मंगलवार, 2 सितंबर 2014

पूरे तंत्र के सड़ जाने का प्रतीक है रंजीत कोहली उर्फ रकीबुल हसन

2 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अभी तक हमारे देश में जो भी आपराधिक मामले सामने आ रहे थे सौभाग्यवश उनका संबंध तंत्र के किसी एक या दो हिस्से से होता था। इसलिए अब तक चर्चा राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टाचार के सर्वव्यापीकरण तक ही सीमित होती थी लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे देश में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी आपराधिक घटना का आयाम एक साथ समाज.खेल,विधायिका,न्यायपालिका और कार्यपालिका तक विस्तृत हो। तो क्या हमारा संपूर्णता में नैतिक पतन हो गया है या फिर नहीं हुआ है तो क्या होने नहीं जा रहा है? पहले जहाँ रिश्वत में पैसे लिए जाते थे अब पैसों के साथ ही सेक्स का लिया जाना क्या दर्शाता है? क्या हमारा महान भारतीय समाज अब मनुष्य के और भी तीव्र पशुकरण के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो गया है?
मित्रों,यह कितने आश्चर्य का विषय है कि एक अदने-से शातिर युवक ने पैसे और सेक्स के दम पर मात्र चार-पाँच सालों में इतना लंबा-चौड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया जितना बनाने में ईमानदार व्यक्ति की कई पीढ़ियाँ खप जातीं! उसके घर पर राजनीतिज्ञों की परेड लगती है,पुलिस अधिकारी उसकी कृपा पाने के लिए तरसते हैं,जज उससे पूछ कर फैसला लिखते और करते हैं और राजपूत समाज की एक विश्वप्रसिद्ध बेटी का बाप बिना गहराई से खानदान की जाँच-पड़ताल किए सिर्फ उसके रुतबे को देखकर अपनी बेटी की शादी उसके साथ कर देता है। समाज और तंत्र के सबसे निचले स्तर से सबसे ऊपरी स्तर तक पतन-ही-पतन।
मित्रों,हमने तो सुना था कि सबहिं नचावत राम गोसाईं मगर यह कैसा युग आ गया है कि सबहिं नचावत रंजीत कोहली उर्फ रकीबुल हसन? कल्पना की जा सकती है कि रकीबुल के नजदीकी जज किस तरह न्याय करते होंगे,उसके नजदीकी पुलिस अधिकारी किस प्रकार से पुलिसिया जाँच को सही परिणति तक पहुँचाते होंगे और उसके इशारों पर नाचनेवाले मंत्री किस तरह से झारखंड में सुशासन यानि गुड गवर्नेंस की स्थापना के लिए प्रयत्नशील रहे होंगे! यहाँ रकीबुल के तीव्र उत्थान के लिए हमारा समाज भी कम दोषी नहीं है जो आज धर्म और ईमानदारी पर चलनेवालों को नहीं बल्कि धनवानों को पूजने लगा है और उनको ही अपना आदर्श मानने लगा है। जिस समाज के लिए साधन की पवित्रता आज बेमानी हो चुकी है और सबको सिर्फ और सिर्फ पैसा और शारीरिक सुख चाहिए वह समाज अंत में वहीं तो पहुँचेगा जहाँ उसको रंजीत कोहली उर्फ रकीबुल ने पहुँचाया है। मैं नहीं जानता कि तारा शाहदेव के पिता को इस होनहार लड़के के बारे में किसने बताया था लेकिन उनको लड़के के गोत्र और खानदान के बारे में विस्तार से पता तो लगाना ही चाहिए था। फिर जिन लड़कियों का इस्तेमाल रंजीत उर्फ रकीबुल अफसरों के आगे परोसने में करता था वह भी तो आखिर किसी की बेटी होंगी। कदाचित् ऐसी बेटी जो मैडोना और सनी लियोन को अपना आदर्श मानती हैं और जिनके लिए नैतिकता का कोई मूल्य नहीं है। जिनके मन में एकसाथ सिर्फ पैसों और वासना की भूख है।
मित्रों,आखिर हमारा भारतीय समाज किस मार्ग पर जा रहा है? क्या इस मार्ग पर चलकर हम भारत को विश्वगुरु बनाएंगे? क्या प्राचीन काल से पूरी दुनिया में भारत का सम्मान इन्हीं घोर प्रवृत्तिवादी प्रवृत्तियों को लेकर रहा है? क्या भारत की ऋषि-मुनियों की संतानों को पश्चिम के चिर-असभ्य समाज की आँखें बंद कर नकल करनी चाहिए? कभी स्वामी विवेकानंद ने सत्कर्म और अकर्म की परिभाषा देते हुए कहा था कि जो कर्म हमें ईश्वर के निकट ले जाए वह कर्त्तव्य है और जो ईश्वर से दूर ले जाए वह अकर्त्तव्य है। मैं मानता हूँ कि प्रत्येक भारतीय को भारत के उस महान सपूत द्वारा दी गई कसौटी पर अपने कर्मों को कसना चाहिए और तदनुसार अपने आपमें सुधार लाना चाहिए। वैसे आप क्या मानते हैं? जबकि हमारे आदर्श ही बदल गए हैं तो फिर कोई क्यों कर कसे खुद को स्वामी विवेकानंद की कसौटी पर और क्यों चले उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर हम जैसे कुछ दीवानों और पागलों को छोड़कर???
मित्रों,ऐसा नहीं है कि भारतीय समाज आज बंद गली के आखिर में आकर फँस गया हो। अपने कई-कई आलेखों में हमने भारतीय समाज के नैतिक उत्थान के मार्ग बताए हैं। हमने बार-बार कहा है कि हमें अपने बच्चों को संस्कृत और संस्कृति की शिक्षा देनी होगी,इस्लाम का भारतीयकरण करना होगा लेकिन जब अभिभावक ही पैसों और तीव्र भोगवाद के पीछे अंधी दौड़ लगाने में लगे हों तो फिर उनसे हमारे सुझावों के अनुपालन की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है? जब बिहार जैसे महान राज्य का मुख्यमंत्री कहता है कि मेरे विवाहित बेटे ने एक विवाहित महिला पुलिस अधिकारी के साथ विवाहेतर शारीरिक संबंध स्थापित करके कोई अपराध नहीं किया है तो फिर बेटा क्या कुछ गलत नहीं करेगा क्योंकि तब तो कोई भी गलत काम गलत है ही नहीं?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

बिहार सरकार की वेबसाईट पर मुख्यमंत्री और कई मंत्रियों के गलत नंबर हैं दर्ज

28 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बिहार सरकार के मंत्रियों की हरकतों पर अगर नजर डालें तो वे लोग ऑन लाईन गवर्नमेंस का खूब जिक्र करते हैं। अभी कल-परसों ही जब दिल्ली में प्रधानमंत्री ने डिजिटल इंडिया पर राज्यों के आईटी मंत्रियों की बैठक बुलाई थी तो बिहार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री शाहिद अली खान इस तरह से बिहार सरकार के डिजिटलाईजेशन पर बोल रहे थे मानो इस मामले में बिहार ने बाँकी राज्यों पर मीलों की बढ़त हासिल कर ली हो लेकिन हकीकत तो यह है कि बिहार सरकार की अधिकृत वेबसाईट पर मुख्यमंत्री का फोन नंबर ही गलत दिया गया है। अगर आपने बिहार सरकार की वेबसाईट पर से कोई नंबर नोट किया है तो कृपया जाँच लीजिए कि वह नंबर काम कर भी रहा है कि नहीं।
मित्रों,बिहार सरकार के प्रशासन में न सिर्फ तृणमूल स्तर पर अव्यवस्था का वातावरण है बल्कि उच्च स्तर पर ऐसी ही स्थिति है और बिहार सरकार की वेवसाईट भी इसका अपवाद नहीं है। उदाहरण के लिए बिहार सरकार की मुख्य वेबसाईट पर बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के कार्यालय के जो दो फोन नंबर 0612-2223886 और 2224784 दिए गए हैं वे दोनों ही नंबर गलत हैं और काम नहीं करते हैं। इसी तरह बिहार सरकार में पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग की वेबसाईट पर विभागीय मंत्री वैद्यनाथ सहनी का जो नंबर दिया गया है 0612-2230496 भी गलत नंबर है तो भवन निर्माण विभाग की वेबसाईट पर भवन निर्माण मंत्री दामोदर राऊत और कला संस्कृति एवं युवा विभाग के मंत्री विनय बिहारी का नंबर ही नहीं दिया गया है लगता है कि मंत्रीजी गोपनीयता में कुछ ज्यादा ही विश्वास रखते हैं।
मित्रों,परिवहन विभाग की वेबसाईट पर विभागीय मंत्री रमई राम का जो नंबर दिया गया है उस पर सेवा अस्थायी रूप से बंद है तो इतिहास में अपना ऊँचा स्थान रखने वाले बिहार के पर्यटन विभाग की वेबसाईट रहस्यमय परीकथा की तरह प्रतीत होती है जिस पर फोटो-ही-फोटो है लेकिन इस विभाग का मंत्री कौन है और उसका नंबर क्या है का कहीं अता-पता नहीं है।
मित्रों,वाणिज्य कर विभाग की तो वेबसाईट खुलती ही नहीं है। बड़े ही दिलचस्प तरीके से सहकारिता मंत्री जय कुमार सिंह  के कार्यालय का वही नंबर दिया गया है जो मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का है 0612-2224784 और जो काम भी नहीं करता। इसी तरह वित्त विभाग की वेबसाईट पर वित्त मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव का जो नंबर दिया गया है वही नंबर मुख्यमंत्री मांझी का भी है-0612-2223886 तो ऊर्जा विभाग की वेबसाईट पर विभागीय मंत्री और मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का जो नंबर दिया गया है वह भी गलत है और लगाने पर यह नंबर मौजूद नहीं है की घोषणा सुनाई देती है। इसी तरह खनन और भूतत्व विभाग के मंत्री रामलखन राम रमन का भी वही नंबर बताया गया है जो मुख्यमंत्री का है जो गलत भी है-2223886।
मित्रों,उद्योग मंत्री भीम सिंह का एक नंबर 0612-2215430 गलत है तो दूसरा नंबर 2215431 सही है। सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की वेबसाईट से विभाग का मंत्री कौन है का पता ही नहीं लगता। पहले इंफॉरमेशन और फिर अबाउट अस पर क्लिक करने पर पता चलता है विभाग के सचिव के रूप में प्रत्यय अमृत हैं। पता नहीं यह जानकारी सही है या गलत लेकिन उनका जो फोन नंबर-0612-2212390 दिया गया वह जरूर गलत है।
मित्रों,सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की वेबसाईट पर कॉन्टैक्ट पर क्लिक करने पर जो पेज खुलता है उस पर सर्च में ऑनरेबल मिनिस्टर डालने पर फिर से वही पेज खुल जाता है और बार-बार कोशिश करने पर भी फिर से खुलता रहता है मगर नंबर नहीं मिलता। संसदीय कार्य मंत्री श्रवण कुमार का तो विभाग की वेबसाईट पर नंबर ही नहीं दिया गया है और वेबसाईट पर दी गई फोन डाइरेक्ट्री का लिंक भी काम नहीं करता है।
मित्रों,पंचायती राज विभाग की वेबसाईट पर विभाग के मंत्री विनोद प्रसाद यादव का नंबर नहीं दिया गया है और न ही यहाँ दिया गया कॉन्टैक्ट्स लिंक ही काम करता है। हाँ वेबसाईट के डाटाबेस लिंक पर क्लिक करके आप राज्य की किसी भी पंचायत,जिला परिषद या पंचायत समिति प्रतिनिधि का नाम और फोन नंबर जरूर प्राप्त कर सकते हैं।
मित्रों,अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण विभाग की वेबसाईट पर विभाग का मंत्री कौन है का पता ही नहीं चलता,Directory पर क्लिक करने पर विभागीय सचिव हुकुम सिंह मीणा का नंबर प्राप्त होता है जो गलत है। इसी तरह की अव्यवस्था की शिकार समाज कल्याण मंत्रालय की वेबसाईट भी है जहाँ महिला मंत्री की तस्वीर तो लगी हुई है लेकिन नाम तक नहीं बताया गया है फोन नंबर तो दूर की बात रही। इसी वेबसाईट पर उपलब्ध एक लिंक मीट द मिनिस्टर पर जाने पर भी न तो मंत्री के नाम का और न ही नंबर का ही पता चल पाता है। वैसे इस विभाग को इन दिनों श्रीमती लेसी सिंह संभाल रही हैं। बिजली विभाग की मनमानी से पूरे बिहार की बिहार की जनता परेशान हैं लेकिन बिहार सरकार को इसकी कोई परवाह नहीं। तभी तो ऊर्जा विभाग और बीएसपीएचसीएल की वेबसाईट पर विभागीय मंत्री श्री जीतनराम मांझी और विभागीय सचिव अमृत प्रत्यय दोनों के ही नंबर गलत हैं। न तो ऊर्जा मंत्रालय की वेबसाईट पर,न तो बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड और न ही नॉर्थ बिहार पावर डिस्ट्रिब्यूशन कंपनी लिमिटेड की वेबसाईट पर ही उपभोक्ताओं के लिए कोई कस्टमर केयर की सुविधा दी गई है। एनबीपीडीसीएल की वेबसाईट पर एक नंबर दिया भी गया है मगर उस पर सिर्फ ट्रांसफार्मर के जलने या काम नहीं करने की ही शिकायत की जा सकती है।
मित्रों,कुल मिलाकर बिहार में किस तरह से शासन-प्रशासन में सूचना प्रौद्योगिकी का सदुपयोग किया जा रहा है का सबसे अच्छा उदाहरण है बिहार सरकार की वेबसाईट। बिहार सरकार में इन दिनों हर स्तर पर हर विभाग में कहीँ भी व्यवस्था नाम की चीज नहीं है। ऐसा हो भी क्यों नहीं जो सरकार अपनी वेबसाईट तक को दुरूस्त नहीं रख पाती हो वो राज्य को कैसे दुरूस्त करेगी और रखेगी?
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

बिहार के उपचुनाव भाजपा के लिए सबक?!

26 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,वैसे तो बिहार में जो दस सीटों के लिए उपचुनाव हुए हैं उनका कोई मतलब नहीं था। इससे सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़नेवाला था और मुझे नहीं लगता कि वर्तमान विधानसभा के बचे हुए एक साल में जीतनेवाले 10 उम्मीदवार अपने क्षेत्र के लिए कुछ खास कर पाएंगे लेकिन फिर भी चुनाव तो चुनाव होते हैं। मैच चाहे लीग स्तर का हो या नॉक आउट,20-20 हो या टेस्ट, जीत जीत होती है और हार हार।
मित्रों,इस साल के लोकसभा चुनावों में जिस तरह एनडीए ने बिहार में विपक्ष का सूपड़ा साफ कर दिया था लगता है कि भाजपा के बिहारी नेता उससे कुछ ज्यादा ही फूल गए। उनको लगा कि बिहार की जनता ने सिर्फ उनको ही वोट दिया है और उसके सामने विकल्पहीनता की स्थिति है। वास्तविकता तो यह है कि उस समय बिहार की जनता ने बिहार की जनता की तरह नहीं बल्कि भारत की जनता के रूप में वोट दिया था। वास्तविकता यह भी है कि उस समय भी एनडीए के पक्ष में कम विपक्ष में ज्यादा मत पड़े थे। फिर उस चुनाव में भाजपा के पास एक मजबूत,प्रतिभासम्पन्न और प्रखर सेनापति मौजूद था। उस समय भाजपा का प्रचार अभियान भी काफी सुव्यवस्थित और सुसंगठित तरीके से चला था।
मित्रों,लगता है कि एनडीए ने इन उपचुनावों को गंभीरता से लिया ही नहीं जबकि महागठबंधन ने इस अपने अस्तित्व का प्रश्न बना लिया था। शायद यह कारण भी था कि भाजपा समर्थक मतदाताओं ने मतदान में कम संख्या में भाग लिया जिसका प्रभाव कुल मतदान की संख्य़ा पर भी पड़ा। 10 सीटों में से 9 सीटों पर सिर्फ भाजपा चुनाव लड़ रही थी और लोजपा ने सिर्फ एक सीट पर और रालोसपा ने तो किसी भी सीट पर लड़ने में अपनी रूचि ही नहीं दिखाई शायद इसलिए उसको अपने बाँकी दो सहयोगी दलों के समर्थकों का मत भी पूरी तरह से नहीं मिल सका। रही-सही कसर टिकट-वितरण में की गई गड़बड़ी ने पूरी कर दी जिससे पार्टी को लगभग हरेक सीट पर बागी उम्मीदवारों का सामना करना पड़ा। उदाहरण के लिए मोहिउद्दीननगर में हमेशा राजद का वोट बैंक ज्यादा मुखर और सशक्त रहा है फिर भी वहाँ भाजपा ने बाहरी उम्मीदवार को खड़ा कर दिया। मतलब भाजपा को अभी भी निचले स्तर तक स्थानीय व जिताऊ उम्मीदवार तलाशने में परेशानी हो रही है जैसा कि 2010 के विधानसभा चुनावों में भी हुआ था और यह निश्चित रूप से पार्टी के लिए चिंता का विषय है। जब किसी पार्टी के पक्ष में लहर चल रही होती है तब ऐरे-गैरे नत्थू खैरे भी जीत जाया करते हैं लेकिन जब लहर नहीं चल रही होती है तब मतदाता उम्मीदवार को भी देखता है और भाजपा ने कई सीटों पर उम्मीदवार चयन में गलतियाँ कीं। इतना ही नहीं पार्टी ने जदयू के बागियों की ताकत को आँकने में भी गलती की और लगातार बेवजह अनाप-शनाप बयान देती रही।
मित्रों,इन उपचुनावों में प्रदेश भाजपा नेतृत्व बिखरा हुआ दिख रहा था। इसी तरह प्रचार अभियान में भी बिखराव था और अव्यवस्था थी। बिहार की जनता यह जानना भी चाहती है कि बिहार के अगले मुख्यमंत्री के लिए भाजपा किसको अपना उम्मीदवार बनाएगी। बिहार में ऐसा कौन-सा भाजपा नेता है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह सीना ठोंककर यह कह सके कि मैं न तो खाऊंगा और न ही खाने दूंगा? है कोई नेता जो कह सके कि मैं न तो सोऊंगा और न ही सोने दूंगा? भाजपा नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी लाख गलतियों के बावजूद भी बिहार की जनता ने उनको दस में से चार यानि सबसे ज्यादा सीटें दी हैं और मत प्रतिशत के मामले में भी वह अकेली सबसे आगे है इसलिए पूरी तरह से हार मान लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है एक सशक्त और तेजस्वी नेतृत्व के हाथों में बिहार भाजपा का सेनापतित्व सौंपने की और फिर सुसंगठित और सुव्यवस्थित तरीके से गहन चुनाव प्रचार करने की। सोशल मीडिया से लेकर जनता से डोर-टू-डोर सीधा संवाद करके उसे बताना होगा कि उसकी झोली में बिहार के लिए कौन-सी योजनाएँ हैं और उन योजनाओं को कैसे प्रभावी तरीके से वह लागू करेगी,कैसे बिहार में वास्तविक सुशासन,पारदर्शिता और ईमानदार शासन-प्रशासन की स्थापना करेगी,कैसे अव्यवस्था,अराजकता और रिश्वतखोरी के प्रति जीरो टॉलरेंसे की नीति अपनाएगी और इन बुराइयों को पूरी तरह से दूर करेगी। इसके लिए बिहार प्रदेश भाजपा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संपर्क कर सकती है लेकिन चूँकि बिहार पूरे भारत के लिए हमेशा से कुत्ते की दुम रहा है इसलिए योजनाओं के क्रियान्वयन और शासन से भ्रष्टाचार और घूसखोरी की समाप्ति के लिए उनको विशेष बिहारी उपाय खोजने होंगे और जनता को विश्वास में लेना होगा। हम जानते हैं कि बिहार भारत के सबसे युवा प्रदेशों में से है। बिहार का युवा आज भी अपने परिवार से हजारों किलोमीटर दूर जाकर नौकरी करने को विवश है,आज भी बिहार सिर्फ श्रमिकों की आपूर्ति करने का काम कर रहा है। कौन ऐसा बिहारी युवा होगा जो अपने घर में परिवार के साथ रहकर रोजी-रोटी कमाना नहीं चाहेगा? बस भाजपा बिहारी युवाओं को विश्वास दिलाए कि हम बिहार को औद्योगिक प्रदेश बनाएंगे और कैसे बनाएंगे बताए।
मित्रों,फाईनल में टक्कर एक बार फिर से काँटे की होनेवाली है इसलिए इंतजाम अभी से ही करने होंगे। बिहार के युवा अभी भी भ्रष्ट व जातिवादी ताकतों के हाथों का खिलौना बनने को तैयार नहीं हैं बशर्ते उनके पास बेहतर और बेहतरीन विकल्प हो और वह विकल्प इस समय सिर्फ भाजपा ही दे सकती है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 25 अगस्त 2014

बिहार में इंटर परीक्षा का अंतिम परिणाम कभी आएगा भी?

25 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बिहार के बारे में विशेषज्ञ लगातार अपनी राय रखते रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि बिहार एक बीमार मानसिकता का नाम है तो कुछेक कहते हैं कि बिहार एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई ईलाज किसी के पास भी नहीं है। चूँकि मैं एक विशेषज्ञ नहीं हूँ इसलिए मानता हूँ कि बिहार नामक बीमारी भले ही 40-50 साल पुरानी हो,भले ही पिछले कई दशकों से बिहार में सरकार और प्रशासन नाम की चीज नहीं रह गई है,भले ही बिहार आज भी दूसरे राज्यों को सिर्फ श्रम की आपूर्ति करनेवाला राज्य बना हुआ है,भले ही बिहार में परीक्षा के नाम पर मजाक होता हो,भले ही बिहार में अंग्रेजी के शिक्षक संस्कृत की और हिन्दी के शिक्षक अंग्रेजी की कॉपियाँ जाँचते हों लेकिन बिहार फिर भी सुधर सकत है,स्वस्थ हो सकता है लेकिन ऐसा इस सरकार में तो कभी नहीं होगा। इसके लिए व्यवस्था परिवर्तन के लिए सत्ता-परिवर्तन करना होगा। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इस समय भी बिहार में जन्म लेना बिहारियों के लिए अभिशाप ही बना हुआ है।

मित्रों,बिहार के करीब डेढ़ लाख विद्यार्थी ऐसे हैं जो बिहार में जन्म लेने और बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा आयोजित इंटर की परीक्षा देने का दंड भुगत रहे हैं। हुआ यह कि इस साल जब इंटर का रिजल्ट आया तो बड़ी संख्या में छात्र फेल कर दिए गए थे। उनमें से कुछ छात्र तो ऐसे थे जो देश की शीर्षस्थ इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थानों की नामांकन परीक्षाओं में टॉप किया था। रिजल्ट आते ही पूरे राज्य में छात्रों ने हंगामा खड़ा कर दिया। जगह-जगह आगजनी होने लगी। तत्कालीन शिक्षा मंत्री पीके शाही ने कहा कि कॉपियाँ फिर से जाँची जाएंगी और छात्रों के साथ न्याय होगा।

मित्रों,जब से पुनर्मूल्यांकन अर्थात् स्क्रूटनी का काम शुरू हुआ बिहार सरकार और बिहार विद्यालय परीक्षा समिति को परीक्षक मिल ही नहीं रहे। डेढ़ लाख छात्रों की 8 लाख कापियों की जाँच के लिए मात्र 125 परीक्षक रखे गए हैं। ऐसे में जो होना चाहिए था वही हुआ। देश के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में नामांकन समाप्त हो चुके हैं। नए सत्र की पढ़ाई भी शुरू हो चुकी है लेकिन रिजल्ट का अभी भी कहीं अता-पता नहीं है। सूत्र बता रहे हैं कि अभी भी कम-से-कम एक छात्रों की कॉपियों की जाँच होनी बाँकी है। ऐसे में छात्रों को जिनका कि एक साल बर्बाद हो चुका है अब जिंदगी खराब होने का खतरा मंडराने लगा है।

मित्रों, जब इन कॉपियों की जाँच की गई थी तब तो सरकार को पर्याप्त संख्या में शिक्षक मिल गए थे फिर अब क्यों नहीं मिल रहे हैं? क्या तब दूसरे विषय के शिक्षकों से दूसरे विषय की कॉपियाँ जँचवाई गई थीं या फिर परीक्षकों ने धड़ल्ले से बिना पढ़े ही नंबर दे दिये? अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर तब इतनी तेजी में कैसे कॉपियों की जाँच हो गई और अब इतनी धीमी गति से क्यों हो रही है? छात्रों को प्राप्त बेतुके अंकों से भी क्या मेरी यह आशंका सत्य साबित नहीं हो रही है?

मित्रों,एक सप्ताह पहले बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के वर्तमान अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद ने दावा किया था कि 10 दिन में परिणाम घोषित कर दिये जाएंगे लेकिन जबकि एक परीक्षक एक दिन में अधिकतम 30 कॉपियों की ही जाँच कर सकता है तो फिर कैसे दस दिन में 5-6 लाख कॉपियों की जाँच हो सकेगी? क्या फिर से उसी तरह से धड़ल्ले से कॉपियों को बिना पढ़े ही जाँच देने की योजना बनाई गई है जैसे कि पहली बार में किया गया था? फिर स्क्रूटनी का मतलब ही क्या है?

मित्रों, अभी भी कॉपियों को स्ट्रांग रूम में मैनेज वे में नहीं रखा गया है जिससे कि एक-एक को निकालने में काफी समय लग रहा है। बीच में समर वैकेशन के कारण लगभग एक महीने बंद रहा था स्कूल जिसके चलते भी कॉपियों की जाँच की गति धीमी पड़ गई। बोर्ड के पास कॉपी चेक कराने के लिए स्पेस की कमी है।
स्कूल एवं कॉलेज खुले होने के कारण बड़ी संख्या में टीचर्स को एग्जामिनर्स बनाने से क्लासेस बंद हो जाएंगे इसके चलते भी समस्या आ रही है। सरकार अगर अमल करना चाहे तो हम सुझाव देते हैं कि सरकार को स्पेशियस सरकारी या प्राइवेट भवन किराए पर लेना चाहिए जहाँ कि ज्यादा संख्या में परीक्षक कॉपियों की जाँच कर सकें। परीक्षकों की संख्या बढ़ाई जाए। जरुरत के हिसाब से हर जिले में री-चेकिंग सेंटर बने और आगे से इंटर और मैट्रिक की परीक्षाओं से कदाचार को तो समाप्त किया ही जाए कॉपियों की जाँच की प्रक्रिया को भी इस तरह से चुस्त-दुरूस्त किया जाए कि बिहार में जन्म लेना और बिहार विद्यालय परीक्षा समिति पर विश्वास करना अभिशाप नहीं बन पाए।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 24 अगस्त 2014

आइडिया इंटरनेट जब लगाविंग,आइडिया तुमको उल्लू बनाविंग

24 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,विज्ञापन की दुनिया बड़ी आकर्षक है। अच्छे-अच्छे समझदार भी इनके झाँसे में आने से नहीं बच पाते। उदाहरणार्थ,आइडिया कंपनी कहती है कि आइडिया इंटरनेट जब लगाविंग,नो उल्लू बनाविंग,नो उल्लू बनाविंग अर्थात् जब आप आइडिया इंटरनेट लगा लेते हैं तो कोई आपको उल्लू नहीं बना सकता लेकिन कंपनी यह नहीं बताती कि हम तो आपको उल्लू बना ही सकते हैं और जरूर बनाएंगे।
मित्रों,हुआ यूँ कि रक्षाबंधन यानि 10 अगस्त से एक-दो दिन पहले मैं अपने मित्र नरेश राय जिनकी मोबाईल रिचार्चिंग की दुकान में बैठा था तभी मेरी नजर दुकान में चिपकाए गए आइडिया के पोस्टर पर पड़ी जिसमें बताया गया था आइडिया मात्र 197 रुपये में एक महीने के लिए अनलिमिटेड इंटरनेट उपयोग की सुविधा देती है। मैंने तत्काल आइडिया का एक सिम ले लिया जो 8 तारीख को चालू भी हो गया। नंबर है 9507489439। नौ अगस्त को मैं बक्सर जिले के छतनवार गांव गया जहां कि मेरी बड़ी बहन रहती है। वहाँ जाकर पता चला कि वहाँ आइडिया का टावर था इसलिए आइडिया ही सबसे अच्छा काम करता था। मैंने तत्काल नरेश जी को फोन किया और कहा कि 197 वाला पैकेज डाल दीजिए। सचमुच वहाँ आइडिया काफी अच्छा काम कर रहा था।
मित्रों,मैं 11 तारीख को हाजीपुर वापस आ गया। कल मैं जब एसएमएस चेक कर रहा था तो मैंने पाया कि मेरा 50 एमबी जीपीआएस डाटा आइडिया कंपनी पर बकाया है। मैंने तुरंत बताए गए नंबर पर फोन कर दिया। करीब आधे घंटे में 50 एमबी डाटा समाप्त हो गया परंतु यह क्या उसके बाद आइडिया इंटरनेट ने काम करना ही बंद कर दिया। मैं परेशान हो गया कि यह क्या हुआ। फिर मैंने 198 पर कस्टमर केयर पर कॉल किया तो फोन उठानेवाली महिला ने बताया कि चूँकि आपने 50 एमबी फ्री डाटा लिया है इसलिए आपकी सेवा बंद कर दी गई है। मैंने पूछा कि ऐसा कैसे हो सकता है मुझे तो एक महीने का वादा किया गया था तो उसने कहा कि कंपनी का यही नियम है इसलिए ऐसा किया गया है। यानि फ्री के फेर में पड़े तो पेड भी गया।
मित्रों,फ्री डाटा वाले एसएमएस में यह कहीं नहीं कहा गया था कि ऐसा भी हो सकता है और मैं उल्लू बनाया जा सकता हूँ लेकिन सच्चाई तो यही है कि जिस कंपनी ने पूरे भारत को ठगी से मुक्त करने का बीड़ा उठाया है उसी ने मुझे ठग लिया। सावधान रहिएगा ऐसा आपके साथ भी हो सकता है क्योंकि इन कंपनियों का कोई ईमान नहीं होता। यह बोलतीं कुछ है और करतीं कुछ और। खुद ही इंडिया को उल्लू बनाती हैं और कहती हैं कि हम आपको उल्लू बनने नहीं देंगे।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 23 अगस्त 2014

भंते, बिहार सरकार में बुद्धि की कमी है!

23 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आपने का वर्षा जब कृषि सुखानि वाली कहावत तो सुनी होगी लेकिन हमें पूरी तरह से यकीन है कि इस पर कभी अमल नहीं किया होगा लेकिन हमारे बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी इस पर न सिर्फ यकीन रखते हैं बल्कि इस पर अमल भी करते हैं। तभी तो उन्होंने कहा है कि बरसात के बाद बिहार उन सभी बांधों की मरम्मत करवाई जाएगी जिनकी पिछली कई वर्षों या महीनों से मरम्मत नहीं हुई। वाह कमाल है! क्या तरीका है शासन चलाने का। मुजफ्फरपुर में बागमती नदी पर बने बांध के टूटने से लेकर यहाँ बिहार में रोज कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी नदी का बांध टूट रहा है। कल भी सीवान में सरयू नदी पर बना मिर्जापुर बांध टूटा है। नीतीश कुमार जी उर्फ सुशासन बाबू के गृह जिले नालंदा में तो अब शायद ही कोई बांध टूटने से बच गया हो। इस साल बाढ़ से सबसे ज्यादा वही नालंदा जिला प्रभावित हुआ है जिसके बारे मैंने जबसे होश संभाला है नहीं सुना कि वहाँ बाढ़ भी आती है और बिहार के निवर्तमान मुख्यमंत्री बिहार की जनता को भरोसा दे रहे हैं कि घबराईए नहीं बस कुछ ही दिनों की बात है। कुछ दिन और कष्ट बर्दाश्त कर लीजिए फिर बरसात के रुकते ही सरकार सारे तटबंधों की मरम्मत करवा देगी। मगर उससे क्या फायदा होगा और किसको फायदा होगा? ठेकेदार दस-बीस टोकरी मिट्टी डालकर काम पूरा कर लेंगे और इंजीनियर कमीशन पाकर लिख देंगे कि फलां ठेकेदार ने इतने करोड़ का काम किया और अगले साल फिर से वही बांध टूट जाएंगे। मुख्यमंत्री खुद कहते हैं कि ओवर एस्टिमेट बनाकर अधिकारी-कर्मचारी सरकारी खजाने को चूना लगा रहे हैं। क्या उनका कह देना भर काफी है? इस लूट को रोकेगा कौन? कई जिलों से रिपोर्ट आई है कि उनके यहाँ कोई बांध नहीं है जबकि उन्हीं जिलों में जमींदारी बांधों की देखभाल के नाम पर करोड़ों रुपयों के वारे-न्यारे कर दिये गए। ईट हैप्पेन्स ऑनली ईन बिहार।

मित्रों,राजधानी पटना में तो कोई बांध नहीं टूटा फिर वहाँ क्यों बाढ़ जैसे हालात बने हुए हैं? पटना में भी हर साल बरसात में जलनिकासी प्रणाली फेल हो जाती है और लोगों के घरों तक में पानी घुस जाता है क्या उसके लिए बिहार सरकार के पास कोई कार्ययोजना है? पिछले 9 सालों में पूरे पटना में नालियों का निर्णाण करवाया गया फिर भी हालत में सुधार क्यों नहीं हो रहा? क्यों करोड़ों रुपये नालियों के निर्माण और रखरखाव के नाम पर नालियों में बहा दिए गए?

मित्रों,बिहार की सरकार को किसने रोका था,किसने जबर्दस्ती उसके हाथ-पांव बांध रखे थे बरसात से पहले ही बांधों की मरम्मत करने से? क्या बरसात के बाद बांधों की मरम्मत की जाती है अगर हुई तो और मांझी को अपना यह अद्भुत वादा याद रह गया तो? क्या इस तरह चलती है सरकार? इससे पहले जब राज्य में सूखे से आसार बन रहे थे तब पता चला कि राज्य के 99 प्रतिशत सरकारी नलकूल कई सालों से बंद पड़े हैं और इस साल भी सरकार उनमें से एक को भी चालू नहीं करवा पाई। क्या इस तरह की जाती है प्राकृतिक आपदा से निबटने की तैयारी कि सूखा आए तो सारे नलकूप खराब और बाढ़ आए तो एक-एक कर सारे बांध टूट जाएँ? क्या बिहार सरकार के पास अब कामचलाऊ बुद्धि भी नहीं रह गई है? साहित्यकार श्रीकांत वर्मा ने तो अपनी कविता में कोशल के बारे में कहा था कि कोशल ज्यादा दिन टिक नहीं सकता क्योंकि वहाँ विचारों की कमी है लेकिन यहाँ तो बिहार सरकार में बुद्धि की ही कमी हो गई है विचार तो फिर भी दूर की कौड़ी हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 19 अगस्त 2014

कमाल खान इन्सान हैं या पत्रकार या सिर्फ मुसलमान?

19 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इसमें कोई संदेह नहीं कि एनडीटीवी के रिपोर्टर कमाल खान कमाल के रिपोर्टर हैं। उनके बोलने का लहजा और शब्दों का चयन दोनों ही लाजवाब है लेकिन आज जब मैं फैजाबाद सामूहिक दुष्कर्म और बेरहमी से,तड़पा-तड़पा कर एक लड़की की हत्या के मामले में उनकी रिपोर्ट देख रहा था तो लगा कि भले ही इन दोनों मामलों में कमाल खान कमाल हैं लेकिन वे कदाचित् इंसान हैं ही नहीं।
मित्रों,जहाँ तक मेरी परिभाषा का सवाल है तो मैं यह मानता हूँ कि इंसान वही है जो सीने पर बंदूक टिकी होने पर भी,तोप के आगे बांध दिए जाने के बाद भी पीड़ितों का पक्ष ले न कि पीड़कों का और आज की अपनी रिपोर्ट में कमाल खान सीधे-सीधे पीड़कों का पक्ष ले रहे थे। श्री खान का मानना था कि यह मामला एक व्यक्तिगत मामला है क्योंकि पीड़क व दरिंदा नदीम बता रहा है कि हिन्दू लड़की उससे प्यार करती थी और उसकी मोबाईल की दुकान पर बराबर पैसा भरवाने आती थी। इधर कुछ दिनों से लड़की उस पर शादी के लिए दबाव डाल रही थी इसलिए उसने उससे छुटकारा पाने के लिए उसकी हत्या कर दी और बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी। तो हमारे कमाल के धर्मनिरपेक्ष कमाल खान ने बिना किसी हीला-हवाली के इस दरिंदे की बात पर विश्वास कर लिया और अपना निर्णय सुना दिया कि यह मामला सांप्रदायिक तो है ही नहीं बल्कि व्यक्तिगत है।
मित्रों,दूसरी तरफ दिवंगत पीड़िता ने पुलिस को अपने अंतिम बयान में कहा था कि फलां-फलां चार मुसलमान लड़कों ने मेरा जबर्दस्ती अपहरण किया फिर सामूहिक बलात्कार किया और बाद में उसके सारे बाल उखाड़ डाले,सारे दाँत तोड़ दिए और रीढ़ की हड्डी के भी टुकड़े-टुकड़े कर दिया लेकिन कमाल खान जी को पीड़िता की बातों पर किंचित भी भरोसा नहीं है। क्यों? क्या इसलिए क्योंकि पीड़िता हिन्दू थी और हिन्दू तो झूठ ही बोलते हैं सच तो सिर्फ मुसलमान बोलते हैं? अब आप खुद भी निर्णय ले सकते हैं कि मेरी परिभाषा के अनुसार कमाल खान इंसानियत से कोसों दूर हैं। तो फिर कमाल खान हैं क्या? क्या वे पत्रकार हैं? लेकिन पत्रकार तो प्रत्येक मामले को सिर्फ गुण-दोष के आधार पर देखता है तो इस तरह तो कमाल खान जी तो पत्रकार भी नहीं रहे। यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि यह मेरी परिभाषा है अब उनकी परिभाषा में पत्रकार को कैसा होना चाहिए यह तो वही बता सकते हैं।
मित्रों,हमारे कमाल खान जी वास्तव में न तो पत्रकार हैं और न ही इंसान वे तो सिर्फ मुसलमान हैं और मुसलमान भी कैसे? वे सूफी परंपरा वाले मंसूर बिन हल्लाज किस्म के मुसलमान नहीं हैं जिनको सऊदी अरब में अन हलक अर्थात् ब्रह्मास्मि की रट लगाने के चलते जिन्दा आग में झोंक दिया गया था,श्री खान इमाम हुसैन की तरह के मुसलमान भी नहीं हैं जिन्होंने पीड़ितों का पक्ष लेते हुए कर्बला के मैदान में बेनजीर शहादत दी थी। बल्कि श्री कमाल खान तो तालिबान,बोको हराम और आईएस किस्म के मुसलमान हैं जिनके अनुसार मुसलमान (खासकर सुन्नी) जो करे वही सही है और सिर्फ वही सही है। अन्यथा श्री खान को पीड़िता के दर्द के प्रति स्वानुभूति तो दूर सहानुभूति तो होती। उनके बोलने के लहजे से और बॉडी लैंग्वेज से तो यही लग रहा था कि पीड़िता जो कि एक प्रेंमिका भी थी (सिर्फ दरिंदे नदीम और महान पत्रकार कमाल खान के अनुसार) को शादी के लिए कहने का कोई अधिकार नहीं था और चूंकि उसने यह अक्षम्य अपराध किया इसलिए नदीम का कर्त्तव्य था कि वो निहारत बहसीपना करके उसकी हत्या कर दे और सो उसने अपना कर्त्तव्य निभाया। फिर तो नदीम को राजकीय सम्मान मिलना चाहिए। है न कमाल खान जी?
मित्रों,मैं कमाल खान जी से पूछना चाहता हूँ कि अगर ऐसी हरकत किसी हिन्दू चांडाल चौकड़ी ने किसी मुसलमान लड़की के साथ किया होता तब भी क्या यह व्यक्तिगत मामला होता? वैसे मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि महिला चाहे हिन्दू हो या मुसलमान और पीड़क चाहे हिन्दू हो मुसलमान मेरा मानना है कि हर महिला का दर्द एकसमान होता है और हर पीड़क को सिर्फ एक ही दंड देना चाहिए-सड़क पर खड़ा करके पत्थरों से मार देना चाहिए और ऐसा होने पर पहला पत्थर मैं मारूंगा। तो मैं कह रहा था कमाल खान जी महाराष्ट्र सदन में रोटी खिलाने की घटना तो कमाल खान जी की नजरों में सांप्रदायिक थी लेकिन फैजाबाद का इंसानियत को शर्मसार कर देनेवाली घटना व्यक्तिगत है? हिन्दू लड़कियों को घर से निकलने से पहले लाख बार सोंचने को मजबूर और भयभीत कर देनेवाली घटना व्यक्तिगत है? वाह रे हमारे धर्मनिरपेक्ष चैनल,धर्मनिरपेक्ष पत्रकार और उनकी धर्मनिरपेक्षता। एक बात और आगे से जब भी किसी हिन्दू लड़की के साथ मुसलमानों द्वारा सामूहिक बलात्कार होगा तो धर्मनिरपेक्ष मीडिया,यूपी पुलिस और दरिंदे मिलकर यही कहेंगे कि लड़की लड़के से प्यार करती थी और ऐसे प्यार का अंजाम जो होना चाहिए वही हुआ। मतलब कि बलात्कार तो हुआ ही नहीं वह तो प्यार था यह बात अलग है कि इसे कई मानवता प्रेमी प्रेमियों ने मिलकर अंजाम दिया। यह ज्ञान आज मुझे श्री कमाल खान की रिपोर्टिंग देखकर ही प्राप्त हुआ है जिसके लिए मैं उनका बहुत-बहुत-बहुत-बहुत आभारी हूँ। तहेदिल से!


(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

पारस को खोजती पूरे एक महीने बाद पहुँची पुलिस घटनास्थल पर

08-08-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हमने कुछ महीने पहले पढ़ा था कि अमेरिका में किसी की लिखी हुई चिट्ठी अपने गन्तव्य तक लगभग 100 साल बाद पहुँची लेकिन हमारी बिहार पुलिस और खासकर वैशाली पुलिस तो उस चिट्ठी से भी ज्यादा सुस्त है। हमने 16 जुलाई को लिखा था कि एफआईआर दर्ज करा के पछता रहा है पारस और बताया था कि 11 जुलाई की रात को चोरी हुई और 16 तारीख तक पुलिस का कहीं अता-पता नहीं था जबकि पारस का पड़ोसी होने के नाते मैं कई-कई बार वैशाली के पुलिस अधीक्षक सुरेश प्रसाद चौधरी से बात कर चुका था। हमने आपको यह भी बताया था कि संभावित चोर नत्थू साह पारस को सपरिवार जान से मारने की धमकी दे रहा था जिसके चलते उसने चोरी के बाद 15 दिनों तक डर के मारे दुकान तक नहीं खोली थी। बाद में मेरे द्वारा हिम्मत देने के बाद बेचारे ने दुकान खोलना शुरू किया।

मित्रों,यह बड़े ही हर्ष का विषय है कि आज हमारी उम्मीद के विपरीत घटना के पूरे एक महीने के बाद हाजीपुर नगर थाना की पुलिस प्रकट हुई। इससे पहले कल ही मुझे पारस ने बता दिया था कि थाने से उसके मोबाईल पर फोन आया था। दुर्भाग्यवश जब पुलिस आई तब मैं घर पर नहीं था वरना मुझे भी नगर थाना के देवतुल्य पुलिसवालों का देवदुर्लभ दर्शन प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त हो जाता। मैंने तो समझा था कि अब पुलिस चोरी की तफ्तीश करने कभी आएगी ही नहीं लेकिन आश्चर्य कि पुलिस आई। आकर पूछताछ की। किस पर शक है पूछा और संभावित चोर नत्थू साह के घर की ओर रवाना हो गई फिर क्या हुआ क्या पता क्या खबर!? होगा क्या यह जरूर हमें पता है कि कुछ भी नहीं। अब चोरी के एक महीने बाद पुलिस को न तो कोई सबूत नहीं मिलेगा और न ही कोई चोरी का सामान। अब तक तो चोर ने कब का नगदी को ठिकाना लगा दिया होगा और बिस्कुट,पावरोटी और दालमोट खा गया होगा और साबुनों से नहा गया होगा। 

मित्रों,सवाल उठता है कि फिर पुलिस आई ही क्यों? पारस ने आज शाम मुझे बताया कि उसने भी अनुसंधान अधिकारी से यही सवाल पूछा था तो वह बोला कि उसे तो पता ही नहीं था कि आपके यहाँ चोरी भी हुई है। हद हो गई पारस ने 12 जुलाई को एफआईआर के लिए आवेदन दिया और 13 जुलाई को केस नं.-575/14 दर्ज भी कर लिया गया,14 जुलाई के हिन्दुस्तान अखबार में समाचार प्रकाशित भी हुआ,खुद मैंने पहले थाने को और बाद में एसपी को फोन कर तत्परता दिखाने का अनुरोध किया फिर भी दारोगा जी को कल तक पता ही नहीं चला कि चोरी हुई है। फिर किसी भी घटना के बाद उनको कैसे तत्काल पता चलवाया जाए? बड़ी उलझन है। क्या आप पाठकों के पास कोई उपाय है,कोई युक्ति है?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

यूपी में राष्ट्रपति शासन लगाए वरना इस्तीफा दे मोदी सरकार

05 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,यह सत्य है कि जब हम किसी भी सरकार को चुनते हैं तो उसको 60 महीने का समय देते हैं मगर कभी-कभी जब संविधान से लेकर आम आदमी की जान,माल और ईज्जत तक पर खतरा उत्पन्न हो जाए तब हम पाँच साल तक का ईंतजार नहीं कर सकते। उत्तर प्रदेश में भी जनता ने 5 साल के लिए सरकार को चुना था लेकिन वहाँ बहुत जल्दी स्थिति सरकारविहीनता की तो आ ही गई सरकार के मंत्री ही स्वयं असामाजिक कार्यों को बढ़ावा देते हुए देखे और पाए जाने लगे। ऐसे में सवाल उठता है कि आज यूपी की जो हालत है उसको देखते हुए राज्य में संविधान और कानून का शासन पुनर्स्थापित करने के लिए केंद्र की मोदी सरकार कब राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाएगी?
मित्रों,लखनऊ से लेकर मुजफ्फरनगर तक पिछली केंद्र सरकार के शासन के दौरान यूपी में सैंकड़ों सांप्रदायिक दंगे हुए। गौरतलब है कि ये सारे दंगे तभी हुए जब 2012 में वहाँ समाजवादी पार्टी की सरकार सत्ता में आ चुकी थी। मुजफ्फरनगर के दंगों में तो मीडिया के स्टिंग ऑपरेशन से इस बात का खुलासा भी हुआ कि समाजवादी सरकार के कद्दावर मंत्री और सुपर चीफमिनिस्टर कहे जाने वाले आजम खान के चलते यह दंगा हुआ। समाजवादी सरकार के दौरान यूपी में एक तरफ तो लगातार दंगे होते रहे वहीं दूसरी तरफ बलात्कार की भी बाढ़ आ गई। यूपी की हालत पर न सिर्फ भारत का उच्चतम न्यायालय बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ तक ने भी चिंता जाहिर की। उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी के बाद तो तब केंद्र में विपक्ष में रहे और अब भारत के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने टिप्पणी के मद्देनजर यूपी सरकार से इस्तीफा भी मांगा था और केंद्र से राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग भी की थी।
मित्रों,जबसे अच्छे दिन के वादे के साथ केंद्र में सत्ता में आई मोदी सरकार का गठन हुआ है तबसे यूपी के लोगों के लिए हर आनेवाला दिन पिछले दिन की अपेक्षा ज्यादा बुरा ही सिद्ध हो रहा है। सहारनपुर में ऐन ईद के दिन जिस तरह से बिना किसी उकसावे के सिक्खों की दुकानों वाले पटियाला रोड की सारी दुकानों को दिनदहाड़े मुसलमानों ने जलाकर राख कर दिया और बाद में दंगाइयों का मुख्य नेतृत्वकर्ता मोहर्रम अली अखिलेश यादव का नजदीकी निकला उसके बाद इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं रह गया है कि दंगाई कौन हैं और उनको किनका समर्थन मिल रहा है। वे कौन-से लोग हैं जो यूपी को पाकिस्तान बना देना चाहते हैं? इसी प्रयास की अगली कड़ी तब सामने आई जब कट्टरपंथी मुसलमानों के शिकंजे से भागी एक हिन्दू लड़की ने बताया कि उसका अपहरण करके उसके साथ बलात्कार किया गया है और बाद में जब उसके पेट में दर्द होने लगा तो ऑपरेशन करके एक मुस्लिम डॉक्टर ने उसका गर्भाशय निकाल दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार जब गर्भ गर्भाशय के बदले फैलोपियन ट्यूब में ही निषेचित हो जाता है तब पेट में दर्द जैसी स्थिति बन जाती है। हो सकता है कि सामूहिक बलात्कार के कारण इस मासूम के साथ भी ऐसा ही हुआ हो।
मित्रों,इतना ही नहीं उस लड़की ने बताया कि बाद में उसका जबरन धर्मान्तरण भी करवा दिया गया और शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर करवाय़े गए। इस्लामिक कट्टरपंथियों के कब्जे से किसी तरह से जान बचाकर भागनेवाली लड़की ने बताया है कि दरिंदों के कब्जे में कम-से-कम दो दर्जन और भी हिन्दू लड़कियाँ कैद हैं और जल्दी ही उनको अरब देशों में देह-व्यापार के लिए बेच दिया जाएगा। इस खुलासे के बाद प्रश्न उठता है कि क्या भारत पर गोरी,कासिम,तैमूर,अब्दाली या नादिरशाह का हमला हुआ है जो हमलों के बाद पकड़ में आनेवाली महिलाओं को भी वस्तु के रूप में ही गिनते थे और साथ ले जाकर बगदाद,तेहरान,बसरा,सिकंदरिया और काबुल के बाजारों में सोने-चाँदी के सिक्कों के बदले में बेच डालते थे? फिर तो उन हिन्दुस्तानी महिलाओं की पूरी जिन्दगी ही नर्क बनकर रह जाती थी।
मित्रों,क्या फिर से भारत की हिन्दू लड़कियों और महिलाओं के साथ वही सब होनेवाला है? क्या यही हैं मोदी सरकार के अच्छे दिन? विपक्ष में होते हुए लगातार सपा सरकार से इस्तीफा और केंद्र सरकार से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करनेवाले राजनाथ सिंह अब किस बात का इंतजार कर रहे हैं? क्या यूपी समेत पूरे भारत के हिन्दुओं ने भाजपा को इसलिए वोट दिया था कि उनकी बहू-बेटियाँ बसरा,रियाद,दुबई और बगदाद के चकलाघरों की शोभा बढ़ाए? हिन्दुओं के जिस जबरन धर्मपरिवर्तन के समाचार हमें अबतक पाकिस्तान से मिल रहे थे वही समाचार अब भारत में देखने,सुनने और पढ़ने को मिलें? क्या भारत के संविधान में अनुच्छेद 25 के अंतर्गत जो धार्मिक स्वतंत्रता दी गई है वह केवल मुसलमानों के लिए है? देश की सबसे बड़ी आबादी जब तक यूपी में परेशान रहेगी तबतक देश में कैसे अच्छे दिन लाए जा सकते हैं? अगर केंद्र सरकार को संविधान के अनुच्छेद 355 और 356 का प्रयोग किसी भी स्थिति में,बुरी-से-बुरी और बद-से-बदतर स्थिति में भी करना ही नहीं है तो फिर इनका संविधान में क्या काम है?
मित्रों,मैं अंत से मोदी जी से अर्ज करना चाहता हूँ कि श्रद्धेय मोदीजी हम हिन्दुओं ने एकजुट होकर आपको इसलिए वोट नहीं दिया था कि आप काशी से लेकर काठमांडू तक के मंदिरों में घंटी बजाते फिरें बल्कि इसलिए दिया था कि आप देश में न तो हिन्दुओं का और न ही मुसलमानों का बल्कि संविधान और कानून का शासन स्थापित करेंगे और मुझे नहीं लगता जबतक यूपी में सपा की,दानवराज अखिलेश और नराधम आजम खान की सरकार सत्ता में है ऐसा हो पाएगा। अगर आपकी सरकार अगले विधानसभा चुनाव तक का इंतजार करती है तो अगले तीन सालों में ये लोग यूपी के प्रत्येक गांव,प्रत्येक शहर और प्रत्येक घर को जलाकर राख कर देंगे। इतना ही नहीं ये लोग भारत के संविधान और आईपीसी का भी गला घोंट देंगे फिर भरते रहिएगा इनके किए गड्ढ़ों को,जलाते रहिएगा आनेवाले समय में दरिंदगी की शिकार होनेवाली मासूम लड़कियों की चिताएँ और बुझाते रहिएगा अनंत काल तक घरों,दुकानों और झोपड़ियों से उठनेवाली गगनचुंबी आग की लपटों को। मोदी जी आपने भी महाभारत पढ़ी है और देखा है कि द्वापर में एक महिला द्रौपदी की ईज्जत से हुए खिलवाड़ पर तटस्थ रह जानेवाले सम्राट धृतराष्ट्र,भीष्म,द्रोण और पूरे भारतवर्ष के पुरूषों को किस तरह अपनी जान गंवानी पड़ी थी या बुरे दिन देखने पड़े थे। फिर आज तो यूपी में हजारों स्त्रियों के साथ बलात् दुष्कर्म हो रहे हैं जिनका दंड सिर्फ दुर्योधन या दुश्शासन को ही नहीं बल्कि समय आने पर राजा धृतराष्ट्र को भी चुकाना पड़ेगा। और अगर यूपी में धर्म और न्याय की संस्थापना आपके बस का रोग नहीं है तो आप तत्काल इस्तीफा दीजिए जनता अन्य विकल्पों पर विचार कर लेगी।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

खरखौदा पर चुप क्यों हैं धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार मीडिया,नेता और कार्यकर्ता?

05 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अभी कुछ ही दिन हुए आड़ी से भी न काटी जा सकनेवाली रोटी खाते-खाते महाराष्ट्र सदन में रुके शिवसेना के कुछ सांसद क्रोधित हो उठे थे और उन्होंने अनजाने में कैंटीन मैनेजर रोजेदार मुसलमान के होठों से रोटी सटा दी थी यह कहते हुए कि तुम खुद ही खाकर देखो कि क्या यह इंसानों के खाने लायक है। फिर तो जैसे सारे मीडियाकर्मियों,नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की चाय की प्यालियों में तूफान आ गया। भारत के संविधान का मूल ढांचा और अनुच्छेद 25 खतरे में पड़ गए। उस रोजेदार के धर्म की रक्षा को जैसे सबने अपना धर्म बना लिया। टेलीवीजन से लेकर संसद तक हड़कंप मच गया।

मगर मित्रों,पिछले दिनों जब उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में मुसलमानों ने सिक्खों के एक पूरे बाजार को दिनदहाड़े आग के हवाले कर दिया तब इन ढोंगियों ने अपना मुँह तक खोलना लाजिम नहीं समझा। जहां एक को रोटी खिलानेभर से गांधी,मार्क्स और लोहिया के अनुयायियों की धर्मनिरपेक्षता हिलोरे मारने लगीं वहीं दुसरी ओर हजारों सिखों के मुँह की रोटी छिन जाने पर इनलोगों की संवेदना सोती रही। हद तो अब हो गई है जब मेरठ जिले के खरखौदा थाने की एक हिन्दू की लड़की को मुसलमानों ने पहले अपहृत किया,फिर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया,फिर उसका धर्म-परिवर्तन करवाया गया और फिर उसका गर्भाशय निकाल दिया गया। लड़की किसी तरह जान बचाकर भागी और तब जाकर उनके साथ हुए अन्याय को पूरी दुनिया ने जाना लेकिन अभी भी भारत के धर्मनिरपेक्षता के रक्षक मीडिया के दल्ले और गणिकाएँ,नेतागण और सामाजिक कार्यकर्तागण चुपचाप हैं। जैसे कि इन लोगों को साँप सूंघ गया हो,जैसे कि गांधी,मार्क्स और लोहिया इनसे कहकर गए थे कि चेलों जब मुसलमानों पर हिन्दू अत्याचार करें तभी उसे पाप मानना और जब मुसलमान हिन्दुओं की बेटियों की ईज्जत के साथ खिलवाड़ करें तो उसे पुण्य का काम समझना।

मित्रों,इस तरह का दोहरा चरित्र रखनेवाले धर्मनिरपेक्षतावादियों को चुल्लूभर पानी में डूब मरना चाहिए। यही घटना अगर किसी मुसलमान लड़की के साथ किसी गांव में हुई होती तो यही लोग रो-रोकर इस भीषण सूखे में भी उस गांव के तालाब को अपने आंसुओं से लबालब कर चुके होते लेकिन यही घटना जब एक हिन्दू लड़की के साथ घटी है तो धर्मनिरपेक्षता का कोई भी सिपाही अभी तक उससे मिलने नहीं पहुँचा है। क्या हिन्दुओं और मुसलमानों का दर्द अलग-अलग होता है? क्या दोनों के लिए सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा अलग-अलग है?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 3 अगस्त 2014

नीतीश कुमार का सुशासन के बाद महागठबंधनासन


03-08-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हमारे नीतीश कुमार जी न जाने कितने मुखों को धारण करते हैं? रावण के समक्ष जरूर इस तरह की समस्या खड़ी होती होगी कि कभी किसी मुँह ने कुछ कह दिया तो कभी किसी मुँह ने कुछ और। रावण के तो दस मुँह ही थे हमारे नीतीश जी के तो शायद उससे भी ज्यादा हैं। न जाने उन्होंने किस मुँह से कभी लालू-राबड़ी शासन को जंगल राज कहा था और न जाने किस मुँह से कहा था कि उनका सबसे बड़ा उद्देश्य लालू-राबड़ी के कुशासन का खात्मा कर सुशासन की स्थापना है? वैसे काफी दिनों से बेचारे ने सुशासन शब्द का प्रयोग करना बंद कर दिया है। पता नहीं क्यों उन्होंने इस शब्द को छुट्टी पर भेज दिया है?
मित्रों,हमने तो नीतीश कुमार जी को जब भी देखा है हमने पाया है कि उनके एक ही मुख है फिर यह रावण जैसा करतब वे कैसे कर लेते हैं? इतना ही नहीं एक बार तो नीतीश कुमार जी ने नरेंद्र मोदी जी की भी जमकर बड़ाई कर डाली थी और यहाँ तक कह डाला था कि मोदी जी को राष्ट्रीय राजनीति में आना चाहिए। और जब मोदी जी उनकी बात मानकर राष्ट्रीय राजनीति में आए तो सबसे पहले बिदकनेवालों में नीतीश कुमार भी थे। फिर उन्होंने दूसरे अज्ञात मुँह से मोदी जी को राष्ट्र के लिए घातक बताना शुरू कर दिया। बाद में भाजपा जिसने उनको राजनीति के कूड़ेदान से उठाकर राजगद्दी पर बिठाया उसी को लात मार दी और तीसरे मुँह से कहना शुरू किया कि भाजपा सांप्रदायिक है। वाह भाई वाह जब तक आप भाजपा के साथ रहे तब तक 17 सालों तक भाजपा धर्मनिरपेक्ष थी और जब आपने उसका साथ छोड़ दिया तो उसी क्षण से वह सांप्रदायिक हो गई? सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की सबसे सटीक परिभाषा।

मित्रों,पता नहीं नीतीश जी के बचे-खुचे राजनैतिक जीवन का क्या उद्देश्य है? महाभ्रष्ट कांग्रेस और राजद के सहयोग से बिहार में सुशासन की स्थापना तो होने से रही अलबत्ता जंगल राज के पुराने दिन जरूर बिना कोई प्रयास किये वापस लाए जा सकते हैं। जहाँ तक मुस्लिम मतों का सवाल है तो बिना उसकी सहायता के जब केंद्र में सरकार बनाई जा सकती है तो बिहार में क्यों नहीं बन सकती? काम मुश्किल है मगर असंभव नहीं। बिहार की जनता बढ़ती घूसखोरी,अनाप-शनाप बिजली बिल,अराजकता और भ्रष्टाचार से त्राहि-त्राहि कर रही है,पुलिस थानों में ही सिमट कर रह गई है और थानों के बाहर अदृश्य रूप में जैसे एक बार फिर से लिख दिया गया है कि बिहार के लोग अपने जान और माल की सुरक्षा स्वयं करें ऐसे में नीतीश जी को यह मुगालता कैसे हो गया है कि बिहार की जनता सिर्फ जातीय समीकरण के आधार पर उनके कथित महागठबंधन को वोट दे देगी? कहते हैं कि गीदड़ की जब मौत आती है तो वह शहर की ओर भागता है और बिहार में किसी राजनैतिक दल को जब चुनाव हारना होता है तो वह लालू से गठबंधन करता है। रामविलास जी तो इस सत्य को समझ गए थे इसलिए चुपके से खिसक लिए नीतीश जी भी समझेंगे मगर तब जब उनकी पार्टी भी आज लोकसभा में कांग्रेस की तरह मुख्य विपक्षी दल बनने की स्थिति में भी नहीं रह जाएगी। तब तक और उस निश्चित हार के बाद भी देखिए कि नीतीश जी अपने किस मुँह से क्या बोलते हैं और कैसे-कैसे सिद्धांत बघारते हैं? अब बेचारे के दिखाए झूठे सपनों का खरीददार तो कोई रहा नहीं तो बेचारे खुद ही सपने देखने लगे हैं कि वे लालू और कांग्रेस की मदद से भाजपा को बिहार में सत्ता में आने से रोक देंगे और इस तरह बिहार को लगातार लूटते रहेंगे।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 2 अगस्त 2014

आरटीआई के दायरे में आने से भय क्यों है भाजपा को?

02 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,चुनावों से पहले ही कई ऐसे भारतीय थे जिनका मानना था कि भाजपा और कांग्रेस दोनों आपस में मौसेरे भाई हैं। लड़ाई-झगड़े तो अब पति-पत्नी और अपने सहोदर भाइयों में होने लगे हैं फिर भाजपा और कांग्रेस चुनावों के दौरान लड़ पड़े तो आश्चर्य कैसा? खैर,चाहे दोनों पार्टियों के बीच कोई रक्त-संबंध हो या नहीं हो लेकिन एक गुण तो जरूर ऐसा है जो दोनों में ही समान है और वह गुण यह है कि दोनों ही पार्टियाँ खुद को आरटीआई के दायरे में नहीं लाना चाहतीं?
मित्रों,इससे पहले भी मैं 10 अक्तूबर 2012 को अपने ब्लॉग ब्रज की दुनिया पर भारतीय लोकतंत्र की इस समस्या और विडंबना के बारे में अपने आलेख राजनीतिक पार्टी संबंधी कानूनों में हो सुधार में विस्तार से चर्चा कर चुका हूँ। दुर्भाग्यवश उस समय भी भाजपा राजनैतिक दलों के आरटीआई के दायरे में लाने के पक्ष में नहीं थी और अब जब वो सत्ता में आ चुकी है तब भी इसके विरोध में है। अब आप यह कह सकते हैं कि अगर ऐसा था तो आपने लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी का समर्थन क्यों किया?
मित्रों,देश के करोड़ों देशवासियों की तरह मेरे सामने भी कोई विकल्प नहीं था। हमने सोंचा कि जहाँ कांग्रेस के सारे कदम देशविरोधी हैं वहाँ भाजपा के 50% कदम तो देशहित में होंगे? हमें उम्मीद थी कि पारदर्शिता के परम व चरम समर्थक नरेंद्र मोदी जी के हाथों में जब भाजपा की बागडोर होगी तो वे जरूर पारदर्शिता का शुभारंभ अपनी पार्टी,अपने घर से करेंगे और अपनी पार्टी के साथ-साथ सारे राजनैतिक दलों को सूचना के अधिकार के अंतर्गत लाकर करेंगे।
मित्रों,मगर ऐसा हो नहीं रहा है और निकट भविष्य होने भी नहीं जा रहा है क्योंकि भारत सरकार ने संसद में कहा है कि ऐसा कर पाना संभव नहीं है क्योंकि इससे कई तरह की समस्याएँ खड़ी होंगी। कौन-सी समस्याएँ खड़ी होंगी? क्या वे समस्याएँ उन समस्याओं से ज्यादा गंभीर और घातक होंगी जो ऐसा नहीं किए जाने से देश के समक्ष खड़ी हो चुकी हैं? क्या राजनैतिक दलों द्वारा आय का स्रोत नहीं बताने से देश का भला होगा या हो रहा है? जब कुछेक क्षेत्रों को छोड़कर पूरे तंत्र को जो किसी-न-किसी प्रकार से किसी-न-किसी राजनैतिक दल के द्वारा संचालित है सूचना के अधिकार के दायरे में लाया जा चुका है तो फिर राजनैतिक दल क्यों इससे बाहर रहें? आज हमारा लोकतंत्र जिस तरह से धनिकतंत्र में बदल गया है जहाँ कोई गरीब चुनाव में खड़े होने की सोंच भी नहीं सकता तो क्या इसके लिए राजनैतिक दलों को हो रही बेतहाशा आमदनी जिम्मेदार नहीं है? आखिर हमारे राजनैतिक दलों में भीतरखाने ऐसा क्या हो रहा है जिसको कि वे जनता से छिपाना चाहते हैं? क्या अमीरों के चंदों पर चलनेवाली पार्टी की सरकार कभी गरीबों की सरकार हो सकती है? अगर भाजपा बिरला-टाटा-अंबानी-अडाणी से अरबों-करोड़ों चंदा नहीं लेती है तो फिर वह खुद को सीधे-सीधे आरटीआई के दायरे में लाना क्यों नहीं चाहती? अगर सबकुछ ठीकठाक है तो छिपाने की आवश्यकता ही क्या है और अगर ठीकठाक नहीं है तो जनता के लिए उसको जानना और भी जरूरी हो जाता है क्योंकि जनता अब और ज्यादा दिनों तक लोकतंत्र के साथ मजाक या खिलवाड़ को बर्दाश्त नहीं करने जा रही है। सिर्फ नारे लगा देनेभर से न तो कोई पार्टी पार्टी विथ डिफरेंस हो जाती है और न तो कोई सरकार ही। बाँकी इतिहास का हिस्सा हो चुकी सरकारों से अलग इसके लिए अलग तरह के कदम उठाने पड़ते हैं और मैं समझता हूँ कि पार्टियों को आरटीआई के दायरे में लाने के प्रयास तक नहीं करके भाजपा ने वही सुनहरा अवसर खो दिया है। माना कि बिल संसद के किसी सदन में गिर जाता और सरकार की हार होती लेकिन उस हार में ही जीत के अंकुर छिपे होते मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

जाँच पर जाँच,तारीख पर तारीख और अंत में इंसाफ को सजाये मौत

29-07-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हाल ही में मुझे कई बार टेलीवीजन पर अली बाबा और मरजीना फिल्म देखने का सुअवसर मिला। फिल्म क्या थी भारत के वर्तमान का सच्चा प्रतिबिम्ब थी। फिल्म में बगदाद में एक ऐसे अमीर का शासन है जो निहायत लालची है। वह अपने सारे फैसले और सारे न्याय इस आधार पर देता है कि किस पक्ष ने कितना सोना पेश किया है। वो हर बार कहता कि सबूत पेश किया जाए लेकिन सबूत के बदले पक्षकार सोने की अशर्फियाँ पेश करते हैं और तब वो कहता है कि इस पक्ष का सबूत उस पक्ष के सबूत (सोने की अशर्फी) से ज्यादा वजनदार है इसलिए फैसला इस पक्ष के पक्ष में सुनाया जाता है और उस पक्ष को सजा दी जाती है।
मित्रों,क्या आपको नहीं लगता कि इस समय भारत में भी ठीक यह स्थिति है? जिसके पास जितना ज्यादा पैसा और जितनी तगड़ी पैरवी होती है वह कानून के साथ बलात्कार करने के लिए उतना ही ज्यादा स्वतंत्र है। जाँच का नाटक किया जाता है फिर इंसाफ का ड्रामा खेला जाता है और अंत में इंसाफ को ही वजनदार सबूत के आधार पर सजाये मौत सुना दी जाती है। आखिर कब तक भारत में ऐसा चलता रहेगा,कब तक??
मित्रों,जैसा कि आप जानते हैं कि लखनऊ की निर्भया मामले की जाँच को यूपी की बाप-बेटे,बलात्कारियों और दंगाइयों की सरकार ने सीबीआई के हवाले कर दिया है। इससे पहले स्त्री-गौरव उप्र की एडीजी सुतापा सान्याल अपनी खराब किस्सागोई के कारण उप्र की सरकार की काफी फजीहत करवा चुकी हैं।
मित्रों,मैंने देखा है कि जो दलित-पिछड़ा-गरीब अधिकारी बन जाते थे वे दलित-पिछड़ा-गरीब नहीं रह जाते थे बल्कि वे सिर्फ और सिर्फ घूस खानेवाला अधिकारी रह जाता था लेकिन शायद यह पहली ऐसी महिला अधिकारी हैं जो अधिकारी बनने के बाद सिर्फ अधिकारी रह गई हैं। न तो इनके मन में महिलाओं के प्रति दर्द है और न ही करुणा इनके मन में तो सिर्फ जीहुजूरी है,अपने आका नेताओं को खुश रखने का उत्साह है,तत्परता है। मैं मानता हूँ कि अगर इस महिला को अपने महिला होने का थोड़ा-सा भी भान है तो उनको अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए क्योंकि उन्होंने महिला होते हुए भी एक बलात्कार-पीड़िता महिला के दर्द और संघर्ष की हँसी उड़ाने की धृष्टता की है।
मित्रों,आपको क्या लगता है कि अब जब सीबीआई इस मामले की जाँच करने जा रही है तो क्या पीड़िता को न्याय मिल जाएगा? मैं जानता हूँ कि आप भी इस संभावना को लेकर निश्चित नहीं हैं। मैं तो निश्चित हूँ कि और दुष्कर्मियों की तरह निश्चिंत भी कि सीबीआई अब उस रसूखदार को बचाने के लिए जिसको कि श्रीमती सान्याल बचा रही थीं काफी लंबे समय तक जाँच करने का नाटक करेगी और अंत में केस का क्लोजर रिपोर्ट लगा देगी। मामला खत्म इंसाफ खल्लास। दरअसल पिछले कुछ दशकों से सीबीआई का काम ही यही रह गया है कि बड़े और बहुत बड़े लोगों को कानून के पंजे से यानि सजा पाने से बचाना।
मित्रों,आपको याद होगा कि 90 के दशक के अंत में बिहार में गौतम सिंह और शिल्पी जैन नामक प्रेमी जोड़े की हत्या कर दी गई थी। तब शक के दायरे में थे लालू जी के साले यानि आधे घरवाले साधु यादव। यहां तक चर्चाएं रहीं कि साधु यादव और उनके तत्कालीन सहयोगी मंत्री ने मिलकर गौतम के सामने ही शिल्पी के साथ दुष्कर्म किया और फिर हत्या कर डाली। भाजपा के पुरजोर विरोध के बाद मामला सीबीआई के हवाले हुआ। पर साधु यादव ने पॉलीग्राफी टेस्ट और रक्त के नमूने देने से मना कर दिया। इसी बीच साधु जी केंद्र में सत्तारूढ़ दल कांग्रेस में चले गए। यूपीए 2 के आखिर में सीबीआई ने कहा साधु वाकई साधु हैं इसलिए हम उनको निर्दोष मानते हुए मामले को बंद करने की अनुमति मांगते हैं। कोर्ट ने भी सीबीआई के इस साधु वाद को साधुवाद कहा और इस प्रकार इंसाफ के साथ-साथ गौतम-शिल्पी की भी दोबारा हत्या कर दी गई।
मित्रों, इसी प्रकार यूपीए 1 के दौरान वर्ष 2006 में अपनी लाख कोशिशों के बावजूद सीबीआई को कई-कई महान घोटालों के निर्माता और निर्देशक लालू प्रसाद यादव जी के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति का कोई सबूत नहीं मिला और वे बरी करार दिये गए। इसी प्रकार सीबीआई को मुलायम सिंह यादव के पास भी आय से अधिक संपत्ति होने का कोई प्रमाण नहीं मिला और पिछले साल सितंबर में यूपीए 2 के समय वे भी दूध के धुले घोषित किए जा चुके हैं। कुछ इसी तरह की कोशिश यूपीए 2 के दौरान मायावती को भी आयानुसार सम्पत्ति निर्माण का प्रमाण-पत्र देकर सीबीआई कर चुकी है यानि यूपीए की सरकार के समय जिन-जिन भ्रष्टाचारियों-बलात्कारियों ने कांग्रेस की शरणागति स्वीकार कर ली सरकार ने सीबीआई के माध्यम से सबको अभयदान दे दिया कि करो और भ्रष्टाचार करो,और बलात्कार करो कोई तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं कर सकेगा क्योंकि देश में कानून का नहीं हमारा स्वेच्छाचारी शासन है। न जाने क्यों न तो आयकर विभाग को ही और न तो सीबीआई को ही नेताओं के पास आय से ज्यादा सम्पत्ति मिल पाती है जबकि पटना के चोर बार-बार उसका पता लगा लेते हैं। इसी प्रकार मुजफ्फरपुर की नवरुणा का भी सीबीआई पिछले दो सालों में पता नहीं लगा पाई है क्योंकि उसके माता-पिता के पास इंसाफ पाने लायक सबूत (पैसा) नहीं है। यहाँ सवाल सिर्फ सीबीआई का नहीं है बल्कि पूरे तंत्र का है जो पैसों और पैरवी की बीन पर नाच रही है। राज्यों की जाँच एजेंसियाँ तो केंद्र की जाँच एजेंसियों से भी ज्यादा भ्रष्ट हैं। जिनके पास पैसा और पैरवी नहीं है वे वास्तविक लाभार्थी होते हुए भी बेहाल हैं और जिनके पास पैसा है,पैरवी है वे जेल में होने के बदले मलाई चाभ रहे हैं।
मित्रों,इस बार के लोकसभा चुनावों में जब हमने मतदान किया था तो हमारे मन में एक आशा इस बात को लेकर भी थी कि आनेवाली सरकार सही मायनों में भारत में कानून का शासन स्थापित करेगी। तब कानून के हाथ इतने लंबे और मोदी जी की मजबूत सरकार की तरह मजबूत होगी कि कोई भी अपराधी सजा पाने से बच नहीं पाएगा भले ही वो देश का राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री ही क्यों न हो। मगर हमारा यह सपना सच होगा क्या? क्या लखनऊ की निर्भया समेत भारत के हजारों पीड़ितों को जीवित रहते या मरने के बाद भी कभी इंसाफ मिल पाएगा?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 23 जुलाई 2014

गवर्नेंट विथ डिफरेंस कहाँ तक डिफरेंट?

22-07-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,एक जंगल था जहाँ अचानक लोकतंत्र की हवा चलने लगी। चुनाव हुए तो चूँकि वहाँ बंदरों,हिरणों और खरगोशों की संख्या ज्यादा थी इसलिए एक बंदर को राजा चुन लिया गया। कुछ ही दिन बाद एक दिन जंगल के पुराने राजा सिंह ने एक हिरण के बच्चे को दबोच लिया। हिरणी बेचारी हाँफती हुई नए राजा बंदर के यहाँ पहुँची और उससे अपने पुत्र की रक्षा करने की गुहार लगाई। बंदर पेड़ों की डालों पर उछलता-कूदता हुआ भागा-भागा वहाँ पहुँचा जहाँ सिंह ने हिरणी के बच्चे को बंधक बना रखा था। बंदर ने सिंह को हिरणी के बच्चे को नहीं खाने और छोड़ देने का आदेश दिया लेकिन सिंह के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। बंदर चिल्लाता रहा और चिल्लाता-चिल्लाता लगातार पेड़ों की इस डाल से उस डाल पर कूदता रहा और उधर सिंह हिरणी के बच्चे को खा गया।
मित्रों,तब बच्चे की मौत से दुःखी हिरणी ने बंदर पर नाराज होते हुए कहा कि तुम बेकार राजा हो क्योंकि तुम सिंह से मेरे बच्चे की रक्षा नहीं कर सके। जवाब में बंदर ने कहा कि भले ही मैं तेरे बच्चे को नहीं बचा सका लेकिन मेरी कोशिश में तो कमी नहीं थी।
मित्रों,केंद्र में मोदी सरकार को गठित हुए 2 महीने हो चुके हैं और मोदी सरकार भी लगातार उस बंदर की तरह कोशिश ही करती हुई दिख रही है। महंगाई को कम करने की कोशिश,चीन-पाकिस्तान को समझाने की कोशिश,रोजाना 30 किमी राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने की कोशिश,भ्रष्टाचार मिटाने की कोशिश,मुलायम-अखिलेश को समझाने की कोशिश,कांग्रेसी काल के राज्यपालों को इस्तीफे के लिए मनाने की कोशिश वगैरह-वगैरह। ठगा-सा देश और ठगी-सी देश की जनता ने क्या सिर्फ इसी बंदरकूद के लिए देश ने नरेंद्र मोदी को भारी बहुमत-से चुनाव जिताया था?
मित्रों,चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश में कुशासन के खिलाफ लगातार बोल रहे थे मगर आज जब यूपी में कानून-व्यवस्था नाम की चीज नहीं रह गई है तब वे अपने संवैधानिक कर्त्तव्यों को दरकिनार करते हुए ठीक उसी तरह सपा-बसपा को साधने की जुगत भिड़ा रहे हैं जिस तरह कि कभी सोनिया-मनमोहन ने भिड़ाया था। तो क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि अब उत्तर प्रदेश की लाचार जनता को मार्च 2017 तक मोदी कथित बाप-बेटे की सरकार को झेलना पड़ेगा? इसी प्रकार नरेंद्र मोदी सरकार चीन-पाकिस्तान और कांग्रेसी काल के राज्यपालों के आगे भी गिड़गिड़ाती हुई दिखाई दे रही है। चीन की घुसपैठ और पाकिस्तान की गोलीबारी में मोदी सरकार के गठन के बाद तेजी ही आई है लेकिन मोदी सरकार ने इनको ऐसा करने से रोकने के लिए अब तक ऐसा कुछ भी नहीं किया है जिससे कि ऐसा लगे कि यह सरकार मोदी कथित वेंटिलेटर पर चल रही मनमोहन सरकार से किसी भी मायने में अलग है।
मित्रों,इसी प्रकार नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार में कई ऐसे लोगों को शामिल किया है जिनको बेदाग नहीं कहा जा सकता। इनमें से जिन लोगों पर बलात्कार के आरोप हैं या दंगों के आरोप हैं उनको तो मैं नहीं जानता लेकिन मैं हाजीपुर के सांसद और भारत के उपभोक्ता एवं खाद्य आपूर्ति मंत्रालय रामविलास जी पासवान (मोदी जी और राजनाथ सिंह जी शायद उनको ऐसे ही पुकारते होंगे) को जरूर अच्छी तरह से जानता हूँ। ये वही रामविलास जी पासवान हैं जिनके रेल मंत्री रहते कभी अजमेर रेलवे भर्ती बोर्ड के चेयरमैन और इनके प्रिय समता कॉलेज,जन्दाहा के तत्कालीन प्रिंसिपल श्री कैलाश प्रसाद जी को एक उम्मीदवार से घूस लेते हुए सीबीआई ने पकड़ लिया था। बाद में अटल जी की उस सरकार ने न जाने क्यों मामले को दबा दिया था जिसमें स्वयं रामविलास जी पासवान भी शामिल थे। अभी लोकसभा चुनाव प्रचार के समय 22 फरवरी,2014 तत्कालीन मनमोहन सरकार ने यह खुलासा किया था (कृपया पूरा समाचार पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें) कि रामविलास पासवान ने यूपीए 1 में केंद्रीय इस्पात और रसायन मंत्री रहते हुए बोकारो इस्पात कारखाने में कई ऐसी बहालियाँ की थीं जिनमें पैसे लेकर गड़बड़ी की गई थी लेकिन न तो मनमोहन सरकार ने और न ही अब मोदी सरकार ने इस मामले में जाँच को आगे बढ़ाया है। इसका सीधा मतलब देश की जनता यह क्यों न लगाए कि मोदी सरकार भी रामविलास जी पासवान के खिलाफ किसी तरह की सीबीआई जाँच नहीं करवाने जा रही है यानि मामला रफा-दफा?
मित्रों,क्या आपको भी ऐसा लगता है कि ऐसे दागी लोगों को सरकार में रखकर मोदी बेदाग शासन दे सकते हैं? मुझे तो ऐसा नहीं लगता क्योंकि ठीक ऐसी ही स्थिति सोनिया-मनमोहन की सरकार में भी थी। तब भी दाग अच्छे हैं वेद वाक्य था और आज भी है फिर यह सरकार कैसे गवर्नेंस विथ डिफरेंस हुई। तब भी तब की सरकार ने राष्ट्रमंडल घोटाले में आरोपी शीला दीक्षित को राज्यपाल बनाया था और बनाए रखा था और आज की सरकार भी शीला दीक्षित को हटा नहीं रही है बल्कि मोदी जी उनके साथ गुपचुप मुलाकात कर रहे हैं। क्या श्री श्री मोदी जी बताएंगे कि उनके और शीला आंटी के बीत क्या-क्या बातचीत हुई? क्या नरेंद्र मोदी ने शीला दीक्षित को अभयदान दे दिया है? अगर हाँ तो क्या वे बताएंगे कि ऐसा उन्होंने किन शर्तों पर किया है? प्रचंड बहुमत से बनी यह कैसी मजबूत सरकार है जो अपने भ्रष्ट राज्यपालों को हटा भी नहीं सकती फिर चीन-पाकिस्तान के साथ यह सरकार कैसे आँखों में आँखें डालकर बात करेगी। एक राज्यपाल हैं उत्तराखंड के राज्यपाल कुरैशी जी जो राज्यपाल के पद को पिकनिक मनाने जैसा समझ रहे हैं और रोजाना बिरयानी के जलवे लूट रहे हैं और बेहद संवेहनहीन होकर बलात्कार को स्वाभाविक परिघटना बता रहे हैं। रोजाना सीमा पर पाकिस्तानी गोलीबारी में हमारे सैनिक मारे जा रहे हैं और मोदी सरकार सार्क उपग्रह की परिकल्पना करने में खोयी हुई है। क्या इसको कहते हैं आँखों में आँखें डालकर बात करना? हेमराज पहले भी सीमा पर मारे जा रहे थे और आज भी मारे जा रहे हैं। पहले भी तोगड़िया,ओबैसी,शिवसेना वगैरह बेलगाम थे और आज भी बेलगाम हैं। मोदी सरकार के मंत्री जीतेन्द्र सिंह जिन्होंने सरकार गठन के तत्काल बाद संविधान के अनुच्छेद 370 पर प्रश्नचिन्ह लगाया था अब संसद में ऐसा क्यों कह रहे हैं कि सरकार के पास अनुच्छेद 370 में किसी तरह की तब्दीली का कोई प्रस्ताव नहीं है? क्यों मोदी सरकार ने अभी तक दिन-प्रतिदिन गति पकड़ रहे उस पिंक रिव्यूलेशन को रोकने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है जिसको बढ़ाने के आरोप उन्होंने अपने चुनावी भाषण में लगातार लगाए थे? क्या अभी भी गोवंश के मांस के निर्यात पर केंद्र सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी जारी नहीं है?
मित्रों,कुल मिलाकर अबतक नरेंद्र मोदी सरकार वही सब कर रही है और वैसे ही कर रही है जैसे कि मनमोहन सरकार चुनावों से पहले कर रही थी फिर कैसे समझा जाए कि यह सरकार उससे अलग हटकर है? माना कि मोदी सरकार ने महँगाई को काफी हद तक नियंत्रण में रखा है लेकिन क्या भारत की जनता ने सिर्फ 25 रुपये किलो का प्याज और 20 रुपये किलो का आलू खाने के लिए मोदी को भारी बहुमत दिया था? और अगर वही सब होना है जो अब तक होता आया है अथवा अगर मोदी सरकार को आगे भी वैसे ही और वही काम करना है जो उसने पिछले दो महीनों में किया है तो फिर अच्छे दिन तो आने से रहे अलबत्ता पहले से भी ज्यादा बुरे दिन जरूर आनेवाले हैं देश की जनता के लिए भी और मोदी सरकार के लिए भी। जनता को सिर्फ बंदरकूद जैसा प्रयत्न नहीं परिणाम चाहिए।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 21 जुलाई 2014

नई गरीबी रेखा पर चुप क्यों है मोदी सरकार?

21-07-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,15 दिन हुए जब रंजराजन समिति ने गरीबी को मापने के लिए नए पैमानेवाली रिपोर्ट मोदी सरकार को सौंपी थी। हमें उम्मीद थी थी कि आदत के मुताबिक नरेंद्र मोदी इस रिपोर्ट पर तीव्र और तीखी प्रतिक्रिया देंगे और सिरे से रिपोर्ट को नकार देंगे। आखिर सवाल गरीबों की ईज्जत का था। याद करिए चुनाव प्रचार जब नरेंद्र मोदी पानी पी-पीकर मनमोहन सरकार पर शहरों के लिए 33 रुपए प्रतिदिन और गांवों के लिए 27 रुपये प्रतिदिन व्यय का पैमाना देकर भारत के गरीबों का अपमान करने और मजाक उड़ाने के आरोप लगा रहे थे। प्रश्न उठता है कि क्या अब शहरों के लिए 47 रुपए प्रतिदिन और गांवों के लिए 32 रुपए प्रतिदिन व्यय का सरकारी पैमाना गरीबों का अपमान नहीं कर रहा है या उनका मजाक नहीं उड़ा रहा है?

मित्रों,अगर श्री नरेंद्र मोदी भी इसे अपमान या मजाक मानते हैं तो फिर रिपोर्ट की सुपुर्दगी के बाद एक पखवाड़ा बीत जाने के बाद भी उन्होंने या उनकी सरकार ने इसको क्यों नहीं नकारा है? क्या उनकी चुप्पी से जनता यह मतलब निकाले कि मनमोहन और मोदी में सिर्फ 32 और 47 का फर्क है यानि नरेंद्र मोदी ने इस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है? गरीबों का मजाक मनमोहन ने भी उड़ाया था और अब मोदी भी उड़ा रहे हैं। हमें यह भी देखना होगा कि मुद्रास्फीति की दर को देखते हुए अगर तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट सही भी थी तो 47 रुपए की गरीबी-सीमा काफी कम है। मोदी चुनाव प्रचार के समय और प्रधानमंत्री बनने के बाद लगातार यह दोहराते आ रहे हैं कि उनकी सरकार गरीबों की सरकार होगी। तो क्या गरीबों की गरीबी का मजाक उड़ाकर वे देश में गरीबों की सरकार स्थापित कर रहे हैं?

मित्रों,मैं यह नहीं कहता कि सरकार को गरीबों को मुफ्तखोर बना देना चाहिए लेकिन सरकार गरीबी को स्वीकार तो करे। संयुक्त राष्ट्र संघ कह रहा है कि दुनिया के सबसे गरीब लोगों की एक तिहाई आबादी भारत में है। भारत सरकार को भी आय-वर्ग के आधार पर तीन श्रेणियों का निर्माण करना चाहिए। एक वे जो वास्तव में अमीर हैं,दूसरे वे जो अभावों में जी रहे हैं लेकिन हालत उतनी खराब नहीं है और तीसरे में वे लोग हों जो बेहद गरीब हैं। हमारे हिसाब से रंजराजन समिति ने जो व्यय-सीमा अपनी रिपोर्ट में दी है उसके अनुसार जीनेवाले लोग बेहद गरीब की श्रेणी में ही आ सकते हैं गरीब की श्रेणी में नहीं।

मित्रों,गरीबों को सब्सिडी पर तो मीडिया लगातार सवाल उठाती रहती है लेकिन उससे कई गुना ज्यादा जो सब्सिडी सरकार अमीरों को दे रही है उस पर चुप्पी साध जाती है। सब्सिडी निश्चित रूप से बुरी चीज है और सबसे बुरी चीज है उस सब्सिडी का गरीबों तक न पहुँच पाना यानि बीच में ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाना। अच्छा हो कि सरकार गरीबी को मापने के लिए तर्कसंगत पैमाना बनाए,सब्सिडी को गरीबों तक पहुँचाने की दिशा में आ रही रूकावटों को दूर करे और गरीबों को खैरात बाँटने के बदले रोजगार दे और इस काम को पहली प्राथमिकता दे तब न तो उसको गरीबों की संख्या को जबरन कम करके दिखाना पड़ेगा और न ही देश के गरीबों को पागलपनभरी,बेसिर पैर की  सरकारी आंकड़ेबाजी से खुद को अपमानित ही महसूस करना पड़ेगा।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 20 जुलाई 2014

लखनऊ की निर्भया की पाती देशवासियों के नाम

20-07-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। प्यारे देशवासियों,मैं एक और निर्भया जो अपनों की ही हवश से खुद को बचा नहीं सकी आपलोगों के नाम यह खत लिख रही हूँ। मैं कहीं बाहर से नहीं बल्कि आपलोगों की अंतरात्मा,अंतर्मन से ही आपलोगों को यह संदेश दे रही हूँ। मुझे जिन्दगी से बहुत-कुछ नहीं मिला लेकिन फिर भी मैंने अपने कर्त्तव्यों से कभी मुँह नहीं मोड़ा। विवाह के तत्काल बाद ही मेरे पति के गुर्दे खराब हो गए लेकिन मैंने हार नहीं मानी और उनको अपना एक गुर्दा देकर बचा लेना चाहा। मगर मेरा यह महान त्याग भी उनकी प्राण-रक्षा नहीं कर पाया और उन्होंने अंततः मेरे विवाह के कुछ ही साल बाद दम तोड़ दिया। वे पीजीआई,लखनऊ में काम करते थे और न जाने कितनों की जान अपनी सेवा के द्वारा बचाई थी लेकिन वे अपनी ही जान नहीं बचा सके।

प्यारे भाइयों और बहनों,फिर मैंने पीजीआई में ही नर्स की नौकरी कर ली और पति ने जो जनसेवा का काम अधूरा छोड़ा था उसे भरे मन से सारे भावों को छिपाते हुए मुस्कान के साथ पूरा करने में लग गई। 16 जुलाई तक मेरे ऊपर मेरे पति की निशानी 13 साल की बिटिया और 3 साल के बेटे की शिक्षा-दीक्षा और पालन-पोषण का भी भार था। 16 जुलाई को मुझे मेरी जान-पहचान के चार लड़के इमरजेंसी कहकर बुलाने आए। रात गहरा चुकी थी लेकिन मेरी करुणा ने मुझे रुकने नहीं दिया और मैं घर में अपने बेटे-बेटियों को जल्दी आ जाऊंगी कहकर निकल पड़ी। कार जब तहजीबों के शहर लखनऊ के सबसे बड़े अस्पताल पीजीआई से आगे बढ़ने लगी तब मैंने समझा कि मेरे साथ धोखा हुआ है। ठीक उसी तरह का धोखा जैसा धोखा कभी डाकू खड़क सिंह ने बाबा भारती के साथ किया था। मैंने उनसे कार रोकने को कहा तो उन्होंने मेरे साथ मारपीट शुरू कर दी। इस बीच उनकी कार कई बार शहर के विभिन्न थानों से होकर गुजरी।

दोस्तों,मैं अब डरने लगी थी। मुझे लगने लगा था कि मेरे साथ ये लोग काफी बुरा करनेवाले हैं। मुझे लखनऊ के ... मुहल्ले के एक बंद स्कूल में ले जाया गया। स्कूल का दरवाजा बंद था इसलिए वे लोग मुझे टूटी हुई चारदिवारी से उठाकर भीतर ले गए। वहाँ सीमेंट से बने बेंच पर मेरे साथ उन्होंने वह सब किया जिसकी मैंने कभी कल्पना तक नहीं की थी। वे मेरे अपने थे,मेरे परिचित थे और मुझे सिस्टर कहकर बुलाते थे फिर आप ही बताईए कि कोई अपनी सिस्टर यानि बहन के साथ बलात्कार करता है क्या? मैंने लगातार उनका विरोध किया जिससे नाराज होकर उन्होंने लाठी-डंडों से मेरी जमकर पिटाई की। डंडे से मेरे गुप्तांग को भी क्षतिग्रस्त कर दिया। मेरा सिर भी दो फाँक कर दिया जिससे मेरे गुप्तांग के साथ-साथ सिर से भी तेज रक्तस्राव होने लगा। मैं लगातार चिल्लाती रही लेकिन मुझे बचाने कोई नहीं आया। या तो मानव-समाज तक मेरी चित्कार पहुँची ही नहीं या फिर आपलोगों ने उसे सुनकर अनसुना कर दिया क्योंकि मैं आपके परिवार की नहीं थी। वे मुझे वहीं घायल अवस्था में छोड़कर भाग गए। दर्द और लगातार खून बहने से मुझे तेज प्यास लग रही थी मैं स्कूल के मैदान में स्थित चापाकल तक घिसटकर पहुँची क्योंकि अब मेरे भीतर खड़ा होने की ताकत नहीं बची थी। बाँकी सरकारी स्कूलों के चापाकलों की तरह वह चापाकल भी खराब था इसलिए मैं पानी नहीं पी सकी। फिर भी मैंने हार नहीं मानी और घुप्प अंधेरे में भी मैं कुल मिलाकर 80 मीटर तक घिसटती रही इस उम्मीद में कि मैं नजदीकी बस्ती तक पहुँच जाऊंगी और किसी तरह मेरे बच्चे पूरी तरह से अनाथ होने से बच जाएंगे। मैंने अस्पताल में अपनी सेवा से न जाने कितने बच्चों को अनाथ होने से बचाया था लेकिन आज मेरे बच्चे ही अनाथ होने जा रहे थे। अंततः मैं बेहोश होने लगी तब मुझे लगा कि मैं पूरी तरह से नंगी कर दी गई हूँ। मेरे कपड़े तो काफी दूर रह गए थे इसलिए मैं अपनी लाज को ढंकने के लिए जमीन की तरफ मुँह करके लेट गई और प्राण-त्याग दिया। तब शायद रात के दो बज रहे थे।

मेरे प्यारे देशवासियों,जो मेरे साथ हुआ आप ही बताईए कि उसके बाद कोई भी महिला क्या दूसरी महिला की इमरजेंसी में मदद करने की सोंचेगी भी? क्या ऐसे में देश की लाखों बहनों की जान पर खतरा नहीं बढ़ जाएगा? 16 दिसंबर से 16 जुलाई तक भारत में न जाने कितनी निर्भयाओं को बलात्कार के दर्द से गुजरना पड़ा और न जाने कितनी निर्भयाओं को सबूत छिपाने के लिए जान से मार दिया गया। मगर मेरा बलात्कार तो समाज द्वारा मेरी मृत्यु के बाद भी होता रहा। मैं दिन निकलने के बाद तीन घंटे तक नंग-धड़ंग पड़ी रही। पुलिसवाला हाथ में कपड़ा लिए खड़ा रहा,समाज मेरे नंगे मृत शरीर से नयनसुख प्राप्त करता रहा लेकिन किसी ने भी मुझ पर कपड़ा डालने की कोशिश नहीं की। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही देश है जहाँ पर दुर्गा और काली की पूजा की जाती है। मेरा अपराध क्या था? सिर्फ यही न कि मैं एक महिला थी। पुरुषप्रधान समाज ने हमें कभी भी आदर नहीं दिया। मूर्ति के रूप में हमारी पूजा की लेकिन वास्तव में हमें सिर्फ एक वस्तु समझा। मैं नहीं जानती कि मुझे मारने के बाद यह समाज मेरे बच्चों के साथ कैसा सलूक करेगा। क्या मेरी बेटी के साथ भी भविष्य में वही होनेवाला है जो 16 जुलाई को मेरे साथ हुआ?

मेरे प्यारे देशवासियों,हमारे देश के मर्दों को हो क्या गया है? उनमें क्यों पशुता ने प्रवेश कर लिया है? क्या कथित आधुनिकता और नंगेपन की वैश्विक आंधी हम नारियों के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देगा? क्या फिर से मध्यकाल की तरह जाकी कन्या सुन्दर देखी ता सिर जाई धरि तलवार वाला युग आ गया है? फिर तो हम महिलाओं को जन्म लेते ही लड़कियों को मार देना होगा क्योंकि वह मौत मेरी मौत से तो कम कष्टकारी होगा।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 16 जुलाई 2014

एफआईआर दर्ज करा के पछता रहा है पारस

16-07-2013,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,यूँ तो पूरे भारत की पुलिस के काम करने का अंदाज निराला है लेकिन हमारी हाजीपुर की पुलिस की तो कोई हद ही नहीं है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। इसी शुक्रवार को जब मैं हाजीपुर नगर थाना के बैंक मेन्स कॉलोनी स्थित अपने मकान पर मौजूद नहीं था तभी देर रात को मेरे पड़ोस में स्थित किराने की दुकान गुंजन किराना स्टोर में चोरी हो गई। चोर दुकान का ताला तोड़कर करीब 20 हजार रुपये की नकदी और सामान ले गए। मेरी दुकानदार से अच्छी बनती है इसलिए जब परसों सोमवार को मैं घर आया तो हालचाल लेने चला गया। दुकानदार पारस कुमार जायसवाल ने बताया कि उसने शनिवार 12 जुलाई को ही नगर थाने में आवेदन दे दिया था,सोमवार के हिन्दुस्तान में समाचार प्रकाशित भी हुआ लेकिन अभी तक नगर थाने की पुलिस का कहीं अता-पता नहीं है।

मित्रों,कल अहले सुबह पारस मेरे घर पर आया और बताया कि संभावित चोर नत्थू साह पिता-श्री दशरथ साह उसको एफआईआर वापस लेने की अन्यथा परिवार सहित हत्या कर देने की धमकी दे गया है वो भी अकेले में नहीं मुहल्ला के दस आदमी के सामने। बेचारे का डर के मारे बुरा हाल था। उसने बताया कि जबसे वह धमकी देकर गया है दुकान खोलने की हिम्मत ही नहीं हो रही। मैं गरीब आदमी दुकान न खोलूँ तो कैसे खर्च चले और कैसे जीऊँ? मैंने तत्काल नगर थाने में फोन किया तो उधर से जवाब आया कि देखते हैं। फिर सवा दस बजे के करीब वैशाली जिले के पुलिस अधीक्षक सुरेश प्रसाद चौधरी जी से शिकायत की कि सुस्ती की भी एक सीमा होती है चोरी हुए चार दिन बीत गए मगर पुलिस तो क्या उसकी परछाई तक का कहीं अता-पता नहीं है। उन्होंने भी कहा देखते हैं। फिर दिन ढला और शाम हो गई। चार बजे फिर से चौधरी जी को फोन लगाया तो उन्होंने केस नं. मांगा जो मैंने दे दिया-केस नं.-575/14 डेटेड-13-07-2014।

मित्रों,अब आज बुधवार दिनांक 16 जुलाई,2014 के डेढ़ बज रहे हैं लेकिन अभी भी हाजीपुर नगर थाने की पुलिस छानबीन करने नहीं आई है। दोस्तों,मैं पहले भी अर्ज कर चुका हूँ कि हमारी पुलिस रक्षक नहीं भक्षक है,शोषक है फिर ऐसी पुलिस किस काम की? हम क्यों उठा रहे हैं या उठाएँ ऐसे पुलिस-तंत्र का खर्च? दरअसल हमारी बिहार पुलिस तब तक टस-से-मस नहीं होती जब तक कि उसकी जेब गर्म न कर दी जाए। वह पीड़ित से भी रिश्वत लेती है और पीड़क से भी इसलिए हमने दारोगा का फुल फॉर्म दो रोकर या गाकर कर दिया है। यही कारण है,यकीनन यही कारण है कि कोई भी पीड़ित व्यक्ति या महिला चाहे मामला बलात्कार का ही क्यों न हो एफआईआर दर्ज करवाने से हिचकते हैं। जब चोरी की घटना के तत्काल बाद ही एफआईआर कर देने के बाद 5 दिन बाद तक पुलिस घटनास्थल पर नहीं पहुँचती है तो इससे तो अच्छा है कि नुकसान को चुपचाप सह लिया जाए। अगर कल पारस की संभावित चोर हत्या कर देता तो इसके लिए दोषी कौन होगा? क्या अब 5 दिन बाद पुलिस अगर आती भी है तो चोरी का सामान बरामद होगा? क्या पुलिस ने चोर को चोरी के सामान को ठिकाने धराने के लिए पर्याप्त समय नहीं दे दिया है? क्या पुलिस का यह भ्रष्ट और लचर रवैय्या नत्थू जैसे अपराधियों का मनोबल नहीं बढ़ा रहा है? सवाल बहुत हैं मगर उत्तर किसी का भी नहीं है। कौन देगा और कहाँ से मिलेगा जवाब?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

बेवजह की आक्रामकता कर सकती है खुद कांग्रेस का नुकसान

14-07-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अंग्रेजी में एक कहावत है कि आक्रमण ही रक्षण का सर्वश्रेष्ठ तरीका है परन्तु यह कहावत सिर्फ चुनावों के समय के लिए ही सत्य हो सकती है। लगता है कि कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ऐसा बिल्कुल भी नहीं मानती। शायद उनका यह मानना है कि चाहे संघर्ष का समय हो या निर्माण का आक्रमण ही एकमात्र विकल्प हो सकता है। तभी तो जब यूपीए की सरकार सत्ता में थी तब भी देश का शुद्ध अंतर्मन से भारत-निर्माण करने के बदले कांग्रेस हमेशा इसी प्रयास में लगी रही कि कैसे विपक्ष के दामन को दागदार बना दिया जाए या दागदार साबित कर दिया जाए।
मित्रों,मैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कथन से पूरी तरह से सहमत हूँ कि आप अपने बल पर सरकार तो चला सकते हैं लेकिन देश का निर्माण नहीं कर सकते। सोनिया गांधी इसी बात को समझ नहीं पाई या फिर समझ कर भी समझना नहीं चाहा इसलिए उनका भारत निर्माण का नारा महज नारा बनकर रह गया। कभी द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन की जीत सुनिश्चित करवाने वाले चर्चिल को ब्रिटेन की जनता ने यह देखकर सत्ता से बाहर कर दिया था कि विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद भी उनका मिजाज सेनानायकों वाला ही था शायद यही हाल वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों के समय से ही सोनिया गांधी का है। मेरी समझ से सोनिया जी की सबसे बड़ी परेशानी उनके पुत्र हैं जो वर्षों में भी कुछ भी सीख पाए। कदाचित् उनमें नेतृत्व क्षमता है ही नहीं और नेतृत्व क्षमता तो जियाले माँ के गर्भ से ही लेकर पैदा होते हैं उसे किसी के भीतर इंजेक्ट नहीं किया जा सकता। सोनिया जी को किसी दूसरे योग्य व्यक्ति को आगे लाना चाहिए और केंद्र सरकार के साथ सहयोगपूर्ण व्यवहार करना चाहिए अन्यथा क्या पता अगले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस दोहरे अंकों में भी नहीं पहुँच सके क्योंकि देश की जनता समझ चुकी है कि राहुल गांधी अयोग्य हैं और भविष्य में अगर देश के विकास की राह में मोदी सरकार के मार्ग में कांग्रेस किसी भी तरह से बाधक बनती है तो इसका दंड भी वही अकेली भुगतेगी।
मित्रों,कांग्रेस जब केंद्र में सत्ता में थी तब उसका फुलटाईम वर्क क्या था इसके बारे में हम पहले पाराग्राफ में बात कर चुके हैं। सत्ता से हटने के बाद भी उसके दुर्भाग्य से उसका रवैय्या वही है। सबसे पहले उसने बेवजह स्मृति ईरानी की पढ़ाई को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का प्रयास किया फिर उस एक केंद्रीय मंत्री को बलात्कार के आरोप में लपेटना चाहा जिसको उसी की पार्टी की प्रदेश सरकार उसी मामले में कभी निर्दोष ठहरा चुकी है और अब पत्रकार वेद प्रताप वैदिक के मामले में बिना किसी तथ्य के हो-हल्ला मचा रही है। शायद उसको लगता है कि इन बेतुके हमलों से जनता को विश्वास हो जाएगा कि इस सरकार और उसकी अपदस्थ हो चुकी सरकार में कोई फर्क नहीं है। हम जानते हैं कि वेद प्रताप वैदिक कभी नरेंद्र मोदी के नजदीकी नहीं रहे और लोकसभा चुनावों के दौरान तो उन्होंने कई बार उनका विरोध भी किया। यहाँ तक कि वे उनकी नजदीकी माकपा नेता सीताराम येचुरी और आप नेता अरविन्द केजरीवाल के साथ भी रही है फिर कांग्रेस क्यों वैदिक की रामदेव बाबा के साथ निकटता को लेकर हंगामा खड़ा कर रही है?
मित्रों,पत्रकार तो रोज सैंकड़ों लोगों से मिलता है। उसमें से कई अच्छे लोग होते हैं तो कई निहायत बुरे तो इसका यह मतलब नहीं हो जाता कि वह पत्रकार उसके गिरोह में शामिल हो गया। इतिहास गवाह है कि कभी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी जी के पति राजीव गांधी ने भी उस एलटीटीई प्रमुख प्रभाकरण के साथ मुलाकात की थी जिन पर बाद में उनकी ही हत्या करवाने का आरोप लगा तो क्या कांग्रेस बताएगी कि राजीव क्यों प्रभाकरण से मिले थे? क्या वे उनके यहाँ अपने बच्चों के लिए वर-वधु की तलाश कर रहे थे? फिर राजीव जी तो पत्रकार भी नहीं थे जबकि वेद प्रताप वैदिक देश के वरिष्ठ पत्रकार है। अगर कांग्रेस पार्टी यह समझती है कि वैदिक को कटघरे में खड़ा करने का मतलब है मोदी को कटघरे में खड़ा करना तो यह उसकी निरी मूर्खता है। देश की जनता अब इतनी बेवकूफ नहीं रह गई है कि कांग्रेस के चोर बोले जोर से की नीति को समझ नहीं पाए इसलिए कांग्रेस और सोनिया परिवार के हित में यही अच्छा होगा कि वह मोदी सरकार के काम-काज में बाधा डालने के बदले उसके साथ सहयोग करे,मुद्दों के आधार पर विरोध करे न कि विरोध के लिए विरोध करे और बेवजह की आक्रामकता से बचे। बिना बात के गाली-गलौज को भारत में शिष्टता नहीं अशिष्टता माना जाता है। एक बात और कि जब शीशे के घर में रहनेवाला व्यक्ति दूसरे के घरों पर पत्थर फेंकता है तो अंततः वह अपने ही हाथों खुद का ही नुकसान करता है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 14 जुलाई 2014

बजट अच्छे हैं मगर आदर्श नहीं

14-07-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कहते हैं कि बजट को देखकर पता चलता है कि सरकार और देश की दशा और दिशा क्या है। जाहिर है कि 45 दिन पुरानी सरकार की दशा का अनुमान बजट से लगाना बेमानी होगा लेकिन दिशा का अनुमान तो हम लगा ही सकते हैं। चाहे मोदी सरकार का रेल बजट हो या आम बजट दोनों ही अच्छे हैं हालाँकि आदर्श नहीं हैं क्योंकि सरकार वोट बैंक को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती थी। शायद इसलिए वित्त मंत्री बजट में जनता को कड़वी दवा तो नहीं ही दे पाए उल्टे मीठी दवा दे डाली।
मित्रों,जहाँ तक रेल बजट का सवाल है तो इसमें निश्चित रूप से रेलवे को भारत के विकास का ईंजन बनाने की क्षमता है। रेलवे के पास विशाल नेटवर्क और अधोसंरचना है और उसके आधुनिकीकरण पर अगर समुचित ध्यान दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब भारत में भी दुनिया की सबसे तीव्रतम यातायात सेवा उपलब्ध होगी। कौन नहीं चाहेगा कि पटना से दिल्ली एक ही दिन में चला भी जाए और अपना काम करके देर शाम तक घर वापस भी आ जाए? जो लोग गरीबों के लिए बुलेट ट्रेन के भाड़े को लेकर चिंता से मरे जा रहे हैं उनको यह तो पता होगा ही कि देश में बुलेट ट्रेन के आने के बावजूद भी सस्ते विकल्प मौजूद रहेंगे। रेलवे की सामान ढुलाई में भी सुधार हो बजट में इसका भी खास ख्याल रखा गया है और माल ट्रेनों के लिए अलग स्टेशन बनाने की परिकल्पना की गई है। इतना ही नहीं रेलवे का उपयोग सरकार महंगाई को कम करने के लिए भी करने जा रही है।

मित्रों,अगर आप आम रेल यात्री से पूछें कि वो रेलवे में कौन-से परिवर्तन चाहता है तो वह यही बताएगा कि ट्रेनों में भोजन की गुणवत्ता और ट्रेनों-स्टेशनों की साफ-सफाई का स्तर अच्छा होना चाहिए। यह बड़े ही सौभाग्य का विषय है कि इस बजट में इन समस्याओं के समाधान पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है। इसके साथ ही एक आम यात्री यह चाहता है कि ट्रेनों के विलंब से चलने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगनी चाहिए तो इसके लिए तो रेलवे का आधुनिकीकरण करना पड़ेगा और उसमें वक्त लगेगा। वैसे बुलेट ट्रेन और हाई स्पीड ट्रेनों को चलाने के लिए तो ट्रेन संचालन में आमूलचूल बदलाव तो करना पड़ेगा ही। यह हमारी अंग्रेजकालीन संचालन-प्रणाली का ही दोष है कि प्रत्येक साल सर्दी के दिनों में रेलगाड़ियों की गति को काठ मार जाता है और कई दर्जन महत्त्वपूर्ण गाड़ियों के संचालन को महीनों तक के लिए बंद कर देना पड़ता है जिससे यात्रियों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
मित्रों,लेकिन फिर से वही सवाल उठ खड़ा होता है कि रेल बजट में जो प्रावधान किये गए हैं उनको धरातल पर उतारने के लिए पैसे आएंगे कहाँ से? जनता की जेब को तो पिछली सरकार ही लूट चुकी है इसलिए उसकी जेब से तो कुछ निकाल नहीं सकते तो क्या निजी कंपनियाँ सरकार की परियोजनाओं में अभिरूचि लेगी? अगर सरकार की नीति के साथ उसकी नीयत भी ठीक रही तो जरूर ऐसा संभव है इसलिए इस दिशा में पूरी तरह से निराश होने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है।
मित्रों,जहाँ तक आम बजट का सवाल है तो इसमें भी रेल बजट की ही तरह पीपीपी पर ज्यादा जोर दिया गया है यानि पब्लिक पाइवेट पार्टनरशिप पर। आम बजट में सबसे ज्यादा जोर विनिर्माण क्षेत्र के विकास पर दिया गया है जिससे देश की जीडीपी तो बढ़े ही देश के करोड़ों बेरोजगार युवाओं को रोजगार भी मिले। देश का सबसे बड़ा क्षेत्र सेवा-क्षेत्र में विकास की रफ्तार एक तो संतृप्त हो चुका है और दूसरा यह कि उसमें रोजगार-सृजन की संभावना न के बराबर होती है। इसके लिए बीमा और रक्षा-क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाकर 49 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके साथ ही देश के कई क्षेत्रों में औद्योगिक गलियारों के निर्माण का भी प्रावधान किया गया है। 24 घंटे बिजली,नदियों को जोड़ने,कौशल विकास,सड़क-निर्माण,प्रधानमंत्री सिंचाई योजना,पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए कई सारी योजनाएँ,सीमावर्ती क्षेत्रों में रेल और सड़क निर्माण,महामना मालवीय के नाम पर नई शिक्षा योजना,गंगा सफाई और विकास योजना,सौ स्मार्ट सिटी निर्माण,मिट्टी हेल्थ कार्ड,2022 तक सबके लिए घर योजना,किसान टीवी चैनल की शुरुआत,हर राज्य में एम्स जैसी सुविधा देना,सबके लिए शौचालय,हर घर में बिजली पहुँचाने की योजना,किसानों को 7 प्रतिशत के ब्याज-दर पर ऋण,ई-वीजा प्रणाली,बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना,सुशासन के लिए धन का आवंटन आदि कई सारे ऐसे कदम बजट में प्रस्तावित किए गए हैं जो देश में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकते हैं लेकिन वास्तविकता यह भी है कि सरकार के हाथों में कुल जीडीपी का मात्र 2 प्रतिशत ही है इसलिए बिना निजी क्षेत्र और विदेशी निवेशकों की सहायता के बजट-लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। यहाँ मैं रेल और आम दोनों ही बजटों की बात कर रहा हूँ।

मित्रों,ऐसा होने के बावजूद भी मैं केंद्र सरकार की विनिवेश नीति से सहमत नहीं हूँ। मैं नहीं मानता कि सरकारी उपक्रमों को संचालन व्यावसायिक तरीके से नहीं किया जा सकता और उनमें सुधार लाकर उनको मुनाफे में नहीं लाया जा सकता फिर सरकारी हिस्सेदारी को बेचने या कम करने की क्या जरुरत है? आर्थिक सुधार का यह मतलब नहीं होता कि पूरे देश को राई से रत्ती तक को देसी-विदेशी पूंजीपतियों के हाथों में दे दो बल्कि किसी भी लोक-कल्याणकारी देश में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में एक संतुलन बनाए रखना जरूरी है वरना लोक-कल्याणकारी राष्ट्र होने का क्या औचित्य है? निजी क्षेत्र तो हमेशा अपना मुनाफा देखता है और आगे भी देखेगा फिर वो क्यों लोक-कल्याण से क्यों कर वास्ता रखने लगा? देश को देशहित में प्राइवेट कंपनी की स्टाईल में चलाया तो जा सकता है लेकिन प्राइवेट कंपनियों को सौंपा नहीं जा सकता क्योंकि देश की जनता इस सच्चाई को कभी स्वीकार नहीं करेगी इस बात को केंद्र सरकार को अच्छी तरह से अपने जेहन में बैठा लेनी पड़ेगी।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 7 जुलाई 2014

बिहार की पब्लिक आप दोनों को जान चुकी है लालू जी-नीतीश जी

7-7-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,न जाने क्यों हमारे देश के नेताओं को अपनी धूर्तता और जनता की मूर्खता पर अपार विश्वास है। वे समझते हैं कि वे बार-बार जनता को झाँसा दे सकते हैं,ठग सकते हैं। मगर वे बेचारे यह नहीं जानते कि देश-प्रदेश की जनता अब वो पुरानी 20वीं सदी वाली जनता नहीं रही बल्कि देश-प्रदेश की 55 प्रतिशत जनसंख्या आज युवा है और पल-पल जागरुक और चौकन्नी है। बिहार में जंगलराज के निर्माता और निर्देशक लालू प्रसाद जी पिछले कई चुनावों से बिहार की जनता को बरगलाने का प्रयास करते आ रहे हैं। वे हर चुनाव में अपना वही पुराना जातिवादी मंडल राग छेड़ते आ रहे हैं और मुँह की खाते आ रहे हैं। पिछले दो चुनावों में बिहार के वर्तमान से पूर्व मुख्यमंत्री हो चुके नीतीश कुमार बिहार की जनता को विकास और भ्रष्टाचारमुक्त शासन देने का वादा करके जीतते रहे मगर किया कुछ नहीं। घूसखोरी बढ़ती गई,अराजकता पाँव पसारती गई और आज तो स्थिति ऐसी हो गई है कि जहाँ पूरे बिहार में पिछले छः महीने से अनाज नहीं बँटा है तो कई स्थानों पर सामाजिक पेंशन बँटे दो साल हो गए हैं, राज्य के 90 प्रतिशत शिक्षक नकली डिग्रीधारी हैं और अपने कर्त्तव्यों को पूरा करने में पूरी तरह से अक्षम हैं। कानून-व्यवस्था की स्थिति एक बार फिर से इतनी खराब हो चुकी है कि बिहार के वित्त मंत्री के नाती का ही अपहरण हो गया है।
मित्रों,जब नीतीश कुमार पहली बार जीते तो लालू के जंगलराज से मुक्ति के वादे पर सवार होकर जीते। इसी तरह 2010 के चुनावों से पहले उन्होंने वादा किया कि इस पारी में उनकी सरकार भ्रष्टाचार को निर्मूल करके रख देगी लेकिन जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि भ्रष्टाचार घटने के बदले बढ़ता ही जा रहा है। चारों तरफ सरकारी पैसों की लूट और अराजकता का बोलबाला है। जनता परेशान है और धीरज खो रही है लेकिन लगता है जैसे नीतीश कुमार जी को यह दिखाई ही नहीं दे रहा था तभी तो वे सीएम से पीएम बनने का सपना पाल बैठे। जब सपना टूटा तो बेचारे सीएम की कुर्सी भी छोड़कर भाग गए। कदाचित् अरविन्द केजरीवाल की तरह वे भी यह समझ चुके थे कि भ्रष्टाचार को मिटाना तो दूर उसका बाल बाँका तक कर सकने की क्षमता भी उनमें नहीं है। चले थे नरेंद्र मोदी बनने और बन गए अरविन्द केजरीवाल। जाहिर है कि जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने की परीक्षा में नीतीश कुमार बुरी तरह से फेल हो चुके हैं।
मित्रों,फिर भी लालू और नीतीश दोनों परखे जा चुके नेता यह समझ रहे हैं कि अगर वे दोनों मिल जाएँ तो जनता फिर से उनको ही मौका दे देगी। वे फिर से चुनावों को केमिस्ट्री के बजाये गणित समझने की भूल कर रहे हैं। आखिर क्यों देगी जनता मौका जब वे दोनों जनता की आशाओं पर खरे नहीं उतर सके हैं? एक ने जो कुर्सी से चिपक कर बैठ गया था पूरे बिहार के खून को जोंक की तरह चूसकर बीमार बना दिया और दूसरा जनाकाक्षाओं को पूरा करने की कोई राह नहीं सूझने पर कुर्सी छोड़कर भाग गया फिर जनता क्यों दे उनको फिर से बिहार को बर्बाद करने का मौका जबकि उनके पास बिहार के लिए कोई नवीन योजना और उनको धरातल पर उतारने का जिगर है ही नहीं? वे दिन गए जब बिहार के लोग जाति-पाँति के बहकावे में आ जाते थे। अब वे समझ चुके हैं कि ये नेता जाति-पाँति के नाम पर जीतने के बाद जनता की जगह अपना और अपनों का ही भला करनेवाले हैं। हालाँकि बिहार की जनता का एक बड़ा भाग ऐसा है जो भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी को पसंद नहीं करता है। कारण यह है कि श्री मोदी ने बेवजह नीतीश कुमार को बिहार का मसीहा बन जाने दिया जबकि वे दूर-दूर तक ऐसा बनने के लायक नहीं थे। इतना ही नहीं श्री मोदी लंबे समय तक नीतीश कुमार को ही भारत के पीएम पद का सबसे योग्य उम्मीदवार बताते रहे जबकि उनको पता था कि भाजपा नरेंद्र मोदी को प्रोजेक्ट करने जा रही है इसलिए अच्छा हो कि अगले विधानसभा चुनावों से पहले सुशील कुमार मोदी को भाजपा मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार या स्टार प्रचारक नहीं बनाए। या तो किसी और को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए या फिर यह निर्णय चुनावों के बाद जीतनेवाले विधायकों के विवेक पर छोड़ दे तभी उसकी जीत और लालू-नीतीश जैसे महान काठ की हाँड़ी विशेषज्ञ नेताओं की हार सुनिश्चित हो पाएगी।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

इराक में इस्लाम कहाँ है?

1 जुलाई,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जहाँ तक मैं जानता हूँ कि इस्लाम का अर्थ शांति होता है लेकिन विडंबना यह है कि जहाँ-जहाँ भी इस्लाम है वहाँ-वहाँ ही शांति नहीं है। पूरी दुनिया में मुसलमान दूसरे धर्मवालों से तो संघर्ष कर ही रहे हैं जहाँ जिस देश में सिर्फ मुसलमान ही हैं वहाँ आपस में ही लड़ रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में हमने इराक में इस्लाम की जो क्रूरता देखी,जो स्वरूप देखा वह बिल्कुल भी इस्लाम के प्रति श्रद्धा या प्रेम नहीं जगाता बल्कि जुगुप्सा और घृणा उत्पन्न करता है। क्या कोई व्यक्ति या धर्म इतना हिंसक और बेरहम हो सकता है कि 1700 निहत्थों को पंक्तिबद्ध करके गोलियों से भून दे? क्या कोई धर्म तब भी धर्म कहलाने का अधिकारी हो सकता है जब सैंकड़ों लोगों के सिरों को धड़ों से अलग करके ढेर लगा दे और फिर पूरी प्रक्रिया का वीडियो जारी करे? इतनी निर्दयता तो अपनी प्रजाति के लिए मांसाहारी पशुओं में भी नहीं होती फिर इंसान में कहाँ से आ गई और यह सब उस धर्म के नाम पर किया गया जिसका शाब्दिक अर्थ ही शांति होता है? तो क्या इस्लाम का नाम कुछ और रखना पड़ेगा क्योंकि अब यह नाम अपने अर्थ को खो चुका है?

मित्रों,हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह सारा रक्तपात फिर से उसी धरती पर किया गया,उसी देश में किया गया जहाँ के एक शहर कर्बला में कभी यजीद नामक रक्तपिपासु की क्रूरता का विरोध करते हुए इमाम हुसैन शहीद हुए थे। अफगानिस्तान से लेकर सीरिया तक जहाँ देखिए मुसलमानों के कबीले आपस में खून की होली खेल रहे हैं। कहीँ सुन्नी हजारा को मार रहा है तो कहीं शिया सुन्नी को। हर मुस्लिम संप्रदाय यही समझता है कि उसका मत ही सही है और दूसरे मतवालों को जीने का कोई अधिकार नहीं है। यह असहिष्णुता और असहअस्तित्व ही सारे झगड़ों की जड़ है और इस झगड़े में इस्लाम को तो नुकसान हुआ ही है पूरी मानवता शर्मसार हुई है। इराक के नरपिशाचों ने तो छोटे-छोटे मासूम बच्चों तक की हत्या निहायत पशुता के साथ की है। कभी एलटीटीई प्रमुख प्रभाकरण के बेटे की श्रीलंकाई सैनिकों द्वारा की गई हत्या की तस्वीरों ने पूरी दुनिया को विचलित कर दिया था लेकिन इराक में तो न जाने कितने मासूमों के गले पर बेहरमी से चाकू चलाए गए।

मित्रों,सवाल उठता है कि अफगानिस्तान,इराक और सीरिया में इस्लाम इतना बेरहम क्यों है? धर्म को मानव ने बनाया है धर्म ने मानव को नहीं बनाया फिर धर्म के नाम पर नरसंहार का क्या औचित्य है? अगर कुरान-शरीफ या किसी अन्य इस्लामिक पुस्तक में हिंसा को बढ़ावा देनेवाले वाक्य मौजूद हैं तो निश्चित रूप से उनको हटा दिया जाना चाहिए क्योंकि वे अब सामयिक नहीं रह गए हैं। धर्म का काम शांति स्थापित करना होना चाहिए न कि खूरेंजी को बढ़ावा देना। पूरी दुनिया में सिर्फ सुन्नी या शिया ही शेष रह जाएँ तो क्या गारंटी है कि दुनिया में शांति स्थापित हो जाएगी और सुन्नी और शियाओं के गुट आपस में ही नहीं लड़ेंगे? याद रखिए दुनिया का प्रत्येक मानव प्रकृति की ओर से दुनिया को व मानवता को एक अमूल्य देन है। एक समय था जब मानव मानव के लिए मर रहा था और आज मानव मानव को मार रहा है? मानव का मानव के साथ प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है और जो भी धर्म इस धर्म को नहीं मानता है वह धर्म नहीं अधर्म है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 30 जून 2014

महामूर्ख हैं शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती

30 जून,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैं नहीं जानता कि हिन्दुओं के लिए पूजनीय शंकराचार्यों का चुनाव किस प्रक्रिया के तहत किया जाता है लेकिन मैं यह जरूर जानता हूँ कि वह प्रक्रिया दोषपूर्ण है। क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो एक दंभी,घमंडी और महामूर्ख द्वारिका पीठ का स्वामी नहीं होता। आपने एकदम सही समझा है मैं स्वरूपानंद सरस्वती की ही बात कर रहा हूँ जो न तो ज्ञानी हैं,न ही तत्त्वदर्शी,तो ब्रह्मज्ञानी हैं और न ही आत्मज्ञानी फिर भी शंकराचार्य हैं और उस शंकराचार्य के उत्तराधिकारी माने जाते हैं जिसने कभी पूरी दुनिया से कहा कि ब्रह्मास्मि। तत् त्वमसि।। इन श्रीमान् ने वैसे तो पहले भी जमकर मूर्खतापूर्ण बातें की हैं लेकिन पिछले कुछ दिनों में तो इन्होंने हद ही कर दी है।

मित्रों,इन श्रीमान् का कहना है कि चूँकि साईं बाबा का जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था इसलिए हिन्दुओं को उनकी पूजा नहीं करनी चाहिए। मैं नहीं जानता कि स्वरूपानंद ने कहाँ से इस तथ्य का पता लगाता लेकिन अगर यह सत्य भी है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि साईं बाबा एक महामानव थे। हम उनको राम और कृष्ण की श्रेणी में तो नहीं रख सकते लेकिन कबीर और रामकृष्ण परमहंस जैसे संतों की श्रेणी में तो रख ही सकते हैं। हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण यह नहीं रहा है कि कोई जन्मना क्या था बल्कि महत्त्व इस बात का रहा है कि कोई कर्मणा क्या था। रावण तो जन्मना ब्राह्मण था लेकिन हम उसको नहीं पूजते। महान हिन्दू संन्यासी स्वामी विवेकानंद ने तो यहाँ तक कहा है कि अगर वे ईसा को सूली चढ़ाने के समय मौजूद होते तो उनके रक्त को अपने माथे पर लगाते और अपने रक्त से उनके चरण धोते तो क्या विवेकानंद पर माता काली नाराज हो गईँ? स्वामी स्वरूपानंद को कैसे पता चला कि राम उमा भारती से नाराज हैं? क्या राम ने स्वयं आकर उनको इस बात की जानकारी दी? क्या स्वरूपानंद अन्य लोगों को भी राम के दर्शन करवा सकते हैं?

मित्रों,हम हिन्दू शुरू से ही महामानवों के साथ-साथ पशु-पक्षी,पेड़-पौधों और धरती के कुछ भू-भागों,मिट्टी पत्थरों के पिंडों तक की पूजा करते आ रहे हैं फिर मानव तो रामकृष्ण परमहंस के अनुसार ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है और साईं तो महामानव थे। हम साईं के शरीर की पूजा नहीं करते बल्कि उनकी त्यागपूर्ण जिंदगी और कृतियों को पूजते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार अगर कोई अच्छे लोगों के प्रति श्रद्धा नहीं रखता और बुरे लोगों से नफरत नहीं करता तो वह मानव कहलाने के योग्य ही नहीं है। फिर कोई कैसे साईं के प्रति श्रद्धा नहीं रखे?

मित्रों,इस स्वरूपानंद ने तो गंगा पर भी एक धर्म विशेष का एकाधिकार बता दिया है। कितनी बड़ी मूर्खता है यह! क्या यह महामूर्खता नहीं है? क्या हवा,नदी और धरती पर भी किसी का एकाधिकार हो सकता है? मैं ऐसे कई मुसलमानों को जानता हूँ जिनके घर गंगा किनारे हैं और जो सालोंभर गंगा स्नान करते हैं तो क्या इससे गंगा हिन्दुओं के लिए पूजनीय नहीं रही? यह आदमी बार-बार शास्त्रों का उदाहरण देता है। ऐसे ही लोगों के लिए कबीर ने कभी कहा था कि
मैं कहता हूँ आँखन देखी,तू कहता कागद की लेखी,
तेरा मेरा मनुआ एक कैसे होई रे।
लेकिन लगता है कि इन श्रीमान् ने कबीर के इस दोहे को कभी पढ़ा ही नहीं है। अनुभव हमेशा ज्ञान से बेहतर होता है ये श्रीमान् यह भी नहीं जानते। श्रीमान् शास्त्रों में संतोषी माता और साईं बाबा को ढूंढ़ रहे हैं। मैं नहीं श्री रामकृष्ण परमहंस कहते हैं कि चूँकि सारे शास्त्रों में मनमाफिक हेराफेरी की गई है इसलिए वे झूठे हैं। उनके अनुसार ईश्वर गूंगे का गुड़ है इसलिए उसका वर्णन किया ही नहीं जा सकता। ईश्वर का वास तो अच्छे गुणों और कर्मों में हैं। कोई तो पढ़ाओ इस स्वरूपानंद को रामकृष्ण साहित्य।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 22 जून 2014

डॉ. मंजू गीता मिश्र के यहाँ पुरुष करता है महिलाओं का अल्ट्रासाउण्ड

पटना,ब्रजकिशोर सिंह। पटना के कदमकुआँ का जगतप्रसिद्ध जगतनारायण रोड। नाम बड़े और दर्शन छोटे चारों तरफ गंदगी-ही-गंदगी। यहीं पर स्थित है पटना की सबसे प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. मंजू गीता मिश्र का महलनुमा क्लिनिक,एमजीएम। दिन शनिवार,तारीख-21 जून,2014। दिखाने के लिए महिलाओं की भीड़। डॉक्टर साहिबा एक सुर में सारी नई मरीजों को खून जाँच और अल्ट्रासाउण्ड लिख रही हैं। एक असिस्टेंट भी है जो नौसिखुआ मालूम होती है क्योंकि वो बार-बार दवाओं का उच्चारण गलत लिख देती है। पूछने पर महिलाएँ और उनके परिजन डॉक्टर साहिबा की ईलाज से काफी संतुष्ट दिखे। यहाँ मरीजों के बाहर जाने की जरुरत नहीं सारी जाँच यहीं पर हो जाती है। मगर तभी थोड़ी देर बाद सीमा अल्ट्रासाउण्ड जो उसी परिसर में स्थित है में कुछ हंगामा होने लगता है। पता चला कि इसका नाम मरीजों को धोखा देने के लिए सीमा अल्ट्रासाउण्ड रखा गया है दरअसल भीतर में एक पुरुष डॉक्टर महिलाओं के गर्भाशय और गुप्तांगों का अल्ट्रासाउण्ड कर रहा है। जब एक महिला मरीज के पति ने इस पर आपत्ति की तो डॉक्टर ने कहा कि मेडिकल क्षेत्र में तो ऐसा होता है।

वहाँ उपस्थित महिलाओं से जब हमने पूछा कि आप एक पुरुष डॉक्टर से अल्ट्रासाउण्ड करवाने में असहज तो नहीं महसूस करतीं तो उन्होंने कहा कि करती तो हैं मगर करें क्या। मंजू गीता जी से दिखवाना है तो सहना ही पड़ेगा लेकिन अगर कोई महिला अल्ट्रासाउण्ड करती तो जरूर ज्यादा अच्छा होता। उनका यह भी कहना था कि पटना में हर जगह तो महिला डॉक्टर ही अल्ट्रासाउण्ड करती है फिर यहाँ पर पुरुष क्यों? उन महिलाओं में से कुछ तो मुसलमान भी थीं जिनका मजहब इन सब बातों को लेकर काफी सख्त है। इस बारे में जब डॉ. मंजू गीता मिश्र से बात करने की कोशिश की गई तो वे ओटी में व्यस्त रहने के कारण उपलब्ध नहीं हो सकीं।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)