शनिवार, 4 जुलाई 2015

संपूर्ण विनाश हो,रक्तरंजित बिहार हो,फिर से नीतीश कुमार हो

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के छोटे-छोटे पाँव जमीन पर पड़ ही नहीं रहे हैं। दरअसल उनके हाथ एक ऐसा नारेबाज लग गया है जो नारे और प्रचार की योजना बनाने में बला का माहिर है। पिछले 2 सालों से बिहार को अच्छा शासन देने में विफल रहे नीतीश जी को लग रहा है कि वे कोरे नारों के बल पर ही फिर से बिहार का चुनाव जीत जाएंगे। जबकि चुनाव जीतने के लिए उनको जनता को यह भी बताना पड़ेगा कि उन्होंने बिहार को अब तक दिया क्या है। अगर जनता इससे संतुष्ट हो जाती है तो उनको बताना चाहिए कि वे आगे क्या करने की सोंच रहे हैं।
मित्रों,अब हम चलते हैं फ्लैश बैक में। बात वर्ष 2007 की है। तब हम हिंदुस्तान के पटना कार्यालय में कॉपी एडिटर हुआ करते थे। एक दिन वहाँ चर्चा छिड़ गई कि बिहार की कानून-व्यवस्था में सुधार आने के कारण क्या हैं। तब दिलीप भैया ने कहा था कि चूँकि बिहार सरकार ने सारे बदमाशों को शिक्षामित्र बना दिया है इसलिए अपराध कम हो गया है। उत्तर सुनते ही मैं काँप गया था। इस आशंका से कि बदमाशों की अगली पीढ़ी जब आएगी तब कानून-व्यवस्था का क्या होगा। बदमाश शिक्षक शरीफ बच्चों का निर्माण तो करेंगे नहीं। नीतीश राज में स्कूली शिक्षकों की बहाली में किस कदर मनमानी और भ्रष्टाचार का बोलबाला रहा इसका अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी कल-परसों ही हाईकोर्ट के भय से 1400 ऐसे शिक्षामित्रों ने इस्तीफा दे दिया है जिनकी डिग्रियाँ फर्जी थीं।
मित्रों,आज के बिहार के कानून-व्यवस्था की स्थिति कमोबेश नीतीश कुमार की उसी गलती का परिणाम है जिसकी ओर तब दिलीप भैया ने ईशारा किया था। सिर्फ राजधानी पटना की ही बात करें तो कल पूर्व मंत्री एजाजुल हक के फ्लैट में घुसकर उनको चाकू मार दिया गया, नीतीश सरकार की नाक के नीचे जीपीओ गोलंबर के पास कल रात गोविंद ढाबा के मालिक गोविंद से 50 हजार रुपये छीन लिए गए, कपड़ा व्यवसायी से नक्सली संगठन के नाम पर 10 लाख रुपये की रंगदारी मांगी गई और एयरपोर्ट थानान्तर्गत किसी जज साहब की धर्मपत्नी से चेन छीन ली गई। ये तो हुई बिहार के कानून-व्यवस्था की खबर अब हम बात करेंगे बिहार पुलिस पर बिहार की जनता के विश्वास की। आज आप बिना घूस दिए या बिना कोर्ट के आदेश के बिहार के थानों में एफआईआर भी दर्ज नहीं करवा सकते। बिहारवासियों का पुलिस पर विश्वास इतना कम हो गया है कि लोगों ने अपराधियों को पकड़ने के बाद पुलिस के हवाले करना ही बंद कर दिया है और ऑन द स्पॉट अपराधियों का निपटारा कर दे रहे हैं। आज एक बार फिर से बिहार में जंगलराज कायम हो चुका है और लोग बिहार में निवेश करने से डरने लगे हैं।
मित्रों,जब नीतीश कुमार ने बिहार का राजपाट संभाला था तब नक्सलवाद सिर्फ गंगा के दक्षिण में ही सक्रिय था। आज नक्सलवाद उत्तर बिहार के अधिकांश क्षेत्रों में भी अपने पाँव पसार चुका है। हमारा वैशाली जिला जो नक्सलवाद के मायने भी नहीं जानता था का बहुत बड़ा इलाका इस समय नक्सलवाद की चपेट में आ चुका है। जिले के कई प्रखंडों में बिना लेवी दिए कोई ठेकेदार न तो सड़क ही बनवा सकता है और न ही कोई उद्योगपति फैक्ट्री ही डाल सकता है। क्या यही है नीतीश कुमार का सुशासन? हमारे हाजीपुर शहर में ही लूट रोजाना की घटना बन गई है।
मित्रों,बिहार की आम जनता का मानना है कि लालू-राबड़ी राज के मुकाबले राज्य में घूसखोरी घटी नहीं है बल्कि बढ़ी है। पहले लालू-राबड़ी राज में खद्दरधारी लोग बिना पैसे के भी काम करवा देते थे लेकिन आज बिना पैसे दिए कोई काम नहीं होता। पहले 250 रुपये में जमीन की दाखिल खारिज हो जाती थी आज 5 हजार से कम में नहीं होती। बिजली विभाग बिजली कम देती है अनर्गल बिलिंग के झटके ज्यादा देती है। नीतीश राज में बने पुल 5 साल में ही गिर जा रहे हैं। क्यों? इतना ही नहीं नीतीश जी ने शासन में आने के बाद कहा था कि ठेकेदारों को सड़कों के निर्माण के समय गारंटी देनी पड़ेगी कि सड़कें कितने सालों तक चलेगी। अब नीतीश सरकार जनता पर यह जिम्मेदारी छोड़ रही है कि कहीं पर सड़क टूट जाती है तो टॉल फ्री नंबर पर फोन करे। सरकार उसके बाद ठेकेदार को ब्लैक लिस्ट में डाल देगी और इस प्रकार भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा। सरकारी अस्पतालों की स्थिति में नीतीश राज की शुरुआत में जो सुधार आया था अब फिर से स्थिति बिगड़ चुकी है। कहीं दवा घोटाला है तो कहीं यंत्र खरीद घोटाला। जहाँ नजर डालिए बस घोटाला ही घोटाला। सरकार किसानों से धान खरीदती है तो वहाँ भी घोटाला हो जाता है। यानि जहाँ भी कोई काम राज्य सरकार अपने हाथ में लेती है वहीं पर एक घोटाला हो जाता है और इस तरह से राज्य में सुशासन का राज स्थापित किया जा रहा है।
मित्रों,जहाँ तक शिक्षा का सवाल है तो मैंने शुरू में ही अर्ज किया कि बिहार के स्कूलों में नीतीश कुमार ने अयोग्य और असामाजिक तत्त्वों को शिक्षक बना दिया इसलिए प्राथमिक शिक्षा का जो हाल होना चाहिए था वही हो गया है। किसी भी सरकारी स्कूल में यूँ तो पहले से ही पढ़ाई न के बराबर हो रही थी अब दूरदर्शी नीतीश जी ने उपस्थिति की अनिवार्यता को समाप्त करके हालत को और भी चौपट करने की दिशा में महान कदम उठा दिया है। अब जबकि छात्र स्कूलों में आएंगे ही नहीं तो पठन-पाठन का माहौल कहाँ से बनेगा? यही कारण है कि जब बिहार में मैट्रिक या इंटर या बीए की परीक्षा आयोजित होती है तो बिहार को शर्मशार होना पड़ता है। पिछले 10 सालों में प्राइमरी स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक शिक्षा के माहौल को षड्यंत्रपूर्वक नीतीश सरकार द्वारा समाप्त कर दिया है। बिहार सरकार प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन करती है और बहाली कर दी जाती है कभी मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष के परिजनों की तो कभी स्वास्थ्य मंत्री की सुपुत्री की।
मित्रों,नीतीश कुमार जी ने कल-परसों ही एक बार फिर से आरक्षण और अपने भेजा का बेजा इस्तेमाल किया है। नीतीश जी ने ठेकों में आरक्षण लागू कर दिया है। इससे पहले भी मोहम्मद बिन तुगलक के 21वीं शताब्दी अवतार श्रीमान ने पंचायती राज में विचित्र आरक्षण व्यवस्था लागू की थी। आप सभी जानते हैं कि लोकतंत्र बहुमत से चलता है लेकिन बिहार की पंचायती राज व्यवस्था में लोकतंत्र तुगलकी आरक्षण से चलता है। किसी पंचायत में भले ही सवर्णों या यादवों की आबादी 99 प्रतिशत रहे लेकिन गाँव का मुखिया बनेगा कोई दलित या महादलित ही भले ही उस पंचायत में उनका एक ही परिवार क्यों न रहता हो।
मित्रों,तो ये है संक्षेप में नीतीश राज में बिहार की स्थिति। अब आप ही बताईए कि बिहार में बहार हो,नीतीश कुमार हो नारा लगा देने मात्र से कैसे बिहार में बहार आ सकती है? ठीक इसी तरह से यूपी सरकार कहती है कि यूपी में दम है क्योकि यूपी में जुर्म कम है। क्या यूपी सरकार के ऐसा कह देने या ऐसे नारे लगा देने भर से यूपी में जुर्म कम हो गया या हो जाएगा। वास्तविकता तो यह है कि यह नारा बिहार की स्थिति पर फिट तो नहीं ही हो रही है बल्कि पूरी तरह से विरोधाभासी है। नारा तो कुछ इस तह से होना चाहिए कि संपूर्ण विनाश हो,रक्तरंजित बिहार हो,फिर से नीतीश कुमार हों।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

आडवाणी जी यूपी में तो कई साल से आपातकाल लागू है

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अपने भीष्मपितामह लालकृष्ण आडवाणी जब भी कुछ बोलते हैं तो उसके अनगिनत अर्थ लगाए जाते हैं। श्री आडवाणी ने कहा कि आपातकाल लगाने वाली प्रवृत्तियाँ आज भी हमारे देश में मौजूद हैं और लोगों ने इसे सीधे-सीधे केंद्र की मोदी सरकार से जोड़ दिया जबकि अभी तक मोदी सरकार ने ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाया है जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरा पैदा होता हो। अगरचे भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जरूर वर्ष 2012 से ही यानि समाजवादी सरकार के आने के बाद से ही अघोषित आपातकाल लागू है।

मित्रों,अगर आप यूपी में रहते हैं तो आप सुपर चीफ मिनिस्टर आजम खान के खिलाफ लिखने की सोंच भी नहीं सकते हैं। पता नहीं कब आपको पुलिस घर से उठा ले। अभी पिछले दिनों एक पत्रकार जगेंद्र सिंह को तो यूपी सरकार के कद्दावर मंत्री राममूर्ति वर्मा के खिलाफ लिखने पर खुद जनता की रक्षा की शपथ लेनेवाले पुलिसवालों ने ही घर में घुसकर जिंदा जला दिया और वर्मा यूपी सरकार में आज भी मंत्री बना हुआ है। संकेत साफ है कि हमारे खिलाफ लिखोगे तो जिंदा जला दिए जाओगे और हमारा कुछ भी नहीं बिगड़ेगा। मैं समझता हूँ कि ऐसा तो 1975 के आपातकाल में भी नहीं हुआ था।

मित्रों,कल ही पूर्व बसपा सांसद शफीकुर्ररहमान बर्क के खिलाफ दो साल पहले फेसबुक पर की गई टिप्पणी के चलते एक स्वतंत्र टिप्पणीकार को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस बार यूपी पुलिस ने 66 ए के तहत मामला दर्ज नहीं किया है बल्कि सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने के ज्यादा संगीन धारा के तहत मुकदमा किया है। अगर यह प्रयोग सफल रहता है और पूर्व की तरह सुप्रीम कोर्ट मामले में हस्तक्षेप कर पीड़ित पत्रकार को नहीं छुड़वाता है तो आगे उम्मीद की जानी चाहिए कि धड़ल्ले से इस सूत्र का यूपी पुलिस द्वारा प्रयोग किया जाएगा और यूपी में पत्रकार बिरादरी का जीना मुश्किल कर दिया जाएगा।

मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि देश में आपातकाल लागू करने के लिए न तो संसद की अनुमति चाहिए और न ही केंद्र सरकार की पहल ही जरूरी है बल्कि राज्य सरकारें भी चाहें तो बिना घोषणा किए ही आपातकाल जैसी परिस्थितियाँ पैदा कर सकती हैं और यूपी की समाजवादी सरकार यही कर रही है। यूपी में पिछले तीन सालों से लोकतंत्र को खूंटी पर टांग दिया गया है और एक पार्टी की सरकार चल रही है। उसी एक पार्टी के लोग प्रतियोगिता परीक्षाओं में पास हो रहे हैं,उसी एक पार्टी के लोग रंगदारी वसूल रहे हैं,उसी एक पार्टी के लोग थानेदारों को हुक्म दे रहे हैं और उसी एक पार्टी के लोग पत्रकारों को जिंदा जला भी रहे हैं। सवाल यह है कि इस एक पार्टी के सरकार-समर्थित गुंडाराज को रोका कैसे जाए? फिलहाल तो कोई मार्ग दिख नहीं रहा। वैसे भी जनता ने जब बबूल का पेड़ लगाया है तो उसको आम खाने को कहाँ से मिलेगा? गिनते रहिए गिनती कि कितने पत्रकार अंदर कर दिए गए और कितनों को मोक्षधाम पहुँचा दिया गया।
 

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

मंगलवार, 23 जून 2015

सिर्फ नदी द्वीप नहीं भ्रष्टाचार का टापू भी है राघोपुर

राघोपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अपने गृह-प्रखंड राघोपुर (वैशाली) के बारे में हम बचपन से ही पढ़ते आ रहे हैं कि यह एक नदी द्वीप है जिसके चारों तरफ से गंगा बहती है। लेकिन अब राघोपुर को देखता हूँ तो पाता हूँ कि यह न सिर्फ एक नदी द्वीप है बल्कि भ्रष्टाचार का टापू भी है। एक ऐसा टापू जहाँ आकर केंद्र और राज्य सरकार की सारी योजनाएँ दम तोड़ जाती हैं या फिर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं।
मित्रों,हरि अनंत हरि कथा अनंता अर्थात राघोपुर में व्याप्त अव्यवस्था के बारे में मैं तो क्या श्रीगणेशजी भी संपूर्णता से वर्णित नहीं कर सकते। हमारे प्रखंड में करीब एक-डेढ़ दशक पहले सामुदायिक शौचालय निर्माण की योजना आई। आज अगर आप प्रखंड में घूमेंगे तो पाएंगे कि कहीं भी सामुदायिक शौचालय बना ही नहीं। ठेकेदारों ने बदले में अपने-अपने घरों में शौचालय बनवा लिए। इसी तरह इस प्रखंड में उनलोगों को भी इंदिरा आवास योजना के तहत पूरी की पूरी राशि दे दी गई जिनके पहले से ही छतदार मकान थे।
मित्रों,इसी तरह आपको इस प्रखंड में कई ऐसे पंचायत मिल जाएंगे जहाँ कि पिछले कई सालों से वृद्धावस्था या विधवा पेंशन का वितरण ही नहीं हुआ है। पूछने पर अधिकारी बताते हैं कि लाभान्वितों का रिकार्ड ही नहीं मिल रहा। पिछले वर्षों में कई बीडीओ यहाँ आए और चले भी गए लेकिन यह गुत्थी आज भी अनसुलझी की अनसुलझी ही है।
मित्रों,अगर आप चकौसन घाट से नदी पार करने के बाद चकसिंगार की तरफ बढ़ेंगे तो देखेंगे कि चकसिंगार में एक पुलिया गिरी पड़ी है। यह एक ऐसी पुलिया है जो बनने के साथ ही धराशायी हो गई जाहिर है कि निर्माण में गुणवत्ता को ध्यान में रखा ही नहीं गया बल्कि पैसा निर्माण पर ज्यादा जोर दिया गया। पुलिया बनी और गिरी। कई साल बीत गए लेकिन न तो ठेकेदार के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई और न ही संबंधित अभियंता के विरूद्ध ही।
मित्रों,चाहे नीतीश कुमार जितने भी दावे कर लें लेकिन सच्चाई तो यही है कि राघोपुर प्रखंड का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी लालटेन युग में जीने को विवश है। रात होते ही राघोपुर के कई पंचायत अंधेरे में डूब जाते हैं। कहीं ट्रांसफॉर्मर नहीं है तो कहीं तार।
मित्रों,राघोपुर प्रखंड में अगर सबसे खराब स्थिति किसी चीज की है तो वह है सरकारी शिक्षा। बीआरसी यानि ब्लॉक रिसोर्स सेंटर और क्लस्टर रिसोर्स सेंटरों की मिलीभगत से यहाँ के विद्यालयों के अधिकतर शिक्षक सिर्फ वेतन लेने विद्यालय आते हैं। हर महीने सीआरसी के समन्वयक को निर्धारित राशि पहुँचाते रहिए और घर पर खेती कराईए या फिर दुकान चलाईए। हाँ,अगर आप महिला हैं या स्कूलवाले गांव के ही हैं तो फिर और भी सोने पर सुहागा। अब जब शिक्षक रहेगा ही नहीं तो पढ़ाएगा कौन? प्रखंड के कई गांवों के स्कूलों में तो इतना अधिक नामांकन है जितने कि गांव में बच्चे भी नहीं हैं। नहीं समझे क्या? ज्यादा नामांकन होगा तभी तो भ्रष्टाचार की खिचड़ी ज्यादा से ज्यादा मात्रा में पकाई जा सकेगी और हेडमास्टरों और सहायक शिक्षकों के वारे-न्यारे हो सकेंगे।
मित्रों,संभवतः पूरे वैशाली जिले में राघोपुर प्रखंड ही ऐसा इकलौता प्रखंड है जहाँ कि पुलिस पब्लिक के रहमोकरम पर जीती है। कभी थाने में घुसकर कोई दारोगा को मार जाता है और प्रशासन उसका बाल बाँका भी नहीं कर पाता तो कभी कोई बाजाप्ता फोन करके दारोगा को जान से मारने की धमकी देता है और दारोगा उसका कुछ भी नहीं उखाड़ पाता।
मित्रों,जहाँ हाजीपुर शहर की जनवितरण प्रणाली की दुकानों में हर महीने सामानों का वितरण किया जाता है वहीं राघोपुर में साल में दो बार भी अगर वितरण हो जाए तो लोग भगवान का शुक्रिया अदा करते हैं। प्रखंड के आंगनबाड़ियों का तो कहना ही क्या? कई स्थानों पर तो आंगनबाड़ी का धरातल पर अस्तित्व ही नहीं है और हर महीनों हजारों बच्चे लाभान्वित भी हो जा रहे हैं। कुपोषण को तो आंगनबाड़ियों ने प्रखंड से निकाल बाहर ही कर दिया है।
मित्रों,यूँ तो वैशाली प्रशासन के लिए राघोपुर हमेशा से टेढ़ी खीर रहा है लेकिन मैं नहीं मानता कि राघोपुर को चुस्त-दुरूस्त नहीं किया जा सकता। इसकी भौगोलिक स्थिति इस दिशा में उतनी बड़ी बाधा नहीं है जितनी बड़ी बाधा बिहार सरकार और उसके अधिकारियों की ईच्छा-शक्ति की कमजोरी है। माना कि साल के 6 महीने तक इस क्षेत्र में सिर्फ नावों के जरिए ही पहुँचा जा सकता है लेकिन बाँकी के 6 महीनों तक तो दो-दो पीपा पुलों की मदद से कभी भी कहीं भी अधिकारी आ-जा सकते हैं। इन 6 महीनों में तो प्रखंड में बहुत-कुछ सुधार लाया जा सकता है। एक और बात,जब तक राघोपुर से होकर पक्के पुल का निर्माण नहीं हो जाता तब तक गंगा के उत्तर पार से भी कम-से-कम एक पीपा पुल का निर्माण तो होना ही चाहिए क्योंकि वैशाली पुलिस-प्रशासन को पीपा पुल चालू होने की स्थिति में भी पटना होकर राघोपुर जाना पड़ता है जो कि गंगा सेतु पर महाजाम लगा होने पर लगभग असंभव-सा हो जाता है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 22 जून 2015

बाबू मोशाय,ब्रांड से नहीं खेल से मैच जीते जाते हैं

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,पूरी दुनिया जानती है कि बंगाली बाबू जगमोहन डालमिया का भारतीय और विश्व क्रिकेट में क्या योगदान है। आपको याद होगा कि आज से दो दशक पहले तक पूर्व क्रिकेट खिलाड़ियों की भुखमरी के किस्से कैसे समाचार पत्रों में छाये रहते थे। यह डालमिया की ही देन है कि आज भारत दुनिया के क्रिकेट का गढ़ बन गया है और भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों की गिनती दुनिया के सबसे धनी खिलाड़ियों में की जाती है। लेकिन अगर हम यह कहें कि क्रिकेट के इसी व्यवसायीकरण ने भारतीय क्रिकेट का बंटाधार करके रख दिया है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज भारतीय क्रिकेट के लिए खिलाड़ियों का चयन कदाचित यह देखकर नहीं किया जाता कि कौन खिलाड़ी अभी कैसा खेल रहा है बल्कि यह देखकर किया जाता है कि किस खिलाड़ी का ब्रांड वैल्यू कितना है।

मित्रों,अगर हम भारत-बांग्लादेश एकदिवसीय शृंखला के नतीजों और दोनों देशों की टीमों पर सरसरी नजर भी डालेंगे तो पाएंगे कि जहाँ बांग्लादेश की टीम में सारे फॉर्म में चल रहे खिलाड़ियों को रखा गया था वहीं भारत की टीम में बड़े-बड़े ब्रांड खेल रहे थे और उनमें से अधिकतर लंबे समय से आउट ऑफ फॉर्म चल रहे थे।

मित्रों,शायद यही कारण था भारत के कागजी शेर बांग्लादेश के नौजवान,जोशीले और देशभक्त खिलाड़ियों के आगे ढेर हो गए और इस प्रकार दोनों ही मैच एकतरफा हो गए। हम यह नहीं कहते कि भारतीय खिलाड़ी देशभक्त नहीं हैं लेकिन सवाल उठता है कि क्या कारण है कि जब भारतीय टीम विश्वकप के सेमीफाईनल में हारती है तो टीम के किसी भी खिलाड़ी की आँखों से आँसू नहीं बहते लेकिन जब वही खिलाड़ी आईपीएल के मैच हारते हैं तो मैदान पर फूट-फूटकर रोने लगते हैं? खेल में पैसा होना तो चाहिए मगर उसके प्रति इतना भी पागलपन नहीं हो कि देश के लिए खेलते समय खिलाड़ियों की प्रतिबद्धता ही खतरे में पड़ जाए।

मित्रों,इसलिए तो हम कहते हैं कि बाबू मोशाय भारतीय क्रिकेट को अगर बचाना है तो टीम से निकाल फेंकिए सारे बिस्कुट-पेप्सी-शैंपू आदि बेचनेवाले चुके हुए ब्रांडों को सिर्फ और सिर्फ उन्हीं खिलाड़ियों को टीम में रखिए जो पूरी तरह से फिट हों,फॉर्म में हों और देश के लिए खेलने में गौरव अनुभव करते हों। देश को ब्रांडों से भरी दिशाहारा टीम नहीं चाहिए बल्कि मैच जितानेवाली,देश का गौरव बढ़ानेवाली मजबूत टीम चाहिए।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 10 जून 2015

अब तेरा क्या होगा लालू?


मित्रों,हिंदी में एक कहावत है और है महाभारतकालीन कि मनुष्य बली नहीं होत हैं समय होत बलवान,भीलन लूटी गोपिका वही अर्जुन वही बान। 15 सालों तक बिहार पर एकछत्र राज करनेवाले लालू प्रसाद को देखकर एकबारगी स्वभाववश दया भी आती है और इस कहावत पर हमारा विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है। दरअसल मानव करण कारक है लेकिन वो खुद को समझ बैठता कर्त्ता है। श्री लालू प्रसाद यादव जी को भी किस्मत ने मौका दिया लेकिन जनाब खुद को खुदा समझ लेने की भूल कर बैठे। बिहार को उन्होंने फैमिली प्रॉपर्टी समझ लिया। दरवाजे पर बंधी गाय समझकर जब जितना चाहा दूहा।
मित्रों,इस लालू के शासन में बिहार का विकास नहीं हुआ विनाश हुआ। बिहार को इन्होंने सीधे रिवर्स गियर में चला दिया। जिस दौर में पूरी दुनिया इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी के पीछे पागल थी उस दौर में यह श्रीमान इसका मजाक उड़ाते हुए कहा करते कि ये आईटी-फाईटी क्या होता है? उनका एक और जुमला उन दिनों काफी मशहूर हुआ करता था कि कहीँ विकास करने से वोट मिलता है वोट तो जात-पात के नाम पर मिलता है?
मित्रों,धीरे-धीरे कैलेन्डर के साथ-साथ वक्त बदला,बिहारियों की सोंच बदली,मानसिकता बदली और आज इन लालू प्रसाद जी की स्थिति ऐसी हो गई है,ये इतने कमजोर हो गए हैं कि इन श्रीमान जो कभी बिहार के साथ-साथ दिल्ली की कुर्सी के भी किंग मेकर हुआ करते थे से खुद सड़कछाप हो चुके सोनिया और राहुल गांधी मिलना तक नहीं चाहते। जिस व्यक्ति ने बिहार पर 40 सालों तक शासन करनेवाली कांग्रेस पार्टी को अपना पिछलगुआ बनाकर रख दिया था आज खुद ही पिछलग्गू बनने को बाध्य है। जिन लोगों को ऐसा लगता था या लगता है कि मुलायम लालू के रिश्तेदार होने के नाते उनका समर्थन करेंगे उनको यह याद रखना चाहिए कि देवगौड़ा और गुजराल के जमाने में मुलायम ही लालू के सबसे बड़े दुश्मन हुआ करते थे और लालू जी जेल भेजवाने में भी सबसे बड़ा हाथ उनका ही था। वैसे भी लालू से मुलायम का यूपी में कुछ बनने-बिगड़ने को नहीं है।
मित्रों,एक बात हमेशा याद रखिएगा कि बिहार में जो पार्टी एक बार पिछलगुआ बन जाती है वह समाप्त ही हो जाती है। यानि अब लालू जी के राजनैतिक जीवन का तो अंत हो ही गया समझिए। भविष्य में बेचारे शरद यादव की तरह नीतीश कुमार की हाँ में हाँ मिलाने का ही एकमात्र काम किया करेंगे। यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि भाजपा बिहार में सत्ता में साझीदार थी लेकिन पिछलग्गू नहीं थी। उसके नेता बराबर नीतीश कुमार को पसंद न आनेवाले बयान तो देते रहते ही थे साथ ही उस तरह के काम भी करते रहते थे। लेकिन यहाँ लालूजी की स्थिति वैसी नहीं है। उनको नीतीश जी को अपना नेता मानने के साथ ही खुद अपनी ही पार्टी के नेताओं को नीतीश को नागवार लगनेवाले बयान देने से रोकना पड़ा है। मतलब साफ है कि लालू जी ने अपने साथ-साथ पूरी पार्टी के स्वाभिमान को नीतीश कुमार के चरण कमलों में समर्पित कर दिया है।
मित्रों,लालू जी ने इस अवसर पर यह भी कहा कि भाजपा को हराने के लिए वे जहर पीने को भी तैयार हैं। वास्तविकता भी यही है कि लालू जी ने जहर ही पिया है,एक ऐसा जहर जो न सिर्फ उनकी राजनीति की बल्कि उनकी पार्टी की भी जान ले लेगा। वैसे हमारी लालू जी के साथ कोई हमदर्दी नहीं है। इस आदमी ने बिहार को बर्बाद करके रख दिया और जो कुछ भी थोड़ा-बहुत बिहार बचा हुआ था उसको समाप्त कर दिया उनके छोटे भाई नीतीश कुमार जी ने। आज तो हालत यह कि बिहार फिर से वहीं पर आकर खड़ा हो गया है जहाँ कि 2005 में तब था जब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। मैं पूछता हूँ  कि नीतीश कुमार जी जीतन राम मांझी जी के एस्टीमेट घोटाले पर कोई जवाब या सफाई क्यों नहीं देते? चाहे सरकारी पुल हो,सड़क या मकान उनके निर्माण में खर्च होता है 1 करोड़ तो एस्टीमेट बनाया जाता है 5 करोड़ का। मांझी जी का तो यह व्यक्तिगत अनुभव था कि कमीशन का पैसा मुख्यमंत्री रहते हुए उनके पास भी पहुँचता था तो क्या नीतीश कुमार तक मांझी जी से पहले और मांझी जी के बाद भी कमीशन का पैसा पहुँचता था या पहुँचता है? अगर नहीं तो बरसात के दिनों में बिहार के कोने-कोने से नीतीश काल में निर्मित पुलों के गिरने की खबरें क्यों आती हैं? नीतीश जी ने पूरे बिहार में बोर्ड लगवा दिए हैं कि इन-इन सड़कों के टूटने की सूचना इस नंबर दें? आप कमीशन खाईए और पब्लिक दिन-रात पागलों की तरह नंबर डायल करती रहे?
मित्रों,वैसे आपको अबतक मेरे द्वारा उठाये गए सवाल का जवाब तो मिल ही गया होगा कि अब लालू जी का क्या होने वाला है। अब लालूजी बिहार से समाप्त हो चुके हैं,उन्होंने आत्मघाती गोल मारकर अपने द एंड को सुनिश्चित कर लिया है। चुनावों में चाहे जीते कोई लालूजी ने चुनाव लड़ने से पहले ही अपनी हार सुनिश्चित कर ली है। लालू जी अब मदारी नहीं रहे जमूरा बन गए हैं जो दूसरों के इशारे पर नाचता है। लेकिन यह मेरे उस सवाल का पूरा जवाब नहीं है। पूरा उत्तर यह है कि अगले कुछ महीनों में लालू जी कदाचित फिर से जेल की शोभा बढ़ाएंगे। अब दिल्ली में उनकी माई-बाप की सरकार नहीं है जो उनको खुल्ला छोड़ देगी। जब छोटे घोटालेबाज चौटाला को चुनावों के दौरान ही जेल भेज दिया गया तो लालू जी तो बहुत ही बड़े घोटालेबाज हैं पीएचडी डिग्रीधारी।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 4 जून 2015

देश की राजनीति का डिब्बा नहीं ईंजन रहा है बिहार

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आप बिहार को गरीब कहकर हँसी भले हीं उड़ा लें लेकिन इस बात से आप इंकार नहीं कर सकते कि बिहार के लोगों में जो राजनैतिक विवेक है वो कई पढ़े-लिखे और समृद्ध कहलानेवाले राज्यों के मतदाताओं में भी नहीं है। यही कारण है कि चाहे छठी सदी ईसा पूर्व के बौद्ध और जैन धर्म आंदोलन हों या चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य का भारत को एक राष्ट्र में बदलने का अभियान या 1857 का पहला स्वातंत्र्य संग्राम हो या 1920 का असहयोग आंदोलन हो या 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन या 1974 का जेपी आंदोलन बिहार ने ईंजन बनकर देश की राजनीति को दिशा दिखाई है। बिहार के लोग इतिहास को दोहराने में नहीं नया इतिहास बनाने में विश्वास रखते हैं।
मित्रों,अब से कुछ ही महीने बाद बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और बिहार की सारी यथास्थितिवादी शक्तियों ने एकजुट होना शुरू कर दिया है। उनको लगता है कि बिहार में 1995 और 2000 ई. जैसे चुनाव-परिणाम आएंगे। ये विकास-विरोधी,बिहार की शिक्षा को रसातल में पहुँचा देनेवाले,भ्रष्टाचार को सरकारी नीति बना देनेवाले और बिजली,चारा,अलकतरा,दवा-खरीद,धान-खरीद,पुल-निर्माण,एस्टीमेट आदि घोटालों की झड़ी लगा देनेवाले घोटालेबाज लोग सोंचते हैं कि बिहार में अगले चुनावों में भी लोग जाति के नाम मतदान करेंगे और इन जातिवादियों की नैया फिर से किनारे लग जाएगी। नीतीश जी ने तो कई बार मंच से कहा था कि अगर साल 2015 तक बिहार के हर घर में बिजली नहीं पहुँचती है तो वे वोट मांगने ही नहीं जाएंगे। बिजली तो मेरी पंचायत जुड़ावनपुर बरारी में ही नहीं है। शाम होते ही पूरी पंचायत अंधेरे के महासागर में डूब जाती है तो क्या नीतीश जी सचमुच इस चुनाव में वोट नहीं मांगेंगे? नीतीश जी ने 2010 के चुनाव जीतने के बाद कहा था कि इस कार्यकाल में उनकी सरकार भ्रष्टाचार के विरूद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति अख्तियार करेगी तो क्या बिहार से भ्रष्टाचार समाप्त हो गया? फिर क्यों बिहार में रोजाना नए-नए घोटाले सामने आ रहे हैं? क्या यही है जीरो टॉलरेंस की नीति?
मित्रों,कितने आश्चर्य की बात है कि पूरी दुनिया में सत्ता-पक्ष को हराने के लिए मोर्चे बनाए जाते हैं,गठबंधन किए जाते हैं लेकिन बिहार में विपक्ष को रोकने के लिए पहले महाविलय का नाटक किया गया और अब गठबंधन की नौटंकी की जा रही है। कल तक लालू-राबड़ी राज आतंकराज था और लालू-राबड़ी आतंकवादी थे लेकिन आज बड़े भाई और भाभी हो गए हैं। लालू जी भी मंचों से कहा करते थे कि ऐसा कोई सगा नहीं जिसको नीतीश ने ठगा नहीं और खुद पहुँच गए उस आदमी की शरण में जिसने पूरे बिहार की जनता को ठगा है और आज लालू भी खुद को ठगे हुए महसूस कर रहे हैं। नीतीश ने लालू को किनारे लगाकर कांग्रेस से खुद को मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित करवा लिया है और खुद को राजनीति का पीएचडी कहनेवाले लालू जी की समझ में ही नहीं आ रहा है कि अब करें तो क्या करें?
मित्रों,यह सच्चाई है कि जबतक बिहार में भाजपा नीतीश सरकार में शामिल थी तब तक बिहार ने 14 प्रतिशत की दर से विकास किया। तब भी नीतीश कुमार कहा करते थे कि इस रफ्तार से विकास करने पर भी बिहार को अन्य विकसित राज्यों की बराबरी में आने में 20 साल लग जाएंगे और उनके पास 20 साल तक इंतजार करने  लायक धैर्य नहीं है। आज उन्होंने जबसे भाजपा को सरकार से निकाल-बाहर किया है बिहार की विकास दर आधी हो चुकी है और 7 प्रतिशत तक लुढ़क चुकी है। जाहिर है कि अब तो नीतीश जी को 100 सालों तक इंतजार करने लायक धैर्य एकत्रित करना पड़ेगा। लेकिन सवाल उठता है कि क्या बिहार की जनता 100 सालों तक इंतजार करेगी? क्या भारत की तीसरी सबसे बड़ी युवा आबादी को धारण करनेवाले बिहार के लोगों के पास आज 100 सालों तक विकास का इंतजार करने लायक धैर्य है?
मित्रों,कदापि नहीं,कदापि नहीं!!  इतना ही नहीं भाजपा को हटाने के बाद से बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति में इतनी गिरावट हो चुकी है कि लगता है कि बिहार फिर से नीतीशकथित आतंकराज में पहुँच गया है। लालू-नीतीश बिहारी होकर भी बिहार को नहीं समझ पाए हैं। बिहार कोई दिल्ली नहीं है जो बार-बार मूर्खता करे और अपने विकास के मार्ग को रायता विशेषज्ञों को मत देकर खुद ही अवरूद्ध कर ले। बिहार के लोग कम पढ़े-लिखे भले हीं हों लेकिन बिहार का अनपढ़ चायवाला या रिक्शावाला भी इतनी समझ रखता है कि कौन उसका और उसके राज्य का वास्तविक भला चाहता है। बिहार की जनता में अब विकास की भूख जग चुकी है। वैसे भी केंद्र की मोदी सरकार ने बिहार की सारी मांगों को एकसिरे से न सिर्फ मंजूर कर लिया है बल्कि उससे भी ज्यादा दे दिया है जितने कि नीतीश कुमार की सरकार ने मांग की थी। इतिहास गवाह है कि बिहार की जनता लगातार नए प्रयोग करने में विश्वास रखती है। वो लालू और नीतीश दोनों को देख चुकी है,परख चुकी है इसलिए ये दोनों तो इसबार के चुनाव में शर्तिया माटी सूंघते हुए ही दिखनेवाले हैं। भाजपा अगर बिहार में जीतती है तो निश्चित रूप से भारतमाता की बांयीं बाजू को मजबूत बनाने के नरेंद्र मोदी के संकल्प पर तेज गति से काम होगा और दुनिया में भारत अतुल्य भारत तो बनेगा ही वसुधा पर बिहार का भी जोड़ा नहीं मिलेगा। 1947 में जो बिहार प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश में दूसरा स्थान रखता था 2047 आते-आते कदाचित पहला स्थान प्राप्त कर लेगा और बिहार की जनता इस बात को बखूबी जानती और समझती है। ये बिहार की पब्लिक है बाबू और ये जो पब्लिक है वो सब जानती है,कौन बुरा है कौन भला है ये न सिर्फ पहचानती है बल्कि देश में सबसे ज्यादा पहचानती है।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

बुधवार, 20 मई 2015

मोदी के एक साल बनाम सौ दिन के केजरीवाल

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अब कुछ ही दिन बचे हैं जब भारत में रक्तहीन क्रांति को हुए एक साल पूरे हो जाएंगे। एक साल पहले भारत ने कांग्रेस की फूट डालो और शासन करो की नीति को पूरी तरह से नकारते हुए नरेंद्र मोदी की सबका साथ सबका विकास की नीति पर अपनी मुहर लगाई थी।
मित्रों,दूसरी तरफ दिल्ली में केजरीवाल सरकार के सौ दिन भी दो-तीन दिन में ही पूरे हो जाएंगे। जहाँ नरेंद्र मोदी ने शपथ-ग्रहण से पहले ही काम करना शुरू कर दिया था वहीं दिल्ली में केजरीवाल सरकार के काम शुरू करने का अभी भी इंतजार हो रहा है। हम यह तो नहीं कह सकते कि मोदी सरकार ने एक साल में ही उतना काम कर दिया है जितना कि उसको 5 साल में करना था लेकिन हम यह जरूर दावे के साथ कह सकते हैं कि मोदी सरकार ने पिछले एक साल में उतना काम तो जरूर किया है जितना कि एक साल में कर पाना किसी भी सरकार के लिए संभव था और जब आगाज अच्छा होता है तो अंजाम भी अच्छा ही होता है।
मित्रों,आपको याद होगा कि मोदी सरकार ने पहला फैसला लिया था कालाधन पर एसआईटी के गठन का। फिर भारत के इतिहास में पहली बार मेक इन इंडिया अभियान का आगाज किया गया । फिर लाई गई प्रधानमंत्री जनधन योजना और तत्पश्चात् एलपीजी सब्सिडी को सीधे ग्राहकों के खातों में डालने की शुरुआत की गई। और अब लाई गई है 12 रुपये सालाना वाली लाजवाब प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना एवं प्रधानमंत्री जीवन सुरक्षा बीमा योजना । आगे उम्मीद की जानी चाहिए सारी सब्सिडी आधारित योजनाओं की सब्सिडी सीधे लाभान्वितों के खातों में डाल दी जाएगी और इस तरह दिल्ली से चला 1 रुपये में से 1 रुपया ही लाभुकों तक पहुँचेगा न कि 15 पैसे। इसी तरह ऐसी उम्मीद भी की जानी चाहिए कि निकट-भविष्य में पूरी सरकार हमारे मोबाईल में होगी,हमारी मुट्ठी में होगी। सबकुछ ऑटोमैटिक, न तो रिश्वत देनी पड़ेगी और न ही टेबुल-टेबुल दौड़ना ही पड़ेगा। जहाँ तक कालेधन का सवाल है तो संस्कृत का एक श्लोक तो आपने पढ़ा ही होगा कि पुस्तकेषु तु या विद्या परहस्तगतं धनं। आपतकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनमं।। इसलिए अगर मोदी सरकार देसी-विदेशी कालाधन के निर्माण पर ही रोक लगा दे तो देश का कायाकल्प हो जाएगा। इसके लिए आयकर विभाग को चुस्त-दुरूस्त बनाना होगा और आयकर अधिकारियों की सम्पत्ति की जाँच करवानी होगी और कदाचित सरकार ऐसा करेगी भी। इसके साथ ही कृषि को लाभकारी बनाने की दिशा में भी कई योजनाएँ बनाई जा रही हैं जिनको जल्दी ही लागू किया जाएगा। अगर भारत को विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में लाना है तो हमें कृषि को लाभकारी बनाने के साथ-साथ कृषि पर से जनसंख्या के भार को भी कम करना होगा और मोदी सरकार की महत्त्वाकांक्षी योजना मेक इन इंडिया इसी दिशा में किया जा रहा सार्थक प्रयास है।
मित्रों,जहाँ सोनिया-मनमोहन-राहुल की सरकार इसलिए चर्चा में रहती थी क्योंकि उसमें रोज ही कोई-न-कोई घोटाला होता था वहीं आज विपक्ष शोर मचा रहा है सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी के कपड़ों को लेकर। बेचारे करें तो क्या करें सरकार के खिलाफ और कोई मुद्दा मिल भी तो नहीं रहा। हल्ला भी एक ऐसे नेता के कपड़ों को लेकर किया जा रहा है जो हर साल अपने कपड़ों की नीलामी का आयोजन करता है और उससे होनेवाली आय को हर साल सरकारी खजाने में जमा कर देता है। भारत के किसी भी अन्य नेता ने कभी ऐसा किया था क्या?
मित्रों,एक और कारण से मोदी सरकार के खिलाफ हल्ला मचाया जा रहा है और वह है भूमि अधिग्रहण बिल। आरोप लगाया जा रहा है कि मोदी सरकार किसान-विरोधी है और किसानों की जमीनों को छीनकर राबर्ट वाड्राओं और जिंदलों को सौंप देगी। आश्चर्य तो इस बात को लेकर है कि आरोप लगानेवाले वही लोग हैं जिन्होंने पिछले 50 सालों में किसानों की जमीनों को मनमानी शर्तों पर बिना कुछ दिए छीनने का काम किया है और वाड्राओं और जिंदलों को देने का काम किया है। केंद्र सरकार आश्वस्त कर रही है कि अधिगृहित भूमि सरकार के पास ही रहेगी,पहली बार प्रभावित किसानों को चार गुना मुआवजा दिया जाएगा और देश के इतिहास में पहली बार नौकरी भी दी जाएगी फिर भी चोर शोर मचा रहे हैं। वास्तव में ये लोग चाहते ही नहीं हैं कि देश का विकास हो और इनक्रेडिबल इंडिया वास्तव में इनक्रेडिबल इंडिया बने। नई सड़कों,नए उद्योगों,पावर-प्लांटों,रेलवे-लाइनों के लिए जमीन के अधिग्रहण की आवश्यकता है और विपक्ष नहीं चाहता कि मोदी सरकार भारत की आधारभूत संरचना का विकास करे,भारत को उत्पादन में,जीडीपी में दुनिया में नंबर एक बनाए जैसे कि भारत 1813 ईस्वी तक था। हम उम्मीद करते हैं कि चालू वित्त वर्ष में मोदी सरकार बहुत जल्दी किसी-न-किसी तरह भूमि अधिग्रहण बिल को संसद से पारित करवा लेगी और वास्तविक भारत के निर्माण की दिशा में रॉकेट की गति से अग्रसर होगी। मोदी सरकार को यह बात समझ लेनी चाहिए कि चाहे उनका मूलमंत्र सबका साथ सबका विकास कितना ही पवित्र क्यों न हो उनके मार्ग में,यज्ञ में राष्ट्रीय और वैश्विक दोनों स्तर पर कुछ राहु(ल)-केतु हमेशा विघ्न डालते ही रहेंगे।
मित्रों,अब बात करते हैं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में सौ दिन पूरे करनेवाली केजरीवाल सरकार की जिसने वेलेन्टाईन दिवस को पदभार संभाला था। पिछले सौ दिनों अगर इस सरकार ने कुछ किया है तो बस रायता फैलाने का काम किया है। पहले आपस में ही झगड़ने का काम किया और अब संविधान और केंद्र सरकार से झगड़ा कर रही है। हमने विधानसभा चुनावों के समय दिल्ली की जनता को इसकी बाबत सचेत भी किया था लेकिन जनता ने हमारी नहीं सुनी और एक ऐसी सरकार चुनी जो सरकार है ही नहीं बल्कि अराजकतावादियों का जमघट है फर्जी डिग्रीवाले फर्जी लोगों की भीड़ है। जिसके लिए कसमें वादे प्यार वफा सब बातें हैं और बातों का क्या! केजरी सर के लिए न तो कसमों का कोई मोल है,न ही पुराने साथियों का और न तो चुनावी वादों का ही। केजरी बाबू तो यही चाहते हैं कि उनके मन-मुताबिक फिर से भारत के संविधान का निर्माण हो जिसके अनुसार राबर्ट मुगाबे,किंग जोंग इल या सद्दाम हुसैन के चुनावों की तरह प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति पद के लिए सीधा चुनाव हो और उस चुनाव में राबर्ट मुगाबे,किंग जोंग इल या सद्दाम हुसैन के चुनावों की तरह केवल केजरी सर ही उम्मीदवार हों।
(हाजीपुर टाईम्स पर प्रकाशित)

शनिवार, 9 मई 2015

आज मेरे पास न बंगला है, न गाड़ी है, न बैंक बैंलेन्स है और न माँ है

मित्रों,आज की ही तरह पहले भी मैं यही मानता था कि माँ के कदमों के नीचे स्वर्ग होता है। जब भी दुर्गा सप्तशती का पाठ करता तो सबसे ज्यादा श्रद्धाभाव से इसी श्लोक का पाठ करता कि माता कुमाता न भवति। दीवार फिल्म को दर्जनों बार टीवी पर देखता और सोंचता कि मेरी माँ भी फिल्म की सुमित्रा की तरह ही कभी मेरा साथ नहीं छोड़ेगी। तब भी नहीं जब मेरे पास कुछ भी नहीं होगा लेकिन हुआ उल्टा। आज मेरे पास न बंगला है, न गाड़ी है, न बैंक बॅलेन्स है और माँ भी नहीं है। आज मेरे पास अगर कुछ है तो वो हैं मेरे यानि रवि के कोरे आदर्श। खुद को बदलकर पूरी दुनिया को रामराज्य में बदल देने का सपना। खुद विष पीकर दुनिया को अमरत्व प्रदान करने का शिवभाव।
मित्रों,बचपन में मैं भी अंधेरे से बहुत डरता था। डरकर आँखें बंदकर लेता और माँ के सीने से चिपक जाता। सोंचता कि चाहे कोई भी संकट हो मेरी माँ उस संकट को खुद पर झेल लेगी लेकिन मुझे बचा लेगी। जब भी बीमार होता और माँ एक मिनट के लिए भी आँखों से ओझल हो जाती तो छटपटाने लगता ठीक वैसे ही जैसे पानी से बाहर निकाल देने पर मछली छटपटाने लगती है। मेरी माँ ने मुझे दूध पिलाकर नहीं बल्कि अपना खून पिलाकर पाला। कुछ बड़ा हुआ तो देखा कि घर-परिवार के मामलों के चलते माँ-पिताजी में झगड़ा अक्सर झगड़ा होता। मैंने कभी पिताजी का पक्ष नहीं लिया बल्कि हमेशा माँ का पक्ष लिया। हाँ,एक मुद्दे पर मैंने कभी माँ का समर्थन नहीं किया और वो मुद्दा था दो नंबर के पैसे का मुद्दा। मेरी माँ को न जाने क्यों एक नंबर के पैसों से ज्यादा दो नंबर के पैसों से प्यार था। वो हमेशा पिताजी को गलत तरीके से पैसे कमाने के लिए उकसाती लेकिन तब तक मैं पिताजी की ही तरह आदर्शवादी हो चुका था और हमेशा कहता कि नहीं माँ पिताजी ठीक कर रहे हैं। भले ही मेरे पाँव में चप्पल हो या नहीं,मेरे जिस्म पर अच्छे कपड़े नहीं हों,होली में पुराने कपड़ों से काम चलाना पड़े,सिर्फ पर्व-त्योहारों में मिठाई खाने को मिले लेकिन मुझे अपने पिता के आदर्शवाद पर तब भी गर्व था और आज भी है।
मित्रों,जब 1982 में मेरा हाथ टूटा तो मुझसे ज्यादा दर्द मेरी माँ को हुआ,जब 1991 में मैंने माँ से अंतिम विदा ले ली और उसके पैरों पर सर पटककर फिल्मी स्टाईल में बेहोश हो गया तब मेरी माँ पागलों की तरह जहर खोज रही थी। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि आज माँ दीवार फिल्म के रवि को छोड़कर विजय के घर जा बैठी है। साथ ही,साथ न देने पर आत्महत्या कर लेने की धमकी देकर मेरे पिताजी को भी साथ ले गई है। उसी पिताजी को जो कभी मुझसे एक दिन भी दूर नहीं रह पाते थे और ऐसा होने पर उनकी हालत अयोध्यापति दशरथ जैसी हो जाती थी। उसी पिताजी को जो मुझसे फोन पर बात करते-करते रोने लगते थे। मैं तो राम बन गया लेकिन अब कौशल्या और दशरथ को कहाँ से लाऊँ।
मित्रों,जो माँ कभी मेरे ऊपर तीनों लोक न्योछावर करती थी मेरी शादी के बाद वो क्यों मेरे सुख में सुख और मेरे दुःख में दुःख का अनुभव नहीं करती? क्यों जब भी मैं ससुराल पत्नी से मिलने जाता तो मेरी माँ कहती कि दिन रहते जाओ और शाम होने से पहले वापस आ जाओ? क्यों मेरी माँ मेरी शादी के बाद मुझे एक मिठाई या एक मैगी खाते हुए भी नहीं देखना चाहती? मैं तो हमेशा वही करता रहा जो करने के लिए उसने कहा फिर आज वो क्यों मुझे देखना तक नहीं चाहती? क्या इसलिए क्योंकि मेरी माँ मुझे अब बेटा नहीं अपना गुलाम मानने लगी है? क्या इसलिए क्योंकि मेरी माँ को अपने पैसों का घमंड हो गया है? क्या इसलिए क्योंकि मेरी माँ नहीं चाहती थी कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊँ और उसकी गुलामी से मुक्त हो जाऊँ? क्या इसलिए क्योंकि मैं आज भी सच बोलता हूँ और प्यार का झूठा दिखावा नहीं करता बल्कि जो सच लगता है वही बोल देता हूँ? क्या इसलिए नहीं क्योंकि मेरी माँ का मानना था कि उसके पास पैसा रहेगा तो थक-हारकर बेटे-बहू की हाँ-में-हाँ मिलायेंगे ही और मैं जान दे सकता हूँ लेकिन हाँ-में-हाँ नहीं मिला सकता और तब तो हरगिज नहीं जब असत्यभाषण किया जा रहा हो या किसी तरह के अभिमान का प्रदर्शन किया जा रहा हो। मुझे याद है कि वर्ष 2007-08 में मेरी माँ के ऐसा कहने पर कि उसके पास पैसा होगा तो झक मारकर बहू प्यार करेगी ही मेरी छोटी बहन रूबी ने उसे चेताया था कि ऐसा नहीं होता है और नहीं होगा बल्कि कोई भी बहू व्यवहार को देखकर सास को पूजती है पैसे को देखकर नहीं।
मित्रों,यह सही है कि आज मैं अंधेरों से नहीं डरता बल्कि इंसानों के मन का अंधेरा मिटाने की कोशिश कर रहा हूँ। यह भी सही है कुछ ही दिनों में मेरे कारोबार से पैसा आना शुरू हो जाएगा लेकिन फिर भी माँ की कमी तो हमेशा रहेगी। आज भले ही रवि के पास बंगला, गाड़ी और बैंक बैंलेन्स नहीं है लेकिन कल होगा जरूर लेकिन शायद तब भी उसके पास माँ नहीं होगी और न ही पिताजी होंगे क्योंकि उन दोनों को विजय की झूठ,फरेब और धोखे की दुनिया कहीं ज्यादा रास आ रही है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 7 मई 2015

आपका कानून और आपकी अदालत आज भी अमीरों की रखैल है,मी लॉर्ड!

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आज से लगभग 100 साल पहले जिन दिनों हमारा देश अंग्रेजों का गुलाम था महात्मा गांधी ने भारत के कानून और अदालतों के बारे में गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ये दोनों ही दुर्भाग्यवश अमीरों की रखैल बनकर रह गई हैं। और दुर्भाग्यवश हमें आज भी,आजादी के 70 साल बाद भी अपने आलेख में यह कहना पड़ रहा है कि आज भी हमारे देश में दो तरह के कानून हैं-एक अमीरों के लिए और दूसरे गरीबों के लिए। हमारी अदालतों का रवैया भी अमीरों और गरीबों के लिए अलग-अलग दो तरह का है।
मित्रों,हम सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दत्तू साहब के शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने 27 नवंबर,2014 को बिना किसी लाग-लपेट के स्वीकार किया कि भारत की न्याय-प्रणाली गरीब और कमजोरविरोधी है लेकिन हमें 13 फरवरी,2015 को यह देखकर तब भारी दुःख हुआ जब इन्हीं दत्तू साहब की खंडपीठ ने तीस्ता शीतलवाड़ को जेल जाने से बचाने के लिए कपिल सिब्बल से फोन पर बात करने के दौरान ही फोन पर ही याचिका स्वीकार करते हुए फोन पर ही यह आदेश सुना दिया कि तीस्ता शीतलवाड़ की गिरफ्तारी पर हम रोक लगाते हैं।
मित्रों,दत्तू साहब ने न्यायपालिका की बीमारी तो बता दी लेकिन किया वही जिसको करने से बीमार की हालत और भी गंभीर होती हो। सवाल उठता है कि जब चीफ जस्टिस का रवैया ऐसा है तो कौन करेगा न्यायपालिका का ईलाज? कौन न्याय-प्रणाली को कमजोर और गरीबपरस्त बनाएगा।
मित्रों,इसी तरह कल भी वॉलीबुड अभिनेता सलमान खान को सजा मिलने के चंद घंटों के भीतर ही बंबई हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करके,सुनवाई करके जमानत दे दी। सजा मिलने में जहाँ 13 साल लग गए वहीं जमानत मिलने में 13 घंटे भी नहीं लगे। सवाल उठता है कि देश के सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जो 11 लाख मुकदमे लंबित हैं उनपर भी इसी तरह तात्कालिकता क्यों नहीं दिखाई जाती? क्यों एक आम आदमी को दशकों तक कहा जाता है कि अभी आपके मुकदमें का नंबर नहीं आया है और किसी रसूखदार लालू,माया,तीस्ता या सलमान के मामले की सुनवाई तमाम लाइनों को तोड़कर तत्काल कर ली जाती है?
मित्रों,कल जब सलमान खान को सजा सुनाई गई तो हमें खुशी हुई कि आखिर अदालत ने 13 साल की देरी के बाद भी यह तो साबित कर ही दिया कि कानून के समक्ष क्या अमीर क्या गरीब,क्या रामदेव और क्या रमुआ सभी एक समान हैं लेकिन कुछ ही घंटों के बाद हाईकोर्ट ने हमारे सभी भ्रमों को तोड़ते हुए गांधी जी द्वारा एक शताब्दी पहले की गई शिकायत को ही उचित ठहरा दिया। सवाल उठता है कि ऐसा कब तक चलेगा? कब तक पुलिस,सीबीआई,कानून और अदालतें चांदी के सिक्कों की खनखनाहट पर थिरकते रहेंगे? कब और कैसे कानून और अदालतें गरीबपरस्त होंगे? शायद कभी नहीं!!!

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 3 मई 2015

मोदी सरकार में कुछ तो गड़बड़ है

मित्रों,केंद्र में मोदी सरकार कुछ ही दिनों में अपना एक साल पूरा करने जा रही है। इस अवधि में सरकार ने कई उपलब्धियाँ प्राप्त कीं मगर सवाल उठता है कि क्या वे उपलब्धियाँ जनता की आकांक्षाओं पर पूरी तरह से पूरा कर पाईँ या कहीं-न-कहीं उम्मीद से कम रहीं। विदेशों में तो मोदी सरकार की खूब धूम रही लेकिन देश में वही धूम देखने को क्यों नहीं मिल रही है? पहले दिल्ली विधानसभा,फिर प. बंगाल निकाय चुनाव और अव यूपी के उपचुनावों में पार्टी का प्रदर्शन क्यों शर्मनाक रहा? अगर इसी तरह से राज्यों में भाजपा का फ्लॉप शो चलता रहेगा तो फिर कैसे पार्टी को राज्यसभा में बहुमत प्राप्त होगा?
मित्रों,इसका सीधा मतलब है कि मोदी सरकार जिस तरह उम्मीदों के पहाड़ चढ़कर सत्ता में आई थी उनको पूरा कर पाने में कहीं-न-कहीं कोई-न-कोई त्रुटि रह गई। यह त्रुटि नीतिगत स्तर पर तो है ही नीयत के स्तर पर भी है। हमने सरकार गठन के समय ही सरकार में दागियों को शामिल करने पर सवाल खड़े किए थे लेकिन तब कहा गया था कि इनके ऊपर कड़ा अंकुश रखा जाएगा। कोई भी संसदीय प्रणाली में कोई भी सरकार वास्तव में वन मैन शो बनकर अच्छा काम कर ही नहीं सकती। सरकार चलाना एक टीम वर्क था,है और रहेगा। इसलिए अच्छे प्रदर्शन के लिए अच्छी और योग्य लोगों की टीम का होना जरूरी है। नरेंद्र मोदी कोई सुपरमैन नहीं हैं कि अकेले सारे मंत्रालयों की फाइलें रोजाना चेक कर लेंगे और उन पर निर्णय भी ले लेंगे। इसलिए मंत्रालयों में ईमानदार,भरोसेमंद और कर्मठ मंत्रियों का होना जरूरी है। कुछ इसी तरह के प्रयोग बिहार में नीतीश कुमार ने भी किया था और लंबे समय तक एक साथ 18 विभागों के मंत्री रहे थे लेकिन परिणाम क्या हुआ यह सारी दुनिया जानती है।
मित्रों,इसलिए नरेंद्र मोदी जी को चाहिए कि वे अपने मंत्रिमंडल की समीक्षा करें और नकारा मंत्रियों को बाहर निकालकर वास्तव में जो लोग ईमानदार,कर्मठ और देशभक्त हैं उनको मंत्री बनाएँ। मोदी सरकार की दूसरी कमजोरी मेरे हिसाब से रही है भ्रष्टाचार के मामले में कड़क और जीरो टॉलरेंस की नीति का पालन नहीं कर पाना। यह सही है कि मोदी सरकार के एक साल के कार्यकाल में भ्रष्टाचार का कोई भी मामला सामने नहीं आया है लेकिन सच यह भी है कि अभी भी ईमानदार अधिकारियों को परेशान किया जा रहा है। अशोक खेमका को तो हरियाणा की भाजपा सरकार ने भी स्थानान्तरित कर दिया। अभी कल ही भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठानेवाले कर्नाटक के वरिष्ठ आइएएस एमएन विजय कुमार को केंद्र सरकार की सहमति से राज्य सरकार ने जबरिया रिटायर कर दिया। इस तरह के कदमों से भ्रष्टाचार घटेगा नहीं बल्कि बढ़ेगा मोदी सरकार को यह समझना होगा। ईमानदार अधिकारियों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए न कि दंडित।
मित्रों,फिर,भ्रष्टाचार के मामले में भाजपाशासित पंजाब, छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश और राजस्थान में स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं है। मोदी अपने इन क्षत्रपों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार पर कैसे अंकुश लगाएंगे अभी तक स्पष्ट नहीं है। मोदी कहते हैं कि सभी तरह की सब्सिडियों को सीधे लाभान्वितों के खातों में डाला जाएगा लेकिन ऐसा कब तक होगा कोई नहीं बताता। बैंक अधिकारी हों या प्रशासनिक अधिकारी बिना घूस लिए वे किसानों,छात्रों या अन्य ऋण के ईच्छुक लोगों का कोई काम नहीं करते हैं इस पर मोदी सरकार कैसे पूर्ण विराम लगाएगी? क्या ऋण देने की प्रक्रिया को ऑनलाईन नहीं किया जा सकता? सच्चाई तो यह है कि किसानों को केसीसी के जरिए मिलने वाले लाभ या सब्सिडी का एक बड़ा हिस्सा रिश्वत की भेंट चढ़ जाता है। इसी तरह आंगनबाड़ी,मध्याह्न भोजन योजना और मनरेगा के दी जानेवाली राशि का आधा से भी ज्यादा बड़ा हिस्सा मोदी सरकार के एक साल हो जाने के बाद भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। जनवितरण प्रणाली तो भ्रष्टाचार की नाली बनी हुई है ही। आज भी कोई युवा नए उद्यम स्थापित करने से घबराता है क्योंकि बिना रिश्वत लिए ऋण नहीं मिलता और अगर सब्सिडी है भी तो सरकारी सब्सिडी घूस देने में ही चली जाती है।
मित्रों,हमने मोदी सरकार के गठन के समय ही कहा था कि भारत की जनता को मोदी सरकार से कोशिश नहीं चाहिए बल्कि परिणाम चाहिए। कोशिशें जनता ने बहुत देख लीं और अब इंतजार की हद की भी हद हो चुकी है। सरकार काम करे,परिणाम दे और तेजी से परिणाम दे। यह सही है कि मोदी सरकार यह दिखाना चाहती है कि वो कालाधन को विदेशों से वापस लाने के लिए प्रयासरत है लेकिन जनता को प्रयास नहीं चाहिए बल्कि जनता तो यह जानना चाहती है कि पिछले एक साल में कितना कालाधन विदेश से भारत में वापस लाया गया? फिर भले हीं भारत के हर व्यक्ति के खाते में 15-पन्द्रह लाख रुपये डाले नहीं जाएँ या भले ही करदाताओं को कर देने से कुछ दिनों के लिए मुक्ति न मिले लेकिन देश के खजाने में तो पैसा वापस आए। साथ ही मोदीजी को और उनकी मंडली को यह भी समझ लेना होगा कि राजनीति में जुमले नहीं चलते इसलिए भाषण देते समय जुमलों से बचना चाहिए। इसी तरह मोदी सरकार के एक मंत्री जितेंद्र सिंह ने सरकार गठन के तत्काल बाद कहा कि धारा 370 पर पुनर्विचार किया जाएगा और अब कुछ ही दिन पहले वही मंत्री संसद में कहते हैं कि धारा 370 पर पुनर्विचार की सरकार की कोई योजना नहीं है। अगर यही करना था तो फिर सालभर पहले इस संबंध में सनसनीखेज बयान देने की क्या आवश्यकता थी? इसी तरह नरेंद्र मोदी ने खुद ही लोकसभा चुनावों के समय कहा था कि बांग्लादेशी घुसपैठी बोरिया-बिस्तर बांध लें लेकिन अब तक ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा। शायद यह भी एक वजह है कि भाजपा को नगरीय निकाय चुनावों में प. बंगाल में धूल चाटनी पड़ी है जबकि वह वहाँ सरकार गठन के सपने देखने लगी थी। इसी तरह सैनिकों और पूर्व सैनिकों को भी मोदी सरकार के एक साल पूरा कर लेने के बाद भी एक रैंक एक वेतन और पेंशन का इंतजार है।
मित्रों,मोदी सरकार का सबसे ज्यादा नुकसान पिछले एक साल में अगर किसी ने किया है तो वो लोग हैं मोदी के सबसे बड़े कथित हितचिंतक बड़बोले नेता। चाहे वो आदित्यनाथ हों या साक्षी महाराज या फिर गिरिराज सिंह या साध्वी निरंजना ये लोग रह-रहकर ऐसी भाषा का प्रयोग करते रहते हैं जिसको किसी भी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता। सरकार को चाहिए कि अपनी इस लगातार विषवमन करनेवाली मंडली की जुबान पर ताला लगाए फिर चाहे इसके लिए उनको कितने ही सेंटर फ्रेश क्यों न खिलाना पड़े। इसी तरह कई बार मोदी जी अपने इन हितचिंतकों की बकवास पर पूरी तरह से चुप्पी लगा जाते हैं वो भी कुछ इस तरह कि कई मर्तबा तो गुमाँ हो जाता है कि क्या अभी भी मनमोहन सिंह ही भारत के प्रधानमंत्री हैं?
मित्रों,एक गलती मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण बिल और कृषकों के मामले में भी की है। भूमि अधिग्रहण विधेयक के मामले को इतना लंबा खींचने की आवश्यकता ही नहीं थी। दोबारा अध्यादेश लाने की तो कतई जरुरत नहीं थी जबकि उसको पता है कि उसका राज्यसभा में बहुमत नहीं है। अब अगर विपक्ष ने विधेयक को फिर से राज्यसभा में पारित नहीं होने दिया तो क्या वो तीसरी बार अध्यादेश लाएगी? बल्कि सरकार को चाहिए था कि वो शुरू में ही संसद का संयुक्त सत्र बुलाती और विधेयक को पारित करवा लेती। सरकार की दूसरी विफलता यह है कि वो हताश-निऱाश हो चुके किसानों के मन में आशा का संचार नहीं कर पाई है। कृषि को अगर लाभकारी बनाना है तो उत्पादकता में क्रांतिकारी बढ़ोतरी करनी होगी ही साथ ही कृषि पर से जनसंख्या के भार को भी कम करना होगा और ऐसा तब तक संभव नहीं है जबतक कि देश में बड़े पैमाने पर छोटे-बड़े उद्योग-धंधों की स्थापना नहीं की जाती और उद्योग-धंधों की बड़े पैमाने पर तब तक स्थापना नहीं हो सकती जब तक कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को संभव न बना दिया जाए। वर्तमान कानून जो 2013 में बना था के तहत तो भूमि-अधिग्रहण कर पाना लगभग असंभव ही कर दिया गया है। मैं यह नहीं कहता कि जनता से जबर्दस्ती जमीन छीन ली जाए लेकिन स्थिति ऐसी भी नहीं हो कि विकास-कार्यों के लिए जमीन प्राप्त कर पाना नितांत असंभव ही हो जाए। मोदी सरकार को यह समझना होगा कि देश के युवा प्रतीक्षा कर पाने की स्थिति में कतई नहीं हैं इसलिए मेक इन इंडिया पर काम तेजी से और तुरंत होना चाहिए। बार-बार भूमि-अधिग्रहण अध्यादेश लाना सिर्फ समय की बर्बादी है और इसके अलावा और कुछ नहीं क्योंकि अब तक इस कानून को बन जाना चाहिए था और मेक इन इंडिया का काम पूरे जोर-शोर से शुरू हो जाना चाहिए था।
मित्रों,इसके साथ ही गांव-गांव में अनाज गोदामों,शीतभंडार गृहों की व्यवस्था भी करनी होगी और कृषि के क्षेत्र से बिचौलियों को समाप्त करना होगा तभी किसानों को उनके उत्पादों का उचित मूल्य मिल पाएगा और उपभोक्ताओं को भी महंगाई से स्थायी रूप से निजात मिलेगी। साथ ही अगर हो सके तो कृषि और कृषि संबंधी कार्यों में केंद्र सरकार के दखल को बढ़ाना होगा क्योंकि देखा जाता है राज्य सरकार के मातहत काम करनेवाला भ्रष्ट प्रशासन केंद्र सरकार के सद्प्रयासों को असफल कर देता है। आज ही यूपी में एक किसान की उस समय हृदयगति रूक जाने से लेखपाल के दरवाजे पर ही मौत हो गई जब उस प्राकृतिक आपदा के मारे किसान से लेखपाल ने मुआवजे का चेक देने के बदले रिश्वत की मांग कर दी।

मित्रों,इसी तरह से भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दत्तू साहब ने यह कह तो दिया है कि मुकदमों के निबटारे के लिए समय-सीमा का निर्धारण किया जाएगा लेकिन ऐसा तब तक संभव नहीं होगा जब तक राज्य सरकारें और केंद्र सरकार इस दिशा में सहयोग नहीं करतीं। अच्छा होता कि नया कानून बनाकर अधीनस्थ न्यायालयों में नियुक्ति को भी केंद्र या सर्वोच्च न्यायालय के जिम्मे कर दिया जाता। साथ ही न्यायालयों में जो प्रक्रियागत देरी होती है को भी रोकना होगा और प्रक्रिया को सरल करना होगा। इस दिशा में भी मोदी सरकार ने पिछले एक साल में कुछ नहीं किया है।

मित्रों,तीसरी बात कि मोदी जी बार-बार कौशल-विकास पर जोर दे रहे हैं लेकिन देश की सच्चाई क्या है? जब तक अवसर पैदा नहीं किया जाएगा तब तक कुशलता प्राप्त लोगों को योग्यतानुसार वेतन पर नौकरी मिलेगी कैसे? नरेंद्र मोदी बार-बार वैश्विक स्तर पर डॉक्टरों,इंजीनियरों की कमी का जिक्र करते हैं लेकिन हम तब तक दुनिया को अच्छे डॉक्टर और इंजीनियर नहीं दे सकते जब तक हम हमारी शिक्षा-प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन नहीं करें या फिर सरकारी शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण और विश्वस्तरीय न कर दें। हम भारत को तब तक विश्वगुरू नहीं बना सकते जब तक देश में शोध और अनुसंधान का माहौल नहीं बनेगा। क्या कारण है कि हमारे देश में नोबेल जीतने लायक वैज्ञानिक खोज नहीं हो पा रही है या विश्वस्तरीय शोध-अनुसंधान नहीं पा रहे हैं?
मित्रों,अंतिम बात यह कि मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी को राज्यों में गलत लोगों के साथ गठबंधन करने से बचना चाहिए था। भाजपा ने पहले महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ और बाद में जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन करके भयंकर गलती की है। शिवसेना बराबर बेलगाम बयान देती रहती है तो पीडीपी अलगाववादियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपना रही है जिससे भाजपा के साथ-साथ मोदी सरकार की भी फजीहत हो रही है। इससे तो अच्छा रहता कि जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन ही रहता।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

किसानों के नाम पर राजनीति और किसानी की समस्याएँ

मित्रों,इन दिनों भारत देश की राजनीति अजीबोगरीब स्थिति से गुजर रही है। पूरा का पूरा विपक्ष एकजुट होकर किसान नाम केवलम् का जाप कर रहा है और केंद्र सरकार पर किसान विरोधी होने के आरोप लगा रहा है। जबकि वास्तविकता यह है कि आप जो पार्टियाँ विपक्ष में हैं यह उनकी ही करनी का परिणाम है कि आज किसानों को जीवन जीना कठिन और मौत को गले लगा लेना आसान लगने लगा है। आज खेती-किसानों की जो हालत है वह आज अचानक पैदा नहीं हुई बल्कि आजादी के बाद से ही धीरे-धीरे पैदा हुई,पिछले 60 सालों में पैदा हुई। केंद्र सरकार कह रही है और संसद में कह रही है कि विपक्ष हमें सुझाव दे,हम उस पर विचार करेंगे लेकिन विपक्ष सुझाव देने के बदले केंद्र के खिलाफ सिर्फ नारेबाजी किए जा रही है।
मित्रों,सवाल उठता है कि शोर-शराबे,नारेबाजी और बकवास भाषणबाजी करने से ही क्या किसानों का भला हो जाएगा? आज अमेरिका में 2 फीसदी जनसंख्या खेती-किसानी पर निर्भर है तो वहीं भारत में 65 फीसदी। आजादी के 70 साल बाद भी ये आँकड़े क्यों नहीं बदले? क्यों जो खेती आजादी के समय सबसे उत्तम व्यवसाय मानी जाती थी आज मजबूरी का पर्यायवाची बन गई है? इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं? आजादी के बाद कौन लोग और दल सत्ता में रहे? किसानों की दुरावस्था के लिए किन पार्टियों और नेताओं की नीतियाँ जिम्मेदार हैं?
मित्रों,राजनीति तो इस बात को लेकर होनी चाहिए कि किसानों की समस्याएँ क्या हैं और उनका समाधान क्या हो सकता है? लेकिन राजनीति हो रही है कि कैसे किसानों की समस्याएँ जस-की-तस बनी रहें और कैसे किसानों को बरगलाकर,उनके हितैषी होने का दिखावा करके उनके वोट प्राप्त किए जाएँ। कोई जंतर-मंतर पर किसान से फाँसी लगवाकर तालियाँ बजा रहा है तो कोई पूर्व में देश को बेचने में सबसे आगे रह चुका नेता जेनरल बोगी में यात्रा करके खुद को किसानों का सच्चा हमदर्द साबित करने में लगा हुआ है। लेकिन इस बात पर कोई भी विपक्षी दल विचार नहीं कर रहा कि किसानों की असल या मौलिक समस्याएँ क्या हैं और उनका समाधान क्या हो सकता है। तो क्या सिर्फ कोरी नारेबाजी और घड़ियाली आँसू बहानेभर से किसानों का भला हो जाएगा? हमें इस बात पर भी विचार करना होगा कि पिछले 60 सालों में जनसंख्या बढ़ने से किसानों के पास प्रति परिवार जोत का आकार काफी कम हो गया है,इतना कम कि उतनी जमीन से एक परिवार का पेट नहीं भरा जा सकता। राहुल गांधी कहते हैं कि भविष्य में कृषि-भूमि का मूल्य सोने का बराबर हो जाएगा। अगर ऐसा भविष्य में हो सकता है तो अब तक क्यों नहीं हुआ? क्यों 4 गुना 5 फीट की 'लोहे' की दुकान में बैठा आदमी 'सोना' हो गया और 5 बीघा सुनहरी फसलों में खड़ा किसान 'मिट्ठी' हो गया?
मित्रों,भारत के सामने इस समय दो ही रास्ते हैं। पहला यथास्थितिवाद का रास्ता है कि जैसी हालत है वैसी ही बनी रहे और दूसरा रास्ता है विकास का कि खेती पर से कैसे जनसंख्या का भार कम किया जाए। कैसे भारत को दुनिया की फैक्ट्री बनाया जाए,कैसे भारत के युवाओं को रोजगार मिले,कैसे किसानों के युवा पुत्रों को योग्यतानुसार काम मिले,कैसे खेती को लाभकारी व्यवसाय में बदला जाए,कैसे सरकार और राजनीतिज्ञों के प्रति किसानों के मन में विश्वास पैदा किया जाए जिससे वे आत्महत्या के मार्ग पर न जाएँ।
मित्रों,केंद्र सरकार सुझाव मांग रही है और पूरा भरोसा भी दे रही है कि वह विपक्ष के सुझावों पर अमल करेगी लेकिन विपक्ष है कि चाहती ही नहीं कि किसानों का भला हो,किसानी का भला हो। अच्छा होता कि विपक्ष सरकार के साथ बैठकर इस बात पर विचार करती कि अतीत में जो भी सरकारें सत्ता में रही हैं उनकी कृषि-नीतियों में कहाँ-कहाँ, कौन-कौन-सी गलतियाँ हुईं और उनका परिमार्जन किस तरह से इस प्रकार किया जाए कि कृषि फिर उत्तम खेती हो जाए,सबसे ज्यादा लाभकारी व्यवसाय हो जाए। आजादी के सत्तर साल बाद भी किसान क्यों सिंचाई के लिए बरसात पर निर्भर है? इस दिशा में केंद्र की प्रधानमंत्री सिंचाई योजना किस तरह से फायदेमंद हो सकती है या फिर इस योजना में कौन-कौन से सुधार किए जाने की आवश्यकता है? पानी का ज्यादा-से-ज्यादा संरक्षण कैसे संभव हो जिससे कि जरुरत के दिनों में पानी की कमी नहीं हो? कृषि की ऐसी कौन-सी विधियाँ हैं जिससे कम पानी में ज्यादा पैदावार प्राप्त हो सकती हैं? गांव-गांव में कृषि-आधारित उद्योगों की स्थापना कैसे हो? मृदा का संरक्षण कैसे हो और केंद्र सरकार की स्वायल हेल्थ कार्ड योजना इस दिशा में किस तरह लाभकारी सिद्ध हो सकती है? आदि-आदि। लेकिन विपक्ष सरकार के साथ खेती-किसानी की समस्याओं के समाधान में सहयोग करने की बात तो दूर ही रही साथ बैठकर समस्या पर विचार तक करने को तैयार नहीं है।
मित्रों,अगर आपने कजरारे-कजरारे वाली 'बंटी और बबली' फिल्म देखी होगी तो आपको याद होगा कि उसके एक दृश्य में बंटी अभिषेक बच्चन ताजमहल का सौदा करके एक विदेशी जोड़े को ठगता है। वो कुछ भाड़े के नेता टाईप लोगों को कुछ पैसे देता है और असली मंत्री की कार के आगे उनसे नारेबाजी करवा देता है। भाड़े के नेता नारेबाजी करते हैं कि हमारी मांगें पूरी हों चाहे जो मजबूरी हो। मंत्री कार से उतरकर पूछती है कि आपकी मांगें क्या हैं तो वे मांग नहीं बताते बल्कि वही नारा दोहराते रहते हैं कि हमारी मांगें पूरी हो चाहे जो मजबूरी है। इस बीच बंटी बबली रानी मुखर्जी को मंत्री बनाकर मंत्रालय में बैठा देता है और विदेशी जोड़े से मोटी रकम हासिल करके फरार हो जाता है।
मित्रों,कुछ ऐसा ही भाड़े के नेताओं जैसा काम इन दिनों विपक्ष कर रहा है। केंद्र सरकार कह रही है कि आपकी क्या मांगें हैं और उनका क्या समाधान हो सकता है पर आईए मिल-बैठकर विचार करते हैं लेकिन विपक्ष कुछ भी नहीं सुन रहा है और लगातार सिर्फ नारेबाजी करता जा रहा है। दरअसल विपक्ष भी बंटी और बबली फिल्म के नारेबाजों की तरह समस्या का समाधान नहीं चाहता बल्कि सरकार का मार्ग अवरूद्ध करना चाहता है,विपक्ष चाहता है कि सरकार काम नहीं कर पाए,देश का विकास नहीं कर पाए जिससे फिर से सत्ता पर उनका कब्जा हो सके,बस।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

राहुल जी निराश मत होईए,आपका जवाब हम देई देते हैं

मित्रों,आज कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जी काफी खुश हैं और काफी दुःखी भी। आप कहेंगे ऐसा कैसे हो सकता है तो फिर आप राहुल जी को नहीं जानते हैं। वे स्थिरबुद्धि हैं इसलिए एकसाथ ऐसा कर लेते हैं। माननीय युवराज जी इस बात से काफी खुश हैं कि उन्होंने जिन्दगी में पहली बार अच्छा भाषण किया है। वैसे यह मुगालता उनको हर बार हो जाता है जब-जब वे भाषण करते हैं लेकिन कुछ ही समय बाद दूर भी हो जाता है। खैर श्री गांधी को इस बात से भारी सदमा लगा है कि भाजपा नेतागण उनकी बातों का सही-सही जवाब नहीं दे पाए। पता नहीं उनकी दृष्टि में सही जवाब क्या हो सकता है।
मित्रों,चूँकि मुझसे श्री गांधी का दुःख देखा नहीं जा रहा है इसलिए हमने फैसला किया है कि राहुल जी की बातों और उनके सवालों का जवाब हम ही दे देते हैं। वैसे हम न तो सांसद हैं और न ही नेतारूपी अभिनेता लेकिन हमारी आदत रही है अनाधिकार चेष्टा करने की। सो हम इस बात की बिना परवाह किए कि किसी को हमारी चेष्टा से दुःख हो सकता है हम राहुल गांधी जी का दुःख दूर कर देते हैं। आखिर परोपकार भी तो कोई चीज होती है।
मित्रों,हमारे राहुल जी का कहना है कि मोदी सरकार सूट-बूटवालों की सरकार है। राहुल जी कितने बड़े पाखंडी हैं जो उनको यह पता ही नहीं है कि भारत को सबसे ज्यादा नुकसान खादी के बने सस्ते कपड़े पहननेवालों ने पहुँचाया है। उनके पिताजी के नानाजी भी खादी ही पहनते थे लेकिन उनका कपड़ा पेरिस से धुलकर आता था। आज भारत में सबसे ज्यादा कालाधन अगर किसी के पास है तो वे खादीवाले ही हैं।
मित्रों,राहुल जी ने निश्चित रूप से स्वामी विवेकानंद के संस्मरण नहीं पढ़े हैं अन्यथा वे कपड़ों की बात ही नहीं करते। हुआ यूँ था कि जब विवेकानंद जी पहली बार अमेरिका की यात्रा पर गए तो उनके गेरूए वस्त्र को देखकर अमेरिकी हँस पड़े। तब स्वामी जी ने पूरी विनम्रता के साथ अमेरिकियों से पूछा कि आपके यहाँ व्यक्ति की पहचान क्या उनके कपड़ों से निर्धारित होती है उनके कर्म से नहीं? राहुल जी को भी नरेंद्र मोदी के कपड़ों को नहीं उनके कर्मों को देखना चाहिए। नरेंद्र मोदी तो ऐसी शख्सियत हैं कि जो अपने कपड़े तक को नीलाम कर देते हैं और प्राप्त धनराशि को सरकारी खजाने में जमा कर देते हैं। नरेंद्र मोदी राहुल जी की तरह पाखंडी नहीं हैं कि खादी पहनकर चांदी के बरतन में भोजन करें या चांदी की पलंग पर सोयें बल्कि वे तो पूर्ण योगी हैं,ज्ञान योगी,कर्म योगी और राज योगी भी। साथ ही राहुल जी को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि मोदी जी के देश-विदेश में सूट पहनने से भारत को लाभ हो रहा है या हानि हो रही है? वास्तविकता तो यह है कि मोदी जी के सूट पहनने या शॉल ओढ़ने से भारत के उस वस्त्रोद्योग को बढ़ावा मिलता है जो आज भारत के सबसे ज्यादा श्रमिकों को रोजगार दे रहा है।
मित्रों,वास्तविकता तो यह है कि मनमोहन सिंह की सरकार असली सूट-बूटवालों की सरकार थी जिसमें कौन संचार मंत्री बनेगा का फैसला रतन टाटा,मुकेश अंबानी,नीरा राडिया और बरखा दत्त करते थे न कि मोदी की सरकार सूट-बूटवाली है जिसके समय सहारा श्री तिहाड़ जेल की शोभा बढ़ा रहे हैं,मुकेश अंबानी पर जुर्माना हो रहा है,वोडाफोन परेशान है,विजय माल्या बेहाल है आदि-आदि। मोदी की सरकार तो गरीबों की सरकार है जिसकी सारी नीतियाँ और कार्यक्रम गरीबों की भलाई के लिए हैं।
मित्रों,इसी तरह राहुल जी नितिन गडकरी के बयान को भी अपने भाषण में उद्धृत किया है लेकिन उन्होंने ऐसा करते हुए थोड़ी-सी धूर्तता भी की है। उन्होंने गडकरी जी के बयान को संदर्भ से काटकर पेश किया है। गडकरी जी ने न सिर्फ यह कहा था कि किसानों की मदद न तो सरकार ही कर सकती है और न तो भगवान ही बल्कि यह भी कहा था कि उनकी सरकार चाहती है कि किसानों आर्थिक रूप से इतने सक्षम हो जाएँ कि उनको न तो भगवान और न ही सरकार का आसरा ही करना पड़े बल्कि वे हर तरह की क्षति को खुद अपने बल पर झेल सकें। राहुल जी क्या बताएंगे कि गडकरी जी ने क्या गलत कहा था? आज किसान अगर फसल खराब होने पर आत्महत्या करने को बाध्य हो रहे हैं तो यह कोई 14 महीने में पैदा हुई स्थिति नहीं है बल्कि 70 सालों में किसानों को इतना विपन्न बना दिया गया है कि उनको अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा है। 70 साल पहले कहा जाता था उत्तम खेती,मध्यम बान,अधम चाकरी भीख निदान। क्यों आज यह कहावत उल्टी हो गई है? क्यों आज भी किसान सिंचाई के लिए रामभरोसे है? क्यों आज किसान खेती करना नहीं चाहता? क्या 14 महीने पहले किसानों की स्थिति अच्छी थी? गुजरात के किसानों की जमीन अगर मोदी सरकार ने जबरन छीना था तो वहाँ के किसानों ने कभी विरोध क्यों नहीं किया? कल की राहुल की रैली में कितने ऐसे किसान थे जो गुजरात से आए थे? गुजरात के किसानों की स्थिति बाँकी राज्यों के किसानों से अच्छी क्यों है?
मित्रों,क्या राहुल जी यह नहीं जानते हैं कि कृषि राज्य सूची का विषय है? किस किसान की कितनी फसल खराब हुई इसका सर्वेक्षण करवाना संवैधानिक रूप से किसका काम है केंद्र की सरकार का या राज्य की सरकार का? केंद्र सरकार तो बार-बार राज्य सरकारों से इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट मांग रही है। अगर राज्य सरकारें इस काम को गंभीरता से नहीं ले रही हैं तो इसके लिए दोषी कौन है राज्य सरकार या नरेंद्र मोदी? हाँ,अगर राज्य सरकार की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार मुआवजा नहीं देती है तो जरूर वह दोषी होगी लेकिन केंद्र तो पैसे राज्य सरकारों को ही दे सकती है। फिर भी बाँटना तो राज्यों की सरकारों को ही है। अगर बाँटने में भ्रष्टाचार होता है और मुआवजे को तंत्र सोख जाता है तो फिर दोषी कौन होगी राज्य की या केंद्र की सरकार?
मित्रों,हमारे राहुल जी को इस बात का भी दुःख है कि मोदीजी किसानों से मिलने नहीं गए। क्या किसानों का भला करने के लिए सिर्फ उनसे मिल लेना ही काफी होगा? हमारा उद्देश्य किसानों से मिलना होना चाहिए या उनके दुःखों का निवारण करना? क्या उनकी समस्याओं को उनके खेतों में गए बिना दूर नहीं किया जा सकता है? अगर नहीं तो पिछले 70 सालों में किसानों की हालत दिन-ब-दिन खराब क्यों होती चली गई जबकि 65 सालों तक कांग्रेस या कांग्रेस के समर्थन से बनी सरकार केंद्र में सत्ता में थी? क्या राहुल जी द्वारा लीलावती-कलावती की झोपड़ी में रात गुजारने से देश की गरीबी दूर हो गई? क्या राहुलजी बताएंगे कि आजादी के 70 साल बाद भी अगर भारत की 65 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है तो इसके लिए कौन सबसे ज्यादा जिम्मेदार है? भारत के कृषि मंत्री आसमानी आपदा के आने के बाद से ही प्रत्येक राज्य का दौरा कर रहे हैं। राज्यों के मुख्यमंत्रियों,मंत्रियों और अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे हैं। भारत के गृहमंत्री खेतों में जाकर स्वयं बालियों से दानों को निकालकर देख रहे हैं। क्या पीएम को उन्होंने अपनी रिपोर्ट नहीं दी होगी? फिर मोदी जी को हर खेत पर जाने की क्या आवश्यकता है? क्या पीएम के हर खेत का दौरा कर लेने मात्र से ही किसानों की समस्त समस्याओं का समाधान हो जाएगा? या इसके लिए इस तरह की योजनाएँ बनानी पड़ेंगी या संजीदगी से लागू करनी पड़ेगी कि खेती फिर से गुलाम भारत की तरह भारत का सबसे उत्तम व्यवसाय हो जाए? और हम समझते हैं कि मोदी सरकार इसी दिशा में काम भी कर रही है।
मित्रों,सत्ता और विपक्ष में से कौन किसानों की तरफ है और कौन वाड्रा की तरफ यह राहुल जी को बताने की कोई आवश्यकता नहीं है। आँकड़े गवाह हैं कि किसानों की सबसे ज्यादा जमीन पिछले दिनों हरियाणा में कांग्रेस की सरकार ने ही छीनी है। जमीन का अधिग्रहण होने बाद भी जमीन का मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा न कि उद्योगपतियों के पास। किसानों और गरीबों के नाम की माला जपते-जपते मुँह में राम बगल में छुरी को चरितार्थ करनेवाले कांग्रेसियों ने किसानों और गरीबों की हालत कितनी चिंताजनक बना दी यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। मोदी जी ने पहली बार किसानों की मूल समस्या को पकड़ा है और वह है सिंचाई के साधन नहीं होना और फसल का उचित मूल्य नहीं मिलना। इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री सिंचाई योजना शुरू की है और कहा है कि हम किसानों को उसकी लागत से ड्योढ़ा दाम देंगे।
मित्रों,राहुल जी और पूरा विपक्ष परेशान है कि मोदी इतनी विदेश-यात्रा क्यों करते हैं तो उनको पता होना चाहिए कि मोदी विदेश भी गए थे तो देश के लिए ही न कि छुट्टियाँ मनाने या गुप्त-यात्रा पर गए थे।

मित्रों,लगता है कि राहुलजी ने अभी तक नरेंद्र मोदी को पीएम के रूप में स्वीकार नहीं किया है तभी तो वे कभी मनमोहन सिंह को पीएम कह जाते हैं तो कभी कहते हैं कि आपके पीएम जबकि उनको कहना चाहिए था हमारे पीएम,देश के पीएम।
मित्रों,हम अंत में राहुल जी को बता देते हैं कि मोदी सरकार ने पिछली बार लोकसभा में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश में कौन-कौन से परिवर्तन किया था हो सकता है कि वे अपने थाईलैंड प्रवास के दौरान उनको पढ़ने का समय नहीं मिला होगा-
01. खेती योग्य जमीन दायरे में नहीं
मोदी सरकार ने पहले संशोधन में खेती योग्य भूमि को अधिग्रहित करने का भी प्रस्ताव शामिल किया था। लेकिन अब लोकसभा में लाए गए बिल में संशोधन कर दिया गया है। अब बहुफसली भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा। साथ ही इंडस्ट्रियल कॉरीडोर के लिए सीमित जमीन लिए जाने का फैसला लिया गया है। इससे किसानों के एक बड़े वर्ग को राहत मिलेगी।
02. मंजूरी जरूरी
भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के मुताबिक अधिग्रहण के लिए 80 फीसदी किसानों की मंजूरी का प्रावधान था। उसे मोदी सरकार ने नए संशोधन में खत्म कर दिया था लेकिन अब लोकसभा में पास किए गए बिल के मुताबिक सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के लिए होने वाले अधिग्रहण में किसानों की मंजूरी भी जरूरी होगी। इसी तरह से आदिवासी क्षेत्रों में अधिग्रहण के लिए पंचायत की सहमति जरूरी होगी।
03. अपील का अधिकार
मोदी सरकार ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में शामिल अपील के अधिकार को खत्म कर दिया था। पर अब संशोधन के बाद आए बिल में किसानों को अपील का अधिकार वापस मिल गया है। अब वे अधिग्रहण के किसी भी मामले में अपील कर सकेंगे। इससे उनके अधिकारों की सुरक्षा को बल मिलेगा।
04. मिलेगी नौकरी
पहले चले आ रहे भूमि अधिग्रहण कानून में प्रभावित किसानों को मुआवजा देने का प्रावधान था लेकिन किसी को नौकरी नहीं दी जाती थी। संशोधन के बाद लोकसभा में पास हुए बिल में प्रभावित परिवार के किसी एक सदस्य को नौकरी दिए जाने का प्रावधान किया गया है।
05. इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए अधिग्रहण
भूमि अधिग्रहण बिल में शामिल किए गए एक प्रावधान से रेलवे ट्रेक और हाइवे के एक किलोमीटर दायरे में रहने वालों को परेशानी हो सकती है। सरकार ने फैसला कर लिया है कि इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए अब रेलवे ट्रैक और हाईवे के दोनों तरफ एक किलोमीटर तक की जमीन का अधिग्रहण किया जा सकता है। संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल के मुताबिक बंजर जमीनों के लिए अलग से रिकॉर्ड रखा जाएगा।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 19 अप्रैल 2015

भारतीय नेताओं का निजी जीवन और देशहित

मित्रों,वैसे तो हर व्यक्ति को निजता का मौलिक अधिकार होता है लेकिन जब व्यक्ति सार्वजनिक जीवन से जुड़ा हुआ हो और उसकी ऐय्याशी व रंगरेलियों की वजह से देश-प्रदेश का हित प्रभावित होता हो तब जनता को अधिकार होना चाहिए यह जानने का कि उसका नेता कैसा है और क्या कर रहा है। पंडित नेहरू से लेकर नीतीश कुमार तक के बारे में समय-समय पर कई तरह की अंदरखाने की बातें बाहर आती रही हैं जिससे भारत की जनता को शक होता रहता है कि कहीं इन नेताओं ने भी मुगल बादशाह जहाँगीर की तरह शराब,कबाब और शबाब के बदले हिन्दुस्तान को नूरजहाँ के पास गिरवी तो नहीं रख दिया था या दिया है या फिर पैसों के बदले बेच तो नहीं दिया या फिर पैसों के बदले बेच तो नहीं दिया।
मित्रों,सवाल उठानेवाले लोग तो भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दाम्पत्य जीवन को लेकर भी सवाल उठाते रहे हैं लेकिन नरेंद्र मोदी तो काफी पहले से ही संन्यासी हैं। हाँ यह बात जरूर है कि अगर उनको संन्यास ही लेना था तो फिर उन्होंने शादी क्यों की? क्यों एक अबला का जीवन बर्बाद किया? हाँ यह भी सही है कि अभी तक नरेंद्र मोदी के ऊपर विवाहेतर संबंध जैसा कोई आरोप नहीं है जो यह दर्शाता है कि मोदी पूरी निष्ठा के साथ संन्यास के नियमों का पालन कर रहे हैं।
मित्रों,अब कांग्रेस के कुछ वर्तमान नेताओं को देखिए जैसे कि अभिषेक मनु सिंघवी,दिग्विजय सिंह आदि। लगता है जैसे इन लोगों का चरित्र शब्द से ही कुछ भी लेना-देना नहीं है। इसी तरह हमारे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के बारे में भी कई-कई तरह की बातें हवाओं में तैरती रहती हैं। नीतीश जी का दाम्पत्य जीवन भी बड़ा रहस्यमय रहा है। उनके बड़े भैया लालू जी की पत्नी ने तो एक बार खुलेआम मंच पर से ही बिहार के सड़क निर्माण मंत्री ललन सिंह को उनका साला बता दिया था जबकि दरअसल में ललन सिंह जी नीतीश जी के साले तो क्या जाति-बिरादरी के भी नहीं हैं। इसी तरह से पिछले साल लालू जी के लाड़ले तेजस्वी यादव जी का भी एक बेहद कामुक फोटो फेसबुक पर वाइरल हो गया था। कहा तो यह भी जाता है कि यह तस्वीर किसी और ने नहीं बल्कि उनके मामाश्री सुभाष जी ने ही खींची थी।
मित्रों,कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी यूपीए की सरकार के समय बराबर विदेश की गुप्त-यात्राएँ किया करती थीं और मीडिया को निजता की दुहाई देती रहती थीं। अभी राहुल जी दो महीने तक गुप्त रहने के बाद प्रकट हुए हैं। इन दो महीनों में वे कहाँ-कहाँ रहे और क्या-क्या किया यह देश की जनता को क्यों नहीं जानना चाहिए? अगर सबकुछ गुप्त ही रखना था तो फिर सार्वजनिक जीवन में आना ही नहीं चाहिए था। आखिर ऐसी कौन-सी बात है जिसको वे और उनकी माँ जनता के साथ साझा नहीं करना चाहते? कहीं उनलोगों ने गुप्त-यात्राओं के दौरान कोई ऐसा काम तो नहीं किया जिससे भारत के दूरगामी या अल्पकालिक हितों को नुकसान होता हो? अगर आपको जनता का मत चाहिए,अगर आप चाहते हैं कि जनता आपके हाथों में देश या प्रदेश की बागडोर सौंप दे तो फिर जनता को निश्चित रूप से यह जानने का अधिकार भी है कि आप क्या हैं,आपका चरित्र कैसा है? ऐसा हरगिज नहीं चलेगा कि पानी में तैरते हुए बर्फ की तरह आपके व्यक्तित्व का दसवाँ हिस्सा ही आँखों के आगे हो। आखिर आज भी भारत कश्मीर और अरूणाचल में नेहरू की गलतियों का नतीजा ही तो भुगत रहा है। उसी नेहरू की गलतियों का जिनके कथित रूप से लेडी माउंटबेटन से अंतरंग संबंध थे और ऐसा दावा सिर्फ भारतीय ही नहीं बल्कि माउंटबेटन की बेटी भी कर रही है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

नमो की शॉल और प्रेस्टीच्यूट्स

मित्रों, पिछले कुछ दिनों से इंटरनेट पर जनरल वीके सिंह द्वारा मीडिया के एक हिस्से को प्रेस्टीच्यूट्स कहे जाने का विवाद छाया हुआ है। भारतीय मीडिया का एक हिस्सा इस बात को लेकर मुँह फुलाये बैठा है कि उनकी तुलना प्रौस्टीच्यूट्स यानि वेश्याओं के साथ क्यों कर दी गई। जाहिर है कि जनरल साहब को ऐसा नहीं करना चाहिए था बल्कि बिकाऊ मीडिया की तुलना तो किसी जानवर के साथ करनी चाहिए थी।
मित्रों,वेश्या तो सिर्फ शरीर का सौदा करती हैं यह बिकाऊ मीडिया तो रोजाना अपने ईमान का सौदा करती है। इनकी हालत तो कुत्तों जैसी है जो रोटी को देखते ही मुँह से लार टपकाने लगते हैं। इन प्रेस्टीच्यूट्स की आमदनी का आप हिसाब ही नहीं लगा सकते हैं। इनका वेतन होता तो हजारों और लाखों में होता है लेकिन इनकी वास्तविक आय करोड़ों में होती है। वरना क्या कारण है कि किसी पत्रकार के पास दिल्ली में करोड़ों की कोठी है तो किसी के पास नोएडा में अपना मॉल है?
मित्रों,अभी जब भारत के पीएम नरेंद्र मोदी फ्रांस गए थे तो उन्होंने एक शॉल ओढ़ रखी थी जिस पर कथित रूप से N M लिखा हुआ था।

https://twitter.com/sagarikaghose/status/587161033845800960

महान पत्रकार सागरिका घोष ने बिना सोंचे-समझे,बिना किसी प्रमाण के नमो पर यह आरोप लगा दिया कि उनके द्वारा ओढ़ी गई यह शॉल लुईस व्हिटन कंपनी द्वारा बनाई गई थी जबकि लुईस व्हिटन का कहना है कि वो ऐसे शॉल तो बनाती ही नहीं है।

https://twitter.com/search?q=sagrika%20ghose&src=tyah

इसी तरह बिकाऊ मीडिया ने नरेंद्र मोदी के शूट को लेकर भी अफवाह उड़ाई थी और बाद में बिना विलंब किए माफी भी मांग ली थी। लोकसभा चुनावों के समय इसी बिकाऊ मीडिया का एक चैनल एक नेता को जबर्दस्ती क्रांतिकारी,बहुत ही क्रांतिकारी साबित करने पर तुला हुआ था। हद है बेहयाई की कि पहले कुछ भी बोल दीजिए और जब वह झूठ साबित हो जाए तो बेरूखी के साथ माफी मांग लीजिए।

https://twitter.com/sagarikaghose/status/587189427065135104

मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि कांग्रेस-राज में जमकर मलाई चाभनेवाली बिकाऊ मीडिया ने बार-बार की फजीहत के बाद भी हार नहीं मानी है और अभी भी बेवजह के विवाद पैदा करने की कोशिश करती रहती है। आपको याद होगा कि मनमोहन सिंह की सरकार ने इस दलाल मीडिया का वर्चस्व इस कदर बढ़ा हुआ था कि नीरा राडिया और बरखा दत्त मंत्रियों की सूची तक बनाने में दखल रखते थे और नरेंद्र मोदी की सरकार आते ही इनलोगों के ऐसे बुरे दिन आ गए कि अब जब पीएम विदेश जाते हैं तो इन लोगों को अपनी जेब से भाड़ा लगाकर समाचार कवर करने जाना पड़ता है। ऐसे लोगों का देशहित से भी पहले भी कुछ भी लेना-देना नहीं था और आज भी नहीं है बल्कि इनके लिए तो अपना स्वार्थ ही सबकुछ है। इस बिकाऊ मीडिया को आज भी इस बात का भ्रम है कि वह जो कुछ भी कह या दिखा देगी देश की जनता उसको आँखें बंद करके सच मान लेगा। जबकि सच्चाई तो यह है कि आज की सबसे शक्तिशाली मीडिया न तो प्रिंट मीडिया है और न ही इलेक्ट्रानिक मीडिया बल्कि सोशल मीडिया है। एक ऐसा प्लेटफॉर्म जहाँ न तो कोई बड़ा है और न ही कोई छोटा,सब बराबर हैं। एक ऐसा पात्र है जो पलभर में दूध को दूध और पानी को पानी कर देता है। इसलिए अच्छा हो कि प्रेस्टीच्यूट्स जल्दी ही सही रास्ते पर आ जाएँ और फिजूल की अफवाहें फैलाना बंद कर दे नहीं तो यकीनन उनकी हालत ऐसी हो जाएगी कि वे सच भी बोलेंगे तो लोग उसे झूठ समझेंगे। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

मेक इन इंडिया में बाधक बना विपक्ष

मित्रों,यह गहन चिंतन का विषय है कि राजनीति को किसके लिए होनी चाहिए। राजनीति अगर सिर्फ राज के लिए की जाती है तो वह राजनीति है ही नहीं बल्कि राजनीति राज्य के लिय,राज्य की भलाई के लिए की जानी चाहिए। परन्तु आदर्श और यथार्थ में हमेशा एक फर्क होता है,फासला होता है और इस फासले को इन दिनों आसानी से देखा जा सकता है भारत की केंद्रीय राजनीति में विपक्ष की भूमिका निभा रही राजनैतिक पार्टियों की कथनी और करनी में।
मित्रों,लगभग सारी विपक्षी पार्टियाँ बात तो जनता की भलाई की कर रही हैं लेकिन काम कर रही हैं जनता और देश को नुकसान पहुँचाने का। चाहे किसी भी तरह का उद्यम या उद्योग हो उसके लिए सबसे जरूरी होती है जमीन। केंद्र सरकार 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में जरूरी बदलाव करना चाहती है क्योंकि इस कानून ने भूमि अधिग्रहण को लगभग असंभव ही बना दिया है। केंद्र सरकार चाहती है कि कानून में कुछ ऐसे सुधार किए जाएँ जिससे न तो किसानों को ही क्षति हो या न तो किसानों के साथ ही जबर्दस्ती हो और न ही राज्य के लिए उद्योगादि की स्थापना के लिए जमीन प्राप्त करना असंभव ही हो जाए।
मित्रों,कल अगर केंद्र सरकार देश की 65 प्रतिशत युवा आबादी को रोजगार देने में विफल रहती है तो यही विपक्ष शोर मचाएगा कि केंद्र वादे को पूरा नहीं कर पाया। क्या विपक्ष बताएगा कि बिना जमीन के उद्योग कहाँ खुलेंगे? क्या विपक्ष बताएगा कि अगर उद्योग नहीं खुलेंगे तो देश के बेरोजगार युवाओं को रोजगार कैसे मिलेगा? क्या विपक्ष के पास इसके लिए कोई वैकल्पिक योजना है? अगर विपक्ष के पास ऐसी कोई वैकल्पिक योजना नहीं है तो फिर उच्च सदन राज्यसभा को हथियार बनाकर भूमि अधिग्रहण बिल को रोकने का क्या औचित्य है? राज्यसभा का गठन तो इस उद्देश्य से किया गया था कि अगर लोकसभा से कोई गलती हो जाती है तो उसमें सुधार किया जा सके लेकिन जिस तरह से विपक्ष राज्यसभा में अपने बहुमत का देशहित के विरूद्ध दुरूपयोग कर रहा है उसने तो राज्यसभा के औचित्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। जबकि आज पूरी दुनिया की शक्तियाँ भारत के मेक इन इंडिया में अपना अहम योगदान देने को तत्पर हैं यह विडंबनापूर्ण है कि भारत का विपक्ष इसमें रोड़े अँटका रहा है। कल अगर विपक्षी पार्टियों द्वारा शासित राज्यों में देसी-विदेशी पूंजी का निवेश नहीं होता है यही विपक्ष कहेगा कि मेक इन इंडिया का लाभ उनको जानबूझकर नहीं मिलने दिया गया। बिहार का ही उदाहरण अगर लें तो दीघा रेल सह सड़क पुल के लिए एप्रोच पथ के निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण हो रही देरी के लिए स्वयं पीएम को राज्य के मुख्य सचिव से बात करनी पड़ रही है। पुल बनकर तैयार है लेकिन एप्रोच पथ नहीं बन पाने के कारण चालू नहीं हो पा रहा है। जब सुशासन बाबू की सरकार सड़क के लिए ही जमीन नहीं जुटा पा रही है तो फिर बिना उचित भूमि अधिग्रहण बिल के उद्योग के लिए कहाँ से हजारों-लाखों एकड़ जमीन लाएगी।
मित्रों,चाहे पक्ष हो या विपक्ष सबके लिए इंडिया फर्स्ट मूल मंत्र होना चाहिए लेकिन ऐसा परिलक्षित हो रहा है कि विपक्ष के लिए इंडिया प्राथमिकता सूची में कहीं है ही नहीं। उसको तो बस मोदी को नीचा दिखाना है,पराजित होते देखना है भले ही इससे देश को कितनी ही क्षति क्यों न उठानी पड़े। मगर ऐसा करते हुए विपक्ष को यह जरूर सोंचना चाहिए कि आज के युग में पब्लिक को बरगलाना आसान नहीं रह गया है। आज की जनता सब जानती है,सब समझती है,सब देखती है। आगे बिहार में विधानसभा चुनाव होना है और बिहार की जनता अपनी देशभक्ति और राजनैतिक-विवेक के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है। बिहार की जनता को यह पता है कि मोदी सरकार को अगर राज्यसभा में बहुमत दिलवाना है तो उनको राज्य में ज्यादा-से-ज्यादा सींटें जीतकर भाजपा को देनी होगी। ऐसे में कहीं ऐसा न हो कि निकट-भविष्य में आनेवाले विधानसभा चुनावों में हारते-हारते विपक्ष का राज्यसभा से भी सूपड़ा साफ हो जाए। आखिर नकारात्मक और घोर स्वहितकारी राजनीति का यही परिणाम होता है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 21 मार्च 2015

बिहार की पूरी तस्वीर क्या है नीतीश जी?

मित्रों,बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गजब के वाकपटु हैं और शोमैन भी। पूरे बिहार में इस समय मैट्रिक की परीक्षा में इस कदर जमकर कदाचार हो रहा है कि इसे परीक्षा कहना इस शब्द का ही अपमान होगा। बल्कि यह तो स्वेच्छा है और इसमें कदाचारियों की मदद कर रहे हैं पुलिस,शिक्षक आदि अर्थात् पूरे सरकारी तंत्र ने परीक्षा को कमाई का साधन बना लिया है। वैसे तो यह हर साल का भ्रष्टोत्सव है लेकिन इस बार मीडिया ज्यादा जागरूक है वरना कदाचार के खिलाफ तो हमने अपने अखबार में पिछले साल भी मैट्रिक और इंटर की परीक्षा में जमकर लिखा था।
मित्रों,नीतीश जी अपने महान असत्यवादी़-पाखंडवादी श्रीमुख से फरमाते हैं कि इस परीक्षा के दौरान मीडिया बिहार की अधूरी तस्वीर पेश कर रही है तो क्या नीतीशजी बताएंगे कि फिर बिहार की पूरी तस्वीर क्या है? मीडिया द्वारा जहाँ पूरे राज्य के लगभग प्रत्येक जिले और प्रत्येक केंद्र पर कदाचार की खबरें दी गई थीं वहीं उनको पूरे बिहार में सिर्फ चार केंद्रों पर ही कदाचार नजर आया। रद्द तो पूरी परीक्षा होना चाहिए थी लेकिन उनको तो सिर्फ वही दिखता है जो वह देखना चाहते हैं। जाने भी दीजिए वे बेचारे तो सावन के अंधे हैं इसलिए उनको सिर्फ हरियाली ही नजर आती है। हम बताते हैं बिहार की पूरी तस्वीर क्योंकि नीतीश बाबू के कुशासन से रोजाना पाला तो हमारा पड़ता है। नीतीश बाबू का क्या उनको तो सिर्फ पैसा चाहिए फिर वो किसी भी तरह से आए।
मित्रों,बिहार की मुकम्मल तस्वीर तो यह है कि पूरे बिहार में कहीं भी सरकार नाम की चीज ही नहीं है। आप कहेंगे कैसे? तो हम एक उदाहरण द्वारा आपको बताते हैं। अभी कुछ दिन पहले हमने यह खबर लगाई थी कि बिहार की पुलिस कानून के अनुसार नहीं बल्कि अपनी मनमर्जी के अनुसार काम करती है। खैर तब हमने बताया था कि हाजीपुर के सदर थाना में जब हम ठगी की एफआईआर करने गए तब क्या हुआ। अब आगे सुनिये कि उसके बाद क्या हुआ। उसके बाद थाना ने एफआईआर दर्ज करने में 5 दिन लगा दिया। हमने थानेदार को कई-कई बार फोन किया,एसपी को फोन किया लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया। सवाल उठता है कि सरकार ने इनको सरकारी फोन क्यों दिया है जबकि इनको बिना पैसे लिए कोई काम करना ही नहीं है।
मित्रों,हद तो हो गई कल जब पीड़ित सुरेश बाबू एफआईआर लेने थाना पहुँचे तो थाने के मुंशी ने उनसे एफआईआर की कॉपी देने के लिए 500 रु. के रिश्वत की मांग कर दी। मैंने उनसे कहा मुंशी से बात करवाईए तो मुंशी फोन पर नहीं आया और गालियाँ बकने लगा। फिर मैंने थानेदार को फोन लगाया तो उसने कहा कि वो थाने पर नहीं है लॉ एंड ऑर्डर संभाल रहा है। सुनकर हँसी आई कि जब बिहार में लॉ को संभालनेवाले खुद ही ऑर्डर में नहीं हैं तो वे लॉ एंड ऑर्डर क्या संभालेंगे। फिर हमने एसपी वैशाली को फोन किया तो उन्होंने कहा कि आप लिखित निवेदन दे दीजिए हम जाँच करवा लेंगे और फोन काट दिया। अब आप ही बताईए कि जब एफआईआर की कॉपी लेनी है तो इसमें जाँच क्या होगी और जाँच से निकलकर क्या आएगा? क्या एसपी दूध के धुले हैं जो दूध का दूध और पानी का पानी कर देंगे।
मित्रों,हमने तिरहुत रेंज के आईजी को फोन किया तो पहले तो मैसेज आया कि हम अभी मीटिंग में हैं और बाद में फोन करने पर कहा गया कि रांग नंबर है और फोन काट दिया गया। फिर हम और ऊपर चढ़े और डीजीपी को फोन किया। फोन डीजीपी ने नहीं उनके रीडर ने उठाया और कहा कि शाम में फोन करिए और वो भी लैंड लाईन पर। इसके बाद और ऊपर चढ़ने की हमारी हिम्मत ही नहीं रही क्योंकि हम समझ चुके थे कि जिस राज्य में तबादले ने उद्योग का रूप ले रखा हो वहाँ और ऊपर जाने से कोई फायदा नहीं है। फिर माननीय मुख्यमंत्री को तो सबकुछ ठीकठाक नजर आ ही रहा है। ऊपर से उन्होंने मीडिया को अपना मोबाईल नंबर भी नहीं दिया है तो उनका लैंडलाईन फोन तो अधिकारी उठाएंगे। पहले यह पूछकर तोलेंगे कि कितना बड़ा आदमी बोल रहा है तब मुख्यमंत्री को फोन देंगे और हम तो ठहरे छोटे पत्रकार तो हमारी तो उनसे किसी भी कीमत पर बात ही नहीं होने दी जाएगी या फिर नीतीश जी हमने बात करेंगे ही नहीं।
मित्रों,तो यह है हमारे बिहार की मुकम्मल तस्वीर। एफआईआर के आवेदन के समय मुंशी ने खुद ही हमसे कहा था कि प्रार्थी का फोन नंबर भी डाल दीजिएगा। तो फिर कायदे से उनको एफआईआर हो जाने के बाद खुद ही फोन करके प्रार्थी को बुलाना चाहिए था और एफआईआर की कॉपी दे देनी चाहिए थी। लेकिन उनको कानून-कायदे से क्या मतलब? उनको तो बस पैसे से मतलब है। कदाचित घूस लेना ही उनकी ड्यूटी है।
मित्रों,आज जब हमने अभी सदर थाने के थानेदार को फोन लगाया तो उसने मेरा नाम सुनते ही फोन काट दिया। अब आप ही बताईए कि अंग्रेजों की पुलिस और सुशासन की पुलिस में क्या अंतर है? तब भी दरोगा (दारोगा) को रोकर या गाकर घूस देनी ही पड़ती थी और आज भी देनी ही पड़ती है। तब तो बड़े अफसर तुरंत कदम उठाते थे। आज कोई कदम नहीं उठाते।
मित्रों,अंत में मैं क्षमा चाहूँगा कि मैं आपको बिहार के वर्तमान शासन-प्रशासन की सिर्फ एक बानगी ही दिखा पाया क्योंकि पूरी कथा लिखूंगा तो परती परिकथा से भी मोटी किताब लिख जाएगी। बाँकी सुशासन की कुछ पोल तो पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी भी खोल ही रहे हैं कि कैसे बिहार में लागत से कई गुना ज्यादा का एस्टीमेट बनता है और कैसे उसका कुछ हिस्सा मुख्यमंत्री को भी दिया जाता है। संक्षेप में बस यही समझ लीजिए कि नीतीश बाबू के शासन और दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक (1351-1388) के शासन में कोई अंतर नहीं है। हुआ यूँ था कि फिरोजशाह तुगलक के पास एक सैनिक गया यह शिकायत लेकर कि उससे वेतन के ऐवज में रिश्वत मांगी जा रही है तो फिरोजशाह तुगलक ने उसको अपने पास से पैसे देकर कहा कि तो दे दो क्योंकि मैं भी देता हूँ। यहाँ तो नीतीश जी 500 रु. भी देने से रहे क्योंकि नेता लोग तो सिर्फ लेना जानते हैं। मैं सुशासन बाबू को खुली चुनौती देता हूँ कि अगर वे सचमुच इस राज्य के शासन-प्रशासन के मुखिया हैं तो मेरे संबंधी सुरेश बाबू जो विकलांग भी हैं को बिना पैसे दिए एफआईआर की कॉपी दिलवा दें। थाने से उनको फोन करवाएँ और बुलाकर बाईज्जत उनको एफआईआर की कॉपी दिलवाएँ। अन्यथा खुलेआम कह दें कि यह काम मेरे बस का नहीं है क्योंकि यह मेरा काम नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक समस्या है ठीक उसी तरह जैसे परसों उनके शिक्षा मंत्री ने नकल को लेकर कहा था।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 16 मार्च 2015

इकलौते वारिस से लावारिस तक

मित्रों,जब मैंने होश संभाला तो खुद को बड़ी दीदी सुनीता जो अब बक्सर के छतनवार गांव के जनार्दन सिंह की पत्नी और बंटी और छोटू की माँ है की गोद में पाया। वह मारती भी थी तो दुलारती भी थी। फिर मेरी नानी धन्ना कुंवर की तो जैसे जान ही मुझमें बसती थी। मेरे मामा नहीं थे और चचेरे मामा मेरी नानी को काफी मारते-पीटते थे इसलिए मेरा पूरा परिवार मेरे जन्म के पाँच साल पहले से ही मेरे ननिहाल जो महनार रोड रेलवे स्टेशन के नजदीक जगन्नाथपुर गांव में था में रहता था। खुद मेरा जन्म भी ननिहाल में ही हुआ। मैं पूरे गांव का लाडला था और बला का शरारती। मैंने बचपन में सांड की सवारी भी गांठी है तो आम-अमरूद चुराकर भी खाया है। कई बार तो पेड़ के मालिक की आँखों के आगे भी। मुझे याद है कि 1991 में जब मेरी तबियत काफी खराब हो गई थी तो लगभग पूरा जगन्नाथपुर और छिटपुट रूप से चमरहरा तक के सैंकड़ों लोग कई दिनों तक पीएमसीएच से हिले तक नहीं थे। जगन्नाथपुर के प्रत्येक परिवार ने मेरी जान के ऐवज में काली माता को बकरा चढ़ाने की मन्नत मान दी थी। यद्यपि पूरी तरह से शाकाहारी होने के कारण मैंने आज तक एक भी बकरे की बलि नहीं दी है।
मित्रों,अपने पूरे स्कूली जीवन में मैंने कभी बाहर का चाट-पकौड़ा नहीं खाया। जब भी बड़ी दीदी पैसे देती मैं शाम में उनको ही लौटाकर दे देता। जब मैं मैट्रिक में था तभी मैंने साइकिल चलाना सीखा। फिर तो घर का सारा काम मेरे ही जिम्मे आ गया। मुझे याद है कि चाहे 1989 में हुआ मेरी बड़ी दीदी का दुरागमन हो या फिर नानी का श्राद्ध मैंने दो-दो हफ्तों तक एक पांव पर खड़े रहकर सारा भार उठाया। इसी बीच सन 93 में मैंने पॉलिटेक्निक की प्रतियोगिता परीक्षा पास की और मेरा नामांकन दरभंगा पॉलिटेक्निक में सिविल इंजीनियरिंग में हुआ। इसी बीच पूर्णिया पॉलिटेक्निक में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में सीट खाली हुई। उस समय बिहार में सिविल इंजीनियरों को नौकरी नहीं मिलती थी इसलिए पिताजी ने मेरा स्थानान्तरण पूर्णिया पॉलिटेक्निक में करवा दिया। तब तक मेरी छोटी दीदी की उम्र काफी हो चुकी थी। उस समय उनकी उम्र की कोई भी लड़की मेरे गांव या ननिहाल में क्वांरी नहीं थी। तब तक 1991 में नानी का देहांत हो चुका था और हमलोग महनार बाजार में किराये के मकान में रहने लगे थे। हमलोग की आर्थिक स्थिति पिताजी विष्णुपद सिंह जी के राम प्रसाद सिंह महाविद्यालय,चकेयाज में रीडर होने के बावजूद इतनी खराब थी कि उनको हर महीने खर्चा चलाने के लिए कभी कॉलेज में अपने जूनियरों से कभी लाईब्रेरियन चाचा से कर्ज लेना पड़ता था और उनके घर जाकर पैसे लाने की शर्मिंदगी भी मुझे ही उठानी पड़ती। इसी बीच मेरे ननिहाल में मेरी हमउम्र एक लड़की की शादी के दौरान मेरे चचेरे मामा सत्येन्द्र सिंह द्वारा एक ऐसी टिप्पणी कर दी गई जो मेरे दिल-दिमाग को चीर गई। उन्होंने कहा कि बहन को तुम ही अपने घर बिठा लोगे क्या,शादी क्यों नहीं करते? गुस्सा तो बहुत आया लेकिन खून के घूंट पीकर रह गया।
मित्रों,तब मेरे छोटे नाना के बेटों ने नानी के खेतों पर जबरन कब्जा कर लिया था और खेत की फसल भी नहीं देते थे। नानी मरने से पहले जमीन माँ के नाम पर कर गई थी। जमीन में से कुछ जगन्नाथपुर में था तो कुछ कटिहार में। मेरे नाना रामगुलाम सिंह जिनकी मौत मेरे जन्म से पहले ही हो चुकी थी अपने गांव के सबसे दबंग और समृद्ध किसान थे। मैं भीतर-ही-भीतर गुस्से से जल रहा था। फिर मैंने कटिहार वाली जमीन पर आना-जाना शुरू किया। न खाने का ठौर रहता और न रहने का। कभी भी खा लेता,कहीं भी सो लेता। फुलवड़िया जहां कि नानी का कामत था के ही एक दुसाध लड़के से मेरी दाँतकटी दोस्ती हो गई। मेरा मित्र राजकुमार मुझे अपने सगों से भी ज्यादा मानता था। उसकी,उसके मामा,बंदा,विष्णु और लालबाबू,जगन्नाथपुर के ही कमतिया सीतेश मामा,उपेंद्र मामा और रामजी मामा की सहायता से दो साल के अथक परिश्रम के बाद मैंने जमीन पर कब्जा कर लिया। इस दौरान मुझे गांव की गंदी राजनीति में भी उतरना पड़ा।
मित्रों,तब तक पिताजी गुड्डी दीदी जो मुझसे पाँच साल बड़ी थी के लिए वर की तलाश करने में जुट गए थे। उधर जगन्नाथपुर की जमीन पर माँ द्वारा दायर टाईटल सूट खुल गया था और जमकर पैसे खा रहा था। कई बार के प्रयास के बाद मैंने तीन बीघा जमीन के लिए ग्राहक को खोजा और माँ को रजिस्ट्री के लिए बुलाया। इस तरह किसी तरह से दीदी की शादी हो गई। दीदी की पुछरिया में मिठाई भेजने के लिए हमलोगों के पास पैसे नहीं थे उस पर हमलोगों पर लाखों का कर्ज हो गया था। मैं वर पक्ष द्वारा शादी में लाए गए मिठाई के टोकरों को ही पुछरिया में लेकर गया था। इस बीच मैं यह भी भूल गया कि मैं पॉलिटेक्निक में भी पढ़ता हूँ। उस पर पप्पू यादव के समर्थक छात्रों के साथ जिनका पॉलिटेक्निक पर कब्जा था हमारा टंटा हो गया। शादी के बाद हमारी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि मुझे पढ़ाई छोड़कर घर बैठना पड़ा और मैं इंजीनियर बनते-बनते रह गया। संतोष इस बात का था कि दीदी की शादी एक सरकारी अफसर के साथ हुई थी। जीजाजी राकेश कुमार जी इस समय भारत सरकार के MSOPI मंत्रालय में क्लास वन अधिकारी हैं और दिल्ली के सरोजनीनगर में रहते हैं।
मित्रों,फिर मैंने घर पर रहकर ही इतिहास विषय लेकर स्नातक किया और आईएएस की तैयारी के लिए दिल्ली चला गया। मगर ईश्वर की मर्जी के आगे किसकी चलती है। वर्ष 2003 में आईएएस की मुख्य परीक्षा देते समय ही मुझे डेंगू हो गया और मैं आईएएस बनते-बनते रह गया। फिर मैंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के नोएडा कैंपस से एमजे किया। इस दौरान अपने सहपाठी मित्रों के प्यार की बदौलत अपनी कक्षा का प्रतिनिधि भी रहा और इस दौरान विश्वविद्यालय की हालत में कई सुधार भी करवाये। धीरे-धीरे मेरी ताकत इतनी ज्यादा हो गई थी कि विभागाध्यक्ष अरूण भगत कहते कि मैंने नहीं सोंचा था कि आप इतने शक्तिशाली हो जाएंगे कि कैंपस को आपके इशारों पर चलना और चलाना पड़ेगा। मैं और मेरे मित्र ही तब यह फैसला करते कि किसको किस अखबार या चैनल में नौकरी करने के लिए भेजा जाएगा।
मित्रों,इसी दौरान मैं दैनिक जागरण,नोएडा में इंटर्न करने लगा और इस बात की पूरी संभावना थी कि वहीं मेरी नौकरी भी लग जाती। तब तक मेरी छोटी बहन जो मुझसे ढाई साल छोटी थी की उम्र 30 को पार करने लगी थी और मेरे माँ-पिताजी उसकी शादी को लेकर काफी चिंतित थे। इसी बीच एक दिन मेरी माँ ने मुझे फोन कर कहा कि बहन की शादी नहीं करोगे क्या? पिताजी से तो अब दौड़-धूप होती नहीं। मेरे पिताजी वर्ष 2003 में ही कॉलेज की नौकरी से सेवानिवृत्त हो चुके थे। माँ का फोन जाते ही मैं अपार संभावनाओं के शहर दिल्ली को छोड़कर हाजीपुर आ गया और नाम के लिए पटना,हिंदुस्तान में तीन हजार की नौकरी कर ली। फिर कई स्थानों पर वरतुहारी की मगर अंत में शादी पक्की हुई बिहार के ही मधेपुरा निवासी और उस समय आईबीएन7 में प्रोड्यूशर की नौकरी कर रहे नीरज कुमार सिंह से। उस समय नीरज को 18 हजार रुपये वेतन के रूप में मिलते थे। उसने गाजियाबाद के इंदिरापुरम में एक फ्लैट भी खरीद रखा था। वरतुहारी के सिलसिले कई बार तो मुझे लगातार दो-दो रातों तक जगकर सफर करना पड़ा।
मित्रों,शादी में हमने दिल खोलकर खर्च किया फिर भी शादी के तत्काल बाद से ही मेरी छोटी बहन हमसे पैसे मांगने लगी। नीरज ने न जाने क्यों चुल्हा,टीवी वगैरह को गांव भेज दिया। हमने मोह में आकर पैसे दे दिए। मगर जब यह सिलसिला बन गया और हर महीने की बात हो गई तब मैंने विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि हम खुद ही पिछले 20 सालों से बेघर थे। फिर मेरी शादी हुई और शादी के दौरान किसी ने मेरी ससुराल में नीरज के साथ अभद्र मजाक कर दिया। जब मैं अपनी पत्नी को विदा करवा कर अपने घर पहुँचा तो देखा कि मेरी छोटी बहन रूबी मशीन गन की गोलियों की तरह अपनी भाभी को गालियाँ दिए जा रही थी और मेरी माँ उसे रोक भी नहीं रही थी। जब सारे संबंधी अपने-अपने घर चले गए तब मेरी माँ का रवैया भी धीरे-धीरे बदलने लगा। मेरी बहनों और भांजे-भांजियों के बहकावे का असर यह हुआ कि मेरी माँ अपनी बहू को देखना ही नहीं चाहती थी।
मित्रों,इसी बीच मेरी पत्नी सात महीने का गर्भ लेकर अपने मायके चली गई जहाँ कि 23 मार्च,2012 को मेरे बेटे ने जन्म लिया। चूँकि 23 मार्च भगत सिंह का शहीद दिवस था इसलिए हमने उसका नाम भगत सिंह ही रख दिया। बाद में जब-जब मैं मेरी पत्नी को अपने पास लाता मेरी माँ और मेरी भांजी ब्यूटी जिसकी शादी गमहर के सुनील से हुई है और जिसको मैंने बचपन में अपार स्नेह दिया था उसको इतना तंग करती कि मैं उकता कर उसको मायके रख आता। इस बार जब 6 दिसंबर,2014 को वो मेरे पास रहने आई तो माँ ने मेरे घर को रणक्षेत्र में बदल कर रख दिया। वो हमलोगों पर 1 रुपया भी खर्च करना नहीं चाहती थी और सबकुछ अपनी बेटियों और उनके बाल-बच्चों को दे देना चाहती थी। जब उसने देखा कि मेरी पत्नी इस बार मायके नहीं जा रही तो उसने अलग डेरा ले लिया और हमें अपने हाल पर छोड़कर पिताजी के साथ चली गई। मेरी बड़ी दीदी की प्रतिक्रिया थी कि सबकुछ उसका है वो चाहे तो लुटा-पुटा दे,मेरी मंझली बहन ने मेरी पत्नी से कहा कि तुमको उसके सारे सितम को हँसकर सह लेने चाहिए थे जबकि उसने खुद अपनी उस सास की कभी सेवा नहीं की जो दरअसल उसके पति की चाची थी और अपने तीन-तीन बेरोजगार दामादों को दरकिनार करके उसके पति को अपने पति की मौत के बाद अनुकंपा की नौकरी दे दी थी और छोटी बहन रूबी या छोटे बहनोई नीरज जो इस समय आज तक में 61 हजार रुपये का वेतन प्राप्त कर रहा है का तो कहना ही क्या उनका तो वश चले तो मेरे माता-पिता से सारी जमीन-जायदाद भी लिखवा लें।
मित्रों,आज मेरे पास मेरे बच्चे को पढ़ाने तो क्या खिलाने तक के पैसे नहीं हैं। मैं पूरी तरह से बर्बाद होकर जब जिंदगी के पिछले पन्नों पर नजर डालता हूँ तो सोंचता हूँ कि मुझसे गलती कहाँ हुई? क्या अपने परिवार के मान और सुख के लिए दो-दो बार त्याग करके मैंने गलती की? क्या मेरा भगवान शिव वाला जीवन-दर्शन गलत था कि स्वयं विष पीकर जगत को अमरत्त्व दो? क्या मैंने पिछले चार सालों से अपने माता-पिता को अपने हाथों खाना बनाकर,खिलाकर और 24 घंटे सेवा करके गलती की? पता नहीं मुझसे कहाँ गलती हुई जिसकी सजा मुझको मिली? कभी माखनलाल के नोएडा परिसर में पढ़ाई के दौरान वहाँ के क्लर्क देवदत्त शर्मा ने मुझे कहा था कि आप बड़े सीधे हैं कदम-कदम पर छले जाएंगे मगर क्या किसी इकलौते बेटे के साथ कोई माँ-बाप छल करता है क्या? क्या कोई अपने कथित इकलौते वारिस को लावारिस बनाकर भाग जाता है क्या? जबतक तंगी थी तब तक तो साथ रखा और अब जब 50 हजार का पेंशन मिलने लगा तब छोड़ दिया? माँ,मम्मी और मम्मी जी कहनेवाले दामाद क्या मिल गए माई कहनेवाले और शिव-पार्वती भाव से सेवा करनेवाले को लात मार दिया? यह सही है कि मेरे अंदर अब भी इतना जीवट है कि मैं अपनी जिंदगी को फिर से सजा-संवार लूंगा लेकिन सबकी खुशी में अपनी खुशी समझते-समझते संघर्ष के सबसे जरुरतमंद क्षणों में खुद ही तन्हा रह जाने का दंश तो अब जीवनभर मेरे मन को डँसता रहेगा।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

कानून नहीं थानेदारों की मर्जी से चलते हैं बिहार के थाने

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बिहार की महान पुलिस की महानता का वर्णन कदाचित शेष भी अपने हजारों मुखों से भी नहीं कर सकते। शायद बिहार पुलिस की इसी महानता का माहात्म्य है कि कोई भी व्यक्ति किसी आपराधिक घटना के बाद पुलिस के पास जाने की हिम्मत ही नहीं करता है। फिर जब बात वैशाली पुलिस की हो तब तो कहना ही क्या! इनकी कर्महीनता को कह सकना तो कदाचित नहीं बल्कि निश्चित रूप से हजारों शेष भगवानों के वश में भी नहीं है।
मित्रों,हुआ यूँ कि मेरे दोस्त रंजन के ससुर जी सुरेश प्रसाद सिंह,वल्द श्री रामदेव सिंह,सा. गुरमिया,पो. थाथन बुजुर्ग,थाना सदर हाजीपुर ने 10 मार्च,2015 को दोपहर के 1 बजकर 12 मिनट पर सदर थाना हाजीपुर स्थित एक्सिस बैंक के एटीएम से महज 1000 रु. निकाले। चूँकि उनको पैसा निकालना नहीं आता था इसलिए एक अनजान युवक द्वारा मदद की पेशकश करने पर वे मदद लेने से मना नहीं कर सके। पैसा निकालने के दौरान युवक ने लिंक फेल हो जाने का बहाना किया। फिर अपना एटीएम डालकर पैसा निकालने का नाटक किया और पैसे निकाल कर चला गया। थोड़ी देर बाद जब श्री सिंह ने 1000 रु. निकाला तो उनके तो होश ही उड़ गए क्योंकि जमा राशि में से 16000 रु. निकल चुके थे।
मित्रों,कल होते ही श्री सिंह जो लगभग 60 साल के हैं स्टेट बैंक जहाँ उनका उक्त खाता था पहुँचे और पासबुक अपडेट करवाया तब पता चला कि उनको चकमा देकर उस नितांत परोपकारी युवक ने चार बार में 16000 रु. निकाल लिए थे। बेचारे ने अपने दामाद को फोन किया और दामाद ने हमको। हमने कहा कि कल यानि दिनांक 12 मार्च को भेज देना। फिर उनको लेकर सदर थाने में पहुँचा जहाँ मेरा काफी ठंडा स्वागत करते हुए एक आवेदन लिखने को कहा गया। फिर आवेदन में कई गलतियाँ निकाली गईं। फिर से आवेदन लिखकर कमियों को दूर कर देने के बाद थाने के महान मुंशी ने मुझसे फिर से आवेदन लिखवाया और उसके बाद एक बार फिर से। उसके बाद कहा गया कि इंस्पेक्टर साहब से अनुमति ले लीजिए।
मित्रों,पता नहीं कि कानून इस बारे में क्या कहता है? क्या एफआईआर दर्ज करने के लिए इंस्पेक्टर की ईजाजत जरूरी होती है या नहीं? फिर भी मैं इंस्पेक्टर साहब के पास पहुँचा और अपना परिचय देते हुए वाकये से उनको अवगत करवाया। इंस्पेक्टर साहब ने मुंशी को बुलाया और एफआईआर दर्ज कर लेने का आदेश दिया। उसके बाद जब मैं मुंशीजी के पास बैठा हुआ था तभी एक पुलिस अधिकारी ने मुझे एफआईआर दर्ज नहीं करवाने की अनमोल सलाह दी क्योंकि उनके मतानुसार पैसा ऊपर होगा ही नहीं। तब मैंने उनसे कहा कि आपलोग एफआईआर दर्ज करने से मना कैसे कर सकते हैं जबकि पीड़ित ऐसा करना चाहता है। फिर मैं मुंशी जी को कल आने की बात कहकर अपने अखबार के दफ्तर में आ गया। आज जब थाने में गया तो बताया गया कि बड़ाबाबू छापा मारने में इतना व्यस्त हैं कि उनसे मामले के बारे में बात ही नहीं हो पाई और इसलिए एफआईआर दर्ज नहीं हो पाया है।
मित्रों,तो यह है सुशासन बाबू के सुशासन में हाजीपुर की पुलिस का रवैया। अब पता नहीं कब तक एफआईआर दर्ज किया जाएगा या फिर दर्ज किया जाएगा भी कि नहीं। अब आप ही बताईए कि जब एक पत्रकार के साथ पुलिस का व्यवहार ऐसा है तो वो आम आदमी के साथ कैसा व्यवहार करती होगी?
मित्रों,सुशासन बाबू से तो कुछ कहना ही बेकार है क्योंकि पिछले दस सालों में हमारे और उनके बीच काफी कहासुनी हो चुकी है लेकिन थानों और पुलिस के हालात में रंचमात्र भी कोई बदलाव नहीं आया है अलबत्ता रिश्वत की दरों में भारी ईजाफा जरूर हो चुका है। इसलिए इस बार मैं सीधे-सीधे भारत के यशस्वी और तेजस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से निवेदन करुंगा कि हुजूर कुछ करिए और कुछ ऐसा करिए और जल्दी में करिए कि अगले छह महीने-साल भर में पूरे भारत की जनता को एफआईआर दर्ज करवाने के लिए थानों में जाना ही न पड़े यानि वो घर बैठे ऑनलाईन एफआईआर दर्ज करवा सके। तभी जाकर अपने आपको सरकारी दामाद समझनेवाले पुलिसवालों पर लोकसेवक शब्द फबेगा।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)