गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से

१९९९ के अंतिम सप्ताह में हमने इंडियन एयरलाइंस के अपहर्ताओं के आगे झुककर जो गलती की उसने कहीं-न-कहीं कश्मीर में हमारी स्थिति को कमजोर ही किया.साथ ही पूरी दुनिया में यह गलत संकेत गया कि भारत एक सॉफ्ट स्टेट है और सीमापार के आतंकवाद से निबटने में सक्षम नहीं है.इन दिनों देश फिर से कुछ उसी तरह की स्थिति का सामना कर रहा है.माओवादियों ने मलकानगिरी के कलक्टर कृष्णा और एक अभियंता पवित्र मांझी का अपहरण कर लिया था.कड़ा रूख अपनाने के बदले माओवादियों की सभी १४ मांगें मान ली गईं.माओवादी मांझी को छोड़ भी चुके हैं.लेकिन उनके साथ एक पत्र भी भेजा है जिसमें उन्होंने कृष्णा को छोड़ने के बदले ५ नई मांगें की हैं.इस बीच माओवादी नेता गंती प्रसादम को जमानत दी जा चुकी है.लेकिन वे भी तब तक जेल से बाहर जाने को तैयार नहीं है जब तक उनके ६०० अन्य माओवादी साथियों को भी रिहा नहीं कर दिया जाता.
                    ऊंगली पकडवाने पर बांह पकड़ना तो देखा-सुना था लेकिन यहाँ तो माओवादी गला ही पकड़ रहे हैं.पुलिस ने बरसों की मेहनत और अप्रतिम साहस के बल पर जिन देशद्रोहियों को गिरफ्तार किया उन्हें एक व्यक्ति की जान बचाने के लिए रिहा करके सरकार किसी भी तरह वीरता का परिचय तो नहीं ही दे रही है.आगे जब भी माओवादियों को अपने किसी भी साथी को रिहा करवाना होगा तो वे किसी अधिकारी का अपहरण कर लेंगे और जंगल में ऐसा करना कठिन भी नहीं होगा.इस तरह सरकारी अधिकारी उनके लिए ए.टी.एम. मशीन बनकर रह जाएँगे.
              अगर सरकार इसी तरह बार-बार झुकती रही तो न तो कंधार विमान अपहरण इस शृंखला की अंतिम घटनात्मक कड़ी थी और न ही मलकानगिरी के कलक्टर का माओवादियों द्वारा अगवा किया जाना ही इस प्रकार की अंतिम घटना है.आज तो किसी को याद भी नहीं होगा कि भारत सरकार सबसे पहले आतंकवादियों के आगे २० साल पहले रुबैय्या सईद अपहरण मामले में झुकी थी.भारत सरकार और राज्य सरकारों को समझ लेना होगा कवि गोपाल सिंह नेपाली की इन पंक्तियों में छिपी हुई चेतावनी को जो उन्होंने १९५६ में ही दी थी और दुर्भाग्यवश जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं-
ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से
चरखा चलता है हाथों से,शासन चलता तलवार से
यह रामकृष्ण की जन्मभूमि,पावन धरती सीताओं की   
फिर कमी रही कब भारत में,सभ्यता-शांति सद्भावों की
पर नए पडोसी कुछ ऐसे,पागल हो रहे सिवाने पर 
इस पार चरते गौएँ हम,गोली चलती उस पार से
ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से

तुम उड़ा कबूतर अम्बर में,सन्देश शांति का देते हो
चिट्ठी लिखकर रह जाते हो,जब कुछ गड़बड़ सुन लेते हो
वक्तव्य लिखो कि विरोध करो,यह भी कागज वह भी कागज
कब नाव राष्ट्र की पार लगी,यों कागज की पतवार से
ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से

मालूम हमें है तेजी से निर्माण हो रहा भारत का
चहुँओर अहिंसा के कारण,गुणगान हो रहा भारत का
पर यह भी सच है,आजादी है तो चल रही अहिंसा है
वरना अपना घर दीखेगा,फिर कहाँ कुतुबमीनार से
ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से

सिद्धांत,धर्म कुछ और चीज,आजादी है कुछ और चीज
सबकुछ है तरु-डाली-पत्ते,आजादी है बुनियादी बीज
इसलिए वेद-गीता-कुरान,दुनिया ने लिक्खे स्याही से
लेकिन लिखा आजादी का इतिहास रूधिर की धार से 
ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से
चरखा चलता है हाथों से,शासन चलता तलवार से.  

1 टिप्पणी:

arganikbhagyoday ने कहा…

achchha aur rochak laga !