इस बीच बिहार में आती-जाती सरकारें ईलाज के नाम पर खानापूरी करती रही. फिर वशिष्ठ बाबू गायब हो गए और जब मिले तो कूड़े के ढेर पर से कुत्तों के साथ सडा-गला और जूठन खाते हुए. यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि जिस आदमी का दिमाग अलबर्ट आईन्सटीन से भी तेज था उसकी कुल मिलाकर ७७ साल की जिंदगी में ४४ तक दिमाग बेकार पड़ा रहा.
मित्रों, जीवित रहते तो तंत्र ने वशिष्ठ बाबू का कदम-कदम पर अपमान किया ही मरने के बाद रही-सही कसर भी पूरी कर दी. कई घंटों तक उनकी लाश पीएमसीएच के दरवाजे पर पड़ी रही लेकिन एक अदद एम्बुलेंस तक उपलब्ध नहीं कराई गई. ऊपर से ५००० रूपये की रिश्वत भी मांगी गयी. बाद में जब सोशल मीडिया पर महानतम गणितज्ञ के अपमान की खबर आग की तरह फैली तब जाकर सरकारी तंत्र नींद से जागा और घोषणा की गई कि उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा.
मित्रों, इस सन्दर्भ में मुझे याद आता है अपने गाँव का वो वाकया कि एक बूढ़े पिता को उसके बेटों-बहुओं ने जीते-जी कभी ठीक से सूखी रोटी तक नहीं दी लेकिन मर जाने के बाद ५० गांवों को भोज दिया और पंडितों को दोनों हाथों दान दिया. तबसे हमारे गाँव में यह कहावत प्रचलन में है कि जिन्दा में गूं-भात और मरने पर दूध-भात. मैं समझता हूँ कि वशिष्ठ बाबू के साथ भी इन दिनों बिहार की सरकार ऐसा ही कर रही है. वैसे हम सिर्फ बिहार सरकार को ही क्यों दोष दें? क्या वशिष्ठ बाबू सिर्फ बिहार की धरोहर थे? क्या उनके सन्दर्भ में केंद्र सरकार का कोई कर्त्तव्य नहीं था? हो सकता है कि अगर वशिष्ठ बाबू स्वस्थ रहते या हो जाते तो देश के लिए ऐसे अविश्वसनीय आविष्कार करते जिससे एक झटके में पूरी दुनिया भारत के कदमों में होती. लेकिन हमारा देश तो आरक्षण का देश है. एक ऐसा देश जहाँ ९०० नंबर लानेवाला डीएम बन जाता है और ९५० लानेवाला क्लर्क भी नहीं बन पाता. जिस देश में कम्पाउण्डर डॉक्टर से और क्लर्क ऑफिसर से ज्यादा योग्य हो वह देश कभी विश्वगुरु नहीं बन सकता,मैं दावे और पूरी जिम्मेदारी के साथ ऐसा कहता हूँ. बल्कि इसके लिए तो प्रतिभा को महत्व देना होगा,सिर्फ प्रतिभा को, जाति, विचारधारा और धर्म से परे होकर.
मित्रों, इस सन्दर्भ में मुझे एक कहानी याद आती है. अमेरिका में उन दिनों गृहयुद्ध चरम पर था और अमेरिका के १६वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन काफी परेशान थे. उन्होंने तब एक ऐसे व्यक्ति को अमेरिका का सेनापति बनाया जो उनका सबसे कटु आलोचक था. लिंकन के इर्द-गिर्द रहनेवाले लोगों ने इसके लिए जब उनसे नाराजगी जताई तो उन्होंने कहा कि इस काम के लिए देश में इस समय सबसे योग्य यही व्यक्ति है. जब तक अपने देश में भी ऐसा नहीं होता तब तक हजारों वशिष्ठ पागल होते रहेंगे और ऐसे ही मरते रहेंगे. अंत में मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि दुर्भाग्यवश मोदी सरकार भी ऐसा नहीं कर रही है. उसे भी हर पद पर सिर्फ संघी और चापलूसी करनेवाला चाहिए भले ही वो कितना ही अयोग्य क्यों न हो?

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

हमारा राम रो रहा है


मित्रों, अगर हम कहें कि अपने भारत के रोम-रोम में, पल-प्रतिपल में, घाट-घाट और घट-घट में राम समाए हुए हैं तो ऐसा कहना कहीं से भी अतिशयोक्ति नहीं होगी. हमारी दिनचर्या की शुरुआत राम से होती है और समाप्ति भी राम से. हम किसी का अभिवादन करते हैं तो कहते हैं राम-राम जी. जब कोई पूछता है कि आगे क्या होनेवाला है तो हम कहते हैं कि राम जाने, जब हमें अपनी प्राप्ति या उपलब्धि बतानी होती है तो हम उसका श्री भी राम जी को यह कहकर देते हैं कि राम जी की देनी से या रामजी की ईच्छा से ऐसा संभव हुआ है. यहाँ तक कि जब हम परेशान या उदास होते हैं तब भी हमारे मुंह से हठात निकलता है हे राम. अर्थात भारत के जन-मन के हर कण में राम ही राम बसे हुए हैं. राम के बिना हम भारत की कल्पना तक नहीं कर सकते.
मित्रों, यह भारत का दुर्भाग्य है कि ऐसे राम को हमने न्यायालय में ले जाकर खड़ा कर दिया. इतना ही नहीं दुर्भाग्यवश ऐसे राम को कई दशकों तक न्याय के लिए प्रतीक्षा भी करनी पड़ी. हालांकि अब माननीय उच्चतम न्यायालय ने राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है लेकिन सवाल उठता है कि क्या कोर्ट में मुकदमा जीतने मात्र से हमारे राम खुश हो जाएँगे और राम ने जिन मूल्यों और आदर्शों की हमारे समाज में स्थापना की थी उनकी स्थिति क्या है? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मेरे राम ने सोने की लंका को जीतने के बाद विभीषण को दे दिया था.
मित्रों, यह तो निश्चित है कि मेरे और हमारे राम ने जिन मूल्यों की स्थापना की और जिन आदर्शों को जिया आज समाज में उनका लगातार क्षरण हो रहा है. हम अपने बच्चों के नाम राम के नाम पर रख देते हैं लेकिन उनके भीतर, उनके अंतर्मन में राम के बदले रावण बसने लगता है और फिर वो इतने गिरे हुए कर्म करता है कि राम तो क्या रावण को भी उबकाई आने लगे. इस सन्दर्भ में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि निर्भया के बलात्कारियों में से एक राम सिंह भी था जिसने बाद में तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली.
मित्रों, यह अच्छी बात है कि राम जन्मभूमि पर अब राम का भव्य मंदिर फिर से बन जाएगा लेकिन मुझे नहीं लगता कि मेरे ऐसे राम इतने भर से प्रसन्न हो जाएँगे जिनके लिए पिता की आज्ञा और माता की ईच्छा के समक्ष अयोध्या का राज्यसिंहासन तृण के बराबर भी मूल्य नहीं रखता. हम देखते हैं कि आज के घनघोर पूंजीवादी समाज में अगर किसी चीज का मूल्य है तो वो सिर्फ पैसा. जिसको भी देखिए वो पैसे के पीछे भाग रहा है. सबको सुख और भोग चाहिए. भोगवाद ने हमारी अंतर्मन को इतना बीमार बना दिया है कि आज सारे पवित्र सामाजिक व पारिवारिक रिश्ते खतरे में पड़ गए हैं. राम के देश में रोजाना नए वृद्धाश्रम खुल रहे हैं, बालिका-गृहों में बालिकाओं से वेश्यावृत्ति करवाई जा रही है, भाई भाई की, पिता पुत्र की, पुत्र पिता की और पत्नी पति की हत्या कर और करवा रहे हैं, बाप स्वयं अपनी पुत्री की और भाई बहन की ईज्जत लूट रहा है, हर कोई अंधाधुंध पैसे के पीछे इस तरह भाग रहा है कि भगवान की मूर्तियाँ भी सुरक्षित नहीं हैं, ईमानदारों की कोई क़द्र नहीं है और हर चुनाव में चोर जीत रहे हैं और हम समझते हैं कि हमारा राम खुश है. वो कैसे खुश हो सकता है? असलीयत तो यह है कि हमारा राम रो रहा है और पछता रहा है कि उसने कैसे देश में जन्म लिया था. हमारा राम रो रहा है.....

सोमवार, 4 नवंबर 2019

बैंकों में जमा गरीबों के पैसों की सुरक्षा सुनिश्चित करे सरकार


मित्रों, एक जमाना था जब लोग चोर-डाकुओं के भय से जमीन के नीचे गाड़कर पैसे रखा करते थे. फिर आया बैंक का जमाना और लोग बैंकों में पैसा जमा करने लगे. फिर आए नॉन बैंकिंग संस्थान. लोगों ने अपना पेट काटकर इनमें ज्यादा ब्याज के लालच में जमकर पैसे जमा कराए. लेकिन १९९७ में एक समय ऐसा भी आया जब बहुत सी नॉन बैंकिंग कंपनियां रातों-रात लोगों के पैसे लेकर फरार हो गईं और देश की गरीब जनता रोती-बिलखती रह गयी. तब ऐसा कोई कानून था ही नहीं जिसके माध्यम से जनता की खून-पसीने की कमाई की बरामदगी हो पाती.
मित्रों, फिर वर्ष २०१७ में मोदी सरकार ने ऐसा कानून बनाया जिसके अंतर्गत बैंक बंद होने, दिवालिया होने या बैंक का विलय होने पर जमा धारकों को उनका पैसा मिलने की गारंटी दी गयी लेकिन दुर्भाग्यवश वह गारंटी सिर्फ १ लाख तक की ही दी गयी. अर्थात अगर आपका बैंक डूबता है तो आपको अधिकतम १ लाख रूपया ही प्राप्त होगा भले ही आपने करोड़ों रूपये जमा कर रखे हों.
मित्रों, पंजाब एंड महाराष्ट्र कॉपरेटिव (पीएमसी) बैंक के संकट में पड़ने के बाद बैंक में जमा रकम के बीमा का मुद्दा चर्चा में आ गया है। इस बैंक में जमा राशि के फंस जाने से लोगों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। पिछले दिनों पैसे की किल्लत से जूझ रहे पीएमसी बैंक के कुछ ग्राहकों की मौत भी हो गई।
मित्रों, जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि भारतीय बैंकों में जमा रकम पर ग्राहकों को अधिकतम एक लाख रुपए का बीमा मिलता है। बीमा का यह स्तर दुनिया के अधिकतर देशों में मिलने वाले बीमे के मुकाबले कम है। यही नहीं एशियाई देशों और ब्रिक्स समूह के देशों से भी तुलना की जाए, तो भारतीय बैंकों का डिपॉजिट बीमा काफी कम है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक रूस में बैंकों की जमा पर 13.6 लाख रुपए का बीमा कवर मिलता है। यह बीमा कवर ब्राजील में 45.36 लाख रुपए है। कनाडा में बैंक डिपॉजिट पर 51.2 लाख रुपए का बीमा कवर मिलता है। जापान में यह कवर 62.9 लाख रुपए है। फ्रांस में यह कवर 77.1 लाख रुपए, जर्मनी और इटली में भी यह कवर इतना ही है। ब्रिटेन में यह 78.7 लाख रुपए, ऑस्ट्रेलिया में 1.3 करोड़ रुपए और अमेरिका में यह डिपॉजिट कवर 1.77 करोड़ रुपए है।
मित्रों, भारत में बैंक डिपॉजिट पर जो बीमा कवर है, वह देश की प्रति व्यक्ति आय के मुकाबले 70 फीसदी है। रूस में यह प्रति व्यक्ति आय के मुकाबले 2.2 गुना है। ब्राजील में यह 7.4 गुना, कनाडा में 1.7 गुना, जापान में 2.3 गुना, फ्रांस में तीन गुना, जर्मनी में 2.6 गुना, इटली में 3.6 गुना, ब्रिटेन में 2.8 गुना, ऑस्ट्रेलिया में गुना और अमेरिका में 4.4 गुना है।  ब्रिक्स समूह में ब्राजील में 45.36 लाख रुपए और रूस में 13.6 लाख रुपए का डिपॉजिट कवर मिलता है। वहीं ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन में 57.3 लाख रुपए तक का बीमा कवर मिलता है। अगर हम एशियाई देशों की तरफ दृष्टिपात करें तो फीलीपींस में बैंक डिपॉजिट पर 67.3 लाख रुपए का बीमा कवर है। थाईलैंड में यह कवर 1.13 करोड़ रुपए है।
मित्रों, आप देख सकते हैं कि भारत में बैंक जमा राशि पर गारंटी बहुत कम है. अभी पीएमसी बैंक के डूबने के बाद उसके जमाकर्ताओं की हालत काफी चिंताजनक है. आरबीआई ने ६ महीने में मात्र ४० हजार रूपये निकालने की अनुमति दी है जो वर्तमान हालात में काफी कम है. फिर जिसको बेटी की शादी करनी होगी या घर बनाना होगा, बच्चों की पढाई का खर्च उठाना होगा उनका तो पूरा भविष्य ही ख़राब हो गया. सवाल उठता है कि मात्र एक लाख तक की ही गारंटी क्यों? यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूं कि अगर कोई सरकारी बैंक भी बंद होता या उसका विलय होता है तब भी ग्राहक मात्र एक लाख अधिकतम का ही हकदार होगा. तो मैं कह रहा था कि सिर्फ १ लाख तक की ही गारंटी क्यों? क्यों जनता की एक-एक पाई की गारंटी नहीं देनी चाहिए? एक तरफ बड़े-बड़े पूंजीपति हजारों करोड़ का ऋण लेकर विदेश भाग जा रहे हैं, हजारों करोड़ों के उनके ऋण माफ़ कर दिए जा रहे हैं तो वहीँ दूसरी ओर गरीबों के खुद की मेहनत की कमाई की भी गारंटी नहीं. ऐसा क्यों? भारत में लोकतंत्र है या अमीर तंत्र? या फिर बचपन में स्टेशन पर चाय बेचनेवाले की सरकार यह चाहती है कि लोग फिर से बाग़-बगीचे में जमीन के नीचे पैसे गाड़कर रखें?

गुरुवार, 31 अक्तूबर 2019

कुलीन तंत्र की ओर बढ़ता भारत


मित्रों, यह एक दिलचस्प तथ्य है कि अंग्रेजों ने जब भारतीयों को पहले पहल वोटिंग का अधिकार दिया था तब उन्होंने सारे भारतीयों को मताधिकार नहीं दिया बल्कि सिर्फ उन्हीं लोगों को दिया जो आयकर अदा करते थे अर्थात वह एक प्रकार का कुलीन तंत्र था ठीक उसी तरह जैसे फ़्रांस की क्रांति से पहले यूरोप में था.
मित्रों, इन दिनों अपने देश भारत में भी जो कुछ हो रहा है उससे इस बात की आशंका काफी प्रबल हो जाती है कि भारतीय लोकतंत्र एक बार फिर से कुलीन तंत्र की तरफ जा रहा है. एक ऐसे तंत्र की तरफ जहाँ सब कुछ, सारी सेवाएँ निजी होंगी. देश में अमीरों का जीवन जितना सुखकर और आरामदायक होगा, गरीबों का जीवन उतना ही कठिन. फिर एक दिन ऐसा होगा जब देश की बहुसंख्यक जनता सडकों पर होगी और तब कथित लोकतंत्र ही खतरे में पड़ जाएगा.
मित्रों, आप अगर ऐसा सोंच रहे हैं कि मैं कपोल कल्पना कर रहा हूँ तो आप बिलकुल गलत हैं. दरअसल इन दिनों दक्षिण अमेरिका के सबसे धनी देश चिली के लोग सडकों पर उतरे हुए हैं. भारत की ही तरह १९७० से ही चिली में निजीकरण चल रहा है. अभी पिछले साल ही वहां की सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद वहाँ शिक्षण संस्थान चलानेवाले पूंजीपतियों को मनमानी कमाई करने की छूट मिल गई. जिसके बाद छात्रों ने पूरे देश में जमकर उत्पात मचाया. अभी ताजा हिंसक प्रदर्शन इसलिए हो रहा है क्योंकि वहां मेट्रो रेल के किराये में संचालक ने मनमानी वृद्धि कर दी थी. वहां के राष्ट्रपति ने आपातकाल लगा दिया. फिर बढ़ा हुआ किराया भी वापस ले लिया गया लेकिन प्रदर्शन अभी भी जारी है. अब वहां के लोग वहां के समाज में लगातार बढ़ रही गैरबराबरी को समाप्त करने की मांग कर रहे हैं. राष्ट्रपति ने मंत्रिमंडल को भी बर्खास्त कर दिया है लेकिन प्रदर्शन रूकने के बदले और भी जोर पकड़ते जा रहे हैं.
मित्रों, मैं उस चिली की वर्तमान हालत को देखते हुए आपसे पूछना चाहता हूँ कि आप कैसा भारत चाहते हैं जिस चिली की प्रतिव्यक्ति आय १४ हजार डॉलर है लेकिन सबसे अमीर १० प्रतिशत लोगों की आय सबसे गरीब १० प्रतिशत लोगों की आय के मुकाबले ३० गुना ज्यादा है? क्या आप भी चाहते हैं कि भारत की स्थिति भविष्य में चिली जैसी हो जाए जबकि भारत में गैरबराबरी कहीं-न-कहीं चिली से भी ज्यादा है.
मित्रों, सच्चाई तो यह है कि १९९१ में उदारीकरण की शुरुआत के बाद से असमानता की स्थिति सुधरी नहीं बल्कि बिगड़ी ही है.  भारत में असमानता (Inequality) इन तीन दशकों में लगातार काफी तेजी से बढ़ी है। पिछले साल देश के १०१ अरबपतियों की संपत्ति जीडीपी के 15% तक पहुंच गई। 5 साल पहले उनके पास जीडीपी के 10% के बराबर दौलत थी। ऑक्सफैम इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में यह बात कही है। अमीरों की अमीरी और गरीबों की गरीबी बढ़ने के लिए उसने सरकारी नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। भारत की जीडीपी 2.6 लाख करोड़ डॉलर यानी करीब 168 लाख करोड़ रुपए है। 2017 में यहां अरबपतियों की संख्या (6,500 करोड़ से ज्यादा नेटवर्थ वाले) 101 थी। इस ‘इंडिया इनइक्वलिटी रिपोर्ट 2018’ में कहा गया है कि भारत दुनिया के सबसे असमान देशों में है। इसमें कहा गया था कि 2017 में भारत में जो संपत्ति पैदा हुई उसका 73% हिस्सा 1% बड़े अमीरों को मिला। जिन मुट्‌ठीभर लोगों के हाथों में अकूत संपत्ति है, उनकी अमीरी में भी तेजी से इजाफा हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार 2017 में भारत के 67 करोड़ गरीबों की संपत्ति में सिर्फ 1% बढ़ोतरी हुई.
मित्रों, सारांश यह कि लिबरलाइजेशन का सारा फायदा सिर्फ अमीरों को मिला है गरीबों को नहीं. 50% गरीबों के पास 1991 में 9% संपत्ति थी, 2012 में यह घटकर 5.3% रह गई। वहीँ टॉप 1% अमीरों के पास 1991 में 17% संपत्ति थी, यह 2012 में बढ़कर 28% हो गई। साथ ही, टॉप 10% अमीर लोगों की संपत्ति की हिस्सा इस दौरान 51% से बढ़कर 63% हो गया. इतना ही नहीं वर्तमान भारत में कुल खर्च का 44.7% शीर्ष 20% लोग करते हैं, सबसे कमजोर 20% लोगों का खर्च महज 8.1% है। शहरों में टॉप 10% लोगों का खर्च सबसे गरीब 10% लोगों की तुलना में 19.6 गुना है। रिपोर्ट का कहना है कि 2005 में देश के अरबपतियों की संपत्ति जीडीपी के 5% के बराबर थी। 2008 में यह बढ़कर 22% पर पहुंच गई। उसी साल दुनिया की इकोनॉमी में गिरावट आई। इससे 2012 में संपत्ति भी कम हुई और अरबपतियों की संपत्ति जीडीपी की तुलना में 10% रह गई। लेकिन उसके बाद जैसे-जैसे हालात सुधरते गए, इनकी संपत्ति भी बढ़ती गई। 2017 में यह जीडीपी की 15% हो गई है. रिपोर्ट कहती है कि 2017 में देश में जो संपत्ति पैदा हुई उसका 73% हिस्सा 1% बड़े अमीरों को मिला। २०१७ में 20.9 लाख करोड़ के इजाफे में से 1% अमीरों की संपत्ति ७३% और 67 करोड़ गरीबों की संपत्ति 1% बढ़ी।
मित्रों, आप समझ सकते हैं कि अंधाधुंध निजीकरण से अपने देश में गरीबों की जिंदगी भविष्य में और भी कितनी कठिन होने जा रही है. ऐसे में समाधान यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था को मिश्रित अर्थव्यवस्था बने रहने दिया जाए न कि घनघोर पूंजीवाद के मुंह में धकेल दिया जाए. सार्वजानिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के बीच एक संतुलन बना रहना चाहिए अन्यथा देश से गरीबी के स्थान पर गरीब मिट जाएँगे. 

मंगलवार, 29 अक्तूबर 2019

नाटक, नौटंकी और राजनीति


मित्रों, कभी तथाकथित पंडित जवाहरलाल नेहरु ने कहा था कि हम बदलेंगे देश बदलेगा. बाद में देश के लोगों को लगा कि नेहरु जी की पार्टी को हटाकर सरकार बदलेंगे तब देश बदलेगा. लेकिन अब देश की जनता को लग रहा है कि यह देश कभी नहीं बदलेगा. और अगर बदलेगा भी तो अच्छे दिन तो कतई नहीं आनेवाले हैं अलबत्ता तन पर नहीं रह जाएगा लत्ता और इस तरह देशवासियों के बुरे दिन आने वाले हैं.
मित्रों, समझ में नहीं आता कि अपने देश की राजनीति को हो क्या गया है? सब कुछ सिर्फ सिम्बोलिज्म यानि प्रतीकवाद. गणित में हम पढ़ते हैं कि मान लिया कि ....आज की राजनीति भी कहती है कि ऐसा मान लीजिए. कैसे मान लें जिंदगी कोई बीजगणित या अलजेब्रा तो है नहीं जो मान लें.
मित्रों, आज की राजनीति कहती है कि मान लो कि हम बचपन में गरीब थे और स्टेशन पर चाय बेचा करते थे. आज की राजनीति कहती है कि मान लो कि हमारे पास मास्टर डिग्री है. आज की राजनीति यह भी कहती है कि मान लो कि हम देश के लिए खाते हैं, देश के लिए पीते हैं, देश के लिए १० लाख का कपडा पहनते हैं, देश के लिए शादी की फिर देश के लिए पत्नी को छोड़ा, घर को छोड़ा. आज की राजनीति कहती है कि मान भी लो कि हमने देश के लिए चुनाव प्रचार के लिए हजारों मोटरसाइकिल खरीदीं और देशहित में उनको अपनी पार्टी के कार्यालयों में सडा रहे हैं. आज की राजनीति कहती है कि मान लो कि जो विपक्षी नेता हमारे पक्ष में आ गए वे अब पाक-साफ़ हैं. आज की राजनीति कहती है कि मान लो नोटबंदी और जीएसटी लागू करना देश के लिए काफी लाभदायक रहे. वो यह भी मान लेने के लिए अतिविनम्र निवेदन करती है कि इस समय देश में कोई मंदी नहीं है और देश अगले ५ सालों में ५० ख़राब डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगी. वो यह भी कहती है कि कोई चैनल नहीं देखो और सिर्फ नमो एप देखो क्योंकि हम जो दिखाते हैं सिर्फ वही सच है बांकी सब माया है. आज की राजनीति कहती है कि यह मत देखो कि तुम बेरोजगार हो बल्कि यह देखो कि चुनावों से ४ दिन पहले हमने कितने पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया. आज की राजनीति कहती है कि तुम हर महीने के अंतिम रविवार को मेरे मन की बात सुनो क्योंकि तुम सिर्फ चुपचाप सुनने के लिए पैदा हुए हो. आज की राजनीति कहती है कि तेरी जेब खाली होने को लेकर दुखी मत होओ क्योंकि हमने तुमसे दुखी होने का अधिकार छीन लिया है. बल्कि तुम्हे हर हाल में यह देखकर खुश होना होगा कि हमने आंकड़ों में महंगाई को समाप्त कर दिया है. तुम्हे यह देखकर भी खुश होना होगा कि मेरा स्वागत अमेरिका में रेड कार्पेट पर होता है. आज की राजनीति कहती है कि तुम्हें अपने लाडले सैनिक पुत्र के शव पर विलाप नहीं करना है बल्कि यह देखकर खुश होना है कि देश के प्रधानमंत्री तुम्हारे सैनिक पुत्र के साथ दिवाली मनाते हैं. आज की राजनीति कहती है कि मान लो कि देश का सबको साथ में लेकर सबका विकास हो रहा है और सबका विश्वास भी हासिल कर लिया गया है. आज की राजनीति कहती है कि मान लो कि निजीकरण देशहित में है और समस्त समस्याओं का एकमात्र ईलाज निजीकरण है.
मित्रों, कुल मिलाकर इस समय पूरे देश की राजनीति सिर्फ प्रतीकवाद के सहारे चल रही है. मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री और अधिकारी सब बस एक प्रतीक बनकर रह गए हैं उनका वास्तविक अस्तित्व है ही नहीं. ऐसा लगता है कि जैसे विशालकाय भारत के रंगमंच पर कोई महानाटक मंचित हो रहा है. ऐसा महानाटक जिसका कोई अंत ही नहीं है. अभिनय देखिए और ताली बजाते रहिए. आँखों में आंसू हो तब भी हंसकर ताली पीटनी पड़ेगी क्योंकि आपके सामने इस बात को मानने के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं है कि हमारा देश दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बन चुका है और हमारे प्रधानमंत्री दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति. ख़बरदार जो रोये या ताली पीटना बंद किया क्योंकि ऐसा करना अब अपने देश में देशद्रोह है.

शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2019

भाजपा को झटका जनता का फटका


मित्रों, इस साल जबसे भाजपा लोकसभा चुनाव जीती है एक अलग ही मूड में है. इस समय भाजपा की मनोदशा ठीक वैसी ही है जैसी कांग्रेस की २००९ का चुनाव जीतने के बाद थी. उसका और उसके शीर्षस्थ नेता द्वय का घमंड दोबारा केंद्र में सरकार के गठन के बाद से ही सातवें आसमान पर है. भाजपा के शीर्ष नेता जनता को भेड़ और खुद को चरवाहा समझ रहे हैं और उनको लगता है कि वे उनको जिधर हांक देंगे वे बिना किसी नानुकर के उधर ही चल देंगे.
मित्रों, इस बारे में मुझे एक किस्सा याद आ रहा है. बिहार की राजनीति में एक बहुत बड़े नेता हुए हैं नाम था-सत्येन्द्र नारायण सिन्हा. १९८५ में कांग्रेस के बिहार विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उनकी भेंट महनार (वैशाली) से चुनाव हार चुके वरिष्ठ समाजवादी नेता मुनीश्वर प्रसाद सिंह से पटना में हुई. मुनीश्वर बाबू जाहिर है कि बड़े उदास थे. तब सत्येन्द्र बाबू ने चुटकी लेते हुए मुनीश्वर बाबू को कहा था कि तुम कैसे चुनाव हार जाते हो हम तो हर बार जीत जाते हैं चाहे हम जनता के लिए कुछ करें या न करें.
मित्रों, उन्हीं सत्येन्द्र बाबू को बाद में कई बार हार का सामना करना पड़ा और गुमनामी में दिन काटना पड़ा. कहने का तात्पर्य यह है कि जनता किसी की गुलाम नहीं है बल्कि मनमौजी है. जब मौज चढ़ा तो एक चायवाले को भी राजा बना देती है जब गुस्सा आया तो सत्येन्द्र बाबू जैसे राजा को भी सड़क पर ला देती है. मुझे लगता है मोदी और शाह सत्ता के नशे में अभी इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं या फिर समझकर भी नहीं समझना चाहते हैं.
मित्रों, पिछले कई चुनावों से हम देख रहे हैं कि भाजपा जमीन से जुड़े मुद्दों को झुठलाकर हवाई मुद्दों के आधार पर चुनाव जीतने का प्रयास करती रही है. देश की जनता कितनी परेशान है इस बात से जैसे उसका कोई सरोकार ही नहीं रह गया है. देश में छाई मंदी और उससे उपजी बेरोजगारी, महंगाई और बैंकों की खस्ता हालत और महँगी होती बैंकिंग सेवा ने लोगों का जीना मुश्किल कर रखा है लेकिन मोदी देश को चाँद दिखा रहे हैं. अभी महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनाव होना था तो पाकिस्तान पर हमला बोल दिया. मतदान ख़त्म,हमला समाप्त. जबकि केंद्र सरकार को इस बात की चिंता होनी चाहिए कि कश्मीर से सेब देश में कैसे पहुंचेगा क्योंकि आतंकवादी सेब बेचनेवाले किसानों और सेब खरीदनेवाले व्यापारियों दोनों की लगातार हत्या कर रहे हैं. सवाल उठता है कि क्या केंद्र सरकार में इतना दम है कि वो कश्मीरी सेब उत्पादकों में भरोसा पैदा कर सके?
मित्रों, पिछले कुछ सालों में भाजपा ने दूसरे दलों से जमकर नेताओं का आयात किया है और उनको अपने कार्यकर्ताओं पर थोप दिया है. साथ ही जमकर मशहूर हस्तियों को भी टिकट बांटा गया है. इन चुनावों ने भाजपा को बता दिया है कि अब ऐसा नहीं चलेगा। बल्कि अब जनता पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं को जिताएगी भले ही वो निर्दलीय उम्मीदवार हो। ये तो हुई पूरे चुनाव परिणाम की बात। जहां तक बिहार का प्रश्न है तो उपचुनावों में पटखनी देकर बिहार की जनता ने भाजपा नेतृत्व को चेतावनी दे दी है कि अब वो नीतीश कुमार की नाकारा सरकार को बर्दाश्त करने की स्थिति में कदापि नहीं है। 

शनिवार, 19 अक्तूबर 2019

कमलेश तिवारी को मिली सच बोलने की सजा?

मित्रों,  लखनऊ में सरकार की नाक के नीचे हिन्दू नेता कमलेश तिवारी की हत्या कर दी गई. अभी तक यह पता नहीं है कि किन लोगों ने और क्यों उनकी हत्या की लेकिन अब तक कई खबरें वायरल हो रही हैं जिनमें यह भी संकेत मिल रहे हैं कि दरिंदगी से दहला देनेवाले आईएसआईएस का हाथ है.
मित्रों, दरअसल कई साल पहले जब समलैंगिकों ने आन्दोलन किया था तब आजम खान ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बेवजह तंज करते हुए आरोप लगाया था कि समलैंगिकता आरएसएस का मौलिक लक्षण है. तब हिन्दू महासभा के नेता कमलेश तिवारी ने जवाब देते हुए कहा था कि खुद इस्लाम के संस्थापक हजरत मोहम्मद साहब में कई सारे मानवीय अवगुण थे जिसमे समलैंगिकता भी एक था. उनके बयान के बाद मुस्लिम समुदाय काफी गुस्से में आ गया था. उनके खिलाफ देवबंद, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, लखनऊ सहित देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुआ था. पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के कालियाचक में भी बड़ा बवाल हुआ था. जनवरी 2016 में करीब 2.5 लाख मुसलमानों ने उग्र रैली निकाली और आगजनी की गई. पुलिस थाने पर हमला हुआ. BSF की एक गाड़ी को भी आग के हवाले कर दिया. यात्रियों से भरी बस पर भी पथराव किया गया. दंगाई कमलेश तिवारी की मौत मांग रहे थे. कमलेश तिवारी की मौत को लेकर फतवे जारी हुए. बिजनौर के जामा मस्जिद के इमाम मौलाना अनवरुल हक और मुफ्ती नईम कासमी ने कमलेश तिवारी का सिर काटने वाले को 51 लाख रुपए का इनाम देने का एलान किया.  बाद में पुलिस ने कमलेश को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था. उस समय अखिलेश यादव की सरकार ने उनके खिलाफ रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) भी लगाया था. हालांकि, सितंबर 2016 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उनपर लगे रासुका को हटा दिया था. वो फिलहाल जमातन पर रिहा चल रहे थे.
मित्रों, समझ में नहीं आता कि पूरी दुनिया में जब भी कोई मोहम्मद साहब का चरित्र चित्रण करने का प्रयास करता है तो इतना हंगामा क्यों खड़ा हो जाता है? चाहे आशाराम हो या बाबा राम रहीम सिंह हो या रामपाल पिछले दिनों इनके बारे में क्या-क्या नहीं कहा गया. भगवान राम और श्रीकृष्ण के बारे में भी रोजाना क्या-क्या नहीं कहा जाता. भगत सिंह ने अपनी पुस्तक मैं नास्तिक क्यों हूँ में भगवान को क्या-क्या नहीं कहा है? उन्होंने सीधे-सीधे सवाल उठाया है कि अगर दुनिया में अच्छा होने के लिए भगवान जिम्मेदार है तो निर्दोषों की मौत की जिम्मेदारी भी उसे ही लेनी होगी. लेकिन कहीं कोई हंगामा नहीं हुआ. लेकिन जैसे ही इस्लाम की जहरीली और अमानवीय शिक्षाओं और मोहम्मद साहब के बारे में कुछ कहा जाता है पूरी दुनिया में जैसे हिंसा का ज्वार पैदा हो जाता है. ऐसा क्यों है? जब आजम खान आरएसएस के बारे में घटिया बातें करता है तब तो कोई उसे मना नहीं करता लेकिन जब कोई कमलेश तिवारी उसका उत्तर देता है और तथ्यों के आधार पर देता है तब लोग क्यों पूरी दुनिया के गैर मुस्लिमों को जला देने पर आमादा हो जाते हैं?
मित्रों, अच्छा तो यह होता कि दुनियाभर के मुसलमान आत्मविश्लेषण करते और अपने धर्म में इस प्रकार से सुधार करते जिससे किसी को उनके ऊपर ऊँगली उठाने का मौका ही नहीं मिलता. बजाए इसके वे उनके कुकृत्यों की चर्चा करनेवाले के पीछे ही पड़ जाते हैं. अभी कल ही अफगानिस्तान में एक मस्जिद में बम फोड़कर ६२ निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया है. हो सकता है कि ऐसा किसी ने जन्नत जाने के लालच में किया हो लेकिन सवाल उठता है कि क्या भगवान पागल है जो ऐसे लोगों को दोजख के बजाए जन्नत में भेजेगा बशर्ते अगर जन्नत और दोजख होते हों? इसी तरह से सीरिया और इराक में खुद मुसलमान मुसलमान को मार रहे हैं. लाखों लोग अभी तक पश्चिमी एशिया में इनके आपसी झगडे में मारे जा चुके हैं क्या इसकी कोई चर्चा भी न करे? आखिर क्यों मुसलमानों के अतिहिंसक होने के कारणों का विश्लेषण नहीं होना चाहिए जबकि उनसे पूरी दुनिया परेशान है? पाकिस्तान जैसे देशों ने तो इसे रोकने के लिए ईशनिंदा कानून ही बना रखा है. किसी शायर ने क्या खूब कहा है-
हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती.
मित्रों, सच बोलना तो हर समाज में गुनाह रहा है. सिर्फ भारत ही है जो मुंडे मुंडे मति भिन्नाः को मानता है. याद करिए कि किस तरह सुकरात को सच बोलने के लिए जहर पीना पड़ा था. ईसा शूली पर चढ़े और मंसूर अल हल्लाज को आग में झोंक दिया गया. लेकिन हमारे भारत में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता-बल्कि यहाँ तो लोग वेदों का विरोध करने के बावजूद सिद्धार्थ को भगवान बुद्ध बना देते हैं. फिर आज के भारत में सच बोलना गुनाह कैसे हो गया? मुझे लगता है कि कमलेश तिवारी भी सच बोलने के चलते मारे गए. ऐसे शहीद को श्रद्धांजलि.
-इस बीच, सोशल मीडिया पर एक तथाकथित संगठन अलहिंद ब्रिगेड के नाम से एक मेसेज वायरल हो रहा है, जिसमें हत्या की जिम्मेदारी ली गई है। मेसेज में दावा किया गया है कि जो भी इस्लाम या मुस्लिमों पर उंगली उठाएगा, उसका यही अंजाम होगा। मेसेज की सत्यता की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। यूपी पुलिस की भी जानकारी में यह मेसेज है और इसकी जांच की जा रही है।

बुधवार, 16 अक्तूबर 2019

नरेन्द्र मोदी की रॉबिनहुडी सरकार


मित्रों, जब मोदी जी २०१४ में चुनाव प्रचार कर रहे थे तो न जाने उन्होंने क्या-क्या वादे किए थे. जैसे कि देश उनको सिर्फ ६० महीने देकर देखे. वे बेरोजगारी, गरीबी और कालेधन का कलंक हमेशा के लिए मिटा देंगे. पांच साल के बाद भ्रष्टाचार बीते दिनों की बात हो चुकेगी. लेकिन हमारे देश में हो क्या रहा है? बेरोजगारी इन दिनों ऐतिहासिक ऊंचाई पर है, भुखमरी के मामले में भारत पाकिस्तान से भी पीछे है और कालाधन जो विदेश से सौ दिनों में वापस आनेवाला था उसका अबतक कोई अता-पता नहीं है. अलबत्ता कांग्रेस के लगभग सारे भ्रष्ट नेता जरूर भाजपा में आकर पवित्र हो चुके हैं.
मित्रों, जब मोदी जी ने नोटबंदी लागू की तो मैं समझा था और मैं ही क्या पूरा देश समझा था कि मोदी जी की नीयत साफ़ है और वे विदेश के साथ-साथ देश में मौजूद कालेधन का भी नामो-निशान मिटा देंगे. तब भारत के छोटे-मोटे कारोबारियों ने देशहित के नाम पर मोदी जी की बातों पर यकीन करके अपने रोजगार छिन जाने के गम को भी बर्दाश्त कर लिया. लेकिन वैसा कुछ भी नहीं हुआ जैसा देश के गरीबों ने सोंचा था. चालाक अमीरों ने तो बैंकवालों की मिलीभगत से अपने सारे कालेधन को सफ़ेद कर लिया लेकिन गरीबों का रोजगार कभी फिर से पटरी पर नहीं आ सका. इतना ही नहीं नोटबंदी के कारण लाखों लघु और मध्यम दर्जे की औद्योगिक ईकाईयां हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो गईं जिससे लाखों श्रमिकों की नौकरी चली गयी और वे बैंक में जमा बुरे वक़्त के लिए बचाए गए धन पर निर्भर हो गए.
मित्रों, मंदी को और भी लम्बा और मारक बनाने के लिए मोदी सरकार ने मूर्खतापूर्ण तरीके से जीएसटी को लागू कर दिया जिसमें अग्रिम कर देने की व्यवस्था थी. सरकार ने समय पर व्यवसायियों को उनका अग्रिम पैसा नहीं लौटाया जिससे उनको दोहरी क्षति हुई. बाद में जीएसटी के कारण कर-वसूली में आई कमी को पूरा करने लिए सरकार ने सार्वजानिक क्षेत्र की ईकाईयों जैसे ओएनजीसी और एलआईसी से जबरन पैसे लिए जिससे इनकी हालत ख़राब हो गई. पहले जहाँ वे महानवरत्न थे आज पत्थर बनकर रह गए हैं. इतना ही नहीं सरकार ने रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया को भी नहीं छोड़ा.
मित्रों, यह सरकार इतने पर ही रूक जाती तो फिर भी गनीमत थी लेकिन अब तो यह सरकार रेलवे का भी निजीकरण करने में जुट गई है. इससे पहले बीएसएनएल, एमटीएनएल को मनमाने ऑफर लाकर बर्बाद किया जा चुका है. मतलब कि भविष्य में गरीब लोग रेलगाड़ी में चढ़ भी नहीं पाएँगे. इतना ही नहीं इन सरकारी कंपनियों और रेलवे में निकट-भविष्य में जमकर छंटनी हो सकती है. मंदी के चलते कई निजी एयरलाइन्स पहले ही बर्बाद हो चुकी हैं. आसमान का महाराजा एयर इण्डिया भी जल्द ही परायाधन बननेवाला है.इसी तरह भारत पेट्रोलियम को भी कौड़ी के दाम में बेचने की पूरी तैयारी हो चुकी है. राजतिलक की करो तैयारी आ रहे हैं भगवाधारी. इस सरकार के रहते भविष्य में बैंकों में लोगों की जमा पूँजी भी सुरक्षित है या नहीं कहा नहीं जा सकता. सरकार पैसे की कमी के चलते पहले ही तरह-तरह की चालाकियों से गरीबों से पैसे वसूल रही है जैसे एक तरफ तो सरकार बैंकों से लिए गए बड़े ऋणों को माफ़ कर रही है वहीँ गरीबों से न्यूनतम जमा राशि के नाम पर दोनों हाथों से पैसे लूट रही है.
मित्रों, इन दिनों देश की जनता की हालत कुल मिलाकर बेटा मांगने गए और पति को भी गँवा दिया वाली हो गयी है. यह सही है कि सरकार ने धारा ३७० को समाप्त कर दिया है और भविष्य में शायद वो समान नागरिक संहिता को भी लागू करेगी. साथ ही कदाचित राम मंदिर भी अयोध्या में बना दिया जाएगा. लेकिन इसके बदले सरकार देश के गरीबों से उनकी जिंदगी ही छीन लेना चाहती है. भविष्य में उनके पास जिंदगी तो होगी परन्तु उनकी जिंदगी के स्वामी पूंजीपति होंगे. अर्थात कभी पाकिस्तान के नाम पर तो कभी चंद्रयान के नाम पर तो कभी चीनी राष्ट्रपति की यात्रा या राऊडी मोदी के नाम पर भारतवासियों को लगातार बरगलाया जा रहा है. असलियत तो यह है कि यह सरकार रॉबिनहुड से उलट व्यवहार करनेवाली सरकार है. जहाँ रॉबिनहुड अमीरों से धन लूटकर उसे गरीबों में बाँट दिया करता था यह सरकार अमीरों को पहले ऋण देती है और फिर उनके ऋणों को माफ़ कर उसकी कीमत गरीबों से वसूलती है. चाहे वो पेट्रोल-डीजल और बिजली की ऊंची दर के रूप में हो या फिर उच्च शिक्षा में बेतहाशा बढ़ी हुई फीस के रूप में हो या रेलगाड़ी में बढे हुए तत्काल सीटों और टिकटों के रूप में हो. खुद सरकारी आंकड़ें बताते हैं कि इस सरकार के समय रोजगार नहीं बढ़ा बल्कि बेरोजगारी बढ़ी हैं लेकिन सरकार अपने आंकड़ों को ही झुठला रही है. अभी-अभी कल ही खबर आई कि यूपी सरकार २५ हजार गृहरक्षकों को नौकरी से निकालने जा रही है. लेकिन बाद में मामले को तूल पकड़ते देख निर्णय को तत्काल टाल दिया गया. अरे भाई गरीबों का जिन्दा रहना कोई जरूरी है क्या जरूरी तो राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण है. इस सरकार के मंत्री मंदी को फिल्मों से जोड़कर अजीबोगरीब बयान देकर गरीबों के जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं. आश्चर्यजनक तो यह है जब अर्थव्यवस्था में क्षेत्र में चौतरफा निराशाजनक हालात हैं तब भारत के प्रधानमन्त्री देश की जनता को चने के झाड़ पर चढाते हुए भारत को ५० ख़राब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की बात कर रहे हैं. 
मित्रों, मैं नहीं जानता कि मोदी जी कितने गरीब परिवार से आते हैं लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि इनके समय में लाखों लोग सड़क पर जरूर आ गए हैं. मोदी जी को उन परिवारों का दर्द नहीं पता जिनके पैसे इस समय पंजाब एंड महाराष्ट्र बैंक में फंस गए हैं और जो आत्महत्या कर रहे हैं. मोदी जी, हो सकता है कि आपने बचपन में चाय बेची होगी लेकिन क्या इसका बदला आप देश के गरीबों से लेंगे और हम सबसे चाय बेचवाएंगे और पकौड़े तलवाएंगे?

शनिवार, 12 अक्तूबर 2019

शी जिंग पिंग अच्छे तो इमरान बुरे कैसे


मित्रों, जबसे यह सरकार सत्ता में आई है इसने विदेश नीति का मतलब ही बदल कर रख दिया है. वैसे अर्थ तो इसने अर्थव्यवस्था और अर्थशास्त्र का भी बदल दिया है. नाम गरीब का सारे काम अमीरों के लिए. इस सरकार में सब कुछ सिर्फ और सिर्फ दिखावे में बदल गया है. ठीक उसी तरह जैसे कोई लड़की का बाप अपने लड़की की शादी किसी महानालायक से करे मगर गाजे-बाजे और झाडफानूस पर करोड़ों लुटा दे.
मित्रों, अब चीन के प्रीमियर शी जिंग पिंग की इस समय चल रही भारत यात्रा को ही ले लीजिए. उनकी यात्रा को भारत सरकार ने क्या खूब तबज्जो दी है. जैसे चीन के राष्ट्रप्रमुख भारत में आते ही अपने देश की सारी गलतियों के लिए जमीन पर अपनी नाक रगड़ते हुए माफ़ी मांगेंगे और चीन भविष्य में भारत का सबसे अभिन्न मित्र हो जाएगा. चीन के राष्ट्रप्रमुख को दिल्ली के बदले महाबलीपुरम में बुलाया गया है. उनके आगे छप्पनभोग की थाली पेश की गयी है. दोनों नेता लगातार ठहाके लगा-लगाकर बात कर रहे हैं. मगर परिणाम? समझ में नहीं आता कि भारत को ठहाके चाहिए या परिणाम चाहिए. देश की आर्थिक स्थिति ख़राब है और लगातार और भी ख़राब होती जा रही है लेकिन प्रधानमंत्री जनता के अथक परिश्रम से अर्जित पैसे को दिखावे में और शाही भोज में उड़ा रहे हैं. अभी-अभी उन्होंने अमेरिका में राऊडी मोदी का आयोजन किया और पता नहीं क्यों किया? अपने लिए किया या डोनाल्ड ट्रम्प के लिए किया? अपने लिए किया तो भी ठीक मगर उससे भारत को क्या लाभ हुआ क्या प्रधानमंत्री जी बताएंगे? क्या भारत सरकार बताएगी कि इस कार्यक्रम पर भारत के लगातार छीजते खजाने से कितना पैसा गया?
मित्रों, हम भारतीयों को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वह चीन ही है जिसने भारत की लाखों वर्ग किमी जमीन पर अपना अवैध कब्ज़ा जमा रखा है. हम यह भी नहीं भूल सकते कि पाकिस्तान इसी चीन की शह पर हम पर गुर्राता रहता है वर्ना उसकी अपनी कोई औकात ही नहीं. वह चीन ही है जो भारत को लगातार चारों तरफ से घेर रहा है. यहाँ तक कि उसने हमसे बिना पूछे पीओके में सड़क भी बना ली है. और फिर भी हम उसके लिए पलकें बिछा रहे हैं? भारत के बाद शी जिंग पिंग नेपाल जाएंगे और वहां भी वे जो कुछ भी करेंगे वो सिर्फ और सिर्फ भारतविरोधी होगा फिर भारत सरकार क्यों उनके स्वागत में बिछी पड़ी है?
मित्रों, हम जानते हैं कि मोदी जी के अमेरिका, चीन, जापान, रूस आदि देशों के शासनाध्यक्षों के साथ बड़े ही मधुर व्यक्तिगत सम्बन्ध हैं. मगर सवाल उठता है कि भारत की जनता को व्यक्तिगत संबंधों से क्या लेना-देना? हमें तो कूटनीतिक संबंधों से मतलब है. हमें तो इस बात से मतलब है कि कोई देश भारत के बारे में क्या सोंचता है और भारत के प्रति उसका व्यवहार कैसा है न कि इस बात का कोई महत्व है कि मोदी जी के स्वागत में अमेरिका में कितने किमी तक लाल मखमल बिछाया गया. मगर हम देख रहे हैं कि भारत के प्रधानमंत्री और उनके दरबारी पत्रकार लगातार यही प्रदर्शित कर रहे हैं कि मोदी जी ट्रंप से इतनी बार गले मिले या फिर इतनी बार शी जिंग पिंग से हाथ मिलाया. क्या बचपना है? ये सब तो ऊपरी बातें हैं वास्तविक तो आधिकारिक बयान  या नीति होती है.
मित्रों, देखना यह है कि भारत-चीन शी जिंग पिंग की यात्रा के दौरान कैसा साझा बयान जारी करते हैं. क्या चीन भारत के प्रति सचमुच मित्रतापूर्ण रवैया अपनाता है या फिर अपनी पाकिस्तानपरस्त नीति जारी रखता है? यह भी देखना होगा कि चीन भारत के व्यापार-घाटे को कम करने की दिशा में कोई कदम उठाता भी है या नहीं? अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर यही कहना पड़ेगा कि खाया-पीया कुछ भी नहीं और गिलास तोडा सवा लाख का. वैसे यहाँ तो दोनों जने खूब खा-पी रहे हैं.

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2019

गया सुशासन पानी में


मित्रों, बिहार के गांवों में एक लोक गीत वर्षो से लोकप्रिय है खासकर भैंस पालनेवालों की बीच-गईल गईल रे भईसिया पानी में, दूधो न देबे जवानी में, गईल गईल रे भईसिया पानी में.
मित्रों, अपना बिहार भी विचित्र है. पहले यहाँ भैंस पानी से बाहर आने का नाम नहीं लेती थी. तब लालू जी ने इसका उपाय बताया था कि छोड़ दो भईसिया को उसके हाल पर. भूख लगेगी तो खुद ही पानी से बाहर आ जाएगी. बिहार में जबतक लालू जी का शासन था लगता था कि भैंस के साथ-साथ पूरा बिहार भी पानी में है और उसके साथ बिहार सरकार भी.
मित्रों, फिर कुछ समय के लिए बिहार में फील गुड वाला समय आया. जब २००५ में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने तब लगा कि अब ये सरकार बिहार को पानी से बाहर निकलेगी. लेकिन अब लगता है कि इससे अच्छी स्थिति तो लालू के समय थी. तब पटना इस तरह पानी में डूबता नहीं था. बताईए भला इन्द्रदेव की इतनी हिमाकत कि २-२ करोड़ के फ्लैट वाले ईलाके को भी पानी-पानी कर दिया. नीचे का पूरा फ्लोर तो डूब ही गया. ऊपर से बिजली गायब. न खाने को कुछ न पीने को. लोग भागना भी चाहते थे तो भाग नहीं पा रहे थे. फिर खबर आई कि बिहार की प्रख्यात लोक गायिका शारदा सिन्हा जी अपने घर में फंसी हुई हैं. इसके साथ ही यह खबर भी आई कि बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी पानी में घिरे हुए हैं. अब जब छोटे सरकार ही पानी में डूब रहे थे तो जनता को बचाता कौन? 
मित्रों, कुछ दिनों तक पूरा पटना एक समंदर में बदल गया था. सरकारी राहत सरकारी तरीके से चलनी शुरू हुई. सड़े हुए आलू, सडा हुआ चूड़ा असमान से बरसाए जाने लगे. खाना हो तो खाओ नहीं हो मरो अपनी बला से. जमीन पर और पानी में तो कहीं सरकार का पता ही नहीं था.
मित्रों, इसी बीच पटना के लोगों के लिए मसीहा बनकर आए हारे हुए नेता पप्पू यादव. बेचारे पटना के लगभग हर घर तक गए. भोजन-पैसा-पानी बांटा, लोगों को घर से बाहर निकाला. सुबह से देर रात तक पटना की सड़कों पर सिर्फ पप्पू यादव और उनके लोग ही नजर आ रहे थे. यहाँ तक कि लोग राहत के लिए पैसे भी पप्पू यादव के पास ही जमा करवाने लगे. वो तो जब अमिताभ बच्चन जी ५१ लाख का चेक दिया तब पता चला कि बिहार में मुख्यमंत्री भी है और एक मुख्यमंत्री आपदा कोष भी.
मित्रों, सवाल उठता है कि जो काम पप्पू यादव कर रहे थे और अब भी कर रहे हैं उसे बिहार सरकार ने क्यों नहीं किया? क्या एनडीए को इस बात का अभिमान हो गया है कि उसके पास जरूरत से ज्यादा जनसमर्थन है? आश्चर्य तो तब हुआ जब पटना की मेयर जो भाजपाई हैं मीडिया के सामने आई. पता चला कि वे दूसरी राबड़ी देवी हैं. निपट अनपढ़ और अज्ञानी. शायद यही कारण है कि पटना नगर निगम के पास ड्रेनेज का मानचित्र तक नहीं है ड्रेनेज सिस्टम सुधारने की बात तो दूर ही रही.
मित्रों, कुल मिलाकर इन दिनों बिहार में सुशासन पानी में है और जल-क्रीडा का आनंद ले रहा है. पता नहीं कब वो पानी से बाहर आएगा या फिर आएगा भी या नहीं.

शनिवार, 5 अक्तूबर 2019

गाँधी का संक्षिप्त मगर निर्मम मूल्यांकन


मित्रों, इन दिनों हम महात्मा गाँधी की १५०वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमने पिछले दशकों में गाँधी जी को बुद्ध और कबीर की तरह सीधे भगवान ही बना दिया जबकि गाँधी भी इनकी ही तरह मानव थे. बुद्ध और कबीर ने तो लोगों को मना भी किया था कि मरने के बाद मुझे भगवान मत बना देना लेकिन भारत की जनता सुनती कहाँ हैं वो तो बस पूजती है. अगर महापुरुषों की सुनती तो आज भारत की हालत वो नहीं होती जो है.
मित्रों, मेरी बातों से आप अब तक यह समझ गए होंगे कि मैं गाँधी जी को भगवान नहीं मानता इसलिए मैं उनका भक्त भी नहीं हूँ और इसलिए मैं उनके मूल्यांकन में निर्ममता बरतनेवाला हूँ. मैं समझता हूँ कि खुद गाँधी ने भी अपना निर्मम और तटस्थ मूल्यांकन करने की कोशिश की थी वरना वे अपनी आत्मकथा में उन बातों का जिक्र नहीं करते जो अश्लील तो हैं ही खुद उनका चरित्रहनन करती हैं. जी हाँ, आपने सही समझा मैं उनकी आत्मकथा में वर्णित शादी के तत्काल बाद पत्नी कस्तूरबा का साथ किए गए सेक्स और बुढ़ापे में नंगी लड़कियों के साथ नंगे सोकर किए गए ब्रह्मचर्य के अनूठे प्रयोग की बात कर रहा हूँ.
मित्रों, हम सभी अपनी जीवन में बहुत सारे ऐसा काम करते हैं जिनको प्रकट करना समाजोपयोगी नहीं होता. मैं समझता हूँ कि भले ही गाँधी जी सत्यवादी थे लेकिन हम जानते हैं कि गाँधी संस्कृत के अच्छे ज्ञाता थे और संस्कृत कहता है- सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात, न ब्रूयात अप्रियम सत्यम. गांधीजी को समझना चाहिए था कि ऐसा नंगा सत्य किसी के काम का नहीं होता जो खुद आपको ही नंगा कर दे. सच्चाई अच्छी चीज है लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है व्यावहारिकता. यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूं कि गाँधी का ब्रह्मचर्य को लेकर किये गए प्रयोग किसी भी तरह से नैतिक नहीं थे. ब्रह्मचर्य की जांच के और भी तरीके हो सकते हैं लेकिन यह तरीका नहीं हो सकता.
मित्रों, बहुत सारे लोग समझते हैं कि गाँधी जी काफी विनम्र, अभिमानरहित और लोकतान्त्रिक थे लेकिन अगर हम गाँधी जी के जीवन को देखें तो हम पाते हैं कि ऊपर से गाँधी भले ही विनम्र दिखें लेकिन अन्दर से वे अभिमानी और तानशाह थे. इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि गाँधी १९२० के बाद से ही कांग्रेस को अपने इशारों पर चलाते रहे यहाँ तक कि १९३४ में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता छोड़ दी मगर कांग्रेस फिर भी उनका जेबी संगठन बना रहा. यहाँ तक कि १९३९ में जब त्रिपुरी अधिवेशन में गाँधी के उम्मीदवार पट्टाभिसीतारमैया को हराकर सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए तब गाँधी जी ने इसे अपनी व्यक्तिगत हार माना और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों पर अपने प्रभाव का बेजा इस्तेमाल करते हुए सुभाष बाबू को काम करने से रोक दिया. अंततः बड़े ही भरे मन से सुभाष बाबू को कांग्रेस अध्यक्ष के पद इस्तीफा देना पड़ा. अगर गाँधी जी निरभिमानी और लोकतांत्रिक होते तो मैं समझता हूँ कि सुभाष बाबू का साथ देते न कि विरोध करते. बाद में हम पाते हैं कि जब आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री चुनने का अवसर आया तब भी गाँधी ने सीडबल्यूसी के बहुमत को नजरअंदाज करते हुए पटेल की जगह नेहरू को भारत का प्रधानमंत्री बना दिया जो तत्कालीन परिस्थितियों में बिलकुल भी सही नहीं थे और जिनकी गलतियों का परिणाम आज भी भारत भुगत रहा है.
मित्रों, इसी तरह गाँधी का मुस्लिमों के प्रति तुष्टीकरण वाला व्यवहार कई बार इतने आगे तक चला जाता था कि हिन्दुओं को क्षति उठानी पड़ रही थी. चाहे दंगें हो या पाकिस्तान को पैसा देने के लिए अनशन करना. मैं समझता हूँ कि गाँधी उसी तरह दिन-ब-दिन भारत के लिए ज्यादा हानिकारक होते जा रहे थे जैसे कि महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह धर्म और पांडवों की जीत में रोड़ा बन गए थे. जैसे भीष्म पर प्रहार करते समय अर्जुन का ह्रदय रो रहा था उसी तरह से गाँधी पर गोली चलाते समय नाथूराम गोडसे भी दुखी थे.

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2019

चिन्मयानंद और हिंदुत्व


मित्रों, हिन्दू धर्म में ४ आश्रमों को व्यवस्था की गई है. मानव जीवन को १०० वर्षों का मानकर चार भागों में विभाजित किया गया है. जन्म से लेकर २५ वर्ष की आयु तक के समय को ब्रह्मचर्य, २५ से ५० तक के समय को गृहस्थ, ५० से ७५ तक के समय को वानप्रस्थ और ७५ से १०० वर्ष तक की आयु को संन्यास आश्रम कहा गया है. लेकिन बहुत-से लोग जिनमें वैराग्य की भावना प्रबल होती थी वे सीधे संन्यासी ही बन जाते हैं और ऐसा लाखों वर्षों से होता आ रहा है. प्रखर संन्यासी विवेकानन्द के अनुसार संन्यासी वो है जो पूरी तरह से काम,क्रोध,मद,मोह और लोभ से मुक्त हो और माया जनित समस्त विकारों से पूर्णतया स्वतंत्र हो. जिसका पूरा जीवन सिर्फ और सिर्फ मानवों और जीव-जगत के भले के लिए समर्पित हो. भारत में ऐसे तेजस्वी संन्यासियों की लम्बी परंपरा रही है.
मित्रों, मध्यकाल में ही बहुत-से आलसी लोग घर-बार छोड़ कर भिक्षाटन पर गुजारा करने और बिना परिश्रम के आराम की जिंदगी जीने के लालच में संन्यासी बनने लगे थे. संत कबीर ने ऐसे लोगों पर कटाक्ष करते हुए उसी समय कहा था-
मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।। टेक।।
आसन मारि मंदिर में बैठे, नाम छाड़ि पूजन लागे पथरा।। 1।।
कनवां फड़ाय जोगी जटवा बढ़ौले, दाढ़ी बढ़ाय जोगी होइ गैले बकरा।। 2।।
जंगल जाय जोगी धुनिया रमौले, काम जराय जोगी होइ गैलै हिजरा।। 3।।
मथवा मुड़ाय जोगी कपड़ा रंगौले, गीता बाँचि के होइ गैले लबरा।। 4।।
कहहि कबीर सुनो भाई साधो, जम दरबजवाँ बाँधल जैवे पकरा।। 5।।
मित्रों, आप पटना से दिल्ली जानेवाली किसी भी ट्रेन में बैठ जाईए तो पाएंगे कि इस बीच कम-से-कम १०० भिखारी आपसे पैसे मांगने आएंगे. आप दया से द्रवित होकर १० का नोट दे भी देंगे लेकिन कभी आपने सोंचा है कि यह उनकी मजबूरी नहीं है बल्कि व्यवसाय है. एक-एक भिखारी सुबह से शाम तक कम-से-कम १००० रूपया कम लेता है आपसे भी कहीं ज्यादा और इस तरह आप एक गलत प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे होते हैं. आरएसएस प्रचारक इन्द्रेश कुमार के अनुसार ऐसे लोगों की संख्या भारत में २० करोड़ है. मेरा अनुमान है कि इनमें से ५ करोड तो हिन्दू संन्यासी होंगे.
मित्रों, अभी मैं हरिद्वार गया हुआ था और मैंने वहां पाया कि हमारी धर्मभीरूता का जमकर दोहन किया जा रहा है. जिन स्थानों पर २००६ में एक मंदिर था वहां अब कई-कई मंदिर बन गए हैं जो वास्तव में कलेक्शन सेंटर हैं. इसी तरह घाट पर भी कई लोग झूठा चंदा काटते हुए मिल जाएंगे. मुझे तो ऐसा लगा कि जैसे यह पूरा शहर ही भिखारियों का शहर है.
मित्रों, पहले भी लोग संन्यास धारण करते थे और शंकराचार्य और विवेकानंद जैसे संन्यासियों ने तो अपने छोटे से जीवन में ही हिंदुत्व को नई ऊंचाई दी. लेकिन इन दिनों भगवा और हिंदुत्व के नाम पर भारत में जो कुछ हो रहा है वो सही तो नहीं ही है शर्मनाक भी है. कोई भी लम्पट भगवा कपडे पहनकर साधू बन जाता है और हमारी धर्मभीरुता का लाभ उठाकर अकूत धन इकठ्ठा कर लेता है. फिर आलिशान आश्रम बना लेता है, दिन-रात ऐसे-ऐसे भोग-विलास करता है जो हम गृहस्थों के लिए कदापि संभव नहीं है. कभी-कभी तो नेता भी बन जाता है और मंत्री भी लेकिन उसके कर्म तब भी गर्हित ही होते हैं. फिर खुद बदनाम होकर हिंदुत्व को भी बदनाम करता है.
मित्रों, १९८७ में जब मैं सातवीं कक्षा में था मेरे गाँव के बगल में वासुदेवपुर चंदेल में यज्ञ हुआ था. तभी मैंने देखा था कि इन यज्ञों से किसी को कोई लाभ नहीं होता बल्कि लाभ होता है इसमें पधारनेवाले शंकराचार्यों और कथित संन्यासियों को जो दिन-रात मलाई और मेवे खाते हैं. ये लोग बिना एसी के एक पल भी नहीं रह सकते और बिना कार के एक कदम भी नहीं चल सकते. उनमें से कुछेक का वजन तो इतना ज्यादा था कि उनके चलने से धरती प्रकम्पित होती थी. इन मठाधीशों से पूछा जाना चाहिए कि ये जिस तरह के आचरण की अपेक्षा अपने श्रोताओं से करते हैं क्या इनका खुद का आचरण वैसा है?
मित्रों, स्वामी चिन्मयानन्द जैसे कुछ संन्यासियों की करतूतों को देखकर तो इतनी शर्मिंदगी होती है और इतना क्रोध आता है कि क्या कहें? जब कामवासना पर नियंत्रण नहीं रख सकते तो क्यों नहीं शादी करके घर बसाते हो? एक तरफ तो पवित्र भगवा धारण कर रखा है और दूसरी तरफ इतना नीच कर्म कर रहे हो कि बड़ा-से-बड़ा कुकर्मी भी शरमा जाए. कुछ लोग इन दिनों इन्टरनेट पर यह साबित करने में लगे हैं कि मुस्लिम और इसाई धर्माचार्य भी ऐसा ही कर रहे हैं. मुझे नहीं है लेना-देना इस बात से कि बांकी धर्म के लोग क्या कर रहे हैं लेकिन मुझे हिन्दू धर्म में ऐसा व्यभिचार कतई बर्दाश्त नहीं. ऐसे लोगों को अविलम्ब फांसी चढ़ा देना चाहिए क्योंकि इन्होंने परम पवित्र संन्यास आश्रम को बदनाम किया है. लेकिन हो क्या रहा है? सरकार उल्टे इनका ही बचाव कर रही है और पीडिता को ही अपराधी बना दिया है जैसे उसने इनके कुकर्मों को उजागर करके बहुत बड़ा अपराध कर दिया है.
मित्रों, हम भाजपा और आरएसएस को बता देना चाहते हैं कि हमें हिंदुत्व का अभ्युदय तो मंजूर है लेकिन हिंदुत्व के नाम पर अनाचार और अत्याचार फ़ैलाने को हम हरगिज बर्दाश्त नहीं कर सकते. मनु महाराज कहते हैं-
    धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:।
    धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌।। (मनुस्‍मृति ६.९१)
    जो व्यक्ति सामान्य धर्म तक का पालन नहीं कर सकता वो संन्यासी कैसे हो सकता है? श्रीमद्भगवदगीता कहती है कि संन्यास का एकमात्र लक्ष्य मोक्ष होता है और मोक्ष का अर्थ है सभी प्रकार के सांसारिक बंधनों से मुक्ति। बंधन वे जो मनुष्य को संसार से बांध कर रखते हैं, जो सांसारिक सुखों और सुविधाओ के प्रति आसक्ति पैदा करते हैं। इस आसक्ति के कारण हम अनेक तरह की चिंता, दुःख, अशांति, अभाव, निराशा, हताशा, जीवन के प्रति अवसाद और उदासीनता से घिरे रहते हैं। ये दुःख और चिंता जीवन पर्यन्त चलती रहती हैं। इसलिए शंकराचार्य ने संन्यासियों के लिए नारी को नरक का द्वार बताया है तो वहीँ रामकृष्ण परमहंस ने आजीवन कामिनी और कंचन को स्पर्श तक नहीं किया था.
मित्रों, कुल मिलाकर संन्यास आश्रम में आ गई विकृतियों को दूर करने का समय आ गया है. समस्त मठों और अखाड़ों में सुधार किया जाना चाहिए जिससे आपादमस्तक स्वर्णाभूषणों से लदे-पदे रहनेवाले ५ स्टार बाबाओं व दिन-रात स्त्रियों के साथ कामाचार में लगे दुष्टों को संन्यास आश्रम से बाहर किया जा सके.


सोमवार, 30 सितंबर 2019

बहानावीर नीतीश कुमार और बेहाल बिहार


मित्रों, यह धरती वीरों से खाली नहीं है. इस धरती पर एक-से-बढ़कर-एक वीर भरे पड़े हैं. कोई भाषणवीर है तो कोई बयानवीर है तो वहीं किसी का मूर्खता करने में कोई जोड़ा नहीं है. लेकिन इन सबसे अलग भी एक प्रकार के वीरों से ये धरती अटी पड़ी है और वो वीर हैं बहानावीर. ऐसे वीर अपनी किसी भी गलती के लिए कभी भी खुद को दोषी नहीं मानते. आपने अख़बारों में पढ़ा होगा कि किसी देश की क्रिकेट टीम के कप्तान ने हार के लिए कभी टीम को तो कभी मौसम को तो कभी पिच को ही दोषी ठहरा दिया भले ही वो खुद शून्य पर चलता हो गया हो.
मित्रों, दुर्भाग्यवश ऐसे ही दुनिया के समस्त बहानावीरों के वीर श्री नीतीश कुमार जी इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री हैं. श्रीमान अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए ऐसे-ऐसे बहाने बनाते हैं कि कदाचित खुद बहानों को भी शर्म आ रही होगी. जब श्रीमान से राज्य में फेल हो चुकी शराबबंदी के बारे में पूछा जाता है तो कहते हैं कि इसमें उनकी या उनके महान प्रशंसनीय शासन की कोई गलती नहीं है बल्कि सारी गलती पडोसी देश नेपाल और पडोसी राज्यों प. बंगाल, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश की है जिन्होंने शराब पर रोक नहीं लगाई है. इसी तरह पिछले दिनों जब उनसे राज्य में बढ़ते अपराध के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बड़े ही दार्शनिक अंदाज में फ़रमाया कि बढ़ता अपराध ख़राब कानून-व्यवस्था के कारण नहीं है बल्कि यह एक मानसिक या मनोवैज्ञानिक समस्या है.
मित्रों, हद तो तब हो गई जब इन दिनों भारी बरसात से उत्पन्न बुरी स्थिति को लेकर उन्होंने कहा कि यह एक प्राकृतिक आपदा है और प्रकृति पर किसका नियंत्रण है. हद हो गयी भाई, दैव दैव आलसी पुकारा. नीतीश जी आगे से राज्य में कुछ भी बुरा हो तो आप सीधे भगवान को ही दोषी ठहरा देना क्योंकि सबकुछ वही तो करता है. लेकिन जब भी कुछ अच्छा हो तो उसका श्रेय आप ले लेना क्योंकि वो तो भगवान ने नहीं किया बल्कि पूरी तरह से आपने किया. नीतीश जी को बताना चाहिए कि पटना का ड्रेनेज सिस्टम करोड़ों रूपये फूंकने के बावजूद फेल क्यों है? या फिर हर साल एक साथ बिहार के सारे बांध कैसे टूटने लगते हैं? बरसात सिर्फ पटना में ही तो नहीं होती है या नदियाँ सिर्फ बिहार में ही नहीं हैं? दिल्ली में वर्षा होती है तो कुछ ही घंटों में पानी नालियों से होकर निकल जाता है फिर पटना की नालियों से पानी क्यों नहीं निकल रहा? क्या ड्रेनेज बनाने के काम में कोताही बरती है आपके चहेते ठेकेदारों ने और उसे आधा-अधूरा बनाकर छोड़ दिया है?
मित्रों, ऐसी ही एक कथा वेदों में भी है जिसमें एक ब्राह्मण अपने हर अच्छे काम के लिए खुद की पीठ ठोकता है तो अपने हर बुरे काम के लिए भगवान को दोषी ठहरा देता है और बहाने बनाता है कि नेत्रों में सूर्य की शक्ति है तो कानों में पवन की शक्ति है तो हाथों में देवराज इंद्र का निवास है इसलिए उनके हाथों हुए प्रत्येक अपराध के लिए वो स्वयं नहीं बल्कि इन अंगों से संबधित देवता जिम्मेदार हैं. एक दिन जब वो अपने बगीचे में होता है तब वो डंडा चलता है उसके हाथों एक गाय की हत्या हो जाती है. घबराहट के मारे वो उसे पत्तों से ढँक देता है. औरअपने मन में सोंचता है कि चूंकि हाथों में इंद्र का निवास है इसलिए इस गोहत्या के लिए भी देवराज को ही सजा मिलनी चाहिए. तभी वेश बदलकर इंद्र आते हैं और उपवन की प्रशंसा करते हुए उससे पूछते हैं कि इन पेड़-पौधों को किसने लगाया है तो वह लपककर कहता है कि उसने और किसने. लेकिन जब वो पूछते हैं कि गाय जो पत्तों से ढकी हुई हैं को किसने मारा है तो वो इंद्र को दोषी ठहराने लगता है. तभी इंद्र प्रकट हो जाते है और उसे लताड़ लगाते हैं कि जब सारे अच्छे काम तुमने किये हैं तो बुरे कामों को भी तुमने ही किया है.
मित्रों, हमने स्कूल के दिनों में भी देखा है और एक शिक्षक होने के नाते आज भी रोजाना देखता हूँ कि कुछ बच्चे लगातार बहाने बनाते हैं कि होम वर्क इसलिए नहीं बना पाया क्योंकि घर में कोई बीमार हो गया था, बना तो लिया था मगर कॉपी घर पर रह गयी. कई बच्चे तो अपने मामा, नाना, दादा, दादी को ही मार डालते हैं और कई बार तो एक ही दादा-नाना को कई-कई बार मार डालते हैं. लेकिन हमने यह भी देखा है कि ऐसा करने से खुद उनका ही नुकसान होता है और वे पढाई में कमजोर रह जाते हैं. इसी तरह जो कप्तान बार-बार पिच को दोषी ठहराता है वो ज्यादा दिनों तक कप्तान बना नहीं रह पाता. मगर नीतीश जी न जाने किस मुगालते हैं कि उनको लगता है कि प्रत्येक स्थिति में यहाँ तक कि लगातार शर्मनाक प्रदर्शन के बावजूद वही हमेशा बिहार के कप्तान बने रहेंगे.

शनिवार, 28 सितंबर 2019

पाकिस्तान का पप्पू


मित्रों, यह आप भी जानते हैं कि पाकिस्तान हमेशा से भारत के मुकाबले कमजोर देश रहा है लेकिन अपनी शातिराना कूटनीति के बल पर उसने हमेशा भारत को परेशान किया है. अगर मैं ऐसा कहूं कि भारत और दुनिया के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है या हो रहा है कि पाकिस्तान भारत के मुकाबले कूटनीति के मोर्चे पर कहीं ठहर ही नहीं पा रहा है तो ऐसा कहना कहीं से भी अतिशयोक्ति नहीं होगी.
मित्रों, ऐसा हो भी क्यों नहीं जबकि पाकिस्तान में इन दिनों वहां के सबसे बड़े पप्पू का शासन है. मुझे आश्चर्य हो रहा है कि पाकिस्तान के लोग क्या पागल हैं जो एक बेदिमागी, दिमागी तौर पर पूरी तरह से दिवालिया व्यक्ति को प्रधानमंत्री बना दिया. मैं पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की इस मांग से पूरी तरह से सहमत हूँ कि इमरान खान के विदेश दौरों पर पूरी तरह से रोक लगाई जानी चाहिए. यह आदमी जब भी विदेश दौरे पर जाता है पाकिस्तान के हितों के खिलाफ बयान देकर खुद अपने ही देश को नुकसान पहुंचाता है. ये कभी कहता है कि पाकिस्तान आतंकियों का देश है, तो कभी कहता है कि पाकिस्तान ने अल कायदा को जन्म दिया तो कभी कहता है कि डेढ़ सौ करोड़ मुसलमान कभी भी हथियार उठा सकते हैं तो कभी कहता है कि नरेन्द्र मोदी भारत के राष्ट्रपति हैं. इतना ही नहीं इसने कई बार भारत में अपनी सबसे बड़ी समर्थक पार्टी कांग्रेस को भी उलझन में डाल दिया है. अभी कल के भाषण को ही लें तो इसने आरएसएस को लांछित करने के चक्कर में कांग्रेस को ही फंसा दिया. मैं यह भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि आखिर आरएसएस से इमरान या कांग्रेस को समस्या क्यों है? भारत के पप्पू भी पाकिस्तान के पप्पू की तरह प्रत्येक चुनाव में नहा-धोकर आरएसएस के पीछे पड़े रहते हैं जबकि आरएसएस पूरी तरह से एक सामाजिक व सांस्कृतिक संगठन है. आरएसएस ने कभी भी किसी आपराधिक कृत्य में न तो भाग लिया है, न ही इसके लिए उकसाया है और न ही किसी आपराधिक कृत्य का समर्थन किया है. हाँ, उसने हिन्दुओं को सामाजिक और राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति आगाह जरूर किया है. साथ ही किसी भी आपदा के समय सबसे पहले इसी के कार्यकर्ता लोगों की मदद करने आते हैं और बिना जाति-पंथ का ख्याल किए लोगों की सहायता करते हैं.
मित्रों, इमरान खान की पार्टी का नाम तहरीके इंसाफ जरूर है लेकिन यह आदमी कहीं से भी इंसाफपसंद नहीं है. इसकी सारी इंसानियत सिर्फ मुसलमानों के लिए है और जब पाकिस्तान में किसी गैरमुसलमान की बेटी को अगवा कर लिया जाता है और जबरन मुसलमान बना दिया जाता है तब इसका इंसाफ घास चरने चला जाता है. यह आदमी दुनिया के सबसे बर्बर और सबसे घनघोर स्त्री-विरोधी संगठन तालिबान का इतना बड़ा प्रशंसक है कि कई लोग इसे तालिबान खान कहकर ही पुकारते हैं. इसका मानना है कि तालिबान अब बदल गया है ठीक वैसे ही जैसे इसके प्रधानमंत्री बनने के बाद पाकिस्तान बदल गया है. पता नहीं यह आदमी गांजा पीता है या भांग घोंटता है या ड्रग्स लेता है लेकिन कुछ-न-कुछ लेता जरूर है.
मित्रों, यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि हमने पिछले चुनाव में अपने देश को अपने पप्पू के हवाले नहीं किया वरना वो भी वही कुछ कर रहा होता जो इमरान कर रहे हैं. हालाँकि हमारा पप्पू भी जब भी विदेश जाता है अपने बयानों से भारत का नुकसान करता है लेकिन वो उससे कहीं ज्यादा नुकसान खुद का और खुद की पार्टी का करता है.
मित्रों, इमरान के मुकाबले अगर हम अपने देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की अमेरिका यात्रा को देखें तो उन्होंने हमेशा संतुलित बयान दिया खासकर उनके द्वारा यूएनजीए में दिए गए संबोधन की सराहना इस समय पूरी दुनिया कर रही है. पूरी दुनिया ने देखा कि मोदी जी ने सिर्फ शांति और विकास की बात की तो इमरान ने सिर्फ युद्ध और विनाश की यहाँ तक कि यूएन जिसका गठन ही शांति के लिए हुआ है के मंच से परमाणु युद्ध की धमकी भी दे डाली वो भी यह जानते हुए कि अगर उसने ऐसा किया तो पाकिस्तान हमेशा के लिए दुनिया के मानचित्र से ही गायब हो जाएगा. इमरान मियां, गांजा फूंकने और देश फूंकने में काफी फर्क है. कब समझोगे? भारतीय पप्पू ने तो यह समझ भी लिया है कि राजनीति उसके बस की बात नहीं है इसलिए अध्यक्ष की कुर्सी छोड़कर निकल लिया है पर इस बात को तुम कब समझोगे? नहीं समझो अपनी बला से. यह तो हमारे लिए और भी अच्छा है. मियां, तुम तब तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने रहो जब तक पाकिस्तान है.

गुरुवार, 26 सितंबर 2019

नीतीश आवश्यकता हैं या बोझ?


मित्रों, एक अरसा हो गया जबसे मैं कहता आ रहा हूँ कि बिहार ने जिस नीतीश कुमार को अपने लिए वरदान समझा था वे अब उसी बिहार के लिए अभिशाप बन चुके हैं. महाभारत कहता है कि जिस राज्य में अराजकता का बोलबाला होता है वो राज्य ही समाप्त हो जाता है. कमोबेश इन दिनों के बिहार की वैसी ही स्थिति है. संक्षेप में अगर हम कहें तो आज के बिहार में सरकार नाम की चीज ही नहीं है. हर जगह मनमानी है, जिसकी लाठी उसकी भैंस है. कहीं जनता मनमानी कर रही है तो कहीं राज्य सरकार के अधिकारी-कर्मचारी. बिहार सरकार ने ऐसी कोई सुविधा भी नहीं दी है जिस पर कोई अपना दुखड़ा रो सके और अगर ऐसा कोई चैनल है भी तो पूरी तरह से बेकार. अगरचे तो उसपर कुछ लिखा ही नहीं जा सकता और अगर लिख भी दिया तो होता कुछ भी नहीं. पहले नीतीश कुमार जनता दरबार भी लगाते थे लेकिन बाद के दिनों में उसे भी बंद कर दिया क्योंकि उसमें आनेवाले कभी-कभी आक्रामक हो जाते थे जिससे सरकार की बदनामी होती थी.
मित्रों, कुल मिलाकर इन दिनों बिहार रामभरोसे है हालाँकि सरकार में भाजपा भी सुशील मोदी एंड कंपनी के साथ शामिल है. ये वही सुशील मोदी हैं जिनको एक समय नीतीश कुमार में भारत का भावी प्रधानमंत्री दिखता था. दुर्भाग्यवश आज भी सुशील मोदी पूरी तरह से नीतीश-भक्त हैं और नहीं चाहते कि बिहार का विकास हो.
मित्रों, हो सकता है कि अगर भाजपा एक बार फिर से नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में बिहार का चुनाव लडती है तो प्रचंड बहुमत से जीत जाए लेकिन सवाल उठता है कि भाजपा का उद्देश्य क्या है? सिर्फ चुनाव जीतना या बिहार का विकास करना? फिर भारतमाता के वामांग का क्या होगा? इस बात में अब कोई संदेह नहीं रहा कि नीतीश कुमार बिहार के विकास में सबसे बड़ी बाधा बन चुके हैं. बड़ी ही प्रसन्नता का विषय है कि भाजपा के भीतर से भी नीतीश कुमार जी के खिलाफ स्वर उठने लगे हैं. पिछले दिनों विधान पार्षद डॉ. संजय पासवान जैसे विद्वान नेता इस बात की मांग कर चुके हैं कि नीतीश कुमार जी को स्वेच्छा से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देना चाहिए. जाहिर-सी बात है कि सुशील मोदी जैसे सत्तालोलुप उनसे सहमत नहीं हैं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह किस्सा यही पर समाप्त हो जाने वाला है क्योंकि गिरिराज सिंह जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काफी निकट माने जाते हैं इन दिनों बिहार में काफी सक्रिय हो गए हैं. दूसरी तरफ नीतीश कुमार भी संघ के नेताओं से चोरी चोरी चुपके चुपके बैठक कर अपनी कुर्सी बचाने की जी-तोड़ या दूसरे शब्दों में कहें तो अंतिम कोशिश कर रहे हैं.
मित्रों, इन दिनों जिस तरह बिहार में अपराधियों का मनोबल बढ़ा हुआ है और जिस तरह बैंक से पैसा निकालना तक बिहार में जानलेवा कदम हो गया है उससे यह तो निश्चित है कि नीतीश अब फितिश यानि फिनीश हो चुके हैं इसलिए उनको अब वानप्रस्थ आश्रम की ओर प्रयाण कर ही जाना चाहिए. लेकिन सवाल उठता है कि अगर वे ऐसा करने से मना कर देते हैं तो क्या भाजपा अकेले बिहार में चुनाव लड़ने का जोखिम उठाएगी? वैसे मुझे लगता है कि आज नहीं तो कल भाजपा को सुशासन की लाश को अपने कंधे से उतार फेंकना ही होगा. जब भाजपा ऐसा महाराष्ट्र में कर सकती है तो बिहार में क्यों नहीं? अभी सबसे अच्छा तो यह होता कि केंद्र सृजन घोटाला, मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड समेत सारे घोटालों की सीबीआई से निष्पक्ष जांच करवा देता जिससे छोटे भाई भी बड़े भाई के पास पहुँच जाते. साथ में अपने परम भक्त सुशील मोदी को भी लेते जाते.

शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

भारत को चाँद दिखा रहे हैं मोदी?


मित्रों, जैसा कि मैं बता चुका हूँ कि मेरा बचपन गाँव में बीता है और गाँव में एक-से-बढ़कर एक मनोरंजक घटनाएँ लगातार होती रहती हैं. ऐसी ही एक घटना एक बार मेरे दरवाजे पर हुई. हुआ यह कि हमारे एक पडोसी बच्चे का जो हमारा हमउम्र था पैंट का बटन टूट गया. बेचारे का पैंट बार-बार नीचे सरक जाता था. हमारे गाँव के सबसे शरारती बच्चों में से एक ने उससे कहा कि चाँद देखोगे. हम सभी आश्चर्य में पड़ गए कि दिन के १० बजे ये चाँद कहाँ से दिखाएगा. फिर उसने आसमान की ओर इशारा करके कहा कि वो रहा चाँद, देखो. उस बेचारे ने जैसे ही ऊपर देखना शुरू किया शरारती बच्चे ने उसका पैंट नीचे खींच दिया और उसे नंगा कर दिया.
मित्रों, खैर ये तो रही बचपन के हंसी-मजाक की बात. लेकिन आज मैंने एक संस्मरणात्मक प्रसंग को बिलकुल भी मजाक-मजाक में नहीं उठाया है बल्कि काफी गंभीर मनःस्थिति में उठाया है. आप सभी जानते हैं कि भारत ने कुछ दिन पहले चाँद पर चंद्रयान भेजा था जिसकी लैंडिंग के समय भारत के प्रधानमंत्री भी मौजूद थे. फिर लैंडिंग में गड़बड़ी आ गई और माहौल अचानक ग़मगीन हो गया. इसरो अध्यक्ष रोने लगे और उनको कन्धा दिया प्रधानमंत्री जी ने. फिर खबर आई कि अभी मामला समाप्त नहीं हुआ है और हमारे वैज्ञानिक चंद्रयान से संपर्क साधने की कोशिश में हैं.
मित्रों, कुल मिलाकर मामले को पूरा तूल दिया गया और पूरा भारत दिन-रात चाँद पर नजर गड़ाए रहा इस बात से बिलकुल बेखबर कि नीचे जमीन पर हो क्या रहा है. कहीं चाँद दिखाकर उन्हें भी निर्वस्त्र तो नहीं किया जा रहा है. मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि इन दिनों देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से ख़राब है. वाजपेयी जी ने पेंशन समाप्त किया था तो मोदी ने नौकरी ही समाप्त कर दी है. जहाँ भी नजर डालिए आंकड़े बता रहे हैं कि हालत ख़राब है. उस पर गजब यह कि केंद्रीय वित्त मंत्री स्वास्थ्य और रेल मंत्रालय से सम्बंधित घोषणाएं कर रही हैं. मतलब कि जिस मंत्री का जो काम है वो काम मंत्री कर ही नहीं रहा है. जैसे कि ग्रेग चैपल ने इरफ़ान पठान को हरफनमौला बनाने का प्रयास किया था और अंततः इरफ़ान की गेंदबाजी की लय ही बिगड़ गई और बेचारे टीम से ही बाहर हो गए.
मित्रों, भारत सरकार कहती है कि राजकोषीय घाटा कम करना है और इसके लिए सरकारी खर्च को कम करना है. मैं पूछता हूँ कि सरकार जनता के लिए है यह जनता सरकार के लिए? मैं यह भी पूछना चाहता हूँ कि सरकार जनता से है यह जनता सरकार से है? सरकारी खर्च कम करना है तो प्रधानमंत्री सामान्य यात्री की तरह विमान-यात्रा करें किसने रोका है? विधायकों-सांसदों-मंत्रियों को पेंशन देना बंद कर दें किसने रोका है? महाभ्रष्ट योजना सांसद-विधायक फण्ड को बंद कर दें किसने रोका है? लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे उनको तो जनता से त्याग करवाना है खुद त्याग नहीं करना है इसलिए वे तो नौकरी में कटौती करेंगे.
मित्रों, भारत सरकार यह भी कहती है कि व्यवसाय चलाना सरकार का काम नहीं है इसलिए परिवहन, संचार सहित प्रत्येक क्षेत्र से सम्बद्ध सरकारी उद्यमों को निजी क्षेत्र को बेच देना चाहिए और वो भी उनका दिवाला निकालने के बाद. इस मामले में मुझे जहाँ तक लगता है कि या तो भारत सरकार महामूर्ख है या फिर महाचतुर. सरकारी उद्यमों को तो वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने भी बेचा था लेकिन तब जब उनकी हालत अच्छी ही नहीं बहुत अच्छी थी और वो नवरत्न और महानवरत्न कहलाते थे. मेरा आज भी मानना है कि सरकारी उद्यमों को सुधारा जा सकता है और एक बात फिर से महानवरत्न बनाया जा सकता है लेकिन इसके लिए कोशिश तो हो. लेकिन कोशिश तो हो रही है कि कैसे अम्बानी दुनिया के सबसे धनवान व्यक्ति बनें और इसलिए सबकुछ उनके हवाले किया जा रहा है. अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों. साथ ही आपने यह भी गौर किया होगा कि आजकल सबकुछ सिर्फ और सिर्फ गुजरात में ही हो रहा है. मानों सिर्फ गुजरात ही भारत है जबकि वादा तो किया गया था कि माँ भारती के वामांग को यानि पूर्वी भारत को भी मजबूत किया जाएगा.
मित्रों, अब मैं बात करना चाहूँगा पाकिस्तान और हिंदुत्व की. लोग-बाग़ दिन-रात उल्लुओं की तरह टीवी पर नजर गडाए हुए हैं कि कब भारत पाकिस्तान पर हमला बोलेगा. अरे भाई वो तो खुद ही भूखों मर रहा है उसको मारने की जरुरत क्या है? चिंता करनी है तो अपनी अर्थव्यवस्था की चिंता करो नहीं तो कुछ सालों में तुम भी पाकिस्तान ही बननेवाले हो.
मित्रों, जब मोदी सरकार सत्ता में आई तो लगा कि अब साधू-समाज देश का सञ्चालन करेगा और देश में रामराज्य आ जाएगा. साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को हमने क्या समझा था और क्या निकली. इनकी तो खुद की प्रज्ञा ही नष्ट हो चुकी है. हमेशा आएं-बाएँ बोलती रहती है. इनके बारे में तो यही कहा जा सकता है कि यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम, लोचनाभ्याम विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति. थोड़ी बात चिन्मयानन्द की भी हो जाए जिनके खिलाफ सबूतों के अम्बार लगे हैं लेकिन अब तक उनके खिलाफ एफआईआर तक नहीं हुआ है. क्यों नहीं हुआ है? शायद इसलिए क्योंकि वे भाजपाई हैं और भाजपा तो गंगा है जिसमें डुबकी लगाकर न जाने कितने महाभ्रष्ट कांग्रेसी पवित्र हो चुके हैं.
मित्रों, अंत में मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करना चाहता हूँ कि कृपया चाँद की ओर देखना बंद करिए और धरती की तरफ देखिए जो धीरे-धीरे आपके पाँव के नीचे से सरक रही है या यूं कहें कि सरकाई जा रही है. सोंचिए कल अगर रेलवे निजी हाथों में चला गया तो क्या कोई गरीब इसकी सवारी कर पाएगा? सोंचिएगा जरूर. नहीं तो,....

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

१९२९ के अमेरिका से भारत की आश्चर्यजनक समानता



मित्रों, इन दिनों भारत में मंदी की चर्चा बड़े जोर-शोर से हो रही है. यह उस भारत में हो रहा है जिसकी सरकार अगले ५ वर्षों में जीडीपी को दोगुना कर देने का दंभ भर रही है. हमारे जैसे फिजूल में देश के लिए चिंतित रहनेवाले लोगों ने पिछले सालों में कई बार सरकार को सचेत भी किया लेकिन सब बेकार.
मित्रों, वर्तमान सरकार किसी भी तरह से अर्थव्यवस्था की दुरावस्था के लिए पिछली सरकार को दोषी नहीं ठहरा सकती क्योंकि ५ साल का समय कम नहीं होता. पिछले पांच सालों में सरकार ने ऐसा कोई काम नहीं किया है जिससे देश की अर्थव्यवस्था को गति मिलती. अगर हम १९२९ की अमेरिका की महामंदी से वर्तमान भारत की तुलना करें तो आश्चर्यजनक रूप से आज भारत की अर्थव्यवस्था की हालत ठीक वही है जैसी १९२९ में अमेरिका की अर्थव्यवस्था की थी. १९२० के दशक में अमेरिका के सबसे धनी ०.१ प्रतिशत लोगों ने ३४ प्रतिशत बचत को नियंत्रित कर रखा था जबकि देश के ८० प्रतिशत लोगों की कोई बचत ही नहीं थी.
मित्रों, १९२० के दशक के अमेरिका में उद्योग में उत्पादकता तो बढ़ रही थी किन्तु लोगों की मजदूरी उस अनुपात में नहीं बढ़ रही थी. उद्योगपतियों को अधिक मजदूरी नहीं देनी पड़ती थी इसलिए उन्होंने अकूत मुनाफा कमाया किन्तु अगर मजदूरी कम होगी तो उत्पाद खरीदेगा कौन? किसी भी अर्थव्यवस्था के समुचित रूप से काम करने के लिए जरूरी है कि मांग और पूर्ति के संतुलन को कायम रखा जाए. १९२० के दशक के अंत तक अमेरिका में वस्तुओं की आपूर्ति आवश्यकता से अधिक हो गयी किन्तु उन्हें खरीदने के लिए लोगों के पास पर्याप्त पैसे नहीं थे. चूंकि अधिसंख्य अमेरिकियों के पास अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त धनराशि नहीं थी अतः वे इन वस्तुओं को उधार पर खरीदने लगे. 'खरीदो अभी, भुगतान बाद में' की संकल्पना जोर पकड़ने लगी. १९२० के दशक के अंत तक ६० प्रतिशत कारें और ८० प्रतिशत रेडियो सेट किस्तों पर ख़रीदे गए. १९२५ और १९२९ के बीच बकाया किस्तों की कुल रकम १.३८ अरब डॉलर से बढ़कर ३ अरब डॉलर से भी अधिक हो गयी. यह एक खतरनाक स्थिति थी क्योंकि लोगों को अपनी कम आय का अधिकांश भाग विवश होकर अपने पिछले ऋणों की चुकौती के लिए रखना पड़ता था.
मित्रों, तत्कालीन अमेरिकी अर्थव्यवस्था विलास-व्यय और अमीर व्यक्तियों के निवेश पर बहुत अधिक निर्भर थी. यह स्थिति तभी तक चल सकती थी जब तक कि अमीर लोगों को अर्थव्यवस्था पर विश्वास हो. अमेरिकी उद्योग के अनेक क्षेत्र गरीब थे. केवल २०० कम्पनियों ने आधी से अधिक निगमित संपत्ति को नियंत्रित कर रखा था. ऑटोमोबाइल क्षेत्र उन्नति कर रहा था और कृषि क्षेत्र की उपेक्षा हो रही थी. अधिकांश उद्योग, जो १९२० के दशक में फले-फूले, किसी-न-किसी रूप में ऑटोमोबाइल, रेडियो उद्योग, इस्पात, शीशा, रबर टायर, पेट्रोल उत्पादों, होटलों, निर्माण कार्यों आदि के साथ जुड़े हुए थे. स्वाभाविक रूप से यह एक खरतनाक स्थिति थी क्योंकि लोग अनगिनत कारें और रेडियो तो खरीद नहीं सकते थे. जो चीजें रोज खरीदी जाती थीं वे थी खाद्य वस्तुएं. १९२९ तक अमेरिका की कृषि बर्बाद हो चुकी थी.
मित्रों, १९२० के दशक में अमेरिका में सट्टेबाजी की संस्कृति पनपने लगी. चौतरफा निराशा के वातावरण में लोगों ने भारी मुनाफा कमाने की आशा में स्टॉक एक्सचेंजों में निवेश करना शुरू कर दिया, जबकि इस राशि से वे अपने पुराने ऋण चुकता कर सकते थे. वेतन-वृद्धि के अभाव में वे कर भी क्या सकते थे? जल्दी ही लोगों ने अपने ही दलालों से, शेयर खरीदने के लिए पैसे उधार लेना शुरू कर दिया. कोई भी व्यक्ति अपने दलाल से ६५ डॉलर उधार लेकर ७५ डॉलर मूल्य के शेयर खरीद सकता था, इसके लिए उसे १० डॉलर ही अपनी जेब से देने होते थे. इस प्रकार की बेतहाशा खरीद से शेयरों के दाम आसमान छूने लगे. एक साल के भीतर ही खरीदार उन्हीं शेयरों को ४२० डॉलर में बेच सकता था और ब्याज सहित अपने दलाल को ऋण चुका सकता था और पर्याप्त राशि घर भी ले जा सकता था. किन्तु सट्टेबाजी में आया यह उछाल मजबूत आधारों पर टिका हुआ नहीं था. अनेक कम्पनियाँ, जिनके शेयरों की कीमत बहुत ज्यादा बढ़ी हुई थी, वास्तव में अच्छी स्थिति में नहीं थी.
मित्रों, १९२९ की गर्मियों तक शेयर दलालों को देय कुल बकाया ऋण ७ अरब डॉलर से अधिक था. अगली तिमाही में यह बढ़कर ८.५ अरब डॉलर हो गया. अचानक शेयरों के दाम गिरने लगे. फिर ये ये दाम इतने गिर गए कि लोगों के पास जो भी शेयर थे वे उन्हें बेचने लगे. 'काले मंगलवार' यानि २९ अक्टूबर १९२९ को दाम इतने गिर गए कि शेयरों को किसी भी दाम पर खरीदने के लिए कोई भी खरीदार नहीं बचा.
मित्रों, स्टौक मार्केट के यूं ढह जाने के बाद अमेरिका के 'चंद' धनाढ्य लोगों का भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था में विश्वास जाता रहा. उन्होंने विलासिता की वस्तुओं पर खर्च कम कर दिया और निवेश धीमा कर दिया. मध्य वर्ग और गरीब वर्ग तो अपने पुराने ऋणों को ही नहीं चुका पा रहा था; बहुत ही कम लोगों ने कार और रेडियो खरीदने के लिए नए ऋण लिए. मांग में कमी से सभी उद्योग प्रभावित हुए और इस प्रकार औद्योगिक उत्पादन में भारी गिरावट आ गयी. परिणामतः भारी संख्या में मजदूरों की छंटनी कर दी गयी. १९३० में बेरोजगारों की संख्या ५० लाख थी वह १९३२ में बढ़कर १३० लाख हो गई. देश महाविपत्ति से घिर चुका था. इस घटना को 'महामंदी' के नाम से भी जाना जाता है.
मित्रों, दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं-एक जो दूसरों की गलतियों से सबक लेते हैं और दूसरे जो दूसरों की गलतियों से सबक नहीं लेते और खुद के लिए महाविपत्ति की प्रतीक्षा करते हैं. अब यह भारत सरकार पर निर्भर है कि वो १९२९ की अमेरिका की महामंदी से सबक लेकर समय रहते निवारण के उपाय करती है या फिर देश की अर्थव्यवस्था के पूरी तरह से ढह जाने का इंतज़ार करती है. वैसे भी ऐसे वित्त मंत्री से हम क्या आशा रखें जो उबर और ओला को मंदी के लिए जिम्मेदारी ठहरा रही हों. सरकार के समक्ष इस समय क्या रास्ते हैं इस पर चर्चा अगले आलेख में.