बुधवार, 6 दिसंबर 2017

क्या कांग्रेस आतंकी संगठन नहीं है?

मित्रों, हमारे पूर्वजों ने जो आजादी की लडाई के समय गर्व से सीना चौड़ा करके कहते थे कि मैं कांग्रेसी हूँ कभी सपने में भी नहीं सोंचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब कांग्रेस देशविरोधी आतंकवादियों की पार्टी बन जाएगी. क्या विडंबना है कि पाकिस्तान में जब भारत का सबसे बड़ा घोषित शत्रु आतंकी संगठन जमात उद दावा का संस्थापक हाफिज सईद चुनाव लडेगा तब लडेगा भारत में तो कांग्रेस पार्टी कई दशकों से न केवल चुनाव लडती आ रही है बल्कि देश पर अधिकांश समय राज भी किया है.

मित्रों, आतंकी सिर्फ वही नहीं होता जो फसाद करता है और निर्दोषों की हत्या करता है बल्कि वो भी आतंकी है जो उनको आर्थिक या नैतिक समर्थन देता है. हाफिज सईद अगर आतंकी है तो उससे सहानुभूति रखनेवाला हर व्यक्ति और हर संगठन आतंकी है. मौलाना मसूद अजहर अगर आतंकी है तो उसको लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ में वीटो करनेवाला चीन भी आतंकी है. चीन और पाकिस्तान तो फिर भी हमारे जानी दुश्मन है लेकिन यह समझ में नहीं आता कि स्वर्णिम इतिहास वाली कांग्रेस पार्टी कैसे भारतविरोधी आतंकियों से सहानुभूति रख सकती है. क्या उसको अब भारत में राजनीति नहीं करनी है? पाकिस्तान से चुनाव लड़ना है?

मित्रों, क्या कारण है जब भी किसी आतंकी का मुकदमा कोर्ट में जाता है तो कांग्रेसी वकीलों की फ़ौज उनके बचाव में खड़ी हो जाती है? कपिल सिब्बल का सोनिया और राहुल गाँधी के लिए वकालत करना तो समझ में आता है लेकिन सिमी, याकूब मेनन , कन्हैया, ख़ालिद उमर के लिए उनका व अन्य कांग्रसियों का कोर्ट में पैरवी करना समझ में नहीं आता. यहाँ तक कि तीन तलाक और राम मंदिर के मुद्दे पर भी सिब्बल कट्टरपंथी मुस्लिमों के पक्ष में खड़े होने से नहीं चूकते। यहाँ तक कि जब पाकिस्तान की अदालत हाफिज सईद को रिहा करती है तो कांग्रेस के होनेवाले महाराज राहुल गाँधी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता. वे इसके लिए पाकिस्तान की आलोचना करने और भारत सरकार के साथ मिलकर एकजुटता दिखाने के बदले उसका मजाक उड़ाने लगते हैं वो भी निहायत फूहड़ शब्दों में कि मोदी जी आपको ट्रम्प से और गले मिलना होगा हाफिज बाहर आ गया है. हद तो यह है कि कश्मीर में कांग्रेस का साझीदार फारूख अब्दुल्ला इन दिनों लगातार भारत के खिलाफ बोल रहा है फिर भी कांग्रेस चुप लगाए हुए है जैसे वो उसके ही मन की बात बोल रहा हो. सैयद अली शाह गिलानी के साथ कांग्रेसी नेताओं के कितने मधुर सम्बन्ध हैं यह हमलोग कई बार समाचार चैनलों पर देख चुके हैं.

मित्रों, कांग्रेस इतने पर ही रूक जाती तो फिर भी गनीमत थी जब चीन और भारत की सेना डोकलाम में आमने-सामने थी तब राहुल जा पहुंचे चीनी दूतावास में चीन के राजदूत से गले मिलने और कदाचित उनको यह बताने कि चढ़ बैठो भारत पर मैं तुम्हारे साथ हूँ. सिर्फ ऊपर के नेताओं तक बात थम जाती तो फिर भी गनीमत थी आज स्थिति इतनी बुरी हो गई है कि कांग्रेस के जिला और प्रखंड स्तर के कार्यकर्त्ता लश्कर के आतंकी निकल रहे हैं. जिस नोटबंदी के चलते कश्मीर में आतंकवाद में कमी आई है कांग्रेस अभी भी उसकी आलोचना किए जा रही है. समझ में नहीं आता कि अगर कश्मीर में आतंकवाद में कमी आती है तो इससे कांग्रेस को कैसी हानि हो रही है? क्या आपने कभी कांग्रेस को कश्मीर में होनेवाली किसी आतंकी घटना की निंदा करते हुए देखा है? आपको यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि हिज्बुल चीफ सैयद सलाऊद्दीन १९८७ में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुका है. आपको यह जानकर भी आश्चर्य होगा कि जब केंद्र में मनमोहन और कश्मीर में छोटे अब्दुल्ला की सरकार थी तब सीआरपीएफ़ के जवानों को कश्मीर में बिना हथियार के ड्यूटी करने के लिए बाध्य किया गया था. इतना ही नहीं आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने पर सेना के अधिकारियों को जेल जाना पड़ता था और कई तो अभी भी जेल में हैं.

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

कांग्रेसी कसमें और वादे बातें हैं बातों का क्या

मित्रों, क्या आपने कभी सब्जियों के दरख्तों का बगीचा देखा है? नहीं, क्या बात करते हैं? लगता है कि आपने चुनाव-दर-चुनाव कभी कांग्रेस पार्टी का घोषणा-पत्र नहीं पढ़ा है या फिर आपकी याददाश्त कमजोर है भारत की उस जनता की तरह जो ३ साल में ही भूल जाती है कि कांग्रेस ने केंद्र में यूपीए सरकार के समय कैसे-२ और कौन-२ से घोटाले किए थे. क्या कहा आपने कि आप उस पार्टी को झूठी व ठग पार्टी मानते हैं इसलिए आप उसका घोषणापत्र पढ़ते ही नहीं. वाह फिर तो आप बहुत समझदार हैं लेकिन तभी जब आप उसको वोट भी नहीं दें.

मित्रों, अब देखिए और सोंचिए न कि कांग्रेस पार्टी अपने घोषणापत्र में जो वादे लेकर आई है उसमें दूरदर्शिता क्या है? क्या इसमें कहीं यह बताया गया है कि वो राज्य के विकास के लिए क्या करेगी,राज्य के लोगों का जीवन-स्तर सुधारने के लिए क्या करेगी? बल्कि वो तो कहती है कि गुजरात के लोगों को पता है कि खुद का विकास कैसे करना है। अच्छा फिर आपकी जरुरत ही क्या है? वो यह भी भरमाते हैं कि विकास की अंधी दौड़ नहीं होनी चाहिए, विकास का मतलब खुश रहना होता है।

मित्रों, केंद्र में जब यूपीए की सरकार थी तो इसने सबको क्या मस्त खुश किया था? ए राजा खुश मतलब जनता खुश, एयर चीफ मार्शल त्यागी खुश जनता खुश, माल्या खुश पूरा देश खुश हाथ में किंगफिशर की बोतल पकड़कर. मतलब कि इन मतलबी लोगों का तो नारा ही यही है कि स्वयं जेब फाड़कर खाऊँगा और सबको पेट फाड़कर खाने दूंगा. खुद खुश रहूंगा और सारे घोटालेबाजों को खुश रखूंगा. जनता को चाटने के लिए लोल्लीपॉप थमा दूंगा. वैसे भी राहुल बाबा के अनुसार सुख और कुछ तो है नहीं मन की एक अवस्था मात्र है.

मित्रों, स्वतंत्र भारत के चुनावी इतिहास पर जब हम नजर डालते हैं तो घनघोर आश्चर्य होता है कि कांग्रेस पार्टी बार-२ काठ की हांडी में चुनावी खिचड़ी कैसे पका ले रही है और जनता कैसे उनके हाथों ख़ुशी-२ ठगी जाती है. कैसे जनता हो पता ही नहीं होता कि उसको ठगा गया है.

मित्रों, हमारे प्रधान सेवक जी को भी इन दिनों जो कहना चाहिए नहीं कह रहे हैं हालाँकि कर तो वही रहे हैं जो उनको करना चाहिए. हम जानते हैं कि भारत के कुछेक लोगों के लिए अभी भी नेशन फर्स्ट नहीं है लेकिन प्रधान सेवक जी को इसके लिए आह्वान करने से किसने रोका है? जब उनके मन में कोई खोट या छल नहीं है तो फिर देश की जनता से खुलकर और साफ़-२ बात करनी चाहिए कि हम जो भी अलोकप्रिय कदम उठा रहे हैं आपके लिए उठा रहे हैं, हम जो कुछ भी कर रहे हैं वो आपके लिए और आपके देश के लिए कर रहे हैं इसलिए कष्ट के खेद है और उसके बाद उनको बोलना चाहिए कि कांग्रेस के कैरेक्टर सर्टिफिकेट में छेद ही छेद है. ठीक उसी तरह से निर्भय होकर जनता से बात करनी चाहिए जैसे वो २०१४ में करते थे.

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

पढ़े फारसी बेचे तेल

मित्रों, जबसे १९९१ में भारत में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई तभी से देश में रोजगाररहित विकास के आरोप लगते रहे हैं हालाँकि इस दौरान देश की जीडीपी में तीव्र और अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिली है. २०१४ में जब नरेन्द्र मोदी की सरकार सत्ता पर काबिज हुई तो इस वादे के साथ कि वो हर साल १ करोड़ लोगों को रोजगार देगी. लेकिन अब तक इस दिशा में जो काम हुआ है वो कहीं से भी सराहनीय या संतोषजनक नहीं कहा जा सकता. तथापि अगर प्रति वर्ष १ करोड़ रोजगारों का सृजन कर भी लिया जाता है तो भी बेरोजगारी बढ़ेगी ही क्योंकि खुद केंद्र सरकार के आकंडे बताते हैं कि तेज जनसंख्या-वृद्धि के चलते देश में हर साल १२ मिलियन यानि १ करोड़ २० लाख नए श्रमिक जुड़ रहे हैं.

मित्रों, सीआईआई के अनुसार, वित्त वर्ष 2012 से 2016 के बीच भारत में रोजगार के 1.46 करोड़ मौके बने थे. यानी हर साल 36.5 लाख अवसर. साल 2016 की श्रम मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, बावजूद इसके पिछले सात सालों में टेक्सटाइल्स और आॅटोमोबाइल सहित आठ सेक्टर में रोजगार सृजन सबसे धीमा रहा है। 

मित्रों, प्रौद्योगिकी में उभरती तकनीकी के चलते भी नौकरियों में गिरावट देखने को मिली है।  मैककिंसे एंड कंपनी की एक रिसर्च आर्म्स ने 46 देशों में 800 से अधिक व्यवसायों को रिकवर किया, जिसके अनुसार 2030 तक दुनियाभर के कुल 800 मिलियन श्रमिक रोबोट और आॅटोमेटेड तकनीक के चलते अपनी नौकरियां खो सकते हैं। यह संख्या पूरी दुनिया के मजदूरों का पांचवा हिस्सा है. देश की सबसे बड़ी भर्ती कंपनी टीमलीज सर्विसेज लिमिटेड के मुताबिक रोबोटिक्स के चलते पिछले साल की तुलना भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के जॉब्स में 30 से 40 फीसदी की कमी देखी जा सकती है। साथ ही नोटबंदी और जीएसटी के चलते भी बहुत-से लघु और माध्यम उद्योग बंद हो गए हैं. उदाहरण के लिए सूरत के साड़ी और हीरा उद्योग, कानपुर के चमड़ा उद्योग, भदोही के कालीन उद्योग, लुधियाना के रेडीमेड-वस्त्र उद्योग, मुरादाबाद के पीतल उद्योग, फिरोजाबाद के चूड़ी उद्योग और अलीगढ के ताला उद्योग से जुड़ी कई फैक्ट्रियों पर ताले लग चुके हैं. यहाँ मैं आपको बता दूं कि लघु और माध्यम उद्योग कृषि के बाद भारत में सबसे ज्यादा रोजगार देनेवाला क्षेत्र है और इसमें लगभग ४५ करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है. साथ ही भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इसकी हिस्सेदारी भी ४५ प्रतिशत की है.

मित्रों, अगस्त महीने में, औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग द्वारा जारी एक परिपत्र में कहा गया है कि भारत को भविष्य के लिए एक नई औद्योगिक नीति बनाने की जरूरत है, ताकि देश में प्रतिवर्ष कम से कम 100 अरब डॉलर की एफडीआई आकर्षित की जा सके। इस परिपत्र में यह दर्शाया गया है कि भारत में रोजगार सृजन ग्रोथ बिल्कुल धीमी है। इस नई औद्योगिक नीति के लिए केंद्र सरकार ने एक टास्क फ़ोर्स गठित किया है।

मित्रों, आर्थिक वृद्धि के साथ रोजगार के मौके बनने की रफ्तार बढ़ाने के लिए नीति आयोग ने भी तीन साल का एक ऐक्शन प्लान पेश किया है, जिसमें विभिन्न सेक्टरों में रोजगार सृजित करने की बात की गई है.

मित्रों, देखना यह है कि सरकार २०१९ तक सिर्फ योजनाएं और टास्क फ़ोर्स ही बनाती रहती है या फिर इस दिशा में धरातल पर कुछ काम भी होता है? वास्तव में संघ सरकार की असली परीक्षा इसी मोर्चे पर होनेवाली है. कल की तिमाही रिपोर्ट में जीडीपी भले ही उड़ान भर रही हो लेकिन इस समय पूरे भारत में रोजगार के क्षेत्र में मंदी है क्योंकि जिन क्षेत्रों में वृद्धि के चलते जीडीपी ने गति पकड़ी है उनमें रोजगार-सृजन न के बराबर है.

मित्रों, पढ़े फारसी बेचे तेलवाली कहावत यक़ीनन आपने भी सुनी होगी. हम पर तो यह बखूबी चरितार्थ भी हो रही है. आज ही मैंने हाजीपुर में ५००० रूपये मासिक पर नौकरी पकड़ी है बैठे से बेगारी भला. वैसे अगर भाजपा यूपी निकाय चुनाव जीतने के बाद इस मुगालते में है कि नोटबंदी और जीएसटी के बावजूद जैसे उसने यह चुनाव जीत लिया वैसे ही लोकसभा चुनाव भी आसानी से और प्रचंड बहुमत-से जीत जाएगी भले ही बेरोजगारी कम होने के बदले पहले से भी ज्यादा हो जाए तो निश्चित रूप से वो गलत है और इस दिशा में उसे परिणामात्मक कार्य करके दिखाना ही होगा वो भी २०२२ नहीं बल्कि २०१९ तक.

सोमवार, 13 नवंबर 2017

आसां नहीं है आदमी का मोदी होना

मित्रों, मिर्जा ग़ालिब ने कहा था कि बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना. कितने दूरदर्शी थे ग़ालिब जो यूरोप-अमेरिका से काफी पहले ही दो पंक्तियों में पूरे-के-पूरे अस्तित्ववादी दर्शन को कह डाला था.
मित्रों, अस्तित्ववाद कहता है कि हम जीवनभर अप्रामाणिक जीवन जीते हैं. हम बनना कुछ और चाहते हैं लेकिन बनते कुछ और हैं,हम करना कुछ और चाहते हैं लेकिन करते कुछ और हैं. मसलन मुकेश दिल्ली से मुंबई नायक बनने जाते हैं लेकिन परिस्थितिवश गायक बन जाते हैं. वैसे आरक्षण भी इन दिनों पढ़े फारसी बेचे तेल को चरितार्थ करने में अपना महती योगदान दे रहा है. अस्तित्ववाद तो यहाँ तक कहता है कि अगर हम प्रामाणिक जीवन नहीं जी सकते तो जिए ही क्यों?
मित्रों, सौभाग्यवश हमारा भारतीय दर्शन इस मामले में भी अतिवादी नहीं है. गीता में श्रीकृष्ण ने साफ शब्दों में हजारों साल पहले ही कहा था कि तेरे वश में परिणाम है ही नहीं बस कर्म है यद्यपि परिणाम वैसे ही होते हैं जैसे हमारे कर्म होते हैं.
मित्रों, तो हम बात कर रहे थे ग़ालिब की और आदमी के चाहकर भी इंसां नहीं हो पाने की मजबूरी की. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो मजबूरियों के आगे मजबूर नहीं होते बल्कि उत्तरोत्तर मजबूत होते जाते हैं. ऐसी ही एक शख्सियत का नाम है नरेन्द्र दामोदरदास मोदी. घनघोर गरीबी में उनका बचपन गुजरा लेकिन गरीबी उनके मनोबल को तोड़ न सकी और उसका बालमन सपना देखने लगा गरिबीविहीन भारत का. गृहस्थजीवन के छोटे-से दायरे में सिमटना उसने स्वीकार नहीं किया और पत्नी की रजामंदी से गृह त्याग दिया.
मित्रों, विवेकानंद की तरह हर क्षण भारत के लिए चिंतित रहनेवाला वो युवक पूरी जवानी भारत की खाक छानता रहा और भारत को समझने का प्रयास करता रहा. फिर अचानक उसके जीवन में गुजरात के भूकंप के रूप में भूकंप आया और उसने खुद को तबाह गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पाया. पहले से कोई राजनैतिक अनुभव नहीं. कभी विधायक भी नहीं रहा था लेकिन वो घबराया नहीं और कुछ ही महीनों में गुजरात को फिर से खड़ा कर दिया और खड़ा भी कहाँ किया-चीन के आगे ले जाकर.
मित्रों, फिर ट्रेन में आग लगाकर आततायी मुसलमानों ने जिनमें से कई कांग्रेस पार्टी से जुड़े थे कई दर्जन निर्दोष हिन्दुओं को जिंदा जलाकर मार डाला और भड़क उठी दंगे की आग. जिन लोगों ने ट्रेन में यात्रियों को जलाकर दंगों की शुरुआत की उनको बचाने और मोदी को फंसाने की साजिश प्रधानमंत्री निवास और १० जनपथ में रची जाने लगी क्योंकि तब तक दिल्ली में सोनिया-मनमोहन की सरकार बन चुकी थी. वे लोग भूल गए कि हिन्दू कभी दंगों की शुरुआत नहीं करते. मोदी को रोजाना दरिंदा, खूनी, खूंखार आदि कहा जाने लगा. मानो उस समय केंद्रीय सत्ता के पाम दो ही काम रह गए थे-एक घोटाला करना और दूसरा योजना बनाना कि मोदी को कैसे जेल में डाला जाए और गुजरात से उखाड़ फेंका जाए. लेकिन मोदी डरे नहीं, घबराए नहीं, लडखडाए भी नहीं और ६ करोड़ गुजरातियों के विश्वास के बल पर सारी साजिशों को नाकाम कर दिया.
मित्रों, मोदी जब भारत के प्रधानमंत्री बने तब उनके माथे पर उम्मीदों का भारी बोझ नहीं पहाड़ था. जीडीपी को गति देनी थी, भ्रष्टाचार को कम करना था, बेरोजगारी दूर करनी थी, दुनिया में भारत के मान को पुनर्स्थापित करना था आदि. कुछ मोर्चों पर काम हुआ है तो कुछ पर अभी बहुत-कुछ होना है.
मित्रों, मोदी से इस दौरान कुछ गलतियाँ भी हुई हैं फिर भी हम ऐसा नहीं कह सकते कि मोदी की नीयत में खोट है यद्यपि उनसे नीतिगत भूल हुई है. मोदी का सीना कल भी भारत के लिए धड़कता था और आज भी केवल भारत के लिए ही धड़कता है. वाजपेयी की तरह ही आगे नाथ न पीछे पगहा. आज भी भारत की जनता ही मोदी का परिवार है, भारत के लोगों का प्यार ही मोदी की संपत्ति है.
मित्रों, इस बीच कुछ नेता मोदी की नक़ल करके खुद को मोदी साबित करने में जुट गए हैं. मोदी मंदिर जाते हैं इसलिए वे भी मंदिर जाते हैं जबकि वे न तो जन्मना और न ही कर्मना हिन्दू हैं. वे लोग जो इन दिनों अपने आपको विशुद्ध हिन्दू साबित करने में लगे हैं कुछ समय पहले ही सभी हिन्दुओं को आतंकवादी सिद्ध करने में जीजान से लगे थे और कहते थे कि लोग मंदिरों में पूजा करने नहीं लड़कियों के साथ छेड़खानी करने जाते हैं. जाहिर है कि रावन साधू बनकर सीतारुपी जनता को ठगने के लिए फिर से आया हुआ है और हर दरवाजे को खटखटाता फिर रहा है. शायद इस रावन को पता नहीं है कि नक़ल करके कोई मोदी नहीं बन सकता बल्कि ५६ ईंच का सीना लेकर जियाले माँ के पेट से पैदा होते हैं.
मित्रों, हो सकता है कि भविष्य में मोदी के लिए भी आज का मोदी बने रह पाना संभव न रह जाए. सब जनता के विश्वास पर निर्भर करेगा कि आगे मोदी और मजबूत होंगे या फिर खूँटी में टंगे अपने झोले को उठाकर फिर से देशाटन पर चल देंगे जैसा कि वे पहले कह भी चुके हैं. यद्यपि अगर ऐसा होता है तो यही समझा जाएगा कि भारत की जनता मोदी जैसे महान राष्ट्रभक्त के नेतृत्व के लायक है ही नहीं उसे तो लल्लू-पंजू चोर-बेईमान-लुटेरा-राष्ट्रद्रोही नेतृत्व ही चाहिए.

रविवार, 12 नवंबर 2017

राहुल गाँधी को ज्ञान प्राप्ति

मित्रों, सारी दुनिया जानती है कि आज से ढाई हजार साल पहले सिद्धार्थ गौतम को भारी तपस्या के बाद बोधगया के बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. सारी दुनिया यह भी जानती है कि गौतम अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल अर्थात बाधा को घर पर छोड़ कर रात्रि के समय गृहस्थ जीवन से पलायन कर गए थे.
मित्रों, बुद्ध के ढाई हजार साल बाद एक और राहुल भारतभूमि पर अवतरित हुए हैं और इनको भी ज्ञानप्राप्ति की तलाश है. लेकिन इसके लिए ये जंगल नहीं जा रहे बल्कि बार-बार थाईलैंड और यूरोप के चक्कर काट रहे हैं. यहाँ तक कि विदेशी बिगडैल महिलाओं के साथ होटल में कमरा भी साझा करते हैं. ऐसा लगता कि इनको रजनीश के दिए सम्भोग से समाधि के सिद्धांत पर कुछ ज्यादा ही यकीन है. 
मित्रों, यह मेरा व्यक्तिगत मत कदापि नहीं है कि इस अबोध बालक के उलटे क्रियाकलाप में इसका किंचित भी दोष नहीं है. दोषी तो इसके लिए आलेख और भाषण लिखनेवाले अथवा इसको सलाह देनेवाले हैं क्योंकि ये बेचारा तो आज से ३०-३५ साल पहले भी सादा स्लेट था और आज भी है. अब आज से कुछ दिन पहले ८ नवम्बर को अख़बारों में प्रकाशित इस चिरबालक के नाम से प्रकाशित आलेख को ही लें जिसमें सिवाय झूठ के और कुछ है ही नहीं. आलेख कहता है मोदी सरकार ने काफी तेज गति से आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर दिया है.
मित्रों, जबकि वास्तविक आंकड़े तो यही बता रहे हैं कि जब अर्थव्यवस्था अर्थशास्त्र के डॉक्टर मनमोहन सिंह के हाथों में थी तब उसकी हालत २०१० के बाद से ही दिन-ब-दिन ख़राब होती जा रही थी. देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर 2012-13 के दौरान तो 4.5 फ़ीसदी रही थी जो कि पिछले एक दशक की सबसे कम थी. इससे पहले विकास दर वर्ष २०१० में ८.९, २०११ में ६.७ प्रतिशत थी. सोनिया-मनमोहन सरकार के अंतिम वर्ष २०१३ में विकास दर हांफती हुई ४.७ प्रतिशत रही थी.
मित्रों, मोदी सरकार के शुभागमन के बाद वित्‍त वर्ष 2014-15 में देश की विकास दर लम्बी छलांग लगाती हुई 7.2 फीसदी पर पहुँच गयी. फिर 2015-16 में भारतीय अर्थव्यवस्था में 7.6 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई और वास्तविक प्रति व्यक्ति आय भी 6.2 फीसदी बढ़कर 77,435 रुपए हो गई। २०१६-१७ में विकास दर में हल्की सी गिरावट आई और यह ७.१ प्रतिशत पर रही. मगर ऐसा होना किसी भी प्रकार से अप्रत्याशित नहीं था क्योंकि अर्थव्यवस्था के शुद्धिकरण के लिए की गई नोटबंदी के बाद ऐसा होना अपेक्षित ही था.
मित्रों, अब आप ही बताईए कि राहुल के आलेख में सच का लेश भी है? अर्थव्यवस्था की हालत तो घोटालों के चहुमुखी विकास के चलते उनकी सरकार के समय ही ज्यादा ख़राब थी और मृत्युगामी थी. आश्चर्यजनक तरीके से बाद में और ८ नवम्बर से पहले गुजरात में दिए गए अपने कई भाषणों में भी राहुल ने मोदी सरकार को तेज गति से आगे बढती अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर देने का आरोप लगाया.
मित्रों, चूंकि हम उनको आज भी अबोध बालक समझते हैं इसलिए हमें उनसे कोई गिला-शिकवा नहीं है बल्कि हम तो उस व्यक्ति के परम पवित्र चरणों को ढूंढ रहे हैं जो उनके लिए भाषण और आलेख तैयार करता है. वैसे सोनिया ताई हमारे जैसे अकुलीन की सुननेवाली नहीं हैं फिर भी हम उनसे अनुरोध करना चाहते हैं कि ताई उधार के ज्ञान से न तो कोई बुद्धत्व की प्राप्ति कर पाया है और न ही भविष्य में कर पाएगा बैशाख पूर्णिमा तो हर साल आता है और चला जाता है. फिर काहे उपले में घी लपेट रही हो इस उम्मीद में कि एक दिन उपला रोटी बन जाएगा? हो सकता है कि राहुल गुजरात चुनाव जीत भी जाएं लेकिन इसके लिए उसकी बौद्धिक योग्यता नहीं बल्कि सीधे तौर पर बुद्धिमान गुजरातियों की मूर्खता जिम्मेदार होगी.

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

गुजरात चुनाव,चीन और पाकिस्तान

मित्रों, एक बार फिर से दो राज्यों के चुनाव सर पर हैं. इसमें भी गुजरात चुनाव को लेकर उत्सुकता कुछ ज्यादा ही है. ऐसा लग रहा है जैसे चक्रव्यूह में अभिमन्यु को फंसाने की तैयारी चल रही हो. इस युद्ध में एक तरफ तो गुजरात और भारत के गौरव मोदी हैं वहीँ दूसरी तरफ विपक्ष ही नहीं बल्कि सीधे चीन और पाकिस्तान भी हैं. सवाल उठता है कि क्या गुजरात के लोग विशेषकर हिन्दू गुजरात के गौरव को हराकर चीन-पाकिस्तान को जिताएंगे?

मित्रों, हमने चीन और पाकिस्तान का नाम इसलिए लिया क्योंकि डोकलाम विवाद के समय चीन ने भारत सरकार को इसका परिणाम भुगतने की धमकी दी थी. फिर डोकलाम विवाद के समय राहुल चीनी दूतावास में कोई रिश्ते की बात तो करने गए नहीं थे. जहाँ तक पाक का सवाल है तो उसके नापाक मंसूबे किसी से छुपे हुए नहीं हैं. पाकिस्तान कभी नहीं चाहेगा कि भारत में देशहित को सर्वोपरि माननेवाली सरकार हो. पाकिस्तानी पत्रकार टीवी बहसों में खुलेआम कहते रहे हैं कि अगर मोदी तदनुसार हिन्दू राष्ट्रवाद को कमजोर करना है तो हिन्दुओं में फूट डालनी होगी.  पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने हार्दिक को प्लांट किया, आरक्षण आन्दोलन खड़ा करवाया और जानबूझकर हिंसा करवाई गयी.

मित्रों, इस युद्ध में एक पक्ष मीडिया भी है. बिहार चुनावों की तरह एक बार फिर से मीडिया माहौल को जातिवादी बना रही है. आपको याद होगा कि एबीपी पर जहानाबाद की हालत को इस तरह से बयां किया जा रहा था मानों वहां की हालत कश्मीर से भी ख़राब हो. इसी तरह से एनडीटीवी के रवीश कुमार बिहार में लोगों से उनकी जाति पूछते फिर रहे थे.

मित्रों, जिस तरह राम-रावण युद्ध में दुनिया के सारे राक्षस एकजुट हो गए थे वैसे ही गुजरात में भी इस समय एकजुट हो गए हैं. गुजरात चुनाव सिर्फ एक चुनाव नहीं है यह एक प्रयोग है जिसको आईएसआई आजमाने जा रही है. सवाल उठता है कि क्या हम आईएसआई के इस प्रयोग को सफल हो जाने देंगे? प्रश्न उठता है कि बिहार में भाजपा को हरा दिया गया था मगर परिणाम क्या हुआ? बिहार का विकास पूरी तरह से ठप्प हो गया और नीतीश कुमार को मन मार कर फिर से भाजपा के साथ जाना पड़ा.

मित्रों, हम मानते हैं कि कुछ गलतियाँ भाजपा से भी हुई हैं. सेक्स सीडी मामले में एकतरफा कार्रवाई करते हुए पत्रकार को भीतर कर दिया लेकिन मंत्री पर कार्रवाई नहीं की गई. साथ ही मुकुल राय को पार्टी में शामिल करना तो गलत है ही इसकी टाइमिंग भी गलत है. पार्टी को बताना चाहिए कि शारदा मामले में आरोपी मुकुल अब कैसे भ्रष्ट नहीं रहे. साथ ही व्यवसाय प्रधान राज्य होने के कारण कुछ असर तो जीएसटी का भी पड़ेगा.

मित्रों, फिर भी अंत में मैं गुजरातियों से पूछना चाहूँगा कि उनको विकसित भारत और गुजरात चाहिए या आरक्षण के नाम पर बर्बादी चाहिए. हम जब बचपन में क्रिकेट खेलते थे तब टॉस के समय सिक्का उछालने के समय हमेशा भारत को ही चुनते थे भले ही हर बार टॉस हार जाएं. जिस तरह से हमने २०११  और २०१६ में पश्चिम बंगाल, २०१२ में यूपी, २०१५ में बिहार की जनता को सचेत किया था उसी तरह से गुजरात की जनता को चेताना चाहेंगे कि अगर वो आरक्षण के चक्कर में पड़ेंगे तो गुजरात का भी विकास रूक जाना निश्चित है. आरक्षण की राजनीति ने पिछले २५-३० सालों में बिहार को कहाँ-से-कहाँ पहुंचा दिया जगजाहिर है. बिहार को आरक्षण ने लालू जैसा लम्पट दिया फिर गुजरात का हार्दिक तो इस मामले में लालू के बेटे से भी ज्यादा तेजस्वी है. जिस तरह लालू कभी बिहार का भला नहीं कर सकते वैसे ही हार्दिक भी गुजरात का भला नहीं कर सकता बस लालू की तरह आपको उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा करता रहेगा. ये तो अभी से ही होटल से थैली और अटैची भर-भर के रूपया ले जाने लगा है.

बुधवार, 25 अक्तूबर 2017

नीतीश जी आप ऐसे तो न थे

मित्रों, आपको याद होगा कि जब नीतीश कुमार जी २००५ में बिहार के मुख्यमंत्री बनाए गए थे तब बिहार की सडकों की क्या स्थिति थी. स्टेट हाईवे तो स्टेट हाईवे राज्य के नेशनल हाईवे की स्थिति भी इतनी बुरी थी कि पता ही नहीं चलता था कि गड्ढे में सड़क है या सड़क में गड्ढा. तब नीतीश जी ने दरियादिली दिखाते हुए न सिर्फ स्टेट हाईवे बल्कि नेशनल हाईवे की भी मरम्मत राज्य सरकार के खजाने से करवाई थी जबकि ऐसा करना उनकी जिम्मेदारियों में शामिल नहीं था. तब उनकी सोंच महान थी कि पैसा कहीं से भी व्यय हो राज्य का भला होना चाहिए.
मित्रों, अभी कुछ दिनों पहले जब हमने उन्हीं नीतीश कुमार जी को बिहार के विश्वविद्यालयों के बारे में मीडिया से बात करते हुए देखा तो सहसा न तो आखों को और न ही कानों को ही यकीन हुआ. श्रीमान फरमा रहे थे कि विश्वविद्यालय उनकी जिम्मेदारी नहीं हैं क्योंकि उनके कुलाधिपति तो राज्यपाल होते है.
मित्रों, बात दरअसल यह है कि बिहार राज्य के विवि शिक्षकों और कर्मचारियों को प्रत्येक महीने वेतन और पेंशन नहीं मिलता है. कभी-कभी तो ४-चार महीने की देरी राज्य सरकार की ओर से की जाती है. इस बीच उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कितनी खस्ता हो चुकी होती है का आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं. इस साल सितम्बर का वेतन-पेंशन अभी तक नहीं आया है जबकि सारे खर्चीले हिन्दू त्योहार इसी दौरान आते हैं. इस बीच जब कुछ दिन पहले पत्रकारों ने नीतीश जी से विवि के वेतन-पेंशन के बारे में पूछ लिया तो नीतीश जी ने मामले से पूरी तरह से अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा कि यह उनकी जिम्मेदारियों में आता ही नहीं है.
मित्रों, आप सहज ही अनुमान लगा सकते है कि जब राज्य का मुखिया ही अपनी जिम्मेदारियों के प्रति इस कदर उदासीन होगा तो राज्य में शिक्षा या सम्पूर्ण शासन-प्रशासन की स्थिति कैसे सुधर सकती है? क्या राज्य के विवि में दूसरे राज्य के लोग नौकरी करते हैं या उनमें दूसरे राज्यों के बच्चे पढ़ते हैं? अगर विश्वविद्यालय राज्य सरकार की जिम्मेदारी नहीं हैं तो हैं किसकी जिम्मेदारी? विश्वविद्यालय अधिनियम क्या अमेरिका की विधानसभा में पारित हुए थे या राज्यपाल को कुलाधिपति कहाँ की विधानसभा ने बनाया है? राज्य सरकार में सारे काम तो राज्यपाल के नाम पर ही होते हैं तो क्या मुख्यमंत्री की कहीं कोई जिम्मेदारी है ही नहीं? पता नहीं नीतीश जी को यह पल्ला झाड़ने की बीमारी कहाँ से लगी? कहीं केजरीवाल जी से तो नहीं जो लम्बे समय तक दिल्ली के विभागविहीन मुख्यमंत्री रह चुके हैं?
मित्रों, कदाचित बिहार के दिहाड़ी मजदूर भी नीतीश जी की जिम्मेदारियोंवाली सूची में नहीं आते हैं. तभी तो उनकी सरकार ने पिछले कई महीनों में राज्य में बालू के खनन पर रोक लगा रखी है जिससे राज्य में भवन-निर्माण का काम पूरी तरह से ठप है. अब अगर इन लाखों मजदूरों या विवि शिक्षकों-कर्मचारियों के परिवार में कोई भुखमरी से मर जाता है तो सरकारी डॉक्टर तो यही कहेंगे कि इसकी मौत भुखमरी से नहीं हुई है बल्कि मलेरिया का मच्छर काटने से किडनी में हार्ट अटैक हो गया था?

शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

निरंकुश न्यायपालिका के खतरे

मित्रों, हम सभी जानते हैं कि हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान में न तो कार्यपालिका, न ही संसद और न न्यायपालिका को ही बल्कि संविधान को ही सर्वोच्च कहा है. संविधान के अनुसार कानून बनाना संसद का काम होगा और संविधान की रक्षा करना न्यायपालिका का. यद्यपि तीनों के बीच अधिकारों का बंटवारा करते समय चेक एंड बैलेंस अर्थात नियंत्रण और संतुलन को प्राथमिकता दी गई तथापि उन्होंने इंग्लैंड की तरह संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया जिसके अनुसार राष्ट्रपति नाम मात्र का शासनाध्यक्ष होगा और उसको अपना शासन मंत्रिमंडल के परामर्श से चलाना होगा और वह परामर्श राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होगा.

मित्रों, यह परामर्श शब्द एक जगह और भी संविधान में आया है. संविधान का अनुच्छेद १२४ कहता है कि राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करता है जिन्हें वह इस कार्य के लिए आवश्यक समझता है. यह अनुच्छेद मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति को मुख्य न्यायाधीश से परामर्श लेना अनिवार्य बनाता है.
इसी प्रकार अनुच्छेद २१७ में प्रावधान किया गया है कि किसी उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, सम्बंधित राज्य के राज्यपाल एवं उस राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श लेना अनिवार्य है. परन्तु संविधान में परामर्श शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है कि यह परामर्श बाध्यकारी होगा अथवा नहीं. इसलिए यह पूर्णतः स्पष्ट नहीं है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में किसे प्रधानता होगी राष्ट्रपति को या न्यायाधीशों को.

मित्रों, न्यायपालिका की स्वतंत्रता बहुत संवेदनशील मुद्दा है क्योंकि प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कार्यकाल में उस पर कई गंभीर आघात किए गए थे. उसी समय “प्रतिबद्ध न्यायपालिका” का नारा दिया गया था और वरिष्ठतम जज की उपेक्षा करके उससे जूनियर जज को भारत का प्रधान न्यायाधीश बना दिया गया था. जिसके चलते इमरजेंसी के दौरान न्यायपालिका की भूमिका गौरवपूर्ण नहीं रही. इसीलिए उसके बाद पूरी कोशिश की गई कि न्यायपालिका को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त किया जाए और जजों की नियुक्ति में सरकारी भूमिका को कम किया जाए. 

मित्रों, कुछ इस तरह के माहौल में उपरोक्त अनुच्छेदों  में परामर्श शब्द को परिभाषित करने हेतु सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तीन निर्णय दिए गए जिन्हें ३ न्यायाधीशवाद की संज्ञा दी गई. प्रथम न्यायाधीशवाद में ७ न्यायाधीशों की पीठ ने 4:3 के बहुमत से १९८१ में निर्णय दिया कि अनु. १२४ एवं २१७ में परामर्श का अर्थ भारत के मुख्य न्यायाधीश की सहमति नहीं है. यदि राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश के मध्य मतभिन्नता आती है तो राष्ट्रपति की राय प्रभावी होगी. लेकिन वर्ष १९९३ में द्वितीय न्यायाधीशवाद में ९ न्यायाधीशों की पीठ ने ७:2 के बहुमत से वर्ष १९९३ में निर्णय को उलट दिया. इस निर्णय में परामर्श को सहमति माना गया और विवाद की स्थिति में मुख्य न्यायाधीश की राय को प्रभावी बताया गया. इसी निर्णय के आधार पर कोलेजियम प्रणाली अस्तित्व में आई.

मित्रों, इस प्रणाली में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश एवं २ अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीशों की राय से सरकार को अवगत करा दी जाने की व्यवस्था बनाई, जो कि राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी थी. अपवादस्वरुप सरकार मजबूत एवं ठोस तर्कों से अनुशंसित नियुक्ति को अस्वीकार कर सकती थी किन्तु निर्णय में व्यवस्था थी कि यदि पुनः अनुशंसा करनेवाले न्यायाधीश एकमत से सरकार के तर्कों को दरकिनार करके अनुशंसित नियुक्ति की पुनः अनुशंसा करते हैं तो सरकार यह नियुक्ति करने के लिए बाध्य होगी. इसके बाद वर्ष १९९८ में तृतीय न्यायाधीशवाद में कोलेजियम के आकार को बढाकर सर्वोच्च न्यायालय के ४ वरिष्ठतम जजों को भी शामिल कर लिया गया.

मित्रों, फिर तो माननीय न्यायमूर्तियों ने न्यायाधीश के पद की ऐसी अन्यायपूर्ण बंदरबांट की कि एनजेएसी पर सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान दिए गए आंकड़ों के अनुसार देश के 13 हाईकोर्ट में 52 फीसदी या करीब 99 जज बड़े वकीलों और जजों के रिश्तेदार हैं। आरोपों के अनुसार जजों की नियुक्ति प्रणाली में 200 अभिजात्य रसूखदार परिवारों का वर्चस्व है। सुप्रीम कोर्ट के जज कुरियन जोसफ ने कोलेजियम व्यवस्था में खामी पर सहमति जताते हुए सुधार के लिए खुलेपन की जरूरत जताई थी। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट अपने स्तर पर कोलेजियम व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए न्यायिक आदेश पारित करने में विफल रहा। उसने केंद्र सरकार को ही मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर (एमओपी) में बदलाव करने का निर्देश दे दिया।

मित्रों, उसके बाद केंद्र सरकार ने बार-बार न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन के प्रयास किए. अंततः वर्ष २०१४ में वर्तमान केंद्र सरकार ने १२१वां संविधान संशोधन विधेयक २०१४ एवं राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक को दोनों सदनों से १४ अगस्त,२०१४ को पारित करवाया. तत्पश्चात राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को १३ अप्रैल, २०१५ को भारत सरकार के राजपत्र में अधिसूचित कर दिया गया. इस जन्म से पहले मार दिए गए राष्ट्रीय नियुक्ति आयोग में ६ सदस्य होने थे जिनमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के ही २ वरिष्ठतम न्यायाधीश, केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री और दो प्रतिष्ठित व्यक्ति जो ३ सदस्यीय समिति जिसमें प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता शामिल होंगे द्वारा चयनित होंगे शामिल होने थे. परन्तु १६ अक्टूबर २०१५ को सर्वोच्च न्यायलय ने न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर की अध्यक्षता में ५ न्यायाधीशों की पीठ ने ४:1 बहुमत से संविधान संशोधन को असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया और पुराने कोलेजियम प्रणाली को ही जारी रखने का निर्णय देते हुए इसकी खामियों में सुधार हेतु सुझाव मांगे. संविधान संशोधन और आयोग के गठन वाला कानून संसद के दोनों सदनों ने बिना किसी विरोध के पारित किया था और उसे 20 विधानसभाओं का भी अनुमोदन प्राप्त था. इसलिए यह कहा जा सकता है कि ये जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करते थे. इतना ही नहीं न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना विधि आयोग और प्रशासनिक सुधार आयोग जैसी संस्थाओं के व्यापक अध्ययन और सिफारिश के बाद की गई थी।

मित्रों, अब जबकि सुप्रीम कोर्ट एमओपी में बड़े बदलाव के लिए राजी नहीं है और उसके बगैर नए जजों की नियुक्ति लटकी है. चीफ जस्टिस के अनुसार विभिन्न हाईकोर्ट में 43 फीसदी पद रिक्त होने से 38 लाख मुकदमे लंबित हैं, लेकिन तथ्य यह भी है कि उच्च न्यायालयों के अलावा अन्य अदालतों में 3.5 करोड़ मुकदमे लंबित हैं। सवाल है कि ये मुकदमे क्यों लंबित हैं? इन अदालतों में तो जजों की नियुक्ति पर कोई गतिरोध नहीं है। न्यायिक सुधारों और जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव के बगैर केवल जजों की संख्या बढ़ाने से आम जनता को जल्दी न्याय कैसे मिलेगा? देश में 1940 और 1950 के दशक के मुकदमे अभी भी लंबित हैं। दूसरी ओर बड़े वकीलों की उपस्थिति से जयललिता और सलमान खान जैसे रसूखदारों के मुकदमों में तुरंत फैसला हो जाता है। पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ने जजों के भ्रष्टाचार को दर्शाते हुए एक हलफनामा दायर किया था। राजनीतिक भ्रष्टाचार पर सख्ती दिखाने वाला सुप्रीम कोर्ट जजों की अनियमितताओं के मामलों में सख्त कारवाई करने में विफल रहा। दिलचस्प है कि जजों को बर्खास्त करने के लिए संविधान में महाभियोग की प्रक्रिया निर्धारित की गई है, लेकिन यह प्रक्रिया इतनी कठिन है कि उसके इस्तेमाल से आज तक कोई भी जज हटाया नहीं जा सका है।

मित्रों, आखिर हमारी अदालतें 19वीं शताब्दी के कानून और 20वीं सदी की मानसिकता से लैस होकर 21वीं सदी की समस्याओं को सिर्फ जजों की संख्या बढ़ा कर कैसे सुलझा सकती हैं? जब सीनियर एडवोकेट्स की नियुक्ति हेतु सभी जजों की सहमति चाहिए होती है तो फिर जजों की नियुक्ति हेतु पांच जजों की बजाय सभी जजों की सहमति क्यों नहीं ली जाती? जब लोकतंत्र के सभी हिस्से सूचना अधिकार कानून के दायरे में हैं तो फिर जज उसके दायरे में आने से परहेज क्यों करते है? जब संसद की कार्यवाही का सीधा टीवी प्रसारण हो सकता है तो फिर अदालतों की कार्यवाही का सीधा प्रसारण या रिकार्डिंग को क्यों रोका जा रहा है? अगर जजों के बच्चे या रिश्तेदार हाईकोर्ट में वकालत कर रहे हैं तो फिर ऐसे जज अपना तबादला खुद कराकर नैतिक मिसाल क्यों नहीं पेश कर पा रहे हैं? सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार तीन महीने से ज्यादा कोई आर्डर रिजर्व नहीं रखा जा सकता। इसके बावजूद तमाम मामलों में सालों साल बाद आदेश पारित हो रहे हैं।

मित्रों, सुप्रीम कोर्ट द्वारा एडीआर मामले मे दिए गए फैसले के बाद सांसद और विधायक का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को व्यक्तिगत विवरण का हलफनामा जरूरी हो गया है। यदि जज भी सत्ता केंद्रों के साथ अपने संबंधों का हलफनामा दें तो उनकी नियुक्ति पारदर्शी हो जाएगी। इस तरह का हलफनामा देने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट की खामोशी चिंताजनक है। नेम और शेम के तहत हलफनामे में विवरण के अनुसार रिश्तेदारों को चयन प्रक्रिया से बाहर होना ही पड़ेगा। इससे समाज के वंचित वर्ग के योग्य लोगों को जज बनने का मौका मिलेगा। हलफनामे में गलत तथ्य होने पर जजों को बगैर महाभियोग के हटाने में आसानी होगी।

मित्रों, सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अपनी जगह है, लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि कॉलेजियम प्रणाली बहुत सुचारु ढंग से काम नहीं कर रही है. इसमें सुधार-संबंधी सुझावों पर विचार करने की बात कहकर खुद सुप्रीम कोर्ट ने प्रकारांतर से यह स्वीकार किया है कि प्रणाली में खामियां हैं. पिछले कई वर्षों के दौरान हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई जजों के भ्रष्टाचार के बारे में सवाल उठे हैं. देश के शीर्षस्थ कानूनविदों में से एक फाली एस. नरीमन ने हालांकि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का विरोध किया था, लेकिन उनका भी यह कहना था कि कॉलेजियम प्रणाली बिलकुल भी पारदर्शी नहीं है और इसे बदलने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि वह आयोग का इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि छह सदस्यों वाले इस आयोग में तीन ऐसे सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान है जिनमें कानून मंत्री भी शामिल होंगे और शेष दो सदस्य ऐसे होंगे जिनका कानून से कोई वास्ता ही नहीं होगा. इस तरह जजों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश पैदा हो जाएगी.

मित्रों, दरअसल सबसे बड़ी समस्या यह है कि एक बार जज बन जाने के बाद उस व्यक्ति पर चाहे कितना भी गंभीर आरोप क्यों न लग जाए, उसे उसके पद से हटाने की प्रक्रिया इतनी कठिन और लंबी है कि हटाना लगभग असंभाव ही है. इसके कारण यह सवाल पैदा होता है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बरकरार रखते हुए उसे जवाबदेह कैसे बनाया जाए. इस समय किसी को भी यह नहीं पता है कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया क्या है और उन्हें किन कसौटियों पर कसने के बाद नियुक्त किया जाता है, यानी उनकी नियुक्ति के लिए क्या मानक तय किए गए हैं. इसलिए यह राय बल पकड़ती जा रही है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बचाने के नाम पर न्यायपालिका ने खुद को निरंकुश बना लिया है. यह अपने अधिकारों का दुरुपयोग तो है ही साथ ही लोकतंत्र में उसका कोई भी स्तंभ निरंकुश नहीं हो सकता.

मित्रों,कहाँ तो हमने सोंचा था कि वर्तमान केंद्र सरकार पूरी-की-पूरी न्याय व्यवस्था में ही आमूल-चूल परिवर्तन करेगी जिससे डिजिटलाईजेशन के इस युग में न्याय पाना चुटकी बजाने जितना आसान होगा और कहाँ अभी तक उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति को लेकर जारी गतिरोध ही दूर नहीं हो सका है. सवाल उठता है कि न्यायपालिका में बांकी के सुधार भी क्या स्वयं न्यायपालिका ही करेगी या संसद को बेधड़क होकर करने देगी जो संसद का संवैधानिक अधिकार भी है? फिर भी मैं मानता हूँ कि सरकार और संसद को इस दिशा में अपना काम तेजी से जारी रखना चाहिए जिससे हमारी न्याय व्यवस्था २१वीं सदी के साथ त्वरित गति से कदम-से-कदम मिलाकर चल सके. अगर आगे भी सर्वोच्च न्यायालय इस पवित्र कार्य में बाधा डालता है तब भी जनता के समक्ष यह तो साबित हो ही जाएगा वर्तमान सरकार की मंशा में कोई खोट नहीं है.

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

जारी है अरेस्ट वारंट, फिर भी थमा दी महिला थाना की कमान

मित्रों, एक कहावत तो आपने सुनी होगी कि भगवान के घर देर है लेकिन अंधेर नहीं. लेकिन बिहार में तो देर भी लगती है और अंधेर भी ख़त्म नहीं होता. हाजीपुर में पुलिस डिपार्टमेंट का एक अजीब कारनामा सामने आया है. मामला है वारंटी एसएचओ को थाने की कमान देने का. दरअसल मुजफ्फरपुर कोर्ट की वारंटी लेडिज पुलिस सब इंसपेक्टर पूनम वैशाली के हाजीपुर महिला थाना की थानेदार हैं. कोर्ट के आदेश की परवाह नहीं है. संबंधित कोर्ट से लेकर डिस्ट्रिक्ट जज, उच्च न्यायालय में उनकी अग्रिम जमानत अर्जी खारिज हो चुकी है. लोकायुक्त पटना तक मामला पहुंच चुका है.कानून की अवहेलना का मामला संज्ञान में लाए जाने के बाद लोकायुक्त भी हैरान हैं. वैशाली एसपी को जीएससीसीए रूल का हवाला देते हुए पूछा गया है जिस पुलिस पदाधिकारी को निलंबित करते हुए उनके विरुद्ध विभागीय स्तर पर कार्रवाई होनी चाहिए थी वे अपने पद पर कैसे बनी हुई हैं. कैसे वे थानेदारी कर रही है?

लोकायुक्त पटना ने इस मामले को गंभीरता से लिया है. मामले की सुनवाई की तिथि 25 जुलाई 2017 निर्धारित करते हुए आरोपी को हाजिर कराने के संबंध में एसपी को लिखा गया था. वहीं हाजीपुर महिला थाना की एसएचओ पूनम कुमारी के खिलाफ आरोपों की जांच कर तीन माह के भीतर रिपोर्ट देने को कहा गया है.

मामले में आरोपित की गईं एसआई पूनम ने अग्रिम जमानत के लिए कोर्ट में आवेदन दिया था. 14 दिसंबर 1999 को कोर्ट ने वेल पीटिशन खारिज कर 10 दिनों के भीतर कोर्ट में समर्पण करने का आदेश दिया था.

 इसके बाद वे डिस्ट्रिक्ट जज की कोर्ट में एंटी सेपरेटरी बेल के लिए 234/99 पीटिशन दिया वह भी मामले की गंभीरता देखते हुए खारिज कर दिया गया. संबंधित कोर्ट ने बार-बार अहियापुर थाना जहां वे पोस्टेड थीं उसे रिमांइडर देकर आरोपी दाराेगा को कोर्ट में सदेह हाजिर कराने का आदेश दिया.

वैशाली जिला में योगदान दे रही एसआई पूनम कुमारी फिलवक्त हाजीपुर महिला थाने की थानेदार हैं. पूनम कुमारी इससे पहले मुजफ्फरपुर में पोस्टेड थीं. मुजफ्फरपुर के अहियापुर थाना में 17 वर्ष पूर्व उनके खिलाफ कांड संख्या 99/99 के तहत आपराधिक मामला दर्ज हुआ था.

इतना ही नहीं वैशाली महिला थाना की थानाध्यक्ष का काम सँभालने के दौरान भी पूनम कुमारी के विरुद्ध जाति सूचक गाली देकर मारपीट करने के कई मुकदमें दर्ज हो चुके हैं. नगर थाना क्षेत्र के मीनापुर मधुवन मोहल्ला की रामपरी देवी द्वारा अक्टूबर २०१६ में दायर किए गए मामले में तो उनका वेल पेटीशन भी रद्द हो चुका है. आरोप है कि जब पीड़िता अपने पुत्र एवं बहू द्वारा की जा रही मारपीट की शिकायत करने थाना पर गई तो थाना प्रभारी पूनम कुमारी ने अनुसूचित जाति की इस बुजुर्ग महिला को जाति सूचक गालियां देते हुए थप्पड़ मारकर गिरा दिया।

इसी तरह २५ मार्च २०१७ को महिला थानाध्यक्ष पूनम कुमारी समेत छह लोगों के विरुद्ध मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के न्यायालय में एक आपराधिक मामला दायर किया गया। उक्त मामला बरांटी ओपी क्षेत्र में बरुआ बहुआरा गांव के नागेंद्र सिंह ने दायर किया है।

दायर मामले में महिला थानाध्यक्ष पूनम कुमारी के अलावे अवर निरीक्षक अर्चना कुमारी, सहायक अवर निरीक्षक प्रदीप राय, चौकीदार विनोद पासवान, राजापाकर थाना क्षेत्र के दयालपुर गांव के विभा देवी तथा अजय कुमार सिंह को नामजद आरोपी बनाया गया है। भादवि की धारा 323, 379, 384 406 तथा 409 अंतर्गत दायर इस मामले को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी जयराम प्रसाद ने जांच एवं साक्ष्य हेतु अपनी निजी संचिका में रख लिया है।

मित्रों, जब मैंने खुद थाना पर जाकर थानाध्यक्ष से इन मामलों पर बात करने की कोशिश की तो उन्होंने यह कहते हुए कि यहाँ मिडिया का प्रवेश प्रतिबंधित है सीधे हम पर ही गालियों की बौछार कर दी. मैं नहीं समझता हूँ कि जब तक पूनम कुमारी महिला थाने की थानेदार है किसी भी महिला को यहाँ से न्याय मिल भी सकता है. वे सिर्फ पैसा पहचानती है. यहाँ तक कि थाना परिसर में ही रहनेवाले नाका न. २ के कर्मियों से भी पानी देने के बदले एक-एक हजार रूपये मांग रही है. मैं समझता हूँ कि उसने और बांकी से थाना स्टाफ ने व्यापक पैमाने पर भ्रष्टाचार करके काफी ज्यादा कालाधन और बेनामी संपत्ति भी अर्जित की है जिसकी भी जाँच होनी चाहिए. साथ ही इस बात की भी जाँच होनी चाहिए कि उसको किन-किन लोगों का वरदहस्त प्राप्त है जिसके बल पर वो जेल में होने के बजाए आज की तारीख तक थानेदार बनी हुई है.

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

पागल कौन विकास या राहुल?

मित्रों, उन दिनों मैं हाई स्कूल में पढता था. इसी दौरान मुझे आरा जाने का अवसर मिला. वहां रेलवे स्टेशन पर मैंने एक पागल को देखा जो लगातार बडबडा रहा था कि पागल मैं नहीं हूँ पूरी दुनिया पागल है. मैं आश्चर्यचकित था कि इसको खुद के शरीर तक की सुध तो है नहीं और ये पूरी दुनिया को पागल बता रहा है? बाद में कई पागलों के व्यवहारों का जब मैंने सूक्ष्म विश्लेषण किया तो यही समझ में आया कि पागलपन की बीमारी का यह सामान्य लक्षण है कि हर पागल दूसरों को ही पागल समझता है.
मित्रों, मुझे पता नहीं है कि राहुल गाँधी कहाँ तक मानसिक रूप से स्वस्थ हैं लेकिन उनका व्यवहार जबसे वे सार्वजानिक जीवन में आए हैं हमेशा असामान्य रहा है. कभी विधेयक की कॉपी फाड़ने लगते हैं तो कभी लेडिज टॉयलेट में घुस जाते हैं. कभी आलू की फैक्ट्री लगाने की बात करने लगते हैं. कभी भारत-चीन के बीच भारी तनाव के समय चीनी दूतावास में गुप्त मंत्रणा करने चले जाते हैं तो कभी कहते हैं कि लोग मंदिर लुच्चागिरी करने जाते हैं. इतना ही नहीं कभी यह भी कह देते हैं कि भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा कथित भगवा आतंकवाद है जबकि पूरी दुनिया जानती है कि आतंकवाद का रंग हरा होता है भगवा तो हरगिज नहीं. कभी अचानक थाईलैंड की गुप्त यात्रा पर निकल जाते हैं. खुद साल के ६ महीने विदेश में क्यों रहते हैं नहीं बताते लेकिन प्रधानमंत्री की आधिकारिक विदेश यात्रा पर ऊंगली उठाते हैं. इतना ही नहीं प्रेम भी करते हैं तो किसी सामान्य लड़की से नहीं बल्कि पोर्न अभिनेत्री के साथ. कभी भारत की नाकामी के प्रतीक मनरेगा को रोजगार देनेवाली महान योजना बताते हैं तो कभी कहते हैं कि कांग्रेस घमंडी हो गई थी इसलिए हार गयी. कभी कहते हैं कि हम तो रोजगार नहीं ही दे पाए मोदी भी नहीं दे पा रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि भारत इन दिनों एफडीआई में दुनिया में शीर्ष पर है इसलिए भारी मात्रा में रोजगार का आना तय है.
मित्रों, जब प्रधानमंत्री बनना उनके लिए जमीन पर गिरे हुए सिक्के को उठाने से भी ज्यादा आसान होता है तब एक पुतले को पीएम बनाकर अनंत घोटालों का आनंद लेते हैं और जब चुनाव हार जाते हैं तो कहते फिरते हैं कि मैं प्रधानमंत्री बनने को तैयार हूँ. मैं ६ महीने में देश की कायापलट कर दूंगा मानों उनको भी भगवान बुद्ध की तरह अचानक ज्ञान की प्राप्ति हो गई हो. आश्चर्य है राहुल बाबा को आज तक पता ही नहीं है कि एनआरआई किसको कहते हैं! उनको यह भी पता नहीं है कि वे भारत में पैदा हुए हैं या इटली में इसलिए वे भारत की महिलाओं से शोर्ट और निक्कर पहनने की आशा रखते हैं. खुद के हाथों में जब शासन की बागडोर होती है तो देश को भ्रष्टाचार और अराजकता की आग में जान-बूझकर झोंक देते हैं और चीन-पाकिस्तान के हाथों का खिलौना बन जाते हैं और जब अगली सरकार भ्रष्टाचार,आतंकवाद और माओवाद को जड़ से ही समाप्त करने का माद्दा दिखाती है और देश के विकास की गाड़ी को फिर से पटरी पर लाना चाहती है तो चीन से तुलना कर-करके कहते हैं कि विकास पागल हो गया है, विकास को पागलखाने से वापस लाना होगा इत्यादि.
मित्रों, अब आप ही बताइए कि इन दिनों पागल कौन है विकास या स्वयं राहुल गाँधी? विकास अगर पागल था भी तो सोनिया-मनमोहन के समय था. जब एक साथ तीनों लोकों में घोटाले किए जा रहे थे तब विकास पागल था, जब हिंदूविरोधी सांप्रदायिक दंगा विधेयक लाया जा रहा था तब विकास पागल था, जब लालू,मुलायम,मायावती मुकदमों से बरी हो रहे थे तब विकास पागल था, जब भगवा आतंकवाद की झूठी कहानी रची जा रही थी तब विकास पागल था, जब लाल किले से घोषणा की जा रही थी कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ कथित अल्पसंख्यकों का है तब विकास पागल था. अब तो विकास के पागलपन को दूर किया जा रहा है राहुल बाबा.
मित्रों, मैं समझता हूँ कि मोदी सरकार को तो अपनी उपलब्धियों को गिनाने की आवश्यकता ही नहीं है. केरल-कश्मीर से लेकर डोकलाम तक प्रत्येक क्षेत्र में स्वयं उसका काम बोलता है और रोज ही बोलता है. अब राहुल बाबा को दिखाई और सुनाई नहीं दे रहा है तो इसमें हम क्या कर सकते हैं या मोदी सरकार क्या कर सकती है? पेट्रोल के दाम ७-आठ रूपये बढे थे अब कम भी हो रहे हैं. जीएसटी को लेकर भी व्यापारियों को जो समस्याएँ थीं दूर कर दी गई हैं. आश्चर्य है कि राहुल गाँधी को नोट और कागज में कोई फर्क क्यों नजर नहीं आ रहा है? वे क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था का शुद्धिकरण हुआ है? आतंकियों और नक्सलियों की गतिविधियों में कमी आई है. बेनामी संपत्ति की जब्ती से अर्थव्यवस्था पूरी तरह से शुद्ध और पवित्र हो जाएगी. क्या उनसे हम उनकी क्षमता से बहुत ज्यादा की उम्मीद कर रहे हैं? क्या उनके दोनों कानों के बीच का स्थान रिक्त है? क्या उन्होंने विदेश जाकर ऐय्याशी करने के अलावे और कुछ सीखा ही नहीं है या सीख ही नहीं सकते ?
मित्रों, ये तो हद की भी हद हो गयी. जो खुद शुरुआत से ही पागलों सरीखा व्यवहार करता आ रहा है एक भ्रष्टाचार मुक्त शासन देनेवाली और सच्चे मन से भारत को फिर से विश्वगुरु बनाने की दिशा में काम करनेवाली सरकार को ही पागल बता रहा है? ये सब क्या है राहुल बाबा? कब तक बचपना करते रहिएगा? अब तो ४७ साल के हो चुके हैं आप, अब तो अपना ईलाज सही पागलखाने के सही डॉक्टर से करवाईए. बांकी आपकी और आपकी माँ की मर्जी. हम तो सर्वे भवन्तु सुखिनः में विश्वास रखते हैं इसलिए आपकी बीमारी देखकर हमसे चुप नहीं रहा गया.

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

क्या यशवंत सिन्हा सचमुच भीष्म हैं?

मित्रों, पता नहीं क्यों हम अपने संस्कृत और तदनुसार अपनी संस्कृति से कटते जा रहे हैं. कदाचित इसी का परिणाम होता है कि हम कई बार अपने शास्त्रों से गलत उदाहरण दे जाते हैं. हो सकता है कि भारत के पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा अंग्रेजी के विद्वान हों लेकिन भारतीय वांग्मय के बारे में उनकी जानकारी शून्य है यह उन्होंने अपने बारे में गलतफहमीयुक्त उदाहरण देकर साबित कर दिया है.
मित्रों, आप सभी जानते हैं कि यशवंत सिन्हा जी ने पिछले दिनों खुद को भीष्म पितामह घोषित किया है. तो पहले बात कर लेते हैं इसी बात पर कि भीष्म थे कौन और उन्होंने क्या-क्या किया था. भीष्म हस्तिनापुर के राजा शांतनु के पुत्र थे जिनका जीवन महान त्यागों से भरा पड़ा है. किशोरावस्था में उन्होंने पिता की ख़ुशी के लिए आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा की और सिंहासन का परित्याग कर आजीवन हस्तिनापुर की राजगद्दी की सेवा करने का व्रत लिया.
मित्रों, बाद में उनको अपनी प्रतिज्ञाओं के कारण भारी मानसिक क्लेश झेलने पड़े, यहाँ तक कि पुत्रवधू का चीरहरण तक देखना पड़ा लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी. महाभारत की लडाई में भीष्म को अधर्म के पक्ष में सेनापति बनकर युद्ध करना पड़ा. उनकी अपराजेयता से परेशान होकर पांडवों द्वारा पूछने पर धर्मविजय के निमित्त उन्होंने स्वयं अपनी पराजय का उपाय पांडवों को बता दिया. कल होकर उनका सबसे प्रिय पौत्र अर्जुन उनके समक्ष उपस्थित तो हुआ लेकिन अपने आगे शिखंडी को ढाल बनाकर.
मित्रों, शिखंडी के पीछे से वाण चलाकर अर्जुन ने उनके रोम-रोम को अपने पैने वाणों से छेद दिया लेकिन महात्मा भीष्म इस भीषण दर्द को चुपचाप सहते रहे उत्तर नहीं दिया. बाद में शरशैया पर भी तब तक जीवित रहकर ईच्छा मृत्यु के वरदान के बावजूद असह्य पीड़ा को सहते रहे जब तक हस्तिनापुर का सिंहासन चहुँओर से सुरक्षित न देख लिया.
मित्रों, तो ऐसे महात्मा भीष्म से अपनी तुलना करके मियां मिट्ठू बन रहे हैं वयोवृद्ध यशवंत सिन्हा. शायद उनको पता नहीं कि सिर्फ उम्रदराज हो जाने से ही कोई इतना महान नहीं हो जाता कि उस भीष्म पितामह से अपनी तुलना करने लगे जिनके आगे भगवान श्रीकृष्ण का सिर भी श्रद्धा से स्वतः झुक जाया करता था. आईएएस की नौकरी समय से पहले छोड़ने के सिवाय ऐसा कौन-सा त्याग किया है यशवंत बाबू ने और क्या ऐसा करनेवाले वे एकमात्र व्यक्ति हैं? ऐसा उन्होंने किया भी तो अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए किया न कि देशहित या देशसेवा की भावना से आप्लावित होकर. पहले चंद्रशेखर के साथ चिपके फिर भाजपा में आ गए.
मित्रों, आपको याद होगा कि जब यशवंत चंद्रशेखर सरकार में वित्त मंत्री थे तब उनकी महान आर्थिक नीतियों के चलते भारत के खजाने की हालत ऐसी हो गई थी कि भारत को ४७ टन सोना गिरवी तक रखना पड़ा था. वाजपेयी सरकार में जब वे वित्त मंत्री थे तब उन पर कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लगे. उन्होंने कथित तौर पर मारीशस के रास्ते भारी मात्रा में अपने कालेधन को सफ़ेद किया था. उनका कार्यकाल बहुत जल्द इतना विवादित हो गया था कि उनको वित्त मंत्री के पद से हटाना पड़ा. फिर भी भाजपा ने उनका मान रखा और मंत्रिमंडल में बनाए रखा. विदेश मंत्री के रूप में उनकी उपलब्धि क्या रही शायद वे ही बेहतर जानते होंगे.
मित्रों, बाद में वे कई बार हजारीबाग से सांसद बने लेकिन अपने बल पर नहीं पार्टी के नाम पर? क्योंकि सांसद बनकर भी वे ठसकवाले आईएएस ही ज्यादा रहे और जनता से आयरन कर्टन सरीखी दूरी बनाए रखी. पिछली बार अपनी जगह बेटे को खड़ा किया जो इन दिनों संघ सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री हैं. श्री सिन्हा का आरोप है कि इन दिनों भारतीय अर्थव्यवस्था का चीरहरण हो रहा है और वे इसे चुपचाप नहीं देख सकते. सिन्हा जी भारत के इतिहास में पहली बार तो भारत की अर्थव्यवस्था को महान और भ्रष्टाचारमुक्त बनाने की निःस्वार्थ कोशिश हो रही है और आप राग विलाप आलाप रहे हैं? जीडीपी की वृद्धि-दर इस तिमाही में घटी है तो अगली में बढ़ जाएगी इसके लिए उपाय किए जा रहे हैं. रोजगार भी बढ़ेगा बस थोडा-सा धैर्य रखिए ये अभूतपूर्व एफडीआई जो आ रही है कोई अंचार डालने के लिए नहीं आ रही . सिन्हा जी या तो आपको अर्थव्यवस्था की बुनियादी समझ ही नहीं है या फिर आप भी उस शत्रु-मंडली का हिस्सा बन गए हैं जो देश में भ्रष्टाचार की जड़ों को बचाने और चीन-पाकिस्तान के साथ मिलकर देश और मोदी सरकार को कमजोर करने की इन दिनों जी-तोड़ कोशिश कर रही है.
मित्रों, दूसरी बात की सम्भावना ही ज्यादा है कि यशवंत सिन्हा जी जानबूझकर उस कांग्रेस की गोद में जा बैठे हैं जो स्वयं को भ्रष्टाचार का पर्याय बना चुकी है. पता नहीं उनकी ऐसी क्या मजबूरी है कि जीवन की सांध्य-बेला में कौरव-पक्ष और उसका अनाचार उनको ज्यादा प्रिय लगने लगा है?
मित्रों, देश की जनता एक लम्बे समय से राजनेताओं की अवकाशप्राप्ति की उम्र निर्धारित करने की मांग कर रही है जो उचित भी है. यूपीए सरकार के समय रक्षा मंत्री एंटोनी सेना की सलामी के दौरान ही बेहोश हो गए थे. इसी तरह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लाल किले पर झंडे की रस्सी ही नहीं खींच पाए थे. अगर मोदी जी ने राजनेताओं की अवकाशप्राप्ति की आयु अघोषित रूप से निर्धारित कर दी तो क्या गलत किया? नौकरीवाले रिटायर होते है तो नेता क्यों नहीं हों? फिर यह प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होता है कि वो किसको मंत्री रखेगा और किसको नहीं और किस मंत्रालय में रखेगा. क्या सिन्हा जी जबरदस्ती मंत्री बनना चाहते हैं? पता नहीं सच क्या है लेकिन इतना तो तय है कि सिन्हा जी को अपनी तुलना प्रातःस्मरणीय भीष्म पितामह से नहीं करनी चाहिए थी. कहाँ तो उन्होंने कुर्सी का त्याग किया था और कहाँ ये कुर्सी के लिए हस्तिनापुर के राजसिंहासन के ही नहीं बल्कि हस्तिनापुर के शत्रुओं से जा मिले हैं.

शनिवार, 30 सितंबर 2017

दुर्गा पूजा के नाम पर पापाचार

मित्रों, अगर मैं कहूं कि धर्म दुनिया का सबसे जटिल विषय है तो यह कदापि अतिशयोक्ति नहीं होगी. विडंबना यह है कि कई बार जब कोई धर्म अपने मूल स्वरुप में सर्वकल्याणकारी हो तो उसमें स्वार्थवश इतने अवांछित परिवर्तन कर दिए जाते हैं कि वह घृणित हो जाता है तो वहीँ दूसरी ओर कोई धर्म जब अपने मूल स्वरुप में ही राक्षसी होता है और उसमें देश, काल और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन आवश्यक हो जाता है तब उसके अनुयायी परिवर्तन को तैयार ही नहीं होते.
मित्रों, पहले प्रकार के धर्म का सर्वोत्तम उदाहरण बौद्ध धर्म है और दूसरे प्रकार के धर्म का इस्लाम. बुद्ध ने कहा कि ईश्वर होता ही नहीं है लेकिन उनके अनुयायियों ने परवर्ती काल में उनको ही ईश्वर बना दिया. फिर महायान-हीनयान-वज्रयान-तंत्रयान इतने यान आते गए कि बुद्ध द्वारा संसार को दिया गया मूल ज्ञान ही लुप्त हो गया. कुछ ऐसी ही स्थिति कबीर पंथ की हुई. कबीर ने कहा मैं तो कूता राम का मोतिया मेरा नाऊं, गले राम की जेवड़ी जित खींचे तित जाऊं. लेकिन कबीरपंथियों ने उनको इन्सान से सीधे उनके आराध्य राम से भी बड़ा पारब्रह्मपरमेश्वर बना दिया. राधे मां और राम रहीम सिंह ने तो एक कदम आगे बढ़ते हुए खुद को ही भगवान घोषित कर दिया. एक और बाबा थे पंजाब के जिनका जन्म बिहार में हुआ था नाम था आशुतोष महाराज. उनके अनुयायी यह कहकर पिछले ३-४ साल से उनका अंतिम संस्कार नहीं कर रहे हैं कि आशुतोष फिर से जीवित हो जाएंगे. मतलब कि चाहे धर्मगुरु हो या उनके अनुयायी वे धर्म, ईश्वर और नैतिकता की कई बार वैसी व्याख्या करते हैं जिससे उनका स्वार्थ सधता हो. 
मित्रों, दुर्भाग्यवश इस तरह की दुष्टता से जगत की जननी और पालक माँ दुर्गा भी नहीं बची हैं. यह सही है कि मार्कंडेय पुराण के अनुसार दुर्गा माता ने रक्तबीज का खून पीया था और राक्षसों की सेना को सीधे निगल गई थीं लेकिन ऐसा करना युद्धकाल की आवश्यकता थी. रक्तबीज खून के हर बूँद के भूमि पर गिरने से एक रक्तबीज पैदा हो जा रहा था. इसी प्रकार चंड-मुंड के संहार के समय उन्होंने रथ-हाथी-घोड़े और युद्धास्त्रों सहित सीधे-सीधे पूरी सेना को ही निगल लिया था लेकिन वह तो उनकी लीला थी. इसका मतलब यह नहीं कि हम उनको निर्दोष और मजबूर जानवरों की बलि देने लगें. माता ने राक्षसों का संहार किया था न कि निरीह और निर्दोष जानवरों का. इसी पुस्तक के अनुसार महिषासुर-वध से पहले उन्होंने मधुपान किया था जिससे उनके नेत्र लाल हो गए थे. हो सकता है कि यहाँ लेखक ने मदिरा को मधु कहा हो. मगर युद्ध की स्थिति विशेष होती है सामान्य नहीं. कई बार अग्रिम पर्वतीय मोर्चे पर तैनात सैनिकों को भारत सरकार स्वयं शराब उपलब्ध करवाती है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि सैनिक शराबी हो जाएँ और रिटायर्मेंट के बाद सामाजिक समस्या बन जाएँ.
मित्रों, अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि पुराणों की रचना गुप्त और परवर्ती गुप्त काल में हुई थी. इतिहास साक्षी है कि यह वही काल था जब बौद्ध और सनातन धर्म पर तांत्रिकों का कब्ज़ा हो चुका था इसलिए हो सकता है कि तांत्रिकों ने जानबूझकर श्री दुर्गा सप्तशती में इस तरह के वर्णन डाल दिए हों जिनमें माता को रक्त-मांसभक्षक और मद्यप बताया गया हो. समयानुसार ईश्वर का रूप कैसे बदलता है इसके बुद्ध के बाद सबसे बड़े प्रमाण हैं श्रीकृष्ण जो महाभारत काल में योगेश्वर होते हैं लेकिन रीतिकाल आते-आते अपने भक्तों द्वारा भोगेश्वर बना दिए जाते हैं.
मित्रों, कहने का तात्पर्य यह कि मां के नाम पर बलि देना, मांस खाना या शराब पीना न केवल गलत है बल्कि अपराध है इसलिए इस पर तुरंत रोक लगनी चाहिए. फिर गीता-प्रेस द्वारा प्रकाशित दुर्गा-सप्तशती में दुर्गा पूजा की जो विधि बताई गयी है उसमें तो कहीं भी इन राक्षसी या तांत्रिक विधियों की चर्चा नहीं है. यानि जब माँ को सात्विक विधि से भी प्रसन्न किया जा सकता है तो फिर राक्षसी कर्म करने की आवश्यकता ही क्या है?
मित्रों, माता क्या सिर्फ मानवों की माता हैं? क्या वो अन्य प्राणियों की माता नहीं हैं? या फिर अन्य प्राणियों में प्राणरूप में माता की मौजूदगी नहीं है? दुर्गा-सप्तशती तो कहती है कि देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोखिलस्य। प्रसीद विश्वेश्वरी पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य।। (अध्याय ११-३) सम्पूर्ण जगत की माता प्रसन्न होओ. विश्वेश्वरी विश्व की रक्षा करो. देवी तुम्ही चराचर जगत की अधीश्वरी हो. विद्याः समस्तास्तव देवी भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगस्तु. त्वयैकया पूरितम्बयैतत का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः. (अध्याय ११-६) देवी, सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरुप हैं. जगत में जितनी स्त्रियाँ हैं वे सब तुम्हारी ही मूर्तियां हैं. जगदम्ब एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है. तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? आदि-आदि.
मित्रों, मेरे कहने का मतलब यह है कि जिसको मांस-मदिरा का भक्षण करना है करें (यद्यपि मानव शरीर इसके हिसाब से नहीं बनाया गया है) लेकिन इसमें परम करुणामयी और परमपवित्र माता का नाम न घसीटें-खस्सी मार घरबैया खाए हत्या लेले पाहुन जाए क्यों? मेरी माँ तो करुणा की महासागर हैं, निरंतर अहैतुकी कृपा बरसाने वाली हैं वे कैसे किसी मूक-मजबूर का रक्तपान कर प्रसन्न हो सकती हैं? हाँ मेरी माँ दुष्टों का संहार करनेवाली जरूर हैं और तदनुसार दुष्टता का भी इसलिए माँ के साथ माँ का नाम लेकर कृपया छल करने की सोंचिएगा भी नहीं.
मित्रों, इसी प्रकार कई स्थानों पर दुर्गा पूजा के नाम पर किशोरियों को पुजारियों के साथ अधनंगे रखे जाने की परंपरा है. इस तरह की देवदासी प्रकार की हरेक लोकनिन्दित परंपरा भी तत्काल बंद होनी चाहिए क्योंकि स्वयं दुर्गा सप्तशती कहती है कि प्रत्येक स्त्री स्वयं दुर्गास्वरूप है इसलिए स्त्री की गरिमा और सम्मान के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ करना सीधे-सीधे स्वयं दुर्गा माता की गरिमा और सम्मान के साथ खिलवाड़ करना होगा.


शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

राहुल गाँधी की कृत्रिम बुद्धि और हस्तिनापुर

मित्रों, एक समय था जब पूरे भारत पर हस्तिनापुर का शासन था. लेकिन तभी वहां धृतराष्ट्र नामक अंधे को राजा बना दिया गया. जाहिर है कि वो सर्वथा अयोग्य था. आश्चर्य कि वहां की जनता ने भी मनांध की तरह आँख मूंदकर राजपरिवार के इस फैसले को मान लिया और परिणाम यह हुआ कि हस्तिनापुर का बहुत जल्दी पतन हो गया.
मित्रों, दूसरी ओर मगध अपेक्षाकृत एक कमजोर और छोटा राज्य था. लेकिन वहां की जनता ने कभी राजा के कमजोर और अयोग्य पुत्र को राजा के रूप में स्वीकार नहीं किया. बार-बार जनविद्रोह होता रहा, वंश बदलता रहा लेकिन मगध का विस्तार होता गया और एक समय ऐसा भी आया जब पूरे भारत पर मगध का ध्वज लहराता था.
मित्रों, इस समय कांग्रेस पार्टी की स्थिति हस्तिनापुर जैसी है. युवराज निहायत अयोग्य हैं कदाचित दुर्योधन से भी ज्यादा लेकिन पार्टी हस्तिनापुर की जनता की तरह अडी हुई है कि हमें तो यही नेता चाहिए और कोई चाहिए ही नहीं. परिणाम सबके सामने है.
मित्रों, अभी पिछले महीने पता चला कि राहुल जी अमेरिका में कृत्रिम बुद्धि पर कुछ बोलनेवाले हैं. यकीन मानिये हँसते-हँसते अंतड़ियों में दर्द होने लगा. जिसकी खुद की बुद्धि कृत्रिम है वो कृत्रिम बुद्धि पर व्याख्यान देगा? आपने पिछले दिनों देखा भी होगा कि राहुल जी अमेरिका में क्या-क्या बोले जा रहे हैं. मैं मानता हूँ कि इस समय उनके सैम अंकल सैम पित्रोदा अपनी जिंदगी के सबसे कठिन मिशन पर हैं मिशन टोटली इम्पॉसिबल पर. घोडा सुस्त हो तो उसको तेज बनाया जा सकता है लेकिन गधे को घोडा कदापि नहीं बनाया जा सकता.
मित्रों, अब हम आते हैं राहुल गाँधी के अमेरिका के वर्तमान दौरे पर. वैसे मुझे नहीं पता कि इस समय उनका भाषण लिख कौन रहा है. वो जो बोल रहे हैं निश्चित रूप से वे उनके शब्द तो नहीं हैं. चलिए हंसी को दबाने का प्रयास करते हुए एक नजर डालते हैं. राहुल गाँधी फरमाते हैं भारत असहिष्णु हो गया है, भारत वंशवाद से ही चल रहा है, मैं भारत का प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हूँ, दुनियाभर में भारत की प्रतिष्ठा लगातार कम हो रही है, भारत की वर्तमान सरकार की आर्थिक नीति सही नहीं है बल्कि चीन की सही है, भारतीय लोकसभा में ५४६ सदस्य हैं, भारत को एनआरआई ने आजाद कराया था और कांग्रेस एनआरआई द्वारा स्थापित और संचालित एनआरआई पार्टी है, सिर्फ बेरोजगारी की वजह से कांग्रेस चुनाव हार गयी, कांग्रेस को घमंड हो गया था इत्यादि.
मित्रों, आप ही बताईए क्या आप अपनी हंसी रोक पा रहे हैं? चाहे कोई भारत में बेवकूफी करे या अमेरिका जाकर करे कहलाएगी तो बेवकूफी ही. (वैसे अगर उनकी अमेरिकी यात्रा का मुख्य उद्देश्य प्रसिद्ध पोर्न अभिनेत्री के साथ रात बिताते हुए विशेष तकनीकी ज्ञान प्राप्त करना था तब जरूर उनकी अमेरिकी यात्रा उम्मीद से बढ़कर सफल रही है.)  ऊपर से गजब यह कि कांग्रेस बहुत जल्दी इनको अपना अध्यक्ष बनाने जा रही है. बढ़िया है हस्तिनापुर वालों बढ़िया है. हमें तो देशहित से मतलब है और तुम्हारा यह कदम निश्चित रूप से देशहित में होगा. महान मगध की जय, भारतमाता की जय.

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

किसानों के साथ योगी सरकार का मजाक

मित्रों, यह बात किसी से छिपी नहीं है कि आजादी के बाद से अगर कोई व्यवसाय सबसे ज्यादा घाटे में रहा है तो वो है कृषि. कहने को तो किसान अन्नदाता है और पूरे देश का पेट भरते हैं लेकिन उनके खुद के हाथ बारहों मास खाली रहते हैं. अगर आप महंगाई के आंकड़े देखेंगे को पाएंगे कि सबसे कम तेजी से अनाजों के दाम बढ़ते हैं. दूसरी चीजों के दाम आसमान को छू जाएं तो कोई चर्चा नहीं होती लेकिन आलू-प्याज-टमाटर थोड़े से महंगे हो जाएँ तो मीडिया आसमान को सर पे उठा लेती है. मानों किसानों ने लगातार घाटा उठाकर दूसरों का पेट भरने का ठेका ले रखा हो.
मित्रों, अनाज-दाल-सब्जियों की खेती करनेवाले किसानों को आजादी के बाद से ही लगातार वादों का सब्जबाग दिखाया गया लेकिन हुआ कुछ नहीं. अंग्रेजों के समय कम-से-कम उनकी स्थिति इतनी बुरी तो नहीं थी कि उनको आत्महत्या करनी पड़े? वर्तमान केंद्र सरकार भी कहती है कि २०२२ तक किसानों की आय दोगुनी कर दी जाएगी मगर इस दिशा में अभी तक कोई काम होता हुआ दिख नहीं रहा है. पता नहीं रातों रात सरकार ऐसा चमत्कार कैसे कर देगी?
मित्रों, यूपी विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा ने वादा किया था कि जीतने के बाद वो किसानों के कर्ज माफ़ करेगी लेकिन अब लगता है कि किसानों को फिर से उसी तरह से ठगा गया है जिस तरह से पिछली अखिलेश सरकार ने ७५ पैसे और ५ रूपये का चेक देकर ठगा था. कितना बड़ा मजाक है लोन डेढ़ लाख का माफ़ी का चेक १ रूपया और १०० रूपये का? इससे ज्यादा पैसे तो बैंक आने-जाने में ही खर्च हो जाएंगे? फिर क्यों किया कर्ज माफ़? सरकार ने किसानों को भिखारी समझा है क्या जो उनके कटोरे में ५० पैसे और एक रूपये डाल रही है? बतौर अलफांसों जी क्या किसान इतने पैसों के बिना मरे जा रहे थे?
मित्रों, मैं हमेशा से ऐसी कर्ज माफ़ी के खिलाफ रहा हूँ. वास्तव में इससे देश का तो कोई भला नहीं ही होता है किसानों को भी सिर्फ तात्कालिक फायदा होता है. अच्छा हो कि ऐसे इंतजाम किए जाएँ कि किसान भिखारी के बदले वास्तविक दाता बन सकें. मैं तो उस दिन की कल्पना करके डरता रहता हूँ जिस दिन हमारे देश के किसान हड़ताल कर देंगे? क्या आपने कभी सोंचा है कि अगर ऐसा हुआ तो देश की हालत क्या होगी?

रविवार, 17 सितंबर 2017

हैप्पी बर्थ डे मोदीजी

मित्रों, कहते हैं कि भगवान जो भी करता है उसके पीछे कोई न कोई कारण होता है वैसे उनकी कृपा जरूर अहैतुकी होती है. शायद इसलिए हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री और भगवान विश्वकर्मा का जन्मदिन एक ही दिन पड़ता है. एक देवताओं का शिल्पी और दूसरा नए भारत का निर्माता. दोनों ही निःस्वार्थ और दोनों ही निराभिमानी.
मित्रों, आप कहेंगे कि मोदीजी का जन्मदिन तो हर साल आता है फिर इस बार बधाई क्यों. तो इसका उत्तर देने से पहले मैं आपसे एक प्रतिप्रश्न करना चाहूँगा और आपको साढ़े ३ साल पहले के भारत और साढ़े ३ साल पहले की दुनिया में ले जाना चाहूँगा. साढ़े तीन साल पहले भारत की स्थिति कैसी थी आपको याद है? रोज-रोज तत्कालीन संघ सरकार के नए-नए घोटाले सामने आ रहे थे. तीनों लोकों में ऐसा कोई विभाग नहीं बचा था जिसमें घोटाला नहीं किया गया हो.  देश के विकास के लिए सरकार के एजेंडे में कोई स्थान ही नहीं था और लगता था जैसे एकमात्र लूटने-खसोटने के उद्देश्य से ही सरकार का गठन किया गया था. लोग राजनीतिज्ञों से इस कदर निराश हो चुके थे कि कानों में उनके नाम पड़ते ही चेहरे पर स्वतः घृणा के भाव आ जाते थे. वैश्विक परिदृश्य में भारत को कोने में धकेल दिया गया था. यहाँ तक कि पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने हमारे कथित प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हरदम रोनेवाली देहाती महिला घोषित कर रखा था.
मित्रों, अब आते हैं आज के परिदृश्य पर. आज भारत में चतुर्दिक जोश का माहौल है, सरकार के प्रति विश्वास का वातावरण है. ईमानदार खुश हैं और बेईमान परेशान. नोटबंदी और जीएसटी के चलते अर्थव्यवस्था की रफ़्तार कुछ घटी जरूर है लेकिन भविष्य के लिए नई उडान की असीम संभावना भी बनी है. भारत के वे सारे पडोसी जो भारत का अहित चाहते थेभारत की बढती ताकत से परेशान है. पूरे संसार को प्रकम्पित कर देनेवाला ड्रैगन आज भयभीत और शर्मिंदा है. आतंकियों को अब बिरयानी नहीं दिया जाता बल्कि सीधे नरक भेज दिया जाता है. आज पूरी दुनिया हर मानवीय संकट में भारत की तरफ आशाभरी दृष्टि से देख रही है. आज भारत की आवाज दुनिया की सबसे सशक्त आवाज है.
मित्रों, कुल मिलाकर नरेन्द्र मोदी जी ने अपने कार्यों से जनता के मन में राजनीतिज्ञों के प्रति जो घृणा का भाव था उसको न केवल कम किया है बल्कि जनता के मन में अपने प्रति श्रद्धा उत्पन्न की है. वैसे मेरे जैसे निर्धन के पास ऐसा कुछ नहीं है शाब्दिक उद्गारों  के अलावा जो मैं उनको उनके ६७वें जन्मदिन पर भेंट कर सकूं. उल्टे अपने प्रधान सेवक से यह छोटा सेवक रिटर्न गिफ्ट की अपेक्षा रखता है. मेरी उनसे दो मांगें हैं-१. बैंकों में जो न्यूनतम जमा रखने का नियम रखा गया है उसको आय के आधार पर दो श्रेणियों में बाँट दिया जाए. जो लोग आय कर देते हैं उनके लिए तो हजार-दो हजार की सीमा रखी जाए लेकिन जिनकी आय आय कर के दायरे में नहीं आती उनके लिए शून्य बैलेंस को मंजूरी दी जाए. २. पेट्रोल और डीजल की कीमत के सम्बन्ध में सरकार स्थिति स्पष्ट करे. अगर वास्तविक कर-संग्रह में गिरावट के चलते ऐसा करना अनिवार्य है तो पीएम को इसके लिए सीधे जनता से बात करनी चाहिए और जनता-जनार्दन का आह्वान करना चाहिए. इसके साथ ही मोदी जी से अनुरोध करूंगा कि अल्फ़ान्सो जी की दिग्विजयी (मेरा मतलब दिग्विजय सिंह से है) जुबान पर शीघ्रातिशीघ्र ताला लगाएं.
मित्रों, अंत में मैं मोदी जी को उनके जन्मदिन पर बहुत-बहुत बधाई देते हुए ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि उनका स्वास्थ्य हमेशा उत्तम रहे और उनको देश निर्माण की दिशा में लगातार सफलता-दर-सफलता मिलती रहे.

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

मालदा से जयपुर वाया पंचकुला

मित्रों,  कार्ल मार्क्स ने कहा था कि "Religion is the sigh of the oppressed creature, the heart of a heartless world, and the soul of soulless conditions. It is the opium of the people". यानि संप्रदाय अफीम है. यह बात अलग है कि हमारे देश के मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों ने इसको धर्म अफीम है बना डाला जबकि धर्म का मतलब ड्यूटी होता है संप्रदाय नहीं. चूंकि हिन्दू धर्म है संप्रदाय नहीं शायद इसलिए मार्क्सवादियों को ऐसी शरारत करनी पड़ी.  अब चूंकि हिन्दू धर्म है अर्थात नैतिक नियमों का महासागर है इसलिए इसमें कट्टरता का नामोनिशान नहीं है. हमारे किसी भी शास्त्र या पुस्तक में यह नहीं लिखा है कि जो अहिंदू हैं उनसे नफरत करो, लूट लो, उनके साथ बलात्कार करो या उनको मार डालो या उनको बंदी बना लो. बल्कि दुनिया में हमीं ऐसे अकेले हैं जो कहते हैं कि तू वसुधैव कुटुम्बकम या सर्वे भवन्तु सुखिनः या ब्रह्मास्मि तत त्वमसि.
मित्रों, यही कारण है कि जब १९४७ में भारत का संप्रदाय के आधार पर बंटवारा हुआ तो बड़ी संख्या में मुसलमानों ने नए मुस्लिम देश पाकिस्तान जाने के बदले हिंदुस्तान में हिन्दुओं के बीच रहना बेहतर समझा. यह आबादी इतनी बड़ी थी कि आज पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान भारत रहते हैं. फिर आया १९७१. भारत को बेवजह पाकिस्तान से युद्ध करना पड़ा. युद्ध के दौरान भारी संख्या में बंगलादेशी भागकर भारत आ गए. इनमें से भी ९० प्रतिशत से ज्यादा मुस्लमान थे. इनकी आबादी इतनी तेजी से बढ़ी कि भारत के कई राज्यों और महानगरों में ये कानून और व्यवस्था के लिए समस्या बन गए. सबसे बड़ी बात यह थी कि ये आसानी से स्थानीय मुस्लिम आबादी से घुल-मिल गए और वैश्विक इस्लामिक भाईचारा का हिस्सा बन गए. कथित धर्मनिरपेक्ष दलों के तुष्टिकरण ने दुनिया के इस सबसे कट्टर और हिंसक संप्रदाय के साहस को इतना बढाया कि इन्होंने पहले १९९३ में मुम्बई में एक साथ दर्जनों स्थानों पर बम विस्फोट कर हजारों लोगों की हत्या कर दी फिर २००२ में ट्रेन में आग लगाकर कई दर्जन हिन्दू तीर्थयात्रियों को सिर्फ इसलिए जिंदा जला दिया क्योंकि वे हिन्दू थे.
मित्रों, पिछले कुछ महीनों से जबसे संघ में मोदी सरकार आई है सुभाष और विवेकानंद की धरती पश्चिम बंगाल के मुसलमानों का जेहादी खून हिलोरे मारने लगा है. मालदा से शुरू हुई आगजनी, लूटपाट और दंगे पूरे बंगाल में फ़ैल रहे हैं और वो भी प्रशासनिक संरक्षण में. उधर म्यामार में हिंसा हो रही है तो वहां के मुसलमान भी भारत आ रहे हैं लेकिन सवाल उठता है कि बंगाल या भारत के अन्य हिस्सों से जिन हिन्दुओं को भगाया जा रहा है वे भाग कर किस देश में जाएंगे? मुसलमानों के तो ५६ देश हैं हिन्दुओं का कोई दूसरा देश तो है नहीं. नेपाल है भी तो बहुत छोटा है.
मित्रों, इस बीच एक और शहर है जो सांप्रदायिक हिंसा की आग में जला है और वो है हरियाणा का पंचकुला. वहां कुछ हिन्दू और सिख एक पथभ्रष्ट शैतान जो खुद को ईन्सान कहता था के बहकावे में आ गए और शहर को जलाने लगे. फिर तो प्रशासन कहर बनकर टूट पड़ा. देखते-२ कई दर्जन उपद्रवी मिट्टी के ढेर में बदल दिए गए. सरकार ने स्पष्ट घोषणा कर दी कि किसी भी मृतक के परिजन को मुआवजा नहीं मिलेगा. इतना ही नहीं हंगामे से हुए नुकसान की भरपाई डेरा की संपत्ति बेचकर की जाएगी. किसी भी हिन्दू या सिख ने विरोध भी नहीं किया.
मित्रों, अब हमारी दंगा एक्सप्रेस आ पहुंची है जयपुर. वीरों की धरती राजस्थान की राजधानी जयपुर. यहाँ पुलिस का डंडा कथित रूप से गलती से एक मुस्लिम बाईक सवार को लग जाती है जिससे वो गाड़ी सहित गिर जाता है. गाड़ी पर उसकी पत्नी और बच्चे भी होते हैं. फिर आनन-फानन में हजारों मुसलमान थाने पर हमला बोल देते हैं और पूरे शहर में आगजनी शुरू कर देते हैं. ड्रोन से लिए गए चित्र बताते हैं कि मुसलमानों ने दंगों की तैयारी पहले से ही कर रखी थी. एक मुसलमान इसमें मारा जाता है लेकिन परिजन लाश लेने से इंकार कर जाते हैं. राजस्थान सरकार के मानों हाथ-पांव फूल जाते हैं और वो मृतक के परिजनों से समझौता-वार्ता करती है. फिर करार होता है कि सरकार उस महान हिंसक उपद्रवी के परिजनों को १० लाख रूपये और एक नौकरी देगी. इसी दंगे में एक दिव्यांग हिन्दू ऑटो चालक भी मारा जाता है लेकिन प्रशासन उसकी लाश को छिपा जाती है. बाद में उसके परिजन भी लाश लेने से मना करते हैं लेकिन उनके साथ कोई समझौता नहीं किया जाता. उसके परिजनों को न तो १० लाख रूपये ही दिए जाते हैं और न तो नौकरी ही. बाद में मीडिया में किरकिरी होने पर घोषणा की जाती है कि उसके परिजनों को भी वही सब मिलेगा जो आदिल के परिवार को दिया जाएगा. इतना ही नहीं यहाँ संपत्ति की भरपाई दंगा करनेवालों से भी नहीं करवाई जाती.
मित्रों, आपको याद होगा कि सोनिया-मनमोहन कीQ सरकार जो साम्प्रदायिकता अधिनियम लाने पर विचार कर रही थी उसमें भी कुछ ऐसे ही भेदभावकारी प्रावधान थे. कि दंगों के लिए हमेशा हिन्दू ही दोषी माने जाएँगे,मुआवजा सिर्फ मुसलमानों को मिलेगा आदि. तब हमारे साथ मिलकर भाजपा ने इसका सख्त विरोध भी किया था. फिर अब भाजपा राजस्थान में अघोषित रूप से उसी अधिनियम को लागू करने पर क्यों आमादा है? ममता ने तो बंगाल में जैसे उसको बहुत पहले से लागू कर रखा है. मगर हमारा सवाल तो भाजपा से है कि क्या भाजपा ने ख़ुदकुशी की पूरी तैयारी कर ली है? मैं आज भी स्टाम्प पर लिख देने को तैयार हूँ कि मुसलमानों ने आज तक भाजपा को न तो कभी वोट दिया है और न ही कभी देंगे फिर महारानी ऐसा क्यों कर रही है जिससे भाजपा का आधार ही समाप्त हो जाए? भाजपा कहती है कि एक देश में २ कानून नहीं चलेगा फिर वो हरियाणा और राजस्थान में अलग-अलग कानून क्यों चला रही है?

शनिवार, 9 सितंबर 2017

झुकता है चीन झुकानेवाला चाहिए

मित्रों, अगर मैं ये कहूं कि पिछले कुछ साल और खासकर कुछ महीने भारतीय कूटनीति के लिए स्वर्णिम रहे हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. वैसे अपने जीवन में लगातार अप्रत्याशित परिस्थितियों का सामना करनेवाला व्यक्ति अतिरंजनापूर्ण बातें कर भी नहीं सकता.
मित्रों, आप समझ गए होंगे कि मैं भारत-चीन संबंध के सम्बन्ध में बात कर रहा हूँ. इसमें कोई संदेह नहीं पिछले ३ दशकों में चीन अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में हमसे काफी आगे निकल चुका है. लेकिन मैं हमेशा से ऐसा मानता रहा हूँ कि भारत ने इस दौरान जो अवसर खोया चीन ने उसी को लपक लिया. वरना जिस तरह आज भारत एफडीआई के क्षेत्र में दुनिया में नंबर एक है ३ दशक पहले भी हो सकता था, २ दशक पहले भी हो सकता था. सबसे बड़ी बात तो यह है कि भारत में लोकतंत्र था, कायदा था, कानून था बस नहीं थी तो व्यवस्था. वहीँ चीन में तानाशाही थी, एकदलीय शासन था,कानून नहीं था परन्तु व्यवस्था थी.
मित्रों, नरेन्द्र मोदी ने शासन में आने के साथ ही बस इतना किया कि पुराने फिजूल कानूनों को समाप्त कर कानून को कम कर दिया और व्यवस्था को स्थापित किया. डीबीटीएल, प्रत्येक सेवा को ऑनलाइन करना, नोटबंदी, जीएसटी इत्यादि कदम इस दिशा में उठाए गए.
मित्रों, वैदेशिक कूटनीति के क्षेत्र में भी कई बदलाव किए गए. कथित आदर्शवादी नेहरु सिद्धांत जिस पर चल कर भारत को अपनी लाखों वर्ग किलोमीटर जमीन पिद्दी जैसे देशो के हाथों खोना पड़ा था को टाटा बाई-बाई कर दिया गया और एक साथ दुनिया के सारे गुटों के देशो के साथ संबंधों में सुधार पर जोड़ दिया गया. इसी बदलाव का नतीजा है कि चीन को भारत के खिलाफ पहली बार डोकलाम में मुंह की खानी पड़ी और अपनी सेना वापस हटानी पड़ी. इतना ही नहीं चीन को मन मारकर ब्रिक्स के घोषणापत्र में पाकिस्तान से संचालित हो रहे भारत-विरोधी आतंकी संगठनों के खिलाफ प्रस्ताव को मंजूरी देनी पड़ी. आज से ४ साल पहले सोनिया-शासन में क्या हम इस बात की कल्पना भी कर सकते थे?
मित्रों, कुछ लोग जिनको रतौंधी की बीमारी है और जिनका पूर्णकालिक कार्य मोदी सरकार के प्रत्येक अच्छे-बुरे काम की बुराई करना है वे इन दिनों नोटबंदी, जीडीपी और जीएसटी को लेकर रुदाली-रूदन करने में लगे हैं. नोटबंदी और बेनामी संपत्ति पर कार्रवाई से चाहे अर्थव्यवस्था को जो भी तात्कालिक नुकसान हुआ हो लोगों में ईमानदारी की प्रवृत्ति बढ़ी है इसमें कोई संदेह नहीं और मैं समझता हूँ कि यही एक अकेली उपलब्धि बहुत बड़ी है. आज लगभग सारी सरकारी सेवाएँ मोबाइल पर उपलब्ध हैं. आयकर ढांचे में सुधार लाने से आयकरदाताओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है तो वहीँ जीएसटी लागू करने से पूरा-का पूरा व्यापार सुनियोजित हुआ है जिसका लाभ कर-वसूली के क्षेत्र में दिखने भी लगा है और भविष्य में आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी दिखेगा इसमें संदेह नहीं.
मित्रों, सबसे अच्छी बात यह है कि विरोधियों के तमाम विधवा-विलाप के बावजूद अभी भी आम जनता का मोदी सरकार के प्रति विश्वास बना हुआ है. तमाम सर्वेक्षण भी इसकी पुष्टि करते हैं. ऐसे में मोदी सरकार चाहे तो भविष्य में और भी कड़े कदम उठा सकती है हालाँकि अब २०१९ भी ज्यादा दूर नहीं रह गया है.

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

गौरी लंकेश की हत्या एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना

मित्रों, पता नहीं क्यों जबसे कट्टर हिन्दूविरोधी और हिन्दू संस्कृति से घनघोर घृणा करनेवाली कथित पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई है तभी से मुझे ऐसा लगता है कि उनको उनके किसी अपने आदमी ने ही मारा है. क्योंकि मारनेवाले ने उनको आराम से उनके घर के भीतर जाकर मारा. अगर वो अजनबी होता तो लंकेश ने उसे घर में घुसने ही नहीं दिया होता. उनके भाई को शक है कि लंकेश ही हत्या नक्सलियों के की है क्योंकि उन्होंने ऐसा करने की धमकी दे रखी थी. गौरी के भाई के मुताबिक़- गौरी नक्सलियों को मुख्य धारा में लाने की मुहिम की अगुवाई कर रही थीं. कुछ नक्सलियों को मुख्य धारा से जोड़ने में वह सफल भी हुई थीं, जिसकी वजह से वह नक्सलियों के निशाने पर थीं और उन्हें लगातार धमकी भरी चिट्ठी और ईमेल आते थे.
मित्रों, शक का कोहरा इसलिए और भी गहरा हो जाता है क्योंकि हत्यारे का वीडियो फूटेज मौजूद है लेकिन पुलिस के हाथ अब तक खाली हैं. इससे पहले ३० अगस्त, २०१५ को मारे गए कन्नड़ लेखक कलबुर्गी की हत्या किसने की और क्यों की का पता भी आज तक सिद्धारमैया की पुलिस नहीं लगा पाई है.
मित्रों, ऐसा कैसे हो सकता है कि पुलिस के हाथों में हत्यारे का सीसीटीवी फुटेज हो फिर भी वो हत्यारों तक नहीं पहुँच पाए? क्या पुलिस इन दोनों हत्याओं में शामिल लोगों को जानबूझकर पकड़ना ही नहीं चाहती है? क्या इस हत्या के पीछे स्वयं कांग्रेस का हाथ है क्योंकि लंकेश ने इन दिनों अपनी कलम का मुंह उसके मंत्रियों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार की तरफ कर दिया था? तो क्या कांग्रेस पूरे होशो-हवास में हत्या की राजनीति कर रही है?
मित्रों,  पुलिस और कानून-व्यवस्था पूरी तरह से राज्य सरकार का विषय है ऐसे में एक खास विचारधारा से जुड़े लोगों की लगातार हत्या होना और उनका उद्भेदन दो साल बाद तक भी नहीं हो पाना सर्वप्रथम राज्य सरकार की क्षमता पर ही सवालिया निशान लगाता है. मैं कर्नाटक के मुख्यमंत्री से मांग करता हूँ कि या तो वे इन दोनों हत्याओं का खुलासा करें अन्यथा पदत्याग करें क्योंकि उनकी पुलिस जब इतने हाईप्रोफाईल मामलों का रहस्योद्घाटन नहीं कर पाती तो आम आदमी से जुड़े मामलों में क्या खाक कारवाई करती होगी.
मित्रों, अगर राज्य पुलिस अक्षम है तो इसका मतलब यह नहीं कि इन्साफ को दम घुट जाए. वैसे भी लंकेश का भाई कह चुका है कि उसको राज्य पुलिस पर भरोसा नहीं है और मामले की जाँच सीबीआई को करनी चाहिए. लेकिन क्या इसके लिए राज्य सरकार तैयार होगी? नहीं होती है तो क्या वो खुद को शक के कटघरे में नहीं डाल लेगी?
मित्रों, अंत में मैं लेखकों और पत्रकारों से किसी तरह की हिंसा का विरोध करता हूँ. जिसको बहस करनी है करे हम खुद भी चौबीसों घंटे तैयार हैं. कोई अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बेजा फायदा उठाता है तो उसके ऊपर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए जैसे इन दिनों अरुण जेटली केजरीवाल के खिलाफ कर रहे हैं लेकिन हिंसा नहीं होनी चाहिए. 

सोमवार, 28 अगस्त 2017

नमो का सफाई अभियान चालू आहे

मित्रों, जबसे हमने नरेन्द्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बनाया है तभी से वे स्वच्छता पर जोर दे रहे हैं. नेताओं ने हम लोगों को चूंकि चुनाव-दर-चुनाव खूब चकमा दिया है इसलिए हमलोग उनकी बातों को जरा हलके में लेते हैं सो हमें लगा कि मोदी सिर्फ बाहरी साफ़-सफाई की बात कर रहे हैं. लेकिन वास्तविकता में ऐसा था नहीं.
मित्रों, वास्तविकता तो यह थी कि प्रधानमंत्री का आशय हर तरह की स्वच्छता से था फिर चाहे वो सामाजिक, लैंगिक, मानसिक, आर्थिक, शारीरिक, धार्मिक या नैतिक स्वच्छता हो या फिर राजनैतिक. हर पहल की शुरुआत अपने आपसे या अपने घर से होनी चाहिए इसलिए राजनैतिक दलों को मिलनेवाले चंदे को अधिक पारदर्शी बनाया गया. हालाँकि अभी भी स्थिति संतोषजनक नहीं है. अलावा इसके राजनैतिक दलों को आरटीआई के अंतर्गत लाना शेष है. अर्थव्यवस्था में व्याप्त काले धन की सफाई के लिए पहले नोटबंदी लागू की गई फिर जीएसटी लाई गई. मानसिक, सामाजिक व लैंगिक क्षेत्र में स्वच्छ वातावरण बनाने के लिए लाखों पोर्न साईटों पर रोक लगाई गई, खुले में शौच और भ्रूणहत्या के खिलाफ अभियान चलाया गया और ३ तलाक व हलाला की १४०० साल पुरानी सडी-गली अमानवीय बेहूदा प्रथा को समाप्त किया गया. शारीरिक व मानसिक स्वच्छता के लिए योग को बढ़ावा दिया गया. धार्मिक या नैतिक स्वच्छता की स्थापना के लिए पहले आसाराम फिर जाकिर नाईक फिर रामपाल और अब बाबा राम रहीम सिंह जैसे पाखंड के साम्राज्य चलानेवालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई.
मित्रों, आज तक भारत के इतिहास में कभी भी किसी भी ऐसे नेता जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हों या सजा मिल चुकी हो की संपत्ति जब्त नहीं की गई थी. भारत के इतिहास में पहली बार बेहिसाब बेनामी संपत्ति अर्जित करनेवाले नेताओं के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई शुरू की गई है. हालाँकि अभी तक निशाने पर सिर्फ विपक्षी नेता ही हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि सृजन घोटाले की भी निष्पक्ष जाँच की जाएगी और सारे दोषियों पर कार्रवाई करते हुए लूटे गए धन की वापसी की जाएगी फिर चाहे दोषी जीवित हो या मृत या फिर बिहार का वर्तमान मुख्यमंत्री ही क्यों न हो. कश्मीर में आतंकियों और आतंकवाद की चल रही सफाई के बारे में तो आपको पता होगा ही.
मित्रों, इस पूरे शाब्दिक व्यायाम का सारांश यह है कि नरेन्द्र मोदी का स्वच्छता कार्यक्रम चालू है जिसके परिणामस्वरुप वयोवृद्ध माँ भारती के चेहरे पर निखार आना निश्चित है. आज ही खबर आई है कि चीन डोकलाम से अपनी सेना वापस करने के लिए तैयार हो गया है. यह भी सही है कि इस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है लेकिन जिस तेजी से सब कुछ किया जा रहा है बहुत जल्द यह बहुत कुछ कुछ-कुछ रह जानेवाला है इसमें संदेह नहीं. महाकवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने कहा था कि
छल-छद्म धन की किन्तु मैं
सीधी-सादी पटरी-पटरी दौड़ा हूँ जीवन की
फिर भी मैं अपनी सार्थकता से खिन्न हूँ
विष से अप्रसन्न हूँ
इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए
पूरी दुनिया साफ़ करने के लिए मेहतर चाहिए.
हमारा सौभाग्य है कि हमें वो मेहतर मिल गया है. वो हमसे कुछ नहीं चाहता सिर्फ हमारा प्यार, हमारा समर्थन चाहता है. हम तो आज भी उसके साथ हैं क्या आप हैं?

सोमवार, 21 अगस्त 2017

नेहरु की मूर्खता के स्मारक है बांध

मित्रों, मेरा ननिहाल महनार रोड रेलवे स्टेशन के पास है. पहले गाँव में खूब धान उपजता था. लोग पोरा (पुआल) बेचकर घोड़ा खरीदते थे. फिर नेहरु के समय गाँव में नहर खोद दी गई और सब सत्यानाश हो गया. आज वहां एक मुट्ठी धान नहीं होता. गर्मी में नहर सूखी रहती है और बरसात में नहर से होकर इतना पानी आ जाता है कि खेतों में अथाह पानी लग जाता है. तीन फसली जमीन एक फसली हो गई है.
मित्रों, बिहार के ज्यादातर ईलाकों में कमोबेश यही स्थिति है. 1954 से पहले जब तक नदियों को तटबंधों और बांधों में नहीं बाँधा गया था पानी को बहने के लिये काफी खुली जगह मिलती थी. पानी कितना भी तेज हो जन-धन की हानि बहुत अधिक नहीं होती थी. 1954 से पहले नदियाँ खुली जगह में धीमे प्रवाह से बहतीं थीं. मध्दिम प्रवाह उर्वर मिट्टी के बहाव में मदद करता था व आसपास के इलाके उर्वर हो जाते थे. परंतु तटबंध से नदियों को बाँधने के बाद जल भराव व बाढ़ से तबाही होना शुरू हो गया. बिहार की बाढ़ का मुख्य कारण तटबंध और बाँध हैं. तटबंध बाढ़ को नियंत्रित करने व सिंचाई को बढ़ावा देने के लिये हैं परंतु इनसे बाढ़ रुक नहीं पाती है बल्कि तटबंध टूटने से बालू बहुत तेज गति से बहता आता है जिससे आसपास की उर्वर भूमि भी बंजर हो जाती है. तटबंध निर्माण से ठेकेदारी व भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलता है. बिहार में कई सारे ठेकेदार विधायक व मंत्री बन गये हैं. बाढ़ नियंत्रण व सिंचाई के नाम पर ये तटबंध राजनीति की देन हैं. तटबंध बाढ़ से सुरक्षा के बजाय बाढ़ की विभीषिका में वृध्दि करते हैं. अगर आप आंकड़े देखें, जैसे-जैसे तटबंध बनते गये हैं, बाढ़ में तेजी आती गयी है.
मित्रों, यही नहीं पर्यावरणविदों का मानना है कि भूकंप के बाद अगर बाँध चरमराता है व टूटता है तो पूरा उत्तरी बिहार बह जायेगा, कुछ नहीं बचेगा. दूसरे, भूमंडलीकरण के दौर में किस देश का संबंध कब दूसरे देश से बिगड़ जाये कहना मुश्किल है. उदाहरण के लिए बिहार के दरभंगा में चीन को ध्यान में रखकर हवाईअड्डा बनाया गया है. अगर कल चीन के साथ हमारे संबंध गड़बड़ाते हैं और चीन इस बाँध पर बमबारी करता है तो पूरा इलाका बह जायेगा. दूसरे, नेपाल में माओवादी सत्ता में हैं. बिहार में भी कई सारे इलाके नक्सली हिंसा से प्रभावित हैं. बड़े बाँध नक्सलवादियों के निशाने पर हमेशा रहेगें व जरा से हमले से भीषण तबाही आ जायेगी.
मित्रों, बिहार के काफी संवेदनशील माने जानेवाले किशनगंज, अररिया आदि जिलों में इस समय जो जलप्रलय की स्थिति चल रही है हो सकता है कि उसके पीछे चीन का हाथ हो और चीन ने नेपाल को ज्यादा पानी छोड़ने के लिए उकसाया हो. इन पीकॉक नैक कहे जानेवाले सीमांचल के जिलों में लगभग सारे-के-सारे सड़क पुल बह गए हैं. यहाँ तक कि कटिहार के पास रेल पुल भी बह गया है जिससे असम जानेवाली लगभग सारी ट्रेनों को रद्द करना पड़ा है. ऐसी स्थिति में अगर चीन का हमला होता है तो आप आसानी से सोंच सकते हैं कि भारत की क्या हालत होगी. वैसे तो ये बाँध नेहरु की मूर्खता के स्मारक बन चुके हैं लेकिन फिर भी नेहरु को बांध बनाना ही था तो भारतीय ईलाके में बनाते. नेपाल में बनवाने की क्या जरुरत थी? पैसा हमारा और नियंत्रण नेपाल का?
मित्रों, हमारे बिहार में एक कहावत है कि नक़ल के लिए भी अकल चाहिए. अमेरिका, रूस का अन्धानुकरण करने से पहले हमारे राजनेताओं को भारत की स्थिति-परिस्थिति का आकलन जरूर कर लेना चाहिए. यह बात आज के नेताओं पर भी लागू होती है. अब आप कहेंगे कि भविष्य में नदियों पर बड़े बांध बनने चाहिए या नहीं. तो मैं कहूँगा बिलकुल भी नहीं. बल्कि बड़े बाँधों के बजाय लघु बाँध बनने चाहिये. छोटे बाँधों से सिंचाई-क्षमता बढ़ेगी, बिजली उत्पादन भी होगा व बाढ़ से बचाव भी होगा.

सोमवार, 14 अगस्त 2017

बिहार में फिर से बड़े घोटाले का सृजन

मित्रों, हो सकता है कि आपने भी बचपन में आवेदन -प्रपत्र या फोटो सत्यापित करने के लिए किसी स्कूल या कॉलेज के प्रधानाचार्य की मुहर बनवाई होगी और खुद ही हस्ताक्षर करके काम चला लिया होगा. ऐसा करनेवालों में से कुछ तो अब नौकरी में भी होंगे. लेकिन क्या आपने कभी ऐसा सुना है कि कोई किसी राजपत्रित अधिकारी का नकली हस्ताक्षर करके और नकली मुहर लगाकर १००० करोड़ की राशि बैंक से निकाल जाए या अपने चहेते के खाते में स्थानांतरित कर दे? शायद नहीं लेकिन जो बात दुनिया में कहीं नहीं होती वो बिहार में होती है तभी तो बिहार बर्बादी का दूसरा नाम है.
मित्रों, बिहार आकर शब्द भी पथभ्रष्ट हो जाते हैं. अब सृजन शब्द को ही लीजिए. इसका अर्थ होता है निर्माण. कहने का मतलब यह कि सृजन एक सकारात्मक शब्द है. लेकिन बिहार में इसका दुरुपयोग घोटाला सृजित करने के लिए हुआ है और इस तरीके से हुआ है कि पूरी दुनिया सन्न है. भ्रष्टाचार की सत्यनारायण कथा इस प्रकार है कि स्वयंसेवी संस्था सृजन की संचालिका मनोरमा देवी एक विधवा महिला थी। जिसके पति अवधेश कुमार की मौत 1991 मे हो गई जो रांची में लाह अनुसंधान संस्थान में वरीय वैज्ञानिक के रूप में नौकरी करते थे। जिसके बाद मनोरमा देवी अपने बच्चे को लेकर भागलपुर चली आई और वही एक किराए के मकान में रह कर अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करने लगी। गरीबी से मजबूर विधवा ने पहले ठेले पर कपड़ा बेचने का काम शुरू किया फिर सिलाई का और धीरे-धीरे उसका काम इतना बढ़ने लगा कि उसमें और भी कई महिलाएं शामिल हो गई। जिसके बाद 1993-94 में मनोरमा देवी ने सृजन नाम की स्वयंसेवी संस्था की स्थापना की। मनोरमा देवी की पहचान इतनी मजबूत थी कि तमाम बड़े अधिकारी से लेकर राजनेता तक उनके बुलावे पर दौड़ते हुए पहुंच जाते थे। मनोरमा देवी ने अपने समूह में लगभग 600 महिलाओं का स्वयं सहायता समूह बनाकर उन्हें रोजगार से जोड़ा। मित्रों,फिर शुरू हुआ हेराफेरी का खेल. मनोरमा देवी ने सहयोग समिति चलाने के लिए भागलपुर में एक मकान 35 साल तक के लिए लीज पर लिया। मकान लेने के बाद सृजन महिला विकास समिति के अकाउंट में सरकार के खजाने से महिलाओं की सहायता के लिए रुपए आने शुरू हो गए। जिसके बाद सरकारी अधिकारियों और बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत से पैसे की हेराफेरी शुरू हो गयी। देखते-देखते बेवजह लगभग 1000 करोड़ से ज्यादा पैसा समिति के अकाउंट में डाल दिया गया और इसके ब्याज से अधिकारी-कर्मचारी मालामाल होते चले गए। दिखावे के लिए इस संस्था के द्वारा पापड़, मसाले, साड़ियां और हैंडलूम के कपड़े बनवाए जाते थे और  'सृजन' ब्रांड से बाजार में बेचे जाते थे. लेकिनअब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि पापड़ और मसाले बनाने का धंधा केवल दुनिया को गुमराह करने के लिए था. संस्था ने घोटाले के पैसे को बाजार में लगाया, साथ ही रियल एस्टेट में भी लगाया. इन पैसों से लोगों को 16% ब्याज दर पर लोन भी मुहैया कराया गया.
मित्रों, अपनी जिंदगी के 75 साल गुजारने के बाद भ्रष्टाचार की देवी मनोरमा देवी की इसी साल फरवरी में मौत हो गई। उसकी मौत के बाद उसके बेटे अमित और उसकी पत्नी प्रिया ने महिला समिति के कामकाज देखना शुरू कर दिया। जब यह मामला का पर्दाफाश हुआ दोनों फरार हो गए फिलहाल पुलिस उनकी तलाश कर रही है। 1995 से लेकर 2016 तक चले इस घोटाले की अधिकारियों द्वारा जांच पड़ताल की जा रही है और जल्द ही इस लूट में शामिल सारे लोगों को बेनकाब करने का दावा किया जा रहा है।
मित्रों, ऐसा नहीं है कि बिहार में भागलपुर ही एकमात्र अभागा जिला है बल्कि बिहार में जहाँ कहीं भी कोई सरकारी योजना चल रही है, सरकारी फंड का व्यय हो रहा है या सरकारी काम चल रहा है वहां घोटाला है,मनमानी है. इसलिए आवश्यक है कि न केवल भागलपुर में घोटाले के दौरान पदस्थापित सारे कर्मचारियों और अधिकारियों की संपत्तियों की गहनता से जाँच हो बल्कि पूरे बिहार में इस तरह का जाँच अभियान चलाया जाए और भ्रष्टाचार बिहार छोडो के नारे को वास्तविकता का अमलीजामा पहनाया जाए.
मित्रों, सवाल उठता है कि भागलपुर जिले में तीन-तीन डीएम आए और चले गए और तीनों के समय उनके नकली हस्ताक्षर से सरकारी खाते से करोडो रूपये गायब कर दिए गए और कैसे उनलोगों को कानोकान खबर तक नहीं हुई? ऐसा कैसे संभव है? मानो गबन न हुआ झपटमारी हो गई. अगर ऐसा हुआ भी है तो ऐसा होना उन साहिबानों की योग्यता पर प्रश्न-चिन्ह लगाता है और प्रश्न-चिन्ह लगाता है भारतीय प्रशासनिक सेवा में बहाली की प्रक्रिया पर.सवालों के घेरे में एजी और सीएजी जैसी संवैधानिक संस्थाएं भी हैं जो २२ सालों में सरकारी चोरों को पकड़ने में विफल रहीं. कदाचित यह घोटाला आगे भी धूमधाम से चलता रहता अगर भागलपुर के वर्तमान डीएम आदेश तितरमारे का महज ढाई करोड़ का चेक कूद कर वापस न आ गया होता.
मित्रों, बिहार सरकार की काबिलियत पर सवाल उठाने का तो प्रश्न ही नहीं. मैं जबसे नीतीश २०१३ में एनडीए से अलग हुए तभी से कहता आ रहा हूँ कि बिहार में सरकार की मौत हो चुकी है और चारों तरफ अराजकता का माहौल है. लगता है जैसे बिहार में शाहे बेखबर बहादुरशाह प्रथम का शासन हो. मुख्यमंत्री न जाने किस मूर्खों की दुनिया में मस्त थे. कहीं कुछ भी ठीक नहीं. हाई कोर्ट भी कहता है जब पैसे लेकर ही बहाली करनी है तो विज्ञापन,परीक्षा और साक्षात्कार का नाटक क्यों करते हो? सीधे गाँधी मैदान में शामियाना लगाकर नियुक्ति-पत्र क्यों नहीं बाँट देते?

रविवार, 13 अगस्त 2017

यूपी को संभालिए मोदी जी!

मित्रों, मेरी एक बहुत ही प्यारी आदत है. इसे मैं बुरी कहूं या अच्छी कह नहीं सकता. मैं जब भी नींद में होता हूँ सपने देखने लगता हूँ. न जाने कितनी बार मेरे सपनों में मैं भारत को विकसित राष्ट्र के रूप में देख चुका हूँ. न जाने कितनी बार भारत को विश्वगुरु बना देख चुका हूँ. मैंने अपने सपनों में देखा है कि मेरे भारत में कोई गरीब नहीं है. सबके पास पर्याप्त रोटी, कपडा और मकान है. हमारे सरकारी अस्पतालों में ईलाज की बेहतरीन सुविधा है. हमारे शिक्षा-संस्थान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मामले में दुनिया में अद्वितीय है. सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार इतिहास बन चुका है. ओलंपिक में भारत ने दुनिया में पहला स्थान प्राप्त किया है. इत्यादि.  लेकिन जितने सपने मैं सोती आँखों से देखता हूँ उससे कहीं ज्यादा जागते हुए कल्पना करता रहता हूँ.
मित्रों, जब भी मेरे सपनों के पूरा होने की जरा-सी भी उम्मीद जगती है मेरी खुशियों का ठिकाना नहीं रहता लेकिन जब सपने टूटने और बिखरने लगते हैं तो मैं जैसे पीड़ा के अंतहीन महासागर में गोते खाने लगता हूँ.
मित्रों, बिहार में २०१५ में जब एनडीए हारा था तो मेरे सपने भी हारे थे.  मेरी भींगी-२ सी पलकों में रह गए जैसे मेरे सपने बिखर के. तभी से मैं इन्तजार करने लगा था यूपी के चुनाव-परिणामों का. यूपी में जब भाजपा जीती तो मुझे लगा कि नरेन्द्र मोदी जिनकी उम्र मेरी ही तरह देश की उन्नति के सपने देखते गुजरी है अब यूपी में आदर्श-शासन स्थापित कर भारत के बांकी राज्यों को बताएंगे कि देखो राम-राज्य कोरी कल्पना नहीं है-दैहिक दैविक भौतिक तापा,राम राज काहू नहीं व्यापा. उन्होंने इसके लिए जिस व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि चुना वो कड़वा सच बोलने और कड़कपन के लिए ही जाना जाता था. शुरू में लगा कि अब यह व्यक्ति यूपी को बदल कर रख देगा. लेकिन अब धारणाएँ बदलने लगी हैं. सपने टूटे तो नहीं हैं लेकिन दरकने लगे हैं.
मित्रों, क्या जून तक यूपी की सड़कें गड्ढाविहीन हो गई? क्या यूपी पुलिस का रवैया थोडा-सा भी बदला? क्या थाना सहित दफ्तरों में व्याप्त भ्रष्टाचार में किंचित भी कमी आई? क्या शिक्षण-संस्थानों में पढाई के माहौल में कोई बदलाव आया? क्या इस साल जापानी बुखार से गोरखपुर अस्पताल में कम बच्चे मर रहे हैं? अगर नहीं तो फिर यूपी में क्या बदला?
मित्रों, दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तो यह है कि योगीजी को कदाचित अभी तक यह पता ही नहीं है कि करना क्या है और कैसे करना है? कौन-कौन से अधिकारी उनकी टीम में होंगे और किस तरह योजनाओं पर अमल होगा.
मित्रों, हम नहीं चाहते कि भविष्य में यूपी में भाजपा का शासन अपनी असफलताओं के लिए जाना जाए. क्योंकि यूपी भाजपा के लिए एक चुनौती तो है लेकिन अवसर भी है. उसके पास इतना प्रचंड बहुमत है कि वो यहाँ खुलकर प्रयोग कर सकती है. इसलिए मैं मोदीजी से कहता हूँ कि यूपी को संभालिए मोदीजी! सपनों को सिर्फ देखने और दिखाने से काम नहीं चलेगा उनको पूरा भी करना होगा देवता.

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

बिहार की नई राजधानी हाजीपुर!

मित्रों, यह खबर शर्तिया आपको अख़बारों में पढने को नहीं मिली होगी. किसी भी शहर के लिए राज्य की राजधानी होना गौरव की बात होती है लेकिन हाजीपुर के साथ ऐसा कतई नहीं है. बल्कि हाजीपुर के लोग  ऐसा होने पर शर्मिंदा हो रहे हैं. आप कहेंगे कि मैं मजाक कर रहा हूँ लेकिन यह भी सच नहीं है. चलिए मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ कि भारत की आर्थिक राजधानी के रूप में किस शहर को जाना जाता है? आप छूटते ही या फिर सवाल पूरा होने के पहले ही बोलेंगे मुंबई. अब आप सोंच रहे होंगे कि बिहार की आर्थिक राजधानी हाजीपुर है क्या? नहीं भाई वो तो पटना ही है लेकिन बिहार की आपराधिक राजधानी जो पहले से पटना ही था अब पटना नहीं है बल्कि हाजीपुर बन गया है.
मित्रों, यकीन न हो तो किसी भी अख़बार के किसी भी जिला संस्करण को को उलट कर देख लीजिए. रोजाना आपको हाजीपुर में जितनी शराब की बरामदगी, सेक्स रैकेट के भंडाफोड़, हत्या, अपहरण, छिनतई, मार-पीट और लूट की ख़बरें पढने को मिलेंगी क्या मजाल कि किसी और जिले के अख़बार में मिले. ऐसा लगता है जैसे बिहार के सारे अपराधियों ने हाजीपुर को ही अपना आधार-केंद्र बना लिया है. स्थिति ऐसी हो गई है कि हाजीपुर में कारोबार करना अपनी जान के साथ खिलवाड़ करना बन गया है.
मित्रों, आज से दो-ढाई दशक पहले तक हमारा हाजीपुर और हमारा वैशाली जिला ऐसा नहीं था. तब जब हम जहानाबाद, बड़हिया और बेगुसराय के बारे में पढ़ते-सुनते तो हमें अपने आप पर और अपने जिला पर बड़ा गर्व होता कि पूरी दुनिया को अहिंसा का अमर पाठ पढ़ानेवाले भगवान महावीर की जन्मस्थली कितनी शांत है. फिर लालू-राबड़ी के जंगल राज में हाजीपुर अपहरण उद्योग का केंद्र बन गया. अपहरण चाहे बिहार के किसी भी स्थान से हुआ हो अपहृत की बरामदगी हाजीपुर से ही होती थी. २००५ में एनडीए राज आने के बाद यह उद्योग पूरे बिहार के साथ-साथ बिहार में भी बंद हो गया.
मित्रों, लेकिन पिछले करीब चार-पांच सालों में और खासकर जिले में वर्तमान पुलिस कप्तान राकेश कुमार की तैनाती के बाद तो जैसे हाजीपुर ने अपराध के मामले में विश्व-रिकार्ड बना डालने की जिद ही पकड़ ली है. आप कहेंगे कि इसमें पुलिस कप्तान की क्या गलती है तो मैं आपको सलाह देता हूँ कि किसी काम से कभी आप भी एसपी ऑफिस का चक्कर लगा लीजिए. मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर बता रहा हूँ कि पहले तो साहब के अंगरक्षक आपको कार्यालय के बाहर से ही टरकाने की कोशिश करेंगे. अगर आपने एसपी साहब से भेंट कर भी ली तो वो कहेंगे कि उनके नीचे के कर्मचारियों या अधिकारियों से बातचीत कीजिए. कहने का मतलब कि वो कुछ नहीं करेंगे कुछ ले-देकर खुद ही निपटा लीजिए.
मित्रों, जब कप्तान ही ऐसा हो तो टीम के बांकी खिलाडी कैसे होंगे आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं. एक सच्ची घटना पेशे खिदमत है. इन दिनों पटना में सेक्स रैकेट चला रहे लोगों ने भी हाजीपुर का रूख कर लिया है शायद मनु महाराज के डर से. अगर आपका भी हाजीपुर में मकान है और आप उसमें नहीं रहते तो सचेत हो जाईए. ये लोग नकली पति-पत्नी बनकर आपके पास आएँगे और किराया पर फ्लैट ले लेंगे. फिर इनके पति के कथित दोस्तों और पत्नी के कथित भाइयों और बहनों का आना-जाना शुरू होगा जो सारे-के-सारे पटनिया होंगे. इनमें से एक-न-एक हमेशा रास्ते पर नजर रखेगा और मुख्य-दरवाजे को हमेशा बंद रखा जाएगा. फिर जब पडोसी और मकान-मालिक असली खेल को समझ जाएंगे तो डेरा और मोहल्ला बदल दिया जाएगा. फिर पति कोई और बनेगा और पत्नी कोई और. पति और पत्नी की जाति भी बदल जाएगी. हद तो तब हो गई जब मैंने पाया कि ऐसा ही एक चकला मेरे पड़ोस में भी चल रहा था और एक बार तो उक्त फ्लैट के बाहर दारोगा जी से भेंट हो गई. शायद हफ्ता वसूलने आए थे. बेचारे हमसे मिलकर ऐसा झेंपे कि पूछिए मत.
मित्रों, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि हाजीपुर में इन कप्तान साहब को पिछले दो-ढाई सालों से क्यों रखा गया है? क्या हाजीपुर इस मामले में भी उपेक्षित ही रहेगा? क्या हाजीपुर को पटना की तरह तेज-तर्रार पुलिस कप्तान का सुख भोगने का कोई हक़ नहीं? पटना में शिवदीप लांडे, विकास वैभव, मनु महाराज ... जैसे अधिकारी जो मीटिंग नहीं हीटिंग के लिए पूरे भारत में जाने जाते हैं और हाजीपुर में राकेश कुमार जिनको सिवाय मीटिंग के कुछ करना आता ही नहीं है?

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

शराबबंदी से किसको फायदा?

मित्रों, मैं वर्षों से अपने आलेखों में कहता आ रहा हूँ कि बिहार एक प्रदेश या जमीन का टुकड़ा ही नहीं है बल्कि एक मानसिकता भी है. नहीं तो क्या कारण है कि जो योजनाएं बांकी भारत में अतिसफल रहती हैं बिहार में अतिविफल हो जाती हैं. भ्रष्टाचार तो जैसे हम बिहारियों के खून में, डीएनए में समाहित है. लहर गिन कर पैसे कमाने वाले तो आपको देश के दूसरे हिस्सों में भी मिल जाएँगे लेकिन सूखे की स्थिति में भी लहरों का मजा देकर पैसा कमाना सिर्फ हम बिहारियों को आता है.
मित्रों, शराबबंदी से पहले बिहार की क्या हालत थी? छोटे-छोटे गाँव के हर गली मोहल्ले में नीतीश सरकार ने शराब की दुकान खोल दी थी. जिधर नजर जाती थी युवाओं के कदम लड़खड़ाते हुए नजर आते थे. मानों पूरा बिहार नशे में था और मदहोश कदमों से बर्बादी की ओर बढ़ रहा था.
मित्रों, ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गलतियों से सबक लिया और राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी. हमने तब भी कहा था कि बिहार पुलिस भारत ही नहीं दुनिया का सबसे भ्रष्ट संगठन है ऐसे में इस आन्दोलन का सफल होना नामुमकिन हैं. सरकार इसे असफल नहीं होने देगी और बिहार पुलिस इसे सफल नहीं होने देगी.
मित्रों, आज शराबबंदी लागू होने के डेढ़ साल बाद क्या स्थिति है? पैसे वाले पियक्कड़ों को तस्करों ने होम डिलीवरी की सुविधा दे दी है. एक फोन पर उनके घर पर शराब पहुंचा दी जाती है. दाम जरूर दोगुना देना पड़ रहा है. यद्यपि तस्कर भी जब पकडे जाते हैं तो उनकी सालभर की कमाई जमानत लेने में ही उड़ जाती है. लेकिन ये छोटे तस्कर हैं. बड़े तस्कर जो राजनीति में भी दखल रखते हैं उन पर कोई हाथ नहीं डालता. हमारे वैशाली जिले के ही एक एमएलसी पहले भी शराब माफिया थे और आज भी हैं. रोज ट्रक से माल मंगाते हैं लेकिन किसी की क्या मजाल कि उन पर हाथ डाल दे.
मित्रों, छोटे पियक्कड़ जो पहले मुंहफोड़वा से दिल लगाए थे अब ताड़ी से काम चला रहे हैं. ऐसे में ताड़ी बेचनेवालों की पौ-बारह है और उन्होंने ताड़ी के दाम कई गुना बढ़ा दिए हैं. इतना ही नहीं राज्य में गांजा और ड्रग्स की तस्करी में भी भारी इजाफा हुआ है. लेकिन अगर बिहार में शराबबंदी से सबसे ज्यादा किसी को लाभ हो रहा है तो वो है यहाँ की पुलिस. माल पकड़ाता है एक ट्रक तो बताया जाता है एक ठेला. बांकी पुलिसवाले खुद ही बेच देते हैं. जब्त दर्ज माल के भी बहुत बड़े हिस्से के साथ ऐसा ही किया जाता है और रिपोर्ट बना दी जाती है कि चूहे शराब पी गए.
मित्रों, ऐसे में बिहार सरकार को विचार करना होगा कि शराबबंदी से किसको क्या मिला? राज्य से खजाने को भारी नुकसान होने के बावजूद मैं मानता हूँ कि सरकार का कदम सही है लेकिन दुनिया की सबसे भ्रष्ट संस्था बिहार पुलिस पर वो कैसे लगाम लगाएगी विचार करने की जरुरत है क्योंकि बिल्ली कभी दूध की रखवाली नहीं कर सकती? बड़े शराब माफियाओं पर भी हाथ डालना इस मुहिम की सफलता के लिए जरूरी हो गया है. साथ ही अगर गांजा और ड्रग्स की आमद को भी रोका नहीं गया तो बिहार की पूत मांगे गई थी और पति गँवा के आई वाली स्थिति होनेवाली है.

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

पीछा करो

मित्रों, आपने कभी किसी का पीछा किया है? हमने तो नहीं किया. लड़की और बस के पीछु तो आपुन कभी भागा इच नहीं. हाँ कभी किसी को गलतफेमिली हो सकती है कि हम उसके पीछु पड़े हुए हैं. होता यह है कि कई बार हाजीपुर में हम सुभाष चौक पर बाईक से होते हैं और कोई लड़की स्कूटी से हमारे आगे होती है. फिर हम सिनेमा रोड में होते है तो वो भी वही होती हैं. फिर हम किसी काम से यादव चौक पर होते है और वो भी वहीँ पर होती है.  मगर ऐसा हम जानबूझकर नहीं करते या वहां-वहां जानबूझकर नहीं होते बल्कि संयोगवश होते हैं.
मित्रों, ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है. अमीन सयानी जी ने एक बार एक बड़ा ही दिलचस्प वाकया सुनाया था रेडियो पर. लता दीदी ने उस समय फिल्मों में नया-नया गाना शुरू किया था. वो रोज घर से निकलतीं. तांगा पकडतीं. फिर स्टेशन से लोकल ट्रेन पकडतीं. फिर ट्रेन से उतर कर तांगा पकडतीं और उतरने के बाद पैदल चलकर बॉम्बे टॉकीज जातीं. एक दिन ऐसा हुआ कि एक घुघराले बालों वाला लड़का उनके घर के पास से उसी तांगे में बैठा जिसमें लता दी बैठीं. फिर वही ट्रेन और फिर से वही तांगा. यहाँ तक कि पैदल वो उनके पीछे-पीछे बॉम्बे टॉकीज भी आने लगा. लता दी डर गई और लगभग दौड़ते हुए बॉम्बे तौकिज के मालिक हिमांशु रॉय और अभिनेता अशोक कुमार के पास पहुँच गई. फिर उनको बताया कि वो लड़का जो अभी गेट में घुस रहा है उनका पीछा कर रहा है. लड़के पर नजर जाते ही सभी हंस पड़े. दादामुनि ने कहा कि ये उनका छोटा भाई किशोर है जो कल ही मुंबई आया है. संयोग से ये भी आज वहीँ से बॉम्बे टॉकीज आ रहा है जहाँ से तुम आ रही हो. कहना न होगा बाद में लता और किशोर पक्के भाई-बहन बन गए.
मित्रों, अब अगर लता दी घटना का राजनीतिकरण करती और हमारी मीडिया जो कुछ दिनों से टीआरपी के लिए महिलाओं की चोटी कटवाती फिर रही होती मामले को लपक लेती कि सुपर स्टार दादामुनि के भाई ने एक गरीब लड़की का पीछा किया और उसका जीना मुहाल कर दिया. किशोर कुमार की गलती बस इतनी होती कि वे उस रास्ते से आते और अशोक कुमार के भाई होते. बांकी तो उनको भी पता नहीं होता कि वे किसी का पीछा कर रहे हैं.
मित्रों, खैर चंडीगढ़ पीछा करो कांड में एक अच्छी बात यह हुई है कि घटना का वीडियो फुटेज मिल गया है जिससे बहुत जल्द दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. पता चल जाएगा कि भाजपा नेता का बेटा सड़क पर चुपचाप जा रहा था या छेड़खानी भी कर रहा था. तब तक आप लोगों को राम राम इस चेतावनी के साथ कि सड़क पर सचेत रहें सावधान रहें कि कोई लड़की आपके आगे-आगे तो नहीं चल रही है. अगर आप भाजपा नेता के बेटे हैं तो बेहतर होगा कि आप सड़क पर निकले ही नहीं.

शनिवार, 5 अगस्त 2017

सत्ता पक्ष के नेताओं पर छापे क्यों नहीं?

मित्रों, क्या आपको याद है कि जबसे अपना देश आजाद हुआ है तबसे हमारे देश और प्रदेश में कितने लोकसभा और विधानसभा चुनाव भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लडे गए? न जाने कितनी बार चुनाव जीतनेवाली सरकारों ने चुनावों से पहले हमसे वादे किए कि जीतने के बाद हम सत्तारूढ़ दल के भ्रष्ट नेताओं को सजा दिलवाएंगे लेकिन चुनाव जीतने के बाद भूतपूर्वों को सजा दिलवाना तो दूर वादा करनेवाले खुद ही भ्रष्टाचार में लिप्त हो गए.
मित्रों, यह हमारे लिए बड़े ही सौभाग्य की बात है कि पिछले ७० सालों में पहली बार केंद्र में एक ऐसी सरकार काम कर रही है जिसने खुद को भ्रष्ट होने से बचाते हुए देसी-विदेशी कालाधन और बेनामी संपत्ति के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई शुरू की है. पिछली सरकारों की तरह इसने भूतपूर्व नेताओं को बख्श नहीं दिया है बल्कि उनके द्वारा अर्जित कालेधन और बेनामी संपत्ति को भी पूरी बेरहमी के साथ जब्त किया है. लेकिन ऐसा देखने में आ रहा है उसकी कार्रवाई में निष्पक्षता नहीं है और चुन-चुनकर सिर्फ विपक्षी नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है. सत्ता पक्ष के जिन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई है वे काफी छोटे स्तर के भ्रष्टाचारी व नेता हैं.
मित्रों, सवाल उठता है कि क्या सिर्फ विपक्ष के नेता ही भ्रष्ट हैं? कल तक जो भ्रष्ट नेता विपक्ष में थे और आज भाजपा में आ गए हैं उनके खिलाफ क्यों कार्रवाई नहीं हो रही? क्या भाजपा में आ जाने मात्र से ही वे ईमानदारों की श्रेणी में आ गए? लालू परिवार अगर भ्रष्ट हैं तो मुलायम परिवार उनसे कम तो नहीं? बिहार के प्रसिद्ध  पासवान परिवार की संपत्तियों की गहराई और उतनी ही निष्ठुरता के साथ क्यों नहीं जांच की जा रही? बोकारो स्टील कारखाना बहाली में गड़बड़ी को लेकर उनके खिलाफ सीबीआई ने मनमोहन सरकार के अंतिम दिनों में जो जाँच शुरू की थी उसका क्या हुआ कौन जवाब देगा?
मित्रों, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भी पिछले सालों में कई घोटाले हो चुके हैं लेकिन आज तक किसी नेता को सजा नहीं मिली है. इनमें से व्यापम घोटाला तो जैसे भूतहा है. इसी तरह राजस्थान में गौमाता के नाम पर अनगिनत घोटाले हो रहे हैं. सरकारी गौशालाओं में एकसाथ सैंकड़ों गायों की मौत हो रही है लेकिन वहां तो कोई छापा नहीं पड़ रहा.
मित्रों, कुल मिलाकर हमारा मानना है इस तरह की एकतरफा कार्रवाई से भ्रष्टाचार कम तो होगा लेकिन पूरी तरह से ख़त्म नहीं होगा. उसके लिए सारे भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ निष्पक्ष होकर कार्रवाई करनी होगी इस तथ्य को मोदी सरकार को समझना होगा. मैं समझता हूँ कि वो इसे समझ भी रही है.

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

चीन को आतंकी राष्ट्र घोषित करवाए भारत

मित्रों, मुझे उम्मीद है कि आपने कभी-न-कभी कनकौआ जरूर देखा होगा. जो मित्र राहुल गाँधी की तरह अपने शहर में आलू की फैक्ट्री लगाना चाहते हैं उनको बता दूं कि हमारे बिहार में मक्के या आलू के खेत में कौओं,चूहों आदि को डराने के लिए खेतों में एक मानवनुमा पुतले को खड़ा कर दिया जाता है. जानवर और पक्षी उनको आदमी समझ लेते हैं और खेत में आने से डरते हैं जिससे फसल की रक्षा हो जाती है. लेकिन जिस दिन उनको पता चल जाता है कि उनको ठगा जा रहा है उसी दिन उनका डर समाप्त हो जाता है और पक्षियों में सबसे चतुर माने जानेवाले कौवे कनकौवे पर मल विसर्जन करने लगते हैं.
मित्रों, कुछ ऐसा ही चीन इन दिनों अपने पडोसी देशों के साथ करने की कोशिश कर रहा है. वो बार-बार हवाबाजी करता रहता है कि हमारे पास इतनी सेना है, इतने हथियार हैं, हम यह कर देंगे, हम वह कर देंगे लेकिन करता कुछ भी नहीं है. लगता है मानों वो फूंक मारकर ही पहाड़ को उडा देगा.
मित्रों, यह चीन न सिर्फ पाकिस्तानी आतंकियों का संयुक्त राष्ट्र संघ में बचाव कर रहा है बल्कि खुद भी आतंकियों की तरह पड़ोसियों में अपनी कथित ताकत का आतंक पैदा कर उनपर अपनी धौंस जमाना चाहता है. इतिहास साक्षी है कि चीन आमने-सामने की लडाई में आज तक किसी भी देश को हरा नहीं पाया है यहाँ तक कि छोटे-से वियतनाम के हाथों भी उसको शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा था. जहाँ तक १९६२ का सवाल है तो उस समय भी चीन से भारत की सेना हारी नहीं थी बल्कि नेहरु ने उनको जान-बूझकर या अपनी महामूर्खता के कारण एक के बाद एक भयंकर रणनीतिक गलतियाँ करते हुए हरवा-मरवा दिया था. सनद रहे कि उस समय भयंकर अकाल जिसे चीनी झेंप मिटाने के लिए गर्व से ग्रेट चाईनीज फेमिन कहते हैं से होनेवाली करोड़ों लोगों की मौतों के चलते कम्युनिस्ट पार्टी काफी अलोकप्रिय हो चुकी थी और ऐसे में भारत के खिलाफ मिले वाक ओवर ने माओ के लिए संजीविनी का काम किया था. इस संदर्भ में नेहरू की भूमिका संदिग्ध हो जाती है और इसकी गहराई से जांच किए जाने की आवश्यकता है. 
मित्रों, वही चीन आज फिर से १९६२ को दोहराना चाहता है मगर उसके पहले प्रयास को ही भारत की वर्तमान संघ सरकार ने ऐसा फटका दिया है कि वो पूरी दुनिया में हँसी का पात्र बनकर रह गया है. पिछले एक-डेढ़ महीने से चीन लगातार भारत को थोथी धमकियाँ देता जा रहा है कि हम पहाड़ हैं तो हम इतने शक्तिशाली हैं, हम ये कर देंगे हम वो कर देंगे लेकिन सच्चाई यही है कि वो डोकलाम में आज भी भारत के मुकाबले कमजोर स्थिति में है. अब तो उसकी स्थिति ऐसी हो गयी है कि उसके एकमात्र पडोसी मित्र पाकिस्तान की मीडिया भी उसका मजाक उड़ाने लगी है.
मित्रों, मेरा मानना है कि भारत को सीमा पर अपनी तैयारियों को युद्ध-स्तर पर और भी चाक-चौबंद तो करना ही चाहिए साथ ही पाकिस्तान का आतंकवाद के मुद्दे पर खुलकर साथ देने के लिए प्रत्येक वैश्विक मंच पर आड़े हाथों भी लेना चाहिए और उसको भी आतंकी राष्ट्र घोषित करवाने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि अपराधी की मदद करनेवाला भी बराबर का अपराधी होता है. चीन के कब्जे में आज भी हमारी हजारों किलोमीटर जमीन फँसी हुई है इसलिए वह किसी भी तरह नरम व्यवहार का अधिकारी नहीं है. फिर आज वैश्विक कूटनीति भी भारत के माकूल है इसलिए लोहा इससे पहले कि ठंडा हो जाए हथौड़े का जबरदस्त प्रहार कर देना चाहिए.

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

नीतीश का निर्णय देश-प्रदेश के हित में लेकिन.....

मित्रों, पिछले दिनों बिहार के राजनैतिक पटल पर जो घटित हुआ वह पूरी तरह से हतप्रभ कर देने वाला रहा. जो आदमी बार-बार ताल ठोककर कह रहा था कि मिटटी में मिल जाऊँगा लेकिन भाजपा से हाथ नहीं मिलाऊंगा उसने चंद घंटों में पाला बदल लिया और भाजपा की गोद में जाकर बैठ गया. सबकुछ इतनी तेजी में हुआ कि लगा कि जैसे सबकुछ पूर्वनिर्धारित था.
मित्रों, सवाल उठता है कि नीतीश कुमार ने जो कुछ किया क्या वो नैतिक रूप से सही था? नहीं कदापि नहीं. क्योंकि नीतीश का अचानक पाला बदल लेना जनादेश का सीधा अपमान है. लेकिन नीतीश के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. याद कीजिए वर्ष २०१० का विधान-सभा चुनाव. तब नीतीश भाजपा के साथ मिलकर प्रचंड बहुमत से चुनाव जीते थे लेकिन साल २०१३ में उन्होंने अचानक भाजपा को लात मारकर सरकार से बाहर कर दिया और रातोंरात उन्ही लालू से हाथ मिला लिया जिनके जंगल राज के खिलाफ लम्बे संघर्ष के बाद वो बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. जाहिर है नीतीश के लिए राजनैतिक मूल्यों और जनादेश का न तो पहले कोई मतलब था और न आज ही है. हमेशा जनता की आँखों में सिद्धांतों की धूल झोंकनेवाले नीतीश का तो बस एक ही सिद्धांत है कि अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता.
मित्रों, आश्चर्य है कि २०१५ के विधान-सभा चुनावों के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जुमला वीर कहने वाले नीतीश कल कैसे अपने मिट्टी में मिल जानेवाले बयान पर यह कहकर निकल लिए कि ऐसा कहना उस समय की आवश्यकता थी. इसका तो यही मतलब निकालना चाहिए कि नीतीश अंग्रेजी में चाइल्ड ऑफ़ टाइम और हिंदी में मतलब के यार हैं.
मित्रों, इतना ही नहीं नीतीश समय-समय पर शब्दों की परिभाषा तक बदल देते हैं. उनके अनुसार कभी सुशासन का मतलब अच्छा शासन होता है तो कभी कथित साम्प्रदायिकता को रोकना ही सुशासन हो जाता है फिर चाहे ऐवज में राज्य में कानून नाम की चीज ही न रह जाए. इतना ही नहीं बार-बार उनकी सांप्रदायिकता की परिभाषा भी बदलती रहती है. कभी भाजपा का साथ देना घनघोर साम्प्रदायिकता होती है तो कभी घोर धर्मनिरपेक्षता.
मित्रों, जाहिर है कि नीतीश कुमार ने थाली का बैगन बनकर मूल्यपरक राजनीति का मूल्य संवर्धन नहीं किया है बल्कि उसका अवमूल्यन ही किया है. हाँ इतना जरूर है उनके इस कदम से देश और प्रदेश को लाभ होगा. प्रदेश एक बार फिर से विकास की पटरी पर लौट आएगा. चाहे आदती गलथेथर नीतीश ने कल की प्रेस-वार्ता में भले ही यह नहीं माना हो कि पिछले ४ सालों में बिहार का विकास न केवल पूरी तरह से अवरूद्ध हो गया बल्कि रिवर्स गियर में चला गया लेकिन आंकड़ों में यह स्वयंसिद्ध है. चूंकि हमारे लिए नेशन फर्स्ट है इसलिए हम नीतीश के इस कदम का स्वागत करते है लेकिन भाजपा को चेताना भी चाहते हैं कि उनसे सचेत रहे और उनको ज्यादा सीटें देकर फिर से इतना मजबूत न होने दे कि वे फिर से मौसम के बदलने या फिर गिरगिट के रंग बदलने से पहले ही पाला बदलने की स्थिति में आ जाएं.