मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

समान नागरिक संहिता लागू करे सरकार

मित्रों, किसी भी सभ्य और लोकतान्त्रिक राष्ट्र की आधारशिला यह है कि वह अपने नागरिकों में लिंग, धर्म, जाति, आर्थिक स्थिति आदि के आधार पर बिना किसी भेदभाव के सबके साथ समान व्यवहार करे. वास्तव में राज्य द्वारा नागरिकों से समान व्यवहार की यह प्रक्रिया समाज में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उन तार्किक सामाजिक मूल्यों की स्थापना करती है जो किसी भी राष्ट्र के जीवन और विकास की आधारभूत आवश्यकता होती है. परन्तु जब समान व्यवहार की यह प्रक्रिया समाज के रूढ़िवादी विचारों, धार्मिक कट्टरता, व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थों से बाधित होती है तो इसकी परिणति एक शोषणकारी व्यवस्था के सृजन के रूप में होती है. और तब इस शोषण के लिए जिम्मेदार न सिर्फ स्वार्थपूर्ण धार्मिक एवं सामाजिक मूल्य होते हैं बल्कि राज्य भी इस शोषण का संरक्षक बन जाता है.
                मित्रों, भारतीय संविधान-निर्माताओं ने लोकतान्त्रिक आदर्शों एवं मूल्यों से प्रेरित होकर प्रत्येक नागरिक को समान व्यवहार का आश्वासन दिया. संविधान के अनुच्छेद १४ के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को समानता का अधिकार होगा अर्थात राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति लिंग, धर्म आदि के भेद के बिना एक जैसी विधि द्वारा शासित होगा और भविष्य में यह अवधारणा और भी सुदृढ़ हो सके इसलिए अनुच्छेद ४४ में राज्य को यह निर्देश दिया गया कि वह इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु समान नागरिक संहिता की स्थापना करे. परन्तु लगता है कि राज्य इस निर्देश को पूरी तरह भूल गया है और समान नागरिक संहिता के द्वारा देश की एकता और अखंडता को और भी मजबूत करने के बदले नागरिकों को बाँटने में लीन हो गया है. जहाँ पहले हिन्दुओं और सिखों के लिए एक नागरिक संहिता थी अब इन पर अलग-अलग संहिताएँ लागू होंगी. इस तरह के कदमों से न सिर्फ जनता बँटेगी वरन विभाजनकारी शक्तियों और विचारधाराओं को भी प्रश्रय प्राप्त होगा.
                   मित्रों, वास्तव में संविधान-निर्माताओं में समानता की भावना राष्ट्रीय आन्दोलनों की विभिन्न घटनाओं तथा एक सुदृढ़ राष्ट्र की स्थापना के उच्च आदर्शों से प्रेरित थी. राष्ट्रीय नेताओं का यह मत था कि समान नागरिक संहिता के माध्यम से परंपरागत एवं रूढ़िवादी सामाजिक तथा धार्मिक मूल्यों का तार्किकीकरण किया जा सकेगा जिससे एक समता आधारित राष्ट्र कि स्थापना हो सकेगी. साथ ही साम्प्रदायिकता, जातिवाद, लिंगभेद जैसी समस्याओं पर नियंत्रण पाया जा सकेगा.
                मित्रों, यद्यपि पूरे भारत में अंग्रेजों के ज़माने से ही समान आपराधिक संहिता लागू है लेकिन समान नागरिक संहिता के प्रयास राजनैतिक तथा धार्मिक स्वार्थों में फँस कर रह गए हैं. वास्तव में यह मुद्दा स्त्री-पुरुष समानता का है जबकि तुच्छ स्वार्थों के कारण इसे संप्रदाय-विरोध से जोड़ दिया गया है. संपत्ति उत्तराधिकार, विवाह, तलाक, गोद लेना जैसे मुद्दे प्रत्येक धर्म की धार्मिक विधियों से नियमित होते हैं. विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक रूढ़ियों के कारण स्त्रियों को इन विषयों पर या तो बहुत सीमित अधिकार है या फिर कोई अधिकार ही नहीं दिया गया है. इस प्रकार लगभग आधा राष्ट्र इन रूढ़ियों के कारण मूल व स्वाभाविक अधिकारों से वंचित है. ऐसे में समान नागरिक संहिता का उद्देश्य मात्र यह है कि विभिन्न धर्मों की विधियों को तार्किक रूप दिया जाए ताकि स्त्रियों को उनके स्वाभाविक मानव-अधिकार प्राप्त हो सके.
               मित्रों, यह महत्वपूर्ण है कि समान नागरिक संहिता किसी धार्मिक विधि को समाप्त नहीं करती बल्कि सिर्फ विभेदकारी रूढ़ियों को समाप्त करती है. इस सन्दर्भ में हिन्दू तथा ईसाई धार्मिक विधियों को संहिताबद्ध करके इन धर्मों से विभेद समाप्त करने के प्रयास नेहरु के काल में ही हुए थे. अभी कुछ ही दिन पहले सिखों के लिए उनको हिन्दुओं से अलग मानते हुए उनके लिए अलग नागरिक संहिता बना दी गयी है. यानि समान नागरिक संहिता के सन्दर्भ में देश की गाड़ी और भी पीछे रिवर्स गियर में चलाई जा रही है.
                  मित्रों, जहाँ तक मुस्लिम धार्मिक विधियों के संहिताकरण के प्रयासों का सवाल है तो वे धार्मिक स्वतंत्रता के हनन, अल्पसंख्यकों के अस्तित्व संकट जैसे व्यक्तिगत व राजनैतिक कुतर्कों के कारण असफल ही रहे हैं. परंतु समानता का इस दिशा में किया गया कोई भी प्रयास क्या वास्तव में धर्मनिरपेक्षता की भावना के विपरीत है? भारत के सन्दर्भ में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक विषयों पर पूर्ण स्वतंत्रता होगी, राज्य का स्वयं का कोई धर्म नहीं होगा और वह धार्मिक विषयों में हस्तक्षेप भी नहीं करेगा. परन्तु यह स्पष्ट होना चाहिए कि धार्मिक स्वतंत्रता की आड़ में किसी के साथ अन्याय नहीं किया जा सकता है. स्वयं शाहबानो वाद (१९८५) में उच्चतम न्यायालय का भी यही मत था कि महज कुछ अमानवीय धार्मिक रूढ़ियों के आधार पर किसी को इतना अधिकारविहीन कर देना कि उसका अस्तित्व ही संकटमय हो जाए, पूर्णतः अन्यायपूर्ण है. वास्तव में समान नागरिक संहिता धर्म को तार्किक और उदार बनाती है. अतः हमें यह समझना होगा कि एक ऐसे धर्म को संरक्षण देना जो कि लिंग के आधार पर किसी से उसकी समानता तथा सामाजिक सुरक्षा का अधिकार ही छीन लेता हो, धर्मनिरपेक्षता नहीं है. वास्तव में आज के परिवेश में किसी धर्म की अतार्किक एवं रूढ़िवादी भावनाओं के संरक्षण हेतु राष्ट्र का बलिदान नहीं दिया जा सकता है. धर्मनिरपेक्षता, जो भेदभाव और शोषण को मौन समर्थन दे; उसे राष्ट्रहित में छोड़ देना ही उचित होगा.
               मित्रों, सत्य तो यह है कि समान नागरिक संहिता का न होना ही हमारे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के विरुद्ध है. समान नागरिक संहिता सभी धर्मों की स्त्रियों को समान दर्जा देती है, इस प्रकार देश का लगभग आधा मानव संसाधन जो गलत धार्मिक रूढ़ियों के कारण अनुत्पादक पड़ा था अब राष्ट्र-निर्माण में अपनी योग्यता व क्षमता का योगदान दे सकेगा. वास्तव में जब तक जन-जन का विकास नहीं होगा तब तक एक लोकतान्त्रिक एवं दृढ राष्ट्र की स्थापना असंभव है. समान नागरिक संहिता प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से सामाजिक विकास को भी सुनिश्चित करती है. सम्पूर्ण समाज का विकास तभी संभव है जबकि प्रत्येक व्यक्ति को विकास के समान अधिकार एवं अवसर मिले. दूसरे शब्दों में प्रत्येक व्यक्ति स्वविकास करता हुआ सामाजिक विकास में अपना योगदान देने में सक्षम हो. ऐसे में समान नागरिक संहिता विभिन्न भेदभाव आधारित बाधाओं को दूर कर प्रत्येक व्यक्ति को सक्षम बनाती है. इस तरह संहिता के अभाव में सामाजिक विकास की प्रक्रिया भी बाधित हुई है. आज सैद्धांतिक और कानूनी रूप से हिन्दू या ईसाई स्त्रियों को संपत्ति, विवाह-विच्छेद, भरण-पोषण आदि के समान अधिकार प्राप्त हैं जो महिला सशक्तिकरण में सहायक तो हैं ही लेकिन साथ-ही-साथ उन्हें समाज पर आश्रित वस्तु के बजाए एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में भी स्थापित करते हैं. साथ ही हिन्दू या ईसाई धर्म अपने अनुनायियों के विवाह, विवाह-विच्छेद, उत्तराधिकार, व्यवसाय आदि के विषय में कोई लिंगाधारित प्रतिबन्ध नहीं लगाता है. लेकिन दूसरी ओर मुस्लिम धर्म में समान नागरिक संहिता के अभाव में जहाँ पुरुषों को विवाह, तलाक, उत्तराधिकार आदि के अतार्किक अधिकार मिले हुए हैं वहीं स्त्रियों को शोषण से कोई सुरक्षा प्राप्त नहीं है. पुरुषों के इन अतार्किक अधिकारों का परिणाम है कि स्त्रियाँ पूर्णतः सामाजिक असुरक्षा की भावना में जीवन व्यतीत करती हैं. क्या इसके लिए समान नागरिक संहिता का न होना जिम्मेदार नहीं है? विवाद का कारण भी यही है कि संहिता के आने के बाद मुस्लिम पुरुषों द्वारा अधिकारों के मनमाने प्रयोग पर प्रतिबन्ध लग जाएगा. उन्हें स्त्रियों को भरण-पोषण, उत्तराधिकार जैसे समान अधकार देने होंगे क्योंकि समान नागरिक संहिता में मुस्लिम महिलाओं के संरक्षण के लिए तार्किक नियम-कानून होंगे. लेकिन राजनैतिक स्वार्थों ने मुद्दे को समानता के स्थान पर साम्प्रदायिकता तथा धार्मिक हस्तक्षेप का आवरण पहना दिया है. परिणामस्वरूप समाज को दोहरा नुकसान हो रहा है. पहला यह कि मुस्लिम स्त्रियाँ जो देश की जनसंख्या का लगभग ८-१० प्रतिशत हैं अभी भी समाज की मुख्यधारा से कटी हुई हैं तथा शिक्षा एवं अधिकारों के अभाव में हर तरह से समाज पर आश्रित हैं. इस प्रकार देश का लगभग ८-१०% मानव-संसाधन अनुत्पादक होने के साथ-साथ सामाजिक विकास में समस्या बना हुआ है. दूसरा नुकसान यह है समान नागरिक संहिता की राजनीति ने समाज में बिखराव पैदा किया है तथा लोकतंत्र का आधार अर्थात विधि का शासन अतार्किक धार्मिक कुरीतियों के समक्ष लाचार-सा हो गया है.
                       मित्रों, आज आवश्यकता इस बात की है कि समस्या का जो मुख्य कारण है उसी में से समाधान की खोज की जाए. अर्थात धर्म के उदारवादी दृष्टिकोण की स्थापना एवं प्रचार हो, उदार धार्मिक नेताओं और बुद्धिजीवियों को इस विषय पर विश्वास में लेते हुए उनके माध्यम से सामान्य जन के मध्य समान नागरिक संहिता के उद्देश्य और आवश्यकता को स्पष्ट किया जाए. शिक्षा को पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष स्वरुप दिया जाए ताकि नई पीढी में सामाजिक तथा धार्मिक विषयों पर उदारता की भावना का विकास हो. साथ ही शिक्षा-व्यवस्था ऐसी हो कि सभी धर्मों तथा सभी व्यक्तियों को आसानी से सुलभ हो सके. इन सबका परिणाम यह होगा कि सभी वर्गों में उदारता तथा राष्ट्रीय हित की भावना दृढ होगी और वे स्वयं अतार्किक अधिकारों का त्याग कर नए सामाजिक परिवर्तन हेतु स्वयं को तैयार कर सकेंगे.
                    मित्रों, अंततः निष्कर्ष यही निकलता है कि राष्ट्रहित में आवश्यक प्रत्येक प्रक्रिया का पालन होना चाहिए. राष्ट्र किसी भी धर्म से श्रेष्ठ है, अतः ऐसी अतार्किक धार्मिक रूढ़ियाँ जो हमारे राष्ट्रीय मूल्यों के विपरीत हों तथा उसके विकास में बाधा उत्पन्न कर रही हों उन्हें प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए. समान नागरिक संहिता का किसी भी आधार पर विरोध उचित नहीं है अतः सभी विरोधों के बावजूद इसको शीघ्रातिशीघ्र लागू किया जाना चाहिए.         
                        

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

रामू काका होंगे भारत के अगले राष्ट्रपति

मित्रों, भारत में अबसे कुछ ही सप्ताह बाद राष्ट्रपति चुनाव की सरगर्मी शुरू होनेवाली है. कुछ दूर की सोंच रखनेवाले पत्रकारों ने इस बात पर बहस शुरू कर भी दी है कि भारत का अगला राष्ट्रपति कैसा होना चाहिए. किसको होना चाहिए और कौन हो सकता है तक उनकी दूरदर्शी नजर अभी नहीं पहुँच पाई है. कुछ नामचीनों का कहना है कि राष्ट्रपति पद के लिए कोई योग्यता निर्धारित की जानी चाहिए, मसलन उसे मिड्ल फेल होना चाहिए, उसका कद ४ फीट ११.७५ ईंच से अधिक न हो, वो बिना मुँह ऐंठे फर्राटेदार अंग्रेजी बोल सके, आँखों से कम दिखता हो, बहुत बड़ा घोटाला कर चुका हो, उसके सारे दाँत सही-सलामत हों और उम्र इतनी हो कि कम-से-कम आधे बाल काले हों इत्यादि-इत्यादि.
        मित्रों, इस तरह की जनक-प्रतिज्ञा सदृश कठिन शर्तें अगर रखेंगे तो हो सकता है कि यह कुर्सी खाली ही रह जाए ठीक उसी तरह जैसे बतौर मनमोहन अगर हम ईमानदार ढूँढने लगें तो भारत में प्रधानमंत्री सहित ज्यादातर महत्वपूर्ण पद खाली ही रह जाएँगे. फिर भी प्रस्तावों में दम है इसलिए ये विचारणीय हैं. मेरे हिसाब से हमारे राष्ट्रपति को मिड्ल फेल तो होना ही चाहिए. उसे तो जब पार्टी आलाकमान जहाँ कहे वहाँ हस्ताक्षर कर देना है, पढ़ने का उसे न तो अवकाश मिलेगा और न ही अवसर; फिर पढ़ा-लिखा राष्ट्रपति लेकर क्या अँचार डालना है? अब आते है लम्बाई वाले प्रस्ताव पर तो आपलोग भी जानते हैं कि राष्ट्रपति का पद अपने देश का सर्वोच्च पद है. पद सबसे बड़ा और कद छोटा; बात कुछ जमती नहीं. है न? मगर इसमें भी एक बड़ा भारी रहस्य छिपा हुआ है और वो रहस्य है कि हमारे नाटे उस्ताद जब भी किसी समकक्षी से बात करेंगे तो उसे सिर झुका कर बात करनी पड़ेगी और बदले में इनके साथ-साथ हमारे देश का माथा भी हमेशा ऊँचा बना रहेगा, तना रहेगा क्योंकि इन्हें तो ऊपर की तरफ मुँह करके बोलना पड़ेगा.
                    दोस्तों, यह जानी हुई बात है कि कोई भी व्यक्ति बिना मुँह ऐंठे फर्राटे के साथ अंग्रेजी बोल ही नहीं सकता इसलिए हमेशा कोई-न-कोई आम जनता के मध्य का आम आदमी ही राष्ट्रपति बनेगा. चूँकि संवैधानिक दृष्टि से रबर स्टाम्प जैसा यह पद अब गरिमाहीन भी हो चुका है और इसलिए जब सरकार का किसी खुशगवार-नागवार मसले पर विरोध करना ही नहीं है तो तो ऑंखें किस काम की? होंगी तो हो सकता है कि बहुत-कुछ अनपेक्षित भी देखना पड़े और मन व्यथित हो जाए. घोटाला करना निश्चित रूप से आज हमारे राजनेताओं की सबसे बड़ी खूबी बन चुकी है. दाग अच्छे हैं, अच्छे होते हैं इसलिए हमारी पार्टी आलाकमान को दागदार छवि के लोग कुछ ज्यादा ही अच्छे लगते हैं, अपनी बिरादरी के लगते हैं. ईमानदार व्यक्ति अगर राष्ट्रपति बन गया तो रोज-रोज संवैधानिक संकट उत्पन्न होने का खतरा रहेगा. सरकार के साथ मिलकर ऐसा व्यक्ति मिले सुर मेरा तुम्हारा गा ही नहीं सकता जिससे सरकारी कामकाज के ठप्प पड़ जाने की आशंका हमेशा बनी रहेगी और जीडीपी में गिरावट आ जाएगी. राजनीति के स्तर में, राजनीतिज्ञों के स्तर में, नौकरशाहों की नैतिकता के स्तर में, उनके काम-काज के स्तर में, पुल-पुलियों-सड़कों की गुणवत्ता के स्तर में, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के स्तर में, आम जनता के जीवन-स्तर में, गरीबी रेखा को मापने के पैमाने के स्तर में, कृषि-उत्पादकता के स्तर में, नदियों में, जनसाधारण की आँखों में और जमीन के भीतर स्थिर पानी के स्तर में भले ही गंभीर और चिंताजनक गिरावट आ जाए जीडीपी में गिरावट हरगिज नहीं आनी चाहिए. जीडीपी देश की मूँछ होती है और मूँछ नहीं तो कुछ नहीं. दांतों की सलामती इसलिए जरुरी है ताकि बंदा विदेशी दौरों पर कठोर-मुलायम व्यंजनों का बेरोकटोक आनंद ले सके. उम्र के बारे में तो कहना ही क्या? उम्र कम होगी तो हमउम्र समकक्षी तितलियों को या उनकी पत्नियों को लुभाने में, मनाने में आसानी रहेगी और इस तरह राजनयिकों का काम आसान हो जाएगा और अगर ऐसा हुआ तो हो सकता है कि २४वीं शताब्दी के अंत तक भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का स्थाई सदस्य बन ही जाए.
                    मित्रों, इस तरह हमने देखा और पाया कि उपरलिखित सारे-के-सारे प्रस्ताव लाजवाब हैं और स्वीकारणीय तो हैं ही प्रशंसनीय भी हैं. अब राष्ट्रपति कैसा हो की समस्या तो हल हो ही गई समझिए. क्योंकि संसद के चालू सत्र में यह संशोधन विधेयक गारंटी के साथ बिना बहस के पास हो जाएगा. वैसे सरकार ने अभी संशोधन-प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया है लेकिन अंदरखाने की खबर यह है कि हमारे साथ-साथ पार्टी आलाकमान की भी यही ईच्छा है. विपक्ष तो इस समय है ही नहीं विपक्ष में तो सिर्फ हमारी कलम है; इसलिए संशोधन तो हुआ ही समझिए.
                         दोस्तों, अब बच गया दूसरा सवाल जो कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है कि कौन भारत का अगला राष्ट्रपति बननेवाला है? और किसी को पता हो या नहीं हो मुझे तो पता है. बिलकुल पता है और वह शख्स कोई और नहीं है बल्कि वह शख्स हैं रामू काका. अरे आपके या हमारे वाले रामू काका नहीं बल्कि पार्टी आलाकमान के घर में बर्तन-पोछा का महान कार्य संभालनेवाले रामू काका होंगे मेरा भारत महान के अगले महान राष्ट्रपति. दस बार मिड्ल फेल हैं, नाटे हैं, अंग्रेजी से सपने में भी उनकी मुक्का-लात नहीं हुई है, आँखों से दिन में कम दिखता है अलबत्ता रात की नजर ठीक है, कई महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित करते हुए कितने रुपयों के और कितने घोटाले कर चुके हैं कि दैवो न जानाति; मुँह के बत्तीसों दाँत दुरुस्त हैं और बड़ी-बड़ी जुल्फें रखते हैं, कलंक से भी ज्यादा काली और बला की कातिल. इसलिए मुझे नहीं लगता कि उनके आलावा कोई और भारत का अगला राष्ट्रपति बन भी सकता है या बनने के लायक है भी. आलाकमान के चाटुकार हैं, प्रिय-पात्र हैं और इन दिनों बेकार हैं. उनके राष्ट्रपति बनने से देश की जीडीपी बढ़ेगी, संवैधानिक संकट का तो प्रश्न ही नहीं उठता, देश का माथा ऊँचा होगा, कूटनीतिक सम्मान बढेगा, भ्रष्टाचार और घोटाले बढ़ेंगे और हम भ्रष्ट देशों की रैंकिंग में और ऊपर चढ़ेंगे. हर शाख पे उल्लू ही उल्लू बैठे दिखेंगे, भ्रष्टाचार के बगीचे में बहारें ही बहारें होंगी. तो मित्रों आज की सबसे बड़ी एक्सक्लूसिव, फेकिंग और ब्रेकिंग न्यूज़ यह है कि रामू काका होंगे भारत के अगले राष्ट्रपति. रामू काका एक ऐसी शख्सियत जिनकी अपनी कोई शख्सियत ही नहीं है.                 

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

नीतीश कुमार का मीडिया मैनेजमेंट

मित्रों, इसे हम अपनी सुविधानुसार भारतीय प्रजातंत्र की विशेषता कहें या विडम्बना; आजादी के बाद से ही सामूहिक नेतृत्व के स्थान पर इसकी प्रीति व्यक्तिपूजा के प्रति कुछ नहीं बल्कि बहुत ज्यादा रही है. जैसा कि आप सब भी जानते हैं कि व्यक्तिपूजक व्यवस्था में सबसे ज्यादा जिस भौतिक-अभौतिक चीज की कीमत होती है वह होती है उस व्यक्ति की छवि. यह छवि लाजवंती से भी कहीं ज्यादा संवेदनशील और कांच से भी कहीं बढ़कर भंगुर होती है. उस पर यह ऐसी शह होती है जिसको बनाने में तो वर्षों लग जाते हैं और खंडित होने में एक क्षण भी नहीं लगता. शायद इसलिए हमारे राजनेता अपनी छवि चमकाने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते. यह छवि ही थी जिसने प्रधानमंत्री नेहरु को चाचा नेहरु भी बना डाला वरना बच्चे किस राजनेता को प्रिय नहीं थे-गाँधी को, राजेंद्र प्रसाद को, सरदार पटेल या सुभाष या तिलक इत्यादि किसको नहीं?
                     मित्रों, बिहार में जब घोटाला-दर-घोटाला करने के बाद लालू की गरीबों के मसीहा वाली छवि चूर-चूर हो गयी तब उनके पूर्व राजनीतिक सहयोगी नीतीश कुमार नए मुख्यमंत्री के रूप में सिंहासन पर विराजमान हुए. उन्होंने सत्ता में आते ही सुशासन का नारा दिया और इस शब्द का इतनी फिजूलखर्ची से प्रयोग किया कि उनका नाम ही सुशासन बाबू पड़ गया. परन्तु नारा लगाने और नारों को हकीकत का (पै)जामा पहनाने में हमेशा बड़ा भारी फर्क रहा है. कागज पर और आंकड़ों में तो सुशासन को जबरन ला दिया गया लेकिन जमीनी स्तर पर जनता कहीं पहले से भी ज्यादा बेहाल हो उठी. राज्य का विकास हुआ भी परन्तु उससे कहीं ज्यादा तेज गति से विकास हुआ राज्य में भ्रष्टाचार का. राज्य सरकार ने सामाजिक योजनाओं की राशि में वृद्धि की तो सरकारी बाबुओं और हाकिमों ने और भी अधिक अनुपात में रिश्वत की दर और परिमाण को बढ़ा दिया. जाहिर है जनता जब परेशान होगी तो आक्रोशित भी होगी और अपने आक्रोश को धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन, बयानबाजी आदि के द्वारा अभिव्यक्त भी करेगी और उनकी अभिव्यक्ति को शब्द और शक्ति प्रदान करने का दायित्व होता है मीडिया पर. बिहार चूंकि देश का सबसे पिछड़ा प्रदेश है इसलिए स्वाभाविक तौर पर इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अख़बारों की हो जाती है. नीतीश ठहरे चतुर सुजान, चाणक्यावतार सो उन्होंने जनता को खुश करने के बजे मीडिया को ही साध लिया. ऐसा करना अपेक्षाकृत आसान भी था. वो कहते हैं न कि एकहि साधे सब सधै. अब करते रहिए धरना, प्रदर्शन, देते रहिए सरकारी कुनीतियों के विरुद्ध बयान; जब अख़बार उनको और उनसे सम्बंधित ख़बरों को छापेंगे ही नहीं तो सिवाय खून के घूँट पीकर रह जाने के आप कुछ कर ही नहीं पाएंगे.
                         मित्रों, पहले किसी लालच के पुतले को वश में वश में करने के लिए चांदी की खनक सुनानी पड़ती थी अब गाँधी बाबा का दर्शन करवाना पड़ता है. पहले जब मीडिया विकेन्द्रित था तब उसे मैनेज करना खासा मुश्किल अथवा असंभव-सा था परन्तु अब मीडिया का मतलब दो-चार कॉरपोरेट हाउस के आलावा और कुछ नहीं रह गया है. उदाहरण के लिए अगर बिहार में मीडिया को मैनेज करना है तो सिर्फ दैनिक जागरण, हिंदुस्तान टाइम्स, हिंदुस्तान, प्रभात खबर, आज, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और राष्ट्रीय सहारा को मैनेज कर लीजिए फिर जनता के समक्ष सावन के अंधे की तरह शासन-प्रशासन में सिवाय हरियाली को देखने के कोई विकल्प ही नहीं रह जाएगा. जब नीतीश सत्ता में आए तो मीडिया सज-धज कर बिकने को तैयार बैठी थी और नीतीश सरकार खरीदने को आतुर हुई जा रही थी. देखते-देखते लोकतंत्र का वाच डॉग सचमुच के दुम हिलानेवाले कुत्ते की तरह व्यवहार करने लगा. फिर क्या था बिहार में अभिव्यक्ति के क्षेत्र में अघोषित आपातकाल की स्थिति पैदा हो गयी. सरकार ने जिन्हें झुकने को कहा एकदम से बैठ गए, जिन मीडिया संस्थाओं को बैठने को कहा गया घुटनों पर आ टिके और जिन्हें घुटनों के बल रेंगने का आदेश मिला एकदम से आपत्तिजनक अवस्था में लेट ही गए.
                       मित्रों, सरकारी खजाने में जमा हुई रकम किसी मंत्री-मुख्यमंत्री के बाप की कमाई हुई नहीं होती कि जिसको वे जब चाहें, जहाँ चाहें, जैसे चाहें और जिस पर चाहें उड़ा डालें. सरकार को विज्ञापन जारी करना चाहिए लेकिन सिर्फ जनजागरूकता के लिए न कि मीडिया-घरानों को उपकृत कर अपना उल्लू सीधा करने के लिए. जब आप आर.टी.आई. कार्यकर्ता शिवप्रकाश राय, राम प्रवेश सिंह यादव और विनय शर्मा जी के संयुक्त प्रयास से प्राप्त सरकारी आंकड़ों पर स्थूल दृष्टिपात भर करेंगे तो आपकी समझ में आसानी से यह बात आ जाएगी कि प्रिंट मीडिया में क्यों लगातार सरकार की वाहवाही और जयजयकार हो रही है? क्यों जनता द्वारा कानून को अपने हाथ में लेकर लगातार होली और होली के बाद वाले दिन दो स्थानों पर पीट-पीटकर दो अपराधियों को पुलिस की मौजूदगी में सरेआम मृत्युदंड देने और पुलिस के मूकदर्शक बने रहने की खबर भी अख़बारों में स्थान नहीं बना पाती है? बिहार सरकार ने वर्ष २००५ से मई २०११ के बीच मीडिया पर १ अरब, १० करोड़ से भी ज्यादा रूपये न्योछावर कर दिए. वित्तीय वर्ष २००५-०६ से लगातार यह राशि बढती गयी. इस लूट का सबसे ज्यादा फायदा मिला हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, आज और प्रभात खबर को. कुल राशि की लगभग आधी इन चारों के ही हाथ लगी. इनमें भी कुल विज्ञापन व्यय का लगभग एक तिहाई बिहार के सबसे बड़े अख़बार हिंदुस्तान को खुश करने के लिए फूंक दिया गया. कई बार तो एक ही विज्ञापन दो-दो पृष्ठों पर छापे गए. उदाहरण के लिए १६ जुलाई, २०११ को हिंदुस्तान में एक ही विज्ञापन दो पृष्ठों पृष्ठ संख्या ९ और १० पर क्रमशः सादा और रंगीन रूपों में दे दिया गया. इस तरह जब पानी की तरह पैसा बहाया जाएगा तो इस धनयुग में कौन ऐसा मूर्ख सत्यनिष्ठ होगा जो फिसल और मचल नहीं जाएगा और हुक्मफरमानी करने की सोंचेगा भी. ई.टी.वी. के प्रवीण बागी ने की और टीम सहित बाहर कर दिए गए, सुभाष पाण्डे ने की और जागरण परिवार ने उनका तबादला कर दिया. ऐसे अनेकों उदाहरण उपलब्ध हैं जो यह बताते हैं कि बिहार की मीडिया पर किस कदर नीतीश कुमार का प्रभाव कायम हो चुका है. लेकिन सावधान, हे दुश्शासन (सुशासन)!! झूठ के हाथ भले ही हजार होते हों पाँव आज भी नहीं होते. हर चीज की एक हद होती है तो सच को छिपाने की भी होती होगी. पब्लिक को कब तक बरगलाईयेगा; वो तो खुद ही भुक्तभोगी भी है और द्रष्टा भी? दुनियावालों से भले ही इस तिकड़म से सच्चाई छिप भी जाए परन्तु बिहार के गाँव-गाँव, शहर-शहर में रहनेवाली जनता तो सब कुछ जानती है. इसलिए सरकार के लिए श्रेयस्कर यही रहेगा कि बिहार अभिव्यक्तिक आपातकाल को तीन दशक बाद फिर से जीवन्त करने के बजाए अपने प्रदर्शन में सुधार करे. अपनी सोंच, नीति और नीयत में बदलाव करे. आईने को डराने-धमकाने और ललचाने से किसी को कुछ हासिल न तो हुआ है और न ही भविष्य में कभी होनेवाला ही है; बेहतर यही होगा कि अपनी सूरत को ही संवारने की भरपूर कोशिश की जाए. अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब जनता झूठ बोलनेवाले दर्पण को तो तोड़ डालेगी ही झूठी बाइस्कोपी सरकार को भी अपदस्थ कर देगी. शायद बहुत जल्द राज्य सरकार और राज्य के प्रेस पर काटजू साहब और भारतीय प्रेस परिषद् का डंडा भी चले और सड़े हुए प्याज की शल्कों की तरह वीभत्स सच्चाई की परतें नजर आने लगे. सरकार को समझना चाहिए कि बिहार की जनता ने उसे अभूतपूर्व बहुमत देकर एक अमूल्य अवसर दिया है राज्य और राज्यवासियो का यथार्थपरक विकास करने के लिए न कि जबरदस्ती सबकुछ ठीक-ठाक है का झूठा अहसास करवाने के लिए. मीडिया को भी अपने कर्तव्यों को नहीं भूलना चाहिए अन्यथा सरकार की छवि तो उसके सुधारने से सुधरेगी नहीं खुद मीडिया की छवि भी विकृत हो जाएगी और तब शायद फिर से उसे बनाने में सदियों का समय लग जाए. अंत में मैं एक बार फिर नीतीश जी को सावधान करना चाहूँगा कि वक़्त रहते संभल जाईए, नहीं संभले तो हो सकता है कि अगले विधानसभा चुनाव के बाद आपको मुख्यमंत्री की ड्राइविंग सीट के बदले विपक्ष के नेता की कुर्सी पर यानि बैकसीट पर बैठना पड़े या फिर मायावती जी की तरह दिल्ली का रूख करना पड़े और ऐसा आप पहले कर भी चुके हैं. याद कीजिए, याद आ जाएगा.        

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

हमारे यहाँ सामान्य डेलिवरी की सुविधा नहीं है


मित्रों, आपको भी पता है कि हमारे देश में धर्मयुग कई दशक पहले धर्मयुग का प्रकाशन बंद होने के पहले ही समाप्त हो चुका था फिर भी धर्मरूपी गाय का एक पैर अब भी सही-सलामत था. परन्तु लगता है कि अब उसे भी तोड़ दिया गया है. उपभोक्तावाद और बाजारवाद ने तमाम नैतिक मर्यादाओं को तोड़कर रख दिया है और "रूपया नाम परमेश्वर" हम लोगों का मूलमंत्र बन गया है. इंसान तो इंसान धरती के भगवान यानि डॉक्टरों ने भी लुटेरों का चोला धारण कर लिया है. हमारे राज्य बिहार के डॉक्टर कुछ इस कदर धनपिपासु हो गए हैं कि राज्य में बच्चों का सामान्य जन्म हो पाना लगभग असंभव-सा हो गया है.
                 मित्रों, पिछले साल की ही तो बात है. मेरी छोटी बहन रूबी अपने दूसरे बच्चे को जन्म देने के लिए हमारे यहाँ आई हुई थी. चूँकि हमारी आर. मामी स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं इसलिए यह स्वाभाविक था कि हम उसे उनके यहाँ ही ले जाएँ. पहले दिन ही उनकी क्लिनिक में हमें पता चल गया कि यह मामी वो मामी नहीं हैं जो २० साल पहले हुआ करती थीं. अब इनके लिए रिश्ते और रिश्तेदार कोई मायने नहीं रखते. मायने रखता है तो सिर्फ और सिर्फ पैसा. तभी तो मेरे पिताजी जो कभी उनके लिए परम पूजनीय हुआ करते थे; को बाहर प्रतीक्षा करता देखकर भी वे नहीं रूकीं और सीधे अपने कक्ष में चली गईं. बाद में कई बार कंपाउंडर द्वारा सूचित करवाने पर करीब एक घंटे बाद बुलावा आया. तब हमें मामी का व्यवहार स्वचालित मशीन की तरह लगा. शायद अब वे इन्सान रह ही नहीं गयी थीं और पैसा कमाने की मशीन-मात्र बन चुकी थीं. अकस्मात् उनके चेहरे पर यह जानकर कि पहला बच्चा नॉर्मल डेलिवरी से पैदा हुआ था निराशा के भाव छलक उठे. तभी हम समझ गए कि डॉक्टरों के लालच के कारण आज के बिहार में बच्चों की नॉर्मल डेलिवरी लगभग असंभव है.
          मित्रों, फिर वह शुभ अवसर भी आया जब मेरी पत्नी विजेता गर्भवती हुई. हमारी शादी को अभी डेढ़-दो महीने ही हुए थे. उसे दिखाने के लिए हम उसकी ही जिद पर पटना की सबसे बड़ी स्त्रीरोग विशेषज्ञों में से एक डॉ. डी. सिंह के पास लेकर गए; लेकिन उनके यहाँ 5 दिन तक नंबर ही नहीं था. मजबूरन मैंने डॉ. सिंह के यहाँ से ही मामी को फोन मिलाया तो वो बोलीं कि आप पत्नी को लेकर एन.एम.सी.एच. आ जाईये. दरअसल मेरी मामी एक सरकारी डॉक्टर भी हैं और इस समय उनकी ड्यूटी एन.एम.सी.एच. में है और जब मैंने उनको फोन किया था वे अपने निजी नर्सिंग होम से चलकर सरकारी अस्पताल पहुँच चुकी थीं. अस्पताल क्या था बीमारों का मेला था. शायद अपनी तरह का दुनिया का सबसे बड़ा मेला. चूँकि मेरी मामी वहां डॉक्टर थीं इसलिए मैंने पंजीकरण करवाना आवश्यक नहीं समझा और सीधे स्त्रीरोग विभाग में जा धमका. परन्तु यह क्या मामी ने तो विजेता को हाथ तक नहीं लगाया और सीधे दवा लिख दी. बाहर पुर्जा देखते ही मैं समझ गया था कि उन्होंने जो कुछ भी किया था बेमन से किया था.
                         मित्रों, अब कोई और उपाय नहीं देखकर मैं फिर से कल होकर डॉ. डी. सिंह के यहाँ गया और नंबर लगा दिया. तभी मेरी नजर वहाँ दीवार पर लिखे मध्यम आकार के शब्दों पर गयी. लिखा था कि "हमारे यहाँ नॉर्मल डेलिवरी की सुविधा नहीं है". मैं देखकर सन्न रह गया और सोंचने लगा कि यहाँ ऐसा क्यों लिखा गया है? फिर तो प्रत्येक डॉ महीने पर मैं उनके पास सपत्निक जाता. बड़ा अच्छा स्वाभाव लगा उनका, मृदुल, कोमल. कहतीं कहीं से भी अल्ट्रासाउण्ड करवा लाओ मुझे कोई समस्या नहीं है. मैं प्रसन्न था उनकी भलमनसाहत पर और नतमस्तक भी. विजेता के स्वास्थ्य में भी अभूतपूर्व सुधार होता दिखा. अल्ट्रासाउण्ड की रिपोर्ट भी गर्भस्थ शिशु का उत्साहजनक विकास दर्शाती रही. तभी इसी दौरान पता चला कि डॉक्टर साहब के कंपाउंडर छोटे और पटेल जो शायद समांगी जुड़वाँ थे मेरे शहर हाजीपुर के ही हैं. इतना ही नहीं दवा दुकानदार अरुण भी हाजीपुर का ही था. फिर तो यह स्वाभाविक ही था कि उनलोगों से मेरा दोस्ताना सम्बन्ध बन जाए. डॉक्टर के पास जाता तो लगता मानो अपने ही घर में आया हुआ हूँ. इस तरह देखते-देखते सात महीने गुजर गए. डॉ. सिंह अब विदेश में थीं और उनका बेटा मयंक उनके बदले ईलाज कर रहा था. इस बार मुझे मैक्स अल्ट्रासाउण्ड, रोड नं. 5, राजेंद्र नगर में जाकर अल्ट्रासाउण्ड करवाने को कहा गया. परन्तु हमें आदेश (इस बार परामर्श वाला स्वर कंपाउंडर का नहीं था) की अनदेखी कर दी और बगल में ही स्थित लाईफलाइन जहाँ अब तक हम अल्ट्रासाउण्ड  करवाते आ रहे थे, में सोनोग्राफी करवा ली. जब हम लौटकर रिपोर्ट लेकर क्लिनिक पर पहुंचे तो कंपाउंडर छोटे मुझ पर गरम हो गया और धमकी भरे स्वर में कहने लगा कि यह डॉक्टर अच्छा अल्ट्रासाउण्ड नहीं करती है. कुछ भी होनी-अनहोनी हो गयी तो आप समझिएगा. मैं उसके बदले हुए व्यवहार से हैरान था और मुझे लगा कि शायद सारा चक्कर कमीशन का होगा लेकिन बात यह थी नहीं यह मैं बाद में समझ पाया. हालाँकि सोनोग्राफी के समय बच्चा उल्टा था लेकिन अभी पूरे दो महीने का समय था और बच्चे का क्या? वह तो पेट में ईधर-उधर उल्टा-सीधा होता हुआ घूमता ही रहता है. फिर आया नौवाँ महीना. होली बीत चुकी थी. इस बार पिछली बार की बकझक से सबक लेते हुए हम वहीं पर अल्ट्रासाउण्ड के लिए गए जहाँ हमें भेजने का प्रयास पिछली बार से ही किया जा रहा था यानि मैक्स अल्ट्रासाउण्ड, रोड न. ५, राजेंद्र नगर. डॉ. सिंह अब विदेश से वापस आ चुकी थीं. अल्ट्रासाउण्ड केंद्र पर अव्यवस्था का माहौल था. क्रम को बार-बार तोड़कर बाद में आए मरीजों की सोनोग्राफी की जा रही थी. मैं परेशान हो गया. मैं और विजेता दोनों जने भूख से बेहाल हो रहे थे परन्तु डॉक्टर पर हमारी विनती का कोई असर नहीं हो रहा था. विजेता तो नौवाँ महीना होने के कारण बैठने से भी लाचार थी. फिर मैंने कंपाउंडर छोटे को फोन किया और बार-बार किया. उसने भी वहां के स्टाफ से बात की लेकिन चूँकि सब ड्रामा था इसलिए कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला. अंत में पांच घंटे की भारी जद्दोजहद के बाद जब सोनोग्राफी की गयी तो रिपोर्ट में बताया गया कि गर्भाशय में पानी कम है. विजेता को कोई परेशानी नहीं थी इसलिए मुझे संदेह हुआ कि कहीं यह साजिश तो नहीं है? क्या इसलिए तो छोटे यहीं सोनोग्राफी करवाने की जिद नहीं कर रहा था? डॉ. डी. सिंह के परामर्श में रहे कई अन्य भावी माताएँ भी वहाँ उपस्थित थीं और उन सभी को भी बड़े ही आश्चर्यजनक और रहस्यमय तरीके से डॉ. एल. मित्तल द्वारा कोई-न-कोई गड़बड़ी बता दी गयी थी. अब सारा मामला मेरे सामने शीशे की तरह साफ़ था. डॉ. सिंह की मैक्स वालों से सांठ-गाँठ थी और इसलिए सभी मामले को धड़ल्ले से जटिल बताया और बनाया जा रहा था. जाहिर है सिजेरियन में डॉक्टर को भारी लाभ होने वाला था. मन भारी और दुखी हो गया. इनती बड़ी डॉक्टर की इतनी नीच करतूत!!! फिर भी मैं कल होकर रिपोर्ट के साथ डॉ. सिंह से मिला और वही हुआ जिसका मुझे पहले से ही अंदेशा था. सोनोग्राफी के आधार पर उन्होंने सामान्य डेलिवरी को असम्भव बताते हुए सिजेरियन की सिफारिश की और विजेता को कल होकर ही भर्ती करवाने को कहा. आज मेरी समझ में पूरी तरह से डॉक्टर के परामर्श कक्ष के बाहर लिखे उन शब्दों का मतलब आ गया था जिसे मैंने पहले दिन ही देखा था. वाह,क्या डॉक्टर हैं? सामान्य गर्भस्थ शिशु को भी अल्ट्रासाउण्डवाले को मैनेज कर असामान्य घोषित करवा देती हैं और फिर बड़े ही प्यार से, आत्मीयता से कहतीं हैं कि बिना सिजेरियन के अब तो कोई उपाय है ही नहीं. ऊपर जाकर पता किया तो बताया गया कि कुल 24-25 हजार का खर्च आएगा. वहाँ यह बतलाकर मैंने पीछा छुड़ाया कि मेरी मामी भी डॉक्टर हैं और मैं उनसे समझने के बाद ही आगे कुछ कह सकूंगा. फिर उदास और क्रोधित मन से दवा दुकानदार से 15 दिन की दवा ली और घर के लिए रवाना हो गया. 
          मित्रों, फिर वह दिन भी आया जब विजेता को प्रसव-पीड़ा शुरू हुई. मामी और डॉ. सिंह सहित बिहार के किसी भी प्राइवेट या सरकारी डॉक्टर पर अब मेरा थोड़ा-सा भी विश्वास नहीं रह गया था. सबके सब मुझे सिजेरियन माफिया नजर आ रहे थे इसलिए मैंने पत्नी को पटना, आलमगंज स्थित त्रिपोलिया मिशनरी अस्पताल में भर्ती करवाया और आज एक सप्ताह के एक पुत्र का पिता हूँ. हमारी आशा के अनुरूप ही डेलिवरी सामान्य हुई और जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ हैं. त्रिपोलिया के डॉक्टरों और नर्सों के सेवा-भाव ने मुझे सचमुच मंत्रमुग्ध कर दिया है. जहाँ बिहार का पूरा डॉक्टर समाज कसाई बन बैठा है वहां त्रिपोलिया अस्पताल निविड़ घनघोर तम में पूरी शिद्दत से चुपचाप जलते दीए के सामान है. मैं निश्चित रूप से आज भी धर्मान्तरण के खिलाफ हूँ लेकिन यह सोंचने की आवश्यकता भी है कि हम हिन्दुओं में वह सच्चाई और सेवा-भाव क्यों नहीं है जो इन इसाई डॉक्टरों और नर्सों में है? क्यों हमारे हिन्दू स्त्रीरोग विशेषज्ञ प्रत्येक सामान्य डेलिवरी को सिजेरियन में बदल देने और अपने हाथों को भावी माताओं के खून से रंगने को व्याकुल हैं?

बुधवार, 28 मार्च 2012

शिक्षा की परीक्षा में फेल नीतीश सरकार

मित्रों, कुछ लोगों की आदत होती है कि करते बहुत कम हैं लेकिन ढोल बहुत ज्यादा का पीटते हैं और कुछ इसी तरह की आदत से ग्रस्त हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार. उनके शासनकाल में कुछ क्षेत्रों में सुधार हुआ तो है लेकिन उम्मीद से बहुत कम जबकि कुछ क्षेत्र ऐसे भी रहे हैं जिनमें धनात्मक की बजाए ऋणात्मक प्रगति हुई है और दुर्भाग्यवश इनमें सबसे अव्वल है शिक्षा जो सही मायने में आदमी को इन्सान बनाती है. यही वह सबसे बड़ी बेचारी है जिसे सुशासन के दिमाग में चल रहे केमिकल लोचे का दुष्परिणाम सबसे ज्यादा भुगतना पड़ा है.
             मित्रों, सबसे पहले तो सत्ता में आते-आते नीतीश जी ने स्व. परम आदरणीय तत्कालीन शिक्षा सचिव मदनमोहन झा के मार्गदर्शन में शिक्षामित्रों की अत्यंत मूर्खतापूर्ण तरीके से बहाली की. बहाली सही थी परन्तु बहाली का तरीका निहायत गलत था और गलत थी और है भी शिक्षामित्रों के प्रति सरकार की नीति. सबसे पहली गलती तो थी शिक्षामित्रों के मानदेय का बहुत कम रखा जाना जो २००६ में आश्चर्यजनक तरीके से मात्र १५०० रूपया था. अभी भी यह महंगाई के हिसाब से बहुत कम ५-७ हजार रूपया है. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि मेधावी छात्रों ने बहुत कम संख्या में इन नौकरियों के लिए अपनी अभिरूचि दिखाई और अगर अभिरुचि दिखाई भी तो बहाली की गलत और दोषपूर्ण प्रकिया ने उन्हें बहाल होने ही नहीं दिया. दरअसल इस सरकार की आदत है कि वो जो कुछ भी करती है बड़े पैमाने पर करती है इसलिए वह शिक्षामित्रों की बहाली में सिर्फ नीतिगत गलतियाँ करके ही नहीं रुकी और उसने प्रक्रियागत भूलें भी कीं. उसने शिक्षामित्रों को बहाल करने की महती जिम्मेदारी से पूरी तरह अपना पल्ला झाड़ते हुए यह भार पंचायतों के भ्रष्ट कन्धों पर डाल दिया. फिर तो जमकर पैसा बनाया गया और अपने नालायक भाइयों-भतीजों की जिंदगियां बड़े ही करीने से संवारी गयी. जिसका परिणाम वही हुआ जो किसी भी स्थिति में नहीं होना चाहिए था. ऐसे-ऐसे शिक्षक बहाल हो गए जिन्हें गिनती तक नहीं आती थी. वैसे भी ५-६ हजार रूपयों में विश्वविद्यालय टॉपर तो मिलने से रहे. बाद में एक सांकेतिक योग्यता परीक्षा लेकर इस ढीठ सरकार ने अपनी गलतियों को सही साबित करने का असफल प्रयास भी किया.
                 मित्रों, नीतीश जी की शिक्षा-सम्बन्धी तथाकथित गौरव गाथा का अगला काला अध्याय है विद्यालयों का उत्क्रमण. दरअसल १५ साल के लालू-राबड़ी राज में सरकार ने लगातार तेज गति से बढती छात्र-छात्रों की संख्या को ध्यान में रखते हुए न तो नए विद्यालय-भवनों का निर्माण कराया और न ही यथोचित संख्या में नए शिक्षकों की बहाली ही की. नीतीश-सरकार ने भी पूरे मन से कदम नहीं उठाते हुए बहुत-से प्राइमरी स्कूलों को मध्य विद्यालयों में, मध्य विद्यालयों को उच्च विद्यालयों में और उच्च विद्यालयों को उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में उत्क्रमित कर दिया. इन उत्क्रमित विद्यालयों में नए कमरे तो बना दिए गए परन्तु नई कक्षाओं को पढ़ाने योग्य शिक्षकों की बहाली नहीं की गयी. अब समस्या यह है कि पुराने शिक्षक इतने योग्य नहीं हैं कि वे पहले से उच्चतर कक्षाओं को पढ़ा सकें. सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है उत्क्रमित उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में. वहां तो कक्षा-सञ्चालन पूरी तरह से ठप्प ही हो गया है और विद्यार्थी कोचिंग शरणं गच्छामि के लिए बाध्य हैं. दरअसल नीतीश जी की पतली अक्ल में यह बात समा ही नहीं रही है कि बच्चों की पढाई और साइकिल में सीधा सम्बन्ध नहीं है बल्कि पढाई का सीधा सम्बन्ध है शिक्षकों से और उनकी योग्यता से. उच्च विद्यालयों में शिक्षक बहाली की प्रक्तिया तो हालाँकि ठीक थी लेकिन ७-८ हजार रू. में इस महंगाई में काम करेगा भी तो कौन मेधावी छात्र? फलतः यहाँ भी ज्यादातर अयोग्य शिक्षक ही बहाल हो गए हैं.
                  मित्रों, केंद्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार कागजों पर तो प्रदान कर दिया है परन्तु बिहार के विद्यालयों में अभी भी कमरों और शिक्षकों की भारी कमी है और कमी है बिहार सरकार में ईच्छा-शक्ति की भी. ऐसे में यह कानून शायद ही कभी सही मायनों में राज्य में लागू होने पाए. राज्य में सरकार महादलितों के बीच रेडियो तो बाँट रही है लेकिन राज्य के अम्बेडकर विद्यालयों और छात्रावासों को रामभरोसे छोड़ दिया गया है. प्रतिवर्ष इन पर करीब एक अरब रूपये खर्च किए जाते हैं लेकिन इनमें रहनेवाले दलित-महादलित बच्चों की थालियों में आता है ऐसा भोजन जो शायद जानवर भी नहीं खाना पसंद करेंगे और इसके साथ ही उन्हें बिना शौचालय और स्नानघर की मूलभूत सुविधा के जीवन बिताना पड़ रहा है. वे चाहते तो नहीं फिर भी वे सरकारी उदासीनता के चलते खुले में शौच करने और स्नान करने के लिए अभिशप्त हैं.
                     मित्रों, राज्य के विश्वविद्यालयों में; जो बिहार सरकार के पूर्ण नियंत्रण में नहीं हैं, में भी हालात अच्छे नहीं हैं. महामहिम कुलाधिपति यानि राज्यपाल कथित रूप से पैसे लेकर कुलपतियों की नियुक्ति कर रहे हैं. कई कुलपति तो अपराधी भी है और उन पर आपराधिक मामले भी चल रहे हैं. पैसा देकर कुलपति बने कुलपति जी पैसे लेकर बिना जमीन, बिना भवन और बिना शिक्षक वाले महाविद्यालयों को भी धड़ल्ले से संबंधन प्रदान कर रहे हैं. इस मामले में हमारा विश्वविद्यालय यानि बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर खासी तत्परता प्रदर्शित कर रहा है. परन्तु ऐसा भी नहीं है कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षा का बंटाधार करने जैसा महान कार्य सिर्फ राज्य के बूते ही सम्पन्न हुआ है वरन बिहार सरकार ने भी इस महायज्ञ में अपने हिस्से की जिम्मेदारी बखूबी निभाई है. बिहार सरकार ने गैर मान्यताप्राप्त महाविद्यालयों को मानदेय देना शुरू किया है जो एक स्वागतयोग्य कदम है परन्तु उसने साथ-ही-साथ मानदेय को परीक्षा-परिणामों से भी जोड़ दिया है. जिसका परिणाम यह हुआ है कि महाविद्यालय अब पढाई का स्तर ऊँचा उठाने के बदले येन-केन-प्रकारेण परिणाम को ऊँचा उठाने में लगे रहते हैं. इसके लिए पहले परीक्षा-सञ्चालन में जान-बूझकर कदाचार किया-करवाया जाता है और फिर मूल्यांकन-केन्द्रों पर जाकर पैसा देकर रिजल्ट को जबरन उत्तम कोटि का करवाया जाता है. इतना ही नहीं नीतीश सरकार ने, जबसे वह सत्ता में आई है एक भी स्थाई शिक्षक की न तो विश्वविद्यालयों में और न ही महाविद्यालयों में ही बहाली की है. पुराने शिक्षकों के रिटायर होते जाने से शिक्षकों की विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में इतनी कमी हो गयी है कि कई विभाग तो पूरी तरह से शिक्षक-विहीन ही हो गए हैं. बीच में इनकी नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालयों की ओर से विज्ञापन भी दिया गया जिसमें शिक्षकों को अधिकतम १२००० रूपये मासिक मानदेय या हथउठाई देने की महान दुस्साहसिक घोषणा की गयी. भारी विरोध होने पर और इस लेखक द्वारा पढोगे लिखोगे बनोगे ख़राब लेख लिखने के बाद विज्ञापनों को वापस ले लिया गया और कहा गया कि अब बहाली पुराने तरीके से विश्वविद्यालय सेवा आयोग की पुनर्स्थापना के बाद उसके द्वारा ही की जाएगी. देखते-देखते दो साल बीत गए मगर उक्त आयोग का पुनर्गठन सरकार को नहीं करना था सो नहीं किया गया. अब फिर से जनता की कमजोर याददाश्त पर अटूट विश्वास करते हुए विश्वविद्यालयों को बहाली अपने स्तर से करने का अधिकार दे दिया गया है. शायद फिर से मानदेय अधिकतम १२००० रूपया ही रहेगा. अब आप ही बताईए कि क्या एमए, पीएचडी की डिग्री प्राप्त करने और नेट/सेट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कौन मेधावी चाहेगा १२००० रूपये पर बेगार करना? यानि एक बार फिर शिक्षा के इस हिस्से का भी अयोग्य शिक्षकों के हाथों में जाना निश्चित है. साथ ही बहाली में भ्रष्टाचार भी जमकर हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए.
           मित्रों, इस प्रकार हमने देखा और पाया कि नीतीश सरकार जो प्रतिवर्ष लाखों विद्यार्थियों की परीक्षा लेकर उत्तीर्णता का प्रमाण-पत्र देती है खुद ही शिक्षा-व्यवस्था और शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के मोर्चे पर साल-दर-साल फेल हो रही है. मामले का सबसे निराशाजनक पहलू तो यह है कि आगे इस सरकार की यह मंशा भी नहीं दिख रही है कि बिहार में शिक्षा की स्थिति में सुधार हो और वह आईसीयू से बाहर आकर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करे.                                 

बुधवार, 21 मार्च 2012

क्या समलैंगिक हैं श्याम बेनेगल?

मित्रों, श्याम बेनेगल हमारे देश का एक ऐसा नाम है जिसके कान में पड़ते ही हमारे दिमाग में एक ऐसे क्रान्तिकारी संस्कृतिकर्मी की छवि बनने लगती है जिसने भारतीय सिनेमा की दशा और दिशा  को ही बदल कर रख दिया. अंकुर, निशांत, मंथन, भूमिका, देव जैसी दर्जनों फ़िल्में उनकी अद्भुत और बेजोड़ रचनात्मकता की गवाही देते से प्रतीत होते हैं. श्याम बाबू उन गिने-चुने भारतीय फिल्मकारों में से हैं जो सिर्फ पैसा कमाने के लिए फ़िल्में नहीं बनाते बल्कि समाज को सार्थक सन्देश देने के लिए भी फिल्मों का निर्माण करते हैं.
               मित्रों, समाज अगर कुमार्ग पर अग्रसर हो तो उसका विरोध प्रत्येक समकालीन प्रबुद्ध व्यक्ति का धर्म बन जाता है और उसको उसे सही दिशा में अग्रसारित करने का भागीरथ प्रयास करना ही चाहिए. परन्तु हमारे श्याम बाबू पर ७७ साल की पकी उम्र में इन दिनों कुछ ज्यादा ही क्रान्तिकारी दिखने का जूनून सवार हो गया है. जनाब निरा भोगवाद और उपभोक्तावाद की उपज समलैंगिकता के प्रबल समर्थक बनकर देश के समक्ष आ खड़े हुए हैं. श्रीमान का मानना है कि भारतीय दंड संहिता की धारा ३७७ को समाप्त कर देना चाहिए जिससे भारतीय समाज में समलैंगिकता को वैधानिक दर्जा प्राप्त हो सके. अब यह तो श्याम बाबू को ही बेहतर पता होता कि मानव-देह की प्रकृति के विरूद्ध एक नवाचार प्रचलित करके वे समाज को कौन-से सन्मार्ग पर ले जाना चाहते हैं. हो सकता है कि वे खुद भी समलैंगिक हों हालाँकि उन्होंने इसकी कभी स्पष्ट घोषणा नहीं की है. लेकिन अगर वे समलैंगिक नहीं हैं तो फिर और दूसरा कौन-सा कारण हो सकता है उनके द्वारा समलैंगिकता का खुला समर्थन करने के पीछे? मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आ रहा है और आने वाला है भी नहीं जब तक वे स्वयं आगे आकर स्थिति को स्पष्ट नहीं कर देते.
                मित्रों, मैं अपने पहले के आलेखों में भी लिख चुका हूँ कि चूंकि समलैंगिक आचरण प्रजनन की दृष्टि से अनुत्पादक और प्रकृति के नियमों के विरूद्ध है इसलिए निषिद्ध कर्म है और इसे निषिद्ध कर्मों की श्रेणी में ही रहने देना चाहिए तथापि हमारी केंद्र सरकार इस एड्स प्रसारक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने और कानूनी मान्यता देने को उतावली हुई जा रही है. पता नहीं क्यों; क्योंकि खुद उसके द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पेश आंकड़े ही बता रहे हैं कि देश में समलैंगिकों की आबादी काफी कम है, आटे में नमक जितना से भी कम इसलिए वे निर्णायक वोटबैंक बनने से तो रहे. हाँ, अगर सोनिया गाँधी भारतीय संस्कृति को इटालियन संस्कृति में कायांतरित करना चाहती हों तो बात दूसरी है. वैसे उनसे पहले उनके कई सांस्कृतिक पूर्वज कैनिंग, मैकाले आदि भी भारतीय सस्कृति को विकृत करने का असफल प्रयास करके अपने गौड को प्यारे हो चुके हैं. आप भी करिए; स्वप्न देखने और कोशिश करने में क्या जाता है? आपको भी श्याम बेनेगल जैसे और भी जरखरीद गुलाम मिल जाएँगे जो पद और प्रतिष्ठा के लालच में आपके जैसा आचरण करना तो क्या आपकी तरह सोंचने को भी तैयार हो जाएँगे और फिर भी देशवासियों के बीच कथित क्रान्तिकारी कहे जाएँगे.
           मित्रों, मैं श्याम बेनेगल जी से विनती करना चाहूँगा कि और भी सामाजिक मुद्दे हैं भारत में. अपने चारों तरफ सिर घुमाकर तो देखिए भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, निर्धनता, जनसंख्या-विस्फोट, मादक पदार्थों का दुरुपयोग, बालश्रम, विकलांगता, कालाधन, भिक्षावृत्ति, वृद्धावस्था, जनस्वास्थ्य, आत्महत्या, मानसिक रोग, बाल अपराध, एड्स, दहेज़-प्रथा, मानवाधिकार-हनन, खाद्य-सुरक्षा और कुपोषण, जातीयता, साम्प्रदायिकता और छद्म धर्मनिरपेक्षता, जनजातीय समस्याएँ, आतंकवाद और उग्रवाद, शिक्षा की दुर्गति, पर्यावरण-विनाश, आवास की कमी, मानव-व्यापार और देह-व्यापार, महंगाई जैसी अनगिनत ऐसी सामाजिक समस्याएँ हैं जिनसे देश की जनता को रोजाना रूबरू होना पड़ता है. कृपया अपनी राज्यसभा सदस्यता का लाभ उठाईये और इन मुद्दों की ओर केंद्र सरकार का ध्यान आकर्षित कीजिए. याद रखिए सिर्फ समाज का अंधा विरोध करना क्रांतिकारिता नहीं है बल्कि समाज को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना क्रांतिकारिता है और अगर किसी मुद्दे पर समाज पहले से ही सही रास्ते पर चल रहा हो तो उसे प्रोत्साहित करना भी क्रांतिकारिता है न कि उसे अपने निजी हित के लिए जानबूझ कर पथभ्रष्ट कर देना.

शनिवार, 17 मार्च 2012

बन्दर के हाथ का नारियल है बजट

मित्रों, कहते हैं कि दुर्भाग्यवश एक बार किसी बन्दर के हाथ नारियल पड़ गया. बन्दर ने उससे पहले नारियल को न देखा और न सुना था इसलिए जबरदस्त फेरे में पड़ गया. इसका वो करे तो क्या करे? कभी हवा में उछालता तो कभी जमीन पर पटकता तो कभी दाँत से काट खाने की असफल कोशिश करता. इस प्रकार उसने उसकी ऐसी-तैसी करके रख दी.
  मित्रों, कुछ ऐसा ही व्यवहार हमारे वित्त मंत्री ने २०१२-१३ के बजट के साथ भी किया है. कुल मिलाकर यह बजट बेकार की कवायद है, अकारण की गयी कसरत है. अगर अर्थव्यवस्था की रफ़्तार धीमी पड़ रही थी तो उसकी चाल को दुलकी से सरपट करने के लिए कृषि और औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाने का उपाय किया जाना चाहिए था. कृषकों को ज्यादा कर्ज दे देने मात्र से अगर कृषि-उत्पादन को बढ़ना होता तब तो वित्तीय-वर्ष २०११-१२ में भी उसे आकाश छूना चाहिए था न कि गोता खाना. साथ ही वित्त मंत्री मात्र १००० करोड़ रूपये में दूसरी हरित क्रांति देखना चाह रहे हैं. इसे ही तो कहते हैं तेलों न लागे पूड़ियो पाके. इस अद्भुत चेष्टा की तुलना हम पागलखाने से भाग निकले उस पागल की करतूत से कर सकते हैं जो सोंचता है कि १०००-२००० रूपये का नमक डालकर वह पूरी दुनिया की नदियों को खारा कर देगा.
                  मित्रों, कुछ इसी तरह बजट में डूबते हुए औद्योगिक क्षेत्र को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है उल्टे सेवा कर और उत्पाद कर को बढाकर सिर्फ औद्योगिक क्षेत्र ही नहीं बल्कि सेवा-क्षेत्र की भी राहें मुश्किल कर दी गयी हैं. अब आप भी सोंच सकते हैं कि जब कृषि और औद्योगिक उत्पादन बढेगा नहीं तो सिर्फ लंगड़ाते हुए सेवा-क्षेत्र की बदौलत सरकार और जनता की आमदनी कहाँ से बढ़ेगी और जीडीपी का ग्राफ ऊपर कैसे चढ़ेगा; वो तो नीचे ही जाएगा न? कालेधन पर मौजूदा सत्र में श्वेत-पत्र लाने की बात बजट में जरूर कही गयी हैं लेकिन भ्रष्टाचार और कालेधन को लेकर अबतक सरकार का जो रवैय्या रहा है उसे देखते हुए हमें यह उम्मीद बिलकुल भी नहीं करनी चाहिए कि सरकार इस पत्र में खाताधारकों के नाम उजागर करेगी या फिर उसे देश में वापस लाने का दिखावटी प्रयास भी करेगी. अंत में जब वित्त मंत्री को पूर्वोल्लेखित बन्दर की तरह उत्पादन-वृद्धि और आय-वृद्धि का कोई उपाय नहीं सूझा तो वे शरारत पर उतर आए और उन्होंने महंगाई से पहले से ही बेहाल हो रही जनता को और भी परेशान करने की ठान ली. शायद ५ राज्यों के निराशाजनक चुनाव परिणाम का बदला लेना चाहते हों. इस बजट से महंगाई तो शर्तिया तौर पर बढ़ेगी ही जनता को अपनी फटी जेब में से ज्यादा कर भी अदा करना पड़ेगा. आयकर स्लॉट का पुनर्निर्धारण तो इतनी बेवकूफी से उन्होंने किया है कि देखकर पागल का भी दिमाग चकरा जाए. कम आमदनी वालों को कम राहत और ८ लाख से १० लाख सालाना के बीच कमानेवालों को भारी कर-छूट. वाह-वाह!! आम आदमी की सरकार के वित्त मंत्री ने क्या दिमाग पाया और लगाया है? गरीबों पर महंगाई के कोड़े और अमीरों को सौगात. पहले रेल बजट और अब यह आम बजट;आम जनता तो धन्य हुई जा रही है.
               मित्रों, कुल मिलाकर वित्त वर्ष २०१२-१३ में आपको ज्यादा कर तो चुकाना पड़ेगा ही उस पर सरकार यह भी सोंच रही है कि ऐसा होने पर हम यानि आम जनता ज्यादा पैसे बचा पाने की स्थिति में होंगे. शायद इसलिए बचत-खाता में बचत को प्रोत्साहित करने के लिए १०००० रूपये तक के ब्याज को करमुक्त कर दिया गया है. सरकार का मतलब तो आप समझ ही गए होंगे जो ज्यादा-से-ज्यादा मिर्ची खिलाकर जबरन हमें मिठास का अहसास करवाना चाहती है. इस तरह के बजट पेश करने से तो अच्छा था कि बजट पेश ही नहीं किया गया होता. कम-से-कम हमारी जेबों पर बेवजह का बोझ तो नहीं बढ़ता. यहाँ मैंने इसे बेवजह का बोझ इसलिए कहा है क्योंकि हमारी जेबों से जो पैसे सरकार निकालने जा रही है उससे देश की अर्थव्यवस्था में वह कैसे सुधार लाएगी, का विजन बजट में है ही नहीं. बस एक लक्ष्य रख दिया गया है कि हमें ७.६ प्रतिशत की विकास-दर प्राप्त करनी है मगर यह चमत्कार होगा कैसे; का उत्तर दिया ही नहीं गया है. वास्तव में प्रणव मुखर्जी बजट द्वारा बैक गेयर लगाकर देश को आगे ले जाना चाहते हैं और शायद डार्विन के इस सिद्धांत को भी सही साबित करना चाहते हैं कि सारे मानवों की तरह वो भी बंदरों की संतान हैं.

गुरुवार, 15 मार्च 2012

भीड़ का न्याय,कहाँ तक उचित

मित्रों, भारतीय संविधान में कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका तीनों के कार्यों का स्पष्ट बंटवारा किया गया है.इनमें से कानून और व्यवस्था को बनाए रखना कार्यपालिका की जिम्मेदारी है.लेकिन जब कार्यपालिका पूरी तरह से बेकार और निष्क्रिय को जाए तो? तब जनता करे तो क्या करे? क्या उसे हाथ-पर-हाथ रखकर, दरवाजे-खिड़कियाँ बंद कर यह सोंचते हुए संतोष कर लेना चाहिए कि अगर वह सपरिवार सही-सलामत है तो फिर सबकुछ ठीक-ठाक है या उसे भी क्रूर और कातिल भीड़ का हिस्सा बनकर वही सब करना चाहिए जो इन दिनों बिहार की मजबूर जनता कर रही है?
           मित्रों, भीड़ द्वारा कानून को अपने हाथों में लेने की पहली घटना घटी है बेगूसराय जिले के तेघरा में ९ मार्च को. रंगों के त्यौहार होली के दिन यहाँ जमकर खून की होली खेली गयी. कई दर्जन आपराधिक घटनाओं को अंजाम दे चुका और क्षेत्र में आतंक का पर्याय बन चुका बंटी सिंह कुछ ही दिन पहले जेल से छूटकर आया था और जबसे गाँव में वापस आया था लगातार रंगदारी भरा व्यवहार करता आ रहा था. ग्रामीणों ने पुलिस से इसकी शिकायत भी की लेकिन सब बेकार. पुलिस झाँकने तक नहीं आई. अंततः आजिज और पुलिस से निराश होकर जनता ने कानून को अपने हाथों में ले लिया और बंटी सिंह को पीटते-पीटते मार डाला. फिर भी जी नहीं भरा तो भीड़ में से ही किसी ने मरे हुए बंटी को गोली भी मार दी. कुछ इसी तरह की दूसरी घटना घटी लगातार दूसरे ही दिन यानि १० मार्च को समस्तीपुर जिले में. हुआ यह कि समस्तीपुर के लोकप्रिय सीपीएम नेता सुरेन्द्र यादव की इसी साल ९ जनवरी को हुई हत्या का आरोपी मिंटू पासवान अपने दो साथियों के साथ वारदात के एकमात्र चश्मदीद गवाह और श्री यादव के समर्थक कुंदन पासवान की हत्या करने दलसिंगसराय थाने में स्थित उसके गाँव बगरा और उसके घर तक पहुँच गया. इलाके में शार्प शूटर के रूप में कुख्यात मिंटू को कुंदन तक पहुँचने से कुंदन की माँ जादो देवी और भाई ललन ने रोकने की कोशिश की तो उसने दोनों को गोली मार दी जिससे दोनों की तत्काल मौत हो गयी. परन्तु उसके बाद दर्जनों जघन्य आपराधिक घटनाओं को अंजाम दे चुका दुर्दांत अपराधी मिंटू भीड़ के हत्थे चढ़ गया और पुलिस की मौजूदगी में पीट-पीट कर मार डाला गया. सनद रहे कि बाद में जब मिंटू की पिटाई जारी थी तब पुलिस भी घटनास्थल पर पहुँच गयी थी.लोगों में उसके प्रति गुस्सा इतना ज्यादा था कि लोग मरने के बाद भी उस पर बेतहाशा लाठियां चलाते रहे.
               मित्रों, सामान्य स्थिति में किसी भी दृष्टिकोण से भीड़ द्वारा कानून को अपने हाथों में लेकर तत्काल फैसला करते हुए कथित अपराधी को मृत्युदंड दे देना उचित नहीं माना जा सकता परन्तु प्रश्न यह भी उठता है कि ऐसी नौबत आने ही क्यों दी जाती है? अगर राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति इतनी ही सराहनीय और संतोषजनक है तो फिर इस तरह की घटनाएँ क्यों घटित हो रही हैं? जो हाथ रोजी-रोटी कमाने के लिए प्रयुक्त होने चाहिए उन हाथों को क्यों बाध्य होना पड़ रहा है जानबूझकर व पूरे होशोहवास में मानव-रक्त बहाने को? अगर पुलिस-प्रशासन सुरक्षा देने में विफल रहता है तो क्या जनता को आत्मरक्षा का अधिकार नहीं है? परन्तु अगर हम जैसे को तैसा की नीति पर चलने लगेंगे तो हमारे और तालिबानी समाज में क्या कोई अंतर रह जाएगा? यह सही है कि पुलिस ने सक्रियता दिखाई होती तो भीड़ को इंसाफ करके सजा देने की जरूरत ही नहीं पड़ती. इन दोनों घटनाओं में से पहली में ग्रामीणों ने पुलिस को सूचित तो किया ही था दूसरी घटना में तो हत्या के समय पुलिस घटनास्थल पर मौजूद भी थी फिर पुलिस ने भीड़ को हत्या जैसा जघन्य अपराध करने से क्यों नहीं रोका? क्या यह उसके काहिलीपन की इन्तहां नहीं है? फिर क्या जरूरत है ऐसी सुरक्षा एजेंसी की? यहाँ मैं आपको यह बता दूं कि ९ जनवरी को सुरेन्द्र यादव की हत्या होने से पहले ऐसी ख़ुफ़िया सूचनाएं भी पुलिस को दी गयी थीं कि उनकी जान को खतरा है फिर क्यों उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी गयी और बाद में हत्या के एकमात्र चश्मदीद गवाह कुंदन पासवान की सुरक्षा को क्यों रामभरोसे छोड़ दिया गया? सुरेन्द्र के साथ-साथ कुंदन की माँ और भाई की हत्या के लिए क्या पुलिस की लापरवाही भी जिम्मेदार नहीं है? प्रश्न यह भी उठता है कि अगर इसी तरह गवाहों पर हमले होते रहे तो कोई क्यों कानून की मदद करने का जोखिम उठाएगा?
                    मित्रों, इन दोनों ताजा घटनाओं के आलोक में बिहार में पुलिस-प्रशासन को लेकर सैंकड़ों सवाल जनता के दिमाग में तैर रहे हैं परन्तु उत्तर नदारद है. इनके उत्तर देगा कौन? कायदे से तो राज्य की कार्यपालिका के वास्तविक मुखिया नीतीश कुमार जी को आगे आकर जवाब देना चाहिए परन्तु क्या वे ऐसा करेंगे या फिर एक बार फिर सच्चाई से नजरें चुराते हुए चलता है सोंचकर सबकुछ वक़्त पर छोड़कर या जनता की कमजोर याददाश्त पर अटल विश्वास करके निरुत्तर ही छोड़ देंगे? जवाब तो बिहार से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचारपत्रों को भी देना चाहिए कि क्या कारण है कि ये दोनों इतनी बड़ी ख़बरें होली के अवकाश के तत्काल बाद प्रकाशित ११ मार्च के अंक और बाद के अंकों से पूरी तरह गायब से थीं और अब तक भी गायब क्यों हैं?

गुरुवार, 8 मार्च 2012

पियक्कड़ई का त्योहार बनती होली

मित्रों,आपने भी किताबों में पढ़ा होगा कि होली उल्लास और सद्भाव का या फिर असत पर सत की विजय का पर्व है परन्तु आपने यह भी पाया होगा कि किताबों में लिखी बातें अक्सर सच्चाई के धरातल पर गलत निकलती हैं.यह बड़ा ही दुखद है कि आज उल्लास और सद्भाव का त्योहार होली पियक्कड़ई का पर्याय बनकर रह गयी है.अक्सर हमारे किशोर और युवा होली के नाम पर इस दिन इस नामाकुल शराब को मुँह से लगा लेते हैं और फिर यह इस तरह उनके गले पड़ जाती है कि पूरा जीवन कब नशे में बीत जाता है पता ही नहीं चलता.होली में पहले भी नशा किया जाता था लेकिन पहले नशेड़ियों की संख्या काफी कम थी और नशे के नाम पर लोग इस दिन सिर्फ भांग पीते थे.नुकसानदेह तो भांग भी था लेकिन सिर्फ पीनेवाले की सेहत के लिए परन्तु शराब तो पूरे समाज के लिए ही हानिकारक होता है.लोग भांग खाते और फिर चुपचाप घर जाकर सो जाते थे.भांग मुफ्त में उपलब्ध होता था जबकि शराब के लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं, किसी को अपनी बीवी के जेवर बेचने पड़ते हैं तो कोई इसके लिए अपने घर-बार तक को बेच डालता है.
           मित्रों,दरअसल होली के नाम पर पहली बार शराब पीने वाला पहली बार तो पीता है लेकिन आखिरी बार नहीं.फिर तो वो नशे में क्या-क्या कर डालता है उसे खुद भी इसकी खबर नहीं होती.कई साल हुए तब मैं कटिहार रहा करता था जहाँ मेरी केले की खेती होती थी.मेरे दलान के पास का ही एक मुसहर रोजाना महुआ की घर में बनी शराब पीता और मेरे दलान के पास से जब भी गुजरता मुझे गालियाँ देता हुआ गुजरता.फिर अपने घर में जाकर मार-पीट करता.दो-चार दिनों के बाद जब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो एक दिन सुबह-सुबह मैं उसके घर पर जा पहुंचा और बुलाकर पूछा कि तुम चाहते क्या हो?क्या अपने हाथ-पैर तुडवाना चाहते हो तो वो बोला कि भैया मैंने किया क्या है?मैंने कहा तू रोज शाम में मुझे गालियाँ क्यों देता है तब उसने अद्भुत जवाब दिया कि वो तो शराब गाली देती है मैं नहीं देता और मेरे पैरों पर गिर गया.मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं इसका क्या करूँ लेकिन एक अच्छी बात यह हुई कि उस दिन के बाद उसने मुझे गालियाँ देना बंद कर दिया लेकिन उसने घर में चूल्हे तोड़ देना और रोजाना बीवी-बच्चों की पिटाई करना बंद नहीं किया.उसके घर में भुखमरी की स्थिति थी लेकिन ये शराब तो चीज ही ऐसी है जो मरे को भी मारती है.
           मित्रों,आप अक्सर कुछ घिनौनी टाईप की ख़बरें पढ़ते होंगे कि बाप ने बेटी के साथ बलात्कार किया या ससुर के बहू के साथ अनैतिक सम्बन्ध थे.इन सब के लिए वह आदमी कतई दोषी नहीं होता.मैं नहीं मानता कि कोई भी इंसान मूल रूप से इतना गिरा हुआ हो सकता है कि अपने पूरे होशोहवास में ऐसे नीच कर्म करे.मेरा मानव और मानवता में पूरा विश्वास है.ऐसे कर्म वह करता नहीं है बल्कि उससे ऐसे कुकर्म करवाती है यह शराब.अगर आप ३० से ऊपर के हैं और अगर आप होली के वर्तमान और इसके इतिहास पर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि होली क्या थी और क्या होकर रह गयी है.पहले जहाँ यह वैर मिटानेवाला पावन-सामाजिक त्योहार थी अब झगडा बढानेवाली पर्व बन गयी है.कई जगहों पर होली के दिन हिंसा की, आगजनी की घटनाएँ होती हैं जो इस त्यौहार की प्रकृति के ही प्रतिकूल है.गांवों-कस्बों में अब दरवाजों पर घूम-घूमकर होली गाने का रिवाज समाप्त होने लगा है.शरीफ लोग शराबियों के या उनकी टोली के पीछे पड़ने के डर से घर से निकलते ही नहीं हैं.सरकार की आबकारी-नीति भी दोगली है.एक तरफ तो उसने गाँव-गाँव और चौराहे-चौराहे पर शराब की दुकानें खोल रखी है तो दूसरी ओर होली पर शराब पीकर लोग हुड्गंद नहीं करें इसके लिए पुलिस को भी अलर्ट पर रखती है.यानि वो चाहती है कि लोग शराब तो पीएँ लेकिन हुडदंग नहीं करें.परन्तु उन युवाओं का क्या जो होली के दिन सिर्फ चखने के नाम पर पहली बार शराब पीते हैं और फिर आपने ही हाथों अपनी जिंदगी को ही तबाह कर लेते हैं.इसलिए सरकार को चाहिए कि वो शराब की बिक्री और निर्माण को पूरी तरह से बंद करे.सेना के जवानों को भी तभी शराब दी जाए जब वो कश्मीरादि अतिशीतल इलाकों में तैनात हों.जब वे छुट्टी पर हों तब उन्हें शराब नहीं दी जाए वरना वे गाँव में शराब-संस्कृति को बढ़ाते जाएंगे.माना कि इससे सरकार को राजस्व का नुकसान होगा लेकिन वो इतना ज्यादा नहीं होगा जितना आज युवा-शक्ति के शराब पीकर दिग्भ्रमित होने से हो रहा है.साथ ही मैं समाज और देश के सभी जिम्मेदार नागरिकों से यह अपील भी करता हूँ कि वे होली को केवल उल्लास और सद्भाव का त्योहार रहने दें पियक्कड़ों का त्योहार नहीं बनाएँ.पहली और अंतिम बार पीने की भी नहीं सोंचें क्योंकि शराब चीज ही ऐसी है जो एक बार मुँह से लग जाए तो न छोड़ी जाए,ये मीठी जहर के जैसी है न छोड़ी जाए.अंत में सभी भारतवासियों को होली मुबारक.

रविवार, 4 मार्च 2012

बेलगाम नौकरशाही के आगे लाचार नीतीश

मित्रों,इन दिनों भारतीय लोकतंत्र में एक अजीब तरह की प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है.हमारे राजनेता बेलगाम नौकरशाही पर नियंत्रण नहीं लगा पा रहे हैं और लाचारी का रोना रो रहे हैं.हमारे प्रधानमंत्री की लाचारी का तो कहना ही क्या?वे तो मजबूरों के सरदार ठहरे.उनकी तो उनके सहयोगी मंत्री ही नहीं सुनते तो नौकरशाह क्यों सुनेंगे?बेचारे बार-बार बहादुरशाह जफ़र की तरह अपनी लाचारी और बेचारगी का रोना रोते रहते हैं.ऐसे घोर अंध तमस के वातावरण में प्रशासनिक सुधार के दिनकर बनकर देश के राजनैतिक क्षितिज पर उभरे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार.पहले सूचना के अधिकार कानून को कमजोर किया फिर नौकरशाही पर कथित लगाम लगाने के लिए सेवा का अधिकार कानून और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम लेकर आए.जनता और विपक्ष तो लगातार विभिन्न मंचों से नौकरशाही की मनमानी का सवाल उठाती रही है.लेकिन कल तमाम उपायों के बावजूद ऐसा कर पाने में असफल रहे नीतीश कुमार ने भी मान लिया कि उनके मातहत अफसर उनकी सुनते ही नहीं हैं.जबकि अगर न्यायालय या चुनाव आयोग का आदेश हो तो आज्ञापालन के लिए अतिसक्रिय हो उठते है.
                मित्रों,ऐसा हो भी क्यों नहीं?इसका तो सीधा मतलब हुआ कि भय बिनु होहिं न प्रीति और नौकरशाह सरकार से डरते नहीं हैं इसलिए सरकारी आदेशों को नजरंदाज कर जाते हैं.एक बार ऐसा हुआ कि बादशाह अकबर ने बीरबल से कहा कि देखो बीरबल हमारी प्रजा कितनी ईमानदार है,कहीं कोई भ्रष्टाचार नहीं.बीरबल ने सीधे-सीधे कोई उत्तर नहीं देते हुए बादशाह से एक तालाब खुदवाने को कहा और आदेश जारी करवाया कि चूंकि राज्य को बहुत अधिक मात्रा में दूध की आवश्यकता है इसलिए राज्य के सभी निवासी अमावस्या की रात में आएं और एक-एक लोटा दूध तालाब में डालें.सुबह जब अमावस्या के कल होकर अकबर और बीरबल तालाब के पास पहुंचे तो पाया कि तालाब में तो सिर्फ पानी-ही-पानी है दूध है लेकिन बहुत कम,न के बराबर.कहने का तात्पर्य यह कि प्रत्येक युग में बेईमानों की संख्या ईमानदारों से अधिक रही है.अकबर के समय शासन कठोर और दंड-विधान कड़े थे इसलिए लोग मजबूरन ईमानदार थे.आज शासन लचर है,न्यायपालिका लेटलतीफ है और दंड-विधान ढीले-ढाले हैं इसलिए हर कोई जहाँ देखिए;क्या जनता और क्या नौकरशाह;अपनी मनमर्जी चला रहे हैं.चूँकि कोर्ट और चुनाव आयोग के आदेशों की अवहेलना करने पर तत्काल दंडित होने का भय होता है इसलिए तब नौकरशाही सुस्ती के बजाए चुस्ती बरतती है.
             मित्रों,अफसरशाही में कैसे भय का संचार हो यह निर्धारित करना नीतीश कुमार जी का काम है.जनता ने उन्हें अपार बहुमत के साथ राजदंड सौंपा है.इसका कैसे सदुपयोग करना है इसका निर्णय तो उन्हें खुद ही लेना है.नौकरशाही अगर शेर है तो नीतीश कुमार रिंग मास्टर है.अगर रिंग मास्टर शेर के आगे लाचारी दिखाएगा तो या तो उसकी जान ही चली जाएगी और अगर बच भी गयी तो नौकरी तो जाएगी ही.इसलिए मनमोहन सिंह की तरह नीतीश जी विधवा-विलाप बंद करें और शासन में कठोरता लाएँ.नौकरशाही जहाँ भी सुस्ती बरते उस पर शीघ्रतापूर्वक अनुशासनात्मक कार्रवाई करें और कठोरतापूर्वक केवल गुण-दोष के आधार पर पूरी तरह से निष्पक्ष होकर दण्डित करें.जनता को उनका रोदन नहीं बल्कि सिंह-गर्जना चाहिए जिसे सुनकर भ्रष्ट-से-भ्रष्ट और आलसी-से-आलसी अधिकारी-कर्मचारी भी भयभीत हो जाएँ, सुधर जाएँ और कार्यशील हो जाएँ.उन्हें चाहिए कि जब भी वे किसी नौकरशाह को कोई आदेश दें तो अनुपालन के लिए एक समय-सीमा निर्धारित कर दें और अगर उस निश्चित समय-सीमा में आदेश का पालन नहीं हो पाता है तो सम्बंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करें,चुनाव आयोग और न्यायालय भी तो यही करते हैं.हो सके तो ऐसा करने का अधिकार प्राप्त करने के लिए नया कानून भी बनाया जाए.

अस्मत की कीमत ८०००० रूपया

मित्रों,बचपन में प्रेमचंद की एक कहानी पढ़ी थी पञ्च परमेश्वर जिसमें जुम्मन शेख अपने पूर्व मित्र अलगू चौधरी के साथ अपनी सारी दुश्मनी को भूलकर न्याय का साथ देता है.लेकिन बड़ा होकर पाया कि पञ्च तो सिर्फ बेईमान और दुष्ट होते हैं और जब ईन्सान भी नहीं होते तो भगवान क्या ख़ाक होंगे?अब झारखण्ड के जामताड़ा के नारायणपुर थाने के एक पंचायत के तुगलकी फैसले को ही लें.वहां हुआ यह है कि एक लड़का गाँव की ही एक लड़की के साथ शादी का झांसा देकर एक साल तक यौन-सम्बन्ध बनाता है और जब लड़की के पेट में बच्चा ठहर जाता है तो गाँव छोड़कर फरार हो जाता है.लड़की गोद में बच्चा लेकर मामले को पंचायत प्रतिनिधियों के समक्ष उठाती है और मांग करती है कि लड़के से उसकी शादी करवाई जाए जैसा कि उसने वादा भी किया हुआ है.लड़का गाँव के एक प्रभावशाली परिवार से आता है इसलिए पंचायत सबही सहायक सबल को की नीति का पालन करती हुई कुछ अजीब फैसला देती है कि लड़की को उसकी अस्मत के बदले ८०००० रूपये की रकम दे दी जाए और मामले को समाप्त समझा जाए.
                   मित्रों,जाहिर है कि एक ऐसी गरीब लड़की जिसके पास सिवाय अस्मत के और कुछ भी गिनने-गिनाने लायक नहीं है भला ऐसे तालिबानी और अन्यायपूर्ण फैसले से कैसे संतुष्ट हो सकती थी सो पहुँच गयी थाने.लेकिन यहाँ भी तो अधिकारी बनकर कोई सत्य के अवतार तो बैठे हुए हैं नहीं बल्कि बैठे हुए हैं लक्ष्मी के अंधे पुजारी (उल्लू).सो लड़की को इन्साफ नहीं मिला.उलटे थानाध्यक्ष लड़की पर ही उपरोक्त ८०००० रूपये लेकर मामले को वापस लेने के लिए लगे दबाव डालने.अब लड़की कह रही है कि अगर उसे न्याय नहीं मिला जिसकी पूरी सम्भावना भी दिख रही है तो वो परिवारसहित आत्महत्या कर लेगी.आखिर ऐसी नौबत आती ही क्यों है?क्या लड़की को पता नहीं था कि वो शादी से पहले सिर्फ वादे पर यकीन करके जो कुछ भी एक साल तक करती रही वो गलत था.खैर इस गरीब-अबला से तो जो गलती होनी थी हो गयी लेकिन उसे न्याय तो मिलना चाहिए.परन्तु न्याय देगा कौन क्योंकि इस भ्रष्ट-युग में भगवान तो शायद ढूँढने पर मिल भी जाएँ लेकिन न्याय नहीं मिलता.
             मित्रों,कहते हैं कि जाके पांव न फटे बिवाई सो क्या जाने पीड पराई.काश जिस तरह की घटना इस नादाँ लड़की के साथ हुई हैं वैसी ही उन पंचायत प्रतिनिधियों की बहन-बेटियों के साथ भी घट जाती तब शायद उन्हें पता चलता कि किसी गरीब की अस्मत की कीमत कितनी होती है और वह कितनी अनमोल होती है.साथ ही कुछ इसी तरह की परिस्थितियों का सामना उन पुलिस अधिकारियों को भी करना पड़े तब शायद उनका गरीबों के प्रति रवैया बदले.लेकिन प्रश्न है कि लड़की और उसके परिवारवालों को अब क्या करना चाहिए?क्या उन्हें सचमुच आत्महत्या कर लेनी चाहिए?मेरी हिसाब से कदापि नहीं,उन्हें जीना चाहिए और समाज से लड़ना चाहिए.जीवन अनमोल है.माना कि उससे गलती हुई है लेकिन इसका निदान कम-से-कम आत्महत्या तो नहीं है.उसे जीना चाहिए और कुछ इस तरह से जीना चाहिए जो समाज के लिए और आगे आनेवाली पीढ़ियों के लिए एक नजीर बन जाए.माना कि बच्चे का बाप कायर था और डरकर भाग निकला लेकिन वह तो माँ है और माँ अपने बच्चे को मारकर खुद भी कैसे मर सकती है.आज समाज में बहुत-से ऐसे उदार प्रवृत्ति के कुंवारे युवा हैं जो उसे बिना शर्त जीवनसाथी बनाने को भी तैयार हो जाएँगे.गलती तो उससे हुई ही है परन्तु अब उसका पश्चाताप करने का कोई मतलब नहीं है.उसे तो बस प्रायश्चित करना चाहिए जीकर और अपने बच्चे को पढ़ा-लिखाकर;अच्छा ईन्सान बनाकर;एक ऐसा ईन्सान बनाकर जिस पर मानवता नाज करे.

गुरुवार, 1 मार्च 2012

सेक्सी,सेक्सी,सेक्सी तुझे लोग बोलें

मित्रों,कभी प्रसिद्ध अमेरिकी उपन्यासकार पर्ल एस. बक ने उन महिलाओं को जिनका निकट-भविष्य में बलात्कार हो सकता है,को अमूल्य सलाह देते हुए कहा था कि यदि यह निश्चित हो कि आपका बलात्कार होकर रहेगा और विरोध करने का कोई फायदा नहीं रह जाए तो बेहतर यही है कि उक्त महिला इसका आनंद उठाए.मैं नहीं जानता कि श्रीमती बक को कितनी बार इस तरह का परमानन्द प्राप्त करने का पुण्य अवसर मिला.यहाँ आलेख के आरम्भ में उन स्वर्गीया का उल्लेख मैंने यह बताने के लिए किया है कि कई बार बड़ी शक्सियतें भी किस तरह अपनी मर्यादाओं की सीमाओं को लाँघ जाया करते हैं और उन्हें इसके असर का पता तक नहीं होता.जिस तरह बक महोदय को बलात्कार का दर्द क्या होता है;कदाचित पता नहीं था;शायद ममता शर्मा जो दुर्भाग्यवश या सौभाग्यवश पता नहीं इसमें से क्या हम भारतीय के लिए सही है;इस समय राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष के पद पर हैं;को भी यह मालूम नहीं है कि जब किसी गरीब-लाचार महिला के साथ छेड़खानी की घटना होती है तब उसके मन-मस्तिष्क पर क्या गुजरती है और वो उस एक क्षण में कितनी बार कितनी मौतें मरती है.उनकी पीड़ा की अगर स्वानुभूति करनी है तो ममता जी को किसी लम्पट साईनी आहूजा के घर घरेलू नौकरानी के तौर पर कार्य करना चाहिए या फिर किसी बेहया सुपरवाईजर के मातहत किसी फैक्टरी में साधारण मजदूर की नौकरी करनी चाहिए और अगर ईट-भट्ठे पर काम मिल गया तो क्या कहना.तब उन्हें पता चलेगा कि सेक्सी शब्द का वास्तविक अर्थ क्या होता है अथवा क्या कभी-कभी शब्दों का वह मतलब होता भी है जिसका जिक्र शब्दकोशकार शब्दकोशों में करते हैं क्योंकि हमेशा छेडनेवाले की निगाहें कहीं और होती हैं और निशाना कहीं और.
                  मित्रों,किसी शब्द का अर्थ काल और देश के अनुसार कैसे एकदम-से बदल जाता है मैं इसे एक बेहद दिलचस्प उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करना चाहूँगा.उस समय यानि वर्ष २००८ में दैनिक हिंदुस्तान,पटना में जेनरल डेस्क में कार्यरत था.एक दिन यूं ही उत्सुकतावश प्रिंट आउट वाली मशीन पर पड़ी सम्पादकीय पृष्ठ का प्रिंट आउट उठा लिया और पढ़ने लगा.मुख्य सम्पादकीय चन्द्रमा पर पानी के मिलने के सन्दर्भ में लिखा गया था जिसका समापन चंदामामा दूर के,पुए पके बूर के गीत से किया गया था.पंक्ति बिल्कुल सही थी और मुंगेर और खगड़िया के लिए अख़बार भेजा भी जा चुका था लेकिन बिहार में तो बूर का अर्थ योनि होता है भले ही गीतकार प्रेम धवन के पंजाब में इसका कोई और अर्थ होता हो.मैंने उस समय के समाचार संपादक कमल किशोर सक्सेना जी को इस तथ्य से अवगत कराया.फिर क्या था मशीन पर चल रही छपाई रोक दी गयी और आगे के संस्करणों में बूर को गुड़ कर दिया गया.ठीक इसी तरह हो सकता है कि सेक्सी शब्द का पश्चिमी देशों के सेक्स फ्री समाज में ज्यादा प्रयोग सुन्दर के अर्थ में होता हो लेकिन भारत में तो इसका सीधा मतलब होता है कामुक या सेक्स करने लायक.दोनों अर्थ सही हैं परन्तु जिस तरह बिहार में बूर शब्द का प्रयोग आपत्तिजनक की श्रेणी में आता है उसी तरह भारत में सेक्सी शब्द का प्रयोग मानसिक प्रताड़ना या छेड़खानी के लिए किया जाता है.ऐसे में ममता जी की सलाह को मानकर लड़कियां कैसे उस स्थिति में अपने को खुशनसीब मान सकती हैं जब कोई चौक-चौराहे पर खुलेआम उससे कहे कि तुम तो आज बड़ी सेक्सी लग रही हो?साथ ही छेड़खानी के वक़्त ऐसा करनेवाले के हाव-भाव पर गौर करना होता है और तब न तो शब्दों के अर्थ को लेकर ही कोई संशय शेष रह जाता है और न ही प्रयोगकर्ता के उद्देश्य को लेकर ही.
                     मित्रों,मुझे लगता है कि चूंकि ममता जी का लालन-पालन अंग्रेजी वातावरण में हुआ होगा इसलिए उन्हें शायद चौक-चौराहे पर रोजाना होनेवाली छेडखानियों से रूबरू होने का सुअवसर मिला ही नहीं है अन्यथा उन्हें पता होता कि जब कोई कामांध किसी अबला नारी के लिए सेक्सी शब्द का प्रयोग करता है तो उसका मतलब सिर्फ और सिर्फ कामुक होता है और उद्देश्य भी केवल और केवल एक होता है उस स्त्री का शीलहरण.उसका उद्देश्य अपने शिकार की सुन्दरता की प्रशंसा करना तो कदापि नहीं होता.इस तरह अगर ममता जी को प्रत्येक लम्पट में एक प्रशंसक भी नजर आने लगा तब तो हो चुका उनके सेक्सी हाथों से भारतीय महिलाओं का भला.हो सकता है कि वो कल किसी बलात्कार की दिल दहला देने वाली घटना के बाद यह भी कह डालें कि बलात्कारी निरपराध है क्योंकि वह तो पीडिता की सुन्दरता का अनन्य प्रशंसक है.
                    मित्रों,आपको भी आश्चर्य हो रहा होगा कि सुपर प्रधानमंत्री सोनिया गाँधी ने कैसे-कैसे लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठा रखा है.इटली से आयातित नेता से हम और उम्मीद भी क्या रख सकते हैं?एक बात तो निश्चित है कि सोनिया जी किसी भी तरह भारतीय संस्कृति का भला नहीं चाहती हैं तभी तो लगातार इसकी जड़ों पर केंद्र सरकार द्वारा सायास प्रहार किया जा रहा है.कभी राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा ममता शर्मा छेड़खानी और यौनापराध-उत्प्रेरक बयान दे डालती हैं तो कभी सरकार सुप्रीम कोर्ट में भारतीय संस्कृति में अतिवार्जित समलैंगिकता का समर्थन करने लगती है.जो कुछ भी इन दिनों देश में संस्कृति के मंच पर हो रहा है मुझे तो लगता है कि ऐसा सरकार द्वारा साजिशन किया या करवाया जा रहा है.चाहे वह सन्नी लियोन का भारत आगमन ही क्यों न हो.स्थिति बड़ी गंभीर है और निकट-भविष्य में और भी ज्यादा गंभीर हो जानेवाली है.अगर हम भारतीय अब भी नहीं संभले तो एक दिन ऐसा भी आएगा कि हमारी लचीली संस्कृति में इतनी तब्दीली आ जाएगी कि सत्य सनातन भारतीय संस्कृति में कुछ भी भारतीय नहीं रह जाएगा.                

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

यातना शिविर से यातना शिविर तक

मित्रों,जर्मन तानाशाह हिटलर का नाम कानों में पड़ते ही उससे जुडी सबसे पहली बात जो हमारे जेहन में आती है वो है उसके द्वारा किया गया यहूदियों का लोमहर्षक संहार.उसके द्वारा लगाए गए यातना-शिविरों से जीवित बच गए कई लोगों ने अपना जो अनुभव बयां किया और विजेता मित्र देशों के सैनिकों ने जो कुछ अपनी नंगी आँखों से देखा;वीभत्स और जुगुप्सा रसों की चरम अभिव्यक्ति कर सकने में परम सक्षम है.द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यह स्वाभाविक था कि लगभग पूरी दुनिया में यहूदियों के प्रति सहानुभूति की लहर दौड़ पड़े.परिणामस्वरूप १४ मई,१९४८ को इंग्लैण्ड और संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर एक स्वतंत्र यहूदी इस्राईल राष्ट्र की फिलिस्तीन की पवित्र भूमि पर स्थापना की गयी.यह स्थापना अरबों के सख्त विरोध के बाबजूद तो की ही गयी थी साथ ही इस उम्मीद पर की गयी थी कि फिलिस्तीन में यहूदी और मुसलमान एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करते हुए विकास के पथ पर हँसी-ख़ुशी अग्रसर हो सकेंगे.लेकिन ऐसा हो न सका.अरब देशों ने एकजुट होकर इस्राईल पर उसका नामोनिशान मिटा देने के ध्येय से १९४८,१९६७ और १९७३ में तीन बार भीषण आक्रमण किया और मुँह की खाते रहे.नतीजतन इस्राईल ने फिलिस्तीन के बचे हुए लगभग सारे अरब प्रदेशों पर अधिकार कर लिया.साथ ही,प्रत्येक यहूदी के मन में यह धारणा घर कर गयी कि मुसलमान कभी उसके स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार कर ही नहीं सकते.
                  मित्रों,यह बेहद बिडम्बनापूर्ण और दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन यहूदियों पर द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान घोर अमानुषिक अत्याचार किए गए वही यहूदी इस्राईल की स्थापना के बाद अरब अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों की घोर अवहेलना करने लगे.कितने आश्चर्य का विषय है कि जर्मनी की यातना शिविरों की चीखों और आँसुओं से जन्मा यह देश स्वयं वर्तमान विश्व का मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघनकर्ता बन गया है.वैसे तो इस्राईल द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन के सैंकड़ों या उससे भी अधिक ऐसे मामले हैं जिनका जिक्र यहाँ किया जा सकता है परन्तु वर्तमान में जो वाकया सबसे ज्यादा चर्चा में है वो है पश्चिमी तट के अर्रबा निवासी खादर अदनान का.खादर अदनान अपने गृहनगर अर्रबा में बेकरी चलाता है.३३-३४ साल का है.उसे पहली बार १९९९ में इस्राईली सैनिकों ने गिरफ्तार किया था और तब से कुल मिलकर उसके साथ ऐसा नौ बार हो चुका है.अब तक उसे ६ सालों से भी ज्यादा जेलों में बिताने पड़े हैं.अंतिम बार १७ दिसंबर २०११ को अर्द्धरात्रि के बाद उसे उसके घर से उठा लिया गया.न तो कभी उसका गुनाह ही बताया गया और न ही जेल में कोई मानवोचित सुविधा ही दी गयी.अदनान ने जब पाया कि मौखिक विरोध का कोई असर दिख नहीं रहा तो बैठ गया आमरण अनशन पर जो २१ फरवरी तक यानि ६६ दिनों तक जारी रहा.अदनान की मांग थी कि इस्राईल उसे यातना देना और मारना-पीटना बंद करे.अदनान पर उसकी पिछली गिरफ्तारियों की ही तरह अब तक औपचारिक रूप से कोई आरोप नहीं लगाया गया है.उसे बस जुबानी शांति और व्यवस्था के लिए खतरा बताया गया है जिसका कोई मतलब नहीं है.खादर की यह भी मांग थी कि या तो उस पर मुकदमा चलाया जाए या फिर रिहा किया जाए.बाद में जब पूरे फिलिस्तीन में अदनान के समर्थन में सांकेतिक भूख हड़ताल और प्रदर्शन होने लगे तथा दूसरे अरब-मुस्लिम कैदी भी अनशन पर बैठ गए तब जाकर इस्राईल की नींद खुली और उसने उसकी प्रशासनिक हिरासत को लगातार दूसरा विस्तार नहीं देने की घोषणा कर दी.
              मित्रों,मालूम हो कि इस्राईल में अभी तक संविधान की स्थापना नहीं हो पाई है और न्यायालय द्वारा समय-समय पर दी गए निर्णयों जिनको वे लोग बुनियादी कानून कहते हैं के आधार पर शासन चलाया जाता है.न तो वहां के नागरिकों को औपचारिक रूप से मौलिक अधिकार ही प्राप्त हैं और न ही मानव अधिकार ही क्योंकि संविधान है ही नहीं और संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार घोषणा को वहां का सर्वोच्च न्यायालय कई वर्ष पहले अवैध घोषित कर चुका है.सैन्यादेश १९५१ के तहत इस्राईल प्रशासन किसी को भी ६ महीने के लिए प्रशासनिक हिरासत के तहत जेल में कैद रख सकता है और इस हिरासत को अनिश्चित काल तक प्रत्येक ६ महीने पर बढ़ा भी सकता है.इस तरह इस्राईल दुनिया के उन कुछेक देशों में से है जहाँ यातना और मानवाधिकारों के उल्लंघन को वैधानिक मान्यता मिली हुई है.जिस देश में इस तरह की सैद्धांतिक कानूनी व्यवस्था हो वहां मानवाधिकारों की क्या व्यावहारिक स्थिति हो सकती है;सहज ही समझा जा सकता है.यह तथ्य भी किसी से छिपा हुआ नहीं है कि इस काले कानून का प्रयोग इस्राईल का प्रशासन केवल अल्पसंख्यक मुसलमानों के खिलाफ ही करता है.
           मित्रों,वैसे तो भारत में भी बहुत-से ऐसे कैदी हैं जिनकी पूरी-की-पूरी उम्र ही विचाराधीन कैदी के रूप में निकल गयी लेकिन हमारे यहाँ ऐसा किसी खास धर्म या जाति के खिलाफ जानबूझकर नहीं किया जाता.खादर अदनान एक अकेला ऐसा अरब नहीं है जिसको ज़िन्दगी के कई अमूल्य सालों तक बेवजह बिना कोई कारण बताए इस्राईली जेलों में रखा गया.अभी भी सैंकड़ों निर्द्होश अरब इस्राईली जेलों में अमानुषिक यंत्रणाओं को झेलते हुए अपनी रिहाई का इन्तजार कर रहे हैं.ऐसा भी नहीं है कि दुनिया में या संयुक्त राष्ट्र संघ में इसके खिलाफ आवाज नहीं उठती लेकिन वो नक्कारखाने की तूती बनकर रह जाती है क्योंकि इस्राईल के खिलाफ किसी भी तरह के प्रस्ताव को अमेरिका वीटो लगाकर निष्प्रभावी बना देता है.न जाने क्यों उसे ईरान और ईराक में मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन तो दिखाई देता है लेकिन इस्राईल का जिक्र होते ही वो एकाएक बापू का बन्दर बन जाता है.समय साक्षी है कि एक समय इसी तरह की तुष्टिकरण की नीति पर इंग्लैंड उस जर्मन तानाशाह हिटलर के मामले में चल रहा था जिसका जिक्र मैंने इस आलेख के प्रारंभ में किया है और जिसका परिणाम था;जैसा कि आप सब भी जानते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध.समय अपने आपको दोहराता है और कितनी बेशर्मी से दोहराता है कि जो समुदाय एक समय यंत्रणाओं का सबसे बड़ा भोक्ता था आज सबसे बड़ा कर्ता बन बैठा है.
           मित्रों,जब विरोध और सुधार के सारे मार्ग बंद हो जाते हैं तब बचता है गांधीवाद.खादर अदनान ने इसका बड़ी ही खूबसूरती से प्रयोग भी किया है और सारे उन अरबों को एक नई राह भी दिखा दी है कि कतिपय परिस्थितियों में सत्य और अहिंसा से ज्यादा प्रभावी पंथ कोई और नहीं होता.अरबों को चाहिए कि वे खून-खराबी बंद करें और सत्याग्रह की नीति का निष्ठापूर्वक अनुशरण करें.उन्हें अपनी लडाई खुद ही लड़नी होगी.अरब देशों के शासक अपने निहित स्वार्थों के चलते अमेरिका के हुक्म के गुलाम बन चुके हैं और उनकी कोई मदद नहीं करने वाले.वे अपने हित में उनका उपयोग करते आ रहे हैं और करते रहेंगे.जब गांधीवाद २०वीं शताब्दी में दुनियाभर पर शासन करनेवाले अंग्रेजों को झुका सकता है तो वर्तमान २१वीं सदी में अमेरिका और इस्राईल को क्यों नहीं?अगर उनका संकल्प दृढ रहा और विश्वास सच्चा रहा तो वह दिन दूर नहीं कि जर्मन यातना शिविरों में जन्म लेनेवाला देश इस्राईल बहुत जल्दी अपने क्षेत्राधिकार में चल रहे अगणित अघोषित यातना शिविरों (जेलों) को बंद करने के लिए बाध्य हो जाएगा.अंत में दुनियाभर के स्वतंत्रताप्रेमियों से मेरा विनम्र अनुरोध है कि वे अपने-अपने देश में इस्राईल द्वारा मानवाधिकारों के धृष्टतापूर्ण उल्लंघन के विरुद्ध आवाज उठाएँ और अपनी-अपनी सरकारों पर दबाव बनाएँ जिससे कि वे इस्राईल पर वैश्विक मंचों के साथ-साथ कूटनीतिक वैकल्पिक मार्गों द्वारा भी दबाव बनाने को बाध्य हो जाएँ.                      

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

नई उभरती चुनौतियाँ और भारतीय कूटनीति

मित्रों,एक कहावत है और वह बिलकुल माकूल भी है कि इस दुनिया में कोई भी शह टुच्ची राजनीति से बचकर नहीं रह सकता.राजनीति की जद में परिवार से लेकर विश्व यानि हर कोई है.वैश्विक राजनीति भी घरेलू राजनीति की तरह निरंतर परिवर्तनशील है और यहाँ भी वही सिद्धांत काम करता है यानि कोई न तो किसी का स्थायी मित्र होता है और न ही स्थायी शत्रु.वैश्विक कूटनीति में भी किसी देश का दूसरे देश का शत्रु या मित्र होना केवल एक चीज पर निर्भर करता है और वो है परिस्थिति.
        मित्रों,भारत नेहरु के ज़माने से ही ना काहू से दोस्ती, ना काहू से वैर के मार्ग पर यानि कथित गुटनिरपेक्षता की नीति पर चलता आ रहा है और उसने इसका भारी खामियाजा अपनी कई लाख वर्ग किलोमीटर भूमि चीन और पाकिस्तान के हाथों खोकर भुगता भी है.वर्तमान में भी हमारे लिए अब भी दुनिया की कूटनीतिक जलवायु माकूल नहीं है.चीन और पाकिस्तान के इरादे अब भी हमारे प्रति नेक नहीं हैं.दुर्भाग्यवश हमारे दोनों चिरशत्रुओं की मित्रता रात दूनी दिन चौगुनी की रफ़्तार से बढती चली जा रही है.अभी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में इस बात की चर्चा बड़े ही जोर-शोर से चल रही है कि पाकिस्तान अपने द्वारा १९४७ में कब्जाए गए कश्मीर को चीन को सौंपने जा रहा है.इस तरह की दुखद संभावित स्थितियों से अगर भारत को बचना है तो उसे जल्द-से-जल्द अपनी मर्जी से ओढ़े गए गुटनिरपेक्षता के चोले को सदा-सदा के लिए उतार फेंकना होगा.खुदा न करे कभी अगर चीन और पाकिस्तान दोनों ने भारत के खिलाफ एक साथ युद्ध का मोर्चा खोल दिया तो बिना अमेरिकादि पश्चिमी देशों और जापान-आस्ट्रेलिया जैसे पूर्वी देशों की सहायता के हम शायद अपना अस्तित्व भी नहीं बचा पाएँगे.
                   मित्रों,भारत के सामने जो सबसे ताज़ी चुनौती कूटनीतिक मोर्चे पर आ खड़ी हुई है वो भारत के कथित ऐतिहासिक मित्र ईरान और पश्चिमी देशों में चल रही शीतयुद्ध जैसी खींचतान के चलते.पश्चिमी देश और ईस्राइल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को किसी भी कीमत पर रोकना चाहते हैं मगर ईरान रूकने को तैयार ही नहीं है.उन्होंने ईरान पर कई तरह के व्यापारिक और आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिए हैं लेकिन नई परिस्थितियों में ईरान के लिए संकटमोचक बनकर उभरा है भारत.शायद इसके लिए ५ राज्यों का विधानसभा चुनाव भी जिम्मेदार है.यह तो हुआ भारत-ईरान संबंधों का एक पहलू.इसका दूसरा पहलू यह भी है कि ईरान को भारत के सरोकारों से कुछ ज्यादा लेना-देना नहीं है और वो भारत को एक ऐसा मजबूर देश समझता है जो अपने कुल तेल आयत का १२% उससे करके काफी हद तक उस पर आश्रित है.तभी तो उसने दिल्ली में इस्राइली दूतावास के सदस्य के परिजनों पर संदिग्ध हमला करने की गुस्ताखी की है.हालाँकि अभी तक हमारी चिरकारी सुरक्षा-एजेंसियां किसी नतीजे पर नहीं पहुंची हैं और अगर हम उनकी योग्यता को मद्देनजर रखें तो कभी पहुँचनेवाली भी नहीं हैं परन्तु जार्जिया और थाईलैंड में हुए विस्फोटों से मिलनेवाली संभावनाओं की कड़ियों को अगर हम दिल्ली-विस्फोट से जोड़कर देखें तो काफी हद तक धुंध साफ़ हो जाती है कि दिल्ली-हमला भी ईरान प्रायोजित ही था.यदि यह सत्य है तो स्पष्ट हो जाता है कि भले ही भारत ईरान को अपना अभिन्न मित्र माने वो भारत को अपना मित्र तक नहीं मानता.वैसे अगर हम कश्मीर के मुद्दे पर विभिन्न मंचों पर समय-समय पर ईरान की नीतियों को देखें तो पाएँगे कि उसने हमेशा पाकिस्तान का साथ दिया भारत का नहीं.उसके सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला खोमेनी तो लगातार दुनियाभर के मुसलमानों से कश्मीरी अलगाववादियों की सहायता करने की अपील भी करते रहे हैं.फिर भी न जाने किन मजबूरियों के कारण भारत-सरकार ईरान से एकतरफा और जबरदस्ती की दोस्ती गांठने पर तुली हुई हैं?भारत कोई विधवाओं का देश नहीं है कि कोई भी ऐरा गैरा नत्थू खैरा भारत की पवित्र भूमि को अपने कुत्सित स्वार्थों का रणक्षेत्र बना दे.निश्चित रूप से ईरान ने दिल्ली में ईस्राइली दूतावासकर्मियों पर हमला करके जो कुछ भी किया है वह भारत की शान में गुस्ताखी है,हमारी संप्रभुता पर हमला है,हमारी गैरत को एक ललकार है और इसे हम भारतवासी हरगिज सहन नहीं करनेवाले!
                मित्रों,जहाँ तक ईस्राइल का सवाल है तो उसने कभी भारत-विरोधी तेवर नहीं दिखाए हैं और लगभग निःस्वार्थ भाव से हमारी मदद करता रहा है.आज भी सामरिक तकनीक के मामले में काफी हद तक हम उस पर निर्भर हैं जबकि हमने नेहरु-युग से ही फिलिस्तीनियों का बिना शर्त समर्थन करके उसे बार-बार चिढ़ाया है.हम नहीं चाहते कि दोनों में से किसी एक का नामोनिशान विश्व के मानचित्र से मिट जाए.दुनिया का इकलौता यहूदी राष्ट्र ईस्राइल और मुस्लिम देश फिलिस्तीन दोनों रहें और फले-फूलें परन्तु उस क्षेत्र में स्थायी शांति तभी कायम हो सकती है जब दोनों ही पक्ष सहअस्तित्व के सिद्धांतों को स्वीकार कर लें.
                     मित्रों,यह अति कड़वा सत्य है और भविष्य में भारत की परेशानियाँ बढ़ानेवाला भी कि दुनियाभर में मुसलमानों के बीच कट्टरता नए उभार पर है और मिस्र से लेकर मालदीव तक उदारवादी शक्तियां हाशिए पर चली गईं हैं और कट्टरवादियों को धरती और आकाश के बीच सिर्फ एक ही धर्म चाहिए इस्लाम और दूसरा कोई नहीं.यह सर्वविदित है कि हिन्दूबहुल भारत में मुसलमानों को जितनी आजादी,सुविधाएँ और अधिकार प्राप्त हैं उतनी किसी इस्लामिक देश में भी नहीं है.फिर भी हमारे कुछ मुसलमान भाई अपनी जेहादी मानसिकता को त्याग नहीं पा रहे हैं अन्यथा भारत में इन्डियन मुजाहिद्दीन और सिम्मी जैसे आतंकवादी संगठन नहीं होते जिन्होंने शायद दिल्ली हमले में भी ईरान की मदद की है.
              मित्रों,आज ईरान वैश्विक राजनीति में अकेला पड़ता जा रहा है.ऐसे में उसके साथ चिपके रहने की हमारी जिद हानिकारक ही सिद्ध होगी.माना कि आयातित तेल का ज्यादा मूल्य देकर हमें सम्बन्ध-विच्छेद का मूल्य चुकाना पड़ सकता है लेकिन उससे भी कहीं कई गुना ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी जब हम उसके साथ रहेंगे.इस सन्दर्भ में मुझे अकबर-बीरबल कथा से एक कथा का सन्दर्भ लेना समीचीन मालूम पड़ता है.हुआ यह कि बादशाह अकबर एक दोपहर को बीरबल के साथ भोजन कर रहे थे.तभी उन्हें न जाने क्या सूझी कि लगे बैगन की बड़ाई करने जिसे कुछ ही समय पहले पुर्तगाली भारत में लेकर आए थे.बीरबल ने भी कहा कि 'बजा फ़रमाया हुजूर,बैगन तो सभी सब्जियों का राजा है" फिर कुछ लम्हों तक ईधर-उधर की बातें करने के बाद अकबर लगे बैगन की बुराई करने परन्तु बीरबल तो हमेशा की तरह सचेत थे.सो उन्होंने भी तुरंत हामी भर दी और यहाँ तक कह दिया कि "हुजूर मैं तो कहता हूँ कि इसकी खेती पर ही प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए."अकबर चौंके और पूछा कि बीरबल पहले यह तो निर्णय कर लो कि बैगन अच्छा है या ख़राब.बीरबल ने भी छूटते ही कहा कि "हुजूर,बैगन जाए चूल्हे की भांड में,मुझे क्या?मुझे तो बस आपसे मतलब है जो मेरी रोजी-रोटी चलते हैं,आप कहते हैं कि बैगन अच्छा है तो अच्छा है और आप कहते हैं कि बुरा है तो बुरा है."इसी तरह भारत-सरकार को भी ईरान को नहीं बल्कि अपने हितों को ध्यान में रखना चाहिए.ईरान भी तो यही कर रहा है.

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

बेनजीर,बेमिसाल,अतुल्य बिहार

मित्रों,कुछ ही साल पहले भारत के अन्य राज्यों में बिहार की छवि इतनी ज्यादा ख़राब थी कि 'बिहारी' शब्द सबसे भद्दी गाली में परिवर्तित हो गया था.तब बिहार एक भ्रष्ट,नाकारा और जंगलराज सदृश शासन के लिए जाना जाता था.उस दौर में लालू और बिहार को लेकर कई चुटकुले बनाए और चलाए गए और उनमें से कई तो सुपरहिट भी हुए.उन दिनों जापान के कथित प्रधानमत्री के कथित बिहार दौरे और राज्य की अनपढ़ मुख्यमंत्री राबड़ी देवी से उनकी कथित मुलाकात के फ़साने ने इतनी स्वतःस्फूर्त लोकप्रियता और स्वीकार्यता हासिल की कि बहुत जल्दी यह फ़साना हकीकत जैसा बन गया.
             मित्रों,वो कहते हैं न कि दिन चाहे कितने भी बुरे क्यों न हों गुजर ही जाते हैं.इस दुनिया में कभी किसी की चलती हमेशा के लिए नहीं होती.कोई मिले हुए अवसर को भुना लेता है तो कोई सिर्फ हाथ मलता रह जाता है.एक वक्त था जब लालू राजनीतिक रूप से इतने शक्तिशाली होकर उभरे थे कि वे दिल्ली की गद्दी का फैसला भी करने लगे.चाहते तो उस दो साल की अवधि में बिहार को भारत के विकास का ईंजन बना डालते लेकिन सत्ता और अपार जनसमर्थन की ताड़ी पीकर मस्त लालू को तो जैसे विकास के नाम से ही नफरत थी.उन पर तो जैसे घोटाला करने का फितूर सवार था.वे उन दिनों अक्सर मंच से कहते कि "ये आईटी-फाईटी क्या होता है?कहीं विकास करने से वोट मिलता है?" परिणाम यह हुआ कि विकास की होड़ में रिवर्स गीयर चलता बिहार लगातार पीछे होता गया और अन्य राज्य आगे निकलते गए.फिर तो वह समय भी आया कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय जो बिहार विकास की दौड़ में दूसरे स्थान पर था;शर्मनाक तरीके से नीचे से प्रथम आने लगा.
                          मित्रों,धीरे-धीरे कई कारणों से बिहार की जनता लालू की जोकरई और राबड़ी के कुशासन से उबती गयी.जो बिहारी मजबूर और मजदूर होकर दूसरे राज्यों में रोजी-रोटी की तलाश में गए और जिन्हें सिर्फ बिहार से होने के कारण सबसे ज्यादा जलालत भी झेलनी पड़ी उन्होंने ही पहली बार विकास का मतलब समझा और असर भी देखा.कहना न होगा कि उनमें से ज्यादातर को लालू का परंपरागत वोटर माना जाता था.अंत में उनकी विकास की भूख इतनी बढ़ गयी कि उन्होंने और उनके परिवारवालों ने मसखरे लालू एंड फेमिली को सत्ता की भैंस की पीठ पर से जिस पर वे आगे से चढ़ा करते थे,धडाम से नीचे पटक दिया.वो कहते हैं न कि "सब कुछ गँवा के होश में आए तो क्या किया?"फिर लालू की नींद खुली और वे लगे रेलवे द्वारा विकास करवाने लेकिन एक तरफ जहाँ इसकी एक सीमा थी वहीँ दूसरी ओर तब तक बहुत देर हो चुकी थी.बिहार को सुशासन मिल चुका था;कानून का राज और विकासपरक शासन.
            मित्रों,फिर तो नीतीश और मोदी के कुशल नेतृत्व में बिहार विकास की पटरी पर इस तरह सरपट भागा कि नंबर एक गुजरात से टक्कर लेने लगा.बिहारी मेहनती तो थे ही.यह कहावत यूं ही तो प्रचलित नहीं हुई थी कि 'जो न कटे आड़ी से सो कटे बिहारी से'.सरकार की आमदनी बढ़ी तो खर्च भी बढ़ा और भ्रष्टाचारियों की बांछें खिल आई.मुफ्ते माल बाप का माल समझकर लगे लूटने.तब नीतीश कुमार की गठबंधन सरकार ने कई दशकों से निष्क्रिय पड़े निगरानी विभाग को अतिसक्रिय कर दिया.लोग रोजाना कहीं-न-कहीं घूस लेते पकडे जाने लगे.सरकारी सोंच यह थी कि इससे घूसखोरों की समाज में भद्द पिटेगी और वे घूस लेना छोड़ देंगे.
                       मित्रों,परन्तु ऐसा हुआ नहीं.तब तक भ्रष्टाचरण को समाज में पूरी तरह से मान्यता प्राप्त हो चुकी थी और भ्रष्टाचारी पूरी तरह से निर्लज्ज भी हो चुके थे.जेल की हवा खाकर आते और फिर से घूस खाने लगते.तब नीतीश सरकार ने एक भ्रष्टाचार निरोधक कानून का निर्माण किया जो पूरे भारत में अपनी तरह का पहला और अनूठा प्रयोग था.अब भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर आरोपी की आय से अधिक संपत्ति जब्त की जा सकती थी और अवैध कमाई से अर्जित संपत्ति की सूचना देनेवाले को अधिकतम ५ लाख रूपये तक ईनाम देने का भी प्रावधान किया गया.कई बड़े-बड़े अवकाशप्राप्त अधिकारियों की संपत्तियों को जब्त कर उनमें सरकारी स्कूल खोले गए.परन्तु पहल तेजी से परवान नहीं चढ़ सकी और जमकर मुकदमेबाजी का सहारा लिया जाने लगा.इसी बीच बेलगाम तंत्र के मुँह में "सेवा का अधिकार" का लगाम डालने का भी प्रयास किया गया.परन्तु छोटे-बड़े घोटालों पर रोक नहीं लग सकी.इंदिरा आवास योजना और मनरेगा तो मानो भ्रष्टाचार का निवास-स्थान ही बनती जा रही थी.असली समस्या तो शायद यह थी कि बिहार सरकार में वर्तमान में कार्यरत वैसे अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ क्या किया जाए जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप सही पाए गए हैं और जो जेल से बाहर आते ही फिर से घूस लेते पकड़े गए हैं.निलंबन से कुछ ज्यादा होने-जानेवाला था नहीं.एक बार जेल-यात्रा कर लेने के बाद जेल जाने का भय भी मन से रफूचक्कर हो चुका था.पुनर्नियुक्त होने पर फिर से वे भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते.वेतन आधा मिले या पूरा इससे भी उन्हें कोई अंतर नहीं पड़ना था क्योंकि जितना उनका मासिक वेतन था उतना तो वे एक दिन में ही बना लेते थे.
                मित्रों,अब जाकर बिहार सरकार ने पूरे भारत के सामने बेमिसाल नजीर पेश करते हुए "न तबादला,न निलंबन;सीधे बर्खास्तगी" का ब्रह्मास्त्र चला दिया है.मैंने भी कई महीने पहले ही अपने कई आलेखों में इसकी मांग उठाई थी और कहा था कि निलंबन और स्थानांतरण से कुछ भी नहीं हासिल होनेवाला इन्हें तो अब नौकरी से निकालकर जेल भेज दो और संपत्ति जब्त कर इन पर आपराधिक मुक़दमा भी चलाओ.इनके पीछे,इनकी पढाई के पीछे समाज और सरकार ने इसलिए पैसे पानी की तरह नहीं बहाए कि ये पढलिख कर उसको ही खोखला करने लगें.वो कहते हैं न कि अगर छोटे बच्चों की कक्षा को शांत करना हो तो सिर्फ एक की धुनाई कर दो और अगर यह फार्मूला भी विफल हो जाता है तब सबको बारी-बारी से पीटो.अभी तो सिर्फ ८ बी.डी.ओ. और ५ पुलिस अधिकारी बर्खास्त हुए हैं शायद बाँकी अधिकारी वक़्त के इशारे को समझकर संभल जाएँ और अगर नहीं संभलते हैं तो जाएँ अपने घर.हमें नहीं चाहिए उनकी लूटमार सेवा.इस बर्खास्तगी को पूरे देश में अभियान की तरह चलाना चाहिए तब जाकर मिटेगा या फिर प्रभावकारी सीमा तक घटेगा भ्रष्टाचार.जिन लोगों को लगता है कि सिर्फ सत्ता बदलने से कुछ नहीं बदलता उन्हें बिहार की तरफ विस्फारित नेत्रों से देखना चाहिए जहाँ सत्ता बदलने से शासन का चरित्र बदला,शासन-प्रशासन की परिभाषा ही बदल गयी.माना कि अभी भी सच्चा सुशासन लाने की दिशा में कई कदम उठाए जाने की जरूरत है.कुछ कमियां हैं,कुछ खामियां हैं,दाल में कुछ काला है लेकिन लालू-राबड़ी काल की तरह पूरी-की-पूरी दाल ही काली नहीं है.अब देश में सबके पीछे-पीछे चलनेवाला बिहार सबसे आगे चल रहा है;निरंतर उदाहरण-पर-उदाहरण स्थापित करता हुआ;अपनी स्वर्णिम विकास यात्रा में लगातार मील का पत्थर स्थापित करता हुआ.

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

कांग्रेस हराओ देश बचाओ

मित्रों,भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की विधानसभा के पहले चरण के मतदान में अब कुछ ही घंटे शेष रह गए हैं.इस समय सारे दल और उनके नेता जनता को लुभाने में लगे हुए हैं और इस दिशा में सबसे आगे है भारत की सबसे पुरानी मगर इस समय की सबसे भ्रष्ट और झूठी पार्टी कांगेस पार्टी.इसने एक ही बार में अपने सारे तीर छोड़ दिए हैं.मुस्लिमों को आरक्षण,युवराज्ञी प्रियंका गाँधी वाड्रा द्वारा प्रचार और युवराज राहुल गाँधी द्वारा राज्य का कथित विकास करने का वादा.बड़ी ही सफाई से पार्टी एक ही बार में देश और प्रदेश को पीछे धकेलने और आगे ले जाने वाले दोनों तरह के वादे किए जा रही है.
                   मित्रों,कुछ साल पहले कुछ इसी तरह के वादे करके यह पार्टी केंद्र में सत्ता में आई थी.परन्तु किया क्या?सिर्फ और सिर्फ सत्ता का दुरुपयोग.इसकी पूरी-की-पूरी सरकार सिर्फ एशिया में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी भ्रष्टाचार के मामले में अव्वल है.इसका लगभग प्रत्येक मंत्री अपनी मनमानी करके अपनी तिजोरी भरने में लगा हुआ है और प्रधानमंत्री व्यस्त हैं इन सबसे पूरी तरह से अनजान होने का स्वांग रचने में.श्री मनमोहन सिंह को शायद यह नहीं पता है कि वे कोई अपना या सोनिया गाँधी का घर नहीं चला रहे है वरन देश को चला रहे हैं.यहाँ इस कुर्सी पर उनकी छोटी-सी भूल और लापरवाही देश में भयानक तबाही ला सकती है जैसा कि २-जी स्पेक्ट्रम मामले में हुआ भी है लेकिन हमारा नेहरू परिवार अभी भी उन्हें सर्वोत्तम सिद्ध करने की जिद पकडे हुए है.तो क्या हम इस चुनाव में इस परिवार की इस गलत धारणा को गलत साबित नहीं कर देंगे?
               मित्रों,इस समय देश में चारों तरफ अराजकता का माहौल है.भ्रष्टाचार अपने चरम पर है,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जो किसी भी लोकतंत्र की धुरी होती है;को केवल इसलिए कुचला जा रहा है ताकि कोई जागृत नागरिक केंद्र की कांग्रेस सरकार की आलोचना नहीं कर सके और चूंकि कांग्रेसी युवराज्ञी प्रियंका गाँधी फरमा रहीं हैं कि उनकी और उनके परिवार की नजर में मनमोहन इस समय भी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं इसलिए निकट-भविष्य में देश में वर्तमान स्थितियों में कोई बदलाव आने की उस स्थिति में कोई सम्भावना नहीं रह जाती है कि अगर कांग्रेस उत्तर प्रदेश चुनाव जीत जाती है.इसका दूसरा मतलब यह भी हुआ कि केंद्र सरकार में जो कुछ भी हो रहा है वह कांग्रेस की सुशासन की परिभाषा के अंतर्गत है और हो सकता है जीत के बाद कांग्रेस उत्तर प्रदेश में भी इस मनमोहिनी सुशासन को आजमाए.
             मित्रों,पिछले दो लोकसभा चुनाव इस बात के गवाह है कि जब-जब कांग्रेस जीती है जनता की हार हुई है.महंगाई बढ़ी है,भ्रष्टाचार बढ़ा है और साथ ही बढ़ा है कालेधन के जमाकर्ताओं और भ्रष्टाचारियों को केंद्र सरकार का संरक्षण भी.इसलिए अगर आपको अपने प्रदेश की संभावित बर्बादी को रोकना है तो राहुल गाँधी के भ्रष्टाचार के साथ विकास के वादे को पूरी तरह से अंगूठा दिखाते हुए जब भी मतदान करें तो उसी उम्मीदवार के पक्ष में करें जो कांग्रेसी उम्मीदवार को हराने में सक्षम हो.
                दोस्तों,इस बात की भी प्रबल सम्भावना बन रही है कि चुनावों के बाद कांग्रेस समाजवादी पार्टी से गठबंधन कर लेगी.इसलिए आप कांग्रेस के साथ-साथ सपा को भी सीधे-सीधे ख़ारिज करिए.माया जी की माया के तो आप प्रत्यक्ष गवाह भी हैं और भोक्ता भी इसलिए उनको वोट देने का तो सवाल ही नहीं.हालाँकि कांग्रेस यह दावा कर रही है कि वो चुनावों के बाद किसी भी अन्य राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करेगी.किन्तु ऐसा वो पहले ही बिहार में बार-बार कर चुकी है.१९९० के बाद बिहार विधानसभा के प्रत्येक चुनाव में वह राजद से अलग होकर चुनाव लडती रही और इसी तरह हर बार यह वादा और दावा करती रही कि चुनावों के बाद वो किसी के साथ भी गठबंधन नहीं करने जा रही है.किन्तु चुनावों के बाद एक बार तो सोनिया गाँधी ने ऐसा भी किया कि अपने सारे-के-सारे विधायकों को एकबारगी लालू-राबड़ी सरकार में मंत्री बनवा डाला.
               मित्रों,दैवात आपके हाथों में सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे भारतवर्ष की तक़दीर और तस्वीर को बदलने का मौका आया है.इस सुअवसर का पूरा-पूरा लाभ उठाईए और अपने महान राज्य कांग्रेस के खूनी पंजे के शिकंजे में जाने से बचाईए अन्यथा बाद में सिवाय पछतावे के आपके पास कोई और विकल्प नहीं बचेगा.न तो आपकी आजादी ही बचेगी और न ही देश में लोकतंत्र ही बचेगा.जहाँ तक राहुल के विकास के वादे का सवाल है तो केंद्र सरकार के आंकड़े खुद ही चीख-चीखकर इस बात की गवाही दे रहे हैं कि देश के उन्हीं राज्यों में विकास-दर इस समय सबसे ज्यादा तेज है जिन राज्यों में कांग्रेस सत्ता में नहीं है और यह तो आप भी भली-भांति जानते हैं कि रोजगार के अवसर वहीं पर ज्यादा उत्पन्न होते हैं जहाँ विकास की रफ़्तार ज्यादा तेज होती है.इसलिए दोस्तों कांग्रेस के झूठे वायदों से बचिए,इसके झूठे नेताओं से सतर्क रहिए.आपको तो याद  ही होगा कि इन्होने हाल-फिलहाल में ही लोकपाल के मुद्दे पर थोक में देश से वादे किए हैं.और फिर उतनी ही बेहयाई और बेरहमी से उन वादों को तोड़ा भी है.