शनिवार, 3 दिसंबर 2016

बाबाजी तुम क्या चीज हो?



मित्रों, अपने देश में पहेली पूछने और बूझने की लम्बी परंपरा रही है. मगर वास्तविकता तो यह है आदमी खुद ही बहुत बड़ी पहेली है. मसलन हम किसी को समझते कुछ और हैं और वो निकलता कुछ और ही है. कई बार तो एक ही इंसान के इतने सारे रूप सामने आते हैं कि देखनेवाला हतप्रभ हो जाता है कि इनमें से कौन-सा रूप सही है और कौन-सा गलत.
मित्रों, अपने बाबा रामदेव को ही लीजिये. पहले पता चला कि वे एक योगी-संन्यासी हैं. फिर पता चला कि आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माता और व्यापारी हैं. फिर पता चला कि राजनीतिज्ञ हैं. फिर पता चला कि वे चैनल के मालिक हैं. फिर पता चला कि वे बहुत बड़े देशभक्त हैं और कालेधन के प्रबल विरोधी भी. फिर पता चला कि बहुत बड़े धनकुबेर हैं. और अब पता चल रहा है कि वे कालेधन और भ्रष्टाचार के प्रतीक लालू प्रसाद यादव के समधी बनने जा रहे हैं. पता नहीं आगे बाबाजी और क्या-क्या बनेंगे?
मित्रों, हमारी नजर में संन्यासी रामकृष्ण परमहंस थे जो कंचन और कामिनी को हाथ तक नहीं लगाते थे. हमने तो यहाँ तक सुना है कि पैसे को हाथ लगाते हुए उनकी कलाई ही मुड़ जाती थी. संन्यास के मतलब ही होता है पूर्ण वैराग्य. फिर बाबा रामदेव किस तरह के सन्यासी हैं. गेरुआ वस्त्र पहन लिया लेकिन उनको अकूत पैसा चाहिए. उनके परिवार के लोग आज भी उनके साथ रहते हैं और उनकी कई कम्पनियों में साझीदार हैं. उनको रथयात्रा तक पसंद नहीं पैदल चलना तो दूर की बात है. हमेशा पुष्पक विमान में उड़ते रहते हैं. कहने का तात्पर्य यह कि या तो बाबा विशुद्ध गृहस्थ हैं और उनको संन्यासी कहना कदाचित संन्यास आश्रम का ही अपमान है. बाबा खुद को कालाधन का सबसे बड़ा विरोधी बताते हैं और लालू से गुप्त मुलाकात करने निजी विमान से जाते हैं तो कभी लालू के गाल पर मक्खन लगाते हैं.
बाबा रे बाबा, इतना कन्फ्यूजन. दिमाग का फ्यूज न उड़ जाए. हमारी समझ में तो बिलकुल भी नहीं आ रहा कि ये बाबा जी हैं क्या जो न केवल पूरे भारत को बाबा जी समझ रहे हैं बल्कि बाबाजी बना भी रहे हैं. अगर आप की समझ में ये निर्गुण, निराकार आ रहे हैं तो कृपया हमें भी समझाईए अन्यथा हमारे साथ मिलकर कुरुक्षेत्र निवासी बाबाजी से यह बतलाने की कृपा करने के लिए प्रार्थना करिए कि हे माधव, हे सखे, हे केशव आप चीज क्या हो?

बाबाजी तुम क्या चीज हो?



मित्रों, अपने देश में पहेली पूछने और बूझने की लम्बी परंपरा रही है. मगर वास्तविकता तो यह है आदमी खुद ही बहुत बड़ी पहेली है. मसलन हम किसी को समझते कुछ और हैं और वो निकलता कुछ और ही है. कई बार तो एक ही इंसान के इतने सारे रूप सामने आते हैं कि देखनेवाला हतप्रभ हो जाता है कि इनमें से कौन-सा रूप सही है और कौन-सा गलत.
मित्रों, अपने बाबा रामदेव को ही लीजिये. पहले पता चला कि वे एक योगी-संन्यासी हैं. फिर पता चला कि आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माता और व्यापारी हैं. फिर पता चला कि राजनीतिज्ञ हैं. फिर पता चला कि वे चैनल के मालिक हैं. फिर पता चला कि वे बहुत बड़े देशभक्त हैं और कालेधन के प्रबल विरोधी भी. फिर पता चला कि बहुत बड़े धनकुबेर हैं. और अब पता चल रहा है कि वे कालेधन और भ्रष्टाचार के प्रतीक लालू प्रसाद यादव के समधी बनने जा रहे हैं. पता नहीं आगे बाबाजी और क्या-क्या बनेंगे?
मित्रों, हमारी नजर में संन्यासी रामकृष्ण परमहंस थे जो कंचन और कामिनी को हाथ तक नहीं लगाते थे. हमने तो यहाँ तक सुना है कि पैसे को हाथ लगाते हुए उनकी कलाई ही मुड़ जाती थी. संन्यास के मतलब ही होता है पूर्ण वैराग्य. फिर बाबा रामदेव किस तरह के सन्यासी हैं. गेरुआ वस्त्र पहन लिया लेकिन उनको अकूत पैसा चाहिए. उनके परिवार के लोग आज भी उनके साथ रहते हैं और उनकी कई कम्पनियों में साझीदार हैं. उनको रथयात्रा तक पसंद नहीं पैदल चलना तो दूर की बात है. हमेशा पुष्पक विमान में उड़ते रहते हैं. कहने का तात्पर्य यह कि या तो बाबा विशुद्ध गृहस्थ हैं और उनको संन्यासी कहना कदाचित संन्यास आश्रम का ही अपमान है. बाबा खुद को कालाधन का सबसे बड़ा विरोधी बताते हैं और लालू से गुप्त मुलाकात करने निजी विमान से जाते हैं तो कभी लालू के गाल पर मक्खन लगाते हैं.
बाबा रे बाबा, इतना कन्फ्यूजन. दिमाग का फ्यूज न उड़ जाए. हमारी समझ में तो बिलकुल भी नहीं आ रहा कि ये बाबा जी हैं क्या जो न केवल पूरे भारत को बाबा जी समझ रहे हैं बल्कि बाबाजी बना भी रहे हैं. अगर आप की समझ में ये निर्गुण, निराकार आ रहे हैं तो कृपया हमें भी समझाईए अन्यथा हमारे साथ मिलकर कुरुक्षेत्र निवासी बाबाजी से यह बतलाने की कृपा करने के लिए प्रार्थना करिए कि हे माधव, हे सखे, हे केशव आप चीज क्या हो?

बाबाजी तुम क्या चीज हो?



मित्रों, अपने देश में पहेली पूछने और बूझने की लम्बी परंपरा रही है. मगर वास्तविकता तो यह है आदमी खुद ही बहुत बड़ी पहेली है. मसलन हम किसी को समझते कुछ और हैं और वो निकलता कुछ और ही है. कई बार तो एक ही इंसान के इतने सारे रूप सामने आते हैं कि देखनेवाला हतप्रभ हो जाता है कि इनमें से कौन-सा रूप सही है और कौन-सा गलत.
मित्रों, अपने बाबा रामदेव को ही लीजिये. पहले पता चला कि वे एक योगी-संन्यासी हैं. फिर पता चला कि आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माता और व्यापारी हैं. फिर पता चला कि राजनीतिज्ञ हैं. फिर पता चला कि वे चैनल के मालिक हैं. फिर पता चला कि वे बहुत बड़े देशभक्त हैं और कालेधन के प्रबल विरोधी भी. फिर पता चला कि बहुत बड़े धनकुबेर हैं. और अब पता चल रहा है कि वे कालेधन और भ्रष्टाचार के प्रतीक लालू प्रसाद यादव के समधी बनने जा रहे हैं. पता नहीं आगे बाबाजी और क्या-क्या बनेंगे?
मित्रों, हमारी नजर में संन्यासी रामकृष्ण परमहंस थे जो कंचन और कामिनी को हाथ तक नहीं लगाते थे. हमने तो यहाँ तक सुना है कि पैसे को हाथ लगाते हुए उनकी कलाई ही मुड़ जाती थी. संन्यास के मतलब ही होता है पूर्ण वैराग्य. फिर बाबा रामदेव किस तरह के सन्यासी हैं. गेरुआ वस्त्र पहन लिया लेकिन उनको अकूत पैसा चाहिए. उनके परिवार के लोग आज भी उनके साथ रहते हैं और उनकी कई कम्पनियों में साझीदार हैं. उनको रथयात्रा तक पसंद नहीं पैदल चलना तो दूर की बात है. हमेशा पुष्पक विमान में उड़ते रहते हैं. कहने का तात्पर्य यह कि या तो बाबा विशुद्ध गृहस्थ हैं और उनको संन्यासी कहना कदाचित संन्यास आश्रम का ही अपमान है. बाबा खुद को कालाधन का सबसे बड़ा विरोधी बताते हैं और लालू से गुप्त मुलाकात करने निजी विमान से जाते हैं तो कभी लालू के गाल पर मक्खन लगाते हैं.
बाबा रे बाबा, इतना कन्फ्यूजन. दिमाग का फ्यूज न उड़ जाए. हमारी समझ में तो बिलकुल भी नहीं आ रहा कि ये बाबा जी हैं क्या जो न केवल पूरे भारत को बाबा जी समझ रहे हैं बल्कि बाबाजी बना भी रहे हैं. अगर आप की समझ में ये निर्गुण, निराकार आ रहे हैं तो कृपया हमें भी समझाईए अन्यथा हमारे साथ मिलकर कुरुक्षेत्र निवासी बाबाजी से यह बतलाने की कृपा करने के लिए प्रार्थना करिए कि हे माधव, हे सखे, हे केशव आप चीज क्या हो?

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

कालेधन पर जुरमाना अभी भी २०० प्रतिशत ही है कृपया रायता न फैलाएँ



मित्रों, इस साल जब जेटली ने २०१६ के बजट पेश किया था तब उन्होंने इनकम टैक्स में २ नए अधिनियम जोड़े थे। अगर कोइ व्यक्ति अपनी इनकम को कम करके बताता है तो उस पर ५० प्रतिशत टैक्स पेनाल्टी का प्रावधान था। यानि ३० प्रतिशत टैक्स के ऊपर ५० प्रतिशत यानि टोटल ४५ प्रतिशत। और यदि कोइ व्यक्ति पकड़ा जाता है तो यही पेनाल्टी २०० प्रतिशत लगनी थी। यानि ९० प्रतिशत। जब मोदी जी विमुद्रीकरण किया तो उन्होंने इसी २०० प्रतिशत की पेनाल्टी का जिक्र किया था। नए प्रावधानों के अनुसार आयकर अधिनियम, 1961 और वित्त अधिनियम, 2016 का और संशोधन करने वाला यह विधेयक ‘धन विधेयक’ है।

मित्रों, इसमें प्रस्ताव किया गया है कि अगर लोग अपनी अघोषित नकद की घोषणा करते हैं, तो उन्हें कर एवं जुर्माने के रूप में 50 प्रतिशत देना होगा, जबकि ऐसा नहीं करने और पकड़े जाने पर 85 से ९० प्रतिशत कर एवं जुर्माना लगेगा। संशोधित आयकर कानून में यह भी प्रावधान है कि घोषणा करने वालों को अपनी कुल जमा राशि का 25 प्रतिशत प्रधानमंत्री मंत्री गरीब कल्याण योजना (पीएमजीकेवाई) में लगाना होगा, जहां कोई ब्याज नहीं मिलेगा। साथ ही इस राशि को चार साल तक नहीं निकाला जा सकेगा।

मित्रों, इसमें यह भी प्रावधान है कि घोषणा करने वालों को अपनी कुल जमा राशि का 25 प्रतिशत सरकार द्वारा लायी जा रही एक ‘गरीबी-उन्मूलन योजना’ में निवेश करना होगा। इसमें लगाए गए पैसे पर कोई ब्याज नहीं मिलेगा। साथ ही इस राशि को चार साल तक नहीं निकाला जा सकेगा। जो लोग गलत तरीके से कमाई गई राशि अपने पास 500 और 1,000 के पुराने नोट में दबाकर रखे हुए थे और जो उसकी घोषणा करने का विकल्प चुनते हैं, उन्हें प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना 2016 के तहत इसका खुलासा करना होगा। उन्हें अघोषित आय का 30 प्रतिशत की दर से कर भुगतान करना होगा। इसके अलावा अघोषित आय पर 10 प्रतिशत जुर्माना लगेगा। साथ ही पीएमजीके उपकर नाम से 33 प्रतिशत अधिभार (30 प्रतिशत का 33 प्रतिशत) लगाया जाएगा। इतना ही नहीं इस संशोधन विधेयक के द्वारा मोदी सरकार ने कांग्रेस राज में बनाए गए आयकर कानून में मौजूद कई कमियों को भी दूर करने का प्रयास किया है  जिसका फायदा अब तक कालाधनधारक उठा रहे थे

मित्रों, इस प्रकार हम पाते हैं कि संशोधित विधेयक में पहले से भी ज्यादा कड़े प्रावधान किए गए हैं फिर भी कुछ लोग जाने-अनजाने में इस तरह की अफवाह फैला रहे हैं कि मोदी सरकार ने यूटर्न ले लिया है या कालेधन के मुद्दे पर फिरकी ले रही है। ऐसे लोगों से अनुरोध है कृपया वे रायता न फैलाएँ। गंदे लोगों की इस तरह की गन्दी हरकतों का काफी बड़ा खामियाजा देश पहले ही काफी भुगत चुका है। इसलिए आपलोगों से करबद्ध प्रार्थना है कि देश में पहली बार सिर्फ देश की चिंता करनेवाली सरकार आई है कृपया उसे निर्बाध रूप से काम करने दें।

सोमवार, 28 नवंबर 2016

विपक्ष की दाढ़ी में तिनका

मित्रों, 15 अगस्त,1947 के बाद से ही अपने देश में पक्ष और विपक्ष के बीच यह अघोषित समझौता रहा है कि जब भी कोई पार्टी सत्ता में रहती है तो उन दूसरी पार्टियों को बचाती है जिनको गरियाकर या अपदस्थकर वो सत्ता में आती है। सौभाग्यवश इन दिनों पहली बार केंद्र में ऐसी सरकार सत्तारूढ़ है जो किसी को भी बचा नहीं रही है बल्कि देश को बचाने की सच्चे मन से कोशिश कर रही है। वरना इससे पहले जो तथाकथित प्रधानमंत्री थे वे पकड़े गए कालेधन को छुड़ाने के लिए आयकर आयुक्त को एक-एक दिन में 27 बार खुद ही फोन करते थे।
मित्रों, हमने-आपने सबने अकबर-बीरबल की चोर की दाढ़ी में तिनके वाली कहानी पढ़ी है। उक्त कहानी में किसी की भी दाढ़ी में तिनका नहीं होता लेकिन जो चोर होता है वो बीरबल के झाँसे में आकर अपनी दाढ़ी में तिनका खोजने लगता है। कालेधन के खिलाफ मोदी सरकार ने जो मुहिम छेड़ी है उसके खिलाफ जिस तरह से विपक्ष बौखलाया हुआ है उससे स्वतः ही पता चल जाता है कि किसके घर में कितना बोरा 500-1000 का नोट रखा हुआ है। वैसे जिन लोगों को लगता होगा कि मोदी सरकार का यह कालाधन के विरूद्ध पहला और आखिरी कदम है उनको बता दूँ कि अभी तो महफिल शुरू ही हुई है। अभी तो उसका चरमबिंदु (क्लाईमेक्स) पर पहुँचना बाँकी है। अभी तो भ्रष्टाचार की कई परतों को उघाड़ना बाँकी है,बरगद की कई जटाओं को काटना शेष है।
मित्रों, कहावत है कि जिनके मकान शीशे के होते हैं वे दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते। जाहिर है कि जिसके पास खुद अपार कालाधन होगा वो श्यामालक्ष्मी के दूसरे उपासकों के विरूद्ध भला कैसे कार्रवाई करेगा? फिर मोदी के पास तो अपना सफेद धन भी नहीं है कालाधन तो दूर की बात है। कदाचित, मोदी के हाथों अपनी दुर्गति का अंदाजा विपक्ष के लुटेरों को पहले से ही था इसी वजह से वे 2014 में मोदी के पीएम बनने के खिलाफ एकजुट हो गए थे।
मित्रों, इन दिनों लालू परिवार दिल्ली में 100 करोड़ की लागत से राबड़ी भवन बना रहा है। कहाँ से आया उस लालू परिवार के पास इतना अकूत धन जो आज से 35-40 साल पहले पटना में एक कमरे के फ्लैट में किराये पर रहता था? आज सोनिया गांधी के बारे में विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में छप रहा है कि उसके पास ब्रिटेन की महारानी से भी ज्यादा संपत्ति है। एक जमाने की बार-गर्ल महाकंगाल एंटोनिया माइनो उर्फ सोनिया गांधी के पास कहाँ से आई इतनी अकूत संपत्ति? इसी तरह से केजरीवाल, मुलायम, ममता, माया आदि ने भी कभी कोई व्यवसाय तो किया नहीं फिर इन भिखमंगों के पास कहाँ से आ गया उनके पास इतना पैसा जिसके छिन जाने से या छीन लिए जाने की प्रबल संभावना से वे पगला गए हैं?
मित्रों, इन दिनों कालेधन के खिलाफ संग्राम छिड़ने से सिर्फ राजनेता ही परेशान नहीं हैं बल्कि कई न्याय की कथित मूर्ति और बैंक यूनियन वाले भी अलबला रहे हैं। कहना न होगा कि नोट बंद होने की चोट इनको भी करारी पड़ी है। कहावत है कि जाके पैर न फटे बिबाई सो क्या जाने पीड़ पराई। जब किसी लुटेरे से उसकी जीवनभर की लूट की कमाई छीन ली जाती है तो उस हत्यारे पर क्या गुजरती है ये या तो वही जानता है या फिर उस लूट से मौज उड़ानेवाला उसका परिवार जानता है। जब कुत्तों के झुड में से किसी एक की पूँछ गाड़ी के नीचे आती है तो हर कोई बिना पूछे ही जान जाता है कि किस कुत्ते की पूँछ कुचली गई है।
मित्रों, मोदी सरकार बड़ी बेरहम है। जबरा मारे भी और रोये भी न दे। वह बेरहमी से मार भी रही है और रोने भी नहीं दे रही। चिल्लाये तो हर कोई जान जाएगा कि इसकी पूँछ भी कुचली गई है और चुप रहे तो पूँछ से हाथ ही धोना पड़ेगा। गरीबों का क्या उसको तो अपना लुटा हुआ पैसा वापस चाहिए, चमकता हुआ भारत चाहिए, अभावमुक्त सुखी जीवन चाहिए जिनके झूठे सपने उसे आज तक बारी-बारी से सत्ता में रहे लुटेरे दिखाते रहे हैं।