मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

अन्ना हजारे देशभक्त हैं या देशद्रोही?

मित्रों,एक बार फिर से कथित गांधीवादी अन्ना हजारे जंतर मंतर पर धरना पर बैठे हुए हैं। उनका साथ महान धरनावादी नेता अरविंद केजरीवाल भी देने जा रहे हैं। कहने को तो अन्ना हजारे भूमि अधिग्रहण बिल के विरोध में धरना कर रहे हैं लेकिन वास्तव में धरने के पीछे की सच्चाई क्या है यह कोई नहीं जानता। क्या अन्ना निःस्वार्थ व्यक्ति हैं या धरना करना उनका पेशा है अर्थात् अन्ना पैसे लेकर धरना देते हैं? जिस तरह से अन्ना द्वारा पिछले सालों में किए गए अनशनों में जमा पैसों को ठिकाने लगा दिया गया और जिस तरह स्वामी अग्निवेश ने टीम अन्ना के अहम सदस्य अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाया था कि उन्होंने आईएसी के नाम पर मिलने वाले 80 लाख रुपये को अपने निजी ट्रस्ट में जमा कराया था को देखते हुए तो प्रथम दृष्ट्या यही प्रतीत हो रहा है कि अन्ना हजारे न केवल एक पेशेवर धरनेबाज और अनशनकर्ता है बल्कि वंदे मातरम् के नारे का दुरुपयोग करनेवाला देशद्रोही भी है,खद्दर की उजली धोती पहननेवाला बगुला भगत है। आईएसी के संस्थापकों में से एक अग्निवेश के मुताबिक केजरीवाल ने आईएसी के नाम से खाता खोलने में देरी की, जबकि कोर कमिटी ने आईएसी के नाम से खाता खोलने के कई बार निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि केजरीवाल ने आईएसी के नाम से खाता खोलने की बजाय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में प्राप्त दान को अपने निजी ट्रस्ट पब्लिस कॉज रिसर्च फाउंडेशन में जमा कराया।
मित्रों,क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि जो व्यक्ति एक मंदिर में रहता हो और अपने-आपको सादगी की प्रतिमूर्ति कहता हो वो विशेष विमान से यात्रा करे और बड़ी-बड़ी गाड़ियों के काफिलों के साथ चले। सवाल उठता है कि यह सादगी की प्रतिमूर्ति विमान-यात्रा और महंगे वाहनों से चलने के लिए पैसे कहाँ से लाता है? क्या इसके लिए उसको फोर्ड फाउंडेशन या फोर्ड फाउंडेशन से अनुदान प्राप्त (अ)लाभकारी संस्थाओं या फिर आम आदमी पार्टी से पैसे मिले हैं? अन्ना ने घोषणा की थी कि उनके मंच पर कोई नेता नहीं आएगा फिर आप पार्टी से चुनाव लड़ चुकी मेधा पाटेकर उनके मंच से भाषण कैसे दे रही है? अन्ना अगर शुरू से अंत तक पूरी तरह से गैर राजनैतिक व्यक्तित्व रहे हैं तो फिर अरविंद केजरीवाल उनसे मिलने महाराष्ट्र सदन क्यों गए थे? 22 फरवरी को अन्ना ने कहा कि केजरीवाल का मंच पर स्वागत है फिर कल कहा कि वे केजरीवाल को मंच पर नहीं आने देंगे जबकि मनीष सिसोदिया का दावा है कि केजरीवाल अन्ना के साथ मंच साझा करेंगे। आखिर यह कैसा गड़बड़झाला है? अन्ना और केजरीवाल के संबंधों पर तो यही कहा जा सकता है कि खुली पलक पर झूठा गुस्सा बंद पलक में प्यार?
मित्रों,जिस तरह अन्ना ने आंदोलन शुरू किया था और जिस तरह यह आंदोलन आगे बढ़ा और जिस तरह से आंदोलन के दौरान किरण बेदी को बदनाम कर केजरीवाल को महिमामंडित किया गया इस पूरे घटनाक्रम को देखकर बहुत ही आसानी से यह समझा जा सकता है कि अन्ना+टीम केजरीवाल का आंदोलन शुरू से ही एक राजनैतिक आंदोलन था और छिपे हुए राजनैतिक और भारत-विरोधी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आयोजित किया गया था जिसकी डोर कहीं दूर सात समंदर पार फोर्ड फाउंडेशन के हाथों में थी। ओबामा द्वारा सोनिया गांधी से मुलाकात और उसके बाद उनका धार्मिक सद्भाव पर प्रवचन देना कहीं-न-कहीं इस बात का इशारा कर रहा है कि अमेरिका भीतर-ही-भीतर मोदी सरकार से खुश नहीं है और नरेंद्र मोदी से उनकी नजदीकी स्वाभाविक नहीं बल्कि मजबूरी है।
मित्रों,सवाल उठता है कि धरना पर बैठे अन्ना के ईर्द-गिर्द कौन-से लोग हैं? क्या ये लोग भारत का विकास चाहते हैं,या ये लोग चाहते हैं कि भारत की ऊर्जा जरुरतों को पूरा किया जाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत विकास के मामले में दुनिया का सिरमौर बने,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत की सैन्य ताकत के मामले में इतना आत्मनिर्भर हो जाए कि दुनिया का कोई भी देश उसको आँखें न दिखाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन का स्थान ले ले और दुनिया की फैक्ट्री बने,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत की युवाशक्ति को अभिशाप से वरदान में बदल दिया जाए और दुनिया के दूसरे देशों के लोग उसी तरह भारत आने को लालायित हों जिस तरह आज भारतीय अमेरिका जाने का सपना देखते हैं,क्या ये लोग चाहते हैं कि सारी सरकारी सुविधा लोगों को मोबाईल पर ही प्राप्त हो जाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि पूरे भारत में विश्वस्तरीय सड़कों का जाल बिछे,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत के हर खेत को पानी मिले,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारतीय रेल लेटलतीफी के लिए कुख्यात होने के बजाए अपनी रफ्तार के लिए जानी जाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत में सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का स्तर दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हो,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत की जीडीपी 2 ट्रिलियन डॉलर के बजाए 20 ट्रिलियन डॉलर हो जाए? इन सारे सवालों का बस एक ही उत्तर है नहीं,बिल्कुल भी नहीं। बल्कि अन्ना और उनके साथ धरना देने वाले संगठन और संगठनों के लोग यह चाहते हैं कि भारत हमेशा साँपों और सँपेरों का देश ही बना रहे,भारत का बिजली-उत्पादन इसी तरह जरुरत से काफी कम पर बना रहे,युवाशक्ति के हाथों में कलम या कंप्यूटर का माऊस नहीं हो बल्कि बंदूकें हों,भारत दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक बनने के बदले सबसे बड़ा आयातक बना रहे।
मित्रों,जहाँ तक भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का प्रश्न है तो अभी तक यह सिर्फ एक अध्यादेश है। इस पर विधेय़क आएगा,उस पर संसद में विचार होगा और तब तमाम संशोधनों के बाद वह कानून का रूप लेगा। मतलब कि अभी तो उबलते हुए पानी में चावल डाला तक नहीं गया है और अन्ना भात जल गया,भात जल गया चिल्लाने लगे हैं। फिर केंद्र सरकार बार-बार यह कह रही है कि वो इस मामले पर सदन में खुले दिमाग से चर्चा करवाएगी फिर अन्ना को धरने पर बैठने की जल्दी क्यों थी? केंद्र सरकार न तो भूमि अधिग्रहण को इतना आसान बनाना चाहती है कि कोई सरकार जब चाहे तब किसी किसान की जमीन छीन ले और न ही इतना कठिन कि विकास के कार्यों के लिए जमीन प्राप्त करना सर्वथा असंभव ही हो जाए फिर अन्ना को परेशानी क्या है? विदेशों से जो कंपनियाँ भारत में कारखाना खोलने के लिए आएंगी क्या वो हवा में कारखाने खोलेगी? केजरीवाल सरकार जब विद्युत तापघर स्थापित करेगी तो क्या वो जमीन के बदले आसमान में स्थापित करेगी? नए स्कूलों और नए महाविद्यालयों को हवा में बनाया जाएगा? केंद्र सरकार तो खुद ही कह रही है कि किसानों का हित उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस दिशा में भूमि स्वास्थ्य कार्ड,प्रधानमंत्री सिंचाई योजना जैसे तरह-तरह के इंतजाम भी कर रही है फिर अन्ना हजारों को धरना पर बैठने की जल्दीबाजी क्यों थी या है? जब केजरीवाल सरकार को वादों को पूरा करने के लिए पूरा 5 साल चाहिए तो मोदी सरकार को 5 साल क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? मोदी सरकार ने कोयले की लगभग पूरी रायल्टी राज्य सरकारों को दे दी,कोयला खानों की पारदर्शी नीलामी करवाई,2 जी स्पेक्ट्रमों की पारदर्शी नीलामी करवाने जा रही है,सारी सब्सिडियों को सीधे गरीबों के खातों तक पहुँचाने की व्यवस्था करने जा रही है,केंद्रीय मंत्रालयों में रोजाना कारपोरेट चूहों की धरपकड़ हो रही है,अंबानी पर जुर्माना हो रहा है,बंगाल से लेकर केरल तक के घोटालेबाज-हत्यारे राजनेताओं को जेल भेजा जा रहा है,सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सांसदों और विधायकों पर चल रहे आपराधिक कांडों का स्पीडी ट्रायल करवाया जा रहा है। ऐसे में क्या अन्ना अंधे हैं या फिर उनका मोदी विरोध विपक्षी दलों की तरह सिर्फ विरोध के लिए विरोध नहीं है?
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

मांझी प्रकरण में गलती किसकी,मांझी,भाजपा या नीतीश की?

मित्रों,बिहार की राजनीति के मांझी कांड का आज अंत हो गया। अब इस नाटक को ट्रेजडी कहा जाए या कॉमेडी इस बात का निर्णय करना उतना ही मुश्किल है जितना इस बात का फैसला करना कि नीतीश राज ज्यादा बुरा था या मांझी राज। खैर जो नहीं होना चाहिए था वो तो हो चुका है अब आगे यह देखना कम दिलचस्प नहीं होगा कि सुशासन बाबू किस तरह फिर से कथित सुशासन की स्थापना करते हैं क्योंकि मेरी राय में जबसे नीतीश कुमार ने भाजपाई मंत्रियों को सरकार से अलग किया है तभी से सुशासन की गाड़ी बेपटरी है।
मित्रों,मांझी जी ने इस्तीफा तो दे दिया है लेकिन उनके मुख्यमंत्री बनने और हटने के घटनाक्रम ने कई अहम सवालों को जन्म दिया है। पहला सवाल तो यही है कि क्या नीतीश कुमार जी ने इस्तीफा देकर सही किया था। हमने तब भी यही कहा था कि नीतीश कुमार को इस्तीफा नहीं देना चाहिए था और अगर इस्तीफा देना ही था तो नए चुनाव करवाने चाहिए थे क्योंकि जनता ने उनको जो मत दिया था वह अकेले उनको नहीं था बल्कि जदयू-भाजपा गठबंधन को था। फिर उनको अपने बदले किसी और को मुख्यमंत्री बनाने अधिकार किसने दे दिया?
मित्रों,जहाँ तक मांझी जी के कामकाज करने के तरीके का सवाल है तो यह तो निश्चित है नीतीश कुमार ने मांझी को समझने में ठीक वैसे ही भूल कर दी जैसी भूल भाजपा ने खुद नीतीश के मामले में की थी। मांझी को पहले दिन से ही ठीक से काम नहीं करने दिया गया यह बात और है मांझी को काम करना आता भी नहीं था। मांझी लगातार उटपटांग बयान देते रहे जिससे पार्टी की जगहँसाई भी होती रही। धीरे-धीरे मांझी ने रिमोट के आदेश को मानना बंद कर दिया और मंत्रिमंडल में शामिल कई मंत्रियों को अपने पक्ष में कर लिया लेकिन वे यह भूल गए कि विधानसभा में वास्तविक शक्ति तो विधानसभा अध्यक्ष के पास होती है जो अब भी नीतीश कुमार के पाले में ही थे।
मित्रों,यद्यपि बिहार के दलित-महादलित मांझी सरकार के पराभव से उद्वेलित तो हैं लेकिन अब देखना यह है कि मांझी नई पार्टी बनाकर उनके गुस्से को कितना भुना पाते हैं। वैसे अभी भी चुनावों में 8 महीना बाँकी है और नीतीश कुमार निश्चित रूप से इस समय का भरपुर सदुपयोग करनेवाले हैं। वे दलितों-महादलितों सहित सभी जातियों और वर्गों के लिए नई-नई घोषणाओं की झड़ी लगानेवाले हैं जिसका असर होना भी निश्चित है।
मित्रों,जहाँ तक भाजपा की संभावनाओं का सवाल है तो आगामी चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि नीतीश कुमार कहाँ तक जंगल राज को मंगल राज में बदल पाते हैं। वैसे भाजपा को मांझी का समर्थन करने से अलावे और विकल्प ढूँढ़ने चाहिए थे क्योंकि जबतक मांझी-नीतीश में गहरी छनती रही तबतक भाजपा की निगाहों में मांझी निहायत अयोग्य शासक थे और जैसे नहीं मांझी ने विद्रोह किया तो वही मांझी अच्छे हो गए?
मित्रों,लगता है कि भाजपा ने दिल्ली की हार से कोई सबक नहीं लिया है। भाजपा को अब से भी सचेत हो जाना चाहिए क्योंकि बिहार में भी उसको वैसी ही स्थिति का सामना करना पड़ सकता है जैसी स्थिति दिल्ली में थी। बिहार में भी हिन्दू बँटे हुए हैं और मुसलमान एकजुट। इसलिए भाजपा को सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए काफी सोंच-समझकर कदम उठाने होंगे। साथ ही,केंद्र की मोदी सरकार को काफी तेज गति से इस तरह के काम करने होंगे जिनका असर दूरदराज के गांवों तक में आसानी से दिखाई दे। दिल्ली से लेकर गांवों तक में भ्रष्टाचार पर करारा प्रहार करना होगा,शासन-प्रशासन को ज्यादा-से-ज्यादा पारदर्शी और सूचना-प्रोद्योगिकी आधारित करना होगा,शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार लाना होगा और मेक इन इंडिया में बिहार भी लाभान्वित हो यह सुनिश्चित करना होगा क्योंकि बिहार की सबसे बड़ी समस्या आज भी बिहार में बिहारियों को रोजगार का नहीं मिलना है।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

न मोदी नेपोलियन हैं और न दिल्ली वाटरलू


13 फरवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,10 फरवरी को दिल्ली में भाजपा को मिला करारी हार के बाद से ही मीडिया का एक हिस्सा दिल्ली को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए वाटरलू बताने में जुटा हुआ है जबकि वास्तविकता ऐसी है नहीं। नेपोलियन तलवार और बंदूकों के बल पर यूरोप को जीतना चाहता था जबकि नरेंद्र मोदी अपने अच्छे कामों से भारतीयों का दिल जीतना चाहते हैं। यहाँ संघर्ष जमीन जीतने के लिए नहीं बल्कि दिल जीतने के लिए हो रहा था और वास्तव में दिल्ली की हार मोदी की हार नहीं बल्कि खुद भारतीयों की हार है।
मित्रों,दिल्ली के चुनाव परिणामों का अगर हम विश्लेषण करें तो आसानी से यह समझ सकते हैं कि कैसे मुट्ठीभर अंग्रेजों ने विशालकाय भारत पर कब्जा कर लिया था। इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने दक्षिण में निजाम और मराठों को बारी-बारी से लालच देकर आपस में ही लड़वाया और वे अंग्रेजों की चाल को समझ ही नहीं सके। इसी तरह अंग्रेजों ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला,बंगाल के सेनापति मीरजाफर को भी लालच देकर अपना उल्लू सीधा किया और जब मतलब निकल गया तब दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया। कभी निजाम का पक्ष लेकर मराठों को हराया तो कभी मराठों को साथ में लेकर निजाम को। इसी तरह इतिहास बताता है कि जब ग्वालियर के किले में रहकर रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लोहा ले रही थी तब उनके किले के किसी द्वारपाल ने सिर्फ एक सोने की ईट के बदले 16-17 जून 1858 की आधी रात को किले के द्वार को खोल दिया था फिर अंजाम जो हुआ उसे सारी दुनिया जानती है।
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है लालच हम भारतीयों के खून में है और उसी गंदे खून का दुष्परिणाम है दिल्ली का चुनाव-परिणाम। किसी ने एक लैपटॉप,एक साईकिल या एक मिक्सी दे दिया तो हम बिना यह देखे-परखे कि वह कैसा आदमी है उसे अपना राज्य अपना सबकुछ सौंप देते हैं। दिल्ली में भी वही हुआ जो अब तक यूपी,बिहार और तमिलनाडु में होता आ रहा था। दिल्ली में हमने यह नहीं देखा कि 40 हजार करोड़ रुपये के बजट वाली दिल्ली के लिए कोई व्यक्ति या पार्टी कैसे 15 लाख करोड़ रुपये के वादे कर रहा है? हमने यह भी नहीं देखा कि पिछली बार उस व्यक्ति या पार्टी ने कितने वादों को पूरा किया था?
मित्रों,अभी तो दिल्ली में मुख्यमंत्री का शपथ-ग्रहण भी नहीं हुआ है और स्वंघोषित एकमात्र सत्यवादी जी की पार्टी ने गीता,बाईबिल और कुरान से भी ज्यादा पवित्र अपने घोषणा-पत्र से पलटना शुरू भी कर दिया है। उसने घोषित कर दिया है कि दिल्ली में सिर्फ सार्वजनिक स्थलों पर ही मुफ्त वाई-फाई की सुविधा मिलेगी। वो भी सिर्फ आधे घंटे के लिए और उसमें भी फेसबुक आदि सोशल वेबसाईटों पर प्रतिबंध रहेगा। लो कल्लो बात। फिर फ्री के वाई-फाई का हम क्या अँचार डालेंगे? इतना ही नहीं कथित आम आदमियों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि हम वादों को तभी पूरा कर सकेंगे जब केंद्र सरकार हमें पर्याप्त आर्थिक सहायता देगी। तो फिर इन लोगों ने घोषणा-पत्र में इस बात की घोषणा क्यों नहीं की कि हम वर्णित घोषणाओं और वादों को तभी पूरा करेंगे जब केंद्र सरकार पैसे देगी? घोषणा-पत्र में अगर यह लिखा गया था कि मुफ्त वाई-फाई,मुफ्त पानी,झुग्गी के स्थान पर मकान और सस्ती बिजली में नियम और शर्तें लागू होंगी तो फिर अखबारों में क्यों नहीं वादों के साथ-साथ उन नियमों और शर्तों को प्रमुखता से छपवाया गया? क्यों नियमों और शर्तों को जनता से छिपाया गया? अभी एक और खबर आई है कि सस्ती बिजली और फ्री में पानी देने के लिए नई सरकार के पास विकास की राशि को सब्सिडी के रूप में बर्बाद करने के अलावा और कोई उपाय नहीं है। अगर हर राज्य में इसी तरह होता रहा और हो भी रहा है तो फिर कहाँ से आएगी विकास के लिए राशि और कैसे होगा देश का विकास?
मित्रों,ठगों को तो ठगी करनी ही थी अगर उन्होंने ठगी की तो इसमें उनका क्या दोष? दोष तो उनका है जिनका कबीर के इस 600 साल पुराने दोहे में आज भी अटूट विश्वास है कि कबिरा आप ठगाईए और न ठगिए कोए। आप ठगे सुख उपजै और ठगे दुःख होए।। तो ठगाते रहिए और सदियों तक लंगोट में फाग खेलकर चरम सुख का अनुभव करते रहिए। आप यकीनन देश के दुश्मनों द्वारा अभी दिल्ली में ठगे गए हैं,कल बिहार,परसों पश्चिम बंगाल और तरसों उत्तर प्रदेश में ठगे जाएंगे और इस तरह लगातार अपने लिए सुख उपजाते रहेंगे। मेरा यह पूरा आलेख विशेष तौर पर भारत के हिन्दुओं के लिए है। मुसलमानों का तो फिक्स है कि वे किसको वोट करेंगे फिर चाहे कोई कितने भी लैपटॉप,साईकिल क्यों न दे दे लेकिन दुनिया के सबसे पुराने धर्म के अनुयायियों का कोई ईमान-धर्म है क्या? फिर कोई दल या नेता क्यों इनके हित की बात करेगा,क्यों इनकी भलाई के लिए लड़ेगा?
मित्रों,शपथ-ग्रहण से पहले ही कथित आम आदमी कहने लगे हैं कि सोशल-साईट्सविहीन आधे घंटे के फ्री वाई-फाई के आने में कम-से-कम 6 महीने लग जाएंगे तो क्या नरेंद्र मोदी स्विटजरलैंड या जर्मनी के बाप लगते हैं जो उनके एकबार फोन घुमाते ही 10 दिन के भीतर ही सारा-का-सारा कालाधन देश में वापस आ जाएगा। मोदी को तो वह कोट जिसका मूल्य भले ही कितना भी हो उपहार में मिला था और मोदी हर साल जुलाई में उपहार में मिली वस्तुओं को नीलाम करके प्राप्त राशि को सरकारी खजाने में जमा करवा देते हैं। बाँकी के नेताओं में क्या कोई एक भी ऐसा है जो ऐसा करता हो? बाँकी के नेता तो जब सरकारी आवास को खाली करते हैं तो बल्ब और कुर्सियाँ तक उठाकर ऐसे ले जाते हैं जैसे उनके बाप का माल हो। अभी हाल ही में हमारी पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने जब अपना कार्यकाल पूरा किया तब अपने साथ देश-विदेश में मिले कीमती उपहारों को भी साथ ले गईँ जिनको बाद में भारत सरकार को पत्राचार कर वापस मंगवाना पड़ा। और ऐसी लुटेरी पार्टियों के लुटेरे नेता भारत के प्रधानमंत्री के शूट पर सवाल उठा रहे हैं? खुद तो इनलोगों ने 200 रुपये मीटर का कपड़ा पहनकर देश को हजारों करोड़ का चूना लगा दिया और सवाल उठा रहे हैं पीएम के शूट पर?
मित्रों,कल ही बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने स्वीकार किया है कि बिहार में जो पुल बनते हैं उनके पायों के निर्माण पर जितना खर्च होता है उससे कहीं ज्यादा तो कमीशन दे दिया जाता है और वह कमीशन मुख्यमंत्री तक पहुँचता है। उन्होंने यह भी माना है कि पुल 20 करोड़ में बन जाता है लेकिन बिल 200 करोड़ रुपये का बनाया जाता है। और जिस व्यक्ति ने इस सारी कमीशनखोरी पर केंद्र सरकार में पूर्ण विराम लगा दिया उसी से आज बेईमान ईमानदार पार्टियों के लोग शूट का दाम पूछ रहे हैं और जनता भी उनके झाँसे में आ जा रही है! सवा सौ साल पहले भारत-दुर्दशा लिखकर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भारत की अंतरात्मा को जगाने का प्रयास किया था लेकिन भारत की अंतरात्मा तो आज तक भी सोयी हुई ही है। सवा सौ साल पहले की तरह आज भी हमारे लिए हमारी वरीयता सूची में हमारे स्वार्थों का स्थान सबसे ऊपर है और देशहित कहीं नहीं। आज भी हम दस-बीस हजार रुपये के फायदे के लिए अपने राज्य और देश को देश के घोषित-अघोषित दुश्मनों के हाथों में हर पाँच साल पर सहर्ष सौंप देते हैं। वो हमें बार-बार धोखा देते हैं और बार-बार माफी मांगते हैं और हम बार-बार माफ भी कर देते हैं। वो कभी हमें रोटी का लालच देते हैं तो कभी पानी का तो कभी लैपटॉप या साईकिल या मिक्सी का और तब हम भूल जाते हैं कि इनके हाथों में हमारे राज्य या देश का हित सुरक्षित रहेगा या नहीं। हम लालच में आकर अपना वोट बेच देते हैं और उनको मौका दे देते देश को बेचने का। कौन कहता है काठ की हाँड़ी एक बार ही आग पर चढ़ती है?  फिर सवा सौ करोड़ के भारत में एक व्यक्ति के लिए अगर नेशन फर्स्ट और लास्ट है तो होकर भी क्या कर लेगा???
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

जनता की नब्ज पहचानने में विफल रही भाजपा

10 फरवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,दिल्ली ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अश्वमेध के घोड़े को रोक लिया है। जीत जीत होती है और हार हार। फिर हार जब इतनी करारी हो तो सवाल उठना और भी लाजिमी हो जाता है। ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं सच कहूंगा मगर फिर भी हार जाऊंगा, वो झूठ बोलेगा और लाजवाब कर देगा? लेकिन ऐसा हो चुका है और भारत की राजधानी दिल्ली में हो चुका है। कभी 15वीं-16वीं शताब्दी में कबीर को भी जमाने से यही शिकायत थी कि साधो,देख ये जग बौराना।
साँच कहूँ तो मारन धावे,
झूठौ जग पतियाना,
साधो,देख लो जग बौराना।।
मित्रों,वजह चाहे जो भी हो हार तो हार होती है। मुझे लगता है दिल्ली में भाजपा अतिआत्मविश्वास की बीमारी से ग्रस्त हो गई थी। भाजपा जनता से कट गई थी। लोक और तंत्र के बीच संवादहीनता की स्थिति पैदा हो गई थी। भाजपा का प्रचार ऊपर से नीचे की ओर चल रहा था वहीं आप पार्टी का प्रचार सीधे नीचे से चल रहा था। उनके कार्यकर्ता लगातार लोगों से डोर-टू-डोर संपर्क कर रहे थे जो कि भाजपा नहीं कर रही थी। फिर भाजपा ने चुनावों में काफी देर भी कर दी। मेरे हिसाब से दिल्ली में चुनाव लोकसभा चुनावों के तुरन्त बाद करवा लेना चाहिए था। चुनावों में देरी ने कई तरह के अंदेशों और अफवाहों को हवा दी।
मित्रों,दूसरी जो वजह हार की है वो है दिल्ली भाजपा में सिर फुटौब्बल। भाजपा में ऐसा कम ही देखा जाता है कि प्रदेश अध्यक्ष का ही टिकट कट जाए और उनके समर्थक प्रदेश कार्यालय को घेर लें लेकिन ऐसा हुआ। उस पर भाजपा ने अपने पुराने कैडरों की उपेक्षा करते हुए किरण बेदी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बना दिया जिससे पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं में निराशा उत्पन्ना हो गई। इतना ही नहीं पार्टी ने दूसरी पार्टी से आए हुए लोगों को सिर आँखों पर बिठाया जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ जनता के बीच भी गलत संकेत गया।
मित्रों,तीसरी वजह यह रही कि पार्टी ने कई मुद्दों पर चुप्पी साधे रखी। नरेंद्र मोदी के शूट के मुद्दे पर पार्टी को तुरन्त बताना चाहिए था कि शूट गिफ्ट में मिली है और मोदी गिफ्ट में मिली चीजों की सालाना नीलामी करवाते हैं और प्राप्त राशि को सरकारी खजाने में जमा करवा देते हैं। इसी तरह पार्टी ने प्रत्येक भारतवासी के खाते में 15 लाख रुपये वाले जुमले पर भी चुप्पी साधे रखी।
मित्रों,चौथी वजह यह रही कि मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार किरण बेदी में धैर्य और वक्तृता शक्ति की कमी। पूरे चुनाव अभियान के दौरान किरण बेदी जी राजनेता की तरह दिखी ही नहीं। हमेशा ऐसा लगता रहा कि उनके पास समय की कमी है। यहाँ तक कि टीवी चैनल वालों के लिए भी उनके पास समय नहीं था। अगर उनको टीवी पर बहस नहीं करनी थी तो उनको इसकी पहल भी नहीं करनी चाहिए थी क्योंकि उनके बहस से पीछे हटने का जो संकेत जनता के बीच गया वह पार्टी के लिए काफी घातक रहा। किरण बेदी जी ने चुनाव प्रचार की शुरुआत ही विवाद से की लाला लाजपत राय की प्रतिमा को भाजपा का पट्टा पहनाकर।
मित्रों,पाँचवीं वजह यह रही कि भाजपा ने अपना विजन डॉक्यूमेंट लाने में काफी देर कर दी। उसके विजन डॉक्यूमेंट में अधिकतर वादे वही थे जो आप पार्टी के घोषणा-पत्र में पहले ही आ चुके थे।
मित्रों,छठी वजह यह रही कि दिल्ली सहित सारे देश में धीरे-धीरे जनता को लगने लगा है कि मोदी जी के केंद्र में आने के बावजूद ग्रास रूट लेवल पर स्थितियाँ कमोबेश वैसी ही और वही हैं जो 9 महीने पहले थीं। आज भी पुलिस भ्रष्ट है,नगर निगम भ्रष्ट हैं,चारों तरफ गंदगी है,भ्रष्टाचार है,बिजली और पानी की किल्लत है,न्याय विलंबित और बेहद खर्चीला है,शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति काफी खराब है,पंचायती राज भ्रष्टाचार के विकेंद्रीकरण के प्रतीक बने हुए हैं,जनवितरण प्रणाली में व्यापक भ्रष्टाचार है आदि-आदि।
मित्रों,सातवीं वजह यह रही कि आज भी भारत की जनता मुफ्तखोर है। उसको हर चीज मुफ्त में चाहिए भले ही इसके लिए देश के विकास के रथ को रोकना ही क्यों न पड़े। उसको इस बात से कुछ भी लेना-देना नहीं है कि कौन सी पार्टी देशभक्त है और कौन सी पार्टी देश विरोधी। यहाँ यह ध्यान देनेवाली बात है कि दिल्ली का वार्षिक बजट मात्र 40,000 करोड़ रुपये का होता है वही आप पार्टी ने 15 लाख करोड़ रुपये के वादे दिल्ली की जनता से कर दिए हैं। जाहिर है कि भविष्य में यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि वे इन वादों को कैसे पूरा करते हैं। या फिर से पैसों की मांग के लिए धरने पर बैठ जाते हैं। सबसे ज्यादा दिलचस्प यह देखना होगा कि पूरी दिल्ली में कबसे मुफ्त में वाई-फाई की सुविधा शुरू की जाती है और कब दिल्ली में 15 लाख सीसीटीवी कैमरे लगाए जाते हैं। क्योंकि दिल्ली के ज्यादातर युवा फ्री वाई-फाई के लालच में आ गए।
मित्रों,आठवीं वजह यह रही कि कांग्रेस का पूरा वोट बैंक आम आदमी पार्टी ले उड़ी। वोट प्रतिशत के मामले में भाजपा इस बार भी वहीं है जहाँ 2013 में थी। अगर भाजपा ने जमीनी स्तर पर घर-घर जाकर चुनाव प्रचार किया होता तो निश्चित रूप से कांग्रेस के वोट बैंक में उसको भी हिस्सा मिलता लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाई जिसका दुष्परिणाम आज हमारे सामने है।
मित्रों,नौवीं वजह यह रही कि मोदी सरकार ने भले ही डीजल के दाम कितने भी कम क्यों न कर दिए हों उसका व्यापक असर महंगाई पर दिख नहीं रहा क्योंकि न तो बसों-टेम्पो के भाड़े ही कम हुए और न ही ट्रकों के।
मित्रों,नौवीं वजह यह रही कि भाजपा की तरफ से घर-वापसी आदि को लेकर लगातार उटपटांग बयान आते रहे। खुद नरेंद्र मोदी के दिल्ली में दिए गए चारों भाषण भी निर्विवाद नहीं रहे। भाग्यवान और अभागा जैसे जुमले सिर्फ और सिर्फ दंभ और अभिमान के परिचायक रहे। मोदी केजरीवाल को निगेटिव कहते रहे लेकिन कहीँ-न-कहीं उनका खुद का भाषण ही निगेटिव हो गया। उनको आप पार्टी की आलोचना करने के बजाए यह बताना चाहिए था कि वे दिल्ली के लिए क्या-क्या करना चाहते हैं। उनको नौ महीने में दिल्ली नगर निगम की स्थिति को सुधारना चाहिए था। फिर योगी आदित्यनाथ ने तो हद ही कर दी यह कहकर कि वे देश की प्रत्येक मस्जिद में गौरी-गणेश की प्रतिमा स्थापित करवा देंगे। कुल मिलाकर निश्चित रूप से भाजपा ने कई गलतियाँ कीं और उन गलतियों का खामियाजा उसे भुगतना ही था। देश की जनता निश्चित रूप से मोदी सरकार के काम करने की रफ्तार से संतुष्ट नहीं है। उसको और भी तेज रफ्तार में काम चाहिए और ऐसे काम चाहिए जो जमीनी स्तर पर आसानी से दिखाई दें। उसको भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहिए,त्वरित न्याय चाहिए,सफाई चाहिए,अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सुविधा चाहिए,रोजगार चाहिए आदि-आदि।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)



गुरुवार, 29 जनवरी 2015

किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल,एक आलोचनात्मक विश्लेषण

29 जनवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अब दिल्ली के मतदान में कुछ ही दिन शेष रह गए हैं। दिल्ली में ऐसा पहली बार हुआ है कि यहाँ की सभी तीनों प्रमुख पार्टियों ने अपने-अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि दिल्ली पिछले 800 सालों से भारत की राजधानी है,भारत का दिल बनी हुई है ऐसे में दिल्ली पर कब्जे का मतलब सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं हो सकता।
मित्रों,लगभग सारे विश्लेषक यह मानकर चल रहे हैं कि इस बार दिल्ली में मुख्य मुकाबला भाजपा और आप पार्टी के बीच है। यह कहीं-न-कहीं आश्चर्यजनक है क्योंकि जो पार्टी दिल्ली को अपने हाल पर छोड़कर बनारस भाग गई थी वही पार्टी कैसे टक्कर में हो सकती है! फिर भी जो है सो है। ऐसा तो हमारे साथ अक्सर ही होता है कि हम जो चाहते हैं वैसा होता नहीं है। हम चौथे स्तंभ हैं और हम तो इसके साथ-साथ कि क्या हो रहा है बस यही बता सकते हैं कि क्या होना चाहिए। बस यही तो हमारे वश में है।
मित्रों,पिछले कई दिनों से जबसे किरण बेदी जी को भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है मीडिया किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल तथा भाजपा और आप पार्टी की तुलना करने में जुटी हुई है। मैं समझता हूँ कि दोनों दो तरह के मिजाज वाले लोग हैं इसलिए इन दोनों की तुलना हो ही नहीं सकती फिर भी जबकि दोनों आमने-सामने हैं तो तुलना तो करनी ही पड़ेगी।
मित्रों,पहले अरविंद केजरीवाल की कथनी,करनी और शख्सियत पर विचार करते हैं। अरविंद को भी किरण बेदी की ही तरह रमन मैग्सेसे पुरस्कार मिल चुका है। अरविंद विवाद पुरूष हैं क्योंकि उनको जानबूझकर विवादों में रहने में मजा आता है इसलिए वे लगातार विवादित बयान देते रहते हैं,अंट-शंट बकते रहते हैं। अरविंद आरोप लगाने में मास्टर हैं लेकिन आज तक अपने किसी भी आरोप को साबित नहीं कर पाए हैं। अरविंद में एक और कमी यह है कि जब उनके ऊपर आरोप लगता है तो वे चुप्पी साध जाते हैं,न तो खंडन करते हैं और न ही मंडन। झूठ बोलने में उनको मास्टरी है। किसी के बारे में भी कुछ भी बोल दिया और जब प्रमाण मांगा गया तो कह दिया कि हमने तो आरोप लगा दिए हैं अब ये सही हैं या गलत जनता समझेगी। अरविंद चंदा किंग हैं और उनको भारतमाता के कट्टर दुश्मनों से भी चंदा लेने में कोई आपत्ति नहीं है। अरविंद कभी भी अपने किसी भी पुराने कथन पर कायम नहीं रह पाए हैं। बोलते हैं कि हम तो आम आदमी हैं जी हमें वीवीआईपी ट्रीटमेंट नहीं चाहिए लेकिन साथ ही वीवीआईपी पास की भी ईच्छा रखते हैं। अरविंद सर्वेवीर हैं। उनके पास सर्वक्षकों की एक बेहतरीन टीम है जो पहले से ही सर्वेक्षण के निष्कर्ष निर्धारित कर लेते हैं और पीछे सर्वेक्षण करते हैं। जैसे-हमने पता लगाया है जी कि हमारे 49 दिनों के शासन में भ्रष्टाचार काफी कम हो गया था,हमने सर्वे करवाया है जी कि हम 55 सीटों पर चुनाव जीतने जा रहे हैं,हमने यह सर्वे करवाया है जी,वह सर्वे करवाया है जी। अरविंद जी धरातल पर चाहे काम करें या न करें सर्वे बहुत करवाते हैं। अरविंद जी ने मीडिया में भी अच्छे दोस्त बना रखे हैं जो उनके आगे-पीछे भगत सिंह की तस्वीरें लगाकर लगातार उनको क्रांतिकारी साबित करने में जुटी रहती है। उनके क्रांतिकारी मीडिया-मित्र भी लगातार सर्वे करवाते हैं और गजब के सर्वे करवाते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले एबीपी न्यूज कह रहा था कि दिल्ली में सरकार तो भाजपा की बनेगी लेकिन दिल्ली के लोग मुख्यमंत्री के रूप में तो अरविंद को ही देखना चाहते हैं। यानि सरकार तो भाजपा की बनेगी लेकिन मुख्यमंत्री तो अरविंद केजरीवाल ही होंगे। कुल मिलाकर अरविंद केजरीवाल मीडियाप्रेमी हैं,ब्लोअर की हवा हैं,परले दर्जे के हवाबाज हैं। आजतक उन्होंने सिर्फ बोला ही है किया कुछ भी नहीं है और अभी भी वे ऐसा ही करते दिख रहे हैं। मुख्यमंत्री बनकर वे बहुतकुछ कर सकते थे लेकिन उन्होंने खुद कोई काम नहीं किया सिर्फ केंद्र सरकार या विपक्ष के खिलाफ बयान देते रहे या फिर केंद्र और संसद-संविधान के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करते रहे। उनकी पार्टी में एक-से-एक कश्मीर के स्वतंत्रता-प्रेमी और राष्ट्रविरोधी तत्त्व भरे पड़े हैं।
मित्रों,अब आते है किरण बेदी जी पर। किरण बेदी ने जब जो कहा है वही किया है। किरण जी ने कभी किसी के ऊपर भी झूठे आरोप नहीं लगाए हैं न ही किरण जी अपनी झूठी प्रशंसा ही पसंद करती हैं। तभी तो महान क्रांतिकारी पत्रकार रवीश कुमार को उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गाड़ी नहीं उठवाई थी। किरण जी कर्मठ हैं,कर्त्तव्यनिष्ठ हैं,अनुशासनप्रिय हैं और देशभक्त हैं। किरण जी के पास एक पूरा खाका है,पूरी योजना है कि दिल्ली का मुख्यमंत्री बनकर वे कैसे दिल्ली के लिए काम करेंगी और दिल्ली का विकास करेंगी जो कि केजरीवाल के पास नहीं है। किरण जी ने अपने 40 साल के प्रशासनिक जीवन के द्वारा पहले ही यह साबित कर दिया है कि उनके पास अच्छा शासन व प्रशासन देने की भरपुर योग्यता है। किरण जी ने नौकरी के दौरान कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि किरण जी उस पुलिस का हिस्सा थीं जिसको हमारे देश में सर्वाधिक भ्रष्ट विभाग का खिताब अता किया जाता है और फिर भी वे निष्कलंक हैं। फिर वे जिस पार्टी का हिस्सा हैं वह घोर राष्ट्रवादी पार्टी है,राष्ट्रभक्तों की पार्टी है। हाँ,मैंने पिछले तीन-चार दिनों में गौर किया है कि किरण जी में कुछ कमियाँ भी हैं। किरण जी पत्रकारों को देखकर घबरा जाती हैं और ठीक से जवाब नहीं दे पातीं जबकि उनको ऐसा नहीं करना चाहिए। किरण जी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रेरणा लेनी चाहिए जिन्होंने लोकसभा चुनावों के दौरान अपने घोर विचारधारात्मक शत्रु चैनल एबीपी पर धमाकेदार साक्षात्कार देकर तहलका मचा दिया था। जहाँ तक दो-2 वोटर आईकार्ड होने का सवाल है तो मेरे पास भी दो-दो हैं जिनमें से एक का अब मैं कहीं भी इस्तेमाल नहीं करता। मैं भी चाहता हूँ कि एक को रद्द करवा दूँ लेकिन लालफीताशाही और दफ्तरों की बेवजह की दौड़ लगाने से भागता हूँ। अगर ऐसा करना अपराध है तो मैं भी अपराधी हूँ लेकिन क्या ऐसा नहीं होना चाहिए कि बीएलओ जाँच करके खुद ही एक को रद्द कर दे। फिर दिल्ली में तो कम-से-कम 22% वोटर आई कार्ड फर्जी हैं,एक ही फोटो पर 15-पन्द्रह आई कार्ड बने हुए हैं तो क्या इसमें भी उस तस्वीर वाले या वोटर की ही गलती है। मेरी 70 वर्षीय माँ की उम्र वोटर आईकार्ड में 98 साल दर्ज कर दी गई है,मेरे गाँव के कई पुरुषों के वोटर आईकार्ड में महिलाओं की और कई महिलाओं के वोटर आईकार्ड में पुरुषों की तस्वीरें दर्ज है,इसमें किसकी गलती है? हमारे हाजीपुर में लोग पिछले 20 सालों से रह रहे हैं और बार-बार मतदाता सूची में नाम दर्ज करने के लिए आवेदन देते हैं फिर भी उनका नाम दर्ज नहीं किया जाता,इसमें किसकी गलती है?
मित्रों,तो यह था अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी की कथनी,करनी और शख्सियत का आलोचनात्मक विश्लेषण। अब यह आप दिल्लीवासियों पर निर्भर करता है आप किसको चुनते हैं। झूठ और अराजकता को या सत्य और सृजनात्मकता को? विवादपुरुष को या विकासस्त्री को? रायता को या विकास को? राष्ट्रविरोधी को या राष्ट्रभक्त को? निर्णय आपके अपने हाथों में है। आप ही अपनी दिल्ली के भाग्यनिर्माता हैं। क्या आप वर्ष 2013 में अपने द्वारा की गई गलती को दोहराना चाहेंगे?

(हाजीपुर टाईम्स पर प्रकाशित)

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

डी फॉर डॉक्टर,डॉक्टर मीन्स डाकू

23 जनवरी,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,एक समय था जब डॉक्टरों को धरती का भगवान कहा जाता था। तब डॉक्टरी पैसा कमाने का गंदा धंधा नहीं थी बल्कि मानव-सेवा का सबसे उत्तम माध्यम थी। लेकिन आज जैसा कि कल मैंने महसूस किया डॉक्टरों से ज्यादा उदार और दयावान तो कसाई होते हैं।
मित्रों,हुआ यह कि इसी 16 जनवरी की रात में मेरी पत्नी के पेट में असहनीय दर्द होने लगा। मैं उसके साथ-साथ रातभर परेशान रहा। सुबह गैस की दवा दी। कुछ देर तक तो दर्द बंद रहा लेकिन दोपहर में फिर से दर्द होने लगा। मैं दौड़ा-दौड़ा हाजीपुर के ही सुभाष चौक पर क्लिनिक चलानेवाली डॉ. अंजु सिंह के पास गया और दो सौ रुपया देकर नंबर लगा दिया। फिर घर आया और 12 बजे आनन-फानन में क्लिनिक ले गया। परन्तु यह क्या डॉक्टर तो अपने कक्ष में थी ही नहीं। वे कथित रूप से ऑपरेशन थिएटर में चली गई थीं। फिर शुरू हुआ इंतजार का सिलसिला। पूरी बिल्डिंग में सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ था और कंपाउंडर किसी भी चना-चबेना बेचनेवाले को फटकने नहीं दे रहा था। ईधर मेरी पत्नी का दर्द के मारे बुरा हाल था। उसके साथ-साथ मैं भी सुबह से भूखा-प्यासा अपनी बारी का इंतजार कर रहा था।
मित्रों,इस बीच मैंने कई बार कंपाउंडर से जल्दी दिखवाने का निवेदन किया लेकिन सब बेकार। मेरे साथ-साथ अन्य मरीज और उनके परिजन भी बेहाल थे। मैंने पूरे जीवन में इतनी सुस्ती से मरीज का परीक्षण करनेवाला डॉक्टर नहीं देखा था। फिर राम-राम करते-करते और पत्नी को दर्द से बेहाल देखते हुए शाम के पाँच बजे कंपाउंडर ने नाम पुकारा। लेकिन जब पत्नी दिखाकर बाहर आई तो पुर्जा पर कोई दवा नहीं लिखी गई थी बल्कि अल्ट्रासाउंड और कई तरह की जाँच लिखी हुई थी। मैंने पत्नी से पूछा कि क्या तुमने दवा लिखने को नहीं कहा। तब उसने बताया कि डॉक्टर ने कहा कि बिना अल्ट्रासाउंड औरजाँच की रिपोर्ट देखे वह दवा नहीं लिखेगी भले ही मेरी मौत ही क्यों न हो जाए।
मित्रों,फिर तो मारे गुस्से के मेरा बुरा हाल था। मैं सोंच रहा था कि डॉक्टर का मतलब क्या डाकू होता है? हद है कि डॉक्टरी ने किस तरह डकैती का स्वरूप ग्रहण कर लिया है! मरीज को ईलाज कराने के दौरान पग-पग पर लूटा जाता है और बेचारा प्रतिवाद भी नहीं कर पाता। 17 जनवरी को मेरी पत्नी की जो हालत थी उसको देखकर शायद जल्लाद भी रो पड़ता लेकिन एक डॉक्टर को तनिक भी दया नहीं आई! कहाँ है हिप्पोक्रेटिज की शपथ?
मित्रों,केंद्र सरकार ने जबसे गरीबों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू की है तबसे इन डाकू डॉक्टरों की आमदनी कई गुना बढ़ गई है। मैंने सुना है कि भारत में डॉक्टरों को रेग्यूलेट करने के लिए एमसीआई नाम की कोई संस्था है। फिर एमसीआई या केंद्र सरकार क्यों प्रत्येक जिले या राज्य की राजधानी में मरीजों के लिए हेल्पलाईन नंबर जारी नहीं करती या ऐसी कोई वेबसाईट क्यों नहीं बनाती जहाँ फोन करके या ईमेल करके लोग डॉक्टर नामधारी डाकुओं की शिकायत कर सकें।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 18 जनवरी 2015

भ्रष्टाचार की बाड़ी आंगनबाड़ी योजना

18 जनवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हमारे बिहार में घर के आगे-पीछे जो खाली जमीन होती है लोग उसका भी बखूबी उपयोग करते हैं। लोग उसमें सब्जी उगा लेते हैं और ऐसे ही सब्जियों के छोटे-बड़े बागीचे को हम कहते हैं बाड़ी। कुछ ऐसी ही स्थिति बिहार में आंगनबाड़ियों की है। बिहार के आंगनबाड़ियों में पोषण की नहीं बल्कि वास्तव में भ्रष्टाचार की सब्जी की खेती हो रही है और खुलेआम हो रही है,ताल ठोंककर हो रही है। जबसे यह ICDS (Integrated Child Development Services Scheme) योजना शुरू की गई है आजतक मेरी तो समझ में ही नहीं आया कि योजना को चलानेवाले अधिकारी-कर्मी धूर्त हैं या सरकार ही अंधी है? इस योजना के अंतर्गत कहीं कोई काम ही नहीं हो रहा। पूरा-का-पूरा माल जेब में। अब यह तो जाँच का विषय है कि किसकी जेब में कितना माल जाता है।

मित्रों,इस परियोजना से जुड़े भ्रष्ट अधिकारियों का मनोबल किस कदर बढ़ा हुआ है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई साल पहले जब परवीन अमानुल्लाह बिहार की महिला एवं बाल विकास मंत्री थीं तब वैशाली जिले के ही बिदुपुर में वहाँ की प्रखंड बाल विकास परियोजना पदाधिकारी ने उनके साथ धक्का-मुक्की और बदतमीजी की और मंत्री होते हुए भी अमानुल्लाह कुछ नहीं कर सकीं।

मित्रों,अभी कुछ दिन पहले ही जब वैशाली जिले के कई प्रखंडों में आंगनबाड़ियों की जाँच की गई तो पाया गया कि महुआ और देसरी में कई आंगनबाड़ियों का कहीं अता-पता ही नहीं है। राघोपुर का तो मैं खुद ही चश्मदीद गवाह हूँ और वहाँ भी धरातल पर अधिकांश आंगनबाड़ी हैं ही नहीं फिर बच्चों का कैसा पोषण और कैसा विकास। हाँ,आंगनबाड़ी सेविकाएँ जरूर प्रति सेविका प्रति माह 20 से 25 हजार रुपये का कालाधन अर्जित कर रही हैं।

मित्रों,बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक समग्र बाल विकास सेवा (आइसीडीएस) योजना के तहत 91,688 आंगनबाड़ी संचालित किए जा रहे हैं, मगर एक सर्वे रिपोर्ट में पाया गया कि अधिकांश आंगनबाड़ी केंद्र अपने लक्ष्य और दायित्व से कोसों दूर हैं। मुश्किल से 60 फीसदी बच्चों को नियमित पोषाहार मिल पा रहा है। आइसीडीएस का पहला लक्ष्य ही बच्चों को कुपोषण से बचाना है, लेकिन कागजों में दर्ज बच्चों में बमुश्किल 60 फीसद को ही आंगनबाड़ी केंद्रों पर नियमित पोषाहार मिलता है। समाज कल्याण विभाग के संबंधित अधिकारी के मुताबिक हर आंगनबाड़ी केंद्र में आने वाले बच्चे रोजाना दोपहर डेढ़ सौ से दो सौ ग्राम खिचड़ी, अंडे, हलवा या पुलाव खाते हैं। सुबह के नाश्ते में इन्हें फल और बिस्किट मिलता है, लेकिन हकीकत में तो अधिकांश केंद्रों पर बच्चों की मौजूदा संख्या के अनुरूप भोजन पकाने की सुविधा तक उपलब्ध नहीं है। कई जगहों पर विटामिन ए की खुराक तक समय पर नहीं मिल पा रही है। कहीं-कहीं जरूर कभी-कभी बच्चों को कुछेक बिस्कुट या टॉफियाँ देकर समझ लिया जाता है कि अब वे कुपोषित नहीं रह गए हैं।

मित्रों,आंगनबाड़ी सेविका के बीमार पड़ने, प्रशिक्षण पर जाने या किसी अन्य काम से जाने पर ये केंद्र नहीं खुल पाते। राजधानी पटना की कई आंगनबाड़ियों में वजन मापने की मशीन उपलब्ध तो है, मगर उसका कभी उपयोग नहीं किया गया। दवा की किट, बच्चों का शारीरिक विकास दर्ज करने की व्यवस्था, शौचालय और स्वच्छ पानी आदि की व्यवस्था तो कहीं दिखी ही नहीं। आंगनबाड़ी केंद्र पर बच्चों को दरी और स्लेट तक नहीं मिलती। ज्यादातर सेविकाओं को टीकाकरण और पोषण संबंधी सामान्य सावधानियों की जानकारी नहीं है। बच्चों को खिचड़ी, हलवा या पुलाव देने में भी सफाई नहीं बरती जाती। अधिकांश आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि पोषाहार के सामान से लेकर जलावन तक के लिए मिलने वाली रकम बेहद कम है। शिकायत करने पर संबंधित अधिकारी झिड़क देते हैं।

मित्रों,सवाल उठता है कि फिर इस योजना का पैसा जाता कहाँ है? ऐसा कौन-सा स्पंज है जो योजना की राशि को सोख जाता है? सवाल यह भी उठता है कि सरकार कबतक सबकुछ जानते-बूझते हुए भी इसी तरह जनता के टैक्स से आए पैसे को गड्ढ़े में बहाती रहेगी? आखिर कब इस भ्रष्टाचार की बाड़ी को समाप्त किया जाएगा या इसमें सुधार किया जाएगा? आँकड़े व समाचार-पत्र गवाह हैं कि बिहार में जितने भी अधिकारी घूस लेते रंगे हाथों पकड़े गए हैं उनमें बड़ी संख्या इस योजना से जुड़े अधिकारियों की है। फिर भी केंद्र और राज्य की सरकार क्यों इस योजना की ओवरहॉलिंग नहीं कर रही?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

भारतीय राजनीति में आशा की नई किरण किरण बेदी

16 जनवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैं कई बार अपने आलेखों में लिख चुका हूँ कि हमारे देश की राजनीति सिर्फ बाहर से गालियाँ देने से स्वच्छ नहीं होनेवाली है बल्कि इसके लिए स्वच्छ मन,चरित्र और विचारवाले लोगों में राजनीति में आना होगा। यह हमारे लिए बड़ी ही खुशी का सबब है कि कल एक ऐसी ही शख्सियत ने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया। वह एक ऐसी शख्सियत हैं जिनके बारे में हमलोग बचपन से ही पढ़ते-सुनते आ रहे हैं और उनसे प्रेरणा ग्रहण करते रहे हैं। वह एक ऐसी शख्सियत हैं जिनकी ईमानदारी भारत के भ्रष्टतम विभाग में काम करने के बावजूद संदेह से परे रही है।
मित्रों,वे एक ऐसी शख्सियत हैं जिनके राजनीति में आने के बाद हम निश्चिंत होकर यह कह सकते हैं कि भारत के साथ-साथ दिल्ली के भी अच्छे दिन आनेवाले हैं। आपको पता है कि मैं किनके बारे में बात कर रहा हूँ। वैसे तो वे किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं फिर भी चूँकि आलेख को आगे बढ़ाने के लिए उनका नाम लेना जरूरी है इसलिए मैं उनका नाम ले रहा हूँ और उनका नाम है-किरण बेदी। वही किरण बेदी जो भारत की पहली महिला आईपीएस थीं, वही किरण बेदी जिन्होंने नौकरी को सिर्फ नौकरी की तरह नहीं किया बल्कि देश और समाज की सेवा के हथियार के रूप में प्रयुक्त किया,वही किरण बेदी जिनके लिए देश और समाज ही हमेशा सर्वोपरि रहा,उन्हीं किरण बेदी ने कल भारतीय जनता पार्टी को ज्वाईन कर राजनीति में कदम रखा।
मित्रों,कल तक आम आदमी पार्टी नामक नौटंकिया दल गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रहा था कि भाजपा के पास मुख्यमंत्री बनने लायक कौन-सा चेहरा है आज वो खामोश हो गया है क्योंकि आज भाजपा के पास मुख्यमंत्री बनने लायक एक ऐसा चेहरा है जो नौटंकी करने में नहीं बल्कि काम करने में विश्वास रखता है, जो ईमानदार होने का दिखावा नहीं करता बल्कि वास्तव में ईमानदार है। कुछ लोग किरण जी के नरेंद्र मोदी और भाजपा को लेकर पहले दिए गए बयानों को प्रमुखता से दुनिया के सामने लाने में लग गए हैं मैं उनको बताना चाहता हूँ कि एक समय था जब मैं खुद भी नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं करता था हालाँकि मैंने उनको कभी देखा-सुना नहीं था। निश्चित रूप से मेरे मन में उनकी जो छवि बनी हुई थी वह मीडिया की देन थी लेकिन जब मैंने उनको पहली बार गुजरात विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भाषण करते हुए टीवी पर देखा तो मुझे लगा कि बंदे में दम है और सिर्फ यही एक आदमी माँ भारती की बिगड़ी हुई तकदीर को बदल सकता है। तभी से मैंने बिना किसी लाग-लपेट व बिना किसी शंका-संदेह के उनका समर्थन करना शुरू कर दिया।
मित्रों,हो सकता है कि किरण बेदी जी के साथ भी ऐसा ही हुआ हो क्योंकि आज हमारे देश में जो आशा व उत्साह का माहौल है क्या कोई पिछले साल आज की ही तारीख में कल्पना भी कर सकता था? मैंने तो यहाँ तक लिख दिया था कि भारत में संसदीय प्रणाली फेल साबित हो चुकी है और हमें देर-सबेर अध्यक्षीय शासन प्रणाली को अपनाना ही पड़ेगा लेकिन आज मैं यह कह सकता हूँ कि नरेंद्र मोदी ने कुछ ऐसा जादू भारत की जनता पर कर दिया है कि मुझे यकीन ही नहीं हो रहा है कि भारत में संसदीय शासन प्रणाली है बल्कि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भारत में अमेरिका की तरह ही अध्यक्षीय शासन प्रणाली है।
मित्रों,इसलिए इस विवाद को ज्यादा तूल नहीं दिया जाना चाहिए कि नरेंद्र मोदी को लेकर भूतकाल में किरण बेदी के क्या विचार थे और वर्तमान काल में हमें यह देखना चाहिए कि हम किरण जी की जीवटता और योग्यता से क्या लाभ उठा सकते हैं? हमें किरण जी के राजनीति में पदार्पण को एक अवसर के रूप में लेना चाहिए और उनको अपनी कल्पना को साकार करने का अवसर देना चाहिए। मैं मानता हूँ कि राम-राज्य एक आदर्श है और उसको शत-प्रतिशत प्राप्त करना संभव ही नहीं है फिर भी अगर कोई उस आदर्श को 50 प्रतिशत तक भी प्राप्त कर लेता है तो उसे एक अद्भुत उपलब्धि माना जाना चाहिए और मैं समझता हूँ कि किरण जी भविष्य में उसी दिशा में प्रयास करनेवाली हैं।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 11 जनवरी 2015

समाजवाद बबुआ पहिले भकुआईल रहे अब पगला गईल ह!

11 जनवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,एक समय था जब मैं समाजवादियों की काफी कद्र करता था। मेरे चाचा जो खुद भी समाजवादी थे ने वर्षों पहले एक बार मुझे समझाया था कि समाजवाद का मतलब होता है रामजी के चिरई रामजी के खेत,खा ले रे चिरई भर-भर पेट। उनके कथनानुसार समाजवादी समाज से गैरबराबरी को समाप्त कर समरस समाज की स्थापना करना चाहते हैं। परन्तु 1990 के बाद वही चाचा कहने लगे कि समाजवाद बबुआ भकुआ गईल ह। अब बिहार,हरियाणआ और यूपी में समाजवादियों का ही शासन था। शासन क्या था दुश्शासन था। सत्ता में आने के बाद समाजवादियों ने समाज में समरसता की स्थापना के स्थान पर अपनी जाति के शासन की स्थापना कर डाली। आज भी यूपी और बिहार की माटी का कण-कण यही गाता हुआ लग रहा है कि हमें तो लूट लिया मिल के समाजवादियों ने। यूपी-बिहार के समाजवादियों ने घोटालों की झड़ी लगा दी। हरियाणा भी अपवाद नहीं रहा और वहाँ के चौटाला जी आज भी अपनी ठंडी रातें जेल में काट रहे हैं।
मित्रों,क्या विडंबना है कि जिन बातों को लेकर समाजवादी पुराने शासकों की सामंतवादी कहकर आलोचना किया करते थे शासन में आने के बाद वे खुद वही सब कहीं ज्यादा चढ़-बढ़कर करने लगे। यूपी में जब मुलायम सिंह यादव को जन्मदिन मनाना होता है तो वे इसे सादे तरीके से नहीं मनाते बल्कि वे रामपुर की सड़कों पर विक्टोरिया की फिटन पर सवार होकर निकलते हैं। जब मुलायम परिवार को नया साल मनाना होता है तो वे इसे गरीबों को ठंड से बचाने का इंतजाम करते हुए नहीं मनाते बल्कि सैफई में अरबों रुपये फूंककर महामहोत्सव का आयोजन करते हैं जिसमें मोनिका बेदी ठुमके लगाती है,ऋत्विक रौशन संगीत और नृत्य की शमाँ को रौशन करते हैं। इस साल भी पूरे भारत में ठंड लगने से सबसे ज्यादा गरीब यूपी में ही मरे हैं लेकिन समाजवाद को अब गरीबों की चिंता नहीं है बल्कि वो तो मोनिका बेदी के साथ ठुमके लगाने में मशगूल है। इसी तरह समाजवाद को बलत्कृत अबलाओं की भी चिंता नहीं है बल्कि वो तो बलात्कार को बच्चों की छोटी-मोटी शरारत मानता है। इसी तरह कभी गैरबराबरी को समाप्त करने की चिंता करनेवाले समाजवादियों को आज दलितों की कोई चिंता नहीं है क्योंकि वे इनको वोट ही नहीं देते। समाजवाद सैफई के ठुमकों पर हो-हल्ला होने पर गजब की बेशर्मी से कहता है कि इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। जब हम छोटे थे तब हमारे गांव में शादियों में नर्तकियों को नचाया जाता था लेकिन इससे हमारे गांव में तो पर्यटन को बढ़ावा नहीं मिला?
मित्रों,इन दिनों हमारे देश के समाजवाद को एक नई चिंता ने ग्रसित कर लिया है और वह चिंता है भाजपा और नरेंद्र मोदी के विजय रथ को रोकने की। लेकिन इसके लिए सैफई में ठुमके लगाता समाजवाद ठुमकों को रोककर सुशासन की स्थापना नहीं करता बल्कि कलम-कॉपी लेकर हिसाब लगाता है कि अगर हम-तुम हाथ मिला लें तो तुम्हारा वोट-बैंक और मेरा वोट-बैंक मिलकर हमारा वोट-बैंक इतना हो जाएगा और चुनाव जीतने के बाद हमारा बैंक-बैलेंस इतना। अब समाजवाद न सिर्फ भकुआ गया है बल्कि लंपट,सत्तावादी,सामन्तवादी और भ्रष्ट हो गया है। समाजवाद पहले कहता था कि राष्ट्रपति हो या गरीबों की संतान,सबको शिक्षा मिले एक समान लेकिन आज समाजवाद को गांवों में शिक्षा के स्तर को सुधारने की चिंता नहीं है बल्कि बच्चों के बीच लैपटॉप,साईकिल और छात्रवृत्ति बाँटकर चुनाव जीतने की चिंता है। आज मुलायम सिंह यादव का बेटा-पोता गांव में गरीबों के साथ टूटे हुए बेंचों और टाट पर बैठकर पढ़ाई नहीं करता बल्कि अमेरिका-इंग्लैंड जाकर हार्वर्ड और कैंब्रिज में अध्ययन करता है। इसी तरह से कभी समाजवाद कहता था कि हम उन घरों को रौशन करने आए हैं जिनमें सदियों से अंधेरा है मगर आज समाजवाद कहता है कि हम जिसकी सरकार रहे उसी के साथ हो लेने के लिए आए हैं ताकि बराबर सत्ता की मलाई चाभने को मिलती रहे। अब नई परिभाषानुसार गाँव,गरीब और गौ की चिंता करना समाजवाद नहीं है बल्कि चुनाव जीतकर सत्ता में आना,पुराने राजाओं की तरह राज भोगना,अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को गुंडागर्दी-मनमानी करने की पूरी छूट दे देना और फिर उनके बल पर चंबल के लुटेरों की तरह लूट मचाना समाजवाद है। मेरे चाचा कहते हैं कि बबुआ समाजवाद अब भकुआईल नईखे बाकिर सत्ता के नशीला दारू पीके पगला गईल ह।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 4 जनवरी 2015

PK आरोप है या आलोचना?

4 जनवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जबसे राजू हिरानी की फिल्म पीके आई है पूरे देश में कुछ लोगों ने हड़कंप मचाया हुआ है। उनको लगता है जैसे हिन्दू धर्म लाजवंती का पौधा है जो छूते ही मुरझा जाएगा और उसके ऊपर इस एक फिल्म के चलते संकट पैदा हो गया है। जबकि तलवारों और तोपों के बल पर हिन्दू धर्म को हजारों ISIS सदृश आक्रान्ता नहीं मिटा सके तो सिर्फ शब्दों और तर्कों के कारण हिन्दू धर्म को कैसे खतरा पैदा हो सकता है? फिर हिन्दू धर्म में तो हजारों सालों से बहस और शास्त्रार्थ की परंपरा रही है फिर आज क्यों हमें आलोचनाओं के द्वारों को बंद कर देना चाहिए? क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि दूसरे धर्म वाले अपने मामले में ऐसा करने की ईजाजत नहीं देते? अगर हम ऐसा करते हैं तो फिर हममें और उनमें क्या फर्क रह जाएगा? क्या तब हम भी लकीर के फकीर नहीं कहे जाएंगे? क्या हम भी मध्ययुगीन जानवर बनकर नहीं रह जाएंगे?
मित्रों, अभी कल ही भारत के प्रधानमंत्री ने भारत के लोगों से अपील की कि लोगों को आलोचना करनी चाहिए न कि आरोप लगाने चाहिए। इस बयान के संदर्भ में आज हम इस बात पर विचार करेंगे कि फिल्म PK में हिन्दू धर्म पर आरोप लगाए गए हैं या उसकी आलोचना मात्र की गई है? जहाँ तक मैं समझता हूँ कि PK में हिन्दू धर्म में कायम पाखंडवाद पर करारा प्रहार किया गया है न कि हिन्दू धर्म पर। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमने अपने भगवान की हत्या कर दी है और पैसे को ही भगवान बना दिया है और फिल्म पीके में हमारे इसी पतन को रेखांकित किया गया है जो किसी भी तरह से गलत नहीं है। PK के निर्माता-निर्देशक ने बस एक ही गलती की है कि उसने सिर्फ हिन्दू धर्म में बढ़ते पाखंडवाद को ही निशाने पर रखा है जबकि उसको अन्य धर्मों में फलते-फूलते पाखंडवाद पर भी बराबर की चोट करनी चाहिए थी। कुछ इसी तरह की फिल्म ओ माई गॉड भी थी लेकिन उसमें सारे धर्मों की एक साथ आलोचना की गई थी। अगर PK के निर्माता-निर्देशक भी इतनी सावधानी रखते तो आज उनको हिन्दुओं का इतना सख्त विरोध नहीं झेलना पड़ता। मेरी समझ में यही एक कारण है जिससे कि कई हिन्दुओं को फिल्म में आलोचना के तत्त्व कम और आरोप के तत्त्व ज्यादा दिखाई दे।
मित्रों,इसलिए मैं नहीं समझता कि फिल्म PK को प्रतिबंधित कर देना चाहिए लेकिन मैं राजू हिरानी को यह सलाह जरूर देना चाहूंगा कि जब भी वे इस तरह के संवेदनशील विषय पर फिल्म बनाएँ तो इस बात का आवश्यक रूप से ख्याल रखें कि फिल्म एकतरफा या किसी एक ही धर्म की आलोचना करती हुई नहीं हो क्योंकि पाखंड और झूठ सभी धर्मों और पंथों में है और कई धर्म और पंथ तो ऐसे हैं जिनमें सुधार और परिवर्तन की आवश्यकता हिन्दू धर्म से कहीं ज्यादा है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

भारतीय इतिहास का प्रस्थान विन्दु था 2014

31 दिसंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कुछ वक्त ऐसे होते हैं जो बिना कोई हलचल मचाए ही इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं जबकि कुछ लम्हे ऐसे भी होते हैं जो इतिहास को ही बदल देते हैं। साल 2014 भी ऐसा ही साल था जिसमें न केवल भारत के इतिहास को बल्कि पूरी दुनिया के वर्तमान और भविष्य को बदलकर रख देने की क्षमता थी। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले पूरे भारत में निराशा-ही-निराशा का माहौल था और ऐसा लग रहा था जैसे भारत एशिया का नया मरीज बनने जा रहा है। केंद्र सरकार में रोज-रोज नए-नए घोटाले सामने आ रहे थे जो नित नए-नए रिकॉर्ड बना रहे थे। छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों ने हुआँ-हुआँ करके ऐसा माहौल बना दिया था जैसे कि हिन्दू धर्म में जन्म लेना ही अपराध हो। रजिया और डायना के लिए तो सरकार के पास एक-से-एक योजना थी लेकिन कहीं ज्यादा अभावों में जी रही राधा के लिए कुछ भी नहीं था।
मित्रों,फिर आया लोकसभा चुनाव,2014। लगभग पूरे भारत के हिन्दू एकजुट हो गए और पहली बार भारत में किसी हिन्दुवादी दल को लोकसभा में अपने बल पर बहुमत प्राप्त हुआ। भारत में रक्तहीन क्रांति हो गई जो बारास्ता ईवीएम संपन्न हुई। आज हम विलियम वर्ड्सवर्थ की तरह जिसने कभी फ्रांस की क्रांति के बारे में कहा था कि उस काल में जीवित होना ही बहुत बड़ी बात थी और युवा होना तो स्वर्गिक अनुभव था, की तरह कह सकते हैं कि उस चुनाव के समय भारत में होना ही बहुत बड़ी बात थी और मतदान करना तो स्वर्गिक अनुभव था। वर्ष 2014 की यह इकलौती यादगार घटना हो ऐसा भी नहीं है। भारत की जनता ने इस चुनाव के बाद भी विभिन्न विधानसभा चुनावों में भाजपा को शानदार जीत देकर राज्यसभा में पार्टी के बहुमत की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाया है।
मित्रों,यद्यपि अभी केंद्र सरकार को सत्ता में आए ज्यादा दिन नहीं हुए हैं लेकिन इस अल्पकाल में भी आज पूरी दुनिया में भारत का डंका बज रहा है। एक बार फिर से स्वदेशी का जोर बढ़ने लगा है,भारत को दुनिया की फैक्ट्री बना डालने की दिशा में जोर-शोर से कोशिश हो रही है,सरकार में कहीं कोई घोटाला नहीं है,कानून का बोझ कम किया जा रहा है,देश के गणमान्य लोगों ने झाड़ू उठा लिए हैं,भारत दुनिया के सारे देशों के साथ आँखों में आँखें डालकर बात कर रहा है,पूंजी निवेश को आसान बनाया जा रहा है,नए उद्यमों की स्थापना को आसान बनाने के प्रयास काफी तेजी से और शिद्दत से किए जा रहे हैं,युवाओं को भिक्षा के स्थान पर शिक्षा और रोजगार देने के इंतजामों में सरकार लग गई है।
मित्रों,किसी भी एक साल में भारत की दशा और दिशा में इतना बदलाव नहीं आया जितना कि वर्ष 2014 में। इस मामले में यह साल निश्चित रूप से सन् 1947 और 1974 से भी ज्यादा क्रांतिकारी और परिवर्तनकारी रहा। सबसे बड़ी बात तो यह रही कि इस क्रांति को अंजाम तक पहुँचाया स्वयं भारत की सवा सौ करोड़ जनता ने। अगर जनता जागरुक नहीं हुई होती तो एक तो क्या एक हजार नरेंद्र मोदी भी व्यवस्था तो क्या सत्ता तक को भी नहीं बदल पाते और आज भी देश में देशविरोधी,हिन्दूविरोधी तत्त्वों का शासन होता।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 28 दिसंबर 2014

मुंशी प्रेमचंद,डॉ. धर्मवीर और नीतीश कुमार

28 दिसंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आप जानते हैं कि हिंदी साहित्य में एक धारा चलती है दलित साहित्य। इस धारा के कई लोगों का मानना है कि दलितों के दर्द को बयान करने का अनन्य अधिकार सिर्फ दलितों को ही है। इनमें से एक डॉ. धर्मवीर ने तो दलितों के दर्द को सबसे ज्यादा जुबान देनेवाले व हिन्दी के महानतम कथाकार मुंशी प्रेमचंद को सामंतों का मुंशी तक कह दिया। कदाचित इस धारा के समर्थकों के अनुसार दलितों पर दलित अत्याचार करे,दबंग दलित दलित अबला के साथ बलात्कार करे फिर भी दलितों के बारे में लिखेगा सिर्फ वही। वह व्यक्ति जो दलितों के साथ सहानुभूति रखता है,उनके सामाजिक,आर्थिक व शैक्षिक उत्थान के लिए अपने श्रम,धन व समय का व्यय करता है अगर वह दलित नहीं है तो फिर उसको दलितों के दर्द को बाँटने का अधिकार ही नहीं है। शायद वे यह भी मानते हैं कि कोई दलित अगर सड़क-दुर्घटना का शिकार हो जाए तो किसी गैरदलित को उसकी मदद नहीं करनी चाहिए भले ही उसके ऐसा करने से दुर्घटना-पीड़ित की मौत ही क्यों न हो जाए। वह व्यक्ति अगर ऐसा कुछ करता है तो शायद सीधे तौर पर वो अनाधिकार चेष्टा कर रहा है और ऐसा करने से उसको बलपूर्वक रोका जाना चाहिए।
मित्रों,कुछ इसी तरह की धारा राजनीति में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी बहाना चाहते हैं और बहा भी रहे हैं। श्री कुमार भारतीय जनता पार्टी से इस बात को लेकर काफी नाराज हैं कि भाजपा ने आदिवासीबहुल झारखंड में किसी गैर आदिवासी को कैसे मुख्यमंत्री बना दिया। नीतीश जी की निगाह में भाजपा ने ऐसा करके एक गलत परंपरा की शुरुआत की है। शायद इसलिए उन्होंने महाअयोग्य जीतनराम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाकर महान परंपरा की रक्षा की क्योंकि उनको लगता है कि श्री मांझी के सीएम बनते ही तत्क्षण सारे महादलितों के दिन बहुर गए। शायद नीतीश आँखवाले अंधे हैं। वे यह नहीं देख पाए कि पिछले 14 सालों में राज्य के शासन की बागडोर संभालनेवाले आदिवासी मुख्यमंत्रियों ने राज्य की और राज्य के आदिवासियों की क्या हालत कर दी है। जनता (मुसहर) शासक (मांझी) की जाति लेकर क्या उसका अँचार डालेगी? जनता को तो सुशासन से मतलब है फिर चाहे वो रघुवर दास लाएँ या नीतीश कुमार या कोई भी और। क्या कोई सड़क-दुर्घटना पीड़ित सहायता प्राप्त करने से पहले मदद करनेवाले की जाति या धर्म पूछता है या उसको सिर्फ मदद पाने से मतलब रहता है? पिछले 14 सालों में जिन आदिवासी नेताओं ने झारखंड को लूट लिया उनको क्या उनके ऐसे कृत्य के लिए नीतीश कुमार सम्मानित करना पसंद करेंगे? क्या नीतीश कुमार सहित सारे समाजवादियों के लिए जाति ही सबकुछ होती है या धर्म ही सर्वस्व होता है? लोगों के कर्मों और चरित्र की कोई कीमत नहीं? क्या नीतीश कुमार जी किसी मूर्ख स्वजातीय या दलित चिकित्सक से ऑपरेशन या ईलाज करवाना पसंद करेंगे बजाए किसी सवर्ण योग्य डॉक्टर से? क्या पिछड़ी जाति होने के चलते लालू जी के तमाम काले कारनामे अचानक उजले हो गए? छि,घिन्न आती है मुझे ऐसे नेताओं से और इस बात को लेकर शर्म आती है कि ऐसे नेता ने हमारे राज्य बिहार में जन्म लिया!!!

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

भटके हुए समाजवाद के प्रतीक थे मुंशीलाल राय

28 दिसंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कल वैशाली जिले के महान समाजवादी नेता मुंशीलाल राय का निधन हो गया। आज बहुत से लोग उनको याद कर रहे हैं। मैं ठहरा एक छोटा और आम आदमी सो मैं उनको इसी रूप में याद करूंगा। मुंशीलाल जी का नाम मैंने पहली बार 80 के दशक में सुना मेरे ननिहाल जगन्नाथपुर जो कि बासुदेवपुर चंदेल और महनार रोड रेलवे स्टेशन के पास है में। तब अक्सर उनके बारे में लोग बातें करते। उनकी शिकायत रहती कि बगल के गोरीगामा गांव में तो मुंशीलाल जी जो तब महनार के विधायक थे गली-गली में सड़कें बनवा रहे हैं लेकिन जगन्नाथपुर जो कि राजपूतों का गांव था में वोट मांगने भी नहीं आते।
मित्रों,इसके बाद आया 1985 का चुनाव। चूँकि कांग्रेस प्रत्याशी प्रो. मिथिलेश्वर प्रसाद सिंह मेरे पिताजी के स्नेहिल थे इसलिए अक्सर हमारे दरवाजे पर जमे रहते। मगर जब मतदान शुरू हुआ तो मेरे मामा शोकहरण प्रसाद सिंह के दबाव में गांववालों ने मुनीश्वर प्रसाद सिंह को वोट दे दिया जो वोटकटवा की भूमिका में थे। परिणाम यह हुआ कि मुंशीलाल जी 2-ढाई हजार मतों से जीतकर फिर से विधायक बन गए। मगर इस बार भी उनका रवैय्या वही था कि वे सिर्फ अवर्णों के पास मत मांगने गए और सवर्णों से दूरी बनाए रखी।
मित्रों,फिर 1990 के चुनाव में उनको महनार से टिकट ही नहीं मिला। पार्टी की अंदरूनी राजनीति के चलते हाजीपुर से मिला था मगर वे चौथे स्थान पर रहे। कहा जाता है कि लालू जी मुंशीलाल जी से डरते थे कि कहीं मुंशीलाल जी चुनावों के बाद मुख्यमंत्री न बन जाएँ। 1990 के बाद बिहार में जातीय युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए जिससे महनार भी अछूता नहीं रहा। महनार बाजार में 1992 में मुक्तियारपुर के मुखिया प्रह्लाद सिंह की हत्या हो गई जिसमें महनार के बनियों का भी नाम आया। तब बनिए आरक्षण के नाम पर पिछड़ी जातियों के साथ एकजुट थे। मगर जल्दी ही हालत बदल गई। यादव जाति के दो अपराधियों देशराजपुर के नागेश्वर राय और चकेसो के राजगीर राय ने महनार में अपहरण को उद्योग का रूप दे दिया और धीरे-धीरे स्थिति इतनी खराब हो गई कि दिन ढलते-ढलते बाजार बंद हो जाता। जब भी महनार से हाजीपुर आने-जानेवाली बसों को चकौसन,चेचर या खिलवत में रोका जाता तो लोग समझ जाते कि महनार के किसी तेली-कलवार या बढ़ई का अपहरण हो गया। रात में राजगीर राय घोड़े पर सवार होकर महनार बाजार में निकलता तो महनार के तेली-कलवार और सुनार कथित रूप से रास्तों पर थालियों में रुपये और सोना-चांदी लेकर खड़े रहते। अब तक मुंशीलाल जी समाजवाद भूलकर अन्य यादव नेताओें की तरह जातिवादी हो चुके थे और महनार के लोगों का मानना था कि अपहर्ताओं को मुंशीलाल का वरदहस्त प्राप्त था।
मित्रों,इसी माहौल में 1995 का विधानसभा चुनाव हुआ। इस बार मुंशीलाल जी महनार से जनता दल के उम्मीदवार थे। बक्से से जिन्न निकला और वे जीत गए। जीतने के बाद उन्होंने अपने संरक्षक शरद यादव जी के यहां लॉबिंग की कि उनको नई सरकार में मंत्री बनाया जाना चाहिए। शरद यादव जी जब मुंशीलाल जी को साथ में लेकर लालू जी के यहाँ पहुँचे तो उनके साथ महनार के उनके कई समर्थक भी थे जिनमें से किसी ने हमें बताया था कि लालू जी ने शरद जी से तब कहा था कि हमने 13 को 39 कर दिया अब मंत्री भी बना दें? यानि 13 हजार मत को 39 हजार कर दिया अब मंत्री कैसे बना दें? लेकिन बाद में जब जनता दल का विभाजन हुआ तो मजबूरन लालू जी को मुंशीलाल जी को मंत्री बनाना ही पड़ा। अभी भी महनार में नागेश्वर राय और राजगीर राय का आतंकराज जारी था।
मित्रों,मुंशीलाल जी को इस बार कुछ नए चेले मिल गए थे। उनमें से सबसे बड़ा नाम था महनार के इशहाकपुर के बंधुद्वय बच्चू राय और शंभू राय का। दोनों भाई ठेकेदार थे और छँटे हुए बदमाश भी। मुंशीलाल जी के कथित इशारे पर उनके चेलों ने पहले लावापुर के चंद्रशेखर राय की और बाद में महनार बाजार के ही रामपुकार सिंह की हत्या कर दी। उस कालखंड का एक वाकया मुझे आज भी याद है। एक बार डीएम साहब महनार में नाली-निर्माण का निरीक्षण कर रहे थे। महनार के महान समाजवादी और कर्पूरी ठाकुर के मित्र रहे सत्यनारायण दिवाकर जी भी साथ में थे। दिवाकर जी ने कहा कि अगर मैं जोर से पेशाब कर दूँ तो यह नाली बह जाएगी। डीएम साहब ने ठेका रद्द कर दिया। बाद में बच्चू और शंभू राय ने सत्यनारायण दिवाकर जी को उनकी उम्र का ख्याल किए बिना न सिर्फ अपमानित किया बल्कि जमकर पीटा भी। मुझे आज भी चलचित्र की तरह याद है कि रामपुकार सिंह की प्रतिमा का अनावरण हो रहा था और अनावरण करने के लिए बिहार सरकार में पीएचडी मंत्री मुंशीलाल राय जी मंच पर मौजूद थे। तभी सत्यनारायण दिवाकर जी ने माईक संभाली और कहा कि मंत्रीजी बड़े ही दयालु हैं। पहले तो हत्या करवाते हैं,फिर अपने फंड से मूर्ति बनवाते हैं और अपने हाथों से अनावरण भी करते हैं। फिर तो मुंशीलाल जी को जनता के इतने तीखे विरोध का सामना करना पड़ा कि उन्होंने निकल भागने में ही अपनी भलाई समझी। यह बात अलग है कि इसके बाद दिवाकर जी कई दिनों तक घर से बाहर ही नहीं निकले।
मित्रों,इसी बीच पहले नागेश्वर राय और फिर बाद में राजगीर राय की हत्या हो गई। मौके की नजाकत को समझते हुए अब मुंशीलाल जी सवर्णों के गांवों में भी आने-जाने लगे। जगन्नाथपुर में भी उन्होंने स्टेट बोरिंग की स्थापना करवाई। यह बात अलग है कि आज तक बोरिंग ने पानी देना शुरू नहीं किया है। फिर आया साल 2000 का चुनाव और इस बार मुंशीलाल जी रामा सिंह से 40000 मतों के भारी अंतर से पराजित हो गए। इसी के साथ उनके राजनैतिक जीवन का लगभग अंत हो गया और इसके बाद वे लगातार चुनावों में हारते रहे।
मित्रों,मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूँ कि मैं एक आम आदमी था और आज भी हूँ इसलिए मैं उसी रूप में मुंशीलाल जी याद करूंगा। खास रहता तो उनके बारे में खास बातें बताता। दरअसल मेरी नजर में मुंशीलाल जी समाजवादी कम जातिवादी ज्यादा थे। लालू युग से पहले भी वे सवर्णों से दूरी रखते थे। शायद उनकी दृष्टि में ऐसा करना ही समाजवाद था। बाद में उन्होंने अपराधियों को जमकर संरक्षण दिया। कथित रूप से दो-चार हत्याएँ भी करवाईं शायद यह भी उनका समाजवाद ही था। अगर हम दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि आज लालू-मुलायम-नीतीश-शरद आदि का समाजवाद भी तो वही समाजवाद है जो मुंशीलाल जी का समाजवाद था। वैसे आप क्या समझते हैं कि मुंशीलाल जी का भटकाव समाजवादियों का भटकाव था या स्वयं समाजवाद का?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

भाजपा की कम मोदी की जीत अधिक

25 दिसंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आपलोग इस शीर्षक को देखकर जरूर चौंक सकते हैं लेकिन हकीकत तो जो है सो है। जम्मू-कश्मीर और झारखंड दोनों ही राज्यों के चुनाव-परिणाम स्पष्ट तौर पर यही दर्शाते हैं कि भारत की जनता का अभी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में विश्वास बना हुआ है लेकिन साथ-ही चुनावों के नतीजों से यह भी पता चलता है कि पार्टी के तौर पर जनता के लिए भारतीय जनता पार्टी बेतहर विकल्प तो है लेकिन एकमात्र विकल्प नहीं।
मित्रों,अगर हम प्रचुरता में निर्धनता के दुनिया में सर्वश्रेष्ठ उदाहरण झारखंड को देखें तो वहाँ की जनता ने न सिर्फ सारे पूर्व मुख्यमंत्रियों को नकार दिया बल्कि पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो को भी विधानसभा का मुँह नहीं देखने दिया। जाहिर है कि जनता राज्य को लूटने के लिए जिम्मेदार चेहरों को दंडित करना चाहती थी। जनता ने भाजपा को बहुमत तो दे दिया लेकिन संभावित मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को हरा दिया। विदित हो कि झारखंड के निर्माण के बाद के 14 वर्षों में भाजपा 9 सालों तक सत्ता में रही है और राज्य में सबसे ज्यादा समय तक अर्जुन मुंडा ही मुख्यमंत्री रहे हैं। जाहिर है कि जनता चाहती थी कि भाजपा की ओर से इस बार ऩया व ताजा चेहरा राज्य का मुख्यमंत्री बने। झारखंड के चुनाव-परिणामों से यह भी पता चलता है कि राज्य की एक तिहाई आबादी आदिवासियों का विश्वास अभी भी झारखंड मुक्ति मोर्चा में बना हुआ है। इसके साथ ही झारखंड की जनता ने कांग्रेस,लालू और नीतीश के महागठबंधन को सिरे से नकार दिया है। लालू और नीतीश की पार्टियों का तो राज्य में पहली बार खाता भी नहीं खुला।
 मित्रों,इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर के चुनाव-परिणाम भी यही दर्शाते हैं कि जनता का मोदी में विश्वास अभी भी बना हुआ है। कश्मीर में भाजपा ने 44+ का जो लक्ष्य रखा था वह कहीं से भी यथार्थवादी था ही नहीं। मुसलमानों ने इस बार भी  भाजपा को वोट नहीं दिया है जबकि जम्मू-कश्मीर में मुसलमानों का ही बहुमत है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में भाजपा को 25 सीटें ही मिल सकती थीं 44 तो कभी भी नहीं।  भाजपा के लिए जम्मू-कश्मीर में सबसे बड़ा झटका लद्दाख में कोई सीट नहीं मिलना है जबकि प्रधानमंत्री ने पीएम बनने के बाद भी कई-कई बार इस क्षेत्र का दौरा किया है।
मित्रों,चाहे चुनावों में कोई जीता हो,कोई हारा हो सबसे बड़ी बात तो यह है कि इन दोनों ही राज्यों में जनता ने अलगाववाद और प्रतिक्रियावाद को नकार दिया और भारी मतदान करके लोकतंत्र में अपनी आस्था पर मुहर तो लगा ही दी है। इसके साथ ही दोनों राज्यों की जनता ने चुनाव-परिणामों के माध्यम से नेताओं को यह चेतावनी भी दी है कि जनता अब लूट और कुशासन के प्रतीकों को बनाए रखने में नहीं बल्कि ढहा देने में यकीन रखती है। चूँकि भाजपा के पास जनता को सुशासन की उम्मीद बंधाने के लिए नरेंद्र मोदी नामक चेहरा मौजूद था इसलिए सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को हुआ वैसे फायदे में तो जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और झारखंड में झामुमो भी रहा।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

कुछ ऐसी ही कसमें अनिल कुमार की शहादत पर भी खाई गई थीं

24 दिसंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आपको याद होगा कि वर्ष 2014 के पहले ही दिन वैशाली जिले के जुड़ावनपुर थाने के प्रभारी अनिल कुमार की अपराधियों ने थाने में घुसकर कर दी थी। इतना ही नहीं उन्होंने एक स्थानीय ग्रामीण की भी हत्या कर दी थी और पैदल ही आराम से भाग निकले थे। तब अनिल कुमार के शव के सामने वैशाली के पुलिस अधीक्षक सुरेश प्रसाद चौधरी ने हत्यारों को सजा दिलाने की कसमें खाई थीं। मगर हुआ इसका उल्टा। न जाने किस दबाव में और किसके दबाव में वैशाली पुलिस ने सिर्फ एक ही अभियुक्त को गिरफ्तार किया और उसको भी बाद में हाईकोर्ट से जमानत ले लेने दिया। इस प्रकार शहीद अनिल कुमार को मरने के बाद भी खुद उनके सहयोगी ही न्याय नहीं दिला सके या जानबूझकर इसके लिए प्रयास ही नहीं किया। न तो कोई गवाह ही जुटाया गया और न ही हत्या में इस्तेमाल हथियार को ही बरामद किया गया। इतना ही नहीं वैशाली पुलिस एक साल में अपने ही जवानों से लूटे गए हथियारों को ही बरामद कर पाई। जाहिर है कि पुलिस के ऐसे रवैये से पुलिस के जवानों का नहीं बल्कि अपराधियों का मनोबल बढ़ा।

मित्रों,कुछ ऐसे ही वादे कल सूबे के अपर पुलिस महानिदेशक गुप्तेश्वर पांडे ने बिहार की जनता और शहीद के परिजनों से किए। मेरी मानिए तो इस बार भी बिहार पुलिस अपने के शहीद सहकर्मी को मरणोपरांत न्याय नहीं दिला सकेगी। फिर से वही पैरवी का खेल चलेगा और अपराधी पकड़े जाने के बाद भी बाईज्जत बरी हो जाएंगे। जिस तरह से वर्ष 2014 में जुड़ावनपुर थाने के थानेदार की हत्या के मुख्य नामजद अभियुक्त श्रीकांत राय का बैंड बाजे के साथ जमानत पर रिहा होने के बाद गांव में स्वागत किया गया फिर से संजय कुमार तिवारी के हत्यारों का भी नए साल में भी स्वागत किया जाएगा।

मित्रों,सवाल उठता है कि जो बिहार पुलिस अपने ही सहकर्मियों के हत्यारों को सजा नहीं दिलवा पा रही है उस पर कैसे यकीन किया जाए कि वो बिहार के आम गरीब-दबे-कुचले नागरिकों को इंसाफ दिलवाएगी? मैं कई बार अपने पूर्व के आलेखों पुलिस वाला लुटेरा अथवा वर्दी वाला गुंडा,दरिंदा बनता सिस्टम,क्या मैं आपकी सहायता कर सकता हूँ?,दुश्शासनों के भरोसे सुशासन में निवेदन कर चुका हूँ कि या तो पुलिस के रवैये को बदलिए नहीं तो इस संगठन को समाप्त ही कर दीजिए क्योंकि यह अपराधियों की रक्षक और शरीफ लोगों की भक्षक बन गई है। ऐ भाई,ऐ भाई,नरेंद्र मोदी जी ! सुन रहे हो क्या? बिहार सरकार तो बहरी है भाई!

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

इस्लाम,आतंकवाद और पाकिस्तान

19 दिसंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,पिछले दिनों पेशावर के मिलिट्री स्कूल में जो कुछ भी हुआ उसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है। बच्चे,महिलायें या कोई भी निर्दोष इंसान चाहे भारत के हों या पाकिस्तान या कहीं के भी उनकी हत्या करना सीधे इंसानियत की हत्या करना है और कोई भी मजहब इंसानियत से ऊपर नहीं हो सकता। लेकिन जब कोई मजहब ही हिंसा की नींव पर खड़ी हो और अपनी स्थापना के समय से ही हिंसा का मजहब हो तो फिर ऐसी हिंसा को कोई रोकेगा कैसे? मैं यहाँ इस्लाम को हिंसा का मजहब इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इसको माननेवाले ही आज पाकिस्तान से लेकर नाइजीरिया तक खून बहा रहे हैं। दुर्भाग्यवश इस्लाम एक ऐसा मजहब है जिसके मुख्य धर्मग्रंथ कुरान में एक जगह नहीं बल्कि 50 जगह हिंसा का समर्थन किया गया है। जबकि यह तथाकथित ईश्वरीय पुस्तक खुलेआम अपने अनुयायियों से कहता है कि जब वर्जित समय बीत जाए, तब लड़ो और काफिर जहाँ मिले उन्हें मारो, बंदी बना लो, घेर लो, और हर लड़ाई में उनकी ताक में रहो! अभी-अभी कुछ ही समय पहले आईएसआईएस ने इसी कुरान के हवाले से यजीदी और कुर्द महिलाओं के साथ सामूहिक पाशविक बलात्कार और उनके क्रय-विक्रय को उचित ठहराया है।
मित्रों,सवाल उठता है कि जब सुन्नी मुसलमान हजारा,इसाई,अहमदियों,यजीदी,कुर्द,हिंदू,सिख बच्चों को बेरहमी से मारते हैं तब क्या इंसानियत की हत्या नहीं होती? क्या इस धरती पर सिर्फ सुन्नी मुसलमान ही जीने के हकदार हैं? फिर सुन्नी जब सुन्नी को मारता है तब वो किस अल्लाह के बताए रास्ते पर चल रहा होता है? जिस घर में बच्चे बचपन से ही रोजाना दूध पिलानेवाली मातासमान गायों के गले पर बड़ों को छुरियाँ फेरते हुए देखेंगे उस घर के बच्चे बड़े होकर क्रूर नहीं होंगे तो क्या दयावान होंगे? हिन्दी में एक बहुत ही प्रसिद्ध कहावत है कि जाके पैर न फटे बिवाई सो क्या जाने पीड़ पराई। सो पूरी दुनिया में इस्लामिक आतंकवाद की नर्सरी पाकिस्तान को पेशावर बालसंहार के बाद शायद पूरी तरह से नहीं तो थोड़ी-थोड़ी यह समझ में आ गया होगा कि दूसरों को खाने के लिए अपने घर में बाघ को पालना कितना खतरनाक हो सकता है? कुरान के गलत अंशों को आधार बनाकर मजहबी हिंसा को प्रश्रय देना आत्मघाती भी हो सकता है।
मित्रों,पूरी इस्लामिक दुनिया में आज जो खून-खराबी हो रही है उसके लिए सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं बल्कि मेरी समझ में संयुक्त राज्य अमेरिका,रूस और सऊदी अरब भी जिम्मेदार हैं। अमेरिका ने अफगानिस्तान से सोवियत संघ को निष्कासित करने के लिए तालिबान को जन्म दिया,वैश्विक राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए कुरान और इस्लाम का दुरूपयोग किया और पाकिस्तान की पंजाब और कश्मीर नीति का आँखें बंद करके समर्थन किया। रूस ने फिलीस्तीन के नाम पर आतंकवाद को बढ़ावा दिया तो सऊदी अरब ने पूरी दुनिया में इस्लाम के गलत-सही तरीके से प्रचार-प्रसार के लिए अनाप-शनाप पैसे दिए। सीरिया में आईएसआईएस व अन्य विद्रोहियों को पहले अमेरिका ने ही सहायता देकर मजबूती दी और आज कथित रूप से उसके खिलाफ ही लड़ रहा है।
मित्रों,पूरी दुनिया के मुसलमानों को देर-सबेर यह समझ लेना होगा कि आज की दुनिया में सबसे ज्यादा मुसलमान ही अकालमृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं। मरनेवाले भी अल्लाह हो अकबर कहकर मर रहे हैं और मारनेवाले भी अल्लाह हो अकबर के नारे लगाकर उनको मौत के घाट उतार रहे हैं। मैं नहीं मानता कि कोई भी किताब ईश्वर की लिखी हुई हो सकती है और उसमें संशोधन नहीं किया जा सकता। किताब या धर्म ने इंसान को नहीं बनाया बल्कि इंसानों ने किताबें लिखीं और धर्म बनाए यहाँ तक कि ईश्वर को भी बनाया। फिर क्यों कुरान में संशोधन नहीं हो सकता? जब कुरान को माननेवाले ही कुरान के पालन के नाम पर एक-दूसरे को मार डालेंगे तो फिर मानव-समाज ऐसे धर्मग्रंथ को लेकर क्या करेगा? मैं पहले भी अपने आलेखों जैसे- अफजल गुरू जेहाद का फल था जड़ नहीं,इराक में इस्लाम कहाँ है?,व्यक्ति नहीं विचारधारा है ओसामा में मुसलमानों से इस तरह का निवेदन कर चुका हूँ लेकिन तब से न जाने कितने ही लाख मुसलमानों को मुसलमान मार चुके हैं और अभी तक तो मेरी अपील बेअसर रही। जाने कभी मेरी अपील का असर होगा भी कि नहीं?!

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

उसने कहा था

16 दिसंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बात जून,2013 की है। तब हमलोग प्रोफेसर कॉलोनी के प्रोफेसर सत्येंद्र पांडे के यहाँ किरायेदार थे और काफी परेशान थे। मकान के शौचालय की दशा काफी खराब थी और हर बार शौच जाने के बाद कपड़ा लगे डंडे से शौचालय के पैन को हूरना पड़ता था। बराबर डंडे का कपड़ा भीतर में ही खुल जाता जिसको फिर अपने हाथ से निकालना पड़ता। उस पर जब जी में आए तब पांडेजी उस भीषण गर्मी में हमारे डेरे की बिजली काट देते थे। तभी मेरे गांव के एक पंडित जी बस्कित मिश्र की बेटी की शादी हुई। श्री मिश्र तब आरएन कॉलेज के मैदान के दक्षिणी छोर पर रहा करते थे। श्री मिश्र के मामाजी और उनका लड़का भी शादी में आया हुआ था जो उन दिनों पास में ही घर बनवा रहा था। मिश्र जी के मामाजी मेरे पिताजी के काफी पुराने मित्र थे और पहले महनार,अंचल कार्यालय में बड़ा बाबू हुआ करते थे जो कि बिहार में काफी मलाईदार पद माना जाता है। मामाजी ने पिताजी से हाल पूछा तो स्वाभाविक रूप से पिताजी ने तत्कालीन मकान मालिक के अत्याचारों का वर्णन किया। तभी मामाजी ने अपने बेटे से कहा कि जब तुम्हारा घर बन जाए तब प्रोफेसर साहेब यानि मेरे पिताजी को ही किरायेदार बनाना।
मित्रों,हमें तो अकस्मात् ऐसा लगा जैसे कि किसी कई दिन से भूखे-प्यासे व्यक्ति को छप्पन भोग या गंगा का पानी मिल गया हो। इस बीच मामाजी का देहान्त हो गया लेकिन जब हम अक्तूबर में उनके बेटे से मिलने गए तो उन्होंने कहा कि उनको अपने मृतक पिता का कथन भलीभाँति याद है इसलिए वे हमलोगों को ही किराया पर फ्लैट देंगे। इस बीच उन्होंने घर का काम पूरा करने के लिए दो महीने का भाड़ा 7000 रु. अग्रिम के रूप में मांगा जो हमने दे भी दिया मगर इस ताकिद के साथ कि हम पहले दो महीने में इस राशि का समायोजन कर लेंगे। फिर हम 1 फरवरी,2013 को उनके यहाँ रहने के लिए बैंक मेन कॉलोनी में आ गये। पहली बार उनकी पत्नी के दर्शन हुए। वो रात का खाना लेकर हमारे पास आईं। चाय भी पिलाई। माँ से तो वो जब भी मिलती तो यही कहतीं कि अब आप ही मेरी सास हैं और गले से लिपट जातीं। बच्चे जब भी देखते कि पिताजी भारी झोला लिए आ रहे हैं तो दौड़कर झोला ले लेते और हमारे घर दे जाते। हम आश्चर्यचकित थे कि कोई मकानमालिक ऐसा कैसे हो सकता है?
मित्रों,इसी बीच हमने दो महीने के अग्रिम को सधा लिया और तभी  से उनलोगों के व्यवहार में भी बदलाव आने लगा। मुझे इस बात का भी शक हुआ कि उनका लगाया बिजली का मीटर ज्यादा तेज भाग रहा है इसलिए हमने मामाजी के बेटे श्रीमोहन मिश्र की सहमति से बाजार से बिजली का मीटर खरीदकर लगा दिया। जब तक मैं हाजीपुर में था उनलोगों ने कुछ भी नहीं कहा लेकिन जैसे ही मैं वेबसाईट संबंधी कार्यों के लिए दिल्ली के लिए रवाना हुआ जैसा कि मुझे बाद में पता चला कि उनकी पत्नी ने आसमान को सिर पर उठा लिया। मेरी समझ में यह नहीं आया कि उनका मीटर अगर सही था तो मेरा मीटर गलत कैसे हो सकता था? क्या इसलिए क्योंकि वे मकान मालकिन थीं और हम किरायेदार?
मित्रों,इसी बीच मैं अपनी पत्नी और बेटे को डेरे में ले आया और मेरी माँ की आत्मघाती मूर्खता के चलते मेरा घर कुरूक्षेत्र का मैदान बन गया। मेरी माँ दिन-रात मकान-मालकिन के पास ही बैठी रहती और बार-बार उसको पंचायत करने के लिए बुलाती। इस बीच स्वाभाविक तौर पर हमारे घर में पानी का खर्च काफी बढ़ गया था जिससे मकान-मालकिन खुश नहीं थीं। अब तक हम यह अच्छी तरह से समझ चुके थे कि हमारे मकान-मालिक श्रीमोहन झा की उनके घर में कुछ भी नहीं चलती बल्कि जो भी चलती है उनकी पत्नी की ही चलती है। मेरी माँ अपने घर में होनेवाले विवादों की विस्तृत रिपोर्ट रोजाना मकान मालकिन को सुनातीं और कहतीं कि उनकी बहू बहुत देर तक स्नान करती है।
मित्रों,इसी बीच एक दिन हम अपने बेटे को चापाकल के ताजा पानी से नहाने के लिए चापाकल पर ले जा रहे थे कि हमने देखा कि पानी का मोटर चल रहा है। जब मोटर को बंद कर ग्रिल में ताला लगा दिया गया तब हमने चापाकल चलाकर अपने बेटे को स्नान करवाया। मगर जब हम उसको लेकर छत पर गए तो पाया कि मेरी मकान-मालकिन इस बात को लेकर हल्ला कर रही हैं कि हमने मोटर चलने के दौरान ही तथाकथित रूप से चापाकल चलाया जिससे कि मोटर जल भी सकता था। मेरी माँ उसका ही साथ दे रही थीं और पिताजी चुपचाप थे जबकि वे दोनों ही जानते थे कि मैं मजाक में भी झूठ नहीं बोलता। मैंने प्रतिवाद किया और कहा कि मैंने मोटर बंद होने के बाद ही चापाकल चलाया था मगर वे अपनी ही बात पर अड़ी रहीं। मैंने कहा भी कि मकान मालकिन होने के कारण मैं आपके झूठ को सच नहीं मान लूंगा क्योंकि झूठ झूठ होता है चाहे उसको बोलनेवाला बॉस हो या मकान-मालकिन।
मित्रों,उसी दिन से डेरे में जल-संकट उत्पन्न कर दिया गया और कहा गया कि दिनभर में सिर्फ एक बार ही टंकी को भरा जाएगा। कुछ दिनों तक जल-संकट झेलने और चापाकल पर कपड़े धोने के बाद मैंने पत्नी और बच्चे को मायके भेज दिया। मैं करता भी क्या जबकि खुद मेरी माँ ही नहीं चाहती थीं कि हमलोग एकसाथ रहें। पत्नी के जाते ही कुछ ही दिनों में घर भूत का डेरा बन गया। इसी बीच मकान-मालकिन को शिकायत रहने लगी कि हम घर में पोंछा नहीं लगाते। मैंने जब कहा कि अगर आप पर्याप्त मात्रा में पानी देने का वादा करें तो मैं फिर से पत्नी को ले आऊंगा तो वे मौन साध गईं। इस बीच उनका बड़ा बेटा सौरभ हमसे हमारे दोनों बेंच मांग कर ले गया और हमने सीधेपन में दे दिया। अब तक हमने एक मोटरसाईकिल भी ले ली थी और मुझे लग रहा था कि उनको हमारा मोटरसाईकिल खरीदना पसंद नहीं आया था। आखिर कोई किरायेदार मकान-मालिक से ज्यादा अच्छी जिंदगी कैसे जी सकता था? इस बीच एक दिन मेरी माताजी नल को खुला छोड़कर घर में ताला लगाकर घूमने चली गईं। बाद में जब मोटर चला तो नल से पानी बहने लगा। उस दिन मैं ससुराल में था। आने के बाद पता चला कि उस रात मकान-मालकिन ने मेरे माँ-पिताजी को काफी खरी-खोटी सुनाई। दोनों हाथ जोड़कर बार-बार माफी मांगते रहे लेकिन वे सुनने को तैयार ही नहीं थीं। अब तक मकान-मालकिन का खुलकर समर्थन करनेवाले माँ-पिताजी समझ चुके थे कि मकान-मालकिन जैसी दिखती हैं वैसी हैं नहीं बल्कि विषकुंभंपयोमुखम् हैं।
मित्रों,सितंबर में उन्होंने यह कहकर दो महीने का एडवांस मांगा कि हमने ऐसा वादा किया था जबकि हमने कभी ऐसा वादा नहीं किया था। पिताजी ने शांति बनाए रखने के लिए एक महीने का एडवांस दे भी दिया कि तभी से हमें डेरा खाली करने के लिए तंग किया जाने लगा। मैं समझ गया कि अब हमारे दोनों बेंचों को तुरूप से पत्तों की तरह इस्तेमाल किया जाएगा क्योंकि हमारी मकान-मालकिन इस बीच हमारे बगल के फ्लैट में रहनेवाली एक महिला का एक महीने का किराया पचा चुकी थीं। फिर एक दिन हमसे चाबी खो जाने के नाम पर बाहर के ग्रिल की चाबी ले ली गई और कहा गया कि हमारी माताजी यानि उनकी पूर्व मित्र उनके खिलाफ मुहल्ले में प्रचार करती हैं। जवाब में मैंने बस इतना ही कहा कि मैं औरतों के झमेले में नहीं पड़ता। इस बीच एक दिन देर शाम को पिताजी अपना टॉर्च किसी दुकान पर छोड़ आए। तब तक मैं अपनी मोटरसाईकिल गैरेज में रख चुका था। मैंने गैरेज खुलवाकर फिर से मोटरसाईकिल निकाली और टॉर्च लाने चला गया। मगर यह क्या जब मैं लौटकर आया तो मकान-मालकिन मेरी गाड़ी को गैरेज में रखने को तैयार ही नहीं हुई। फिर दो महीने तक मुझे अपनी गाड़ी को मुहल्ले के मित्रों के यहाँ रखना पड़ा।
मित्रों,इस बीच हमने डेरा ढूंढ़ लिया और डेरा बदलने से एक सप्ताह पहले से बेंच के लिए तकादा करना शुरू कर दिया मगर कोई असर ही नहीं हो रहा था। बाद में बेंच दिया गया मगर तब जब मेरा पूरा सामान ढोया जा चुका था जिसके कारण मुझे बेंचों को अपने सिर पर उठाकर लाना पड़ा। अंत में जब मैं डेरा खाली करने के बाद घर को साफ कर रहा था तब श्रीमोहन झा आकर मुझसे बेवजह की बक-झक करने लगे। उनका कहना था कि उनके पास बहुत पैसा है। जब मैं उनपर काफी नाराज हो गया तब उनकी पत्नी ने आकर बीच-बचाव किया।
मित्रों,आज जब मैं अपने गांव के पड़ोसी बस्कित मिश्र के मामाजी के बेटे के मकान से निकल चुका हूँ या निकाला जा चुका हूँ तब मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि मामाजी ने हमें उस मकान में रहने की दावत क्यों दी थी? क्या वे यह बताना चाहते थे कि मकान-मालिक और किरायेदार के बीच सिर्फ एक ही रिश्ता होता है और वह रिश्ता होता है मकान-मालिक और किरायेदार का? या फिर यह अहसास दिलाना चाह रहे थे कि आज के जमाने में सच्चाई,ईमानदारी और अच्छाई की कोई कीमत नहीं है जो भी कीमत है वो पैसे की है? या फिर अपने बेटे और उसके परिवार को बताना चाह रहे थे कि कैसे एक बेटे को अपने बूढ़े माता-पिता की देखभाल करनी चाहिए या फिर किस तरह से एक परिवार सच्चाई के मार्ग पर चलकर इस घनघोर कलियुग में भी जी रहा है?
मित्रों,खैर मामाजी हमें क्या बताना चाहते थे यह राज तो उनके साथ ही चला गया मगर हम भी कुछ कहना चाहते हैं और कहना चाहते हैं अपनी राज्य और केंद्र की सरकारों से। हम कहना चाहते हैं कि भारत में ऐसे करोड़ो लोग हैं जो मजबूरी में किराया के मकान में रहते हैं और दिन-रात मकान-मालिकों के जुल्म को सहते हैं। क्या उनका कोई मानवाधिकार नहीं होता? मकान-मालिक जब जी चाहे तब मकान खाली करने का फरमान सुना देता है और किरायेदारों को खाली करना भी पड़ता है। इस तंगदिली के जमाने में किराये के मकान में रहना जेल में रहने के बराबर है। मकान-मालिक किरायेदारों को अपने बंधुआ मजदूर से ज्यादा कुछ भी नहीं समझते और मकान-मालिक ईज ऑलवेज राईट की नीति पर अमल करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि राज्यों व केंद्र की सरकारें कब तक करोड़ों लोगों के मानवाधिकारों के उल्लंघन को नजरंदाज करती रहेंगी? क्या दिन-रात अपनी सरकार को गरीबों की सरकार बतानेवाले हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी कभी गरीब और लाचार करोड़ों किरायेदारों पर नजरे ईनायत करेंगे और उनके अधिकारों की रक्षा से संबंधित कानून बनाएंगे,उनको बंधुआ मजदूरी से आजाद करवाएंगे?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

'घरवापसी' पर हंगामा क्यों?

13 दिसंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,यकीन मानिए कि लेखन के लिए धर्म मेरा प्रिय विषय नहीं है लेकिन जब धर्म के नाम पर अधर्म बढ़ने लगे तो फिर लिखना ही पड़ता है। अभी-अभी हमने देखा कि आगरा में चंद मुसलमानों को हिन्दू बना दिया गया है और इस समारोह को नाम दिया गया घरवापसी। न जाने क्यों इस घटना के सामने आते ही देश की कथित धर्मनिरपेक्ष जमात बुरी तरह से तिलमिला उठी है जैसे कि कोई कुत्ते की पूँछ पर पेट्रोल डाल दे या फिर बंदर की पूँछ कुचल दे।
मित्रों,आश्चर्य है कि जब हिन्दू हजारों की संख्या में लालच,दबाव या प्राण पर संकट आने पर किसी दूसरे धर्म को अपनाते हैं तब देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को किसी भी तरह का कोई खतरा नहीं होता लेकिन जब कोई इक्का-दुक्का ऐसा मुसलमान या ईसाई जो स्वयं जन्मना हिन्दू था या जिनके पूर्वज हिन्दू थे फिर से हिन्दू समाज में वापसी करते है तब भारत में धर्मनिरपेक्षता खतरे में आ जाती है! यह कैसी धर्मनिरपेक्षता है जो प्रत्येक मामले में हिन्दुओं और अन्य धर्माम्बलंबियों के बीच भेदभाव करती है?
मित्रों,इतिहास गवाह है कि भारत ही नहीं काबुल तक के ईलाके में सनातन-धर्मी हिंदू-ही-हिंदू रहते थे। यह भी सही है कि हिन्दुओं में मध्यकाल में ऊँच-नीच और छुआछुत की कुरीति शर्मनाक स्तर तक बढ़ गई थी जिससे आहत होकर बहुत-से हिन्दू मुसलमान बन गए। साथ ही सत्य यह भी है कि बहुत सारे हिन्दुओं को तलवार के बल पर मुसलमान बनने पर बाध्य किया गया। गजनवी,गोरी,तैमूर,नादिरशाह,अब्दाली,खिलजी के साथ भारत आए इतिहासकारों के विवरण इस बात के प्रमाण हैं कि भारत के विभिन्न शहरों में हिन्दू पुरुषों के मुंडों के पहाड़ खड़े कर दिए गए,बच्चों को हवा में उछालकर भालों से बींध दिया गया और स्त्रियों को अरब देशों में ले जाकर बाजार में ठीक उसी तरह से खुलेआम नीलाम कर दिया गया जैसे कि इन दिनों कुर्द व यजीदी महिलाओं को आईएसआईएस के इस्लामिक वीर कर रहे हैं।
मित्रों,गुरू तेगबहादुर को इसलिए बलिदान देना पड़ा क्योंकि उन्होंने औरंगजेब द्वारा कश्मीरी पंडितों पर किए जा रहे अत्याचार का विरोध किया। अगर कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को मारा और सताया नहीं गया होता तो आज भी कश्मीर हिन्दू-बहुल होता। गुरू गोविन्द सिंह के मासूम बच्चों को दीवार में इसलिए चुनवा दिया गया क्योंकि वे मुसलमान बनने के लिए राजी नहीं हुए।
मित्रों,आज जबकि स्थितियाँ बदल गई हैं। आज हिन्दू समाज में जातिगत भेदभाव न के बराबर रह गया है और न ही हिन्दुओं को हिन्दू होने के चलते जान से हाथ धोने का भय है तो फिर अगर कोई पूर्व हिन्दू मुसलमान या इसाई फिर से हिन्दू बनना चाहता है तो इससे किसी को भी क्यों ऐतराज हो? जब हिन्दू किसी अन्य धर्म को अपनाता है तब तो किसी को भी ऐतराज नहीं होता,क्यों?
मित्रों,स्वयं राष्ट्रपिता गांधी ने इसाई मिशनरियों द्वारा हिन्दुओं को लालच देकर या बहला-फुसलाकर,झूठ बोलकर इसाई बनाने की जमकर भर्त्सना की है और ऐसा आदिवासी हिन्दुओं के साथ तो आज भी किया जा रहा है इसलिए जरुरत इस बात की है कि गलत तरीके से किए जानेवाले धर्मान्तरण को रोकने के लिए कड़े कानूनी प्रावधान किए जाएँ। केंद्र सरकार इसके लिए तैयार भी दिखती है। तो क्या भारत के छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी लोग इस पुनीत कार्य में सरकार का साथ देने के लिए तैयार हैं?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

हत्या सिर्फ ललित बाबू की नहीं इंसाफ की भी हुई है मी लॉर्ड!

9 दिसंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आज से करीब ढाई हजार साल पहले कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में लिखा था कि जिस राज्य के निवासियों को न्याय नहीं मिलता वहाँ अराजकता पैदा होती है और अंततः उस राज्य का अंत हो जाता है। अभी कुछ ही दिन पहले भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दत्तू ने भी भारत की न्यायिक प्रणाली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत की न्यायिक प्रणाली गरीब-विरोधी है। अब जब मुख्य न्यायाधीश का ही ऐसा मानना है तो फिर इस संबंध में बहुत-कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है।
मित्रों,अभी कुछ ही हफ्ते पहले निठारी कांड पर कोर्ट का फैसला आया और अजीबोगरीब आया,अमीर-गरीब के बीच फर्क करनेवाला आया। जिस मकान में कई दर्जन बच्चों के साथ बलात्कार किया गया और फिर उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए आश्चर्यजनक तरीके से उस मकान के मालिक को सीबीआई और कोर्ट ने निर्दोष बताते हुए बरी कर दिया। आप ही बताईए कि क्या ऐसा संभव है कि कई सालों से मकान में अनवरत जारी बलात्कारों और हत्याओं के बारे में मकान मालिक पूरी तरह से अनभिज्ञ रहे और अगर पंढ़ेर को सबकुछ पता था तो उसने पकड़े जाने तक चुप्पी क्यों साधे रखी? क्या धनवान पंढ़ेर ने सीबीआई अधिकारियों को मोटी रकम देकर उनके ईमान को खरीद नहीं लिया था?  क्या गरीब नौकर कोली अपनी गरीबी के कारण ऐसा नहीं कर पाने के कारण आज फाँसी की सजा का इंतजार नहीं कर रहा है?
मित्रों,जहाँ तक ललित बाबू की हत्या के मामले का सवाल है तो खुद स्वर्गीय ललित नारायण मिश्र के बेटे ने कल कोर्ट का फैसला आने पर कहा कि एक तो फैसला काफी देर से आया है और दूसरी बात यह है कि जिन लोगों को सजा दी गई है वे पूरी तरह से निर्दोष हैं। जहाँ तक मैं और मेरे इलाके के लोग जानते हैं कि बिहार विधान परिषद् के माननीय सदस्य विजय कुमार मिश्र एकदम सही कह रहे हैं। वास्तव में इस हत्याकांड की साजिश के पीछे तथ्य यह था कि जैसा कि तब बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और ललित बाबू के अनुज डॉ. जगन्नाथ मिश्र जो खुद भी बम-विस्फोट में घायल हो गए थे,ने मित्रोखिन आर्चिव्स के आधार पर आरोप लगाया था कि चूँकि तत्कालीन रेल मंत्री ललित बाबू और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रूसी खुफिया एजेंसी केबीजी से रिश्वत ली थी इसलिए सबूत मिटाने के लिए कांग्रेस नेतृत्व और उनके बिगड़ैल बेटे ने ललित बाबू की हत्या करवा दी। हालाँकि बाद में जब जगन्नाथ मिश्र को इंदिरा ने बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया तो वे चुप लगा गए। 2 जनवरी और 3 जनवरी,1975 के घटनाक्रम को देखते हुए भी ऐसा ही लगता है कि श्री मिश्र की हत्या में सीधे प्रधानमंत्री का हाथ था। जहाँ बम-विस्फोट में घायल बाँकी लोगों को तत्काल दरभंगा मेडिकल क़ॉलेज अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया वहीं स्व. मिश्र के ईलाज में जानबूझकर रेलवे के अधिकारियों ने 10 घंटे की देरी की और उनको दानापुर रेलवे अस्पताल में भर्ती करवा दिया जबकि वहाँ अच्छे डॉक्टर नहीं थे।
मित्रों,बाद में बिहार पुलिस से मामले की जाँच को सीबीआई ने अपने हाथों में ले लिया और न जाने कहाँ से चार निर्दोष आनंदमार्गियों को पकड़कर आरोपी बना दिया। वह सीबीआई उस युग की सीबीआई थी जिस युग में कहा जाता था कि इंदिरा ईज इंडिया एंड इंडिया ईज इंदिरा। पहले निठारी और अब ललित बाबू हत्याकांड में जिस तरह से सीबीआई और अदालत ने संभावित निर्दोषों को सजा सुनाई है उससे सवाल उठता है कि अगर न्याय-प्रणाली को इसी तरह से काम करना है तो फिर भारत में पुलिस,सीबीआई और न्यायालयों की जरुरत ही क्या है? क्या हमारी अनुसंधान-एजेंसी और अदालतें रोजाना सैंकड़ों-हजारों निर्दोषों को इसी तरह से सजा नहीं सुना रही है?
मित्रों,जैसा कि पीएम मोदी बार-बार कह रहे हैं कि बेकार के कानुनों को समाप्त कर न्यायिक-प्रक्रिया को सरल बनाया जाएगा उसको ध्यान में रखते हुए क्या हमें यह उम्मीद रखनी चाहिए कि वर्तमान केंद्र सरकार यानि मोदी सरकार न्यायिक-प्रक्रिया को द्रुत और पारदर्शी बनाने की दिशा में कोई प्रभावी कदम उठाएगी? क्या कभी भारत की न्याय-प्रणाली गरीब-विरोधी के बजाए निष्पक्ष हो सकेगी या फिर आगे के मुख्य न्यायाधीश भी यह कहकर अपनी लाचारी व्यक्त करने को मजबूर होंगे कि भारत की न्याय-प्रणाली आज 22वीं सदी में भी गरीब-विरोधी या अमीरों की रखैल है?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 26 नवंबर 2014

मांझी सरकार के रिपोर्ट कार्ड में उपलब्धियाँ कम वादे ज्यादा

26 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जैसा कि नाम से ही जाहिर होता है कि रिपोर्ट कार्ड में सरकार की उपलब्धियाँ होनी चाहिए,सरकार द्वारा किए गए कार्यों का जिक्र होना चाहिए लेकिन बिहार की मांझी सरकार की वार्षिक रिपोर्ट को देखकर यह दुःखद आश्चर्य हुआ कि रिपोर्ट कार्ड में रिपोर्ट थी ही नहीं बल्कि थी तो सिर्फ वादों की भरमाऱ। नौ साल से बिहार पर राज कर रही जदयू सरकार ने एक बार फिर से राज्य के लोगों के साथ प्रति वर्ष एक के हिसाब से 9 वादे कर दिए कि हम सभी किसानों को छह माह में बिजली कनेक्शन देंगे, धान के क्रय पर प्रति क्विंटल 300 रुपये बोनस देंगे, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक व दिल्ली की तर्ज पर 70 हजार सिपाही-हवलदारों को 13 महीने का वेतन देंगे, एससी-एसटी आवासीय विद्यालयों में आवासन क्षमता 20 हजार से बढ़ाकर अब एक लाख करेंगे, एक लाख से अधिक आबादी के शहरों में एक यातायात थाना खोलेंगे, दो लाख से अधिक की आबादी के लिए डीएसपी कार्यालय की स्थापना करेंगे, बिहार उर्दू अकादमी को एक करोड़ के अनुदान को बढ़ाकर तीन करोड़ करेंगे, पर्यावरण की चिंता करेंगे व मुंगेर में वानिकी महाविद्यालय खोलेंगे, अफसरों और कर्मचारियों के प्रशिक्षण की नयी व्यवस्था शुरू करेंगे। वहीं सरकार ने अपनी उपलब्धियों में जाति,आय एवं आवास प्रमाण-पत्र के लिए तत्काल सेवा आरंभ करने के काम को सबसे ऊपर रखा है। बिहार लोक सेवाओं के अधिकार के तहत प्राप्त 8 करोड़ 39 लाख 77 हजार 695 आवेदनों में से 8 करोड़ 26 लाख 76 हजार 474 के निष्पादन को भी सरकार बड़ी उपलब्धि बता रही है। मगर सवाल उठता है कि क्या सारे आवेदनों का निष्पादन निर्धारित समय-सीमा के भीतर कर दिया गया? अगर नहीं तो फिर पहले और वर्तमान की स्थिति में क्या अंतर रह गया? इसी तरह सरकार 411 भ्रष्ट लोक सेवकों की बर्खास्तगी को भी अपनी उपलब्धि बता रही है परंतु सवाल उठता है कि क्या इससे राज्य में भ्रष्टाचार में और घूस के रेट में किसी तरह की कमी आई है? नहीं भ्रष्टाचार तो पहले से और भी बढ़ा है फिर यह कैसा जीरो टॉलरेंस है? फिर ये जो 411 भ्रष्ट लोकसेवक हैं उनको तो जनता ने पहल करके पकड़वाया है सरकार अपनी तरफ से कब भ्रष्टाचारियों के खिलाफ स्वतः कार्रवाई करेगी? जब मुख्यमंत्री ही अपने दामाद को पीए बनाकर नियमों को तोड़ेगा,जब मुख्यमंत्री का बेटा ही शराब पीकर होटल में रंगदारी करेगा,महिला दारोगा का यौन-शोषण करेगा तो फिर कैसे भ्रष्टाचार कमेगा?
मित्रों,इसी तरह से सरकार कह रही है कि वर्ष 2015 तक राज्य के लिए 5000 मेगावाट बिजली उपलब्ध होगी मगर सरकार ने यह नहीं बताया है कि वह बिजली आएगी कहाँ से। सच्चाई तो यह है कि इसमें से ज्यादातर बिजली केंद्र द्वारा बिहार को प्राप्त हो रही है और बिहार में बिजली का उत्पादन आज भी काफी कम है। सरकार ने रिपोर्ट कार्ड में खुलेआम जाति-पाँति का खेल खेला है। सरकार जहाँ एक ओर सवर्ण आयोग को जल्दी रिपोर्ट देने के लिए कह रही है वहीं वह यह भी बता रही है कि फलां-फलां जाति को अनुसूचित जाति और अत्यंत पिछड़े वर्ग में शामिल किया गया है। मतलब अभी भी आरक्षण को सरकार ने वोट पाने का हथियार बनाया हुआ है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सीएम मांझी अभी कुछ ही दिन पहले सवर्णों को विदेशी बता रहे थे और अब अचानक सवर्णों पर मेहरबान हो रहे हैं। मुझे तो इस बात की आशंका लग रही हैं कि कहीं मुख्यमंत्री इस मामले में भी ऐसा न कह दें कि मैंने तो मजाक किया था। मुख्यमंत्री मजाक बहुत करते हैं। काम कुछ नहीं करते राज्य की जनता के साथ सिर्फ मजाक ही करते हैं। न जाने कब किस मुद्दे पर पलट जाएँ और कह दें कि मैंने तो जनता के साथ मजाक किया था। साथ ही सरकार बता रही है कि राज्य में एक आतंकवाद निरोधी दस्ते का गठन किया गया है मगर यह नहीं बताया है कि इस दस्ते ने अबतक किया क्या है? कितने आतंकियों को पकड़ा है और कितने माड्युलों को ध्वस्त किया है? राज्य में 85 नए थाने भी खोले गए हैं। आश्चर्य है कि नए थानों का खुलना उपलब्धि कैसे हो गई बल्कि यह तो शर्मनाक स्थिति है कि अपराध बढ़े हैं तभी तो नए थाने खोलने की आवश्यकता पड़ी? सरकार कहती है कि उसने इतने आर्सेनिक और लौह-शोधक पेयजल संयंत्र स्थापित किए मगर जहाँ तक हमारी जानकारी है वैशाली जिले में स्थापित किया गया ऐसा कोई भी संयंत्र इस समय काम नहीं कर रहा है और सफेद हाथी बना हुआ है और मैं समझता हूँ कि राज्य के बाँकी जिलों के संयंत्रों का भी यही हाल है।
मित्रों,रिपोर्ट कार्ड में किए गए जिस वादे पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है वो यह है कि सरकार राज्य की छात्राओं को मुफ्त में उच्च शिक्षा देगी। अच्छा होता कि सरकार उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने के उपाय करती बजाए मुफ्त शिक्षा देने के। सच्चाई तो यह है कि राज्य के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में अब पढ़ाई होती ही नहीं है बल्कि डिग्री बाँटी जाती है। राज्य में शोध के नाम पर सिर्फ कट,कॉपी,पेस्ट चल रहा है। मैट्रिक से लेकर एमए तक की परीक्षाओं में कुछेक अपवादों को छोड़कर छात्र-छात्राओं को जमकर नकल की सुविधा उपलब्ध करवाई जाती है जिससे एमए पास विद्यार्थी भी एक आवेदन-पत्र तक लिख पाने में असमर्थ होते हैं।
मित्रों,आश्चर्यजनक तरीके से वादों की लिस्ट से भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस नदारद है जबकि 2010 के चुनावों में यह सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर था। तो क्या यह मान लिया जाए कि सरकार ने भ्रष्टाचार के आगे आत्मसमर्पण कर दिया है? कहने का तात्पर्य यह है कि राज्य सरकार के पास उपलब्धियों के नाम पर जब कुछ था ही नहीं तो वो बताती क्या? वास्तविकता तो यह है वर्ष 2005 से 2013 की उस अवधि में जब भाजपा भी सरकार में शामिल थी तब सरकार ने जो भी अच्छे काम किए उनमें से ज्यादातर या लगभग सारे भाजपा मंत्रियों द्वारा किये गए थे। वास्तविकता यह भी है कि भाजपा को सरकार से हटाने के बाद से उन मंत्रालयों व विभागों की स्थिति को बिगाड़ा ही गया है जिसमें स्वास्थ्य विभाग सबसे ऊपर है जिसका सर्वोत्तम उदाहरण आईजीआईएमएस में जज से थर्मामीटर खरीदवाना है। जनता ने नीतीश कुमार को इसलिए जनमत नहीं दिया था कि वे 9 साल सरकार चलाने के बाद भी उपलब्धियाँ गिनवाने के बदले वादे ही करें। यह तो वही बात हो गई कि परीक्षार्थी परीक्षा में प्रश्नों के उत्तर देने के बजाए अपनी आगे की पढ़ाई की योजना प्रस्तुत करे कि हम अगली कक्षा में इस तरह से कड़ी मेहनत से पढ़ेंगे और हम यह सब पढ़ेंगे इसलिए हमें उत्तीर्ण घोषित कर दिया जाए।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

कबीरपंथियों के पाखंड की पराकाष्ठा हैं रामपाल

20 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,साहेब बंदगी!
कबीर कहते हैं कि
कबीरा जब हम पैदा हुए जग हँसे हम रोये।
ऐसी करनी कर चलो हम हँसें जग रोये।
मगर कबीर के अनुयायी अब जो कर रहे हैं उसको देखकर दुनिया हँस भी रही है और रो भी रही है। हँस रही है यह देखकर कि कबीर ने क्या कहा था और अनुयायी क्या कर रहे हैं और रो रही है उनके नैतिक पतन को देखकर। यह देखकर कि जो कबीर आजीवन पाखंड और पाखंडवाद से लड़ते रहे उनके ही नाम पर उनके कथित भक्तों ने यह कैसा पाखंड का साम्राज्य खड़ा कर दिया!
मित्रों,मैं वर्षों पहले अपने एक आलेख कबीर के नाम पर पाखंड का साम्राज्य में कबीर के नाम पर फैले पाखंड के साम्राज्य पर काफी विस्तार से लिख चुका हूँ लेकिन मैं जहाँ तक समझता था कबीर के नाम पर धंधा करनेवाले उससे कहीं ज्यादा ठग,चोर,फरेबी,पाखंडी और मानवशत्रु निकले। अगर ऐसा नहीं है तो फिर यह बाबा रामपाल कैसा कबीरपंथी है और किस तरह से कबीरपंथी है। कबीर ने तो अपने प्रशंसकों को इंसान बनने और इंसानों के साथ इंसानों की तरह पेश आने की शिक्षा दी थी फिर यह रामपाल भगवान कैसे बन गया? पूरे आश्रम में जमीन के भीतर बने सुरंगों के माध्यम से कहीं भी प्रकट हो जाना,विज्ञान के चमत्कारों के माध्यम से हवा में चलना,लेजर की सहायता से अपने चारों ओर आभामंडल बनाना और सिंहासन सहित आसमान से उतरना आदि के माध्यम से रामपाल तो क्या कोई भी भगवान बन सकता है।
मित्रों,हमें इस बात को भी ध्यान में रखना पड़ेगा कि कबीरपंथ के अधिकतर अनुयायी गरीब और दलित-पिछड़ी जातियों से आते हैं जिनके खाने के भी लाले पड़े होते हैं। स्वाभाविक रूप से उनमें से ज्यादातर अनपढ़ होते हैं और उनमें इतनी बुद्धि नहीं होती कि वे रामपाल के चमत्कारों को तर्क और विज्ञान की कसौटी पर कस सकें। रामपाल ने गिरफ्तारी से बचने के लिए जो मानव-शील्ड बनाई उनमें से अधिकतर लोग इसी तरह के थे।
मित्रों,विज्ञान और संचार-क्रांति का उपयोग जहाँ इस तरह की ठगविद्या के भंडाभोड़ के लिए होना चाहिए वहीं दुर्भाग्यवश उसका उपयोग ठगने के लिए किया जा रहा है। दिनभर टीवी चैनलों पर ऐसे बाबाओं से संबंधित कार्यक्रम आते रहते हैं जिनमें से कोई जन्तर बेच रहा होता है तो कोई भविष्य बतानेवाली किताब और कोई तो अपनी कृपा भी। और आश्चर्य की बात तो यह है कि 21वीं सदी में भी इन बाबाओं की दुकानें धड़ल्ले से चल रही हैं।
मित्रों,रहा बाबा रामपाल का सवाल तो यह आदमी संत या अवतार तो क्या आदमी कहलाने के लायक भी नहीं है। जो व्यक्ति आदमी की जान का इस्तेमाल अपने को जेल से जाने से बचने के लिए करे उसको भला अवतार (भले ही संत कबीर का ही) कहा जा सकता है क्या? संत या अवतार तो वो है जो एक आदमी की प्राण-रक्षा के लिए अपने प्राण को न्योछावर कर दे। कबीर संत थे जिन्होंने अंधविश्वास,भेदभाव,छुआछूत और पाखंड के खिलाफ आवाज उठाई। भले ही तत्कालीन शासक सिकंदर लोदी ने तीन-तीन बार उनपर जानलेवा हमला क्यों न करवाया कबीर न तो डरे और न ही जान की परवाह ही की। कबीर ने तो भगवान से बस इतना ही मांगा था-
साईँ इतना दीजिए जामें कुटुम्ब समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय।।
अर्थात् हे ईश्वर,हमको बस इतना बड़ा घर दे दो जिसमें मेरा पूरा परिवार समा जाए और इतना धन दे दो कि न तो मेरा परिवार ही भूखा रहे और न हीं अतिथि को मेरे द्वार से भूखा लौटना पड़े। फिर कबीर के रामपाल जैसे अनुयायियों को क्यों राजाओं जैसे ऐश्वर्यपूर्ण ठाठ-बाट की आवश्यकता पड़ गई? वे क्यों उस महाठगनी माया के चक्कर में पड़ गए जिसे बारे में कबीर ने कहा था कि-
माया महा ठगनी हम जानी।
तिरगुन फांस लिए कर डोले बोले मधुरी बानी।।
केसव के कमला भय बैठी शिव के भवन भवानी।
पंडा के मूरत भय बैठीं तीरथ में भई पानी।।
योगी के योगन भय बैठी राजा के घर रानी।
काहू के हीरा भय बैठी काहू के कौड़ी कानी।।
माया महा ठगनी हम जानी।।
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि अगर कहीं पर संत कबीर की आत्मा होगी तो आज जरूर रो रही होगी। कबीर ने अपने जीते-जी ऐसा कभी नहीं कहा कि उनको उनकी मृत्यु के बाद कथित भूदेव ब्राह्मणों की तरह देवता या भगवान का दर्जा दे दिया जाए बल्कि वे तो लोगों की ज्ञान-चक्षु खोलना चाहते थे जिससे कोई बाबा या ढोंगी उनको बरगला न सके। वे तो चाहते थे कि लोग किताबों में लिखी बातों से ज्यादा अपनी तर्कशक्ति,बुद्धि और विवेक पर विश्वास करें। वे तो चाहते थे कि लोग जब उनकी बातों पर अमल करें और उनकी शिक्षाओं का पालन करें तब भी आँख मूंदकर न करें बल्कि भले-बुरे पर विचार करके करें फिर कबीर को किसने और क्यों साधारण इंसान से साक्षात् परब्रह्म बना दिया? क्या ऐसा रामपाल जैसे ढोंगियों ने इसलिए नहीं किया क्योंकि उनको खुद को भगवान घोषित करना था और लोगों के विश्वास का नाजायज फायदा उठाना था?
मित्रों,अंत में दुनिया के तमाम कबीरपंथियों और सारे अन्य पंथियों से मेरा यह विनम्र निवेदन है कि वे सारे महामानवों को इंसान ही रहने दें भगवान न बनाएँ क्योंकि जैसे ही हम उनको भगवान मान लेंगे उसी क्षण हम यह भी मान लेंगे कि इनके जैसा हो पाना किसी भी मानव के लिए संभव ही नहीं है। चाहे वे राम हों,कृष्ण हों,बुद्ध,ईसा,महावीर या कबीर हों ये सभी इंसान थे और इस धरती पर विचरण करते थे। इन्होंने भी उसी प्रक्रिया से जन्म लिया था जिस प्रक्रिया से हम सभी ने लिया है। इनके भीतर जरूर ऐसे गुण थे जिसके चलते इन लोगों को महामानव की श्रेणी में रखा जा सकता है और ऐसे गुण हमारे भीतर भी हो सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर इन महामानवों के महान गुणों का विकास करें,उनके आदर्शों पर चलें और पूरी दुनिया को महामानवों की दुनिया बनाएँ न कि दिन-रात इनका नाम रटें। जिस दिन ऐसा हो जाएगा उसी दिन धरती पर सतयुग आ जाएगा न कि किसी मकान या महल का नाम सतलोक आश्रम रख देने से आएगा।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)