बुधवार, 30 मार्च 2011

बेवजह का उतावलापन

26-11

कहते हैं कि जनता की याददाश्त बड़ी कमजोर होती है और वह किसी भी घटना को बहुत जल्दी भूल जाती है.हमारे नेता लोग भले ही ऐसा मानते हों लेकिन सच्चाई यह है कि भारत की जनता इतनी भी भुलक्कड़ नहीं है कि दो-ढाई साल पहले हुए मुम्बई हमले और उसके बाद हमारे प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए बयान को भूल जाए.मुझे तो याद है और मुझे पूरा यकीन है कि आपको भी यह पूरी तरह से याद होगा कि नवम्बर,२००८ के मुम्बई हमले के बाद हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने अपने श्रीमुख से कौन-से शब्द उगले थे.उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा था कि जब तक पाकिस्तान मुम्बई हमले के दोषियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं करेगा तब तक भारत उससे बातचीत नहीं करेगा.साथ ही उन्होंने स्पष्ट शब्दों में पाकिस्तान को यह चेतावनी भी दी थी कि वह भारत की सहनशीलता की परीक्षा नहीं ले.अगर पाकिस्तानी आतंकवादियों की ओर से आगे कोई भी इस तरह का हमला होता है तो भारत सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी नहीं रहेगी.लेकिन हम देख रहे हैं कि भले ही पाकिस्तान समर्थित आतंकियों द्वारा २६-११ के बाद इस तरह का हमला नहीं किया गया हो,पाकिस्तान ने मुम्बई हमलों के लिए जिम्मेदार दुर्दांत आतंकवादी हाफिज सईद या किसी अन्य के खिलाफ कोई भी प्रभावी कदम नहीं उठाया है.साथ ही उसने हाफिज सईद को पूरे पाकिस्तान में घूम-घूम कर भारत विरोधी प्रचार करने की छूट भी दे रखी है.
मित्रों,ऐसे में यह सवाल उठता है कि दोनों देशों के संबंधों में ऐसा क्या हो गया है,ऐसी कौन-सी प्रगति हो गयी हैं जिससे भारत सरकार पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय बातचीत करने को उतावली हो रही है.जैसे ही यह तय हुआ कि विश्वकप के सेमीफाइनल में भारत और पाकिस्तान मोहाली में आमने-सामने होने जा रहे हैं,मनमोहन सिंह उतावले हो उठे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को बगलगीर बनाकर मैच देखने के लिए.वैसे भी यह बातचीत सिर्फ बातचीत के लिए हो रही है इससे कुछ भी निकलकर बाहर नहीं आनेवाला.निश्चित रूप से केंद्र की निगाहें कहीं और हैं और निशाना कहीं और.अगर हम सूक्ष्मान्वेषण करें तो पाएँगे कि केंद्र का मानना है कि अगर वह पाकिस्तान के साथ बातचीत प्रारंभ करती है तो इसका सीधा फायदा उसे बंगाल,केरल और असम में होनेवाले चुनावों में होगा.कहना न होगा इन तीनों राज्यों में मुसलमानों की अच्छी खासी आबादी है.हो सकता है कि बातचीत शुरू करने के लिए केंद्र पर अमेरिका की तरफ से भी दबाव पड़ रहा हो.अगर विकीलीक्स के खुलासों पर भरोसा करें तो ऐसा होना असंभव भी नहीं है.
मित्रों,अगर इन बातों में तनिक भी सच्चाई है तो इसका सीधा मतलब यह है कि हमारी धर्मनिरपेक्ष केंद्र सरकार को भारतीय मुसलमानों की देशभक्ति पर भरोसा नहीं है और वह यह मानती है कि हमारे मुसलमान भाई हिंदुस्तान से ज्यादा पाकिस्तानपरस्त हैं.साथ ही अगर दूसरी आशंका सच है तो इसका अर्थ यह होगा कि हमारी विदेश-नीति सम्प्रभु नहीं है और हम अमेरिका के हाथों की एक कठपुतली-मात्र हैं.
मित्रों,पिछली बार जब भारत और पाकिस्तान दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में भिड़े थे और भारत सरकार ने क्रिकेट कूटनीति का प्रयोग करते हुए पाकिस्तानी दर्शकों के लिए पलक-पांवड़े बिछा दिए थे तब भी मैंने कहा था की यह एक मूर्खतापूर्ण कदम है और पाकिस्तानी आतंकवादी दर्शक के रूप में भारत में दाखिल हो सकते हैं और ऐसा हुआ भी.पाकिस्तान से आए सैकड़ों दर्शक भारत आकर गायब हो गए.फिर हुआ मुम्बई हमला.इस हमले से पहले और इसके बाद पकडे गए कई पाकिस्तानी आतंकियों ने यह स्वीकार किया है कि वे दिल्ली मैच देखने के बहाने भारत के घुसे थे.फिर से मैच के चलते पाकिस्तानियों को जल्दी में और धड़ल्ले से वीजा बांटा जा रहा है.इस समय भारत और पंजाब सरकार का एकमात्र लक्ष्य मोहाली मैच का शांतिपूर्वक आयोजन संपन्न करवाना है.इतनी जल्दीबाजी में तो किसी भारतीय दर्शक का रिकार्ड जांचना भी संभव नहीं है.हमारी सुरक्षा और ख़ुफ़िया एजेंसियां अपने कर्तव्यों को लेकर कितनी तत्पर है इसे मैं एक उदाहरण द्वारा बताना चाहूँगा.अभी जब राष्ट्रमंडल खेल होने वाले थे तो संवाददाताओं को पास देने से पूर्व उनके आपराधिक रिकार्डों की जाँच होनी थी.ऐसा किए बिना ही पास बाँट दिए गए और खेल समाप्त भी हो गए.खेल की समाप्ति के कोई डेढ़-दो महीने बाद बीबीसी के एक संवाददाता जो बिहारी हैं के घर पुलिस पहुँच गयी और पूछताछ करने लगी.घरवाले डर गए और संवाददाता को बताया.पुलिस से पूछने पर पता चला कि राष्ट्रमंडल के पास को लेकर वह जाँच करने गयी थी.
मित्रों,तो क्या आप तैयार हैं मनमोहन सरकार की मूर्खता या धूर्तता के कारण अपने देश में निकट-भविष्य में होनेवाले आतंकी हमलों को अपने सीनों पर झेलने के लिए?अगर नहीं हैं तो तैयार हो जाइए क्योंकि इन्होने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया है और इसलिए इतिहास फिर से खुद को दोहरानेवाला है.

सोमवार, 28 मार्च 2011

फूट डालो और शासन करो और आरक्षण की राजनीति


jat

मित्रों,अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर जब पहली बार कलकत्ता बंदरगाह पर उतरे तो उन्हें यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि मुट्ठीभर अंग्रेज कैसे विशाल जनसंख्या वाले भारत पर शासन कर रहे हैं.लुई फिशर भले ही तब इस प्रश्न का उत्तर नहीं जानते हों;आज प्रत्येक भारतीय को पता है कि इसके लिए अंग्रेंजों ने फूट डालो और शासन करो की नीति अपनाई थी.
मित्रों,अंग्रेज तो विदेशी थे और उनका एकमात्र लक्ष्य भारत से धन लूटकर इंग्लैण्ड ले जाना था लेकिन भारत में फूट डालो और शासन करो की नीति आज भी जारी है.हमारे सारे राजनैतिक दल और राजनेता इसी नीति के बल पर चुनाव जीतते हैं और देश को लूटते हैं,देश का बंटाधार करते हैं.आरक्षण की राजनीति आज जनता में फूट डालने और अपना नाकारापन छिपाने का सर्वोत्तम साधन बन गया है.याद करिए कि किस तरह आरक्षण का समर्थन कर लालू बिहार के राजा बन बैठे थे और सिवाय पिछड़ों को आरक्षण देने का समर्थन करने के उन्होंने बिहार को कुछ भी नहीं दिया था.इन श्रीमान का सीधे तौर पर मानना था कि जनता काम के आधार पर वोट नहीं देती बल्कि जाति के आधार पर देती है.
मित्रों,भारत में सदियों से आरक्षण लागू है.पहले जहाँ समाज के सारे महत्वपूर्ण काम बड़ी जातियों के लिए आरक्षित थे,अब छोटी जातियां इसका लाभ उठा रही हैं.अगर वह गलत था तो यह भी सही नहीं है क्योंकि दोनों ही स्थितियों में प्रतिभावान लोग उपेक्षित रह जाते हैं या फिर दूसरे शब्दों में कहें तो समाज को उनकी प्रतिभा का समुचित लाभ नहीं मिल पाता है.आरक्षण के चलते कई बार तो अजीबोगरीब व हास्यास्पद स्थिति पैदा हो जाती है,जैसे किसी उम्मीदवार को शून्य से भी कम अंक मिलने पर सफल घोषित कर दिया जाता है और सामान्य कोटि का मेधावी उम्मीदवार अच्छे अंक लाने के बावजूद असफल करार दिया जाता है.
मित्रों,यह स्थिति किसी भी तरह देशहित में नहीं है.अयोग्य लोगों को डॉक्टर,इन्जीनियर या आईएएस-आईपीएस बना देने से सेवा,निर्माण और शासन की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ना तय है और ऐसा हो भी रहा है.हमारे कुछ अवर्ण जातीय नेता सवर्णों के प्रति बदले की भावना से ग्रस्त हैं और उन्होंने अपने लम्बे राजनितिक कैरियर में बस दो ही काम किए हैं;एक-सवर्ण जातियों को मंच पर से गलियां देना और दूसरा गलत तरीके से,घपले-घोटाले करके पैसे बनाना.
मित्रों, इन दिनों केंद्र सरकार पर हिंसक-अहिंसक तरीके से दबाव बनाकर आरक्षण लेने के प्रयास जोर-शोर से चल रहे हैं.कभी जाट तो कभी गुर्जर दल-बल सहित आकर सड़कों और रेलवे ट्रैकों पर जम जाते हैं.यह जमावड़ा कभी-कभी तो २०-२० दिनों तक चलता है.कहना न होगा उन्हें ऐसा करने की प्रेरणा १९९०-९१ के सरकार-प्रायोजित आरक्षण-समर्थक आन्दोलन से मिलती है.इन जातियों को लगता है कि जब अन्य जातियां हिंसक-अहिंसक आन्दोलन के बल पर आरक्षण पाने में सफल हो सकती हैं तो वे लोग क्यों नहीं हो सकते?
मित्रों,अनुसूचित जातियों और जनजातियों को आरक्षण देने के पीछे यह सोंच काम कर रही थी कि चूंकि ये लोग सामाजिक पिछड़ेपन के कारण अन्य जातियों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते इसलिए इन्हें कुछ समय के लिए आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए.जाट और गुर्जर तो सामाजिक रूप से पिछड़े हैं नहीं;कुछ इलाकों में तो ये आर्थिक रूप से भी काफी सशक्त हैं और प्रभु जातियों में गिने जाते हैं.फिर इन्हें कैसे आरक्षण दिया जाए?इस केंद्र सरकार की फूट डालो और शासन करो की नीति अब जातीय आरक्षण का कार्ड खेलने से एक कदम आगे जा चुकी है.केंद्र वोट बैंक की राजनीति के लिए सांप्रदायिक आरक्षण देने का प्रयास कर रहा है और वजह बता रहा है इन सम्प्रदायों के आर्थिक पिछड़ेपन को.इसी तरह बिहार में नीतीश सरकार इसी आधार पर सवर्णों को आरक्षण देने का मन बना चुकी है.मैं पूछता हूँ कि आरक्षण देने की कसौटी क्या होनी चाहिए? जातीय,सांप्रदायिक या फिर व्यक्तिगत गरीबी या सामाजिक पिछड़ापन,आर्थिक पिछड़ापन या फिर आन्दोलन खड़ा कर देश को क्षति पहुँचाने की क्षमता.मेरे हिसाब से इनमें से कोई भी नहीं;क्योंकि अब नौकरियां गिनती की हैं और उम्मीदवार करोड़ों.ऐसा देखा जाता है कि वह एक व्यक्ति जो नौकरी पाने में सफल होता है अपनी पूरी जाति की भलाई के लिए हरगिज काम नहीं करता बल्कि भाई-भतीजावाद में लग जाता है.इतना ही नहीं बाद में भी ज्यादातर मामलों में इन्हीं सफल लोगों के बाल-बच्चे आरक्षण का लाभ उठाते रहते हैं.मैंने आज तक आरक्षित कोटि का ऐसा कोई भी उम्मीदवार नहीं देखा जिसने क्रीमी लेयर में आने के बावजूद आरक्षण का लाभ नहीं लिया हो.अगर हम पिछले ७०-८० साल के भारत के इतिहास को देखें और देश की सामाजिक स्थिति का तृणमूल स्तर पर अवलोकन करें तो पाएँगे कि आरक्षण सामाजिक बदलाव लाने में असफल रहा है और इसका लाभ चंद संपन्न लोग ही उठाते जा रहे हैं.
मित्रों,अब प्रश्न उठता है कि आरक्षण का विकल्प क्या है?विकल्प है कि सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को पढाई की सुविधा दी जाए और इस स्तर की सुविधा दी जाए जिससे गाँव के सरकारी स्कूलों में पढनेवाला बच्चा भी दून या दिल्ली पब्लिक स्कूल के बच्चों से प्रत्येक विषय में मुकाबला कर सके.जाहिर है कि ऐसा इंतजाम करना आरक्षण देने की तरह आसान नहीं है.अगर केंद्र या राज्य सरकारें ऐसा नहीं कर सकतीं तो फिर वह अलग से सड़कें व रेल ट्रैक बनाए जिस पर आरक्षण की मांग करने वाली जातियाँ भविष्य में धरने पर बैठ सकें.इससे यात्रियों को सड़क जाम व ट्रेनें रद्द होने की स्थिति में परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा.

शनिवार, 26 मार्च 2011

सुविधा और दुविधा के बीच झूलता भारतीय जनमानस


fukusima
मित्रों,इस ग्लोब पर निवास करनेवाले किसी भी इन्सान ने कभी ख्वाबों-ख्यालों में भी नहीं सोंचा था कि पूरी दुनिया के लिए वैज्ञानिक व तकनीकी विकास का उदाहरण माना जानेवाला जापान प्रकृति के एक हल्के-से झटके को भी सहन नहीं कर पाएगा और इस कदर हिल जाएगा.दिनकर ने पिछली शताब्दी में ही मानव को विज्ञान की खतरनाक प्रकृति के प्रति सचेत करते हुए कहा था कि रे मानव सावधान!यह विज्ञान नहीं तलवार!लेकिन तब पूरा विश्व पश्चिमी विकास के मॉडल के प्रति सम्मोहन की अवस्था में था.
मित्रों,हम जानते हैं कि पश्चिम का मानना है कि मानव और प्रकृति में लगातार संघर्ष चलता रहता है.विकास के प्रथम चरण में प्रकृति मानव पर हावी थी जबकि विकास के द्वितीय चरण में मानव प्रकृति पर भारी है.पश्चिम के अनुसार मानव का अंतिम लक्ष्य प्रकृति पर विजय पाना है और जीवन को प्राकृतिक विनाश की कीमत पर भी अधिक-से-अधिक सुविधापूर्ण बनाना है.इसलिए पश्चिम ने तरह-तरह की मशीनें बनाईं जिनमें से कईयों का प्रकृति पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा है.
मित्रों,पश्चिमी दर्शन के विपरीत भारतीय दर्शन प्रकृति पर विजय के बजाये प्रकृति की पूजा का समर्थक रहा है.वह यह नहीं कहता कि छत पर चढ़ जाने के बाद सीढ़ी को ही तोड़ देना चाहिए.बल्कि वह प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखते हुए विकास का हिमायती रहा है.यहाँ तक कि आधुनिक विश्व के महानतम नेता गाँधी का भी यही मानना था.लेकिन नेहरू पर पश्चिम का प्रभाव इतना ज्यादा था कि एडम स्मिथ के विचार गाँधी के विचारों पर भारी पड़ गए.नेहरू को आधुनिक कल-कारखाने और नहरें मंदिर की तरह पवित्र लगते थे.उनका मानना था कि अमेरिका आदि विकसित देशों की तरह अर्थव्यवस्था की तरह भारतीय अर्थव्यवस्था में भी सेवा और उद्योग क्षेत्रों की हिस्सेदारी लगातार बढती जानी चाहिए और कृषि की हिस्सेदारी में तदनुसार कमी आनी चाहिए.वैसे नेहरू के समय कृषि उतनी उपेक्षित भी नहीं रही जैसी आज है.नेहरु पश्चिमी व्यवस्था पर इस कदर फ़िदा थे कि उन्होंने देश के प्रशासनिक ढांचे को भी पश्चिमी मॉडल पर भी बने रहने दिया.नेहरु युग में और नेहरु के बाद जीवन-शैली और पश्चिमी विज्ञान जो विशुद्ध रूप से भौतिकवाद पर आधारित था का जमकर अन्धानुकरण किया गया.गाँधी की तस्वीर को तो खूब अपनाया गया लेकिन गांधीवाद जो प्रकृति के साथ विकास पर आधारित था को कूड़ेदान में डाल दिया गया.
मित्रों,परिणाम हमारे सामने है.कभी अध्यात्म में विश्वगुरु रहा भारत आज दुनिया के भ्रष्टतम देशों में गिना जाता है.नेहरु द्वारा स्थापित आधुनिक मंदिर कल-कारखाने भ्रष्टाचार और चीन द्वारा उत्पन्न प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाने के कारण घाटा उगलनेवाली मशीनरी बनकर रह गए हैं और नेहरु युग में खोदी गयी ज्यादातर नहरों में पानी आते देखे कई पीढियां बीत चुकी हैं.धुआँ उगलती मशीनों ने पर्यावरण के संतुलन को ही डगमग कर दिया है.ऐसे में जबकि नदियाँ ही सूखने लगी हैं तो नहरों में पानी कहाँ से आए?पश्चिम की देन अंधभौतिकवाद का जो भी कुपरिणाम संभव है वह हम भारत में कहीं भी और किसी भी क्षेत्र में देख सकते हैं.सर्वत्र नैतिक-स्खलन का दौरे-दौरा है.कृषि बेदम है और सेवा क्षेत्र में विकास तो हो रहा है लेकिन वह विकास रोजगारविहीन विकास है.देश में यत्र-तत्र-सर्वत्र अव्यवस्था और भ्रष्टाचार व्याप्त है.देश के एक चौथाई हिस्से पर खुले तौर पर भारतीय संविधान का नहीं चीन से आयातित हिंसक विचारधारा का शासन है.
मित्रों,प्रत्येक वर्ष भारत सरकार गुणवत्तापूर्ण जीवन के लिए आवश्यक बन चुकी बिजली के उत्पादन में वृद्धि के लिए लक्ष्य निर्धारित करती है और व्यवस्था की कमी के चलते उसे प्राप्त नहीं कर पाती है.ऐसा माना जा रहा है कि भारत में इस समय कम-से-कम १०-१५% बिजली की कमी है.आदर्श स्थिति तो यह होती कि सौर,पवन और ज्वारभाटीय ऊर्जा द्वारा इस कमी को पाटा जाता.लेकिन भारत सरकार और आदर्श शब्द तो जैसे जानी दुश्मन हैं.भारत सरकार को तो पश्चिमी तरीके से ऊर्जा चाहिए.भले ही ऐसा करने से पर्यावरण को स्थायी और अपूरणीय नुकसान ही क्यों न हो.भारत-अमेरिका परमाणु समझौते से कभी इतनी बिजली नहीं मिलेगी जिससे परमाणु ऊर्जा भारत के कुल ऊर्जा उत्पादन में मुख्य हिस्सेदार बन सके.तब भी लगभग ९०% बिजली तापीय और अन्य परंपरागत और अपरम्परागत ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त करना होगा.
मित्रों,विकास के पश्चिमी रास्ते पर चलकर जापान आज विनाशक मोड़ पर आ खड़ा हुआ है और सारी दुनिया बर्बाद होते जापान को मूकदर्शक बनी देख रही है.यह सही है कि जो जापान १८६८ में मेजी पुनर्स्थापना से पहले तीर-धनुष के युग में था वही जापान मात्र ८-१० सालों में ही पश्चिम की नक़ल करके विकसित देशों की श्रेणी में आ गया और पश्चिमी साम्राज्यवादियों के साथ बराबरी के साथ बात करने लगा.जापान ने न केवल विज्ञान और तकनीक के मोर्चे पर पश्चिम की नक़ल की बल्कि साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के मामले में भी जमकर अन्धानुकरण किया जिसका परिणाम हुआ नागासाकी और हिरोशिमा.यह घोर आश्चर्य की बात है कि जो जापान परमाणु-हथियारों की विभीषिका का एकमात्र भोक्ता था उसने कैसे खतरनाक परमाणु ऊर्जा पर विश्वास कर लिया जबकि उसे यह भलीभांति पता था और है कि किसी भी प्राकृतिक या मानवीय भूल से उत्पन्न होनेवाली आपदा के समय परमाणु-रिएक्टर परम विनाशकारी और अनियंत्रित परमाणु-बम में बदल जाता है.
मित्रों,कुछ पश्चिमवादी भारतीय जिनमें हमारे प्रधानमंत्री भी शामिल है यह तर्क दे रहे हैं कि अब ऎसी तकनीकें उपलब्ध हैं जिससे कि किसी भी संभावित परमाणु-दुर्घटना पर पूर्णतः नियंत्रण संभव है.मैं उनलोगों से पूछना चाहता हूँ कि क्या भारत या दुनिया का कोई भी दूसरा देश तकनीक के मामले में जापान से आगे है?फिर नए परमाणु-रिएक्टर बिठाने की जिद क्यों?भारत की जनसंख्या भी काफी ज्यादा है इसलिए भी यहाँ मौतें ज्यादा होगी और जहाँ तक व्यवस्था का प्रश्न है तो इस मामले में दुनिया के कुछ ही देश ऐसे हैं भारत की स्थिति जिनके मुकाबले अच्छी है.मान लिया कि हम कानून बना देंगे और दिशा-निर्देश भी जारी कर देंगे.साथ ही यह नियम भी बना देंगे कि समय-समय पर रिएक्टरों की स्थिति की जाँच की जाएगी.लेकिन उन्हें लागू कौन कराएगा?हमारे भ्रष्ट नेता और अफसर ही न.फिर क्या गारंटी है कि हमारे नेता और अफसर चंद गाँधी-छाप कागज के टुकड़ों के लालच में नहीं आयेंगे और दूसरा-तीसरा भोपाल नहीं होगा?
मित्रों,कुल मिलाकर इस समय पूरे भारत में परमाणु-ऊर्जा को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है.बहुसंख्यक लोगों का मानना है कि भारत को इस पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहिए और जो धन परमाणु-ऊर्जा के उत्पादन पर खर्च किया जाना है उसे नवीकरणीय ऊर्जा के निर्माण पर खर्च किया जाए.अगर जनमानस में आशंकाएं हैं तो उन्हें बेवजह भी नहीं कहा जा सकता.हमारी सरकार की विश्वसनीयता खुद ही अनगिनत प्रश्नों के घेरे में है.ऐसे में अगर वह सुरक्षा की गारंटी देती भी है तो जनता उस पर बिलकुल ही विश्वास नहीं करेगी.लेकिन यहाँ प्रश्न सिर्फ दो-चार या दस-बीस परमाणु बिजलीघरों का ही नहीं है;यहाँ सवाल है विकास,प्रशासन और जीवन-शैली के अहम् क्षेत्रों में पश्चिम की नक़ल करने का भी.सवाल यह है कि हम इन क्षेत्रों में अपना भारतीय मॉडल विकसित करेंगे या पश्चिम का अन्धानुकरण करते हुए एक दिन जापान की तरह बर्बाद हो जाएँगे.हमारे पूर्वजों ने जो संस्कृति अपनाई थी उसी के बल पर हम आज भी गर्व के साथ माथा ऊंचा करके यह कह पा रहे हैं कि कुछ बात है हस्ती मिटती नहीं हमारी,सदियों रहा दुश्मन दौरे-जहाँ हमारा.इस समय हम दोराहे पर खड़े हैं.एक रास्ता प्राकृतिक विनाश का है और धरती पर मानव जीवन के अंत की ओर जाता है.वहीँ दूसरा रास्ता सर्वे भवन्तु सुखिनः का है और माँ वसुंधरा की,प्रकृति की रक्षा करते हुए विकास करने का है.कौन-सा रास्ता बेहतर है यह दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ है.

बुधवार, 23 मार्च 2011

बोल मेरी दिल्ली बोल

delhiबोल मेरी दिल्ली बोल,
मोल तोल के बोल;
गांवों में है घुप्प अँधेरा,
तेरे घर में अखंड रोशनी;
बोल मेरी दिल्ली बोल;
गांवों में है सूखा पड़ रहा,
तेरी सड़कों पर पानी बह रहा;
बोल मेरी दिल्ली बोल;
सज-धज के तू बनी है रानी
कहाँ से आया बिजली-पानी;
बोल मेरी दिल्ली बोल;
मोल तोल के बोल.

कदम-कदम पे उडती सड़कें,
चिकनी-चुपड़ी खिलती सड़कें;
बोल मेरी दिल्ली बोल;
अपने भाग्य पर इठलाती सड़कें,
मंत्रालयों को जाती सड़कें;
बोल मेरी दिल्ली बोल;
कहाँ से आया इतना पैसा,
बेशर्म नहीं कोई तेरे जैसा;
बोल मेरी दिल्ली बोल;
मोल तोल के बोल.

तू दूसरों का हक़ खानेवाली,
फिर क्यों न रोज मने दिवाली;
बोल मेरी दिल्ली बोल;
तेरे घर में रोज घोटाला;
तेरा मुखिया (मनमोहन सिंह) बेईमानों की खाला,
बोल मेरी दिल्ली बोल;
कब आयेंगे तेरे होश ठिकाने,
पूरा देश जब लगेगा गाने;
लालगढ़ के लाल तराने;
बोल मेरी दिल्ली बोल;
मोल तोल के बोल.

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

इस होली में आप क्या जलाने जा रहे हैं

holika dahan
होली उमंग और उल्लास का पर्व है.सारे ग़मों को भुलाकर आगे मंजिल की ओर नए उत्साह से प्रयाण करने का अवसर है.लेकिन यह तो बात हुई होली की.होली से एक दिन पहले आता है होलिका दहन.इस दिन आग जलाकर खुशियाँ मनाई जाती है.बिहार में तो कई दिन पहले से ही लकड़ियों और उपलों को जमा करके का काम प्रगति पर है.आज मैंने देखा कि चंदा वसूलने में दक्षता रखनेवालों ने इस पर्व को भी अछूता नहीं रहने दिया है.जाहिर है कि जो राशि होलिका दहन के बाद शेष बच जाएगी;भाई लोग उसका सदुपयोग दारू खरीदने में करेंगे.
तो क्या होलिका दहन का बस इतना ही महत्त्व है कि आग जलाओ और हुडदंग करो?ऐसा बिल्कुल भी नहीं है मेरे भाई.हरेक हिन्दू पर्व का सांकेतिक महत्त्व है और होलिका दहन का तो और भी ज्यादा है.जितना बड़ा त्योहार उसका प्रतीकात्मक महत्त्व भी उतना ही ज्यादा.होलिका दहन प्रतीक है बुराई पर अच्छाई की जीत का.यह हमें बताता है कि बुरे लोग चाहे जितनी भी ताकत क्यों न अर्जित कर लें भगवान उनके साथ हरगिज नहीं होते;इसलिए जीत अंत में अच्छाई की ही होती है.सोंचिए कि हिरण्यकश्यप की अपार शक्ति के आगे नन्हे-मासूम प्रह्लाद की क्या बिसात थी?लेकिन अंत में जीत भक्ति,विश्वास,दया और सत्य की ही हुई.होलिका जिसके आग में जल मरने की याद में हम होलिका दहन मनाते हैं;वह सिर्फ एक स्त्री नहीं थी बल्कि वह ईर्ष्या थी,शक्ति का दुरुपयोग भी थी और अभिमान तो थी ही.लेकिन ईर्ष्या,लालच और मदान्धता तो आज भी जिंदा है;हमारे भीतर व हमारे-आपके अंतस्तल में.इन्हें इस तरह भौतिक होलिका दहन के माध्यम से हम जला भी नहीं सकते.इन्हें जलाने के लिए हमें नवांकुरों यानि बच्चों में अच्छी शिक्षा,अच्छे संस्कारों का प्रतिस्थापन करना होगा और यह तभी संभव होगा जब हम खुद सन्मार्ग पर चलकर उनके आगे एक आदर्श प्रस्तुत करेंगे.अगर हम ऐसा नहीं कर सकते तो फिर कोई मतलब नहीं है प्रतीकात्मक होलिका दहन मनाने का.
तो क्या आप तैयार हैं इस होलिका दहन पर अपनी बुराईयों को जला डालने का संकल्प लेने के लिए?मैं जानता हूँ कि हम-आप ऐसा एक दिन में नहीं कर सकते;इसमें समय लगेगा.परन्तु ऐसे पवित्र संकल्प को धारण करना ही कम नहीं होगा.हो सकता है हम अपने लक्ष्य की प्राप्ति में शत-प्रतिशत सफल नहीं हो पाएं लेकिन वह असफलता भी बड़ी भव्य होगी;महाराणा प्रताप की हल्दीघाटी की पराजय की तरह.तो कहिए मित्र क्या विचार है?इस होली पर आप सिर्फ घासफूस जलाने जा रहे हैं या अपनी बुराइयों को जलाने का संकल्प भी लेने जा रहे हैं?

बुधवार, 16 मार्च 2011

सड़क पर डिग्री क्यों नहीं बाँट देते सुशासन बाबू

pariksha1

मित्रों,अभी-अभी बिहार में मैट्रिक की परीक्षा समाप्त हुई है और इंटरमीडियट की अभी चल ही रही है.कुछ देखा तो कुछ सुना.कुछ अख़बारों ने भी बताया तो कुछ टी.वी.चैनलों ने.परीक्षा-सम्बन्धी गतिविधियों ने कभी सोंचने पर बाध्य किया तो कभी विचारने पर कि परीक्षा की परिभाषा क्या है और नक़ल करके पास होनेवाले बच्चों का भविष्य क्या होगा?
जहाँ तक मैं जानता हूँ और मुझे बचपन में जैसा कि बताया गया है कि पर+ईच्छा=परीक्षा यानि दूसरे की ईच्छानुसार काम करने को परीक्षा कहते हैं.हालाँकि यह परिभाषा सटीक नहीं है फिर भी इससे शब्द के निहितार्थ का तो पता चल ही जाता है.लेकिन बिहार में हर साल मैट्रिक व इंटरमीडियट की परीक्षाओं में होता क्या है?पहले तो परीक्षा का कार्यक्रम घोषित किया जाता है.फिर अख़बारों और रेडियो-टेलीविजन पर घोषणा की जाती है कि परीक्षा की तैयारियां प्रशासन द्वारा पूरी कर ली गयी हैं.इसके बाद सम्बंधित मंत्री और अधिकारियों द्वारा कदाचार रहित परीक्षा के संचालन में सहयोग की अपील प्रकाशित-प्रसारित करने के साथ ही सरकारी कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती है.
फिर शुरू होती है परीक्षा.निर्धारित समय पर जब परीक्षार्थी परीक्षास्थल पर पहुँचता है तो उसके साथ राजकीय अतिथियों के सदृश व्यवहार किया जाता है.परीक्षा-भवन में तो किताबें खोलकर या जानबूझकर आँख बचाकर लिखने की छूट दी ही जाती है,बाहर से भी अभिभावकों को जिन्हें बिहार में छडपार्थी कहते हैं;मदद के लिए परीक्षा-भवन में आने दिया जाता है.पुलिस के जवानों और छडपार्थियों के बीच नूरा-कुश्ती चलती रहती है.अगर पुलिस की जगह होमगार्डों की नियुक्ति हुई तो कुछ पैसे दे देने से वे बाधक की जगह सहायक भी बन जाते हैं.ऐसा पुलिसवालों के साथ भी हो सकता है.कभी-कभी डी.एम. आदि अधिकारियों का दौरा भी होता है और तब दिखावे के लिए १०-२० परीक्षार्थियों-छडपार्थियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है.प्रायः प्रत्येक वर्ष कुछ विषयों के प्रश्न-पत्र रहस्यमय तरीके से परीक्षा से पहले ही आउट कर दिए जाते हैं और तब सरकार उन विषयों की परीक्षा रद्द कर देती है.हालाँकि ऐसा वर्षों से चलता आ रहा है लेकिन आश्चर्य है कि सरकार अब तक लीकप्रूफ़ व्ययवस्था नहीं कर पाई है.इस तरह येन-केन-प्रकारेण किसी भी तरह से परीक्षा सरकारी भाषा में अगर कहें तो पूरी तरह से कदाचारमुक्त माहौल में संपन्न करा ली जाती है.फिर परिणाम घोषित किए जाते हैं और जिन बच्चे-बच्चियों को अपना नाम और पता लिखने का भी शऊर नहीं होता वे भी ७०-८०% अंक पा जाते हैं.उसके बाद अगर अभिभावक के पास दो नम्बरी पैसा हुआ तो घूस और डोनेशन के बल पर नौकरी भी मिल जाती है.बिहार में ऐसा आज से नहीं बल्कि तब से हो रहा है जब बिहार में कर्पूरी ठाकुर की सरकार थी.
मित्रों,इस सम्बन्ध में मुझे दो दशक से भी ज्यादा पुरानी एक घटना याद आ रही है.हुआ यह कि उन दिनों बिहार में समाजवादी सरकार थी और उसमें सबसे ज्यादा रसूखवाले मंत्री हमारे इलाके के ही थे.उन्होंने जबरन अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए औसत से कुछ ज्यादा तेज अपने एक ग्रामीण को दसवीं की परीक्षा में पूरे बिहार में प्रथम करवा दिया.बच्चे को आसानी से पटना के प्रतिष्ठित साईंस कॉलेज में दाखिला भी मिल गया.लेकिन जब भी क्लास होता बच्चू के पल्ले कुछ पड़ता ही नहीं.डर के मारे उसने एक साल ड्रॉप करने के बाद इंटर की परीक्षा दी.अब आप ही बताएं ऐसा नंबर किस काम का?अगर पैसे और भ्रष्टाचार के बल पर नौकरी मिल भी गयी तो ऐसा व्यक्ति क्या अपने काम को सही तरीके से अंजाम दे पाएगा;नहीं न?
मित्रों,मैं जानता हूँ कि परीक्षाओं में नक़ल और कदाचार के लिए समाज भी दोषी है;लेकिन क्या साथ में सरकार दोषी नहीं है?सरकार अपने कर्तव्यों का निर्वहन उसी तरह क्यों नहीं कर रही जैसे कभी कल्याण सिंह सरकार ने यू.पी. में किया था?क्या मजबूरी है बिहार सरकार की?अगर वह कदाचार-मुक्त परीक्षा नहीं ले सकती तो बच्चे-बच्चियों को सड़क पर खड़ा करके खुलेआम डिग्री क्यों नहीं बाँट देती?इतनी नौटंकी करने की क्या जरुरत है?इससे जनता का भी करोड़ो बचेगा जो उसे परीक्षा देने-दिलाने में खर्च करने पड़ते हैं.अनिच्छा से परीक्षा लेने की क्या जरुरत है?अभी पिछले साल की ही बात है.स्नातक प्रथम-द्वितीय वर्ष की परीक्षा बी.आर.ए.बिहार विश्वविद्यालय द्वारा ली जा रही थी.मानव संसाधन विभाग के सचिव के.के.पाठक के कड़े रूख के कारण परीक्षार्थियों को हिलने तक की भी अनुमति नहीं थी.अगर एक साधारण अधिकारी इतना बड़ा परिवर्तन करा सकता है तो फिर बिहार सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती?कौन जवाब देगा;सुशासन बाबू उत्तर देंगे क्या?

मंगलवार, 15 मार्च 2011

किस-किस गलती के लिए क्षमा मांगेंगे मनमोहन

manmohan
मित्रों,इन्सान को गलतियों का पुतला माना जाता है;लेकिन यह विशेषण सिर्फ उन दोपायों के लिए सही है जो भूलवश या अज्ञानतावश गलतियाँ कर जाते हैं.मेरे कहने का मतलब यह है कि ये वे इन्सान होते हैं गलतियाँ करना जिनकी फितरत नहीं होती.लेकिन कुछ लोग गलत होते ही हैं और उनका काम ही होता है गलतियाँ करना.ये लोग अज्ञानी भी नहीं होते और अपनी गलतियों से अनजान तो बिलकुल भी नहीं.
मित्रों,दुर्भाग्यवश इन दिनों इसी दूसरी तरह का एक व्यक्ति भारत का प्रधानमंत्री है.पहले तो वह जानबूझकर गलतियाँ करता है,कलमाड़ी को चोरी-चोरी चुपके-चुपके राष्ट्रमंडल आयोजन समिति की कमान सौंपता है,भ्रष्टाचार के राजा ए.राजा को उसके आचरण से परिचित होते हुए भी दूरसंचार मंत्री बनाता है,घोटाला करने में उस्ताद पी.जे.थामस को विपक्ष की नेता के कड़े ऐतराज के बावजूद भ्रष्टाचार-निवारक सर्वोच्च संस्था केंद्रीय सतर्कता आयोग के प्रधान के पद पर बिठाता है और दागी पूर्व न्यायाधीश के.जी.बालाकृष्णन को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयुक्त का अहम पद दे देता है.इतना ही नहीं उसकी नाक के ठीक नीचे अंतरिक्ष मंत्रालय में २ लाख करोड़ के वारे-न्यारे किए जाते हैं और वह कहता है कि उसे तो पता ही नहीं था.
मित्रों,महाभारत में एक प्रसंग आता है जब चेदी नरेश शिशुपाल अपने ममेरे भाई श्रीकृष्ण को गालियाँ देता फिरता है.वचनबद्ध होने के कारण श्रीकृष्ण उसकी ९९ गालियों को माफ़ करते जाते हैं लेकिन जैसे ही वह १००वीं गाली देता है उनका क्षमा-पात्र भर जाता है और वे अविलम्ब उस दुष्ट का वध कर देते हैं.एक झूठ को छिपाने के लिए सैंकड़ों झूठ बोले जाने की परंपरा तो हमेशा से रही है लेकिन मनमोहन एक सच को छिपाने के लिए सैंकड़ों झूठ बोलते जाते हैं और जब सच को स्वीकार कर लेने के सिवा कोई अन्य मार्ग उनके सामने शेष नहीं रहता तब अपराधं सहस्राणि क्रियन्ते अहर्निशं मया की अकिंचन मुद्रा धारण करते हुए झटपट माफ़ी मांग लेते हैं.ये अंग्रेजीदां लोग शायद यह समझते हैं कि सिर्फ एक बार सॉरी बोल देने से उनके सारे गुनाह धुल जाते हैं.
मित्रों,भारत में इन दिनों कुछेक परिवारों का शासन है जिसमें सबसे प्रमुख है गाँधी-नेहरु परिवार.विधि का शासन तो देश से बिलकुल विलुप्त ही हो चुका है जबकि हमारा संविधान देश में विधि के शासन की स्पष्ट घोषणा करता है.मनमोहन जी का यह न केवल नैतिक बल्कि संवैधानिक कर्तव्य भी है कि वे छाया शासन से बाहर आएं और देश को गाँधी-नेहरु परिवार की मर्जी से चलाने के बजाए ईमानदारीपूर्वक उस तरीके से चलाएँ जिस तरीके से शासन चलाने से देश में विधि का शासन पुनर्स्थापित हो सके.अगर मनमोहन जी ऐसा नहीं कर सकते तो बेहतर होगा कि अंतिम बार देश से क्षमा मांगते हुए वे प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दे दें.
दोस्तों,मनमोहन जी को यह अच्छी तरह पता है कि जनता कोई श्रीकृष्ण नहीं है जो झटपट चक्र सुदर्शन चला दे.जनता के हाथ में सिर्फ वोट देना है और लोकसभा चुनाव में अभी देरी है.वास्तव में मनमोहन सिर्फ एक राजनेता नहीं हैं बल्किन वर्तमान भारतीय राजनीति का प्रतीक भी हैं.असल में हमारी राजनीति ही बेहया और बेशर्म हो चुकी है.अब झूठ को एकमात्र सच की तरह पेश करना अपराध नहीं है वरन कला है,पैकेजिंग है,मार्केटिंग है.मनमोहन जी को भ्रम है कि वे अनगिनत बार अपनी गलतियों के लिए माफ़ी की गुहार लगाते रहेंगे और जनता उन्हें हर बार निर्विकार भाव से माफ़ करती रहेगी.उन्हें निश्चित रूप से यह पता नहीं है कि जनता कोई अक्षय-पात्र नहीं है जिसमें क्षमा का महासागर समा जाए.उनकी सरकार के बजट ने महंगाई की लाल अग्नि को और भी तीव्र कर दिया है और उस पर छाये अविश्वास के काले घटाटोप बादलों का रंग और भी गहरा होता जा रहा है.परन्तु मनमोहन जी हैं कि पुरानी गलतियों के लिए क्षमायाचना करते हुए नई गलतियाँ करने में लीन हैं.मैं मनमोहन जी को सावधान करना अपना नागरिक कर्त्तव्य समझते हुए चेता देना चाहता हूँ कि वे कृपया ऐसी स्थिति न आने दें जिसके चलते उन्हें जनता से बार-बार बेशर्मीपूर्वक माफ़ी मांगनी पड़े क्योंकि अगर वे २१वीं सदी के चतुर नेता हैं तो जनता भी २१वीं सदी वाली प्रबुद्ध जनता है.उन्हें और उनके जैसे अन्य बेईमान ईमानदारों को क्षमा करते-करते जनता का क्षमा-पात्र उपटाने लगा है.अब भारत की जनता न सिर्फ सत्ता को बदलेगी बल्कि सड़े-गले कानून और तंत्र को भी बदल दिया जाएगा.इतना ही नहीं संविधान में भी ऐसे अपेक्षित बदलाव कर दिए जाएंगे जिससे कि भविष्य में जानबूझकर गलतियाँ करके माफ़ी मांगनेवाला दूसरा मनमोहन सत्ता में नहीं आ सके.आखिर तंत्र,कानून या संविधान जनता का है,जनता द्वारा है और जनता के लिए है;जनता इनका,इनके द्वारा और इनके लिए नहीं है.बिल्कुल भी नहीं!!!
मित्रों,हमने कई बार तख़्त बदल दो ताज बदल दो,बेईमानों का राज बदल दो का नारा लगाया है लेकिन न तो तख्तो ताज ही बदला और न ही बेईमानों का राज ही समाप्त हुआ.इस समय अगर मनमोहन प्रधानमंत्री पद से हट भी जाते हैं तो उनकी सरकार द्वारा किए गए भ्रष्टाचार का मुद्दा पृष्ठभूमि में चला जाएगा और कोई दूसरा बेईमान या बेईमान ईमानदार उनकी जगह ले लेगा.फिर से वही इमोशन,ड्रामा और सस्पेंस.मित्रों इस सरकार ने चौतरफा भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे करूणानिधि परिवार से एक बार फिर से समझौता कर लिया है और यह स्वयंसिद्ध कर दिया है कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी प्रभावी कदम उठाने नहीं जा रही है.इसलिए हमें इस पर दबाव बनाना-बढ़ाना होगा जिससे यह जनता द्वारा तैयार जन लोकपाल विधेयक को अक्षरशः पारित कराने को बाध्य हो जाए.मैं जानता हूँ कि यह विधेयक महान भारत के निर्माण की दिशा में बहुत छोटा कदम होगा लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रत्येक महान कार्य की शुरुआत एक छोटे-से कदम से ही होती है.

सोमवार, 7 मार्च 2011

अथ श्री भ्रष्टाचारम कथा


ghoos

सुशासन की परम कृपा से बिहार में इन दिनों सारे कार्यालय दुकानों में बदल गए हैं.भले ही इनकी दीवारों पर उच्चतम न्यायलय की सलाह के अनुसार सुविधा-शुल्कों की रेट-लिस्ट लगायी नहीं गयी है लेकिन प्रत्येक काम का रेट नियत जरुर है.यूं तो वह भी अन्य बिहारियों की तरह सरकारी कार्यालयों में जाने से बचने का भरसक प्रयास करता है लेकिन जब जाना निश्चित हो और इससे बचने का कोई मार्ग नहीं बचे तो?
मित्रों,हुआ यूं कि मेरे मित्र के परिवार ने अपने शहर में एक जमीन रजिस्ट्री कराई;९५० वर्ग फुट का छोटा-सा टुकड़ा.कब तक किराये के मकान में रहा जाए?हर चीज से मन उबता है;यहाँ तक कि जीते-जीते ज़िन्दगी से भी.जमीन रजिस्ट्री हो जाने के बाद अगली अनिवार्य प्रक्रिया होती है जमीन का दाखिल ख़ारिज या नामांतरण करवाने की.इस प्रक्रिया के द्वारा जमीन की रसीद नए खरीददार के नाम पर कटने लगती है.उसके हलके का राजस्व कर्मचारी इस बात से परिचित है कि वह एक पत्रकार है और उसने कई बार उसे हिंदुस्तान के सम्पादकीय पृष्ठ पर छपते भी देखा है.इसलिए जैसे ही उसने रजिस्ट्री की छाया-प्रति उसे दी वह निर्धारित फॉर्म निकालकर उसमें नामादि चुपचाप भरने लगा;बिना पैसे की मांग किए.इससे पहले वह अपने एक परिचित जो डी.सी.एल.आर. कार्यालय में पेशकार हैं;से इस बारे में सलाह ले चुका था.उनका कहना था कि अगर वह पत्रकार होने के नाते घूस नहीं देता है तो काम होने में काफी परेशानी आएगी.उनका मानना था कि राजस्व कर्मचारी को २५०० रूपये दे देना सही रहेगा.इसलिए उसने कर्मचारी को ही दाखिल ख़ारिज का काम सौंप दिया और २५०० रूपये भी दे दिए.कर्मचारी ने काम को आगे तो बढाया लेकिन एक महीने के बाद.
दरअसल मामला काबिल लगान का था यानि जमीन का लगान अब तक विधिवत निर्धारित नहीं था.इसलिए अंचलाधिकारी (सी.ओ.) कार्यालय से लगान निर्धारण का प्रस्ताव डी.सी.एल.आर.कार्यालय में जाना था.अगर वह पूरा सुविधाशुल्क देता तो उसे कुल ५००० रूपये देने पड़ते;२५०० अंचल कार्यालय के लिए और २५०० रूपये डी.सी.एल.आर. कार्यालय के लिए.लेकिन चूंकि डी.सी.एल.आर. के पेशकार उसके पुराने परिचित थे और उनसे उसका घरेलू सम्बन्ध था इसलिए उसे २५०० रूपये ही देने पड़े,हालाँकि यह राशि भी कम नहीं होती खासकर गरीबों के लिए.उसने कई बार अपने परिचित पेशकर जिनका जिक्र मैंने पहले भी किया है;से सी.ओ. के यहाँ से भेजा गया पत्र वहां पहुंचा या नहीं पूछा.लेकिन हमेशा उत्तर नकारात्मक रहा.अंत में उसने झुंझलाकर दो माह गुजर जाने के बाद राजस्व कर्मचारी से पत्र संख्या बताने को कहा.कई दिनों के इंतजार के बाद कर्मचारी ने संख्या बताई जिसे उसने पेशकर महोदय को दे दिया.उसे आश्चर्य हुआ कि जो पत्र दिसंबर के पूर्वार्द्ध में ही भेज दिया गया था वह दो महीने में कैसे २ किलोमीटर दूर ठिकाने तक नहीं पहुंचा.वह समझ गया था कि चूंकि पेशकार परिचित था इसलिए शर्म के मारे पैसे नहीं मांग रहा था और काम को भी आगे नहीं बढ़ा रहा था;असमंजस में था भोलाभाला.पेशकार महोदय द्वारा वस्तुस्थिति बताने में बार-बार टालमटोल करने के बाद उसे ताव आ गया और वह जा पहुंचा डी.सी.एल.आर. कार्यालय.यहाँ मैं आपको यह बताता चलूँ कि जैसा कि उसने मुझे बताया कि उसके पिताजी जो प्रोफ़ेसर हैं;के उस पेशकार पर बड़े उपकार थे.उन्होंने अन्य छात्रों की तरह ही बिना एक पैसा लिए भूतकाल में नमकहराम पेशकार की बेटी को नोट्स और गेस प्रश्नों की सूची दी थी.लेकिन जब समाज में पैसा ही सबकुछ हो जाए तो निःस्वार्थ उपकारों का कोई मोल नहीं रह जाता है.
उसे साक्षात् प्रकट हुआ देखकर पेशकार महोदय घबरा गए और जल्दी ही स्वीकृति का पत्र भेजने का आश्वासन दिया.कल होकर ही स्वीकृति का पत्र अंचलाधिकारी के यहाँ भेज भी दिया गया और पेशकर बाबू ने स्वयं फोन करने की जहमत उठाते हुए उसे पत्र संख्या भी बता दी.लेकिन राजस्व कर्मचारी ने पूछने पर बताया कि पत्र पर भूमि सुधार उपसमाहर्ता यानि डी.सी.एल.आर. का हस्ताक्षर ही नहीं है.उसके साथ फिर से धोखा हुआ था.एक बात फिर से उसे डी.सी.एल.आर.की दहलीज पर जाना पड़ा.वहां उसी कार्यालय के एक कर्मचारी ने उसे बताया कि यहाँ घूस का इतना अधिक बोलबाला है कि पेशकार बिना नजराना दिए फाईल डी.सी.एल.आर. के टेबुल पर रख ही नहीं सकता क्योंकि साहब बिना महात्मा गाँधी के दर्शन किए दस्तखत ही नहीं करेंगे;इतनी मेहनत और ईमानदारी से पढाई इसलिए तो की थी महाशय ने.फिर कोई १० दिनों के बाद राजस्व कर्मचारी ने उसे अपने निवास पर बुलाया.उसने उसे शुद्धि-पत्र तो थमा दिया लेकिन रसीद लेने के लिए परदे के पीछे अपने साले के पास भेज दिया.यह कर्मचारी भी संयोग से उसके ननिहाल के बगल के गाँव का महादलित निकला.हालाँकि जब उसने उसे २५०० रूपये दिए थे तब उसे यह बिलकुल भी पता नहीं था.साले ने परदे के पीछे जाते ही रहस्य पर से पर्दा उठाते हुए कहा कि ८९ रूपये की तो रसीद ही कट रही है;उसे भी ऊपर से १०० रूपये चाहिए.आखिर उसने भी तो मेहनत की है;पसीना बहाया है.कैसी मेहनत पता नहीं?वह इस तरह बात कर रहा था जैसे उसने ही कर्मचारी को ५-५ अवैध सहायक रखने को कहा था.यहाँ तो कर्मचारी का सारा कुनबा जमा था महाभोज में शामिल होने के लिए.खैर उसे कोर्ट में काम था और वह हड़बड़ी में था इसलिए उसने चुपचाप उसे २०० रूपये दे दिए.साथ ही एक और जमीन की रसीद भी काटने को कहा.सुनते ही एक तरफ सारी खुदाई और एक तरह जोरू के भाई ने बताया कि रसीद पुस्तिका के आखिरी पन्ने के रूप में अभी-अभी उसी की जमीन की रसीद काटी गयी है.वह इस तरह की भाषा से अपरिचित नहीं था.उसे पत्रकार होते हुए भी टहलाया जा रहा था.गुस्सा स्वाभाविक था.वह जा पहुंचा राजस्व कर्मचारी के पास और नाराजगी दिखाते हुए शिकायत की.फिर तो उसी साले साहब ने यह कहते हुए कि दाखिल ख़ारिजवालों के लिए रसीद बचाकर रखनी पड़ती है;रसीद काट दी और इस तरह दाखिल ख़ारिज का महती काम पूरा हुआ और उसने और उसके परिवार ने काफी दिनों के बाद चैन की साँस ली.मूल कथा तो यहीं समाप्त होती है अब थोड़ी इसकी समालोचना भी कर ली जाए.
हम यह भी बताते चलें कि इस समय पूरे बिहार में सुशासन के कुशासन की वजह से राजस्व रसीद की जबरदस्त किल्लत चल रही है.वजह यह है कि बिहार सरकार ने हर तरह के प्रमाण-पत्रों को निर्गत करने के लिए ताजी-गरम राजस्व रसीद लगाना अनिवार्य कर दिया है;लेकिन अतिरिक्त राजस्व रसीदों की छपाई नहीं कर पा रही है.ऐसा जानबूझकर किया जा रहा है या कोई मजबूरी है कह नहीं सकता.लोग एक अदद रसीद के लिए महीनों राजस्व कर्मचारी की परिक्रमा करते रहते हैं और इस बीच उनका काम ख़राब भी हो जाता है.वांछित प्रमाण-पत्र नहीं दे पाने के चलते कईयों को तो नौकरी मिलते-मिलते भी रह जाती है.
यह एक कटु सत्य है कि बिहार में निगरानी विभाग ने जिन लोगों को रंगे हाथों घूस लेते पकड़ा है उनमें से अधिकतर राजस्व कर्मचारी हैं और अधिकतर ट्रैप-पकड़ घटनाओं में मामला दाखिल ख़ारिज का ही होता है.अगर मामला सामान्य है तो १ दाखिल ख़ारिज के लिए ढाई से तीन हजार रूपये मांगे जाते हैं और अगर काबिल लगान का मामला हो तो कांटा ५ हजार तक भी पहुँच जाता है.चूंकि जनता के सीधे संपर्क में सिर्फ राजस्व कर्मचारी होता है इसलिए जेलयात्रा भी सिर्फ उसी के हिस्से आती है जबकि उसे उस राशि में से कुछ-न-कुछ हर टेबुल पर पेश करनी पड़ती है.प्रतिदिन कम-से-कम ५ दाखिल ख़ारिज के मामले १ राजस्व कर्मचारी के पास आते हैं.अगर मोटे तौर पर हिसाब लगाएं तो ज्यादा-से-ज्यादा १५-२० हजार मासिक वेतन वाला राजस्व कर्मचारी महीने में कम-से-कम १ लाख रूपये की ऊपरी कमाई कर रहा है;अधिकारियों यथा अंचलाधिकारी वगैरह की अवैध कमाई तो और भी ज्यादा;इससे कई गुना होगी.
मित्रों,अभी आपने देखा की भ्रष्ट तंत्र घूस खाता है २७०० रूपये या ५२०० रूपये और सरकार के खाते में जाता है मात्र ८९ रूपया या इससे भी कम और सरकार कहती है कि राज्य विकास के पथ पर तीव्र गति से अग्रसर है.मित्रों,यह सच्ची कहानी तो बस एक बानगी भर है.मेरा दावा है कि आप बिहार सरकार के किसी भी कार्यालय से वाजिब काम भी बिना सुविधा-शुल्क दिए करा ही नहीं सकते.बिहार की जनता को प्रस्तावित सेवा के अधिकार से बड़ी उम्मीदें हैं.शायद इसके आने के बाद सरकारी गुंडागर्दी और रंगदारी वसूली सह ब्लैकमेलिंग बंद हो जाए और महंगाई पीड़ित बिहार की गरीब जनता की जेब में इतनी राशि बच जाया करे जिससे वह अपने आपको कुपोषित होने से बचा सके.शायद???

गुरुवार, 3 मार्च 2011

दिशाहीन आम बजट उर्फ़ राग बेमौसम

pranab mukherjee budget
मित्रों,भारत का आम बजट पेश हुए कई दिन हो चुके हैं.मैंने पहले से सोंच रखा था कि १३ मार्च को झारखण्ड लोक सेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षा में शामिल हो लेने के बाद ही इस विषय पर कुछ लिखूंगा लेकिन मन कुछ इस तरह बेचैन हो उठा कि कलम उठानी पड़ी.मित्रों,बजट किसी भी देश का ऐसा वार्षिक वित्तीय विवरण होता है जिससे देश की दशा और सरकार की दिशा का पता चलता है लेकिन इस बार के बजट से न तो देश की दशा का ही पता चलता है और न ही सरकार देश को किस दिशा में ले जाना चाहती है अतिशक्तिशाली इलेक्ट्रोन सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन करने पर भी इसका पता चलता है.
बजट पेश होने से पहले पूरे भारत में उम्मीद की अन्तर्वर्ती धारा बह रही थी.लोगों को आशा थी कि वित्त मंत्री महंगाई से जली हुई और इस जले पर नमक हर दफ्तर में सुविधाशुल्क देने को विवश जनता को राहत देने के लिए कोई-न-कोई कदम उठाने की घोषणा अवश्य करेंगे.लेकिन इन विषयों की चर्चा तो दूर बजट में इस बात का कोई संकेत तक नहीं था कि सरकार इन समस्याओं को गंभीर मानती भी है.जबकि बजट से पहले आई आर्थिक समीक्षा में महंगाई और भ्रष्टाचार का उड़ते-उड़ते ही सही जिक्र किया गया था.ऐसा क्यों हुआ और सरकार की नीयत क्या है यह तो बेहतर तरीके से सरकार में शामिल लोग ही बता सकते हैं;हम तो सरकार के भीतर की हलचल को बस अनुमानों के आईने में ही देख सकते हैं.
इस बार के बजट में आम नागरिकों को आयकर में प्रतिमाह १७१ रूपये की नियत छूट दी गई है और बदले में सर्विस टैक्स के रूप में प्रति माह हजारों रूपयों का बोझ लाद दिया गया है.इतना ही नहीं वित्त मंत्री इस साल मुद्रास्फीति के कम-से-कम ८.५ प्रतिशत होने का अनुमान भी लगा रहे हैं यानि आम जनता अपनी कुल कमाई में से कम-से-कम ८.५ प्रतिशत के क्षरण के लिए भी तैयार रहे.शायद इसी स्थिति को छटांक लेना और छटाँक नहीं देना और महंगाई में आटा गीला होना कहते हैं.
ऐसा भी नहीं है कि वित्त मंत्री महंगाई के वास्तविक कारणों से पूरी तरह से नावाकिफ हों.अगर ऐसा होता तो उनके बजट भाषण में द्वितीय हरित क्रांति का जिक्र तक नहीं होता.हमारे वित्त मंत्री द्वितीय हरित क्रांति को साकार होते हुए देखना तो चाहते हैं लेकिन उन्हें इसके लिए कोई जल्दीबाजी भी नहीं है.तभी तो उन्होंने बजट में इस अवश्यम्भावी क्रांति के लिए मात्र ४०० करोड़ रूपया निर्धारित किया है.पूरा पूर्वोत्तर,जहाँ पर यह कथित क्रांति होनी है;पिछले दो वर्षों से घोर अनावृष्टि का सामना कर रहा है.क्षेत्र में पीने के पानी की भी कमी हो रही है लेकिन सरकार यहाँ की जनता को हरित क्रांति का दिवास्वप्न दिखा रही है.जनमोहिनी-मनमोहिनी सरकार मात्र ४०० करोड़ रूपये में पूरे पूर्वोत्तर भारत की कृषि में क्रांति कर देना चाहती है.शायद उसका फूंक मारकर पहाड़ उड़ा देने के करतब में गंभीर विश्वास है.हालाँकि धर्मनिरपेक्ष प्रणव ने रामचरितमानस की चाहत फूंकी उड़ावन पहाड़ू पंक्ति पढ़ी है या नहीं मैं यकीं के साथ नहीं कह सकता.वर्तमान जलवायविक स्थितियों में जब तक क्षेत्र की सभी नदियों को एक-दूसरे से जोड़ नहीं दिया जाता;हरित क्रांति तो दूर की कौड़ी है ही,क्षेत्र में वर्तमान खाद्यान्न उत्पादन स्तर को बरक़रार रख पाना भी संभव नहीं है.जाहिर है कि वित्त मंत्री अगर इस तथाकथित क्रांति के प्रति सचमुच गंभीर होते तो बजट में इसके लिए कई लाख करोड़ रूपये का प्रावधान करते न कि सिर्फ ४०० करोड़ रूपये का.
मित्रों,हम जानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था की हालत इस समय दयनीय है.बजट बनाते समय एक तरफ जहाँ वित्त मंत्री को देश में उच्च विकास दर को बनाए रखना था तो वहीँ दूसरी और उनके सामने मुद्रास्फीति को भी ८.५ प्रतिशत के स्तर पर स्थिर रखने की चुनौती थी.हालाँकि मुद्रास्फीति की यह दर भी वर्तमान परिस्थितियों में जनता को कष्ट ही देगी;इसमें संदेह नहीं.वित्त मंत्री अगर साहस दिखाते तो १९२९ की महामंदी के समय जिस तरह फ्रैंकलिन डिलानो रूजवेल्ट ने अमेरिका में न्यू डील की घोषणा की थी,वैसी ही कोई वजनदार योजना की घोषणा करते.इससे बेरोजगारी भी दूर होती और देश को दीर्घकालिक लाभ भी होता.हो सकता है कि इससे मुद्रास्फीति कुछ और ज्यादा हो जाती लेकिन जनता की जेब में ज्यादा पैसा तो आता ही;देश के समक्ष सदियों से मुंह बाए खड़ी भुखमरी और मूल्य वृद्धि की स्थायी समस्या का भी स्थायी समाधान हो जाता.
मित्रों,शायद मैंने कुछ ज्यादा ही उटपटांग तुलना कर दी है.मुझे क्रांतिकारी रूजवेल्ट की घोर यथास्थितिवादी और मजबूर मनमोहन सिंह या प्रणव मुखर्जी से तुलना नहीं करनी चाहिए थी.लेकिन जब कोई ४०० करोड़ रूपये में ही भारत जैसे विशाल देश में हरित क्रांति कराने लगे तो इतिहास के पन्नों को पलटना ही पड़ता है.प्रणव मुखर्जी बड़े भारत के बहुत बड़े नेता हैं.इसलिए वे अगर गलती भी करते हैं तो बहुत बड़ी ही करते हैं.शायद बहुत बड़ा करने के चक्कर में ही वे खाद्य तेल,सब्जियां,मोटे अनाज और डेयरी उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा देनेवाली पाँच अतिमहत्वकांक्षी परियोजनाओं को मात्र ३००-३०० करोड़ रूपये दे गए.हद तो उन्होंने ४०० करोड़ रूपये में हरित क्रांति करके ही कर दी थी अब बारी बेहद करने की थी.मित्रों,कोई भी वित्त मंत्री जब किसी योजना के लिए राशि का आवंटन करता है तो उसके पीछे कोई-न-कोई तर्क होता है,तथ्य होता है.दादा के पास तर्क नहीं है;कुतर्क है.वे कहते हैं कि उन्होंने इन ५ योजनाओं के लिए ३००-३०० करोड़ रूपये इसलिए दिए हैं क्योंकि उनका शुभ अंक ३ है.दादा,अगर तीन के गुणांक में ही राशि देना चाहते थे तो उन्हें कम-से-कम ३०००-३००० करोड़ रूपये देने चाहिए थे.३००-३०० रूपये में क्या होगा और क्या नहीं होगा पता नहीं लेकिन लक्ष्य तो पूरा नहीं ही होगा.वैसे दादा ने शायद इस संभावित आलोचना से बचने के लिए ही इन क्षेत्रों में उत्पादन वृद्धि के लिए कोई लक्ष्य रखा ही नहीं है.मित्रों,जिस तरह प्रश्न-पत्र में सिर्फ कठिन प्रश्न ही नहीं होते क्योंकि इससे परीक्षार्थी के आत्महत्या कर लेने की सम्भावना बढ़ जाती है उसी तरह इस बजट में भी सिर्फ जुबान को जलाकर रख देने वाली मिर्च ही नहीं है कुछ मिठाइयाँ भी है लेकिन किंचित.बुनियादी ढांचा को दुरुस्त करने और सामाजिक क्षेत्र के लिए आबंटन में भारी वृद्धि की गयी हैं;लेकिन सच्चाई यह भी है कि चूंकि यह आवंटन पहले से काफी कम था सिर्फ इसलिए वृद्धि जोरदार दिखाई दे रही है.
कुल मिलकर उद्गम से मुहाने तक यह बजट बेसुरा है और खटराग में निबद्ध है.यह बजट दिशाहीन होने की अंतिम परिणति तक दिशाहीन है और इसमें की गयी सारी घोषणाएं समय की मांग के विपरीत है.अगर सरकार को जनता व जनाकांक्षा की रंचमात्र भी चिंता होती तो वह बजट में महंगाई और भ्रष्टाचार को कम करने और मिटाने को प्रमुखता देती.अगर उसके पास इसके लिए धन की कमी थी तो वह विदेशों से कालेधन को वापस लाने की घोषणा करती न कि धनाभाव और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल के दाम बढ़ने का रोना रोती और न ही जनता खड़ी होती अपने उजड़े हुए घर की दहलीज पर ठगी-सी,अन्यमनस्क.हमें उम्मीद थी कि २०११-१२ का बजट अच्छा है या बुरा;यह अनिवार्यतः एक अनिर्णायक विवाद का विषय होगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं;बल्कि यह बजट तो बजट के औचित्य पर ही सवालिया निशान लगा गया.लगता है कि सरकार ने यह सोंचकर यह बजट पेश किया है कि चूंकि ऐसा होता ही रहा है तो हम भी ऐसा कर ही लेते हैं.वास्तव में यह बजट है ही नहीं बल्कि इसे पेश करके करके एक भ्रष्ट और निकम्मी सरकार द्वारा अपनी बेगारी को टाला गया है.

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

याचना नहीं अब रण होगा


anna
मित्रों,भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारी लडाई अब निर्णायक मोड़ पर आ गयी है.३० जनवरी को रामलीला मैदान से जो शंखनाद किया गया था आज उसने उसी ऐतिहासिक मैदान पर विराट रूप ग्रहण कर लिया है.बाबा रामदेव व अन्ना हजारे के नेतृत्व में लाखों भारतवासियों ने इस ऐतिहासिक मैदान से भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध अहिंसक जनयुद्ध छेड़ने का ऐलान कर दिया है.
मित्रों,रामायण में एक प्रसंग है कि राम सागर से मार्ग प्रदान करने की विनती करते हैं.लगातार तीन दिनों के अनुनय-विनय के बाद जब धीरोदात्त राम को कोई परिणाम निकलता नहीं दिखता तब वे ब्रह्मास्त्र का संधान करते हैं और तब समुद्र त्राहि-त्राहि करता हुआ राम के श्रीचरणों में आ गिरता है.
हमने भी पिछले ६४ सालों में बहुत अनुनय-विनय किया.विश्वास किया नेताओं के भाषणों पर कि भ्रष्टाचार को समूल नष्ट किया जाएगा.लेकिन आश्वासन आश्वासन बने रहे,घोषणाएं घोषणाएं बनी रहीं.हम ठगाते रहे और नेता-अफसर मालामाल होते रहे.एक विदेशी बैंकों में धन जमा करता रहा तो दूसरा देसी बैंकों के लौकरों में सोने की ईटें.अब याचना करते-करते हमारे हाथ थक गए हैं और वोटिंग मशीन का बटन दबाते-दबाते ऊंगलियाँ ऐंठने लगी हैं.
मित्रों,अब हम व्यवस्थापक नहीं बदलेंगे.हमें नहीं चाहिए एक के बाद एक भ्रष्टाचार के आगे मजबूर हो जानेवाले या इस महाभोज में शामिल हो जानेवाले प्रधानमंत्री.एक राजा और दो-चार कलमाड़ी को कुछ दिनों के लिए जेल भेज देने से भ्रष्टाचार नहीं मिटनेवाला,क्योंकि हमारा कानून और तंत्र सत्ता का मुखापेक्षी है.हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसे कानून बनाने होंगे व ऐसा तंत्र (सिस्टम) स्थापित करना होगा जिसमें भ्रष्टाचारियों के खिलाफ स्वचालित तरीके से कार्रवाई हो.जनता को धोखा देने के ख्याल से केंद्र सरकार ने भी एक लोकपाल बिल बनाया है.इसके अंतर्गत एक बार फिर से सतर्कता आयोग की तरह ही लोकपाल को भी सिर्फ सिफारिशी अधिकार दिया गया है.अगर यही करना है तो फिर सी.वी.सी. से अलग किसी लोकपाल नामक संस्था बनाने की जरुरत ही क्या है?साथ ही सांसदों और मंत्रियों पर मुकदमा चलने के लिए भी इसमें लोकसभा अध्यक्ष और प्रधानमंत्री से अनुमति लेने का प्रावधान किया गया है.लेकिन जब गुनाहगार खुद प्रधानमंत्री या लोकसभा अध्यक्ष हो तब?तब यह सरकार प्रायोजित लोकपाल कुछ भी नहीं कर पाएगा सिवाय मुंह ताकते रहने के.
इसलिए देश की कुछ जानी-मानी  देशभक्त हस्तियों ने अलग से जन लोकपाल विधेयक तैयार किया है जिसमें व्यवस्था की गयी हैं कि ९ सदस्यीय लोकपाल संस्था के सदस्य जनता द्वारा सीधे चुने जाएँ और सीधे तौर पर जनता के प्रति ही जवाबदेह भी हों.देश जनता का है,संविधान और संसद जनता का है और जनता के लिए है.इसलिए इसमें कोई अनहोनी नहीं है यदि जनता ही सीधे लोकपालों का चुनाव करे.इस लोकपाल को दंडात्मक अधिकार होगा.वह भ्रष्टाचारियों पर मुकदमा चलाएगा.उनकी संपत्ति जब्त करेगा और सजा भी दिलवाएगा.उसके दायरे में सभी लोग होंगे,पूरा भारत होगा;भंगी से लेकर राष्ट्रपति तक हर कोई होगा.
लेकिन हमारी सरकार इस बिल को स्वीकार करने को तैयार नहीं है.वह देश को लाचार लोकपाल देकर काम निकाल लेना चाहती है.लेकिन जनता को अब किसी भी तरह का झुनझुना नहीं चाहिए.जनता अब किसी भी तरह के और किसी भी तरह से भुलावे में नहीं आनेवाली.उसे तो जो चाहिए सो चाहिए ही और चाहिए तो बस जन लोकपाल.
आज ऐतिहासिक रामलीला मैदान में जनता-जनार्दन ने अपने विराट रूप का प्रदर्शन किया है,५ अप्रैल से युद्ध शुरू होगा और इस महाभारत में जनता अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण बनेंगे प्रखर गांधीवादी अन्ना हजारे.आगे-आगे अन्ना होंगे,उनके पीछे होंगे बाबा रामदेव,किरण बेदी,स्वामी अग्निवेश,अरविन्द केजरीवाल आदि और उनके पीछे होगा पूरा भारत;राम,मोहम्मद,ईसा और गोविन्द के सभी अनुयायी.इस भ्रष्ट सरकार में शामिल लोगों ने अगर आज की रैली का दूरदर्शन पर दूरदर्शन किया होगा तो वे अवश्य भारत के आकाश में हो रही सितारों की गुफ्तगू और उनके इशारों को समझ गए होंगे.
देश के नीति-निर्माता समझ गए होंगे कि देश की जनता क्या चाहती है.अब यह उन पर निर्भर है कि वे सहूलियत से जन लोकपाल की जनाकांक्षा को स्वीकार कर लेते हैं या ढीठ धृतराष्ट्र व दुर्योधन की तरह रणभूमि को आमंत्रण देते हैं.अगर इस बार रण सजाया गया तो सरकार की हार पूर्वनिश्चित है क्योंकि विराट जनता के आगे न तो कोई तोप काम करती है और न ही बदूकें.मिस्र,ट्यूनीशिया और लीबिया के हालात इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं.स्वतंत्रता का यह दूसरा संग्राम बड़ा भीषण होगा और दूरगामी प्रभावों वाला होगा.याचना का समय अब बीत चुका है.रामरुपी जनता ने सत्याग्रह ब्रह्मास्त्र का संधान कर लिया है.याचना नहीं अब रण होगा,संघर्ष बड़ा भीषण होगा.जय चंद्रशेखर आजाद,जब भारत.

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

टूटी कश्ती से चुनावी दरिया पार करने की कोशिश

जब किसी विपक्षी नेता को अपने राज्य में विधानसभा चुनाव में जाना हो और उसे बजट पेश करने का सुनहरा मौका मिल जाए तो जाहिर है वह इसका अपने चुनावी हितों की पूर्ति के लिए भरपूर उपयोग करेगा.नेहरु युग में हो सकता है कि ऐसा नहीं होता हो लेकिन वर्तमान काल में तो ऐसा ही होता है और इस साल ऐसा ही हुआ भी.वर्षों से पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजरें गड़ाए ममता बनर्जी ने तमाम पूर्वानुमानों को सत्य साबित करते हुए केंद्रीय रेल बजट को बंगाल का बजट बनाकर रख दिया.बीच-बीच में अन्य राज्यों  जिसमें केरल सबसे आगे रहा,का नाम भी घोषणाओं की बाढ़वाले भाषण में आता रहा लेकिन कम-से-कम आधे समय तक बंगाल की ही बात होती रही.मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जिन श्रोताओं-दर्शकों ने रेल बजट का प्रसारण देखा-सुना होगा उन्हें पश्चिम बंगाल के सभी जिलों के नाम जानने के लिए अब सामान्य ज्ञान की किताबें उलटनी नहीं पड़ेगी बल्कि ममताजी ने आज इनके नामों को इतनी बार दोहराया है कि उन्हें ये नाम यूं ही याद हो गए होंगे.ममता जी की मानें तो भारत में सिर्फ पश्चिम बंगाल ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ महापुरुषों ने जन्म लिया है.
                            इस साल रेलवे बाजार से १० हजार करोड़ रूपये का कर्ज लेने जा रही हैं क्योंकि रेलवे को प्रत्येक 2.5 रुपये कमाने के लिए 4.5 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं.रेलवे की वित्तीय हालत बहुत ही ख्रराब है और यह अति दुखद है कि अकाउंट में हेरफेर कर यह दर्शाया गया है कि वास्तव में वह घाटे में नहीं है।ऐसे में पश्चिम बंगाल,केरल और आंध्र प्रदेश (यहाँ कांग्रेसी राज्य सरकार को चौतरफा समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है) के लिए नई परियोजनाओं की झड़ी लगा देनेवाली ममता ने यह नहीं बताया कि इनके लिए धन आएगा कहाँ से?खुदा न करे अगर ममता इस साल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन गईं तो उनकी जगह आनेवाला रेलमंत्री उनकी घोषणाओं के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैय्या नहीं अपनाएगा इसकी क्या गारंटी है?लालू के जाने के बाद जिस तरह ममता ने बिहार की सभी रेल परियोजनाओं को निर्ममतापूर्वक अधर में लटका दिया आनेवाला रेलमंत्री भी कहीं उनके सपनों की परियोजनाओं के साथ वैसा ही व्यवहार तो नहीं करेगा?
                                      किसी भी रेल बजट की खामी पर्याप्त आवंटन का नहीं होना तो होता ही है;बजट में यह भी नहीं बताया जाता है कि किसी योजना को कितने समय में पूरा हो जाना है.लगता है जैसे देरी रेलवे का अनिवार्य गुण बन गयी है.फिर चाहे वह देरी ट्रेनों के परिचालन की हो या योजनाओं के पूरा होने की.ममता ने इस साल भी यात्री किराये में किसी तरह की वृद्धि नहीं की है.ज्ञात हो कि यात्री किराया बढ़े करीब एक दशक बीत चुके हैं.जाहिर है कि ऐसा करते समय उनके दिमाग में पश्चिम बंगाल का चुनाव तो होगा ही;साथ ही कमरतोड़ महंगाई का ख्याल भी कहीं-न-कहीं उनके जेहन में होगा.पिछले १० सालों में रेलवे किराया और बस किराया में भारी अंतर पैदा हो चुका है.उदाहरण के लिए हाजीपुर से मुजफ्फरपुर का बस का भाडा ३५ रूपया है जबकि रेलवे का भाडा पैसेंजर से १० रूपया और एक्सप्रेस से मात्र २४ रूपया है.अगर यात्री किराये में मामूली वृद्धि कर दी जाती है तो भी आमलोगों की जेब पर बोझ नहीं पड़ता.बदले में सरकार की आमदनी काफी बढ़ जाती जिससे ममता जी रेलयात्रियों की सुरक्षा के लिए कदम उठा पातीं न कि सिर्फ जुबानी खर्च से काम चलातीं.साथ ही नए रेल लाइन निर्माण के लक्ष्य को भी कई गुना बढाया जा सकता था.इतना ही नहीं यात्री कोच और मालगाड़ी के डिब्बे की कमी भी दूर हो जाती.साथ ही पिछले बजट में उन्होंने कई प्रमुख स्टेशनों को विश्वस्तरीय बनाने की जो घोषणा की थी उसे पूरा नहीं कर पाने लिए उन्हें देश से माफ़ी भी नहीं मांगनी पड़ती.
                            आजकल जब भी रेलगाड़ी में कोई आपराधिक घटना घटती है तो केंद्र राज्य पर और राज्य केंद्र पर आरोप लगाने लगता है.ट्रेनें चलायमान वस्तु हैं और उन्हें कई राज्यों और जिलों से होकर गुजरना पड़ता है.ऐसे में कभी-कभी दो राज्यों की पुलिसों और कभी-कभी दो जिलों की पुलिसों के मध्य विवाद उत्पन्न हो जाता है कि जब घटना घटी तब ट्रेन किस राज्य या जिले में थी.अच्छा होता अगर रेलवे के लिए अलग से राष्ट्रीय पुलिस सेवा की स्थापना कर दी जाती और रेल संपत्ति और यात्रिओं की सुरक्षा का जिम्मा पूरी तरह उसको ही सौंप दिया जाता.इस बार के रेल बजट में मंत्री ने दुर्घटनारोधी यंत्रों को कुछ चुनिन्दा रेल मंडलों में लगाने की घोषणा की है जिसे अधूरे मन से और बहुत देर से उठाया गया कदम ही कहा जा सकता है; इसके सिवा और कुछ भी नहीं.जबकि ममता जी द्वारा २०१०-११ के रेल बजट में की गयी दर्जनों घोषणाएं अभी भी अमल के इंतजार में हैं तो फिर कैसे विश्वास कर लिया जाए कि नई घोषणाओं को अमलीजामा पहनाया ही जाएगा?मंत्री को जब तक पुराने लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं हो जाती तब तक नए लक्ष्यों की घोषणा नहीं करनी चाहिए थी.ममता ने पिछले बजट में १०२१ कि.मी. नई लाइन की स्थापना की घोषणा की थी लेकिन काम हुआ एक चौथाई से भी कम.इतना ही नहीं बजट में ८०० कि.मी. आमान परिवर्तन का लक्ष्य रखा गया था लेकिन काम हुआ एक बटा तीन.इन परिस्थितियों में बढ़ा-चढ़ाकर लक्ष्य घोषित करना या तो मूर्खता है या फिर धूर्तता.
                     रेलमंत्री को शिकायत है कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जाता.यह वह रेलमंत्री बोल रही हैं जो लम्बे समय से कैबिनेट और सदन की बैठकों में भाग ही नहीं ले रहीं.उनके ऐसे आरोपों पर सिर्फ हँसा ही जा सकता है.पूरी दुनिया के देशों में इस समय बुलेट ट्रेन चलाने की होड़ लगी है और हमारे यहाँ ट्रेनें चल रही हैं ५०-६० की रफ़्तार में.अगर भारत को विकास की वैश्विक दौड़ में सचमुच शामिल होना है तो उसे रेलवे सहित हरेक क्षेत्र में अपनी आधारभूत संरचना का विकास करना होगा और सुपर गति से करता होगा.वरना प्रत्यक्ष विदेश निवेश में आया ज्वार अब उतरने लगा ही है और आगे इसकी गति और भी तेज होनेवाली है.
                               जहाँ तक रेल बजट में की जानेवाली घोषणाओं के लिए धनाभाव का प्रश्न है तो या तो इसके लिए अलग से स्थायी कोष का गठन किया जाए या फिर रेल बजट को आम बजट का ही हिस्सा बना दिया जाए.इससे योजनाएं भविष्य में अटका नहीं करेंगी और उनके समय पर पूरी होने की भी गारंटी होगी.

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से

१९९९ के अंतिम सप्ताह में हमने इंडियन एयरलाइंस के अपहर्ताओं के आगे झुककर जो गलती की उसने कहीं-न-कहीं कश्मीर में हमारी स्थिति को कमजोर ही किया.साथ ही पूरी दुनिया में यह गलत संकेत गया कि भारत एक सॉफ्ट स्टेट है और सीमापार के आतंकवाद से निबटने में सक्षम नहीं है.इन दिनों देश फिर से कुछ उसी तरह की स्थिति का सामना कर रहा है.माओवादियों ने मलकानगिरी के कलक्टर कृष्णा और एक अभियंता पवित्र मांझी का अपहरण कर लिया था.कड़ा रूख अपनाने के बदले माओवादियों की सभी १४ मांगें मान ली गईं.माओवादी मांझी को छोड़ भी चुके हैं.लेकिन उनके साथ एक पत्र भी भेजा है जिसमें उन्होंने कृष्णा को छोड़ने के बदले ५ नई मांगें की हैं.इस बीच माओवादी नेता गंती प्रसादम को जमानत दी जा चुकी है.लेकिन वे भी तब तक जेल से बाहर जाने को तैयार नहीं है जब तक उनके ६०० अन्य माओवादी साथियों को भी रिहा नहीं कर दिया जाता.
                    ऊंगली पकडवाने पर बांह पकड़ना तो देखा-सुना था लेकिन यहाँ तो माओवादी गला ही पकड़ रहे हैं.पुलिस ने बरसों की मेहनत और अप्रतिम साहस के बल पर जिन देशद्रोहियों को गिरफ्तार किया उन्हें एक व्यक्ति की जान बचाने के लिए रिहा करके सरकार किसी भी तरह वीरता का परिचय तो नहीं ही दे रही है.आगे जब भी माओवादियों को अपने किसी भी साथी को रिहा करवाना होगा तो वे किसी अधिकारी का अपहरण कर लेंगे और जंगल में ऐसा करना कठिन भी नहीं होगा.इस तरह सरकारी अधिकारी उनके लिए ए.टी.एम. मशीन बनकर रह जाएँगे.
              अगर सरकार इसी तरह बार-बार झुकती रही तो न तो कंधार विमान अपहरण इस शृंखला की अंतिम घटनात्मक कड़ी थी और न ही मलकानगिरी के कलक्टर का माओवादियों द्वारा अगवा किया जाना ही इस प्रकार की अंतिम घटना है.आज तो किसी को याद भी नहीं होगा कि भारत सरकार सबसे पहले आतंकवादियों के आगे २० साल पहले रुबैय्या सईद अपहरण मामले में झुकी थी.भारत सरकार और राज्य सरकारों को समझ लेना होगा कवि गोपाल सिंह नेपाली की इन पंक्तियों में छिपी हुई चेतावनी को जो उन्होंने १९५६ में ही दी थी और दुर्भाग्यवश जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं-
ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से
चरखा चलता है हाथों से,शासन चलता तलवार से
यह रामकृष्ण की जन्मभूमि,पावन धरती सीताओं की   
फिर कमी रही कब भारत में,सभ्यता-शांति सद्भावों की
पर नए पडोसी कुछ ऐसे,पागल हो रहे सिवाने पर 
इस पार चरते गौएँ हम,गोली चलती उस पार से
ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से

तुम उड़ा कबूतर अम्बर में,सन्देश शांति का देते हो
चिट्ठी लिखकर रह जाते हो,जब कुछ गड़बड़ सुन लेते हो
वक्तव्य लिखो कि विरोध करो,यह भी कागज वह भी कागज
कब नाव राष्ट्र की पार लगी,यों कागज की पतवार से
ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से

मालूम हमें है तेजी से निर्माण हो रहा भारत का
चहुँओर अहिंसा के कारण,गुणगान हो रहा भारत का
पर यह भी सच है,आजादी है तो चल रही अहिंसा है
वरना अपना घर दीखेगा,फिर कहाँ कुतुबमीनार से
ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से

सिद्धांत,धर्म कुछ और चीज,आजादी है कुछ और चीज
सबकुछ है तरु-डाली-पत्ते,आजादी है बुनियादी बीज
इसलिए वेद-गीता-कुरान,दुनिया ने लिक्खे स्याही से
लेकिन लिखा आजादी का इतिहास रूधिर की धार से 
ओ राही,दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से
चरखा चलता है हाथों से,शासन चलता तलवार से.  

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

रातभर बदनाम होती रही मुन्नी

मुन्नी अपनी करनी से बदनाम है या उसे बेवजह बदनाम कर दिया गया है;शोध का विषय है.लेकिन चाहे जैसे भी हो बदनामी तो बदनामी होती है;चाहे ओढ़ी हुई हो या थोपी हुई.मैंने सैंकड़ों विवाह-समारोहों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है लेकिन माँ कसम ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा.
                       मित्रों,२० फरवरी को मेरे अभिन्न-अजीज मित्र की शादी थी.मेरे मित्र अमीर घर में पैदा हुए समाजवादी हैं.कई-कई बार उनके द्वारा बेवजह ताकीद करने पर मैं निर्धारित कार्यक्रमानुसार दोपहर बाद ३ बजे उनके घर पहुंचा.न जाने क्यों मैं धनपतियों के घरों में जाकर बेचैन-सा हो उठता हूँ.इसलिए बोर होने से बचने के लिए एक साहित्यिक पत्रिका मैंने हाजीपुर स्टेशन पर ही खरीद ली थी;साहित्य अमृत का फरवरी अंक.करीब २ घंटे तक मैं मित्र के दरवाजे पर बैठे-बैठे उक्त पत्रिका के माध्यम से कभी नागार्जुन तो कभी नेपाली तो कभी केदारनाथ अग्रवाल तो कभी शमशेर तो कभी अश्क से मुलाकात करता रहा.मुझे झूठी औपचारिकता और झूठे दिखावे पसंद नहीं इसलिए भी ऐसे मौके पर मेरे लिए समय काटना मुश्किल तो जाता है.मैं जानता हूँ कि मेरा मित्र मुझसे अपार स्नेह रखता है और मेरे लिए उसकी शादी में शामिल होने के लिए बस इतना ही काफी से भी ज्यादा काफी था.
                    खैर,विवाह-स्थल मुजफ्फरपुर से कुछ किलोमीटर दूर गाँव में था.मैं एक गाड़ी में सवार हुआ जिसमें कई मजदूर भी थे और काफिला चल पड़ा.रास्ते में हम एक लाईन होटल पर रुके;जहाँ नाश्ता-पानी का इंतजाम था.जिन्हें जाम पीना था पीया;मैंने तो जमकर पानी पीया.फिर हम जनवासा पर पहुंचे.बड़ा ही उम्दा इंतजाम था.छककर नाश्ता किया.बचपन में गोलगप्पे नहीं खाने की गलती को सुधारते हुए खूब गोलगप्पे खाए.
                    यहाँ तक तो स्थिति ठीक थी.जब हम लड़कीवाले के दरवाजे पर द्वार लगाने पहुंचे तो पाया कि कैटरिंग में भोजन परोसने के लिए लड़के कम लड़कियां ज्यादा रखी गई हैं.गाँव में तो ऐसा दृश्य मैंने आज तक नहीं ही देखा था;महानगर दिल्ली में भी कभी नहीं देखा.याद आया कि अभी पिछले साल अपने ही गाँव में गाँव की ही एक नाबालिग लड़की को बैंड की धुन पर नाचते देखकर मेरा मन कैसे खट्टा हो गया था.बहरहाल यहाँ बाराती लड़कियों पर अश्लील टिप्पणियां कर रहे थे और वे भी इस तरह से पेश आ रही थीं जैसे ये तो होना ही था.चुस्त जींस-टीशर्ट में बनी-ठनी लड़कियां.हमारे गांवों में भी पैसा ही सबकुछ होता जा रहा है देखकर दुखद आश्चर्य हुआ.
                    ईधर बारातियों में गोली फायरिंग करने की होड़ लगी हुई थी.दर्जनों बंदूकें गरज रही थीं.लाखों रूपये झूठे दिखावे में फूंके जा रहे थे.जब हम लौटकर जनवासा पर पहुंचे तो कथित सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो चुका था.हमने चूंकि पगड़ीवाली टोपी पहन रखी थी इसलिए हमें स्थान पाने में किसी तरह की असुविधा नहीं हुई.कुछ देर तक तो गायन का कार्यक्रम चला.फिर रिकार्डिंग डांस शुरू हुआ.५ लड़कियां काफी कम कपड़ों में आतीं और नृत्य प्रदर्शन कम देश प्रदर्शन ज्यादा करके चली जातीं.छोटे-छोटे बच्चों की भारी उत्साहित भीड़ जमा थी;कुछ बूढ़े भी उन पर अपना बुढ़ापा लुटाने को आतुर थे.तभी एक १४-१५ साल का बच्चा स्टेज पर चढ़ गया और लड़कियों के साथ कामुकता का प्रदर्शन करता हुआ भोंडा नृत्य करने लगा.इससे पहले एक गरीब मंच पर छेड़खानी करके अपनी धुनाई करवा चुका था.हम आश्चर्यचकित थे कि इस बच्चे को कोई क्यों नहीं कुछ कह रहा?थोड़ी ही देर में यह रहस्योद्घाटन हुआ कि जो व्यक्ति बार-बार हजार के नोट ईनाम में फेंक रहा था यह होनहार उन्हीं का एकमात्र पुत्र था.उस व्यक्ति की ईंट की चिमनियाँ थीं और वे मेरे मित्र के हो चुके या होनेवाले ससुर के सगे छोटे भाई थे.
                       वह बच्चा जब अपनी कथित मर्दानगी का प्रदर्शन करते-करते थक जाता और मंच से नीचे उतरने लगता तब उसके पिता उसे फिर से ऊपर बुला लेते और फिर से वह किसी अन्य नर्तकी के साथ नृत्य करने लगता.बच्चे की दोनों टाँगें ख़राब थीं.माता-पिता ने जरूर बचपन में पोलियो-ड्रॉप पिलवाने में कोताही की होगी.पिता की चौड़ी छाती बेटे के ठुमके के साथ और भी चौड़ी होने लगी.उसने मंच से ही घोषणा कि वह आर्केष्ट्रा पार्टी को आज डेढ़ लाख रूपये और दो कट्ठे जमीन का ईनाम तो देगा ही साथ ही इस साल की विश्वकर्मा पूजा के लिए भी अनुबंधित करता है वो भी साढ़े पांच लाख रूपये में.
                         मैंने गांवों में २०-३० हजार रूपये के कुल खर्च में लड़कियों की शादियाँ होते भी देखी हैं.लेकिन यहाँ तो उससे कई गुना सिर्फ दिखावे में न्योछावर किया जा रहा था.बार-बार सुपुत्रजी की फरमाईश पर या यूं कहें कि आदेश पर मुन्नी बदनाम हुई गाना बजता और कोई नर्तकी आकर उसके साथ नाचती.यहाँ नाचने वाला भी पैसा था और नचानेवाला भी.ईधर पुत्र की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था तो उधर पिता का सीना गर्व से फटा जा रहा था.मेरे पत्रकार मित्रों ने भी इससे पहले ऐसा अद्भूत दृश्य कभी नहीं देखा था.अंत में सभी नृत्यांगनाओं को एकसाथ उस जवान बच्चे के साथ नाचना था.एक के नितम्ब को उसने सरेआम दबा दिया और वह नाराज होकर नेपथ्य में चली गई.फिर अप्रतिम साहस का परिचय देते हुए उस परमवीर ने दूसरे को अपनी बांहों में भर ही तो लिया.परिणामस्वरूप धनलोभी आर्केष्ट्रा संचालक को सभी नर्तकियों को प्रसाधन-कक्ष में भेजना पड़ा.सभा विसर्जित हो गई और अपने पीछे छोड़ गई अनगिनत सवाल.
                पहला सवाल तो व्यक्तिगत था कि मेरा मित्र कैसे ऐसे परिवार के साथ सामंजस्य बिठाएगा?उसका दिल तो शीशे का है सोने या चांदी का नहीं है.अन्य कई सवाल भी मेरे सामने थे जो सामाजिक थे.विवाह एक सुअवसर है या कुअवसर?यह दो दिलों या आत्माओं के मिलन का अनुष्ठान है या धनबल के अश्लील प्रदर्शन का अचूक मौका?लक्ष्मी की सवारी हंस क्यों नहीं है उल्लू क्यों है?हम बुद्धिजीवियों पर उनकी कृपा क्यों नहीं होती जो उनका सदुपयोग कर उन्हें सम्मान दिलवाता.क्या लक्ष्मी को मूर्खों के हाथों लुटने में ही आनंद आता है?लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यह था कि उस रात मुन्नी तो बदनाम हुई ही ईंट कंपनी का मालिक और उसका ईकलौता बेटा बदनाम हुआ था या नहीं?या फिर बदलते सामाजिक परिवेश में मुन्नी को बदनाम करके भी उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि तो नहीं हुई?

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

रोये अब किस द्वार पे जाकर लुटी-पिटी बेचारी हिंदी

रोये अब किस द्वार पे जाकर,
लुटी-पिटी बेचारी हिंदी;
घर के लोगों से निष्कासित,
अपमानित किस्मत की मारी हिंदी.


खूनी पंजे का खूनी खेल,
हिंदी हुई लहूलुहान;
जबरन किया सूर्य को अस्त,
वादा था जिनका नया विहान;
क्यूं कर किस पर दांव लगाए
हर बाजी में हारी हिंदी;
रोये अब किस द्वार पे जाकर,
लुटी-पिटी बेचारी हिंदी;
घर के लोगों से निष्कासित,
अपमानित किस्मत की मारी हिंदी.

हुई सिविल सेवा परीक्षा
अब अंग्रेजी के हवाले मित्रों;
बनेंगे भविष्य में कलक्टर
सिर्फ टाई-कोट-पैंट वाले मित्रों;
उपेक्षित थी बना दी गयी फिर वंचित
तेरी-मेरी-हमारी हिंदी;
रोये अब किस द्वार पे जाकर,
लुटी-पिटी बेचारी हिंदी;
घर के लोगों से निष्कासित,
अपमानित किस्मत की मारी हिंदी.

जिससे आशंकित बिल गेट्स हैं
भयभीत बिल क्लिंटन थे;
उसके खिलाफ साजिश रचने में
मशगूल सोनिया-मनमोहन थे;
गाँधी के चेलों की मारी
गाँधी की राजदुलारी हिंदी;
रोये अब किस द्वार पे जाकर,
लुटी-पिटी बेचारी हिंदी;
घर के लोगों से निष्कासित,
अपमानित किस्मत की मारी हिंदी.

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

मनमोहन जी नामुमकिन नहीं है भारत में मिस्र जैसी क्रांति

कल जब ६ महीने की नरसिंह राव स्टाइल चुप्पी के बाद राव के सच्चे राजनैतिक शिष्य प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मीडिया के सामने उपस्थित हुए तो उम्मीद की जा रही थी कि वे भ्रष्टाचार व महंगाई से निबटने का कोई-न-कोई रोडमैप अवश्य साथ में लाए होंगे.लेकिन देश की जनता के साथ पत्रकारों को भी यह देखकर भारी निराशा हुई कि प्रधानमंत्री के पास ऐसा कोई रोडमैप नहीं था बल्कि उनकी झोली पूरी तरह खाली थी.उनके पास अगर कुछ था तो बस मजबूरियों का रोना था.आश्चर्य है कि विपक्ष बरसों से मनमोहन को भारत का सबसे मजबूर प्रधानमंत्री बता रहा था और कांग्रेस इसका खंडन करती जा रही थी;प्रधानमंत्री ने मजबूरी के विधवा-विलाप द्वारा उनके इस आरोप को स्वयं सत्य साबित कर दिया.अब इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया है कि मनमोहन सिंह भारतीय इतिहास के सबसे कमजोर और मजबूर प्रधानमंत्री हैं.दुर्भाग्यवश वह भी ऐसे कालखंड में जब देश एक साथ कई-कई गंभीर संकटों का सामना कर रहा है और देश को सशक्त व निर्णायक नेतृत्व की सर्वाधिक आवश्यकता है.
               ईमानदारी के कठपुतले मनमोहनजी फरमाते हैं कि भ्रष्टाचार को देखकर भी धृतराष्ट्र की तरह आँखें बंद रखना उनकी मजबूरी है क्योंकि वे नहीं चाहते हैं कि देश में हर ६ महीने पर चुनाव हो.कितनी महान सोंच हैं;कितनी बड़ी देशभक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं मनमोहन जी देश को हर ६ महीने पर चुनाव से बचाकर!!वाह दिल खुश हो गया!!एक चुनाव में देश का कितना खर्च होगा?बहुत होगा तो सौ या हजार या दस-बीस हजार करोड़ रूपया.चाहे जितना भी हो पौने दो लाख या २ लाख करोड़ रूपया तो नहीं ही होगा जितने का घोटाला उनकी सरकार में हर सप्ताह सामने आ रहा है.मनमोहन देश को चुनाव के नाम से डरा रहे हैं जैसे देश ने कभी चुनाव देखा ही नहीं है या फिर चुनाव न हो कोई भूत,हौवा या डरावना सपना हो.अगर हर ६ महीने के चुनाव से देश भ्रष्टाचारमुक्त हो सकता है तो फिर यही सही.हम सह लेंगे हर ६ महीने में १०-२० हजार करोड़ रूपये का खर्च.कम-से-कम हमें रोज-रोज के घोटाले तो नहीं देखने पड़ेंगे या फिर रोज-रोज दफ्तर-दफ्तर में कुल मिलाकर अरबों रूपये सालाना का सुविधा-शुल्क तो नहीं देना पड़ेगा.
                     अर्थव्यस्था विशेषज्ञ डॉक्टर साहब फरमाते हैं कि वे तो गठबंधन धर्म का पालन कर रहे हैं लेकिन अन्य दल नहीं कर रहे हैं तो वे क्या कर सकते हैं?मनमोहन जी को कोई तो बतलाये कि गठबंधन धर्म के पालन का मतलब यह नहीं कि वे अन्य दलों के मंत्रियों को देश को लूटने की खुली छूट दे दें.फिर उन्होंने जो शपथ पदभार ग्रहण करते समय ली थी वो क्या था?क्यों ली थी अपने कर्तव्यों के सम्यक निर्वहन की शपथ?इसके बदले कैमरे के सामने उन्हें सिर्फ गठबंधन धर्म का पालन करने की शपथ लेनी चाहिए थी.क्यों शासन की शुरुआत ही उन्होंने इस धोखेबाजी से की?
                       हद तो यह है कि जिस मुंह से सच्चाई के आला अलंबरदार मनमोहन गठबंधन की मजबूरी का रोना रोते हैं उसी मुंह से उसी समय देश को यह भरोसा भी देते हैं कि भ्रष्टाचारियों को कदापि नहीं बख्शा जाएगा.क्या अब ऐसा करने से उनकी सरकार गिरेगी नहीं और हर ६ महीने पर चुनाव की नौबत नहीं आएगी?इसका भी जवाब दिया उन्होंने लेकिन परोक्ष रूप से और कहा कि गठबंधन मजबूत है,नहीं टूटनेवाला.एक साथ मनमोहन कई-कई तरह की बातें कर लेते हैं और सभी एक-दूसरे से पूर्णतया प्रतिकूल.किसे सच मानें और किसे झूठ?किस बात पर भरोसा करें;किस पर नहीं?रावण की तरह उनके भी दस मुंह होता तो ऐसा कृत्य क्षम्य होता लेकिन मनमोहन के तो एक ही मुंह है और एक ही जुबान भी.तो क्या हम यह नहीं समझें कि मनमोहन सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ उतनी ही और सीमित कार्रवाई करेगी जिससे गठबंधन बिखरने से बचा रहे.तभी तो वे यह दावा कर रहे हैं कि गठबंधन को बिखरने भी नहीं देंगे और भ्रष्टाचार को नियंत्रित भी कर लेंगे.मुंह फुलाना और हँसना एक मुंह वाले किसी भी इन्सान के लिए संभव नहीं,शायद मनमोहन के लिए संभव हो.
                    जहाँ तक महंगाई का प्रश्न है तो मनमोहन जी ने बताया कि उनको पता है कि गरीबों पर ही महंगाई की मार सबसे ज्यादा पड़ती है.लेकिन वे उच्च विकास दर के लिए ७% तक की मुद्रास्फीति को जरुरी मानते हैं.यानि उनकी पहली प्राथमिकता ऊंची विकास दर है और आखिरी प्राथमिकता महंगाई पर नियंत्रण.गरीबों को चाहिए कि वह उच्च विकास दर की ख़बरों से अटे-पटे अख़बार ख़रीदे और उनकी रोटी बनाकर खा ले;हर तीन महीने में एक बार और अपने को भाग्यशाली समझे कि वह उच्च विकास दर वाले समय में जी रहा है.
                    बेसिरपैर की तुलना करने में हमारे मनमोहनजी का कोई जवाब नहीं.कब किसकी तुलना किससे कर दें देवो न जानाति?कल भी उन्होंने कालिदास की उपमाशक्ति को कई प्रकाशवर्ष पीछे छोड़ते हुए २-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में गयी रकम की तुलना गरीबों को दी जा रही सब्सिडी से कर दी.कल वे किसी अन्य घोटाले में हुए नुकसान की तुलना वेतन पर होनेवाले खर्च और भ्रष्टाचार-नियंत्रण पर होनेवाले व्यय से करेंगे और अपनी अद्भूत उपमा शक्ति का फिर से परिचय देंगे.कालिदास को अभी पानी-पानी ही किया है;शर्म की नदी में डुबकी लगाने को भी विवश कर देंगे.
                प्रधानमंत्रीजी विपक्ष पर आरोप लगा रहे हैं कि वह भ्रष्टाचार के मुद्दे पर केंद्रीय मंत्रियों से इस्तीफा दिलवाकर बदला सधा रहा है.अगर यह सच है भी तो विपक्ष क्या गलत कर रहा है?सरदारजी खुद अपने कर्तव्यों का पालन तो कर नहीं रहे हैं और चले हैं विपक्ष और मीडिया को जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाने.कई सालों तक हार्वर्ड में शिक्षक जो रह चुके हैं महानुभाव.शिक्षक तो पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब भी बने थे और कई बार बने थे लेकिन एक आदर्श स्थापित करने के बाद.लेकिन मनमोहन का आदर्शों से क्या लेना-देना?वे तो पर उपदेश कुशल बहुतेरे में विश्वास रखते हैं;अटूट विश्वास.जब मौका मिलता है उपदेश देने लगते हैं कि यह होना चाहिए,वह होना चाहिए.जैसे देश में किसी को पता ही नहीं हो कि क्या होना चाहिए?हम जनता ने यह जानने-सुनने के लिए उन्हें भारत की सबसे बड़ी कुर्सी नहीं सौंपी है कि यह होना चाहिए और यह नहीं होना चाहिए;हरगिज नहीं!!!जनता ने उन्हें इसलिए वोट दिया है क्योंकि उसे विश्वास है कि यह शख्स जो होना चाहिए उसे करके दिखाएगा.जैसे इसने देश को कर्ज और पूँजी की कमी के दलदल से बाहर निकाला;उसी प्रतिबद्धता के साथ यह लगातार बढ़ते भ्रष्टाचार के दलदल से भी हमें बाहर निकलेगा.लेकिन हाय री किस्मत!जिस पर मजबूत समझकर भरोसा किया वही सबसे ज्यादा मजबूर निकला.मजबूर भी ऐसा कि न तो अपनी मर्जी से भ्रष्ट लोगों पर कार्रवाई ही कर सके और नाराज होने पर न तो अपनी मर्जी से इस्तीफा ही दे सके.कल ही उन्होंने एक बार फिर से कहा कि वे इस्तीफा नहीं देंगे.दें भी कैसे मैडम का आदेश जो नहीं होगा.
                                 उनकी कई जुबानों वाले मुंह की एक और बाजीगरी देखिए.मनमोहनजी ने ७० हजार करोड़ रूपये के राष्ट्रमंडल घोटाले के बारे में कहा था कि ९० दिनों में जाँच पूरी कर ली जाएगी.जबकि वास्तविकता यह है कि जाँच अभी सही तरीके से शुरू भी नहीं हो सकी है;हालाँकि भ्रष्टाचार के इन खेलों को समाप्त हुए चार महीना पूरा होने को है.भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से अंकुश लगाने के लिए अपनी आदत के अनुसार प्रधानमंत्री ने प्रणव मुखर्जी की अगुवाई में एक समिति का गठन कर दिया है जो ६० दिनों में अपनी रिपोर्ट देगी.देखिए अब यह समिति क्या कहती है?वह जन लोकपाल की सिफारिश करती है या लोकपाल की?वह भ्रष्टाचार को मिटाने की बात करती है या बचाने की.मनमोहन जी विपक्ष पर बचकाना आरोप लगा रहे हैं कि विपक्ष महत्वपूर्ण बिलों को पारित करने में सहयोग नहीं कर रहा.किस बिल की बात कर रहे हैं वे?अगर बात प्रस्तावित लोकपाल बिल की हो रही है तो फिर विपक्ष को धन्यवाद् देना चाहिए क्योंकि यह बिल तो रद्दी की टोकरी में भी फेंकने लायक नहीं है;बल्कि सीधे दाह-संस्कार का अधिकारी है.
                     झूठ बोलते मनमोहन यही नहीं रुके.वे यह भी बोल गए कि तेज विकास दर के चलते भारत का दुनिया में मान बढ़ रहा है.पहले तो मनमोहन बताएं कि विकास दर का ४५-५० डिग्री का कोण लिए ग्राफ किसके विकास की देन है.गाँव में आधा पेट खाकर महंगाई से लड़ रहे गरीब की या फिर टाटा और मित्तल की जिनकी कम्पनियाँ आईटी क्रांति के रॉकेट पर सवार है.जहाँ तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का मान बढ़ने का उनका दावा है तो वह उनकी सरकार की अन्य उपलब्धियों की तरह ही खोखला है;पूरी तरह से खोखला.अमेरिका में हमारे बच्चों के गले और पैरों में कुत्तों की तरह पट्टा डालने और श्रीलंका द्वारा हमारे मछुआरों के साथ लगातार बदतमीजी की बढती घटनाएँ इसका प्रमाण हैं कि भारत का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान बढ़ा नहीं है बल्कि घटा है और जब तक सरकार चीन से डरती रहेगी और यह सोंचती रहेगी कि चीनी खतरे को नजरंदाज कर देने से भारत की ओर बढ़ रहा चीनी खतरा टल जाएगा तब तक भारत के अंतर्राष्ट्रीय सम्मान में क्षरण होता रहेगा.जब तक दूसरे का भाषण पढने लगनेवाला खुद से भी बेखबर व्यक्ति भारत का विदेशमंत्री बना रहेगा;भारत की अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर फजीहत होती रहेगी,भारत का सम्मान बढनेवाला नहीं है.
                अबोध व मासूम मनमोहन जी को दुःख है की उन पर भी अब भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं.वे खुद को सीजर की पत्नी बता रहे हैं.जनता के विश्वास का खून करनेवाला कैसे सीजर की पत्नी हो सकता है,वह तो ब्रूटस हुआ न?फिर मनमोहन का आचरण कैसे संदेहों से परे हो गया?क्या वे अपने को इन्सान नहीं मानते;भगवान मानते हैं?एक तरफ तो वे मानते हैं कि उनसे गलतियाँ हुई हैं और दूसरी तरफ खुद को पाक-साफ भी बता रहे हैं.लगता है जैसे मनमोहन कोई सात घूंघटोंवाली ऐसी महिला हैं जिसके हर घूंघट में अलग-अलग चेहरा है.कौन-सा चेहरा सच्चा है,कोई नहीं बता सकता.
                    मैं परम विद्वान मनमोहन जी को याद दिलाना चाहूँगा कि सदियों पहले गोस्वामी तुलसीदास कह गए हैं कि जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी,सो नृप अवस नरक अधिकारी.अभी भी उतनी देर नहीं हुई है;देर नहीं हुई यह कहना भी सत्य नहीं होगा.अब से भी जनता के दुखदर्द को समझने का प्रयास कीजिए और उन्हें दूर करिए.अब जमाना इंदिरा या सोनिया या राहुल इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा,सोनिया या राहुलवाला नहीं रहा.आज जमाना तहरीर चौक का है.कल जो कुछ उन्होंने कहा उसके अनुसार मनमोहनजी को अगर ऐसा लगता है कि भारत में मिस्र जैसी क्रांति नहीं हो सकती क्योंकि वे लोग जनता को समय-समय पर झूठी हरी,पीली,नीली,उजली,काली क्रांति दिखाते रहते हैं तो बेहतर होगा कि वे इस ग़लतफ़हमी को आगे नहीं पालें और अपने दिमाग के तबेले से खदेड़ डालें.
             भारत में जो विस्फोटक हालात उनकी भ्रष्ट और निकम्मी सरकार तैयार कर रही है वह किसी भी तरह से फ़्रांस,रूस,चीन या मिस्र की क्रांतिपूर्व की स्थिति से अलग नहीं है.भारत की जनता भी क्षुब्ध है और उच्च विकास दर की ख़बरों से भरे पड़े समाचार-पत्रों को निचोड़ने से न तो दूध निकल सकता है और न ही रोटी.जनता का धैर्य ऊपरी सीमा की ओर बढ़ रहा है.जनता समझ गयी है कि चुनाव-दर-चुनाव मतदान करने से सिर्फ शासक बदल रहे हैं शासन का चरित्र नहीं.व्यवस्थापकों को बदलना अब काफी नहीं है अब समय आ गया है जब व्यवस्था को बदला जाए.इससे पहले मनमोहन जी की पार्टी १९७४ देख चुकी है अब शायद आगे जब जनता सडकों पर आएगी तो १९७४ से नहीं मानेगी बल्कि १९४२ होगा और १९१७ होगा.व्यवस्था बदल दी जाएगी और भ्रष्ट काले अंग्रेजों को भी भारत छोड़कर जाना पड़ेगा,गोरे अंग्रेजों की तरह.हाँ,मैं मानता हूँ कि अभी देश में गाँधी जैसा नेतृत्व नहीं है लेकिन कभी-कभी मुद्दे ही नेतृत्व बन जाया करते हैं,हमरी न मानो तो हुस्नी मुबारक से पूछो.मैं सचेत करना चाहूँगा भारत सरकार को कि भारत में जिस तरह लोकतंत्र वरदान के बजाए अभिशाप बनता जा रहा है वह देश को सिर्फ और सिर्फ रक्तरंजित क्रांति की ओर ले जाएगा.मिस्र से चली बदलाव की हवा ने अब तूफ़ान का स्वरुप ग्रहण कर लिया है और लीबिया,यमन,बहरीन होते हुए क्रांति के दबाव का क्षेत्र हमारे पड़ोस के पड़ोस ईरान तक में बनने लगा है और ईरान न तो भारत से ज्यादा दूर ही है और न ही भारत की स्थिति ईरान से बहुत अलग ही है.
पुनश्च-मित्रों यह लेख मैंने कल ही लिख लिया था लेकिन बिजली नहीं रहने के कारण कल प्रकाशित नहीं कर पाया और आज कर रहा हूँ.

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

ऐ अजनबी तूं भी कभी आवाज दे कहीं से

प्रेम ही ईश्वर है और ईश्वर ही प्रेम है.प्रेम कोरा शब्द नहीं अनुभूति का नाम है,दुनिया की सर्वोत्तम अनुभूति का.कोई सरकार प्रेम करने पर प्रतिबन्ध लगा दे इससे बड़ा अत्याचार कोई हो ही नहीं सकता.ऐसा सिर्फ रोम में संभव है,भारत में नहीं.भारत में तो प्रेम को ही विद्या माना गया है.कबीर कहते हैं कि जिसने सबसे प्रेम करना सीख लिया वही पंडित है.सबके साथ अनुराग,सबके साथ प्रेम तभी संभव है जब या तो सबमें ईश्वर नजर आने लगे या फ़िर सबमें प्रेमी अथवा प्रेमिका दिखाई देने लगे.इसमें भी पहली अवस्था उत्तम है क्योंकि यहाँ पिटने का भय नहीं,दूसरी अवस्था में सिर्फ पिटने की ही सम्भावना है,प्रेम तो मिलने से रहा.
               सबमें ईश्वर है.सब उसी के अंश हैं.फ़िर घृणा क्यों और किससे?इसलिए दुनिया में अगर कुछ करनीय है तो वह है सिर्फ और सिर्फ प्रेम और कुछ भी नहीं.लेकिन ऐसा तभी संभव है जब कोई व्यक्ति ईश्वर में स्थित हो जाए.फ़िर तो जित देखूं तित तूं वाली अवस्था हो जाती है.ऐसा व्यक्ति किसी पर नाराज नहीं हो सकता,कुपित नहीं हो सकता,क्रोधित नहीं हो सकता.वह मन के हाथों बेमोल बिक चुका होता है;बाध्य हो जाता है.ऐसा व्यक्ति इस दुनिया में सिर्फ एक ही काम कर सकता है और वह है प्रेम.
              लेकिन यह सर्वसिद्ध है कि सभी मानवेंद्रियों में सबसे प्रभावकारी हैं नेत्र.हम जो देखते हैं उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते.इसलिए हम जब किसी को अनुचित कार्यों में एक बार लिप्त देखते हैं तो कुपित हो जाते हैं.बार-बार देखते हैं तब क्रोध स्थायी भाव ग्रहण करने लगता है और हम उससे घृणा करने लगते हैं.हम भूल जाते हैं कि जो हमें दिख रहा है वह माया है और हम जाने-अनजाने उसका शिकार बन चुके हैं.हम भूल जाते हैं कि यहाँ देखनेवाला भी ईश्वर है;दुष्कर्म करनेवाला भी ईश्वर,पीड़ित भी ईश्वर और घृणा करनेवाला भी ईश्वर.
                    ऐसा नहीं है कि अगर कोई अनुचित कर्म करे तो उसे ईश्वरीय कृत्य मानकर क्षमा कर दिया जाए तो उचित होगा.मायावी संसार में व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरुरी है कि मायावी कानून बने और मायावी दंड भी दिए जाएँ.इस सम्बन्ध में एक कथा बड़ी सटीक और प्रासंगिक है.कथा प्रेममूर्ति स्वामी रामकृष्ण परमहंस के मुखारविंद के निस्सृत है.एक दिन शिष्य को उसके गुरु ने बताया कि सभी जीवों में ईश्वर है इसलिए सबसे प्रेम करो,किसी से भी नहीं डरो.एक दिन शिष्य जब भिक्षाटन पर था तब किसी राजा का हाथी पगला गया.चौराहे पर भगदड़ मच गई.सब भागने लगे.लेकिन शिष्य नहीं भागा उसने सोंचा कि गुरूजी के अनुसार तो यह हाथी भी ईश्वर है इसलिए क्यों भागा जाए?लोग चिल्ला रहे थे उसे सचेत करने लिए कि भागो हाथी तुम्हें कुचल देगा.लेकिन वह नहीं भागा और खड़ा रहा.परिणामस्वरूप हाथी ने उसे घायल कर दिया.गुरूजी को मालूम हुआ तो राजकीय आरोग्यशाला में भागे-भागे आए और शिष्य से पूछा कि यह गजब हुआ कैसे?तो शिष्य ने कहा कि हाथी में जो ईश्वर था उसने मुझे घायल कर दिया.तब गुरूजी ने कहा कि मूर्ख,सिर्फ हाथी में ही ईश्वर था और तुम्हें जो लोग सचेत कर रहे थे उनमें ईश्वर नहीं था?
               प्रेम करना आसान नहीं है.आखिर यह सर्वोत्तम अनुभव मुफ्त में मिले भी तो कैसे?प्रेम में अपना सबकुछ पिघला देना पड़ता है.अपना व्यक्तित्व,अपनी सोंच,अपना अस्तित्व सबकुछ खाक कर देना होता है,तब जाकर मिलता है सच्चे प्रेम के बदले सच्चा प्रेम.कबीर कहते हैं कि प्रेम हाट में नहीं बिकता न ही बाड़ी में उपजता है.यह अनमोल फसल तो ह्रदय में उपजता है और ह्रदय में ही परिपक्व होता है और ह्रदय ही इसका रसास्वादन करता है.
                   पुरुष और स्त्री दुनिया को चलानेवाले दो पहिए हैं.जबतक दोनों अलग-अलग हैं दुनिया की गाड़ी नहीं चल सकती,ठहर जाएगी;सबकुछ समाप्त हो जाएगा.सुनता हूँ कि सबके लिए कहीं-न-कहीं कोई-न-कोई है जो तत्काल अज्ञात है,अनजाना है.लेकिन भविष्य में वही उसके लिए सबकुछ न सही बहुत-कुछ हो जाएगा;क्योंकि वही प्रेम का सबसे सघन साक्षात् प्रतिरूप बनकर उसके जीवन में आएगा.लेकिन क्या यह प्रेम सिर्फ सांसारिक प्रेम होगा,शारीरिक होगा या यह प्रेम ईश्वरीय प्रेम की ऊंचाइयों को भले ही प्राप्त कर न पाए उसके निकट पहुंचेगा.मैं आदर्शवादी हूँ.मुझे सपनों में जीने की आदत है.मैं रोज कल्पना करता हूँ कि मैं अपनी अर्द्धांगिनी से बेईन्तहा मुहब्बत करता हूँ और हमारे प्रेम ने ईश्के मजाजी से ईश्के हकीकी तक का सफ़र तय कर लिया है.हमारे प्रेम ने उन्हीं ऊंचाईयों को हासिल कर लिया है जो कभी उसने राम और सीता के मध्य प्राप्त की थी.लेकिन मैं नहीं जानता हूँ उसका रंग-रूप,नाम और पता.इस समय वह कहाँ है और क्या कर रही है सबकुछ अनिश्चित भविष्य की धुंध में है..मैं उसकी पुकार सुन रहा हूँ लेकिन जान नहीं रहा कि वह कौन है और कहाँ है.वह भी इसी तरह मेरे दिल की आवाज को कहीं गुमसुम बैठी सुन रही है और व्याकुल है आवाज के स्रोत को जानने के लिए.मगर कहाँ,रहस्य है और तब तक यह रहस्य बना रहेगा जब तक भविष्य वर्तमान नहीं बन जाता.

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

रिक्त हो रहा हूँ मैं

कल रात मैंने एक बड़ा भयानक सपना देखा.मैं सपने में सपना देख रहा था.ऐसा भी नहीं है कि मैं यह सपना पहली बार देख रहा था.पहले भी कई बार मैंने यह सपना देखा है.मैंने देखा कि मैं सुबह में जगा तो पाया कि मेरी आवाज ही गायब है.मैं बोलना तो चाहता हूँ लेकिन कंठ से आवाज ही नहीं निकल रही है.काफी कोशिश के बाद जब बोला भी तो मुंह से सिर्फ निरर्थक शब्द निकले.
                  मारे घबराहट के निकालता हूँ वह कलम जिससे मैंने बहुत सारे लेख,कविता और व्यंग्य लिखे हैं.लेकिन यह क्या?कलम से भी कोई शब्द नहीं निकल रहे थे?यह क्या हो गया था मुझे और मेरी कलम को.कहीं मेरा शब्दकोष रिक्त तो नहीं हो गया था,व्यवस्था पर व्यंग्य करते-करते;उसे गलियाते,लताड़ते और उसकी आलोचना करते-करते.तभी मेरी नींद खुल गई और मैं एक साथ दोनों सपनों से बाहर आ गया.मारे घबराहट के मेरा कंठ सूख रहा था.मैंने पानी पीना शुरू किया एक गिलास,दो,तीन शायद दसवें गिलास तक.लेकिन अब भी घबराहट कायम थी.धडकनें बेकाबू थीं.मैं डरा हुआ था और अब भी डरा हुआ हूँ कि क्या सचमुच एक दिन मेरा शब्दकोष रिक्त हो जाएगा?वैसे भी जिन शब्दों का प्रयोग मैं कर रहा हूँ उनमें असर है कहाँ?मेरे शब्द अर्थहीन हैं शायद.तभी तो न तो मैं इस देश की जनता को जगा पा रहा हूँ और न ही बना-बसा पा रहा हूँ अपनी दुनिया-ब्रज की दुनिया.
                         कहाँ से लाऊँ अर्थवान शब्द?बाजार में तो बिकते नहीं.आपके पास हो तो उधार में देंगे न?लेकिन आपको मैं जानता भी तो नहीं हूँ.फ़िर कैसे पहुंचूं आप तक?मुझे ज्यादा नहीं बस दो-चार दर्जन ऐसे शब्द चाहिए जिनमें सिर्फ अर्थ-ही-अर्थ हो,असर-ही-असर हो.जिन्हें सुनते ही जनता में जागरण उत्पन्न हो जाए,जनता निकल आए अपने-अपने घरों से.मेरे गाँव-घर का हर चौक-चौराहा तहरीर चौक बन जाए और चारों तरफ रामराज्य जैसा वातावरण बन जाए.
पुनश्च-मेरी यह रचना पद्य भी है और गद्य भी.यह आप पर निर्भर करता है कि आप इसे क्या समझते हैं.यह सपना कोई काल्पनिक नहीं है,सत्य है.मैं स्वप्नफल विशेषज्ञ नहीं हूँ और अगर कोई विशेषज्ञ मिल भी जाए तो आदतन बिना पूर्ण संतुष्टि के मैं उसकी व्याख्या को मानूंगा नहीं.मैं प्रयोगवादी भी नहीं हूँ और मैंने इस गद्यात्मक पद्य या पद्यात्मक गद्य में कोई प्रयोग नहीं किया है.मुझे लगता है कि यह समस्या सिर्फ मेरी ही नहीं है.सार्वभौमिक है,दुनिया के सभी रचनाकारों की है;भले ही उन्हें इस तरह के सपने मूंदी आखों में नहीं आए हों.कभी-न-कभी खुली आँखों में जरूर आए होंगे.

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

काले कोट का काला धंधा

अंग्रेजों ने क्या सोंचकर वकीलों को काला कपडा पहनाया था इसका महज अनुमान ही लगाया जा सकता है.शायद उन्होंने सोंचा हो कि जिस तरह इस रंग पर दूसरा कोई रंग नहीं चढ़ाया जा सकता उसी तरह इसे पहननेवालों पर भी झूठ और लालच का रंग नहीं चढ़ेगा.लेकिन हो रहा है ठीक इसके उलट.इसे पहनकर कई लोगों द्वारा सिर्फ झूठ ही बोला जा रहा है और मुवक्किलों के विश्वास का नाजायज फायदा उठाया जा रहा है.
                  हाजीपुर व्यवहार न्यायालय में ऐसे वकीलों की एक बड़ी संख्या है जो पहले वकीलों के मुंशी थे और बाद में वकालत की डिग्री हासिल कर ली.जब ये लोग काला कोट नहीं पहनते थे यानी सिर्फ मुंशी थे तब इनका काम थोड़ी-सी हेराफेरी करके मुवक्किल की जेब से १०-२० रूपये ज्यादा निकाल लेने तक सीमित था.जैसे ही इन्होंने काला कोट पहना इनके हाथों में ठगने की अनियंत्रित शक्ति आ गई.अब वे हरेक मुवक्किल को १०-२० रूपयों का नहीं बल्कि हजारों-हजार रूपये का चूना लगा रहे हैं.वे एकसाथ मुंशी भी हैं और वकील भी.
                  मैं खुद भी एक ऐसे मुंशी-कम-वकील की शैतानी का शिकार हो चुका हूँ.मामला दखल कब्ज़ा का है.प्रारंभिक और अंतिम डिग्री हुए कई साल हो चुके हैं.उसने कहीं कोई काम नहीं बढाया और तारीख पर तारीख लेने का झूठ बोलकर हमसे लाखों रूपये ऐंठ लिए.चूंकि वह मेरे पिताजी का शिष्य रह चुका है इसलिए उस पर न तो पिताजी को ही कभी संदेह हुआ और न ही मुझे.अब हमारे पास खून के घूँट पीकर रह जाने के सिवा कोई उपाय नहीं रह गया है.
                           बात सिर्फ मेरी रहती तो मैं न तो यह लेख लिखता और न ही काले कोट पर कीचड़ उछालने की जहमत ही उठाता.लेकिन काले कोट द्वारा ठगा गया न तो मैं पहला आदमी हूँ और न ही आखिरी.मेरे जैसे हजारों-लाखों बेबस लोग न्याय की उम्मीद लिए कचहरी में आते हैं और लूट लिए जाते हैं.काले कोट की प्रतिबद्धता का मामला सिर्फ हाजीपुर व्यवहार न्यायालय तक ही सीमित नहीं है.यह तो सिर्फ एक बानगी है.इस तरह के ठगों से यह पूरा व्यवसाय अटा पड़ा है.अच्छे लोग हाजीपुर कचहरी में भी हैं लेकिन बहुत कम.इस तालाब की गन्दी मछलियाँ इतनी सयानी हैं कि धीरे-धीरे मुवक्किल को निगलती रहती हैं और वह उन्हें अपना हितैषी समझता रहता है.उनकी किस्सागोई को देखकर तो शायद आज प्रेमचंद होते तो खुद भी चक्कर खा जाते.
                        बार-बार मीडिया में मीडिया के नियमन की बातें आती रहती हैं लेकिन इन काले कोट वालों के नियमन का मामला कभी मीडिया या किसी भी मंच पर नहीं आता.जबकि यह व्यवसाय सीधे तौर पर व्यवस्था पर लोगों के विश्वास के क्षरण से जुड़ा हुआ है.यहाँ स्वनियंत्रण से बात नहीं बननेवाली है क्योंकि पूरे कुएँ में ही भांग पड़ी है.कोई मुवक्किल किसके पास जाएगा,अगर वो भी वैसा ही हुआ तो?
                     मैं देश के हजारों-लाखों वकील-पीड़ित मुवक्किलों की तरफ से केंद्र सरकार से मांग करता हूँ कि सरकारी तौर पर ऐसी व्यवस्था की जाए जिससे लाचार और बेबस लोगों को वकीलों की ठगी का शिकार होने से बचाया जा सके.उनकी मॉनिटरिंग की जाए जिन्होंने कानून की पढाई ही नैतिकता के हनन के लिए की है.जब भी कोई वकील ठगी में लिप्त पाया जाए तो उसपर आजीवन प्रतिबन्ध लगा दिया जाए.अन्यथा लोग न्यायालय नहीं जाएँगे और इससे अंततः कानून को अपने हाथों में लेने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा.वैसे भी लोग न्यायालयों में होनेवाले प्रक्रियागत विलम्ब से पहले से ही परेशान हैं.

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

अमीर राज्यों पे करम बिहार पे सितम,ऐ केंद्र सरकार ये जुल्म न कर

भारत एक संघीय राज्य है या दूसरे शब्दों में कहें तो राज्यों का संघ है.जिसकी राजधानी दिल्ली में है.दिल्ली में संघीय सरकार यानी केंद्र सरकार के प्रधान प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री रहते हैं जो गरीबों के प्रति बड़े दयालु होने का दिखावा करते रहते हैं.ये लोग उनके लिए नित नई योजनाएं बनाते और घोषित करते रहते हैं.ऐसा होना भी चाहिए.जो गरीब हैं उनकी अतिरिक्त मदद अवश्य की जानी चाहिए.लेकिन वही केंद्र सरकार आजादी के बाद से ही चाहे केंद्र में जिसकी भी सरकार रही हो;गरीब राज्य बिहार को प्रताड़ित करने में लगी रही है.यह दोहरी नीति क्यों?गरीबों की मदद करो लेकिन गरीब राज्यों को और गरीब बना दो.इस तरह समाप्त होगी गरीबी?
                   बिहार की राजनीतिक रूप से प्रबुद्ध जनता इस केंद्र सरकार की देशविरोधी नीतियों को शुरू में ही समझ गई थी.तभी तो २००९ के लोकसभा चुनावों में बिहारियों ने केंद्र की यूपीए सरकार के खिलाफ जनादेश दिया था.आज पूरा भारत जहाँ उन चुनावों में अकर्मण्य और भ्रष्ट यूपीए को वोट देने को लेकर खुद के विवेक पर ही शर्मिंदा है,बिहारियों को अपने चुनावी विवेक पर गर्व है.फ़िर भी कांग्रेस को उम्मीद थी कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं की नौका पर सवार होकर वह बिहार चुनाव की वैतरणी पार कर लेगी;नहीं तो पार्टी की हालत में कुछ तो सुधार होगा ही.इसलिए तब दंडस्वरूप किसी भी बिहारी को आजादी के बाद पहली बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में भले ही स्थान नहीं दिया गया हो,बिहार को मिलनेवाले फंड व बिजली के कोटे में कोई गंभीर कटौती नहीं की गई.
                       लेकिन जबसे बिहार विधानसभा चुनावों में यूपीए की पहले से डूबती-उतराती लुटिया डूब गई है;केंद्र जैसे पूरे बिहार की जनता को इसके लिए दण्डित करने पर तुल गया है.होना तो यह चाहिए कि राज्यों को सहायता वहां स्थापित सरकारों के प्रदर्शन के आधार पर देना चाहिए या फ़िर गरीबी को आधार बनाया जाना चाहिए.साथ ही जनसंख्या भी एक महत्वपूर्ण वास्तविकता है.इस समय इन तीनों ही मानदंडों पर बिहार खरा उतरता है.इसलिए सहायता राशि प्राप्त करने वाले राज्यों की सूची में उसका स्थान सबसे ऊपर रहना चाहिए.बिहार लम्बे समय तक देश की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाला राज्य रहा है.आज भी वह तीसरा स्थान रखता है.लेकिन न ही तब बिहार की विशाल जनसंख्या के हितों का खयाल रखा गया और न ही अब रखा जा रहा है.
             जब केंद्र सरकार गरीबों के लिए कोई योजना लाती है तब यह सोंचकर कि ये लोग बांकियों से प्रतियोगिता में नहीं टिक सकते इसलिए बराबरी पर लाने के लिए अन्य लोगों से इतर इनकी मदद करना उसका धर्मं बनता है.आज जब बिहार जो देश का सबसे गरीब राज्य है और विकास की दौड़ में सबके साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलने को बेताब है;तो इसकी योजना राशि और बिजली कोटे में कटौती की जा रही है.बिहार में बदले माहौल से उत्साहित होकर बड़े-बड़े उद्योगपति आने और उद्योग स्थापित करने को उत्सुक हैं.मैं कई ऐसे लोगों को जानता हूँ जो पटना के आसपास के क्षेत्रों में जमीन भी खोज रहे हैं.अगर वे आ गए तो बिना बिजली के कैसे फैक्टरी चलाएंगे,दीया या ढिबरी से?दूसरी ओर बिहार के किसान भी पिछले दो सालों से सूखा झेल रहे हैं.उनके लिए तो बिजली के कोटे में कमी बिजली गिरने के ही समान है.
                    केंद्र सरकार की बिहार के प्रति नीति उसी तरह की है जैसे कोई माँ अपनी बीमार संतान की देखरेख-दवादारू में और भी कटौती कर दे.फ़िर तो वह संतान मरेगी ही न.अगर दुर्भाग्यवश आप लेट से चल रही ट्रेन में कभी चढ़े होंगे तो देखा होगा कि रेलवे कंट्रोल उसके परिचालन में और भी देर करती जाती है.कुछ इसी तरह का रवैया केंद्र का बिहार और बिहारियों के प्रति है.यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे पास गुजरात की तरह संसाधन नहीं है.नहीं तो हमारे मुख्यमंत्री भी नरेन्द्र मोदी की तरह सीना ठोंककर कहते कि हे केंद्र सरकार!तुम अपना पैसा और बिजली अपने पास रखो.मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिए मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो.लेकिन केंद्र सरकार की प्रतिशोधात्मक नीतियों के चलते न राधा को नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी.
                यह स्पष्ट है कि केंद्र सरकार के सौतेले रवैये के चलते पिछड़ा बिहार विकास की दौड़ में और भी पिछड़ जाएगा.आज भी नीचे से नंबर एक है कल भी नीचे से ही नंबर एक रहेगा.बिहार सरकार को बुद्धिस्ट देशों और विश्व बैंक आदि से सीधे धन प्राप्त करने के प्रयास बढ़ा देने चाहिए और मान लेना चाहिए कि केंद्र से कुछ भी नहीं मिलनेवाला.यह केंद्र सरकार वैसे भी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है और उसे राज्यों में भी भ्रष्ट मुख्यमंत्री चाहिए,नीतीश जैसा आदमी नहीं.साथ ही दो-दो बार बिहार में धोबिया पछाड़ खाकर भी या तो उसके होश ठिकाने नहीं आए हैं या फ़िर आघात से उसका दिमागी सन्तुलन ही गड़बड़ा गया है.अगले लोकसभा चुनाव में वह न सिर्फ बिहार में बल्कि पूरे भारत में मुंह की खानेवाली है.वो कहते हैं न कि मतदाता (भगवान) के घर में देर है अंधेर नहीं है.अगर बांकी भारत की लगातार तीसरी बार की मूर्खता से अगले चुनावों में भी यह सरकार जीत गई तो भी कोई बात नहीं.बिहार के पास आज भी बहुत शक्ति है;युवा शक्ति और श्रम शक्ति.जरूरत बस इसका योजनाबद्ध और ईमानदार तरीके से इस्तेमाल करने की है.मुझे पूरा भरोसा है कि आज नहीं तो कल एक दिन वह जरूर आएगा जब हम भी केंद्र से गुजरात सरकार की तरह यह कह सकेंगे कि तुम हमसे हो हम तुमसे नहीं.चाहे उस समय केंद्र और राज्य में किसी की भी सरकार हो.