सोमवार, 20 अप्रैल 2015

राहुल जी निराश मत होईए,आपका जवाब हम देई देते हैं

मित्रों,आज कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जी काफी खुश हैं और काफी दुःखी भी। आप कहेंगे ऐसा कैसे हो सकता है तो फिर आप राहुल जी को नहीं जानते हैं। वे स्थिरबुद्धि हैं इसलिए एकसाथ ऐसा कर लेते हैं। माननीय युवराज जी इस बात से काफी खुश हैं कि उन्होंने जिन्दगी में पहली बार अच्छा भाषण किया है। वैसे यह मुगालता उनको हर बार हो जाता है जब-जब वे भाषण करते हैं लेकिन कुछ ही समय बाद दूर भी हो जाता है। खैर श्री गांधी को इस बात से भारी सदमा लगा है कि भाजपा नेतागण उनकी बातों का सही-सही जवाब नहीं दे पाए। पता नहीं उनकी दृष्टि में सही जवाब क्या हो सकता है।
मित्रों,चूँकि मुझसे श्री गांधी का दुःख देखा नहीं जा रहा है इसलिए हमने फैसला किया है कि राहुल जी की बातों और उनके सवालों का जवाब हम ही दे देते हैं। वैसे हम न तो सांसद हैं और न ही नेतारूपी अभिनेता लेकिन हमारी आदत रही है अनाधिकार चेष्टा करने की। सो हम इस बात की बिना परवाह किए कि किसी को हमारी चेष्टा से दुःख हो सकता है हम राहुल गांधी जी का दुःख दूर कर देते हैं। आखिर परोपकार भी तो कोई चीज होती है।
मित्रों,हमारे राहुल जी का कहना है कि मोदी सरकार सूट-बूटवालों की सरकार है। राहुल जी कितने बड़े पाखंडी हैं जो उनको यह पता ही नहीं है कि भारत को सबसे ज्यादा नुकसान खादी के बने सस्ते कपड़े पहननेवालों ने पहुँचाया है। उनके पिताजी के नानाजी भी खादी ही पहनते थे लेकिन उनका कपड़ा पेरिस से धुलकर आता था। आज भारत में सबसे ज्यादा कालाधन अगर किसी के पास है तो वे खादीवाले ही हैं।
मित्रों,राहुल जी ने निश्चित रूप से स्वामी विवेकानंद के संस्मरण नहीं पढ़े हैं अन्यथा वे कपड़ों की बात ही नहीं करते। हुआ यूँ था कि जब विवेकानंद जी पहली बार अमेरिका की यात्रा पर गए तो उनके गेरूए वस्त्र को देखकर अमेरिकी हँस पड़े। तब स्वामी जी ने पूरी विनम्रता के साथ अमेरिकियों से पूछा कि आपके यहाँ व्यक्ति की पहचान क्या उनके कपड़ों से निर्धारित होती है उनके कर्म से नहीं? राहुल जी को भी नरेंद्र मोदी के कपड़ों को नहीं उनके कर्मों को देखना चाहिए। नरेंद्र मोदी तो ऐसी शख्सियत हैं कि जो अपने कपड़े तक को नीलाम कर देते हैं और प्राप्त धनराशि को सरकारी खजाने में जमा कर देते हैं। नरेंद्र मोदी राहुल जी की तरह पाखंडी नहीं हैं कि खादी पहनकर चांदी के बरतन में भोजन करें या चांदी की पलंग पर सोयें बल्कि वे तो पूर्ण योगी हैं,ज्ञान योगी,कर्म योगी और राज योगी भी। साथ ही राहुल जी को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि मोदी जी के देश-विदेश में सूट पहनने से भारत को लाभ हो रहा है या हानि हो रही है? वास्तविकता तो यह है कि मोदी जी के सूट पहनने या शॉल ओढ़ने से भारत के उस वस्त्रोद्योग को बढ़ावा मिलता है जो आज भारत के सबसे ज्यादा श्रमिकों को रोजगार दे रहा है।
मित्रों,वास्तविकता तो यह है कि मनमोहन सिंह की सरकार असली सूट-बूटवालों की सरकार थी जिसमें कौन संचार मंत्री बनेगा का फैसला रतन टाटा,मुकेश अंबानी,नीरा राडिया और बरखा दत्त करते थे न कि मोदी की सरकार सूट-बूटवाली है जिसके समय सहारा श्री तिहाड़ जेल की शोभा बढ़ा रहे हैं,मुकेश अंबानी पर जुर्माना हो रहा है,वोडाफोन परेशान है,विजय माल्या बेहाल है आदि-आदि। मोदी की सरकार तो गरीबों की सरकार है जिसकी सारी नीतियाँ और कार्यक्रम गरीबों की भलाई के लिए हैं।
मित्रों,इसी तरह राहुल जी नितिन गडकरी के बयान को भी अपने भाषण में उद्धृत किया है लेकिन उन्होंने ऐसा करते हुए थोड़ी-सी धूर्तता भी की है। उन्होंने गडकरी जी के बयान को संदर्भ से काटकर पेश किया है। गडकरी जी ने न सिर्फ यह कहा था कि किसानों की मदद न तो सरकार ही कर सकती है और न तो भगवान ही बल्कि यह भी कहा था कि उनकी सरकार चाहती है कि किसानों आर्थिक रूप से इतने सक्षम हो जाएँ कि उनको न तो भगवान और न ही सरकार का आसरा ही करना पड़े बल्कि वे हर तरह की क्षति को खुद अपने बल पर झेल सकें। राहुल जी क्या बताएंगे कि गडकरी जी ने क्या गलत कहा था? आज किसान अगर फसल खराब होने पर आत्महत्या करने को बाध्य हो रहे हैं तो यह कोई 14 महीने में पैदा हुई स्थिति नहीं है बल्कि 70 सालों में किसानों को इतना विपन्न बना दिया गया है कि उनको अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा है। 70 साल पहले कहा जाता था उत्तम खेती,मध्यम बान,अधम चाकरी भीख निदान। क्यों आज यह कहावत उल्टी हो गई है? क्यों आज भी किसान सिंचाई के लिए रामभरोसे है? क्यों आज किसान खेती करना नहीं चाहता? क्या 14 महीने पहले किसानों की स्थिति अच्छी थी? गुजरात के किसानों की जमीन अगर मोदी सरकार ने जबरन छीना था तो वहाँ के किसानों ने कभी विरोध क्यों नहीं किया? कल की राहुल की रैली में कितने ऐसे किसान थे जो गुजरात से आए थे? गुजरात के किसानों की स्थिति बाँकी राज्यों के किसानों से अच्छी क्यों है?
मित्रों,क्या राहुल जी यह नहीं जानते हैं कि कृषि राज्य सूची का विषय है? किस किसान की कितनी फसल खराब हुई इसका सर्वेक्षण करवाना संवैधानिक रूप से किसका काम है केंद्र की सरकार का या राज्य की सरकार का? केंद्र सरकार तो बार-बार राज्य सरकारों से इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट मांग रही है। अगर राज्य सरकारें इस काम को गंभीरता से नहीं ले रही हैं तो इसके लिए दोषी कौन है राज्य सरकार या नरेंद्र मोदी? हाँ,अगर राज्य सरकार की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार मुआवजा नहीं देती है तो जरूर वह दोषी होगी लेकिन केंद्र तो पैसे राज्य सरकारों को ही दे सकती है। फिर भी बाँटना तो राज्यों की सरकारों को ही है। अगर बाँटने में भ्रष्टाचार होता है और मुआवजे को तंत्र सोख जाता है तो फिर दोषी कौन होगी राज्य की या केंद्र की सरकार?
मित्रों,हमारे राहुल जी को इस बात का भी दुःख है कि मोदीजी किसानों से मिलने नहीं गए। क्या किसानों का भला करने के लिए सिर्फ उनसे मिल लेना ही काफी होगा? हमारा उद्देश्य किसानों से मिलना होना चाहिए या उनके दुःखों का निवारण करना? क्या उनकी समस्याओं को उनके खेतों में गए बिना दूर नहीं किया जा सकता है? अगर नहीं तो पिछले 70 सालों में किसानों की हालत दिन-ब-दिन खराब क्यों होती चली गई जबकि 65 सालों तक कांग्रेस या कांग्रेस के समर्थन से बनी सरकार केंद्र में सत्ता में थी? क्या राहुल जी द्वारा लीलावती-कलावती की झोपड़ी में रात गुजारने से देश की गरीबी दूर हो गई? क्या राहुलजी बताएंगे कि आजादी के 70 साल बाद भी अगर भारत की 65 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है तो इसके लिए कौन सबसे ज्यादा जिम्मेदार है? भारत के कृषि मंत्री आसमानी आपदा के आने के बाद से ही प्रत्येक राज्य का दौरा कर रहे हैं। राज्यों के मुख्यमंत्रियों,मंत्रियों और अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे हैं। भारत के गृहमंत्री खेतों में जाकर स्वयं बालियों से दानों को निकालकर देख रहे हैं। क्या पीएम को उन्होंने अपनी रिपोर्ट नहीं दी होगी? फिर मोदी जी को हर खेत पर जाने की क्या आवश्यकता है? क्या पीएम के हर खेत का दौरा कर लेने मात्र से ही किसानों की समस्त समस्याओं का समाधान हो जाएगा? या इसके लिए इस तरह की योजनाएँ बनानी पड़ेंगी या संजीदगी से लागू करनी पड़ेगी कि खेती फिर से गुलाम भारत की तरह भारत का सबसे उत्तम व्यवसाय हो जाए? और हम समझते हैं कि मोदी सरकार इसी दिशा में काम भी कर रही है।
मित्रों,सत्ता और विपक्ष में से कौन किसानों की तरफ है और कौन वाड्रा की तरफ यह राहुल जी को बताने की कोई आवश्यकता नहीं है। आँकड़े गवाह हैं कि किसानों की सबसे ज्यादा जमीन पिछले दिनों हरियाणा में कांग्रेस की सरकार ने ही छीनी है। जमीन का अधिग्रहण होने बाद भी जमीन का मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा न कि उद्योगपतियों के पास। किसानों और गरीबों के नाम की माला जपते-जपते मुँह में राम बगल में छुरी को चरितार्थ करनेवाले कांग्रेसियों ने किसानों और गरीबों की हालत कितनी चिंताजनक बना दी यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। मोदी जी ने पहली बार किसानों की मूल समस्या को पकड़ा है और वह है सिंचाई के साधन नहीं होना और फसल का उचित मूल्य नहीं मिलना। इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री सिंचाई योजना शुरू की है और कहा है कि हम किसानों को उसकी लागत से ड्योढ़ा दाम देंगे।
मित्रों,राहुल जी और पूरा विपक्ष परेशान है कि मोदी इतनी विदेश-यात्रा क्यों करते हैं तो उनको पता होना चाहिए कि मोदी विदेश भी गए थे तो देश के लिए ही न कि छुट्टियाँ मनाने या गुप्त-यात्रा पर गए थे।

मित्रों,लगता है कि राहुलजी ने अभी तक नरेंद्र मोदी को पीएम के रूप में स्वीकार नहीं किया है तभी तो वे कभी मनमोहन सिंह को पीएम कह जाते हैं तो कभी कहते हैं कि आपके पीएम जबकि उनको कहना चाहिए था हमारे पीएम,देश के पीएम।
मित्रों,हम अंत में राहुल जी को बता देते हैं कि मोदी सरकार ने पिछली बार लोकसभा में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश में कौन-कौन से परिवर्तन किया था हो सकता है कि वे अपने थाईलैंड प्रवास के दौरान उनको पढ़ने का समय नहीं मिला होगा-
01. खेती योग्य जमीन दायरे में नहीं
मोदी सरकार ने पहले संशोधन में खेती योग्य भूमि को अधिग्रहित करने का भी प्रस्ताव शामिल किया था। लेकिन अब लोकसभा में लाए गए बिल में संशोधन कर दिया गया है। अब बहुफसली भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा। साथ ही इंडस्ट्रियल कॉरीडोर के लिए सीमित जमीन लिए जाने का फैसला लिया गया है। इससे किसानों के एक बड़े वर्ग को राहत मिलेगी।
02. मंजूरी जरूरी
भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के मुताबिक अधिग्रहण के लिए 80 फीसदी किसानों की मंजूरी का प्रावधान था। उसे मोदी सरकार ने नए संशोधन में खत्म कर दिया था लेकिन अब लोकसभा में पास किए गए बिल के मुताबिक सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के लिए होने वाले अधिग्रहण में किसानों की मंजूरी भी जरूरी होगी। इसी तरह से आदिवासी क्षेत्रों में अधिग्रहण के लिए पंचायत की सहमति जरूरी होगी।
03. अपील का अधिकार
मोदी सरकार ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में शामिल अपील के अधिकार को खत्म कर दिया था। पर अब संशोधन के बाद आए बिल में किसानों को अपील का अधिकार वापस मिल गया है। अब वे अधिग्रहण के किसी भी मामले में अपील कर सकेंगे। इससे उनके अधिकारों की सुरक्षा को बल मिलेगा।
04. मिलेगी नौकरी
पहले चले आ रहे भूमि अधिग्रहण कानून में प्रभावित किसानों को मुआवजा देने का प्रावधान था लेकिन किसी को नौकरी नहीं दी जाती थी। संशोधन के बाद लोकसभा में पास हुए बिल में प्रभावित परिवार के किसी एक सदस्य को नौकरी दिए जाने का प्रावधान किया गया है।
05. इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए अधिग्रहण
भूमि अधिग्रहण बिल में शामिल किए गए एक प्रावधान से रेलवे ट्रेक और हाइवे के एक किलोमीटर दायरे में रहने वालों को परेशानी हो सकती है। सरकार ने फैसला कर लिया है कि इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए अब रेलवे ट्रैक और हाईवे के दोनों तरफ एक किलोमीटर तक की जमीन का अधिग्रहण किया जा सकता है। संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल के मुताबिक बंजर जमीनों के लिए अलग से रिकॉर्ड रखा जाएगा।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 19 अप्रैल 2015

भारतीय नेताओं का निजी जीवन और देशहित

मित्रों,वैसे तो हर व्यक्ति को निजता का मौलिक अधिकार होता है लेकिन जब व्यक्ति सार्वजनिक जीवन से जुड़ा हुआ हो और उसकी ऐय्याशी व रंगरेलियों की वजह से देश-प्रदेश का हित प्रभावित होता हो तब जनता को अधिकार होना चाहिए यह जानने का कि उसका नेता कैसा है और क्या कर रहा है। पंडित नेहरू से लेकर नीतीश कुमार तक के बारे में समय-समय पर कई तरह की अंदरखाने की बातें बाहर आती रही हैं जिससे भारत की जनता को शक होता रहता है कि कहीं इन नेताओं ने भी मुगल बादशाह जहाँगीर की तरह शराब,कबाब और शबाब के बदले हिन्दुस्तान को नूरजहाँ के पास गिरवी तो नहीं रख दिया था या दिया है या फिर पैसों के बदले बेच तो नहीं दिया या फिर पैसों के बदले बेच तो नहीं दिया।
मित्रों,सवाल उठानेवाले लोग तो भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दाम्पत्य जीवन को लेकर भी सवाल उठाते रहे हैं लेकिन नरेंद्र मोदी तो काफी पहले से ही संन्यासी हैं। हाँ यह बात जरूर है कि अगर उनको संन्यास ही लेना था तो फिर उन्होंने शादी क्यों की? क्यों एक अबला का जीवन बर्बाद किया? हाँ यह भी सही है कि अभी तक नरेंद्र मोदी के ऊपर विवाहेतर संबंध जैसा कोई आरोप नहीं है जो यह दर्शाता है कि मोदी पूरी निष्ठा के साथ संन्यास के नियमों का पालन कर रहे हैं।
मित्रों,अब कांग्रेस के कुछ वर्तमान नेताओं को देखिए जैसे कि अभिषेक मनु सिंघवी,दिग्विजय सिंह आदि। लगता है जैसे इन लोगों का चरित्र शब्द से ही कुछ भी लेना-देना नहीं है। इसी तरह हमारे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के बारे में भी कई-कई तरह की बातें हवाओं में तैरती रहती हैं। नीतीश जी का दाम्पत्य जीवन भी बड़ा रहस्यमय रहा है। उनके बड़े भैया लालू जी की पत्नी ने तो एक बार खुलेआम मंच पर से ही बिहार के सड़क निर्माण मंत्री ललन सिंह को उनका साला बता दिया था जबकि दरअसल में ललन सिंह जी नीतीश जी के साले तो क्या जाति-बिरादरी के भी नहीं हैं। इसी तरह से पिछले साल लालू जी के लाड़ले तेजस्वी यादव जी का भी एक बेहद कामुक फोटो फेसबुक पर वाइरल हो गया था। कहा तो यह भी जाता है कि यह तस्वीर किसी और ने नहीं बल्कि उनके मामाश्री सुभाष जी ने ही खींची थी।
मित्रों,कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी यूपीए की सरकार के समय बराबर विदेश की गुप्त-यात्राएँ किया करती थीं और मीडिया को निजता की दुहाई देती रहती थीं। अभी राहुल जी दो महीने तक गुप्त रहने के बाद प्रकट हुए हैं। इन दो महीनों में वे कहाँ-कहाँ रहे और क्या-क्या किया यह देश की जनता को क्यों नहीं जानना चाहिए? अगर सबकुछ गुप्त ही रखना था तो फिर सार्वजनिक जीवन में आना ही नहीं चाहिए था। आखिर ऐसी कौन-सी बात है जिसको वे और उनकी माँ जनता के साथ साझा नहीं करना चाहते? कहीं उनलोगों ने गुप्त-यात्राओं के दौरान कोई ऐसा काम तो नहीं किया जिससे भारत के दूरगामी या अल्पकालिक हितों को नुकसान होता हो? अगर आपको जनता का मत चाहिए,अगर आप चाहते हैं कि जनता आपके हाथों में देश या प्रदेश की बागडोर सौंप दे तो फिर जनता को निश्चित रूप से यह जानने का अधिकार भी है कि आप क्या हैं,आपका चरित्र कैसा है? ऐसा हरगिज नहीं चलेगा कि पानी में तैरते हुए बर्फ की तरह आपके व्यक्तित्व का दसवाँ हिस्सा ही आँखों के आगे हो। आखिर आज भी भारत कश्मीर और अरूणाचल में नेहरू की गलतियों का नतीजा ही तो भुगत रहा है। उसी नेहरू की गलतियों का जिनके कथित रूप से लेडी माउंटबेटन से अंतरंग संबंध थे और ऐसा दावा सिर्फ भारतीय ही नहीं बल्कि माउंटबेटन की बेटी भी कर रही है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

नमो की शॉल और प्रेस्टीच्यूट्स

मित्रों, पिछले कुछ दिनों से इंटरनेट पर जनरल वीके सिंह द्वारा मीडिया के एक हिस्से को प्रेस्टीच्यूट्स कहे जाने का विवाद छाया हुआ है। भारतीय मीडिया का एक हिस्सा इस बात को लेकर मुँह फुलाये बैठा है कि उनकी तुलना प्रौस्टीच्यूट्स यानि वेश्याओं के साथ क्यों कर दी गई। जाहिर है कि जनरल साहब को ऐसा नहीं करना चाहिए था बल्कि बिकाऊ मीडिया की तुलना तो किसी जानवर के साथ करनी चाहिए थी।
मित्रों,वेश्या तो सिर्फ शरीर का सौदा करती हैं यह बिकाऊ मीडिया तो रोजाना अपने ईमान का सौदा करती है। इनकी हालत तो कुत्तों जैसी है जो रोटी को देखते ही मुँह से लार टपकाने लगते हैं। इन प्रेस्टीच्यूट्स की आमदनी का आप हिसाब ही नहीं लगा सकते हैं। इनका वेतन होता तो हजारों और लाखों में होता है लेकिन इनकी वास्तविक आय करोड़ों में होती है। वरना क्या कारण है कि किसी पत्रकार के पास दिल्ली में करोड़ों की कोठी है तो किसी के पास नोएडा में अपना मॉल है?
मित्रों,अभी जब भारत के पीएम नरेंद्र मोदी फ्रांस गए थे तो उन्होंने एक शॉल ओढ़ रखी थी जिस पर कथित रूप से N M लिखा हुआ था।

https://twitter.com/sagarikaghose/status/587161033845800960

महान पत्रकार सागरिका घोष ने बिना सोंचे-समझे,बिना किसी प्रमाण के नमो पर यह आरोप लगा दिया कि उनके द्वारा ओढ़ी गई यह शॉल लुईस व्हिटन कंपनी द्वारा बनाई गई थी जबकि लुईस व्हिटन का कहना है कि वो ऐसे शॉल तो बनाती ही नहीं है।

https://twitter.com/search?q=sagrika%20ghose&src=tyah

इसी तरह बिकाऊ मीडिया ने नरेंद्र मोदी के शूट को लेकर भी अफवाह उड़ाई थी और बाद में बिना विलंब किए माफी भी मांग ली थी। लोकसभा चुनावों के समय इसी बिकाऊ मीडिया का एक चैनल एक नेता को जबर्दस्ती क्रांतिकारी,बहुत ही क्रांतिकारी साबित करने पर तुला हुआ था। हद है बेहयाई की कि पहले कुछ भी बोल दीजिए और जब वह झूठ साबित हो जाए तो बेरूखी के साथ माफी मांग लीजिए।

https://twitter.com/sagarikaghose/status/587189427065135104

मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि कांग्रेस-राज में जमकर मलाई चाभनेवाली बिकाऊ मीडिया ने बार-बार की फजीहत के बाद भी हार नहीं मानी है और अभी भी बेवजह के विवाद पैदा करने की कोशिश करती रहती है। आपको याद होगा कि मनमोहन सिंह की सरकार ने इस दलाल मीडिया का वर्चस्व इस कदर बढ़ा हुआ था कि नीरा राडिया और बरखा दत्त मंत्रियों की सूची तक बनाने में दखल रखते थे और नरेंद्र मोदी की सरकार आते ही इनलोगों के ऐसे बुरे दिन आ गए कि अब जब पीएम विदेश जाते हैं तो इन लोगों को अपनी जेब से भाड़ा लगाकर समाचार कवर करने जाना पड़ता है। ऐसे लोगों का देशहित से भी पहले भी कुछ भी लेना-देना नहीं था और आज भी नहीं है बल्कि इनके लिए तो अपना स्वार्थ ही सबकुछ है। इस बिकाऊ मीडिया को आज भी इस बात का भ्रम है कि वह जो कुछ भी कह या दिखा देगी देश की जनता उसको आँखें बंद करके सच मान लेगा। जबकि सच्चाई तो यह है कि आज की सबसे शक्तिशाली मीडिया न तो प्रिंट मीडिया है और न ही इलेक्ट्रानिक मीडिया बल्कि सोशल मीडिया है। एक ऐसा प्लेटफॉर्म जहाँ न तो कोई बड़ा है और न ही कोई छोटा,सब बराबर हैं। एक ऐसा पात्र है जो पलभर में दूध को दूध और पानी को पानी कर देता है। इसलिए अच्छा हो कि प्रेस्टीच्यूट्स जल्दी ही सही रास्ते पर आ जाएँ और फिजूल की अफवाहें फैलाना बंद कर दे नहीं तो यकीनन उनकी हालत ऐसी हो जाएगी कि वे सच भी बोलेंगे तो लोग उसे झूठ समझेंगे। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

मेक इन इंडिया में बाधक बना विपक्ष

मित्रों,यह गहन चिंतन का विषय है कि राजनीति को किसके लिए होनी चाहिए। राजनीति अगर सिर्फ राज के लिए की जाती है तो वह राजनीति है ही नहीं बल्कि राजनीति राज्य के लिय,राज्य की भलाई के लिए की जानी चाहिए। परन्तु आदर्श और यथार्थ में हमेशा एक फर्क होता है,फासला होता है और इस फासले को इन दिनों आसानी से देखा जा सकता है भारत की केंद्रीय राजनीति में विपक्ष की भूमिका निभा रही राजनैतिक पार्टियों की कथनी और करनी में।
मित्रों,लगभग सारी विपक्षी पार्टियाँ बात तो जनता की भलाई की कर रही हैं लेकिन काम कर रही हैं जनता और देश को नुकसान पहुँचाने का। चाहे किसी भी तरह का उद्यम या उद्योग हो उसके लिए सबसे जरूरी होती है जमीन। केंद्र सरकार 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में जरूरी बदलाव करना चाहती है क्योंकि इस कानून ने भूमि अधिग्रहण को लगभग असंभव ही बना दिया है। केंद्र सरकार चाहती है कि कानून में कुछ ऐसे सुधार किए जाएँ जिससे न तो किसानों को ही क्षति हो या न तो किसानों के साथ ही जबर्दस्ती हो और न ही राज्य के लिए उद्योगादि की स्थापना के लिए जमीन प्राप्त करना असंभव ही हो जाए।
मित्रों,कल अगर केंद्र सरकार देश की 65 प्रतिशत युवा आबादी को रोजगार देने में विफल रहती है तो यही विपक्ष शोर मचाएगा कि केंद्र वादे को पूरा नहीं कर पाया। क्या विपक्ष बताएगा कि बिना जमीन के उद्योग कहाँ खुलेंगे? क्या विपक्ष बताएगा कि अगर उद्योग नहीं खुलेंगे तो देश के बेरोजगार युवाओं को रोजगार कैसे मिलेगा? क्या विपक्ष के पास इसके लिए कोई वैकल्पिक योजना है? अगर विपक्ष के पास ऐसी कोई वैकल्पिक योजना नहीं है तो फिर उच्च सदन राज्यसभा को हथियार बनाकर भूमि अधिग्रहण बिल को रोकने का क्या औचित्य है? राज्यसभा का गठन तो इस उद्देश्य से किया गया था कि अगर लोकसभा से कोई गलती हो जाती है तो उसमें सुधार किया जा सके लेकिन जिस तरह से विपक्ष राज्यसभा में अपने बहुमत का देशहित के विरूद्ध दुरूपयोग कर रहा है उसने तो राज्यसभा के औचित्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। जबकि आज पूरी दुनिया की शक्तियाँ भारत के मेक इन इंडिया में अपना अहम योगदान देने को तत्पर हैं यह विडंबनापूर्ण है कि भारत का विपक्ष इसमें रोड़े अँटका रहा है। कल अगर विपक्षी पार्टियों द्वारा शासित राज्यों में देसी-विदेशी पूंजी का निवेश नहीं होता है यही विपक्ष कहेगा कि मेक इन इंडिया का लाभ उनको जानबूझकर नहीं मिलने दिया गया। बिहार का ही उदाहरण अगर लें तो दीघा रेल सह सड़क पुल के लिए एप्रोच पथ के निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण हो रही देरी के लिए स्वयं पीएम को राज्य के मुख्य सचिव से बात करनी पड़ रही है। पुल बनकर तैयार है लेकिन एप्रोच पथ नहीं बन पाने के कारण चालू नहीं हो पा रहा है। जब सुशासन बाबू की सरकार सड़क के लिए ही जमीन नहीं जुटा पा रही है तो फिर बिना उचित भूमि अधिग्रहण बिल के उद्योग के लिए कहाँ से हजारों-लाखों एकड़ जमीन लाएगी।
मित्रों,चाहे पक्ष हो या विपक्ष सबके लिए इंडिया फर्स्ट मूल मंत्र होना चाहिए लेकिन ऐसा परिलक्षित हो रहा है कि विपक्ष के लिए इंडिया प्राथमिकता सूची में कहीं है ही नहीं। उसको तो बस मोदी को नीचा दिखाना है,पराजित होते देखना है भले ही इससे देश को कितनी ही क्षति क्यों न उठानी पड़े। मगर ऐसा करते हुए विपक्ष को यह जरूर सोंचना चाहिए कि आज के युग में पब्लिक को बरगलाना आसान नहीं रह गया है। आज की जनता सब जानती है,सब समझती है,सब देखती है। आगे बिहार में विधानसभा चुनाव होना है और बिहार की जनता अपनी देशभक्ति और राजनैतिक-विवेक के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है। बिहार की जनता को यह पता है कि मोदी सरकार को अगर राज्यसभा में बहुमत दिलवाना है तो उनको राज्य में ज्यादा-से-ज्यादा सींटें जीतकर भाजपा को देनी होगी। ऐसे में कहीं ऐसा न हो कि निकट-भविष्य में आनेवाले विधानसभा चुनावों में हारते-हारते विपक्ष का राज्यसभा से भी सूपड़ा साफ हो जाए। आखिर नकारात्मक और घोर स्वहितकारी राजनीति का यही परिणाम होता है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 21 मार्च 2015

बिहार की पूरी तस्वीर क्या है नीतीश जी?

मित्रों,बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गजब के वाकपटु हैं और शोमैन भी। पूरे बिहार में इस समय मैट्रिक की परीक्षा में इस कदर जमकर कदाचार हो रहा है कि इसे परीक्षा कहना इस शब्द का ही अपमान होगा। बल्कि यह तो स्वेच्छा है और इसमें कदाचारियों की मदद कर रहे हैं पुलिस,शिक्षक आदि अर्थात् पूरे सरकारी तंत्र ने परीक्षा को कमाई का साधन बना लिया है। वैसे तो यह हर साल का भ्रष्टोत्सव है लेकिन इस बार मीडिया ज्यादा जागरूक है वरना कदाचार के खिलाफ तो हमने अपने अखबार में पिछले साल भी मैट्रिक और इंटर की परीक्षा में जमकर लिखा था।
मित्रों,नीतीश जी अपने महान असत्यवादी़-पाखंडवादी श्रीमुख से फरमाते हैं कि इस परीक्षा के दौरान मीडिया बिहार की अधूरी तस्वीर पेश कर रही है तो क्या नीतीशजी बताएंगे कि फिर बिहार की पूरी तस्वीर क्या है? मीडिया द्वारा जहाँ पूरे राज्य के लगभग प्रत्येक जिले और प्रत्येक केंद्र पर कदाचार की खबरें दी गई थीं वहीं उनको पूरे बिहार में सिर्फ चार केंद्रों पर ही कदाचार नजर आया। रद्द तो पूरी परीक्षा होना चाहिए थी लेकिन उनको तो सिर्फ वही दिखता है जो वह देखना चाहते हैं। जाने भी दीजिए वे बेचारे तो सावन के अंधे हैं इसलिए उनको सिर्फ हरियाली ही नजर आती है। हम बताते हैं बिहार की पूरी तस्वीर क्योंकि नीतीश बाबू के कुशासन से रोजाना पाला तो हमारा पड़ता है। नीतीश बाबू का क्या उनको तो सिर्फ पैसा चाहिए फिर वो किसी भी तरह से आए।
मित्रों,बिहार की मुकम्मल तस्वीर तो यह है कि पूरे बिहार में कहीं भी सरकार नाम की चीज ही नहीं है। आप कहेंगे कैसे? तो हम एक उदाहरण द्वारा आपको बताते हैं। अभी कुछ दिन पहले हमने यह खबर लगाई थी कि बिहार की पुलिस कानून के अनुसार नहीं बल्कि अपनी मनमर्जी के अनुसार काम करती है। खैर तब हमने बताया था कि हाजीपुर के सदर थाना में जब हम ठगी की एफआईआर करने गए तब क्या हुआ। अब आगे सुनिये कि उसके बाद क्या हुआ। उसके बाद थाना ने एफआईआर दर्ज करने में 5 दिन लगा दिया। हमने थानेदार को कई-कई बार फोन किया,एसपी को फोन किया लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया। सवाल उठता है कि सरकार ने इनको सरकारी फोन क्यों दिया है जबकि इनको बिना पैसे लिए कोई काम करना ही नहीं है।
मित्रों,हद तो हो गई कल जब पीड़ित सुरेश बाबू एफआईआर लेने थाना पहुँचे तो थाने के मुंशी ने उनसे एफआईआर की कॉपी देने के लिए 500 रु. के रिश्वत की मांग कर दी। मैंने उनसे कहा मुंशी से बात करवाईए तो मुंशी फोन पर नहीं आया और गालियाँ बकने लगा। फिर मैंने थानेदार को फोन लगाया तो उसने कहा कि वो थाने पर नहीं है लॉ एंड ऑर्डर संभाल रहा है। सुनकर हँसी आई कि जब बिहार में लॉ को संभालनेवाले खुद ही ऑर्डर में नहीं हैं तो वे लॉ एंड ऑर्डर क्या संभालेंगे। फिर हमने एसपी वैशाली को फोन किया तो उन्होंने कहा कि आप लिखित निवेदन दे दीजिए हम जाँच करवा लेंगे और फोन काट दिया। अब आप ही बताईए कि जब एफआईआर की कॉपी लेनी है तो इसमें जाँच क्या होगी और जाँच से निकलकर क्या आएगा? क्या एसपी दूध के धुले हैं जो दूध का दूध और पानी का पानी कर देंगे।
मित्रों,हमने तिरहुत रेंज के आईजी को फोन किया तो पहले तो मैसेज आया कि हम अभी मीटिंग में हैं और बाद में फोन करने पर कहा गया कि रांग नंबर है और फोन काट दिया गया। फिर हम और ऊपर चढ़े और डीजीपी को फोन किया। फोन डीजीपी ने नहीं उनके रीडर ने उठाया और कहा कि शाम में फोन करिए और वो भी लैंड लाईन पर। इसके बाद और ऊपर चढ़ने की हमारी हिम्मत ही नहीं रही क्योंकि हम समझ चुके थे कि जिस राज्य में तबादले ने उद्योग का रूप ले रखा हो वहाँ और ऊपर जाने से कोई फायदा नहीं है। फिर माननीय मुख्यमंत्री को तो सबकुछ ठीकठाक नजर आ ही रहा है। ऊपर से उन्होंने मीडिया को अपना मोबाईल नंबर भी नहीं दिया है तो उनका लैंडलाईन फोन तो अधिकारी उठाएंगे। पहले यह पूछकर तोलेंगे कि कितना बड़ा आदमी बोल रहा है तब मुख्यमंत्री को फोन देंगे और हम तो ठहरे छोटे पत्रकार तो हमारी तो उनसे किसी भी कीमत पर बात ही नहीं होने दी जाएगी या फिर नीतीश जी हमने बात करेंगे ही नहीं।
मित्रों,तो यह है हमारे बिहार की मुकम्मल तस्वीर। एफआईआर के आवेदन के समय मुंशी ने खुद ही हमसे कहा था कि प्रार्थी का फोन नंबर भी डाल दीजिएगा। तो फिर कायदे से उनको एफआईआर हो जाने के बाद खुद ही फोन करके प्रार्थी को बुलाना चाहिए था और एफआईआर की कॉपी दे देनी चाहिए थी। लेकिन उनको कानून-कायदे से क्या मतलब? उनको तो बस पैसे से मतलब है। कदाचित घूस लेना ही उनकी ड्यूटी है।
मित्रों,आज जब हमने अभी सदर थाने के थानेदार को फोन लगाया तो उसने मेरा नाम सुनते ही फोन काट दिया। अब आप ही बताईए कि अंग्रेजों की पुलिस और सुशासन की पुलिस में क्या अंतर है? तब भी दरोगा (दारोगा) को रोकर या गाकर घूस देनी ही पड़ती थी और आज भी देनी ही पड़ती है। तब तो बड़े अफसर तुरंत कदम उठाते थे। आज कोई कदम नहीं उठाते।
मित्रों,अंत में मैं क्षमा चाहूँगा कि मैं आपको बिहार के वर्तमान शासन-प्रशासन की सिर्फ एक बानगी ही दिखा पाया क्योंकि पूरी कथा लिखूंगा तो परती परिकथा से भी मोटी किताब लिख जाएगी। बाँकी सुशासन की कुछ पोल तो पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी भी खोल ही रहे हैं कि कैसे बिहार में लागत से कई गुना ज्यादा का एस्टीमेट बनता है और कैसे उसका कुछ हिस्सा मुख्यमंत्री को भी दिया जाता है। संक्षेप में बस यही समझ लीजिए कि नीतीश बाबू के शासन और दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक (1351-1388) के शासन में कोई अंतर नहीं है। हुआ यूँ था कि फिरोजशाह तुगलक के पास एक सैनिक गया यह शिकायत लेकर कि उससे वेतन के ऐवज में रिश्वत मांगी जा रही है तो फिरोजशाह तुगलक ने उसको अपने पास से पैसे देकर कहा कि तो दे दो क्योंकि मैं भी देता हूँ। यहाँ तो नीतीश जी 500 रु. भी देने से रहे क्योंकि नेता लोग तो सिर्फ लेना जानते हैं। मैं सुशासन बाबू को खुली चुनौती देता हूँ कि अगर वे सचमुच इस राज्य के शासन-प्रशासन के मुखिया हैं तो मेरे संबंधी सुरेश बाबू जो विकलांग भी हैं को बिना पैसे दिए एफआईआर की कॉपी दिलवा दें। थाने से उनको फोन करवाएँ और बुलाकर बाईज्जत उनको एफआईआर की कॉपी दिलवाएँ। अन्यथा खुलेआम कह दें कि यह काम मेरे बस का नहीं है क्योंकि यह मेरा काम नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक समस्या है ठीक उसी तरह जैसे परसों उनके शिक्षा मंत्री ने नकल को लेकर कहा था।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 16 मार्च 2015

इकलौते वारिस से लावारिस तक

मित्रों,जब मैंने होश संभाला तो खुद को बड़ी दीदी सुनीता जो अब बक्सर के छतनवार गांव के जनार्दन सिंह की पत्नी और बंटी और छोटू की माँ है की गोद में पाया। वह मारती भी थी तो दुलारती भी थी। फिर मेरी नानी धन्ना कुंवर की तो जैसे जान ही मुझमें बसती थी। मेरे मामा नहीं थे और चचेरे मामा मेरी नानी को काफी मारते-पीटते थे इसलिए मेरा पूरा परिवार मेरे जन्म के पाँच साल पहले से ही मेरे ननिहाल जो महनार रोड रेलवे स्टेशन के नजदीक जगन्नाथपुर गांव में था में रहता था। खुद मेरा जन्म भी ननिहाल में ही हुआ। मैं पूरे गांव का लाडला था और बला का शरारती। मैंने बचपन में सांड की सवारी भी गांठी है तो आम-अमरूद चुराकर भी खाया है। कई बार तो पेड़ के मालिक की आँखों के आगे भी। मुझे याद है कि 1991 में जब मेरी तबियत काफी खराब हो गई थी तो लगभग पूरा जगन्नाथपुर और छिटपुट रूप से चमरहरा तक के सैंकड़ों लोग कई दिनों तक पीएमसीएच से हिले तक नहीं थे। जगन्नाथपुर के प्रत्येक परिवार ने मेरी जान के ऐवज में काली माता को बकरा चढ़ाने की मन्नत मान दी थी। यद्यपि पूरी तरह से शाकाहारी होने के कारण मैंने आज तक एक भी बकरे की बलि नहीं दी है।
मित्रों,अपने पूरे स्कूली जीवन में मैंने कभी बाहर का चाट-पकौड़ा नहीं खाया। जब भी बड़ी दीदी पैसे देती मैं शाम में उनको ही लौटाकर दे देता। जब मैं मैट्रिक में था तभी मैंने साइकिल चलाना सीखा। फिर तो घर का सारा काम मेरे ही जिम्मे आ गया। मुझे याद है कि चाहे 1989 में हुआ मेरी बड़ी दीदी का दुरागमन हो या फिर नानी का श्राद्ध मैंने दो-दो हफ्तों तक एक पांव पर खड़े रहकर सारा भार उठाया। इसी बीच सन 93 में मैंने पॉलिटेक्निक की प्रतियोगिता परीक्षा पास की और मेरा नामांकन दरभंगा पॉलिटेक्निक में सिविल इंजीनियरिंग में हुआ। इसी बीच पूर्णिया पॉलिटेक्निक में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में सीट खाली हुई। उस समय बिहार में सिविल इंजीनियरों को नौकरी नहीं मिलती थी इसलिए पिताजी ने मेरा स्थानान्तरण पूर्णिया पॉलिटेक्निक में करवा दिया। तब तक मेरी छोटी दीदी की उम्र काफी हो चुकी थी। उस समय उनकी उम्र की कोई भी लड़की मेरे गांव या ननिहाल में क्वांरी नहीं थी। तब तक 1991 में नानी का देहांत हो चुका था और हमलोग महनार बाजार में किराये के मकान में रहने लगे थे। हमलोग की आर्थिक स्थिति पिताजी विष्णुपद सिंह जी के राम प्रसाद सिंह महाविद्यालय,चकेयाज में रीडर होने के बावजूद इतनी खराब थी कि उनको हर महीने खर्चा चलाने के लिए कभी कॉलेज में अपने जूनियरों से कभी लाईब्रेरियन चाचा से कर्ज लेना पड़ता था और उनके घर जाकर पैसे लाने की शर्मिंदगी भी मुझे ही उठानी पड़ती। इसी बीच मेरे ननिहाल में मेरी हमउम्र एक लड़की की शादी के दौरान मेरे चचेरे मामा सत्येन्द्र सिंह द्वारा एक ऐसी टिप्पणी कर दी गई जो मेरे दिल-दिमाग को चीर गई। उन्होंने कहा कि बहन तुम ही अपने घर बिठा लोगे क्या,शादी क्यों नहीं करते? गुस्सा तो बहुत आया लेकिन खून के घूंट पीकर रह गया।
मित्रों,तब मेरे छोटे नाना के बेटों ने नानी के खेतों पर जबरन कब्जा कर लिया था और खेत की फसल भी नहीं देते थे। नानी मरने से पहले जमीन माँ के नाम पर कर गई थी। जमीन में से कुछ जगन्नाथपुर में था तो कुछ कटिहार में। मेरे नाना रामगुलाम सिंह जिनकी मौत मेरे जन्म से पहले ही हो चुकी थी अपने गांव के सबसे दबंग और समृद्ध किसान थे। मैं भीतर-ही-भीतर गुस्से से जल रहा था। फिर मैंने कटिहार वाली जमीन पर आना-जाना शुरू किया। न खाने का ठौर रहता और न रहने का। कभी भी खा लेता,कहीं भी सो लेता। फुलवड़िया जहां कि नानी का कामत था के ही एक दुसाध लड़के से मेरी दाँतकटी दोस्ती हो गई। मेरा मित्र राजकुमार मुझे अपने सगों से भी ज्यादा मानता था। उसकी,उसके मामा,बंदा,विष्णु और लालबाबू,जगन्नाथपुर के ही कमतिया सीतेश मामा,उपेंद्र मामा और रामजी मामा की सहायता से दो साल के अथक परिश्रम के बाद मैंने जमीन पर कब्जा कर लिया। इस दौरान मुझे गांव की गंदी राजनीति में भी उतरना पड़ा।
मित्रों,तब तक पिताजी गुड्डी दीदी जो मुझसे पाँच साल बड़ी थी के लिए वर की तलाश करने में जुट गए थे। उधर जगन्नाथपुर की जमीन पर माँ द्वारा दायर टाईटल सूट खुल गया था और जमकर पैसे खा रहा था। कई बार के प्रयास के बाद मैंने तीन बीघा जमीन के लिए ग्राहक को खोजा और माँ को रजिस्ट्री के लिए बुलाया। इस तरह किसी तरह से दीदी की शादी हो गई। दीदी की पुछरिया में मिठाई भेजने के लिए हमलोगों के पास पैसे नहीं थे उस पर हमलोगों पर लाखों का कर्ज हो गया था। मैं वर पक्ष द्वारा शादी में लाए गए मिठाई के टोकरों को ही पुछरिया में लेकर गया था। इस बीच मैं यह भी भूल गया कि मैं पॉलिटेक्निक में भी पढ़ता हूँ। उस पर पप्पू यादव के समर्थक छात्रों के साथ जिनका पॉलिटेक्निक पर कब्जा था हमारा टंटा हो गया। शादी के बाद हमारी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि मुझे पढ़ाई छोड़कर घर बैठना पड़ा और मैं इंजीनियर बनते-बनते रह गया। संतोष इस बात का था कि दीदी की शादी एक सरकारी अफसर के साथ हुई थी। जीजाजी राकेश कुमार जी इस समय भारत सरकार के MSOPI मंत्रालय में क्लान वन अधिकारी हैं और दिल्ली के सरोजनीनगर में रहते हैं।
मित्रों,फिर मैंने घर पर रहकर ही इतिहास विषय लेकर स्नातक किया और आईएएस की तैयारी के लिए दिल्ली चला गया। मगर ईश्वर की मर्जी के आगे किसकी चलती है। वर्ष 2003 में आईएएस की मुख्य परीक्षा देते समय ही मुझे डेंगू हो गया और मैं आईएएस बनते-बनते रह गया। फिर मैंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के नोएडा कैंपस से एमजे किया। इस दौरान अपने सहपाठी मित्रों के प्यार की बदौलत अपनी कक्षा का प्रतिनिधि भी रहा और इस दौरान विश्वविद्यालय की हालत में कई सुधार भी करवाये। धीरे-धीरे मेरी ताकत इतनी ज्यादा हो गई थी कि विभागाध्यक्ष अरूण भगत कहते कि मैंने नहीं सोंचा था कि आप इतने शक्तिशाली हो जाएंगे कि कैंपस को आपके इशारों पर चलना और चलाना पड़ेगा। मैं और मेरे मित्र ही तब यह फैसला करते कि किसको किस अखबार या चैनल में नौकरी करने के लिए भेजा जाएगा।
मित्रों,इसी दौरान मैं दैनिक जागरण,नोएडा में इंटर्न करने लगा और इस बात की पूरी संभावना थी कि वहीं मेरी नौकरी भी लग जाती। तब तक मेरी छोटी बहन जो मुझसे ढाई साल छोटी थी की उम्र 30 को पार करने लगी थी और मेरे माँ-पिताजी उसकी शादी को लेकर काफी चिंतित थे। इसी बीच एक दिन मेरी माँ ने मुझे फोन कर कहा कि बहन की शादी नहीं करोगे क्या? पिताजी से तो अब दौड़-धूप होती नहीं। मेरे पिताजी वर्ष 2003 में ही कॉलेज की नौकरी से सेवानिवृत हो चुके थे। माँ का फोन जाते ही मैं अपार संभावनाओं के शहर दिल्ली को छोड़कर हाजीपुर आ गया और नाम के लिए पटना,हिंदुस्तान में तीन हजार की नौकरी कर ली। फिर कई स्थानों पर वरतुहारी की मगर अंत में शादी पक्की हुई बिहार के ही मधेपुरा निवासी और उस समय आईबीएन7 में प्रोड्यूशर की नौकरी कर रहे नीरज कुमार सिंह से। उस समय नीरज को 18 हजार रुपये वेतन के रूप में मिलते थे। उसने गाजियाबाद के इंदिरापुरम में एक फ्लैट भी खरीद रखा था। वरतुहारी के सिलसिले कई बार तो मुझे लगातार दो-दो रातों तक जगकर सफर करना पड़ा।
मित्रों,शादी में हमने दिल खोलकर खर्च किया फिर भी शादी के तत्काल बाद से ही मेरी छोटी बहन हमसे पैसे मांगने लगी। नीरज ने न जाने क्यों चुल्हा,टीवी वगैरह को गांव भेज दिया। हमने मोह में आकर पैसे दे दिए। मगर जब यह सिलसिला बन गया और हर महीने की बात हो गई तब मैंने विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि हम खुद ही पिछले 20 सालों से बेघर थे। फिर मेरी शादी हुई और शादी के दौरान किसी ने मेरी ससुराल में नीरज के साथ अभद्र मजाक कर दिया। जब मैं अपनी पत्नी को विदा करवा कर अपने घर पहुँचा तो देखा कि मेरी छोटी बहन रूबी मशीन गन की गोलियों की तरह अपनी भाभी को गालियाँ दिए जा रही थी और मेरी माँ उसे रोक भी नहीं रही थी। जब सारे संबंधी अपने-अपने घर चले गए तब मेरी माँ का रवैया भी धीरे-धीरे बदलने लगा। मेरी बहनों और भांजे-भांजियों के बहकावे का असर यह हुआ कि मेरी माँ अपनी बहू को देखना ही नहीं चाहती थी।
मित्रों,इसी बीच मेरी पत्नी सात महीने का गर्भ लेकर अपने मायके चली गई जहाँ कि 23 मार्च,2012 को मेरे बेटे ने जन्म लिया। चूँकि 23 मार्च भगत सिंह का शहीद दिवस था इसलिए हमने उसका नाम भगत सिंह ही रख दिया। बाद में जब-जब मैं मेरी पत्नी को अपने पास लाता मेरी माँ और मेरी भांजी ब्यूटी जिसकी शादी गमहर के सुनील से हुई है और जिसको मैंने बचपन में अपार स्नेह दिया था उसको इतना तंग करती कि मैं उकता कर उसको मायके रख आता। इस बार जब 6 दिसंबर,2014 को वो मेरे पास रहने आई तो माँ ने मेरे घर को रणक्षेत्र में बदल कर रख दिया। वो हमलोगों पर 1 रुपया भी खर्च करना नहीं चाहती थी और सबकुछ अपनी बेटियों और उनके बाल-बच्चों को दे देना चाहती थी। जब उसने देखा कि मेरी पत्नी इस बार मायके नहीं जा रही तो उसने अलग डेरा ले लिया और हमें अपने हाल पर छोड़कर पिताजी के साथ चली गई। मेरी बड़ी दीदी की प्रतिक्रिया थी कि सबकुछ उसका है वो चाहे तो लुटा-पुटा दे,मेरी मंझली बहन ने मेरी पत्नी से कहा कि तुमको उसके सारे सितम को हँसकर सह लेने चाहिए थे जबकि उसने खुद अपनी उस सास की कभी सेवा नहीं की जो दरअसल उसके पति की चाची थी और अपने तीन-तीन बेरोजगार दामादों को दरकिनार करके उसके पति को अपने पति की मौत के बाद अनुकंपा की नौकरी दे दी थी और छोटी बहन रूबी या छोटे बहनोई नीरज जो इस समय आज तक में 61 हजार रुपये का वेतन प्राप्त कर रहा है का तो कहना ही क्या उनका तो वश चले तो मेरे माता-पिता से सारी जमीन-जायदाद भी लिखवा लें।
मित्रों,आज मेरे पास मेरे बच्चे को पढ़ाने तो क्या खिलाने तक के पैसे नहीं हैं। मैं पूरी तरह से बर्बाद होकर जब जिंदगी के पिछले पन्नों पर नजर डालता हूँ तो सोंचता हूँ कि मुझसे गलती कहाँ हुई? क्या अपने परिवार के मान और सुख के लिए दो-दो बार त्याग करके मैंने गलती की? क्या मेरा भगवान शिव वाला जीवन-दर्शन गलत था कि स्वयं विष पीकर जगत को अमरत्त्व दो? क्या मैंने पिछले चार सालों से अपने माता-पिता को अपने हाथों खाना बनाकर,खिलाकर और 24 घंटे सेवा करके गलती की? पता नहीं मुझसे कहाँ गलती हुई जिसकी सजा मुझको मिली? कभी माखनलाल के नोएडा परिसर में पढ़ाई के दौरान वहाँ के क्लर्क देवदत्त शर्मा ने मुझे कहा था कि आप बड़े सीधे हैं कदम-कदम पर छले जाएंगे मगर क्या किसी इकलौते बेटे के साथ कोई माँ-बाप छल करता है क्या? क्या कोई अपने कथित इकलौते वारिस को लावारिस बनाकर भाग जाता है क्या? जबतक तंगी थी तब तक तो साथ रखा और अब जब 50 हजार का पेंशन मिलने लगा तब छोड़ दिया? माँ,मम्मी और मम्मी जी कहनेवाले दामाद क्या मिल गए माई कहनेवाले और शिव-पार्वती भाव से सेवा करनेवाले को लात मार दिया? यह सही है कि मेरे अंदर अब भी इतना जीवट है कि मैं अपनी जिंदगी को फिर से सजा-संवार लूंगा लेकिन सबकी खुशी में अपनी खुशी समझते-समझते संघर्ष के सबसे जरुरतमंद क्षणों में खुद ही तन्हा रह जाने का दंश तो अब जीवनभर मेरे मन को डँसता रहेगा।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

कानून नहीं थानेदारों की मर्जी से चलते हैं बिहार के थाने

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बिहार की महान पुलिस की महानता का वर्णन कदाचित शेष भी अपने हजारों मुखों से भी नहीं कर सकते। शायद बिहार पुलिस की इसी महानता का माहात्म्य है कि कोई भी व्यक्ति किसी आपराधिक घटना के बाद पुलिस के पास जाने की हिम्मत ही नहीं करता है। फिर जब बात वैशाली पुलिस की हो तब तो कहना ही क्या! इनकी कर्महीनता को कह सकना तो कदाचित नहीं बल्कि निश्चित रूप से हजारों शेष भगवानों के वश में भी नहीं है।
मित्रों,हुआ यूँ कि मेरे दोस्त रंजन के ससुर जी सुरेश प्रसाद सिंह,वल्द श्री रामदेव सिंह,सा. गुरमिया,पो. थाथन बुजुर्ग,थाना सदर हाजीपुर ने 10 मार्च,2015 को दोपहर के 1 बजकर 12 मिनट पर सदर थाना हाजीपुर स्थित एक्सिस बैंक के एटीएम से महज 1000 रु. निकाले। चूँकि उनको पैसा निकालना नहीं आता था इसलिए एक अनजान युवक द्वारा मदद की पेशकश करने पर वे मदद लेने से मना नहीं कर सके। पैसा निकालने के दौरान युवक ने लिंक फेल हो जाने का बहाना किया। फिर अपना एटीएम डालकर पैसा निकालने का नाटक किया और पैसे निकाल कर चला गया। थोड़ी देर बाद जब श्री सिंह ने 1000 रु. निकाला तो उनके तो होश ही उड़ गए क्योंकि जमा राशि में से 16000 रु. निकल चुके थे।
मित्रों,कल होते ही श्री सिंह जो लगभग 60 साल के हैं स्टेट बैंक जहाँ उनका उक्त खाता था पहुँचे और पासबुक अपडेट करवाया तब पता चला कि उनको चकमा देकर उस नितांत परोपकारी युवक ने चार बार में 16000 रु. निकाल लिए थे। बेचारे ने अपने दामाद को फोन किया और दामाद ने हमको। हमने कहा कि कल यानि दिनांक 12 मार्च को भेज देना। फिर उनको लेकर सदर थाने में पहुँचा जहाँ मेरा काफी ठंडा स्वागत करते हुए एक आवेदन लिखने को कहा गया। फिर आवेदन में कई गलतियाँ निकाली गईं। फिर से आवेदन लिखकर कमियों को दूर कर देने के बाद थाने के महान मुंशी ने मुझसे फिर से आवेदन लिखवाया और उसके बाद एक बार फिर से। उसके बाद कहा गया कि इंस्पेक्टर साहब से अनुमति ले लीजिए।
मित्रों,पता नहीं कि कानून इस बारे में क्या कहता है? क्या एफआईआर दर्ज करने के लिए इंस्पेक्टर की ईजाजत जरूरी होती है या नहीं? फिर भी मैं इंस्पेक्टर साहब के पास पहुँचा और अपना परिचय देते हुए वाकये से उनको अवगत करवाया। इंस्पेक्टर साहब ने मुंशी को बुलाया और एफआईआर दर्ज कर लेने का आदेश दिया। उसके बाद जब मैं मुंशीजी के पास बैठा हुआ था तभी एक पुलिस अधिकारी ने मुझे एफआईआर दर्ज नहीं करवाने की अनमोल सलाह दी क्योंकि उनके मतानुसार पैसा ऊपर होगा ही नहीं। तब मैंने उनसे कहा कि आपलोग एफआईआर दर्ज करने से मना कैसे कर सकते हैं जबकि पीड़ित ऐसा करना चाहता है। फिर मैं मुंशी जी को कल आने की बात कहकर अपने अखबार के दफ्तर में आ गया। आज जब थाने में गया तो बताया गया कि बड़ाबाबू छापा मारने में इतना व्यस्त हैं कि उनसे मामले के बारे में बात ही नहीं हो पाई और इसलिए एफआईआर दर्ज नहीं हो पाया है।
मित्रों,तो यह है सुशासन बाबू के सुशासन में हाजीपुर की पुलिस का रवैया। अब पता नहीं कब तक एफआईआर दर्ज किया जाएगा या फिर दर्ज किया जाएगा भी कि नहीं। अब आप ही बताईए कि जब एक पत्रकार के साथ पुलिस का व्यवहार ऐसा है तो वो आम आदमी के साथ कैसा व्यवहार करती होगी?
मित्रों,सुशासन बाबू से तो कुछ कहना ही बेकार है क्योंकि पिछले दस सालों में हमारे और उनके बीच काफी कहासुनी हो चुकी है लेकिन थानों और पुलिस के हालात में रंचमात्र भी कोई बदलाव नहीं आया है अलबत्ता रिश्वत की दरों में भारी ईजाफा जरूर हो चुका है। इसलिए इस बार मैं सीधे-सीधे भारत के यशस्वी और तेजस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से निवेदन करुंगा कि हुजूर कुछ करिए और कुछ ऐसा करिए और जल्दी में करिए कि अगले छह महीने-साल भर में पूरे भारत की जनता को एफआईआर दर्ज करवाने के लिए थानों में जाना ही न पड़े यानि वो घर बैठे ऑनलाईन एफआईआर दर्ज करवा सके। तभी जाकर अपने आपको सरकारी दामाद समझनेवाले पुलिसवालों पर लोकसेवक शब्द फबेगा।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 12 मार्च 2015

हद कर दी 'आप' ने

मित्रों,पिछले एक महीने का समय दिल्ली वालों के लिए एक के बाद एक हद से गुजरने का रहा है। पहले तो उन्होंने सारी हदों को पार करते हुए एक ऐसी पार्टी को विधानसभा की लगभग सारी-की-सारी सीटें दे दीं जिसका काम काम करना नहीं बल्कि रायता फैलाना भर है। फिर उसके बाद से हद करने की बारी रही है उस पार्टी की जिसके दिल्ली में जीतने के बाद मीडिया के छद्मधर्मनिरपेक्ष हिस्से के कदम जमीन पर पड़ ही नहीं रहे थे। कोई इसे मोदी के लिए झटका बता रहा था तो कोई मोदी के अंत की शुरूआत।
मित्रों,मगर यह क्या हुआ कि आज जीत के एक महीने के भीतर ही वह पार्टी पार्टी नहीं फाइटिंग क्लब बन गई है। लगातार उसके कर्णधार एक-दूसरे पर आरोपों की बरसात किए जा रहे हैं। सिनेमा हॉल वाले परेशान हैं कि शो खाली क्यों जा रहे हैं। जाए भी क्यों नहीं जब मुफ्त में जबर्दस्त कॉमेडी,सस्पेन्स,थ्रिलर,रिवेन्ज,एक्शन टेलीवीजन और अन्य समाचार माध्यमों पर चौबीसों घंटे उपलब्ध है तो कोई क्यों जाए सिनेमा देखकर व्यर्थ में पैसा बर्बाद करने? मेरी सिनेमा हॉलवालों को मुफ्त में सलाह है कि वे केंद्र सरकार से मांग करें कि आप पार्टी पर मनोरंजन कर लगाया जाए। अगर उनकी मांगें नहीं मानी गई तो निकट-भविष्य में हो सकता है कि बॉलीवुड का नामोनिशान ही नहीं रहे।
मित्रों,आज अगर आप पार्टी की स्थिति को देखते हुए कोई अपनी मूर्खता पर रो रहा होगा तो वो होगी दिल्ली की जनता। उनसे किए गए 70 वादों पर तो अब आप पार्टी के लोग बात भी नहीं कर रहे,वादों को पूरा क्या खाक करेंगे। हाँ एक बात को लेकर दिल्ली की जनता जरूर संतोष कर सकती है कि सरकार बनाने के तुरंत बाद से ही आप पार्टी के नेतागण उनका भरपुर मनोरंजन कर रहे हैं। जहाँ तक मोदी जी के पूर्णकालिक व स्थायी विरोधी मीडिया के मित्रों का सवाल है तो वे लोग इस समय खेती-किसानी,फिल्मों और क्रिकेट से संबंधित कार्यक्रमों का चौबीसों घंटे प्रसारण कर सकते हैं,समाचार तो दिखा नहीं सकते क्योंकि फिर तो उनको अपने महानायक के दोगलेपन को भी दिखाना होगा।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 8 मार्च 2015

सावधान,नरेंद्र मोदी जी,कश्मीर कहीं आपको बर्बाद न कर दे?

मित्रों,इतिहास गवाह है कि भारत के महानतक शासकों में से एक अकबर ने दीने ईलाही धर्म चलाया था। ब्रिटिश इतिहासकार लेनपुल ने इसे अकबर की मूर्खता का स्मारक बताया है। वजह यह थी कि इस धर्म के चलते अकबर ने एक साथ हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों का समर्थन खो दिया। मुसलमानों ने उसे मुसलमान मानना बंद कर दिया और हिंदुओं में यह भय व्याप्त हो गया कि अकबर इसके बहाने उनका धर्म छीनना चाहता है।
मित्रों, कुछ इसी तरह की मूर्खता इन दिनों भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी राजनैतिक पार्टी भाजपा कर रही है। भाजपा और मोदी ने कश्मीर में अलगाववादियों की समर्थक और भारत और भारतीय सेना की सबसे बड़ी दुश्मन पीडीपी के साथ सरकार बनाई है। इस सरकार ने अस्तित्व में आते ही सबसे पहला कदम यह उठाया है कि उसने भारतीय सेना पर पत्थरबाजी करने में सबसे आगे रहनेवाले मशरफ आलम को जेल से रिहा कर दिया है। इससे पहले शपथ-ग्रहण के समय ही मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कश्मीर में शांति का मुख्य श्रेय़ पाकिस्तान और अलगाववादियों को दिया था।
मित्रों,भाजपा अभी भी कह रही है कि कश्मीर में सरकार न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत चलाई जाएगी तो क्या यही है कश्मीर में भाजपा-पीडीपी की संयुक्त सरकार का न्यूनतम साझा कार्यक्रम?? अगर ऐसा है तो फिर भाजपा को कोई अधिकार नहीं है श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपना कहने का या फिर उनका नाम भी लेने का? अगर यही भाजपा का राष्ट्रवाद है तो फिर निश्चित रूप से यह भारत की उस बहुसंख्यक जनता के साथ धोखा है जिसने पिछले साल के लोकसभा चुनावों में उसे मत दिया था।
मित्रों,नरेंद्र मोदी और भाजपा को हरगिज यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर हिन्दुओं का उसके प्रति मोहभंग हो गया तो उनकी हैसियत दो कौड़ी की भी नहीं रह जाएगी। रही बात मुसलमानों की तो मैं यह स्टांप पेपर पर लिखकर देने को तैयार हूँ कि उनका मत भाजपा को कभी नहीं मिलेगा। नरेंद्र मोदीजी और अमित शाह जी यह अकबर का जमाना नहीं है कि बिना जनता के विश्वास के भी कोई 50 सालों तक भारत पर शासन करेगा। आज के हिंदुस्तान में 5 साल के शासन को 10 में बदलना ही किसी भी व्यक्ति या दल के लिए टेढ़ी खीर होती है। ऐसा न हो कि साल 2019 आते-आते आपके ऊपर से भी माँ भारती की अनन्य भक्त भारत की बहुसंख्यक राष्ट्रवादी जनता का विश्वास समाप्त हो जाए।
मित्रों, चूँकि ऐसा होना भारत के विकास के लिए काफी अहितकारी सिद्ध होगा इसलिए मेरा नरेंद्र मोदी और अमित शाह से यह करबद्ध प्रार्थना है कि आपलोग कश्मीर के सनकी नेता मुफ्ती की सही रास्ते पर आने का स्पष्ट निर्देश दें और अगर फिर भी वो रास्ते पर नहीं आता है तो उसे बर्खास्त कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाएँ क्योंकि मैं नहीं चाहता कि नरेंद्र मोदी से भारत की जनता इतनी जल्दी नाराज हो जाए और फिर से देश देशद्रोहियों के हाथों में चला जाए। अंत में मैं मोदी जी और शाह जी को मैं भारतीय इतिहास के एक और दृष्टांत की याद दिलाना चाहूंगा। 5 जनवरी,1544 को शेरशाह सूरी और मारवाड़ के शासक मालदेव के बीच जेतारण का युद्ध लड़ा गया था जिसमें तत्कालीन भारत का बादशाह शेरशाह सूरी हारते-हारते बचा था और तब उसने कहा था कि एक मुट्ठी भर बाजरे की कीमत पर मैँ हिन्दुस्तान की सियासत खो बैठता। कहीं आपलोगों का भी वही हाल नहीं हो।
मित्रों,इससे पहले 7 अक्तूबर,2013,दिन सोमवार को मैंने ब्रज की दुनिया पर ब्लॉग लिखकर उस समय नरेंद्र मोदी जी को चेतावनी दी थी कि सावधान मोदीजी यू टर्न लेना मना है जब वे प्रधानमंत्री नहीं थे बल्कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भर थे। लेकिन नरेंद्र मोदी क्यों सुनने लगे हमारी? आखिर मैं एक आर्थिक रूप से निहायत निर्बल,असफल छोटा-सा,सीधा-सादा,देशभक्त पत्रकार जो ठहरा।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

अन्ना हजारे देशभक्त हैं या देशद्रोही?

मित्रों,एक बार फिर से कथित गांधीवादी अन्ना हजारे जंतर मंतर पर धरना पर बैठे हुए हैं। उनका साथ महान धरनावादी नेता अरविंद केजरीवाल भी देने जा रहे हैं। कहने को तो अन्ना हजारे भूमि अधिग्रहण बिल के विरोध में धरना कर रहे हैं लेकिन वास्तव में धरने के पीछे की सच्चाई क्या है यह कोई नहीं जानता। क्या अन्ना निःस्वार्थ व्यक्ति हैं या धरना करना उनका पेशा है अर्थात् अन्ना पैसे लेकर धरना देते हैं? जिस तरह से अन्ना द्वारा पिछले सालों में किए गए अनशनों में जमा पैसों को ठिकाने लगा दिया गया और जिस तरह स्वामी अग्निवेश ने टीम अन्ना के अहम सदस्य अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाया था कि उन्होंने आईएसी के नाम पर मिलने वाले 80 लाख रुपये को अपने निजी ट्रस्ट में जमा कराया था को देखते हुए तो प्रथम दृष्ट्या यही प्रतीत हो रहा है कि अन्ना हजारे न केवल एक पेशेवर धरनेबाज और अनशनकर्ता है बल्कि वंदे मातरम् के नारे का दुरुपयोग करनेवाला देशद्रोही भी है,खद्दर की उजली धोती पहननेवाला बगुला भगत है। आईएसी के संस्थापकों में से एक अग्निवेश के मुताबिक केजरीवाल ने आईएसी के नाम से खाता खोलने में देरी की, जबकि कोर कमिटी ने आईएसी के नाम से खाता खोलने के कई बार निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि केजरीवाल ने आईएसी के नाम से खाता खोलने की बजाय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में प्राप्त दान को अपने निजी ट्रस्ट पब्लिस कॉज रिसर्च फाउंडेशन में जमा कराया।
मित्रों,क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि जो व्यक्ति एक मंदिर में रहता हो और अपने-आपको सादगी की प्रतिमूर्ति कहता हो वो विशेष विमान से यात्रा करे और बड़ी-बड़ी गाड़ियों के काफिलों के साथ चले। सवाल उठता है कि यह सादगी की प्रतिमूर्ति विमान-यात्रा और महंगे वाहनों से चलने के लिए पैसे कहाँ से लाता है? क्या इसके लिए उसको फोर्ड फाउंडेशन या फोर्ड फाउंडेशन से अनुदान प्राप्त (अ)लाभकारी संस्थाओं या फिर आम आदमी पार्टी से पैसे मिले हैं? अन्ना ने घोषणा की थी कि उनके मंच पर कोई नेता नहीं आएगा फिर आप पार्टी से चुनाव लड़ चुकी मेधा पाटेकर उनके मंच से भाषण कैसे दे रही है? अन्ना अगर शुरू से अंत तक पूरी तरह से गैर राजनैतिक व्यक्तित्व रहे हैं तो फिर अरविंद केजरीवाल उनसे मिलने महाराष्ट्र सदन क्यों गए थे? 22 फरवरी को अन्ना ने कहा कि केजरीवाल का मंच पर स्वागत है फिर कल कहा कि वे केजरीवाल को मंच पर नहीं आने देंगे जबकि मनीष सिसोदिया का दावा है कि केजरीवाल अन्ना के साथ मंच साझा करेंगे। आखिर यह कैसा गड़बड़झाला है? अन्ना और केजरीवाल के संबंधों पर तो यही कहा जा सकता है कि खुली पलक पर झूठा गुस्सा बंद पलक में प्यार?
मित्रों,जिस तरह अन्ना ने आंदोलन शुरू किया था और जिस तरह यह आंदोलन आगे बढ़ा और जिस तरह से आंदोलन के दौरान किरण बेदी को बदनाम कर केजरीवाल को महिमामंडित किया गया इस पूरे घटनाक्रम को देखकर बहुत ही आसानी से यह समझा जा सकता है कि अन्ना+टीम केजरीवाल का आंदोलन शुरू से ही एक राजनैतिक आंदोलन था और छिपे हुए राजनैतिक और भारत-विरोधी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आयोजित किया गया था जिसकी डोर कहीं दूर सात समंदर पार फोर्ड फाउंडेशन के हाथों में थी। ओबामा द्वारा सोनिया गांधी से मुलाकात और उसके बाद उनका धार्मिक सद्भाव पर प्रवचन देना कहीं-न-कहीं इस बात का इशारा कर रहा है कि अमेरिका भीतर-ही-भीतर मोदी सरकार से खुश नहीं है और नरेंद्र मोदी से उनकी नजदीकी स्वाभाविक नहीं बल्कि मजबूरी है।
मित्रों,सवाल उठता है कि धरना पर बैठे अन्ना के ईर्द-गिर्द कौन-से लोग हैं? क्या ये लोग भारत का विकास चाहते हैं,या ये लोग चाहते हैं कि भारत की ऊर्जा जरुरतों को पूरा किया जाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत विकास के मामले में दुनिया का सिरमौर बने,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत की सैन्य ताकत के मामले में इतना आत्मनिर्भर हो जाए कि दुनिया का कोई भी देश उसको आँखें न दिखाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन का स्थान ले ले और दुनिया की फैक्ट्री बने,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत की युवाशक्ति को अभिशाप से वरदान में बदल दिया जाए और दुनिया के दूसरे देशों के लोग उसी तरह भारत आने को लालायित हों जिस तरह आज भारतीय अमेरिका जाने का सपना देखते हैं,क्या ये लोग चाहते हैं कि सारी सरकारी सुविधा लोगों को मोबाईल पर ही प्राप्त हो जाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि पूरे भारत में विश्वस्तरीय सड़कों का जाल बिछे,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत के हर खेत को पानी मिले,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारतीय रेल लेटलतीफी के लिए कुख्यात होने के बजाए अपनी रफ्तार के लिए जानी जाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत में सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का स्तर दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हो,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत की जीडीपी 2 ट्रिलियन डॉलर के बजाए 20 ट्रिलियन डॉलर हो जाए? इन सारे सवालों का बस एक ही उत्तर है नहीं,बिल्कुल भी नहीं। बल्कि अन्ना और उनके साथ धरना देने वाले संगठन और संगठनों के लोग यह चाहते हैं कि भारत हमेशा साँपों और सँपेरों का देश ही बना रहे,भारत का बिजली-उत्पादन इसी तरह जरुरत से काफी कम पर बना रहे,युवाशक्ति के हाथों में कलम या कंप्यूटर का माऊस नहीं हो बल्कि बंदूकें हों,भारत दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक बनने के बदले सबसे बड़ा आयातक बना रहे।
मित्रों,जहाँ तक भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का प्रश्न है तो अभी तक यह सिर्फ एक अध्यादेश है। इस पर विधेय़क आएगा,उस पर संसद में विचार होगा और तब तमाम संशोधनों के बाद वह कानून का रूप लेगा। मतलब कि अभी तो उबलते हुए पानी में चावल डाला तक नहीं गया है और अन्ना भात जल गया,भात जल गया चिल्लाने लगे हैं। फिर केंद्र सरकार बार-बार यह कह रही है कि वो इस मामले पर सदन में खुले दिमाग से चर्चा करवाएगी फिर अन्ना को धरने पर बैठने की जल्दी क्यों थी? केंद्र सरकार न तो भूमि अधिग्रहण को इतना आसान बनाना चाहती है कि कोई सरकार जब चाहे तब किसी किसान की जमीन छीन ले और न ही इतना कठिन कि विकास के कार्यों के लिए जमीन प्राप्त करना सर्वथा असंभव ही हो जाए फिर अन्ना को परेशानी क्या है? विदेशों से जो कंपनियाँ भारत में कारखाना खोलने के लिए आएंगी क्या वो हवा में कारखाने खोलेगी? केजरीवाल सरकार जब विद्युत तापघर स्थापित करेगी तो क्या वो जमीन के बदले आसमान में स्थापित करेगी? नए स्कूलों और नए महाविद्यालयों को हवा में बनाया जाएगा? केंद्र सरकार तो खुद ही कह रही है कि किसानों का हित उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस दिशा में भूमि स्वास्थ्य कार्ड,प्रधानमंत्री सिंचाई योजना जैसे तरह-तरह के इंतजाम भी कर रही है फिर अन्ना हजारों को धरना पर बैठने की जल्दीबाजी क्यों थी या है? जब केजरीवाल सरकार को वादों को पूरा करने के लिए पूरा 5 साल चाहिए तो मोदी सरकार को 5 साल क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? मोदी सरकार ने कोयले की लगभग पूरी रायल्टी राज्य सरकारों को दे दी,कोयला खानों की पारदर्शी नीलामी करवाई,2 जी स्पेक्ट्रमों की पारदर्शी नीलामी करवाने जा रही है,सारी सब्सिडियों को सीधे गरीबों के खातों तक पहुँचाने की व्यवस्था करने जा रही है,केंद्रीय मंत्रालयों में रोजाना कारपोरेट चूहों की धरपकड़ हो रही है,अंबानी पर जुर्माना हो रहा है,बंगाल से लेकर केरल तक के घोटालेबाज-हत्यारे राजनेताओं को जेल भेजा जा रहा है,सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सांसदों और विधायकों पर चल रहे आपराधिक कांडों का स्पीडी ट्रायल करवाया जा रहा है। ऐसे में क्या अन्ना अंधे हैं या फिर उनका मोदी विरोध विपक्षी दलों की तरह सिर्फ विरोध के लिए विरोध नहीं है?
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

मांझी प्रकरण में गलती किसकी,मांझी,भाजपा या नीतीश की?

मित्रों,बिहार की राजनीति के मांझी कांड का आज अंत हो गया। अब इस नाटक को ट्रेजडी कहा जाए या कॉमेडी इस बात का निर्णय करना उतना ही मुश्किल है जितना इस बात का फैसला करना कि नीतीश राज ज्यादा बुरा था या मांझी राज। खैर जो नहीं होना चाहिए था वो तो हो चुका है अब आगे यह देखना कम दिलचस्प नहीं होगा कि सुशासन बाबू किस तरह फिर से कथित सुशासन की स्थापना करते हैं क्योंकि मेरी राय में जबसे नीतीश कुमार ने भाजपाई मंत्रियों को सरकार से अलग किया है तभी से सुशासन की गाड़ी बेपटरी है।
मित्रों,मांझी जी ने इस्तीफा तो दे दिया है लेकिन उनके मुख्यमंत्री बनने और हटने के घटनाक्रम ने कई अहम सवालों को जन्म दिया है। पहला सवाल तो यही है कि क्या नीतीश कुमार जी ने इस्तीफा देकर सही किया था। हमने तब भी यही कहा था कि नीतीश कुमार को इस्तीफा नहीं देना चाहिए था और अगर इस्तीफा देना ही था तो नए चुनाव करवाने चाहिए थे क्योंकि जनता ने उनको जो मत दिया था वह अकेले उनको नहीं था बल्कि जदयू-भाजपा गठबंधन को था। फिर उनको अपने बदले किसी और को मुख्यमंत्री बनाने अधिकार किसने दे दिया?
मित्रों,जहाँ तक मांझी जी के कामकाज करने के तरीके का सवाल है तो यह तो निश्चित है नीतीश कुमार ने मांझी को समझने में ठीक वैसे ही भूल कर दी जैसी भूल भाजपा ने खुद नीतीश के मामले में की थी। मांझी को पहले दिन से ही ठीक से काम नहीं करने दिया गया यह बात और है मांझी को काम करना आता भी नहीं था। मांझी लगातार उटपटांग बयान देते रहे जिससे पार्टी की जगहँसाई भी होती रही। धीरे-धीरे मांझी ने रिमोट के आदेश को मानना बंद कर दिया और मंत्रिमंडल में शामिल कई मंत्रियों को अपने पक्ष में कर लिया लेकिन वे यह भूल गए कि विधानसभा में वास्तविक शक्ति तो विधानसभा अध्यक्ष के पास होती है जो अब भी नीतीश कुमार के पाले में ही थे।
मित्रों,यद्यपि बिहार के दलित-महादलित मांझी सरकार के पराभव से उद्वेलित तो हैं लेकिन अब देखना यह है कि मांझी नई पार्टी बनाकर उनके गुस्से को कितना भुना पाते हैं। वैसे अभी भी चुनावों में 8 महीना बाँकी है और नीतीश कुमार निश्चित रूप से इस समय का भरपुर सदुपयोग करनेवाले हैं। वे दलितों-महादलितों सहित सभी जातियों और वर्गों के लिए नई-नई घोषणाओं की झड़ी लगानेवाले हैं जिसका असर होना भी निश्चित है।
मित्रों,जहाँ तक भाजपा की संभावनाओं का सवाल है तो आगामी चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि नीतीश कुमार कहाँ तक जंगल राज को मंगल राज में बदल पाते हैं। वैसे भाजपा को मांझी का समर्थन करने से अलावे और विकल्प ढूँढ़ने चाहिए थे क्योंकि जबतक मांझी-नीतीश में गहरी छनती रही तबतक भाजपा की निगाहों में मांझी निहायत अयोग्य शासक थे और जैसे नहीं मांझी ने विद्रोह किया तो वही मांझी अच्छे हो गए?
मित्रों,लगता है कि भाजपा ने दिल्ली की हार से कोई सबक नहीं लिया है। भाजपा को अब से भी सचेत हो जाना चाहिए क्योंकि बिहार में भी उसको वैसी ही स्थिति का सामना करना पड़ सकता है जैसी स्थिति दिल्ली में थी। बिहार में भी हिन्दू बँटे हुए हैं और मुसलमान एकजुट। इसलिए भाजपा को सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए काफी सोंच-समझकर कदम उठाने होंगे। साथ ही,केंद्र की मोदी सरकार को काफी तेज गति से इस तरह के काम करने होंगे जिनका असर दूरदराज के गांवों तक में आसानी से दिखाई दे। दिल्ली से लेकर गांवों तक में भ्रष्टाचार पर करारा प्रहार करना होगा,शासन-प्रशासन को ज्यादा-से-ज्यादा पारदर्शी और सूचना-प्रोद्योगिकी आधारित करना होगा,शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार लाना होगा और मेक इन इंडिया में बिहार भी लाभान्वित हो यह सुनिश्चित करना होगा क्योंकि बिहार की सबसे बड़ी समस्या आज भी बिहार में बिहारियों को रोजगार का नहीं मिलना है।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

न मोदी नेपोलियन हैं और न दिल्ली वाटरलू


13 फरवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,10 फरवरी को दिल्ली में भाजपा को मिला करारी हार के बाद से ही मीडिया का एक हिस्सा दिल्ली को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए वाटरलू बताने में जुटा हुआ है जबकि वास्तविकता ऐसी है नहीं। नेपोलियन तलवार और बंदूकों के बल पर यूरोप को जीतना चाहता था जबकि नरेंद्र मोदी अपने अच्छे कामों से भारतीयों का दिल जीतना चाहते हैं। यहाँ संघर्ष जमीन जीतने के लिए नहीं बल्कि दिल जीतने के लिए हो रहा था और वास्तव में दिल्ली की हार मोदी की हार नहीं बल्कि खुद भारतीयों की हार है।
मित्रों,दिल्ली के चुनाव परिणामों का अगर हम विश्लेषण करें तो आसानी से यह समझ सकते हैं कि कैसे मुट्ठीभर अंग्रेजों ने विशालकाय भारत पर कब्जा कर लिया था। इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने दक्षिण में निजाम और मराठों को बारी-बारी से लालच देकर आपस में ही लड़वाया और वे अंग्रेजों की चाल को समझ ही नहीं सके। इसी तरह अंग्रेजों ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला,बंगाल के सेनापति मीरजाफर को भी लालच देकर अपना उल्लू सीधा किया और जब मतलब निकल गया तब दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया। कभी निजाम का पक्ष लेकर मराठों को हराया तो कभी मराठों को साथ में लेकर निजाम को। इसी तरह इतिहास बताता है कि जब ग्वालियर के किले में रहकर रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लोहा ले रही थी तब उनके किले के किसी द्वारपाल ने सिर्फ एक सोने की ईट के बदले 16-17 जून 1858 की आधी रात को किले के द्वार को खोल दिया था फिर अंजाम जो हुआ उसे सारी दुनिया जानती है।
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है लालच हम भारतीयों के खून में है और उसी गंदे खून का दुष्परिणाम है दिल्ली का चुनाव-परिणाम। किसी ने एक लैपटॉप,एक साईकिल या एक मिक्सी दे दिया तो हम बिना यह देखे-परखे कि वह कैसा आदमी है उसे अपना राज्य अपना सबकुछ सौंप देते हैं। दिल्ली में भी वही हुआ जो अब तक यूपी,बिहार और तमिलनाडु में होता आ रहा था। दिल्ली में हमने यह नहीं देखा कि 40 हजार करोड़ रुपये के बजट वाली दिल्ली के लिए कोई व्यक्ति या पार्टी कैसे 15 लाख करोड़ रुपये के वादे कर रहा है? हमने यह भी नहीं देखा कि पिछली बार उस व्यक्ति या पार्टी ने कितने वादों को पूरा किया था?
मित्रों,अभी तो दिल्ली में मुख्यमंत्री का शपथ-ग्रहण भी नहीं हुआ है और स्वंघोषित एकमात्र सत्यवादी जी की पार्टी ने गीता,बाईबिल और कुरान से भी ज्यादा पवित्र अपने घोषणा-पत्र से पलटना शुरू भी कर दिया है। उसने घोषित कर दिया है कि दिल्ली में सिर्फ सार्वजनिक स्थलों पर ही मुफ्त वाई-फाई की सुविधा मिलेगी। वो भी सिर्फ आधे घंटे के लिए और उसमें भी फेसबुक आदि सोशल वेबसाईटों पर प्रतिबंध रहेगा। लो कल्लो बात। फिर फ्री के वाई-फाई का हम क्या अँचार डालेंगे? इतना ही नहीं कथित आम आदमियों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि हम वादों को तभी पूरा कर सकेंगे जब केंद्र सरकार हमें पर्याप्त आर्थिक सहायता देगी। तो फिर इन लोगों ने घोषणा-पत्र में इस बात की घोषणा क्यों नहीं की कि हम वर्णित घोषणाओं और वादों को तभी पूरा करेंगे जब केंद्र सरकार पैसे देगी? घोषणा-पत्र में अगर यह लिखा गया था कि मुफ्त वाई-फाई,मुफ्त पानी,झुग्गी के स्थान पर मकान और सस्ती बिजली में नियम और शर्तें लागू होंगी तो फिर अखबारों में क्यों नहीं वादों के साथ-साथ उन नियमों और शर्तों को प्रमुखता से छपवाया गया? क्यों नियमों और शर्तों को जनता से छिपाया गया? अभी एक और खबर आई है कि सस्ती बिजली और फ्री में पानी देने के लिए नई सरकार के पास विकास की राशि को सब्सिडी के रूप में बर्बाद करने के अलावा और कोई उपाय नहीं है। अगर हर राज्य में इसी तरह होता रहा और हो भी रहा है तो फिर कहाँ से आएगी विकास के लिए राशि और कैसे होगा देश का विकास?
मित्रों,ठगों को तो ठगी करनी ही थी अगर उन्होंने ठगी की तो इसमें उनका क्या दोष? दोष तो उनका है जिनका कबीर के इस 600 साल पुराने दोहे में आज भी अटूट विश्वास है कि कबिरा आप ठगाईए और न ठगिए कोए। आप ठगे सुख उपजै और ठगे दुःख होए।। तो ठगाते रहिए और सदियों तक लंगोट में फाग खेलकर चरम सुख का अनुभव करते रहिए। आप यकीनन देश के दुश्मनों द्वारा अभी दिल्ली में ठगे गए हैं,कल बिहार,परसों पश्चिम बंगाल और तरसों उत्तर प्रदेश में ठगे जाएंगे और इस तरह लगातार अपने लिए सुख उपजाते रहेंगे। मेरा यह पूरा आलेख विशेष तौर पर भारत के हिन्दुओं के लिए है। मुसलमानों का तो फिक्स है कि वे किसको वोट करेंगे फिर चाहे कोई कितने भी लैपटॉप,साईकिल क्यों न दे दे लेकिन दुनिया के सबसे पुराने धर्म के अनुयायियों का कोई ईमान-धर्म है क्या? फिर कोई दल या नेता क्यों इनके हित की बात करेगा,क्यों इनकी भलाई के लिए लड़ेगा?
मित्रों,शपथ-ग्रहण से पहले ही कथित आम आदमी कहने लगे हैं कि सोशल-साईट्सविहीन आधे घंटे के फ्री वाई-फाई के आने में कम-से-कम 6 महीने लग जाएंगे तो क्या नरेंद्र मोदी स्विटजरलैंड या जर्मनी के बाप लगते हैं जो उनके एकबार फोन घुमाते ही 10 दिन के भीतर ही सारा-का-सारा कालाधन देश में वापस आ जाएगा। मोदी को तो वह कोट जिसका मूल्य भले ही कितना भी हो उपहार में मिला था और मोदी हर साल जुलाई में उपहार में मिली वस्तुओं को नीलाम करके प्राप्त राशि को सरकारी खजाने में जमा करवा देते हैं। बाँकी के नेताओं में क्या कोई एक भी ऐसा है जो ऐसा करता हो? बाँकी के नेता तो जब सरकारी आवास को खाली करते हैं तो बल्ब और कुर्सियाँ तक उठाकर ऐसे ले जाते हैं जैसे उनके बाप का माल हो। अभी हाल ही में हमारी पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने जब अपना कार्यकाल पूरा किया तब अपने साथ देश-विदेश में मिले कीमती उपहारों को भी साथ ले गईँ जिनको बाद में भारत सरकार को पत्राचार कर वापस मंगवाना पड़ा। और ऐसी लुटेरी पार्टियों के लुटेरे नेता भारत के प्रधानमंत्री के शूट पर सवाल उठा रहे हैं? खुद तो इनलोगों ने 200 रुपये मीटर का कपड़ा पहनकर देश को हजारों करोड़ का चूना लगा दिया और सवाल उठा रहे हैं पीएम के शूट पर?
मित्रों,कल ही बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने स्वीकार किया है कि बिहार में जो पुल बनते हैं उनके पायों के निर्माण पर जितना खर्च होता है उससे कहीं ज्यादा तो कमीशन दे दिया जाता है और वह कमीशन मुख्यमंत्री तक पहुँचता है। उन्होंने यह भी माना है कि पुल 20 करोड़ में बन जाता है लेकिन बिल 200 करोड़ रुपये का बनाया जाता है। और जिस व्यक्ति ने इस सारी कमीशनखोरी पर केंद्र सरकार में पूर्ण विराम लगा दिया उसी से आज बेईमान ईमानदार पार्टियों के लोग शूट का दाम पूछ रहे हैं और जनता भी उनके झाँसे में आ जा रही है! सवा सौ साल पहले भारत-दुर्दशा लिखकर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भारत की अंतरात्मा को जगाने का प्रयास किया था लेकिन भारत की अंतरात्मा तो आज तक भी सोयी हुई ही है। सवा सौ साल पहले की तरह आज भी हमारे लिए हमारी वरीयता सूची में हमारे स्वार्थों का स्थान सबसे ऊपर है और देशहित कहीं नहीं। आज भी हम दस-बीस हजार रुपये के फायदे के लिए अपने राज्य और देश को देश के घोषित-अघोषित दुश्मनों के हाथों में हर पाँच साल पर सहर्ष सौंप देते हैं। वो हमें बार-बार धोखा देते हैं और बार-बार माफी मांगते हैं और हम बार-बार माफ भी कर देते हैं। वो कभी हमें रोटी का लालच देते हैं तो कभी पानी का तो कभी लैपटॉप या साईकिल या मिक्सी का और तब हम भूल जाते हैं कि इनके हाथों में हमारे राज्य या देश का हित सुरक्षित रहेगा या नहीं। हम लालच में आकर अपना वोट बेच देते हैं और उनको मौका दे देते देश को बेचने का। कौन कहता है काठ की हाँड़ी एक बार ही आग पर चढ़ती है?  फिर सवा सौ करोड़ के भारत में एक व्यक्ति के लिए अगर नेशन फर्स्ट और लास्ट है तो होकर भी क्या कर लेगा???
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

जनता की नब्ज पहचानने में विफल रही भाजपा

10 फरवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,दिल्ली ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अश्वमेध के घोड़े को रोक लिया है। जीत जीत होती है और हार हार। फिर हार जब इतनी करारी हो तो सवाल उठना और भी लाजिमी हो जाता है। ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं सच कहूंगा मगर फिर भी हार जाऊंगा, वो झूठ बोलेगा और लाजवाब कर देगा? लेकिन ऐसा हो चुका है और भारत की राजधानी दिल्ली में हो चुका है। कभी 15वीं-16वीं शताब्दी में कबीर को भी जमाने से यही शिकायत थी कि साधो,देख ये जग बौराना।
साँच कहूँ तो मारन धावे,
झूठौ जग पतियाना,
साधो,देख लो जग बौराना।।
मित्रों,वजह चाहे जो भी हो हार तो हार होती है। मुझे लगता है दिल्ली में भाजपा अतिआत्मविश्वास की बीमारी से ग्रस्त हो गई थी। भाजपा जनता से कट गई थी। लोक और तंत्र के बीच संवादहीनता की स्थिति पैदा हो गई थी। भाजपा का प्रचार ऊपर से नीचे की ओर चल रहा था वहीं आप पार्टी का प्रचार सीधे नीचे से चल रहा था। उनके कार्यकर्ता लगातार लोगों से डोर-टू-डोर संपर्क कर रहे थे जो कि भाजपा नहीं कर रही थी। फिर भाजपा ने चुनावों में काफी देर भी कर दी। मेरे हिसाब से दिल्ली में चुनाव लोकसभा चुनावों के तुरन्त बाद करवा लेना चाहिए था। चुनावों में देरी ने कई तरह के अंदेशों और अफवाहों को हवा दी।
मित्रों,दूसरी जो वजह हार की है वो है दिल्ली भाजपा में सिर फुटौब्बल। भाजपा में ऐसा कम ही देखा जाता है कि प्रदेश अध्यक्ष का ही टिकट कट जाए और उनके समर्थक प्रदेश कार्यालय को घेर लें लेकिन ऐसा हुआ। उस पर भाजपा ने अपने पुराने कैडरों की उपेक्षा करते हुए किरण बेदी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बना दिया जिससे पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं में निराशा उत्पन्ना हो गई। इतना ही नहीं पार्टी ने दूसरी पार्टी से आए हुए लोगों को सिर आँखों पर बिठाया जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ जनता के बीच भी गलत संकेत गया।
मित्रों,तीसरी वजह यह रही कि पार्टी ने कई मुद्दों पर चुप्पी साधे रखी। नरेंद्र मोदी के शूट के मुद्दे पर पार्टी को तुरन्त बताना चाहिए था कि शूट गिफ्ट में मिली है और मोदी गिफ्ट में मिली चीजों की सालाना नीलामी करवाते हैं और प्राप्त राशि को सरकारी खजाने में जमा करवा देते हैं। इसी तरह पार्टी ने प्रत्येक भारतवासी के खाते में 15 लाख रुपये वाले जुमले पर भी चुप्पी साधे रखी।
मित्रों,चौथी वजह यह रही कि मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार किरण बेदी में धैर्य और वक्तृता शक्ति की कमी। पूरे चुनाव अभियान के दौरान किरण बेदी जी राजनेता की तरह दिखी ही नहीं। हमेशा ऐसा लगता रहा कि उनके पास समय की कमी है। यहाँ तक कि टीवी चैनल वालों के लिए भी उनके पास समय नहीं था। अगर उनको टीवी पर बहस नहीं करनी थी तो उनको इसकी पहल भी नहीं करनी चाहिए थी क्योंकि उनके बहस से पीछे हटने का जो संकेत जनता के बीच गया वह पार्टी के लिए काफी घातक रहा। किरण बेदी जी ने चुनाव प्रचार की शुरुआत ही विवाद से की लाला लाजपत राय की प्रतिमा को भाजपा का पट्टा पहनाकर।
मित्रों,पाँचवीं वजह यह रही कि भाजपा ने अपना विजन डॉक्यूमेंट लाने में काफी देर कर दी। उसके विजन डॉक्यूमेंट में अधिकतर वादे वही थे जो आप पार्टी के घोषणा-पत्र में पहले ही आ चुके थे।
मित्रों,छठी वजह यह रही कि दिल्ली सहित सारे देश में धीरे-धीरे जनता को लगने लगा है कि मोदी जी के केंद्र में आने के बावजूद ग्रास रूट लेवल पर स्थितियाँ कमोबेश वैसी ही और वही हैं जो 9 महीने पहले थीं। आज भी पुलिस भ्रष्ट है,नगर निगम भ्रष्ट हैं,चारों तरफ गंदगी है,भ्रष्टाचार है,बिजली और पानी की किल्लत है,न्याय विलंबित और बेहद खर्चीला है,शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति काफी खराब है,पंचायती राज भ्रष्टाचार के विकेंद्रीकरण के प्रतीक बने हुए हैं,जनवितरण प्रणाली में व्यापक भ्रष्टाचार है आदि-आदि।
मित्रों,सातवीं वजह यह रही कि आज भी भारत की जनता मुफ्तखोर है। उसको हर चीज मुफ्त में चाहिए भले ही इसके लिए देश के विकास के रथ को रोकना ही क्यों न पड़े। उसको इस बात से कुछ भी लेना-देना नहीं है कि कौन सी पार्टी देशभक्त है और कौन सी पार्टी देश विरोधी। यहाँ यह ध्यान देनेवाली बात है कि दिल्ली का वार्षिक बजट मात्र 40,000 करोड़ रुपये का होता है वही आप पार्टी ने 15 लाख करोड़ रुपये के वादे दिल्ली की जनता से कर दिए हैं। जाहिर है कि भविष्य में यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि वे इन वादों को कैसे पूरा करते हैं। या फिर से पैसों की मांग के लिए धरने पर बैठ जाते हैं। सबसे ज्यादा दिलचस्प यह देखना होगा कि पूरी दिल्ली में कबसे मुफ्त में वाई-फाई की सुविधा शुरू की जाती है और कब दिल्ली में 15 लाख सीसीटीवी कैमरे लगाए जाते हैं। क्योंकि दिल्ली के ज्यादातर युवा फ्री वाई-फाई के लालच में आ गए।
मित्रों,आठवीं वजह यह रही कि कांग्रेस का पूरा वोट बैंक आम आदमी पार्टी ले उड़ी। वोट प्रतिशत के मामले में भाजपा इस बार भी वहीं है जहाँ 2013 में थी। अगर भाजपा ने जमीनी स्तर पर घर-घर जाकर चुनाव प्रचार किया होता तो निश्चित रूप से कांग्रेस के वोट बैंक में उसको भी हिस्सा मिलता लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाई जिसका दुष्परिणाम आज हमारे सामने है।
मित्रों,नौवीं वजह यह रही कि मोदी सरकार ने भले ही डीजल के दाम कितने भी कम क्यों न कर दिए हों उसका व्यापक असर महंगाई पर दिख नहीं रहा क्योंकि न तो बसों-टेम्पो के भाड़े ही कम हुए और न ही ट्रकों के।
मित्रों,नौवीं वजह यह रही कि भाजपा की तरफ से घर-वापसी आदि को लेकर लगातार उटपटांग बयान आते रहे। खुद नरेंद्र मोदी के दिल्ली में दिए गए चारों भाषण भी निर्विवाद नहीं रहे। भाग्यवान और अभागा जैसे जुमले सिर्फ और सिर्फ दंभ और अभिमान के परिचायक रहे। मोदी केजरीवाल को निगेटिव कहते रहे लेकिन कहीँ-न-कहीं उनका खुद का भाषण ही निगेटिव हो गया। उनको आप पार्टी की आलोचना करने के बजाए यह बताना चाहिए था कि वे दिल्ली के लिए क्या-क्या करना चाहते हैं। उनको नौ महीने में दिल्ली नगर निगम की स्थिति को सुधारना चाहिए था। फिर योगी आदित्यनाथ ने तो हद ही कर दी यह कहकर कि वे देश की प्रत्येक मस्जिद में गौरी-गणेश की प्रतिमा स्थापित करवा देंगे। कुल मिलाकर निश्चित रूप से भाजपा ने कई गलतियाँ कीं और उन गलतियों का खामियाजा उसे भुगतना ही था। देश की जनता निश्चित रूप से मोदी सरकार के काम करने की रफ्तार से संतुष्ट नहीं है। उसको और भी तेज रफ्तार में काम चाहिए और ऐसे काम चाहिए जो जमीनी स्तर पर आसानी से दिखाई दें। उसको भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहिए,त्वरित न्याय चाहिए,सफाई चाहिए,अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सुविधा चाहिए,रोजगार चाहिए आदि-आदि।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)



गुरुवार, 29 जनवरी 2015

किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल,एक आलोचनात्मक विश्लेषण

29 जनवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अब दिल्ली के मतदान में कुछ ही दिन शेष रह गए हैं। दिल्ली में ऐसा पहली बार हुआ है कि यहाँ की सभी तीनों प्रमुख पार्टियों ने अपने-अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि दिल्ली पिछले 800 सालों से भारत की राजधानी है,भारत का दिल बनी हुई है ऐसे में दिल्ली पर कब्जे का मतलब सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं हो सकता।
मित्रों,लगभग सारे विश्लेषक यह मानकर चल रहे हैं कि इस बार दिल्ली में मुख्य मुकाबला भाजपा और आप पार्टी के बीच है। यह कहीं-न-कहीं आश्चर्यजनक है क्योंकि जो पार्टी दिल्ली को अपने हाल पर छोड़कर बनारस भाग गई थी वही पार्टी कैसे टक्कर में हो सकती है! फिर भी जो है सो है। ऐसा तो हमारे साथ अक्सर ही होता है कि हम जो चाहते हैं वैसा होता नहीं है। हम चौथे स्तंभ हैं और हम तो इसके साथ-साथ कि क्या हो रहा है बस यही बता सकते हैं कि क्या होना चाहिए। बस यही तो हमारे वश में है।
मित्रों,पिछले कई दिनों से जबसे किरण बेदी जी को भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है मीडिया किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल तथा भाजपा और आप पार्टी की तुलना करने में जुटी हुई है। मैं समझता हूँ कि दोनों दो तरह के मिजाज वाले लोग हैं इसलिए इन दोनों की तुलना हो ही नहीं सकती फिर भी जबकि दोनों आमने-सामने हैं तो तुलना तो करनी ही पड़ेगी।
मित्रों,पहले अरविंद केजरीवाल की कथनी,करनी और शख्सियत पर विचार करते हैं। अरविंद को भी किरण बेदी की ही तरह रमन मैग्सेसे पुरस्कार मिल चुका है। अरविंद विवाद पुरूष हैं क्योंकि उनको जानबूझकर विवादों में रहने में मजा आता है इसलिए वे लगातार विवादित बयान देते रहते हैं,अंट-शंट बकते रहते हैं। अरविंद आरोप लगाने में मास्टर हैं लेकिन आज तक अपने किसी भी आरोप को साबित नहीं कर पाए हैं। अरविंद में एक और कमी यह है कि जब उनके ऊपर आरोप लगता है तो वे चुप्पी साध जाते हैं,न तो खंडन करते हैं और न ही मंडन। झूठ बोलने में उनको मास्टरी है। किसी के बारे में भी कुछ भी बोल दिया और जब प्रमाण मांगा गया तो कह दिया कि हमने तो आरोप लगा दिए हैं अब ये सही हैं या गलत जनता समझेगी। अरविंद चंदा किंग हैं और उनको भारतमाता के कट्टर दुश्मनों से भी चंदा लेने में कोई आपत्ति नहीं है। अरविंद कभी भी अपने किसी भी पुराने कथन पर कायम नहीं रह पाए हैं। बोलते हैं कि हम तो आम आदमी हैं जी हमें वीवीआईपी ट्रीटमेंट नहीं चाहिए लेकिन साथ ही वीवीआईपी पास की भी ईच्छा रखते हैं। अरविंद सर्वेवीर हैं। उनके पास सर्वक्षकों की एक बेहतरीन टीम है जो पहले से ही सर्वेक्षण के निष्कर्ष निर्धारित कर लेते हैं और पीछे सर्वेक्षण करते हैं। जैसे-हमने पता लगाया है जी कि हमारे 49 दिनों के शासन में भ्रष्टाचार काफी कम हो गया था,हमने सर्वे करवाया है जी कि हम 55 सीटों पर चुनाव जीतने जा रहे हैं,हमने यह सर्वे करवाया है जी,वह सर्वे करवाया है जी। अरविंद जी धरातल पर चाहे काम करें या न करें सर्वे बहुत करवाते हैं। अरविंद जी ने मीडिया में भी अच्छे दोस्त बना रखे हैं जो उनके आगे-पीछे भगत सिंह की तस्वीरें लगाकर लगातार उनको क्रांतिकारी साबित करने में जुटी रहती है। उनके क्रांतिकारी मीडिया-मित्र भी लगातार सर्वे करवाते हैं और गजब के सर्वे करवाते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले एबीपी न्यूज कह रहा था कि दिल्ली में सरकार तो भाजपा की बनेगी लेकिन दिल्ली के लोग मुख्यमंत्री के रूप में तो अरविंद को ही देखना चाहते हैं। यानि सरकार तो भाजपा की बनेगी लेकिन मुख्यमंत्री तो अरविंद केजरीवाल ही होंगे। कुल मिलाकर अरविंद केजरीवाल मीडियाप्रेमी हैं,ब्लोअर की हवा हैं,परले दर्जे के हवाबाज हैं। आजतक उन्होंने सिर्फ बोला ही है किया कुछ भी नहीं है और अभी भी वे ऐसा ही करते दिख रहे हैं। मुख्यमंत्री बनकर वे बहुतकुछ कर सकते थे लेकिन उन्होंने खुद कोई काम नहीं किया सिर्फ केंद्र सरकार या विपक्ष के खिलाफ बयान देते रहे या फिर केंद्र और संसद-संविधान के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करते रहे। उनकी पार्टी में एक-से-एक कश्मीर के स्वतंत्रता-प्रेमी और राष्ट्रविरोधी तत्त्व भरे पड़े हैं।
मित्रों,अब आते है किरण बेदी जी पर। किरण बेदी ने जब जो कहा है वही किया है। किरण जी ने कभी किसी के ऊपर भी झूठे आरोप नहीं लगाए हैं न ही किरण जी अपनी झूठी प्रशंसा ही पसंद करती हैं। तभी तो महान क्रांतिकारी पत्रकार रवीश कुमार को उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गाड़ी नहीं उठवाई थी। किरण जी कर्मठ हैं,कर्त्तव्यनिष्ठ हैं,अनुशासनप्रिय हैं और देशभक्त हैं। किरण जी के पास एक पूरा खाका है,पूरी योजना है कि दिल्ली का मुख्यमंत्री बनकर वे कैसे दिल्ली के लिए काम करेंगी और दिल्ली का विकास करेंगी जो कि केजरीवाल के पास नहीं है। किरण जी ने अपने 40 साल के प्रशासनिक जीवन के द्वारा पहले ही यह साबित कर दिया है कि उनके पास अच्छा शासन व प्रशासन देने की भरपुर योग्यता है। किरण जी ने नौकरी के दौरान कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि किरण जी उस पुलिस का हिस्सा थीं जिसको हमारे देश में सर्वाधिक भ्रष्ट विभाग का खिताब अता किया जाता है और फिर भी वे निष्कलंक हैं। फिर वे जिस पार्टी का हिस्सा हैं वह घोर राष्ट्रवादी पार्टी है,राष्ट्रभक्तों की पार्टी है। हाँ,मैंने पिछले तीन-चार दिनों में गौर किया है कि किरण जी में कुछ कमियाँ भी हैं। किरण जी पत्रकारों को देखकर घबरा जाती हैं और ठीक से जवाब नहीं दे पातीं जबकि उनको ऐसा नहीं करना चाहिए। किरण जी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रेरणा लेनी चाहिए जिन्होंने लोकसभा चुनावों के दौरान अपने घोर विचारधारात्मक शत्रु चैनल एबीपी पर धमाकेदार साक्षात्कार देकर तहलका मचा दिया था। जहाँ तक दो-2 वोटर आईकार्ड होने का सवाल है तो मेरे पास भी दो-दो हैं जिनमें से एक का अब मैं कहीं भी इस्तेमाल नहीं करता। मैं भी चाहता हूँ कि एक को रद्द करवा दूँ लेकिन लालफीताशाही और दफ्तरों की बेवजह की दौड़ लगाने से भागता हूँ। अगर ऐसा करना अपराध है तो मैं भी अपराधी हूँ लेकिन क्या ऐसा नहीं होना चाहिए कि बीएलओ जाँच करके खुद ही एक को रद्द कर दे। फिर दिल्ली में तो कम-से-कम 22% वोटर आई कार्ड फर्जी हैं,एक ही फोटो पर 15-पन्द्रह आई कार्ड बने हुए हैं तो क्या इसमें भी उस तस्वीर वाले या वोटर की ही गलती है। मेरी 70 वर्षीय माँ की उम्र वोटर आईकार्ड में 98 साल दर्ज कर दी गई है,मेरे गाँव के कई पुरुषों के वोटर आईकार्ड में महिलाओं की और कई महिलाओं के वोटर आईकार्ड में पुरुषों की तस्वीरें दर्ज है,इसमें किसकी गलती है? हमारे हाजीपुर में लोग पिछले 20 सालों से रह रहे हैं और बार-बार मतदाता सूची में नाम दर्ज करने के लिए आवेदन देते हैं फिर भी उनका नाम दर्ज नहीं किया जाता,इसमें किसकी गलती है?
मित्रों,तो यह था अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी की कथनी,करनी और शख्सियत का आलोचनात्मक विश्लेषण। अब यह आप दिल्लीवासियों पर निर्भर करता है आप किसको चुनते हैं। झूठ और अराजकता को या सत्य और सृजनात्मकता को? विवादपुरुष को या विकासस्त्री को? रायता को या विकास को? राष्ट्रविरोधी को या राष्ट्रभक्त को? निर्णय आपके अपने हाथों में है। आप ही अपनी दिल्ली के भाग्यनिर्माता हैं। क्या आप वर्ष 2013 में अपने द्वारा की गई गलती को दोहराना चाहेंगे?

(हाजीपुर टाईम्स पर प्रकाशित)

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

डी फॉर डॉक्टर,डॉक्टर मीन्स डाकू

23 जनवरी,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,एक समय था जब डॉक्टरों को धरती का भगवान कहा जाता था। तब डॉक्टरी पैसा कमाने का गंदा धंधा नहीं थी बल्कि मानव-सेवा का सबसे उत्तम माध्यम थी। लेकिन आज जैसा कि कल मैंने महसूस किया डॉक्टरों से ज्यादा उदार और दयावान तो कसाई होते हैं।
मित्रों,हुआ यह कि इसी 16 जनवरी की रात में मेरी पत्नी के पेट में असहनीय दर्द होने लगा। मैं उसके साथ-साथ रातभर परेशान रहा। सुबह गैस की दवा दी। कुछ देर तक तो दर्द बंद रहा लेकिन दोपहर में फिर से दर्द होने लगा। मैं दौड़ा-दौड़ा हाजीपुर के ही सुभाष चौक पर क्लिनिक चलानेवाली डॉ. अंजु सिंह के पास गया और दो सौ रुपया देकर नंबर लगा दिया। फिर घर आया और 12 बजे आनन-फानन में क्लिनिक ले गया। परन्तु यह क्या डॉक्टर तो अपने कक्ष में थी ही नहीं। वे कथित रूप से ऑपरेशन थिएटर में चली गई थीं। फिर शुरू हुआ इंतजार का सिलसिला। पूरी बिल्डिंग में सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ था और कंपाउंडर किसी भी चना-चबेना बेचनेवाले को फटकने नहीं दे रहा था। ईधर मेरी पत्नी का दर्द के मारे बुरा हाल था। उसके साथ-साथ मैं भी सुबह से भूखा-प्यासा अपनी बारी का इंतजार कर रहा था।
मित्रों,इस बीच मैंने कई बार कंपाउंडर से जल्दी दिखवाने का निवेदन किया लेकिन सब बेकार। मेरे साथ-साथ अन्य मरीज और उनके परिजन भी बेहाल थे। मैंने पूरे जीवन में इतनी सुस्ती से मरीज का परीक्षण करनेवाला डॉक्टर नहीं देखा था। फिर राम-राम करते-करते और पत्नी को दर्द से बेहाल देखते हुए शाम के पाँच बजे कंपाउंडर ने नाम पुकारा। लेकिन जब पत्नी दिखाकर बाहर आई तो पुर्जा पर कोई दवा नहीं लिखी गई थी बल्कि अल्ट्रासाउंड और कई तरह की जाँच लिखी हुई थी। मैंने पत्नी से पूछा कि क्या तुमने दवा लिखने को नहीं कहा। तब उसने बताया कि डॉक्टर ने कहा कि बिना अल्ट्रासाउंड औरजाँच की रिपोर्ट देखे वह दवा नहीं लिखेगी भले ही मेरी मौत ही क्यों न हो जाए।
मित्रों,फिर तो मारे गुस्से के मेरा बुरा हाल था। मैं सोंच रहा था कि डॉक्टर का मतलब क्या डाकू होता है? हद है कि डॉक्टरी ने किस तरह डकैती का स्वरूप ग्रहण कर लिया है! मरीज को ईलाज कराने के दौरान पग-पग पर लूटा जाता है और बेचारा प्रतिवाद भी नहीं कर पाता। 17 जनवरी को मेरी पत्नी की जो हालत थी उसको देखकर शायद जल्लाद भी रो पड़ता लेकिन एक डॉक्टर को तनिक भी दया नहीं आई! कहाँ है हिप्पोक्रेटिज की शपथ?
मित्रों,केंद्र सरकार ने जबसे गरीबों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू की है तबसे इन डाकू डॉक्टरों की आमदनी कई गुना बढ़ गई है। मैंने सुना है कि भारत में डॉक्टरों को रेग्यूलेट करने के लिए एमसीआई नाम की कोई संस्था है। फिर एमसीआई या केंद्र सरकार क्यों प्रत्येक जिले या राज्य की राजधानी में मरीजों के लिए हेल्पलाईन नंबर जारी नहीं करती या ऐसी कोई वेबसाईट क्यों नहीं बनाती जहाँ फोन करके या ईमेल करके लोग डॉक्टर नामधारी डाकुओं की शिकायत कर सकें।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 18 जनवरी 2015

भ्रष्टाचार की बाड़ी आंगनबाड़ी योजना

18 जनवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हमारे बिहार में घर के आगे-पीछे जो खाली जमीन होती है लोग उसका भी बखूबी उपयोग करते हैं। लोग उसमें सब्जी उगा लेते हैं और ऐसे ही सब्जियों के छोटे-बड़े बागीचे को हम कहते हैं बाड़ी। कुछ ऐसी ही स्थिति बिहार में आंगनबाड़ियों की है। बिहार के आंगनबाड़ियों में पोषण की नहीं बल्कि वास्तव में भ्रष्टाचार की सब्जी की खेती हो रही है और खुलेआम हो रही है,ताल ठोंककर हो रही है। जबसे यह ICDS (Integrated Child Development Services Scheme) योजना शुरू की गई है आजतक मेरी तो समझ में ही नहीं आया कि योजना को चलानेवाले अधिकारी-कर्मी धूर्त हैं या सरकार ही अंधी है? इस योजना के अंतर्गत कहीं कोई काम ही नहीं हो रहा। पूरा-का-पूरा माल जेब में। अब यह तो जाँच का विषय है कि किसकी जेब में कितना माल जाता है।

मित्रों,इस परियोजना से जुड़े भ्रष्ट अधिकारियों का मनोबल किस कदर बढ़ा हुआ है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई साल पहले जब परवीन अमानुल्लाह बिहार की महिला एवं बाल विकास मंत्री थीं तब वैशाली जिले के ही बिदुपुर में वहाँ की प्रखंड बाल विकास परियोजना पदाधिकारी ने उनके साथ धक्का-मुक्की और बदतमीजी की और मंत्री होते हुए भी अमानुल्लाह कुछ नहीं कर सकीं।

मित्रों,अभी कुछ दिन पहले ही जब वैशाली जिले के कई प्रखंडों में आंगनबाड़ियों की जाँच की गई तो पाया गया कि महुआ और देसरी में कई आंगनबाड़ियों का कहीं अता-पता ही नहीं है। राघोपुर का तो मैं खुद ही चश्मदीद गवाह हूँ और वहाँ भी धरातल पर अधिकांश आंगनबाड़ी हैं ही नहीं फिर बच्चों का कैसा पोषण और कैसा विकास। हाँ,आंगनबाड़ी सेविकाएँ जरूर प्रति सेविका प्रति माह 20 से 25 हजार रुपये का कालाधन अर्जित कर रही हैं।

मित्रों,बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक समग्र बाल विकास सेवा (आइसीडीएस) योजना के तहत 91,688 आंगनबाड़ी संचालित किए जा रहे हैं, मगर एक सर्वे रिपोर्ट में पाया गया कि अधिकांश आंगनबाड़ी केंद्र अपने लक्ष्य और दायित्व से कोसों दूर हैं। मुश्किल से 60 फीसदी बच्चों को नियमित पोषाहार मिल पा रहा है। आइसीडीएस का पहला लक्ष्य ही बच्चों को कुपोषण से बचाना है, लेकिन कागजों में दर्ज बच्चों में बमुश्किल 60 फीसद को ही आंगनबाड़ी केंद्रों पर नियमित पोषाहार मिलता है। समाज कल्याण विभाग के संबंधित अधिकारी के मुताबिक हर आंगनबाड़ी केंद्र में आने वाले बच्चे रोजाना दोपहर डेढ़ सौ से दो सौ ग्राम खिचड़ी, अंडे, हलवा या पुलाव खाते हैं। सुबह के नाश्ते में इन्हें फल और बिस्किट मिलता है, लेकिन हकीकत में तो अधिकांश केंद्रों पर बच्चों की मौजूदा संख्या के अनुरूप भोजन पकाने की सुविधा तक उपलब्ध नहीं है। कई जगहों पर विटामिन ए की खुराक तक समय पर नहीं मिल पा रही है। कहीं-कहीं जरूर कभी-कभी बच्चों को कुछेक बिस्कुट या टॉफियाँ देकर समझ लिया जाता है कि अब वे कुपोषित नहीं रह गए हैं।

मित्रों,आंगनबाड़ी सेविका के बीमार पड़ने, प्रशिक्षण पर जाने या किसी अन्य काम से जाने पर ये केंद्र नहीं खुल पाते। राजधानी पटना की कई आंगनबाड़ियों में वजन मापने की मशीन उपलब्ध तो है, मगर उसका कभी उपयोग नहीं किया गया। दवा की किट, बच्चों का शारीरिक विकास दर्ज करने की व्यवस्था, शौचालय और स्वच्छ पानी आदि की व्यवस्था तो कहीं दिखी ही नहीं। आंगनबाड़ी केंद्र पर बच्चों को दरी और स्लेट तक नहीं मिलती। ज्यादातर सेविकाओं को टीकाकरण और पोषण संबंधी सामान्य सावधानियों की जानकारी नहीं है। बच्चों को खिचड़ी, हलवा या पुलाव देने में भी सफाई नहीं बरती जाती। अधिकांश आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि पोषाहार के सामान से लेकर जलावन तक के लिए मिलने वाली रकम बेहद कम है। शिकायत करने पर संबंधित अधिकारी झिड़क देते हैं।

मित्रों,सवाल उठता है कि फिर इस योजना का पैसा जाता कहाँ है? ऐसा कौन-सा स्पंज है जो योजना की राशि को सोख जाता है? सवाल यह भी उठता है कि सरकार कबतक सबकुछ जानते-बूझते हुए भी इसी तरह जनता के टैक्स से आए पैसे को गड्ढ़े में बहाती रहेगी? आखिर कब इस भ्रष्टाचार की बाड़ी को समाप्त किया जाएगा या इसमें सुधार किया जाएगा? आँकड़े व समाचार-पत्र गवाह हैं कि बिहार में जितने भी अधिकारी घूस लेते रंगे हाथों पकड़े गए हैं उनमें बड़ी संख्या इस योजना से जुड़े अधिकारियों की है। फिर भी केंद्र और राज्य की सरकार क्यों इस योजना की ओवरहॉलिंग नहीं कर रही?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

भारतीय राजनीति में आशा की नई किरण किरण बेदी

16 जनवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैं कई बार अपने आलेखों में लिख चुका हूँ कि हमारे देश की राजनीति सिर्फ बाहर से गालियाँ देने से स्वच्छ नहीं होनेवाली है बल्कि इसके लिए स्वच्छ मन,चरित्र और विचारवाले लोगों में राजनीति में आना होगा। यह हमारे लिए बड़ी ही खुशी का सबब है कि कल एक ऐसी ही शख्सियत ने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया। वह एक ऐसी शख्सियत हैं जिनके बारे में हमलोग बचपन से ही पढ़ते-सुनते आ रहे हैं और उनसे प्रेरणा ग्रहण करते रहे हैं। वह एक ऐसी शख्सियत हैं जिनकी ईमानदारी भारत के भ्रष्टतम विभाग में काम करने के बावजूद संदेह से परे रही है।
मित्रों,वे एक ऐसी शख्सियत हैं जिनके राजनीति में आने के बाद हम निश्चिंत होकर यह कह सकते हैं कि भारत के साथ-साथ दिल्ली के भी अच्छे दिन आनेवाले हैं। आपको पता है कि मैं किनके बारे में बात कर रहा हूँ। वैसे तो वे किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं फिर भी चूँकि आलेख को आगे बढ़ाने के लिए उनका नाम लेना जरूरी है इसलिए मैं उनका नाम ले रहा हूँ और उनका नाम है-किरण बेदी। वही किरण बेदी जो भारत की पहली महिला आईपीएस थीं, वही किरण बेदी जिन्होंने नौकरी को सिर्फ नौकरी की तरह नहीं किया बल्कि देश और समाज की सेवा के हथियार के रूप में प्रयुक्त किया,वही किरण बेदी जिनके लिए देश और समाज ही हमेशा सर्वोपरि रहा,उन्हीं किरण बेदी ने कल भारतीय जनता पार्टी को ज्वाईन कर राजनीति में कदम रखा।
मित्रों,कल तक आम आदमी पार्टी नामक नौटंकिया दल गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रहा था कि भाजपा के पास मुख्यमंत्री बनने लायक कौन-सा चेहरा है आज वो खामोश हो गया है क्योंकि आज भाजपा के पास मुख्यमंत्री बनने लायक एक ऐसा चेहरा है जो नौटंकी करने में नहीं बल्कि काम करने में विश्वास रखता है, जो ईमानदार होने का दिखावा नहीं करता बल्कि वास्तव में ईमानदार है। कुछ लोग किरण जी के नरेंद्र मोदी और भाजपा को लेकर पहले दिए गए बयानों को प्रमुखता से दुनिया के सामने लाने में लग गए हैं मैं उनको बताना चाहता हूँ कि एक समय था जब मैं खुद भी नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं करता था हालाँकि मैंने उनको कभी देखा-सुना नहीं था। निश्चित रूप से मेरे मन में उनकी जो छवि बनी हुई थी वह मीडिया की देन थी लेकिन जब मैंने उनको पहली बार गुजरात विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भाषण करते हुए टीवी पर देखा तो मुझे लगा कि बंदे में दम है और सिर्फ यही एक आदमी माँ भारती की बिगड़ी हुई तकदीर को बदल सकता है। तभी से मैंने बिना किसी लाग-लपेट व बिना किसी शंका-संदेह के उनका समर्थन करना शुरू कर दिया।
मित्रों,हो सकता है कि किरण बेदी जी के साथ भी ऐसा ही हुआ हो क्योंकि आज हमारे देश में जो आशा व उत्साह का माहौल है क्या कोई पिछले साल आज की ही तारीख में कल्पना भी कर सकता था? मैंने तो यहाँ तक लिख दिया था कि भारत में संसदीय प्रणाली फेल साबित हो चुकी है और हमें देर-सबेर अध्यक्षीय शासन प्रणाली को अपनाना ही पड़ेगा लेकिन आज मैं यह कह सकता हूँ कि नरेंद्र मोदी ने कुछ ऐसा जादू भारत की जनता पर कर दिया है कि मुझे यकीन ही नहीं हो रहा है कि भारत में संसदीय शासन प्रणाली है बल्कि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भारत में अमेरिका की तरह ही अध्यक्षीय शासन प्रणाली है।
मित्रों,इसलिए इस विवाद को ज्यादा तूल नहीं दिया जाना चाहिए कि नरेंद्र मोदी को लेकर भूतकाल में किरण बेदी के क्या विचार थे और वर्तमान काल में हमें यह देखना चाहिए कि हम किरण जी की जीवटता और योग्यता से क्या लाभ उठा सकते हैं? हमें किरण जी के राजनीति में पदार्पण को एक अवसर के रूप में लेना चाहिए और उनको अपनी कल्पना को साकार करने का अवसर देना चाहिए। मैं मानता हूँ कि राम-राज्य एक आदर्श है और उसको शत-प्रतिशत प्राप्त करना संभव ही नहीं है फिर भी अगर कोई उस आदर्श को 50 प्रतिशत तक भी प्राप्त कर लेता है तो उसे एक अद्भुत उपलब्धि माना जाना चाहिए और मैं समझता हूँ कि किरण जी भविष्य में उसी दिशा में प्रयास करनेवाली हैं।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 11 जनवरी 2015

समाजवाद बबुआ पहिले भकुआईल रहे अब पगला गईल ह!

11 जनवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,एक समय था जब मैं समाजवादियों की काफी कद्र करता था। मेरे चाचा जो खुद भी समाजवादी थे ने वर्षों पहले एक बार मुझे समझाया था कि समाजवाद का मतलब होता है रामजी के चिरई रामजी के खेत,खा ले रे चिरई भर-भर पेट। उनके कथनानुसार समाजवादी समाज से गैरबराबरी को समाप्त कर समरस समाज की स्थापना करना चाहते हैं। परन्तु 1990 के बाद वही चाचा कहने लगे कि समाजवाद बबुआ भकुआ गईल ह। अब बिहार,हरियाणआ और यूपी में समाजवादियों का ही शासन था। शासन क्या था दुश्शासन था। सत्ता में आने के बाद समाजवादियों ने समाज में समरसता की स्थापना के स्थान पर अपनी जाति के शासन की स्थापना कर डाली। आज भी यूपी और बिहार की माटी का कण-कण यही गाता हुआ लग रहा है कि हमें तो लूट लिया मिल के समाजवादियों ने। यूपी-बिहार के समाजवादियों ने घोटालों की झड़ी लगा दी। हरियाणा भी अपवाद नहीं रहा और वहाँ के चौटाला जी आज भी अपनी ठंडी रातें जेल में काट रहे हैं।
मित्रों,क्या विडंबना है कि जिन बातों को लेकर समाजवादी पुराने शासकों की सामंतवादी कहकर आलोचना किया करते थे शासन में आने के बाद वे खुद वही सब कहीं ज्यादा चढ़-बढ़कर करने लगे। यूपी में जब मुलायम सिंह यादव को जन्मदिन मनाना होता है तो वे इसे सादे तरीके से नहीं मनाते बल्कि वे रामपुर की सड़कों पर विक्टोरिया की फिटन पर सवार होकर निकलते हैं। जब मुलायम परिवार को नया साल मनाना होता है तो वे इसे गरीबों को ठंड से बचाने का इंतजाम करते हुए नहीं मनाते बल्कि सैफई में अरबों रुपये फूंककर महामहोत्सव का आयोजन करते हैं जिसमें मोनिका बेदी ठुमके लगाती है,ऋत्विक रौशन संगीत और नृत्य की शमाँ को रौशन करते हैं। इस साल भी पूरे भारत में ठंड लगने से सबसे ज्यादा गरीब यूपी में ही मरे हैं लेकिन समाजवाद को अब गरीबों की चिंता नहीं है बल्कि वो तो मोनिका बेदी के साथ ठुमके लगाने में मशगूल है। इसी तरह समाजवाद को बलत्कृत अबलाओं की भी चिंता नहीं है बल्कि वो तो बलात्कार को बच्चों की छोटी-मोटी शरारत मानता है। इसी तरह कभी गैरबराबरी को समाप्त करने की चिंता करनेवाले समाजवादियों को आज दलितों की कोई चिंता नहीं है क्योंकि वे इनको वोट ही नहीं देते। समाजवाद सैफई के ठुमकों पर हो-हल्ला होने पर गजब की बेशर्मी से कहता है कि इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। जब हम छोटे थे तब हमारे गांव में शादियों में नर्तकियों को नचाया जाता था लेकिन इससे हमारे गांव में तो पर्यटन को बढ़ावा नहीं मिला?
मित्रों,इन दिनों हमारे देश के समाजवाद को एक नई चिंता ने ग्रसित कर लिया है और वह चिंता है भाजपा और नरेंद्र मोदी के विजय रथ को रोकने की। लेकिन इसके लिए सैफई में ठुमके लगाता समाजवाद ठुमकों को रोककर सुशासन की स्थापना नहीं करता बल्कि कलम-कॉपी लेकर हिसाब लगाता है कि अगर हम-तुम हाथ मिला लें तो तुम्हारा वोट-बैंक और मेरा वोट-बैंक मिलकर हमारा वोट-बैंक इतना हो जाएगा और चुनाव जीतने के बाद हमारा बैंक-बैलेंस इतना। अब समाजवाद न सिर्फ भकुआ गया है बल्कि लंपट,सत्तावादी,सामन्तवादी और भ्रष्ट हो गया है। समाजवाद पहले कहता था कि राष्ट्रपति हो या गरीबों की संतान,सबको शिक्षा मिले एक समान लेकिन आज समाजवाद को गांवों में शिक्षा के स्तर को सुधारने की चिंता नहीं है बल्कि बच्चों के बीच लैपटॉप,साईकिल और छात्रवृत्ति बाँटकर चुनाव जीतने की चिंता है। आज मुलायम सिंह यादव का बेटा-पोता गांव में गरीबों के साथ टूटे हुए बेंचों और टाट पर बैठकर पढ़ाई नहीं करता बल्कि अमेरिका-इंग्लैंड जाकर हार्वर्ड और कैंब्रिज में अध्ययन करता है। इसी तरह से कभी समाजवाद कहता था कि हम उन घरों को रौशन करने आए हैं जिनमें सदियों से अंधेरा है मगर आज समाजवाद कहता है कि हम जिसकी सरकार रहे उसी के साथ हो लेने के लिए आए हैं ताकि बराबर सत्ता की मलाई चाभने को मिलती रहे। अब नई परिभाषानुसार गाँव,गरीब और गौ की चिंता करना समाजवाद नहीं है बल्कि चुनाव जीतकर सत्ता में आना,पुराने राजाओं की तरह राज भोगना,अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को गुंडागर्दी-मनमानी करने की पूरी छूट दे देना और फिर उनके बल पर चंबल के लुटेरों की तरह लूट मचाना समाजवाद है। मेरे चाचा कहते हैं कि बबुआ समाजवाद अब भकुआईल नईखे बाकिर सत्ता के नशीला दारू पीके पगला गईल ह।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 4 जनवरी 2015

PK आरोप है या आलोचना?

4 जनवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जबसे राजू हिरानी की फिल्म पीके आई है पूरे देश में कुछ लोगों ने हड़कंप मचाया हुआ है। उनको लगता है जैसे हिन्दू धर्म लाजवंती का पौधा है जो छूते ही मुरझा जाएगा और उसके ऊपर इस एक फिल्म के चलते संकट पैदा हो गया है। जबकि तलवारों और तोपों के बल पर हिन्दू धर्म को हजारों ISIS सदृश आक्रान्ता नहीं मिटा सके तो सिर्फ शब्दों और तर्कों के कारण हिन्दू धर्म को कैसे खतरा पैदा हो सकता है? फिर हिन्दू धर्म में तो हजारों सालों से बहस और शास्त्रार्थ की परंपरा रही है फिर आज क्यों हमें आलोचनाओं के द्वारों को बंद कर देना चाहिए? क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि दूसरे धर्म वाले अपने मामले में ऐसा करने की ईजाजत नहीं देते? अगर हम ऐसा करते हैं तो फिर हममें और उनमें क्या फर्क रह जाएगा? क्या तब हम भी लकीर के फकीर नहीं कहे जाएंगे? क्या हम भी मध्ययुगीन जानवर बनकर नहीं रह जाएंगे?
मित्रों, अभी कल ही भारत के प्रधानमंत्री ने भारत के लोगों से अपील की कि लोगों को आलोचना करनी चाहिए न कि आरोप लगाने चाहिए। इस बयान के संदर्भ में आज हम इस बात पर विचार करेंगे कि फिल्म PK में हिन्दू धर्म पर आरोप लगाए गए हैं या उसकी आलोचना मात्र की गई है? जहाँ तक मैं समझता हूँ कि PK में हिन्दू धर्म में कायम पाखंडवाद पर करारा प्रहार किया गया है न कि हिन्दू धर्म पर। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमने अपने भगवान की हत्या कर दी है और पैसे को ही भगवान बना दिया है और फिल्म पीके में हमारे इसी पतन को रेखांकित किया गया है जो किसी भी तरह से गलत नहीं है। PK के निर्माता-निर्देशक ने बस एक ही गलती की है कि उसने सिर्फ हिन्दू धर्म में बढ़ते पाखंडवाद को ही निशाने पर रखा है जबकि उसको अन्य धर्मों में फलते-फूलते पाखंडवाद पर भी बराबर की चोट करनी चाहिए थी। कुछ इसी तरह की फिल्म ओ माई गॉड भी थी लेकिन उसमें सारे धर्मों की एक साथ आलोचना की गई थी। अगर PK के निर्माता-निर्देशक भी इतनी सावधानी रखते तो आज उनको हिन्दुओं का इतना सख्त विरोध नहीं झेलना पड़ता। मेरी समझ में यही एक कारण है जिससे कि कई हिन्दुओं को फिल्म में आलोचना के तत्त्व कम और आरोप के तत्त्व ज्यादा दिखाई दे।
मित्रों,इसलिए मैं नहीं समझता कि फिल्म PK को प्रतिबंधित कर देना चाहिए लेकिन मैं राजू हिरानी को यह सलाह जरूर देना चाहूंगा कि जब भी वे इस तरह के संवेदनशील विषय पर फिल्म बनाएँ तो इस बात का आवश्यक रूप से ख्याल रखें कि फिल्म एकतरफा या किसी एक ही धर्म की आलोचना करती हुई नहीं हो क्योंकि पाखंड और झूठ सभी धर्मों और पंथों में है और कई धर्म और पंथ तो ऐसे हैं जिनमें सुधार और परिवर्तन की आवश्यकता हिन्दू धर्म से कहीं ज्यादा है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

भारतीय इतिहास का प्रस्थान विन्दु था 2014

31 दिसंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कुछ वक्त ऐसे होते हैं जो बिना कोई हलचल मचाए ही इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं जबकि कुछ लम्हे ऐसे भी होते हैं जो इतिहास को ही बदल देते हैं। साल 2014 भी ऐसा ही साल था जिसमें न केवल भारत के इतिहास को बल्कि पूरी दुनिया के वर्तमान और भविष्य को बदलकर रख देने की क्षमता थी। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले पूरे भारत में निराशा-ही-निराशा का माहौल था और ऐसा लग रहा था जैसे भारत एशिया का नया मरीज बनने जा रहा है। केंद्र सरकार में रोज-रोज नए-नए घोटाले सामने आ रहे थे जो नित नए-नए रिकॉर्ड बना रहे थे। छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों ने हुआँ-हुआँ करके ऐसा माहौल बना दिया था जैसे कि हिन्दू धर्म में जन्म लेना ही अपराध हो। रजिया और डायना के लिए तो सरकार के पास एक-से-एक योजना थी लेकिन कहीं ज्यादा अभावों में जी रही राधा के लिए कुछ भी नहीं था।
मित्रों,फिर आया लोकसभा चुनाव,2014। लगभग पूरे भारत के हिन्दू एकजुट हो गए और पहली बार भारत में किसी हिन्दुवादी दल को लोकसभा में अपने बल पर बहुमत प्राप्त हुआ। भारत में रक्तहीन क्रांति हो गई जो बारास्ता ईवीएम संपन्न हुई। आज हम विलियम वर्ड्सवर्थ की तरह जिसने कभी फ्रांस की क्रांति के बारे में कहा था कि उस काल में जीवित होना ही बहुत बड़ी बात थी और युवा होना तो स्वर्गिक अनुभव था, की तरह कह सकते हैं कि उस चुनाव के समय भारत में होना ही बहुत बड़ी बात थी और मतदान करना तो स्वर्गिक अनुभव था। वर्ष 2014 की यह इकलौती यादगार घटना हो ऐसा भी नहीं है। भारत की जनता ने इस चुनाव के बाद भी विभिन्न विधानसभा चुनावों में भाजपा को शानदार जीत देकर राज्यसभा में पार्टी के बहुमत की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाया है।
मित्रों,यद्यपि अभी केंद्र सरकार को सत्ता में आए ज्यादा दिन नहीं हुए हैं लेकिन इस अल्पकाल में भी आज पूरी दुनिया में भारत का डंका बज रहा है। एक बार फिर से स्वदेशी का जोर बढ़ने लगा है,भारत को दुनिया की फैक्ट्री बना डालने की दिशा में जोर-शोर से कोशिश हो रही है,सरकार में कहीं कोई घोटाला नहीं है,कानून का बोझ कम किया जा रहा है,देश के गणमान्य लोगों ने झाड़ू उठा लिए हैं,भारत दुनिया के सारे देशों के साथ आँखों में आँखें डालकर बात कर रहा है,पूंजी निवेश को आसान बनाया जा रहा है,नए उद्यमों की स्थापना को आसान बनाने के प्रयास काफी तेजी से और शिद्दत से किए जा रहे हैं,युवाओं को भिक्षा के स्थान पर शिक्षा और रोजगार देने के इंतजामों में सरकार लग गई है।
मित्रों,किसी भी एक साल में भारत की दशा और दिशा में इतना बदलाव नहीं आया जितना कि वर्ष 2014 में। इस मामले में यह साल निश्चित रूप से सन् 1947 और 1974 से भी ज्यादा क्रांतिकारी और परिवर्तनकारी रहा। सबसे बड़ी बात तो यह रही कि इस क्रांति को अंजाम तक पहुँचाया स्वयं भारत की सवा सौ करोड़ जनता ने। अगर जनता जागरुक नहीं हुई होती तो एक तो क्या एक हजार नरेंद्र मोदी भी व्यवस्था तो क्या सत्ता तक को भी नहीं बदल पाते और आज भी देश में देशविरोधी,हिन्दूविरोधी तत्त्वों का शासन होता।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)