रविवार, 24 मई 2020

मोदी नहीं कोरोना और चीन से लड़े कांग्रेस


मित्रों, इन दिनों जब पूरा देश और पूरी दुनिया कोरोना से लड़ने में मशगूल है और कमर कसकर लड़ रही है ऐसे में हमारे देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस अपनी पूरी ताकत से इस लडाई को कमजोर करने में जुटी हुई है. एक तरफ तो वो कह रही है कि यह समय गन्दी और तुच्छ राजनीति करने का नहीं है वहीं दूसरी तरफ वो खुद ऐसा ही करने में पूरे प्राणपन से लगी हुई है. कांग्रेस शासित महाराष्ट्र और पंजाब में कोरोना को लेकर पूरी तरह से अराजकता का वातावरण है. कांग्रेस को उसे ठीक करने की कोशिश करनी चाहिए लेकिन कांग्रेस का पूरा ध्यान इस समय उत्तर प्रदेश का माहौल बिगाड़ने पर है जहाँ की स्थिति बांकी राज्यों के मुकाबले काफी अच्छी है.
मित्रों, हम काफी समय से सोनिया, प्रियंका और राहुल नामक तीन व्यक्तियों की पार्टी रह गई कांग्रेस से यह कहते आ रहे हैं कि उसको अपना हिंदूविरोधी रवैया त्यागना चाहिए नहीं तो वो एक समय भारत का बंटवारा करने वाली मुस्लिम लीग का भारतीय संस्करण मात्र बनकर रह जाएगी लेकिन कांग्रेस न तो अपना हिन्दूविरोधी रवैया छोड़ रही है और न ही मोदी विरोधी रवैया. इतना ही नहीं वो बार-बार लगातार मोदी का विरोध करते-करते भारत के हितों के खिलाफ बात करने लगती है. जिससे शक होने लगता है कि वो कहीं भारत विरोधी शक्तियों की एजेंट तो नहीं है.
मित्रों, यहाँ हम एक उदाहरण लेना चाहेंगे. हरियाणा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पंकज पूनिया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गरियाने के चक्कर में पिछले दिनों हिन्दुओं के लिए परम पूज्य मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को गालियाँ दे बैठे. दूसरी तरफ रायबरेली से कांग्रेस विधायक अदिति सिंह प्रियंका वाड्रा की आलोचना करती हैं. कांग्रेस अदिति सिंह पर तो अनुशासन का डंडा चलाती है लेकिन पंकज पूनिया की आलोचना तक नहीं करती कार्रवाई तो दूर रही. शायद ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस के लिए भगवान राम का कोई मूल्य नहीं है जबकि प्रियंका उसके लिए बहुत कुछ ही नहीं सबकुछ है.
मित्रों, पिछले दिनों एक और अनपेक्षित घटना देखने को मिलती है. दिल्ली के महाबदमाश मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल एक विज्ञापन में सिक्किम को स्वतंत्र राष्ट्र बताता है. जाहिर है कि उनके जैसा बहुत ज्यादा पढ़ा-लिखा आदमी अनजाने में तो ऐसी गलती नहीं ही करेगा. खैर, चूंकि हम उनको दिल्ली चुनावों से पहले ही काला नाग बता चुके हैं इसलिए उनके बारे में हमें ज्यादा बोलने की जरुरत नहीं है. मगर कांग्रेस भी इस मुद्दे पर चुप रह जाती है जबकि जब सिक्किम का भारत में १९७५ में विलय हुआ था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इसे अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि बताया था. तो क्या कांग्रेस पार्टी को इंदिरा गाँधी द्वारा किए गए महान कार्यों से भी कोई मतलब नहीं रह गया है? या फिर कांग्रेस और केजरीवाल दोनों इस समय चीन के एजेंट हैं जो आज भी सिक्किम को भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं मानता?
मित्रों, भारत के कम्युनिस्टों का तो कहना ही क्या? अगर आज भारत पर चीन का हमला हो जाए जो कभी भी और किसी भी दिन हो सकता है तो ये गरीबों और सर्वहारा वर्ग के कथित मसीहा निश्चित रूप से एक बार फिर से चीन के समर्थन में दिखाई देंगे. इससे पहले १९६२ में भी वे चीन के समर्थन में और अपने ही देश भारत के खिलाफ खड़े हो चुके हैं. लेकिन क्या कांग्रेस को भी भविष्य में चीन या पाकिस्तान से चुनाव लड़ना है? अगर हां तब तो कोई बात नहीं, हमारी शुभकामनाएँ उसके साथ है लेकिन अगर उसे भारत से ही चुनाव लड़ना है तो उसे सर्वप्रथम अपना हिन्दूविरोधी रवैया त्यागना होगा अन्यथा जिस प्रकार मुस्लिम लीग को भारत में कभी १ और कभी २ सीटें लोकसभा चुनावों में आती हैं वैसे ही आया करेगी और राहुल गाँधी कभी भी दोबारा अमेठी से चुनाव नहीं जीत पाएंगे. दूसरी बात उसे मोदी विरोध और भारत विरोध के बीच के फर्क को समझना होगा. तीसरी बात अगर सोनिया समझती हैं कि उनके नेतृत्व में पूरे भारत को ईसाई धर्म में धर्मान्तरित किया जा सकता है तो उनको शीघ्रातिशीघ्र इस भ्रम को त्याग देना चाहिए क्योंकि यह नितांत असंभव है. ऐसा करने के प्रयास वास्को डी गामा के समय से ही जारी है और न जाने कितने ईसाई धर्मप्रचारक इस भारत की पवित्र मिटटी में मरखप गए और यहीं उनकी कब्रें बन गईं लेकिन हिंदुत्व का परचम लहराता रहा और लहराता रहेगा.
मित्रों, अंत में मैं अपने इस आलेख का अंत एक दुखद संयोग के साथ करना चाहूँगा कि इस समय भारत के चार प्रमुख दुश्मन हैं और उन चारों के नाम अंग्रेजी के सी अक्षर से शुरू होते हैं-सी फॉर कोरोना, सी फॉर कांग्रेस, सी फॉर चाइना और सी फॉर कम्युनिस्ट. साथ ही मैं बहन मायावती द्वारा इस समय दिखाई जा रही गंभीरता और दूरदर्शिता की प्रशंसा भी करना चाहूँगा जिनसे क से कांग्रेस, केजरीवाल और कम्युनिस्ट चाहें तो बहुत कुछ सीख सकते हैं.

गुरुवार, 14 मई 2020

मोदी, विपक्ष और मुसलमान


मित्रों, जबसे केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार सत्ता में आई है तभी से विपक्ष उसके खिलाफ मुद्दे तलाश रहा है और अपनी कोशिशों के लगातार असफल होते जाने से दिन-ब-दिन पागल भी होती जा रही है. कभी-कभी तो उसका पागलपन इतना बढ़ जाता है कि उसके नेता सीधे पाकिस्तान पहुँच जाते हैं और उससे मोदी जी को अपदस्थ करने में सहायता मांगने लगते हैं तो कभी कांग्रेस पार्टी के युवराज गुप्त यात्रा पर चीनी दूतावास पहुँच जाते हैं. कहने का तात्पर्य यह कि विपक्ष बार-बार मोदी विरोध और भारत विरोध का फर्क भूल जाता है.
मित्रों, सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि विपक्ष, पाकिस्तान और चीन द्वारा रचे गए इस गंदे खेल में मुसलमान पासे बन गए हैं. बहकावे में आकर वे बेवजह सीएए को लेकर आसमान सर पे उठा लेते हैं. जगह-जगह धरना और हिंसक प्रदर्शन. यहाँ तक कि जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत की और दिल्ली की यात्रा पर होते हैं तभी वे हिन्दुओं के नरसंहार की योजना बना डालते हैं और पूरी पूर्वोत्तर दिल्ली को जला डालते हैं. इस दुर्भाग्यपूर्ण हिंसा में जैसा कि आप भी जानते हैं कि ५० से भी ज्यादा बेगुनाह लोग मारे जाते हैं. मुसीबत तो यह थी कि इतने के बावजूद भी शाहीन बाग़ का धरना समाप्त नहीं किया जाता.
मित्रों, इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर कोरोना वायरस का भारत में आगमन नहीं हुआ होता तो देश इस समय शायद गृह युद्ध का सामना कर रहा होता. इसके लिए मैं कोरोना का धन्यवाद करना चाहूँगा. कोरोना के आने बाद तबलीगी जमात का भंडाफोड़ होता है और तबलीगी स्वास्थ्यकर्मियों और सुरक्षा बलों के साथ पागल कुत्तों की तरह व्यवहार करने लगते हैं. जो पुलिस और स्वास्थ्यकर्मी उनकी जान बचाने का प्रयास कर रहे हैं वे उनकी ही जान लेना चाहते हैं शायद इसलिए क्योंकि वे हिन्दू हैं और इसलिए बतौर कुरान काफ़िर हैं. पुलिस न तो तबलीग के पीछे की साजिश का पता लगा पाती है और न ही उनके मुखिया मौलाना शाद को पकड़ पाती है लेकिन तबलीगियों के कुत्तेपन की आलोचना करने के अपराध में कई लोग जेल भेज दिए जाते हैं मानों हम भारत में नहीं पाकिस्तान में हैं जहाँ कुरान और इस्लाम की आलोचना करना अक्षम्य अपराध है.
मित्रों, अब आगे अपने देश में क्या होनेवाला है ये तो भगवान और अल्लाह जाने. इस समय मेरे हिसाब से सबसे बड़ी समस्या कोरोना नहीं है बल्कि देश की सबसे बड़ी समस्या भारतीय मुसलमानों के मन से भारत के प्रति पैदा हो रही नफरत है. मुट्ठीभर कट्टरपंथी मुसलमान तो हमेशा से भारत को मुस्लिम देश बनाना चाहते हैं लेकिन जिस तरह कथित उदारवादी भी पिछले कुछ समय से पहले मोदी विरोधी फिर हिन्दू विरोधी और अंततः भारतविरोधी होते जा रहे हैं वह देश के लिए काफी खतरनाक है. समझ में नहीं आता कि मोदी और हिन्दुओं ने उनका क्या बिगाड़ा है? पहले आमिर खान, नसीरुद्दीन शाह, प्रतापगढ़ी, गुलाम नबी आज़ाद, शाह फैसल, जफरुल इस्लाम और अब मुन्नवर राणा. जफरुल इस्लाम जो दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष हैं ने जहाँ भारत के हिन्दुओं को अरब देशों की धमकी दे डाली वहीँ मुन्नवर राणा के मतानुसार भारत के ३५ करोड़ मुसलमान इन्सान हैं और भारत के १०० करोड़ हिन्दू जानवर जो सिर्फ वोट देना जानते हैं. राणा का बयान खुद ही इस बात को बयां कर रहा है कि ये साहिबान जो अभी तक दुनिया को मुहब्बत का पैगाम सुनाते फिर रहे हैं वो सारा सिर्फ-और-सिर्फ फरेब है. इस आदमी के दिमाग में हिन्दुओं के प्रति सिर्फ जहर भरा हुआ है. जिस तरह इतने बड़े शायर फरेबी निकले हैं उससे कहना न होगा भारत के सारे मुसलमान संदेह के घेरे में आ गए हैं कि क्या उनका देशप्रेम भी फरेब है और समय आने पर वे भी पल्टी मार जाएंगे?
मित्रों, वैसे एक बात तो निश्चित है कि अब न १९४७ का साल है और न ही भारत पर अंग्रेजों की हुकूमत है इसलिए भारत और एक बार टूटने से तो रहा. फिर अभी भी भारत के बहुत सारे मुसलमान भारत पर अपनी जान छिड़कते हैं. कम-से-कम कश्मीर में शहीद हो रहे जवानों के नाम तो इसकी तस्दीक करते हैं और उम्मीद बंधाते हैं.

सोमवार, 4 मई 2020

मजदूरों के साथ सरकारी अन्याय





मित्रों, अगर आपने हमारे भारतीय संविधान की प्रस्तावना पढ़ी होगी तो आपको भी यह पता होगा कि भारत एक लोककल्याणकारी राज्य है. राजनीति विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते हमें ज्ञात है कि एक लोककल्याणकारी राज्य की क्या-क्या विशेषताएँ होती हैं. किसी भी लोककल्याणकारी राज्य में सरकार का यह प्रथम कर्त्तव्य होता है कि वहां के जनसामान्य को आर्थिक सुरक्षा मिले क्योंकि इसके बिना लोककल्याणकारी राज्य का कोई महत्त्व नहीं है. ऐसे राज्य में सबके लिए रोजगार, न्यूनतम जीवन की गारण्टी, अधिकतम आर्थिक समानता होनी चाहिए। यदि शासन तन्त्र में राजसत्ता आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न लोगों के हाथों में होगी तो वह लोककल्याणकारी राज्य की श्रेणी में नहीं आयेगा। किसी भी लोककल्याणकारी लोकतंत्र की दूसरी विशेषता होती है राजनीतिक, सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था. लोककल्याणकारी राज्य को चाहिए कि वह ऐसी व्यवस्था करे कि राजनैतिक शक्ति सम्पूर्ण रूप से जनता के हाथ में हो। शासन व्यवस्था लोकहित में हो। इसके साथ ही लोककल्याणकारी राज्य का प्रमुख लक्षण यह होना चाहिए कि वह सामाजिक सुरक्षा से साथ-साथ समाज में रंग, जाति, धर्म, सम्प्रदाय, वंश, लिंग के आधार पर भेदभाव न करे और न होने दे। राज्य को लोककल्याण सम्बन्धी वे सभी कार्य करने चाहिए, जिससे नागरिकों की स्वतन्त्रता प्रभावित न हो और वे अपने कार्यक्षेत्र में पूर्ण क्षमता एवं स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य कर सकें। राज्य में शान्ति एवं सुव्यवस्था कायम करना तथा नागरिकों को कानून के तहत सुशासन प्रदान करना भी राज्य के कर्तव्यों में सम्मिलित है। लोककल्याणकारी राज्य को शान्ति और व्यवस्था बनाये रखने के लिए स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष न्याय की भी व्यवस्था करनी चाहिए। लोककल्याणकारी राज्य को स्त्री-पुरुष, बच्चों तथा उनके पारस्परिक सम्बन्धों का इस प्रकार नियमन करना चाहिए कि उनके बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न न हो. साथ ही सभी को शिक्षा के समान अवसर प्रदान करना और नागरिकों के स्वास्थ्य रक्षा हेतु समुचित उपाय करना भी एक लोककल्याणकारी राज्य में राज्य का कर्त्तव्य है.
मित्रों, इसके साथ ही कृषि की उन्नति हेतु राज्य को उत्तम बीज, खाद एवं सिंचाई के समुचित साधनों की व्यवस्था करना, कृषकों को कम ब्याज पर ऋण देना, यातायात एवं संचार के लिए सड़कों, रेलों, जल तथा वायुमार्गो, डाक, तार, टेलीफोन, रेडियो, दूरदर्शन आदि की व्यवस्था करना, श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए श्रमहितकारी कानून बनाना, शारीरिक रूप से अपंग एवं वृद्ध व्यक्तियों के लिए इस प्रकार के शिक्षण और प्रशिक्षण की व्यवस्था करना कि वह अपना जीविकोपार्जन स्वयं कर सकें, राज्य में कला, साहित्य, विज्ञान को प्रोत्साहन देना, नागरिकों के लिए आमोद-प्रमोद व मनोरंजन की व्यवस्था करना, प्राकृतिक सम्पदा के अधिकाधिक उपयोग के उपाय करने के साथ ही प्राकृतिक आपदा के समय जनसामान्य के लिए राहत और प्राणरक्षा के उपाय करना भी राज्य का कर्त्तव्य है.
मित्रों, दुर्भाग्यवश इस समय भी हमारे देश में आपदा आई हुई है और जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि किसी देश ने जानबूझकर कोरोना वायरस को फैलाया है तब तक इसे प्राकृतिक आपदा ही माना जाना चाहिए. जैसा कि हमें ज्ञात है कि पूरे भारत में २४ मार्च से ही सबकुछ बंद है यानि पूर्ण लॉक डाउन है. प्रधानमंत्री ने इस दौरान राष्ट्र को अपने पहले संबोधन में देश के सभी नियोक्ताओं और मकानमालिकों से निवेदन किया था कि वे श्रमिकों को काम और घर से नहीं निकालें बल्कि उनकी मदद करें. कितना आदर्श दिवास्वप्न था यह! अद्भुत! लेकिन चाहे आदर्श हो या स्वप्न उनका सत्य के धरातल पर उतरना हमेशा असंभव होता है, ऐसा हो न सका. अचानक पूरे भारत में और खासकर बड़े-बड़े महानगरों में हजारों लोग अपना रोजगार और निवास खोकर सडकों पर आ चुके हैं. कुछ दिनों तक तो भोजन और आवास का प्रबंध भी राज्य सरकारों और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा किया गया लेकिन धीरे-धीरे राहत कार्यों में शिथिलता आने लगी. दुनिया के सबसे बड़े लोककल्याणकारी गणराज्य की राजधानी में दिल्ली में हजारों श्रमवीरों को पुलों के नीचे खुले में सोना पड़ रहा है. इतना ही नहीं उन्हें भोजन भी दिनभर में एक ही बार दिया जा रहा है. कुछ ऐसी ही स्थिति मुम्बई और अन्य महानगरों में फंसे मजदूरों की है. जिन मजदूरों के साथ उनका परिवार भी है उनकी स्थिति तो और भी ख़राब है.
मित्रों, कुल मिलाकर पूरे भारत में इस समय श्रमिकों की हालत भिखारियों से भी बदतर है. कई मजदूर तो परेशान होकर आत्महत्या भी कर चुके हैं. लेकिन सरकारें उनके लिए कर क्या रही हैं? लोग सपरिवार भूखे-प्यासे हजारों किलोमीटर की यात्रा करके घर पहुँच रहे हैं. उनमें से कईयों ने तो रास्ते में ही दम भी तोड़ दिया है. इसी बीच दिल्ली सरकार ने अफवाह फैला दी कि आनंद विहार बस अड्डे से बसें खुलनेवाली हैं और मजदूरों को आनंद विहार ले जाकर छोड़ दिया ताकि मजदूर उत्तर प्रदेश में प्रवेश कर जाएँ और दिल्ली सरकार का उनसे पिंड छूटे. उधर महाराष्ट्र सरकार भी लगातार कह रही है कि प्रवासी मजदूरों को राहत पहुँचाना उसका काम नहीं है. इतना ही नहीं जब केंद्र सरकार ने प्रवासी मजदूरों को घर जाने की अनुमति दे दी तब कई राज्य सरकारें ऐसा कहने लगी कि प्रवासी मजदूरों को घर तक पहुँचाना उनका काम नहीं है. समझ में ही नहीं आता कि मजदूर किसकी जिम्मेदारी हैं? इतना ही नहीं आज सुबह से है आकाशवाणी पर प्रसारित समाचारों में कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार द्वारा जारी नए निर्देशों के अनुसार सिर्फ उन्हीं लोगों को घर लौटने की अनुमति होगी जो लॉक डाउन से तत्काल पहले यात्रा पर गए होंगे और लॉक डाउन घोषित हो जाने के चलते फंस गए होंगे. उन लोगों को घर जाने की अनुमति नहीं है जो पहले से ही मजदूरी या व्यापार के लिए बाहर रहते आ रहे हैं. क्या मजाक है? तो क्या रोजगार और आवास खो चुके सारे श्रमिक सामूहिक आत्महत्या कर लें? क्या इसी को लोककल्याणकारी शासन कहते हैं? कोरोनावीरों को सम्मान और श्रमवीरों को मृत्युदंड? फिर क्या जरुरत है दुनिया के सबसे बड़े रेल तंत्र की?
मित्रों, बिहार जहाँ के सबसे ज्यादा मजदूर दूसरे राज्यों में फंसे हुए हैं वहां की सरकार की करतूत तो और भी शर्मनाक है. पहले बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी ने कहा कि बिहार में किसी को घुसने ही नहीं दिया जाएगा जैसे बिहार उनकी पैतृक और निजी संपत्ति हो. जब कुछ दिनों पहले केंद्र सरकार ने प्रवासी मजदूरों को घर जाने की अनुमति दे दी तब भी बिहार सरकार का रवैया निराशाजनक था. बिहार सरकार कहने लगी कि उसके पास मजदूरों को वापस लाने के लायक साधन ही नहीं है इसलिए केंद्र सरकार ट्रेनों की व्यवस्था करे. अब जब केंद्र सरकार इसके लिए भी तैयार हो गई तो उसने कुछ नंबर जारी किए और कहा कि ये नंबर उन नोडल अधिकारियों के हैं जिनसे प्रवासी मजदूरों को संपर्क करना है लेकिन उनमें से ज्यादातर नंबर बंद हैं. ऐसा संयोग है या सायास किया जा रहा है पता नहीं लेकिन सवाल उठता है कि कोई सरकार अपनी जनता के साथ ऐसा क्रूर और भद्दा मजाक कैसे कर सकती है और वह भी ऐसे लोगों के साथ जो मजदूर से मजबूर बन चुके हैं. ऐसा हमें वर्षों से ज्ञात है कि बिहार में सरकार नाम की चीज नहीं है लेकिन केंद्र सरकार गरीबों के साथ ऐसा कैसे कर सकती है? तो क्या केंद्र में भी सरकार नहीं है? और अगर सरकार है भी तो क्या वो गरीबों की सरकार नहीं है? समाचार तो इस तरह के भी प्राप्त हो रहे हैं कि जो मजदूर ट्रेनों से घर आ रहे हैं उनसे किराया वसूल रही है कांग्रेस और वामपंथियों की सरकारें. यहाँ तक कि राजस्थान से यूपी आनेवाले यात्रियों से भी ट्रेनों में चढ़ने से पहले ही राजस्थान की सरकार द्वारा किराया का पैसा ले लिया गया. हद हो गयी जिनका सबकुछ पहले ही लुट गया है वो बेचारे किराया कहाँ से देंगे? क्या भारत में अभी भी अंग्रेजों की सरकार है?

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद

मित्रों, जब इस समय पूरी दुनिया को कोरोना से लड़ना पड़ रहा है हम भारतीयों को दुर्भाग्यवश कोरोना के साथ-साथ धर्मांध जेहादियों से भी लड़ना पड़ रहा है. जगह-जगह पूरे भारत में स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों पर हमले हो रहे हैं. जो लोग बिना किसी धार्मिक भेदभाव के अपनी जान दांव पर लगाकर सबकी जान बचाने में लगे हैं उनके ऊपर पुष्पवृष्टि करने के बदले पथराव किया जा रहा है.
मित्रों, अभी-अभी दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष श्री जफरुल इस्लाम खान का एक ट्विट काफी वायरल हो रहा है जिसमें उन्होंने जाकिर नाईक नामक घृणास्पद व्यक्ति को महान बताते हुए आरोप लगाया है कि तबलीगी जमातियों को छोड़ा नहीं जा रहा है अर्थात कैदी बना लिया गया है. मैं पूछता हूँ कि जब जमाती पागल कुत्ते की तरह व्यवहार कर रहे थे तब श्री खान कहाँ थे? क्या श्री खान की नज़रों में सिर्फ मुसलमान ही मानव हैं और क्या सिर्फ उनका ही मानवाधिकार होता है? क्या दिन-रात मानवता की सेवा में लगे पुलिसकर्मी और स्वास्थ्यकर्मी उनकी नज़र में मानव नहीं हैं? मैं श्री खान से पूछना चाहता हूँ कि उनके कृत्यों को देखते हुए क्या उनको खुला छोड़ना देश और समाज के लिए खतरनाक नहीं होगा? क्या इन जमातियों की मानसिक हालत ठीक है?
मित्रों, इतना ही नहीं श्री खान भारतवर्ष को अरब देशों का नाम लेकर धमकी दे रहे हैं कि जब अरब देशों तक यह समाचार पहुंचेगा कि जमातियों को कैद कर लिया गया है तब भारत में सैलाब आ जाएगा. वाह खान साहब रहना-खाना भारत में और भक्ति अरब देशों की. अरब देशों ने तो खुद ही तब्लिगियों पर पाबन्दी लगा रखी है फिर वे क्यों भारत से उलझेंगे? और अगर उलझ भी गए तो भारत का क्या बिगाड़ लेंगे? इस समय तो तेल के गिरते दाम ने खुद उनका ही दम निकाला हुआ है.
मित्रों, सवाल उठता है कि श्री खान जैसे पढ़े-लिखे लोग कैसे धर्मांध और जेहादी हो सकते हैं? सांप के तो सिर्फ एक या दो दांतों में जहर होता है इनके तो दिमाग में ही जहर है. उस पर भारत के धर्मनिरपेक्षतावादी नेता इनको लगातार तुष्टीकरण का दूध पिला रहे हैं. जबकि सच्चाई तो यह है कि पयःपानं हि भुजन्गानाम केवलं विषवर्द्धनम. तुष्टीकरण से याद आया कि जर्मनी में हिटलर ने आज से ठीक सौ साल पहले राजनीति में प्रवेश किया था. आरम्भ में हिटलर ने साम्यवादियों को कुचलना शुरू किया और तब इंग्लैण्ड और फ़्रांस ने उसकी खूब मदद की और तभी इस तुष्टीकरण का अत्यंत घृणित स्वरुप देखने को मिला. लेकिन जब हिटलर ने इंग्लैंड और फ़्रांस के मित्र देशों पर भी हमला करना और उनको अधिकृत करना शुरू कर दिया तब तुष्टीकरण करनेवाले मित्र राष्ट्रों के होश उड़ गए और अंततः द्वितीय विश्वयुद्ध के चलते दुनिया और मानवता को भारी नुकसान उठाना पड़ा.
मित्रों, कहने का तात्पर्य यह है कि तुष्टिकरण किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकता अलबत्ता उसे बढ़ा जरूर सकता है. हम दिन-रात ऊं द्यौ शांति, अंतरिक्ष शांति पढ़ रहे हैं. पढना भी चाहिए लेकिन क्या सामनेवाले के मन में भी यही भाव हैं?  हमने तो नफरत करना सीखा ही नहीं और सिर्फ प्रेम के ढाई अक्षर जानते हैं लेकिन क्या सामनेवाले ने भी प्रेम का ढाई आखर पढ़ा है या उसके मन में सिर्फ नफरत का जहर है. नफरत एकतरफा हो सकती है प्रेम तो एकतरफ़ा हो ही नहीं सकता. ऐसा नहीं है कि उनमें प्रेम करनेवाले बिलकुल हुए ही न हों-दरिया साहब, रहीम, रसखान, यारी साहब, खुसरो, ताज, नज़ीर, कारे खान, करीम बख्श, इन्शा, बाजिंद, बुल्लेशाह, आदिल, मक़सूद, मौजदीन, वाहिद, दीन दरवेश, अफ़सोस, काजिम, खालस, वहजन, लतीफ़ हुसैन, मंसूर, यकरंग, कायम, फरहत, काजी अशरफ महमूद, आलम, तालिबशाह, महबूब, नफीस खलीली, सैयद कासिम अली और निजामुद्दीन औलिया जैसे अनगिनत ऐसे प्रेमी हुए हैं जो कबीर की तरह दिन-रात गाते फिरते थे
हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या? 
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या? 
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते, 
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या? 
इन मुस्लिम राम-कृष्ण के भक्तों के लिए एक समय श्री भारतेंदु हरिशचंद्र जी ने कहा था कि- ‘इन मुसलमान हरिजनन पै कोटिन हिन्दुन वारिये.’
मित्रों, सवाल उठता है कि जिस निजामुद्दीन औलिया ने पूरी दुनिया को खालिस इश्क का सन्देश दिया आज उनकी ही दरगाह पर तबलीग का आयोजन कर नफरत की शिक्षा दी जाती है? इश्क यानि प्रेम भगवान द्वारा प्राणिमात्र को प्रदत्त सबसे अमूल्य धन है फिर हम शैतान के सबसे बड़े अवगुण नफरत को क्यों गले लगा रहे हैं? आखिर क्या मिल जाएगा खाद्य पदार्थों में थूकने से, पेशाब करने से या लैट्रिन मिला देने से? ऐसा करने वालों को लगता है कि वे ऐसा करके दूसरों का धर्म भ्रष्ट कर देंगे लेकिन धर्म तो खुद इनका भ्रष्ट हो रहा है और बदनाम भी हो रहा है। हम जानते हैं कि मुसलमान हिटलर से नफ़रत करते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि जो भी समाज सर्वधर्मसमभाव, सहअस्तित्व और सहिष्णुता की नीति पर नहीं चलता वो समाज हिटलरों का समाज है। क्या भारत के मुसलमान सुंदर-सुभूमि भारत को पाकिस्तान बनाना चाहते हैं जहां कोरोना जैसी विषम परिस्थिति में भी हिंदुओं के साथ भेदभाव किया जा रहा है? क्या यही इस्लाम है? क्या यह धर्म है? फिर अधर्म क्या है? दूर सीरिया और पाकिस्तान को छोड़िए हमारे बगल के शहर पटना में सन्नी गुप्ता की सिर्फ इसलिए एक मुसलमान ने हत्या कर दी क्योंकि उसने कोरोनावीरों के साथ उनके द्वारा किए जा रहे दुर्व्यवहार का विरोध किया था. इतना ही नहीं उसकी शवयात्रा पर मुस्लिमों की भीड़ द्वारा पत्थरबाजी भी की गई जबकि शवयात्रा में शामिल महिलाएँ तक हाथ जोड़कर उनसे ऐसा न करने का निवेदन कर रही थीं. बाद में सन्नी गुप्ता के परिजनों ने मुस्लिमबहुल इलाके में स्थित अपने घर पर यह मकान बिकाऊ है का बोर्ड लगा दिया. क्या यही धर्म है? विश्वास नहीं होता कि यही मुसलमान साल में पूरे एक महीने तक हज़रत इमाम हुसैन और उनके परिजनों के साथ हुई क्रूरता और अत्याचार की याद में शोक मनाते हैं. तुलसी कहते हैं-परहित सरिस धरम नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई. फिर किसी पंथ या मजहब में परोपकार के स्थान पर परपीड़ा कैसे महान पुण्य का करणीय कार्य हो सकता है.
मित्रों, इस आलेख का अंत हम महान शायर व भारतमाता के महान बेटे मिर्ज़ा असदुल्लाह खान ग़ालिब की इन पंक्तियों से करना चाहेंगे-
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है.

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

भारत को चाहिए विकास का नया मॉडल


मित्रों, भारत जब आजाद हुआ तब देश के समक्ष बड़ी महती समस्याएँ थीं. सबसे बड़ा सवाल जो भारत के नीति निर्माताओं के लिए परेशानी का सबब बना हुआ था वो यह था कि भारत को कौन-सा विकास मॉडल चुनना चाहिए. उस समय दुनिया में दो तरह की अर्थव्यवस्था थी-अमेरिका वाली पूंजीवादी और सोवियत संघ वाली समाजवादी. चूंकि नेहरु भारत को गुटनिरपेक्ष दिखाना चाहते थे इसलिए उन्होंने दोनों में से थोड़े-थोड़े गुणों को समाहित करते हुए मिश्रित अर्थव्यवस्था का चयन किया. देखते-देखते गाँव और शहर दोनों बदलने लगे. पशुधन आधारित कृषि का तीव्र यंत्रीकरण कर दिया गया और उसको हरित क्रांति का नाम दिया गया.

मित्रों, उधर शहरों में बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना भी की जा रही थी जिनमें बड़े पैमाने पर श्रम की आवश्यकता थी. अब गाँव के मजदूरों के पास एक विकल्प उपलब्ध था जिससे गांवों से देश के पश्चिमी, उत्तरी और दक्षिणी भागों की तरफ पलायन शुरू हुआ. कांग्रेस की किराया समानीकरण की नीति के चलते खनिज उत्पादक राज्य मुंह देखते रह गए और कालांतर में मजदूरों के आपूर्तिकर्ता मात्र बनकर रह गए. उधर गांवों में सिर्फ गेंहू और धान के उत्पादन को बढ़ावा देने से कृषि से विविधता समाप्त हो गयी और मोटे अनाजों की खेती लगभग बंद हो गयी.

मित्रों, सदियों से हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था एक बंद अर्थव्यवस्था थी. ग्रामीणों की जरुरत की सामग्री गांवों में ही उत्पादित की जाती थी जिससे प्रत्येक गाँव अपने-आपमें आत्मनिर्भर था. तब लोगों की जरूरतें भी कम थीं. लेकिन १९४७ के बाद गांवों की अर्थव्यवस्था को बंद से खुली अर्थव्यवस्था में बदल दिया गया और वो भी जबर्दस्ती. अब गाँव के लोगों को कृषि के लिए रासायनिक खाद और कीटनाशकों की जरुरत पड़ने लगी जिनका उत्पादन बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ बड़े-बड़े शहरों में करती थीं. प्रमाणित व संकर किस्म के बीजों का प्रचालन बढाया गया जिससे भोजन से स्वाद गायब हो गया साथ ही पौष्टिकता पर भी असर पड़ा.

मित्रों, १९९० में सोवियत संघ के विघटन के बाद अचानक पूरी दुनिया में पूंजीवाद और निजीकरण ने जोर पकड़ा साथ ही उपभोक्तावाद ने भी. भारत भी इससे अछूता नहीं रहा और शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकारी व्यय में समय के साथ कमी आती गयी. इसका असर यह हुआ कि सरकारी स्कूलों में पढाई का स्तर गिरने लगा जिससे गाँव के लोग मजबूरी में आस-पास के शहरों में बसने लगे और शहरीकरण काफी तेज हो गया.

मित्रों, इन सभी कारणों से गांवों में एक तरफ मजदूरों तो दूसरी तरफ किसानों की संख्या घटती गयी और गांवों के घरों में ताले लटकने लगे. मगर जैसे ही कोरोना महामारी के चलते देश में लॉक डाउन करना पड़ा पूरा विकास मॉडल चरमरा गया. भारी संख्या में मजदूर अपने घरों से हजारों किमी दूर फंस गए. उनकी हालत ऐसी हो गई है कि वे अपने कार्यस्थलों पर न तो रह सकते हैं और न ही अपने घर ही जा सकते हैं. अगर इन मजदूरों को अपने घरों के आस-पास ही काम मिल गया होता तो इनको अपने गांवों से बाहर निकलना ही नहीं पड़ता. कहने का तात्पर्य यह है कि भारत सरकार को अब उद्योगों का भी विकेंद्रीकरण करना होगा जिससे सिर्फ क्षेत्र विशेष में उद्योगों का जमघट न हो और कोरोना महामारी जैसी परिस्थितियों में मजदूर घर से बहुत दूर फंस न जाएँ. हालाँकि अब कृषि में सौ-पचास साल पहले वाला समय नहीं लौटाया जा सकता है क्योंकि मनुष्य मूलतः सुविधाभोगी होता है लेकिन कृषि आधारित लघु और माध्यम उद्योगों को स्थापित कर गांवों को आत्मनिर्भर जरूर बनाया जा सकता है इसके लिए उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर जिले का अनुकरण किया जा सकता है. साथ ही बढती जनसंख्या को भी रोकना होगा.

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

पालघर जहां पर खून गिरे संतन के

मित्रों, प्रसंग महाभारत से है. पांडव अज्ञातवास में थे. विराट युद्ध के पश्चात् राजा विराट के महल में सूचना आती है कि राजकुमार उत्तर ने अकेले ही देवताओं के लिए भी अपराजेय कौरव सेना को परास्त कर दिया है और राजमहल वापस आ रहे हैं. ख़ुशी के मारे राजा विराट पूरे राज्य में दिवाली मनाने का आदेश देते हैं और अंपने दरबारी कंक जो वास्तव में महाराज युधिष्ठिर हैं के साथ जुआ खेलने बैठ जाते हैं. इस दौरान एक तरफ राजा विराट बार-बार अपने पुत्र की बडाई करते हैं वहीँ दूसरी ओर कंक बार-बार बृहन्नला जो वास्तव में महारथी अर्जुन हैं की तारीफ करते हैं. जब ऐसा बार-बार होता है तब राजा विराट खीज में आकर कंक के मुंह पर जुए का पासा दे मारते हैं जिससे युधिष्ठिर के होठों से रक्तस्राव होने लगता है. यह देखकर सैरेन्ध्री अर्थात महारानी द्रौपदी स्वर्णपात्र में टपकते हुए खून को जमा करने लगती है. फिर तो राजा विराट सैरेन्ध्री पर भी नाराज हो उठते हैं और कहते हैं कि वो यह क्या कर रही है. तब सैरेन्ध्री उत्तर में कहती है कि यह खून ऐसे संत का है कि इसकी जितनी बूँदें आपके राज्य की धरती पर गिरेंगी उतने वर्षों तक राज्य में अकाल रहेगा.
मित्रों, फिर पालघर, महाराष्ट्र में तो निर्दोष संतों की हत्या हुई है. जिस इन्सान ने भी उनकी हत्या के वीडियो को देखा है मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि उनका ह्रदय इस समय रो रहा होगा. क्षमा करें मैं यहां केवल इंसानों की बात कर रहा हूं। वे निरीह बार-बार भीड़ के समक्ष हाथ जोड़ रहे थे लेकिन भीड़ उन पर ताबड़तोड़ लाठियां बरसा रही थीं जैसे वह भीड़ इंसानों की नहीं रक्तपिपासु भेड़ियों की हो. सबसे बड़ा अपराध तो उन पुलिसवालों का था जिन्होंने उनको ले जाकर स्वयं अपने हाथों से खूनी भीड़ के हवाले कर दिया. ७० साल का लाचार वृद्ध बार-बार पुलिसवाले की कमीज और हाथ पकड़ रहा था इस उम्मीद में कि वो उनको बचा लेगा लेकिन पुलिसवाला बार-बार उसके हाथों को झटक दे रहा था. क्या यही है क़ानून के लम्बे हाथ? हत्या के बाद जब पुलिसवालों ने अपने उच्चाधिकारियों को घटना के बारे में बताया तो उन्होंने इसे सड़क दुर्घटना बताकर मामले को रफा-दफा करने की पूरी तैयारी कर ली. लेकिन भीड़ मे से किसी व्यक्ति ने इस भयानक हत्याकांड का वीडियो बना लिया था जिसे उसने कल घटना के चार दिनों के बाद वायरल कर दिया. इसके बाद भी वहां की सरकार मीडिया पर ही डंडा चलाती हुई दिखी और गिरफ्तार हत्यारों के नाम तक नहीं बताए. शायद इससे उन महामानवों का मानवाधिकार संकट में आ जाता. फिर भी जो ख़बरें छन कर आ रही हैं उनके अनुसार शैतानों की भीड़ में सत्तारूढ़ एनसीपी और सीपीएम के नेता मौजूद थे और उनके ही निर्देशन में इस पूरे घटनाक्रम को अंजाम दिया गया.
मित्रों, सूचना आ रही है हत्यारों को गिरफ्तार कर लिया गया है और पुलिसवालों को निलंबित कर दिया गया है. लेकिन क्या इतनी कार्रवाई काफी है अपराध की जघन्यता को देखते हुए? फिर पुलिस ने ९ हत्यारों को नाबालिग बताते हुए सुधार गृह में भेज दिया है. सवाल उठता है कि जो हत्या जैसा
नृशंस अपराध कर सकता है वो बच्चा कैसे हो सकता है? इस घटना में शामिल सभी लोगों और पुलिसवालों को सीधे फांसी होनी चाहिए और वो भी त्वरित गति न्यायालय में मुकदमा चलाकर हफ्ते-दो-हफ्ते के भीतर.
मित्रों, आपको क्या लगता है यह किसकी हत्या है? क्या यह इंसानियत की हत्या नहीं है? क्या यह जनता के पुलिस-प्रशासन पर कायम विश्वास की हत्या नहीं है? क्या उन संतों की कार से कोई बच्चा बरामद हुआ था? फिर क्यों उनको पीट-पीट कर मार दिया गया? महाराष्ट्र की सरकार का बंटाधार होना तो तय है क्योंकि उसके शासन में संतों की हत्या हुई है लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार हत्यारों के नाम क्यों उजागर नहीं कर रही? माना कि ९ नाबालिग हैं लेकिन सबके-सब नाबालिग तो नहीं हैं? फिर यह पर्देदारी क्यों? आखिर क्या छुपाना चाह रही है सोनियासेना सरकार?
मित्रों, अंत में मैं आप सबसे विनती करना चाहूंगा कि इन संतों की हत्या की तुलना किसी गो तस्करी या गो हत्या जैसे अक्षम्य अपराध में संलिप्त राक्षस के वध से न करें। जैव वैज्ञानिक दृष्टि से मानव तो निर्भया के अपराधी भी थे।

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

नित नूतन सतीश नूतन की कविता


मित्रों, कभी-कभी किसी-किसी को जीवन में वो सब मिल जाता है जिसका वो हक़दार नहीं होता और कभी-कभी किसी-किसी को इसके उलट वो सब नहीं मिल पाता जिसका वो हक़दार होता है. हाजीपुर के महाकवि स्वर्गीय हरिहर प्रसाद चौधरी नूतन के सुपुत्र सतीश नूतन इसी दूसरी श्रेणी में आते हैं. सम्प्रति हाजीपुर के टाउन हाई स्कूल में क्लर्क सतीश जी उन कोमल भावनाओं के कवि हैं जो बढती प्रच्छन्नताओं के कारण हमारे जीवन से लुप्तप्राय हो चुकी हैं. उनकी कविताओं में आप बच्चों के निश्छल बचपन को महसूस करेंगे, गरीबों की मजबूरी भी देखने को मिलेगी, देशभक्ति के स्वर भी देखने को मिलेंगे और गंगा जल जैसी पवित्रता के साथ श्रृंगार रस भी. नूतन जी की कविताओं में आपको अक्सर हाजीपुर की स्थानीय भाषा बज्जिका के शब्दों का सौन्दर्य देखने को मिलेगा जैसे फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यासों में पूर्णिया की मिटटी की पहली बरसात की सोंधी-सोंधी खुशबू मिलती थी. तो आप मित्रगण भी आनंद लीजिए नूतन जी की सबसे नई कविता का जिसमें उन्होंने कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि में परदेश से बिहार लौटे मजदूर की व्यथा का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है-
क्वारंटाइन केन्द्र के एक मजदूर की व्यथा 

आया था ई सोच के दिल्ली
खूब कमाऊंगा
कम ही खाऊंगा
ज्यादा से ज्यादा बच पाए
जुगत लगाऊंगा
ठेकेदार, सेठ कहे तो
छुट्टी पाऊंगा
देगा जो सौगात उसे ढो
घर ले जाऊंगा
चमक-दमक दिखलाकर दिल्ली
हिरदय बीच बिठाया
रोटी, चावल, घुघनी परसा
लगा की सुख की हो गई वर्षा
आठ बजे तो
भोंपू लेकर
पहुंचे पंथ प्रधान!
किया बड़ा ऐलान-
इधर-उधर क रो ना
अपने बिल में घुस
कुछ ही दिनों में
ईहो विपदा
हो जायेगा फुस्स
सुबह हाथ में लट्ठ लिए
आया मेरा रखवाला
होकर बिल्कुल मतवाला
बोला-
जाओ अपने देस पूरबिये
जाओ अपने देस
तुम्हारा कुछ भी यहाँ न शेष
तथाकथित दिलवालों का
ई बोल सूनते भइया
याद आ गई मइया
खूंटे पे रंभाती गइया
गोर पकड़ कर
विनत भाव से पूछा-
साहब!
रुका हुआ है पहिया,
पैदल पहुँचेंगे कहिया?
ऊ स हम न जानें
अब तू हो बेगाने
भाग
भाग मजूरे भाग
आया है बड़ा व्याधि
मरोगे
आधाआधी
जिस दिल्ली को चिक्कन कीया
आफत में ऊ छीना ठीया
चकाचौंध की लाठी खाकर
दिखा गाँव का लुकझुक दीआ
खुद से ठोका नाल पांव में
उट्ठक बइठक
सोंटा खाते
पहुँचा तब जा अपन गाँव में
टाट लगाए
मुख्य सड़क सरपंच खड़ा था
पगडंडी पर कांट बिछा कर पंच खड़ा था
क्वारंनटाइन के लिए कटा चालान बाप रे!
बाबा ने समझाया
ढाढस खूब बंधाया
जब कह देंगे डागदर बाबू
तुम हो पूरे टंच
तो घर आना भगवंत
सही समय पर जांच करा ले
इस छुतहर को दूर हटा ले

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

और अब कोरोना जिहाद

मित्रों, हम बचपन से सुना करते थे कि अपने दुर्गुणों से लड़ना इस्लाम में जिहाद कहलाता है. फिर हमने कश्मीर में हिन्दुओं का नरसंहार देखा-सुना तब जाना कि गैर मुस्लिमों को जड़-मूल से समाप्त कर इस्लाम का राज स्थापित करना भी जिहाद होता है. कुछ साल पहले जब आईएसआईएस, तालिबान और अल कायदा का विश्व पटल पर आगमन हुआ तब हमने यह भी जाना कि मुसलमानों के अल्लाह अलग हैं और उन्होंने सिर्फ मुसलमानों के लिए एक स्वर्ग का जिसे वे जन्नत कहते हैं निर्माण कर रखा है जहाँ केवल जिहाद में मरनेवाले केवल पुरुष मुसलमानों को रखा जाता है. फिर हमने बीबीसी हिंदी पर पाकिस्तान के मशहूर पत्रकार वजातुल्लाह खान की डायरी सुनी जिसमें उन्होंने कहा था कि इस समय कई सारे कुरान हो गए हैं-अल्लाह का कुरान अलग है, मुल्ला का कुरान अलग है और बगदादी का कुरान अलग. तभी चीन से समाचार आया कि चीन की सरकार ने इस्लाम को मानसिक बीमारी मानते हुए इस पर रोक लगा दी है. वो किसी मुसलमान को न तो घर में कुरान रखने देती है, न ही रोजे रखने देती हैं और न ही नमाज अदा करने. यहाँ तक उसने कुरान पढने के जुर्म में कई मुसलमानों की आँखें तक सिल दी है.
मित्रों, जब दुनिया के रंगमंच पर ये सारी घटनाएँ घटित हो रही थीं तब हमारे देश में शाहे बेखबर मनमोहन सिंह लालकिले के प्राचीर से घोषणा कर रहे थे कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है. फिर उन्होंने सोनिया गाँधी के निर्देश पर सांप्रदायिक दंगा विरोधी विधेयक लाने का भी प्रयास किया जिसके प्रावधानों के अनुसार कहीं भी हिन्दू-मुस्लिम दंगा होने की स्थिति में सिर्फ हिन्दुओं को उसके लिए दोषी मानते हुए सजा मिलनी थी. उनकी सरकार में हिन्दू आतंकवाद नामक नायाब शब्द गढ़ा गया और मुंबई हमलों को भी हिन्दू आतंकवाद साबित करने का घिनौना प्रयास किया गया. लेकिन शहीद तुकाराम ने अपनी शहादत देकर पाकिस्तानी अजमल कसाब को पकड़ लिया और यह साजिश विफल हो गयी.
मित्रों, फिर सरकार बदली और देखते-ही-देखते कई कथित धर्मनिरपेक्ष सांप अपने केंचुल से बाहर आने लगे. फिर पता चला कि न सिर्फ सिमी बल्कि केरल का पीएफआई भी भारत के मुसलमानों को एकजुट कर भारत को इस्लामिक मुल्क बनाना चाहता है. फिर केजरीवाल सरकार की सहायता से दिल्ली में हिन्दुओं के संहार का प्रयास किया गया वो भी तब जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत की यात्रा पर थे. ठीक उसी समय चीन में कोरोना वायरस से हजारों लोग मर रहे थे और यह लाईलाज बीमारी बड़ी तेजी से यूरोप और अमेरिका को अपने गिरफ्त से लेने जा रही थी. तभी भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना के मद्देनजर होली नहीं मनाने का फैसला किया. इस बीच पूरी दुनिया से यहाँ तक कि चीन से भी सारे भारतीयों को भारत लाने का काम चल रहा था और चल रहा था कोरोना का मीटर भी.  भारत सरकार ने तत्काल प्रभावी कदम उठाते हुए पहले धारा १४४ लगवाई और फिर एक दिन के जनता कर्फ्यू की घोषणा की. फिर उसके बाद पूरे भारत में २१ दिन का लॉक डाउन घोषित कर दिया गया.  देश के सारे मंदिर, चर्च और गुरूद्वारे बंद कर दिए गए लेकिन अब भी बहुत सारे मुसलमान बेपरवाह होकर मस्जिदों में सामूहिक नमाज पढ़ते रहे. कई स्थानों पर पुलिस ने उनको पीटा भी. कई स्थानों पर जब पुलिस उनको रोकने गई तो उन्होंने पुलिस पर ही पथराव कर दिया और गोलीबारी भी की. फिर पता चला कि दिल्ली के निजामुद्दीन में भारत सरकार के आदेशों को धत्ता बताते हुए २००० से ज्यादा देसी-विदेशी तबलीगी मुसलमान जमा हैं. दिल्ली पुलिस ने चेतावनी भी दी लेकिन तबलीगी जैसी कट्टरपंथी संस्था के मुसलमान सरकार की क्यों सुनते? फिर जब उनमें से कई हैदराबाद में मर गए तब रात के दो बजे किसी तरह से मस्जिद को खाली कराने का काम शुरू हुआ. इसके लिए भारत सरकार ने कमांडो ऑपरेशन तक की तैयारी कर रखी थी. ये लोग भारत और हिन्दुओं से इतना नफरत करते हैं कि इन्होंने बस की खिड़की से दिल्ली पुलिस के जवानों और डॉक्टरों पर उनको कोरोनाग्रस्त करने के ख्याल से थूकना शुरू कर दिया. अभी भी इनको जहाँ रखा गया है वहां ये बीमारी फ़ैलाने के ख्याल से बस थूके जा रहे हैं. अब यह भी पता चला है कि तबलीग का प्रधान मुसलमानों को मस्जिद में आकर कोरोना से मरने की सलाह दे रहा था और कह रहा था कि मरने के लिए मस्जिद सर्वोत्तम स्थान है. इन मानवरूपी हिंसक पशुओं के कोरोनाग्रस्त होने के चलते देश में कोरोना मरीजों की संख्या में अचानक ५०० से ज्यादा की वृद्धि हो गयी और कोरोना के देश में तीसरे चरण में पहुंचने का खतरा उत्पन्न हो गया. इनमें से बहुत सारे देश में जहाँ-तहां मस्जिदों में छिप गए हैं जिससे पता चलता है कि मस्जिदों का किस हद तक दुरुपयोग होता रहा है.
मित्रों, इस तरह इन दिनों एक और प्रकार के जिहाद का जन्म हुआ है और वो है कोरोना जिहाद. ये लोग किस हद तक जानवर बन चुके हैं कि जो प्रशासन और चिकित्सक इनकी जान बचाना चाहते हैं ये उनको ही मारना चाहते हैं. आप समझ सकते हैं कि इनके दिमाग में भारत और गैर मुसलमानों के प्रति कितना जहर भरा हुआ है. इनकी तुलना सिर्फ पागल कुत्तों से की जा सकती है. हद तो यह है कि सरकारी निर्देशों की अवज्ञा करके ये अपने घर-परिवार और मित्रों को भी खतरे में डाल रहे हैं.
मित्रों, कुल मिलाकर ये हर स्थिति में जिहाद का स्कोप ढूंढ लेते हैं. लव जिहाद, लैंड जिहाद और अब कोरोना जिहाद. ऐसा भी नहीं है कि भारत के सारे मुसलमान महामूर्ख और जेहादी हैं लेकिन वे कट्टरपंथ का विरोध भी नहीं करते यह भी सच है. इसी तबलीग के मामले को लें तो कई बुद्धिजीवी यह झूठ बोलकर तबलीगियों का बचाव करने लगे कि वैष्णो देवी में भी तो ४०० श्रद्धालु फंसे हुए हैं. जबकि सच्चाई तो यह है कि वैष्णो माता ट्रस्ट ने यात्रा को १८ मार्च को ही अर्थात लॉक डाउन से काफी पहले रोक दिया था इसलिए वहां कोई श्रद्धालु है ही नहीं. इन चिंताजनक स्थितियों में सवाल उठता है कि उपाय क्या है? इस तरह के तत्वों को, पागल कुत्तों को खुला भी तो नहीं छोड़ सकते. लेकिन मैं फिर भी यह नहीं कहता कि चीन की तरह सारे मस्जिद ढहा दिए जाएँ लेकिन उन पर नियन्त्रण निश्चित रूप से काफी जरूरी है चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े. मदरसों को बंद कर दिया जाए और उसमें पढनेवाले बच्चों को आधुनिक शिक्षा दी जाए, समान नागरिक संहिता बने, जनसँख्या नियन्त्रण  कानून बने, जो भी मस्जिद भारतविरोधी गतिविधियों में संलिप्त पाए जाएँ उनको अस्पताल में बदल दिया जाए, न्यायपालिका के पंख कतरे जाएँ जिससे वो ऐसा करने में टांग न अडा सके. भारत में सिर्फ भारत की संस्कृति रहे जो तू वसुधैव कुटुम्बकम् में विश्वास रखती है न कि ऐसी बर्बर संस्कृति जो आदमी को पागल कुत्ता बनाती हो. अंत में आप सभी को रामनवमी की बधाई और यह बताते हुए कि इस साल हाजीपुर में रामनवमी के सुअवसर पर लगने वाला रामचौड़ा मेला हिन्दुओं ने खुद ही रद्द कर दिया है घर पर ही रामनवमी मना रहे हैं.यहाँ हम आपको बता दें कि राम,लक्षमण और ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने जनकपुर जाते हुए इसी हाजीपुर के रामचौड़ा घाट पर गंगा पार की थी.

रविवार, 29 मार्च 2020

बर्खास्त हो केजरीवाल सरकार

मित्रों, आज मैं इतिहास के पन्नों को नहीं पलटूंगा कि किस तरह केजरीवाल ने मेरे मित्र चौहान साब के साथ मिलकर नोएडा से इंडिया अगेंस्ट करप्शन आन्दोलन की शुरुआत की. फिर कैसे अन्ना हजारे को आगे करके आन्दोलन को आगे बढाया और पूरे भारत को आंदोलित कर दिया. अन्ना के मंच से कैसे उसने अपने बच्चों के सर पर हाथ रखकर कभी राजनीति में नहीं आने की कसमें खाईं. फिर कैसे उसने कसमें तोड़ीं और इस वादे के साथ राजनीति में आने की घोषणा की कि वह राजनीति से गंदगी साफ़ करने आया है. फिर कैसे उसने अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से दिल्ली में कई सारे शाहीन बाग़ लगवाए और पूरी दिल्ली को जाम कर दिया. फिर कैसे उसने अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से दिल्ली में दंगे करवाए और खुद दंगों के समय फोन पर ताहिर हुसैन को निर्देश देता रहा.
मित्रों, मैं नहीं समझता कि केजरीवाल ने आज तक जो भी कारगुजारी की है उनमें से कोई भी माफ़ी के लायक है लेकिन अब जबकि पूरी दुनिया कोरोना के खिलाफ विश्वयुद्ध लड़ रही है तब उसने जो अपराध किया है उसके लिए उसे सैंकड़ों बार फांसी पर चढाने की सजा भी अगर दी जाए तो कम होगी. इस नीच ने जबकि पूरा देश लॉक डाउन की स्थिति में है तब दिल्ली के मजदूरों को सहारा देने के बदले उनकी बिजली-पानी बंद कर दी. इतना ही नहीं इसने उनको बोरियों की तरह बसों में भरकर दिल्ली के बॉर्डर पर ले जाकर मरने के लिए छोड़ दिया. इस आदमी की नीचता को इस बात से भी समझा जा सकता है कि जबकि पूरे देश में कोई घर से नहीं निकल रहा है तब भी इसकी सरकार ने साजिशन दिल्ली में बसों का परिचालन बंद नहीं किया. ऊपर-ऊपर तो ये यह कहता रहा कि उसकी सरकार ने ४ लाख लोगों के प्रतिदिन भोजन का इंतजाम किया है लेकिन भीतर-भीतर मजदूरों को दिल्ली से भगाता रहा ताकि लॉक डाउन विफल हो जाए और सारा इल्जाम केंद्र सरकार पर आए.
मित्रों, अब आप स्थिति को समझिए. इन प्रचंड भारतविरोधी ने दिल्ली के लगभग सारे मजदूरों को अपनी सरकारी बसों में भर-भरकर दिल्ली-उत्तर प्रदेश की सीमा पर ले जाकर पटक दिया है. अब अगर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार उनको उनके राज्य भेजती है तो गांवों में कोरोना फैलने का खतरा है और अगर आनंद विहार के पास कौशाम्बी में ही रोकती है तो फिर गाज़ियाबाद में बीमारी फैलेगी. इन सबके बीच यह नीच यह कहकर सारे झमेले से अपना पल्ला झाड लेगा कि लोग भाग रहे हैं तो मैं क्या करूं?
मित्रों, कुल मिलाकर जबकि देश की सारी पक्ष-विपक्ष की सरकारें कोरोना वायरस के खिलाफ कंधे-से-कंधा मिलाकर लड़ रहीं हैं इस घनघोर देशद्रोही अराजकतावादी ने एक बार फिर से भारत की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है. ऐसे में मुझे नहीं लगता कि भारत सरकार के समक्ष इसे बर्खास्त कर दिल्ली का पूरा प्रशासन अपने हाथों में ले लेने के सिवाय और कोई विकल्प बचता है. बल्कि मैं तो कहूँगा कि ऐसा दिल्ली दंगों से समय फरवरी के अंतिम हफ्ते में ही हो जाना चाहिए था. लेकिन होता कैसे मोदी जी भी कम जातिवादी थोड़े ही हैं सो एक बनिए की सरकार को कैसे बर्खास्त करते? लेकिन इन दिनों दिल्ली में जो हो रहा है उससे भारत की अंतर्राष्ट्रीय जगत में जो छवि बन रही है वो किसी भी हाल में अच्छी तो नहीं कही जा सकती. हो सकता है कि निकट-भविष्य में देश में कोरोना भयावह रूप ले ले और आपातकाल की घोषणा करनी पड़े. अंत में मैं आपलोगों से कहना चाहता हूँ कि एक कहावत तो आपने भी सुनी होगी कि एक मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है और वह मछली कोई और नहीं केजरीवाल है.

बुधवार, 25 मार्च 2020

कोरोना चीन की साजिश तो नहीं


मित्रों, अगर हम कहें कि हमारा पडोसी चीन दुनिया का सबसे रहस्यमय देश है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. हजारों सालों से चीन दुनिया के लिए एक पहेली बना हुआ है. इस देश की हर चीज अजीबोगरीब है और उसमें से सबसे अजीब है उसका खान-पान. चीनियों के खाने-पीने की आदत सनकीपने की हद से भी आगे तक पहुँचती है. शायद दुनिया की ऐसी कोई चीज है ही नहीं जो चीनी खाते नहीं हैं. इतना ही नहीं वे खाने-पीने के मामले में अतिक्रूर भी हैं. जिस सांप को देखते ही पूरी दुनिया के लोग डर के मारे घबरा जाते हैं चीनी उनको बड़े मजे से जिन्दा ही चबा जाते हैं. आपने कभी चूहों या कुत्तों को जिंदा नहीं खाया होगा लेकिन चीनी खाते हैं. अभी चमगादड़ खाने से फैले कोरोना की आग ठंडी भी नहीं हुई है कि जिंदा चूहे खाने से होनेवाला हन्ता वायरस के फैलने का खतरा खड़ा हो गया है.
मित्रों, अपने देश में भी कुछ अन्य लोग और मुसलमान जब भी उनको मांस खाने से मना किया जाता है अपने कुछ भी खाने के अधिकार की रक्षा के लिए खड़े हो जाते हैं जबकि सच्चाई यह है कि आदमी का पाचनतंत्र शाकाहार के लिए बनाया गया है न कि मांसाहार के लिए. हमें गर्व है कि भारत के ऋषि-मुनियों ने हजारों साल पहले इस तथ्य की खोज कर ली थी लेकिन बांकी दुनिया धृष्टतापूर्वक इस महान खोज को नकारते रहे. आज चीन ने जो पाप किए या कर रहा है उनकी कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ रही है.
मित्रों, एक दूसरी सम्भावना भी हो सकती है जिसकी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प बार-बार ईशारा कर रहे हैं. कभी आपने सोंचा है कि जो चीन जानवरों के प्रति इतना क्रूर हो सकता है क्या वो कभी मानवमात्र के कल्याण के बारे में सोंच भी सकता है? क्रूरता उसके जीन में बसी हुई है. जब से शी जिनपिंग को चीन का आजीवन राष्ट्रपति बनाया गया हैं तभी से सच्चाई यही है उसकी अभिलाषा पूरी दुनिया पर हुकूमत करने की है मगर ट्रम्प, मोदी और कुछ यूरोपियन देशों समेत कुछ शक्तियां उसके अभियान में बाधा बन कर खड़ी हैं. यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि वुहान में चीन ने खतरनाक विषाणुओं के निर्माण के लिए प्रयोगशालाओं का निर्माण कर रखा है जिनमें करीब १५०० विषाणु भंडारित किए गए हैं. शी जिनपिंग ने 2013 में अपनी महत्वकांशी योजना वन बेल्ट वन बेल्ट (OBOR) शुरू की जिसके माध्यम से एशिया से यूरोप तक उत्पाद बेचने की योजना थी मगर भारत और कई अन्य देश इसमें शामिल नहीं हुए. कुछ समय से ट्रम्प ने शी जिनपिंग को ट्रेड वार में उलझा रखा था जो कदाचित उसकी आँखों में खटक रहा था. दुनियाभर को आतंकित करने के लिए शी जिनपिंग ने शायद वुहान में कोरोना वायरस को खुले में छोड़ दिया और अपने लोगों को चुप करा दिया –82000 लोग इस वायरस से संक्रमित हुए और 3200 की मौत हुई, ये चीन कहता मगर कौन जानता है क्या सच है?
मित्रों, चीन और पूरी दुनिया के अगर कुछ करोड़ लोग भी मारे जाएँ तो शी जिनपिंग और चीन को कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि चीन अपनी 1949 की कथित क्रांति में अपने 5 से 7 करोड़ लोगों का क़त्ल कर चुका है. बाद में सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर भी माओ ने करोडो चीनियों को मार डाला. इसलिए इस बात का संदेह दुनियाभर में जताया जा रहा है कि ये कोरोना वायरस का फैलना कोई “संयोग” नहीं है बल्कि ये शी जिनपिंग का विश्व पर हुकूमत करने के लिए किया गया एक “प्रयोग” है जिसमे वो सफल हो गया. यह फैला नहीं है बल्कि इसे चीन ने पूरे विश्व को आतंकित करने के लिए फैलाया है जिससे समस्त विश्व की अर्थव्यवस्थाएं चौपट हो जाएं. आपने इस बात पर विचार किया है कि चीन ने अपने देश में इस वायरस को केवल वुहान तक क्यों और कैसे सीमित रखा?
मित्रों, अब चीन जब मर्जी अपने वुहान के 1500 वायरस वाली तिजोरी से लगातार कोई-न-कोई वायरस छोड़ता रहेगा. एक बार  प्रयोग सफल होने के बाद चीन यह प्रयोग बार-बार करता रहेगा. आज एक और वायरस चीन में पाया गया है”हंता वायरस” जिससे एक आदमी मर गया और 32 को संक्रमित कर गया.गौरतलब है कि २०१८ में चीन का सरकारी अख़बार चाइना डेली इस बात की गौरवपूर्ण घोषणा कर चुका है कि चीन के पास वुहान में १५०० प्रकार के खतरनाक विषाणु जमा हो चुके हैं. यहाँ तक कि अख़बार ने प्रयोगशाला की तश्वीर तक डाली थी.

शनिवार, 14 मार्च 2020

दिल्ली में केजरीवाल की काली राजनीति

मित्रों, हम पत्रकारों की भी अपनी सीमा है। कई बार जब हम देश की जनता को किसी देशद्रोही के प्रति जागरूक करने का प्रयास करते हैं तो हमें पक्षकार कह दिया जाता है हालांकि बाद में जनता को पता चलता है कि हमने सच कहा था मगर तब तक काफी देर हो चुकी होती है।
मित्रों, कुछ ऐसा ही इन दिनों दिल्ली में देखने को मिल रहा है। विधानसभा चुनाव के समय हमने कहा था कि केजरीवाल हिन्दू और भारत-विरोधी है। बल्कि वो मानववेश में काला नाग है इसलिए उसको वोट न दें बल्कि भाजपा को दें लेकिन तब किसी ने नहीं सुना। लेकिन आज वही लोग दहाड़े मार-मार कर रो रहे हैं। दिल्ली में मुसलमानों ने हत्या और आगजनी करते समय आपिये और भाजपाई हिंदुओं के बीच कोई भेदभाव नहीं किया। सबके साथ समानता का व्यवहार किया। जिन हिंदुओं को चुनाव के समय केजरीवाल परम हनुमानभक्त सच्चा हिन्दू लगा था अब दिन के उजाले में भी देख सकते हैं कि केजरीवाल कैसे उस अमानतुल्लाह के साथ खड़ा है जो आगे भी दिल्ली में हिंदूविरोधी दंगे करने-कराने की धमकी दे रहा है। अब शायद हिंदुओं को समझ आ गई होगी कि केजरीवाल वास्तव में हिन्दू है या ऐसा जेहादी मुसलमान जो काफिरों के कत्ल को अपना परम कर्तव्य समझता है।
मित्रों, यह हमारा सौभाग्य है कि दिल्ली में इस समय भाजपा की सरकार है और दिल्ली पुलिस उसके मातहत है अन्यथा अगर दिल्ली की कानून-व्यवस्था केजरीवाल के हाथों में होती तो दिल्ली भी बहुत पहले कश्मीर की तरह‌ हिन्दू विहीन हो चुकी होती। इतना ही नहीं दंगों के बाद दंगा पीड़ित हिंदुओं के खिलाफ ही मुकदमे चल रहे होते अगर सोनिया गांधी सांप्रदायिक दंगा विरोधी बिल मनमोहन के समय पारित करवा लेती।
मित्रों, हम बार-बार लिखते रहे हैं हिन्दू बंटेगा तो कटेगा। पाकिस्तान से जितने भी हिंदू जान बचाकर और सबकुछ लुटा कर आ रहे हैं सबके सब दलित हैं लेकिन भारत के दलित नेता उनको नागरिकता न मिले इसके लिए मुसलमानों के साथ खड़े हैं जबकि सीएए कानून बना ही उन दलितों को नागरिकता देने के लिए है ताकि उनको वापस पाकिस्तान जाकर नरक की यातना न भोगनी पड़े।
मित्रों, हम पहले दिन से ही कह रहे हैं कि दिल्ली के दंगों के पीछे पीएफआई का हाथ है। पीएफआई केरल का आतंकी संगठन है। ऐसे ही संगठनों के चलते ही आज मुसलमान दुनिया भर में आतंकवाद का पर्याय बन गये हैं। अगर कोई मुसलमान ऐसे संगठनों का विरोध नहीं करता तो वो जाने और उसकी देशभक्ति जाने लेकिन हम हिन्दू जो कर सकते थे या जो कर सकते हैं वो क्यो ंंनहीं करते? हम यह नहीं कहते कि हिन्दू भी मुसलमानों की तरह अवैध हथियारों का जखीरा अपने घरों, स्कूलों और मंदिरों में जमा कर लें लेकिन हम वैध हथियार तो रख सकते हैं. ऐसा कहीं से भी ठीक नहीं लगता कि जब हम पर हमला हो जाता है तब हम सरकार और पुलिस की तरफ देखने लगते हैं. अपनी रक्षा करना हर व्यक्ति का सबसे बड़ा और पुनीत कर्त्तव्य है. रही बात केजरीवाल की तो वो वही कर रहा है जो एक काले नाग को करना चाहिए. जिन्होंने उसे वोट दिया अब वो उनको ही डंस रहा है. यहाँ तक कि दंगों के बाद भी वो सीएए और एनपीआर के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव पारित करवा रहा है जबकि वो अनपढ़ नहीं है और यह अच्छी तरह से जानता है कि इन दोनों से देश के किसी भी नागरिक की नागरिकता को कोई खतरा नहीं है. तो अब पछताए होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गई खेत. अब आगे-आगे देखिए कि फ्री बिजली और पानी का लालच देकर दिल्ली के हिन्दुओं को अपने जाल में फंसा लेनेवाला यह काला नाग आपके साथ और क्या-क्या जानलेवा खेल करता है.

शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

दिल्ली के दंगे भारत के खिलाफ युद्ध

मित्रों, भारत की राजधानी में दंगे हुए हैं. उस दिल्ली में जिसे हिंदुस्तान का दिल कहा जाता है. लेकिन सवाल उठता है कि क्या सचमुच ये सिर्फ दंगे ही हैं? या कुछ और हैं. शुरुआत में हमें भी लगा था कि ये सांप्रदायिक दंगे ही हैं लेकिन अब जबकि इसकी भयावहता सामने आने लगी है तब यह स्पष्ट हो चुका है कि ये दंगे दंगे हैं ही नहीं बल्कि बड़े ही नियोजित तरीके से हिन्दुओं और तदनुसार भारत के खिलाफ छेड़ा गया युद्ध है. एक ऐसा युद्ध जिसे निहायत गन्दी मानसिकता वाले लोगों द्वारा भारत को बदनाम करने की साजिश के तहत संचालित किया गया. ये दंगे वास्तव में भारत पर घात लगाकर किया गया हमला है.
मित्रों, इन दंगों में जानबूझकर दलितों के तथाकथित नेता चंद्रशेखर रावण को शामिल किया गया जिससे लोग यह नहीं कह सकें कि मुसलमानों ने भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है जबकि इस आदमी के पीछे एक भी दलित नहीं है. जानबूझकर इस कलियुगी रावण द्वारा उस समय भारत बंद का आह्वान करवाया गया जब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प भारत की यात्रा पर थे. भारत के आतंरिक शत्रुओं को यह अच्छी तरह से पता था कि इस समय दिल्ली पुलिस ट्रम्प की सुरक्षा में लगी हुई है इसलिए हिन्दुओं को बचाने नहीं आ सकती.
मित्रों, सीसीटीवी फुटेज से भी यह बात सामने आ चुकी है कि पहले पथराव की शुरुआत मुसलमानों ने की थी. उन्हीं स्वघोषित घनघोर राष्ट्रवादी मुसलमानों ने उसके बाद हिन्दुओं को मारने की शुरुआत की और २४ तारीख की रात को ताहिर हुसैन नामक नगर पार्षद जो आम आदमी पार्टी का नेता है और केजरीवाल का स्नेहिल है के घर को अपना किला बनाकर कोहराम मचा दिया. ताहिर के घर में उस रात ३००० मुसलमान जमा थे. उस रात इनके हाथ जो भी हिन्दू लगा उसकी हत्या कर दी गई. ऐसा करते समय इन जेहादी आपियों ने यह भी नहीं सोंचा कि इनमें से अधिकतर हिन्दुओं ने कुछ ही दिन पहले उनके साथ हाथ-में-हाथ डालकर आम आदमी पार्टी को मतदान किया था. इंटेलिजेंस ब्यूरो का जवान अंकित शर्मा दुर्भाग्यवश उस ताहिर हुसैन का पड़ोसी था की हत्या तो इतनी बेरहमी से की गई कि देखकर पोस्ट मार्टम करनेवाले चिकित्सकों का भी कलेजा काँप गया. ६ घंटे में छह-सात लोगों ने बारी-बारी से उस पर चाकू से ४०० बार वार किए. सबकुछ उसके परिवार की आँखों के आगे हुआ लेकिन वे कुछ भी नहीं कर सके. इसी तरह एक लड़की प्रीति के साथ ताहिर हुसैन के घर में संभवतः ४०-५० जेहादियों ने पहले भीषण बलात्कार किया फिर उसे जलाकर मार डाला. उस लड़की के वस्त्र अभी भी ताहिर हुसैन के घर में पड़े हुए हैं जो इस भीषण यातना की रो-रो कर गाथा कह रहे हैं. इतना ही नहीं किसी हिन्दू के सर में ड्रिल मशीन से छेद कर दिया गया तो किसी का हाथ-पाँव काट कर जलती हुई आग में झोंक दिया गया. नितिन नामक एक बच्चा पड़ोस की दुकान जाने के लिए जैसे ही घर से निकला उसके सर में गोली मार दी गई. वह मासूम बच्चा जो किसी के घर का चिराग था को बेवजह बुझा दिया गया क्योंकि वो काफ़िर था.
मित्रों, इतना ही नहीं जेहादियों ने उसके अलावा पूरे ईलाके में हिन्दुओं की सारी गाड़ियों, घरों, होटलों, दुकानों यहाँ तक कि स्कूलों तक को नहीं बक्शा बल्कि जलाकर राख कर दिया. चूँकि पुलिस राष्ट्रपति ट्रम्प की सुरक्षा में लगी थी इसलिए समय पर पर्याप्त संख्या में नहीं आ सकी. जो पुलिसवाले दंगों को रोकने आए भी तो उनके हाथों में डंडे थे जबकि जेहादियों के पास तमंचे थे परिणामस्वरूप वे सारे घायल होकर अस्पताल पहुँच गए उनमें से भी कई मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं.
मित्रों, जिस तरह युद्ध में छोटी-छोटी चीजों का भी इस्तेमाल किया जाता है उसी तरह से इन दंगों में भी पेट्रोल, कोल्ड ड्रिंक की बोतलों, ट्यूब, रस्सी, लोहे की छड, चाकू और तमंचों का बखूबी इस्तेमाल किया गया जिससे इलाके के हिन्दुओं को जान और माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा. अब तक मौत का आंकड़ा 50 के करीब पहुँच चुका है. प्रतिक्रिया में हिन्दुओं ने भी गुस्से में आकर कुछ मुसलमानों को मार डाला. लेकिन सवाल उठता है कि उस इलाके से जो हिन्दुओं का पलायन शुरू हो चुका है उसे रोका कैसे जाए? कैसे उनके मन में अपने मुसलमान पड़ोसियों के प्रति विश्वास उत्पन्न किया जाए? जहाँ हिन्दू घोर नैतिकतावादी हैं वहीँ इस्लाम में सब जायज है नाजायज कुछ है ही नहीं. महिलाओं को हम दया और करुणा की प्रतिमूर्ति मानते हैं लेकिन जब महिलाएं भी पत्थर चलाकर गजवा-ए-हिन्द में अपना योगदान देने लगें तो फिर पुरूषों को हैवान बनने से रोकेगा कौन?
मित्रों, एसआईटी की प्रारंभिक जांच में भी यह सामने आ रहा है कि इस युद्ध रुपी दंगे के तार केरल के मुस्लिम संगठन पीएफआई और पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई से जुड़े हैं. जांच से ऐसे संकेत भी मिले हैं कि अगर मुसलमान उस दिन उत्तर पूर्वी दिल्ली की सडकों को बंद करने में सफल हो जाते और रात के बदले दिन में ही हिंसा नहीं करने लगते तो शायद उस इलाके में हिन्दुओं का अभूतपूर्व नरसंहार देखने को मिलता. ऐसे में समझ में नहीं आता कि अपने देश में भविष्य में क्या होनेवाला है? शायद भयंकर गृहयुद्ध जैसे कि अमेरिका में १८६१ से १८६५ तक हुआ था. लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई. बंटवारे के समय अम्बेदकर को अनसुना कर मुसलमानों को भारत में रोकने की जो खता नेहरु-गाँधी ने की थी उसकी सजा अब भारत के हिन्दू पाएंगे और हमारी राजधानी दिल्ली से इसका आरंभ भी हो चुका है.

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

२०२० में कलाम साहब के सपनों का भारत


मित्रों, जबसे भारत आजाद हुआ है तभी से हमारे स्वप्नदर्शी नेताओं ने देश के विकास को लेकर सपने देखे हैं. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने १९४७ में भारत को सुखी और खुशहाल बनाने का सपना देखा था. उनका मानना था कि यह तब तक मुमकिन नहीं होगा जब तक देश में फैली निरक्षरता, गरीबी, बीमारियाँ, अज्ञानता समाप्त नहीं होगी और देश के प्रत्येक नागरिक को आगे बढ़ने के समान अवसर नहीं मिलेंगे.
मित्रों, फिर देखते-देखते भारत की आजादी के ५० साल बीत गए लेकिन देश की हालत में कोई बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हुआ जिसे देखकर राजर्षि डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम काफी चिंतित रहते थे. बल्कि कलाम साहब को देश में उस पुरानी उमंग, तमन्ना और ललक का अभाव दिखा जो आजादी के तत्काल बाद के समय में देशवासियों के मन में हिलोरे मार रही थी. उद्दाम देशभक्त कलाम साहब यह देख निराश थे कि शताब्दी और सहस्राब्दी की समाप्ति के समय जब भारत को विकसित देशों की कतार में खड़े हुए देखने की बात आती है तो किसी भी भारतीय के चेहरे पर उम्मीद की चमक नहीं दिखाई देती, दिखाई देती है निराशा और मानवद्वेष.
मित्रों, कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में भारतमाता के इस लाल ने विकसित भारत का सपना देखा और देशवासियों के सामने लक्ष्य रखा कि भारत को २०२० तक विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में ला खड़ा करना है. इसके लिए उनके पास जो भी कार्ययोजना थी उसको उन्होंने भारत की जनता के समक्ष एक पुस्तक के रूप में रखा जिसका नाम था-भारत २०२०.
मित्रों, कलाम साहब ने १९९८ में लिखित अपनी इस पुस्तक में एक ऐसे भारत की परिकल्पना की थी जिसमें साल २०२० में कोई गरीब नहीं होगा. उनके अनुसार वर्ष २०२० में भारत जीडीपी की दृष्टि से दुनिया में चौथे स्थान पर होगा और उसे विकसित देश का दर्जा मिल जाएगा. कलाम साहब के अनुसार एक विकसित भारत का अर्थ होगा कि भारत विश्व की ५ महानतम शक्तियों में से एक होगा. वह राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से आत्मनिर्भर होगा और विश्व के आर्थिक और राजनैतिक रंगमंच पर उसकी निर्णायक व अहम् भूमिका होगी.
मित्रों, आज हम २०२० में पहुंचकर इस बात की भली-भांति समीक्षा कर सकते हैं कि भारत कलाम साहब के स्वप्नों को कहाँ तक साकार कर पाया है. निश्चित रूप से जीडीपी के मोर्चे पर हम काफी हद तक सफल रहे हैं और कुल जीडीपी के मामले में भारत आज दुनिया में चौथे न सही लेकिन पांचवें स्थान पर पहुँच चुका है लेकिन भारत के लिए विकसित देश का दर्जा आज भी पहुँच से काफी दूर है क्योंकि प्रति व्यक्ति आय २३६१ डॉलर के साथ भारत प्रति व्यक्ति आय में बेहद नीचे दुनिया में १२५वें स्थान पर है. जबकि विश्व बैंक ने उच्च आय वाले देश या विकसित देशों की परिभाषा के लिए 12,055 अमेरिकी डॉलर प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI)  का पैमाना तय कर रखा है. यह प्रति व्यक्ति आय भी दुर्भाग्यवश भारत में सबके बीच समान रूप से वितरित नहीं है. अर्थव्यवस्था में ऊपर के १० प्रतिशत लोगों की आय काफी ज्यादा है तो नीचे के १० प्रतिशत लोग लगभग भिखारी हैं और दिन-ब-दिन यह खाई घटने के बजाए बढती ही जा रही है. इसी तरह मानव विकास सूचकांक में भारत का स्थान दुनिया में १२९वां है जो काफी शर्मनाक स्थिति है. जहाँ कलाम साहब की परिकल्पना के अनुसार भारत में गरीबी २००८ में ही समाप्त हो जानी चाहिए थी दुर्भाग्यवश आज भी भारत के करीब ३२ प्रतिशत लोग यानि ३७ करोड़ लोग गरीब हैं जो दुनिया में सबसे बड़ी संख्या है और पूरी दुनिया के गरीबों की संख्या का एक तिहाई है. इसी तरह रोजगार के मोर्चे पर भी देश की हालत आज पहले से भी ख़राब है. औद्योगिक उत्पादन की स्थिति भी चिंतनीय है. जहाँ तक दुनिया के रंगमंच पर भारत के महत्व का सवाल है तो पीछे २० सालों में निश्चित रूप से भारत का महत्व बढ़ा है लेकिन आज भी न तो भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य बन पाया है और न ही हिंदी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बन पायी है.
मित्रों, इस तरह चाहे आर्थिक विकास हो या औद्योगिक विकास या फिर आर्थिक समानता आज भी भारत की स्थिति कमोबेश वैसी ही है जैसी २० साल पहले तब थी जब कलाम साहब ने विकसित भारत का सपना देखा था. इसके लिए हम किसी एक व्यक्ति या सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते क्योंकि कलाम साहब ने भी अपनी पुस्तक में सबके सम्मिलित योगदान का आह्वान किया था. उन्होंने शिक्षकों, बैंकरों, डॉक्टरों, प्रशासकों और अन्य सारे पेशेवरों, सरकारी मंत्रालयों और विभागों, केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, राज्यों के सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों, शोध और विकास प्रयोगशालाओं, उच्च अध्ययन की संस्थाओं, निजी क्षेत्र के बड़े उद्योगों, लघु-उद्योगों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, गैर-सरकारी संस्थाओं और मीडिया सबसे आह्वान किया था कि वे पूरे मनोयोग से इस दिशा में कार्य करें जिससे भारत २०२० तक विकसित राष्ट्र का दर्जा पा सके. परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं सका और आज भी कलाम साहब का सपना अधूरा है जिसके लिए हम उनके समक्ष क्षमाप्रार्थी है. हम समझते हैं कि आज देश के लिए चिंता करने वाले कलाम साहब जैसे लोग २० साल पहले के समय से और भी कम हो गए हैं. लोगों में मन में निजी स्वार्थ ने कहीं ज्यादा स्थान घेर लिया है और लोग जल्दीबाजी में धनवान बनने के लिए गर्हित से गर्हित कर्मों में पहले से कहीं ज्यादा संख्या में संलिप्त हो रहे हैं.

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

पुलवामा के अभागे शहीद



मित्रों, पुलवामा आतंकवादी घटना को एक साल बीत चुके हैं मगर वो वीभत्स दृश्य जैसे आँखों के आगे से हटने का नाम ही नहीं ले रहा है. चारों तरफ मांस के लोथड़े और खून. कौन-सा टुकड़ा किसका है पहचानना असम्भव. गाँव में लाशें तो आई लेकिन मांस के चंद टुकड़ों के रूप में. पूरे देश में क्रोध और देशभक्ति का तूफ़ान उठ खड़ा हुआ. लोग चाहते थे कि इसका बदला लिया जाए. आसमान से बम गिराकर बदले की कार्यवाही भी पूरी की गई. मोदी सरकार ने देश में पैदा हुए गुस्से से पूरा लाभ उठाया और दोबारा चुनाव जीत लिया.
मित्रों, फिर सबकुछ सामान्य हो गया और लगा जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो. धरती घूमती रही और देखते-देखते आज एक साल पूरा हो गया. देश के बांकी लोगों के लिए सबकुछ भले ही सामान्य हो लेकिन जिन परिवारों ने अपने बेटे खोए उनकी तो जैसे दुनिया ही उजड गई.
मित्रों, हमारे देश में सब बराबर हैं ऐसा आप और हम रोज पढ़ते हैं सुनते हैं लेकिन यह सिर्फ पढने और सुनने के लिए है. वास्तविकता तो यह है कि हमारे देश में न तो जीवित लोग बराबर हैं और न ही देश के लिए अपनी जान लुटानेवाले ही. अगर देश में सब बराबर होते तो देश के लिए अपनी जान न्योछावर करनेवाले अर्द्धसैनिकों को भी जल, थल और वायु सैनिकों की तरह शहीद का दर्जा मिलता. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सैनिक तो युद्ध होने पर ही मरते हैं जबकि अर्द्धसैनिक शांतिकाल में भी रोज अपनी जान देते हैं, पुलवामा में भी दी लेकिन उनको शहीद का दर्जा नहीं मिलता, पुलवामा के शहीदों को भी नहीं मिला. उनके परिजनों को पेंशन भी नहीं मिलेगा क्योंकि अब महान भारतवर्ष में पेंशन तो सिर्फ जल, थल, वायु सैनिकों के अलावे सिर्फ विधायकों और सांसदों को ही मिलती है. सालभर से पुलवामा के शहीद मुआवजे और पेंशन के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं. हर टेबल पर उनको दुत्कारा जाता है, मजाक उड़ाया जाता है, गालियाँ दी जाती हैं और रिश्वत माँगा जाता है. और सरकार कहती है कि मेरा देश बदल रहा है. कैसा बदलाव? काहे का बदलाव? जब पिछले ९० सालों में कुछ नहीं बदला तो अब एक साल में क्या बदलेगा?
मित्रों, किसी शायर ने अंग्रेजों के समय में कहा था कि शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले. लेकिन विडम्बना यह है कि न तो अंग्रेजों के समय शहीदों को शहीदों का दर्जा मिला और न ही अब मिल रहा है. तब भगत सिंह को नहीं मिला था और अब अर्द्धसैनिकों को नहीं मिल रहा. तब विदेशी सरकार थी अब देशी है. आजादी के बाद भी कुछ नहीं बदला. तब नेहरु ने सुभाष चन्द्र बोस को युद्ध अपराधी कहा था. फिर देशभक्तों की सरकार आई और २००५ में नेताओं और सैनिकों को छोड़कर सबको बिना पेंशन का कर दिया. जो सबसे ज्यादा जान देते हैं उन अर्द्धसैनिकों को भी उन्होंने बिना पेंशन का कर दिया. देशभक्तों की सरकार थी कोई कुछ बोलता भी तो कैसे? फिर नेताओं को तो पेंशन दे ही दिया था तो नेता भला क्यों विरोध करते? फिर उनके बच्चे शहीद तो होते नहीं. शहीद तो होते हैं गरीब किसानों और मजदूरों के बेटे. जो पहले अपनी जान देते हैं और बाद में उनके परिजन नेताओं के वादों का पुलिंदा लिए दफ्तरों में भटकते रहते हैं. यह सिलसिला चलता ही रहता है. फिर आतंकी घटना फिर शहादत और फिर दफ्तरों के चक्कर और रिश्वत. अभी तो २०१३ के शहीद हेमराज के परिजन ही भटक रहे हैं फिर पुलवामा को तो एक साल ही हुआ है. देश तो नहीं बदला रहा लेकिन देश में रिश्वत का स्वरुप जरूर बदल रहा है. अभी यूपी में रिश्वत खाकर ३० नेताओं और अधिकारियों को एचआईवी-एड्स हो गया. मेरा देश बदल रहा है, आगे चल रहा है. मेरा भारत महान.

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

दिल्ली के स्मार्ट वोटर


मित्रों, हिंदुस्तान के दिल दिल्ली का फैसला आ चुका है. हालाँकि आम आदमी पार्टी फिर से जीत गई है लेकिन उसके और भाजपा के बीच वोटों का फासला कम हुआ है. जो लोग इस समय दिल्ली के मतदाताओं को गालियां देने में लगे हैं वो नादान है. ऐसे लोगों के बारे में बस इतना ही कहा जा सकता है कि नाच न जाने आँगन टेढ़ा. जो नेता और दल जनता को बन्दर और खुद को मदारी समझते हैं उनको समझ लेना चाहिए कि २१वीं सदी में जनता बन्दर नहीं है मदारी है और बन्दर नेता हैं. दिल्ली का सबक अगर कुछ है तो पहला सबक यह है कि अब जनता नाचेगी नहीं नचाएगी. 
मित्रों, दूसरी बात केजरीवाल इस बात को समझ गये कि किसको क्या चाहिए. उदहारण के लिए महिलाओं को क्या चाहिए, जनता को क्या चाहिए, मुसलमानों को क्या चाहिए और हिन्दुओं को क्या चाहिए. जिसको जो चाहिए था उसको केजरीवाल ने वो सब दे दिया. जो लोग दिल्लीवालों को मुफ्तखोर बता रहे हैं उनको भी यह समझ लेना चाहिए कि बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ देना सरकार का कर्त्तव्य है.
मित्रों,भाजपा ने यह नहीं समझा कि पूर्वांचली सिर्फ गीत सुनकर वोट नहीं दे देंगे. फिर मनोज तिवारी को भाजपा ने कुछ ज्यादा ही काबिल समझ लिया जबकि वे काबिल नहीं हैं बल्कि कबिलफचाक हैं. मतलब कि वे खुद को बहुत ज्यादा काबिल समझते हैं.
मित्रों, इसके साथ ही केजरीवाल ने अपने कोर मतदाताओं को हमेशा परवाह की जबकि भाजपा ने कभी अपने कोर वोटर्स की परवा नहीं की और फ्लोटिंग वोटर्स के पीछे भागती रही.  बिहार के एक बहुत बड़े नेता शिवानन्द तिवारी ने वर्षों पहले भाजपा के सबसे पक्के समर्थक बड़ी जाति के मतदाताओं के बारे कहा था कि उनके लिए कुछ भी करने की जरुरत नहीं है सिर्फ देश और राज्य विकास को देखकर ही वोट दे देंगे. इस दिल्ली चुनाव में भी भाजपा को ज्यादातर वोट उनके ही मिले लेकिन भाजपा दलितों और मुसलमानों के पीछे भागती रही. तीन तलाक का असर दिल्ली में नहीं दिखा. उल्टे मुस्लिम महिलाएं भाजपा के खिलाफ ज्यादा उग्रता थीं. दलितों ने भी भाजपा को वोट नहीं दिया. 
मित्रों, भाजपा की एक और आदत काफी बुरी है और वो आदत है यूज एंड थ्रो. शाहीन बाग़ के साथ आप पार्टी शुरू से अंत तक खड़ी थी लेकिन दूसरी तरफ भाजपा कभी अपने समर्थकों का साथ नहीं देती. क्या कभी भाजपा ने कहा है कि वो गोरक्षकों के साथ है? मोदी की जान बचाने में कोई बंजारा जेल चला जाता है और भाजपा उसे उसके हाल पर मरने छोड़ देती है. साथ ही भाजपा ने अपने साईबर योद्धाओं के लिए कभी कुछ नहीं किया है? अभी-अभी मोदीजी ने लोकसभा में एक शेर पढ़ा था कि खूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं, साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं. जाहिर है कि यह शेर अगर किसी पर सबसे ज्यादा लागू होती है तो तो खुद भाजपा है.
मित्रों, आजादी के बाद कांग्रेस की सबसे बड़ी गलती थी कि उसने सामाजिक कार्यक्रम बंद कर दिया. भाजपा इस मामले में भाग्यशाली रही कि उसके लिए वही काम आरएसएस करता रहा लेकिन अब भाजपा को समझ लेना होगा कि सिर्फ आरएसएस के सामाजिक कार्यक्रमों से काम नहीं चलने वाला. बल्कि भाजपाइयों को भी एसी से बाहर आकर सडकों पर पसीना बहाना पड़ेगा. सिर्फ फोटो खिंचवाने के स्थान पर वास्तव में स्वच्छता कार्यक्रम चलाना पड़ेगा. झुग्गी-झोपड़ियों में जाकर, दलितों की बस्तियों में जाकर लोगों की समस्याओं को दूर करना पड़ेगा. साथ ही पूरे देश में जहाँ-जहाँ उसकी सरकार हैं पुलिस, स्वास्थ्य और शिक्षा को भ्रष्टाचारमुक्त बनाना पड़ेगा. दिल्ली में भी भाजपा के हाथों में अभी भी बहुत कुछ है. केंद्र की सरकार उसकी है और दिल्ली नगरपालिका पर भी दशकों से उसका कब्ज़ा है. भाजपा को चाहिए कि वो नगरपालिका के काम-काज में फैली भ्रष्टाचाररुपी गंदगी को साफ़ करे.
मित्रों, अंत में एक छोटी मगर मोती बात. दरअसल दिल्ली के मतदाता भारत के सबसे स्मार्ट मतदाता हैं. वे भाजपा को लोकसभा और नगरपालिका के लायक तो समझते हैं लेकिन विधानसभा के लायक नहीं समझते. वहीँ दूसरी तरफ वे आप को विधानसभा के लायक तो समझती है लेकिन लोकसभा और विधानसभा के लायक नहीं समझती. पता नहीं आगे आनेवाले चुनावों में दिल्ली की जनता का क्या निर्णय हो. हो सकता है कि वो आप को लोकसभा और नगरपालिका के लायक समझ ले या फिर भाजपा को विधानसभा के लायक. लेकिन इसके लिए दोनों को दिल्ली की जनता के मानदंडों पर खरा उतरना पड़ेगा.

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

उफ्फ ये बिहार के बदमाश चूहे


मित्रों, लड़कपन में शिक्षक की पिटाई से बचने के लिए आपने भी बहाने बनाए होंगे. हमने भी बनाए थे. कई बार जब हम गृह कार्य पूरा नहीं कर पाते थे तो जानबूझकर कॉपी घर पर ही छोड़ आते थे और फिर विद्यालय में कह देते थे कि गृह कार्य तो कर लिया था मगर कॉपी घर पर छूट गयी. लेकिन आजकल के बच्चे तो २१वीं सदी के बच्चे ठहरे इसलिए उनके बहाने ज्यादा प्रोन्नत होते हैं. हमने पिछले दिनों एक बच्ची को देखा कि उसने अपनी ऊंगली में बेवजह पट्टी बंधवा ली. पूछताछ पर पता चला कि उसने गृहकार्य नहीं किया था.
मित्रों, ये तो बात ठहरी लड़कपन की लेकिन बिहार में तो प्रशासन अपनी गलतियां और भ्रष्टाचार छिपाने के लिए अजीबोगरीब बहाने बना रही है. कुछ महीने पहले प्रशासन ने आरोप लगाया था कि जब्त की गई लाखों बोतल शराब पुलिस के मालखाने में चूहे पी गए. जिसने भी सुना सन्न रह गया. घोड़ों, वनमानुषों के बारे में तो हमने भी सुना है कि वे शराब पीते हैं लेकिन चूहों के बारे में कभी नहीं सुना. मैं समझता हूँ कि चूहों पर इस तरह के आरोप लगानेवाले निश्चित रूप से गणेश जी के महान भक्त रहे होंगे.  तभी तो उन्होंने इस तरह अधिकारपूर्वक उनकी सवारी को कागजों में ही सही शराबी बना दिया.
मित्रों, कागजों से याद आया कि अभी दो दिन पहले भी बिहार में एक बार फिर से चूहों पर गंभीर और संगीन आरोप लगाया गया है. आरोप एक बार फिर से प्रशासन ने ही लगाया है. आरोप है कि बिहार में नौकरी करनेवाले १ लाख शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े कागजात चूहों ने चट कर लिए हैं. दरअसल बिहार में शिक्षकों की बहाली में जमकर धांधली करने के आरोप हैं. आरोप है कि बिहार में लाखों ऐसे शिक्षक कार्यरत हैं जिनके प्रमाणपत्र नकली हैं. अब प्रशासन किस पर आरोप लगाता? जब बचने का कोई उपाय नहीं सूझा तो उनको मूषकराज की याद आई और उन्होंने सीधे-सीधे चूहों को न्याय के कटघरे में खड़ा कर दिया.
मित्रों, कहने का मल्लब यह कि जब कोई रिकॉर्ड ही नहीं है तो कोई गड़बड़ी भी नहीं हुई और सबकुछ पाकसाफ़ था. इसी तरह आपने देखा होगा कि जब चुनाव आते हैं तो विभिन्न मंत्रालयों में अचानक शार्ट-सर्किट होने लगती है और सारी भ्रष्ट फाईलें जलकर राख हो जाती हैं. समर्थ व्यक्ति तो भ्रष्ट हो नहीं सकता इसलिए मैंने यहाँ फाईलों को भ्रष्ट कहा. एक बार फाईलें जल गईं तो भ्रष्टाचार भी समाप्त हो गया और सबकुछ पवित्र हो गया. तात्पर्य यह कि कई बार भ्रष्टाचार मुक्त शासन-प्रशासन कायम करने के लिए अग्नि देवता की सहायता ली जाती है तो कई बार छायावादी कवियों को मीलों पीछे छोड़ते हुए चूहों का मानवीकरण कर दिया जाता है. कई बार वरुण देवता की कृपा से भी भ्रष्टाचार दूर किया जाता है. कह दिया जाता है कि बाढ़ आई थी और सारी फाईलों को अपने साथ बहा ले गई.
मित्रों, लड़कपन में मैं समझ नहीं पाता था कि हम गणेश जी के साथ चूहों की पूजा क्यों करते हैं? जब बिहार सरकार ने पटना उच्च न्यायालय में अपने जवाब में लिखा कि चूहे शराब पी गए और फाईलें खा गए तब समझा कि चूहे तो सचमुच अतिपूजनीय हैं. इसी तरह अग्नि और वरुण देवता को भी शत-शत नमन है जो सुशासन को सचमुच का सुशासन बनाने में भ्रष्ट फाईलों को नष्ट कर अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. सचमुच अपना बिहार लाजवाब है! इसका कुछ भी नहीं हो सकता. यह अलग बात है कि लालू जी समय रहते चूहों, अग्नि देव और वरुण देव की मदद नहीं ले पाए इसलिए बेचारे रांची के रिम्स में जेल में रहते हुए स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं. लेकिन नीतीश जी ठहरे दिमागवाले इसलिए वे तो पकड़ में आने से रहे भले ही जनता को लग रहा हो कि इनके समय में भ्रष्टाचार लालू जी के समय से कहीं ज्यादा है और कहीं ज्यादा बड़े-बड़े घोटाले हो चुके हैं. तो इंतजार करिए कि आगे बिहार के चूहों पर यहाँ की सरकार कौन-सा नया आरोप लगानेवाली है. समझ में नहीं आता कि जबकि आर्थिक सर्वेक्षण और बजट कह रहे हैं कि बिहार में भोजन पूरे भारत में सबसे सस्ता है तो बिहार के चूहों तो फाईलें खाकर भूख मिटाने की आवश्कता क्यों आन पड़ी?

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

भारतीय राजनीति का काला नाग अरविन्द केजरीवाल


मित्रों, दुर्भाग्यवश आजादी के बाद से ही भारत में फर्जी हिन्दू नेताओं की कोई कमी नहीं रही है. पंडित जवाहरलाल नेहरु से शुरू हुई यह परंपरा समय के साथ पल्लवित और पुष्पित होती रही है. कांग्रेस में ऐसे नेताओं की लम्बी सूची है जो वास्तव में ईसाई धर्म में दीक्षित हो चुके हैं लेकिन अपना नाम हिन्दुओं वाला ही रखा है. इन नेताओं के पास बस दो ही काम हैं-एक कैसे हिन्दू धर्म के मूलोच्छेदन का मार्ग प्रशस्त किया जाए और दूसरा कैसे मुसलमानों को खुश करते हुए भारत में इसाई धर्म की पताका लहराई जाए.
मित्रों, ऐसे ही रंगे सियारों में से एक हैं दिल्ली के निवर्तमान मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल जिन्होंने भारत की राजधानी दिल्ली को पाकिस्तान बनाकर रख दिया है. मस्जिदों के मौलवियों को वेतन और मंदिरों के पुजारियों को चवन्नी तक नहीं ऐसा शायद पाकिस्तान में भी न होता होगा. क्या केजरीवाल दिल्ली को शरिया कानून के माध्यम से चलाना चाहता है? कहना न होगा कि इस नराधम ने भी अपना नाम हिन्दुओं वाला ही रख रखा है लेकिन इसका पूरा जीवन हिन्दूविरोधियों के सानिध्य में गुजरा है. इसने एक लम्बे समय तक इसाई संस्था मिशनरिज ऑफ़ चैरिटी में काम किया है. मुझे पक्का विश्वास है कि ये उसी समय इसाई बन गया था. भौतिक रूप से नहीं तो मानसिक रूप से तो जरूर.
मित्रों, फिर इसने भी एक एनजीओ बनाया और उसके जरिए अपने हिन्दूविरोधी और भारतविरोधी एजेंडे को आगे बढाया. इसने अपने इर्द-गिर्द तमाम साम्यवादी-माओवादी और इसाई एनजीओ को जमा किया और तत्पश्चात सुदूर महाराष्ट्र के एक बूढ़े गांधीवादी अन्ना हजारे को आगे करके भ्रष्टाचार के खिलाफ एक लिफाफा आन्दोलन छेड़ दिया. उस दौरान इसने अपने बच्चों के सर पर हाथ रखकर कसम खाई कि ये कभी भी राजनीति में नहीं आएगा लेकिन ये राजनीति में भी आया और दिल्ली की जनता को बरगलाकर वहां का मुख्यमंत्री भी बन गया. इस बीमार मानसिकतावाले व्यक्ति का पिछले ५ वर्षों में दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में बस एक ही एजेंडा रहा कि फ्री बिजली-पानी देकर हिन्दुओं को लोल्ली-पॉप पकड़ा दो और दिल्ली को मिनी पाकिस्तान बना दो. जब-जब भी कोई निर्दोष हिन्दू मुसलमानों की बर्बरता का शिकार हुआ तो यह उनसे मिलने तक नहीं गया और जब एक मुसलमान ने हिन्दू लड़की के साथ बलात्कार किया और लोहे की छड उसके गुप्तांग में डालकर उसकी अंतड़ियाँ बाहर निकाल डालीं तब इसने उसे सिलाई मशीन और पैसे देकर पुरस्कृत किया मानों उसने बहुत ही प्रशंसनीय कृत्य किया हो. जब भी कोई मुसलमान हिन्दुओं द्वारा की गई जवाबी कार्रवाई में मारा गया इसने वहां पहुँचने में क्षण-मात्र की भी देर नहीं लगाई और उनके परिजनों को नौकरी और धन देने की तत्काल घोषणा कर डाली. यहाँ तक कि इसने कुर्सी के लिए दिल्ली के मुसलमानों के हाथों में पत्थर थमा दिया और पूरी दिल्ली को दंगों की आग में झोंक डाला. उस पर अति यह कि इसने पुलिस फायरिंग में या आपसी फायरिंग में मारे गए मुसलमानों के परिजनों को भी नौकरी और पैसे दे डाले जैसे दिल्ली भारत में नहीं पाकिस्तान में हो.
मित्रों, सवाल उठता है कि क्या दिल्ली की हिन्दू जनता ऐसे काले नाग को फिर से दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाएगी जो दिल्ली को कश्मीर बना देना चाहता है? आखिर फ्री बिजली-पानी के अलावा केजरीवाल ने दिल्ली में किया ही क्या है और कौन-से वादे को पूरा किया है? दूसरी तरफ इसकी सरकार में किए गए घोटालों की लिस्ट काफी लम्बी है. अब तो इसने मंत्रालयों में आग लगाकर घोटालों के सबूतों को जलाना भी शुरू कर दिया है. इसलिए समय आ गया है जब भारतीय राजनीति के इस काले नाग के फन को समय रहते कुचल दिया जाए अन्यथा ऐसा न हो कि दिल्ली में हिन्दुओं का जीना और हिन्दू लड़कियों का घर से बाहर निकलना दूभर हो जाए. यकीन न हो तो शाहीन बाग़ की स्थिति को देख लीजिए.
 

बुधवार, 15 जनवरी 2020

बिहार में भी लागू हो एनआरसी

मित्रों, बात पुरानी है. १९९४-९५ की. उन दिनों मैं कटिहार जिले के कोढ़ा प्रखंड के फुलवरिया में रहता था और अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती करवाता था. उन दिनों मेरे चचेरे नाना जी कैलाश बाबू की जमीन एक पास के ही गाँव का मुसलमान जोता करता था. नाम था मोहम्मद इस्राईल. अक्सर वो मेरे पास भी बैठ जाया करता था. बातचीत के दौरान ही उसने बताया था कि वो बंगलादेशी मुसलमान है और हाल ही में वहां आया है. उसने यह भी बताया कि धीरे-धीरे उसने अपने पूरे खानदान सारे चाचा, मामा, मौसा, बहनों और बहनोईयों को भी कोढ़ा बुला लिया है. उन दिनों वहां के एनएच ३१ के किनारे के गड्ढों में बहुत सारी झोपड़ियाँ बन रही थीं और वे सारी बंगलादेशी घुसपैठियों की थीं. उस समय मैं कई बार कोढ़ा से बस द्वारा कटिहार गया था और देखा था कि सड़क किनारे बहुत-सी मस्जिदें बन चुकी थीं और बन रही थीं.
मित्रों, उस समय भाजपा और उसके आनुषंगिक संगठन बंगादेशी घुसपैठ को लेकर काफी मुखर और उग्र हुआ करते थे. लेकिन इसे राजनीति की माया कहें या सत्ता का लालच आजकल भाजपा के बिहारी नेताओं की जुबान ही नहीं खुलती. बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार बार-बार कह रहे हैं कि बिहार में एनआरसी यानि नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजनशिप को लागू नहीं किया जाएगा लेकिन बिहार भाजपा जो उनकी सरकार में शामिल है के लोगों की तो जैसे जुबान ही सिल गई है मानों मो. इस्राईल समेत सारे बांग्लादेशी घुसपैठी बिहार छोड़कर चले गए हों.
मित्रों, विभिन्न संस्थाओं एवं मीडिया के मोटे अनुमान के मुताबिक़, भारत में दस करोड़ से भी ज्यादा बंगलादेशी घुसपैठिए बस गए हैं और इनमें से ८० प्रतिशत सिर्फ बिहार,बंगाल,असम और झारखण्ड में हैं. एक अनुमान के अनुसार सिर्फ बिहार में १ करोड़ से ज्यादा बंगलादेशी हैं. 2006 में चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में ऑपरेशन क्लीन भी चलाया था. 23 फरवरी 2006 तक अभियान चला और 13 लाख नाम काटे गए. हालांकि चुनाव आयोग फिर भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं था और उसने केजे राव की अगुवाई में मतदाता सूची की समीक्षा के लिए अपनी टीम भेजी. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन राज्य सचिव अनिल विश्वास ने कहा था, उन्हें सैकड़ों पर्यवेक्षक भेजने दीजिए, अब कोई भी क़दम हमें जीतने से नहीं रोक सकता. इस बयान से अंदाज़ा लगाया गया कि माकपा को अपने समर्पित वोट बैंक पर कितना भरोसा रहा है. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि वाममोर्चा के सत्ता में आने के समय से ही मुस्लिम घुसपैठियों को वोटर बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई. उस समय ममता बनर्जी इस मुद्दे पर काफी मुखर थी और उन्होंने कहा था कि राज्य में दो करोड़ बोगस वोटर हैं. पर अब ममता मुख्यमंत्री बनने के बाद एनआरसी विरोधी हो गई हैं क्योंकि उन्हें भी सिर्फ बंगाल की कुर्सी दिख रही है देश दिखाई नहीं दे रहा.
मित्रों, 1991 की जनगणना में सा़फ दिखा कि असम एवं पूर्वोत्तर के राज्यों के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती ज़िलों की जनसंख्या भी कितनी तेज़ी से बढ़ी. एक मोटे अनुमान के मुताबिक़, प. बंगाल के सीमावर्ती ज़िलों के क़रीब 17 प्रतिशत वोटर घुसपैठिए हैं, जो कम से कम 56 विधानसभा सीटों पर हार-जीत का निर्णय करते हैं, जबकि असम की 32 प्रतिशत विधानसभा सीटों पर वे निर्णायक हालत में हैं. असम में भी मुसलमानों की आबादी 1951 में 24.68 प्रतिशत से 2001 में 30.91 प्रतिशत हो गई, जबकि इस अवधि में भारत के मुसलमानों की आबादी 9.91 से बढ़कर 13.42 प्रतिशत हो गई. 1991 की जनगणना के मुताबिक़, इसी दौरान बंगाल के पश्चिम दिनाजपुर, मालदा, वीरभूम और मुर्शिदाबाद की आबादी क्रमशः 36.75, 47.49, 33.06 और 61.39 प्रतिशत की दर से बढ़ी. सीमावर्ती ज़िलों में हिंदुओं एवं मुसलमानों की आबादी में वृद्धि का बेहिसाब अनुपात घुसपैठ की ख़तरनाक समस्या की ओर इशारा करता है. 1993 में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री ने भी लोकसभा में स्वीकार था कि 1981 से लेकर 1991 तक यानी 10 सालों में ही बंगाल में हिंदुओं की आबादी 20 प्रतिशत की दर से बढ़ी, तो मुसलमानों की आबादी में 38.8 फीसदी का इज़ा़फा हुआ. 1947 में बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी 29.17 प्रतिशत थी, जो 2001 में घटकर 2.5 प्रतिशत रह गई. सबूत तमाम तरह के हैं. 4 अगस्त, 1991 को बांग्लादेश के मॉर्निंग सन अख़बार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, एक करोड़ बांग्लादेशी देश से लापता हैं. छह मई 1997 में संसद में दिए बयान में तत्कालीन गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्ता ने भी स्वीकार किया था कि देश में एक करोड़ बांग्लादेशी हैं।
मित्रों, 2001 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या 1.5 करोड़ थी. सीमा प्रबंधन पर बने टास्क फोर्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, हर महीने तीन लाख बांग्लादेशियों के भारत में घुसने का अनुमान है. केवल दिल्ली में 13 लाख बांग्लादेशियों के होने की बात कही जाती है, हालांकि अधिकृत आंकड़ा चार लाख से कम ही बताता है. भारत-बांग्लादेश सीमा का गहन दौरा करने वाले लेखक वी के शशिकुमार ने इंडियन डिफेंस रिव्यू (4 अगस्त, 2009) में छपे अपने लेख में बताया कि किस तरह दलालों का गिरोह घुसपैठ कराने से लेकर भारतीय राशनकार्ड और वोटर पहचानपत्र बनवाने तक में मदद करता है. दक्षिण दिनाजपुर के हिली गांव में भारत-बांग्लादेश सीमा पर कुछ दीवारें बनाई गई हैं, कोई नहीं जानता कि इन्हें किसने बनाया है, पर यह समझने में मुश्किल नहीं है कि यह तस्करों के गिरोह की करतूत है. वहां सुबह से शाम तक तस्करी और घुसपैठ जारी रहती है. घुसपैठिए ज़्यादा से ज़्यादा गर्भवती महिलाओं को सीमा पार कराते हैं और उन्हें किसी भारतीय अस्पताल में प्रसव कराकर उसे जन्मजात भारतीय नागरिकता दिलवा देते हैं. इस काम में दलाल और उनके भारतीय रिश्तेदार भी मदद करते हैं. मालूम हो कि सीमा के क़रीब रहने वाले लोगों में परंपरागत रूप से अब भी शादी-ब्याह का रिश्ता चलता है. यही नहीं, कुंआरी लड़कियों को बिहार, उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में दुल्हनों के तौर पर बेच दिया जाता है. कई दलाल तो शादी कर उन्हें कोठे पर पहुंचा देते हैं. सीमा से लगी ज़मीन की ऊंची क़ीमतों से भी साबित होता है कि घुसपैठ एवं तस्करी को स्व-रोज़गार का कितना बड़ा साधन बना लिया गया है. इतना ही नहीं,14 जुलाई, 2002 को संसद में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने एक सवाल के जवाब में बताया था कि भारत में 10 करोड़ 20 लाख 53 हज़ार 950 अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं. इनमें से केवल बंगाल में ही ३ करोड़ हैं. इलीगल इमिग्रेशन फॉम बांग्लादेश टू इंडिया : द इमर्जिंग कन्फिल्क्ट के लेखक चंदन मित्रा ने पुस्तक में पश्चिम बंगाल के साथ असम में भी बांग्लादेशी घुसपैठियों से जुड़ी गतिविधियों एवं कार्रवाइयों का पूरा ब्यौरा दिया है. वह लिखते हैं, सच कहें तो पश्चिम बंगाल बांग्लादेशी घुसपैठियों का पसंदीदा राज्य बन गया है. 2003 में मुर्शिदाबाद ज़िले के मुर्शिदाबाद-जियागंज इलाक़े के नागरिकों को बहुउद्देशीय राष्ट्रीय पहचानपत्र देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा पायलट प्रोजेक्ट के लिए चुना गया. इसमें भारतीय नागरिकों और ग़ैर-नागरिकों की पहचान तय करनी थी. हालांकि अंतिम रिपोर्ट अभी सौंपी जानी है, पर अंतरिम रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ. इस प्रोजेक्ट के दायरे में आने वाले 2,55,000 लोगों में से केवल 24,000 यानी 9.4 प्रतिशत लोगों के पास भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कम से कम एक दस्तावेज़ था. 90.6 प्रतिशत या 2,31,000 लोग निर्धारित 13 दस्तावेज़ों में से एक भी नहीं पेश कर पाए. आख़िर में इन्हें संदिग्ध नागरिकता की श्रेणी में डालकर छोड़ दिया गया.
मित्रों, यहाँ हम आपको बता दें कि असम के मंगलदोई संसदीय क्षेत्र में 1979 में हुए उपचुनाव में महज दो साल के दरम्यान 70 हजार मुस्लिम मतदाता बढऩे के बाद पहली बार देश में बांग्लादेशी घुसपैठ का मामला प्रकाश में आया था, लेकिन बिहार के लिए भी यह कोई नया मुद्दा नहीं है। 1980 में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक बालाजी देवरस बिहार दौरे पर आए थे। तब समस्तीपुर की सभा में पूर्णिया एवं  किशनगंज के स्वयंसेवकों ने उन्हें इसकी जानकारी दी थी. इसके बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के महामंत्री की हैसियत से सुशील कुमार मोदी ने सीमांचल के जिलों का सघन दौरा किया था। उन्होंने 1983 में गुवाहाटी हाईकोर्ट के सामने जजेज फील्ड और इसके कुछ दिनों बाद पूर्णिया में बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ प्रदर्शन का नेतृत्व भी किया था। तब मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने इस पर-'क्या बिहार भी असम बनेगा' पुस्तक भी लिखी थी। इसके बाद पूर्व विधान पार्षद और भाजपा नेता हरेंद्र प्रताप ने भी सीमांचल के इलाके में 1961 से लेकर 1991 की जनगणना के आंकड़ों के आधार बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या को लेकर 'बिहार पर मंडराता खतरा' नाम से  किताब लिखी, जिसका 2006 में विमोचन करने भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह पटना आए थे। 1985 के बाद हर चुनाव बिहार में भाजपा के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों का मामला एक मुद्दा रहा है। इसी के बल पर पार्टी को इस इलाके में हर चुनाव में सफलता भी मिलती रही है। कटिहार लोकसभा सीट से भाजपा के निखिल चौधरी के 1999, 2004 और 2009 में लगातार चुनाव जीतने, पूर्णियां 1998 में भाजपा के जयकृष्ण मंडल और 2004 और 2009 में उदय सिंह की जीत तथा अररिया में 98 में रामजी ऋषिदेव, 2004 में सुखदेव पासवान और 2009 में भाजपा के प्रदीप सिंह की जीत के पीछे कहीं न कहीं यह मुद्दा भी कारण रहा है। पार्टी नेताओं की राय है कि इस इलाके में मुस्लिम जनसंख्या में तेजी से हो रही वृद्धि का प्रमुख कारण बांग्लादेशी घुसपैठ है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का अभी भी कहना है कि बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या केवल असम तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल और बिहार भी इससे अछूते नहीं हैं। इसे जाति और धर्म से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
मित्रों, अगर हम 1991 की बिहार की जनगणना पर एक नजर डालें तो उस समय बिहार में हिन्दू आबादी 82.77 प्रतिशत थी और मुस्लिम आबादी 11.02 प्रतिशत. परन्तु 2011 की जनगणना के अनुसार हिन्दू आबादी 79.79 प्रतिशत रह गई और मुस्लिम आबादी 14.22 प्रतिशत हो गई. मतलब कि मुस्लिम आबादी 3.02 प्रतिशत बढ़ गई और हिन्दू आबादी उसी अनुपात में घट गई.  बिहार के सीमावर्ती जिलों में अररिया में 1971 में मुस्लिम आबादी 36.52 प्रतिशत थी जो 2011 में मुस्लिम आबादी 42.94 प्रतिशत हो गई अर्थात मुस्लिम आबादी में 6.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई. इसी तरह कटिहार में 1971 में मुस्लिम आबादी 36.58 प्रतिशत थी जो 2011 में बढ़कर 44.46 प्रतिशत हो गई अर्थात मुस्लिम आबादी में वृद्धि 7.88 प्रतिशत की रही.  इसी प्रकार पूर्णिया जिले में 1971 में मुस्लिम आबादी 31.93 प्रतिशत थी जो 2011 में बढ़कर 38.46 प्रतिशत हो गई यानि मुस्लिम आबादी में वृद्धि 6.53 प्रतिशत रही जो किसी भी तरह से सामान्य नहीं कही जा सकती।
मित्रों, स्वयं संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछली जनगणना में बांग्लादेश से एक करोड़ लोग गायब हैं। सवाल उठता है कि आखिर ये लोग गए कहाँ? इनको धरती निगल गई या आसमान खा गया. अगर मुसलमानों ने १९४७ में अपने लिए अलग देश नहीं लिया होता तब तो कोई बात नहीं थी लेकिन जब उनको धार्मिक आधार पर अलग देश दे दिया गया है तब भारत क्यों घुसपैठ की समस्या को झेले? इस समस्या का सबसे दुखद पहलू तो यह है कि बिहार और बंगाल के जो नेता विपक्ष में होते हुए कभी बांग्लादेशी घुसपैठियों को तत्काल निकाल-बाहर करने की मांग कर रहे थे इन दिनों वही सत्ता के लालच में एनआरसी का मुखर विरोध कर हिन्दू मतदाताओं और देशहित के साथ धोखा कर रहे हैं जिन्होंने उनको पहली बार जब से सत्ता में आए थे तब वोट दिया था. यह कितनी बड़ी विडंबना है कि अब जब वे नेता सत्ता में काबिज हो गए हैं तब उनको हिन्दुओं की भावनाओं से कुछ भी लेना-देना नहीं है और उनके लिए मुस्लिम वोट ही सबकुछ हो गया? यहाँ तक कि बिहार में भाजपा भी नीतीश कुमार के मिथ्या प्रलापों के आगे मूकदर्शक बनी बैठी है जो हिन्दुओं की एकमात्र पार्टी है. बिहार के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि बिहार में एनआरसी लागू नहीं होना चाहिए? मैं उनसे पूछता हूँ क्यों नहीं होना चाहिए? क्या वे ऐसा दावे के साथ कह सकते हैं कि बिहार में कोई बांग्लादेशी घुसपैठी नहीं है? अगर उनको अपने ऊपर और अपने महाभ्रष्ट तंत्र के ऊपर इतना ही भरोसा है तो क्यों नहीं वे बिहार में एनआरसी लागू करके दूध का दूध और पानी का पानी हो जाने देते हैं (हालाँकि अभी एनआरसी अभी आई नहीं है)? आखिर इस समस्या पर किताब लिखनेवाले सुशील कुमार मोदी कुछ बोल क्यों नहीं रहे? क्या इस ठण्ड में उनको भी पाला मार गया है?

गुरुवार, 9 जनवरी 2020

राजनीति की बिसात पर दलित

मित्रों, जबसे अपना देश आजाद हुआ है तभी से विभिन्न राज्यों में तरह-तरह के राजनैतिक समीकरण बनते-बिगड़ते रहे हैं और देश की चुनावी राजनीति में दलितों की भूमिका महत्वपूर्ण होती गई है. खासकर उत्तर भारत में काशीराम और मायावती के पदार्पण के बाद से दलित जिसकी तरफ होते हैं विजयश्री उसी को मिलती है. ऐसे में स्वाभाविक है कि विभिन्न दल लगातार दलितों को अपने पक्ष में करने के प्रयास करते रहते हैं.
मित्रों, कुछ विघ्नसंतोषियों का शुरू से ही यह प्रयास रहा है कि दलितों को बांकी हिन्दुओं से किस प्रकार अलग-थलग करके उसका राजनैतिक लाभ उठाया जाए. प्रारंभ में वामपंथियों ने साहित्य में एक अलग धारा दलित साहित्य के नाम से बनाने और बहाने का प्रयास किया. इस धारा के लोग लगातार यह साबित करने में लगे रहते थे कि सवर्णों ने दलितों पर बेईन्तहा जुल्म ढाहे हैं. पता नहीं इस धारा के लोग कौन-सा इतिहास पढ़कर आए थे. उन लेखकों में कई सारे मुसलमान भी थे जो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बने हुए थे. मैं पूछता हूँ कि ११९२ ई. के बाद से जब देश की बागडोर मुसलमानों के हाथों में चली गयी तो न जाने सवर्णों ने कब जुल्म किया? वो बेचारे तो खुद ही जुल्म के शिकार थे. वर्तमान में पाकिस्तान में जो दलितों के साथ हो रहा है क्या उसके लिए भी सवर्ण ही जिम्मेदार हैं? समाज में छुआछुत का प्रचलन जरूर था लेकिन वह उस युग की सीमा थी,युगधर्म था. जैसे-जैसे आधुनिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ यह कम होता गया और अब कहीं पर भी इसका नामोनिशान नहीं है.
मित्रों, मध्य प्रदेश,पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान से जरूर अभी भी ऐसी इक्का-दुक्का घटनाओं की खबरें आती रहती हैं जिन्हें दुर्भाग्यपूर्ण कहा जा सकता है. जैसे दलित को घोड़े पर चढ़ने से रोकना, बारात को रोक देना आदि. लेकिन इसके साथ ही ऐसी ख़बरें भी आती हैं जिनमें किसी राजपूत या जाट ने अपनी घोड़ी पर बिठा कर गाँव के दलित की बेटी के बारात निकलवाई तथापि मीडिया में ऐसी ख़बरों को दबा दिया जाता है. जहाँ तक मंदिरों में पूजा करने का सवाल है तो अब किसी भी मंदिर में दलितों को पूजा करने से रोका नहीं जाता बल्कि बिहार में तो बड़े-बड़े मंदिरों में दलितों को ही मुख्य पुजारी बना दिया गया है.
मित्रों, दुर्भाग्यवश आपसी रंजिश में घटित हिंसक घटनाओं को भी मीडिया और नेताओं द्वारा जातीय बना दिया जाता है. मीडिया में इन दिनों यह ट्रेंड भी देखने को मिलता है कि जब भी दलितों का झगडा पिछड़ों या सवर्णों से होता है तो मीडिया और कथित दलित राजनेता उसे तुरंत लपक लेते हैं लेकिन जब मुसलमान दलितों के खिलाफ हिंसा करते हैं तब मामले को दबाने की कोशिश की जाती है. कुछ ऐसा ही प्रयास अभी पाकिस्तान और बांग्लादेश से भारत आए हिन्दुओं को लेकर भी किया जा रहा है.
मित्रों, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि जब हमारे देश का बंटवारा हुआ तब जो हिन्दू पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में रह गए लगभग वे सारे-के-सारे दलित थे. उन पर १९४७ से ही वहां के मुसलमान भयंकर अत्याचार कर रहे हैं. वहां उनको कोई कानूनी या राजनैतिक संरक्षण प्राप्त नहीं है. उल्टे मुसलमानों ने जब जी चाहा उनकी बालिग-नाबालिग लड़कियों को उठा लिया और जबरन उनका धर्म बदलकर शादी कर दी. वहां की पुलिस और अदालत भी अपहर्ताओं का ही साथ देती है इसलिए बेचारे दलित हिन्दू के पास मन मसोसकर रह जाने और अंत में भारत आने के सिवा और कोई उपाय शेष नहीं रह जाता. और जब भारत सरकार ने इन हिन्दुओं को भारत की नागरिकता देने की ठानी है तो कई दलित नेता भी बेवजह इसका विरोध करते हैं. आश्चर्य होता है कि मायावती और चंद्रशेखर रावण जैसे राजनेता जिनकी पूरी राजनीति दलितों पर आधारित है वे लोग कैसे इस कानून का विरोध कर सकते हैं? तो क्या उनका दलित प्रेम ढोंग मात्र नहीं है? आखिर क्यों रामविलास पासवान को टिकट बांटते समय अपने परिवार से बाहर का कोई दलित दिखाई नहीं देता?
मित्रों, पिछले कुछ सालों से मैं देख रहा हूँ कि ओवैसी भी दलित-दलित की रट लगाए हुए है और डीएम समीकरण यहाँ दलित-मुसलमान समीकरण की बात कर रहा है लेकिन वो भी सीएए का विरोध कर रहा है. तो क्या दलित इतने मूर्ख हैं या अन्धे हैं कि उनको यह सब नहीं दिख रहा? क्या दलित देख नहीं रहे कि किस तरह दलितों की देवी से मायवती दौलत की देवी बन बैठी जबकि दलित वहीँ के वहीँ खड़े रह गए? दलितों और गरीबों की राजनीति करनेवाले लालू, रामविलास पासवान आज किस तरह पैसों के ढेर पर बैठे हैं क्या दलितों को दिख नहीं रहा? भारत के दलितों को देखना चाहिए और समझना चाहिए कि हिन्दू समाज से अलग होकर पाकिस्तान में ही रूक जाने का क्या दुष्परिणाम वहां के दलितों को झेलना पड़ा जैसे पानी से अलग हो जाने पर मछली को झेलना पड़ता है? उनका हित खुद को हिन्दू समाज से अलग समझने में नहीं है बल्कि उसके साथ चलने में है. एकता में ही बल है और जब भी हिन्दू बंटेगा तो कटेगा और फिर घटेगा चाहे वो पाकिस्तान हो या भारत या बांग्लादेश. दलित हमारे हिन्दू समाज के सम्मानित और आवश्यक अंग हैं और हमें ख़ुशी है कि आजादी के बाद से उन्होंने काफी प्रगति भी की है. बिहार में ऐसे हजारों गाँव हैं जिनके मुखिया आज दलित हैं. आज दलितों के पास कार, बाईक क्या नहीं है? आज बहुत सारे हमारे दलित भाई तो बड़े-बड़े उद्योगपति भी हैं.