बुधवार, 23 जुलाई 2014

गवर्नेंट विथ डिफरेंस कहाँ तक डिफरेंट?

22-07-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,एक जंगल था जहाँ अचानक लोकतंत्र की हवा चलने लगी। चुनाव हुए तो चूँकि वहाँ बंदरों,हिरणों और खरगोशों की संख्या ज्यादा थी इसलिए एक बंदर को राजा चुन लिया गया। कुछ ही दिन बाद एक दिन जंगल के पुराने राजा सिंह ने एक हिरण के बच्चे को दबोच लिया। हिरणी बेचारी हाँफती हुई नए राजा बंदर के यहाँ पहुँची और उससे अपने पुत्र की रक्षा करने की गुहार लगाई। बंदर पेड़ों की डालों पर उछलता-कूदता हुआ भागा-भागा वहाँ पहुँचा जहाँ सिंह ने हिरणी के बच्चे को बंधक बना रखा था। बंदर ने सिंह को हिरणी के बच्चे को नहीं खाने और छोड़ देने का आदेश दिया लेकिन सिंह के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। बंदर चिल्लाता रहा और चिल्लाता-चिल्लाता लगातार पेड़ों की इस डाल से उस डाल पर कूदता रहा और उधर सिंह हिरणी के बच्चे को खा गया।
मित्रों,तब बच्चे की मौत से दुःखी हिरणी ने बंदर पर नाराज होते हुए कहा कि तुम बेकार राजा हो क्योंकि तुम सिंह से मेरे बच्चे की रक्षा नहीं कर सके। जवाब में बंदर ने कहा कि भले ही मैं तेरे बच्चे को नहीं बचा सका लेकिन मेरी कोशिश में तो कमी नहीं थी।
मित्रों,केंद्र में मोदी सरकार को गठित हुए 2 महीने हो चुके हैं और मोदी सरकार भी लगातार उस बंदर की तरह कोशिश ही करती हुई दिख रही है। महंगाई को कम करने की कोशिश,चीन-पाकिस्तान को समझाने की कोशिश,रोजाना 30 किमी राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने की कोशिश,भ्रष्टाचार मिटाने की कोशिश,मुलायम-अखिलेश को समझाने की कोशिश,कांग्रेसी काल के राज्यपालों को इस्तीफे के लिए मनाने की कोशिश वगैरह-वगैरह। ठगा-सा देश और ठगी-सी देश की जनता ने क्या सिर्फ इसी बंदरकूद के लिए देश ने नरेंद्र मोदी को भारी बहुमत-से चुनाव जिताया था?
मित्रों,चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश में कुशासन के खिलाफ लगातार बोल रहे थे मगर आज जब यूपी में कानून-व्यवस्था नाम की चीज नहीं रह गई है तब वे अपने संवैधानिक कर्त्तव्यों को दरकिनार करते हुए ठीक उसी तरह सपा-बसपा को साधने की जुगत भिड़ा रहे हैं जिस तरह कि कभी सोनिया-मनमोहन ने भिड़ाया था। तो क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि अब उत्तर प्रदेश की लाचार जनता को मार्च 2017 तक मोदी कथित बाप-बेटे की सरकार को झेलना पड़ेगा? इसी प्रकार नरेंद्र मोदी सरकार चीन-पाकिस्तान और कांग्रेसी काल के राज्यपालों के आगे भी गिड़गिड़ाती हुई दिखाई दे रही है। चीन की घुसपैठ और पाकिस्तान की गोलीबारी में मोदी सरकार के गठन के बाद तेजी ही आई है लेकिन मोदी सरकार ने इनको ऐसा करने से रोकने के लिए अब तक ऐसा कुछ भी नहीं किया है जिससे कि ऐसा लगे कि यह सरकार मोदी कथित वेंटिलेटर पर चल रही मनमोहन सरकार से किसी भी मायने में अलग है।
मित्रों,इसी प्रकार नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार में कई ऐसे लोगों को शामिल किया है जिनको बेदाग नहीं कहा जा सकता। इनमें से जिन लोगों पर बलात्कार के आरोप हैं या दंगों के आरोप हैं उनको तो मैं नहीं जानता लेकिन मैं हाजीपुर के सांसद और भारत के उपभोक्ता एवं खाद्य आपूर्ति मंत्रालय रामविलास जी पासवान (मोदी जी और राजनाथ सिंह जी शायद उनको ऐसे ही पुकारते होंगे) को जरूर अच्छी तरह से जानता हूँ। ये वही रामविलास जी पासवान हैं जिनके रेल मंत्री रहते कभी अजमेर रेलवे भर्ती बोर्ड के चेयरमैन और इनके प्रिय समता कॉलेज,जन्दाहा के तत्कालीन प्रिंसिपल श्री कैलाश प्रसाद जी को एक उम्मीदवार से घूस लेते हुए सीबीआई ने पकड़ लिया था। बाद में अटल जी की उस सरकार ने न जाने क्यों मामले को दबा दिया था जिसमें स्वयं रामविलास जी पासवान भी शामिल थे। अभी लोकसभा चुनाव प्रचार के समय 22 फरवरी,2014 तत्कालीन मनमोहन सरकार ने यह खुलासा किया था (कृपया पूरा समाचार पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें) कि रामविलास पासवान ने यूपीए 1 में केंद्रीय इस्पात और रसायन मंत्री रहते हुए बोकारो इस्पात कारखाने में कई ऐसी बहालियाँ की थीं जिनमें पैसे लेकर गड़बड़ी की गई थी लेकिन न तो मनमोहन सरकार ने और न ही अब मोदी सरकार ने इस मामले में जाँच को आगे बढ़ाया है। इसका सीधा मतलब देश की जनता यह क्यों न लगाए कि मोदी सरकार भी रामविलास जी पासवान के खिलाफ किसी तरह की सीबीआई जाँच नहीं करवाने जा रही है यानि मामला रफा-दफा?
मित्रों,क्या आपको भी ऐसा लगता है कि ऐसे दागी लोगों को सरकार में रखकर मोदी बेदाग शासन दे सकते हैं? मुझे तो ऐसा नहीं लगता क्योंकि ठीक ऐसी ही स्थिति सोनिया-मनमोहन की सरकार में भी थी। तब भी दाग अच्छे हैं वेद वाक्य था और आज भी है फिर यह सरकार कैसे गवर्नेंस विथ डिफरेंस हुई। तब भी तब की सरकार ने राष्ट्रमंडल घोटाले में आरोपी शीला दीक्षित को राज्यपाल बनाया था और बनाए रखा था और आज की सरकार भी शीला दीक्षित को हटा नहीं रही है बल्कि मोदी जी उनके साथ गुपचुप मुलाकात कर रहे हैं। क्या श्री श्री मोदी जी बताएंगे कि उनके और शीला आंटी के बीत क्या-क्या बातचीत हुई? क्या नरेंद्र मोदी ने शीला दीक्षित को अभयदान दे दिया है? अगर हाँ तो क्या वे बताएंगे कि ऐसा उन्होंने किन शर्तों पर किया है? प्रचंड बहुमत से बनी यह कैसी मजबूत सरकार है जो अपने भ्रष्ट राज्यपालों को हटा भी नहीं सकती फिर चीन-पाकिस्तान के साथ यह सरकार कैसे आँखों में आँखें डालकर बात करेगी। एक राज्यपाल हैं उत्तराखंड के राज्यपाल कुरैशी जी जो राज्यपाल के पद को पिकनिक मनाने जैसा समझ रहे हैं और रोजाना बिरयानी के जलवे लूट रहे हैं और बेहद संवेहनहीन होकर बलात्कार को स्वाभाविक परिघटना बता रहे हैं। रोजाना सीमा पर पाकिस्तानी गोलीबारी में हमारे सैनिक मारे जा रहे हैं और मोदी सरकार सार्क उपग्रह की परिकल्पना करने में खोयी हुई है। क्या इसको कहते हैं आँखों में आँखें डालकर बात करना? हेमराज पहले भी सीमा पर मारे जा रहे थे और आज भी मारे जा रहे हैं। पहले भी तोगड़िया,ओबैसी,शिवसेना वगैरह बेलगाम थे और आज भी बेलगाम हैं। मोदी सरकार के मंत्री जीतेन्द्र सिंह जिन्होंने सरकार गठन के तत्काल बाद संविधान के अनुच्छेद 370 पर प्रश्नचिन्ह लगाया था अब संसद में ऐसा क्यों कह रहे हैं कि सरकार के पास अनुच्छेद 370 में किसी तरह की तब्दीली का कोई प्रस्ताव नहीं है? क्यों मोदी सरकार ने अभी तक दिन-प्रतिदिन गति पकड़ रहे उस पिंक रिव्यूलेशन को रोकने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है जिसको बढ़ाने के आरोप उन्होंने अपने चुनावी भाषण में लगातार लगाए थे? क्या अभी भी गोवंश के मांस के निर्यात पर केंद्र सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी जारी नहीं है?
मित्रों,कुल मिलाकर अबतक नरेंद्र मोदी सरकार वही सब कर रही है और वैसे ही कर रही है जैसे कि मनमोहन सरकार चुनावों से पहले कर रही थी फिर कैसे समझा जाए कि यह सरकार उससे अलग हटकर है? माना कि मोदी सरकार ने महँगाई को काफी हद तक नियंत्रण में रखा है लेकिन क्या भारत की जनता ने सिर्फ 25 रुपये किलो का प्याज और 20 रुपये किलो का आलू खाने के लिए मोदी को भारी बहुमत दिया था? और अगर वही सब होना है जो अब तक होता आया है अथवा अगर मोदी सरकार को आगे भी वैसे ही और वही काम करना है जो उसने पिछले दो महीनों में किया है तो फिर अच्छे दिन तो आने से रहे अलबत्ता पहले से भी ज्यादा बुरे दिन जरूर आनेवाले हैं देश की जनता के लिए भी और मोदी सरकार के लिए भी। जनता को सिर्फ बंदरकूद जैसा प्रयत्न नहीं परिणाम चाहिए।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 21 जुलाई 2014

नई गरीबी रेखा पर चुप क्यों है मोदी सरकार?

21-07-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,15 दिन हुए जब रंजराजन समिति ने गरीबी को मापने के लिए नए पैमानेवाली रिपोर्ट मोदी सरकार को सौंपी थी। हमें उम्मीद थी थी कि आदत के मुताबिक नरेंद्र मोदी इस रिपोर्ट पर तीव्र और तीखी प्रतिक्रिया देंगे और सिरे से रिपोर्ट को नकार देंगे। आखिर सवाल गरीबों की ईज्जत का था। याद करिए चुनाव प्रचार जब नरेंद्र मोदी पानी पी-पीकर मनमोहन सरकार पर शहरों के लिए 33 रुपए प्रतिदिन और गांवों के लिए 27 रुपये प्रतिदिन व्यय का पैमाना देकर भारत के गरीबों का अपमान करने और मजाक उड़ाने के आरोप लगा रहे थे। प्रश्न उठता है कि क्या अब शहरों के लिए 47 रुपए प्रतिदिन और गांवों के लिए 32 रुपए प्रतिदिन व्यय का सरकारी पैमाना गरीबों का अपमान नहीं कर रहा है या उनका मजाक नहीं उड़ा रहा है?

मित्रों,अगर श्री नरेंद्र मोदी भी इसे अपमान या मजाक मानते हैं तो फिर रिपोर्ट की सुपुर्दगी के बाद एक पखवाड़ा बीत जाने के बाद भी उन्होंने या उनकी सरकार ने इसको क्यों नहीं नकारा है? क्या उनकी चुप्पी से जनता यह मतलब निकाले कि मनमोहन और मोदी में सिर्फ 32 और 47 का फर्क है यानि नरेंद्र मोदी ने इस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है? गरीबों का मजाक मनमोहन ने भी उड़ाया था और अब मोदी भी उड़ा रहे हैं। हमें यह भी देखना होगा कि मुद्रास्फीति की दर को देखते हुए अगर तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट सही भी थी तो 47 रुपए की गरीबी-सीमा काफी कम है। मोदी चुनाव प्रचार के समय और प्रधानमंत्री बनने के बाद लगातार यह दोहराते आ रहे हैं कि उनकी सरकार गरीबों की सरकार होगी। तो क्या गरीबों की गरीबी का मजाक उड़ाकर वे देश में गरीबों की सरकार स्थापित कर रहे हैं?

मित्रों,मैं यह नहीं कहता कि सरकार को गरीबों को मुफ्तखोर बना देना चाहिए लेकिन सरकार गरीबी को स्वीकार तो करे। संयुक्त राष्ट्र संघ कह रहा है कि दुनिया के सबसे गरीब लोगों की एक तिहाई आबादी भारत में है। भारत सरकार को भी आय-वर्ग के आधार पर तीन श्रेणियों का निर्माण करना चाहिए। एक वे जो वास्तव में अमीर हैं,दूसरे वे जो अभावों में जी रहे हैं लेकिन हालत उतनी खराब नहीं है और तीसरे में वे लोग हों जो बेहद गरीब हैं। हमारे हिसाब से रंजराजन समिति ने जो व्यय-सीमा अपनी रिपोर्ट में दी है उसके अनुसार जीनेवाले लोग बेहद गरीब की श्रेणी में ही आ सकते हैं गरीब की श्रेणी में नहीं।

मित्रों,गरीबों को सब्सिडी पर तो मीडिया लगातार सवाल उठाती रहती है लेकिन उससे कई गुना ज्यादा जो सब्सिडी सरकार अमीरों को दे रही है उस पर चुप्पी साध जाती है। सब्सिडी निश्चित रूप से बुरी चीज है और सबसे बुरी चीज है उस सब्सिडी का गरीबों तक न पहुँच पाना यानि बीच में ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाना। अच्छा हो कि सरकार गरीबी को मापने के लिए तर्कसंगत पैमाना बनाए,सब्सिडी को गरीबों तक पहुँचाने की दिशा में आ रही रूकावटों को दूर करे और गरीबों को खैरात बाँटने के बदले रोजगार दे और इस काम को पहली प्राथमिकता दे तब न तो उसको गरीबों की संख्या को जबरन कम करके दिखाना पड़ेगा और न ही देश के गरीबों को पागलपनभरी,बेसिर पैर की  सरकारी आंकड़ेबाजी से खुद को अपमानित ही महसूस करना पड़ेगा।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 20 जुलाई 2014

लखनऊ की निर्भया की पाती देशवासियों के नाम

20-07-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। प्यारे देशवासियों,मैं एक और निर्भया जो अपनों की ही हवश से खुद को बचा नहीं सकी आपलोगों के नाम यह खत लिख रही हूँ। मैं कहीं बाहर से नहीं बल्कि आपलोगों की अंतरात्मा,अंतर्मन से ही आपलोगों को यह संदेश दे रही हूँ। मुझे जिन्दगी से बहुत-कुछ नहीं मिला लेकिन फिर भी मैंने अपने कर्त्तव्यों से कभी मुँह नहीं मोड़ा। विवाह के तत्काल बाद ही मेरे पति के गुर्दे खराब हो गए लेकिन मैंने हार नहीं मानी और उनको अपना एक गुर्दा देकर बचा लेना चाहा। मगर मेरा यह महान त्याग भी उनकी प्राण-रक्षा नहीं कर पाया और उन्होंने अंततः मेरे विवाह के कुछ ही साल बाद दम तोड़ दिया। वे पीजीआई,लखनऊ में काम करते थे और न जाने कितनों की जान अपनी सेवा के द्वारा बचाई थी लेकिन वे अपनी ही जान नहीं बचा सके।

प्यारे भाइयों और बहनों,फिर मैंने पीजीआई में ही नर्स की नौकरी कर ली और पति ने जो जनसेवा का काम अधूरा छोड़ा था उसे भरे मन से सारे भावों को छिपाते हुए मुस्कान के साथ पूरा करने में लग गई। 16 जुलाई तक मेरे ऊपर मेरे पति की निशानी 13 साल की बिटिया और 3 साल के बेटे की शिक्षा-दीक्षा और पालन-पोषण का भी भार था। 16 जुलाई को मुझे मेरी जान-पहचान के चार लड़के इमरजेंसी कहकर बुलाने आए। रात गहरा चुकी थी लेकिन मेरी करुणा ने मुझे रुकने नहीं दिया और मैं घर में अपने बेटे-बेटियों को जल्दी आ जाऊंगी कहकर निकल पड़ी। कार जब तहजीबों के शहर लखनऊ के सबसे बड़े अस्पताल पीजीआई से आगे बढ़ने लगी तब मैंने समझा कि मेरे साथ धोखा हुआ है। ठीक उसी तरह का धोखा जैसा धोखा कभी डाकू खड़क सिंह ने बाबा भारती के साथ किया था। मैंने उनसे कार रोकने को कहा तो उन्होंने मेरे साथ मारपीट शुरू कर दी। इस बीच उनकी कार कई बार शहर के विभिन्न थानों से होकर गुजरी।

दोस्तों,मैं अब डरने लगी थी। मुझे लगने लगा था कि मेरे साथ ये लोग काफी बुरा करनेवाले हैं। मुझे लखनऊ के ... मुहल्ले के एक बंद स्कूल में ले जाया गया। स्कूल का दरवाजा बंद था इसलिए वे लोग मुझे टूटी हुई चारदिवारी से उठाकर भीतर ले गए। वहाँ सीमेंट से बने बेंच पर मेरे साथ उन्होंने वह सब किया जिसकी मैंने कभी कल्पना तक नहीं की थी। वे मेरे अपने थे,मेरे परिचित थे और मुझे सिस्टर कहकर बुलाते थे फिर आप ही बताईए कि कोई अपनी सिस्टर यानि बहन के साथ बलात्कार करता है क्या? मैंने लगातार उनका विरोध किया जिससे नाराज होकर उन्होंने लाठी-डंडों से मेरी जमकर पिटाई की। डंडे से मेरे गुप्तांग को भी क्षतिग्रस्त कर दिया। मेरा सिर भी दो फाँक कर दिया जिससे मेरे गुप्तांग के साथ-साथ सिर से भी तेज रक्तस्राव होने लगा। मैं लगातार चिल्लाती रही लेकिन मुझे बचाने कोई नहीं आया। या तो मानव-समाज तक मेरी चित्कार पहुँची ही नहीं या फिर आपलोगों ने उसे सुनकर अनसुना कर दिया क्योंकि मैं आपके परिवार की नहीं थी। वे मुझे वहीं घायल अवस्था में छोड़कर भाग गए। दर्द और लगातार खून बहने से मुझे तेज प्यास लग रही थी मैं स्कूल के मैदान में स्थित चापाकल तक घिसटकर पहुँची क्योंकि अब मेरे भीतर खड़ा होने की ताकत नहीं बची थी। बाँकी सरकारी स्कूलों के चापाकलों की तरह वह चापाकल भी खराब था इसलिए मैं पानी नहीं पी सकी। फिर भी मैंने हार नहीं मानी और घुप्प अंधेरे में भी मैं कुल मिलाकर 80 मीटर तक घिसटती रही इस उम्मीद में कि मैं नजदीकी बस्ती तक पहुँच जाऊंगी और किसी तरह मेरे बच्चे पूरी तरह से अनाथ होने से बच जाएंगे। मैंने अस्पताल में अपनी सेवा से न जाने कितने बच्चों को अनाथ होने से बचाया था लेकिन आज मेरे बच्चे ही अनाथ होने जा रहे थे। अंततः मैं बेहोश होने लगी तब मुझे लगा कि मैं पूरी तरह से नंगी कर दी गई हूँ। मेरे कपड़े तो काफी दूर रह गए थे इसलिए मैं अपनी लाज को ढंकने के लिए जमीन की तरफ मुँह करके लेट गई और प्राण-त्याग दिया। तब शायद रात के दो बज रहे थे।

मेरे प्यारे देशवासियों,जो मेरे साथ हुआ आप ही बताईए कि उसके बाद कोई भी महिला क्या दूसरी महिला की इमरजेंसी में मदद करने की सोंचेगी भी? क्या ऐसे में देश की लाखों बहनों की जान पर खतरा नहीं बढ़ जाएगा? 16 दिसंबर से 16 जुलाई तक भारत में न जाने कितनी निर्भयाओं को बलात्कार के दर्द से गुजरना पड़ा और न जाने कितनी निर्भयाओं को सबूत छिपाने के लिए जान से मार दिया गया। मगर मेरा बलात्कार तो समाज द्वारा मेरी मृत्यु के बाद भी होता रहा। मैं दिन निकलने के बाद तीन घंटे तक नंग-धड़ंग पड़ी रही। पुलिसवाला हाथ में कपड़ा लिए खड़ा रहा,समाज मेरे नंगे मृत शरीर से नयनसुख प्राप्त करता रहा लेकिन किसी ने भी मुझ पर कपड़ा डालने की कोशिश नहीं की। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही देश है जहाँ पर दुर्गा और काली की पूजा की जाती है। मेरा अपराध क्या था? सिर्फ यही न कि मैं एक महिला थी। पुरुषप्रधान समाज ने हमें कभी भी आदर नहीं दिया। मूर्ति के रूप में हमारी पूजा की लेकिन वास्तव में हमें सिर्फ एक वस्तु समझा। मैं नहीं जानती कि मुझे मारने के बाद यह समाज मेरे बच्चों के साथ कैसा सलूक करेगा। क्या मेरी बेटी के साथ भी भविष्य में वही होनेवाला है जो 16 जुलाई को मेरे साथ हुआ?

मेरे प्यारे देशवासियों,हमारे देश के मर्दों को हो क्या गया है? उनमें क्यों पशुता ने प्रवेश कर लिया है? क्या कथित आधुनिकता और नंगेपन की वैश्विक आंधी हम नारियों के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देगा? क्या फिर से मध्यकाल की तरह जाकी कन्या सुन्दर देखी ता सिर जाई धरि तलवार वाला युग आ गया है? फिर तो हम महिलाओं को जन्म लेते ही लड़कियों को मार देना होगा क्योंकि वह मौत मेरी मौत से तो कम कष्टकारी होगा।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 16 जुलाई 2014

एफआईआर दर्ज करा के पछता रहा है पारस

16-07-2013,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,यूँ तो पूरे भारत की पुलिस के काम करने का अंदाज निराला है लेकिन हमारी हाजीपुर की पुलिस की तो कोई हद ही नहीं है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। इसी शुक्रवार को जब मैं हाजीपुर नगर थाना के बैंक मेन्स कॉलोनी स्थित अपने मकान पर मौजूद नहीं था तभी देर रात को मेरे पड़ोस में स्थित किराने की दुकान गुंजन किराना स्टोर में चोरी हो गई। चोर दुकान का ताला तोड़कर करीब 20 हजार रुपये की नकदी और सामान ले गए। मेरी दुकानदार से अच्छी बनती है इसलिए जब परसों सोमवार को मैं घर आया तो हालचाल लेने चला गया। दुकानदार पारस कुमार जायसवाल ने बताया कि उसने शनिवार 12 जुलाई को ही नगर थाने में आवेदन दे दिया था,सोमवार के हिन्दुस्तान में समाचार प्रकाशित भी हुआ लेकिन अभी तक नगर थाने की पुलिस का कहीं अता-पता नहीं है।

मित्रों,कल अहले सुबह पारस मेरे घर पर आया और बताया कि संभावित चोर नत्थू साह पिता-श्री दशरथ साह उसको एफआईआर वापस लेने की अन्यथा परिवार सहित हत्या कर देने की धमकी दे गया है वो भी अकेले में नहीं मुहल्ला के दस आदमी के सामने। बेचारे का डर के मारे बुरा हाल था। उसने बताया कि जबसे वह धमकी देकर गया है दुकान खोलने की हिम्मत ही नहीं हो रही। मैं गरीब आदमी दुकान न खोलूँ तो कैसे खर्च चले और कैसे जीऊँ? मैंने तत्काल नगर थाने में फोन किया तो उधर से जवाब आया कि देखते हैं। फिर सवा दस बजे के करीब वैशाली जिले के पुलिस अधीक्षक सुरेश प्रसाद चौधरी जी से शिकायत की कि सुस्ती की भी एक सीमा होती है चोरी हुए चार दिन बीत गए मगर पुलिस तो क्या उसकी परछाई तक का कहीं अता-पता नहीं है। उन्होंने भी कहा देखते हैं। फिर दिन ढला और शाम हो गई। चार बजे फिर से चौधरी जी को फोन लगाया तो उन्होंने केस नं. मांगा जो मैंने दे दिया-केस नं.-575/14 डेटेड-13-07-2014।

मित्रों,अब आज बुधवार दिनांक 16 जुलाई,2014 के डेढ़ बज रहे हैं लेकिन अभी भी हाजीपुर नगर थाने की पुलिस छानबीन करने नहीं आई है। दोस्तों,मैं पहले भी अर्ज कर चुका हूँ कि हमारी पुलिस रक्षक नहीं भक्षक है,शोषक है फिर ऐसी पुलिस किस काम की? हम क्यों उठा रहे हैं या उठाएँ ऐसे पुलिस-तंत्र का खर्च? दरअसल हमारी बिहार पुलिस तब तक टस-से-मस नहीं होती जब तक कि उसकी जेब गर्म न कर दी जाए। वह पीड़ित से भी रिश्वत लेती है और पीड़क से भी इसलिए हमने दारोगा का फुल फॉर्म दो रोकर या गाकर कर दिया है। यही कारण है,यकीनन यही कारण है कि कोई भी पीड़ित व्यक्ति या महिला चाहे मामला बलात्कार का ही क्यों न हो एफआईआर दर्ज करवाने से हिचकते हैं। जब चोरी की घटना के तत्काल बाद ही एफआईआर कर देने के बाद 5 दिन बाद तक पुलिस घटनास्थल पर नहीं पहुँचती है तो इससे तो अच्छा है कि नुकसान को चुपचाप सह लिया जाए। अगर कल पारस की संभावित चोर हत्या कर देता तो इसके लिए दोषी कौन होगा? क्या अब 5 दिन बाद पुलिस अगर आती भी है तो चोरी का सामान बरामद होगा? क्या पुलिस ने चोर को चोरी के सामान को ठिकाने धराने के लिए पर्याप्त समय नहीं दे दिया है? क्या पुलिस का यह भ्रष्ट और लचर रवैय्या नत्थू जैसे अपराधियों का मनोबल नहीं बढ़ा रहा है? सवाल बहुत हैं मगर उत्तर किसी का भी नहीं है। कौन देगा और कहाँ से मिलेगा जवाब?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

बेवजह की आक्रामकता कर सकती है खुद कांग्रेस का नुकसान

14-07-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अंग्रेजी में एक कहावत है कि आक्रमण ही रक्षण का सर्वश्रेष्ठ तरीका है परन्तु यह कहावत सिर्फ चुनावों के समय के लिए ही सत्य हो सकती है। लगता है कि कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ऐसा बिल्कुल भी नहीं मानती। शायद उनका यह मानना है कि चाहे संघर्ष का समय हो या निर्माण का आक्रमण ही एकमात्र विकल्प हो सकता है। तभी तो जब यूपीए की सरकार सत्ता में थी तब भी देश का शुद्ध अंतर्मन से भारत-निर्माण करने के बदले कांग्रेस हमेशा इसी प्रयास में लगी रही कि कैसे विपक्ष के दामन को दागदार बना दिया जाए या दागदार साबित कर दिया जाए।
मित्रों,मैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कथन से पूरी तरह से सहमत हूँ कि आप अपने बल पर सरकार तो चला सकते हैं लेकिन देश का निर्माण नहीं कर सकते। सोनिया गांधी इसी बात को समझ नहीं पाई या फिर समझ कर भी समझना नहीं चाहा इसलिए उनका भारत निर्माण का नारा महज नारा बनकर रह गया। कभी द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन की जीत सुनिश्चित करवाने वाले चर्चिल को ब्रिटेन की जनता ने यह देखकर सत्ता से बाहर कर दिया था कि विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद भी उनका मिजाज सेनानायकों वाला ही था शायद यही हाल वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों के समय से ही सोनिया गांधी का है। मेरी समझ से सोनिया जी की सबसे बड़ी परेशानी उनके पुत्र हैं जो वर्षों में भी कुछ भी सीख पाए। कदाचित् उनमें नेतृत्व क्षमता है ही नहीं और नेतृत्व क्षमता तो जियाले माँ के गर्भ से ही लेकर पैदा होते हैं उसे किसी के भीतर इंजेक्ट नहीं किया जा सकता। सोनिया जी को किसी दूसरे योग्य व्यक्ति को आगे लाना चाहिए और केंद्र सरकार के साथ सहयोगपूर्ण व्यवहार करना चाहिए अन्यथा क्या पता अगले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस दोहरे अंकों में भी नहीं पहुँच सके क्योंकि देश की जनता समझ चुकी है कि राहुल गांधी अयोग्य हैं और भविष्य में अगर देश के विकास की राह में मोदी सरकार के मार्ग में कांग्रेस किसी भी तरह से बाधक बनती है तो इसका दंड भी वही अकेली भुगतेगी।
मित्रों,कांग्रेस जब केंद्र में सत्ता में थी तब उसका फुलटाईम वर्क क्या था इसके बारे में हम पहले पाराग्राफ में बात कर चुके हैं। सत्ता से हटने के बाद भी उसके दुर्भाग्य से उसका रवैय्या वही है। सबसे पहले उसने बेवजह स्मृति ईरानी की पढ़ाई को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का प्रयास किया फिर उस एक केंद्रीय मंत्री को बलात्कार के आरोप में लपेटना चाहा जिसको उसी की पार्टी की प्रदेश सरकार उसी मामले में कभी निर्दोष ठहरा चुकी है और अब पत्रकार वेद प्रताप वैदिक के मामले में बिना किसी तथ्य के हो-हल्ला मचा रही है। शायद उसको लगता है कि इन बेतुके हमलों से जनता को विश्वास हो जाएगा कि इस सरकार और उसकी अपदस्थ हो चुकी सरकार में कोई फर्क नहीं है। हम जानते हैं कि वेद प्रताप वैदिक कभी नरेंद्र मोदी के नजदीकी नहीं रहे और लोकसभा चुनावों के दौरान तो उन्होंने कई बार उनका विरोध भी किया। यहाँ तक कि वे उनकी नजदीकी माकपा नेता सीताराम येचुरी और आप नेता अरविन्द केजरीवाल के साथ भी रही है फिर कांग्रेस क्यों वैदिक की रामदेव बाबा के साथ निकटता को लेकर हंगामा खड़ा कर रही है?
मित्रों,पत्रकार तो रोज सैंकड़ों लोगों से मिलता है। उसमें से कई अच्छे लोग होते हैं तो कई निहायत बुरे तो इसका यह मतलब नहीं हो जाता कि वह पत्रकार उसके गिरोह में शामिल हो गया। इतिहास गवाह है कि कभी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी जी के पति राजीव गांधी ने भी उस एलटीटीई प्रमुख प्रभाकरण के साथ मुलाकात की थी जिन पर बाद में उनकी ही हत्या करवाने का आरोप लगा तो क्या कांग्रेस बताएगी कि राजीव क्यों प्रभाकरण से मिले थे? क्या वे उनके यहाँ अपने बच्चों के लिए वर-वधु की तलाश कर रहे थे? फिर राजीव जी तो पत्रकार भी नहीं थे जबकि वेद प्रताप वैदिक देश के वरिष्ठ पत्रकार है। अगर कांग्रेस पार्टी यह समझती है कि वैदिक को कटघरे में खड़ा करने का मतलब है मोदी को कटघरे में खड़ा करना तो यह उसकी निरी मूर्खता है। देश की जनता अब इतनी बेवकूफ नहीं रह गई है कि कांग्रेस के चोर बोले जोर से की नीति को समझ नहीं पाए इसलिए कांग्रेस और सोनिया परिवार के हित में यही अच्छा होगा कि वह मोदी सरकार के काम-काज में बाधा डालने के बदले उसके साथ सहयोग करे,मुद्दों के आधार पर विरोध करे न कि विरोध के लिए विरोध करे और बेवजह की आक्रामकता से बचे। बिना बात के गाली-गलौज को भारत में शिष्टता नहीं अशिष्टता माना जाता है। एक बात और कि जब शीशे के घर में रहनेवाला व्यक्ति दूसरे के घरों पर पत्थर फेंकता है तो अंततः वह अपने ही हाथों खुद का ही नुकसान करता है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 14 जुलाई 2014

बजट अच्छे हैं मगर आदर्श नहीं

14-07-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कहते हैं कि बजट को देखकर पता चलता है कि सरकार और देश की दशा और दिशा क्या है। जाहिर है कि 45 दिन पुरानी सरकार की दशा का अनुमान बजट से लगाना बेमानी होगा लेकिन दिशा का अनुमान तो हम लगा ही सकते हैं। चाहे मोदी सरकार का रेल बजट हो या आम बजट दोनों ही अच्छे हैं हालाँकि आदर्श नहीं हैं क्योंकि सरकार वोट बैंक को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती थी। शायद इसलिए वित्त मंत्री बजट में जनता को कड़वी दवा तो नहीं ही दे पाए उल्टे मीठी दवा दे डाली।
मित्रों,जहाँ तक रेल बजट का सवाल है तो इसमें निश्चित रूप से रेलवे को भारत के विकास का ईंजन बनाने की क्षमता है। रेलवे के पास विशाल नेटवर्क और अधोसंरचना है और उसके आधुनिकीकरण पर अगर समुचित ध्यान दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब भारत में भी दुनिया की सबसे तीव्रतम यातायात सेवा उपलब्ध होगी। कौन नहीं चाहेगा कि पटना से दिल्ली एक ही दिन में चला भी जाए और अपना काम करके देर शाम तक घर वापस भी आ जाए? जो लोग गरीबों के लिए बुलेट ट्रेन के भाड़े को लेकर चिंता से मरे जा रहे हैं उनको यह तो पता होगा ही कि देश में बुलेट ट्रेन के आने के बावजूद भी सस्ते विकल्प मौजूद रहेंगे। रेलवे की सामान ढुलाई में भी सुधार हो बजट में इसका भी खास ख्याल रखा गया है और माल ट्रेनों के लिए अलग स्टेशन बनाने की परिकल्पना की गई है। इतना ही नहीं रेलवे का उपयोग सरकार महंगाई को कम करने के लिए भी करने जा रही है।

मित्रों,अगर आप आम रेल यात्री से पूछें कि वो रेलवे में कौन-से परिवर्तन चाहता है तो वह यही बताएगा कि ट्रेनों में भोजन की गुणवत्ता और ट्रेनों-स्टेशनों की साफ-सफाई का स्तर अच्छा होना चाहिए। यह बड़े ही सौभाग्य का विषय है कि इस बजट में इन समस्याओं के समाधान पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है। इसके साथ ही एक आम यात्री यह चाहता है कि ट्रेनों के विलंब से चलने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगनी चाहिए तो इसके लिए तो रेलवे का आधुनिकीकरण करना पड़ेगा और उसमें वक्त लगेगा। वैसे बुलेट ट्रेन और हाई स्पीड ट्रेनों को चलाने के लिए तो ट्रेन संचालन में आमूलचूल बदलाव तो करना पड़ेगा ही। यह हमारी अंग्रेजकालीन संचालन-प्रणाली का ही दोष है कि प्रत्येक साल सर्दी के दिनों में रेलगाड़ियों की गति को काठ मार जाता है और कई दर्जन महत्त्वपूर्ण गाड़ियों के संचालन को महीनों तक के लिए बंद कर देना पड़ता है जिससे यात्रियों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
मित्रों,लेकिन फिर से वही सवाल उठ खड़ा होता है कि रेल बजट में जो प्रावधान किये गए हैं उनको धरातल पर उतारने के लिए पैसे आएंगे कहाँ से? जनता की जेब को तो पिछली सरकार ही लूट चुकी है इसलिए उसकी जेब से तो कुछ निकाल नहीं सकते तो क्या निजी कंपनियाँ सरकार की परियोजनाओं में अभिरूचि लेगी? अगर सरकार की नीति के साथ उसकी नीयत भी ठीक रही तो जरूर ऐसा संभव है इसलिए इस दिशा में पूरी तरह से निराश होने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है।
मित्रों,जहाँ तक आम बजट का सवाल है तो इसमें भी रेल बजट की ही तरह पीपीपी पर ज्यादा जोर दिया गया है यानि पब्लिक पाइवेट पार्टनरशिप पर। आम बजट में सबसे ज्यादा जोर विनिर्माण क्षेत्र के विकास पर दिया गया है जिससे देश की जीडीपी तो बढ़े ही देश के करोड़ों बेरोजगार युवाओं को रोजगार भी मिले। देश का सबसे बड़ा क्षेत्र सेवा-क्षेत्र में विकास की रफ्तार एक तो संतृप्त हो चुका है और दूसरा यह कि उसमें रोजगार-सृजन की संभावना न के बराबर होती है। इसके लिए बीमा और रक्षा-क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाकर 49 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके साथ ही देश के कई क्षेत्रों में औद्योगिक गलियारों के निर्माण का भी प्रावधान किया गया है। 24 घंटे बिजली,नदियों को जोड़ने,कौशल विकास,सड़क-निर्माण,प्रधानमंत्री सिंचाई योजना,पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए कई सारी योजनाएँ,सीमावर्ती क्षेत्रों में रेल और सड़क निर्माण,महामना मालवीय के नाम पर नई शिक्षा योजना,गंगा सफाई और विकास योजना,सौ स्मार्ट सिटी निर्माण,मिट्टी हेल्थ कार्ड,2022 तक सबके लिए घर योजना,किसान टीवी चैनल की शुरुआत,हर राज्य में एम्स जैसी सुविधा देना,सबके लिए शौचालय,हर घर में बिजली पहुँचाने की योजना,किसानों को 7 प्रतिशत के ब्याज-दर पर ऋण,ई-वीजा प्रणाली,बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना,सुशासन के लिए धन का आवंटन आदि कई सारे ऐसे कदम बजट में प्रस्तावित किए गए हैं जो देश में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकते हैं लेकिन वास्तविकता यह भी है कि सरकार के हाथों में कुल जीडीपी का मात्र 2 प्रतिशत ही है इसलिए बिना निजी क्षेत्र और विदेशी निवेशकों की सहायता के बजट-लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। यहाँ मैं रेल और आम दोनों ही बजटों की बात कर रहा हूँ।

मित्रों,ऐसा होने के बावजूद भी मैं केंद्र सरकार की विनिवेश नीति से सहमत नहीं हूँ। मैं नहीं मानता कि सरकारी उपक्रमों को संचालन व्यावसायिक तरीके से नहीं किया जा सकता और उनमें सुधार लाकर उनको मुनाफे में नहीं लाया जा सकता फिर सरकारी हिस्सेदारी को बेचने या कम करने की क्या जरुरत है? आर्थिक सुधार का यह मतलब नहीं होता कि पूरे देश को राई से रत्ती तक को देसी-विदेशी पूंजीपतियों के हाथों में दे दो बल्कि किसी भी लोक-कल्याणकारी देश में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में एक संतुलन बनाए रखना जरूरी है वरना लोक-कल्याणकारी राष्ट्र होने का क्या औचित्य है? निजी क्षेत्र तो हमेशा अपना मुनाफा देखता है और आगे भी देखेगा फिर वो क्यों लोक-कल्याण से क्यों कर वास्ता रखने लगा? देश को देशहित में प्राइवेट कंपनी की स्टाईल में चलाया तो जा सकता है लेकिन प्राइवेट कंपनियों को सौंपा नहीं जा सकता क्योंकि देश की जनता इस सच्चाई को कभी स्वीकार नहीं करेगी इस बात को केंद्र सरकार को अच्छी तरह से अपने जेहन में बैठा लेनी पड़ेगी।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 7 जुलाई 2014

बिहार की पब्लिक आप दोनों को जान चुकी है लालू जी-नीतीश जी

7-7-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,न जाने क्यों हमारे देश के नेताओं को अपनी धूर्तता और जनता की मूर्खता पर अपार विश्वास है। वे समझते हैं कि वे बार-बार जनता को झाँसा दे सकते हैं,ठग सकते हैं। मगर वे बेचारे यह नहीं जानते कि देश-प्रदेश की जनता अब वो पुरानी 20वीं सदी वाली जनता नहीं रही बल्कि देश-प्रदेश की 55 प्रतिशत जनसंख्या आज युवा है और पल-पल जागरुक और चौकन्नी है। बिहार में जंगलराज के निर्माता और निर्देशक लालू प्रसाद जी पिछले कई चुनावों से बिहार की जनता को बरगलाने का प्रयास करते आ रहे हैं। वे हर चुनाव में अपना वही पुराना जातिवादी मंडल राग छेड़ते आ रहे हैं और मुँह की खाते आ रहे हैं। पिछले दो चुनावों में बिहार के वर्तमान से पूर्व मुख्यमंत्री हो चुके नीतीश कुमार बिहार की जनता को विकास और भ्रष्टाचारमुक्त शासन देने का वादा करके जीतते रहे मगर किया कुछ नहीं। घूसखोरी बढ़ती गई,अराजकता पाँव पसारती गई और आज तो स्थिति ऐसी हो गई है कि जहाँ पूरे बिहार में पिछले छः महीने से अनाज नहीं बँटा है तो कई स्थानों पर सामाजिक पेंशन बँटे दो साल हो गए हैं, राज्य के 90 प्रतिशत शिक्षक नकली डिग्रीधारी हैं और अपने कर्त्तव्यों को पूरा करने में पूरी तरह से अक्षम हैं। कानून-व्यवस्था की स्थिति एक बार फिर से इतनी खराब हो चुकी है कि बिहार के वित्त मंत्री के नाती का ही अपहरण हो गया है।
मित्रों,जब नीतीश कुमार पहली बार जीते तो लालू के जंगलराज से मुक्ति के वादे पर सवार होकर जीते। इसी तरह 2010 के चुनावों से पहले उन्होंने वादा किया कि इस पारी में उनकी सरकार भ्रष्टाचार को निर्मूल करके रख देगी लेकिन जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि भ्रष्टाचार घटने के बदले बढ़ता ही जा रहा है। चारों तरफ सरकारी पैसों की लूट और अराजकता का बोलबाला है। जनता परेशान है और धीरज खो रही है लेकिन लगता है जैसे नीतीश कुमार जी को यह दिखाई ही नहीं दे रहा था तभी तो वे सीएम से पीएम बनने का सपना पाल बैठे। जब सपना टूटा तो बेचारे सीएम की कुर्सी भी छोड़कर भाग गए। कदाचित् अरविन्द केजरीवाल की तरह वे भी यह समझ चुके थे कि भ्रष्टाचार को मिटाना तो दूर उसका बाल बाँका तक कर सकने की क्षमता भी उनमें नहीं है। चले थे नरेंद्र मोदी बनने और बन गए अरविन्द केजरीवाल। जाहिर है कि जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने की परीक्षा में नीतीश कुमार बुरी तरह से फेल हो चुके हैं।
मित्रों,फिर भी लालू और नीतीश दोनों परखे जा चुके नेता यह समझ रहे हैं कि अगर वे दोनों मिल जाएँ तो जनता फिर से उनको ही मौका दे देगी। वे फिर से चुनावों को केमिस्ट्री के बजाये गणित समझने की भूल कर रहे हैं। आखिर क्यों देगी जनता मौका जब वे दोनों जनता की आशाओं पर खरे नहीं उतर सके हैं? एक ने जो कुर्सी से चिपक कर बैठ गया था पूरे बिहार के खून को जोंक की तरह चूसकर बीमार बना दिया और दूसरा जनाकाक्षाओं को पूरा करने की कोई राह नहीं सूझने पर कुर्सी छोड़कर भाग गया फिर जनता क्यों दे उनको फिर से बिहार को बर्बाद करने का मौका जबकि उनके पास बिहार के लिए कोई नवीन योजना और उनको धरातल पर उतारने का जिगर है ही नहीं? वे दिन गए जब बिहार के लोग जाति-पाँति के बहकावे में आ जाते थे। अब वे समझ चुके हैं कि ये नेता जाति-पाँति के नाम पर जीतने के बाद जनता की जगह अपना और अपनों का ही भला करनेवाले हैं। हालाँकि बिहार की जनता का एक बड़ा भाग ऐसा है जो भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी को पसंद नहीं करता है। कारण यह है कि श्री मोदी ने बेवजह नीतीश कुमार को बिहार का मसीहा बन जाने दिया जबकि वे दूर-दूर तक ऐसा बनने के लायक नहीं थे। इतना ही नहीं श्री मोदी लंबे समय तक नीतीश कुमार को ही भारत के पीएम पद का सबसे योग्य उम्मीदवार बताते रहे जबकि उनको पता था कि भाजपा नरेंद्र मोदी को प्रोजेक्ट करने जा रही है इसलिए अच्छा हो कि अगले विधानसभा चुनावों से पहले सुशील कुमार मोदी को भाजपा मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार या स्टार प्रचारक नहीं बनाए। या तो किसी और को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए या फिर यह निर्णय चुनावों के बाद जीतनेवाले विधायकों के विवेक पर छोड़ दे तभी उसकी जीत और लालू-नीतीश जैसे महान काठ की हाँड़ी विशेषज्ञ नेताओं की हार सुनिश्चित हो पाएगी।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

इराक में इस्लाम कहाँ है?

1 जुलाई,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जहाँ तक मैं जानता हूँ कि इस्लाम का अर्थ शांति होता है लेकिन विडंबना यह है कि जहाँ-जहाँ भी इस्लाम है वहाँ-वहाँ ही शांति नहीं है। पूरी दुनिया में मुसलमान दूसरे धर्मवालों से तो संघर्ष कर ही रहे हैं जहाँ जिस देश में सिर्फ मुसलमान ही हैं वहाँ आपस में ही लड़ रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में हमने इराक में इस्लाम की जो क्रूरता देखी,जो स्वरूप देखा वह बिल्कुल भी इस्लाम के प्रति श्रद्धा या प्रेम नहीं जगाता बल्कि जुगुप्सा और घृणा उत्पन्न करता है। क्या कोई व्यक्ति या धर्म इतना हिंसक और बेरहम हो सकता है कि 1700 निहत्थों को पंक्तिबद्ध करके गोलियों से भून दे? क्या कोई धर्म तब भी धर्म कहलाने का अधिकारी हो सकता है जब सैंकड़ों लोगों के सिरों को धड़ों से अलग करके ढेर लगा दे और फिर पूरी प्रक्रिया का वीडियो जारी करे? इतनी निर्दयता तो अपनी प्रजाति के लिए मांसाहारी पशुओं में भी नहीं होती फिर इंसान में कहाँ से आ गई और यह सब उस धर्म के नाम पर किया गया जिसका शाब्दिक अर्थ ही शांति होता है? तो क्या इस्लाम का नाम कुछ और रखना पड़ेगा क्योंकि अब यह नाम अपने अर्थ को खो चुका है?

मित्रों,हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह सारा रक्तपात फिर से उसी धरती पर किया गया,उसी देश में किया गया जहाँ के एक शहर कर्बला में कभी यजीद नामक रक्तपिपासु की क्रूरता का विरोध करते हुए इमाम हुसैन शहीद हुए थे। अफगानिस्तान से लेकर सीरिया तक जहाँ देखिए मुसलमानों के कबीले आपस में खून की होली खेल रहे हैं। कहीँ सुन्नी हजारा को मार रहा है तो कहीं शिया सुन्नी को। हर मुस्लिम संप्रदाय यही समझता है कि उसका मत ही सही है और दूसरे मतवालों को जीने का कोई अधिकार नहीं है। यह असहिष्णुता और असहअस्तित्व ही सारे झगड़ों की जड़ है और इस झगड़े में इस्लाम को तो नुकसान हुआ ही है पूरी मानवता शर्मसार हुई है। इराक के नरपिशाचों ने तो छोटे-छोटे मासूम बच्चों तक की हत्या निहायत पशुता के साथ की है। कभी एलटीटीई प्रमुख प्रभाकरण के बेटे की श्रीलंकाई सैनिकों द्वारा की गई हत्या की तस्वीरों ने पूरी दुनिया को विचलित कर दिया था लेकिन इराक में तो न जाने कितने मासूमों के गले पर बेहरमी से चाकू चलाए गए।

मित्रों,सवाल उठता है कि अफगानिस्तान,इराक और सीरिया में इस्लाम इतना बेरहम क्यों है? धर्म को मानव ने बनाया है धर्म ने मानव को नहीं बनाया फिर धर्म के नाम पर नरसंहार का क्या औचित्य है? अगर कुरान-शरीफ या किसी अन्य इस्लामिक पुस्तक में हिंसा को बढ़ावा देनेवाले वाक्य मौजूद हैं तो निश्चित रूप से उनको हटा दिया जाना चाहिए क्योंकि वे अब सामयिक नहीं रह गए हैं। धर्म का काम शांति स्थापित करना होना चाहिए न कि खूरेंजी को बढ़ावा देना। पूरी दुनिया में सिर्फ सुन्नी या शिया ही शेष रह जाएँ तो क्या गारंटी है कि दुनिया में शांति स्थापित हो जाएगी और सुन्नी और शियाओं के गुट आपस में ही नहीं लड़ेंगे? याद रखिए दुनिया का प्रत्येक मानव प्रकृति की ओर से दुनिया को व मानवता को एक अमूल्य देन है। एक समय था जब मानव मानव के लिए मर रहा था और आज मानव मानव को मार रहा है? मानव का मानव के साथ प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है और जो भी धर्म इस धर्म को नहीं मानता है वह धर्म नहीं अधर्म है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 30 जून 2014

महामूर्ख हैं शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती

30 जून,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैं नहीं जानता कि हिन्दुओं के लिए पूजनीय शंकराचार्यों का चुनाव किस प्रक्रिया के तहत किया जाता है लेकिन मैं यह जरूर जानता हूँ कि वह प्रक्रिया दोषपूर्ण है। क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो एक दंभी,घमंडी और महामूर्ख द्वारिका पीठ का स्वामी नहीं होता। आपने एकदम सही समझा है मैं स्वरूपानंद सरस्वती की ही बात कर रहा हूँ जो न तो ज्ञानी हैं,न ही तत्त्वदर्शी,तो ब्रह्मज्ञानी हैं और न ही आत्मज्ञानी फिर भी शंकराचार्य हैं और उस शंकराचार्य के उत्तराधिकारी माने जाते हैं जिसने कभी पूरी दुनिया से कहा कि ब्रह्मास्मि। तत् त्वमसि।। इन श्रीमान् ने वैसे तो पहले भी जमकर मूर्खतापूर्ण बातें की हैं लेकिन पिछले कुछ दिनों में तो इन्होंने हद ही कर दी है।

मित्रों,इन श्रीमान् का कहना है कि चूँकि साईं बाबा का जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था इसलिए हिन्दुओं को उनकी पूजा नहीं करनी चाहिए। मैं नहीं जानता कि स्वरूपानंद ने कहाँ से इस तथ्य का पता लगाता लेकिन अगर यह सत्य भी है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि साईं बाबा एक महामानव थे। हम उनको राम और कृष्ण की श्रेणी में तो नहीं रख सकते लेकिन कबीर और रामकृष्ण परमहंस जैसे संतों की श्रेणी में तो रख ही सकते हैं। हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण यह नहीं रहा है कि कोई जन्मना क्या था बल्कि महत्त्व इस बात का रहा है कि कोई कर्मणा क्या था। रावण तो जन्मना ब्राह्मण था लेकिन हम उसको नहीं पूजते। महान हिन्दू संन्यासी स्वामी विवेकानंद ने तो यहाँ तक कहा है कि अगर वे ईसा को सूली चढ़ाने के समय मौजूद होते तो उनके रक्त को अपने माथे पर लगाते और अपने रक्त से उनके चरण धोते तो क्या विवेकानंद पर माता काली नाराज हो गईँ? स्वामी स्वरूपानंद को कैसे पता चला कि राम उमा भारती से नाराज हैं? क्या राम ने स्वयं आकर उनको इस बात की जानकारी दी? क्या स्वरूपानंद अन्य लोगों को भी राम के दर्शन करवा सकते हैं?

मित्रों,हम हिन्दू शुरू से ही महामानवों के साथ-साथ पशु-पक्षी,पेड़-पौधों और धरती के कुछ भू-भागों,मिट्टी पत्थरों के पिंडों तक की पूजा करते आ रहे हैं फिर मानव तो रामकृष्ण परमहंस के अनुसार ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है और साईं तो महामानव थे। हम साईं के शरीर की पूजा नहीं करते बल्कि उनकी त्यागपूर्ण जिंदगी और कृतियों को पूजते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार अगर कोई अच्छे लोगों के प्रति श्रद्धा नहीं रखता और बुरे लोगों से नफरत नहीं करता तो वह मानव कहलाने के योग्य ही नहीं है। फिर कोई कैसे साईं के प्रति श्रद्धा नहीं रखे?

मित्रों,इस स्वरूपानंद ने तो गंगा पर भी एक धर्म विशेष का एकाधिकार बता दिया है। कितनी बड़ी मूर्खता है यह! क्या यह महामूर्खता नहीं है? क्या हवा,नदी और धरती पर भी किसी का एकाधिकार हो सकता है? मैं ऐसे कई मुसलमानों को जानता हूँ जिनके घर गंगा किनारे हैं और जो सालोंभर गंगा स्नान करते हैं तो क्या इससे गंगा हिन्दुओं के लिए पूजनीय नहीं रही? यह आदमी बार-बार शास्त्रों का उदाहरण देता है। ऐसे ही लोगों के लिए कबीर ने कभी कहा था कि
मैं कहता हूँ आँखन देखी,तू कहता कागद की लेखी,
तेरा मेरा मनुआ एक कैसे होई रे।
लेकिन लगता है कि इन श्रीमान् ने कबीर के इस दोहे को कभी पढ़ा ही नहीं है। अनुभव हमेशा ज्ञान से बेहतर होता है ये श्रीमान् यह भी नहीं जानते। श्रीमान् शास्त्रों में संतोषी माता और साईं बाबा को ढूंढ़ रहे हैं। मैं नहीं श्री रामकृष्ण परमहंस कहते हैं कि चूँकि सारे शास्त्रों में मनमाफिक हेराफेरी की गई है इसलिए वे झूठे हैं। उनके अनुसार ईश्वर गूंगे का गुड़ है इसलिए उसका वर्णन किया ही नहीं जा सकता। ईश्वर का वास तो अच्छे गुणों और कर्मों में हैं। कोई तो पढ़ाओ इस स्वरूपानंद को रामकृष्ण साहित्य।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 22 जून 2014

डॉ. मंजू गीता मिश्र के यहाँ पुरुष करता है महिलाओं का अल्ट्रासाउण्ड

पटना,ब्रजकिशोर सिंह। पटना के कदमकुआँ का जगतप्रसिद्ध जगतनारायण रोड। नाम बड़े और दर्शन छोटे चारों तरफ गंदगी-ही-गंदगी। यहीं पर स्थित है पटना की सबसे प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. मंजू गीता मिश्र का महलनुमा क्लिनिक,एमजीएम। दिन शनिवार,तारीख-21 जून,2014। दिखाने के लिए महिलाओं की भीड़। डॉक्टर साहिबा एक सुर में सारी नई मरीजों को खून जाँच और अल्ट्रासाउण्ड लिख रही हैं। एक असिस्टेंट भी है जो नौसिखुआ मालूम होती है क्योंकि वो बार-बार दवाओं का उच्चारण गलत लिख देती है। पूछने पर महिलाएँ और उनके परिजन डॉक्टर साहिबा की ईलाज से काफी संतुष्ट दिखे। यहाँ मरीजों के बाहर जाने की जरुरत नहीं सारी जाँच यहीं पर हो जाती है। मगर तभी थोड़ी देर बाद सीमा अल्ट्रासाउण्ड जो उसी परिसर में स्थित है में कुछ हंगामा होने लगता है। पता चला कि इसका नाम मरीजों को धोखा देने के लिए सीमा अल्ट्रासाउण्ड रखा गया है दरअसल भीतर में एक पुरुष डॉक्टर महिलाओं के गर्भाशय और गुप्तांगों का अल्ट्रासाउण्ड कर रहा है। जब एक महिला मरीज के पति ने इस पर आपत्ति की तो डॉक्टर ने कहा कि मेडिकल क्षेत्र में तो ऐसा होता है।

वहाँ उपस्थित महिलाओं से जब हमने पूछा कि आप एक पुरुष डॉक्टर से अल्ट्रासाउण्ड करवाने में असहज तो नहीं महसूस करतीं तो उन्होंने कहा कि करती तो हैं मगर करें क्या। मंजू गीता जी से दिखवाना है तो सहना ही पड़ेगा लेकिन अगर कोई महिला अल्ट्रासाउण्ड करती तो जरूर ज्यादा अच्छा होता। उनका यह भी कहना था कि पटना में हर जगह तो महिला डॉक्टर ही अल्ट्रासाउण्ड करती है फिर यहाँ पर पुरुष क्यों? उन महिलाओं में से कुछ तो मुसलमान भी थीं जिनका मजहब इन सब बातों को लेकर काफी सख्त है। इस बारे में जब डॉ. मंजू गीता मिश्र से बात करने की कोशिश की गई तो वे ओटी में व्यस्त रहने के कारण उपलब्ध नहीं हो सकीं।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 21 जून 2014

सुशासन बाबू गए मांझी भी चले जाएंगे मगर क्या कुबतपुर में बिजली आएगी?

21-06-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैं पहले के कई आलेखों में अपनी ससुराल के गांव यानि वैशाली जिले के देसरी प्रखंड के कुबतपुर (भिखनपुरा) का जिक्र कर चुका हूँ। इन आलेखों में आपको मैंने बताया है कि इस गांव की बिजली सुशासन बाबू के शासन की शुरुआत में ही चली गई। वजह यह थी कि ट्रांसफार्मर जल गया था और ठेकेदार रंजन सिंह 20000 रु. घूस में मांग रहा था। बाद में मेरे लिखने के बाद ठेकेदार और जूनियर इंजीनियर गांव आए। दोनों ने इसी साल 1 मई को खंभों पर से तार उतरवा दिया और जब मैंने जेई को फोन करके पूछा तो उन्होंने बताया कि अब इस तार की जरुरत नहीं है क्योंकि गांव में अब तीन फेजवाली बिजली आएगी। बाद में ट्रांसफार्मर भी लगा दिया गया लेकिन पोलों पर से तार अभी भी गायब है।
मित्रों,कभी ठेकेदार और जेई कहते हैं कि छोटे ट्रांसफार्मरों द्वारा बिजली आपूर्ति की जाएगी जैसा कि राजीव गांधी विद्युतीकरण परियोजना के अंतर्गत किया जाता है तो भी कभी कहते हैं कि बड़े ट्रांसफार्मर पर से बिजली दी जाएगी। इस बीच वे खंभों पर से दौड़ाने के लिए उपभोक्ताओं से ही तार मांग रहे हैं। कई उपभोक्ता तार खरीदकर उनका इंतजार भी कर रहे हैं लेकिन पिछले दो सप्ताह से उनका कोई अता-पता नहीं है। इस बीच जब मैंने जेई से उसी नंबर पर संपर्क करना चाहा जिस नंबर पर 1 मई को बात हुई थी तो उस नंबर से जो कोई भी फोन उठाता है रांग नंबर कहकर फोन काट देता है। इतना ही नहीं जिले के कार्यपालक अभियंता रामेश्वर सिंह का नंबर भी अब नहीं लग रहा है और डायल करने पर उधर से घोषणा सुनाई देती है कि इस नंबर से कॉल डाईवर्ट कर दिया गया है और फिर फोन कट जाता है। पता ही चल रहा है क्या किया जाए और किससे बात की जाए। बिजली मंत्री को फोन करिए तो पीए कभी कहता है कि साहब हाउस में हैं तो कभी कहता है कि मीटिंग कर रहे हैं। कुछ ऐसा ही हाल वर्ष 2006 में तक माखनलाल पत्रकारिता विश्ववि. के नोएडा परिसर का था जब मैंने वहाँ नामांकन लिया है। वहाँ के निदेशक अशोक टंडन हमेशा स्टाफ की मीटिंग करते रहते लेकिन विश्ववि. में कोई सुधार नहीं हो रहा था। तब मैं छात्रों के साथ मीटिंग में ही घुस गया था और कहा था कि कभी हमारी भी तो सुनिए ऐसे मीटिंग से क्या लाभ? फिर तो जो हुआ वह इतिहास है। परिसर बदला और फिर बहुत कुछ बदल गया।
मित्रों,सुशासन बाबू तो चले गए और अब जीतन राम मांझी बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि इनके शासन-काल में भी कुबतपुर के लोगों को बिजली नसीब हो पाएगी। कहीं कोई सुननेवाला नहीं है। तंत्र के संचालक अधिकारी जैसे मन होता है वैसे काम करते हैं। राज्य का सबसे भ्रष्ट विभाग बिजली विभाग राज्य के लोगों को सहूलियत नहीं देता बल्कि झटके देता है। बिना रिश्वत दिए शहर के घरों में भी बिजली नहीं आती है तो फिर कुबतपुर में कैसे आएगी?मैं समझता हूँ कि कुबतपुर में बिजली आपूर्ति नीतीश जी के शासन का भी लिटमस टेस्ट था और मांझी जी के शासन का भी लिटमस टेस्ट है। देखना है कि मांझी सरकार इस टेस्ट में पास होती है या नहीं। इस गांव में बिना रिश्वत दिए बिजली आती है या नहीं। कुबतपुर में बिजली का आना या न आ पाना सिर्फ इस बात का फैसला नहीं करेगा कि राज्य में सुशासन है या नहीं बल्कि इस बात का भी निर्णय करेगा कि राज्य में शासन नाम की कोई चीज है भी या नहीं या फिर निरी अराजकता है।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 17 जून 2014

इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे सोनिया के चमचे राज्यपाल?

17 जून,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों केंद्र की मोदी सरकार जब पुराने राज्यपालों को हटाने जा रही है तो सारे छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी दल बेजा शोर मचाने में लगे हैं। जब संप्रग सरकार ने वर्ष 2004 में राजग काल के राज्यपालों को हटाया था तब तो यही लोग तालियाँ पीट रहे थे फिर आज विरोध क्यों? क्या विरोधी दलों का काम सिर्फ विरोध करना है चाहे सरकार के कदम सराहनीय हों और देशहित में हों तब भी? उनको जब मौका मिला था तब उनको भी तो इस संवैधानिक पद का सम्मान करते हुए राजग काल के राज्यपालों को शांतिपूर्वक अपना कार्यकाल पूरा करने देना चाहिए था।

मित्रों,हमने देखा है कि पिछले 10 वर्षों में संप्रग की सरकार में राज्यपाल के पद की गरिमा को रसातल में पहुँचा दिया गया। आरोप तो यहाँ तक लगे कि कांग्रेस आलाकमान पैसे लेकर जैसे-तैसे लोगों को राज्यपाल बना रहा है। तब मैंने 3 अक्टूबर,2011 के अपने एक आलेख राज्यपाल हैं कि आदेशपाल द्वारा यह आरोप भी लगाया था कि राज्यपालों को आदेशपाल बना दिया गया। बिहार का उदाहरण अगर हम लें तो बिहार में लगभग प्रत्येक राज्यपाल के समय विश्वविद्यालयों में उच्चाधिकारियों की नियुक्तियों में खरीद-फरोख्त के आरोप लगे। कई बार पटना उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा। विश्वविद्यालयों का परीक्षा-विभाग घूसखोरी का अड्डा बन गया।

मित्रों,अगर हम संप्रग काल में नियुक्त सारे राज्यपालों पर नजर डालें तो पता चलता है इनमें से अधिकतर लोगों को सिर्फ इसलिए राज्यपाल बनाया गया क्योंकि ये सोनिया परिवार की चापलूसी करते थे और चहेते थे। कई ऐसे लोग भी राज्यपाल बना दिए गए जिनको विधानसभा और लोकसभा चुनावों में जनता ने सिरे से नकार दिया था। कई लोगों पर तो राज्यपाल बनने से पहले से संगीन घोटालों के भी आरोप थे। सवाल उठता है कि ऐसे नाकारा लोगों को सिर्फ संवैधानिक पद के नाम पर वर्तमान केंद्र सरकार क्यों ढोये? हम जानते हैं कि नरेंद्र मोदी का एजेंडा देश को काफी आगे ले जाने का है और सुशासन देने का तो है ही? क्या ऐसे सोनिया के चमचे लोग मोदी के एजेंडे के लागू होने में कभी सहायक सिद्ध हो सकते हैं?

मित्रों,हम जानते हैं कि संविधान के अनुसार राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत पद को धारण करता है। हम यह भी जानते हैं कि संविधान में राष्ट्रपति का मतलब केंद्र सरकार से है तो फिर उचित तो यही होता कि ये लोग अपनी पार्टी के लोकसभा चुनावों में हार के बाद खुद ही पद छोड़ देते और नई सरकार को फिर से अपनी टीम गठित करने का मौका देते। इससे पार्टियों में सद्भावना भी बनी रहती और इनका महामहिमों का सम्मान भी बचा रह जाता। हम यह भी जानते हैं कि राज्यपाल राज्यों में केंद्र का प्रतिनिधि होता है तो फिर जब केंद्र में इनकी चहेती सरकार रही ही नहीं तो ये लोग उसके प्रतिनिधि होने का कैसे जबर्दस्ती दावा कर सकते हैं?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 12 जून 2014

यूपी में कब राष्ट्रपति शासन लगाएगी मोदी सरकार?

12-06-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों यूपी की जो हालत है उससे आप भी अच्छी तरह से वाकिफ हैं। चारों ओर कत्लो गारद और दंगे। बलात्कारों की तो जैसे बाढ़ ही आ गई है। यहाँ तक कि पुलिसवाले भी इस कुकृत्य को बखूबी अंजाम दे रहे हैं और राज्य के डीजीपी इसे रूटीन घटनाओं का नाम दे रहे हैं। तो क्या पुलिसवाले भी बलात्कार करके उसी रूटीन को पूरा कर रहे हैं? क्या बलात्कार करना पुलिसवालों की ड्यूटी में शामिल है?

मित्रों, अभी पढ़ने को मिला कि राज्य में यादव थानों पर डीजीपी भी हाथ नहीं डाल सकते क्योंकि तब उनको शिवपाल सिंह यादव की डाँट सुननी पड़ती है। यादव थानों का मतलब उन थानों से है जहाँ के थानेदार यादव हैं। जगह-जगह भाजपा कार्यकर्ताओँ को चुन-चुनकर मारा जा रहा है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो फिर कौन खुलकर भाजपा का झंडा उठाएगा?

मित्रों,कहने का मतलब है कि पूरे यूपी में कानून और संविधान का शासन समाप्त हो गया है और जंगलराज कायम हो गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि केंद्र की मोदी सरकार कब वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाएगी और वहाँ की जनता को कंसों के शासन से मुक्ति दिलवाएगी? आखिर किस बात का इंतजार है उसे? अगर मोदी सरकार ने भी राज्यसभा में बहुमत के लिए मुलायम सिंह यादव ते घिनौने हाथों को थाम लिया है तो फिर यूपी की उस जनता का क्या होगा जो दुर्भाग्यवश जन्मना यादव नहीं है? माना कि अभी वहाँ की सरकार को आए दो साल ही हुए हैं लेकिन इतने दिनों में ही वहाँ जिस तरह के हालात बन गए हैं क्या ऐसे में वहाँ की सरकार को उसका कार्यकाल पूरा करने देना वहाँ की जनता के साथ अन्याय और अत्याचार नहीं होगा?

मित्रों,भारत का संविधान कहता है कि राज्यों में कानून और संविधान का शासन चल रहा है या नहीं देखना केंद्र सरकार का काम है। इस काम को पूरा करने के लिए संविधान ने उसे अनुच्छेद 355 और 356 के तहत व्यापक अधिकार दिए हैं। क्या मोदी सरकार को अपने संवैधानिक कर्त्तव्यों का पालन करते हुए राज्य में अविलंब राष्ट्रपति शासन नहीं लगा देना चाहिए? नरेंद्र मोदी ने बार-बार देश को सुशासन देने का वादा किया है फिर यूपी में राष्ट्रपति शासन लगाए बिना यूपी में सुशासन कैसे आएगा? क्या अपने उन कार्यकर्ताओं की रक्षा करना भारत के प्रधानमंत्री बन चुके नरेंद्र मोदी का कर्त्तव्य नहीं है जो अपनी पार्टी के विकास को कार्यकर्ताओं की 5 पीढ़ियों की शहादत और मेहनत का परिणाम बताते नहीं थकते?
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 5 जून 2014

क्या मोदी का हिन्दी प्रेम दिखावा है?

5 जून,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। यह बात तो हम सभी जानते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुत अच्छी हिन्दी जानते हैं। लोकसभा चुनाव प्रचार के समय वे भारत को लगातार हिन्दी में संबोधित करते रहे। यहाँ तक कि केरल और तमिलनाडु में भी वे हिन्दी ही बोलते रहे और दुभाषिये की सहायता ली। इस साल सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक बार फिर से हिन्दी गूंजेगी। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी कई बार संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी में भाषण कर चुके हैं। मोदी द्वारा हिन्दी में संबोधन की खबर को सुनकर खुशी तो होती है लेकिन आश्चर्य और शक होता है कि क्या मोदी का हिन्दी प्रेम दिखावा है? अगर नहीं तो फिर भारत के प्रधानमंत्री की आधिकारिक वेबसाइट http://pmindia.nic.in/ पर जनता को हिन्दी में अपनी बातें रखने की अभी तक अनुमति क्यों नहीं दी गई है? राजस्थान से लेकिन बिहार तक पूरे हिन्दी क्षेत्र में अगर मोदी को जनता ने सिर आँखों पर नहीं बैठाया होता तो क्या वे आज भारत के प्रधानमंत्री होते और अगर होते तो इतनी मजबूत स्थिति में होते? फिर प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी ने हिन्दीभाषियों को अंगूठा क्यों दिखा दिया? http://pmindia.nic.in/feedback.php लिंक पर जाकर आप भी देख सकते हैं कि प्रधानमंत्री जी इन दिनों सिर्फ अंग्रेजी में ही जनता की शिकायतें सुन रहे हैं। फिर हिन्दीभाषी जनता क्या करे और कैसे अपनी समस्याओं से अपने प्रधानमंत्री को अवगत करवाए? क्या हिन्दीभाषियों को अपनी समस्याओं को अपनी भाषा में दर्ज करवाने का अधिकार नहीं होना चाहिए? आजकल तो दुनिया की किसी भी भाषा में लोग अपनी बातें रख सकते हैं। ऐसी सुविधा तो माइक्रोसॉफ्ट खुद ही दे रही है फिर सिर्फ अंग्रेजी में ही शिकायत दर्ज करवाने का प्रावधान क्यों? वोट मांगा हिन्दी में और पीएम बनते ही हिन्दी को अंगूठा दिखा दिया क्या यह दोहरा मानदंड नहीं है? क्या यह भारत की कथित राष्ट्रभाषा और स्वयं भारतमाता का अपमान नहीं है? क्या भारत की जनता को,भारतमाता की संतानों को भारतमाता की अपनी भाषा में बात रखने का अधिकार नहीं होना चाहिए? अगर नहीं तो फिर भारतमाता की जय और वंदे मातरम् नारा लगाने का क्या मतलब है? क्या मोदी का भारतमाता से प्रेम और उनके प्रति उनकी भक्ति भी सिर्फ दिखावा था मात्र चुनाव जीतने के लिए? यह कैसा राष्ट्रवाद है राष्ट्रवादी पार्टी भाजपा का? फिर अंग्रेजों,कांग्रेसियों और भाजपा में क्या अंतर है कम-से-कम भाषा के स्तर पर?
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 28 मई 2014

70 सालों तक विद्वानों के शिक्षा मंत्री रहते हुए भी देश में शिक्षा की स्थिति बुरी क्यों है?

28 मई,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों देश में बेवजह की बहस छिड़ी हुई है। बहस इस बात को लेकर चल रही है कि भारत के प्रधानमंत्री को एक इंटर पास महिला को भारत का शिक्षा मंत्री नहीं बनाना चाहिए था। लगता है जैसे स्मृति ईरानी को पढ़ाई का इंतजाम नहीं करना है बल्कि किसी विश्वविद्यालय में जाकर पढ़ाना है। मेरे चाचा बिल्कुल अनपढ़ हैं लेकिन किसी इंतजाम में लगा दीजिए तो वो ऐसा इंतजाम करते हैं कि जैसा कोई पीएचडी भी नहीं कर सकता। मेरे एक चचेरे दादाजी जो काफी कम पढ़े-लिखे थे शकुंतला देवी से भी ज्यादा तेजी में गणित की बड़ी-बड़ी गणनाओं को संपन्न कर दिया करते थे।
मित्रों,पिछले 70 सालों में भारत में एक-से-एक विद्वान इस पद को सुशोभित कर चुके हैं लेकिन फिर भी भारत में शिक्षा की स्थिति दयनीय है। क्या स्मृति जी की योग्यता पर सवाल उठानेवाले बंधु बता सकते हैं कि ऐसा क्यों है? क्या शिक्षा मंत्री बनने के लिए विदेश से हाई डिग्रीधारी बेईमान या चोर होना जरूरी है?  पिछले 5 सालों में कपिल सिब्बल ने शिक्षा के क्षेत्र को क्या दिया है सिर्फ शिक्षा के अधिकार के नामवाला कागजी अधिकार देने के सिवाय? ऐसे पढ़े-लिखे धूर्त से तो स्मृतिजी बेहतर ही हैं। वे पूरी तरह से अनपढ़ तो हैं नहीं कि हिन्दी और अंग्रेजी फाइलों को समझ ही नहीं पाएं। तीव्र प्रतिउत्पन्नमतित्व से संपन्न हैं,मेहनती हैं,देशभक्त और सबसे बड़ी बात तो यह है कि वे ईमानदार भी हैं। उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा है इसलिए वे हर तरह की चुनौतियों से बेहतर निपट सकती हैं।
मित्रों,अगर हम मुगल काल के इतिहास में झाँके तो हम पाते हैं कि इस काल में दो बड़े बादशाह हुए अकबर और औरंगजेब। अकबर पूरी तरह से अनपढ़ था फिर भी इतना सफल शासक साबित हुआ कि इतिहास ने उसे अकबर महान के विशेषण से विभूषित कर दिया। दूसरी तरफ औरंगजेब महाविद्वान था लेकिन वह उतना ही असफल सिद्ध हुआ। उसकी अव्यावहारिक नीतियों ने मुगल सल्तनत की चूलें हिला दीं। इसी तरह आज जिन कबीर के लिखे दोहों और साखियों को एमए तक में पढ़ा-पढ़ाया जाता है वे पूरी तरह से अनपढ़ थे। इसी तरह सत्य यह भी है कि मानव इतिहास के सबसे बड़े वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन ने कभी स्कूली शिक्षा ली ही नहीं थी और उनका दिमाग आज भी रिसर्च के लिए संभालकर रखा गया है। इसी तरह महाकवि महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जिनकी कविता राम की शक्ति पूजा को विश्व साहित्य में अद्वितीय स्थान प्राप्त है और जिन्होंने विवेकानंद साहित्य का अंग्रेजी से हिन्दी में अभूतपूर्व अनुवाद भी किया है और जिनके ऊपर लाखों बच्चे शोध कर चुके हैं मैट्रिक पास भी नहीं थे। इतना ही नहीं आधुनिक युग के एकमात्र हिन्दी महाकाव्य कामायनी के रचयिता जयशंकर प्रसाद भी नन मैट्रिक थे। इसी तरह हिन्दी सिनेमा के शो-मैन राजकपूर भी नन मैट्रिक थे।
मित्रों,क्या अब भी वे भाई लोग यही कहेंगे कि प्रतिभा डिग्री की मोहताज होती है? फिर अपने देश में तो डिग्रियाँ बिकती भी हैं। कई पीएचडी धारक एक आवेदन तक नहीं लिख पाते। ज्यादा पढ़े-लिखे तो हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी नहीं हैं तो क्या वे मनमोहन सिंह जी से कम योग्य हैं? मनमोहन सिंह विदेश से पीएचडी प्राप्त व्यक्ति थे उन्होंने देश को क्या दिया? अगर डिग्री ही सबकुछ होता है तब तो भारत के तमाम आईआईएम को नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार के इंतजामों का अध्ययन करने के लिए उनके पीछे नहीं भागना चाहिए था। फिर वे भाग क्यों रहे हैं? पिछले दो दिनों में मोदी ने जितना अच्छा काम किया है,एक ही दिन में उन्होंने जिस तरह नौ-नौ राष्ट्राध्यक्षों से वार्ता की क्या उसके लिए जरूरी योग्यता को किताबों को पढ़कर प्राप्त किया जा सकता है? क्या कोई हार्वर्ड का पीएचडी धारी निराला,कबीर,आइंस्टीन,प्रसाद बन सकता है? लाल बहादुर शास्त्री ने तो विदेश में पढ़ाई नहीं की थी फिर उन्होंने अपने दो सालों के छोटे से शासन ने भारत को वह सब कैसे दे दिया जो विदेश में पढ़े नेहरू 17 साल में भी नहीं दे सके।
मित्रों,इसलिए सवा सौ करोड़ भारतीय से विनम्र निवेदन है कि वे कृपया इस तरह का बेवजह का शरारतपूर्ण विवाद खड़ा नहीं करें। हमने कांग्रेस के महायोग्य मंत्रियों की महायोग्यता को पिछले 8 सालों तक देखा है और झेला है। कौन-सा मंत्री योग्य है और कौन-सा अयोग्य इसका निर्णय जनता पर छोड़िए और उनको चैन से 60 महीने तक काम करने दीजिए। जनता 60 महीने बाद खुद ही उनकी योग्यता पर अपना फैसला सुना देगी ठीक वैसे ही जैसे आपलोगों के बारे में सुनाया है और आपलोगों को मुख्य विपक्षी दल का दर्जा पाने के लायक भी नहीं समझा है।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 20 मई 2014

करारी हार के बावजूद जनता के संदेश को नहीं समझ पा रहा विपक्ष

20 मई,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बात चाहे खेल की हो या राजनीति की जब भी कोई टीम या पार्टी हारती है तो उससे यही अपेक्षा की जाती है कि वह हार के कारणों की समीक्षा करेगी और कारणों को समझकर उसे दूर करने के प्रयास करेगी। मगर लगता है कि हमारे देश की विपक्षी पार्टियाँ करारी हार के बावजूद यह समझ नहीं पा रही है या फिर समझना चाहती ही नहीं है कि जनता ने मतदान द्वारा क्या संदेश दिया है। अगर वे इसी तरह से नादानी करते रहे तो हमें कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर निकट-भविष्य में विधानसभा चुनावों में भी उनको सिर्फ पराजय और निराशा ही हाथ लगे।
मित्रों,कांग्रेस पार्टी का कहना है कि उसकी नीतियाँ तो अच्छी थीं लेकिन भाजपा ने दस हजार करोड़ के प्रचार-बजट से उनको मात दे दी। पता नहीं कांग्रेस वो कौन-सी नीति की बात कर रही है जो अच्छी थीं। क्या उनकी कोयला नीति सही थी,स्पेक्ट्रम नीति अच्छी थी,रक्षा खरीद नीति बेहतरीन थी? वे आजादी के 70 साल बाद आधी रोटी और पूरी रोटी की बात करते हैं और फिर भी अपनी नीतियों पर शर्मिंदा नहीं होते जबकि 70 सालों में 60 सालों तक उनका ही शासन रहा है। उन्होंने सूचना का अधिकार तो दे दिया लेकिन सूचनाएँ दी क्या? जब भी किसी ने राबर्ट वाड्रा से संबंधित जानकारी मांगी तो बहाना करके टाल दिया। लोग इस अपीलीय अधिकारी से उस अपीलीय अधिकारी के यहाँ चक्कर काटते रहते हैं लेकिन राज्य सरकारों का तंत्र सूचना नहीं देता। फिर कैसा सूचना का अधिकार,कौन सा सूचना का अधिकार? केंद्र में शिक्षा का अधिकार तो कागज पर दे दिया लेकिन देश के किसी भी गरीब-भुक्खड़ के बच्चों को इससे कोई लाभ हुआ क्या? फिर यह कैसा अधिकार है जो वास्तव में है ही नहीं?! भारत की जनता को केंद्र सरकार द्वारा भिखारी मान लिया जाना क्या अच्छी नीति कही जा सकती है? यह मुफ्त वह मुफ्त लेकिन रोजगार नहीं देंगे। केंद्र सरकार ने महंगाई को नियंत्रित करने के लिए क्या किया? कौन-सी नीति अपनाई? क्या देश को जानलेवा महंगाई की आग में झोंक देना उसकी अच्छी नीति थी? कल जब कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक थी तो उम्मीद की जा रही थी कि उसमें हार के कारणों की गहराई और विस्तार से समीक्षा की जाएगी और जरूरी कदम उठाएंगे। मगर हुआ क्या माँ-बेटे ने इस्तीफा दिया,कार्यसमिति ने पूर्वलिखित नाटक की तरह नामंजूर कर दिया और कर्त्तव्यों की इतिश्री हो गई।
मित्रों,हमारे विपक्षी दल अभी भी एक-दूसरे के सिर पर हार का ठीकरा फोड़ने में लगे हैं और अपने गिरेबान में झाँक नहीं रहे हैं। समाजवादी पार्टी कहती है कि हम कांग्रेस के कारण हारे जबकि जबसे यह पार्टी उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई है तबसे उसने ऐसा कोई भी एक काम नहीं किया है जिससे जनता को अपनी सरकार पर गर्व हो। अभी कल ही उसके मंत्री आजम खान आधी रात में अपने गुर्गों को छुड़वाने के लिए रामपुर जिले के अजीमनगर थाने पर जा धमकते हैं। उनके पूरे गृह जिले रामपुर में किसान नलकूपों को बिजली नहीं मिलने से परेशान हैं मगर उनकी समस्याओं की ओर मंत्रीजी की निगाह नहीं जाती उनका पूरा ध्यान अपने गुंडों को बचाने पर रहता है। पार्टी की बैठक में जनता की समस्याओं और उनके विकास पर चर्चा नहीं होती बल्कि इस बात पर बहस की जाती है कि किस जाति और धर्म के कितने लोगों ने हमें वोट दिया और कितनों ने नहीं दिया मगर लखनऊ में पानी किल्लत पर कोई बात नहीं होती।
मित्रों,अपने को प्रधानमंत्री का सबसे सुटेबल उम्मीदवार माननेवाले नीतीश कुमार की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। उनको लगता है कि प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी से हाथ मिलाने से बेहतर है पद से इस्तीफा दे देना। क्या यह अस्पृश्यता नहीं है? नीतीश जी मानते हैं कि महादलित को मुख्यमंत्री बना देने मात्र से महादलितों की जिन्दगी बदल जाएगी और वे फिर से उनके पाले में आ जाएंगे। क्या महादलितों का विकास सिर्फ एक महादलित ही कर सकता है? क्या उनका दर्द सिर्फ एक महादलित ही समझ सकता है? क्या ईमानदारी और योग्यता की कोई कीमत नहीं होती सबकुछ जाति ही होती है? अगर अभी  भी नीतीश ऐसा ही समझते हैं तो वे निश्चित रूप से फिर से मुँह की खानेवाले हैं। दुनिया के सबसे युवा राष्ट्र को जाति नहीं विकास चाहिए,रोजगार चाहिए। चुनाव परिणामों ने आसमान में एक ईबारत लिख दी है कि जाति और संप्रदाय के नाम पर बाँटकर वोट पाने के दिन अब लद गए। समाप्त हो गया वह युग जब जनता के बीच पैसे और सामान बाँटकर वोट बटोर लिया जाता था। वीत गया वह समय जब जनता नंगी-भूखी रहकर भी किसी खास राजनैतिक परिवार के लिए जान तक देने को तैयार रहती थी। उस कालखंड का भी अंत हो गया जब चुनाव-दर-चुनाव एक ही वादा कर करके पार्टियाँ चुनाव जीत जाया करती थी। अच्छा होगा कि हमारे विपक्षी दल इस नए जमाने की नई तरह की राजनीति को यथाशीघ्र समझ लें और उसके अनुसार अपने आपको ढाल लें नहीं तो जनता तो उनको अप्रासंगिक बना ही देगी।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 18 मई 2014

देवा रे देवा नीतीश कुमार की इतनी हेराफेरी!

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कल न जाने क्यों 3 बजे दोपहर में मेरे मोहल्ले की बिजली चली गई और आई तो साढ़े चार बज रहे थे। इसी बीच मुझे फेसबुकिया दोस्तों से मालूम हुआ कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया है। यकीन ही नहीं हुआ लेकिन जब इंटरनेट पर ढूंढ़ा तो पता चला कि यही सच है। फिर 5 बजे नीतीश कुमार ने संवाददाता सम्मेलन किया और कहा कि हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए वे इस्तीफा देते हैं। उन्होंने जनता के विवेक पर प्रश्न-चिन्ह लगाते हुए कहा कि बिहार में मतदान सांप्रदाय़िक ध्रुवीकरण के आधार पर हुआ है जिससे वे क्षुब्ध हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कल 4 बजे शाम में जदयू विधायक दल की बैठक होगी। मन में कई तरह के कयास जन्म लेने लगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ होगा जिसने बिहार के मुख्यमंत्री को इस्तीफी देने पर मजबूर कर दिया क्योंकि मैं नहीं मानता कि इन कथित नमाजवादियों के पास थोड़ी-सी भी नैतिकता बची हुई है जिसके आधार पर ये इस्तीफा दें। तभी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडे टीवी पर प्रकट हुए और नीतीश के पद-त्याग को कोरा नाटक करार दे दिया। झारखंड भाजपा नेता सीपी सिंह ने तो कह भी दिया कि इनके पास नैतिकता है ही नहीं तो फिर ये कैसे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे सकते हैं।
मित्रों,इसके बाद टीवी पर दिखाई दिए जदयू के ऱाष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और दावा कर गए कि कल उनके फैसलों से सभी चौंक जाएंगे। साथ ही उन्होंने कथित धर्मनिरपेक्षता की प्राण-रक्षा की खातिर अपने चिर शत्रु रहे लालू प्रसाद यादव से हाथ मिलाने का दावा किया। उधर लालू जी ने भी उनकी तरफ बढ़े हुए मजबूरी की दोस्ती के बढ़े हुए इस हाथ को झटका नहीं दिया और थाम लेने के संकेत दिए।
मित्रों,लेकिन इस नाटक पर से पर्दा उठा दिया जदयू के प्रवक्ता केसी त्यागी ने। त्यागी जी से जब पूछा गया कि क्या कल नीतीश जी की जगह किसी दूसरे व्यक्ति को नेता चुना जाएगा तो उन्होंने कहा कि ऐसा संभव ही नहीं है। नीतीश हमारे सर्वमान्य नेता हैं। उन्होंने एनडीए को चुनौती दी कि हम उनको 24 घंटे का समय देते हैं इस बीच अगर उनके पास बहुमत है तो सरकार बना लें। अब कोई रहस्य नहीं रह गया था,सबकुछ सामने था। स्पष्ट हो चुका था कि नीतीश जी यह इस्तीफा उसी तरह से दिया गया इस्तीफा था जिस तरह कि उन्होंने कभी रेल मंत्री के पद से दिया था। तब उन्होंने इस्तीफे को सीधे राष्ट्रपति को नहीं भेजकर प्रधानमंत्री को भेज दिया था जिन्होंने स्वाभाविक तौर पर उनके त्याग-पत्र को नामंजूर कर दिया था। इसलिए नीतीश कुमार के पुराने रिकार्ड को देखते हुए संभावना तो यही है कि आज फिर से विधायक दल की बैठक में नीतीश कुमार जी खुद को नेता चुनवाएंगे और फिर से मुख्यमंत्री के पद की शपथ लेंगे। देवा रे देवा इतनी हेराफेरी! नीतीश जी जितना नाटक करना है करिए लेकिन जनता के विवेक पर सवाल खड़े नहीं करिए। अवसर आपके लिए भी खुले हुए थे। आपने क्यों जनता को अपनी तरफ नहीं कर लिया? नरेंद्र मोदी ने तो कहीं सांप्रदायिकता की बात ही नहीं की फिर जनता ने कैसे सांप्रदायिक बहकावे में आकर मतदान कर दिया? आप हार चुके हैं,हारना भी सीखिए और हार को पचाना भी। जनता आपको भी समझ रही है और आपके नाटकों को भी जो आप पिछले 8 सालों से बिहार के रंगमंच पर खेल रहे हैं। मिला लीजिए जंगलराज के डाइरेक्टर लालू जी से भी हाथ और फिर भी करते रहिए नैतिक होने का ढोंग।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 17 मई 2014

छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी

17-05-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आज का सूर्योदय आपने देखा होगा और पाया होगा कि आज भी सूरज पूरब से निकला है लेकिन वह सूरज झूठा है। आज के भारत का वास्तविक सूरज पूरब से नहीं सुदूर पश्चिम से उदित हुआ है। कल तक हम जब पुराने सूरज की रोशनी में थे तो हमें लालची,नपुंसक,जातिवादी और संप्रदायवादी कहा जाता था लेकिन आज हमने उतार फेंका है इन आरोपों को और पूरी ताकत से उछाल दिया है दुनिया के आसमान में एक पत्थर जो हमें उम्मीद है कि नाकामी और मायूसी के बादलों को तितर-बितर करके रख देगा।

मित्रों,हमें नहीं चाहिए खैरात हमें तो काम चाहिए। आखिर हम दुनिया के सबसे युवा राष्ट्र जो ठहरे। हमें नहीं चाहिए भीख की रोटी हमें तो ईज्जत की रोटी चाहिए। हमें नहीं चाहिए एक अंतहीन इंतजार कि अब हमारे राजनीतिज्ञ देश को बदलनेवाले हैं। कभी नेपोलियन ने अपने एक सेनापति से कहा था कि चेंज योर वाच अदरवाईज आई विल चेंज यू। लीजिए हमने अपना सेनापति बदल दिया क्योंकि हमारे लिए प्रतीक्षा अब असहनीय हो गई थी। जबकि कंप्यूटर के एक क्लिक से पलक झपकते ही बड़े-बड़े काम संपन्न हो जाते हैं हमारे राजनेता चुनाव-दर-चुनाव पुराने वादों पर ही अँटके थे।

मित्रों,हम भी चाहते हैं दुनिया के विकास की दौड़ में रेस लगाना और सबसे आगे निकलना। हमारा युवा रक्त कैसे बर्दाश्त करता कि चीन,पाकिस्तान जैसे पड़ोसी हमें आँखें दिखाए। हमारा युवा जोश कैसे सहता कि चीन की जीडीपी हमारी जी़डीपी की तीन गुना से भी ज्यादा हो गई है। हमारी इस्पाती नसें और हिमालय सरीखी दृढ़ता भला इस सत्य को कैसे स्वीकार करतीं कि भारत सरकार ठगों और भ्रष्टाचारियों का दुनिया में सबसे बड़ा जमावड़ा बन गई है। हमें तो वादे नहीं इरादे चाहिए थे इसलिए हमने इस बार बिल्कुल नए इरादे से मतदान किया और नए सिरे से लिख दिया भारतीय राजनीति की प्रस्तावना को। अब से हमारे जान से भी ज्यादा प्यारे भारत में सिर्फ-और-सिर्फ विकास चलेगा और विकास की ही राजनीति चलेगी। नहीं चलेगा जातिवाद और संप्रदायवाद के नाम पर ठगी सिर्फ सच्चा राष्ट्रवाद चलेगा। अब हमें याद नहीं रहा कि हमने किस जाति और संप्रदाय में जन्म लिया था हमें तो बस इतना ही याद है कि हम प्रथमतः और अंततः एक भारतीय हैं भारतीय आत्मा हैं।

मित्रों,हम न तो बहानेबाज हैं और न ही हमें बहानेबाज सरकार चाहिए। हम युवा हैं बहाने नहीं बनाते देश बनाते हैं,देश का वर्तमान और भविष्य बनाते हैं। हम नहीं जानते कि मजबूरी क्या होती है। हम इतना ही जानते हैं कि हमारे हाथों की गर्मी से मोटी-मोटी जंजीरें पिघल जाएंगी इसलिए हमने केंद्र की सरकार को भी मजबूत जनादेश दिया है। पूरी ताकत दी है कि तुम बनाओ नया भारत,लिखो नए युग की इबारत और हमें भी भागीदार बनाओ वास्तविक अतुल्य भारत के वास्तविक निर्माण में। हमने अपनी ऊंगली के जादू से सरकार को बदला है अब अपने फौलादी इरादे और मांसपेशियों से हम भारत को भय,भूख और भ्रष्टाचार से रहित विकसित राष्ट्र बनाएंगे।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 14 मई 2014

याद रहोगे मनमोहन

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विदाई देने का सिलसिला जारी है। अगले एक-दो दिनों में ही मनमोहन सिंह इतिहास का हिस्सा बन जाएंगे। मनमोहन भले ही कोई इतिहास बना नहीं सके लेकिन फिर भी वे इतिहास का हिस्सा तो बन ही गए हैं। चाहे उनका शासन जैसा भी रहा हो,हमारे लिए वो अच्छी यादें हों या बुरी यादें लेकिन हम चाहकर भी उनको भुला नहीं पाएंगे। वैसे भी बुरी यादों को भुलाना कहीं ज्यादा कठित होता है। जितना भुलाना चाहो वे उतनी ही ज्यादा याद आती हैं। याद तो बहुत आएंगे मनमोहन मगर सवाल उठता है कि किस रूप में और किस-किस रूप में?
मित्रों,संजय बारू की किताब के प्रकाशित होने के बाद अब इस तथ्य में कोई संदेह नहीं रहा कि मनमोहन एक दुर्घटनात्मक प्रधानमंत्री थे। मनमोहन राजनीति में अर्थव्यवस्था के कारीगर मात्र बनकर आए थे लेकिन उनको बनना पड़ा प्रधानमंत्री। पड़ा इसलिए क्योंकि वे उन्होंने बनना चाहा नहीं था मगर बने। हमने शतरंज के खेल में प्यादा को वजीर तक बनते देखा है मगर मनमोहन ऐसे वजीर थे जो शुरू से अंत तक प्यादा ही बने रहे। या तो उनको वजीर बनना ही नहीं था या फिर उनको वजीर बनना आता ही नहीं था।
मित्रों,प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मंत्री तो थे मगर मंत्रियों के प्रधान नहीं थे। उन्होंने अपना हानि-लाभ,जीवन-मरण,यश-अपयश सबकुछ सोनिया परिवार के हाथों में सौंप दिया था। मनमोहन समर्पण की पराकाष्ठा थे। तुभ्यदीयं गोविंदं तुभ्यमेव समर्पयामि। यहाँ तक कि उन्होंने अपने आराध्य को देश भी समर्पित कर दिया। हे माता तुमने ही मुझे प्रधानमंत्री बनाया है। मैं तो एक छोटा-सा बालक हूँ और उस पर निर्बल भी इसलिए तुम्हीं संभालो इस राज-पाठ को। मैं कुछ भी नहीं जानता,न देश को और न ही देशहित को। मैं तो केवल तुमको जानता हूँ। मेरे लिए तो सबकुछ तुम-ही-तुम हो। आरंभ भी,मध्य भी और मेरा अंत भी।
मित्रों,सवाल उठता है कि क्या मनमोहन सिंह निरपराध हैं और भोले हैं? मेरे हिसाब से तो नहीं। वे इन दोनों में से कुछ भी नहीं हैं। वो इसलिए क्योंकि उन्होंने जो कुछ भी किया या होने दिया जानबूझकर किया और होने दिया। मनमोहन सिंह ने जानबूझकर अपार संभावनाओं की भूमि भारत का 10 साल बर्बाद किया। दस साल तक सबकुछ जानते हुए भी भारत में वह सब होने दिया जिसने भारत की गाड़ी को 21वीं सदी के अतिमहत्त्वपूर्ण पहले दशक में रिवर्स गियर में चला दिया। निरपराध और भोले तो वे तब होते जब उनको कुछ भी पता नहीं होता या फिर वे महामूर्ख होते। परंतु दुर्भाग्यवश इन दोनों संभावनाओं के लिए मनमोहन के संदर्भ में कहीं कोई स्थान नहीं है।
मित्रों,मनमोहन जा नहीं रहे,बिल्कुल भी स्वेच्छा से नहीं जा रहे वरन् उनको जनता ने धक्का देकर निकाल दिया है। हमने बहुत प्रतीक्षा की,बहुत इंतजार किया कि अब शायद उनका जमीर जागे और मनमोहन इस्तीफा दे दें। मगर भारत में लगातार दुःखद घटनाएँ घटती रहीं,मनमोहन हर मोर्चे पर विफल होते गए परन्तु स्वेच्छा से पद-त्याग नहीं किया। उनका जमीर या तो मर गया था या फिर उनके पास जमीर नामक कोई चीज थी ही नहीं। वे एक नौकरशाह थे और नौकरी उनके खून में थी इसलिए वे मालिक होकर भी नौकर ही बने रहे और नौकरी ही करते रहे। चूँकि मनमोहन प्रधानमंत्री पद से अपने सुखद और प्रतीष्ठापूर्ण अंत को सुनिश्चित नहीं कर सके और उन्होंने देश को सिवाय बर्बादी के कुछ नहीं दिया इसलिए हम वाहेगुरू से यह कामना करते हैं कि वे आधुनिक युग के इस स्वनिर्मित धृतराष्ट्र को उसके बचे-खुचे बुढ़ापे में उसके गर्हित कर्मों या अकर्मों के लिए दंडित जरूर करे क्योंकि भारत का वर्तमान कानून तो शायद उनको कभी दंडित नहीं कर पाएगा। वैसे आपको बता दूँ कि कल मंगलवार को ही इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री यहूद ओलमर्ट को तेलअवीव की एक अदालत ने भ्रष्टाचार के आरोप में 6 साल की कैद की सजा सुनाई है।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 8 मई 2014

हाजीपुर टाईम्स का असर विवि को वेतन व पेंशन का 279.70 करोड़ जारी

पटना (सं.सू.)। बीते दो माह से वेतन एवं पेंशन की प्रतीक्षा कर रहे विश्वविद्यालय शिक्षकों एवं कर्मियों के लिए यह अच्छी खबर है। राज्य सरकार ने मार्च और अप्रैल के वेतन एवं पेंशन मद की एकमुश्त राशि 279.70 करोड़ जारी किया है। इस संबंध में शिक्षा विभाग के विशेष सचिव सह निदेशक एचआर श्रीनिवास ने एक सप्ताह के अंदर वेतन एवं पेंशन की राशि का वितरण सुनिश्चित करने का आदेश सभी कुलसचिवों को दिया है। राज्य सरकार ने मार्च से मई तक सभी विश्वविद्यालयों और उनके अधीनस्थ अंगीभूत महाविद्यालयों के अलावा अल्पसंख्यक कालेजों के शिक्षकों एवं कर्मचारियों के वेतन मद में 313.27 करोड़ और पेंशन मद में 106.27 करोड़ की स्वीकृति प्रदान की है। यह कुल राशि 419.55 करोड़ है। इनमें से मार्च एवं अप्रैल की राशि जारी की गई है। शिक्षा विभाग की ओर से मई का वेतन एवं पेंशन मद की राशि को भी शीघ्र जारी किए जाने की उम्मीद है।

विदित हो कि हाजीपुर टाईम्स ने 29 अप्रैल को समाचार लिखा था कि भुखमरी के कगार पर पहुँचे बिहार के विश्वविद्यालय शिक्षक। हमारी मेहनत ने रंग दिखाया है और बिहार सरकार को विश्वविद्यालयों के वेतन और पेंशन मद में दो महीने के लिए एकमुश्त राशि जारी करनी पड़ी है। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 7 मई 2014

प्रशासनिक लापरवाही के चलते हजारों लोग नहीं गिरा पाएंगे वोट

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। जिला प्रशासन की लापरवाही या मनमानी के चलते हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र में हजारों मतदाता अपना मतदान नहीं कर पाएंगे और इस प्रकार मतदान करने के अपने मूलभूत अधिकार से वंचित रह जाएंगे। विदित हो कि इसी साल 9 मार्च को पूरे देश में राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया गया था और चुनाव आयोग द्वारा घोषणा की गई थी कि जिन लोगों के नाम अब तक वोटर लिस्ट में नहीं है वे फार्म संख्या 6 भरकर अपना नाम जुड़वा सकते हैं। उस समय भी हमने लिखा था कि वैशाली जिला प्रशासन ने राष्ट्रीय मतदाता दिवस ने इस अभियान को गंभीरता से नहीं लिया। (आधे-अधूरे मन से मनाया गया मतदाता दिवस) परन्तु अहले सुबह जब लोग अपने परिवार के साथ मतदान केंद्र पर पहुँचे तो पता चला कि उनका नाम तो लिस्ट में जुड़ा ही नहीं है। हालाँकि कुछ लोगों के नाम जोड़े गए हैं लेकिन ये लोग वे हैं जिनके किसी-न-किसी परिजन का नाम पहले से लिस्ट में दर्ज है और जिनके किसी भी परिजन का नाम पहले से लिस्ट में नहीं है उनके नाम लिस्ट में जोड़े ही नहीं गए और ऐसे में हजारों लोग मतदान करने से वंचित रह जाएंगे।

जढ़ुआ के महावीर राय ने बताया कि उनका नाम वोटर लिस्ट से उनके वार्ड आयुक्त ने इसलिए हटवा दिया है क्योंकि वे उसके समर्थक नहीं हैं वहीं जढ़ुआ के ही नरेश साह ने बताय कि उन्होंने पिछले 15 सालों में हर बार कम-से-कम 10 बार फार्म 6 भरकर जमा किया लेकिन उनका या उनके परिजनों का नाम आजतक भी वोटर लिस्ट में दर्ज नहीं है। इसी प्रकार सहयोगी उच्च विद्यालय पर भी कई ऐसे लोग जिन्होंने फार्म 6 जमा करवाया था वोटर लिस्ट में अपना नाम न पाकर परेशान दिखे। इस बावत पूछने पर हाजीपुर नगर की भाग संख्या 108 की बीएलओ संगीता कुमारी ने बताया कि उन्होंने तो निर्वाची कार्यालय में सभी प्रपत्र 6 को जमा करा दिया था लेकिन नए नाम क्यों नहीं जुड़ सके उनको पता नहीं है। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

कौन कहता है कि (बूढ़े) दिग्विजय सिंह इश्क नहीं करते?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। एक बड़ा लोकप्रिय शेर है कौन कहता है कि बूढ़े इश्क नहीं करते,यह अलग बात है कि हम उन पर शक नहीं करते। इस शेर को अगर किसी पार्टी के नेताओं ने सचमुच में चरितार्थ करके दिखाया है तो वो पार्टी है कांग्रेस पार्टी। एक-के-बाद-एक कांग्रेस पार्टी के नेता ऐय्याशी में संलिप्त पाए गए हैं और अब बारी है पार्टी के थिंक टैंक दिग्विजय सिंह की।

आयु के मुताबित वयोवृद्ध की श्रेणी में आ चुके दिग्विजय सिंह की पोती की उम्र की लड़की के साथ तस्वीरें और सेक्स क्लिप इस समय सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रहा है। बताया जाता है कि लड़की का नाम अमृता राय है और वो राज्यसभा टीवी में एंकर है। सूत्रों से पता चला है कि यह क्लिप खुद दिग्विजय के मोबाईल से ही शूट किया गया है जिसको उनके ड्राईवर ने चुरा लिया था।

सवाल उठता है कि दूसरों पर जमकर ऊंगली उठानेवाले दिग्विजय अब अपनी पोल खुलने पर क्या प्रतिक्रिया देंगे? क्या उनका यह कृत्य नैतिक दृष्टि से उचित है? दिग्विजय को बुढ़ापे में विधुरावस्था बर्दाश्त नहीं हो रही थी तो उन्होंने उक्त लड़की से शादी क्यों नहीं कर ली? पाठक चाहें तो यहाँ क्लिक करके मामले से संबंधिक जानकारी विस्तार से प्राप्त कर सकते हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बिहार पुलिस के वरीय अधिकारी अमिताभ कुमार दास का अमर्यादित आचरण

पटना,रजनीश कुमार। बिहार के लोगों ने शायद ही कभी पुलिस का मानवीय चेहरा भी देखा हो। शायद यही कारण है कि कोई भी व्यक्ति यह नहीं चाहता कि कोई पुलिस अधिकारी या जवान उसका पड़ोसी हो। लेकिन जब ऐसा हादसा हो ही जाए तो कोई क्या करे। बिहार पुलिस के वरिष्ठतम अधिकारियों में से एक रेल पुलिस अधीक्षक जमालपुर (मुंगेर) श्री अमिताभ कुमार दास के द्वारा न्यू पाटलिपुत्रा कोलोनी, पटना के स्काईज अपार्टमेंट में एक फ्लैट खरीदा गया है, जहाँ उनका स्थायी आवास है। दुर्भाग्यवश उसी अपार्टमेंट में संवाददाता के बहनोई के भी दो फ्लैट हैं। श्री दास जबसे पड़ोसी बने हैं तभी से उन्होंने अपने साथ करीब दस सिपाहियों को स्थायी रूप से रखा हुआ है, जिन्हें वे अपने फ्लैट में न रखकर नीचे पार्किंग एरिया में रखते हैं। सिपाहियों ने अपार्टमेन्ट के पार्किंग एरिया को बाकायदे टेंट लगाकर घेर लिया गया है और गाड़ी लगाने के जगह को अवैध रूप से कब्जे में कर लिया है।
इतना ही नहीं इनके ड्राईवर हरेन्द्र ने अपार्टमेन्ट की सबसे ऊपरी मंजिल पर स्थित लिफ्ट-रूम को अपने कब्जे में कर रखा है तथा उसे अपने कमरे की तरह व्यवहार में लाते हैं। श्री दास के पास दो-दो सूमो गाड़ियाँ हैं, जिन्हें वे दूसरों के पार्किंग में लगाते हैं। अपने पार्किंग एरिया में अपने सिपाहियों को रखते हैं और दूसरों की जगह पर अपनी गाड़ी लगाते हैं। साथ ही गेस्ट के लिए निर्धारित पार्किंग एरिया को भी कब्जाए हुए हैं।
दोनों गाड़ियों से साहब के डेरे में अनजान महिलाओं का आना-जाना अक्सर लगा रहता है जिससे यहाँ का सामाजिक वातावरण दूषित हो रहा है। इसके चलते अन्य फ्लैट मालिकों को यहाँ पारिवारिक डेरा लेने से पहले हजार बार सोचना पड़ रहा है।
आते-जाते रास्ते पर इस अत्यंत छोटे से अपार्टमेन्ट में इतनी अधिक संख्या में अनावश्यक रूप से सिपाहियों के रहने के कारण भी लोगों को असहज लगता है और हालत यह है कि यहाँ अब फ्लैट भी कोई किराए पर लेने को तैयार नहीं।
एक सीनियर आईपीएस अधिकारी के इस प्रकार के अशोभनीय चरित्र और रवैये ने उनके पड़ोसियों का जीना मुहाल कर दिया है। ये अपने पद और मिली सुविधाओं का दुरूपयोग अपने पड़ोसियों को परेशान करने में कर रहे हैं। ऐसे पदाधिकारी जो सुविधाओं का दुरूपयोग करे की पोस्टिंग तो ऐसी जगह होनी चाहिए थी, जहाँ इसके दुरूपयोग की कोई गुजाईश ही न रहे। इनके इस कारनामे से बिहार पुलिस की बदनामी तो हो ही रही है, वे इस अपार्टमेन्ट के फ्लैट-धारकों के लिए स्थायी तनाव का कारण बन गए हैं और ऐसा वे केवल इस कारण कर पा रहे हैं क्योंकि वे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हैं।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

भुखमरी के कगार पर पहुँचे बिहार के विश्वविद्यालय शिक्षक

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। प्रदेश और विशेष रूप से बीआरए बिहार विवि में कार्यरत और अवकाशप्राप्त विश्वविद्यालय शिक्षकों की हालत भिखारियों जैसी हो गई है और वे भुखमरी के कगार पर पहुँच गए हैं। विदित हो कि राज्य के विश्वविद्यालय शिक्षकों को फरवरी तक का ही वेतन-पेंशन दिया गया है। बीच में मार्च महीने में उनलोगों को बीमों की किश्तें और आयकर देना पड़ा जिससे फरवरी का वेतन-पेंशन इन कामों में ही हवा हो गया।

विदित हो कि गत 11 अप्रैल को राज्य सरकार के शिक्षा विभाग के सचिव एचआर श्रीनिवास ने घोषणा की थी कि अगले एक सप्ताह में प्रदेश के कार्यरत और अवकाशप्राप्त विवि शिक्षकों नए वेतनमान के बकाये की पहली किस्त दे दी जाएगी परंतु जबकि अब यह महीना समाप्त होने को है किस्त का कहीं अता-पता नहीं है। पिछले दो महीने से वेतन-पेंशन नहीं मिलने से इन हजारों शिक्षकों की आर्थित हालत इतनी खराब हो चुकी है कि उनके परिवार को शाक-सब्जी जैसे छोटे-मोटे खर्चों में भी कटौती करनी पड़ रही है और परिचितों से कर्ज लेना पड़ रहा है।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मैं चाय भी बेच सकता हूँ मेरी चिंता न करें कांग्रेसी-नमो

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने जी न्यूज को दिए गए साक्षात्कार में कहा है कि अगर हारा तो मैं चाय भी बेच सकता हूँ इसलिए कांग्रेसियों को उनकी चिंता नहीं करना चाहिए।  इसके बजाए उनको खुद की चिंता करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उनको इस बात की चिंता नहीं है कि कोई नेता उनको पसंद करता है या नहीं बल्कि वे तो बस इतना ही जानते हैं कि जनता को उनकी बातें अच्छी लगती हैं। श्री मोदी ने मीडिया के एक वर्ग पर बिना जाँच किये उनके खिलाफ मुहिम चलाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वे खुद भी खुद को पूरी तरह से नहीं जानते हैं परंतु इतना जरूर है कि उनमें अथक परिश्रम करने की क्षमता है और उनके मन में सिर्फ आशा ही आशा है। श्री मोदी ने कहा कि वे कभी अपनी जाति बताना नहीं चाहते थे क्योंकि वे जातिवादी बिल्कुल भी नहीं हैं लेकिन उनको जब पानी पी पीकर उनको ऊँची जाति का और अमीर परिवार का बताकर गालियाँ दी जाने लगीं तो उनको कहना पड़ा कि वे पिछड़ी जाति और गरीब परिवार से आते हैं।

उन्होंने कहा कि देश की सबसे अनुभवी पार्टी कांग्रेस ने अपने वक्तव्यों से पिछले कुछ दिनों में स्पष्ट कर दिया है देश में इस समय परिवर्तन की हवा चल रही है और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो चुकी है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस आदि को लगता है कि मोदी को गालियाँ देने से वोट मिलेगा जबकि वे मानते हैं कि विकास और सुशासन के नाम पर वोट मिलेगा।

उन्होंने कहा कि देश के समक्ष सबसे बड़ा संकट यह है कि कांग्रेस अपने कुकृत्यों से शर्मिंदा नहीं है उल्टे आक्रामक है। मोदी ने कहा कि साथ में परिवार होने से ही कोई भ्रष्ट नहीं हो जाता बल्कि उनकी माँ तो आज भी 20 रुपए की चप्पल पहनती है और मुझे इस बात पर गर्व है। श्री मोदी ने कहा कि वे बदले की भावना से काम नहीं करते हैं बल्कि उनके पास तो काम करने से ही वक्त नहीं बचता। उन्होंने कहा कि प्रत्येक मामले में कानून अपना काम करेगा।

श्री मोदी ने कहा कि उनका एजेंडा सुशासन है और वे सिर्फ इसी पर बात करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि गरीबों की गरीबी हमेशा के लिए समाप्त हो,बेरोजगारों को रोजगार मिले,कृषकों को फसल का सही मूल्य मिले,भ्रष्टाचार और महंगाई कम हो। उन्होंने कहा कि कश्मीर को डुबानेवाले उनके समर्थकों को डुबाने की बात कर रहे हैं। उनकी सुरक्षा पर मंडराते खतरे पर उन्होंने कहा कि मोदी रहे न रहे देश सुरक्षित रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि चुनाव केंद्र में हो रहा है और विपक्ष गुजरात सरकार का विश्लेषण करने में लगे हैं जबकि बात केंद्र की सरकार के कामकाज की होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वे मजदूर हैं और मजदूरों की तरह ही मेहनत करते हैं। वे अन्य नेताओं की तरह आरामतलब नहीं हैं। उनको आराम नहीं काम चाहिए।

मोदी ने कहा कि उनको तब घोर आश्चर्य हुआ था जब आधे भारत को अंधेरे में डुबा देनेवाले व्यक्ति को प्रोन्नति देकर भारत का गृह मंत्री बना दिया गया। क्या इस तरह से अच्छा शासन लाया जा सकता है? उन्होंने भारत के चुनावों में विदेश नीति की चर्चा नहीं होने पर चिेता जताई। उन्होंने कहा कि नैन्सी पावेल की छुट्टी हो जाने के कारणों को अमेरिका की सरकार ही बता सकती है।

उन्होंने कहा कि उनको यह पता है कि गुजरात मॉडेल पूरे देश में लागू नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि वे जनता की नब्ज समझते हैं। उनको पता है कि देश की जनता को पिछले 12 सालों में क्या-क्या भुगतना पड़ा है। उनको यह भी पता है कि पूरे देश को एक ही डंडे से नहीं हाँका जा सकता। उन्होंने कहा कि विकास और सुशासन उनकी प्राथमिकता है वे यह-वह कर देने के दावे नहीं करते। उन्होंने कहा कि कुशासन,महंगाई,बेरोजगारी सहित सारी समस्याएँ कांग्रेस से जुड़ी हुई हैं इसलिए कांग्रेस को समाप्त करना पड़ेगा तभी ये समस्याएँ भी समाप्त होंगी। उन्होंने कहा कि 16 मई को निराशा का अंत हो जाएगा और सवा सौ करोड़ भारतीयों के मन में आशा का संचार हो जाएगा। साक्षात्कार के अंत में उन्होंने 18 से 28 आयुवर्ग के नौजवानों से अपील की कि जीवन के इस सबसे महत्वपूर्ण क्षण में वोट डालकर उनको अपने भविष्य का फैसला खुद ही करना चाहिए।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 26 अप्रैल 2014

क्या दाउद को पकड़ने की योजना बना चुके हैं मोदी?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। पिछले साल जब आईपीएल में मैच फिक्सिंग का मामला सामने आया तो दिल्ली पुलिस को पता चला कि इस पूरे खेल के पीछे किसी और का नहीं बल्कि दाउद इब्राहिम का हाथ था। जाहिर है इतना बड़ा खेल वो भी सरेआम दाउद ऐसे ही नहीं खेल रहा था बल्कि उसकी पीठ पर केंद्र सरकार में शामिल किसी बहुत बड़े आदमी का हाथ था। ऐसे में जब भारत के गृह मंत्री ने इसी साल भरोसा जताया कि भारत एक दिन दाउद को भी पकड़ने में कामयाब हो जाएगा तो शायद ही किसी ने उनके इस भरोसे पर भरोसा जताया।

परंतु जिस तरह से कल भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने अपने साक्षात्कार में अचानक दाउद का जिक्र छेड़ दिया उसने एक बार फिर से इस सवाल को चर्चे में ला दिया है कि क्या दाउद इब्राहिम को सचमुच पकड़ा जा सकता है? मोदी ऐसे ही हवा में कोई बात नहीं करते। उनके पास हर समस्या का हल है,हल के लिए योजनाएँ हैं। तो क्या नरेंद्र मोदी ने पहले से ही दाउद को पकड़ने की योजना पर काम शुरू कर दिया है? आज वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने मोदी से उनकी योजना पूछी है। तो क्या केंद्र सरकार को सचमुच यह पता नहीं है कि दाउद को कैसे पकड़ा जा सकता है? क्या वर्तमान समय में भारतीय सेना और खुफिया एजेंसी में सचमुच ऐसे लोग नहीं हैं जो यह बता सकें?

मोदी के व्यक्तित्व के बारे में भारत के लोग जहाँ तक जानते हैं उससे यह भरोसा तो जनगणमन में जरूर उत्पन्न हो रहा है कि मोदी भारत के इस सबसे बड़े दुश्मन के खिलाफ कार्रवाई जरूर करेंगे। मोदी जो ठान लेते हैं उसे करके छोड़ते हैं चाहे इसके लिए कितना भी नुकसान क्यों न उठाना पड़े? जाहिर है कि जैसा कि मोदी ने साक्षात्कार में कहा भी है कि अमेरिका ने बिन लादेन को मारने से पहले संवाददाता सम्मेलन नहीं किया था,वे केंद्र सरकार के मंत्रियों के लाख छेड़ने पर भी अपनी योजना के बारे में तब तक सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं बोलेंगे जब तक कि काम पूरा नहीं हो जाता। वैसे मोदी के पास चुनावों के बाद जनरल वीके सिंह,पूर्व पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह,मेजर राज्यवर्द्धन राठौर जैसे कई योजनाकार उपलब्ध होंगे जो उनकी इस योजना को पूरा करने में सक्षम होंगे।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

कौन सांप्रदायिक है क्या हमें अब महेश भट्ट बताएंगे?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। भारत का सबसे सांप्रदायिक दल कौन है यह भारत की हिन्दू-मुसलमान जनता बखूबी जान चुकी है। सोनिया गांधी बुखारी से पहले फतवा जारी करवाना और अब मुसलमानों को धर्म के आधार पर आरक्षण का वादा करने से इस बारे में शक की कोई गुंजाईश ही नहीं रह गई है। भाजपा और नरेंद्र मोदी तो लगातार सबको साथ लेकर चलने की बात कर रहे हैं,सीधे-सीधे सवा सौ करोड़ भारतीयों की बातें कर रहे हैं। मोदी तो यहाँ तक कह चुके हैं कि उनको पराजय मंजूर है लेकिन धर्म के आधार पर वे वोट हरगिज नहीं मांगेंगे। देश की जनता को धर्म के आधार पर विभाजित करने के प्रयास तो लगातार कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्षतावादी दल ही कर रहे हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत की जनता को कौन-कौन से दल सांप्रदायिक हैं जानने के लिए महेश भट्ट जैसे परम भोगवादी की सहायता लेनी पड़ेगी? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये वही महेश भट्ट हैं जो कभी अपनी बेटी से भी कम उम्र की शिल्पा शेट्टी की बहन शमिता शेट्टी के साथ कुर्सी पर सरेआम बैठे हुए पाए गए थे और उस समय शमिता ने पैंटी भी नहीं पहन रखी थी। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ये वही महेश भट्ट हैं जो कह चुके हैं कि अगर पूजा भट्ट उनकी बेटी नहीं होती तो वे उसी से शादी कर लेते। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह वही महेश भट्ट है जिसने सन्नी लियोन जैसी पोर्न स्टार को बॉलीवुड में हिरोईन बना दिया और लगातार कागज के चंद टुकड़ों के लालच में युवाओं को अपनी फिल्मों में सेक्स परोसता रहा है। गांधी ने तो कहा था कि पाप से नफरत करो पापी से नहीं फिर मोदी ने तो अपने विचारों में पर्याप्त परिमार्जन कर लिया है फिर मोदी से नफरत क्यों? क्या महेश भट्ट या कांग्रेस सच्चे मायनों में गांधीवादी हैं? क्या गांधी ने गोहत्या रोकने और पूर्ण शराबबंदी का समर्थन नहीं किया था?
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 23 अप्रैल 2014

क्या आपने देखा मोदी का अब तक का सबसे कठिन ईंटरव्यू?

23-04-2014,ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। मित्रों,कल रात जब एबीपी न्यूज पर भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का ईंटरव्यू प्रसारित होनेवाला था तब मैंने नहीं सोंचा था कि यह ईंटरव्यू इतना कठिन साबित होने जा रहा है। एबीपी न्यूज पिछले कई महीनों से मोदीविरोधी रूख अख्तियार किए हुए है फिर भी ईंटरव्यू का नियम होता है कि बीच-बीच में ऐसे सवाल भी पूछे जाएँ जिससे कि माहौल खुशनुमा बना रहे। लेकिन इस ईंटरव्यू में ऐसे प्रयत्न बहुत कम किए गए।
मित्रों,ईंटरव्यू को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कि किसी अपराधी को गिरफ्तार करके थाने में लाया गया है और तीन-तीन पुलिसवाले घेरकर उससे थर्ड डिग्री पूछताछ कर रहे हैं। ईंटरव्यू की शुरुआत में नमो ने बताया कि उनको वोट क्यों मिलना चाहिए? फिर उसके बाद विवादित प्रश्नों की झड़ी लगा दी गई। उदाहरण के लिए क्या आपकी सरकार को अंबानी और अडाणी चलाएंगे,क्या आपकी सरकार अमीरों की सरकार होगी, क्या मुसलमानों को आपसे डरना चाहिए, क्या होगा राम मंदिर और समान नागरिक संहिता पर आपका रूख,क्या पिंक रिव्योलूशन से किसी खास समुदाय की रोजी-रोटी नहीं जुड़ी हुई है,,क्या आप खुद अपना ही मुखौटा हैं,क्या आपके विरोधियों को पाक चला जाना चाहिए,क्या आपने गुजरात दंगों के समय राजधर्म निभाया था,क्या जीजाजी और शहजादा कहना व्यक्तिगत आरोपों की श्रेणी में नहीं आते,क्या आपको बुरा नहीं लगा जब लोगों ने आपकी वैवाहिक स्थिति पर कटाक्ष किया,क्या आपकी सरकार आने पर वाड्रा पर भी मुकदमा चलाया जाएगा,क्या आपने सचमुच गिलानी के पास अपना कोई दूत भेजा था,क्या आपने अडाणी को 1 रुपए में जमीन दी,पाकिस्तान के प्रति आपकी नीति क्या होगी,क्या आप प्रधानमंत्री बनने के बाद अमेरिका जाएंगे,क्या आपकी सरकार पर आरएसएस का प्रभाव होगा,क्या आप इसी तेज-तर्रारी से सरकार चलाएंगे,क्या अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति में बदलाव लाकर उसे बहुसंख्यकों के अनुकूल बना लेना चाहिए,शारदा चिंट फंड घोटाले सहित इस तरह के सभी घोटालों में आपका क्या रूख होगा,क्या आप प. बंगाल को तोड़ना चाहते हैं,शरद पवार और ममता बनर्जी के प्रति आपके रूख में धीरे-धीरे सख्ती क्यों आती गई,क्या आपने कभी दोनों ठाकरे बंधुओं में समझौता करवाने की कोशिश की,क्या आपके मोहन भागवत के साथ व्यक्तिगत संबंध रहे हैं,क्या आपको अपने बेलूर मठ के बीते हुए दिन याद आते हैं,आपकी दिनचर्या क्या है आदि।
मित्रों,लेकिन प्रश्न जितने ही कठित उत्तर उतने ही सरल। नमो ने स्पष्ट किया कि अंबानी और अडाणी को टॉफी के दाम में भूमि भाजपा सरकारों ने नहीं बल्कि स्वयं कांग्रेस की सरकारों ने दी। भाजपा की सरकार ने तो निश्चित नीति बनाकर दलाल संस्कृति का समूल अंत ही कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने गुजरात की कृषि में सुधार किया और 10 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि दी। गुजरात में खेतों का भी स्वायल स्मार्ट कार्ड होता है। उन्होंने पशुओं की दंत-चिकित्सा और शल्य चिकित्सा का इंतजाम करवाया। वाईव्रेंट गुजरात के साथ ही कुसुम महोत्सव का भी आयोजन करवाया। कृषि उत्पादन से लेकर लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन में उनके समय में गुजरात में कई गुना की बढ़ोतरी हुई। मोदी ने दावा कि उन्होंने अपना राजधर्म हमेशा निभाया है चाहे वो शांतिकाल हो या अशांति का समय। लोगों की मौत से उनको दुःख भी हुआ और उन्होंने हमेशा इसकी जिम्मेदारी ली और हमेशा इस प्रयास में लगे रहे कि दोबारा वह सब नहीं देखना पड़े। जीजाजी और शहजादा शब्दों को उन्होंने व्यंग्य और विनोद का हिस्सा बताचा। शरद पवार और सुष्मा स्वराज का उदाहरण देते हुए उन्होंने व्यंग्य और विनोद को आवश्यक बताया। अल्पसंख्यकों की संस्कृति में संशोधन को उन्होंने बहुत बड़ा मुद्दा बताया और चैनल से अनुरोध किया कि चुनावों के बाद इस पर विस्तृत चर्चा करवाई जाए और इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को भी उसमें बुलाया जाए। विदेश नीति के बारे में उन्होंने कहा कि वे न तो किसी को आँखें दिखाएंगे और न ही किसी के आगे आँखें झुकाएंगे बल्कि सबसे आँखों में आँखे डालकर बात करेंगे। सरकार पर आरएसएस के प्रभाव के बारे में उन्होंने कहा कि उनकी सरकार सिर्फ संविधान को ध्यान में रखकर शासन करेगी। उनकी सरकार के लिए एक ही भक्ति होगी देशभक्ति,एक ही धर्म होगा नेशन फर्स्ट,एक ही धर्मग्रंथ होगा भारत का संविधान। काले धन पर उन्होंने कहा कि कालेधन को वापस लाना ही चाहिए। कई टैक्स हेवेन देशों ने अपनी नीतियों में बदलाव किया है जिसका भारत को लाभ उठाना चाहिए। पिंक रिव्योलूशन को उन्होंने आर्थिक समस्या बताया और किसी समुदाय विशेष से इसको जोड़ने का विरोध करते हुए कहा कि उनके कई जैन मित्र भी इस धंधे में हैं। उन्होंने कहा कि सारे मुद्दों और मोर्चों पर वर्तमान सरकार की असफलता से जनता का तंत्र में विश्वास कमजोर हुआ है जिसको फिर से पैदा करना पड़ेगा। वाड्रा पर मुकदमा चलाने के बारे में उन्होंने कहा कि कानून के समक्ष सभी बराबर हैं। अगर प्रधानमंत्री रहते हुए वे कोई भ्रष्टाचार करते हैं तो उनको भी जेल भेजना चाहिए। राजनैतिक विरोधियों पर धीरे-धीरे रूख को कड़ा करने को अपनी रणनीति बताते हुए उन्होंने कहा कि अगर वे शुरू से ही सख्त रवैया अख्तियार कर लेते तो जनता उसे स्वीकार नहीं करती। श्री मोदी ने मीडिया में घुस आए कुछ न्यूज ट्रेडर्स की कटु आलोचना करते हुए कहा कि मीडिया को चंद लोगों द्वारा मिशन से गिराकर व्यापार बना दिया गया है। अंत में नरेंद्र मोदी ने बताया कि वे सिर्फ साढ़े तीन घंटे सोते हैं। खाने और सोने के समय के अतिरिक्त उनकी कोई निश्चित दिनचर्या नहीं होती। वे दिन-रात सिर्फ जनकार्य में ही लगे होते हैं। कुछ दिनों पहले गुजरात में आए तूफान की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि चुनावी दौरे से ही उन्होंने फोन करके स्थिति का जायजा लिया। उन्होंने कहा कि उनके लिए भारत सिर्फ एक भूगोल नहीं है बल्कि माँ से भी बढ़कर है। उन्होंने बार-बार दावा कि क्योंकि राजनीति में रसायन शास्त्र की तरह 1 और 1 ग्यारह होता है इसलिए उनको सरकार बनाने के लिए एनडीए से बाहर किसी का भी सहयोग आवश्यक नहीं होगा लेकिन सरकार को चलाने के लिए सवा सौ करोड़ भारतीयों की मदद चाहिए होगी। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार उसकी भी होगी जो उसे वोट देंगे,उसकी भी होगी जो विरोध में वोट देंगे और उसकी भी होगी जो वोट डालने जाएंगे ही नहीं। श्री मोदी ने काम करने की कोई समय-सीमा नहीं बताई और कहा कि वे 5 सालों में काम करने की योजना लेकर चल रहे हैं। मोहन भागवत से अपने संबंधों का खुलासा करते हुए उन्होंने बताया कि वे तो भागवत जी के पिताजी के ही शिष्य रहे हैं।
मित्रों,एक साथ राज,ज्ञान और कर्मयोग से युक्त नर केसरी नरेंद्र मोदी का यह सबसे कठिन ईंटरव्यू अगर आप नहीं देख पाए हों तो एक बार फिर से आपके पास मौका है। थोड़ी देर बाद ही आज सुबह 8 एबीपी न्यूज इस ईंटरव्यू को दोबारा प्रसारित करने जा रहा है। इस लिंक पर भी जाकर देख सकते हैं-http://abpnews.abplive.in/ind/2014/04/22/article299075.ece/%E0%A4%8F%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%AA%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%9C-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%96%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%AA
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)