बुधवार, 21 मार्च 2012

क्या समलैंगिक हैं श्याम बेनेगल?

मित्रों, श्याम बेनेगल हमारे देश का एक ऐसा नाम है जिसके कान में पड़ते ही हमारे दिमाग में एक ऐसे क्रान्तिकारी संस्कृतिकर्मी की छवि बनने लगती है जिसने भारतीय सिनेमा की दशा और दिशा  को ही बदल कर रख दिया. अंकुर, निशांत, मंथन, भूमिका, देव जैसी दर्जनों फ़िल्में उनकी अद्भुत और बेजोड़ रचनात्मकता की गवाही देते से प्रतीत होते हैं. श्याम बाबू उन गिने-चुने भारतीय फिल्मकारों में से हैं जो सिर्फ पैसा कमाने के लिए फ़िल्में नहीं बनाते बल्कि समाज को सार्थक सन्देश देने के लिए भी फिल्मों का निर्माण करते हैं.
               मित्रों, समाज अगर कुमार्ग पर अग्रसर हो तो उसका विरोध प्रत्येक समकालीन प्रबुद्ध व्यक्ति का धर्म बन जाता है और उसको उसे सही दिशा में अग्रसारित करने का भागीरथ प्रयास करना ही चाहिए. परन्तु हमारे श्याम बाबू पर ७७ साल की पकी उम्र में इन दिनों कुछ ज्यादा ही क्रान्तिकारी दिखने का जूनून सवार हो गया है. जनाब निरा भोगवाद और उपभोक्तावाद की उपज समलैंगिकता के प्रबल समर्थक बनकर देश के समक्ष आ खड़े हुए हैं. श्रीमान का मानना है कि भारतीय दंड संहिता की धारा ३७७ को समाप्त कर देना चाहिए जिससे भारतीय समाज में समलैंगिकता को वैधानिक दर्जा प्राप्त हो सके. अब यह तो श्याम बाबू को ही बेहतर पता होता कि मानव-देह की प्रकृति के विरूद्ध एक नवाचार प्रचलित करके वे समाज को कौन-से सन्मार्ग पर ले जाना चाहते हैं. हो सकता है कि वे खुद भी समलैंगिक हों हालाँकि उन्होंने इसकी कभी स्पष्ट घोषणा नहीं की है. लेकिन अगर वे समलैंगिक नहीं हैं तो फिर और दूसरा कौन-सा कारण हो सकता है उनके द्वारा समलैंगिकता का खुला समर्थन करने के पीछे? मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आ रहा है और आने वाला है भी नहीं जब तक वे स्वयं आगे आकर स्थिति को स्पष्ट नहीं कर देते.
                मित्रों, मैं अपने पहले के आलेखों में भी लिख चुका हूँ कि चूंकि समलैंगिक आचरण प्रजनन की दृष्टि से अनुत्पादक और प्रकृति के नियमों के विरूद्ध है इसलिए निषिद्ध कर्म है और इसे निषिद्ध कर्मों की श्रेणी में ही रहने देना चाहिए तथापि हमारी केंद्र सरकार इस एड्स प्रसारक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने और कानूनी मान्यता देने को उतावली हुई जा रही है. पता नहीं क्यों; क्योंकि खुद उसके द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पेश आंकड़े ही बता रहे हैं कि देश में समलैंगिकों की आबादी काफी कम है, आटे में नमक जितना से भी कम इसलिए वे निर्णायक वोटबैंक बनने से तो रहे. हाँ, अगर सोनिया गाँधी भारतीय संस्कृति को इटालियन संस्कृति में कायांतरित करना चाहती हों तो बात दूसरी है. वैसे उनसे पहले उनके कई सांस्कृतिक पूर्वज कैनिंग, मैकाले आदि भी भारतीय सस्कृति को विकृत करने का असफल प्रयास करके अपने गौड को प्यारे हो चुके हैं. आप भी करिए; स्वप्न देखने और कोशिश करने में क्या जाता है? आपको भी श्याम बेनेगल जैसे और भी जरखरीद गुलाम मिल जाएँगे जो पद और प्रतिष्ठा के लालच में आपके जैसा आचरण करना तो क्या आपकी तरह सोंचने को भी तैयार हो जाएँगे और फिर भी देशवासियों के बीच कथित क्रान्तिकारी कहे जाएँगे.
           मित्रों, मैं श्याम बेनेगल जी से विनती करना चाहूँगा कि और भी सामाजिक मुद्दे हैं भारत में. अपने चारों तरफ सिर घुमाकर तो देखिए भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, निर्धनता, जनसंख्या-विस्फोट, मादक पदार्थों का दुरुपयोग, बालश्रम, विकलांगता, कालाधन, भिक्षावृत्ति, वृद्धावस्था, जनस्वास्थ्य, आत्महत्या, मानसिक रोग, बाल अपराध, एड्स, दहेज़-प्रथा, मानवाधिकार-हनन, खाद्य-सुरक्षा और कुपोषण, जातीयता, साम्प्रदायिकता और छद्म धर्मनिरपेक्षता, जनजातीय समस्याएँ, आतंकवाद और उग्रवाद, शिक्षा की दुर्गति, पर्यावरण-विनाश, आवास की कमी, मानव-व्यापार और देह-व्यापार, महंगाई जैसी अनगिनत ऐसी सामाजिक समस्याएँ हैं जिनसे देश की जनता को रोजाना रूबरू होना पड़ता है. कृपया अपनी राज्यसभा सदस्यता का लाभ उठाईये और इन मुद्दों की ओर केंद्र सरकार का ध्यान आकर्षित कीजिए. याद रखिए सिर्फ समाज का अंधा विरोध करना क्रांतिकारिता नहीं है बल्कि समाज को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना क्रांतिकारिता है और अगर किसी मुद्दे पर समाज पहले से ही सही रास्ते पर चल रहा हो तो उसे प्रोत्साहित करना भी क्रांतिकारिता है न कि उसे अपने निजी हित के लिए जानबूझ कर पथभ्रष्ट कर देना.

शनिवार, 17 मार्च 2012

बन्दर के हाथ का नारियल है बजट

मित्रों, कहते हैं कि दुर्भाग्यवश एक बार किसी बन्दर के हाथ नारियल पड़ गया. बन्दर ने उससे पहले नारियल को न देखा और न सुना था इसलिए जबरदस्त फेरे में पड़ गया. इसका वो करे तो क्या करे? कभी हवा में उछालता तो कभी जमीन पर पटकता तो कभी दाँत से काट खाने की असफल कोशिश करता. इस प्रकार उसने उसकी ऐसी-तैसी करके रख दी.
  मित्रों, कुछ ऐसा ही व्यवहार हमारे वित्त मंत्री ने २०१२-१३ के बजट के साथ भी किया है. कुल मिलाकर यह बजट बेकार की कवायद है, अकारण की गयी कसरत है. अगर अर्थव्यवस्था की रफ़्तार धीमी पड़ रही थी तो उसकी चाल को दुलकी से सरपट करने के लिए कृषि और औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाने का उपाय किया जाना चाहिए था. कृषकों को ज्यादा कर्ज दे देने मात्र से अगर कृषि-उत्पादन को बढ़ना होता तब तो वित्तीय-वर्ष २०११-१२ में भी उसे आकाश छूना चाहिए था न कि गोता खाना. साथ ही वित्त मंत्री मात्र १००० करोड़ रूपये में दूसरी हरित क्रांति देखना चाह रहे हैं. इसे ही तो कहते हैं तेलों न लागे पूड़ियो पाके. इस अद्भुत चेष्टा की तुलना हम पागलखाने से भाग निकले उस पागल की करतूत से कर सकते हैं जो सोंचता है कि १०००-२००० रूपये का नमक डालकर वह पूरी दुनिया की नदियों को खारा कर देगा.
                  मित्रों, कुछ इसी तरह बजट में डूबते हुए औद्योगिक क्षेत्र को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है उल्टे सेवा कर और उत्पाद कर को बढाकर सिर्फ औद्योगिक क्षेत्र ही नहीं बल्कि सेवा-क्षेत्र की भी राहें मुश्किल कर दी गयी हैं. अब आप भी सोंच सकते हैं कि जब कृषि और औद्योगिक उत्पादन बढेगा नहीं तो सिर्फ लंगड़ाते हुए सेवा-क्षेत्र की बदौलत सरकार और जनता की आमदनी कहाँ से बढ़ेगी और जीडीपी का ग्राफ ऊपर कैसे चढ़ेगा; वो तो नीचे ही जाएगा न? कालेधन पर मौजूदा सत्र में श्वेत-पत्र लाने की बात बजट में जरूर कही गयी हैं लेकिन भ्रष्टाचार और कालेधन को लेकर अबतक सरकार का जो रवैय्या रहा है उसे देखते हुए हमें यह उम्मीद बिलकुल भी नहीं करनी चाहिए कि सरकार इस पत्र में खाताधारकों के नाम उजागर करेगी या फिर उसे देश में वापस लाने का दिखावटी प्रयास भी करेगी. अंत में जब वित्त मंत्री को पूर्वोल्लेखित बन्दर की तरह उत्पादन-वृद्धि और आय-वृद्धि का कोई उपाय नहीं सूझा तो वे शरारत पर उतर आए और उन्होंने महंगाई से पहले से ही बेहाल हो रही जनता को और भी परेशान करने की ठान ली. शायद ५ राज्यों के निराशाजनक चुनाव परिणाम का बदला लेना चाहते हों. इस बजट से महंगाई तो शर्तिया तौर पर बढ़ेगी ही जनता को अपनी फटी जेब में से ज्यादा कर भी अदा करना पड़ेगा. आयकर स्लॉट का पुनर्निर्धारण तो इतनी बेवकूफी से उन्होंने किया है कि देखकर पागल का भी दिमाग चकरा जाए. कम आमदनी वालों को कम राहत और ८ लाख से १० लाख सालाना के बीच कमानेवालों को भारी कर-छूट. वाह-वाह!! आम आदमी की सरकार के वित्त मंत्री ने क्या दिमाग पाया और लगाया है? गरीबों पर महंगाई के कोड़े और अमीरों को सौगात. पहले रेल बजट और अब यह आम बजट;आम जनता तो धन्य हुई जा रही है.
               मित्रों, कुल मिलाकर वित्त वर्ष २०१२-१३ में आपको ज्यादा कर तो चुकाना पड़ेगा ही उस पर सरकार यह भी सोंच रही है कि ऐसा होने पर हम यानि आम जनता ज्यादा पैसे बचा पाने की स्थिति में होंगे. शायद इसलिए बचत-खाता में बचत को प्रोत्साहित करने के लिए १०००० रूपये तक के ब्याज को करमुक्त कर दिया गया है. सरकार का मतलब तो आप समझ ही गए होंगे जो ज्यादा-से-ज्यादा मिर्ची खिलाकर जबरन हमें मिठास का अहसास करवाना चाहती है. इस तरह के बजट पेश करने से तो अच्छा था कि बजट पेश ही नहीं किया गया होता. कम-से-कम हमारी जेबों पर बेवजह का बोझ तो नहीं बढ़ता. यहाँ मैंने इसे बेवजह का बोझ इसलिए कहा है क्योंकि हमारी जेबों से जो पैसे सरकार निकालने जा रही है उससे देश की अर्थव्यवस्था में वह कैसे सुधार लाएगी, का विजन बजट में है ही नहीं. बस एक लक्ष्य रख दिया गया है कि हमें ७.६ प्रतिशत की विकास-दर प्राप्त करनी है मगर यह चमत्कार होगा कैसे; का उत्तर दिया ही नहीं गया है. वास्तव में प्रणव मुखर्जी बजट द्वारा बैक गेयर लगाकर देश को आगे ले जाना चाहते हैं और शायद डार्विन के इस सिद्धांत को भी सही साबित करना चाहते हैं कि सारे मानवों की तरह वो भी बंदरों की संतान हैं.

गुरुवार, 15 मार्च 2012

भीड़ का न्याय,कहाँ तक उचित

मित्रों, भारतीय संविधान में कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका तीनों के कार्यों का स्पष्ट बंटवारा किया गया है.इनमें से कानून और व्यवस्था को बनाए रखना कार्यपालिका की जिम्मेदारी है.लेकिन जब कार्यपालिका पूरी तरह से बेकार और निष्क्रिय को जाए तो? तब जनता करे तो क्या करे? क्या उसे हाथ-पर-हाथ रखकर, दरवाजे-खिड़कियाँ बंद कर यह सोंचते हुए संतोष कर लेना चाहिए कि अगर वह सपरिवार सही-सलामत है तो फिर सबकुछ ठीक-ठाक है या उसे भी क्रूर और कातिल भीड़ का हिस्सा बनकर वही सब करना चाहिए जो इन दिनों बिहार की मजबूर जनता कर रही है?
           मित्रों, भीड़ द्वारा कानून को अपने हाथों में लेने की पहली घटना घटी है बेगूसराय जिले के तेघरा में ९ मार्च को. रंगों के त्यौहार होली के दिन यहाँ जमकर खून की होली खेली गयी. कई दर्जन आपराधिक घटनाओं को अंजाम दे चुका और क्षेत्र में आतंक का पर्याय बन चुका बंटी सिंह कुछ ही दिन पहले जेल से छूटकर आया था और जबसे गाँव में वापस आया था लगातार रंगदारी भरा व्यवहार करता आ रहा था. ग्रामीणों ने पुलिस से इसकी शिकायत भी की लेकिन सब बेकार. पुलिस झाँकने तक नहीं आई. अंततः आजिज और पुलिस से निराश होकर जनता ने कानून को अपने हाथों में ले लिया और बंटी सिंह को पीटते-पीटते मार डाला. फिर भी जी नहीं भरा तो भीड़ में से ही किसी ने मरे हुए बंटी को गोली भी मार दी. कुछ इसी तरह की दूसरी घटना घटी लगातार दूसरे ही दिन यानि १० मार्च को समस्तीपुर जिले में. हुआ यह कि समस्तीपुर के लोकप्रिय सीपीएम नेता सुरेन्द्र यादव की इसी साल ९ जनवरी को हुई हत्या का आरोपी मिंटू पासवान अपने दो साथियों के साथ वारदात के एकमात्र चश्मदीद गवाह और श्री यादव के समर्थक कुंदन पासवान की हत्या करने दलसिंगसराय थाने में स्थित उसके गाँव बगरा और उसके घर तक पहुँच गया. इलाके में शार्प शूटर के रूप में कुख्यात मिंटू को कुंदन तक पहुँचने से कुंदन की माँ जादो देवी और भाई ललन ने रोकने की कोशिश की तो उसने दोनों को गोली मार दी जिससे दोनों की तत्काल मौत हो गयी. परन्तु उसके बाद दर्जनों जघन्य आपराधिक घटनाओं को अंजाम दे चुका दुर्दांत अपराधी मिंटू भीड़ के हत्थे चढ़ गया और पुलिस की मौजूदगी में पीट-पीट कर मार डाला गया. सनद रहे कि बाद में जब मिंटू की पिटाई जारी थी तब पुलिस भी घटनास्थल पर पहुँच गयी थी.लोगों में उसके प्रति गुस्सा इतना ज्यादा था कि लोग मरने के बाद भी उस पर बेतहाशा लाठियां चलाते रहे.
               मित्रों, सामान्य स्थिति में किसी भी दृष्टिकोण से भीड़ द्वारा कानून को अपने हाथों में लेकर तत्काल फैसला करते हुए कथित अपराधी को मृत्युदंड दे देना उचित नहीं माना जा सकता परन्तु प्रश्न यह भी उठता है कि ऐसी नौबत आने ही क्यों दी जाती है? अगर राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति इतनी ही सराहनीय और संतोषजनक है तो फिर इस तरह की घटनाएँ क्यों घटित हो रही हैं? जो हाथ रोजी-रोटी कमाने के लिए प्रयुक्त होने चाहिए उन हाथों को क्यों बाध्य होना पड़ रहा है जानबूझकर व पूरे होशोहवास में मानव-रक्त बहाने को? अगर पुलिस-प्रशासन सुरक्षा देने में विफल रहता है तो क्या जनता को आत्मरक्षा का अधिकार नहीं है? परन्तु अगर हम जैसे को तैसा की नीति पर चलने लगेंगे तो हमारे और तालिबानी समाज में क्या कोई अंतर रह जाएगा? यह सही है कि पुलिस ने सक्रियता दिखाई होती तो भीड़ को इंसाफ करके सजा देने की जरूरत ही नहीं पड़ती. इन दोनों घटनाओं में से पहली में ग्रामीणों ने पुलिस को सूचित तो किया ही था दूसरी घटना में तो हत्या के समय पुलिस घटनास्थल पर मौजूद भी थी फिर पुलिस ने भीड़ को हत्या जैसा जघन्य अपराध करने से क्यों नहीं रोका? क्या यह उसके काहिलीपन की इन्तहां नहीं है? फिर क्या जरूरत है ऐसी सुरक्षा एजेंसी की? यहाँ मैं आपको यह बता दूं कि ९ जनवरी को सुरेन्द्र यादव की हत्या होने से पहले ऐसी ख़ुफ़िया सूचनाएं भी पुलिस को दी गयी थीं कि उनकी जान को खतरा है फिर क्यों उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी गयी और बाद में हत्या के एकमात्र चश्मदीद गवाह कुंदन पासवान की सुरक्षा को क्यों रामभरोसे छोड़ दिया गया? सुरेन्द्र के साथ-साथ कुंदन की माँ और भाई की हत्या के लिए क्या पुलिस की लापरवाही भी जिम्मेदार नहीं है? प्रश्न यह भी उठता है कि अगर इसी तरह गवाहों पर हमले होते रहे तो कोई क्यों कानून की मदद करने का जोखिम उठाएगा?
                    मित्रों, इन दोनों ताजा घटनाओं के आलोक में बिहार में पुलिस-प्रशासन को लेकर सैंकड़ों सवाल जनता के दिमाग में तैर रहे हैं परन्तु उत्तर नदारद है. इनके उत्तर देगा कौन? कायदे से तो राज्य की कार्यपालिका के वास्तविक मुखिया नीतीश कुमार जी को आगे आकर जवाब देना चाहिए परन्तु क्या वे ऐसा करेंगे या फिर एक बार फिर सच्चाई से नजरें चुराते हुए चलता है सोंचकर सबकुछ वक़्त पर छोड़कर या जनता की कमजोर याददाश्त पर अटल विश्वास करके निरुत्तर ही छोड़ देंगे? जवाब तो बिहार से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचारपत्रों को भी देना चाहिए कि क्या कारण है कि ये दोनों इतनी बड़ी ख़बरें होली के अवकाश के तत्काल बाद प्रकाशित ११ मार्च के अंक और बाद के अंकों से पूरी तरह गायब से थीं और अब तक भी गायब क्यों हैं?

गुरुवार, 8 मार्च 2012

पियक्कड़ई का त्योहार बनती होली

मित्रों,आपने भी किताबों में पढ़ा होगा कि होली उल्लास और सद्भाव का या फिर असत पर सत की विजय का पर्व है परन्तु आपने यह भी पाया होगा कि किताबों में लिखी बातें अक्सर सच्चाई के धरातल पर गलत निकलती हैं.यह बड़ा ही दुखद है कि आज उल्लास और सद्भाव का त्योहार होली पियक्कड़ई का पर्याय बनकर रह गयी है.अक्सर हमारे किशोर और युवा होली के नाम पर इस दिन इस नामाकुल शराब को मुँह से लगा लेते हैं और फिर यह इस तरह उनके गले पड़ जाती है कि पूरा जीवन कब नशे में बीत जाता है पता ही नहीं चलता.होली में पहले भी नशा किया जाता था लेकिन पहले नशेड़ियों की संख्या काफी कम थी और नशे के नाम पर लोग इस दिन सिर्फ भांग पीते थे.नुकसानदेह तो भांग भी था लेकिन सिर्फ पीनेवाले की सेहत के लिए परन्तु शराब तो पूरे समाज के लिए ही हानिकारक होता है.लोग भांग खाते और फिर चुपचाप घर जाकर सो जाते थे.भांग मुफ्त में उपलब्ध होता था जबकि शराब के लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं, किसी को अपनी बीवी के जेवर बेचने पड़ते हैं तो कोई इसके लिए अपने घर-बार तक को बेच डालता है.
           मित्रों,दरअसल होली के नाम पर पहली बार शराब पीने वाला पहली बार तो पीता है लेकिन आखिरी बार नहीं.फिर तो वो नशे में क्या-क्या कर डालता है उसे खुद भी इसकी खबर नहीं होती.कई साल हुए तब मैं कटिहार रहा करता था जहाँ मेरी केले की खेती होती थी.मेरे दलान के पास का ही एक मुसहर रोजाना महुआ की घर में बनी शराब पीता और मेरे दलान के पास से जब भी गुजरता मुझे गालियाँ देता हुआ गुजरता.फिर अपने घर में जाकर मार-पीट करता.दो-चार दिनों के बाद जब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो एक दिन सुबह-सुबह मैं उसके घर पर जा पहुंचा और बुलाकर पूछा कि तुम चाहते क्या हो?क्या अपने हाथ-पैर तुडवाना चाहते हो तो वो बोला कि भैया मैंने किया क्या है?मैंने कहा तू रोज शाम में मुझे गालियाँ क्यों देता है तब उसने अद्भुत जवाब दिया कि वो तो शराब गाली देती है मैं नहीं देता और मेरे पैरों पर गिर गया.मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं इसका क्या करूँ लेकिन एक अच्छी बात यह हुई कि उस दिन के बाद उसने मुझे गालियाँ देना बंद कर दिया लेकिन उसने घर में चूल्हे तोड़ देना और रोजाना बीवी-बच्चों की पिटाई करना बंद नहीं किया.उसके घर में भुखमरी की स्थिति थी लेकिन ये शराब तो चीज ही ऐसी है जो मरे को भी मारती है.
           मित्रों,आप अक्सर कुछ घिनौनी टाईप की ख़बरें पढ़ते होंगे कि बाप ने बेटी के साथ बलात्कार किया या ससुर के बहू के साथ अनैतिक सम्बन्ध थे.इन सब के लिए वह आदमी कतई दोषी नहीं होता.मैं नहीं मानता कि कोई भी इंसान मूल रूप से इतना गिरा हुआ हो सकता है कि अपने पूरे होशोहवास में ऐसे नीच कर्म करे.मेरा मानव और मानवता में पूरा विश्वास है.ऐसे कर्म वह करता नहीं है बल्कि उससे ऐसे कुकर्म करवाती है यह शराब.अगर आप ३० से ऊपर के हैं और अगर आप होली के वर्तमान और इसके इतिहास पर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि होली क्या थी और क्या होकर रह गयी है.पहले जहाँ यह वैर मिटानेवाला पावन-सामाजिक त्योहार थी अब झगडा बढानेवाली पर्व बन गयी है.कई जगहों पर होली के दिन हिंसा की, आगजनी की घटनाएँ होती हैं जो इस त्यौहार की प्रकृति के ही प्रतिकूल है.गांवों-कस्बों में अब दरवाजों पर घूम-घूमकर होली गाने का रिवाज समाप्त होने लगा है.शरीफ लोग शराबियों के या उनकी टोली के पीछे पड़ने के डर से घर से निकलते ही नहीं हैं.सरकार की आबकारी-नीति भी दोगली है.एक तरफ तो उसने गाँव-गाँव और चौराहे-चौराहे पर शराब की दुकानें खोल रखी है तो दूसरी ओर होली पर शराब पीकर लोग हुड्गंद नहीं करें इसके लिए पुलिस को भी अलर्ट पर रखती है.यानि वो चाहती है कि लोग शराब तो पीएँ लेकिन हुडदंग नहीं करें.परन्तु उन युवाओं का क्या जो होली के दिन सिर्फ चखने के नाम पर पहली बार शराब पीते हैं और फिर आपने ही हाथों अपनी जिंदगी को ही तबाह कर लेते हैं.इसलिए सरकार को चाहिए कि वो शराब की बिक्री और निर्माण को पूरी तरह से बंद करे.सेना के जवानों को भी तभी शराब दी जाए जब वो कश्मीरादि अतिशीतल इलाकों में तैनात हों.जब वे छुट्टी पर हों तब उन्हें शराब नहीं दी जाए वरना वे गाँव में शराब-संस्कृति को बढ़ाते जाएंगे.माना कि इससे सरकार को राजस्व का नुकसान होगा लेकिन वो इतना ज्यादा नहीं होगा जितना आज युवा-शक्ति के शराब पीकर दिग्भ्रमित होने से हो रहा है.साथ ही मैं समाज और देश के सभी जिम्मेदार नागरिकों से यह अपील भी करता हूँ कि वे होली को केवल उल्लास और सद्भाव का त्योहार रहने दें पियक्कड़ों का त्योहार नहीं बनाएँ.पहली और अंतिम बार पीने की भी नहीं सोंचें क्योंकि शराब चीज ही ऐसी है जो एक बार मुँह से लग जाए तो न छोड़ी जाए,ये मीठी जहर के जैसी है न छोड़ी जाए.अंत में सभी भारतवासियों को होली मुबारक.

रविवार, 4 मार्च 2012

बेलगाम नौकरशाही के आगे लाचार नीतीश

मित्रों,इन दिनों भारतीय लोकतंत्र में एक अजीब तरह की प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है.हमारे राजनेता बेलगाम नौकरशाही पर नियंत्रण नहीं लगा पा रहे हैं और लाचारी का रोना रो रहे हैं.हमारे प्रधानमंत्री की लाचारी का तो कहना ही क्या?वे तो मजबूरों के सरदार ठहरे.उनकी तो उनके सहयोगी मंत्री ही नहीं सुनते तो नौकरशाह क्यों सुनेंगे?बेचारे बार-बार बहादुरशाह जफ़र की तरह अपनी लाचारी और बेचारगी का रोना रोते रहते हैं.ऐसे घोर अंध तमस के वातावरण में प्रशासनिक सुधार के दिनकर बनकर देश के राजनैतिक क्षितिज पर उभरे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार.पहले सूचना के अधिकार कानून को कमजोर किया फिर नौकरशाही पर कथित लगाम लगाने के लिए सेवा का अधिकार कानून और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम लेकर आए.जनता और विपक्ष तो लगातार विभिन्न मंचों से नौकरशाही की मनमानी का सवाल उठाती रही है.लेकिन कल तमाम उपायों के बावजूद ऐसा कर पाने में असफल रहे नीतीश कुमार ने भी मान लिया कि उनके मातहत अफसर उनकी सुनते ही नहीं हैं.जबकि अगर न्यायालय या चुनाव आयोग का आदेश हो तो आज्ञापालन के लिए अतिसक्रिय हो उठते है.
                मित्रों,ऐसा हो भी क्यों नहीं?इसका तो सीधा मतलब हुआ कि भय बिनु होहिं न प्रीति और नौकरशाह सरकार से डरते नहीं हैं इसलिए सरकारी आदेशों को नजरंदाज कर जाते हैं.एक बार ऐसा हुआ कि बादशाह अकबर ने बीरबल से कहा कि देखो बीरबल हमारी प्रजा कितनी ईमानदार है,कहीं कोई भ्रष्टाचार नहीं.बीरबल ने सीधे-सीधे कोई उत्तर नहीं देते हुए बादशाह से एक तालाब खुदवाने को कहा और आदेश जारी करवाया कि चूंकि राज्य को बहुत अधिक मात्रा में दूध की आवश्यकता है इसलिए राज्य के सभी निवासी अमावस्या की रात में आएं और एक-एक लोटा दूध तालाब में डालें.सुबह जब अमावस्या के कल होकर अकबर और बीरबल तालाब के पास पहुंचे तो पाया कि तालाब में तो सिर्फ पानी-ही-पानी है दूध है लेकिन बहुत कम,न के बराबर.कहने का तात्पर्य यह कि प्रत्येक युग में बेईमानों की संख्या ईमानदारों से अधिक रही है.अकबर के समय शासन कठोर और दंड-विधान कड़े थे इसलिए लोग मजबूरन ईमानदार थे.आज शासन लचर है,न्यायपालिका लेटलतीफ है और दंड-विधान ढीले-ढाले हैं इसलिए हर कोई जहाँ देखिए;क्या जनता और क्या नौकरशाह;अपनी मनमर्जी चला रहे हैं.चूँकि कोर्ट और चुनाव आयोग के आदेशों की अवहेलना करने पर तत्काल दंडित होने का भय होता है इसलिए तब नौकरशाही सुस्ती के बजाए चुस्ती बरतती है.
             मित्रों,अफसरशाही में कैसे भय का संचार हो यह निर्धारित करना नीतीश कुमार जी का काम है.जनता ने उन्हें अपार बहुमत के साथ राजदंड सौंपा है.इसका कैसे सदुपयोग करना है इसका निर्णय तो उन्हें खुद ही लेना है.नौकरशाही अगर शेर है तो नीतीश कुमार रिंग मास्टर है.अगर रिंग मास्टर शेर के आगे लाचारी दिखाएगा तो या तो उसकी जान ही चली जाएगी और अगर बच भी गयी तो नौकरी तो जाएगी ही.इसलिए मनमोहन सिंह की तरह नीतीश जी विधवा-विलाप बंद करें और शासन में कठोरता लाएँ.नौकरशाही जहाँ भी सुस्ती बरते उस पर शीघ्रतापूर्वक अनुशासनात्मक कार्रवाई करें और कठोरतापूर्वक केवल गुण-दोष के आधार पर पूरी तरह से निष्पक्ष होकर दण्डित करें.जनता को उनका रोदन नहीं बल्कि सिंह-गर्जना चाहिए जिसे सुनकर भ्रष्ट-से-भ्रष्ट और आलसी-से-आलसी अधिकारी-कर्मचारी भी भयभीत हो जाएँ, सुधर जाएँ और कार्यशील हो जाएँ.उन्हें चाहिए कि जब भी वे किसी नौकरशाह को कोई आदेश दें तो अनुपालन के लिए एक समय-सीमा निर्धारित कर दें और अगर उस निश्चित समय-सीमा में आदेश का पालन नहीं हो पाता है तो सम्बंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करें,चुनाव आयोग और न्यायालय भी तो यही करते हैं.हो सके तो ऐसा करने का अधिकार प्राप्त करने के लिए नया कानून भी बनाया जाए.

अस्मत की कीमत ८०००० रूपया

मित्रों,बचपन में प्रेमचंद की एक कहानी पढ़ी थी पञ्च परमेश्वर जिसमें जुम्मन शेख अपने पूर्व मित्र अलगू चौधरी के साथ अपनी सारी दुश्मनी को भूलकर न्याय का साथ देता है.लेकिन बड़ा होकर पाया कि पञ्च तो सिर्फ बेईमान और दुष्ट होते हैं और जब ईन्सान भी नहीं होते तो भगवान क्या ख़ाक होंगे?अब झारखण्ड के जामताड़ा के नारायणपुर थाने के एक पंचायत के तुगलकी फैसले को ही लें.वहां हुआ यह है कि एक लड़का गाँव की ही एक लड़की के साथ शादी का झांसा देकर एक साल तक यौन-सम्बन्ध बनाता है और जब लड़की के पेट में बच्चा ठहर जाता है तो गाँव छोड़कर फरार हो जाता है.लड़की गोद में बच्चा लेकर मामले को पंचायत प्रतिनिधियों के समक्ष उठाती है और मांग करती है कि लड़के से उसकी शादी करवाई जाए जैसा कि उसने वादा भी किया हुआ है.लड़का गाँव के एक प्रभावशाली परिवार से आता है इसलिए पंचायत सबही सहायक सबल को की नीति का पालन करती हुई कुछ अजीब फैसला देती है कि लड़की को उसकी अस्मत के बदले ८०००० रूपये की रकम दे दी जाए और मामले को समाप्त समझा जाए.
                   मित्रों,जाहिर है कि एक ऐसी गरीब लड़की जिसके पास सिवाय अस्मत के और कुछ भी गिनने-गिनाने लायक नहीं है भला ऐसे तालिबानी और अन्यायपूर्ण फैसले से कैसे संतुष्ट हो सकती थी सो पहुँच गयी थाने.लेकिन यहाँ भी तो अधिकारी बनकर कोई सत्य के अवतार तो बैठे हुए हैं नहीं बल्कि बैठे हुए हैं लक्ष्मी के अंधे पुजारी (उल्लू).सो लड़की को इन्साफ नहीं मिला.उलटे थानाध्यक्ष लड़की पर ही उपरोक्त ८०००० रूपये लेकर मामले को वापस लेने के लिए लगे दबाव डालने.अब लड़की कह रही है कि अगर उसे न्याय नहीं मिला जिसकी पूरी सम्भावना भी दिख रही है तो वो परिवारसहित आत्महत्या कर लेगी.आखिर ऐसी नौबत आती ही क्यों है?क्या लड़की को पता नहीं था कि वो शादी से पहले सिर्फ वादे पर यकीन करके जो कुछ भी एक साल तक करती रही वो गलत था.खैर इस गरीब-अबला से तो जो गलती होनी थी हो गयी लेकिन उसे न्याय तो मिलना चाहिए.परन्तु न्याय देगा कौन क्योंकि इस भ्रष्ट-युग में भगवान तो शायद ढूँढने पर मिल भी जाएँ लेकिन न्याय नहीं मिलता.
             मित्रों,कहते हैं कि जाके पांव न फटे बिवाई सो क्या जाने पीड पराई.काश जिस तरह की घटना इस नादाँ लड़की के साथ हुई हैं वैसी ही उन पंचायत प्रतिनिधियों की बहन-बेटियों के साथ भी घट जाती तब शायद उन्हें पता चलता कि किसी गरीब की अस्मत की कीमत कितनी होती है और वह कितनी अनमोल होती है.साथ ही कुछ इसी तरह की परिस्थितियों का सामना उन पुलिस अधिकारियों को भी करना पड़े तब शायद उनका गरीबों के प्रति रवैया बदले.लेकिन प्रश्न है कि लड़की और उसके परिवारवालों को अब क्या करना चाहिए?क्या उन्हें सचमुच आत्महत्या कर लेनी चाहिए?मेरी हिसाब से कदापि नहीं,उन्हें जीना चाहिए और समाज से लड़ना चाहिए.जीवन अनमोल है.माना कि उससे गलती हुई है लेकिन इसका निदान कम-से-कम आत्महत्या तो नहीं है.उसे जीना चाहिए और कुछ इस तरह से जीना चाहिए जो समाज के लिए और आगे आनेवाली पीढ़ियों के लिए एक नजीर बन जाए.माना कि बच्चे का बाप कायर था और डरकर भाग निकला लेकिन वह तो माँ है और माँ अपने बच्चे को मारकर खुद भी कैसे मर सकती है.आज समाज में बहुत-से ऐसे उदार प्रवृत्ति के कुंवारे युवा हैं जो उसे बिना शर्त जीवनसाथी बनाने को भी तैयार हो जाएँगे.गलती तो उससे हुई ही है परन्तु अब उसका पश्चाताप करने का कोई मतलब नहीं है.उसे तो बस प्रायश्चित करना चाहिए जीकर और अपने बच्चे को पढ़ा-लिखाकर;अच्छा ईन्सान बनाकर;एक ऐसा ईन्सान बनाकर जिस पर मानवता नाज करे.

गुरुवार, 1 मार्च 2012

सेक्सी,सेक्सी,सेक्सी तुझे लोग बोलें

मित्रों,कभी प्रसिद्ध अमेरिकी उपन्यासकार पर्ल एस. बक ने उन महिलाओं को जिनका निकट-भविष्य में बलात्कार हो सकता है,को अमूल्य सलाह देते हुए कहा था कि यदि यह निश्चित हो कि आपका बलात्कार होकर रहेगा और विरोध करने का कोई फायदा नहीं रह जाए तो बेहतर यही है कि उक्त महिला इसका आनंद उठाए.मैं नहीं जानता कि श्रीमती बक को कितनी बार इस तरह का परमानन्द प्राप्त करने का पुण्य अवसर मिला.यहाँ आलेख के आरम्भ में उन स्वर्गीया का उल्लेख मैंने यह बताने के लिए किया है कि कई बार बड़ी शक्सियतें भी किस तरह अपनी मर्यादाओं की सीमाओं को लाँघ जाया करते हैं और उन्हें इसके असर का पता तक नहीं होता.जिस तरह बक महोदय को बलात्कार का दर्द क्या होता है;कदाचित पता नहीं था;शायद ममता शर्मा जो दुर्भाग्यवश या सौभाग्यवश पता नहीं इसमें से क्या हम भारतीय के लिए सही है;इस समय राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष के पद पर हैं;को भी यह मालूम नहीं है कि जब किसी गरीब-लाचार महिला के साथ छेड़खानी की घटना होती है तब उसके मन-मस्तिष्क पर क्या गुजरती है और वो उस एक क्षण में कितनी बार कितनी मौतें मरती है.उनकी पीड़ा की अगर स्वानुभूति करनी है तो ममता जी को किसी लम्पट साईनी आहूजा के घर घरेलू नौकरानी के तौर पर कार्य करना चाहिए या फिर किसी बेहया सुपरवाईजर के मातहत किसी फैक्टरी में साधारण मजदूर की नौकरी करनी चाहिए और अगर ईट-भट्ठे पर काम मिल गया तो क्या कहना.तब उन्हें पता चलेगा कि सेक्सी शब्द का वास्तविक अर्थ क्या होता है अथवा क्या कभी-कभी शब्दों का वह मतलब होता भी है जिसका जिक्र शब्दकोशकार शब्दकोशों में करते हैं क्योंकि हमेशा छेडनेवाले की निगाहें कहीं और होती हैं और निशाना कहीं और.
                  मित्रों,किसी शब्द का अर्थ काल और देश के अनुसार कैसे एकदम-से बदल जाता है मैं इसे एक बेहद दिलचस्प उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करना चाहूँगा.उस समय यानि वर्ष २००८ में दैनिक हिंदुस्तान,पटना में जेनरल डेस्क में कार्यरत था.एक दिन यूं ही उत्सुकतावश प्रिंट आउट वाली मशीन पर पड़ी सम्पादकीय पृष्ठ का प्रिंट आउट उठा लिया और पढ़ने लगा.मुख्य सम्पादकीय चन्द्रमा पर पानी के मिलने के सन्दर्भ में लिखा गया था जिसका समापन चंदामामा दूर के,पुए पके बूर के गीत से किया गया था.पंक्ति बिल्कुल सही थी और मुंगेर और खगड़िया के लिए अख़बार भेजा भी जा चुका था लेकिन बिहार में तो बूर का अर्थ योनि होता है भले ही गीतकार प्रेम धवन के पंजाब में इसका कोई और अर्थ होता हो.मैंने उस समय के समाचार संपादक कमल किशोर सक्सेना जी को इस तथ्य से अवगत कराया.फिर क्या था मशीन पर चल रही छपाई रोक दी गयी और आगे के संस्करणों में बूर को गुड़ कर दिया गया.ठीक इसी तरह हो सकता है कि सेक्सी शब्द का पश्चिमी देशों के सेक्स फ्री समाज में ज्यादा प्रयोग सुन्दर के अर्थ में होता हो लेकिन भारत में तो इसका सीधा मतलब होता है कामुक या सेक्स करने लायक.दोनों अर्थ सही हैं परन्तु जिस तरह बिहार में बूर शब्द का प्रयोग आपत्तिजनक की श्रेणी में आता है उसी तरह भारत में सेक्सी शब्द का प्रयोग मानसिक प्रताड़ना या छेड़खानी के लिए किया जाता है.ऐसे में ममता जी की सलाह को मानकर लड़कियां कैसे उस स्थिति में अपने को खुशनसीब मान सकती हैं जब कोई चौक-चौराहे पर खुलेआम उससे कहे कि तुम तो आज बड़ी सेक्सी लग रही हो?साथ ही छेड़खानी के वक़्त ऐसा करनेवाले के हाव-भाव पर गौर करना होता है और तब न तो शब्दों के अर्थ को लेकर ही कोई संशय शेष रह जाता है और न ही प्रयोगकर्ता के उद्देश्य को लेकर ही.
                     मित्रों,मुझे लगता है कि चूंकि ममता जी का लालन-पालन अंग्रेजी वातावरण में हुआ होगा इसलिए उन्हें शायद चौक-चौराहे पर रोजाना होनेवाली छेडखानियों से रूबरू होने का सुअवसर मिला ही नहीं है अन्यथा उन्हें पता होता कि जब कोई कामांध किसी अबला नारी के लिए सेक्सी शब्द का प्रयोग करता है तो उसका मतलब सिर्फ और सिर्फ कामुक होता है और उद्देश्य भी केवल और केवल एक होता है उस स्त्री का शीलहरण.उसका उद्देश्य अपने शिकार की सुन्दरता की प्रशंसा करना तो कदापि नहीं होता.इस तरह अगर ममता जी को प्रत्येक लम्पट में एक प्रशंसक भी नजर आने लगा तब तो हो चुका उनके सेक्सी हाथों से भारतीय महिलाओं का भला.हो सकता है कि वो कल किसी बलात्कार की दिल दहला देने वाली घटना के बाद यह भी कह डालें कि बलात्कारी निरपराध है क्योंकि वह तो पीडिता की सुन्दरता का अनन्य प्रशंसक है.
                    मित्रों,आपको भी आश्चर्य हो रहा होगा कि सुपर प्रधानमंत्री सोनिया गाँधी ने कैसे-कैसे लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठा रखा है.इटली से आयातित नेता से हम और उम्मीद भी क्या रख सकते हैं?एक बात तो निश्चित है कि सोनिया जी किसी भी तरह भारतीय संस्कृति का भला नहीं चाहती हैं तभी तो लगातार इसकी जड़ों पर केंद्र सरकार द्वारा सायास प्रहार किया जा रहा है.कभी राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा ममता शर्मा छेड़खानी और यौनापराध-उत्प्रेरक बयान दे डालती हैं तो कभी सरकार सुप्रीम कोर्ट में भारतीय संस्कृति में अतिवार्जित समलैंगिकता का समर्थन करने लगती है.जो कुछ भी इन दिनों देश में संस्कृति के मंच पर हो रहा है मुझे तो लगता है कि ऐसा सरकार द्वारा साजिशन किया या करवाया जा रहा है.चाहे वह सन्नी लियोन का भारत आगमन ही क्यों न हो.स्थिति बड़ी गंभीर है और निकट-भविष्य में और भी ज्यादा गंभीर हो जानेवाली है.अगर हम भारतीय अब भी नहीं संभले तो एक दिन ऐसा भी आएगा कि हमारी लचीली संस्कृति में इतनी तब्दीली आ जाएगी कि सत्य सनातन भारतीय संस्कृति में कुछ भी भारतीय नहीं रह जाएगा.                

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

यातना शिविर से यातना शिविर तक

मित्रों,जर्मन तानाशाह हिटलर का नाम कानों में पड़ते ही उससे जुडी सबसे पहली बात जो हमारे जेहन में आती है वो है उसके द्वारा किया गया यहूदियों का लोमहर्षक संहार.उसके द्वारा लगाए गए यातना-शिविरों से जीवित बच गए कई लोगों ने अपना जो अनुभव बयां किया और विजेता मित्र देशों के सैनिकों ने जो कुछ अपनी नंगी आँखों से देखा;वीभत्स और जुगुप्सा रसों की चरम अभिव्यक्ति कर सकने में परम सक्षम है.द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यह स्वाभाविक था कि लगभग पूरी दुनिया में यहूदियों के प्रति सहानुभूति की लहर दौड़ पड़े.परिणामस्वरूप १४ मई,१९४८ को इंग्लैण्ड और संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर एक स्वतंत्र यहूदी इस्राईल राष्ट्र की फिलिस्तीन की पवित्र भूमि पर स्थापना की गयी.यह स्थापना अरबों के सख्त विरोध के बाबजूद तो की ही गयी थी साथ ही इस उम्मीद पर की गयी थी कि फिलिस्तीन में यहूदी और मुसलमान एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करते हुए विकास के पथ पर हँसी-ख़ुशी अग्रसर हो सकेंगे.लेकिन ऐसा हो न सका.अरब देशों ने एकजुट होकर इस्राईल पर उसका नामोनिशान मिटा देने के ध्येय से १९४८,१९६७ और १९७३ में तीन बार भीषण आक्रमण किया और मुँह की खाते रहे.नतीजतन इस्राईल ने फिलिस्तीन के बचे हुए लगभग सारे अरब प्रदेशों पर अधिकार कर लिया.साथ ही,प्रत्येक यहूदी के मन में यह धारणा घर कर गयी कि मुसलमान कभी उसके स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार कर ही नहीं सकते.
                  मित्रों,यह बेहद बिडम्बनापूर्ण और दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन यहूदियों पर द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान घोर अमानुषिक अत्याचार किए गए वही यहूदी इस्राईल की स्थापना के बाद अरब अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों की घोर अवहेलना करने लगे.कितने आश्चर्य का विषय है कि जर्मनी की यातना शिविरों की चीखों और आँसुओं से जन्मा यह देश स्वयं वर्तमान विश्व का मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघनकर्ता बन गया है.वैसे तो इस्राईल द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन के सैंकड़ों या उससे भी अधिक ऐसे मामले हैं जिनका जिक्र यहाँ किया जा सकता है परन्तु वर्तमान में जो वाकया सबसे ज्यादा चर्चा में है वो है पश्चिमी तट के अर्रबा निवासी खादर अदनान का.खादर अदनान अपने गृहनगर अर्रबा में बेकरी चलाता है.३३-३४ साल का है.उसे पहली बार १९९९ में इस्राईली सैनिकों ने गिरफ्तार किया था और तब से कुल मिलकर उसके साथ ऐसा नौ बार हो चुका है.अब तक उसे ६ सालों से भी ज्यादा जेलों में बिताने पड़े हैं.अंतिम बार १७ दिसंबर २०११ को अर्द्धरात्रि के बाद उसे उसके घर से उठा लिया गया.न तो कभी उसका गुनाह ही बताया गया और न ही जेल में कोई मानवोचित सुविधा ही दी गयी.अदनान ने जब पाया कि मौखिक विरोध का कोई असर दिख नहीं रहा तो बैठ गया आमरण अनशन पर जो २१ फरवरी तक यानि ६६ दिनों तक जारी रहा.अदनान की मांग थी कि इस्राईल उसे यातना देना और मारना-पीटना बंद करे.अदनान पर उसकी पिछली गिरफ्तारियों की ही तरह अब तक औपचारिक रूप से कोई आरोप नहीं लगाया गया है.उसे बस जुबानी शांति और व्यवस्था के लिए खतरा बताया गया है जिसका कोई मतलब नहीं है.खादर की यह भी मांग थी कि या तो उस पर मुकदमा चलाया जाए या फिर रिहा किया जाए.बाद में जब पूरे फिलिस्तीन में अदनान के समर्थन में सांकेतिक भूख हड़ताल और प्रदर्शन होने लगे तथा दूसरे अरब-मुस्लिम कैदी भी अनशन पर बैठ गए तब जाकर इस्राईल की नींद खुली और उसने उसकी प्रशासनिक हिरासत को लगातार दूसरा विस्तार नहीं देने की घोषणा कर दी.
              मित्रों,मालूम हो कि इस्राईल में अभी तक संविधान की स्थापना नहीं हो पाई है और न्यायालय द्वारा समय-समय पर दी गए निर्णयों जिनको वे लोग बुनियादी कानून कहते हैं के आधार पर शासन चलाया जाता है.न तो वहां के नागरिकों को औपचारिक रूप से मौलिक अधिकार ही प्राप्त हैं और न ही मानव अधिकार ही क्योंकि संविधान है ही नहीं और संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार घोषणा को वहां का सर्वोच्च न्यायालय कई वर्ष पहले अवैध घोषित कर चुका है.सैन्यादेश १९५१ के तहत इस्राईल प्रशासन किसी को भी ६ महीने के लिए प्रशासनिक हिरासत के तहत जेल में कैद रख सकता है और इस हिरासत को अनिश्चित काल तक प्रत्येक ६ महीने पर बढ़ा भी सकता है.इस तरह इस्राईल दुनिया के उन कुछेक देशों में से है जहाँ यातना और मानवाधिकारों के उल्लंघन को वैधानिक मान्यता मिली हुई है.जिस देश में इस तरह की सैद्धांतिक कानूनी व्यवस्था हो वहां मानवाधिकारों की क्या व्यावहारिक स्थिति हो सकती है;सहज ही समझा जा सकता है.यह तथ्य भी किसी से छिपा हुआ नहीं है कि इस काले कानून का प्रयोग इस्राईल का प्रशासन केवल अल्पसंख्यक मुसलमानों के खिलाफ ही करता है.
           मित्रों,वैसे तो भारत में भी बहुत-से ऐसे कैदी हैं जिनकी पूरी-की-पूरी उम्र ही विचाराधीन कैदी के रूप में निकल गयी लेकिन हमारे यहाँ ऐसा किसी खास धर्म या जाति के खिलाफ जानबूझकर नहीं किया जाता.खादर अदनान एक अकेला ऐसा अरब नहीं है जिसको ज़िन्दगी के कई अमूल्य सालों तक बेवजह बिना कोई कारण बताए इस्राईली जेलों में रखा गया.अभी भी सैंकड़ों निर्द्होश अरब इस्राईली जेलों में अमानुषिक यंत्रणाओं को झेलते हुए अपनी रिहाई का इन्तजार कर रहे हैं.ऐसा भी नहीं है कि दुनिया में या संयुक्त राष्ट्र संघ में इसके खिलाफ आवाज नहीं उठती लेकिन वो नक्कारखाने की तूती बनकर रह जाती है क्योंकि इस्राईल के खिलाफ किसी भी तरह के प्रस्ताव को अमेरिका वीटो लगाकर निष्प्रभावी बना देता है.न जाने क्यों उसे ईरान और ईराक में मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन तो दिखाई देता है लेकिन इस्राईल का जिक्र होते ही वो एकाएक बापू का बन्दर बन जाता है.समय साक्षी है कि एक समय इसी तरह की तुष्टिकरण की नीति पर इंग्लैंड उस जर्मन तानाशाह हिटलर के मामले में चल रहा था जिसका जिक्र मैंने इस आलेख के प्रारंभ में किया है और जिसका परिणाम था;जैसा कि आप सब भी जानते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध.समय अपने आपको दोहराता है और कितनी बेशर्मी से दोहराता है कि जो समुदाय एक समय यंत्रणाओं का सबसे बड़ा भोक्ता था आज सबसे बड़ा कर्ता बन बैठा है.
           मित्रों,जब विरोध और सुधार के सारे मार्ग बंद हो जाते हैं तब बचता है गांधीवाद.खादर अदनान ने इसका बड़ी ही खूबसूरती से प्रयोग भी किया है और सारे उन अरबों को एक नई राह भी दिखा दी है कि कतिपय परिस्थितियों में सत्य और अहिंसा से ज्यादा प्रभावी पंथ कोई और नहीं होता.अरबों को चाहिए कि वे खून-खराबी बंद करें और सत्याग्रह की नीति का निष्ठापूर्वक अनुशरण करें.उन्हें अपनी लडाई खुद ही लड़नी होगी.अरब देशों के शासक अपने निहित स्वार्थों के चलते अमेरिका के हुक्म के गुलाम बन चुके हैं और उनकी कोई मदद नहीं करने वाले.वे अपने हित में उनका उपयोग करते आ रहे हैं और करते रहेंगे.जब गांधीवाद २०वीं शताब्दी में दुनियाभर पर शासन करनेवाले अंग्रेजों को झुका सकता है तो वर्तमान २१वीं सदी में अमेरिका और इस्राईल को क्यों नहीं?अगर उनका संकल्प दृढ रहा और विश्वास सच्चा रहा तो वह दिन दूर नहीं कि जर्मन यातना शिविरों में जन्म लेनेवाला देश इस्राईल बहुत जल्दी अपने क्षेत्राधिकार में चल रहे अगणित अघोषित यातना शिविरों (जेलों) को बंद करने के लिए बाध्य हो जाएगा.अंत में दुनियाभर के स्वतंत्रताप्रेमियों से मेरा विनम्र अनुरोध है कि वे अपने-अपने देश में इस्राईल द्वारा मानवाधिकारों के धृष्टतापूर्ण उल्लंघन के विरुद्ध आवाज उठाएँ और अपनी-अपनी सरकारों पर दबाव बनाएँ जिससे कि वे इस्राईल पर वैश्विक मंचों के साथ-साथ कूटनीतिक वैकल्पिक मार्गों द्वारा भी दबाव बनाने को बाध्य हो जाएँ.                      

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

नई उभरती चुनौतियाँ और भारतीय कूटनीति

मित्रों,एक कहावत है और वह बिलकुल माकूल भी है कि इस दुनिया में कोई भी शह टुच्ची राजनीति से बचकर नहीं रह सकता.राजनीति की जद में परिवार से लेकर विश्व यानि हर कोई है.वैश्विक राजनीति भी घरेलू राजनीति की तरह निरंतर परिवर्तनशील है और यहाँ भी वही सिद्धांत काम करता है यानि कोई न तो किसी का स्थायी मित्र होता है और न ही स्थायी शत्रु.वैश्विक कूटनीति में भी किसी देश का दूसरे देश का शत्रु या मित्र होना केवल एक चीज पर निर्भर करता है और वो है परिस्थिति.
        मित्रों,भारत नेहरु के ज़माने से ही ना काहू से दोस्ती, ना काहू से वैर के मार्ग पर यानि कथित गुटनिरपेक्षता की नीति पर चलता आ रहा है और उसने इसका भारी खामियाजा अपनी कई लाख वर्ग किलोमीटर भूमि चीन और पाकिस्तान के हाथों खोकर भुगता भी है.वर्तमान में भी हमारे लिए अब भी दुनिया की कूटनीतिक जलवायु माकूल नहीं है.चीन और पाकिस्तान के इरादे अब भी हमारे प्रति नेक नहीं हैं.दुर्भाग्यवश हमारे दोनों चिरशत्रुओं की मित्रता रात दूनी दिन चौगुनी की रफ़्तार से बढती चली जा रही है.अभी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में इस बात की चर्चा बड़े ही जोर-शोर से चल रही है कि पाकिस्तान अपने द्वारा १९४७ में कब्जाए गए कश्मीर को चीन को सौंपने जा रहा है.इस तरह की दुखद संभावित स्थितियों से अगर भारत को बचना है तो उसे जल्द-से-जल्द अपनी मर्जी से ओढ़े गए गुटनिरपेक्षता के चोले को सदा-सदा के लिए उतार फेंकना होगा.खुदा न करे कभी अगर चीन और पाकिस्तान दोनों ने भारत के खिलाफ एक साथ युद्ध का मोर्चा खोल दिया तो बिना अमेरिकादि पश्चिमी देशों और जापान-आस्ट्रेलिया जैसे पूर्वी देशों की सहायता के हम शायद अपना अस्तित्व भी नहीं बचा पाएँगे.
                   मित्रों,भारत के सामने जो सबसे ताज़ी चुनौती कूटनीतिक मोर्चे पर आ खड़ी हुई है वो भारत के कथित ऐतिहासिक मित्र ईरान और पश्चिमी देशों में चल रही शीतयुद्ध जैसी खींचतान के चलते.पश्चिमी देश और ईस्राइल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को किसी भी कीमत पर रोकना चाहते हैं मगर ईरान रूकने को तैयार ही नहीं है.उन्होंने ईरान पर कई तरह के व्यापारिक और आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिए हैं लेकिन नई परिस्थितियों में ईरान के लिए संकटमोचक बनकर उभरा है भारत.शायद इसके लिए ५ राज्यों का विधानसभा चुनाव भी जिम्मेदार है.यह तो हुआ भारत-ईरान संबंधों का एक पहलू.इसका दूसरा पहलू यह भी है कि ईरान को भारत के सरोकारों से कुछ ज्यादा लेना-देना नहीं है और वो भारत को एक ऐसा मजबूर देश समझता है जो अपने कुल तेल आयत का १२% उससे करके काफी हद तक उस पर आश्रित है.तभी तो उसने दिल्ली में इस्राइली दूतावास के सदस्य के परिजनों पर संदिग्ध हमला करने की गुस्ताखी की है.हालाँकि अभी तक हमारी चिरकारी सुरक्षा-एजेंसियां किसी नतीजे पर नहीं पहुंची हैं और अगर हम उनकी योग्यता को मद्देनजर रखें तो कभी पहुँचनेवाली भी नहीं हैं परन्तु जार्जिया और थाईलैंड में हुए विस्फोटों से मिलनेवाली संभावनाओं की कड़ियों को अगर हम दिल्ली-विस्फोट से जोड़कर देखें तो काफी हद तक धुंध साफ़ हो जाती है कि दिल्ली-हमला भी ईरान प्रायोजित ही था.यदि यह सत्य है तो स्पष्ट हो जाता है कि भले ही भारत ईरान को अपना अभिन्न मित्र माने वो भारत को अपना मित्र तक नहीं मानता.वैसे अगर हम कश्मीर के मुद्दे पर विभिन्न मंचों पर समय-समय पर ईरान की नीतियों को देखें तो पाएँगे कि उसने हमेशा पाकिस्तान का साथ दिया भारत का नहीं.उसके सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला खोमेनी तो लगातार दुनियाभर के मुसलमानों से कश्मीरी अलगाववादियों की सहायता करने की अपील भी करते रहे हैं.फिर भी न जाने किन मजबूरियों के कारण भारत-सरकार ईरान से एकतरफा और जबरदस्ती की दोस्ती गांठने पर तुली हुई हैं?भारत कोई विधवाओं का देश नहीं है कि कोई भी ऐरा गैरा नत्थू खैरा भारत की पवित्र भूमि को अपने कुत्सित स्वार्थों का रणक्षेत्र बना दे.निश्चित रूप से ईरान ने दिल्ली में ईस्राइली दूतावासकर्मियों पर हमला करके जो कुछ भी किया है वह भारत की शान में गुस्ताखी है,हमारी संप्रभुता पर हमला है,हमारी गैरत को एक ललकार है और इसे हम भारतवासी हरगिज सहन नहीं करनेवाले!
                मित्रों,जहाँ तक ईस्राइल का सवाल है तो उसने कभी भारत-विरोधी तेवर नहीं दिखाए हैं और लगभग निःस्वार्थ भाव से हमारी मदद करता रहा है.आज भी सामरिक तकनीक के मामले में काफी हद तक हम उस पर निर्भर हैं जबकि हमने नेहरु-युग से ही फिलिस्तीनियों का बिना शर्त समर्थन करके उसे बार-बार चिढ़ाया है.हम नहीं चाहते कि दोनों में से किसी एक का नामोनिशान विश्व के मानचित्र से मिट जाए.दुनिया का इकलौता यहूदी राष्ट्र ईस्राइल और मुस्लिम देश फिलिस्तीन दोनों रहें और फले-फूलें परन्तु उस क्षेत्र में स्थायी शांति तभी कायम हो सकती है जब दोनों ही पक्ष सहअस्तित्व के सिद्धांतों को स्वीकार कर लें.
                     मित्रों,यह अति कड़वा सत्य है और भविष्य में भारत की परेशानियाँ बढ़ानेवाला भी कि दुनियाभर में मुसलमानों के बीच कट्टरता नए उभार पर है और मिस्र से लेकर मालदीव तक उदारवादी शक्तियां हाशिए पर चली गईं हैं और कट्टरवादियों को धरती और आकाश के बीच सिर्फ एक ही धर्म चाहिए इस्लाम और दूसरा कोई नहीं.यह सर्वविदित है कि हिन्दूबहुल भारत में मुसलमानों को जितनी आजादी,सुविधाएँ और अधिकार प्राप्त हैं उतनी किसी इस्लामिक देश में भी नहीं है.फिर भी हमारे कुछ मुसलमान भाई अपनी जेहादी मानसिकता को त्याग नहीं पा रहे हैं अन्यथा भारत में इन्डियन मुजाहिद्दीन और सिम्मी जैसे आतंकवादी संगठन नहीं होते जिन्होंने शायद दिल्ली हमले में भी ईरान की मदद की है.
              मित्रों,आज ईरान वैश्विक राजनीति में अकेला पड़ता जा रहा है.ऐसे में उसके साथ चिपके रहने की हमारी जिद हानिकारक ही सिद्ध होगी.माना कि आयातित तेल का ज्यादा मूल्य देकर हमें सम्बन्ध-विच्छेद का मूल्य चुकाना पड़ सकता है लेकिन उससे भी कहीं कई गुना ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी जब हम उसके साथ रहेंगे.इस सन्दर्भ में मुझे अकबर-बीरबल कथा से एक कथा का सन्दर्भ लेना समीचीन मालूम पड़ता है.हुआ यह कि बादशाह अकबर एक दोपहर को बीरबल के साथ भोजन कर रहे थे.तभी उन्हें न जाने क्या सूझी कि लगे बैगन की बड़ाई करने जिसे कुछ ही समय पहले पुर्तगाली भारत में लेकर आए थे.बीरबल ने भी कहा कि 'बजा फ़रमाया हुजूर,बैगन तो सभी सब्जियों का राजा है" फिर कुछ लम्हों तक ईधर-उधर की बातें करने के बाद अकबर लगे बैगन की बुराई करने परन्तु बीरबल तो हमेशा की तरह सचेत थे.सो उन्होंने भी तुरंत हामी भर दी और यहाँ तक कह दिया कि "हुजूर मैं तो कहता हूँ कि इसकी खेती पर ही प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए."अकबर चौंके और पूछा कि बीरबल पहले यह तो निर्णय कर लो कि बैगन अच्छा है या ख़राब.बीरबल ने भी छूटते ही कहा कि "हुजूर,बैगन जाए चूल्हे की भांड में,मुझे क्या?मुझे तो बस आपसे मतलब है जो मेरी रोजी-रोटी चलते हैं,आप कहते हैं कि बैगन अच्छा है तो अच्छा है और आप कहते हैं कि बुरा है तो बुरा है."इसी तरह भारत-सरकार को भी ईरान को नहीं बल्कि अपने हितों को ध्यान में रखना चाहिए.ईरान भी तो यही कर रहा है.

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

बेनजीर,बेमिसाल,अतुल्य बिहार

मित्रों,कुछ ही साल पहले भारत के अन्य राज्यों में बिहार की छवि इतनी ज्यादा ख़राब थी कि 'बिहारी' शब्द सबसे भद्दी गाली में परिवर्तित हो गया था.तब बिहार एक भ्रष्ट,नाकारा और जंगलराज सदृश शासन के लिए जाना जाता था.उस दौर में लालू और बिहार को लेकर कई चुटकुले बनाए और चलाए गए और उनमें से कई तो सुपरहिट भी हुए.उन दिनों जापान के कथित प्रधानमत्री के कथित बिहार दौरे और राज्य की अनपढ़ मुख्यमंत्री राबड़ी देवी से उनकी कथित मुलाकात के फ़साने ने इतनी स्वतःस्फूर्त लोकप्रियता और स्वीकार्यता हासिल की कि बहुत जल्दी यह फ़साना हकीकत जैसा बन गया.
             मित्रों,वो कहते हैं न कि दिन चाहे कितने भी बुरे क्यों न हों गुजर ही जाते हैं.इस दुनिया में कभी किसी की चलती हमेशा के लिए नहीं होती.कोई मिले हुए अवसर को भुना लेता है तो कोई सिर्फ हाथ मलता रह जाता है.एक वक्त था जब लालू राजनीतिक रूप से इतने शक्तिशाली होकर उभरे थे कि वे दिल्ली की गद्दी का फैसला भी करने लगे.चाहते तो उस दो साल की अवधि में बिहार को भारत के विकास का ईंजन बना डालते लेकिन सत्ता और अपार जनसमर्थन की ताड़ी पीकर मस्त लालू को तो जैसे विकास के नाम से ही नफरत थी.उन पर तो जैसे घोटाला करने का फितूर सवार था.वे उन दिनों अक्सर मंच से कहते कि "ये आईटी-फाईटी क्या होता है?कहीं विकास करने से वोट मिलता है?" परिणाम यह हुआ कि विकास की होड़ में रिवर्स गीयर चलता बिहार लगातार पीछे होता गया और अन्य राज्य आगे निकलते गए.फिर तो वह समय भी आया कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय जो बिहार विकास की दौड़ में दूसरे स्थान पर था;शर्मनाक तरीके से नीचे से प्रथम आने लगा.
                          मित्रों,धीरे-धीरे कई कारणों से बिहार की जनता लालू की जोकरई और राबड़ी के कुशासन से उबती गयी.जो बिहारी मजबूर और मजदूर होकर दूसरे राज्यों में रोजी-रोटी की तलाश में गए और जिन्हें सिर्फ बिहार से होने के कारण सबसे ज्यादा जलालत भी झेलनी पड़ी उन्होंने ही पहली बार विकास का मतलब समझा और असर भी देखा.कहना न होगा कि उनमें से ज्यादातर को लालू का परंपरागत वोटर माना जाता था.अंत में उनकी विकास की भूख इतनी बढ़ गयी कि उन्होंने और उनके परिवारवालों ने मसखरे लालू एंड फेमिली को सत्ता की भैंस की पीठ पर से जिस पर वे आगे से चढ़ा करते थे,धडाम से नीचे पटक दिया.वो कहते हैं न कि "सब कुछ गँवा के होश में आए तो क्या किया?"फिर लालू की नींद खुली और वे लगे रेलवे द्वारा विकास करवाने लेकिन एक तरफ जहाँ इसकी एक सीमा थी वहीँ दूसरी ओर तब तक बहुत देर हो चुकी थी.बिहार को सुशासन मिल चुका था;कानून का राज और विकासपरक शासन.
            मित्रों,फिर तो नीतीश और मोदी के कुशल नेतृत्व में बिहार विकास की पटरी पर इस तरह सरपट भागा कि नंबर एक गुजरात से टक्कर लेने लगा.बिहारी मेहनती तो थे ही.यह कहावत यूं ही तो प्रचलित नहीं हुई थी कि 'जो न कटे आड़ी से सो कटे बिहारी से'.सरकार की आमदनी बढ़ी तो खर्च भी बढ़ा और भ्रष्टाचारियों की बांछें खिल आई.मुफ्ते माल बाप का माल समझकर लगे लूटने.तब नीतीश कुमार की गठबंधन सरकार ने कई दशकों से निष्क्रिय पड़े निगरानी विभाग को अतिसक्रिय कर दिया.लोग रोजाना कहीं-न-कहीं घूस लेते पकडे जाने लगे.सरकारी सोंच यह थी कि इससे घूसखोरों की समाज में भद्द पिटेगी और वे घूस लेना छोड़ देंगे.
                       मित्रों,परन्तु ऐसा हुआ नहीं.तब तक भ्रष्टाचरण को समाज में पूरी तरह से मान्यता प्राप्त हो चुकी थी और भ्रष्टाचारी पूरी तरह से निर्लज्ज भी हो चुके थे.जेल की हवा खाकर आते और फिर से घूस खाने लगते.तब नीतीश सरकार ने एक भ्रष्टाचार निरोधक कानून का निर्माण किया जो पूरे भारत में अपनी तरह का पहला और अनूठा प्रयोग था.अब भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर आरोपी की आय से अधिक संपत्ति जब्त की जा सकती थी और अवैध कमाई से अर्जित संपत्ति की सूचना देनेवाले को अधिकतम ५ लाख रूपये तक ईनाम देने का भी प्रावधान किया गया.कई बड़े-बड़े अवकाशप्राप्त अधिकारियों की संपत्तियों को जब्त कर उनमें सरकारी स्कूल खोले गए.परन्तु पहल तेजी से परवान नहीं चढ़ सकी और जमकर मुकदमेबाजी का सहारा लिया जाने लगा.इसी बीच बेलगाम तंत्र के मुँह में "सेवा का अधिकार" का लगाम डालने का भी प्रयास किया गया.परन्तु छोटे-बड़े घोटालों पर रोक नहीं लग सकी.इंदिरा आवास योजना और मनरेगा तो मानो भ्रष्टाचार का निवास-स्थान ही बनती जा रही थी.असली समस्या तो शायद यह थी कि बिहार सरकार में वर्तमान में कार्यरत वैसे अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ क्या किया जाए जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप सही पाए गए हैं और जो जेल से बाहर आते ही फिर से घूस लेते पकड़े गए हैं.निलंबन से कुछ ज्यादा होने-जानेवाला था नहीं.एक बार जेल-यात्रा कर लेने के बाद जेल जाने का भय भी मन से रफूचक्कर हो चुका था.पुनर्नियुक्त होने पर फिर से वे भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते.वेतन आधा मिले या पूरा इससे भी उन्हें कोई अंतर नहीं पड़ना था क्योंकि जितना उनका मासिक वेतन था उतना तो वे एक दिन में ही बना लेते थे.
                मित्रों,अब जाकर बिहार सरकार ने पूरे भारत के सामने बेमिसाल नजीर पेश करते हुए "न तबादला,न निलंबन;सीधे बर्खास्तगी" का ब्रह्मास्त्र चला दिया है.मैंने भी कई महीने पहले ही अपने कई आलेखों में इसकी मांग उठाई थी और कहा था कि निलंबन और स्थानांतरण से कुछ भी नहीं हासिल होनेवाला इन्हें तो अब नौकरी से निकालकर जेल भेज दो और संपत्ति जब्त कर इन पर आपराधिक मुक़दमा भी चलाओ.इनके पीछे,इनकी पढाई के पीछे समाज और सरकार ने इसलिए पैसे पानी की तरह नहीं बहाए कि ये पढलिख कर उसको ही खोखला करने लगें.वो कहते हैं न कि अगर छोटे बच्चों की कक्षा को शांत करना हो तो सिर्फ एक की धुनाई कर दो और अगर यह फार्मूला भी विफल हो जाता है तब सबको बारी-बारी से पीटो.अभी तो सिर्फ ८ बी.डी.ओ. और ५ पुलिस अधिकारी बर्खास्त हुए हैं शायद बाँकी अधिकारी वक़्त के इशारे को समझकर संभल जाएँ और अगर नहीं संभलते हैं तो जाएँ अपने घर.हमें नहीं चाहिए उनकी लूटमार सेवा.इस बर्खास्तगी को पूरे देश में अभियान की तरह चलाना चाहिए तब जाकर मिटेगा या फिर प्रभावकारी सीमा तक घटेगा भ्रष्टाचार.जिन लोगों को लगता है कि सिर्फ सत्ता बदलने से कुछ नहीं बदलता उन्हें बिहार की तरफ विस्फारित नेत्रों से देखना चाहिए जहाँ सत्ता बदलने से शासन का चरित्र बदला,शासन-प्रशासन की परिभाषा ही बदल गयी.माना कि अभी भी सच्चा सुशासन लाने की दिशा में कई कदम उठाए जाने की जरूरत है.कुछ कमियां हैं,कुछ खामियां हैं,दाल में कुछ काला है लेकिन लालू-राबड़ी काल की तरह पूरी-की-पूरी दाल ही काली नहीं है.अब देश में सबके पीछे-पीछे चलनेवाला बिहार सबसे आगे चल रहा है;निरंतर उदाहरण-पर-उदाहरण स्थापित करता हुआ;अपनी स्वर्णिम विकास यात्रा में लगातार मील का पत्थर स्थापित करता हुआ.

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

कांग्रेस हराओ देश बचाओ

मित्रों,भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की विधानसभा के पहले चरण के मतदान में अब कुछ ही घंटे शेष रह गए हैं.इस समय सारे दल और उनके नेता जनता को लुभाने में लगे हुए हैं और इस दिशा में सबसे आगे है भारत की सबसे पुरानी मगर इस समय की सबसे भ्रष्ट और झूठी पार्टी कांगेस पार्टी.इसने एक ही बार में अपने सारे तीर छोड़ दिए हैं.मुस्लिमों को आरक्षण,युवराज्ञी प्रियंका गाँधी वाड्रा द्वारा प्रचार और युवराज राहुल गाँधी द्वारा राज्य का कथित विकास करने का वादा.बड़ी ही सफाई से पार्टी एक ही बार में देश और प्रदेश को पीछे धकेलने और आगे ले जाने वाले दोनों तरह के वादे किए जा रही है.
                   मित्रों,कुछ साल पहले कुछ इसी तरह के वादे करके यह पार्टी केंद्र में सत्ता में आई थी.परन्तु किया क्या?सिर्फ और सिर्फ सत्ता का दुरुपयोग.इसकी पूरी-की-पूरी सरकार सिर्फ एशिया में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी भ्रष्टाचार के मामले में अव्वल है.इसका लगभग प्रत्येक मंत्री अपनी मनमानी करके अपनी तिजोरी भरने में लगा हुआ है और प्रधानमंत्री व्यस्त हैं इन सबसे पूरी तरह से अनजान होने का स्वांग रचने में.श्री मनमोहन सिंह को शायद यह नहीं पता है कि वे कोई अपना या सोनिया गाँधी का घर नहीं चला रहे है वरन देश को चला रहे हैं.यहाँ इस कुर्सी पर उनकी छोटी-सी भूल और लापरवाही देश में भयानक तबाही ला सकती है जैसा कि २-जी स्पेक्ट्रम मामले में हुआ भी है लेकिन हमारा नेहरू परिवार अभी भी उन्हें सर्वोत्तम सिद्ध करने की जिद पकडे हुए है.तो क्या हम इस चुनाव में इस परिवार की इस गलत धारणा को गलत साबित नहीं कर देंगे?
               मित्रों,इस समय देश में चारों तरफ अराजकता का माहौल है.भ्रष्टाचार अपने चरम पर है,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जो किसी भी लोकतंत्र की धुरी होती है;को केवल इसलिए कुचला जा रहा है ताकि कोई जागृत नागरिक केंद्र की कांग्रेस सरकार की आलोचना नहीं कर सके और चूंकि कांग्रेसी युवराज्ञी प्रियंका गाँधी फरमा रहीं हैं कि उनकी और उनके परिवार की नजर में मनमोहन इस समय भी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं इसलिए निकट-भविष्य में देश में वर्तमान स्थितियों में कोई बदलाव आने की उस स्थिति में कोई सम्भावना नहीं रह जाती है कि अगर कांग्रेस उत्तर प्रदेश चुनाव जीत जाती है.इसका दूसरा मतलब यह भी हुआ कि केंद्र सरकार में जो कुछ भी हो रहा है वह कांग्रेस की सुशासन की परिभाषा के अंतर्गत है और हो सकता है जीत के बाद कांग्रेस उत्तर प्रदेश में भी इस मनमोहिनी सुशासन को आजमाए.
             मित्रों,पिछले दो लोकसभा चुनाव इस बात के गवाह है कि जब-जब कांग्रेस जीती है जनता की हार हुई है.महंगाई बढ़ी है,भ्रष्टाचार बढ़ा है और साथ ही बढ़ा है कालेधन के जमाकर्ताओं और भ्रष्टाचारियों को केंद्र सरकार का संरक्षण भी.इसलिए अगर आपको अपने प्रदेश की संभावित बर्बादी को रोकना है तो राहुल गाँधी के भ्रष्टाचार के साथ विकास के वादे को पूरी तरह से अंगूठा दिखाते हुए जब भी मतदान करें तो उसी उम्मीदवार के पक्ष में करें जो कांग्रेसी उम्मीदवार को हराने में सक्षम हो.
                दोस्तों,इस बात की भी प्रबल सम्भावना बन रही है कि चुनावों के बाद कांग्रेस समाजवादी पार्टी से गठबंधन कर लेगी.इसलिए आप कांग्रेस के साथ-साथ सपा को भी सीधे-सीधे ख़ारिज करिए.माया जी की माया के तो आप प्रत्यक्ष गवाह भी हैं और भोक्ता भी इसलिए उनको वोट देने का तो सवाल ही नहीं.हालाँकि कांग्रेस यह दावा कर रही है कि वो चुनावों के बाद किसी भी अन्य राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करेगी.किन्तु ऐसा वो पहले ही बिहार में बार-बार कर चुकी है.१९९० के बाद बिहार विधानसभा के प्रत्येक चुनाव में वह राजद से अलग होकर चुनाव लडती रही और इसी तरह हर बार यह वादा और दावा करती रही कि चुनावों के बाद वो किसी के साथ भी गठबंधन नहीं करने जा रही है.किन्तु चुनावों के बाद एक बार तो सोनिया गाँधी ने ऐसा भी किया कि अपने सारे-के-सारे विधायकों को एकबारगी लालू-राबड़ी सरकार में मंत्री बनवा डाला.
               मित्रों,दैवात आपके हाथों में सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे भारतवर्ष की तक़दीर और तस्वीर को बदलने का मौका आया है.इस सुअवसर का पूरा-पूरा लाभ उठाईए और अपने महान राज्य कांग्रेस के खूनी पंजे के शिकंजे में जाने से बचाईए अन्यथा बाद में सिवाय पछतावे के आपके पास कोई और विकल्प नहीं बचेगा.न तो आपकी आजादी ही बचेगी और न ही देश में लोकतंत्र ही बचेगा.जहाँ तक राहुल के विकास के वादे का सवाल है तो केंद्र सरकार के आंकड़े खुद ही चीख-चीखकर इस बात की गवाही दे रहे हैं कि देश के उन्हीं राज्यों में विकास-दर इस समय सबसे ज्यादा तेज है जिन राज्यों में कांग्रेस सत्ता में नहीं है और यह तो आप भी भली-भांति जानते हैं कि रोजगार के अवसर वहीं पर ज्यादा उत्पन्न होते हैं जहाँ विकास की रफ़्तार ज्यादा तेज होती है.इसलिए दोस्तों कांग्रेस के झूठे वायदों से बचिए,इसके झूठे नेताओं से सतर्क रहिए.आपको तो याद  ही होगा कि इन्होने हाल-फिलहाल में ही लोकपाल के मुद्दे पर थोक में देश से वादे किए हैं.और फिर उतनी ही बेहयाई और बेरहमी से उन वादों को तोड़ा भी है.

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

सरस्वती के उद्दंड बेटे

मित्रों,वक़्त को आते हुए तो सभी देखते हैं पर कब वह चुपके से,दबे पांव सरक लेता है कोई नहीं जान पाता.देखते-देखते नववर्ष और मकर-संक्रांति की तरह ही वसंत पंचमी भी गुजर गयी और साथ ही सरस्वती पूजा भी.फिर शुरू हुआ विद्या और विवेक की अधिष्ठात्री भगवती सरस्वती की प्रतिमाओं को विसर्जित करने का सिलसिला.सरस्वती-पुत्र जुलूस की शक्ल में सड़कों से गुजरने लगे.ठेले पर देवी की प्रतिमा सबसे पीछे,उसके आगे भारी-भरकम साउंड बॉक्सों से लैस ट्रॉली और सबसे आगे शराब के नशे में धुत्त,अश्लील-फूहड़ गानों की बेहूदा धुनों पर लड़खड़ाते हुए नृत्य-जैसा कुछ करते सरस्वती के बेटे अथवा भक्त.कई बार तो जी में आया कि लाठी उठाऊँ और एक सिरे से सबकी पिटाई कर दूं परन्तु परिणाम की सोंचकर हर बार गुस्से को जज्ब कर गया.
                        मित्रों,लगभग पूरे बिहार से इस समय प्रतिमा-विसर्जन के दौरान नदियों-तालाबों में युवकों के डूबकर मारे जाने की ख़बरें आ रही हैं.क्या जरुरत है खतरा मोल लेकर ज्यादा गहरे पानी में प्रतिमा  को विसर्जित करने की?यहाँ तक कि खचाखच भरी नावों में भी इन नशेड़ियों की उच्छृंखलता नहीं रूकती जिसका परिणाम होती है जानलेवा दुर्घटनाएं.जुलूस के रास्ते में भी इनका रवैया निहायत अफसोसनाक होता है.कभी-कभी ये लोग रास्ते में वैध-अवैध आग्नेयास्त्रों से गोलीबारी भी करते चलते हैं.कल कुछ इसी तरह की एक दुखद घटना में सहरसा में रेशमा नाम की एक लड़की मारी गयी.इसी तरह की एक और हिंसात्मक घटना में मुजफ्फरपुर में विवेक नाम के एक सरस्वती-भक्त की दूसरे भक्तों ने चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी.
                         मित्रों,आप सोंच रहे होंगे कि इस तरह की घटनाएँ क्यों हो रहीं है?निश्चित रूप से इसके लिए हमारी दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली और समाज का नैतिक-स्खलन तो जिम्मेदार हैं ही हमारे द्वारा दिया गया चंदा भी कम दोषी नहीं है.हम चंदा तो दे देते हैं लेकिन यह नहीं देखते कि हमारे बच्चे उन पैसों का कर क्या रहे हैं जबकि यह हमारा ही कर्त्तव्य है.हम उन्हें चंदा देते हैं पूजा-पाठ में खर्च करने के लिए और वे जनाब उसका शराब पी जाते हैं.इतना ही नहीं कभी-कभी तो हमारे द्वारा प्रदत्त राशि से नृत्यांगनाएं भी बुलाई जाती हैं और उनसे कामुक और भौंडे नृत्य कराए जाते हैं.भगवान वैद्यनाथ की नगरी देवघर की  एक ऐसी ही घटना इनदिनों खूब चर्चा में है.आश्चर्य है कि ये लोग जाहिर तौर पर पूजा तो कर रहे हैं बुद्धि और विवेक की देवी सरस्वती की और कर रहे हैं बुद्धि और विवेक के सबसे बड़े शत्रु मदिरा का सेवन और अर्द्धनग्न स्त्रियों का साक्षात् दर्शन.मुझे नहीं लगता कि जिन स्थानों पर टिंकू जिया,शीला की जवानी और उ लाला उ लाला जैसे अतिअश्लिल गीत बजे जाते हैं वहां माता सरस्वती का क्षण भर भी टिक पाना संभव होता होगा.
                                       क्या सरलता,सादगी और पवित्रता की देवी की अर्चना सरल सामग्री-साधनों द्वारा,बिना किसी तड़क-भड़क के और सरल-सच्चे मन से नहीं की जानी चाहिए?अन्यथा पूजा का कोई मतलब भी नहीं रह जाता क्योंकि कोई भी पूजा अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए की जाती है न कि दिखावे,प्रदर्शन और अपने उच्छृंखल मन को संतुष्ट करने के लिए.सरस्वती पूजा कोई आप युवा सरस्वती-पुत्रों की ईजाद नहीं है.पूजा हमने भी की थी.तब यानि आज से कोई २५ साल पहले हम अपने नाजुक कन्धों पर उठाकर देवी को १० किलोमीटर दूर बांदे करनौती से जगन्नाथपुर लाया करते थे.कोई लाउडस्पीकर या साउंड बॉक्स नहीं होता था पूजा-स्थल पर.विसर्जन के समय भी हम प्रतिमा को अपने कन्धों पर ही उठाते थे और गाँव के प्रत्येक अमीर-गरीब के घर के सामने रखते थे ताकि महिलाएँ देवी को विधिवत-पुत्रीवत खोईछा भरकर विदाई दे सकें.तब सूरज पासवान की कमर में ढोलक बंधा होता था और जयलाल रविदास अति मधुर और भक्ति-भीना स्वर में 'हंसा पर सवार हे माता,हंसा पर सवार हे' गाते चलते थे.साथ में हम जैसे अन्य युवा-किशोर झाल-करताल बजा-बजाकर संगत करते चलते थे.कहीं कोई उच्छृंखलता या अश्लीलता नहीं;चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ भक्ति का पवित्र वातावरण.क्या वह युग फिर से वापस नहीं आ सकता?अगर नहीं तो क्यों नहीं?बंद करिए लाउडस्पीकर,डीजे और म्युजिक ट्रॉली का प्रयोग.उठाईये ढोलक और झाल-करताल.शराब पीना और अश्लील सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तो निर्विकल्प रूप से बंद होना ही चाहिए.अंत में,मेरी सरस्वती के सभी उद्दंड पुत्रों से हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन है कि जो हुआ सो हुआ आगे से अगर वे सचमुच माता सरस्वती को प्रसन्न करना चाहते हैं तो इन बातों का अवश्य ख्याल रखेंगे.लेकिन क्या मेरे युवा-किशोर अनुज मेरी यानि सरस्वती के इस तुच्छ साधक की सुनेंगे?

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

लोकतंत्र का पेड़ और जनांदोलनों की आंधी

मित्रों,जबसे भारत में अन्ना हजारे के प्रखर नेतृत्व में जनांदोलन शुरू हुआ है इसके भारतीय लोकतंत्र पर संभावित प्रभावों का लगातार विश्लेषण किया जा रहा है.ताजा विश्लेषण किया है हमारी राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल जी ने.उनके मतानुसार भारतीय लोकतंत्र एक वृक्ष है और जनांदोलन उसे लगातार आंधी-तूफ़ान की तरह हिला रहे हैं,जिसके चलते हो सकता है कि यह पेड़ ही जड़ से उखड जाए.उन्होंने सीधे-सीधे जनांदोलनों का जिक्र तो नहीं किया है लेकिन उनके कथन के आशय को लेकर वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए किसी तरह के भ्रम की गुंजाईश भी नहीं है.अब प्रश्न उठता है कि क्या सचमुच भारत में लोकतंत्र खतरे में है और अगर खतरे में है भी तो उसे किन-किन तत्वों से और किस तरह का और कितना गंभीर खतरा है?
                       मित्रों,चाहे कोई भी शासन हो,किसी भी तरह का शासन हो उसकी मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि आम जनता का उसके ऊपर कितना विश्वास है.इतिहास गवाह है कि किसी भी शासन को सबसे ज्यादा खतरा होता है भ्रष्टाचार से और गरीबी तथा बेरोजगारी से.चाहे फ़्रांस की क्रांति हो या रूस की या फिर मिस्र या लीबिया की;ये क्रांतियाँ इसलिए हुई क्योंकि पूर्व प्रचलित शासन समय रहते जनाक्षाओं के अनुरूप खुद को नहीं बदल सका.चीन में च्यांग काई शेक अमेरिका आदि अतिशक्तिशाली देशों द्वारा खुले दिल से सहायता मिलने के बाबजूद गृहयुद्ध में इसलिए हार गया क्योंकि उसके शासन में इतना अधिक भ्रष्टाचार बढ़ गया था कि उसके सैनिक चंद पैसों के लिए अपने हथियार और गोलियां तक माओवादियों के हाथों बेच डालते थे.बढ़ते भ्रष्टाचार ने उसके मजबूत शासन को अन्दर से खोखला कर दिया था और जनता का उसमें विश्वास भी समय गुजरने के साथ निराशा के कारण कम होता जा रहा था.
                          मित्रों,वर्तमान भारत की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं है.निश्चित रूप से हमारा लोकतंत्र इस समय खतरे में है और खतरा भी बाह्य नहीं आतंरिक है शेक के चीन की तरह.हमारे लोकतंत्र को मधु कोड़ा,ए. राजा,सुखराम,मायावती,सुरेश कलमाड़ी,लालू प्रसाद यादव जैसे अनगिनत भ्रष्ट जनप्रतिनिधि मुँह चिढ़ा रहे हैं और वर्तमान केंद्र सरकार है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई प्रभावी कदम उठाना चाहती ही नहीं.ऐसे में जब अख़बारों और सोशल मीडिया में भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार आवाज उठाने और सरकार को कदम उठाने के लिए प्रेरित  करने का कोई प्रभाव होता नजर नहीं आ रहा था तब जनता के सामने सिवाय जनांदोलन करने के कोई विकल्प ही नहीं था.पहले तो आम जनता ने अपने खास जनप्रतिनिधियों से 'तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपति सिन्धु किनारे,पढ़ते रहे छंद अनुनय के प्यारे-प्यारे.'शैली में हाथ जोड़कर विनती की और कहा कि "हे कृपानिधान!कृपया आप हमारी मांगों को मानते हुए जनलोकपाल कानून बनाईये जिससे हमें भ्रष्टाचार रुपी दानव से राहत मिल सके."परन्तु सत्ता की मद-वारुणी के पान में मस्त जनता द्वारा ही गलती से निर्वाचित हुई सरकार ने उनकी विनम्रता को उनकी कमजोरी का संकेत मान लिया.साथ ही वे आम जनता की ईच्छा को भी नहीं समझ सके.उन्हें लगा कि इस जनांदोलन में कोई आंतरिक ऊर्जा है ही नहीं और यहीं पर उन्होंने १६ अगस्त,२०११ को वह गलती कर दी जो ७-८ नवम्बर,१९१७ को रूस में जार निकोलस द्वितीय ने और १४ जुलाई,१७८९ को फ़्रांस में लुई १६वाँ ने की थी;उन्होंने क्रांति के सूरज को ही कैद करने की कोशिश की और नतीजे में अपना हाथ जला बैठे.बाद में उन्होंने भयभीत मन से अन्ना को अनशन की अनुमति तो दे दी लेकिन उनके हाव-भाव से आज भी ऐसा बिलकुल भी नहीं लग रहा है कि उन्होंने अपनी गलतियों से कुछ सीखा भी है.बाद में संसद में एक दन्त और विषविहीन लोकपाल की स्थापना का कुत्सित प्रयास भी सरकार द्वारा किया गया जो जनता के दबाव के चलते सौभाग्यवश असफल भी हो गया.इस बीच प्रधानमंत्री ने नए साल पर देशवासियों को भरोसा दिलाया कि वे नए साल में भ्रष्टाचार और कुशासन को दूर करने के लिए अपेक्षित कदम उठाएंगे परन्तु अभी तक इस तरह के कोई संकेत दृष्टिगत नहीं हो रहे हैं.
                         मित्रों,कुछ करने के लिए एक दिन ही काफी होता है और नहीं करने के लिए सदियाँ भी नाकाफी होती हैं.सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की ग़लतफ़हमी पालने की बीमारी अभी भी गई नहीं है.वह अन्ना के मुम्बई आन्दोलन की विफलता के बाद यह मान बैठी है कि उनके जनांदोलन में अब कोई ऊर्जा शेष ही नहीं रही और अगर पार्टी को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में जीत हासिल होती है तब सीधे-सीधे यह मान लेना चाहिए कि जनता ने अन्ना और उनकी मांगों को ख़ारिज कर दिया है.हम यह अच्छी तरह से जानते हैं कि विधानसभा चुनावों की प्रकृति लोकसभा चुनावों से अलग होती है.इन चुनावों में ज्यादातर स्थानीय मुद्दे हावी होते हैं और राष्ट्रीय मुद्दों का प्रभाव कम ही होता है.यह बात कांग्रेस के नेता भी जानते हैं इसलिए इन चुनावों को किसी भी तरह अन्ना आन्दोलन पर जनमत संग्रह नहीं माना जा सकता है;नहीं माना जाना चाहिए.इस सत्य में कोई संदेह नहीं कि इस आन्दोलन में अभी भी पर्याप्त ऊर्जा है और अगर सही वक़्त में फिर से आन्दोलन छेड़ा जाता है तो हमारे मदांध शासकों को झुकाया जा सकता है और घुटनों पर आने के लिए मजबूर भी किया जा सकता है.इस आन्दोलन को न तो बैरम खान दिग्विजय सिंह के कुतर्क ही कमजोर कर सकते हैं और न ही अकबर राहुल गाँधी की कोरी राजनीतिक विरासत ही.यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूं कि यह आन्दोलन लोकतंत्र के खिलाफ हरगिज नहीं है बल्कि यह तो शासन-प्रशासन में लगातार बढ़ते भ्रष्टाचार के विरुद्ध है इसलिए इससे लोकतंत्र के पेड़ के जड़ से उखड जाने का खतरा राष्ट्रपति जी को क्यों महसूस हो रहा है,शायद उन्हें ही इसका बेहतर पता होगा.राष्ट्रपति जी लोकतंत्र अगर एक पेड़ है तो उसकी जड़ें है भ्रष्टाचार-मुक्त सुशासन और उसके इर्द-गिर्द की मजबूत मिटटी है जनता का उसके प्रति अटूट विश्वास.अगर इस पेड़ को समय रहते भ्रष्टाचार की इस विषबेल से नहीं बचाया गया और इसका वक़्त पर उपचार नहीं किया गया तो फिर एक दिन निश्चित रूप से यह पेड़ खोखला होकर सूखे ठूंठ में बदल जाएगा और मर जाएगा.शायद वह दिन अब ज्यादा दूर रह भी नहीं गया है.तब न तो इसे हिलाने की आवश्यकता होगी और न ही ईलाज करने की ही.इसलिए हमें अब से और अभी से ही भ्रष्टाचार की इस विषबेल को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाने शुरू कर देने चाहिए.तभी भारत में लोकतंत्र बच पाएगा और हमारे मदमस्त जनप्रतिनिधियों के पद भी शेष रह रह पाएँगे.वास्तव में भारतीय लोकतंत्र के वटवृक्ष को खतरा भ्रष्टाचार से है न कि जनांदोलनों से.बल्कि जनांदोलनों की सफलता से ही हमारे लोकतंत्र की सफलता का मार्ग अग्रसर होने वाला है.अब तो सरकार द्वारा इस दिशा में कदम उठाये जाने की भी इन्तहां हो रही है.दुष्यंत कुमार के शब्दों में 'हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए;सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.'          

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

आग,धुंआ और टीम इंडिया

मित्रों,हमारे गांवों में एक कहावत है कि जो पंडित विवाह का मंत्र जानता है उसे श्राद्ध का मंत्र भी पता होता है.मतलब  कि बीसीसीआई के जो अधिकारी किसी युवक को स्टार बनने का मौका दे सकते हैं नाराज होने पर उसे बर्बाद भी कर सकते हैं.जो दर्शक चौबीसों घंटे टीवी के परदे पर किसी प्यासे चातक की तरह नजरें गड़ाए रहते हैं उन्होंने सपने में भी यह नहीं सोंचा होता है कि भारतीय क्रिकेट का असली खेल टीवी के परदे पर नहीं बल्कि परदे के पीछे चल रहा होता है भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड में.ये क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड वाले पहले तो किसी कप्तान या खिलाडी की पतंग को खूब ऊंचाई तक उड़ने की ढील देते हैं और जब उनकी पतंग ऊंचाईयों की उनकी बनाई हुई हदों तक पहुँच जाती है तब चुपके से डोर को ही काट देते हैं.
                मित्रों,कुछ इसी तरह की शरारत भारतीय क्रिकेट इतिहास के तब तक के सबसे सफल कप्तान सौरव गांगुली के साथ भी की गयी और अब शायद महेंद्र सिंह धोनी के खिलाफ भी कुछ उसी तरह की साजिश रची जा चुकी है.वर्ना धोनी जैसा जीवटवाला कप्तान जिसके नेतृत्व में भारतीय टीम ने न केवल २८ साल बाद विश्वकप जीता बल्कि पहली बार टेस्ट क्रिकेट में नंबर एक का ताज भी पहना अब टेस्ट क्रिकेट से ही संन्यास लेने की बात नहीं करता.तर्कशास्त्र में एक सूक्ति खूब प्रचलित है कि धुंआ वहीं पर होता है जहाँ आग होती है.मतलब कि बिना धुंए की आग भले ही इस २१वीं सदी में जलाना संभव हो गया हो लेकिन बिना आग जलाए असली धुंआ उत्पन्न हो ही नहीं सकता;उसके लिए तो निर्धारित तापमान चाहिए ही.
                        मित्रों,कुछ ही दिनों पहले से ऑस्ट्रेलियन मीडिया में भारतीय क्रिकेट टीम से जुडी हुई कुछ इस तरह की ख़बरें छन-छन कर बाहर आ रही हैं कि इस समय भारतीय क्रिकेट टीम में कप्तान धोनी के खिलाफ विद्रोह भड़क उठा है और जिस तरह गांगुली को बेआबरू करके टीम से निकालने के समय विद्रोह का नेतृत्व राहुल द्रविड़ ने किया था उसी तरह इस समय वीरेंदर सहवाग विद्रोह की कमान संभाल रहे हैं.इन आशंकाओं को तब और भी बल मिल गया जब ब्रायन लारा और सौरव गांगुली ने ऑस्ट्रेलिया में टीम की हार पर धोनी का बचाव करते हुए कहा कि धोनी बहुत अच्छे कप्तान हैं और उनकी कप्तानी में अब भी कोई कमी नहीं है उन्हें अपनी टीम का सहयोग नहीं मिल पा रहा.ऐसा टीम के अन्य खिलाडी क्यों कर रहे हैं यह उन्होंने नहीं बताया.बस एक संकेत भर देकर चुप हो गए. क्रिकेट पिच पर तो अनिश्चितताओं का खेल है ही;भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की अंदरूनी राजनीति भी कम अनिश्चिततापूर्ण नहीं है.कब किसको बाहर बिठाना है और किसको अर्श से फर्श पर चढ़ाना है और फिर किसको सफलता की बुलंदियों पर चढ़ने के मौका देकर धक्का दे देना है;इसका फैसला खिलाडियों का प्रदर्शन नहीं करता हमारी बीसीसीआई के घाघ अधिकारी करते हैं.शायद इन शानिदेवों की वक्रदृष्टि के ताजा शिकार बने हैं क्रिकेट के तीनों संस्करणों में भारत के सबसे सफल कप्तान बन चुके महेंद्र सिंह धोनी.हो सकता है कि टीम के सहवाग सरीके खिलाडियों को और टीम प्रबंधन को भी अब एक जन्मना बिहारी का नेतृत्व खटकने लगा हो.टीम इण्डिया हमेंशा से ही भारतीय एकता का प्रतीक रही है.उसमें क्षेत्रवाद का उभार होना न केवल भारतीय क्रिकेट के लिए हानिकारक होनेवाला है वरन यह इस संक्रमण काल में देश की एकता को भी कमजोर करेगा अच्छा होता अगर टीम इण्डिया और प्रबंधन धोनी पर पूरा विश्वास करते और उसके साथ पूर्ण सहयोग करके भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाईयों तक पहुँचाने का अवसर देते क्योंकि धोनी जैसे कप्तान किसी देश और टीम को बार-बार नहीं मिला करते.अगर यह सच है तो धोनी की कप्तानी में जानबूझ कर कुछ खिलाडियों का ख़राब खेलना देश के साथ-साथ खेल-भावना के साथ भी धोखा है.

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

शिकारी आएगा जाल बिछाएगा

मित्रों,मौसम विज्ञान के आंकड़ों पर अगर हम विश्वास करें तो भारत में सबसे ज्यादा ठंडा जनवरी का महीना होता है लेकिन अगर हम देश की राजनीतिक जलवायु की दृष्टि से विचार करें तो यह गुजर रहा मौजूदा महीना सबसे ऊंचे तापक्रम वाला है.सारे राजनीतिक दल इस समय अचानक पेशेवर शिकारी बन गए हैं और पाँच राज्यों की जनता को अतिमधुर लोरियाँ सुनाने में लगे हुए हैं और इस फ़िराक में हैं कि कब जनता सोए और वे उसका बहुमूल्य वोट ले उड़ें.कोई तो सीधे पैसे देकर वोट खरीद रहा है तो कोई जनता को वायदों की मीठी चाशनी में नहलाने में व्यस्त है.
                   मित्रों,मेरे गुरूजी श्रीराम बाबू जब मैं मध्य विद्यालय में पढ़ता था तब एक कहानी सुनाया करते थे.कहानी में भी एक गुरूजी थे लेकिन थे गुरुकुल के जमानेवाले.गुरूजी ने कई तोते पाल रखे थे जिन्हें अक्सर शिकारी बहेलिये जाल में फंसा लिया करते और बाजार में बेच देते.गुरूजी ने फिर अपने तोतों को बहेलिए से बचाने की एक फुलप्रूफ योजना बनाई.उन्होंने अपने तोतों को पाठ रटाना शुरू कर दिया कि शिकारी आएगा,जाल बिछाएगा;दाना डालेगा,लोभ से उसमें फँसना नहीं.अगली बार जब शिकारी आया तो पास के पेड़ पर बैठे गुरूजी के तोतों ने एक साथ शोर मचाना शुरू कर दिया कि शिकारी आएगा,जाल बिछाएगा;दाना डालेगा,लोभ से उसमें फँसना नहीं.शिकारी परेशान हो गया कि आज तो बहुत गड़बड़ है.तोते पहले से ही लोभ से नहीं फंसने का राग अलाप रहे हैं.फिर भी उसने अपने आराध्य का नाम लेकर डूबती हुई उम्मीद से ही सही जाल बिछाया और दाना डाला.परन्तु यह क्या लोभ से नहीं फँसने का तुमुल शाब्दिक नाद करनेवाले सारे-के-सारे तोते तो एक ही बार में आकर जाल में फँस गए.
                       मित्रों,कहीं फिर से यह पौराणिक प्रतीकात्मक कथा तो ५ राज्यों में नहीं दोहराई जाने वाली है.डर लगता है कि हमारी निरीह जनता कहीं फिर से वोटों के शिकारियों के जाल में तो नहीं फँस जाने वाली है.कोई उन्हें आरक्षण देने का दाना दाल रहा है तो कोई देश को केंद्र में कुशासन देने के बाद राज्यों में सुशासन देने का वादा किए जा रहा है.किसी को अपने जातिवादी सामाजिक समीकरण पर अटूट भरोसा है तो कोई दूसरे दलों के भ्रष्ट और रिजेक्टेड नेताओं को अपनाने के लिए पगलाया जा रहा है तो कोई जनता को जाति-धर्म में बाँटने के बाद राज्य को ही कई-कई भागों में बाँट देने का वादा कर रहा है.जोड़ने की बात कोई नहीं कर रहा सबके सब तोड़ने में ही लगे हैं.जनता भी विकल्पहीन है क्योंकि जब सबके सब रिजेक्ट करने के ही लायक हैं तो फिर वोट दिया जाए तो किसे?राईट टू रिजेक्ट का अधिकार होता तो इस समय उसका भरपुर लाभ उठा लिया जाता परन्तु वो तो अभी भी बहुत दूर की कौड़ी है.इसलिए किसी-न-किसी को तो वोट देना और चुनना है ही भले ही वो कितना भी डिफेक्टिव और रिजेक्टेबल क्यों न हो.फिर भी इस उपलब्ध अवस्था में भी अगर वे अपने विवेक का समुचित इस्तेमाल करें तो देश और प्रदेश की लगातार बिगडती स्थिति को समय रहते संभाला जा सकता है.बस उन्हें करना यही है कि वे भी इस सूत्र-वाक्य का रट्टा लगा डालें और गुरूजी के तोतों की तरह सिर्फ रट्टा ही नहीं लगाएँ बल्कि उस पर गंभीरता से अमल भी करें कि शिकारी आएगा,जाल बिछाएगा;दाना डालेगा,लोभ से उसमें फँसना नहीं.बस!!
                  

शनिवार, 14 जनवरी 2012

अब तो भगवान भी नहीं रहे सुरक्षित


मित्रों,हमारा देश इस समय जनसंख्या-विस्फोट के युग से गुजर रहा है.जहाँ देखिए वहीं अनियंत्रित और अनुशासनहीन भीड़.नई पीढ़ी प्रत्येक पुराने मूल्य को नकारने पर आमादा है.मानो केवल पुराना होना ही सबसे बड़ा कलंक हो गया.पुराने मूल्य ध्वस्त हो रहे हैं और नए मूल्यों की स्थापना भी नहीं हो रही.परिणाम यह है कि हमारा भारतीय समाज एक शाश्वत मूल्यहीनता के दौर में प्रवेश कर गया है.एक ऐसे दौर में जिसके दोनों सिरों पर अंधेरा-ही-अंधेरा है,अंधेरे का विकट साम्राज्य.
                    मित्रों,एक समय था जब हम लोग मंदिरों और देवमूर्तियों को सत्य का अंतिम ठिकाना मानते थे.दो लोगों में किसी बात को लेकर गंभीर विवाद पैदा हो गया और सच-झूठ का निर्णय नहीं हो पा रहा है तो फिर चलिए दोनों पक्ष देवमूर्ति को छूकर खाइए कसम कि पुत्र मर जाए या पति मर जाए जो मैं झूठ रहा/रही होऊँ.लोगों का अटल विश्वास था कि कोई बेईमान-से-बेईमान व्यक्ति भी देवमूर्तियों को छूकर झूठी कसमें नहीं खाएगा और अगर वह ऐसा करता है तब वह देवमूर्ति उसे अवश्य दण्डित करेगी.इस प्रकार समाज में धर्म और अधर्म व विश्वास और अविश्वास के बीच एक प्रभावकारी संतुलन बना रहता था.
                            मित्रों,फिर वो दौर भी आया जब झूठी कसमें खानेवालों ने पाया कि ऐसा करने से कोई नुकसान तो होता ही नहीं.फिर तो हमारे धर्मभीरु समाज में ऐसा करनेवालों की संख्या बढती ही चली गयी.साथ ही क्रमशः देव मूर्तियों और मंदिरों के प्रति लोक-आस्था में भी गिरावट का दौरे-दौरा चलता रहा और आज हमारा समाज एक ऐसे मुकाम पर आ पहुंचा है जहाँ इन मंदिरों और देवमूर्तियों के अस्तित्व पर ही खतरा उत्पन्न हो गया है.सबसे पहले २०१० में रजरप्पा स्थित महान छिन्नमस्तिका मंदिर से माता की पिण्डिका को चोरों द्वारा ध्वस्त कर देने और उसमें से मूल्यवान धातुओं और पत्थरों की चोरी की घटना घटी और फिर तो यह सिलसिला ही चल पड़ा.अब हालत ऐसी हो गयी हैं कि हमारे प्रदेश का कोई भी मंदिर या मूर्ति सुरक्षित नहीं है.ये मंदिर या इनमें स्थापित मूर्तियाँ केवल एक जड़-वस्तु नहीं हैं बल्कि ये लोक-आस्था के उद्दाम प्रतीक भी हैं.लोगों के इस विश्वास का प्रतीक कि जब भी मन निराश हो  जाए और चारों तरफ से पंगु हो जाए तब उसे ईश्वर सहारा देता है.लोगों की इस आस्था के प्रतीक हैं ये कि जब भी कोई पाप करेगा तो उसे उसका दंड अवश्य भुगतना पड़ेगा.अगर ये आस्था और विश्वास के दुर्ग ढह गए तो फिर कोई भी अधर्म करने से नहीं डरा करेगा और तब निश्चित रूप से समाज में कभी दूर नहीं हो सकनेवाली अव्यवस्था उत्पन्न हो जाएगी और हम फिर से एकबारगी आदिकालीन सामाजिक स्थिति में पहुँच जाएँगे जिस समाज का सिर्फ एक ही धर्म होगा और आस्था भी एक ही होगी कि जिसकी लाठी उसकी भैंस.फिर तो बलवान अपने से निर्बलों पर इस कदर कहर ढाएंगे कि मानवता की रूह ही कांपने लगेगी.न तो किसी का धन ही सुरक्षित रहेगा और न ही स्त्री ही.तब भाई ही बहनों के साथ बलात्कार किया करेंगे अथवा बहनें ही भाइयों के साथ सम्बन्ध बनाने के लिए बेहाल होने लगेंगी.
                मित्रों,प्रत्येक क्रिया का कोई-न-कोई कारण होता है.नई पीढ़ी की मूल्यहीनता के भी कारण हैं.मेरी समझ से सबसे बड़ा कारण है दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली.हम उन्हें शिक्षित तो कर रहे हैं परन्तु दीक्षित नहीं कर रहे.हमने उन्हें यह तो रटा दिया की सत्यं वद,धर्मं चर परन्तु खुद कभी सत्याचरण नहीं किया और जीवनपर्यंत अधर्म और अनीति में लीन रहे.हमारी नई पीढ़ी को केवल कोरे शब्द नहीं चाहिए उन्हें तो उदहारण भी चाहिए और अगर हमें सनातन भारतीय सामाजिक मूल्यों की रक्षा करनी है,अपनी इस अमूल्य थाती को बचाना है तो हमें खुद ही उदाहरण बनना पड़ेगा.कोई राम या कृष्ण धर्म की स्थापना के लिए नहीं आनेवाले जो भी करना होगा हमें ही करना होगा.परन्तु क्या हम ऐसा करेंगे.............?

शनिवार, 7 जनवरी 2012

सुशासन मतलब अंधा,बहरा और बड़बोला शासन

मित्रों,यह घटना तब की है जब १९८० में स्वर्ग सिधार चुके मेरे दादाजी अनिवार्य रूप से जीवित थे.हुआ यूं कि मेरे गाँव जुड़ावनपुर के पडोसी गाँव चकसिंगार से नाई भोज का न्योता देने आया और गलती से मेरे घर भी न्योता दे गया जबकि उसे देना नहीं था.दो घंटे बाद वह सकुचाता हुआ दोबारा आया और मेरे दादाजी से बोला कि वह न्योता वापस लेने आया है.दादाजी ने भी छूटते ही कहा कि दरवाजे पर जो संदूक रखा हुआ है अभी तक न्योता उसी पर पड़ा हुआ है,उन्होंने न्योते को घर तो भेजा ही नहीं है.जाओ और संदूक पर से ले लो.बेचारे नाई की समझ में कुछ भी नहीं आया.न्योता कोई भौतिक वस्तु तो था नहीं कि दिखाई दे और वह उसे अपने साथ उठाकर ले जा सके.
                  मित्रों,कुछ इसी तरह की स्थिति इन दिनों बिहार में सुशासन की है.प्रिंट मीडिया लगातार राज्य में सुशासन स्थापित होने का रट्टा लगे हुए है.उसे सरकारी तंत्र के कण-कण में सुशासन दिखाई दे रहा है.कैसे और क्यों दिखाई दे रहा है यह मीडिया ही जाने.कभी 'खींचो न कमान न तलवार निकालो,जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो' कहनेवाले अकबर इलाहाबादी ने अख़बारों से मोहभंग होने के बाद उन पर व्यंग्य करते हुए कहा था कि 'मियां को मरे हुए हफ्ते गुजर गए,कहते हैं अख़बार मगर अब हाले मरीज अच्छा है.'अकबर इलाहाबादी को मरे सौ साल पूरे होने को हैं मगर देश के अख़बारों की स्थिति अब भी वैसी ही है.अभी कल ही पटना उच्च न्यायालय ने बिहार की सर्वोच्च नियुक्ति करनेवाली संस्था बीपीएससी को ५३वीं  से 55वीं प्रारंभिक संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा के प्रश्न-पत्र से ८ गलत प्रश्नों को हटाकर फिर से असफल परीक्षार्थियों की कापियों का मूल्यांकन कर १४२ को पूर्णांक मानते हुए अतिरिक्त परिणाम प्रकाशित करने का आदेश दिया है.क्या प्रतिष्ठित बिहार लोक सेवा योग द्वारा १५० सही-सही प्रश्नोत्तर तैयार नहीं कर पाने में दोबारा अक्षम रहने को सुशासन का नाम दिया जा सकता है?अभी कल की ही बात है कि मैं महनार से हाजीपुर बस से आ रहा था.मेरे बगल में एक महनार थाना के स्टाफ बैठे हुए थे.उन्होंने भाड़ा मांगने पर खुद को थाना स्टाफ बताया और सामान्य यात्रियों से १ रूपया कम मिलने पर भी १ घंटे तक बहस और गाली-गलौज करने की भरपूर क्षमता से युक्त कंडक्टर बिना प्रतिवाद किए चला भी गया.जब मैंने उनसे उनकी मुफ्तखोरी का विरोध किया तो वे मुझ पर ही आग हो गए परन्तु खुद को प्रेसवाला बताते ही फिर पानी-पानी भी हो गए और बताया कि चूंकि बस वाले कागजात ठीकठाक नहीं रखते हैं इसलिए वे भी उन्हें भाड़ा नहीं देते.दानापुर निवासी श्रीमान का यह भी कहना था कि जब नेता और अफसर बड़े-बड़े घोटाले करते रहते हैं तब तो प्रेस चुपचाप रहता है और आप मेरे द्वारा २५ रूपये बचाने पर मेरे पीछे पड़े हुए हैं?गजब चीज है यह कथित सुशासन भी.चाहे बिना परमिट के बसें चलाओ या फिर एक ही नंबर पर कई-कई बसें चलाओ कोई भी पुलिस अधिकारी आपको रोकेगा-टोकेगा नहीं बस थाना-स्टाफ को अपने बसों में मुफ्त में चढ़ाते रहो.
              मित्रों,कई वर्ष हुए.२००६-०७ में मेरे चचेरे मामा जिन्हें मैं शुरू से ही भ्रष्टाचारियों के लिए आदर्श मानता हूँ राजेश्वर प्रसाद सिंह जो तब जन्दाहा प्रखंड के नाड़ी महथी या नाड़ी खुर्द में प्रधानाध्यापक थे एक सहायक शिक्षक से घूस लेते रंगे हाथों निगरानी द्वारा पकडे गए.करीब डेढ़ साल तक जेल में रहने के बाद वे बाहर आए और बाहर आते ही न जाने कैसे राजकीय मध्य विद्यालय,बासुदेवपुर चंदेल के प्रधानाध्यापक बना दिए गए और साथ ही कई-कई अन्य विद्यालयों के सुपरवाईजर भी.सुशासन की कृपा से एक बार फिर इस भ्रष्टाचारी की बीसों ऊंगलियाँ घी में हैं और सिर कराह में.फिर से श्रीमान दोनों हाथों से घूस खाकर सच्चा सुशासन स्थापित करने में मशगूल हो गए हैं.निगरानी द्वारा वर्ष २००६-०७ में उन पर दर्ज मुकदमें का क्या हश्र हुआ यह शायद सुशाशन बाबू को बेहतर पता होगा.निगरानी द्वारा छापा मारने और फिर बाद में ले-देकर मामले को कमजोर कर देने ताकि मुजरिम आसानी से कानून के शिकंजे से छूटकर फिर से तंत्र को खोखला कर सके;का यह न तो पहला उदाहरण है और न तो अंतिम ही.हुआ तो मुजफ्फरपुर/हाजीपुर में ऐसा भी है कि राज्य खाद्य निगम के एक पदाधिकारी को जब निगरानी द्वारा घूस लेते रंगे हाथों पकड़ा गया तब निगरानी के पदाधिकारी ने उससे उसके आधा दर्जन से अधिक एटीएम कार्ड छीन लिए और डंडे के जोर पर पिन भी जान लिया.बाद में अभियुक्त ने शिकायत की कि उसके बैंक एकाउंट से उक्त पदाधिकारी ने लाखों रूपये निकाल लिए हैं.क्या मिलेगा आपको इस भूमंडल पर गुड गवर्नेंस का दूसरा ऐसा नायाब उदाहरण?
                  मित्रों,बिहार में सुशासन ने सबको लूटने का समान अवसर दिया है.पूरी तरह से इस मामले में यहाँ साम्यवाद स्थापित हो गया है.जो जनवितरण प्रणाली के दुकानदार लालू-राबड़ी राज में फटेहाली की अवस्था में पहुँच गए थे इन दिनों दिन अढ़ईया रात पसेरी की दर से मोटे होते जा रहे हैं.साल में छह महीने भी अगर बी.पी.एल. के लिए आनेवाले अनाज की कालाबाजारी कर दी तो हो गए बिना के.बी.सी. में भाग लिए करोड़पति.आटा चक्की वालों की भी पौ बारह है.इन्हें भी बाजार से काफी कम कीमत पर गेहूँ-चावल मिल जाता है और फिर ये लोग जो पहले गेहूँ के साथ सिर्फ घुन को पीसते थे अब जबरदस्त तरक्की करते हुए गेहूँ में मिलाकर चावल पीसने लगे हैं.फिर यह अतिपौष्टिक मिश्रण किराना दुकानदारों के हाथों बेच दिया जाता है जिसे खरीदनेवाला ग्राहक भी परेशान रहता है कि आटे की रोटी क्यों अच्छी नहीं बन रही है?ग्राम पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधियों का तो कहना ही क्या?सुशासनी भ्रष्टाचार की कृपा से गांवों में इस दिनों रामराज्य उतर आया है-काजू भुने प्लेट में व्हिस्की है गिलास में,उतरा है सुशासन ग्राम-प्रधान के निवास में.
            मित्रों,सुशासनी अफसरशाही का तो नाम ही मत लीजिए.सुशासन और अफसरशाही का तो गठबंधन ही अनोखा है.'मेरे शासन में मेरा कुछ नहीं जो कुछ है सब तोर,तेरा तुझको सौंपते क्या लागे है मोर?'इस समय पूरा बिहार अफसरों के हवाले है.कोई विधायक तो क्या मंत्री भी थाने तक में कदम रखने से हिचकिचाते हैं.पूरे बिहार में 'पहले पुलिस को बाखबर करना,फिर चाहे जुर्म रातभर करना' की तर्ज पर अपराध किए जा रहे हैं,घोटाले भी किए जा रहे हैं.कुछ लोग तो इस स्थिति से इतने अधिक निराश हो चुके हैं कि उनका मानना है कि अगर इसी तरह से चलता रहा तो २०५० आते-आते भगवान को प्रलय करना पड़ेगा.
                       मित्रों,चर्चा सुशासन की हो और शिक्षा की बात नहीं हो तो बात कुछ हजम ही नहीं होती.सुशासन छात्र-छात्रों के बीच लगातार साइकिल और पोशाक की राशि वितरित कर रहा है.चाहे पढ़ानेवाले मारसाहेब पढाई या लिखाई में जीरो-जीरो ही क्यों न हों या फिर सिर्फ खिचड़ी का अनाज बेचकर पैसे बनाने में ही मशरूफ क्यों न हों.छात्र-छात्राएं खुश हैं कि उन्हें सुशासन से मुफ्त में साइकिल और पोशाक के लिए पैसे प्राप्त हो रहे हैं.अभी से ही उन्हें मुफ्तखोरी की आदत लगाई जा रही है ताकि वे भी बड़े होकर बैठे-बैठे मनरेगा से पैसा उठाएं और सस्ता अनाज लक्षित जनवितरण प्रणाली की दुकान से खरीद कर पड़े-पड़े खाते रहें.परन्तु जब किसानों को मुफ्त में ही पैसा और अनाज मिल रहा है तो फिर खेती कोई क्यों करेगा और फिर कृषि-क्षेत्र में सुशासन बाबू की इन्द्रधनुषी क्रांति का क्या होगा?
                    मित्रों,अभी-अभी १८ दिसंबर को सचिवालय सहायक की परीक्षा कथित सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई है.परीक्षा के दौरान तीन किताबें साथ रखने की अनुमति थी.प्रश्न-पत्र मिला तो पता चला कि निगेटिव मार्किंग भी है.पृष्ठ उलटने पर पाया कि प्रश्न बहुत-ही कठिन प्रकृति के हैं.इतने कठिन कि पूरा बना पाना भी संभव नहीं था सो अधिकांश परीक्षार्थियों ने उत्तर-पत्रक पर कई प्रश्नों के उत्तर बिना रंगे ही छोड़ दिए.बस यहीं से बन गयी गड़बड़ी की गुंजाईश.अब अगर परीक्षा संचालित करनेवाले लोगों ने खाली खानों में जानबूझकर गलत उत्तर को रंग कर अंक कम करवा दिया तो परीक्षार्थी क्या कर लेगा?कुछ भी नहीं न!सूत्रों से पता यह भी चल रहा है कि इस परीक्षा के लिए सीटें बिक भी चुकी हैं और ज्यादातर पद मंत्रियों के परिवारवाले ले उड़ने वाले हैं.एक तो निगेटिव मार्किंग फिर उस पर सितम यह कि प्रश्न-पत्र भी वापस ले लिया जबकि बिहार लोक सेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षाओं की तरह ही इस परीक्षा में भी कई प्रश्नोत्तर गलत थे.अब तो परीक्षार्थी मुकदमा भी नहीं कर सकता.होना तो यह चाहिए कि यह परीक्षा फिर से ली जानी चाहिए.इस बार परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र परीक्षा के बाद घर ले जाने की इजाजत मिलनी चाहिए और निगेटिव मार्किंग भी नहीं की जानी चाहिए.ऐसा होने पर ही इस परीक्षा में गड़बड़ी की आशंकाओं को निर्मूलित किया जा सकेगा वर्ना यह परीक्षा और इसके द्वारा होनेवाली नियुक्तियाँ हमेशा संशय के घेरे में रहेंगी.
                मित्रों,अब थोड़ी बात कर लें बहुचर्चित सेवा का अधिकार कानून की जो हाथी का या यह भी कह सकते हैं कि सुशासन का दिखाने का दांत बनकर रह गया है.लोग रसीद हाथों में लिए महीनों से दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं और उन्हें बिना मेवा खिलाए सेवा प्राप्त ही नहीं हो रही.अगरचे अधिकतर प्रार्थियों को तो रसीद भी नहीं दी जाती.एक अदद आय प्रमाण-पत्र या आवासीय प्रमाण-पत्र के लिए लोग कहाँ-कहाँ अपील करते फिरें समझ में ही नहीं आता?कागजों पर तो सेवा का अधिकार मिल गया परन्तु हकीकत में क्या कभी मिल भी पाएगा;यह आज भी सबसे बड़ा प्रश्न बना हुआ है?सुशासन ने पहले ही सूचना के अधिकार में मनमाना संशोधन कर उसे मृतप्राय बना दिया है फिर जनता भ्रष्टाचार से पीड़ित होने या काम नहीं होने की दशा में करे भी तो क्या करे?कुछ ऐसा ही हाल अगर निकट-भविष्य में नवस्थापित लोकायुक्त का भी देखने को मिले तो किसी को भी उसकी परिणति पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए.आखिर सुबह को देखकर ही तो दिन के मौसम का अंदाजा लग जाता है.
               मित्रों,अंत में हम आते हैं नीतीश कुमार जी द्वारा समय-समय पर की जानेवाली यात्राओं पर.आज ही उनकी सेवा-यात्रा समाप्त हो रही है.कभी धन्यवाद्-यात्रा तो कभी कोई और यात्रा.कभी सम्राट हर्षवर्धन भी छठी शताब्दी में इसी तरह यात्राओं पर निकला करते थे और जनता के सुख-दुःख को समझा करते थे.परन्तु नीतीशजी तो अपनी यात्राओं के दौरान जनता और अधिकारियों को बोलने ही नहीं देते.धन्यवाद्-यात्रा के दौरान पिछली बार सुशासन बाबू ने धड़ल्ले से अनगिनत शिलान्यास कर डाले और फिर भूल भी गए.इस दौरान सारी जनता से मिलते भी नहीं और न ही सबका दुःख-दर्द ही सुनते हैं.उन्हें तो बस वही सुनाई देता है जो वे सुनना चाहते हैं,उन्हें तो सिर्फ वही दिखाई देता है जो वे देखना चाहते हैं और फिर प्रिंट मिडिया वही बोलता है जो वे उससे बोलवाना चाहते हैं.वरना सेवा-यात्रा के दौरान जदयू सांसद महाबली सिंह को नीतीश कुमार की मौजूदगी में जनता द्वारा सैंकड़ों की संख्या में मंच के सामने पंक्तिबद्ध होकर जूते दिखाए जाने और बाद में मुख्यमंत्री द्वारा स्वयं हस्तक्षेप करने पर शांत होने की खबर अख़बारों से गायब नहीं हो गयी होती.मैंने खुद कई बार कई तरह के मामलों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी को ई-मेल किया है,खुले पत्र भी लिखे हैं और अपने पूर्व के लेखों की तरह ही अपने इस लेख को भी उन्हें ई-मेल करने जा रहा हूँ परन्तु मेरे पूर्व के सारे प्रयासों का परिणाम अब तक शून्य ही रहा है और उम्मीद की जानी चाहिए कि इस लेख को पढ़कर भी सुशासन बाबू के छोटे-छोटे कानों पर जूँ तक नहीं रेंगनेवाली है.कुल मिलाकर हमने अब तक की माथापच्ची से पाया कि सुशासन अंधा और बहरा होता है लेकिन गूंगा नहीं होता बल्कि बड़बोला होता है.हो सकता है कि मेरे किसी अन्य राज्य में रह रहे भाई-बन्धुओं द्वारा सुशासन की दी गयी परिभाषा मेरी परिभाषा से अलग हो लेकिन बिहार में तो फ़िलहाल सुशासन का मतलब यही है.

रविवार, 1 जनवरी 2012

नए साल की प्रातः बेला में

नए साल की प्रातः बेला में,
आओ मिलकर दिया जलाएँ;
ईश्वर से हम करें प्रार्थना,
उच्च आदर्शों के  पुष्प चढ़ाएँ.

सरक जाता है जिस तरह रेत
समझ ले मानव मुठ्ठी से,
निकल गया यह कालखंड भी
सरककर आज हमारी मुठ्ठी से;
दुर्गुणों पर विजय करें हम
देश का जग में मान बढाएँ;
नए साल की प्रातः बेला में,
आओ मिलकर दिया जलाएँ.

क्या खोया क्या पाया हमने,
देखी प्रभु  की माया हमने?
भटक रहे हम जिसकी खोज में
क्या उसे पाकर भी पाया हमने?
भटक गए हम स्वयं के अरण्य में
आओ खुद का पता लगाएँ;

नए साल की प्रातः बेला में,
आओ मिलकर दिया जलाएँ.

क्या सीखा हमने इस बीते वर्ष से?
क्या किया हमने इस बीते वर्ष में?
सोंचा है कभी शांतचित्त होकर
करना क्या है नए वर्ष में?
आओ मिलकर सोंचें-विचारें
नववर्ष की योजना बनाएँ;

नए साल की प्रातः बेला में,
आओ मिलकर दिया जलाएँ.

आया है समय नए अवसर लेकर
करें प्रयत्न हम नव निर्माण का;
बीते दिनों के ध्वंस भुलाकर
करें स्वागत हम नवविहान का;
जाना है हमें मंजिल तक
आओ मिलकर कदम बढाएँ;  

नए साल की प्रातः बेला में,
आओ मिलकर दिया जलाएँ;
ईश्वर से हम करें प्रार्थना,
उच्च आदर्शों के  पुष्प चढ़ाएँ. 

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

अनशन तोड़ना अन्ना का सराहनीय कदम

मित्रों,कोई भी आन्दोलन खड़ा करना और फिर उसे सफलतापूर्वक संचालित करना कोई बच्चों का खेल नहीं होता.कांग्रेस गाँधी के पहले भी थी.उसके पास गाँधी से भी कहीं ज्यादा योग्य नेता भी थे लेकिन वे लोग लाख कोशिश करके भी ऐसा आन्दोलन खड़ा नहीं कर पाए जिसे सही परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय कहा जा सकता हो.गाँधी ने १९२० में असहयोग आन्दोलन शुरू करने से पहले मुस्लिम लीग को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि दल स्वीकार करने की महान भूल करते हुए असहयोग आन्दोलन को खिलाफत आन्दोलन से जोड़ दिया था.जैसे ही तुर्की में मुस्तफा कमाल पाशा सत्ता पर काबिज हुआ मुसलमान लोग कट लिए और केरल में तो हिन्दुओं के खिलाफ दंगा-फसाद भी शुरू कर दिया.इसी बीच गोरखपुर में चौरी-चौरा की दुखद घटना हो गयी और गाँधी को १२ फरवरी,१९२२ को न चाहते हुए भी अपनी सारी विश्वसनीयता को दांव पर लगाते हुए असहयोग आन्दोलन को असमय बिना किसी परिणति तक पहुंचे हुए ही वापस  ले लेना पड़ा.कुछ यही हाल १९३० के सविनय अवज्ञा आन्दोलन का भी हुआ.पहले तो १९३१ में गाँधी-इरविन समझौते के बाद उन्होंने आन्दोलन को स्थगित कर दिया.फिर द्वितीय गोलमेज सम्मलेन की विफलता के बाद फिर से आन्दोलन शुरू किया परन्तु इस बार आन्दोलन में वो खनक नहीं थी आने पाई जो इसके पहले भाग में थी.कारण यह था कि इस बार इसमें जनभागीदारी काफी कम थी.किसी भी देश-प्रदेश की जनता की संघर्ष की क्षमता सीमित होती है.वो लगातार अनंत काल तक संघर्ष नहीं कर सकती.हरेक की घर-गृहस्थी भी होती है और उसे भी देखना होता है.इसलिए गांधीजी ने समझदारी का परिचय देते हुए अप्रैल,१९३४ में आन्दोलन को वापस ले लिया.
                                मित्रों,कुछ इसी तरह की स्थिति १९४२ के भारत छोडो आन्दोलन के दौरान भी रही.धीरे-धीरे इसका भी प्रभाव कम होता गया और अंत में सितम्बर १९४२ के बाद यह आन्दोलन भूमिगत होकर रह गया.दिसंबर,१९४३ आते-आते भूमिगत क्रांतिकारियों की गतिविधियाँ भी समाप्तप्राय हो गयी.हाँ,लेकिन गाँधी के साथ एक बात और भी थी.वे जब आन्दोलन नहीं कर रहे होते थे तब सामाजिक-रचनात्मक कार्य कर रहे होते थे.इससे समाज में नई चेतना का प्रसार तो होता ही था नए लोगों को भी कांग्रेस के साथ जोड़ा जाता था.जहाँ तक गाँधी के आंदोलनों में मुसलमानों की भागीदारी का प्रश्न है तो इस मामले में गाँधी भी भाग्यशाली नहीं थे और तब मुस्लिम लीग गाहे-बेगाहे इस बात का ढिंढोरा पीटती रहती थी कि कांग्रेस सिर्फ हिन्दुओं की पार्टी है और इस प्रकार एक सांप्रदायिक संगठन है.
                             मित्रों,इस समय अन्ना के आन्दोलन के सन्दर्भ में कुछ यही काम गाँधी की विरासत का दावा करनेवाली कांग्रेस पार्टी कर रही है.टीम अन्ना के लाख प्रयासों के बाबजूद कांग्रेसी प्रोपेगेंडे ने असर दिखाया और इस बार मुसलमान आन्दोलन से दूर ही रहे.साथ ही,दूसरी आम जनता की भी इस तीसरी बार हो रहे अन्ना के अनशन में काफी कम भागीदारी देखी गयी.कहाँ रह गयी कमी?शायद कमी रह गयी टीम अन्ना की रणनीति में.मेरे मतानुसार पहली कमी तो यह थी कि टीम अन्ना ने आन्दोलन के लिए गलत समय का चयन कर लिया.इस समय संसद में लोकपाल पर बहस चल रही है और पूरे देश की निगाहें उसी पर टिकी हुई हैं ऐसे में लोगों से यह उम्मीद कर लेना कि वे संसद पर पूरी तरह से अविश्वास प्रकट करते हुए अन्ना के समर्थन में सड़कों पर आ जाएँगे बेमानी थी.दूसरी कमी रही आन्दोलन के लिए स्थान चयन में.अन्ना ने अपनी और जनता की सुविधाओं का ख्याल करते हुए दिल्ली के बजाये मुम्बई को आन्दोलन का केंद्र बनाने का फैसला कर लिया.वे भूल गए कि आन्दोलन सुविधाओं को ध्यान में रखकर नहीं छेड़े जाते हैं बल्कि इसके लिए तो जनभावनाओं का उभार चाहिए होता है.दिल्ली और मुम्बई के लोगों के मिजाज में ही मौलिक अंतर है.मुम्बई एक बेहद व्यस्त शहर है.वहां के लोग इतने अधिक स्वयंसीमित होते हैं कि उनकी दिनचर्या पर २६-११ से भी कोई फर्क नहीं पड़ता.वहीं दिल्ली के लोगों के दिलों के किसी कोने में देशभक्ति भी बसती है.साथ ही,यहाँ का जीवन उतना व्यस्त भी नहीं है.११-१२ बजे दुकानों का खुलना दिल्ली के लिए आमबात है.इसलिए रामलीला मैदान चंद मिनटों में ही खचाखच भर जाता है चाहे आह्वान करनेवाला रामदेव हों या अन्ना हजारे.हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि रामलीला मैदान में जमा लोगों में बहुत बड़ा हिस्सा दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों से आनेवाले लोगों का भी होता है जैसे मध्य प्रदेश,उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान, उत्तराखंड,झारखण्ड इत्यादि.जंगे आजादी में भी चाहे असहयोग आन्दोलन हो या सविनय अवज्ञा आन्दोलन या फिर भारत छोड़ो आन्दोलन उस समय भी इन्हीं क्षेत्रों में आंदोलनों का असर ज्यादा रहा था.दक्षिण भारत तो अंत तक लगभग निष्क्रिय बना रहा था.साथ ही,दिल्ली हमेशा से भारतीय संप्रभुता की प्रतीक भी रही है इसलिए लगभग सारे आन्दोलनकारी दिल्ली चलो का नारा देते हैं.
                   मित्रों,कोई भी आन्दोलन जनभागीदारी से ही सफल और विफल होती है.अन्ना कहते भी हैं कि समर्थकों की भीड़ से ही उन्हें भूखे रहकर भी ऊर्जा मिलती है.कुछ सरकारी और कांग्रेसी षड्यंत्रों के चलते और  कुछ टीम अन्ना द्वारा आन्दोलन के लिए गलत वक्त और गलत स्थान चुनने के चलते भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का तीसरा चरण दुर्भाग्यवश सफल नहीं हो पाया.कोई बात नहीं ऐसा तो गाँधी के साथ भी हुआ था.अच्छा रहेगा कि टीम अन्ना भी गाँधी की तरह ही खाली समय में यानि दो आंदोलनों या आन्दोलन के दो चरणों के मध्यांतर में कोई सामाजिक-रचनात्मक कार्यक्रम का सञ्चालन करे.इससे दो फायदे होंगे-एक तो देश व समाज में नई चेतना आएगी और दूसरी इससे उनके आन्दोलन से नए-नए लोगों के निष्ठापूर्वक जुड़ने से संचित ऊर्जा में बढ़ोत्तरी होगी.मैं टीम अन्ना और अन्ना हजारे द्वारा फ़िलहाल आन्दोलन वापस लेने के निर्णय का स्वागत करता हूँ क्योंकि जोश जरुरी तो है ही लेकिन उससे कम आवश्यक होश भी नहीं है.आप लोगों के बीच जाईये,उनके दुःख-दर्द में भागीदार बनिए,कोई निर्माणात्मक कार्यक्रम चलाईये;फिर जब लगे कि आपने आन्दोलन के लिए आवश्यक ऊर्जा अर्जित कर ली है तो फिर से आन्दोलन का शंखनाद करिए.याद रखिए,कभी-कभी जोरदार टक्कर मारने के लिए पीछे भी हटना पड़ता है.जय हिंद,वन्दे मातरम.