रविवार, 14 फ़रवरी 2016

क्या नीतीश विपक्षविहीन बिहार का निर्माण कर रहे हैं?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जैसी कि हमने 8 नवंबर को मतों की गिनती के दिन ही अपने आलेख में भविष्यवाणी की थी कि अब बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति इतनी बुरी होनेवाली है कि लोग लालू-राबड़ी राज यानि जंगलराज को भी भूल जाएंगे। यूँ तो नई सरकार के शपथ-ग्रहण करने के पहले से ही राज्य में अपराधियों का तांडव शुरू हो गया था लेकिन अब जो हो रहा है वह अगर यूँ ही चलता रहा तो निकट भविष्य में बहुत जल्दी ही बिहार विपक्षविहीन हो जाएगा क्योंकि सारे विपक्षी नेताओं की हत्या करवा दी जाएगी,कर दी जाएगी।
मित्रों,लोकतंत्र में विपक्ष का भी अपना महत्त्व होता है। विपक्ष सत्ता पक्ष को निरंकुश होने से रोकता है लेकिन लगता है कि लंबे समय तक विपक्ष की राजनीति कर चुके लालू-नीतीश को बिहार में विपक्ष चाहिए ही नहीं। तभी तो सत्ता पक्ष द्वारा कदाचित पृष्ठपोषित अपराधी एक के बाद एक विपक्षी नेताओं की हत्या करते जा रहे हैं। आश्चर्य का विषय तो यह है कि राघोपुर में 1995 से ही लालू-राबड़ी परिवार के खिलाफ लगातार चुनाव लड़नेवाले बृजनाथी सिंह की राजधानी पटना में एके-47 से सरेआम दिनदहाड़े हत्या कर दी जाती है और बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव जो अभी राघोपुर से विधायक भी हैं बयान देते हैं कि लोजपा में अपराधियों की भरमार है। सवाल उठता है कि अपराधी किस पार्टी में नहीं हैं? सवाल यह भी उठता है कि जो राजनेता सीधे-सीधे अपराधी नहीं हैं क्या वे बेड़ा-मौका काम आने के लिए अपराधियों का लालन-पालन नहीं करते? आखिर ऐसे कौन-से लोग बृजनाथी सिंह की हत्या के पीछे थे कि हत्या के दस दिन बाद भी पुलिस ने कोई गिरफ्तारी नहीं की है और अंधेरे में ही तलवार भाँज रही है? क्या यह हत्या सीधे-सीधे बिहार के उपमुख्यमंत्री ने करवाई है? उपमुख्यमंत्री ने हत्या के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है उससे तो यह शक और भी पुख्ता हो जाता है।
मित्रों,इतना ही नहीं पिछले 48 घंटों में एनडीए के दो और ऐसे नेताओं की हत्या 'अज्ञात' अपराधियों द्वारा कर दी गई है जिन्होंने पिछले दिनों संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में महागठबंधन के खिलाफ चुनाव लड़ा था। इनमें से एक तो मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष भी थे और एक समय लालू के हनुमान रहे शिवानंद तिवारी के बेटे राहुल के खिलाफ चुनाव लड़े थे। इनकी हत्या के बाद भी राहुल तिवारी की प्रतिक्रिया ठीक वैसी ही रही जैसी कि बृजनाथी सिंह की हत्या के बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री की थी। इन श्रीमान् का कहना था कि मरनेवाले की पृष्ठभूमि को भी देखना चाहिए। तो क्या सत्तापक्ष ने इस तरीके से बिहार को अपराधमुक्त बनाने का निर्णय लिया है? क्या कोई शरीफ या बिना राजनैतिक पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति बिहार में चुनाव जीत सकता है? क्या राहुल तिवारी के पिताजी या खुद राहुल तिवारी ने शाहपुर विधानसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में अपराधियों को प्रश्रय नहीं दे रखा है? अपराधियों का पालन ठीक लेकिन अपराधियों का चुनाव लड़ना गलत यह कौन-सा नैतिक सिद्धांत है?
मित्रों,मैं पूछता हूँ कि क्या नीतीश कुमार या तेजस्वी यह बताएंगे कि ये दोनों हत्याएँ किसने की और पुलिस उनको कब तक गिरफ्तार कर लेगी? या फिर उन्होंने बिहार के अपराधियों को विपक्षी नेताओं का आखेट करने की खुली छूट दे दी है जैसी छूट भारतीयों को मारने की कभी अंग्रेजों को प्राप्त थी या फिर जैसी कि राज्य में नीलगायों के बारे में हाल में दी गई है? अगर ऐसा है तो मुबारक हो भारतीय लोकतंत्र को न्याय के साथ विकास! और वर्ष 2020 के विधानसभा चुनावों में सभी सीटों पर निर्विरोध जीत के लिए महागठबंधन को अग्रिम बधाई! आज मैं बिहार की महान जनता को कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि जब उसने विकास और विनाश में से विनाश का पथ प्रचंड बहुमत से चुना है तो फिर राज्य का विनाश ही होगा। बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय!

शनिवार, 23 जनवरी 2016

लालू जी के मामले में कानून अपना काम क्यों नहीं करेगा नीतीश जी?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिेंह। मित्रों,हम वर्षों से यह पढ़ते चले आ रहे हैं कि अंग्रेजों की भारत को सबसे बड़ी देन देश में कानून का शासन और कानून के समक्ष समानता है। आपको याद होगा कि जब बिहार के निवर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नया-नया मुख्यमंत्री बने थे तब कानून-व्यवस्था से संबंधित प्रत्येक मामले में उनका एक ही रटा-रटाया उत्तर होता था कि कानून अपना काम करेगा। कानून ने अपना काम भी किया था और बिहार की कानून-व्यवस्था की स्थिति में एक लंबे समय के बाद सुधार देखने को मिला था।
मित्रों,लेकिन अभी दो-तीन दिन पहले उन्हीं नीतीश कुमार की सरकार ने पिछले साल बिहार बंद के दौरान राजद कार्यकर्ताओं द्वारा तोड़-फोड़,मारपीट और कानून के उल्लंघन से संबंधित मामलों को वापस ले लिया है। चूँकि इन मामलों में आरोपी रहे लालू प्रसाद यादव और उनके बेटे अब उनके गठबंधन और उनकी सरकार में हैं इसलिए नीतीश कुमार जी ने इस मामले यह नहीं कहा कि कानून अपना काम करेगा बल्कि उनके द्वारा लिए गए निर्णय का लब्बोलुआब यह था कि इस मामले में कानून अपना काम नहीं करेगा क्योंकि वे कानून को अपना काम करने ही नहीं देंगे।
मित्रों,दूसरी तरफ जदयू विधायक सरफराज आलम के मामले में लालू-नीतीश-तेजस्वी-तेजप्रताप सभी एक स्वर में कह रहे हैं कि विधायक के खिलाफ कानूनसम्मत कार्रवाई होनी चाहिए। अगर हम दोनों घटनाक्रम को एक साथ जोड़कर देखें तो हमारी समझ में आ जाएगा कि अब नीतीश कुमार जी का कहना है कि कानून उन्हीं मामलों में अपना काम करेगा जिन मामलों में वे चाहेंगे कि वो अपना काम करे और जिन मामलों में वे नहीं चाहेंगे कि कानून अपना काम नहीं करे कानून अपना काम नहीं करेगा। घटनाक्रम को देखकर आसानी से विश्वास नहीं होता कि ये वही नीतीश कुमार जी हैं जिन्होंने कभी राज्य में कानून का शासन स्थापित करने के लिए काफी लंबी लड़ाई लड़ी थी।
मित्रों,इस प्रकार हम पाते हैं कि नीतीश कुमार की सरकार कानून के समक्ष समानता के संवैधानिक अधिकार का तो उल्लंघन कर ही रही है साथ ही कानून के शासन का भी खुलकर मजाक उड़ा रही है। कहने को तो वे और उनके गठबंधन और सरकार के साझीदार एक स्वर में कह रहे हैं कि राज्य में कानून का शासन है और रहेगा लेकिन वास्तविकता यही है कि राज्य में कानून का शासन है ही नहीं,मनमाना शासन है। अब जब मुख्यमंत्री और कैबिनेट ही कानून के शासन और कानून के समक्ष समानता के मौलिक सिद्धान्त की खिल्ली उड़ा रहे हैं तो फिर निचले स्तर पर क्यों नहीं अधिकारी खिल्ली उड़ाएंगे? फिर क्यों नहीं घूसखोरी और रसूखदारी का बाजार गर्म होगा? संस्कृत में कहा भी गया है कि महाजनो येन गतः स पंथाः अर्थात् बड़े लोग जिस मार्ग का अनुशरण करते हैं बाँकी लोग भी उसी मार्ग पर चलते हैं।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

रोहित की कायरता पर छाती पीटनेवाले सावन पर खामोश क्यों?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बंगाल और असम का चुनाव सिर पर है। ऐसे में पुरस्कार-सम्मान लौटाऊ गैंग और कथित पंथनिरपेक्ष मीडिया का आर्तनाद फिर से प्रारंभ हो गया है। इस बार इन भारतविरोधियों ने इसके लिए बहाना लिया है हैदराबाद में आत्महत्या जैसी सबसे बड़ी कायरता का प्रदर्शन करनेवाले कथित दलित रोहित का। बिहार चुनाव के बाद अर्द्धनिद्रा में चले गए धूर्त बुद्धि से अटे-पटे और अक्ल से हीन शकुनिसदृश लोग फिर से अपने रंग में आकर रंगभूमि में पधार चुके हैं।
मित्रों,मैं अपने पहले के आलेखों में भी इन मक्कारों की पोल खोलता रहा हूँ। आप भी जानते-मानते हैं कि आत्महत्या से बड़ी कोई कायरता हो ही नहीं सकती। भले ही आप 84 लाख योनियों में भटकने के शास्त्रीय सिद्धांत को नहीं मानें लेकिन इतना तो जरूर मानेंगे कि जीवन अनमोल होता है और यूँ ही खो देने के लिए नहीं होता। संघर्ष तो राम को भी करना पड़ा था,राजा हरिश्चंद्र को भी करना पड़ा था फिर हम किस खेत की मूली हैं। फिर हमें यह भी देखना चाहिए कि खुदकुशी करनेवाले की विचारधारा क्या थी,उसकी सोंच कैसी थी।
मित्रों,यह अबतक जगजाहिर हो चुका है कि रोहित वेमुला चाहे वो पिछड़ी जाति से आता हो या दलित जाति से ओवैसी जैसे भारतविरोधियों के गंदे हाथों का खिलौना था। ब्रेनवॉश करके उसके मन में अपने ही पंथ के प्रति इस कदर जहर भर दिया गया था कि वो हिन्दुओं को देखना तक पसंद नहीं करता था। यहाँ तक वह इस कदर मानसिक विकृति का शिकार था कि जाने-अनजाने में याकूब मेनन जैसे आतंकवादियों का न केवल प्रशंसक बल्कि भक्त बन चुका था।
मित्रों,आश्चर्य है कि फिर भी वोट-बैंक की गंदी राजनीति करनेवाले लोग उसके लिए हाय-हाय कर रहे हैं। वोट-बैंक की राजनीति की पहली शर्त ही यही होती है कि उस वोट-बैंक से आनेवाला व्यक्ति चाहे कितना ही गिरा-पड़ा क्यों न हो उनका पृष्ठपोषण करना है और दूसरा पक्ष चाहे पीड़क की जगह पीड़ित ही क्यों न हो उसकी उपेक्षा या उसका विरोध करना है। कुछ इसी तरह के कार्य इशरत जहाँ की मौत के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया था जिससे लाभ उठाकर वे तीसरी बार मुख्यमंत्री भी बन चुके हैं।
मित्रों,इसी दौरान पुणे के पंढ़रपुर में भी एक घटना घटी है। आत्महत्या की नहीं नृशंस हत्या की जिसको देखकर जंगली,हिंसक पशुओं को भी शर्म आ जाए लेकिन छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी गिद्ध तो बहुत पहले ही शरमोहया को तिलांजलि दे चुके हैं। सावन राठौड़ नामक एक 17 साला महादलित युवक नाली साफ करने के दौरान 13 जनवरी को पुणे के बिठोबानगरी पंढ़रपुर में सड़क किनारे पेशाब कर रहा था। तभी इब्राहिम महबूब शेख,जुबेर तंबोली (26) और इमरान तंबोली (28) ने उससे पूछा कि वो हिंदू है या मुसलमान और हिंदू बताते ही उनलोगों ने घनघोर असहिष्णुता और क्रूरता का परिचय देते हुए बिना किसी पूर्व परिचय के पूर्व शत्रुता की दूर की बात रही पहले तो पटककर उसको पेट्रोल पिलाया और फिर आग लगा दी।
मित्रों,पुणे के सासून अस्पताल में घर से बाप से झगड़ाकर भागे गरीब ने दो दिन बाद दम तोड़ दिया। उसके पिता एक ईट भट्ठे में मजदूरी करते हैं। पीड़ित ने मरने से पहले अपने आखिरी बयान में जो कहा है बस उतना ही कहा है जितना ऊपर हमने आपको बताया। लेकिन आश्चर्य है कि रोहित वेमुला की कायरता पर चीत्कार करने वाले लोग सावन के परिवार के आस-पास भी नहीं फटक रहे हैं। खैर उनको तो लगता है कि सावन के घर जाने से छोटे वोटबैंक के चक्कर में बड़ा वोटबैंक नाराज हो जाएगा। लेकिन आश्चर्य तो इस बात को लेकर है कि महाराष्ट्र में सरकार चला रही भाजपा भी इस घनघोर सांप्रदायिक घटना को कानून-व्यवस्था से संबंधित छोटी घटना बता रही है जबकि उसको यह अच्छी तरह से पता है कि उसको मुसलमानों ने न कभी वोट दिया है और न कभी देंगे।
मित्रों,मेरा हमेशा से ऐसा मानना रहा है कि हिंदुस्तान को असली खतरा मुसलमानों से नहीं है,न ही पाकिस्तान या चीन से हैं बल्कि उन हिंदुओं से है जो क्षुद्र स्वार्थ के वशीभूत होकर देशहित में नहीं सोंचते हैं और छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी,भेदभावपूर्ण व्यवहार करने लगते हैं और करने लगे हैं। जिनको दादरी तो दिखाई देती है लेकिन मालदा और पूर्णिया नजर नहीं आते। मैं यह नहीं कहता कि दादरी की घटना की प्रशंसा की जानी चाहिए लेकिन मैं यह भी नहीं कहता कि मुसलमानों को हिंदुओं को चिढ़ाने के लिए खुलेआम सरेबाजार गोवध करना चाहिए। खाने के लिए उनके खुदा ने इतनी चीजें दी हैं क्या वे उसमें से केवल एक का त्याग नहीं कर सकते? यहाँ मैंने उनके खुदा शब्द का प्रयोग न चाहते हुए भी इसलिए किया क्योंकि पिछले सप्ताह मिस्र की एक विद्वान महिला मुसलमान प्रोफेसर ने कहा है कि उनका खुदा मुसलमानों को गैरमुस्लिम महिलाओं के साथ गैंग रेप करने की ईजाजत देता है। पता नहीं उनका खुदा हमारे भगवान से कब और कैसे अलग हो गया जो दया को ही धर्म कहता है,अपनी स्त्री के अलावे सारी स्त्रियों को माता मानने की हिदायत देता है। वैसे पता नहीं भारत के छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी हिंदुओं का कौन-सा वो खुदा है जो कहता है कि आत्मघाती रोहित के लिए हल्ला बोल दो और वास्तविक पीड़ित सावन के परिवार के आसपास भी नहीं फटको क्योंकि उनका अगर कोई भगवान होता तो वे यकीनन इसका उलट कर रहे होते।

बुधवार, 20 जनवरी 2016

छाती पीटिए क्योंकि नीतीश सरकार काम कर रही है


वैधानिक चेतावनी-यद्यपि यह रचना व्यंग्य नहीं है तथापि अगर पढ़ते समय या पढ़ने के बाद आपको लगे कि यह व्यंग्य ही है तो इसे हम आपकी कृपा समझेंगे।
हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आप कहेंगे कि जब नीतीश सरकार काम कर रही है तो ताली पीटना चाहिए छाती क्यों पीटें? लगता है आप नहीं समझे आजकल वाला विकास के बिहार मॉडल को। पहले वाला मॉडल भाजपा का था अब वाला भाई-भतीजा का है। नीतीश जी का अपना कोई मॉडल न पहले था और न अब है। जब जिसके साथ रहे तब उसका वाला मॉडल ले लिए।
मित्रों,पहले नीतीश जी की सहयोगी भाजपा मानती थी कि सुशासन स्थापित करने से और विकास करने से वोट मिलता है। वोट मिला भी 2010 के विधानसभा चुनाव में नीतीश और भाजपा दोनों को मिला। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को ज्यादा मिला और नीतीश जी को कम। मतलब यह कि जिसका विकास मॉडल था लोग बिहार की लगभग सब सीट भी उसी को दे दिया।
मित्रों,तब नीतीश जी का माथा ठनका और वो होश में आ गए। सारा भ्रम टूट गया कि जिसको लोग बिहार का विकास मॉडल कहते हैं वो उनका था। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद नीतीश जी के पास न तो वोट था और न ही कोई मॉडल ही बचा था। तब उन्होंने लालू जी से संपर्क किया जिनके पास उनसे ज्यादा वोट भी था और एक विकास का मॉडल भी था जिसको एक समय नीतीश जी भी विनाश का मॉडल,जंगलराज और आतंकराज कहते थे।
मित्रों,लेकिन अब स्थितियाँ अलग थीं। नीतीश जी लंबे समय से सत्ता में थे और किसी भी कीमत पर बिहार के राजपाठ को हाथ से जाना नहीं देना चाहते थे। अबतक वे अच्छी तरह से समझ चुके थे कि न तो विकास का कोई मतलब होता है और न ही विकास मॉडल का असली सार तो सत्ता में बने रहने में हैं। फिर चाहे इसके लिए घिनौने बड़े भैया की गोद में बैठना पड़े या फिर शरारती-बदनाम भतीजों को अपनी गोद में बैठाना पड़े।
मित्रों,आपको याद होगा कि साल 1990 से 2005 तक लालू-राबड़ी स्टाईल बिहार मॉडल से कैसे बिहार का विकास हुआ था। जनता का एक वर्ग जो साध था छाती पीट रहा था और दूसरा वर्ग जो अपराधी था वो पहले वर्ग को पीट रहा था। ताली सिर्फ लालू-राबड़ी और उनके दरबारी पीट रहे थे। अब नीतीश कुमार जी अगर कहते हैं कि जितनी छाती पीटनी है पीटिए हम तो अपना काम करेंगे तो इसका कोई और मतलब नहीं निकालिए। उनके कहने का मतलब बस इतना है कि 1990 से 2005 तक जो लोग छाती पीट रहे थे एकबार फिर से पीट सकते हैं उनको फर्क नहीं पड़ता क्योंकि अब उनके साथ ताली पीटने के लिए वे सारे लोग आ गए हैं जो उस महान् कालखंड में ताली पीट रहे थे। और जब छाती और ताली पीटनेवाले मौजूद हैं तो फिर जबतक छाती पीटनेवालों को पीटनेवाले नहीं हों तो विकास का मॉडल पूरा कैसे होगा,अधूरा नहीं रह जाएगा? सो अब बिहार में खून-तून सब माफ होगा लेकिन नीतीश जी बस इतना ही गुनगुनाते रहेंगे कि आबो हवा बिहार की बहुत साफ है, कायदा है कानून है इंसाफ है,अल्ला मियाँ जाने कोई जिए या मरे,बिहार में खून-तून सब माफ है। इसे ही तो कहते हैं कानून के राज के साथ-साथ न्याय के साथ विकास भी और गरीबों का राज भी। अब बिहार में कोई जंगलराज नहीं बोलेगा और नीतीश जी के सामने तो हरगिज नहीं क्योंकि इस शब्द को बिहार में प्रतिबंधित कर दिया गया है। बोला नहीं कि गया बेट्टा!!! कहाँ जाने की बात हो रही है अगर जानना है तो पहले उस बस वाले से पूछिए जो बस के पीछे लिखवाए हुए है कि लटकले त गेले बेटा।

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

धर्मनिरपेक्ष हिंसा हिंसा न भवति


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अगर आपने भारतेंदु साहित्य को पढ़ा होगा तो पाया होगा और कदाचित् पढ़ा भी होगा उनकी एक रचना को जिसका नाम है वैदिक हिंसा हिंसा न भवति। खैर ये तो बात हुई डेढ़ सौ साल पहले की लेकिन आज वोट बैंक और कुत्सित राजनीति की बदौलत इस श्लोक का स्वरूप बदल गया है और आजकल इस प्रसिद्ध श्लोक के उलट धर्मनिरपेक्ष हिंसा हिंसा न भवति वास्तविकता बन गई है।
मित्रों,आज भी चकरा गए होंगे कि हिंसा भी कहीं धर्मनिरपेक्ष और सांप्रदायिक होती है। परंतु सच्चाई यही है कि इस समय हिंसा भी भारत में दो प्रकार की हो गई है-एक जो हिंदू करें और दूसरी जो मुसलमान करें। जो हिंसा हिंदू करते हैं उसका आकार चाहे जितना छोटा हो,प्रभावित होनेवाले लोगों की संख्या चाहे जितनी कम हो वह हिंसा सांप्रदायिक हिंसा होती है और जो हिंसा मुसलमान करते हैं उससे चाहे हजारों लोग मारे जाएँ वह धर्मनिरपेक्ष होती है और जो हिंसा धर्मनिरपेक्ष हो वह हिंसा ही कैसे हो सकती है।
मित्रों,हमारी बिकाऊ मीडिया और धूर्त बुद्धिजीवियों का मानना है कि चाहे मुसलमान सैंकड़ों गोधरा कर डालें उनके खिलाफ किसी भी तरह के कदम नहीं उठाए जाने चाहिए। गोधरा की आगजनी,मानव-दहन धर्मनिरपेक्ष होता है। उस आग में जलनेवाले को दर्द नहीं होता, दर्द तो सिर्फ मुसलमानों को होता है। मुसलमान चाहें तो खुलेआम सड़कों पर गोहत्या करें क्योंकि वह हिंसा तो हिंसा होती ही नहीं है न। गाय भी अपने पूजक हिंदुओं की तरह सांप्रदायिक होती है इसलिए गाय के न तो खून होता है,न छटपटाहट और न ही दर्द। लेकिन कोई हजरत मोहम्मद के चरित्र के बारे में कुछ नहीं कह सकता भले ही वो सच्चाई पर आधारित हो,फैक्ट हो क्योंकि हजरत मोहम्मद मुसलमानों के पूज्य हैं और मुसलमान या उनके पूज्य तो गलती कर ही नहीं सकते क्योंकि वे तो एकजुट होकर वोट डालते हैं। लेकिन अगर कोई कला के नाम पर हिंदुओं के पूज्यों-पूजनीयों को अपमानित करता है ऐसा वो निर्भय होकर कर सकता है क्योंकि तब उसका कृत्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत माना जाएगा। क्या ऐसा इसलिए नहीं क्योंकि हिंदू एकजुट होकर वोट नहीं डालते??
मित्रों,प. बंगाल की मुख्यमंत्री का आँख मूंदकर मानना है कि मालदा में ढाई लाख मुसलमानों द्वारा हिंदुओं की संपत्ति के साथ की गई तोड़-फोड़ को सांप्रदायिक हिंसा नहीं कहा जाना चाहिए। तो फिर क्या कहा जाना चाहिए,धर्मनिरपेक्ष हिंसा??? हिंदुओं को जो नुकसान हुआ क्या वो नुकसान नहीं था,हिंदुओं ने जो खून-पसीना बहाकर धन कमाया क्या वो खून-पसीना खून-पसीना नहीं था? दादरी या कहीं भी एक मुसलमान की हत्या हो जाए तो वह धर्मनिरपेक्षता की हत्या होती है क्योंकि मुसलमान तो धर्मनिरपेक्ष होते हैं न। आज पूरी दुनिया मुसलमानों से परेशान है,जेहादी या फसादी हिंसा से परेशान है। अगर मुसलमान धर्मनिरपेक्ष होते तो ऐसा क्यों होता?? हम हिंदू गलत हो सकते हैं लेकिन क्या पूरी दुनिया के अन्य धर्मावलंबी भी गलत हैं? पूरी दुनिया गलत है? क्या एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में तलवार लेकर पूरी दुनिया में हिंसा का तूफान पैदा कर देना धर्मनिरपेक्षता है?? हमारे यहाँ कहावत है कि मरा घोड़ा घास नहीं खाता लेकिन कई मुसलमान मानते हैं कि वे निर्दोषों को मारने के क्रम में मरने के बाद स्वर्ग जाएंगे जहाँ उनको सुंदर लड़कों-लड़कियों के साथ सेक्स का आनंद लेने का अवसर मिलेगा। कई युवक तो यौनांगों पर लौह-कवच लगाकर मरना पसंद करते हैं। कितना मूर्खतापूर्ण विश्वास है!!! मरने के बाद क्या होता है किसने देखा है या जाना है? आप कहेंगे कि हिंदू भी तो मृत्योपरांत जीवन की बात करते हैं। जरूर करते हैं पुनर्जन्म की भी और स्वर्ग-नरक की भी। लेकिन सर्वोपरि हिंदू ग्रंथ गीता कहती है कि जैसा करोगे वैसा जरूर भरोगे और इसी जन्म में भरोगे। अगला जन्म भी होगा लेकिन वह जन्म आत्मा का होगा शरीर का नहीं इसलिए स्वर्ग में हूर या गिलमा मिलने का तो सवाल ही नहीं।
मित्रों,सांप्रदायिक हिंदुओं के ग्रंथ कहते हैं कि परोपकार से बड़ा कोई पुण्य नहीं है और परपीड़ा से बड़ा कोई पाप नहीं। हमारा कोई भी ग्रंथ यह नहीं कहता कि जो तुम्हारे धर्म को नहीं माने उसका गला रेत दो,उनकी स्त्रियों के साथ सामूहिक, नारकीय बलात्कार करो,उनको बेच दो और उनका मांस पकाकर खा जाओ। जो तुमसे भिन्न मत रखे उसे तड़पा-तड़पाकर मार डालो या जबरन हिंदू बना लो बल्कि वह तो कहता है कि मुंडे-मुंडे मति भिन्नाः।
मित्रों,अगर कोई धर्मग्रंथ या धर्म इस तरह के घोर पैशाचिक कुकर्मों का समर्थन करता है तो वह ईसानों का नहीं पिशाचों का धर्मग्रंथ है,धर्म है और उसको बदल देना चाहिए या फिर मिटा देना चाहिए। अमेरिका में तो इस बार का राष्ट्रपति चुनाव ही इस्लाम और इस्लामिक कट्टरता के मुद्दे पर होने जा रहा है। शायद ऐसा इसलिए क्योंकि बहुसंख्यक अमेरिकी जो ईसाई हैं एकजुट होकर मतदान करते हैं और उनके लिए देशहित ही सर्वोपरि है जाति-पाति या साईकिल राशि या छात्रवृत्ति या आरक्षण नहीं। कहने का तात्पर्य यह कि जबतक हिंदू बँटे रहेंगे तबतक क्षुद्र स्वार्थी नेताओं की नजरों में सांप्रदायिक बने रहेंगे और जिस दिन एकजुट हो जाएंगे उसी दिन से वे ममता-लालू-नीतीश-सोनिया-माया-मुलायम आदि के लिए धर्मनिरपेक्ष हो जाएंगे। तब कोई ममता बनर्जी हिंदू होते हुए भी निर्मम होकर यह नहीं कह सकेगी कि मालदा की हिंसा सांप्रदायिक हिंसा नहीं थी या लालू यादव यह नहीं कहेंगे गोधरा में ट्रेन में आग खुद कारसेवकों ने ही लगाई थी। उसी दिन से भारत में मुस्लिम तुष्टिकरण की राष्ट्रविरोधी,विनाशक नीति का अंत हो जाएगा और हमारे छद्म धर्मनिरपेक्ष नेता प्रत्येक समस्या और हर तरह की हिंसा का विश्लेषण भी सिर्फ और सिर्फ गुण-दोष के आधार पर करने लगेंगे। तब कोई नहीं कहेगा कि धर्मनिरपेक्ष हिंसा हिंसा न भवति बल्कि सब कहेंगे कि प्रत्येक हिंसा हिंसा भवति।

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

लालू-नीतीश का रणनीतिकार ब्राह्मण क्यों?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आज प्रशांत किशोर को कौन नहीं जानता? वे किसी परिचय के मोहताज नहीं है। वह एक ऐसी शख्सियत के रूप में उभरे हैं जिसका चुनावी रणनीति बनाने में कोई जवाब नहीं है।  जब प्रशांत ने मोदी के अभियान का नेतृत्व किया तब किसी को भी आश्चर्य नहीं हुआ लेकिन जब लालू-नीतीश ने उनको अपनी नैया का खेवनहार बनाया तो वह जरूर आश्चर्यचकित कर देनेवाला निर्णय था। आश्चर्यचकित कर देनेवाला इसलिए क्योंकि लालू-नीतीश हमेशा से ब्राह्मणविरोधी आरक्षणवादी व्यवस्था के कट्टर समर्थक रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि उन्होंने क्यों और कैसे एक ब्राह्मण प्रशांत किशोर को अपना रणनीतिकार बनाया।
मित्रों,जब इनलोगों को डॉक्टर बनाना होता है तो वे 100 में से 90 अंक लानेवाले डॉक्टर की जगह 10 नंबर लानेवाले को डॉक्टर बनाते हैं,गांवों में प्रतिभावान  पढ़े-लिखे नेतृत्व की जगह अंगूठाछाप को मुखिया-सरपंच बनाते हैं तो इनको अपना रणनीतिकार बनाने में भी तो आरक्षण लागू करना चाहिए था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि तब सवाल राज्य या पंचायत के विकास का नहीं था बल्कि अपनी कुर्सी का था,अपने भविष्य का था इसलिए किसी भी तरह का जोखिम नहीं लिया जा सकता था। इसलिए इनलोगों ने सर्वश्रेष्ठ दिमागवाले,प्रतिभावाले को अपनी रणनीति बनाने का भार सौंपा। मुझे पूरा यकीन है कि चाहे लालू-नीतीश हों या मुलायम-माया जब ये लोग बीमार होंगे तो ये सर्वश्रेष्ठ डॉक्टर के पास ही जाएंगे फिर वो डॉक्टर किसी वैसी जाति से ही क्यों न आता हो जिनको वे जीवनभर गालियाँ देते रहे हों। तब ये लोग 100 में से 10 अंक पाकर प्रवेश परीक्षा में जाति के बल पर सफल घोषित होनेवाले से अपना ईलाज हरगिज नहीं करवाएंगे बल्कि तब इनको 100 में से 91 अंक लानेवाले के पास ही जाएंगे फिर भले ही वो क्यों न तिलक,तराजू और तलवार या भूराबाल वाली जातियों से आते हों। माया ने तो पिछले दो चुनावों से अपना नारा भी बदल दिया है-ब्राह्मण शंख बचाएगा,हाथी बढ़ता जाएगा। बहनजी, 5 साल पहले तक आपके करकमलों से जूते खानेवाला ब्राह्मण क्यों शंख बजाएगा?
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि न कथित समाजवादी और कथित मनुवाद-विरोधी नेताओं का न तो कोई सिद्धांत है और न ही कोई मूल्य। इनको तो बस किसी भी तरह से चुनाव जीतना है। ये लोग जब राज्य का सवाल आएगा तब तो प्रतिभा की जगह वोटबैंक को प्राथमिकता देंगे,दूसरों की हजामत होनी हो तो बंदर के हाथ भी उस्तरा पकड़ा देंगे लेकिन जब सवाल खुद अपने भविष्य या अपनी जान का आएगा तब ये लोग किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेंगे और सर्वश्रेष्ठ को ही अपना सहायक या खेवनहार बनाएंगे। यहाँ मेरे कहने यह तात्पर्य नहीं है कि पिछड़ी जातियों या दलित-आदिवासियों में कोई प्रतिभावान है ही नहीं। मेरा उद्देश्य तो इन घनघोर जातिवादी नेताओं के दोहरे मापदंड यानि अपने लिए कुछ और राज्य के मामले में कुछ और की पोल खोलना मात्र है।

रविवार, 3 जनवरी 2016

राजगीर पे करम सही मगर वैशाली पे सितम क्यों?


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,किसी को भी पता नहीं है कि बिहार सरकार का पर्यटन के लिए रोडमैप क्या है। अगर तनिक गौर से भी देखा जाए तो हम पाएंगे कि बिहार की वर्तमान सरकार के लिए राजगीर और नालंदा ही पर्यटन की दृष्टि से सबकुछ है। अगर हम यह कहें कि नालंदा जिला ही नीतीश कुमार के लिए पूरा बिहार है तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।
मित्रों,कोई भी नेता या सीएम पहली प्राथमिकता अपने इलाके को देता है इसलिए अगर नीतीश कुमार भी ऐसा करते हैं तो जरूर करें लेकिन न जाने क्यों वे बिहार के दूसरे सबसे महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल वैशाली से नाराज दिखते हैं। राजगीर तो वे बार-बार जाते हैं,टमटम की सवारी करते हैं,वहाँ नौका विहार भी करते हैं लेकिन कभी वैशाली के लिए वक्त नहीं निकालते। यहाँ तक कि वैशाली महोत्सव के उद्घाटन में भी नहीं आते। अभी वैशाली के जिला मुख्यालय हाजीपुर से सटे दुनिया के सबसे बड़े मेले सोनपुर मेले का समापन हुआ है नीतीश जी इसके उद्घाटन में तो नहीं ही आते हैं मेला घूमने भी नहीं आते। हम बराबर अखबार में पढ़ते हैं कि राजगीर में यह बन रहा है या यह बन चुका है लेकिन वैशाली में? इतिहास साक्षी है कि भगवान बुद्ध को वैशाली भी कम प्रिय नहीं थी फिर यह नीतीश कुमार जी और उनकी सरकार को अप्रिय क्यों है?
मित्रों,हद तो तब हो जाती है जब हम पाते हैं कि विगत कई वर्षों से बिहार सरकार जैनियों के अंतिम तीर्थंकर महावीर का जन्मोत्सव वैशाली के बाहर मगध के किसी स्थान पर मनाने लगी है। यह तो बहुत पहले ही सिद्ध हो चुका है और इतिहासकारों में निर्विवादित तथ्य भी है कि महावीर का जन्म वैशाली के लिच्छवी गणतंत्र के राजपरिवार में हुआ था। यह भी निर्विवादित तथ्य है कि लिच्छवी गणतंत्र गंगा के उत्तर में स्थित था फिर पिछले कुछ वर्षों में महावीर गंगा के दक्षिण मगध या अंग क्षेत्र में कैसे पैदा होने लगे हैं समझ में नहीं आता। क्या गंगा के दक्षिण दक्षिण बिहार में महावीर जन्मोत्सव मनाना वैशाली के खिलाफ कोई सरकारी साजिश है? यह सही है कि महावीर ने नालंदा जिले के पावापुरी में अपने प्राण त्यागे थे लेकिन जन्म तो उन्होंने वैशाली में ही लिया था और जैन और बौद्ध धर्मग्रंथ भी तो ऐसा ही मानते हैं। अगर बिहार सरकार या नीतीश कुमार के मन में वैशाली के खिलाफ कोई साजिश चल रही है तो बिहार के हित में उस पर तत्काल प्रभाव से रोक लगनी चाहिए। वैसे इतिहास साक्षी है कि नीतीश जी के मगध और हमारी वैशाली के बीच लंबे समय तक शत्रुता चलती रही लेकिन उसे समाप्त हुए तो हजारों साल बीत चुके हैं।
मित्रों,अब थोड़ी बात कर लेते हैं बिहार की बिगड़ती कानून-व्यवस्था पर। पिछले दिनों मुख्यमंत्री बिहार जो गृह मंत्री भी हैं ने राजधानी पटना में लगातार कई दिनों तक राज्य के वरीय पुलिस अधिकारियों के साथ मीटिंग की। एक मीटिंग से तो उन्होंने कई अधिकारियों को उसी तरह बाहर निकाल दिया जैसे कि अयोग्य शिक्षक कक्षाओं से शरारती बच्चों को निकाल देते हैं। यहाँ तात्पर्य उन शिक्षकों से है जिनको पढ़ाना तो आता नहीं सिर्फ अनुशासन का डंडा फटकारना आता है। कदाचित् नीतीश जी भी बिहार की कानून-व्यवस्था के मामले में कुछ इसी तरह का आडंबरपूर्ण रवैया अख्तियार किए हुए हैं। सारे योग्य अधिकारियों को तो उन्होंने संटिंग में डाल रखा है और जमकर ट्रांस्फर और पोस्टिंग के नाम पर पैसा भी बना रहे हैं। उनकी जिद है कि हम गदहों से ही घोड़ों का काम लेंगे। दूसरी तरफ उनके बड़े भाई लालू प्रसाद जी प्रसिद्ध पुलिस अधिकारी अभयानंद के पीछे पड़े हुए हैं जबकि यह बात किसी से भी छिपी हुई नहीं है कि नीतीश कुमार के सीएम बनने के बाद अभयानंद जी के फार्मूले पर चलने से ही बिहार की कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ था। यह बात भी किसी से छिपी हुई नहीं है कि लालू जी को अपने एकछत्र राज के समय से ही अभयानंद,डीएन गौतम और किशोर कुणाल जैसे वर्तमान और अवकाशप्राप्त जिद्दी, ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ अधिकारियों से चिढ़ है।
मित्रों,ऐसे में सोंचना नीतीश जी को है कि वे बिहार को किस बिहार मॉडल से चलाना चाहते हैं-अपने मॉडल से जिस पर उन्होंने शासन संभालने के आरंभिक वर्षों में अमल किया था या फिर लालू जी के मॉडल से जिस पर चलकर कोई दशकों तक लगातार किसी राज्य को बर्बाद करते हुए भी सत्ता में बना रह सकता है।

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

बिहार अपहरण औद्योगिक क्षेत्र में आपका स्वागत है


हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह।
वैधानिक चेतावनी:यह रचना कदापि एक व्यंग्य नहीं है।
मित्रों,आपने अबतक विभिन्न शहरों के औद्योगिक क्षेत्रों के नाम सुने होंगे। उनमें से कईयों में इस तरह के बोर्ड भी पढ़े होंगे कि हाजीपुर,बक्सर,पटना,मुजफ्फरपुर,वाराणसी,इंदौर,नोएडा,गाजियाबाद आदि औद्योगिक क्षेत्रों में आपका स्वागत है। मगर आपने आजतक किसी अपहरण औद्योगिक क्षेत्र का नाम नहीं सुना होगा,बोर्ड पढ़ने की बात तो दूर रही। पढ़िएगा भी कैसे यह उद्योग तो सिर्फ बिहार में पाया जाता है या फिर आईएसआईएस के ईलाके में। बिहार में भी सौभाग्यवश इसके फलने-फूलने लायक मौसम 10 साल के लंबे इंतजार के बाद आया है।
मित्रों,बिहार के हर जिले में फिर से यानि पूर्ववर्ती लालू-राबड़ी सरकार की तरह फिर से इस उद्योग की वृद्धि-दर सबसे तेज हो गई है। शायद 100 या 200 प्रतिशत की वृद्धि-दर। दुर्भाग्यवश बिहार सरकार के आंकड़ों में इस उद्योग का कहीं भी उल्लेख नहीं होता। बिहार के प्रत्येक जिले और शहर में एक बार फिर से अपहरण कंपनियाँ स्थापित हो गई हैं जिनका एक सीईओ होता है और कई दर्जन निदेशक। पहले फोन या मैसेज कर पार्टी से पैसे मांगे जाते हैं। फिर घर पर गोली चलाई जाती है या बम फेंका जाता है। अगर अपहरण करना संभव नहीं हुआ तो पार्टी को सीधे यमपुरी की सैर करवा दी जाती है वैसे ही जैसे कल-परसों दरभंगा में एक पथ निर्माण कंपनी के दो इंजीनियरों को करवा दी गई।
मित्रों,इस उद्योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पूंजी न के बराबर लगती है। मशीन के नाम पर खर्च बहुत मामूली। बस कुछेक बंदूकों,पिस्तौलों,गाड़ियों,मोबाइलों और बमों का इंतजाम करना होता है। अगर आप एक विशेष सत्तारूढ़ जाति से हुए तो पुलिस का भी डर नहीं क्योंकि आपकी जाति का कोई-न-कोई नेता थोड़े-से पैसों के बदले आपकी मदद कर देगा। कभी-कभी तो एक कंपनी को माल (अपहृत) अपने पास रखने में खतरा लगे तो वो दूसरी कंपनी के हाथों उसे बेच भी देती है। कई बार पुलिस को भी सीधे तौर पर कारोबार में साझीदार बना लिया जाता है।
मित्रों,जैसे प्रत्येक उद्योग के कई सहायक उद्योग होते हैं वैसे इस महान उद्योग के भी हैं। इसका सबसे बड़ा सहायक उद्योग है-कुटीर कट्टा और बम निर्णाण उद्योग। इस उद्योग के विकास में कई बाधाएँ भी हैं। सबसे बड़ी बाधा है प्रशिक्षित लोगों का अभाव। इसे दूर करने के लिए सरकार को चाहिए कि वो राज्य के हर प्रखंड में प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने जहाँ गोलियाँ चलाने और उत्तम स्तर के देसी कट्टा बनाने और शालीनतापूर्वक अपहरण करने की ट्रेनिंग दी जाए। शालीनतापूर्वक अपहरण करने का सबसे बड़ा लाभ होगा कि दूसरे राज्यों और देशों के लोग भी बार-बार अपना अपहरण करवाने के लिए बिहार की यात्रा पर आएंगे जिससे पर्यटन को भारी बढ़ावा मिलेगा। इस उद्योग की तीव्र अभिवृद्धि में दूसरी सबसे बड़ी बाधा है बिजली। इसके लिए लालू-राबड़ी राज के बाद निष्क्रिय अवस्था में पड़े तरकट्टी गिरोह को सक्रिय करना होगा। वैसे भी अभी जाड़े का समय है जो तरकट्टी के लिए बहुत-ही माफिक है।
मित्रों,वैशाली जिले में इस उद्योग के महान पूर्व इतिहास को देखते हुए हम बिहार सरकार से विनती करेंगे कि राघोपुर में पक्का नदी पुल के निर्माण को अनंतकाल के लिए स्थगित कर दिया जाए। पिछले अनुभव से पता चलता है कि पीपा-पुल बनने से राघोपुर प्रखंड में गांजे की खेती को गहरा धक्का लगा।
मित्रों,इस समय इस महान् ऐतिहासिक उद्योग के पक्ष में सबसे अच्छी बात जो जा रही है वह यह है कि पिछले सालों में पैसे लेकर सरकार द्वारा पोस्टिंग करने के चलते राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति लगातार गिरती ही जा रही है। उदाहरणार्थ,पिछले साल वैशाली जिले के चांदपुरा ओपी थाने के खोरमपुर में मुन्ना सिंह नामक अति गरीब की हत्या हुई। हत्यारा धनवान था इसलिए पैसे लेकर गरीबों की सरकार की पुलिस कुछ इस तरह सोई कि आज तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। इसी तरह हाजीपुर नगर थाने के लोदीपुर चकवारा में दस दिन पहले राकेश नामक टेंपो चालक को मलद्वार में लाठी घुसाकर,हाथों में कीलें ठोंककर,करंट लगाकर पड़ोसी धनपतियों द्वारा मार दिया गया लेकिन सौभाग्यवश इस मामले में भी अभी तक गरीबों की सरकार की पुलिस ने कोई गिरफ्तारी नहीं की है और आगे भी ऐसा होने की कोई उम्मीद नहीं है।
मित्रों,मैं चाहता तो था कि इस आलेख को परिणति तक पहुँचाऊँ लेकिन मैं भी इंसान ही हूँ। स्वाभाविक है कि मुझे डर भी लगता है। आपसे भी एक विनती है कि किसी को भी नहीं बताईएगा कि मैंने अपहरण-उद्योग के महिमामंडम में कुछ लिखा है वरना खुद मेरा अपहरण होने का खतरा बढ़ जाएगा। वो क्या है कि इस उद्योग से जुड़े लोग विचित्र हैं विपक्ष में लिखनेवालों पर तो अपना गुस्सा उतारते ही हैं पक्ष में लिखनेवालों को भी नहीं छोड़ते क्योंकि ऐसे लेखों को वे गलती से व्यंग्य समझ लेते हैं भले ही हम कितनी ही वैधानिक चेतावनी क्यों न दे दें।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

मैला आँचल का दुलारचंद कापरा और राहुल-सोनिया

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आपने हिंदी फिल्मों में बहुत से ऐसे खलनायक-पुत्र देखे होंगे जो पुलिस में कार्यरत हीरो से कहते हैं कि मैं नहीं डरता तुम्हारे कायदे-कानून से क्योंकि मेरे पास बहस करने के लिए वकीलों की फौज है और जजों को खरीदने के लिए अफरात पैसा।
मित्रों,मुझे नहीं पता कि कांग्रेस उपाध्यक्ष नेहरू-गांधी परिवार के चश्मोचिराग राहुल गांधी के पास कितने पालतू अधिवक्ता हैं और उनके खानदानी खजाने में कितना पैसा है लेकिन उनकी भाषा और उनकी अकड़ जरूर वही है और वैसी ही है जैसी कि हिंदी फिल्मों के खलनायकों के बेटों में होती है।
मित्रों,राहुल जी की माँ अक्सर भाजपा पर यह आरोप लगाती हैं कि भारतीय जनता पार्टी के लोग देश की आजादी के लिए जेल नहीं गए। मैं सोनिया जी को उनके राजवंश के संस्थापक पं. जवाहर लाल नेहरू जी का एक प्रसंग सुनाना चाहूंगा जो मैंने प्रकाशन विभाग द्वारा कांग्रेस शासन में प्रकाशित किसी पुस्तक में पढ़ा था। हुआ यह कि नेहरू जी को किसी आंदोलन में भाग लेने के कारण जेल भेजा गया। जेलर अंग्रेज था और बला का जालिम भी।  वो आटे में मिट्टी मिलाकर रोटियाँ बनवाता और स्वतंत्रता-सेनानियों को खाने को देता।
मित्रों,जवाहर लाल जी ठहरे खानदानी रईस सो उनसे मिट्टी मिली रोटी खाई नहीं गई और पहुँच गए जेलर के पास शिकायत लेकर। जेलर ने कहा कि खुद को स्वतंत्रता-सेनानी कहते हो और देश की मिट्टी नहीं खा सकते?  तब नेहरू जी ने खूबसूरती से जवाब दिया था कि हम यहाँ देश की मिट्टी को आजाद कराने के लिए आए हैं न कि देश की मिट्टी को खाने के लिए। लेकिन तब नेहरू जी को यह पता नहीं था कि उनके वंशज देश की मिट्टी तो क्या देश का कोयला और हवा में तैरते तरंगों तक को खा जाएंगे।
मित्रों,मैं सोनिया जी को एक और कथा भी सुनाना चाहूंगा। प्रसंग प्रख्यात समाजवादी विचारक और कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु के विश्वप्रसिद्ध उपन्यास मैला आँचल से है। पृ.सं. 294,राजपाल प्रकाशन,आठवीं आवृत्ति:2003। कांग्रेस का सच्चा कार्यकर्ता,वास्तविक गांधी भक्त और स्वतंत्रता सेनानी बावनदास आजादी मिलने के बाद कांग्रेस के बदले हुए चरित्र से काफी परेशान है। वो परेशान है कि "कटना के दुलारचंद कापरा,वही जुआ कंपनीवाला,जिसकी जूए की दुकान पर नेवीलाल,भोलाबाबू और बावन ने फारबिसगंज मेला में पिकटिन किया था। जूआ भी नहीं,एकदम पाकिटकाट खेला करता था और मोरंगिया लड़कियों,मोरंगिया दारू-गाँजा का कारबार करता था। ...आज कटहा थाना काँग्रेस का सिकरेटरी है! .....उसी की गाड़ियाँ हैं।" उधर गाँव-ईलाके के लोग गांधीजी की हत्या के बाद उनके श्राद्ध का भोज आयोजित करने में तल्लीन हैं और ईधर महान कांग्रेसी दुलारचंद कापरा तस्करी का माल बोर्डर पार पहुँचाने की फिराक में है। पूरा प्रशासन उसकी मदद कर रहा है और बावन अंगुल का बावनदास खड़ा है उसकी गाड़ियों के काफिले के आगे उसका रास्ता रोककर। वो उसे याद दिलाता है कि कापरा जी आप भी तो कांग्रेसी ही हैं फिर भी वो नहीं सुनता और बावनदास पर गाड़ी चढ़ा देता है। ठीक गांधी जी के श्राद्ध के दिन उनके अनन्य भक्त की हत्या कर दी जाती है और वो भी नए-नवेले कांग्रेसी के हाथों।
मित्रों,यह हत्या बावनदास की हत्या नहीं थी बल्कि कांग्रेस पार्टी की हत्या थी,कांग्रेस के आदर्शों की हत्या थी। महान साहित्यकार फणीश्वर नाथ रेणु तो कांग्रेस के बदले हुए चरित्र को सन् 1954 ई. में ही समझ गए थे लेकिन आश्चर्य है कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी इसे आज तक नहीं समझ पाए हैं। हमारे बिहार में एक कहावत है कि जिसकी आँखों में ढेढर हो उसी को वो दिखाई नहीं देता है।
मित्रों,मैं ताल ठोंककर कहता हूँ कि कांग्रेस को मोदी तो क्या किसी से भी डरने की जरुरत नहीं है। यह विडंबना है कि सन् 1954 ई. में तो दुलारचंद कापरा कांग्रेस का छोटा-मोटा पदाधिकारी ही बना था लेकिन आज तो वो पार्टी का आलाकमान बन चुका है। कांग्रेस को डरना है कि खुद से डरे,खुद अपने चरित्र से डरे। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोई डरने-डराने की वस्तु नहीं है जिनसे कोई डरे। राहुल जी को चाहिए कि वे अपनी पार्टी के चाल,चरित्र और चेहरे को बदलें और अपने मन में विचारें कि उनकी पार्टी आजादी के पहले क्या थी और आज क्या हो गई है। जिस पार्टी के नेतृत्व में कभी भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी गई थी वही पार्टी आज भारत के सबसे बड़े शत्रु पाकिस्तान के हाथों का मोहरा या खिलौना बन गई है। देश को बताएँ कि खुर्शीद और अय्यर ने अभी हाल ही में पाकिस्तान जाकर क्या-क्या किया है और क्या-क्या बोला है। डरना है तो अपने मन के आईने से डरें राहुल जिसमें उनको अपना और अपनी पार्टी का वास्तविक चेहरा दिखाई देगा,अपनी अंतरात्मा से डरें जो उनको रात-दिन धिक्कारेगी। मगर इसके लिए तो मन की आँखें भी चाहिए,अन्तरात्मा चाहिए जो कदाचित् उनके पास है ही नहीं। हो सके तो अपनी माँ को भी समझाएँ कि माँ किसी संस्था की महानता के लिए सिर्फ स्वर्णिम इतिहास ही काफी नहीं होता बल्कि उससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है निष्कलंक वर्तमान।

रविवार, 15 नवंबर 2015

मोदी सरकार क्या करे क्या न करे

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,एक कहावत है छोटा मुँह बड़ी बात। लेकिन अपना तो स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि हम हमेशा अपने छोटे से मुँह से बड़ी-2 बातें करते रहते हैं। अब जो व्यक्ति इस देश को चला रहा है और दुनियाभर में जिसकी धूम है उसको हम सलाह दें तो जाहिर है ऐसा करना गुस्ताखी ही होगी। लेकिन करें तो क्या करें हमसे देश की बर्बादी नहीं देखी जाती इसलिए एक और गुनाह कर ही डालते हैं। हमारा जो कर्त्तव्य है सो कर लेते हैं बाँकी जानें मोदी जी कि वे हमारी बातों को मानते हैं या नहीं।
मित्रों,हमने मोदी सरकार के गठन के तत्काल बाद ही अपने एक आलेख द्वारा कहा था कि मंत्रिमंडल गठन में कई कमियाँ रह गई हैं। कई अयोग्य और दागी चेहरे भी मंत्री बना दिए गए हैं। यह चाहे सही भी हो कि सचिवों के माध्यम से अच्छा शासन दिया जा सकता है लेकिन जनता के बीच तो मंत्री ही जाएगा। फिर भारत के मतदाताओं का जो चरित्र है उसमें कोई एक व्यक्ति कभी भी सवा अरब लोगों को अकेला प्रभावित नहीं कर सकता।
मित्रों,बिहार के चुनावों ने यह भी साबित कर दिया है कि स्थानीय लोकप्रिय चेहरों का अपना महत्त्व होता है।  लोग मोदी जी रैली में भले ही भारी संख्या में उमड़ें लेकिन वोट तो वे उसी को और उसी के कहने पर देते हैं जिनके साथ वे सहजता से अपनत्त्व स्थापित कर पाते हैं। इसलिए मोदी जी और भाजपा को चाहिए कि सामूहिक नेतृत्व की जिद छोड़कर स्थानीय क्षत्रपों के विकास पर भी ध्यान दें और उनको पनपने के लिए उचित अवसर दें। फिर चाहे पश्चिम बंगाल हो या उत्तर प्रदेश एक सर्वसम्मत तेज-तर्रार ईमानदार चेहरे को चुन लिया जाए और उसके नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाए।
मित्रों,हमने बिहार और दिल्ली के चुनावों में देखा कि एक छोटी सी गलती भी कड़े परिश्रम का बंटाधार कर सकती है। क्या आवश्यकता थी लोकसभा चुनावों के बाद प्रशांत किशोर को अलग करने की। मैं यह नहीं कहता कि जो काम प्रशांत किशोर ने बिहार में किया वह केवल वही कर सकते थे। भारत में तेज-तर्रार लोगों की कोई कमी नहीं है। फिर जनसंपर्क कोई ऐसा काम नहीं है जो सिर्फ चुनावों के समय ही करणीय हो। यह तो सतत चलनेवाली प्रक्रिया है। मोदी जी को चाहिए कि 500-1000 ऐसे लोगों की टीम हर समय उनके लिए काम करती रहे जैसे लोगों की टीम प्रशांत किशोर चलाते हैं। देखा गया है कि कई बार पीएम किसी घटना या बयान पर प्रतिक्रिया देने में काफी विलंब कर देते हैं। अगर ऐसी टीम सक्रिय रहेगी तो उनकी ओर से जवाब दे दिया करेगी जिससे देरी होने से होनेवाला नुकसान नहीं हो पाएगा। उदाहरण के लिए मोदी सरकार को बार-2 जोर-शोर से बताना चाहिए था कि सरकार कालाधन विदेशों से लाने की दिशा में काम कर रही है।
मित्रों,काफी दिनों से हम देख रहे हैं कि मोदी जी जब भाषण देते हैं तो इंटरनेट पर वह अक्षरशः उपलब्ध नहीं हो पाता जबकि पहले ऐसा नहीं था। पहले ऑडियो-वीडियो और टेक्स्ट फॉरमेट में उनकी वक्तृता आसानी से उपलब्ध होती थी फिर चाहे वह भाषण विदेशों में ही क्यों न दिया गया हो। अच्छा हो कि इसकी व्यवस्था फिर से की जाए। मुझे ऐसा भी लग रहा है कि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के रूप में अकबरूद्दीन विकास स्वरूप से बेहतर थे और उनके पास संवाद-क्षमता ज्यादा थी। वे तात्कालिक रूप से विदेश दौरों की तस्वीरें और घटनाक्रम को ट्विट करते रहते हैं जो विकास जी नहीं कर पा रहे हैं। 
मित्रों,पिछले कुछ महीनों में भाजपा नेताओं में बकवास करने की एक होड़-सी लगी दिखती है। हमने पीएम को भी मुजफ्फरपुर की रैली के बाद एक आलेख के माध्यम से चेताया था कि उनको डीएनए वाला बयान नहीं देना चाहिए था। गिरिराज सिंह,साक्षी महाराज,आदित्यनाथ आदि तो बराबर बेवजह के बयान दे ही रहे हैं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी इस मामले में किसी से पीछे नहीं हैं। बिहार चुनावों के समय उनका पाकिस्तान वाला बयान जब हमने टीवी पर लाईव देखा तो हमें खुशी नहीं हुई थी बल्कि रंज हुआ था। अभी कल ही उन्होंने चित्रकूट में जो 60 साल वाला बयान दिया है उसकी कोई आवश्यकता थी क्या? मोदी जी तो खुद ही 65 साल के हैं तो क्या श्री शाह उनको भी रिटायर करना चाहते हैं? इसी तरह शाह द्वारा मोदी जी के कालाधन संबंधी बयान को सीधे-सीधे चुनावी जुमला बताना भी सही नहीं था और इसको विपक्ष ने बड़ा मुद्दा बना दिया जिससे जनता के मन में मोदी जी द्वारा किए जा रहे वायदों को लेकर संशय की स्थिति उत्पन्न हो गई। श्री शाह या स्वयं गोदी जी चाहिए था कि वे बताते कि हमने ऐसा कभी नहीं कहा कि हम हर व्यक्ति को 15-15 लाख रुपया देंगे। हाँ हमने ऐसा जरूर कहा था कि हम काला धन को वापस लाएंगे और उसका सदुपयोग देश-निर्माण में करेंगे। 30 अक्तूबर को नरेंद्र मोदी बिहार में हिंदू-मुसलमानों को बाँटनेवाली बातें करते हैं और 31 अक्तूबर तो अचानक एकता-अखंडता का राग आलापने लगते हैं जिससे जनता खुश नहीं होती बल्कि भ्रमित होती है।
मित्रों,यह अच्छा हुआ है कि केंद्र ने सुब्रहमण्यम स्वामी का कोर्ट में साथ नहीं दिया। आज फिर से श्री स्वामी दलाई लामा के बयान का खंडन कर एक बेवजह के विवाद को जन्म दे रहे हैं।
मित्रों,श्री स्वामी मानें या न मानें चुनाव परिणामों से यह बार-बार साबित होता रहा है कि हिंदू मन जन्मना उदार होता है। उसको तालिबानी नहीं बनाया जा सकता। अगर ऐसा करने की कोशिश होगी तो भाजपा को बार-बार बिहार जैसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा। फिर जिस चैनल पर शाह जैसे नेता मुसलमानों के खिलाफ बयान देते हैं,मोदी कहते हैं कि हम आरक्षण में धर्म के आधार पर हिस्सा नहीं लगने देंगे उसी चैनल पर जब अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं के लिए ऋण में सब्सिडी का विज्ञापन आता है तो लोग जरूर सोंचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि यह सब क्या है? एक तरफ तो धर्म के आधार पर गरीबों के बीच भेदभाव किया जा रहा है और दूसरी तरफ भेदभाव के खिलाफ बयान भी दिए जा रहे हैं। अच्छा होता कि केंद्र सरकार सभी गरीब बच्चों को एक समान सुविधा देती बिना धार्मिक भेदभाव के या फिर उसके नेता इस तरह के दोहरे मापदंड वाले बयान ही नहीं देते।
मित्रों,कोई माने या न माने बिहार के चुनावों के दौरान अगर किसी एक बयान ने एनडीए का सबसे ज्यादा नुकसान किया तो वो था भागवत जी का आरक्षण-संबंधी बयान। फिर अगर दे ही दिया तो भागवत जी को इसका स्पष्टीकरण दे देना चाहिए था न कि अड़ जाना। मोदी जी संघ को समझा देना होगा कि वो चुनावों के समय बयान देने में सावधानी बरते और अच्छा हो कि अपने को सिर्फ सांस्कृतिक कार्यों तक ही सीमित रखे।
मित्रों,हम देख रहे हैं कि मोदी सरकार ने अब तक लोकपाल की कुर्सी को खाली रखा है। पता नहीं ऐसा क्यों किया जा रहा है लेकिन इसका संदेश जनता के बीच में जरूर गलत जा रहा है कि क्या सरकार कुछ छिपाने की कोशिश कर रही है? अगर पीएम मोदी ताल ठोंककर कह रहे हैं कि उनकी सरकार में एक नये पैसे का भी घोटाला नहीं हुआ है तो फिर भावी लोकपाल से वे भयभीत क्यों हैं? इसलिए जितनी जल्दी हो सके केंद्र में लोकपाल को नियुक्त किया जाना चाहिए। आगे के पश्चिम बंगाल या उत्तर प्रदेश के चुनावों के लिए अगर प्रशांत किशोर एनडीए के लिए काम करने को तैयार हों तो इसके लिए तुरंत प्रयास करना चाहिए अन्यथा उनके जैसे दूसरे रणनीतिकार से संपर्क किया जाना चाहिए। अमित शाह अध्यक्ष के तौर पर फेल हो चुके हैं इसलिए उनको हटाकर राजनाथ सिंह जैसे किसी समझदार व्यक्ति को पार्टी का अध्यक्ष बनाना चाहिए जो न तो बकवास करता हो और न ही बकवास करनेवालों को पसंद ही करता हो। मंत्रिमंडल में भी अविलंब बदलाव किया जाए और योग्य-ईमानदार लोगों को स्थान दिया जाए और अयोग्य लोगों को निकाल-बाहर किया जाए। साथ ही पार्टी में पलते असंतोष को साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल कर दूर किया जाना चाहिए। जो लोग पुचकारने पर भी नहीं मानें पार्टी के खिलाफ बयान देनेवाले ऐसे लोगों को पार्टी से बाहर कर दिया जाए। जब लालू चार सांसदों में से एक पप्पू यादव को बाहर कर सकते हैं तो भाजपा ऐसा क्यों नहीं कर सकती क्योंकि उनके पार्टी विरोधी बयान पार्टी और पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल को कमजोर करते हैं?
मित्रों,मैं पहले भी मोदी सरकार से अर्ज कर चुका हूँ कि वो किसी भी मुद्दे पर यू टर्न नहीं ले। उदाहरण के लिए भूमि-अधिग्रहण के मुद्दे पर सरकार को जो नुकसान होना था वो हो चुका था फिर पल्टी मारने का कोई मतलब नहीं था। सरकार को चाहिए था कि वो संसद का संयुक्त सत्र बुलाकर दृढ़तापूर्वक उसको पारित करवाती। साथ ही सरकार को कुछ इस तरह से काम करना चाहिए कि जनता को उसका काम धरातल पर दिखाई दे क्योंकि हमारी जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो जीडीपी वगैरह का मतलब ही नहीं जानती।
मित्रों,हमने देखा कि भाजपा ने मिस्ड कौल द्वारा करोड़ों लोगों को अपना सदस्य बनाया। तब कहा गया था कि पार्टी कार्यकर्ता मिस्ड कौल सदस्यों से संपर्क करेंगे और उनसे सदस्यता का फार्म भरवाएंगे। लेकिन ऐसा किया नहीं गया जिससे मिस्ड कौल सदस्यों के मन में पार्टी के प्रति गुस्सा उत्पन्न हुआ। पार्टी को चाहिए कि अबसे भी पूरे देश में महाभियान चलाकर मिस्ट कौल सदस्यों से संपर्क कर फार्म भरवाया जाए। इतना ही नहीं समय-2 पर फोन द्वारा उनसे संपर्क किया जाए,शुभकामनाएँ दी जाए और स्थानीय स्तर पर उनकी बैठक आयोजित की जाए जिसमें वे पार्टी के लिए परामर्श दे सकें। साथ ही उनको पार्टी की तरफ से टास्क दिया जाए।
मित्रों,गाय को लेकर इन दिनों भारी विवाद चल रहा है। कुछ लोग तो स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त गायों के चमड़े से भी चप्पलादि बनाने पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं। ऐसा करना उचित नहीं होगा। सरकार को चाहिए कि पूरे भारत में गोवध पर रोक लगा दे। कोई अगर गोवध करता हुआ पकड़ा जाए तो उसको कानून के अनुसार सजा दी जाए न कि भीड़ को पीट-पीटकर उसकी हत्या कर देने की छूट दे दी जाए। गोतस्करों के खिलाफ कड़ाई से पेश आना तो आवश्यक है ही साथ ही ऐसी गाएँ जो अब दुधारू नहीं रह गई हैं के पालन-पोषण की भी व्यवस्था की जाए। महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का महिमामंडन तुरंत बंद होना चाहिए क्योंकि भारत का जनमत इसको अच्छा घटनाक्रम नहीं मानेगा और पार्टी को इसका नुकसान ही उठाना पड़ेगा।
मित्रों,बिहार के चुनावों में टिकट बाँटने के समय हमने देखा कि पार्टी ने टिकट बाँटा नहीं बेच दिया। इस तरह के कृत्य शर्मनाक हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं को टिकट वितरण में तरजीह दी जानी चाहिए। साथ ही हर विधानसभा का अलग-अलग बारीकी से विश्लेषण करना चाहिए। कौन टिकटाकांक्षी कितना लोकप्रिय है का गुप्त सर्वेक्षण भी करवाना चाहिए। मतदाताओं से घर-घर जाकर संपर्क करना चाहिए और उनकी समस्याएँ क्या हैं,आकाक्षाएँ क्या है का विस्तृत डाटाबेस बनाना चाहिए। अंत में उनके आधार पर ही पार्टी का घोषणापत्र तैयार किया जाना चाहिए। हो सके तो हर विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र के लिए अलग-2 घोषणापत्र बनाया जाना चाहिए और चुनाव जीतने के बाद उसको लागू भी किया जाना चाहिए।
मित्रों,धारा 370 को हटाने और समान नागरिक संहिता को लागू करना जरूरी तो है लेकिन अभी सरकार के पास ऐसा करने के लिए पर्याप्त बहुमत नहीं है इसलिए इनको ठंडे बस्ते में ही पड़ा रहने देना चाहिए। जहाँ तक राम मंदिर बनाने का सवाल है तो कोर्ट के निर्णय का इंतजार किया जाना चाहिए। वैसे भी राम को कंकड़-पत्थर के भवनों में नहीं अपने हृदय में बसाने की आवश्यकता है। अगर सबके मन-आत्मा में राम के आदर्शों को बसा दिया जाए तो भौतिक मंदिर की जरुरत ही कहाँ रह जाएगी और अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो मंदिर बनाकर भी कौन-सा अलौकिक लाभ हो जाएगा? जय श्रीराम।

सोमवार, 9 नवंबर 2015

बिहार ने चुना विनाश का पथ,विकासवाद को मारी ठोकर

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बिहार के विधानसभा चुनावों के परिणाम अप्रत्याशित रहे हैं। लोग समझ रहे थे कि 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह ही बिहार इन चुनावों में भी विकासवाद को चुनेगा और जातिवादी विनाशवाद को हमेशा के लिए लात मार देगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बिहार में 15 साल बाद एक बार फिर से लुम्पेन राजनीति के प्रतीक लालू प्रसाद यादव की पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। ऐसा क्यों हुआ,कैसे हुआ और आगे इसके दुष्परिणाम क्या होंगे?
मित्रों,यह तो 2014 के लोकसभा चुनावों के समय से ही स्पष्ट था कि लालू के साथ 18,नीतीश के साथ 18 और कांग्रेस के साथ 9 प्रतिशत वोट बैंक है। चूँकि तब तीनों अलग-अलग लड़े थे इसलिए उनको हराने में भाजपा को ज्यादा मुश्किल नहीं हुई लेकिन इस बार तीनों एकसाथ थे और पूरी ताकत के साथ एकसाथ थे। उन्होंने इस चुनाव में भी कुल मिलाकर 42 प्रतिशत ही वोट प्राप्त किया है जो उनके द्वारा 2014 के लोकसभा चुनावों में प्राप्त मतों के योग से कम ही है।
मित्रों,दूसरी तरफ भाजपा के पास ऐसा कोई बड़ा वोट बैंक नहीं था जो उसे चुनाव जितवाता। कुल मिलाकर पार्टी की सारी उम्मीदें वोटकटवाओं पर लगी हुई थीं जो फेल हो गए। पार्टी ने यद्यपि अकेले साढ़े 24 प्रतिशत मत प्राप्त किया लेकिन इतने मतों से चुनाव तो नहीं जीते जा सकते। उसके सहयोगी दलों के पास जितनी क्षमता थी उतने मत उन्होंने भी प्राप्त किए लेकिन वह भी नाकाफी था। अंत तक दोनों गठबंधनों के बीच 4 प्रतिशत का भारी अंतर रह गया।
मित्रों,जाहिर है कि बिहार ने एक बार फिर से जातीय समीकरण के दायरे में मतदान किया है और भाजपा के विकासवाद के नारे को ठुकरा दिया है। शुरू से ही भाजपा इस बात को समझ रही थी कि बिहार का रण काफी कठिन है फिर भी उसने कई गलतियाँ कीं। भाजपा ने प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार को नीतीश के पाले में चले जाने दिया। टिकट बाँटा नहीं बेच दिया। सूत्रों के अनुसार हाजीपुर से ही पार्टी टिकट के ऐवज में देव कुमार चौरसिया से 2 करोड़ रुपये मांग रही थी जबकि चौरसिया जदयू के जिलाध्यक्ष हैं। टिकट वितरण में विधानसभा क्षेत्रों के जातीय समीकरणों को भी ध्यान में नहीं रखा गया। रही-सही कसर सहयोगी दलों के साथ और सहयोगी दलों के बीच उभरे विवादों ने पूरी कर दी जिससे बिहार की जनता के बीच गलत संदेश गया। साथ ही भागवत पुराण ने अतिपिछड़ी जातियों के मन में शंका पैदा कर दी। केंद्र सरकार के कामों से गरीबों को अबतक सीधा फायदा नहीं हो पाया है जिससे गरीबों ने महागठबंधन को अपना ज्यादा हमदर्द समझा। बड़ी जाति के लोग भी इसी कारण से उदासीन से रहे। पीएम की रैलियों से जो भी लाभ होता उसको नीतीश-लालू ने रैलियों के तुरंत बाद प्रेसवार्ता करके समाप्त कर दिया। इतना ही नहीं बिहार की जनता खासकर महिलाओं ने इसलिए नीतीश को वोट दिया क्योंकि उनकी सरकार ने बच्चों को साइकिल दी थी,छात्रवृत्ति दी थी और महिलाओं को पंचायती राज संस्थाओं में 50 प्रतिशत का आरक्षण दिया था। नाराज शिक्षकों को भी वेतनमान देकर सरकार ने अपनी ओर कर लिया जो एक बहुत बड़ा वोटबैंक थे।
मित्रों,कुल मिलाकर बिहार की जनता ने साल 2014 को ही दोहराया है। अंतर इतना ही है कि तब तीनों पार्टियाँ अलग-अलग लड़ी थीं और अब एकसाथ थीं। भाजपा को जहाँ तब 22 प्रतिशत वोट मिले थे इस बार साढ़े 24 प्रतिशत मत मिले। इन चुनावों का सबसे बड़ा परिणाम यह है कि सजायाफ्ता लालू प्रसाद यादव की बिहार की राजनीति में फिर से वापसी हुई है और वो भी सबसे बड़े दल के रूप में। ऐसे में सवाल उठता है कि अब बिहार का आगे क्या होगा? क्या बिहार का विकास होगा या फिर विनाश होगा? जीतने के बाद भी लालू बैकवॉर्ड-फॉरवॉर्ड ही कर रहे हैं जिससे संदेह और भी बढ़ जाता है कि क्या बिहार एक बार फिर से बर्बादी के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है? इतिहास तो यही बताता है कि लालू जी का विकास के साथ 36 का रिश्ता है। आखिर बिहारियों ने जो बोया है वही तो काटने को मिलेगा। वैसे नीतीश ने भी बिहार को बनाया कम बर्बाद ही ज्यादा किया है।

रविवार, 1 नवंबर 2015

मधुबनी में मोदी ने दी BIHAR की नई परिभाषा

मधुबनी (सं.सू.)। पांचवें चरण के चुनाव प्रचार के लिए मधुबनी पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आते ही एक पर्चा दिखाया। असल में वह पीएम मोदी को कर्पूरीग्राम की कुछ बहनों की ओर से भेजा गया मेमोरेंडम था। उन्होंने नीतीश-लालू पर निशाना साधते हुए कहा, कि इन लोगों ने तंत्र मंत्र के चक्कर में लोकतंत्र का अपमान किया है।

मोदी ने पत्र का जिक्र करते हुए कहा, अब देखिए बिहार का हाल। ये गांव के गरीब लोगों की बिहार में सुनने वाला कोई नहीं, इनको अपनी शिकायत लेकर प्रधानमंत्री के पास आना पड़ा। इनकी शिकायत है कि इनको इनकी जमीन से हटाने पर यहां की सरकार तुली है। उन्होंने वादा किया आठ तारीख के बाद इसका समाधान करने का वादा किया। हालांकि उन्होंने दुख जताया कि शिकायत करने वाले एक भी माताओं बहनों ने हस्ताक्षर करना नहीं आता।

मोदी ने कहा, मुझे दुख है कि माताओं बहनों को हाथ का अंगूठा लगाकर मुझे पत्र भेजना पड़ रहा है, जबकि खुशी होती कि वो अपने हाथ से लिखकर मुझे अपने हस्ताक्षर में भेजा होता। इसके लिए बिहार पर 60 सालों तक शासन करनेवाले नीतीश, लालू और सोनिया जिम्मेदार हैं।


इस अवसर पर मोदी ने बिहार की नई परिभाषा गढते हुए बताया, B यानी ब्रिलियेंट, I यानी इनोवेटिव, H यानी हार्ड वर्किंग, A यानी एक्शन ओरिएंटेड, R यानी रिसोर्सफुल। मोदी ने कहा, मैं जंतर मंतर पर भरोसा नहीं करता हूं, मैं लोकतंत्र भर भरोसा करता हूं। उन्होंने फिर से नीतीश लालू पर निशाना साधते हुए कहा कि ये लोग भी मन से हार गए हैं तो वो बाबा के पास चले गए। इन लोगों ने लोकतंत्र का मजाक बना दिया है।

छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी बुद्धिजीवियों की अवसरवादी भावुकता और बिहार का विधानसभा चुनाव

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,एक चुटकुला आपने भी पढ़ा होगा कि एक महिला के पति का किसी से झगड़ा हो जाता है। जब तक उसका पति दूसरे व्यक्ति को पीटता रहता है तब तक तो महिला खुशी से उछलती रहती है लेकिन जब पतिदेव की पिटाई होने लगती है तो महिला पुलिस को फोन लगा देती है। आप भी कह रहे होंगे कि मैंने आज कितने गंभीर विषय पर लिखने के लिए कलम उठाई है और आपको चुटकुला सुना रहा हूँ। कहीं मैं ललुआ (जैसे लालू जी हर बात को हल्के में लेते हैं) तो नहीं गया हूँ। अगर आप ऐसा सोंच रहे हैं तो गलत सोंच रहे हैं। दरअसल आज भारत के छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी बुद्धूजीवी  (बुद्धिजीवी) भी वही कर रहे हैं जो इस प्रसिद्ध चुटकुले में उस महिला ने किया था।
मित्रों,जब तक हिंदू संस्कृति पर प्रहार हो रहा था,कश्मीरी पंडितों पर भीषण अत्याचार हो रहा था,सिखों को काटा जा रहा था,हिंदुओं को ट्रेनों में जीवित जलाया जा रहा था,गाजर-मूली की तरह काटकर नहर में फेंका जा रहा था,कानून द्वारा प्रतिबंधित होने बावजूद हिंदुओं के लिए सगी माँ से भी ज्यादा पूज्य गायों को खुलेआम मारकर खाया जा रहा था  तब तक तो ये धूर्त लोग चुप थे और मजा ले रहे थे लेकिन जैसे ही इनको गाय खाने से,काटने से और उसकी तस्करी करने से रोका जाने लगा तो ये बेहाल होने लगे,इनकी मरी हुई आत्मा जीवित हो गई और ये लोग देश की स्थिति खराब होने का रोना रोने लगे अपना सम्मान वापस लौटाने लगे।
मित्रों,जो व्यक्ति दयालु होगा उसका हृदय क्या जाति और धर्म को देखकर द्रवित होगा? जो लोग खुद को अतिसंवेदनशील कहते हैं क्या उनकी संवेदनशीलता सिर्फ चयनित घटना पर मुखर होगी? कदापि नहीं,बल्कि जो सचमुच में संवेदनशील होंगे वे तो एक क्रौंच की हत्या पर भी द्रवित हो उठेंगे और बहेलिये को श्राप दे डालेंगे कि मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शास्वतीसमाः। यत् क्रौंच मिथुनादेकम वधीः काममोहितम्। राजा शिवि ने जब एक कबूतर की जान बचाने के लिए अपने शरीर के एक-एक अंग को काटकर तराजू पर तौल दिया था तब तो उन्होंने यह नहीं देखा था कि कबूतर उनका सगा नहीं है। भगवान बुद्ध ने जब हंस की या महाराज दिलीप ने जब गाय की प्राण रक्षा की  तब तो उन्होंने अपने-पराये या लाभ-हानि का ख्याल नहीं किया?
मित्रों,लेकिन हमारे छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी बुद्धिजीवी तो ऐसा ही कर रहे हैं। इनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या गला रेतने पर दर्द सिर्फ उनको ही होता है या उनके परिजनों को ही होता है बांकी इंसानों और पशु-पक्षियों को नहीं होता? जरा इनके विरोध की टाईमिंग भी तो देखिए। जब बिहार में विधानसभा चुनाव चल रहा है तब इन घनघोर घड़ियालों ने अपने आँसुओं से हिंद महासागर को और भी नमकीन बनाना शुरू कर दिया है। इन लोगों को लगता है कि बिहार भी दिल्ली है और बिहार की जनता अंधी है जो नहीं देख पा रही है कि दिल्ली के लोग किस प्रकार से अपने आपको ठगा-सा महसूस कर रहे हैं। खोमचेवाले सड़क किनारे जलेबी नहीं बना सकते,टेंपो और टैक्सी वालों की रोजी-रोटी का सौदा कर दिया गया है,प्याज और चीनी में जबर्दस्त घोटाला हुआ है,सीसीटीवी कैमरे व बसों में महिलारक्षक पुलिस,फ्री वाई-फाई सेवा,फ्री की बिजली-पानी का कहीं अता-पता नहीं है। सफाईकर्मियों जिन्होंने जी-जान से केजरीवाल का साथ दिया था भूखों मर रहे हैं और हड़ताल पर हैं जिससे पूरी दिल्ली साक्षात रौरव नरक बन गई है।
मित्रों,यह तो हमें भी पहले से ही पता था कि छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी बुद्धिजीवी बहुत समय तक शांत तो नहीं बैठेंगे लेकिन बगुला भगत इतनी जल्दी अपनी असलियत पर आ जाएंगे यह हमने भी नहीं सोंचा था। मुक्तिबोध को तो पाखंडियों का वास्तविक चेहरा अंधेरे में दिखा था यहाँ तो चिलचिलाती धूप में अहिंदू,देशद्रोही कथित हिंदुओं के सात घूंघटों वाले चेहरे बेनकाब होते जा रहे हैं। अरे कोई है और भी जो बचा हुआ है अपना कथित सम्मान वापस करने के लिए? आओ भाई जल्दी आओ और अपना मुखड़ा दिखाओ क्योंकि अब बिहार के चुनाव समाप्त होने वाले हैं। वैसे हम आपलोगों को बता दें कि हमें आपके सम्मान वापसी से कोई फर्क नहीं पड़ता दरबारियों हमें तो भारतमाता का खोया हुआ सम्मान वापस प्राप्त करना है। जापान का इतिहास पढ़ो सम्मान लौटानेवाले इतिहासकारों। पढ़ो कि कैसे मेजी पुनर्स्थापना (1868) के 3 दशकों के भीतर ही जापान महाशक्ति बन गया और हम आजादी के 70 साल बाद भी दुनिया में सबसे ज्यादा गरीब जनसंख्या को धारण करनेवाले देश के निवासी हैं। पढ़ो कि कैसे 20वीं सदी की शुरुआत में साम्राज्यवादियों के लिए बँटवारे का तरबूज रहे चीन ने सबको गरीब बनाने की नकारात्मक साम्यवादी नीति का परित्याग कर सबको अमीर बनाने की अति सकारात्मक नीति का अनुगमन किया और आज दुनिया की दूसरी आर्थिक महाशक्ति बनकर अमेरिका के सामने सीना तानकर खड़ा है। भारत और भारतीयों को भी दुनिया में सबसे आगे निकलना है और भूख और गरीबी को बीता हुआ कल बनाना है। बिहार तो क्या अब भारत का कोई भी हिस्सा तुम्हारी नहीं सुनेगा क्योंकि उसे एक ऐसा नेतृत्व मिल गया है जिसको अपने लिए कुछ भी नहीं चाहिए,जो सिर्फ और सिर्फ देश के लिए जीता है और जाग्रत,उत्तिष्ठ,प्राप्य बरान्निबोधत के वेद वाक्य पर पूरी निष्ठा के साथ अमल करता हुआ देश के लिए दिन-रात अपने पूरे सामर्थ्य से परिश्रम कर रहा है।

शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

नीतीश कुमार जी को कोई लौट दे उनके बीते हुए दिन

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कथा-सम्राट प्रेमचंद ने अपनी किसी रचना में कहा है कि बूढ़े लोगों के लिए बीते हुए दिनों से अच्छे दिन कुछ और नहीं होते और उनका सबसे प्रिय काम वर्तमान को कोंसना होता है। पता नहीं नीतीश जी अपने-आपको बूढ़ा मानते हैं या नहीं उनमें यह लक्षण प्रकट जरूर होने लगा है। तभी तो श्रीमान् भारत के तेजस्वी,यशस्वी प्रधानमंत्री से पुराने दिन लौटाने की मांग करने लगे हैं। पता नहीं उनको कौन-से पुराने दिन चाहिए? केंद्र में वे दिन जब केंद्र सरकार में रोजाना कोई-न-कोई घोटाला सामने आ रहा था या बिहार में वे दिन जब लालू-राबड़ी जी का कथित मंगलराज चल रहा था?
मित्रों,हमारी फिल्मों में बीते हुए दिनों को लौटा लाने के कई अथक प्रयास हुए हैं। आपलोगों ने ये दो गीत तो जरूर सुने होंगे कि कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन और याद न जाए बीते दिनों की। खैर,न तो फिल्मों में बीते हुए दिन वापस आए थे और न ही बेचारे नीतीश कुमार जी के बीते हुए दिन वापस आनेवाले हैं। एक पौराणिक कथा राजा ययाति की भी है जो एक बार फिर से जवान होना चाहते थे लेकिन अब वो जमाना तो रहा नहीं कि कोई किसी से जवानी उधार ले ले। इसलिए हम तो सिर्फ नीतीश जी से हार्दिक संवेदना ही प्रकट कर सकते हैं उनके कष्टों का निवारण नहीं कर सकते।
मित्रों,हमारे कुछ मित्र फरमाते हैं कि नीतीश जी चमगदड़ा गए है। यह एक नई तरह की बीमारी है जिसकी उत्पत्ति भारत के छद्मधर्मनिरपेक्षतावादियों को नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद हो गई है। बेचारे हर घटनाक्रम को उल्टा होकर देखने लगे हैं। जैसे नीतीश जी के निर्यात में कमी वाले ट्विट को ही देखिए। नीतीश जी ने समाचार में यह तो देख लिए कि भारत का निर्यात दस महीने में सबसे कम हो गया है लेकिन उन्होंने यह नहीं देखा कि आयात में और भी ज्यादा की कमी आई है और कुल मिलाकर व्यापार-घाटा बढ़ा नहीं है घटा है। सच्चाई तो यह है कि भारत के निर्यात में लगातार दसवें महीने गिरावट दर्ज की गई और सितंबर में निर्यात 24.3 फीसदी घटकर 21.84 अरब डॉलर रह गया जबकि सितंबर, 2014 में निर्यात 28.86 अरब डॉलर था। इस दौरान, आयात भी 25.42 प्रतिशत घटकर 32.32 अरब डॉलर रहा। इससे देश का व्यापार घाटा कम होकर 10.47 अरब डॉलर रह गया जो पिछले साल सितंबर में 14.47 अरब डॉलर था। आज भारत का विदेश मुद्रा भंडार 350 अरब डॉलर को पार कर चुका है। भारत की रेटिंग को रेटिंग एजेंसियाँ लगातार ऊपर ले जा रही हैं। पूरी दुनिया आज 21 जून को योग दिवस मना रही है। अब नीतीश जी को मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत को प्राप्त होनेवाली उपलब्धियों को तो देखना है नहीं तो दिखेगा कैसे?
मित्रों,सच्चाई तो यह है कि आज भारत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में पूरी दुनिया का सरताज है। मेक इन इंडिया के कारण भारत की औद्योगिक विकास दर फर्राटा भरने लगा है। विगत 10 वर्षों से मोबाइल, टीवी, फ्रिज से लेकर बच्चों के खिलौने तक चीन से आते रहे हैं अब पहली बार सोनी अपनी BRAVIA SERIES की टीवी भारत में बनाने जा रही है (चेन्नई में कारखाना ), XIAOMI,मोटोरोला,एप्पल, FOXCONN इत्यादि कम्पनियां भारत में प्रोडक्शन शुरू कर रही हैं। XIAOMI ने तो अपना पहला Made In India मोबाइल बाजार में उतार भी दिया है। BMW जैसी लक्जरी कार निर्माता कम्पनी भी भारत में प्लांट लगा रही है। मर्सिडिज जर्मनी के बाहर अपना पहला कारखाना भारत में खोल रही है (कर्नाटक में)। वाल्वो ने कर्नाटक में अपना संयंत्र स्थापित किया है और आगामी 6 महीनों में इस संयंत्र में निर्मित बसें यूरोप को निर्यात होने लगेंगी।
मित्रों,जो देश रक्षा उपकरणों के आयात में दुनिया में अग्रणी हो, उस भारत ने विगत एक वर्ष में वियतनाम, अफ्रीकी देश समेत कई देशों को रक्षा उपकरण निर्यात करना शुरू कर दिया है। भारत से बुलेट प्रुफ जैकेटों को ब्रिटेन,बहामास और वियतनाम को निर्यात होने लगा है।
मित्रों,अभी कुछ महीने पहले ही यमन से अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए अमेरिका और यूरोप के देशों ने भारत से सहायता माँगी। यह शायद 26 मई 2014 से पहले किसी ने सोंचा भी नहीं होगा।
मित्रों,जिस देश को नरम राष्ट्र कहा जाता था, वही भारत आज तजाकिस्तान, मॉरिशस में अपने सैन्य अड्डे बना रहा है। वर्षों से चीन पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को सैन्य कार्यों के लिए विकसित कर रहा है, सिर्फ 1 वर्ष में चीन को जवाब देने के लिए भारत ने ईरान का चाहबर पोर्ट विकसित किया। इतना ही नहीं वहाँ पर भारत यूरिया उप्तादन के लिए ईरान द्वारा उपलब्ध कराई जानेवाली सस्ती प्राकृतिक गैस आधारित विशाल कारखाना लगाने जा रही है जिससे भारत का यूरिया पर होनेवाला खर्च आनेवाले दिनों में आधा रह जाएगा।
मित्रों, पहले जहाँ भारत सदैव युद्ध-विराम उल्लंघन की शिकायत को लेकर यूएन जाता था, आज उसी देश की शिकायत पाकिस्तान यूएन से कर रहा है।
मित्रों,1947 के बाद पहली बार भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान से यदि कश्मीर पर बात होगी तो सिर्फ पाक अधिकृत कश्मीर पर होगी।
मित्रों,आजतक भारतीयों ने सदैव भारत में पाकिस्तानी झंडे लहराते हुए देखे थे परन्तु आज पहली बार पाकिस्तान के बलुचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर में भारतीय तिरंगा लहराया जा रहा है।
मित्रों,भारत ने मोदी सरकार के आने के बाद गरीबों के लिए बैंक खाता,गरीबों के लिए बीमा योजना,लाखों सक्षम लोगों द्वारा गैस सब्सिडी छोड़ने और सब्सिडी की राशि सीधे बैंक खाते में डालने में की दिशा में भी अभूतपूर्व उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। प्याज के दाम गिरने लगे हैं दाल के दाम भी जल्दी ही कम हो जाएंगे क्योंकि भारत सरकार द्वारा आयातित दाल का आना शुरू हो गया है।
मित्रों,आप समझ गए होंगे कि नीतीश जी की समस्या यह नहीं है कि अच्छे दिन क्यों नहीं आ रहे हैं बल्कि नीतीश जी की समस्या यह है कि चमगदड़ा जाने के अलावे उन्होंने इन दिनों जंगलराज वाला चश्मा धारण कर लिया है जिसको पहनने के बाद अच्छे दिन बुरे और बुरे दिन अच्छे दिखने लगते हैं। फिर हमें तो नीतीश जी माफ ही करें क्योंकि हमारे पास ऐसी कोई जुगत नहीं है जिससे हम नीतीश जी को पुराने दिनों में ले चलें। हम उनको न तो 1995 में ले जा सकते हैं जिससे वे लालू-राबड़ी राज को हटाने के बदले बचाने के लिए संघर्ष कर सकें और न ही 2009 में जिससे वे लोकसभा चुनावों को राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ सकें और उनके लोग भी मनमोहन सरकार में शामिल होकर बहती गंगा में डुबकी लगा सकें। इसलिए हम उनको यही सलाह दे सकते हैं कि नीतीश जी थेथरई छोड़िये और भारत के विश्वगुरू बनने की दिशा में मोदी सरकार का सहयोग करिए। हमेशा आगे की ओर गमन करनेवाले समय के रथ का घर्र-घर्र नाद सुनिए,सिंहासन को बाईज्जत खाली कर दीजिए क्योंकि आपके और आपके जैसे छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी,विकासविरोधी,जातिवादी व ठग कथित हिंदू नेताओँ के अच्छे दिन अब समाप्त हो चुके हैं।
हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2015

तो क्या एबीपी न्यूज की 'आपरेशन भूमिहार' प्लांटेड स्टोरी थी?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जो पत्रकारिता स्वतंत्रता आंदोलन के समय मिशन थी आजकल पता नहीं क्या हो गई है और उसको सही-सही किस नाम या विशेषण द्वारा परिभाषित किया जा सकता है। शायद,इसमें से कुछेक के लिए प्रेस्टीच्यूट शब्द ही सबसे ज्यादा सही है यानि ऐसा मीडिया संस्थान जो वास्तव में वेश्याओं का कोठा है। ऐसा कोठा जहाँ पैसे देकर कुछ भी लिखवाया या दिखवाया जा सकता है।
मित्रों,अभी कुछ दिन पहले भारत के अग्रणी राष्ट्रीय चैनलों में से एक एबीपी न्यूज पर एक स्टोरी चलाई गई जिसका नाम था आपरेशन भूमिहार। देखकर मैं भी स्तब्ध था कि यह क्या दिखाया जा रहा है? मैं खुद भी बिहार के राजपूतों के एक दबंग गांव से आता हूँ जहाँ आज से 25-30 साल पहले बिना हमारी मर्जी के एक पत्ता भी नहीं हिलता था। लेकिन आज स्थितियां बदल चुकी हैं। आज हरिजन भी दुर्गा पूजा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं फिर वोट डालना तो एक छोटी बात है। कहीं कोई किसी को वोट डालने से नहीं रोकता और न ही किसी पार्टी विशेष को वोट देने के लिए दबाव ही डालता है। फिर एबीपी को कैसे ऐसे गांव मिल गए जहाँ कि कुछ जाति के लोगों ने आजादी के बाद से ही कभी मतदान नहीं किया है।
मित्रों,उस दिन स्टोरी को देखने से ही संदेह की स्थिति बन रही थी कि कहीं यह स्टोरी प्लांटेड तो नहीं है और किसी राजनैतिक दल विशेष के इशारे पर चुनाव को बैकवर्ड और फारवर्ड की लड़ाई साबित करने का कुत्सित प्रयास तो नहीं है? आज जब जहानाबाद के उन इलाकों में मतदान शुरू हुआ तो सच्चाई आईने के तरह साफ हो गई। जिन गांवों के बारे में एबीपी न्यूज में दावे किए गए थे वहाँ इस समय भारी मतदान हो रहा है और कहीं कोई रूकावट नहीं है। न्यूज चैनल की थेथरई तो देखिए कि यही चैनल आज चीख-चीख कर कह रहा है कि हमारे स्टोरी दिखाने का असर हुआ है और गैरभूमिहार जातियों को पर्याप्त सुरक्षा दी गई है जिसके कारण वहाँ के लोग आजादी के बाद पहली बार मतदान कर रहे हैं। यद्यपि आज मतदाताओं से संवाददाता यही पूछ रहे हैं कि आपको कोई रोक तो नहीं रहा है यह नहीं पूछ रहा कि आपने पहले भी वोट डाला था या नहीं।
मित्रों,दरअसल हुआ यह था कि पहले चरण के मतदान के बाद नवादा से खबर आई थी कि भाजपा समर्थकों को भाजपा को वोट देने के कारण राजद समर्थकों ने मारा-पीटा था। कदाचित् इस खबर की काट के लिए एबीपी चैनलवालों ने यह संदिग्ध स्टोरी चला दी। सवाल उठता है कि क्या उस खास इलाके में पहली बार चुनावों में कड़े सुरक्षा प्रबंध हुए हैं जिसके चलते लोग निर्भय होकर मतदान कर रहे हैं? क्या पहले के चुनावों में वहाँ कभी सुरक्षा-प्रबंध नहीं होता था? फिर सुरक्षा देनेवाले जवान तो वहाँ कुछ घंटों के लिए हैं अगर एक जाति का उस इलाके में इतना ही आतंक होता तो क्या वे मतदान कर पाते? क्योंकि उनके मन में यह भय होता कि सुरक्षा-बलों के जाने के बाद उनका क्या होगा? जाहिर है कि उनके मन में ऐसा कोई भय नहीं है तभी वे भारी संख्या में मतदान कर रहे हैं।
मित्रों,पता नहीं हमें शर्म क्यों नहीं आती? एक बार तो हम गलत स्टोरी चलाते हैं और फिर बेहयाई से उसका बचाव भी करते हैं। माना कि एबीपी न्यूज सहित कई मीडिया संस्थानों की विचारधारा एनडीए की विचारधारा से मेल नहीं खाती लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि झूठी सच्चाई रच दी जाए। हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को नियंत्रित करनेवाली संस्था से भी अनुरोध करेंगे कि इस मामले की गहराई से निष्पक्ष जाँच करवाई जाए जिससे यह पता चल सके कि न्यूज चैनल की ऐसी क्या मजबूरी थी कि उसने यह बेबुनियाद खबर चलाने की जुर्रत की और ऐन चुनाव के समय मतदाताओं को दिग्भ्रमित किया।
हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

बदलेगा बिहार,बदलेगा भारत

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कल एक विचित्र व्यक्ति से मुलाकात हुई। श्रीमान् जदयू के छुटभैये नेता हैं और जाति से यादव। उनका स्पष्ट तौर पर मानना था कि एक तो क्या हजार मोदी भी आ जाएँ तो न तो बिहार बदलेगा और न ही भारत। उनका यह भी कहना था कि 5 साल तो क्या 17 साल में भी देश-प्रदेश का कुछ भी नहीं होनेवाला है।
मित्रों,स्वाभाविक तौर पर मुझे गुस्सा आया और काफी ज्यादा आया लेकिन कर भी क्या सकते हैं सबको बोलने की स्वतंत्रता है। परन्तु देर रात तक मन बेचैन रहा और बड़ी मुश्किल से नींद आई। बार-बार मन में यही विचार आता कि क्या सचमुच बिहार या भारत नहीं बदलेगा? क्या हम बिहारी गरीबी में ही जन्म लेते और गरीबी में ही मरते रहेंगे? क्या बिहार हमेशा बदइंतजामी और भ्रष्टाचार का ही पर्याय बना रहेगा?
मित्रों,मैं नहीं समझता कि बिहारियों को उन यथास्थितिवादी जदयू नेता की तरह घोर निराशावादी हो जाना चाहिए और वह भी तब जबकि बिहार में नई सरकार के लिए मतदान चल रहा है। ई.पू. 324 से लेकर सन् 2014 तक बिहार ने भारत में होनेवाले प्रत्येक परिवर्तन में न सिर्फ हिस्सा लिया है बल्कि नेतृत्व भी दिया है। मैं नहीं मानता,मेरा मन नहीं मानता कि बिहार इस महान अवसर पर चूक जाएगा जबकि वैश्विक परिवर्तन का उन्नायक,21वीं सदी का नरेंद्र नाथ दत्त उसके दरवाजे पर जोरदार दस्तक दे रहा है। दोनों हाथ जोड़कर,दंडवत होकर कह रहा है कि तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हे हर तरह से संपन्न व उन्नत बिहार दूंगा। आखिर वामा भारतमाता का बायाँ भाग कमजोर कैसे रह सकता है जबकि माता को एक बार फिर से विश्वगुरू बनना है?
मित्रों,जब तक कि बिहार विधानसभा चुनाव,2015 के अंतिम परिणाम नहीं आ जाते मैं नहीं मानूंगा कि दानवीर कर्ण की धरती बिहार एक अनन्य भारतभक्त,प्रखर संन्यासी को अपने द्वार से खाली हाथ लौटने देगा। इस बिहार ने जब ईं.पू. 324 में आचार्य चाणक्य की करूण पुकार को व्यर्थ नहीं होने दिया तो क्या वर्ष 2015 का तरूण बिहार ऐसा होने देगा? नहीं कदापि नहीं!!! बदलेगा,बदलेगा,बदलेगा बिहार और जमाना न सिर्फ देखेगा बल्कि दोनों हाथ उठाकर उसकी जय-जयकार भी करेगा। मैं ऐसा ऐसे ही नहीं कह रहा हूँ बल्कि बिहार का इतिहास भी यही कहता है और भारत की तमाम महान नदियों द्वारा सिंचित इस महान धरती की गोद पला-बढ़ा मेरा अनुभव भी।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

शनिवार, 19 सितंबर 2015

नीतीश कुमार के जुमले अनंत,जुमलों की कथा अनंता

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों आप बिहार की किसी भी सड़क पर चले जाईए हर जगह आपको बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पोस्टर लगे हुए मिल जाएंगे जिन पर लिखा है कि बहुत हुआ जुमलों का वार, फिर एक बार नीतीश कुमार। संदर्भ यह है कि भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनावों के समय बाबा रामदेव द्वारा विदेशों में भारतीयों द्वारा जमा कालेधन के बारे में अनुमानित आंकड़ों के अनुसार कहा था कि अगर विदेशों में भारतीयों द्वारा जमा सारे कालेधन को वापस ले आया जाए तो भारत के प्रत्येक व्यक्ति को 15 लाख रुपये मिल सकते हैं। इसका मतलब यह हरगिज नहीं था कि हम कालाधन लाएंगे तो आपको शर्तिया 15 लाख रुपये प्रति व्यक्ति देंगे। लेकिन नीतीश कुमार जी पीएम मोदी द्वारा तब दिए गए उदाहरण को संदर्भित करके पीएम पर निशाना लगा रहे हैं। यद्यपि श्री कुमार खुद दुनिया के सबसे बड़े जुमलेबाज हैं,जुमलेबाज नंबर वन हैं।
मित्रों,नीतीश कुमार जी का सबसे बड़ा जुमला यह था उन्होंने 2010 के विधानसभा चुनावों के समय लालू राज को आतंकराज कहा था वो भी कविता के माध्यम से। कविता इस प्रकार थी-
जय हो,जय हो, कायापलट जी की जय हो।
रेलवे का क्षय हो,रेलवे का क्षय हो, जय हो।
बिहार में भय हो,बिहार में भय हो,जय हो।
आतंक राज की जय हो,आतंक राज की जय हो।
इसीलिए महाराज कायापलट जी की जय हो,जय हो ......जय हो।
परंतु आज वही नीतीश कुमार जी लालू जी के साथ गलबहियाँ कर रहे हैं और जंगलराज पर बहस करने की चुनौती दे रहे हैं। तो क्या लालू राज को उनके द्वारा आतंकराज कहना एक जुमला भर था? श्री कुमार ने तब क्या झूठ कहा था? क्या उनके मतानुसार लालू राज में बिहार में जंगल राज नहीं मंगलराज था?
मित्रों,इतना ही वर्ष 2010 में ही नीतीश जी ने बिहार की जनता से कहा था कि पहले कार्यकाल में कानून-व्यवस्था को सुधारा अब अगले कार्यकाल में वे बिहार से भ्रष्टाचार का समूल नाश कर देंगे। लेकिन आज जब हम उनके दूसरे कार्यकाल पर नजर डालते हैं तो पाते हैं कि यह वादा भी नीतीश कुमार का जुमला निकला,जुमला नंबर टू। हुआ तो यह कि इस दौरान बिहार सरकार के प्रत्येक विभाग में जमकर घोटाला हुआ। कहने का मतलब यह है कि नीतीश जी हमेशा व्यंजना में बात करते हैं वो भी विरोधाभासी अलंकार का प्रयोग करते हुए। यानि वे जो कहते हैं करते उसका ठीक उल्टा हैं।
मित्रों,नीतीश जी का यह चारित्रिक गुण उनके इस वादे से भी स्पष्ट होता है कि सरकार राज्य के स्कूलों,मंदिरों व मस्जिदों के निकट शराब दुकान खोलने की अनुमति नहीं देगी। लेकिन किया गया इसका ठीक उलट। आज राज्य के प्रत्येक स्कूल,मंदिर और मस्जिद के निकट सरकारी शराब की दुकानें हैं। तो यह था नीतीश कुमार जी का जुमला नंबर थ्री।
मित्रों,अब जरा बात कर लेते हैं जुमला नंबर फोर की। नीतीश कुमार द्वारा किए जा रहे बिहार के न्याय के साथ विकास के दावे नामक जुमले पर। नीतीश सरकार ने जो कृषि रोड मैप लाया था अब पता नहीं सचिवालय के किस कोने पड़ा सड़ रहा है? अस्पतालों में दवा नहीं है,बिना घूस दिए थानों में एफआईआर दर्ज नहीं होता,जमीन का नामांतरण नहीं होता,बिहार कर्मचारी चयन आयोग और बीपीएससी में बच्चा पास नहीं होता,अफसरों को पोस्टिंग नहीं मिलती,ठेकेदारों को ठेका नहीं मिलता,पोस्टमार्टम के बाद लाश नहीं मिलती वगैरह-वगैरह। राज्य के सारे सरकारी नलकूपों के बंद होने से किसानों के खेतों की सिंचाई नहीं हो रही है,स्कूल-कॉलेजों में बाँकी सबकुछ होता है लेकिन शिक्षा नहीं मिलती,बेरोजगारों को रोजगार नहीं मिल रहा और आज भी ट्रेनों में भर-भर के लोग दिल्ली,कोलकाता,सूरत और मुंबई कमाने के लिए जा रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री की बिटिया कम नंबर पाकर भी नियुक्त हो जाती है और प्रतिभावान ज्यादा अंक प्राप्त विद्यार्थी मुँह ताकते रह जाते हैं।
मित्रों,तात्पर्य यह है कि जब राज्य की जनता का अगर विकास नहीं हुआ तो किसका विकास हुआ? विकास हुआ है कुछेक ठेकेदारों का जिनकी बनाई सड़कें एक बरसात में ही धुल जाती हैं,विकास हुआ है नीतीश जी के मंत्रियों का जिनकी घोषित संपत्ति में कई गुना का ईजाफा हो गया है। जहाँ तक राज्य में न्याय के शासन का सवाल है तो इन दिनों हर जगह कंसों,दुर्योधनों और रावणों का राज है अगर ये लोग न्याय स्थापित कर सकते हैं तो राज्य का जरूर न्याय के साथ विकास हुआ है और हो रहा है।
मित्रों,हालत ऐसी है कि नीतीश जी के जुमले अनंत,जुमलों की कथा अनंता सो अच्छा यही रहेगा कि टीकाकार उनकी संपूर्णता में विवेचना कर सकने में खुद को पूरी तरह से असमर्थ मानते हुए मौन हो जाए। तो मैं अब मौन धारण करता हूँ और अपनी दुबली काया वाली लेखनी को कष्ट देना बंद करता हूँ तब तक के लिए जब तक कि चौहट्टा चौक पर जाकर उसमें दूसरी रिफिल न भरवा लूँ।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 16 सितंबर 2015

नीतीश ने 10 साल में 1% भी नहीं किया काम अब कर रहे 5 साल में 99% का वादा

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैं पहले भी दुनिया के सबसे बड़े हवाबाज और वादावीर नेता हैं नीतीश, नीतीश कुमार हैं फेंकू नंबर वन, कौन कहता है बिहार बीमारू राज्य नहीं है? आदि आलेखों के माध्यम से कई बार तथ्य देकर साबित कर चुका हूँ कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी बिहार ही नहीं दुनिया के सबसे बड़े हवाबाज नेता हैं। बिहार की जनता गवाह है कि नीतीश कुमार शिलान्यास करने में बहादुर हैं लेकिन उद्घाटन के मामले में उनका रिकार्ड काफी खराब है। यह आनेवाले सालों में बिहार के राजनीति विज्ञान के छात्र-छात्राओं के लिए शोध का विषय होगा कि नीतीश कुमार जी द्वारा जिन कार्यों का शिलान्यास किया गया उनमें से कितने प्रतिशत उद्घाटन तक पहुँचे और कितनों ने बीच में ही दम तोड़ दिया या फिर कितने प्रतिशत के शिलापट्ट जनता ने कितने महीनों के बाद उखाड़कर फेंक दिया।
मित्रों,अगर हम कुछ दिन पहले आए नीतीश कुमार जी के घोषणापत्र पर नजर डालें तो पाते हैं उन्होंने वादा किया है कि वे बिहार के हर घर तक नल से पानी की व्यवस्था करेंगे। अगर इस मामले में बिहार की वर्तमान स्थिति और नीतीश सरकार के पिछले 10 सालों के काम पर निगाह डालें तो पाते हैं कि यह वादा ही घनघोर हास्यास्पद है। अभी तक तो सरकार हर घर तक चापाकल की ही व्यवस्था नहीं कर पाई है फिर अगले पाँच साल में हर घर तक नल के पानी का इंतजाम कैसे कर देगी? फिर बिहार के बहुत से शहरों और गांवों में भाजपा कोटे से मंत्री रहे चंद्रमोहन राय ने जलमीनारों का निर्माण करवाया था लेकिन सच्चाई यह है कि उनमें से 99.99% टंकी हाथी के दाँत बनकर रह गईं हैं। चाहे कारण जो भी हो उनसे जलापूर्ति नहीं की जा रही है तो क्या इसी सुशासनी मॉडल से नीतीश कुमार जी बिहार की जनता को नल के पानी से नहला कर निहाल कर देनेवाले हैं?
मित्रों,इसी तरह नीतीश कुमार जी अगले 5 सालों में बिहार के हर घर को शौचालय और बिजली उपलब्ध करवाने के वादे भी कर रहे हैं। श्रीमान् जी क्या ये दोनों काम कभी पूरे होंगे भी या फिर हर चुनाव में अपनी आदत के अनुसार आप अगले पाँच सालों में इनको पूरा करने के वादे करते रहेंगे?  इसी तरह नीतीश कुमार जी हर गांव,हर शहर और हर घर को पक्की सड़कों और पक्की नालियों से जोड़ने का वादा किया है। सच्चाई तो यह है कि पिछले दस सालों में नीतीश कुमार जी की सरकार ने बिहार में जितनी सड़कें बनवाई थीं उनमें से कम-से-कम आधी टूट-फूट चुकी हैं और फिर से गड्ढे में सड़क या सड़क में गड्ढे की लालू-राबड़ी कालीन कहावत को चरितार्थ कर रही हैं। जहाँ तक पक्की नालियों के निर्माण और जलनिकासी की व्यवस्था का सवाल है तो वास्तविकता तो यह है कि हल्की-सी बारिश में आज भी राजधानी पटना पानी-पानी हो जाता है। जब पिछले 10 सालों में पटना शहर में ही जलनिकासी का इंतजाम नहीं हो पाया तो फिर पूरे बिहार के हर घर से जलनिकासी के वादे करना क्या पूरी तरह से बेमानी नहीं है? हाजीपुर शहर में ट्राइटेक नाम की कंपनी इन दिनों नालियों के निर्माण का काम कर रही है। उसकी अवधारणा है कि 6 ईंच व्यास वाले पाइपों से भी पॉलिथीन,कचरे से युक्त पानी अबाध रूप से बह सकेगी। बार-बार कंपनी अतिरिक्त समय की मांग करती जा रही है और काम कछुआ गति से पूरा किया जा रहा है।
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि नीतीश जी को पता होना चाहिए कि सिर्फ काम होना ही काफी नहीं होता बल्कि उससे कहीं ज्यादा जरूरी होता है उसका गुणवत्तापूर्ण होना। साथ ही सिर्फ वादे कर देने से या शिलान्यास कर देने से काम पूरा नहीं हो जाता बल्कि उसके लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। बेहतर यही होगा कि नीतीश कुमार जी मान लें कि पिछले 10 सालों में वे काम कर पाने में पूरी तरह से असफल रहे हैं और हार मान लें क्योंकि हवाबाजी और मीडिया-मैनेजमेंट के जरिए वे बिहार के बाहर के लोगों की आँखों में धूल झोंक सकते हैं न कि बिहार के लोगों को धोखा दे सकते हैं जो उनके द्वारा बार-बार धोखा दिए जाने से परेशान और आक्रोशित हैं।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

मोदी सरकार के यू-टर्न और भारत का भविष्य

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हमने बचपन में गणित का एक सवाल किया था कि एक बंदर एक खंभे पर एक मिनट में इतने फीट चढ़ता और दूसरे मिनट में इतने फीट फिसल जाता है तो इतने फीट के खंभे पर वो कितने मिनट में चढ़ जाएगा। लगता है कि केंद्र में सत्तासीन नरेंद्र मोदी की सरकार भी इन दिनों वही कर रही है जो इस सवाल में बंदर कर रहा था। मोदी सरकार भी किसी मुद्दे पर एक कदम आगे बढ़ती है और फिर न सिर्फ कदम वापस खींच लेती है बल्कि सीधा यू-टर्न ही ले लेती है।
मित्रों,हमने केंद्र सरकार को उसके कार्यकाल की शुरुआत में ही चेताया था कि भारत की जनता को उनका परिश्रम ही नहीं  चाहिए बल्कि परिणाम भी चाहिए लेकिन या तो सरकार ने हमारी बातों पर कान ही नहीं दिया या फिर सरकार के थिंक टैंक की सोंच में ही त्रुटि है। अब हम 56 ईंच के सीनेवाली सरकार के कुछ महत्त्वपूर्ण यू-टर्न पर विचार करते हैं। केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में जो कुछ किया है उस पर हम अभी विचार नहीं करेंगे क्योंकि अभी इसके लिए उचित समय नहीं आया। हालाँकि जिस तरह से वहाँ रोजाना आतंकी मारे जा रहे हैं उससे तो यही संकेत मिल रहा है कि स्थिति पिछली अब्दुल्ला सरकार के मुकाबले बेहतर है। कुछ लोग भले ही पाकिस्तान या आईएस का झंडा लहराएँ लेकिन बहुमत इस समय भारत के पक्ष में है। इतना ही नहीं पीओके में भी भारत के प्रति समर्थन बढ़ने की खबरें आ रही हैं।
मित्रों,केंद्र सरकार ने पोर्न वेबसाइटों पर जब रोक लगाने की घोषणा की तो हम जैसे लोग काफी खुश हुए लेकिन 24 घंटा बीतने से पहले ही कदम पीछे खींच लिए गए। क्या केंद्र सरकार को पहले से पता नहीं था कि इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट के क्या विचार हैं? अगर पता नहीं था तो यह बात बेहद शर्मनाक है और अगर पता था तो फिर वेबसाइटों को प्रतिबंधित ही क्यों किया?
मित्रों,इसी तरह की पलटी मोदी सरकार ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबद्ध दस्तावेजों को जारी करने के मामले में भी मारी है जिससे करोड़ों राष्ट्रवादियों का हृदय विदीर्ण हुआ है। 
मित्रों,इसी तरह केंद्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक पर भी यू-टर्न ले लिया जबकि वो पहले इसका पारित होना देश के औद्योगिक विकास के लिए जरूरी मान रही थी। तो क्या अब यह विधेयक जरूरी नहीं रहा? संस्कृत में एक कहावत है कि दीर्घसूत्री विनश्यन्ति अर्थात् विलंब से काम करने वालों को सफलता नहीं मिलती। केंद्र सरकार को अगर इस विधेयक को पारित करवाना ही था तो इस कार्य में ठीक वैसी ही तत्परता और दृढ़ता  दिखानी चाहिए थी जैसी तत्परता और दृढ़ता यूपीए ने अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील के मामले में दिखाई थी और संसद का संयुक्त अधिवेशन बुलाकर बिना वामपंथियों के भारी विरोध की परवाह किए नए विधेयक को पारित करवाया था। सरकार ने विपक्ष को क्यों लंबा मौका दिया जिससे वो किसानों को सरकार के खिलाफ भड़का सके? क्या केंद्र सरकार विधेयक को लेकर डरी-सहमी हुई थी? अगर सरकार के पास 56 ईंच का सीना नहीं था तो फिर विधेयक में संशोधन के लिए प्रयास करने की आवश्यकता ही क्या थी और अगर सीना था तो फिर विधेयक को वापस क्यों लिया? लेकिन सिर्फ सीना चौड़ा होने या साहसी होने से ही कोई सरकार या व्यक्ति कार्यकुशल नहीं हो जाते बल्कि उसके साथ-साथ एक तेज और चतुर मस्तिष्क का होना भी उतना ही जरूरी है।
मित्रों,अभी कुछ दिन पहले ही खबर आई है कि कारगिल के शहीद सौरभ कालिया के मामले में भी सरकार ने यू-टर्न ले लिया है और सरकार का कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय अदालत में इस मामले को तभी ले जाया जा सकता है जब पाकिस्तान भी इसके लिए तैयार हो। अगर ऐसा ही था तो फिर इतनी कवायद करने और देश और न्यायालय का कीमती वक्त बर्बाद करने की आवश्यकता ही क्या थी? क्या कानून मंत्रालय को प्रत्येक मामले में देर से ज्ञान प्राप्त होता है?
मित्रों,इतना ही नहीं हमेशा से अल्पसंख्यक-तुष्टीकरण का विरोध करनेवाली पार्टी की सरकार भी उसी काम में जुट गई लगती है। आजकल टीवी-रेडियो पर अल्पसंख्यकों को विशेष सुविधा से संबद्ध विज्ञापन धड़ल्ले से आ रहे हैं। हमने मनमोहन सरकार के समय आवाज उठाई थी कि रजिया अगर गरीब है तो सरकार बेशक उसकी मदद करे लेकिन राधा अगर गरीब है तो उसकी भी सहायता करे क्योंकि हिंदू-बहुल देश में हिंदुओं को दोयम-दर्जे का नागरिक कैसे बनाया जा सकता है या फिर हिंदू परिवार में जन्म लेना कोई अपराध तो नहीं। लेकिन देखा तो यही जा रहा है कि पहले की सरकारें जो कर रही थीं वही मोदी सरकार भी कर रही है। मुझे तो लगता है अगर सरकार को तुष्टीकरण करना ही नहीं है तो फिर अल्पसंख्यकों के लिए अलग से मंत्रालय की आवश्यकता ही क्या है? भारत में अल्पसंख्यकों के साथ कभी भेदभाव तो किया नहीं गया। अगर वे पिछड़े हैं तो अपनी पिछड़ी और यथास्थितिवादी सोंच की वजह से पिछड़े हैं।
मित्रों,महत्त्वपूर्ण मामलों में केंद्र की मोदी सरकार द्वारा जिस तरह से बार-बार यू-टर्न लिया जा रहा है उससे अब हमारे मन में संदेह होने लगा कि यह सरकार भारत को सही दिशा में ले जा पाएगी। क्या बेवजह हर चौराहे पर यू-टर्न लेकर कोई मंजिल पर पहुँचा है या फिर पहुँच सकता है?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 30 अगस्त 2015

पोस्ट डेटेड चेक है नीतीश कुमार का पैकेज

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों बिहार में पैकेज-पैकेज का खेल चल रहा है। तेरा पैकेज इतने का तो मेरा इतने का। मगर सवाल उठता है कि पैकेज होता क्या है? क्या अपने घर में रखे पैसे को विभिन्न मदों में खर्च करना पैकेज देना होता है या फिर पैकेज का मतलब है कहीं बाहर से पैसों की प्राप्ति कर फिर उसको खर्च करना? जहाँ तक मैं समझता हूँ कि अपने दांयें हाथ से पैसे उठाकर बांयें हाथ को दे देने को किसी भी तरह से पैकेज देना तो नहीं ही कहा जाना चाहिए।
मित्रों,फिर भी अगर हम यह मान भी लें कि नीतीश कुमार जी ने बिहार के खजाने से बिहार के लोगों को 2 लाख करोड़ से ऊपर का पैकेज दे दिया तो क्या बिहार सरकार इस पैकेज तो तुरंत लागू करने जा रही है? इतिहास के आईने में अगर हम झाँकें तो पाते हैं कि 1942 में सर स्टेफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में क्रिप्स मिशन ने भारत का दौरा किया था। मिशन का कहना था कि हम भारत को डोमिनियन स्टेटस तो देंगे लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति व विजय-प्राप्ति के बाद। जाहिर है कि ब्रिटिश सरकार द्वितीय विश्वयुद्द में किसी भी तरह भारतीयों की सहायता चाहती थी। चूँकि प्रथम विश्वयुद्ध से पहले और के दौरान किए गए अपने वादों से ब्रिटिश सरकार युद्ध जीतने के बाद मुकर चुकी थी और उसका दमन-चक्र पहले से भी ज्यादा भीषण हो गया था इसलिए कांग्रेस ने अतीत से सीख लेते हुए क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव को पूरी तरह से नकार दिया। गांधी ने प्रस्ताव को पोस्ट डेटेड चेक की संज्ञा दी अर्थात् यह प्रस्ताव एक ऐसे बैंक चेक के समान है जिस पर वर्तमान की नहीं बल्कि भविष्य की तारीख डाली गई है और वह बैंक भी ध्वस्त हो जानेवाला है।
मित्रों,नीतीश कुमार जी का कथित पैकेज भी एक पोस्ट डेटेड चेक के समान है जिसको जनता तभी भुना पाएगी जब वो नीतीश  कुमार जी की बातों पर भरोसा करके एक बार फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज कर देती है। अगर हम सन् 1942 के भारत से आज के बिहार की तुलना करें तो पाते हैं क्रिप्स मिशन यानि नीतीश सरकार बिहार के लोगों से कह रही है कि हमने जो-जो पिछली बार नहीं किया इस बार जरूर कर देंगे लेकिन पहले हमें जिताओ तो। तब तो भारत की जनता ने क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को सिरे से नकार दिया था तो क्या इस बार बिहार की जनता पोस्ट डेटेड चेक पर भरोसा कर लेगी? दूसरी ओर नरेंद्र मोदी के पैकेज पर अमल शुरू हो भी गया है।
मित्रों,अब हम जरा-सा विश्लेषण कर लेते हैं कथित पैकेज में निहित कथ्य का भी। वास्तव में यह पैकेज सिर्फ व्यय का पैकेज है इसमें आय की बात कहीं की ही नहीं गई है। पैकेज में यह तो कहा गया है हम यह फ्री देंगे,वह फ्री देंगे लेकिन कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि हम इतने उद्योग स्थापित करेंगे या बिहार की आय में इतने की वृद्धि करेंगे या फिर इतने लोगों को रोजगार देंगे। पूरी दुनिया जानती है कि बिहार के युवाओं को रोजगार चाहिए न कि फ्री की वाई-फाई,फ्री का बिजली-पानी। बिहार के युवाओं को बेरोजगारी भत्ता नहीं चाहिए बल्कि रोजगार चाहिए,औद्योगिकृत-विकसित बिहार चाहिए जिसमें वे स्वाभिमान के साथ अपने घर-परिवार के साथ एक अच्छी और स्तरीय जिंदगी जी सकें। वास्तव में जिस दिन ऐसा होगा उसी दिन से बिहार स्वाभिमान के साथ सिर उठाकर जी सकेगा। एक क्या हजारों स्वाभिमान रैलियों का आयोजन भी बिहार के प्राचीन और मध्यकालीन स्वाभिमान को पुनर्स्थापित नहीं कर सकती।
हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

बेतुकी है वन रैंक वन पेंशन की मांग

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आप सोंच रहे होंगे कि मुझे क्या हो गया है। क्या अब मैं देशभक्त नहीं रहा? अगर आप ऐसा सोंच रहे हैं तो बिल्कुल गलत सोंच रहे हैं। दरअसल मैं इस तरह की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मेरा दिल आज भी देश के लिए धड़कता है। दरअसल आप रोज टीवी पर देखते हैं कि सैनिक वन रैंक वन पेंशन की मांग कर रहे हैं। टीवी वाले बस इतना ही दिखाते हैं और आप इतना ही देखते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि वन रैंक वन पेंशन की मांग है क्या और इसका देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?
मित्रों,मैं पहेलियाँ बुझाने में यकीन नहीं रखता इसलिए मैं आपको बताता हूँ कि वन रैंक वन पेंशन की मांग क्या है और इसे लागू करने से पिछली सरकार क्यों हिचकती थी और वर्तमान सरकार भी क्यों संकोच कर रही है। दरअसर सैनिकों की मांग है कि जो व्यक्ति कर्नल या किसी भी पद से 1980 में 250 रुपये प्रतिमाह के वेतन पर रिटायर हुआ उसका पेंशन उनके उन समकक्षों के बराबर हो जो अब एक-डेढ़ लाख प्रतिमाह के वेतन पर रिटायर हो रहे हैं।
मित्रों,आप जानते हैं कि हमारे देश में सारी सरकारी नौकरियों में पेंशन का निर्धारण उनके तत्कालीन वेतन के आधार पर होता है। उदाहरण के लिए मेरे पिताजी डॉ. विष्णुपद सिंह,कॉलेज रीडर के पद से वर्ष 2003 में 18000 रुपये के वेतन पर रिटायर हुए। अभी उनको 45000 का पेंशन मिल रहा है लेकिन अभी दो महीने पहले रामसुरेश गिरि रीडर के पद पर ही सवा लाख के वेतन पर रिटायर हुए हैं और उनका पेंशन 60 हजार से भी ज्यादा है। अब अगर पिताजी को वन रैंक वन पेंशन चाहिए तो उनका पेंशन भी कम-से-कम 60 हजार तो होना ही चाहिए।
मित्रों,अब सोंचिए कि अगर सैनिकों की वन रैंक वन पेंशन की मांग को केंद्र सरकार ने मान लिया तो क्या अन्य विभाग के लोग भी अपने लिए यही मांग नहीं करेंगे? फिर देश की अर्थव्यवस्था का क्या हाल होगा? वैसे भी अगले साल नए वेतनमान के आने के बाद अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़नेवाला है। क्या वन रैंक वन पेंशन लागू होने के बाद रचनात्मक कार्यों के लिए देश के खजाने में पर्याप्त पैसा बचेगा? फिर देश के विकास का क्या होगा? हो सकता है कि सैनिकों की मांग सैद्धांतिक रूप से सही हो लेकिन क्या वह व्यावहारिक तौर पर सही है? इसलिए सैनिकों को जिद छोड़ते हुए उस देश की भलाई के लिए बीच में कहीं समझौते को मान लेना चाहिए जिस देश के लिए उन्होंने अपना खून बहाया है। दरअसल वन रैंक वन पेंशन की मांग मधुमक्खी का छत्ता है जिस पर हाथ डालने का मतलब होगा सभी विभागों के सारे सरकारी पेंशनधारियों को धरना,प्रदर्शन,अनशन और आंदोलन के लिए भड़काना,प्रेरित करना। वैसे इसके लागू होने से मुझे भी लाभ होगा क्योंकि मेरे पिताजी भी पेंशनधारी हैं लेकिन मुझे देश की कीमत पर यह लाभ नहीं चाहिए,कतई नहीं।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

कौन कहता है बिहार बीमारू राज्य नहीं है?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,एक समय था जब भारत के अर्थशास्त्री बिहार,मध्य प्रदेश,राजस्थान और उत्तर प्रदेश को भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बोझ मानते थे और इनको इकट्ठे बीमारू राज्य कहा करते थे। राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्य अब दावा करने लगे हैं कि वे बीमारू नहीं रहे लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि ठीक ऐसा ही दावा इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी बिहार के बारे में कर रहे हैं। शायद इसी तरह के घटनाक्रम में कभी यह कहावत बनी थी कि जब सारी लड़कियाँ नृत्य करने लगीं तो लंगड़ी-लूली ने कहा कि इनसे अच्छा नृत्य तो वो कर लेती है।
खैर,अब नीतीश कुमार उर्फ बिहार कुमार (कृपया इस नामकरण को मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार के प्रसंग से जोड़कर न देखें ) को जो दावा करना था उन्होंने कर लिया,दस साल तक जो हवाबाजी करनी थी कर ली। हवाबाजी में तो पूरी वसुधा पर उनका कोई जोड़ ही नहीं है। लेकिन क्या नीतीश कुमार जी बताएंगे कि बिहार बीमारू राज्य कैसे नहीं रहा? जहाँ भारत की प्रति व्यक्ति औसत आय 80388 रुपया है वहीं बिहार की प्रति व्यक्ति औसत आय 31229 रुपया है। जहाँ बिहार में बिजली की प्रति व्यक्ति खपत 144 किलोवाट प्रति घंटा है. वहीं देश में औसतन प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 927 किलोवाट प्रति घंटा है। जहाँ राज्य की साक्षरता का औसत है 63.8 फीसदी है वहीं राष्ट्रीय औसत 74 फीसदी।  जहाँ बिहार में 43.85 फीसदी लोग अनपढ़ हैं वहीं देश का औसत 35.73 फीसदी है। जहाँ बिहार के 70 फीसदी ग्रामीण परिवार दिहाड़ी मजदूर हैं, वहीं देश का औसत 51 फीसदी है। जहाँ भारत में सिंचित क्षेत्र का औसर 28 प्रतिशत है वहीं कृषि योग्य कुल 93.6 लाख हेक्टेयर भूमि में से मात्र 15 लाख हेक्टेयर भूमि ही वास्तविक रूप से सिंचित है। आज नीतीश कुमार उर्फ बिहार कुमार बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं तो लगे हाथ वे यह भी बता दें कि आज उनके दस साल के शासन के बाद भी राज्य में कितने प्रतिशत सरकारी नलकूप चालू अवस्था में हैं? जहाँ भारत में गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करनेवाले लोगों की संख्या जहाँ 36 प्रतिशत वहीं बिहार में आजादी के 70 साल बाद भी 55 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं और जहालत और जलालत की जिंदगी जी रहे हैं।
मित्रों,अब बात करते हैं उद्योगों की। बिहार में देश की आबादी 9 प्रतिशत है जबकि राज्य के कारखानों से रोजगार पाने वाले लोगों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रलय की एक रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में 1.79 लाख कारखाने हैं जिनमें से बिहार में मात्र तीन हजार कारखाने ही हैं। बिहार में एक कारखाने से औसतन 40 लोगों को रोजगार मिल रहा है जबकि देश में यह औसत 72 है। राज्य में एक भी ऐसा कारखाना नहीं है जो 2,000 से अधिक लोगों को रोजगार देता हो। प्रदेश में जो भी कारखाने हैं उनमें से आधे ऐसे हैं जिनमें 15 से कम लोगों को रोजगार मिलता है। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में बिहार में बरौनी रिफाइनरी ही प्रमुख औद्योगिक इकाई है। इसके अलावा छिटपुट खाद्य उत्पाद बनाने वाली इकाइयां हैं और नीतीश कुमार हैं कि बिहार को बीमारू मानने को तैयार ही नहीं हैं। जो राज्य पूरे देश में सबसे पिछड़ा है अगर उसे बीमारू नहीं कहा जाएगा तो क्या महाराष्ट्र,गुजरात और पंजाब को बीमारू कहा जाएगा? कुछ क्षेत्र जैसे शिक्षा ऐसे भी हैं जिनमें बिहार की स्थिति लालू-राबड़ी के आतंक-राज के मुकाबले और खराब ही हुई है। भले ही बिहार में साक्षर लोगों की संख्या बढ़ी है लेकिन सरकारी स्कूल-कॉलेजों में शिक्षा का स्तर गिरा ही है।
मित्रों,हम नीतीश कुमार उर्फ बिहार कुमार जी से सविनय निवेदन करते हैं कि वे बिहार की हकीकत को देखते हुए मान लें कि बिहार आज से 25-30 साल पहले भी बीमारू था और आज भी बीमारू है। उनके जिद पकड़ने से सत्य और तथ्य बदल नहीं जाएगा। बिहार अधिकांश क्षेत्रों में 5-6 दशक पहले भी नीचे से अव्वल था और आज भी है लेकिन नीतीश कुमार जी को गांठ बांध लेनी चाहिए कि आगे ऐसा नहीं होगा। बिहार अब जाग चुका है और जनता परिवार कैसे बिहार को खंता (गड्ढे ) में फेंक देना चाहती समझ चुका है। अब बिहार नीचे से अव्वल नहीं ऊपर से अव्वल बनना चाहता है। बिहार को अब लालटेन की रोशनी और तीर-धनुष का युग नहीं चाहिए और न ही भारत-विरोधी खूनी पंजा चाहिए बल्कि अब हर बिहारी को विकास चाहिए,24 घंटे बिजली चाहिए,हर खेत को पानी चाहिए,हर हाथ को बिहार में ही काम चाहिए,हर बच्चे को साईकिल और पैसे के बदले बेहतरीन शिक्षा चाहिए,दिवाला नहीं दिवाली चाहिए,कमल पर सवार लक्ष्मी चाहिए।

हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित

बुधवार, 12 अगस्त 2015

मोदी विरोध के बहाने देश को नुकसान पहुँचा रहे हैं लालू-नीतीश-कांग्रेस

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,नाना पाटेकर ने यशवंत फिल्म में एक डॉयलॉग कहा था कि गिरना है तो झरने की तरह गिरो लेकिन हमारे कुछ राजनेता कुत्ते की तरह गिर गए हैं। इनलोगों की प्राथमिकता सूची में देशहित कहीं है ही नहीं। वे दिखाने के लिए तो विरोध कर रहे हैं प्रधानमंत्री मोदी का लेकिन वास्तविकता यह है कि वे देश को भी नुकसान पहुँचाना चाहते हैं और पहुँचा भी रहे हैं। क्या लालू-नीतीश और कांग्रेस को पता नहीं है कि संसद के ठप्प होने से सरकार अर्थव्यवस्था को गति देनेवाले दोनों महत्वपूर्ण विधेयकों जीएसटी बिल और भूमि अधिग्रहण बिल को पास नहीं करवा पाएगी और जब तक ये दोनों विधेयक पारित नहीं होते हैं देश में देसी-विदेशी निवेश को द्रुत-गति मिलना असंभव है? निश्चित रूप से लालू-नीतीश और कांग्रेस को यह पता है। तो फिर संसद को ठप्प करने का क्या मतलब है? क्या इसका यह मतलब नहीं है कि ये नेता भारत को बर्बाद कर देना चाहते हैं। इनको यह भी पता है कि पीएम मोदी जो रोजगार-निर्माण और अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए जाने जाते हैं संसद को ठप्प कर देने से ऐसा नहीं कर पाएंगे और तब उन पर इस बाबत आरोप लगाना आसान हो जाएगा कि कहाँ कि 10 प्रतिशत की विकास दर और कहाँ हैं रोजगार?
मित्रों,दुर्भाग्यवश उसी फिल्म में नाना पाटेकर ने एक और डॉयलॉग बोला था कि एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है। क्या मुट्ठी-भर राजद,जदयू और कांग्रेस के सदस्यों ने अपनी मनमानी और देशविरोध नीति से पूरे भारत को हिजड़ा नहीं बना दिया है? आखिर कब तक हम आँखें बंद कर देखते रहेंगे कि चंद लोगों ने किस तरह भारत के विकास के पहिए को अवरूद्ध करके रख दिया है? एक अकेले जीएसटी के आने से भारत की जीडीपी में 2 प्रतिशत का उछाल आ जाएगा। आखिर कब तक हम इन भारतविरोधी पार्टियों की मनमानी को बर्दाश्त करते रहेंगे? लालू-नीतीश को अगर बिहार और बिहारियों को अमीर बनाना है तो उनको किसकी तरफ होना चाहिए? उनलोगों की तरफ जिनकी राजनीति आजादी के बाद से ही गरीबों को गरीब बनाकर रखने से चलती है या फिर उनलोगों के पाले में जो सबको अमीर बनाना चाहते हैं? कल तो इन विपक्षी दलों ने हर सीमा को पार कर लिया। अब इनको मनाने का समय बीत चुका है। अगर ये लोग चाहते हैं कि प्रत्येक विधेयक को संयुक्त सत्र बुलाकर ही पास कराया जाए तो मोदी-सरकार बिना ज्यादा सोंच-विचार किए ऐसा भी करना चाहिए और ऐसे प्रत्येक कदम उठाने चाहिए जिससे देश के आर्थिक विकास को नई गति मिले क्योंकि देश संसदीय परंपराओं से भी ऊपर है,सबसे ऊपर है।

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