मंगलवार, 20 सितंबर 2011

आप तो आप हैं आपको क्या कहें?

कुछ लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है;जो चाहे कह लो लेकिन वास्तविकता यह है नहीं.आप लंगड़े को लंगड़ा,अंधे को अँधा यहाँ तक कि गदहे को गदहा नहीं कह सकते.हुआ यूं कि एक बार कोई धोबी अपने गदहे पर कपड़ा लादकर नदी किनारे धोने पहुंचा.कपड़े को धोने के बाद नदी किनारे की जमीन पर सूखने के लिए डाल दिया और बीड़ी-खैनी खाते-पीते हुए,आपस में बतियाते हुए सुस्ताने लगा और छोड़ दिया गदहे को घास चरने और धूल में लोटने के लिए.तभी गर्दभराज को न जाने क्या दूर की सूझी?लगे सूखने के लिए डाले गए कपड़ों पर उधम मचाने.धोबी की आदत थी कि वो हर किसी को जिसमें आदमी से लेकर पशु तक शामिल थे;जीवन के अतिभावुकतापूर्ण क्षणों में गदहा कहा करता था सो कह बैठा गदहे को गदहा.फिर अचानक ख्याल आया कि दोपाया और अन्य चौपाया जानवरों को तो मैं नीचा दिखाने के लिए गदहा कह दिया करता हूँ.इस गदहे को गदहा कहने का क्या लाभ?यह तो पहले से ही गदहा है इसलिए उसने गदहे को दोनों हाथ जोड़कर संबोधित करते हुए विनीत शब्दों में कहा कि आप तो आप हैं आपको क्या कहें?
           मित्रों,हमारे देश की विश्व-विजयी क्रिकेट टीम अभी इंग्लॅण्ड के दौरे पर थी और वहां से  किसी भी संस्करण में बिना कोई भी मैच जीते मुंह उठाए वापस लौटी है.गजब का खेल दिखाकर लौटे हैं हमारे रणबांकुरे!बांसों नहीं कुतुबमीनार से भी ऊंचा उछल रहा है हमारा दिल इनके शानदार प्रदर्शन को देखकर!!क्या बॉलिंग थी,वाह क्या बैटिंग थी और फील्डिंग का तो नाम ही मत लीजिए.इनकी अप्रतिम और अनुपमेय फील्डिंग कला की प्रशंसा में जब भारतीय मूल के इंग्लैण्ड के पूर्व टेस्ट कप्तान नासिर हुसैन ने इन्हें गदहा कह दिया तब बी.सी.सी.आई. समेत पूरा भारतीय क्रिकेट-जगत नाराज हो गया.मैंने पूर्व की पंक्तियों में कहा था न कि जो जो है उसे वह कहके नहीं पुकारा जा सकता.अगर भारतीय खिलाड़ी गदहे नहीं हैं तो इस हिसाब से हम नासिर की गलती मान भी सकते हैं.उन्हें इन खिलाडियों को कुछ और कहना चाहिए था.चाहे तो बन्दर या कुछ और.
               मित्रों,टीम इंडिया को कई बार लोग घर का शेर भी कह लेते हैं.अपने घर में जैसे कुत्ता भी शेर होता है उसी तरह प्रत्येक क्रिकेट टीम अपने देसी मैदानों पर शेर होती है.वाह-वाही तो तब होनी चाहिए जब वो विदेशी मैदानों पर भी मैदान मार ले.तेज और घंसियाली पिच को देखते ही धूल भरी पिचों की बादशाह हमारी टीम इण्डिया को जाने क्यों सांप सूंघ गया.इंग्लैण्ड की धरती पर उतरते ही शेर दहाड़ना भूल गए और लगे गदहे की तरह धूल में लोटने.एक जहीर खान घायल क्या हुआ हमारे बॉलर बॉलिंग करना ही भूल गए.भारतीय ओपनर गौतम गंभीर को तो इंग्लैण्ड में दिखना ही बंद हो गया और नई बीमारी साथ में लिए बेचारे बीच मंझधार में ही डूबती नाव से उतर लिए.बाँकी के बचे बल्लेबाजों में से भी कुछ ही गेंद को देख सके बाँकी तो अंदाजन बल्ला घुमाते रहे और तू चल मैं आया वाला क्रम लगातार लगा रहा.अमा मियाँ क्या इसी दम पर विश्वविजेता बने थे?गए तो थे सिकंदर बनकर और लौटे हो बन्दर बनकर.अब किस चीज का हार पहनकर तुम्हारा स्वागत करूँ;तुम खुद ही बता दो?साथ में यह भी बता दो कि आपको क्या कहकर संबोधित करूँ?नासिर का संबोधन तो आपलोगों को जमा नहीं.           

शनिवार, 17 सितंबर 2011

ई ललुआ को हो क्या गया है?

मित्रों,एक दिन पता चला कि बिहार का मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव महनार पधार रहे हैं,भाषण झाडेंगे.सो हमहू सभ्भे काम-काज को बीच का बगल करके चल दिए बिहने-बिहने लालूजी को सुनने.उ खूब बोले,खूब जमकर बोले,खुभ्भे बोले लेकिन उनकर एक घंटा लम्बी बकवास में से एक्के बात हमको आज भी याद है.आउर उ बात ई है कि अभी तक लोग हमको कहता था ललुआ त काम हुआ अलुआ(शक्करकंद);अब लोग कहते हैं लालू तो भाई अब काम होगा चालू.ई हम जिक्र कर रहे हैं १९९५ के बिहार विधानसभा चुनाव का.उ चुनाव तो लालूजी ने जीता ही बाद में २००० में एक बार आउर जीत गए लेकिन काम को चालू नहीं होना था सो नहीं हुआ आउर अंत में बिहार की जनता जब अलुआ खा-खाकर और लालूजी की जोकरई पर हँसते-हँसते बेहाल होने लगी तब पटक दिया उनको गताल खाता में.
              मित्रों,चूंकि लालूजी ने कई बार मौका देने के बाद भी बिहार में काम चालू नहीं किया इसलिए बेहतर होगा कि बिहार की अन्य भलेमानुष जनता की तरह हम भी उन्हें ललुआ ही कहें.आजकल हम ई ललुआ को लेकर बहुते चिंता में हूँ.जाने का हो गया है राजनीति के डॉक्टर को.हरमेशा एंटिश-फेन्टीश बोलता रहता है आ करता रहता है.का जरुरत थी अन्ना हजारे के खिलाफ होने आउर बोलने की?माना कि अभी एक्कर सितारा गर्दिश में है लेकिन फिरू ऊपर उठियो त सकता है.खाली केंद्र में मंत्री बनेला कोई अप्पन पूरा राजनीतिक जीवन के दाव पर लगाता है क्या?ई काम त पहिले से ही बिहार के एगो आउर नेटा रामविलास जी करिए रहे हैं.सब कोई जानता है कि ललुआ जी गिभ एंड टेक में पूर्ण विश्वास रखते हैं,भगवानो से जादा.बड़ आदमी है कुछ आदर देना ही चाहिए.माने कि ऊ पहले लेते हैं फिर मन हुआ त दिए नहीं त पटना के सुनार आउर फर्नीचरबाला की तरह दुत्कार के भगा दिए.लेकिन ईहाँ त कांग्रेस कुछ देईए नहीं रही है और ले रही है राजनीतिक भविष्य.मंत्री बनाएगी ऐसा लग नहीं रहा है काहे कि अभी सोनिया के दिमाग पर अन्ना फैक्टर हावी है.इतना जरूर है कि अपना ललुआ अभी जेल में नहीं है त कांग्रेसे के कृपा से न त अमरवा नियर उहो जेल जाके बीमार हो चुका होता;झुठ्ठो न त सच्चो के.
           मित्रों,ललुआ को लग रहा है चाहे कहिए कि भरम है कि जात-धरम के मुद्दा पर उ फिरू बिहार का राजा बन सकता है.उ समय गया जब गदहा भी जलेबी खाता था.पिछला विधानसभा चुनाव का गणित अभी तक नहीं समझा है का कि अब काम के बदले दाम मिलता है खाली जोकरई आउर नौटंकी करे बाला के जनता भैंसी पर उल्टा बैठा के हांक देती है;भले ही उ भैंस पर सींग की तरफ से ही क्यों न बैठता हो.
               मित्रों,हम त कहेंगे कि ललुआ को एक बात फिरू से रांची जेल में कुछ समय बिताना चाहिए.केस चलिए रहा है चारा घोटाला बाला सो जमानत टूटे के खाली देरी है.रांची के बगले में कांके में एशिया का सबसे बड़ा पागलखाना है जहाँ से निम्मन के पगलाबे आ पागल के ठीक करे वाली हवा रोजे रांची के तरफ चलती है.ललुआ के मगज में उ ठंडी-ठंडी पगलैया बयार लगेगी त हो सकता है कि ओक्कर दिमाग पुरनका पोजीशन पर आ जाए.आप के पास भी कोनो सुझाव है त सीधे ललुआ जी को या हमको भी दे सकते हैं;हम ओकरा तक चहुंपा देंगे बाकिर मानुष के टटका गोबर लगाबे का सुझाव नहीं दीजिएगा त ठीक रहेगा.काहे से कि जब पेट में चारा आउर दिमाग में पहिले से ही गोबर भरा होता है त ई नुस्खा काम-उम नहीं करता है.धनवाद.
     

रविवार, 28 अगस्त 2011

मैं अन्ना हूँ और रहूँगा

मित्रों,जबसे होश संभाला प्रत्येक चुनाव के बाद यह सुनते-सुनते मेरे कान पक गए कि यह मेरी या हमारी नहीं बल्कि जनता की जीत है लेकिन वास्तविकता हमेशा कुछ और ही रही.नेता जीतते-हारते रहे और जनता सिर्फ हारती रही.बार-बार उसने व्यवस्थापक को बदला परन्तु व्यवस्था को नहीं बदल सकी.भ्रष्टाचार सर्वव्यापी बना रहा और न सिर्फ बना रहा वरन उसकी मात्रा और घनत्व में उत्तरोत्तर तीव्र वृद्धि भी होती रही.कहते हैं कि हर पाप का एक न एक दिन अंत होता है.आम जनता भ्रष्टाचार से उब चुकी थी परन्तु कोई निदान नजर नहीं आ रहा था.
      मित्रों,ऐसे में एक ७४ साल का बूढा राष्ट्रीय मंच पर आया.उसके पास भौतिकता के नाम पर तो कुछ भी नहीं था;था तो अंतिम दम तक लड़ने का अद्भुत जीवट.उसने भ्रष्टाचार की समस्या के खिलाफ कोरी आवाज ही नहीं उठाई बल्कि उसका समाधान भी प्रस्तुत किया और केंद्र सरकार से मांग की कि वो उसकी टीम द्वारा तैयार किए गए जनलोकपाल कानून को लागू करे.जाहिर है कोई भी ऐसी सरकार जिसे अब तक की सबसे भ्रष्ट और निकम्मी केंद्र सरकार का गैरसरकारी ख़िताब मिल चुका हो,क्यों कर मानने जाती?उसे तो लग रहा था कि बुड्ढा सठिया गया है,जब जनता साथ नहीं देगी तो झक मारकर खुद ही बैठ जाएगा.लेकिन ऐसा हुआ नहीं.राजनेताओं की फूट डालने की तमाम कोशिशों को नाकाफी सिद्ध करते हुए जब जनता सड़क पर उतरी तो बस इतिहास ही बन गया.
          मित्रों,कभी चर्चिल ने हमारे राष्ट्रपिता को अधनंगा फकीर मात्र समझने की भूल की थी.कुछ उसी तरह की गलती वर्तमान केंद्र सरकार भी कर गयी.उसे आम जनता के मन में भ्रष्टाचार के प्रति पल रहे असंतोष का अनुमान नहीं था.तभी तो उसने भीतर-ही-भीतर जन-जन के ह्रदय-सम्राट बन चुके अन्ना को गिरफ्तार करने और गरियाने की हिमाकत कर दी.खैर,अब जो हुआ सो हुआ;जीत तो आखिर आम आदमी की ही हुई.लेकिन क्या हमारी लड़ाई पूरी हो गयी है?क्या हमने मुकम्मल जीत हासिल कर ली है?नहीं,बिल्कुल भी नहीं.मैं मानता हूँ कि यह जीत कोई छोटी जीत नहीं है.अब तक नेता जीतते और जनता हारती आ रही थी,पहली बार जनता जीती है और नेता हारे हैं.फिर भी अगर हम भारत के सम्पूर्ण परिदृश्य पर दृष्टिपात करें तो पाएँगे कि इस जीत के द्वारा हमने कुछ ज्यादा हासिल नहीं किया है.अभी हमें देखना है कि संसद कहाँ तक हमारे जनलोकपाल को लागू करती है.साथ ही अभी तो हमें बहुत सारे परिवर्तनों में सक्रिय योगदान देना है.हमें न्यायपालिका की लेटलतीफी को ख़त्म करना है,समाप्त करनी है अमीरी और गरीबी के बीच लगातार बढती जा रही है खाई को.कोई हक़ नहीं है किसी को ऐसे मुल्क में ४०० करोड़ या ४००० करोड़ रूपये का एक अदद घर बनाने का जिस मुल्क के ८०% लोग अधनंगे और अधपेट हों.अभी हमें बचानी है भ्रष्ट सत्ताधीशों से अपने किसानों की जमीनें,निबटना है गिरती कृषि-उत्पादकता से और रोकना है वायु,ध्वनि और जल-प्रदूषण के फैलते जहरीले पंजों को.इसके लिए हमें जीत को अपना स्वभाव तो बनाना ही पड़ेगा.साथ ही हार से उपजनेवाली अवसादमयी निराशा से भी बचना होगा.तो आईये मित्रों हम अपनी आगे की लडाई के लिए तैयारी शुरू  करें,अपनी अगली प्रस्थान-यात्रा पर अग्रसर होवें.यह जरुरी नहीं है कि हर बार और हमारी हर लडाई का अन्ना ही नेतृत्व करें.मुझे यकीन ही नहीं विश्वास भी है कि हमने अपनी टोपियों और टी-शर्ट्स पर जो मैं अन्ना हूँ का नारा लिखवाया है वह महज दिखावे के लिए नहीं है;बल्कि हम सभी सचमुच अन्ना हैं और अन्ना रहेंगे और---------तभी हमारा भारत सही मायनों में अतुल्य भारत बन पाएगा.

शनिवार, 27 अगस्त 2011

क्या अन्ना की मौत चाहती है केंद्र सरकार?

मित्रों,जैसा कि मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूँ कि हम स्वतंत्रता सेनानियों का पाला इस बार लोमड़ियों से पड़ा है.आज अन्ना के अनशन का ११वां दिन है लेकिन सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल कानून लाने और पास कराने को लेकर बिलकुल भी संजीदा नहीं दिख रही.उसे इस बात की जरा-सी भी चिंता नहीं है कि अगर अनशन की शरशैय्या पर लेटे अन्ना की मौत हो गई तो क्या होगा?सरकार शायद यह सोंचती है कि देश की जनता अन्ना की मौत को हल्के में लेगी और जल्दी ही अन्ना और भ्रष्टाचार को इस तरह भूल जाएगी जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो.
                   मित्रों,कुछ इसी तरह का भ्रम सरकार को अन्ना की गिरफ़्तारी को लेकर भी था.उसे लग रहा था कि वह अन्ना को भी बाबा रामदेव की तरह गिरफ्तार कर जबरन महाराष्ट्र भेज देगी और देश में आदमी के जुबान खोलने की बात तो दूर रही दिल्ली की गली का कुत्ता भी नहीं भूंकेगा.परन्तु उसकी ग़लतफ़हमी को हम भारत के लोगों ने किस तरह दूर कर दिया अब यह इतिहास का विषय है.यह समय ही इतिहास बनाने और बनते हुए देखने का है.आज कांग्रेस के युवराज,भारत के राष्ट्रीय तोता राहुल बबुआ ने भी इतिहास बनाया.अन्ना का आदर करते हुए उन्हें गालियाँ भी दीं जिसे वे फुर्सत से लिखकर लाए थे और उनके आन्दोलन को कथित भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक बता दिया जबकि हमलोग यह अच्छी तरह से जानते हैं कि अन्ना का पूरी तरह से अहिंसक आन्दोलन अगर किसी के लिए खतरनाक है तो वे हैं सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचारी.पूरी की पूरी केंद्र सरकार के रूख में पिछले ११ दिनों में अगर कोई परिवर्तन आया है तो वो यह है कि अब वो अन्ना को ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ नहीं मानती है और उनका अपमान करने के बदले सम्मान करने लगी है.वो और उसके युवराज एक तरफ तो कहते हैं कि हम अन्ना द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़े जा रहे जंग का सम्मान करते हैं परन्तु अन्ना की किसी भी ऐसी मांग को मानेंगे भी नहीं जिससे भ्रष्टाचार को किंचित भी क्षति पहुँचती हो.
                                     मित्रों,इस सरकार ने अन्ना को पड़ोसी देश पाकिस्तान समझ लिया है जिसके साथ सालोंभर खुले और सौहार्दपूर्ण माहौल में बातचीत चलती रहती है और नतीजा कुछ भी नहीं निकलता.अगर सरकार आमरण अनशन पर बैठे हुए अन्ना के साथ इस तरह की बातचीत करना चाहती है तो इसका साफ़ मतलब है कि अन्ना जियें या मरें इससे उसका कुछ भी लेना-देना नहीं है.वैसे भी मरता कौन नहीं है?जो आया है उसे एक-न-एक दिन जाना ही है.अन्ना की जिंदगी तो कुछेक राजनेताओं को छोड़कर पूरे देश के लिए एक मिसाल रही ही है और अगर वर्तमान अनशन के दौरान उनकी मौत हो जाती है तो मौत भी मिसाल बन जाएगी.अब शायद ऐसा अवश्यम्भावी है.केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी के रूख से नहीं लगता कि उन्हें भ्रष्टाचार को समाप्त करने की कोई जल्दीबाजी है.बल्कि ४२ साल तक इस विधेयक के लटके रहने के बावजूद उन्हें तो यही लगता है कि हमें किसी तरह की जल्दीबाजी नहीं करनी चाहिए.
              मित्रों,क्या आपने कभी यह सोंचा है कि अगर राहुल गांधी के अनुसार समाज के लिए खतरनाक बन चुके अन्ना की अनशन के दौरान मौत हो जाती है तो देश की क्या हालत हो सकती है?वैसे अभी तो यह परिकल्पनात्मक प्रश्न है लेकिन इतना तो निश्चित है कि तब जो कुछ भी देश में होगा उसकी कांग्रेसियों के पूर्वजों ने भी कल्पना नहीं की होगी.सबकुछ अप्रत्याशित होगा.जनता तब महात्मा गांधी पथ को छोड़कर शिवाजी मार्ग पर आ जाएगी और शासन की बागडोर भ्रष्ट राजनेताओं के हाथों से सीधे अपने हाथों में ले लेगी.तब न तो लोकतंत्र का कथित प्रहरी संसद रहेगा और न ही संसद की दुहाई देनेवाले भ्रष्टाचारी सत्ता में रह जाएँगे;कहाँ रहेंगे या रहेंगे भी कि नहीं कह नहीं सकता.

शनिवार, 20 अगस्त 2011

अन्ना+मीडिया+जनता=क्रांति?


मित्रों,भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही हमारी जंग अब बेहद रोमांचक और संवेदनशील मोड़ पर पहुँच गयी है.शुरू में सख्ती दिखाने के बाद अब तक की सबसे भ्रष्ट केंद्र सरकार फिर से हमले की मुद्रा में है.उसके सारे दांव उल्टे पड़ते दिख रहे हैं और उसे थूककर चाटने जैसा काम करना पड़ा है फिर भी उसकी थेथरई नहीं गयी है.अन्ना रामलीला मैदान में ससम्मान पहुंचा दिए गए हैं जबकि दो दिन पहले तक कांग्रेस के मंत्री उन्हें पागल और भ्रष्ट बता रहे थे.लेकिन अब भी शायद उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि न तो संविधान सबसे ऊपर है और न ही संसद;बल्कि सबसे ऊपर अगर कोई है तो वह है जनता जो जब चाहे देश के हरेक चौक को तहरीर चौक बना दे.उसकी ताकत के आगे होश्नी मुबारक की तोप फायर होना भूल जाती है तो अल असद के विमान उड़ान भरने से मना कर देते हैं;देर बस उनके जागने की होती है.
                                                मित्रों,ये क्षण हमारे लिए बड़े ही हर्ष और गौरव के क्षण हैं क्योंकि यही वे क्षण हैं जब हमारे देश की आम जनता जागती हुई दिख रही है.हालाँकि ये क्षण ३७ साल के बेहद लम्बे ईन्तजार के बाद आए हैं.दोनों जागरण में बड़ा मौलिक फर्क है.तब आन्दोलन छिड़ा था देश की सत्ता बदलने के लिए और वर्तमान भारत चाहता है व्यवस्था को बदलना.सत्ता में कौन रहता है और कौन आता-जाता है से कोई सरोकार नहीं;बस व्यवस्था बदलनी चाहिए और सुधरनी चाहिए.कहते हैं कि जब अँधेरा गहराने लगे तब यह समझना चाहिए कि सबेरा अब दूर नहीं.
 .              मित्रों,भारत के आसमान पर इस समय महाघोटालों के काले व डरावने बादल छाए हुए हैं.भारतीय लोकतंत्र का कारवां इस समय भ्रष्टाचार की एक लम्बी अँधेरी गुफा में आकर फंस गया है और इससे बाहर निकालने की जिम्मेदारी हम जनता पर है.हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि हमारा मुकाबला लोमड़ियों से है और वे (कोंग्रेस और उसके मंत्री) हमारा मनोबल तोड़ने के लिए,हमारे उत्साह को कम करने के लिए और हमारे बीच फूट डालने के लिए रोज-रोज नए-नए पैतरे चलने वाले हैं.हमारे अरमानों को पूरा करनेवाले जनलोकपाल विधेयक को चालू सत्र में लाने से  बचने के लिए उन्होंने चालें चलनी शुरू भी कर दी हैं.आगे सबकुछ हमारे ऊपर निर्भर करता है,हमारी संघर्ष-क्षमता पर निर्भर करता है.हमें इस कांग्रेस पार्टी के इन शातिर लोगों पर लगातार दबाव बनाए रखना होगा और इस तरह से बनाए रखना होगा कि वह उत्तरोत्तर बढ़ता ही चला जाए.इसके लिए चाहे जेल भरना पड़े या कुछ भी और करना पड़े तो हमें करने के लिए तैयार रहना पड़ेगा.मैं समझता हूँ कि ऐसा गांधीवादी-मार्ग से ही संभव है और कोई मार्ग नहीं है.
                       मित्रों,जब कोई त्यागी महात्मा,मीडिया और जनता किसी अच्छे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एकजुट होकर प्रयास करते हैं तो मेरी केमिस्ट्री तो यही कहती है कि क्रांति होती है लेकिन ऐसा तभी होता है जब उत्प्रेरक के रूप में अदम्य उत्साह भी मौजूद हो.अब हमें देखना है कि सामने वाले की,सैय्याद की बाजुओं में कितना दम है;हमें अपनी ताकत का बखूबी अंदाजा है इसलिए तो हम उनसे कह रहे है कि-
खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का जमघट आज कूंचा-ए-कातिल में है ।
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है ।।

सोमवार, 15 अगस्त 2011

यलगार हो,आक्रमण

मित्रों,आज १५ अगस्त है;१५ अगस्त २०११ यानि हमारी झूठी आजादी की ६४वीं सालगिरह.आपने शायद जागने के बाद एक या दो रूपये में कागज का तिरंगा ख़रीदा होगा और उसे लहराते हुए अपने आपको धन्य मान लिया होगा कि आप आजाद हैं.लेकिन क्या आप सचमुच आजाद हैं?क्या आपसे हमारा लोकतंत्र (भ्रष्टतंत्र) कदम-कदम पर जीवित रहने की कीमत नहीं वसूल कर रहा है?क्या आपका काम बिना घूस दिए हो जा रहा है?क्या आप यह गारंटी दे सकते हैं कि आपका राशन कार्ड,आपका ड्राइविंग लाइसेंस या घर की होल्डिंग के कागजात या फिर बिजली के कनेक्शन का  कागज बिना कोई घूस लिए बना दिया गया है?अगर नहीं,तो फिर आप मजबूर हैं सरकारी तंत्र की मनमर्जी मानने को और उस पर चलने को भी.फिर आप आजाद कहाँ हैं और कैसे हैं?क्या कोई मजबूर व्यक्ति आजाद हो सकता है?
            मित्रों,अभी थोड़ी ही देर में भारत की सबसे भ्रष्ट सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह ऐतिहासिक लाल किले पर झंडा फहराएंगे और उन्हीं नापाक हाथों से फहराएंगे जिन हाथों से उन्होंने घोटालेबाजों को घोटाला करने की पूरी आजादी दी,जिन हाथों से उन्होंने न जाने कितने कलमाड़ी,राजा,पवार और थामस को विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया है.फिर वे हम देशवासियों को उसी मुखारविंद से चने के झाड़ पर चढ़ाएंगे अथवा अपनी मजबूरी का रोना रोते हुए कहेंगे कि सिर्फ आप ही गुलाम नहीं हैं मैं भी गुलाम हूँ,मजबूर हूँ;कठपुतली हूँ जिसके द्वारा झूठ बोलकर वे अब तक अनगिनत भ्रष्टाचारियों का बचाव करते आ रहे हैं.वे कह सकते हैं कि मैं अगर गुलाम होकर भी खुश हूँ और अपने-आपको भाग्यशाली समझता हूँ तो फिर आप क्यों भ्रष्टाचार से आजादी चाहते हैं?वे अपने भाषण में संसद की सर्वोच्चता का गुणगान करेंगे और कहेंगे कि संसद (और सरकार) अगर देश को रसातल में धंसा दें तो भी आपको कोई हक़ नहीं है उसे बचाने या निकालने का प्रयास करने का क्योंकि स्वयं संविधान ने उसे ऐसा करने का अधिकार दिया है.वे यह भी कह सकते हैं कि चूँकि धरना,अनशन आदि विरोध के गांधीवादी तरीके वर्तमान भारतीय लोकतंत्र में अलोकतांत्रिक हो गए हैं इसलिए महात्मा गाँधी वर्तमान सन्दर्भ में एक असामाजिक व्यक्ति थे और उनका अनुशरण करनेवाले सारे लोग ब्लैकमेलर हैं,अपराधी हैं.साथ ही भगत सिंह और उनके साथियों ने भी लाहौर जेल में जो कई महीने लम्बा अनशन किया था वह एक घोर आपराधिक कृत्य था;रेयर इन रेयरेस्ट था.अंग्रेजों ने उनकी मांगों को नहीं मानते हुए उनकी प्राणरक्षा के नाम पर उनके साथ जबरन भोजन कराने की जो जोर-जबरदस्ती की वह उस शासन का पुनीत कर्त्तव्य था,इसलिए अनुचित भी नहीं था.इसलिए हम काले अंग्रेजों को भी उनकी तरह ही यह अधिकार नैसर्गिक तरीके से प्राप्त है कि युगधर्म भ्रष्टाचार की रक्षा के लिए हम अन्ना को अनशन नहीं करने दें और अगर वे बात से समझाने से नहीं समझते हैं तो उनकी मांगों पर किसी भी तरह से विचार नहीं करते हुए हम उनके अनशन को क्रूरतापूर्वक तुडवाने का प्रयास करें जैसे भगत और उसके साथियों के साथ हमारे अंग्रेज भाइयों ने किया था (अत्याचारी-अत्याचारी सहोदर भाई).
           मित्रों,फिर आप माननीय प्रधानमंत्री जी के औपचारिकतावश किए गए उस बकवास पर खूब तालियाँ बजाएंगे और खूब जलेबी खायेंगे.यही होगी आपकी आज की दिनचर्या न?या फिर आप आज के दिन संकल्प लेंगे भ्रष्टाचार से आजादी के लिए चल रही लड़ाई में शामिल होने का,आधुनिक युग के वीर कुंवर सिंह अन्ना के बूढ़े हाथों को मजबूत करने का और अब तक की सबसे झूठी और बेईमान केंद्र सरकार को मजबूत लोकपाल वाला विधेयक लाने के लिए मजबूर कर देने का.आप जानते हैं कि अन्ना का इस आन्दोलन में कोई भी छिपा हुआ एजेंडा नहीं है.उनके आगे नाथ न पीछे पगहा है.वे निस्स्वार्थ भाव से हमारे लिए लड़ रहे हैं,हमारी आने वाली संततियों के लिए युद्ध के मैदान में उतरे हैं.तो क्या यह उचित होगा कि कोई हमारे भले के लिए अपनी जान की बाजी लगा दे और हम उसका नैतिक रूप से भी समर्थन न करें?नहीं न!तो मित्रों,आगे आईये और अन्ना के निर्देशों का पालन करिए और इस आजादी की दूसरी लडाई को सफल बनाईये.
यलगार हो,आक्रमण!!!!                                

रविवार, 7 अगस्त 2011

क्या सोनिया सचमुच बीमार हैं?

soniya

मित्रों,कुछ नादान कहते हैं कि मुम्बई की बरसात का कोई भरोसा नहीं है.यही बात कुछ लोग दिल्ली,कोलकाता या अपने गृहनगर के बारे में कहते हैं.बरसात का भरोसा नहीं है तो क्या हुआ;प्लास्टिक ले लो,छाता ले लो और अगर इस महंगाई में भी कुछ ज्यादा ही फालतू पैसे जेब में पड़े हैं तो रेनकोट ले लो.माना कि जलवायु-परिवर्तन के बाद बरसात और भी ज्यादा गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाने लगी है लेकिन आज के फैशन के युग में भरोसे के लायक है ही क्या?फिर बेचारी बरसात को ही क्यों अकेले दोषी ठहराया जाए?शेयर बाजार का सूचकांक,मुद्रास्फीति यहाँ तक कि महाबली अमेरिका की शाख का भी भरोसा नहीं.इस भ्रष्ट-युग में सब-के-सब छुई-मुई की तरह नाजुक और महाकवि नागार्जुन के दुखहरण मास्टर के मिजाज की तरह गैरभरोसेमंद हो गए हैं.लेकिन गिनीज बुक ऑफ़ यूनिवर्स रिकार्ड तो कुछ और ही कहता है.उसके अनुसार तो इस ब्रह्माण्ड में अगर कोई चीज सबसे कम भरोसेमंद है तो वह है भारतीय नेताओं का स्वास्थ्य.हमारे ज्यादातर नेताओं का स्वास्थ्य कृष्ण जन्मस्थान में जाने के बाद ख़राब हो जाता है.आपको शायद याद होगा कि लालूजी जब हजारों करोड़ का चारा हजम करने के बाद गरीब रथ (रिक्शा) पर सवार होकर जेल के दौरे पर गए थे तब उनको अचानक दिल की बीमारी हो गयी थी.बार-बार अस्पताल में भर्ती हुए;अस्पताल भी कोई ऐरा-गैरा नहीं;पांच सितारा.ईधर वे जेल से बाहर निकले और उधर उनके लाल-टमाटर सरीखे जिस्म से दिल की बीमारी भी रफूचक्कर हो गयी.मतलब यह कि उन्होंने यह बीमार होने का ड्रामा सिर्फ इसलिए किया था जिससे कि वे सी.बी.आई. रिमांड पर जाने से और यू.एन.विश्वास के हाथों से मुर्गा खाने से बच सकें.
          मित्रों,बाद में बिहार के कई अन्य नेता भी जब-जब जेल गए;बीमार पड़ गए और अस्पतालों में दरबार लगाने लगे.किसी को दिल की बीमारी हो गयी तो किसी का रक्तचाप हिचकोले खाने लगा.हाँ,नेताओं की बीमारी के मामले में अभी भी एक कमी बड़ी शिद्दत से महसूस की जा रही थी कि अबतक जेलयात्रा पर गए हमारे देश के किसी भी कर्णधार को दिमाग की बीमारी नहीं हुई थी.इस क्षेत्र में सूखा लम्बे समय तक चला.सौभाग्यवश अब जाकर समाप्त हुआ है और इसे ख़त्म करने के लिए भारत की सवा अरब गूंगी,बहरी और अंधी जनता की ओर साधुवाद के पात्र हैं भारत के सबसे बड़े खिलाडी सुरेश कलमाड़ी.इन बेचारे को हवालात में पहुँचते ही लॉन्ग टर्म मेमोरी लोंस की बीमारी हो गयी है.इन्हें बांकी तो सबकुछ याद है लेकिन सीडबल्यूजी घोटाला या उससे जुडी बातें बिलकुल भी याद नहीं है.यानि इनके सी.पी.यू. से सारी बातें डिलीट नहीं हुई है सिर्फ वही कुछ डिलीट हो गया है जिसका सम्बन्ध घोटाले से था.इससे पहले इस तरह की बीमारी पूरी दुनिया में न तो कभी सुनी गयी थी और न ही देखी ही गयी थी.जाहिर है इस नई बीमारी और इसके सब्जेक्ट (कलमाड़ी) पर गंभीरता से शोध करने की आवश्यकता है.
                  मित्रों,इन दिनों कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी भी कथित तौर पर गुप्त रूप से बीमार हो गयी हैं और उन्होंने कथित रूप से भारत के बजाए अमेरिका के चिकित्सकों पर विश्वास जताया है.उन्हें कौन-सी बीमारी थी और उसका ईलाज अतुल्य भारत में है भी या नहीं सब रहस्य के परदे में यत्नपूर्वक ढंककर रखा गया है.कहीं सोनिया जी को घोटालों के शोर के डर से कड़कड़हट की बीमारी तो नहीं हो गयी है.दरअसल कड़कड़हट की बीमारी हमारे गाँव में बिदेसिया के लौंडे को हुई थी जब वह सौतेली माँ का भावपूर्ण किरदार निभा रहा था.उसने अपने बिछावन के नीचे खपड़ा बिछा लिया था जिससे जब भी वो करवट लेता कड़कड़ की आवाज आती.उसने धन देकर वैद्य को भी अपनी ओर मिला लिया था जिससे उसने बीमारी का ईलाज उसके सौतेले बेटे की कलेजी खाना बता दिया था.खैर,इतना तो निश्चित है कि सोनिया जी जेल नहीं जाने जा रही हैं.यह सुअवसर अगर मिलेगा भी तो मनमोहन सिंह को क्योंकि सोनिया जी किसी भी जिम्मेदार पद पर नहीं हैं.वे तो उसी तरह सत्ता का निर्भय आनंद ले रही हैं जैसे १७६५ से १७७२ के बीच ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल में लिया था.शासन भी किया और उसकी जिम्मेदारी भी नहीं ली.अगर हम राजनीतिक दृष्टि से देखें तो उनके लिए इस समय बीमार हो जाना दो दृष्टियों से मुफीद था;पहला उनका पूरा परिवार इस खतरनाक समय में संसद में दिखने की शर्मिंदगी उठाने से बच गया और दूसरा देश के भोले-भाले लोगों का ध्यान भ्रष्टाचार और कमजोर लोकपाल से हटकर उनके स्वास्थ्य की ओर चला गया.उनकी रहस्यमय बीमारी की सच्चाई क्या है क्या कभी सामने आ भी पाएगा,शायद कभी नहीं!

बुधवार, 3 अगस्त 2011

उठो,जागो और युद्ध करो

ip

मित्रों,याद नहीं आ रहा कब भारत का संविधान पहली बार उल्टा था,शायद १९८५ में जब मेरी आयु यही कोई ८-९ साल की रही होगी.तब सबसे पहले नजर गयी थी प्रस्तावना पर जिसे वर्तमान कांग्रेस पार्टी के आदिपुरुष और मिजाज से ईसाई,संस्कृति से मुस्लमान और दुर्घटनावश जन्म से हिन्दू पं.जवाहरलाल नेहरु की अध्यक्षतावाली समिति ने तैयार किया था.मेरे द्वारा पढ़ी गयी प्रस्तावना के सबसे पहले शब्द थे हम भारत के लोग और अंतिम शब्द थे संविधान को आत्मार्पित करते हैं.आज भी प्रस्तावना जस की तस है.
         मित्रों,चाहे धार्मिक विधान हो,सामाजिक या राजनैतिक उसे बनाता व्यक्ति ही है;इन विधानों ने व्यक्ति को नहीं बनाया.इसलिए जब भी आवश्यकता हो जड़ता आने से पहले इन विधानों में परिवर्तन कर देना चाहिए.हमारे संविधान की प्रस्तावना भी कहती है कि यह संविधान जनता द्वारा निर्मित है और हमने इसे किसी और को नहीं बल्कि खुद को ही समर्पित किया है.इसका सीधा तात्पर्य है कि भारत में भारत की जनता सबसे ऊपर है न कि संविधान,संसद,कार्यपालिका या फिर न्यायपालिका.लेकिन इन दिनों हमारे देश के न भूतो न भविष्यति सबसे अकर्मण्य प्रधानमंत्री बार-बार संसद की सर्वोच्चता का बेसुरा राग आलाप रहे हैं.रिमोट संचालित मनमोहन सिंह का कहना है कि लोकपाल का जो भी करना होगा वह संसद करेगा न कि जनता.जाहिर है वे ऐसा इसलिए बक रहे हैं क्योंकि संसद में उन जैसे सफेदपोश बेईमान लोगों का बहुमत है.परन्तु अगर संसद को करना ही था तो उसने पिछले ६०-६१ सालों में क्यों नहीं किया?वह संसद जिसके एक तिहाई सदस्य हिस्ट्रीशीटर हों क्या कभी देश का भला सोंच सकता है?सुरेश कलमाड़ी और ए.राजा जैसे लोगों को अगर संसद की कार्यवाही में भाग लेने भी दिया जाए तो क्यों और कैसे उनसे इस देश की जनता यह उम्मीद रखे कि वे सदन में कदम रखते ही देश के अशुभचिन्तक से परमहितैषी बन जाएंगे?
      मित्रों,अभी-अभी कांग्रेस और उसकी सरकार ने लोक लेखा समिति की दुनिया के सबसे बड़े घोटाले से सम्बंधित रिपोर्ट को जिस तरह नकार दिया है और जिस तरह नोट के बदले वोट कांड पर लीपापोती की है;उससे तो यही सिद्ध होता है कि इन धूर्त लोगों का संसद में या उसकी गरिमा में किसी तरह का विश्वास नहीं है.ये तो बस किसी तरह देश में भ्रष्टाचार को बनाए रखने के लिए संसद और संविधान का रट्टा लगा रहे हैं.ये लोग अपने बहुमत के बल पर संसद का दुरुपयोग ही कर सकते हैं,सदुपयोग नहीं.इन लोगों ने पिछले ५३ सालों में सत्ता का सिर्फ दुरुपयोग किया है और अगर इन्हें सत्ता से हटाया नहीं गया तो आगे भी करते रहेंगे.आश्चर्य है कि ये धूर्त बार-बार उस संविधान की दुहाई देने में पिले हुए हैं जिसकी इन्होंने सैंकड़ों बार अपने क्षुद्र लाभ के लिए अवहेलना की है.अभी भी अन्ना हजारे को अनशन की अनुमति नहीं देकर ये कोई संविधानसम्मत काम नहीं कर रहे.कुछ भाई कह सकते हैं कि संसद का सत्र चलने के समय नई दिल्ली इलाके में प्रत्येक वर्ष निषेधाज्ञा लागू कर दी जाती है.अगर यह सच है तो भी यह व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का सरासर उल्लंघन है इसलिए यह परंपरा टूटनी चाहिए.
         मित्रों,उस महान संसद का मानसून-सत्र शुरू हो गया है जिसमें रूपए लेकर वोट देने की और बाद में जाँच के नाम पर लीपापोती कर देने की महान परंपरा रही है.मैं मानता हूँ कि संविधान ने संसद के कन्धों पर कानून बनाने की महती जिम्मेदारी डाली है और यह देखने का भार भी उसी पर छोड़ा है कि सरकार सही तरीके से काम कर रही है या नहीं परन्तु जब संसद अपने कर्तव्यों का सम्यक तरीके से निर्वहन नहीं कर पाए तब?तब क्या विकल्प बचता है देश और देश की जनता के सामने?क्या उसे उस प्रधानमंत्री के अनर्गल प्रलापों पर बिना किसी हिलहवाली के विश्वास कर लेना चाहिए जिसके मंत्री जेल में रहते हुए उस पर घोटालों में बराबर का भागीदार होने के आरोप लगा रहे हों या फिर जिस प्रधानमंत्री पर सी.ए.जी. जैसी महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था सी.डबल्यू.जी. घोटाले में शामिल होने और कान पर ढेला रखकर होने देने की रिपोर्ट दे रही हो?क्या उसे उस प्रधानमंत्री के कोरे आश्वासनों पर विश्वास कर लेना चाहिए जिसके नेतृत्व में विभिन्न विभागों में लाखों करोड़ों का घोटाला हो चुका हो?जब ये घोटाले हो रहे थे तब संसद कहाँ था और आज भी संसद इन मामलों में क्या कर रहा है?संविधान में पी.ए.सी. और नियंत्रक और महालेखाकार का प्रावधान क्यों किया गया है?क्या इसलिए कि कोई गन्दी और बहुमत में अंधी सरकार उनकी रिपोर्ट को बेहयायी से गंदे कूड़ेदान में फेंक दे?
         मित्रों,संसद और संविधान के ६१ साला इतिहास से स्पष्ट है कि ये संस्थाएं और व्यवस्थाएं भारत का कल्याण कर सकने में असफल रहीं है.अलबत्ता इनका दुरुपयोग करके बहुत-से टाई और खादीवाले जरूर अरब-खरब पति बन सकने में सफल रहे हैं.संसद में ऐसे गलत तत्व पहुँच रहे हैं जिनका देश और दिशहित से कुछ भी लेना-देना नहीं है.बल्कि अगर हम यह कहें कि संसद में इस तरह के लोगों का ही बहुमत हो गया है तो गलत नहीं होगा.जाहिर है अगर ऐसे लोग बहुमत में हैं तो सरकार भी वही गठित करेंगे और चलाएंगे भी वही.इसलिए अब समय आ गया है कि हम भारत के लोग जिन्होंने २६ नवम्बर,१९४९ को भारत के संविधान को आत्मार्पित किया था;पूरे संविधान को ही बदल दें.ऐसा कैसे होगा का उत्तर संविधान में नहीं गाँधी के दर्शन और जीवन में मिलेगा.हमें एकजुट होकर इसके लिए एक बार फिर करो या मरो आन्दोलन छेड़ना पड़ेगा और तब तक दम नहीं लेना होगा जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए.तो मित्रों,जागृत,उत्तिष्ठ,प्राप्यबरान्नीबोधत.

रविवार, 31 जुलाई 2011

समलैंगिकता एक अक्षम्य अपराध

homosexual


मित्रों,मानव ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है यह आपको भी पता है.हम लोग बडभागी हैं जो हमें मानव-शरीर मिला है.शास्त्रों में कहा गया है कि शरीरमाद्यं धर्म खलुसाधनं यानि शरीर ही सभी धर्मों को करने का माध्यम है.
           मित्रों,मानव-शरीर ईश्वर की अतुलनीय कृति है.ईश्वर ने हमारे शरीर के सभी अंगों को अलग-अलग काम सौंपा हुआ है.उसने मुँह को खाने-पीने का,नाक को साँस लेने और सूंघने का,कानों को सुनने का,गुदा को मलत्याग का,योनि और शिश्न को प्रजनन का और यौनानन्द लेने का काम दिया है.
           मित्रों,प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में मृत्यु के भयानक तांडव को देखकर पश्चिम के लोग यह सोंचकर भोगवादी हो गए कि जब जीवन का कोई ठिकाना ही नहीं है तब फिर नैतिकता को ताक पर रखकर क्यों नहीं जीवन का आनंद लिया जाए?बड़ी तेजी से वहां के समाज में यौन-स्वच्छंदता को मान्यता मिलने लगी और इसी सोंच से जन्म हुआ सार्वजनिक-समलैंगिकता के इस विषवृक्ष का.बेशक समलैंगिक व्यवहार पहले भी समाज में प्रचलित था लेकिन ढके-छिपे रूप में.
             मित्रों,इन दिनों भारत में भी पश्चिम की संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के चलते समलैंगिकों की एक नई जमात खड़ी हो गयी है.ये लोग गुदा से मलत्याग के साथ-साथ यौनाचार का काम भी लेने लगे हैं.उनमें से कईयों ने तो आपस में शादी भी कर ली है.हद तो यह है कि भारत की केंद्र सरकार भी इन सिरफिरों के कुकृत्यों को मान्यता देने की समर्थक बन बैठी है.
             मित्रों,यह एक तथ्य है कि वर्तमान काल की सबसे भयानक बीमारी एड्स की शुरुआत और फैलाव में सबसे बड़ी भूमिका इन समलैंगिकों की ही रही है.गुदा-मैथुन से ई-कोलाई नाम जीवाणु जो आँतों में पाया जाता है के मूत्र-मार्ग में पहुँचने और गुर्दों के संक्रमित होने का खतरा भी रहता है.सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह बिलकुल ही अनुत्पादक और वासनाजन्य कार्य है.इससे सिर्फ काम-सुख मिलता है प्रजनन नहीं होता.
                मित्रों,जब हम मुंह से मलत्याग नहीं कर सकते,गुदा से भोजन ग्रहण नहीं कर सकते,नाक से सुन नहीं सकते,कान से बोल नहीं सकते,हाथ पर चल नहीं सकते तो फिर गुदा से मैथुन की जिद क्यों?यहाँ मैं आपको यह भी बताता चलूँ कि हिन्दू शास्त्रों में गुदा-मैथुन में संलिप्त रहनेवाले लोगों को सूअर की संज्ञा दी गयी है जो मेरे हिसाब से बिलकुल सही है.
              मित्रों,मानव ही वह जैविक प्रजाति है जिसको दुनिया में सबसे लम्बे समय तक प्रजनन-काल ईश्वर ने प्रदान किया है.यही कारण है कि हम अपनी जनसंख्या में पर्याप्त वृद्धि कर सके और धरती पर आज हमारा राज है.यह प्रजनन-शक्ति हमें संतानोत्पत्ति के लिए दी गयी है न कि निरा भोग के लिए.जो भारत सहस्राब्दियों से विश्व को संयम और ब्रह्मचर्य का पाठ पढ़ाता रहा है और इसलिए विश्वगुरु भी कहलाता रहा है;उसी हिंदुस्तान के कुछ लोग पश्चिम का अन्धानुकरण करने के चक्कर में समलैंगिकता का खुल्लमखुल्ला प्रदर्शन कर रहे हैं.जरा सोंचिये,इनके परिवारवालों पर क्या गुजरती होगी जब उन्हें यह पता चलता होगा कि उनका बेटा समलैंगिक हो गया है.उनके सारे सपनों पर तो अकस्मात् तुषारापात हो जाता होगा न!
                मित्रों,कुल मिलाकर मेरे कहने का लब्बोलुआब यह है कि समलैंगिकता व्यक्ति,परिवार,समाज और राष्ट्र सबके लिए हानिकारक है;सबके प्रति अपराध है.यह नितांत भोगवादी प्रवृत्ति है जैसे कि अफीम का सेवन.इसका परिणाम हमेशा बुरा ही होनेवाला है इसलिए ऐसे समाज-विरोधी लोगों के प्रति सरकार को अत्यंत कठोरता के साथ पेश आना चाहिए और यदि ऐसा करने के लिए वर्तमान कानून पर्याप्त नहीं हों तो बिना देरी किए ऐसे कानून बनाए जाने चाहिए.

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

पिट्ठी के गहिर और कान से बहिर

manmohan

मित्रों,आप मेरे शीर्षकों को देखकर सोंच रहे होंगे कि मुझे आजकल क्या हो गया है.अगर आप ऐसा नहीं सोंच रहे हैं तो यह आपकी भलमनसाहत ही है.खैर,मेरे हिसाब से शीर्षक पूरी तरह सही है और जो मैं कहना चाहता हूँ उसकी पूरी व्यंजना भी करता है.
          मित्रों,अगर आपने कभी बिहार में बसयात्रा की होगी तो निश्चित रूप से आपका पाला बस के ड्राइवरों,कंडक्टरों और खलासियों से पड़ा होगा.जैसे ही आप उसकी गाड़ी के इर्द-गिर्द पहुंचे होंगे उसने आपसे कहा होगा कि बैठिए न सर अब गाड़ी बस खुलने ही वाली है;अब आपके बैठने की ही देरी है.उसके बाद आपके कई बार टोंकने के बाद ऊपर-नीचे पूरी तरह से भर जाने के बाद गाड़ी हिली होगी.चढ़ने से पहले आपने अगर भाड़ा फाइनल नहीं किया होगा तो फिर आपसे मनमाना भाड़ा मांगा गया होगा.आपका बना-बनाया मूड ख़राब हो गया होगा और बस से जब आप उतरे होंगे तो आपकी साफ़ जुबान पर इन ड्राइवरों-कंडक्टरों-खलासियों के लिए सिवाय गन्दी गालियों के कुछ भी नहीं रहा होगा.अगर आप दबंग होंगे तो गाड़ी रूकवाकर इन्हें पीता भी होगा.हो सकता है कि तब उसने डर के मारे आपसे लिया गया अतिरिक्त पैसा वापस भी कर दिया होगा.फिर बस सरकी होगी और ड्राइवर-कंडक्टर-खलासी सारे अपमानों को गीतोक्त स्थितप्रज्ञ की तरह भूलकर दूसरे यात्रियों से हिल-हुज्जत में लग गए होंगे.बिल्कुल इसलिए ड्राइवरी लाइन से जुड़े लोगों को हमारे बिहार में पिट्ठी (पीठ) के (का) गहिर (गहरा) और कान से बहिर (बहरा) कहा जाता है.
           मित्रों,इन दिनों दुर्भाग्यवश इसी कैटेगरी का एक आदमी भारतरूपी बस की ड्राइविंग सीट पर आ बैठा है.रफ गाड़ी चलाने में उसका जवाब नहीं.देशवासी लाख गालियाँ देते रहें यह सुनता ही नहीं.इस निर्लज्ज के कार्यकाल में घोटालों का नया वर्ल्ड रिकार्ड बन चुका है.घोटालों का असर देश में होनेवाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर भी पड़ने लगा है और २०१०-११ में पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले १० अरब डॉलर कम निवेश हुआ है.अब तो इनका एक पूर्व मंत्री इन पर कुकृत्य में साथ देने का आरोप लगा रहा है लेकिन श्रीमान हैं कि या तो कुछ भी नहीं देखने-सुनने का नाटक कर रहे हैं या फिर देख-सुन कर भी अनदेखा-अनसुना कर रहे हैं.आखिर मैं पूछता हूँ कि किसी प्रधानमंत्री के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक और कोई स्थिति हो भी सकती है क्या कि उसका ही पूर्व सहयोगी जेल में रहते हुए उस पर घोटालों में सहयोग करने का आरोप लगाए?फिर मनमोहन सिंह किस बात का इंतजार कर रहे हैं?वे क्यों नहीं दे रहे इस्तीफा जिससे कि जनता को उनसे और उनको जनता से छुटकारा मिल सके?
           मित्रों,मैं जानता हूँ और आप भी जानते हैं कि ईमानदार को वास्तविक परिभाषा क्या है लेकिन भारत के तमाम राजनीतिक दलों ने इसकी अपनी-अपनी परिभाषा बना रखी है.कांग्रेस के अनुसार और कुछ हद तक भाजपा के अनुसार भी बेशर्मी ही ईमानदारी है.कौआ टरटराता रहे धान की फसल को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.जनता जिए या मरे,देश रसातल में चला जाए तो जाए  ड्राइवर की कुर्सी बरक़रार रहनी चाहिए.तो क्या हम इस बेशर्म पिट्ठी के गहिर और कान से बहिर ड्राइवर को चुपचाप बर्दाश्त करते रहेंगे?क्या हम सब मिलकर इसे ड्राइविंग सीट पर से हटा नहीं सकते?पर हम एकजुट हो पाएँगे क्या?होना तो पड़ेगा नहीं तो ये बेशर्म-सनकी ड्राइवर-कंडक्टर और खलासी हमारे देश को दुर्घटनाग्रस्त करा देंगे.हो सकता है और निश्चित रूप से हो सकता है कि ये बस को गहरी खाई में ही गिरा दें.आप कहीं अवश्यम्भावी दुर्घटना का इंतजार तो नहीं कर रहे हैं?          

सोमवार, 25 जुलाई 2011

सचिन का नंबर तो बहुत बाद में है

dhyanchand

मित्रों,सचिन तेंदुलकर यानि छोटे कद वाला क्रिकेट का सबसे बड़ा खिलाडी.सचिन तेंदुलकर रिकार्डों के एवेरेस्ट पर चढ़कर भी रेस्ट लेने को तैयार नहीं हैं.निस्संदेह क्रिकेट की दुनिया में सचिन की उपलब्धियां बेमिसाल हैं लेकिन सचिन ने देश को रिकार्डों के अलावा ऐसा क्या दिया है कि वे भारत के सर्वोच्च सम्मान के हक़दार हो गए?भारत के सामाजिक क्षेत्र में उनका क्या योगदान है?क्या सचिन अभावों के बीच से उभरे हैं?अगर नहीं तो फिर क्यों भारत की सबसे निकम्मी केंद्र सरकार उन्हें भारत रत्न घोषित करने के लिए बेताब हुई जा रही है?
          मित्रों,प्रश्न और भी हो सकते हैं और हैं भी?जैसे भारत का राष्ट्रीय खेल हॉकी क्यों है और अगर हॉकी को ही उसकी तमाम दुर्दशाओं के बाबजूद भी राष्ट्रीय खेल होना चाहिए तो तमाम अभावों के बाद भी दुनिया भर में भारतीय हॉकी का परचम लहराने वाले हॉकी के जादूगर दद्दा ध्यानचंद को उनके जीवित रहते या घुट-घुट कर मरने के ३ दशक से भी ज्यादा समय बीत जाने बाद भी भारत रत्न क्यों नहीं दिया गया?क्या भारत का माथा परतंत्रावस्था में ऊंचा करनेवाले भारतीय सेना के ब्राह्मण रेजिमेंट में बहुत छोटे पद पर (सूबेदार) रहे ध्यानचंद का भारत रत्न पाने का सबसे पहला अधिकार नहीं बनता है?
           मित्रों,इस सन्दर्भ में मुझे एक प्रसंग महाभारत से याद आ रहा है.एक बार महाभारत के युद्ध में अर्जुन-कर्ण के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था.अर्जुन ने वाण चलाकर कर्ण के रथ को कई योजन पीछे धकेल दिया.जवाब में कर्ण ने भी वाण चलाया और अर्जुन के रथ को कुछेक अंगुल पीछे कर दिया.ऐसा होते ही पार्थसारथी श्रीकृष्ण के मुख से शाबासी के शब्द फूट पड़े.देखकर अर्जुन को आश्चर्य हुआ कि जब मैंने कर्ण के रथ को कई योजन पीछे कर दिया तब तो देवकीनंदन चुपचाप रहे और कर्ण ने उसके रथ को कुछेक अंगुल पीछे क्या खिसका दिया वे वाह-वाह किए जा रहे हैं.अर्जुन के पूछने पर मधुसूदन ने कारन स्पष्ट किया कि हे पार्थ मैं तो तीनों लोकों का भार लेकर तुम्हारे रथ पर आरुढ़ हूँ हीं अतुलित बल के स्वामी हनुमान भी तुम्हारे रथ की ध्वजा पर विराजमान हैं.फिर भी कर्ण ने रथ को कुछेक अंगुल ही सही पीछे कर दिया;इसलिए प्रशंसा का पात्र तो वही हुआ न!
      मित्रों,ठीक यही बात दद्दा और सचिन पर लागू होती है.दद्दा गुलाम भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.कई बार तो उन्हें और टीम के बाँकी खिलाडियों को खाली पांव भी खेलना पड़ता था.दद्दा के प्रति यह उपेक्षा-भाव आजाद भारत में भी बना रहा.वे हॉकी और हॉकी खिलाडियों की दुर्दशा से इतने आहत थे कि बेटे अशोक को उनसे छिपकर हॉकी खेलना पड़ता था.ऐसी कोई समस्या सचिन के साथ कभी नहीं रही.वे अच्छे खाते-पीते परिवार से तो थे ही आज उन पर धन की मूसलाधार बरसात हो रही है.दद्दा की तरह ही उड़नसिख मिल्खा सिंह,शिवनाथ सिंह,उड़नपरी पी.टी.उषा,महामल्ल सुशील कुमार,तीरंदाज लिम्बा राम,टेनिस खिलाडी साईना नेहवाल,मुक्केबाज निखिल कुमार,विजेंद्र सिंह,क्रिकेटर विनोद काम्बली,गोल्फर मुकेश कुमार जैसे अनेक ऐसे खिलाडी रहे हैं दुःख और अभाव ही जिनके जीवन की कथा रही.असली भारत रत्न तो वे हैं और उनका इस नाते भारत रत्न पर सचिन से कहीं ज्यादा,बहुत ज्यादा अधिकार बनता है.इसी तरह शतरंज में भारत के वन मैन आर्मी विश्वनाथन आनंद का हक़ भी इस सम्मान पर सचिन से कहीं ज्यादा बनता है.
                मित्रों,आज अगर सचिन तेंदुलकर चाहें तो उनके पास इतना पैसा है कि वे कई दर्जन स्कूल,अस्पताल और अनाथालय बनवा और चलवा सकते हैं;लेकिन उन्होंने ऐसा किया क्या?बल्कि कई बार तो वे ऐसे कृत्या भी कर जाते हैं जो उनकी धनलोलुपता को ही जगजाहिर करता है.कभी वे विदेश से आयातित कार पर टैक्स चोरी का प्रयास करते हैं तो कभी आयकर में छूट प्राप्त करने की कोशिश करते हैं.आखिर जब वे सक्षम हैं तो फिर क्यों उनसे पूरा टैक्स नहीं लिया जाना चाहिए?इस बारे में भी एक प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत है.एक बार भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद का शरीर बीमार पड़ गया और उन्हें डॉक्टर के पास जाना पड़ा.जब उनकी प्रसिद्धि से प्रभावित होकर डॉक्टर ने उनसे फीस लेने से मना कर दिया तो देशरत्न ने प्यारभरी नाराजगी दिखाते हुए डॉक्टर से कहा कि जो मरीज फ़ीस देने में सक्षम नहीं हों उनसे फ़ीस नहीं लीजिएगा परन्तु मुझ पर मेहरबानी नहीं करिए जबकि मैं पूरी तरह फ़ीस चुकाने की स्थिति में हूँ.
      मित्रों,राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर जेल जाते ही अपना नाम और पता भूल जाने का स्वांग करनेवाले कलमाड़ी को आगे करके अरबों रूपये का घोटाला करनेवाली निकम्मी केंद्र सरकार को अचानक खिलाडियों का योगदान कैसे याद आ गया अंत में मैं उन परिस्थितियों पर विचार करना चाहूँगा.इस समय केंद्र सरकार चारों ओर से संकटों और आरोपों से घिरी हुई है और उसके समक्ष सफाई देने तक का कोई रास्ता नहीं बचा है.ऐसे में उसने जनता का ध्यान जनहित से जुड़े मुद्दों से भटकाने के लिए काफी सुविचारित तरीके से यह सचिन को भारत रत्न वाली चाल चली है.बड़े शातिर लोगों को हमने सत्ता सौंपी हैं.सावधान मित्रों,____ से सावधान.उम्मीद करता हूँ कि आप खुद ही रिक्त स्थान को भर लेंगे.

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

बाबा भरोसे फौजदारी


मित्रों,अभी भारत के नवीनतम मित्र और दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत आई हुई थीं.वो भी ऐसे समय में जब भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई पर आतंकवादी हमला हुआ है.ऐसे में हरेक भारतवासी की तरह मुझे भी ऐसी उम्मीद थी कि चूंकि वे भारत को अपना स्वाभाविक मित्र कहते नहीं अघातीं इसलिए वे आतंक के केंद्र पाकिस्तान को कड़क संकेत देकर भारत के जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास करेंगी या फिर लगाते हुए दिखना चाहेंगी.लेकिन हुआ इसका उल्टा.कहाँ तो हम कह रहे थे कि वे आए हमारे घर खुदा की कुदरत;कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं और कहाँ उनके जाने के बाद अपने रिसते हुए जख्मों को अपने जख्मी हाथों से सहलाते हुए कहे जा रहे हैं कि तुम आए हमारे घर खुदा की कुदरत;हमने अपने घर को देखा एक तेरे आने से पहले एक तेरे जाने के बाद.
          मित्रों,हिलेरी क्लिंटन के आने-जाने के बाद अगर हम यात्रा से होने वाले हानि-लाभ पर नजर डालें तो नतीजा सिफ़र पाएँगे.यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि १३ जुलाई के तार पाकिस्तान से जुड़े होने के स्पष्ट संकेत मिलने के बावजूद भारत सरकार अगर उसका नाम खुलकर नहीं ले पा रही थी तो या तो वह ऐसा हिलेरी को खुश करने के लिए कर रही थी या फिर दिग्विजय सिंह सरीखे दगाबाज लोगों के दबाव में आकर.लेकिन हाय रे नसीब!गोरी मेम ने तो कुछ ऐसा दिल तोड़ा कि अब कूटनीति के जीरो कृष्णा साहब सिर्फ यही कह सकते हैं कि न जी भरके देखा न कुछ बात की,बड़ी आरजू थी मुलाकात की.
          मित्रों,यह बात,यह तथ्य आईने पर लिखी ईबारत की तरह कल भी साफ-साफ पढ़ी जा सकती थी और आज भी पढ़ी जा सकती है कि भारत को आतंकवाद के खिलाफ अपनी लडाई खुद ही लड़नी होगी.इस लड़ाई में ट्रिगर पर टिकी ऊंगली भी हमारी होगी,कुंदे से लगा कन्धा भी हमारा होगा और गोली खानेवाला सीना तो हमारा होगा ही.नहीं आनेवाला बाहर से कोई देश हमारा उद्धारक बनकर.लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या हमारी सरकार अंधी हो रही है या दीवानी कि इतनी-सी बात उसके भेजे में नहीं आ रही?क्यों वह सबकुछ लुटाकर भी होश में नहीं आ रही?क्या उसका देशहित से कुछ भी लेना-देना रह गया है और अगर ऐसा नहीं है तो इसके लिए क्या हम मतदाता भी समान रूप से या राजनेताओं से भी कहीं बढ़कर दोषी नहीं हैं?
           मित्रों,भारत में इस समय समस्त अव्यवस्था और अराजकता के बावजूद जिस तरह की मरघट की शांति छाई हुई है उससे तो यही लगता है कि अतीत में यह भले ही वीरों का देश रहा हो आज यह नपुंसकों का देश बनकर रह गया है.हम भारतवासियों की हड्डियों में खून के बदले पानी भर गया है.हम नितांत कायर बन गए हैं और अपनी कायरता को ढंकने के लिए कभी चीन तो कभी पाकिस्तान के प्रति उलटे-सीधे बयान देते रहते हैं,अनाप-शनाप तर्क खोजते रहते हैं.सीमापार से भारत हजार साल पहले भी सुरक्षित नहीं था और आज आजादी के ६३ सालों के बाद भी नहीं है.
             मित्रों,जिस तरह से भारत सरकार आतंकवाद से लड़ रही है उस तरह से तो इसे रोकने की हजारों सालों में भी फुलप्रूफ व्यवस्था नहीं की जा सकती.जब राष्ट्रीय जाँच एजेंसी को मुम्बई पुलिस जाँच ही नहीं करने देगी तो फिर इससे लड़ने की फुलप्रूफ एकीकृत व्यवस्था हो पाने की सोंची भी नहीं जा सकती.हद तो यह है कि ऐसा तब हो रहा है जब प्रदेश में व केंद्र में एक ही पार्टी की सरकार है.हमले के एक सप्ताह बाद भी बदमिजाज मुम्बई पुलिस और भारत सरकार यह बताने की स्थिति में नहीं है कि इन हमलों के पीछे किन संगठनों का हाथ था और इनसे पाकिस्तान कहाँ तक सम्बंधित है.आखिर क्यों?कब रूकेगा इस तरह आतंकी कृत्यों की जाँच में असफलताओं का सिलसिला?जो पुलिस और एजंसियां हमले के बाद हमलावरों का पता तक नहीं लगा सकती उस पर किस आधार पर हमले को होने से पूर्व ही रोक लेने का ऐतबार किया जाए?पुलिस और सुरक्षा पर करोड़ों रूपये खर्च करने के क्या कोई मतलब भी है?क्यों नहीं जन-उत्पीड़क पुलिस व ख़ुफ़िया संगठनों को भंग कर दिया जाए?क्यों बर्बाद किया जाए इनके वेतन और पेंशन पर करोड़ों रूपये और क्यों इनको घूस खा-खाकर तोंद फुलाने का कुअवसर दिया जाए?क्यों???

सोमवार, 18 जुलाई 2011

मूर्खिस्तान के केंदीय मंत्रिमंडल का पुनर्गठन

ass1

पिछले कई महीनों से दुनिया में सबसे तेजी से उभरते देश मूर्खिस्तान की केंद्र सरकार पर मंत्रिमंडल में बदलाव करने का भारी दबाव था.विशेषज्ञों का मानना था कि चूंकि परिवर्तन संसार का नियम है इसलिए अब केंद्रीय मंत्रिमंडल में बेवजह के फेरबदल में ज्यादा विलम्ब नहीं करना चाहिए.अचानक कल रात १२ बजकर ६५ मिनट पर देश की राजधानी गर्दभपुर के मूर्खराज सभागार में सभी गणमान्य महानुभावों को बुलाया गया.आपको बता दूं कि इस अनूठे देश में दिमाग का प्रयोग एक दंडनीय अपराध है.वैसे आप पढ़ते समय चाहें तो दिमाग का प्रयोग कर सकते हैं अगर आपके पास हो तो.मूर्खिस्तान के सत्तारूढ़ दल के महासचिव,अध्यक्ष और युवराज चूंकि देश के सबसे बड़े सिरफिरे हैं इसलिए उनके दल को कभी चुनाव जीतने में कभी कोई परेशानी नहीं हुई.ऐसे में भला प्रधानमंत्री कैसे विवेकपूर्ण तरीके से मंत्रियों का चयन करते?अतः सबसे पहले म्यूजिकल चेयर प्रतियोगिता का आयोजन किया गया.एक गोल घेरे में १० सोने की कुर्सियां रखी गईं जिन पर अलग-अलग मंत्रालयों के नाम चिपके हुए थे.जब तक मादक संगीत बजता रहा मंत्री पद के उम्मीदवार कुर्सियों की परिक्रमा करते रहे और जैसे ही बंद हुआ लोगों ने अपने-अपने सामनेवाली कुर्सी पकड़ ली.
      मित्रों,इस तरह इस निर्विशेष देश के विशेष प्रधानमंत्री मूर्खमोहन सिंह ने जो जनता के बीच बिना दिमागवाले के रूप में लोकप्रिय रहे हैं;ने मंत्रियों का चयन किया.यहाँ मैं आपको यह बताता चलूँ कि प्रतियोगिता शुरू होने से पहले ही दो कुर्सियों को हटा दिया गया था.उनमें से एक तो काजल की कोठरी उर्फ़ जेल का दरवाजा बन चुकी संचार मंत्री की थी और दूसरी कपड़ा मंत्री की.दरअसल मूर्खिस्तान में अब प्रधानमंत्री का पद पहले की तरह शक्तिशाली नहीं रह गया है.पहले इस देश में भी हिंदुस्तान की तरह ही एकदलीय सरकारें बनती थीं और तब मूर्खिस्तान का प्रधानमंत्री ही देश का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी हुआ करता था.अभी यहाँ की पिछली सरकार भी हालाँकि गठबंधन सरकार थी लेकिन प्रधानमंत्री तब इस कदर कमजोर नहीं था.लेकिन अब वो बात कहाँ?आजकल जो व्यक्ति प्रधानमंत्री है पहले नौकरशाह था और अब नौकर है गधा पार्टी की अध्यक्षा का.जो भी अध्यक्षा जी का हुक्म हुआ मूर्खमोहन जी उस पर अमल कर डालते हैं चाहे उससे देश का भला हो या बुरा;उसकी बला से.हमारा देश इन दिनों फिर से सामंतवाद की चपेट में है.आज की तारीख में मूर्खिस्तान के प्रादेशिक क्षत्रप इतने शक्तिशाली हो चुके हैं कि दिल्ली की गद्दी का फैसला भी करने लगे हैं.अब संचार और कपडा मंत्रालय कौन संभालेगा का फैसला एक शक्तिशाली क्षत्रप की ईच्छा पर छोड़ दिया गया है.वो चाहें तो कुर्सी को यूं हीं खाली-खाली सडा दे या फिर से किसी किसी महाभ्रष्ट परिजन के हवाले कर दे.
       मित्रों,इन दिनों हमारा देश एक कथित ईमानदार व्यक्ति की संदिग्ध गतिविधियों से काफी परेशान है.यह गांधीवादी पूरे देश की जनता को भ्रष्टाचार के नाम पर गुमराह कर रहा है.वह कह रहा है कि वह भ्रष्टाचार से लडेगा.अब आप ही बताईए कि भला भ्रष्टाचार लड़ने की चीज है.वो तो करने की चीज है न.इसलिए तो मुझे लगता है कि यह बूढा झूठ-मूठ का अपना बुढ़ापा ख़राब कर रहा है.शादी नहीं करके अपनी जवानी तो पहले ही बर्बाद कर चुका है खूसट.बड़ा चला है गाँधी बनने.जब हिन्दुस्तानवालों ने गाँधी को गाँधी नहीं बनने दिया तो मूर्खिस्तान क्या खाकर इस बुड्ढ़े को गाँधी बनने देगा?
                मित्रों,हमारे देश पर बराबर आतंकी हमला होता रहता है.जब किसी देश में दुनिया की सबसे नकारा सरकार सत्ता में हो तो फिर डर किसको,किससे और क्यों?हमारे प्रधानमंत्री और उनके दल का मानना है कि हमें अथिति देवो भव की सदियों पुरानी परंपरा का पालन करते रहना चाहिए;आतंकवादियों के साथ भी.हमारे देश में आतंकियों को फांसी नहीं दी जाती बल्कि उन्हें दामाद बनाकर रखा जाता है.
मित्रों,इस बार भी हर बार की तरह मंत्रिमंडल में फेरबदल के बाद प्रधानमंत्री ने गैरइरादतन कहा कि उन्होंने युवराज बबुआजी से मंत्रिमंडल में शामिल होने का दंडवत अनुरोध किया था लेकिन उन्होंने सिरे से मना कर दिया.कितना बड़ा झूठ है ये?असलियत तो यह है कि युवराज इस डर से मंत्री बनना नहीं चाहते कि कहीं मंत्री बनने के बाद उनके बिना भेजे वाले दिमाग से कोई ऐसी गलती न हो जाए जिससे वे मंत्री से प्रधानमंत्री बन ही नहीं पाएं.अंत में प्रधानमंत्री जी ने अपने मुखबंदर से यह भी कह डाला कि यह उनकी सरकार के इस कार्यकाल का आखिरी फेरबदल है और आगे वोटों की अगले बंदरबांट तक मंत्रिमंडल में कोई बदलाव नहीं होगा.कितने बड़े गपोरी हैं श्रीमान!कोई उनके बाप का राज है क्या?वे आदेशपाल हैं केवल आदेशपाल और इससे अधिक कुछ भी नहीं.असली सत्ता है राजमाता जी के पास और उनकी जब मर्जी होगी मंत्रिमंडल में बदलाव होगा.वे चाहें तो ऐसा रोज-रोज भी करें.अंत में लेख पढने के लिए आप सभी मित्रों को मैं धन्यवाद नहीं देता हूँ.गुड बाय.फिर मिलेंगे.

बुधवार, 6 जुलाई 2011

कृपालु,दीनदयाल,गरीबनवाज राहुल बबुआ

rahul

मित्रों,भारत की सुपर प्राइम मिनिस्टर इटली से आयातित राजमाता सोनिया गाँधी की आखों के तारे राहुल बबुआ जबसे राजनीति में आए हैं तभी से कृपालु,दीनदयाल,गरीबनवाज बने हुए हैं.जहाँ कहीं भी किसानों,दलितों और मुसलमानों पर प्रदेश सरकार डंडा-गोली चलवाती है राहुल बबुआ तुरंत वहां पहुँच जाते हैं.इस दौरान कुछ देर झोपडिया में आराम करते हैं चटाई बिछाकर.अगर चटाई नहीं मिले तो खटिया से भी काम चला लेते हैं.कभी-कभी तो रातभर के लिए खटिया खाली नहीं करते हैं चाहे घरवालों को जमीन पर ही क्यों न सोना पड़े.
          मित्रों,राहुल बबुआ की संवेदना का जवाब नहीं.बड़े ही जागरूक इन्सान हैं.जिस प्रदेश में उनकी खुद की सरकार होती है वहां लाख पुलिसिया अत्याचार,अनाचार,बलात्कार हो जाए वे नहीं फटकते.फटे में पांव वे तभी डालते हैं जब प्रदेश में विपक्षी दल की सरकार हो.हाँ,वे पीड़ितों-गरीबों पर कृपा करते समय एक और बात का भी ख्याल रखते हैं कि उक्त प्रदेश में चुनाव नजदीक है या नहीं.चुनाव अगर निकट होता है तब हो सकता है कि राहुल बबुआ पीड़ितों पर दोबारा भी कृपा करें  अन्यथा एक बार के दौरे से ही बबुआजी की संवेदना तृप्त हो जाती है.
              मित्रों,अभी उत्तर प्रदेश में चुनाव निकट है और ऐसे में हिटलरी मिजाज वाली मायावती की सरकार ने भट्ठा परसौल में अत्याचार की सारी हदें पर कर दीं.ऐसे में लाजिमी था कि राहुल बबुआ उपरोक्त गाँव का दौरा करें और एक बार नहीं दो या दो से ज्यादा दफा करें.इसी बीच बबुआजी ने बिहार के फारबिसगंज में पुलिस फायरिंग में मारे गए मुसलमानों के परिजनों का दर्द भी बांटा.लेकिन चूंकि बिहार में अभी चुनाव दूर है इसलिए मुझे नहीं लगता कि वे दोबारा वहां की जनता पर निकट-भविष्य में कृपावृष्टि करनेवाले हैं.आप सभी जानते हैं कि इस समय बिहार और उत्तर प्रदेश दोनों प्रदेशों में विपक्षी दल की सरकार है.इसी तरह की घटनाएँ महाराष्ट्र में लगातार नियमित अन्तराल पर होती रहती हैं लेकिन चूंकि क्योंकि वहां राहुल बबुआ की पार्टी सत्ता में है वे नहीं जाते पीड़ितों का दर्द बाँटने.अपने आदमी द्वारा किया गया अत्याचार अत्याचार थोड़े ही होता है.वैदिक हिंसा हिंसा न भवति;वह तो दुर्भाग्यपूर्ण लेकिन अपरिहार्य होता है.उनकी माताजी द्वारा रिमोट संचालित केंद्र सरकार की पुलिस ने रामलीला मैदान में आधी रात में सोये हुए वृद्ध-बीमार लोगों पर लाठियों-गोलियों-अश्रुगैस की बरसात कर दी;लोकतंत्र की शवयात्रा निकाल दी लेकिन राहुल बबुआ का मन थोडा-सा भी नहीं पसीजा.नहीं गए अंग-भंग हुए लोगों को अस्पताल में देखने,उनका दुःख-दर्द बाँटने.जाते भी कैसे,यह अपने लोगों की शरारत जो थी.लोकतंत्र की हत्या तो तभी होती है जब हत्यारी विपक्षी दल की सरकार हो.अपने लोगों पर तो राहुल बबुआ बड़े कृपालु हैं.कुछ भी गलत कर जाए तो बचपना समझकर आँखें मूँद लेते हैं.
               मित्रों,तो ये है अपने कृपालु,दीनदयाल,गरीबनवाज ४१ वर्षीया राहुल बबुआ की संवेदनशीलता की हकीकत.आप समझ गए होंगे कि उनकी संवेदनशीलता सिर्फ वोट के लिए है उसका गरीबों व पीड़ितों के आंसुओं से कुछ भी लेना-देना नहीं है.अगर लेना-देना होता तो वे न तो पीड़ितों के प्रति भेद का भाव रखते और न ही पीड़कों को लेकर.करें भी तो क्या बेचारे अपने नायाब दिमाग से तो कुछ करते नहीं हैं जैसी सलाह उनके खानदानी चाटुकारों ने दी बबुआ ने वैसा ही कर दिया.राजनीति तो उनके खून में होना चाहिए फिर न जाने क्यों वे पिछले कई वर्षों से राजनीति का ककहरा ही सीखने में लगे हैं.ऐसे ही चलता रहा तो वह दिन भी जल्दी ही आएगा जब जनता उनके ककहरा सीखने का इंतजार करते-करते थक जाएगी और फिर से कांग्रेस पार्टी विपक्ष की अँधेरी सुरंग में चली जाएगी.जल्दी सीखिए कांग्रेसी युवराज-क का कि की कु कू बादाम,के कै को कौ कं कः राम.क का कि की.............

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

भगवान की मौत

doctor

मित्रों,जब भी हमारा शरीर बीमार होता है तो हमें दो शख्स याद आता है एक ऊपरवाला भगवान और दूसरा नीचेवाला भगवान यानि डॉक्टर.ऊपरवाले भगवान का किसी को स्वस्थ करने में कहाँ तक योगदान होता है मुझे तो नहीं पता लेकिन नीचेवाले भगवान का पूरा योगदान होता है यह पता है.परन्तु हमारे राज्य बिहार में चिकित्सा की जो स्थिति है उससे तो यही लगता है कि नीचेवाले भगवान की मौत हो गयी है या फिर वह अपने महान पद से नीचे गिर गया है.मानवता का यह पुजारी उपभोक्तावाद की गन्दी हवा से प्रभावित होकर पैसों का हवसी बन चुका है.हिप्पोक्रेतिज की शपथ को तो वह भुला ही चुका है वह यह भी भूल गया है कि वह ईन्सान है;कोई पैसा कमाने की मशीन नहीं.

                मित्रों,पिछले दिनों मेरा डेढ़ वर्षीया भांजा जो इन दिनों हमारे पास हाजीपुर में आया हुआ है बीमार पड़ गया.सुबह के ८ बजते-बजते वह नीचे और ऊपर दोनों तरफ से पानी उगलने लगा.हमारा पूरा परिवार घबरा गया और हम बच्चे को कंधे से चिपकाए हाजीपुर के मशहूर शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर राम वचन ठाकुर के घर सह क्लिनिक की तरफ भागे.वहां का नजारा बड़ा भयावह था.सैकड़ों माएँ अपने बीमार बच्चे को गोद में लिए अपनी बारी आने या नंबर लगने का इंतज़ार कर रही थीं.मेरा भांजा अब भी मेरे कंधे पर था और मुझे यह पता नहीं था वह होश में है या बेहोश है.मैंने कंपाउंडर से तत्काल डॉक्टर से मिलवाने की विनती की तब वह कहने लगा कि २ बजे से पहले ऐसा संभव नहीं है;आप बच्चों को इलेक्ट्राल पिलाईये.मेरे यह कहने पर कि बच्चा मुंह से कुछ भी नहीं ले रहा है तो उसने नाराज होते हुए कहा कि बच्चा अपने मन से थोड़े ही पिएगा आप जबरदस्ती पिलाईये.मैं सुनकर सन्न रह गया.तभी हम भीड़ में जहाँ खड़े थे वहां करीब साल भर के एक बच्चे ने माँ की गोद में ही ईलाज की प्रतीक्षा करते-करते दम तोड़ दिया.माँ के चित्कार से पूरा माहौल गमगीन हो उठा.मेरा मन भी खट्टा हो गया और मैंने वहां से खिसक लेने में ही अपने भांजे की भलाई समझी.
               मित्रों,ठाकुर जी के घर के पास ही एक मशहूर होमियोपैथी डॉक्टर का घर था.हताश-निराश हमने उन डॉक्टर बिजली सिंह के घर का दरवाजा खटखटाया.बिजली बाबू जो लगभग ८५ साल के होंगे खुद ही बीमार मिले.हालाँकि उन्होंने हमें हिम्मत बधाई और पत्नी को चाय बनाने के लिए कहा.साथ ही सदर अस्पताल के पास जाकर अपने बेटे से ईलाज कराने की सलाह दी.चाय को न तो आना था और न आई.इसी बीच एक अच्छी बात यह हुई कि मेरा भांजा वहीं बैठे-बैठे इलेक्ट्राल पीने लगा.हालाँकि मैं भी यही चाहता था कि उसे बिजली बाबू के बेटे से ही दिखाया जाए लेकिन पिताजी की राय थी कि सरकारी अस्पताल में दिखाना चाहिए.हम सरकारी अस्पताल में गए भी और पर्ची कटवाई लेकिन जैसे ही डॉक्टर से कहा कि मामला इमरजेंसी का है इसलिए जल्दी देख लीजिए;वह हड़क गया और देखने से ही मना कर दिया.नीतीश सरकार का एक नंगा सच मेरी आँखों के आगे था.मुझे सरकारी अस्पताल और सरकारी डॉक्टरों पर कितना गुस्सा आ रहा था मैं शब्दों में कह नहीं सकता.जी में आ रहा था कि सबकुछ नेस्तनाबूत कर दूं.
         मित्रों,वहां से हम जौहरी बाजार भागे जहाँ एक पंक्ति में कई निजी नर्सिंग होम हैं.वहां एक दलाल पीछे पड़ गया.हमने दोगुना फ़ीस देकर नंबर भी लगवा लिया लेकिन जब पूछा कि डॉक्टर राजेश कितनी देर में देखेंगे तो बताया गया कि कम-से-कम आधा घंटा लगेगा.मैं ईन्तजार नहीं कर सकता था,हालात भी ऐसे नहीं थे;इसलिए पैसा वापस ले लिया और डॉक्टर गौरव की क्लिनिक में आकर उसका इंतजार करने लगा.गौरव हमसे पूर्व-परिचित है और उसका ननिहाल मेरे भांजे के गाँव में ही है.उसको पटना से आने में दो घंटे लग गए.तब तक मैं बच्चे को इलेक्ट्राल पिलाता रहा.गौरव आया और आते ही स्लाइन चढाने की जिद करने लगा.मैंने कहा कि जब बच्चा मुंह से इलेक्ट्राल पी ही रहा है तो फिर नस से ग्लूकोज चढाने की जरुरत क्या है.मेरे काफी जिद करने पर उसने निराश मन से दवा लिखी.अब तक तो मैं सिर्फ सुनता आ रहा था कि हाजीपुर के डॉक्टर सर्दी-खांसी में भी स्लाइन चढ़ा देते हैं आज देखा भी.आखिर हम समकालीनों ने पैसे को ही सब-कुछ जो बना दिया है.इसलिए तो वह धरती के इस भगवान का भी भगवान बन गया है.
             मित्रों,यह युग पैसे के साथ-साथ मशीनों का युग भी है.भगवान तो भगवान नहीं ही रहा ईन्सान भी अब ईन्सान नहीं रह गया है.आप किसी से भी मिलिए तो ऐसा लगेगा जैसे किसी मशीन से मिल रहे हैं.ओढ़ी हुई मुस्कान होठों से चिपकी हुई होती ही है और होठ कुछ रटे-रटाए शब्द उगलते रहते हैं किसी ऑटोमैटिक आंसरिंग मशीन की तरह.आज की दुनिया में ऐसे व्यवहार को प्रोफेशनलिज्म कहा जाता है.मुझे इस प्रोफेशनलिज्म का कटु अनुभव तब हुआ जब मैं अपनी मामी जो पटना में डॉक्टर हैं से मिला.वही मामी जो एक समय मेरे बीमार पड़ने पर कई दिनों तक मेरे सिरहाने में खड़ी रह गयी थीं मुझे जैसे किसी औपचारिकता का निर्वहन करती हुई सी लगीं.अब उनकी प्रैक्टिस अच्छी-खासी चलने लगी है.शायद सफलता ने उनकी संवेदना को मार दिया है और इसलिए अब वे भी एक मशीन बनकर रह गयी हैं और हमेशा इसी प्रयास में रहती हैं कि सारी गर्भवतियों का सिजेरियन कर दिया जाए जिससे उन्हें कमाने का भरपूर अवसर मिले.ऊपरवाले भगवान की मौत की घोषणा तो फ्रेडरिक नित्स्चे ने कई दशक पहले १८८२ में ही कर दी थी अब बाजारीकरण के इस दौर में नीचेवाला भगवान भी जीवित नहीं रहा.यानि भगवान की मुकम्मल तौर पर मृत्यु हो चुकी है.अब हम सिवाय नवसृष्टि के इन्तजार करने के कुछ भी नहीं कर सकते.एक अंतहीन प्रतीक्षा!
    

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

कभी-कभी बोलनेवाला रोबोट है मनमोहन सिंह

manmohan singh

मित्रों,पिछले कुछ महीने भारत के लिए काफी घटनापूर्ण रहे हैं.अप्रैल से ही भारत का प्रबुद्ध वर्ग समय-समय पर भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलित रहा है.कभी अन्ना हजारे के अनशन और बयानों के कारण तो कभी योगगुरु बाबा रामदेव के भ्रष्टाचारियों को शीर्षासन कराने की जिद के चलते.इस बीच सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह और केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री कपिल सिब्बल सरकार की तरफ से लगातार बयान देते रहे हैं लेकिन सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस कदर चुप्पी साधे रहे हैं कि हम भारतवासियों को गुमां हो रहा था कि कहीं मिस्टर ऑनेस्ट की आवाज तो नहीं चली गयी है.
              मित्रों,मनमोहन जी के राजनैतिक गुरु पी.वी.नरसिंह राव भी बहुत कम बोलते थे लेकिन उन्हें कभी यह स्पष्ट नहीं करना पड़ा कि वे मजबूत प्रधानमंत्री हैं.उनके भ्रष्टाचारपूर्ण कार्यकाल में सत्ता का सिर्फ और सिर्फ एक ही केंद्र था और वह थे स्वयं पी.वी.नरसिंह राव.इसलिए राव साहब ने जो कुछ भी भला-बुरा किया उसकी एकमात्र जिम्मेदारी उनकी खुद की थी.लेकिन इस सरकार में तो सत्ता के बहुत-से केंद्र हैं और अगर कोई केंद्र नहीं है तो वह हैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह.
              मित्रों,कम बोलना अच्छा गुण माना जाता है परन्तु उस शासक के लिए जिस पर पूरे भारत का वर्तमान और भविष्य निर्भर करता है,का पूरी तरह से गूंगा बन जाना और देश में जान-बूझकर भ्रांतिपूर्ण वातावरण बन जाने देना गुण नहीं वरन अवगुण होता है.आखिर सरकार का नेतृत्व मनमोहन सिंह कर रहे हैं न कि कपिल सिब्बल या दिग्विजय सिंह.फिर मनमोहन सिंह ने क्यों नहीं खुद ही इस बात की घोषणा की कि अब सरकार सिविल सोसाईटी को भाव नहीं देगी और मसौदा कमिटी में नहीं रखेगी?क्यों नहीं मनमोहन सिंह ने आगे आकार स्पष्ट किया कि अप्रैल में उनकी सरकार अन्ना के आगे क्यों झुक गयी थी और अब ऐसी कौन-सी गंभीर गलती सिविल सोसाईटी वालों ने कर दी है कि उन्हें मसौदा कमिटी से अलग रखने की बात उनके मंत्री कर रहे हैं?
              मित्रों,मनमोहन सिंह को जब-जब कुछ कहना होता है वे साल में एक-दो बार मीडियाकर्मियों से बात कर लेते हैं.उन्हें रोजाना मीडिया से बात करने में क्या परेशानी है?अगर वे पूरी तरह से स्वतंत्र और मजबूत हैं जैसा कि वे बार-बार बेवजह स्पष्ट भी कर रहे हैं तो फिर कंप्यूटरचालित आंसरिंग मशीन की तरह क्यों जवाब देते हैं?उनकी जुबान पर हमेशा रटा-रटाया जवाब क्यों रहता है?ऐसा क्यों होता है कि उनकी शारीरिक भाषा कुछ और कह रही होती है और जुबान कुछ और?
           मित्रों,भाषण करना एक कला है,विज्ञान भी है.नेताओं को यह कला आनी ही चाहिए.द ग्रेट नेपोलियन की जीत के पीछे कोई चमत्कार का हाथ नहीं होता था बल्कि उसका पत्थर को भी जागृत कर देनेवाला भाषण होता था.प्रसाद,नेहरु और शास्त्री के भाषणों में भी काफी दम होता था.मनमोहन जी के पूर्ववर्ती अटल बिहारी वाजपेयी भी अपनी भाषण-कला के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते थे और भाषण द्वारा वातावरण को पूरी तरह से बदल डालने का माद्दा रखते थे.परन्तु हमारे मनमोहन सिंह साल में एक या दो दिन जब भी जनता को सीधे संबोधित करते हैं टाटा अग्नि चाय पिए हुए लोगों को भी जम्हाई आने लगती है.बोलते समय उनका चेहरा कभी कैमरा-फ्रेंडली नहीं होता.लगता है जैसे कोई ईन्सान नहीं रोबोट बोल रहा है और आप तो जानते हैं कि रोबोट को अपना दिल-दिमाग नहीं होता.जो आदमी अपनी मर्जी से दो-चार बातें तक नहीं बोल सकता उससे हम इस संक्रमण काल में जब देश ड्रैगन के जागने समेत अनगिनत बाह्य और आन्तरिक खतरों से घिरा है;कैसे देश को सफल और सक्षम नेतृत्व देने की उम्मीद कर सकते हैं?
                          मित्रों,श्रीमान मनमोहन जी से हमारा विनम्र निवेदन है कि आगे से वे प्रेस कांफेरेंस या एडिटर्स मीट का आयोजन करने की कृपा बिलकुल न करें.वे क्या बोलने वाले हैं यह सबको पहले से पता होता है.अगली बार जब कुछ अपने दिलो-दिमाग से बोलना हो तब जरुर वे ऐसी अहैतुकी कृपा कर सकते हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस जन्म में वे अपने मन से बिना रिमोट कण्ट्रोल के आदेश के कुछ बोलने वाले हैं.

मंगलवार, 28 जून 2011

मुंगेरीलाल के बदनसीब सपने

mungeri

मित्रों,आजकल अपने मुंगेरी भाई बहुत परेशान हैं.काजीजी तो सिर्फ शहर की चिंता में ही दुबले हो गए थे,मुंगेरी भाई के पास तो चिंताओं का अम्बार है.एक चिंता अभी खत्म भी नहीं हुई होती है कि दूसरी बेचारे के छिलपट मगज पर आकर सवार हो जाती है.चिंता से चतुराई का घटना सर्वज्ञात तथ्य है सो बेचारे चतुर से चतुरी चमार बनते जा रहे हैं.क्या करें और क्या न करें;क्या खरीदें और क्या न खरीदें;आज सिर्फ आम आदमी की ही समस्या नहीं है बल्कि इससे सपनों की दुनिया के बेताज बादशाह भी त्रस्त हैं.
       मित्रों,इन दिनों मुंगेरीलाल जी की सबसे बड़ी समस्या है महंगाई.अभी बेचारे खुश चल रहे थे कि सब्जियों के दाम गिर गए हैं.कई महीनों के बाद उनकी बेलगाम जीभ ने हरी-हरी सब्जियों का स्वाद चखा था.मुंगेरी लाल जी की तरंगित आँखें फिर से लखना डाकू को पकड़ने के सपने देखने लगी थीं कि नींद ही टूट गयी.इस बार उनके रिटायर्ड दारोगा ससुर ने स्वप्नभंग नहीं किया बल्कि उनका सपना टूटा रेडियो पर डीजल,किरासन और रसोई गैस के दाम बढ़ने की खबर को सुनकर.सुनते ही मानो बेचारे की जिंदगी का ही जायका बिगड़ गया.
          मित्रों,मुंगेरी भाई ने एक लम्बे समय से दाल का स्वाद नहीं चखा.और भी ऐसी कई खाने-पीने की चीजें हैं जो इस कृशकाय प्राणी की पहुँच से दूर हो चुकी हैं.मुंगेरी भाई अब चिंतित हैं कि पहले से ही मनमाना भाड़ा वसूलने वाले निजी वाहन मालिक अब न जाने कितना किराया बढ़ा दें.कहीं ऐसा न हो कि अब डीजल गाड़ियों की यात्रा भी दाल-सब्जियों की तरह मुगेरी भाई की पहुँच से दूर हो जाए.फिर बेचारे कहाँ तक बिना जूता-चप्पल वाले पैरों को घसीटते चलेंगे?बात इतनी ही हो तो खुदा खैर करे.डीजल का दाम बढ़ने का मतलब है मालवाहक के किराये में भी मनमानी बढ़ोतरी.फिर बेचारे किस-किस वस्तु के उपयोग का त्याग करते चलेंगे.अगर इसी तरह ज़िन्दगी के लिए जरुरी वस्तुओं का एक-एक कर त्याग करते रहे तो बहुत जल्दी जिंदगी ही उनका त्याग कर देगी.
             मित्रों,मुंगेरी भाई ने कई साल पहले बिजली का कनेक्शन लगवाने के लिए बिहार राज्य विद्युत् बोर्ड में आवेदन किया था.मीटर भी जमा करवाया था लेकिन कई साल बीत जाने के बाद भी बेचारे को विद्युत् बोर्ड के महा (ना) लायक कर्मचारियों के शुभ दर्शन नहीं प्राप्त हुए हैं.सो बेचारे रात में ढिबरी जलाते हैं और इस तरह तनहाई में रात को धोखा देने का प्रयास करते हैं.लेकिन अब क्या होगा रामा रे?अब राशन के साथ-साथ किरासन भी बेचारे की पहुँच से बाहर होती जा रही है.ढंग से उनका नाम तो बीपीएल सूची में होना चाहिए था लेकिन गाँव के मुआं निमुंछिये मास्टरों की भ्रष्ट करतूतों के कारण बेचारे एपीएल में पड़े हुए हैं.ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने इसे सुधरवाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया लेकिन कई वर्षों तक प्रखंड कार्यालय के चक्कर काटने के बाद भी जब काम नहीं बना तो छोड़ दिया खुद को खुदा के भरोसे.
             मित्रों,मुंगेरी भाई को रसोई गैस का मूल्य बढ़ने से कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि श्रीमान के पास कभी इतना पैसा नहीं रहा कि जगे हुए या सोए हुए में गैस कनेक्शन लेने की सोंचते भी.वैसे वे इसका दाम बढ़ने से जनता को होनेवाली दुश्वारियों से पूरी तरह अनजान हों ऐसा भी नहीं है.अपने दिल से जानिए औरों के दिल का हाल कहावत के अनुसार वे चिंतित हैं कि गैस कनेक्शन रखने वालों का क्या होगा.इस महंगाई में वैसे ही जीवन-रक्षा कठिन है;अब और भी मुश्किल हो जाएगी.
          मित्रों,मुंगेरी भाई हर चुनाव में नियमित तौर पर मतदान करते आ रहे हैं;इस उम्मीद में कि इस बार तो बदलाव आकर रहेगा.नेताजी ने अपने मुंह से जो कहा है.आज उन्होंने जब अख़बारों में पढ़ा कि शरद पवार नाम के एक सम्मानित व वरिष्ठ मंत्री ने खुद ही चीनी का दाम बढ़वा दिया तो उन्हें खुद के आदतन मतदान करने पर शर्म आने लगी और गुस्सा भी.आजादी के समय से ही बेचारे सपने देखते रहे हैं.आपने उन्हें दूरदर्शन पर सपने देखते हुए देखा भी है.लेकिन लखना डाकू को पकड़ने का उनका सपना तो उनकी सपनीली दुनिया का काफी छोटा भाग है.उन्होंने कई बार देश के बदलने के सपने अहले सुबह में देखे.इस उम्मीद में कि लोग कहते हैं कि सुबह का सपना सच हो जाता है परन्तु सब व्यर्थ.इसलिए मुंगेरी भाई नहीं चाहते अब कोई भी सपना देखना किन्तु यह तो ऐसी शह है जिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं.स्वर्गीय पत्नी के प्यार में उन्होंने क्या-क्या नहीं छोड़ा?अब बेचारे अफीम और शराब को हाथ तक नहीं लगाते लेकिन पत्नी के लाख मना करने पर भी सपना देखना नहीं छोड़ पाए.अभी भी एक सपना देखने में लगे हैं.वे देख रहे हैं कि देश में राम-राज्य आ गया है.किसी को भी किसी प्रकार का दुःख नहीं है.सबके सब तन-मन से पवित्र हो गए हैं और उनका यानि मुंगेरी भाई का नाम बीपीएल में जुड़ गया है.मंत्रियों-अफसरों-भ्रष्ट कर्मचारियों ने अपनी सारी संपत्ति जनता में वितरित कर दी है और खुद दांतों के बीच में तिनका दबाकर वन को प्रस्थान कर गए हैं.चारों तरफ धर्म की ध्वजा फहराने लगी है.

गुरुवार, 23 जून 2011

बाबा आउट अन्ना अभी भी क्रीज पर

anna 1

मित्रों,यह लम्ब दंड गोल पिंड धर-पकड़ का खेल भी अजीब है.कोई नहीं जानता कि कब किस गेंद पर चौका-छक्का पड़ जाए या फिर कब किस गेंद पर कोई खिलाडी आउट हो जाए.अपने बाबा रामदेव को ही लीजिए.किस शानो-शौकत से ग्लब-पैड लगाकर मैदान पर आए थे.भारत सरकार के चार-चार मंत्रियों ने उनकी आरती उतारी थी.शुरू से आक्रामक बल्लेबाजी करके अपनी मंशा भी जाहिर कर दी लेकिन सरकारी गुगली के आगे उनकी एक न चली.थोड़े से असावधान क्या हुए खेल से संन्यास लेने की नौबत ही आ गयी.अब बेचारे घर (पतंजलि योगपीठ) में बैठकर सोंच रहे हैं कि हमसे क्या भूल हुई जिसकी सजा हमका मिली.बेचारे ने सोंचा था इस बार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हो रहे राष्ट्रीय टूर्नामेंट में सरकार को हराकर ही दम लेंगे.शायद ऐसा हो भी जाता लेकिन तभी सरकारी सटोरिये जो टीम के अहम सदस्य भी थे बाबा को फिक्स करने के लिए सक्रिय हो उठे.बाबा उनकी नीयत को समझ नहीं सके और फिक्स हो भी गए.यही गलती उन पर भारी पड़ गयी और सटोरियों ने मामले को जगजाहिर कर दिया.इतना ही नहीं मैदान (रामलीला मैदान) से मारपीट कर बाहर भी निकाल दिया.इस तरह बेचारे रामदेव बिना पूरी पारी खेले ही बाहर कर हो गए.चूंकि आम आदमी की काठ की हांड़ी (नेताओं को इस मामले में अपवाद माना जा सकता है) आग पर दोबारा नहीं चढ़ती है इसलिए खेलप्रेमियों को निराशाजनक उम्मीद है कि बाबा फिर से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर होनेवाले किसी भी मैच में आगे से नहीं खेल पाएँगे.भौतिक जीवन से तो उन्होंने बहुत पहले ही संन्यास ले लिया था अब न चाहते हुए भी एंटी-करप्शन क्रिकेट से भी उन्हें संन्यास लेना पड़ रहा है.
         मित्रों,हालाँकि हम भ्रष्टाचार विरोधियों को बाबा के मैदान से बाहर हो जाने से काफी निराशा हुई है परन्तु हमारे लिए यह अब भी बड़े ही ख़ुशी की बात है कि हमारे सबसे अनुभवी खिलाड़ी मास्टर-ब्लास्टर हरफनमौला अन्ना हजारे ने बखूबी एक छोर को संभल रखा है.उनके अंदाज से लग रहा है कि वे लम्बी पारी खेलने के मूड में हैं और उन्हें कोई जल्दीबाजी नहीं है.सरकार ने अभी लोकपाल मसविदा के मुद्दे पर अन्ना और देश को अंगूठा दिखाकर एक यार्कर लेंथ की बहुत ही खतरनाक गेंद डाली है.गेंद पर तेज प्रहार करने के इरादे से अन्ना फ्रंट फुट पर आ गए हैं.बल्ला हवा में है.गेंद धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है.अन्ना ने इस समय फिर से अनशन की लकड़ी से बना बल्ला हाथों में ले रखा है.यह बल्ला उनके लिए पहले भी काफी भाग्यशाली रहा है.उन्होंने इसके बल पर कई बार धुआंधार पारियां खेली है.अन्ना अच्छे गेंदबाज भी हैं.उनकी गेंदबाजी के कई प्रत्यक्ष गवाह पूर्व मंत्री इस समय महाराष्ट्र में मौजूद हैं जिनको अन्ना ने आउट किया था.अब हमें देखना है कि इस गेंद पर छक्का पड़ता है या फिर अन्ना भी बाबा की तरह पेवेलियन में बैठे नजर आते हैं.बड़ा ही रोमांचक क्षण है.लेकिन इन क्षणों में भी दर्शकों की ख़ामोशी काट खाने को दौड़ रही है.सबकी धडकनें तेज हैं,सबकी निगाहें मैदान पर टिकी हैं लेकिन बदतमीज और बदमाश विरोधी टीम के डर से कुछेक को छोड़कर कोई अन्ना का प्रकट रूप में समर्थन नहीं कर पा रहा है.विपक्षी टीम के पास धूर्त गेंदबाजों की कोई कमी नहीं है.वहीं बल्लेबाज अन्ना को अपनी सच्चाई पर पूरा भरोसा है.सच और झूठ के इस टेस्ट मैच में पहली और ६० साल लम्बी पारी में अधर्म ने भारी बढ़त हासिल कर रखी है.देखना है कि अन्ना उस बढ़त को कम करते हुए कैसे अपनी टीम को जीत दिलवाते हैं.विपक्षी टीम के पास दिग्गी,सिब्बल,मुखर्जी और कप्तान सोनिया जैसे शातिर खिलाडी हैं इसलिए अन्ना को अपना प्रत्येक शॉट सोंच-समझकर खेलना होगा.
          मित्रों,जैसा कि मैंने आपको पहले भी बताया है कि मैच इस समय काफी रोमांचक स्थिति में है.अन्ना टीम असमंजस में है.समस्त रणनीतियों और संभावनाओं पर विचार-विमर्श का दौर जारी है.अभी कुछ भी कहना जल्दीबाजी होगी कि इस मैच का क्या परिणाम होगा.अन्ना और उनकी टीम को प्रत्येक शॉट को काफी संभलकर खेलना होगा.इस समय बाबा के मैदान और खेल से बाहर हो जाने के बाद अन्ना पूरे भारत की आशाओं के केंद्र बने हुए हैं.सबकुछ उनकी सूझबूझ और रणनीति पर निर्भर करता है.जीत इसलिए भी कठिन लग रही है क्योंकि विपक्षी टीम जीत के लिए बल-प्रयोग और धक्कामुक्की करने के लिए तैयार बैठी है.और इस खेल का सबसे निराशाजनक पहलू तो यह है कि अम्पायर (जो हम हैं) सारी सच्चाई जानते हुए भी मूकदर्शक और तटस्थ बना हुआ है और यही वो ख़ामोशी है जो बेईमानों के मनोबल को बढ़ा रही है.देखना है कि अम्पायर कब तक चुपचाप रहता है.मैच का परिणाम सबसे ज्यादा अम्पायर पर ही निर्भर करता है यह तो आपको भी पता है.

शनिवार, 18 जून 2011

राह बनी खुद मंजिल


A R. Rajput075

मित्रों,एक बार डॉ. बशीर बद्र के मुखारविंद से दूरदर्शन पर उनकी ही पंक्तियाँ सुनीं.पंक्तियाँ कुछ इस तरह से थीं-जबसे मैं चला हूँ मंजिल पर मेरी नजर है,रस्ते में मील का पत्थर मैंने नहीं देखा.ये पंक्तियाँ मुझे कुछ इस तरह पसंद आईं कि मैंने इन्हें अपने जीवन का वेदवाक्य ही बना लिया.कई उपलब्धियां प्राप्त कीं तो कई रेत की तरह मुट्ठी में आते-आते फिसल गईं.लेकिन मंजिल-दर-मंजिल ऊँचाइयां छूने के बावजूद मुझे ख़ुशी नहीं मिल सकी;सबकुछ महज एक औपचारिकता बनकर रह गयी.तब मैंने जाना कि सफ़र का असली मजा तो सफ़र में है न कि मकसद को प्राप्त करने में.रास्ते में अगर आप तन्हा हैं,अकेले हैं तो फिर आपके सफ़र का बेमजा होना और सजा बन जाना तय है.
              मित्रों,सफ़र का मजा तो तब है जब आपके साथ कदम-दर-कदम सुख-दुःख को बाँटने के लिए कोई हमसफ़र हो और अगर हमसफ़र तन और मन दोनों से खूबसूरत भी हो तो फिर कौन कमबख्त चाहेगा कि किसी मंजिल पर जाकर उसका सफ़र समाप्त हो जाए.मैं १२ जून को युवती ब्याहने गया था लेकिन साथ में जिसको लाया वह प्रेम था,खालिश प्रेम.प्रथम मुलाकात में ही आशंका संबल में बदल गयी.पिछले चार-पाँच दिन किस तरह गुजर गए मालूम ही नहीं चला.हम दोनों जो अब तक अजनबी थे एक-दूसरे में इस गहराई तक उतर चुके हैं कि लगता ही नहीं है कि हम अभी-अभी मिले हैं.बल्कि हमें तो लगता है कि हम जन्म-जन्मान्तर से एक-दूसरे को जानते हैं,एक-दूजे के लिए ही बने हैं.अब हम दोनों की काया एक है,दिल की धड़कन एक है;सुख-दुःख एक है.मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि यह कैसा जादू है या चमत्कार है.
               मित्रों,इन दिनों मुझे मेरा जीवन स्वप्न जैसा लग रहा है.जब-जब अपनी आँखों पर यकीन नहीं होता दीवारों को छूकर तसल्ली कर लेता हूँ.अगर मुझे पहले से पता होता कि मेरी शादी कहाँ होने जा रही है तो आपकी कसम मैंने कई साल पहले ही शादी कर ली होती और अपने जीवन में खूबसूरत क्षणों को बढ़ा लेता.सूफी संत इश्के मजाजी (शारीरिक प्रेम) से इश्के हकीकी (ईश्वरीय प्रेम) तक के सफ़र की बात करते थे परन्तु मैंने तो सीधे इश्के हकीकी की उपलब्धि कर ली है.हम समय को रोकने के प्रयास में रात-रात भर जग रहे हैं लेकिन फिर भी वह ठहर नहीं रहा है.रात के बाद हमारे प्रबल विरोध के बावजूद जबरन दिन आ जा रहा है.
              मित्रों,हम (दरअसल अब मेरा स्वतंत्र अस्तित्व विगलित हो चुका है और मैं हम हो गया है) ईशावास्योपनिषद के अनुसार पूर्ण ब्रह्म भले ही न हो पाए हों हम पूर्णरूपेण एकाकार जरूर हो गए हैं.हम दोनों की काया में अब एक ही दिल धड़कता है.आश्चर्यजनक रूप से हमारी पसंद भी एक ही है.चाहे आराध्य की बात हो या फिर फिल्मों की.कल तलक जो एक-दूसरे से पूरी तरह अजनबी थे आज एक-दूसरे के लिए सबकुछ बन चुके हैं.आज हम एक-दूसरे एक बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते.अब मुझे न तो मंजिल की फिक्र है और न ही रास्ते की चिंता.हम दोनों ही एक-दूसरे की मंजिल हैं,सफ़र भी और बसेरा भी.मंजिल चाहे जितनी भी दूर हो रास्ता चाहे कितना ही कठिन क्यों न हो अब हमें वहां तक और फिर उससे भी आगे बढ़ जाने से कोई भी नहीं रोक सकता.

मंगलवार, 7 जून 2011

आईये आप भी लोकतंत्र की शवयात्रा में शामिल होईये

ram

मित्रों,भारतीय लोकतंत्र की स्थिति इसकी स्थापना के बाद से ही अत्यंत बिडम्बनापूर्ण रही है.जिस कांग्रेस पार्टी ने देश में लोकतान्त्रिक शासन की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई उसी ने लोकतंत्र को छठी से पहले ही मौत के मुंह में भी धकेल दिया.नेहरु युग में ही यह नवजात बीमार हो गया.लोहिया की रोज-रोज की नुक्ताचीनी से परेशान होकर सरकारी खर्चे पर पंचसितारा जिन्दगी जीनेवाले नेहरु की कांग्रेस ने उन्हें जेल की अँधेरी कालकोठरी में इतने लम्बे समय तक और कुछ इस तरह से बंद रखा कि आम आमआदमी की उम्मीद लोहिया की मौत के साथ ही उसी समय लम्बी बेहोशी में चली गयी.कितनी बड़ी बिडम्बना है कि कुछ इसी तरह का व्यवहार पाकिस्तान की सरकार ने प्रख्यात शायर फैज अहमद फैज के साथ किया और उनकी कैदी जिंदगी को पाकिस्तान ही नहीं भारत के बुद्धिजीवी भी श्रद्धा के साथ प्रतिवर्ष याद करते हैं लेकिन भारत में ठीक उसी तरह के सरकारी दमन के शिकार डा.लोहिया को उनके घोषित अनुयायियों ने भी भुला दिया है.तभी से लोक पर तंत्र हावी हो गया और लोकशाही सिर्फ नाम की रह गयी.बाद में इस सुधरे बाप की बिगड़ी बेटी इंदिरा ने इस अचेत की १९७५ में बेवजह आतंरिक आपातकाल लगाकर हत्या कर दी.

              मित्रों,तभी से हम इस मरे हुए लोकतंत्र को उसी तरह सीने से लगाए घूम रहे हैं जैसे बंदरिया अपने मृत बच्चे को कलेजे से चिपकाकर इस उम्मीद में घूमती रहती है कि कदाचित उसके ऐसा करने से उसका बच्चा जीवित हो जाए.लेकिन ५ जून की आधी रात को सोनियानीत कांग्रेस ने लोकतंत्र के पुनर्जीवित होने की सारी संभावनाओं पर तुषारापात करते हुए इसकी शवयात्रा ही निकाल दी.इस रात कथित रूप से दुनिया के सबसे बड़े (मेरे अनुसार सबसे बुरे) लोकतंत्र की राजधानी दिल्ली ने वही सब देखा जो १३ अप्रैल,१९१९ को जलियांवाला बाग़ ने देखा था.इस बार वायसराय भी अपना था और जनरल डायर भी.किससे करें शिकायत कहाँ जाकर रोयें;हाकिम के हम है मारे, काजी ने हमको लूटा.
                मित्रों,५ जून जो सम्पूर्ण क्रांति दिवस भी है;की आधी रात को नेहरु-इंदिरा के वारिशों के आदेश पर अचानक सत्ता ने एक साथ हजारों निहत्थे लोगों की अभिव्यक्ति और जीने के अधिकार पर हमला बोल दिया.अचानक आधी रात में रामलीला मैदान में बिना किसी पूर्व सूचना के निषेधाज्ञा लागू कर दी गयी.वहां बेखबर हो सो रहे हजारों अनशनकारियों पर जिनमें वृद्ध,महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे को बिना बाखबर किए बेरहमी से मारा-पीटा गया जिनमें से कई लोककल्याणकारी लोकतंत्र के हाथों शायद कालकवलित भी हो चुके हैं.अगर ऐसा नहीं है तो फिर सरकार बताए कि इस तालिबानी कार्रवाई के बाद लापता लोग कहाँ है?रहीम कवि ने १६वीं शताब्दी में ही ताकत के मद को सरल अभिव्यक्ति प्रदान करते हुए कहा था-कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाए;वा खाए बौराए नर वा पाए बौराए.गोया सत्ता की शराब का असर हर पार्टी पर होता है लेकिन कांग्रेस पर इसका असर कुछ ज्यादा ही होता है.कहने को तो यह दल हमेशा अपने आपको लोकतंत्र का सबसे बड़ा पैरोकार बताती रहती है लेकिन इसको हमेशा से अपने अलावा कोई और विचारधारा बर्दाश्त ही नहीं होती.ये लोग देश में चीन की तरह एकदलीय शासन की स्थापना करना चाहते हैं.विपक्षी पार्टी की राज्य सरकार के खिलाफ धारा ३५६ का दुरुपयोग कर सरकार गिराने का मंत्र इसे किसी और ने नहीं बल्कि खुद गाँधी के सर्वश्रेष्ठ शिष्य नेहरु ने केरल की नम्बूदरीपाद की सरकार को अपदस्थ कर दिया था.उसके बाद उनकी लाडली बिटिया के समय तो यह केंद्र सरकार के लिए रोजमर्रा का काम ही हो गया.
          मित्रों,कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व चाहता है कि लोग अपने मुंह पर टेप लगा लें और न तो कोई उसकी आलोचना करे और न ही शांतिपूर्ण तरीके से भी विरोध ही करे.कोई बोले भी तो सिर्फ उसके सुर में बोले.उसने बाबा रामदेव को अनशन करने से डंडे,आंसूगैस,आगजनी और गोलियों के बल तो रोका ही अब अन्ना को भी आँखें दिखा रही है.उसकी सरकार के सबसे बडबोले और बदतमीज मंत्री कपिल सिब्बल ने अन्ना को चेतावनी दी है कि वे जनता को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जागृत करने की कोशिश हरगिज न करें अन्यथा उन्हें भी रामदेव की तरह कुटाई का शिकार होना पड़ेगा और आप जानते हैं कि ये लोग ऐसा कर सकते हैं क्योंकि इनके पास शर्म नाम की चीज ही नहीं है.जब आदर्शवादी नेहरु ऐसा कर सकते हैं तो फिर सोनिया जी जो सत्ता नाम केवलम के बीजाक्षर मंत्र में अटूट विश्वास रखती हैं उनके लिए ऐसा करना कौन-सा मुश्किल है.आज के अघोषित आपातकाल के हालात को आप किस तरह से लेते हैं यह मैं नहीं जानता लेकिन मुझे तो परिस्थितियां फिर से १९७५-७७ वाली लग रही है.तब भी बापू के बंदरों ने सच बोलने,सुनने और देखने पर रोक लगा दी थी और आज भी ऐसा करके के प्रयास शुरू हो चुके हैं.अंतर सिर्फ इतना है कि इंदिरा ने सत्य का गला घोंटने के लिए प्रत्यक्ष रूप से देश में आपातकाल लगा दिया था और सोनिया परोक्ष रूप से ऐसा करने के प्रयास कर रही है.हे,लोकतंत्र की देवी इन लोगों को कभी क्षमा नहीं करना क्योंकि ये लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं.
मित्रों,भारतीय लोकतंत्र की स्थिति इसकी स्थापना के बाद से ही अत्यंत बिडम्बनापूर्ण रही है.जिस कांग्रेस पार्टी ने देश में लोकतान्त्रिक शासन की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई उसी ने लोकतंत्र को छठी से पहले ही मौत के मुंह में भी धकेल दिया.नेहरु युग में ही यह नवजात बीमार हो गया.लोहिया की रोज-रोज की नुक्ताचीनी से परेशान होकर सरकारी खर्चे पर पंचसितारा जिन्दगी जीनेवाले नेहरु की कांग्रेस ने उन्हें जेल की अँधेरी कालकोठरी में इतने लम्बे समय तक और कुछ इस तरह से बंद रखा कि आम आमआदमी की उम्मीद लोहिया की मौत के साथ ही उसी समय लम्बी बेहोशी में चली गयी.कितनी बड़ी बिडम्बना है कि कुछ इसी तरह का व्यवहार पाकिस्तान की सरकार ने प्रख्यात शायर फैज अहमद फैज के साथ किया और उनकी कैदी जिंदगी को पाकिस्तान ही नहीं भारत के बुद्धिजीवी भी श्रद्धा के साथ प्रतिवर्ष याद करते हैं लेकिन भारत में ठीक उसी तरह के सरकारी दमन के शिकार डा.लोहिया को उनके घोषित अनुयायियों ने भी भुला दिया है.तभी से लोक पर तंत्र हावी हो गया और लोकशाही सिर्फ नाम की रह गयी.बाद में इस सुधरे बाप की बिगड़ी बेटी इंदिरा ने इस अचेत की १९७५ में बेवजह आतंरिक आपातकाल लगाकर हत्या कर दी.
              मित्रों,तभी से हम इस मरे हुए लोकतंत्र को उसी तरह सीने से लगाए घूम रहे हैं जैसे बंदरिया अपने मृत बच्चे को कलेजे से चिपकाकर इस उम्मीद में घूमती रहती है कि कदाचित उसके ऐसा करने से उसका बच्चा जीवित हो जाए.लेकिन ५ जून की आधी रात को सोनियानीत कांग्रेस ने लोकतंत्र के पुनर्जीवित होने की सारी संभावनाओं पर तुषारापात करते हुए इसकी शवयात्रा ही निकाल दी.इस रात कथित रूप से दुनिया के सबसे बड़े (मेरे अनुसार सबसे बुरे) लोकतंत्र की राजधानी दिल्ली ने वही सब देखा जो १३ अप्रैल,१९१९ को जलियांवाला बाग़ ने देखा था.इस बार वायसराय भी अपना था और जनरल डायर भी.किससे करें शिकायत कहाँ जाकर रोयें;हाकिम के हम है मारे, काजी ने हमको लूटा.
                मित्रों,५ जून जो सम्पूर्ण क्रांति दिवस भी है;की आधी रात को नेहरु-इंदिरा के वारिशों के आदेश पर अचानक सत्ता ने एक साथ हजारों निहत्थे लोगों की अभिव्यक्ति और जीने के अधिकार पर हमला बोल दिया.अचानक आधी रात में रामलीला मैदान में बिना किसी पूर्व सूचना के निषेधाज्ञा लागू कर दी गयी.वहां बेखबर हो सो रहे हजारों अनशनकारियों पर जिनमें वृद्ध,महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे को बिना बाखबर किए बेरहमी से मारा-पीटा गया जिनमें से कई लोककल्याणकारी लोकतंत्र के हाथों शायद कालकवलित भी हो चुके हैं.अगर ऐसा नहीं है तो फिर सरकार बताए कि इस तालिबानी कार्रवाई के बाद लापता लोग कहाँ है?रहीम कवि ने १६वीं शताब्दी में ही ताकत के मद को सरल अभिव्यक्ति प्रदान करते हुए कहा था-कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाए;वा खाए बौराए नर वा पाए बौराए.गोया सत्ता की शराब का असर हर पार्टी पर होता है लेकिन कांग्रेस पर इसका असर कुछ ज्यादा ही होता है.कहने को तो यह दल हमेशा अपने आपको लोकतंत्र का सबसे बड़ा पैरोकार बताती रहती है लेकिन इसको हमेशा से अपने अलावा कोई और विचारधारा बर्दाश्त ही नहीं होती.ये लोग देश में चीन की तरह एकदलीय शासन की स्थापना करना चाहते हैं.विपक्षी पार्टी की राज्य सरकार के खिलाफ धारा ३५६ का दुरुपयोग कर सरकार गिराने का मंत्र इसे किसी और ने नहीं बल्कि खुद गाँधी के सर्वश्रेष्ठ शिष्य नेहरु ने केरल की नम्बूदरीपाद की सरकार को अपदस्थ कर दिया था.उसके बाद उनकी लाडली बिटिया के समय तो यह केंद्र सरकार के लिए रोजमर्रा का काम ही हो गया.
          मित्रों,कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व चाहता है कि लोग अपने मुंह पर टेप लगा लें और न तो कोई उसकी आलोचना करे और न ही शांतिपूर्ण तरीके से भी विरोध ही करे.कोई बोले भी तो सिर्फ उसके सुर में बोले.उसने बाबा रामदेव को अनशन करने से डंडे,आंसूगैस,आगजनी और गोलियों के बल तो रोका ही अब अन्ना को भी आँखें दिखा रही है.उसकी सरकार के सबसे बडबोले और बदतमीज मंत्री कपिल सिब्बल ने अन्ना को चेतावनी दी है कि वे जनता को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जागृत करने की कोशिश हरगिज न करें अन्यथा उन्हें भी रामदेव की तरह कुटाई का शिकार होना पड़ेगा और आप जानते हैं कि ये लोग ऐसा कर सकते हैं क्योंकि इनके पास शर्म नाम की चीज ही नहीं है.जब आदर्शवादी नेहरु ऐसा कर सकते हैं तो फिर सोनिया जी जो सत्ता नाम केवलम के बीजाक्षर मंत्र में अटूट विश्वास रखती हैं उनके लिए ऐसा करना कौन-सा मुश्किल है.आज के अघोषित आपातकाल के हालात को आप किस तरह से लेते हैं यह मैं नहीं जानता लेकिन मुझे तो परिस्थितियां फिर से १९७५-७७ वाली लग रही है.तब भी बापू के बंदरों ने सच बोलने,सुनने और देखने पर रोक लगा दी थी और आज भी ऐसा करके के प्रयास शुरू हो चुके हैं.अंतर सिर्फ इतना है कि इंदिरा ने सत्य का गला घोंटने के लिए प्रत्यक्ष रूप से देश में आपातकाल लगा दिया था और सोनिया परोक्ष रूप से ऐसा करने के प्रयास कर रही है.हे,लोकतंत्र की देवी इन लोगों को कभी क्षमा नहीं करना क्योंकि ये लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं.

शुक्रवार, 3 जून 2011

बाबा रामदेव की निंदा सूरज पर थूकने के समान


ramdev
मित्रों,हमारे गाँव में तरह-तरह के जीव निवास करते हैं,अजब भी और गजब भी.उन्हीं में से एक प्रजाति ऐसी है जिनके पास कोई काम ही नहीं है.अब जब काम नहीं है तो वो बेचारे करें तो क्या करें?इसलिए उन्होंने अपने जिम्मे छिद्रान्वेषण का काम ले लिया है.वे दुनिया की सबसे परेशान आत्माओं में से हैं और दिन-रात इसी चिंता में डूबे रहते हैं कि किसी और की धोती मेरे से ज्यादा उजली कैसे?कोई कितना भी अच्छा क्यों न हो ये लोग उसे नीचा दिखाने के लिए कोई-न-कोई सूटेबुल तर्क ढूंढ ही लेते हैं.
          मित्रों,कुछ ऐसा ही वर्तमान भारत ही नहीं विश्व के प्रखर योगी बाबा रामदेव के साथ हो रहा है.चूंकि वे एक हिन्दू संन्यासी हैं इसलिए उन पर हमले का अपना पहला अधिकार और कर्त्तव्य  मानते हुए सबसे पहले झूठे आरोप लगाए साम्यवादियों ने.कथित धर्मनिरपेक्षता के लाइलाज रोग से ग्रस्त इन लोगों ने अपना धर्मनिरपेक्ष कर्त्तव्य निभाते हुए बाबा पर इस बात का बेबुनियाद आरोप लगा दिया कि बाबा की आयुर्वेदिक दवाओं में मानव अंश मिलाया जाता है.कुछ दिनों तक के लिए सनसनी जरुर फ़ैल गयी लेकिन चूंकि झूठ के पांव नहीं होते बाद में वे हाथ-पैर और जीभ समेट कर बैठ गए.
        मित्रों,इसके बाद बारी थी कांग्रेस की जो भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबा के बलिदानी तेवरों से इस समय भी घबराई हुई है.उसने बाबा पर चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की आर्थिक मदद करने का आरोप लगाया.बाबा के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने इस आरोपों को स्वीकार भी किया.लेकिन क्या इस आरोप के सच सिद्ध हो जाने से बाबा द्वारा उठाए गए मुद्दे एकबारगी अप्रासंगिक या निरर्थक हो गए हैं?क्या टाटा-अम्बानी-बिरला जैसे लोगों का उद्देश्य पूर्णतया पवित्र है जिनकी इस भ्रष्टतम पार्टी से गहरी छनती है और जो इसके पार्टी फंड में हर साल करोड़ों रूपये देते हैं.वर्तमान केंद्र सरकार जो अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार भी है को हरानेवाली पार्टी की मदद करने वाले की गिनती मैं नहीं समझता कि किसी भी तरह देशद्रोहियों में की जानी चाहिए और वो भी सिर्फ इसी एक कारण से.इस समय जो भी देशभक्त हैं,जिनके मन में देश के प्रति थोड़ा-सा भी अनुराग है उन्हें इस सरकार को हटाने के प्रयास करने ही चाहिए;नहीं तो जब देश ही नहीं रहेगा तो कोई कैसे किसी को देशभक्त या देशद्रोही का ख़िताब दे पाएगा?
                मित्रों,एक बार हम सभी देशप्रेमी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार से धोखा खा चुके हैं.सरकार अन्ना हजारे और उनकी टीम तथा देश के साथ किए वादे से मुकर चुकी है.सरकार चाहती है कि अन्ना टीम लंगड़ा लोकपाल बिल पर राजी हो जाए और देश जैसे चल रहा है या यूं कहें कि लुट रहा है लुटता रहे.चूंकि बाबा रामदेव के अनुयायी करोड़ों में हैं इसलिए इस बार सरकार पहले से ही डरी हुई है और उन्हें अनशन पर बैठने से रोकने के लिए साम,दाम,दंड और भेद सभी हथियारों का जमकर इस्तेमाल कर रही है.बाबा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी समर्थन प्राप्त हुआ है और मैं नहीं मानता कि इसमें नो थैंक्स कहने की कोई जरुरत भी है.बाबा ने तो किसी को समर्थन के लिए बाध्य नहीं किया है.कांग्रेस क्या कम्युनिस्ट भी अगर बाबा का समर्थन करते हैं तो उन्हें ख़ुशी ही होगी.
          मित्रों,बाबा द्वारा उठाए गए मुद्दे गंभीर हैं,आरोपों में दम है;बाबा का चरित्र भी अब तलक धवल और निष्कलंक है फिर भी निंदा रस का अस्वादन करने की आदत से लाचार लोग उनकी निंदा में लगे हैं.मैं ऐसा कुत्सित प्रयास करनेवाले नेताओं के साथ-साथ अपने पत्रकार मित्रों से भी दंडवत निवेदन करता हूँ कि आप ऐसा करके इस पवित्र जनयुद्ध को कदापि कमजोर न करें.तेल देखिए और तेल की धार देखिए.अभी जब अनशन प्रारंभ भी नहीं हुआ तभी से क्रिया-प्रतिक्रिया व्यक्त करने की जल्दीबाजी बिलकुल न करें.एक तो कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ आगे आ नहीं रहा है और कोई अगर अपना सबकुछ दांव पर लगाकर इसकी हिम्मत कर भी रहा है तो बजाए उसे प्रोत्साहित करने के आप हतोत्साहित कर रहे हैं!यह न केवल निंदनीय कर्म है बल्कि अपराध भी है.जहाँ तक बाबा के राजनीतिक एजेंडा का सवाल है तो अभी तक तो बाबा ने इसका खंडन ही किया है फिर आप क्यों जबरदस्ती यह आरोप उनके मत्थे मढ़ने पर तुले हैं?

बुधवार, 1 जून 2011

शादी का लड्डू खाया क्या

shadi ka laddu
मित्रों,पछताना हम नौजवानों की नियति में ही लिखा है.जिन्होंने शादी का लड्डू चाभ लिया है वे भी पछता रहे हैं और जिन्हें अभी इसका स्वाद नहीं चखा है वे भी पछ्ता रहे हैं.हममें से कुछ लोग अपवाद भी होंगे जिन्होंने इस लड्डू का स्वाद भी ले लिया है फिर भी मजे में हैं.इस समय मैं भी भयभीत और आशंकित हूँ.असल में बात यह है कि इसी १२ तारीख को मेरी शादी होने जा रही है.मैं अब तक इस क़यामत के दिन को टालता आ रहा था लेकिन क्या करूँ फिर भी वह दिन आ ही गया.
         मित्रों,सबकुछ पास में होते हुए भी मुझे अपने में कोई कमी-सी लग रही थी.लगता था जैसे मैं अधूरा हूँ.ऐसा भी नहीं है कि मेरी अब तक की जिंदगी पूरी तरह से इस खूबसूरत मामले में घटनाहीन हो.परन्तु फिर भी मैं अबसे पहले पूर्ण नहीं हो सका क्योंकि जिसको चाहा उसे अपना न सके;जो मिला उससे मुहब्बत न हुई.आजकल मेरे मन में अपने भावी जीवनसाथी के लिए प्यार का प्रशांत महासागर हिलोरें मार रहा है.यद्यपि कुछ साथियों की सलाह है कि कंट्रोल ब्रज कंट्रोल नहीं तो शादी का लड्डू कड़वे में बदल जाएगा.दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि पत्नी के दिल को प्रेम और सच्चाई से ही जीता जा सकता है.
           मित्रों,किसकी बात मानूँ और किसकी नहीं बड़ी विकट समस्या है.इसलिए मैंने अपने दिल की बात मानने का फैसला किया है.दिल तो बच्चा है जी इसलिए हो सकता है कि यह कुछ गलतियाँ कर जाए.मैंने फैसला किया है कि प्रेम और विश्वास हमारे दाम्पत्य जीवन की नींव होंगे और सादगी उसकी दीवारें.सत्य उसकी छत होती औ उसमें सामंजस्य की खिड़कियाँ लगी होंगी.हम दोनों में से सिर्फ एक को ही एक बार में नाराज होने की अनुमति होगी.एक जब क्रोधित होगा तो दूसरे को चुप्पी साध लेनी होगी.हम एक-दूसरे के प्रति अतिसंवेदनशील होंगे.जब एक को चोट लगेगी तो दर्द दूसरे को भी होगा.मैं नहीं मानता कि हमारा जीवन फूलों की सेज साबित होने जा रहा है.जब यह चमत्कार अबतक नहीं हुआ तो आगे ऐसा होने की उम्मीद ही क्यों करूँ?लेकिन अब मुझे न तो रास्ते की चिंता है और न ही मंजिल की.रास्ता चाहे कितना भी लम्बा और पथरीला हो;मंजिल चाहे जितनी भी दूर हो जब दो लोग साथ-साथ चलते हैं तब थकान खुद-ब-खुद ऊर्जा में बदल जाती है.हमारे बीच मतभेद भी होंगे लेकिन मनभेद नहीं होगा.हम दोनों एक-दूसरे के प्रतियोगी नहीं होंगे वरन पूरक होंगे.कोई भी निर्णय उसका या मेरा नहीं होगा अपितु सारे निर्णय हमारे होंगे.
          मित्रों,मैं नहीं जानता और न ही यह जानना ही चाहता हूँ कि मेरे मित्रों में से जो मित्र विवाहित हैं उनका अनुभव कैसा रहा है.हो सकता है कि मेरा वैवाहिक जीवन ठीक वैसा नहीं हो जैसा कि मैंने सोंच रखा है लेकिन उसके ज्यादा-से-ज्यादा निकट जरूर होगा,ऐसा मेरा अटूट विश्वास है.आखिर सबकुछ सिर्फ मुझ पर ही तो निर्भर नहीं करेगा.आगे मेरी आराध्य भगवती दुर्गा की मर्जी जिनसे मैंने सिवाय इस बात के कभी कुछ नहीं मांगा-पत्नीं मनोरमाम देहि मनोवृत्तानुसारिणिम;तारिणीमदुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम.