सोमवार, 15 जुलाई 2013

खाद्य-सुरक्षा के नाम पर दे दे रे बाबा

मित्रों,दिवाने तो आपने बहुत-से देखे होंगे मैंने भी देखे हैं। मैंने लोगों को लंगोट में फाग खेलते हुए भी देखा है और खूब देखा है मगर अल्लाहकसम मैंने आज तक किसी लंगोटधारी को दानी बनते हुए नहीं देखा है। मगर यहाँ तो बिल्कुल ऐसा ही हो रहा है। जिन लोगों ने देश को देशी-विदेशी पूंजीपतियों के हाथों गिरवी रख दिया है और जनता को लगातार महँगाई की चाबुक से मार-मारकर लहूलुहान कर दिया है वही बेईमान और मक्कार लोग आज खाद्य-सुरक्षा कानून लाकर खुद के दुनिया का सबसे बड़ा दानी होने का स्वांग रच रहे हैं।
             मित्रों,पहले घोटाले कर-करके,कर-करके देश के खजाने को लूट लिया,टैक्स और महँगाई बढ़ाकर जनता को भिखारी बना दिया और अब जब सरकार का खर्च भी नहीं निकल पा रहा है,भीख देने को भी जब पास में पैसे नहीं बचे हैं तो सरकार के दो-दो बड़बोले मंत्री जा पहुँचे हैं अमेरिका कटोरा लेकर लेकिन अमेरिका ठहरा विशुद्ध बनिया सो वो क्यों बिना कुछ लिए नाक पर मक्खी भी बैठने दे?
                मित्रों,अगर इन लुटेरों को जनता के लिए अपने निजी धन में से एक पैसा भी खर्च करना पड़े तो ये कदाचित् वो भी न करेंगे। लेकिन खजाना तो जनता का है खाली रहे या भरा इनके बाप का क्या? इन्होंने तो पिछले 9 सालों में अपने निजी कोष में इतना माल भर लिया है अब इनकी सात पीढ़ियों को हाथ-पाँव हिलाने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। यह देश का दुर्भाग्य है कि बावजूद इसके इन लुटेरों का लूट से मन ही नहीं भर रहा है और ये लोग लगातार तीसरी बार दिल्ली के तख्त पर बैठने की जुगत भिड़ा रहे हैं।
                   मित्रों,वो कहते हैं न कि सत्ता बड़ी बुरी शह है।  सत्ता की लत पड़ जाती है क्योंकि उसमें नशा भी है अफीम और हीरोइन से भी बहुत ज्यादा। हमारे कांग्रेसी नेताओं को यकीन ही नहीं हो रहा है कि वो लोग 2014 में सत्ता से बाहर भी हो सकते हैं। कलम के जादूगर रामवृक्ष बेनीपुरी ने कहा था कि अमीरी की कब्र पर उपजी हुई गरीबी की घास बड़ी जहरीली होती है सो विपक्ष में बैठने की सोंचकर ही सोनिया गांधी एंड फेमिली के हाथ-पाँव में सूजन आने लगी है। सरकारी खजाने में रोज के खर्च के लिए भी पैसा है नहीं और भूतपूर्व त्यागमूर्ति सोनिया अम्मा को पूरे देश के उन गरीबों को जो उनके और उनके परिवार के भ्रष्टाचार की वजह से भी गरीब हैं,भोज देना है। उनको न जाने कैसे यह मतिभ्रम हो गया है कि भारत के लोग भूखे,भिखारी और परले दर्जे के कामचोर हैं। वो काम करना ही नहीं चाहते इसलिए उनको काम नहीं दो बल्कि बिठाकर पैसे दे दो और रोटी दे दो फिर चाहे देश को खा जाओ,बेच दो,गुलाम बना दो वे बेचारे अहसानों तले इस कदर दबे रहेंगे कि किंचित भी बुरा नहीं मानेंगे।
                     मित्रों,आपने भी कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी सरकारी दफ्तर में यह लिखा हुआ देखा होगा कि शीघ्रता को भी समय चाहिए लेकिन सोनिया जी ने आजतक नहीं देखा। मान लीजिए कि आपको गंगा नदी पर एक पुल बनाना है तो उसमें कम-से-कम 5-7 साल तो लग ही जाएंगे। पहले जमीन का सर्वेक्षण होगा फिर पाया बनेगा तब ऊपर का काम शुरू होगा। कंक्रीट के जमने में समय तो लगेगा ही। अब अगर आप चाहेंगे कि वही पुल 6 महीने में बन जाए तब तो उस पुल का भगवान ही मालिक है। परन्तु इतनी छोटी-सी बात महाभ्रष्ट-देशबेचवा सोनिया गांधी एंड फेमिली के शातिर दिमाग में घुस ही नहीं पा रही है। वो आमादा हैं कि हम तो इसी साल 20 अगस्त से देश के लोगों को भिक्षा (भोजन) की गारंटी दे देंगे। जबकि इसके लिए पहले सही जरुरतमंदों का पता लगाना चाहिए था,फिर पीडीएस को ठीक-ठाक करना चाहिए था,फिर योजना की मॉनिटरिंग और अन्य प्रकार की व्यवस्थाएँ की जानी चाहिए थी तब जाकर अधिकार देना था वरना कागजी अधिकारों और गारंटियों की तो इस देश में पहले से ही बहुतायत है। वैसे गारंटी देने में इस परिवार का भी कोई जवाब नहीं है,इसने सबसे पहले जनता को सूचना की गारंटी दी हालाँकि अब अपनी ही पार्टी को इसकी मार से बाहर करने के लिए छटपटा रही है,फिर इसने 100 दिन के काम की गारंटी दी,फिर लगे हाथों शिक्षा की गारंटी भी दे दी और अब भीख की गारंटी देने जा रही है। हमारे प्रदेश बिहार की जनता तो सूचना के लिए मारी-मारी फिर रही है पर सूचना मिलती नहीं अलबत्ता कृष्ण-जन्मस्थली की तीर्थयात्रा का पुनीत अवसर जरूर मिल जा रहा है। आपके राज्य की आप जानिए। काम की गारंटी ने मुखियों को करोड़पति होने की गारंटी जरूर दे दी है और मजदूरों को या तो पता ही नहीं है कि उनका नाम मनरेगा में दर्ज है या तो उनको बैठे-बिठाए आधा ही पैसा मिल पा रहा है। शिक्षा के अधिकार का तो कहना ही क्या? इस पर तो अभी तक अमल शुरू हुआ ही नहीं है और शायद कभी होगा भी नहीं और अब आ गया है बिना किसी पूर्व तैयारी के एक और महान अधिकार भिक्षा का अधिकार। वास्तव में यह गरीबों के लिए भोजन की गारंटी नहीं है बल्कि वर्तमान परिस्थितियों में यह पीडीएस के जुड़े मंत्रियों,अधिकारियों,कर्मचारियों व दुकानदारों के करोड़पति होने की गारंटी है। क्या सोनिया एंड फेमिली बताएगी कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी जनवितरण प्रणाली के माध्यम से यह कानून कैसे पारदर्शी तरीके से लागू हो पाएगा? क्या वे लोग जल्दीबाजी करके यह नहीं चाहते हैं कि इस योजना का 12 आना से भी ज्यादा बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचारियों की जेब में पहुँच जाए?
                              मित्रों, जब देश की बीपीएल जनता को पहले से ही हर महीने सस्ता अनाज दिया जा रहा है तो फिर नाम बदलकर उसी तरह की नई योजना लाने का क्या प्रयोजन? यह तो वही बात हुई कि एक ही बार बनी हुई सड़क का शिलापट्ट बार-बार बदल-बदलकर अलग-अलग नेता बार-बार उद्घाटन करें। विपक्ष तो विपक्ष खुद कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों के हाथ-पाँव भी खजाने की बुरी सेहत को देखते हुए इस योजना के बारे में सोंचकर ही फूले जा रहे हैं। मगर सोनिया गांधी एंड फेमिली को देश और देश के खजाने से क्या लेना-देना? उनको तो बस एक गेम चेंजर प्लान चाहिए जो अकस्मात् जनता की याद्दाश्त को इस कदर धुंधली कर दे कि वे उनकी सरकार में हुए सारे रिकार्डतोड़ महाघोटालों को भुला दें। वे यह भी भूल जाएँ कि कांग्रेस ने अपनी आवारगी से किस तरह उनकी घरेलू पारिवारिक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी चमकते चांद से टूटा हुआ तारा बना डाला है और एक बार फिर से उसकी झूठ और फरेब की काठ की हाँडी में सत्ता की परम स्वादिष्ट खिचड़ी को वोटों की मीठी आँच देकर पक जाने दें।

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

नीतीश हैं भारी असमंजस में

मित्रों,यह शायद आपको भी पता होगा कि बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बिहारी राजनीति का चाणक्य कहा जाता है। क्यों कहा जाता है कहनेवाले जानें लेकिन फिलहाल तो राजग से अलग होने के बाद श्रीमान् चाणक्य जी की हालत उस मकड़ी वाली हो गई है जो कभी अपने ही बुने जाल में फँस जाती है। विडंबना यह है कि नीतीश कुमार ने भाजपा के सभी हटाए गए मंत्रियों के विभाग गठबंधन टूटने के 26 दिनों के बाद भी अपने ही पास रखे हैं और मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं कर पा रहे हैं। परिणाम यह हुआ है कि बिहार में पूरे शासन-प्रशासन में अव्यवस्था और अराजकता व्याप्त होने लगी है,कामकाज ठप्प पड़ने लगा है।
               मित्रों,कदाचित् नीतीश कुमार को यह भ्रम या घमंड हो गया है कि राज्य में राजनीति सिर्फ उनको ही आती है। उन्होंने सोंचा था कि राजग से अलग होने के बाद देशबेचवा कांग्रेस उनको हाथोंहाथ लेगी और राज्य में वही करेगी जो वे कहेंगे लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा। कांग्रेस ने राजद और लोजपा से दूरी तो नहीं ही बनाई उल्टे झारखंड में राजद की मदद से महाभ्रष्ट हेमंत सोरेन की सरकार भी बनवा दी और नीतीश गुब्बार देखते रह गए। नीतीश भूल गए थे कि कांग्रेस उनसे भी बड़ी,सबसे बड़ी अवसरवादी है और उसको सिर्फ सत्ता से मतलब है धर्मनिरपेक्षता वगैरह तो जनता को फुसलाने और भरमाने के साधनभर हैं।
                     मित्रों,कांग्रेस पर भरोसा करके नीतीश न घर के रह गए हैं और न घाट के। भाजपा जैसा भरोसेमंद,सुख-दुःख में हमेशा साथ निभानेवाला साथी छूटा और नया साथी सौतन को छोड़ नहीं रहा है। ऐसे में बिहार में आगामी चुनावों में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति अर्थात् भाजपा,कांग्रेस-राजद-लोजपा और जदयू के बीच हो सकती है जो किसी भी तरह नीतीश जी के लिए शुभ नहीं होगा। वैसे भी अब जनता के बीच लगातार बढ़ते सत्ता-विरोधी आक्रोश को भी उनको अकेले ही झेलना होगा। इस समय यह बताना संभव नहीं है कि नीतीश जी के मन में चल क्या रहा है लेकिन इतना तो निश्चित है कि भाजपा के हटने का शासन-प्रशासन पर बहुत-ही बुरा प्रभाव पड़ा है। इसमें कोई शक नहीं कि भाजपा के मंत्री काफी योग्य थे और सुधार भी सिर्फ उन्हीं विभागों में देखने को मिल रहा था जिसके मंत्री भाजपाई थे।
                                                       मित्रों,पिछले 26 दिनों से नीतीश कुमार एक साथ एक दर्जन से अधिक विभागों के मंत्री हैं (क्योंकि भाजपाई मंत्रियों के सारे विभाग अभी उनके पास ही हैं) और मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने अभी तक विभिन्न आयोगों और निगमों में काबिज भाजपा नेताओं को भी उनके पदों से नहीं हटाया है जिससे प्रदेश के राजनैतिक हलकों में कई सवाल उठने लगे हैं। क्या वे फिर से राजग में वापसी करने जा रहे हैं या उनको मंत्रिमंडल-विस्तार से पार्टी में विद्रोह का भय सता रहा है? उनको जो भी करना है जल्दी में करें तो अच्छा होगा उनके लिए भी और राज्य के लिए भी क्योंकि देरी करने से शासन-प्रशासन में सन्निपात की स्थिति और भी ज्यादा गहरी होती जाएगी जिसके दुष्परिणाम सीधे-सीधे चुनाव-परिणामों में परिलक्षित होंगे।

बुधवार, 10 जुलाई 2013

सुशासन में आकाशकुसुम हुआ न्याय

 
क्या पुष्पम की आत्मा को मिल पाएगा न्याय?

मित्रों,जब ग्राम+पोस्ट-राहतपुर,थाना-बलिया,जिला-बेगूसराय निवासी बलराम सिंह ने वर्ष 2002 में अपनी फूल से भी ज्यादा नाजुक पुत्री पुष्पम का हाथ ग्राम+पोस्ट-हरखपुरा,थाना-गढ़पुरा,जिला-बेगूसराय निवासी चिरंजीवी मुरारी राय के हाथों में सौंपा था तब उन्होंने यह सपनों में भी नहीं सोंचा था कि एक दिन इन्हीं हाथों से उनकी पुत्री की दो-दो बच्चों की माँ बन जाने के बाद चंद रूपयों की मांग को उनके द्वारा पूरा न कर पाने के कारण हत्या कर दी जाएगी। उन्होंने सोंचा तो यह भी नहीं था कि सुशासन की पुलिस मोटी रिश्वत खाकर उनके बजाए उनकी बेटी के हत्यारों की ही पैरोकार हो जाएगी और उनकी बेटी तो क्या उसकी आत्मा तक को भी न्याय नहीं मिल पाएगा।
               मित्रों,बलराम बाबू ने जो सपने में भी नहीं सोंचा था वही हुआ और हकीकत में हुआ। 10/11 मई,2013 की रात में उनकी बेटी पुष्पम को उसके पति और परिवारवालों ने मिलकर मार डाला और चुपके से उसका दाह-संस्कार भी कर दिया। सूचना मिलते ही उन्होंने हत्या का मुकदमा भी किया (केस नं.-46/2013,थाना-गढ़पुरा,जिला-बेगूसराय),डीएसपी उपेन्द्र प्रसाद के यहाँ वीडियो कैमरे के सामने बिटिया की ससुराल के 7 लोगों से गवाही भी दिलवाई लेकिन हुआ कुछ भी नहीं,यहाँ तक कि हत्यारों को गिरफ्तार भी नहीं किया गया। थक हारकर जब वे डीएसपी श्री प्रसाद के यहाँ गुहार लगाने पहुँचे तो पूरे परिदृश्य को ही उल्टा पाया। डीएसपी ने उनको कार्रवाई का आश्वासन तो नहीं दिया लेकिन समझौते के लिए दबाव खूब डाला। यहाँ तक कि हत्यारों से उनकी अपने मोबाईल पर बात भी करवाई और अपने सामने बिठाकर फोन पर उनको गालियाँ भी सुनवाई। उसी दिन डीएसपी कार्यालय के एक स्टाफ ने कार्रवाई के लिए उनसे मोटी रकम की मांग की। बाद में मुकदमे के अनुसंधान पदाधिकारी ने भी उनसे समझौता कर लेने को कहा और यह भी कहा कि वह उनको इसके बदले अच्छी-खासी रकम दिलवा देगा। साथ ही यह धमकी भी दी कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो वो मामले को आत्महत्या का मामला बना देगा। अब बेचारे बलराम बाबू,सपरिवार चारों तरफ से असहाय हैं। मन में क्षोभ और गुस्से का लावा उबल रहा है। उनका बस चले तो वे पूरे सरकारी तंत्र को ही जलाकर राख कर दें। आज हत्या को पूरे 2 महीने हो चुके हैं और सुशासन बाबू की पुलिस ने (मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद बिहार के गृह मंत्री भी हैं) हत्यारों की गिरफ्तारी तक नहीं की है और शायद कभी करेगी भी नहीं।
                    मित्रों,पुष्पम का मामला तो सिर्फ एक नमूना है बिहार पुलिस की महानता का। सारे मामलों को तो सात समंद की मसि करौं और लेखनी सब बनराई करके भी स्वयं गणेश जी भी नहीं लिख सकते। बिहार के प्रत्येक थाने में चाहे वो घोषित रूप से आदर्श हों या नहीं सत्य और ईमानदारी के प्रतीक गाँधी जी की तस्वीर जरूर टंगी होती है। ऊपर दीवार पर गाँधी की तस्वीर लगी होती है और उसके ही नीचे बैठकर गाँधी का लेन-देन किया जाता है,व्यापार किया है। थानों में एक पंक्ति भी मोटे-मोटे अक्षरों में लिखी होती है कि क्या मैं आपकी सहायता कर सकता हूँ? जबकि वास्तव में लिखा हुआ यह होना चाहिए कि क्या मैं हत्यारों की सहायता कर सकता हूँ? अथवा क्या मैं आपको तंग कर सकता हूँ? अथवा क्या मैं आपको लूट सकता हूँ?
                                  मित्रों,काफी साल पहले मैंने कादम्बिनी पत्रिका में चंबल के मशहूर डाकू मोहर सिंह का साक्षात्कार पढ़ा था जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर गाँव का पटवारी ईमानदार रहे तो पूरे चंबल क्षेत्र में कोई बागी नहीं बनेगा। मैं कहता हूँ कि अगर हमारी पुलिस ईमानदार हो जाए तो पूरे भारत में कोई नक्सली नहीं बने और नहीं रहे और साल लगते-लगते नक्सलवाद सिर्फ इतिहास की किताबों में सिमटकर रह जाए। लेकिन ऐसा होगा क्या? जिस देश और प्रदेश में नेताओं द्वारा अधिकारियों की पोस्टिंग रिश्वत लेकर की जाती हो,तबादलों ने उद्यम का रूप ले लिया हो,जहाँ अच्छे अफसरों को (उदाहरणस्वरूप शिवदीप लांडे,अरविन्द पांडे वगैरह) शौक से शंटिंग करके रखा जाता हो वहाँ ऐसा कदापि नहीं होगा। वहाँ तो बस यही होगा कि इसी तरह पुष्पम जलाई जाती रहेंगी,इसी तरह डीएसपी की सहानुभूति पीड़ितों के बजाए पीड़कों के साथ बनी रहेगी और जीवित या मृत पुष्पमों के लिए न्याय इसी तरह आकाशपुष्प बनी रहेगी।

बुधवार, 26 जून 2013

उत्तराखंड में संकट में लोक तंत्र लापता

मित्रों,16 जून की शाम ढलने तक दुनियाभर के हिन्दुओं के लिए सदियों से अतिपवित्र माना जानेवाला देवभूमि उत्तराखंड श्मशान में तब्दील हो चुका था। हर जगह,हर तरफ लाशें थीं,चीखें थीं,चीत्कारें थीं,नहीं थी तो केवल सरकार और सरकारी तंत्र। कहीं कोई राहत का इंतजाम नहीं,कहीं किसी तरह की कोई व्यवस्था नहीं। एक घोर चापलूस,दरबारी और अयोग्य मुख्यमंत्री से हम उम्मीद भी क्या करें और क्यों करें? अब तक केंद्र व राज्य की सरकारों ने हादसे के बाद बस इतना ही काम किया है कि वे लाशों को गिन रहें हैं मगर काफी कम करके। जहाँ मरनेवाले अभागे 20 हजार से कम नहीं हैं इन सरकारों की गिनती अभी हजार तक भी नहीं पहुँची है।
             मित्रों,हम सभी जानते हैं कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था सदियों से हिन्दू तीर्थयात्रियों के आगमन पर आधारित है और 16 जून को आए जल प्रलय में मरनेवाले और प्रभावित होनेवाले लगभग सारे लोग हिन्दू तीर्थयात्री ही हैं। कहाँ तो वे आए थे चारों धाम की यात्रा कर पुण्य कमाने और कहाँ तो वे या तो सुरधाम पहुँच गए या फिर उनको मरणांतक पीड़ा का सामना करना पड़ा और करना पड़ रहा है। सोलह जून की शाम को उन्होंने खुद को 15-20 फीट ऊँची वो भी कंकड़-पत्थरयुक्त अतिशीतल पानी की तेज धारा के मध्य में पाया। उनमें से कुछ अभागे तो तत्काल मर गए और जो बच गए उनकी हालत तो और भी बुरी थी। उनको सरकारी अव्यवस्था और अराजकता के चलते न तो कुछ खाने को ही कुछ मिल रहा था और न तो पीने को ही। न तो दवा ही मिल रही थी डॉक्टर भला कहाँ से मिलते? नौ-दस दिनों तक वे लोग लगातार पानी उड़ेलते खुले आकाश के नीचे भींगते-सूखते भूखे-प्यासे पड़े रहे और पड़े हैं। न कहीं शासन का पता और न कहीं प्रशासन का ही,पूरा-का-पूरा तंत्र लापता। न जाने क्यों और किसलिए राज्य सरकार ने इतने भारी-भरकम तंत्र को पाल-पोस रखा है? क्या अब भी किसी को संदेह रह गया है कि भारतीय लोकतंत्र में खासकर कांग्रेसी लोकतंत्र में तंत्र की नजर में लोक का कोई स्थान रह भी गया है? यह सर्वविदित है कि इस प्राकृतिक त्रासदी में मरनेवाले लगभग सारे लोग हिन्दू हैं और कोई हिन्दू वोट बैंक तो होता है नहीं कि उनकी चिंता की जाए। हिन्दू अगर अब भी नहीं जागे तो परंपरागत,सदियों पुरानी चार धाम यात्रा तो भविष्य में थम ही जाएगी उनके जीने के भी लाले पड़ जाएंगे जैसे कि इस समय देवभूमि उत्तराखंड में पड़े हुए हैं।
                         मित्रों,यह सब तब हुआ है जबकि सीएजी ने दो महीने पहले ही अपनी रिपोर्ट में उत्तराखंड में आपदा-प्रबंधन के शून्य होने की चेतावनी दे दी थी। फिर किंकर्त्तव्यविमूढ़ता की ऐसी स्थिति क्यों आई? क्यों राज्य और केन्द्र की सरकारों को कल-परसों यह कहना पड़ा था कि जिनको पीड़ितों तक राहत पहुँचानी है वे आप खुद जाकर पहुँचाएँ? आप ही बताईए कि ऐसा भी कहीं हुआ है कि सड़क मार्ग से कटे,अतिदुर्गम क्षेत्रों में जाकर देशभर के सहृदय और देशभक्त लोग खुद राहत पहुँचाएँ? फिर जब लोग आगे आने लगे तो अब वही केंद्र व राज्य सरकारें ऐसा क्यों कह रही हैं कि राहत-कार्य सिर्फ हमारे द्वारा ही चलाए जाएंगे?
                       मित्रों,क्या सीएजी की चेतावनी के बाद भी केंद्र और उत्तराखंड की सरकारों का कान में तेल डालकर सोए रहना आपराधिक कृत्य नहीं है? क्या केंद्र और उत्तराखंड की सरकारों पर हजारों निरपराधों की हत्या का मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए? हमारे प्रधानमंत्री रोजाना सर्वोच्च न्यायालय को अपनी सीमा में रहने की चेतावनी देते रहते हैं फिर क्यों बिना सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के उत्तराखंड में राहत और बचाव का काम शुरू नहीं किया गया? देश में क्या आवश्यकता है ऐसे लोकतंत्र की जिसमें जब लोक की जान पर बन आए तो तंत्र लापता हो जाए? क्या जरुरत है ऐसी सरकारों की जो गाढ़ी जरुरत के समय जनता की किसी भी तरह से मदद न कर पाए और जनता को पूरी तरह से रामभरोसे तिल-तिल कर मरने के लिए छोड़ दे?
                       मित्रों,पूरा देश आभारी है भारतीय सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के उन जवानों का जिन्होंने रात-दिन एक करके और अपनी जान की बिल्कुल भी परवाह न करते हुए हजारों लाचारों की जान बचाई। कल की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में वायुसेना और अर्द्धसैनिक बलों के 19 जवानों को जान भी गवानी पड़ी है। हम उनकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं और महापापी सरकार से अनुरोध करते हैं कि इन वास्तविक नायकों के परिजनों को पर्याप्त मुआवजा दे,कम-से-कम राशि धौनी ब्रिगेड को कप जीतने पर मिलने वाली राशि से तो ज्यादा जरूर होनी चाहिए,प्रति जवान कम-से-कम एक करोड़ रूपया। दोस्तों,यह घोर दुर्भाग्यपूर्ण है कि अभी भी कम-से-कम पाँच हजार लोग लगातार 11 दिनों से बरसात,मच्छर,कीड़े-मकोड़े और भूख-प्यास से लड़ते हुए अभी भी मदद का इंतजार कर रहे हैं। देश में किसी भी तरह की आपदा-योजना या आपदा-तंत्र का नहीं होना क्या यह नहीं दर्शाता है कि वर्तमान केंद्र-सरकार और उत्तराखंड की सरकार दोनों ही नाकारा हैं और किसी भी तरह की बाहरी और भीतरी चुनौती से निबटने में पूरी तरह से अक्षम हैं? क्या ऐसी सरकारें खुद अपने-आपमें ही आपदा नहीं होती हैं?
                              मित्रों,मुझे आपको यह सूचित करते हुए अपार क्रोध हो रहा है कि भारत को श्री सुशील कुमार शिंदे के बाद कई और नीरो के बाप मिल गए हैं। जिस प्रदेश में 10-11 दिनों से साक्षात महाकाल का तांडव चल रहा हो,लाशों को जलाने के लिए लकड़ियों के लाले पड़े हों उस राज्य का मुख्यमंत्री न जाने क्यों इसी सप्ताह स्विट्जरलैंड की यात्रा पर जा रहा है। उनको स्विस बैंक से कोई जमा-निकासी करनी है या कोई अन्य अपरिहार्य काम आ पड़ा है पता नहीं लेकिन वे जिस विषम परिस्थिति में विदेश जाने पर अड़े हुए हैं उसे देखकर तो कदाचित् किसी जल्लाद को भी शर्म आ जाए। जब उनका प्रेरणा-पुरूष युवराज ही दो-दो गृह राज्य मंत्रियों को साथ में लेकर ऐन घटना के दिन से एक सप्ताह तक पेरिस में रंगरलियाँ मना रहा हो तो बहुत सारे अज्ञात गुणों से युक्त बहुगुणा क्यों नहीं मनाएंगे? मरनेवाले या नरक की पीड़ा भोग रहे लोग कोई उनके सगे-संबंधी तो हैं नहीं। इसी बीच कृपालु युवराज 24 जून को देश में वापस आ गए हैं और लगातार बाढ़-पीड़ितों से मिल रहे हैं जबकि इससे पहले भारत-सरकार के गृह-मंत्री श्री शिंदे ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को यह कहकर ऐसा करने से रोक दिया था कि इससे राहत-कार्य में बाधा आएगी। देश की कुंडली में राहु की महादशा ला सकने की अपार क्षमता रखनेवाले राहुल गांधी किसी नियम के अंतर्गत तो आते हैं नहीं सो वे क्यों मंत्री की सलाह पर अमल करने जाएँ? कुछ अन्य केंद्रीय मंत्री तो ऐसे भी हैं जिन्होंने तो राहत में लगे हेलिकॉप्टरों को जबरन खाली करवा दिया और तब आपदा-प्रभावित क्षेत्रों का क्रूरतापूर्वक हवाई और जमीनी सर्वेक्षण किया। क्या पता फिर कब ऐसा सुनहरा मौका हाथ लगता?
                               मित्रों,इस बीच उत्तराखंड के प्रलय-क्षेत्र से कुछ इस तरह की सूचनाएँ या खबरें भी आ रही हैं जो उसके एक और नाम देवभूमि से बिल्कुल भी मेल नहीं खातीं। कई जगहों पर स्थानीय निवासी फँसे हुए तीर्थयात्रियों से खाद्य-सामग्री और पानी के मनमाने दाम वसूल रहे हैं। देवताओं यह देव-संस्कृतिवाली बात तो हुई नहीं। भारतीय वांङ्मय में अतिथियों को देवता का दर्जा दिया गया है फिर उनकी मजबूरियों से अनुचित लाभ उठाना तो दानवोंवाला कृत्य ही कहा जाएगा न? इतना ही नहीं कई जीवित-मृत महिलाओं के हाथ तक भी स्वर्णाभूषणों के लालच में काट लिए गए हैं,कई तीर्थयात्रियों को पहाड़ से नीचे फेंकने की धमकी देकर लूटा गया है और कई तीर्थयात्री महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार भी किया गया है। कुछ जगहों से जैसे गौरीकुंड से इस तरह की खबरें भी आ रही हैं कि वहाँ के ग्रामीणों ने अपना सारा राशन-पानी पीड़ित आगन्तुकों को खिला-पिला दिया है और खुद उपवास कर रहे हैं। ऐसे लोग निश्चित रूप से श्रद्धा और स्तुति के पात्र हैं।
                मित्रों,कहते हैं कि आपदायें मानवता का लिटमस टेस्ट होती हैं। इसी दौरान पता चलता है कि कौन मानव है और कौन दानव,कौन हितैषी है और कौन शत्रु। तभी तो रहीम कवि ने कहा था कि-रहिमन विपदा हूँ भलि जो थोड़े दिन होय।हित-अनहित या जगत में जानि पड़े सब कोय।। जल-प्रलय ने हिन्दुओं के समक्ष कांग्रेस के खौफनाक हिन्दू-विरोधी,मानवता-विरोधी और देश-विरोधी चेहरे को तो पूरी तरह से अनावृत कर ही दिया है वहाँ की स्थानीय जनता के देव-संस्कृति का हिस्सा होने के दावे को भी कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। मैं हमेशा से तीर्थयात्रा को मूर्खता मानता रहा हूँ। भक्तराज रामकृष्ण परमहंस भी कहा करते थे कि जहाँ सज्जन लोग निवास करते हों वहीं तीर्थ है अन्यत्र नहीं। हिन्दुओं को अपना कर्म सुधारना चाहिए परलोक बिना तीर्थयात्रा किए ही सुधर जाएगा।
                   मित्रों,उत्तराखंड में न तो पहली बार बादल फटे हैं और न ही पहली बार भूस्खलन ही हुआ है। हाँ,इस बार जान-माल का नुकसान जरूर बहुत ज्यादा हुआ है। हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया और प्रकृति ने हमें बिना देरी किए उसका दंड भी दे दिया। हिमालय के साथ सबसे पहला खिलवाड़ तो अंग्रेजों ने पूरे क्षेत्र में अखरोट के बदले चीड़ का जंगल लगाकर किया था जिसकी जड़ों में मिट्टी को जकड़कर रखने की क्षमता कम होती है। फिर हमने औद्योगिकीकरण,सड़क-निर्माण और जल-विद्युत उत्पादन के नाम पर पूरे उत्तराखंड के पहाड़ों को वेध कर रख दिया,छलनी कर दिया। अभी-अभी 4-5 जून को मूर्खता के प्रकाश-स्तंभ,चापलूस-शिरोमणि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय पर राज्य में नई जल-विद्युत परियोजनाओं और नई सड़कों के निर्माण को बाधित करने का आरोप लगाते हुए देखा। सूत्र बताते हैं कि नई जल-विद्युत परियोजनाओं के लिए प्रति मेगावाट 1 करोड़ रूपया माननीय मुख्यमंत्री सुविधा-शुल्क के रूप में लेते हैं।
                       मित्रों,सारे पर्यावरणविद् हिमालय-क्षेत्र में नए बाँधों और सड़कों के निर्माण के विरूद्ध लगातार चेतावनी देते रहे हैं। हमने अपनी आँखों से देखा है कि मंसूरी में लोगों ने पहाड़ की ढाल पर पीलर दे-देकर घर बना लिए हैं। नवीन वलित पर्वतीय व भूकंप की दृष्टि से अतिसंवेदनशील क्षेत्र में इस प्रकार से घर बनाना और उसमें रहना निश्चित रूप से मृत्यु को आमंत्रण देना है इसलिए प्रदेश में अंधाधुंध कंक्रीटों के जंगल लगाने पर भी रोक लगाई जानी चाहिए। गिनाने को तो मैंने गिना दिया कि उत्तराखंड में क्या-क्या किया जाना चाहिए परन्तु यह सब करेगा कौन? कांग्रेस पार्टी के नेताओं से तो कुछ होनेवाला है नहीं सिवाय धर्मनिरपेक्षता के फूटे ढोल को पीटते रहने के और धर्मनिरपेक्षता की छतरी के नीचे बैठकर देश-प्रदेश को लूट लेने के,बेच देने के और फिर अमेरिका व स्विट्जरलैंड जाकर लूट और विक्रय के माल को ठिकाने लगाने के या फिर पेरिस जाकर रंगरलियाँ मनाने के। तो आईये मित्रों,अंत में हम भी भारतेन्दु हरिश्चंद्र की तरह वर्तमान भारत की महादुर्दशा (अंग्रेजों ने तो भारत की सिर्फ दुर्दशा ही की थी) पर सामूहिक विलाप करें-रोवहु सब मिलि के आवहु भारत भाई। हा! हा! भारत महादुर्दशा देखी न जाई।।              

सोमवार, 17 जून 2013

कहाँ हुई भाजपा से चूक?

 

मित्रों,अगर आपने भारत का इतिहास पढ़ा होगा तो आप जानते होंगे कि 1789 से 1792 तक मैसूर का तृतीय युद्ध चला था। इस लड़ाई में एक तरफ तो मैसूर के शेर टीपू सुल्तान थे तो दूसरी तरफ थे अंग्रेज,मराठे और निजाम। युद्ध में टीपू बुरी तरह पराजित हुआ था और अगर अंग्रेज गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस चाहता तो तभी उसे प्राणहीन और राज्यविहीन कर सकता था। लेकिन उसने ऐसा किया नहीं और श्रीरंगपट्टनम् की संधि करके टीपू को मैसूर का शासक बना रहने दिया। जब ब्रिटिश सरकार ने नाराज होकर उससे ऐसा करने का कारण पूछा तो उसने बताया कि मैं शत्रु को तो समाप्त करना चाहता था लेकिन साथ ही मित्रों को इतना मजबूत भी नहीं होने देना चाहता था कि वे भविष्य में हमारे लिए ही खतरा बन जाएँ। जहाँ तक टीपू को समाप्त करने का सवाल है तो अब तो ब्रिटिश सेना यह काम अकेले भी और जब चाहे तब कभी भी कर सकती है। कहने का आशय यह है कि अगर तब टीपू को समाप्त कर दिया जाता तो अंग्रेजों को उसका राज्य तीन बराबर हिस्सों में बाँटना पड़ता जिससे मराठे और निजाम खासे शक्तिशाली हो जाते।
                        मित्रों,लगता है कि भारतीय जनता पार्टी में कोई भी इतिहासकार या इतिहास का विशेषज्ञ नहीं है नहीं तो वो भी इसी तरह कार्नवालिस की नीति पर चलती। दुर्भाग्यवश भाजपा के साथ ऐसा दूसरी बार हुआ है। पहली बार कुछ ऐसा ही उसके साथ उड़ीसा में भी हो चुका है। भारतीय जनता पार्टी लालू विरोध की धुन में भूल गई कि अगर कभी नीतीश कुमार ने अकेले ही बहुमत पा लिया तो गठबंधन का क्या होगा। कोई भी पार्टी लगभग 100 सीटों पर चुनाव लड़कर 91 सीट ही जीत सकती है 122 तो कभी नहीं। हालाँकि पिछले विधानसभा चुनाव में प्रतिशत सफलता के मामले में नीतीश भाजपा से काफी पीछे थे फिर भी उनकी पार्टी ने चूँकि 140 से भी ज्यादा स्थानों पर चुनाव लड़ा था इसलिए उसको 116 सीटों पर सफलता हाथ लगी। राजग तो 24 नवंबर,2010 को ही नीतीश कुमार के लिए बेमानी हो गया था और वे तो तभी से इससे पिण्ड छुड़ाने का बहाना ढूँढ़ रहे थे। जदयू और नीतीश कुमार का यह तर्क भी पूरी तरह से हास्यास्पद है कि नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक हैं तो क्या आडवाणी जो 2009 में राजग की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे और कभी नरेंद्र मोदी के तारणहार भी रह चुके हैं सांप्रदायिक नहीं थे और अगर नहीं थे या हैं तो कैसे? आज नीतीश के पास 116 विधायक हैं तो भाजपा बुरी हो गई और अगर यही गिनती 100 से कम होती तो कदापि बुरी नहीं होती। अगर गुजरात के दंगों में भाजपा की प्रदेश सरकार का हाथ था तो क्या कारण था कि नीतीश कुमार ने दंगों के समय या तत्काल बाद केंद्रीय रेल मंत्री के पद से इस्तीफा क्यों नहीं दिया? इतना ही नहीं ये वही नीतीश कुमार हैं जिन्होंने गुजरात दंगों के बाद भी कई बार नरेंद्र मोदी की बड़ाई की है। जाहिर है कि आज समीकरण बदल चुके हैं और नीतीश के पास पर्याप्त संख्या बल है। आज उनको सत्ता में बने रहने के लिए भाजपा को साथ में लेकर चलने की जरुरत नहीं है कल जरुरत पड़ेगी तो फिर देखा जाएगा। वे घोर अवसरवादी तो हैं ही फिर से हाथ-पाँव जोड़कर चिपक लेंगे।
                          मित्रों,स्पष्ट है कि नीतीश कुमार ने भाजपा के रणनीतिकारों को तगड़ा झटका दिया है। सबसे ज्यादा सबक ग्रहण किया होगा सुशील कुमार मोदी ने। उम्मीद है कि आगे से भाजपा क्षेत्रीय दलों से सीटों का समझौता करते समय इस बात का ख्याल रखेगी कि सहयोगी को बड़ा भाई न बनाया जाए और खुद वो ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़े। नहीं तो उसको इसी तरह लगातार विश्वासघात के झटके लगते रहेंगे और बार-बार धोखे खाने पड़ेंगे। वैसे भी राजनीति में न तो कोई किसी का स्थायी मित्र होता है और न ही स्थायी शत्रु और प्यार और जंग में सबकुछ जायज तो होता ही है।
                   

शनिवार, 15 जून 2013

नरेन्द्र मोदी और उनका मोदीत्त्व

मित्रों, इस दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति में कुछ बुराइयाँ होती हैं तो कुछ अच्छाइयाँ। जाहिर है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी में भी कुछ बुरी बाते हैं तो कुछ अच्छी भी। ऐसा भी नहीं है कि पिछले 11 सालों में मोदी ने अपनी सोंच और व्यवहार में कोई बदलाव नहीं किया हो। उन्होंने इस बीच सद्बावना यात्रा और उपवास का आयोजन कर मुसलमानों को सार्वजनिक मंच पर गले से भी लगाया है। अपने बारह साल के शासन में मोदी ने कभी धर्म के नाम पर भेदभाव नहीं किया। शायद यही कारण है कि सच्चर आयोग ने भी गुजरात में ही मुसलमानों की स्थित सबसे अच्छी बताई। आज के नरेन्द्र मोदी 2002 के नरेन्द्र मोदी नहीं हैं। आज वे विकासपुरूष हैं,सर्वधार्मिक और सर्वजातीय विकास के प्रतीक हैं फिर भी देश की कथित धर्मनिरपेक्ष,मुस्लिमवादी और तुष्टीकरण की गंदी राजनीति करनेवाली पार्टियाँ और नेता उनको अंत्यज और अस्पृश्य बनाने पर तुले हैं।
          मित्रों,मैं इन नेताओं और पार्टियों से पूछना चाहता हूँ कि श्रीमान् जी टाईटलर,सज्जन कुमार सज्जन हैं,मदनी,बुखारी और औबैसी धर्मनिरपेक्ष हैं,गोधरा में ट्रेन फूँकनेवाले सही हैं परन्तु दंगाइयों को सजा दिलानेवाले,दंगों के समय पुलिस को गोली चलाने का आदेश देनेवाले मोदी गलत और सांप्रदायिक कैसे हो गए? कांग्रेस ने कितने बाबू बजरंगियों और कितनी मायाओं को सजा दिलवाई है? नरपिशाच नक्सलियों का मसीहा विनायक सेन स्वीकार्य और मोदी घृणास्पद? शर्म को विदेशी शराब में घोलकर पी गए क्या? मोदी ने मंच पर फैजी टोपी नहीं पहनी तो साम्प्रदायिक हो गए और फैजी टोपी पहनकर जो नेता दशकों से मुसलमानों को टोपी पहना रहे हैं वे धर्मनिरपेक्ष? इन लोगों ने देश-प्रदेश में मुसलमानों के लिए क्या किया है? क्यों बाँकी राज्यों के मुसलमान गुजरात के मुसलमानों से पिछड़े हुए हैं? इक्का-दुक्का को छोड़कर क्या इनमें से सबने पार्टी को पारिवारिक सम्पत्ति या दुकान नहीं बना दिया है?
                        मित्रों,महात्मा ईसा और गाँधी कहा करते थे कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं। महर्षि वाल्मिकी भी पहले डाकू हुआ करते थे इसलिए हमें क्या इस बात का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए कि वाल्मिकी मोदी में कितना कथित रत्नाकर मोदी बचा हुआ है? अगर मोदी ने 2002 के मार्च के पहले सप्ताह में राजधर्म का पालन नहीं किया और दंगों को जानबूझकर बढ़ावा दिया तो क्या उन्होंने इस एक गलती को बाद में दोहराया भी? क्या इसके बाद भी गुजरात में कभी सांप्रदायिक दंगे हुए? राजधर्म को तो आज कोई भी राजनेता नहीं निभा रहा है। सबके सब पदभार ग्रहण करते समय देश की एकता और अखंडता की रक्षा करने और अपने कर्त्तव्यों का सम्यक निर्वहन करने की शपथ लेते हैं फिर भूल जाते हैं। मोदी ने अगर बाद में भी राजधर्म नहीं निभाया तो फिर आज माया और बजरंगी को सजा कैसे हो गई? जो लोग और जो मीडिया कभी मोदी की बाबू बजरंगी से निकटता का बेबुनियाद आरोप लगा रहे थे वे उसको सजा मिलने पर चुप क्यों हैं जैसे कि वसंत में मेंढ़क मौन हो जाता है।
                        मित्रों,जाहिर है कि मोदी का पूरी तरह से कायान्तरण हो चुका है। उन्होंने कथित धर्मनिरपेक्ष मीडिया द्वारा निर्मित सांप्रदायिक छवि को वर्षों पीछे छोड़ते हुए विकासपुरूष की छवि बना ली है। जब लालू,खुर्शीद,राजा,सोरेन,कोड़ा,राजशेखर रेड्डी,मायावती,मुलायम एंड को,पवार एंड को,कलमाड़ी,जयललिता,करूणानिधि एंड को,सोनिया गाँधी एंड को जैसे महाभ्रष्ट,देशद्रोही और देशबेचवा नेता स्वीकार्य हैं,रोज-रोज राजधर्म के साथ सामूहिक दुष्कर्म करनेवाले ये नेता वंदनीय हैं और एक बार गलती से कथित रूप से राजधर्म नहीं निभा सकनेवाले नरेन्द्र मोदी निंदनीय? हमें नहीं भूलना चाहिए कि यही वे नेता हैं जो 1998 में मिनरल वाटर पी पीकर यह भविष्यवाणीपूर्ण आरोप लगा रहे थे कि अगर भाजपा एक बार केंद्र में सत्ता में आ गई तो फिर कभी चुनाव नहीं होंगे क्योंकि ये लोग तानाशाह हिटलर की तरह सत्ता पर हमेशा-हमेशा के लिए जबरन काबिज हो जाएंगे मगर ऐसा हुआ क्या? ये वही लोग हैं जो बिहार में यह बोलकर मुसलमानों को डराते रहे हैं कि अगर भाजपा सत्ता में आ गई तो उनके साथ यह होगा वह होगा मगर ऐसा हुआ क्या? और आज वही लोग यह कहकर देशभर के मुसलमानों के मन में भय का वातावरण बना रहे हैं कि मोदी प्रधानमंत्री बनेगा तो उनके साथ यह बुरा होगा वह बुरा होगा। कोई भी दल या नेता बहुसंख्यक हिन्दुओं की न तो चिंता ही कर रहा है और न तो बात ही। जैसे वे लोग तो वोटर हैं ही नहीं।
                     मित्रों,मैं बताता हूँ कि मोदी के आने से देश में क्या हो सकता है। मोदी के आने से सरकार में पूंजीपतियों का दखल कम होगा,देश की डूबती अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर आ सकेगी,देश का सर्वांगिण विकास होगा,भ्रष्टाचार में कमी आएगी,बेरोजगारी घटेगी,घोटाले कम होंगे,देश को लूटने और बेचने का सिलसिला कम होगा,महँगाई कम होगी,सांप्रदायिक दंगे कम होंगे,सीमापार से कश्मीर सहित पूरे भारत में आतंकवाद में कमी आएगी,भुगतान संतुलन में सुधार आएगा,रूपया मजबूत होगा,हम चीन से उसकी ही भाषा में बात कर सकेंगे,पूरी दुनिया में भारत का रसूख बढ़ेगा और रक्तपिपासु नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक कदम उठाए जा सकेंगे। और अगर ये कथित धर्मनिरपेक्ष देशद्रोही लुटेरे फिर से सत्ता में आ गए तो वही सब होगा जो इन दिनों केंद्र की सरकार में हो रहा है और देश एक बार फिर से गुलाम हो जाएगा।

शुक्रवार, 7 जून 2013

भाजपा के अर्जुन,भीष्म और शिखंडी

मित्रों,मुझे पूरा यकीन है कि आपने महाभारत पढ़ा या देखा जरूर होगा। घर में नहीं तो टीवी पर ही सही। यकीनन आपको यह भी पता होगा कि महाभारत का युद्ध जब 9 दिनों तक हो चुका था तब पांडवों के समक्ष सबसे बड़ी समस्या अजेय योद्धा और कौरव दल के सेनापति भीष्म पितामह को मार्ग से हटाने की थी। अंत में नौवें दिन की रात में खुद भीष्म ने ही पांडवों द्वारा पूछने पर अपनी पराजय का रहस्य प्रकट कर दिया था। तत्पश्चात् जब 10वें दिन की लड़ाई शुरू हुई तो अर्जुन भीष्म के सामने सीधे-सीधे नहीं आए और अपने आगे नपुंसक शिखंडी को खड़ा कर लिया। प्रतिज्ञाबद्ध होने के चलते भीष्म ने शिखंडी पर प्रहार नहीं किया और उसके पीछे से वाण चलाकर अर्जुन ने इस दुर्जेय योद्धा को शरशायी कर दिया।
           मित्रों,इन दिनों भारत की दूसरी सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी भाजपा में भी महाभारत का जीवंत मंचन चल रहा है। इस महाभारत के भीष्म हैं वयोवृद्ध और जनता द्वारा 2009 में प्रधानमंत्री पद के लिए नकारे जा चुके लालकृष्ण आडवाणी,अर्जुन हैं जोश से लबरेज विजय रथ पर सवार गुजरात के बब्बर शेर नरेंद्र मोदी। जहाँ मूल महाभारत में अर्जुन को शिखंडी चाहिए था वहीं इस महाभारत में पराजित और हताश भीष्म शिखंडी की तलाश में हैं। कभी उनको अपना शिखंडी भाषणवीरांगना सुष्मा स्वराज में नजर आता है तो कभी किसी और में। अभी उन्होंने मध्य प्रदेश के अपने प्रदेश में दिन-प्रतिदिन अलोकप्रिय होते जा रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को शिखंडी बनाना चाहा था लेकिन सिरे से असफल रहे। फिर नेता कम व्यापारी ज्यादा भ्रष्टाचारपुरूष नितिन गडकरी के सिर पर शिखंडी का ताज रखना चाहा लेकिन उन्होंने भी उसे जमीन पर दे मारा। तब श्रीमान् ने अर्जुन अर्थात् नरेंद्र मोदी के सेनापतित्व को तो स्वीकार कर लिया लेकिन इस शर्त पर कि कमान का एक हिस्सा गडकरी को दिया जाए। दुर्भाग्यवश श्रीमान् एक बार फिर से असफल होते दिख रहे हैं क्योंकि गडकरी फिलहाल विवादों में उलझना ही नहीं चाहते।
             मित्रों,आडवाणी जी की मानसिक अवस्था को हम आसानी से समझ सकते हैं और चाहें तो सहानुभूति भी प्रकट कर सकते हैं। हम सभी यह जानते हैं कि हर किसी के भाग्य में हरेक चीज नहीं होती। आडवाणी के भाग्य में भी हर तरह से योग्य होते हुए भी पीएम की कुर्सी नहीं लिखी हुई थी। अच्छा होता कि आडवाणी अपनी तकदीर को 2009 में ही स्वीकार कर लेते और भाजपा के नेतृत्व को काम करने की खुली छूट दे देते। मगर क्या करें बेचारे का दिल है कि मानता ही नहीं और अब भी प्रधानमंत्री बनने को मचल उठता है वो कहते हैं न कि दिल तो बच्चा है जी। वर्तमान दशा में आडवाणी जी को जहाँ अपने हठी दिल को समझाना चाहिए और वक्त की पुकार को तहेदिल से मान लेना चाहिए वहाँ वे हर बात में अड़ जाते हैं किसी जिद्दी बच्चे की तरह।
                  मित्रों,अगर हम प्रदेशवार विचार करें तो भाजपा में चार ऐसे नेता हैं जो मुख्यमंत्री हैं और जनाधारवाले कहे जा सकते हैं-मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान,छत्तीसगढ़ में रमन सिंह,गुजरात में नरेंद्र मोदी और गोवा में मनोहर पार्रीकर। इनमें से गोवा चूँकि काफी छोटा है इसलिए उसको सूची से हटा दें तो नरेंद्र मोदी को छोड़कर ऐसा कोई भाजपाई नेता या मुख्यमंत्री नहीं है जिसकी लोकप्रियता 2009 के बाद बढ़ी हो या पूर्ववत् हो। पता नहीं फिर आडवाणी क्यों जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं को गुमराह करने में लगे हैं?
                       मित्रों,अगर ऐसा है तो फिर आडवाणी न सिर्फ मूर्ख हैं बल्कि देशद्रोही भी हैं। उनका अवसरवादी चेहरा और चरित्र तो तभी जनता के समक्ष अनावृत्त हो चुका है जब उन्होंने महान साम्प्रदायिक नेता,40 करोड़ मजलूमों के हत्यारे और भारत विभाजक जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष कह दिया था। आडवाणी मूर्ख इसलिए हैं क्योंकि अब नरेंद्र मोदी को विकल्पहीन हो चुकी भाजपा का सेनापति बनने से रोक पाना संभव ही नहीं रह गया है फिर भी वो इस दिशा में निरर्थक हाथ-पैर मार रहे हैं और वे देशद्रोही इसलिए हैं क्योंकि उनके द्वारा मोदी का मार्ग बाधित करने से अगर किसी को फायदा हो सकता है तो देश को दोनों हाथों से लुटने में लगी लुटेरी और देशद्रोही कांग्रेस पार्टी को। मैं जहाँ तक समझता हूँ कि देशद्रोहियों का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मददगार होना भी देशद्रोह ही है। वैसे अभी तक इस हारे मगर ईच्छामृत्यु का वरण नहीं कर रहे भीष्म पितामह को शिखंडी मिला नहीं है और उम्मीद करनी चाहिए कि मिलेगा भी नहीं। ऐसे में आडवाणी क्या करेंगे? क्या उनमें वह साहस और नैतिक बल है,वो जनाधार उनके पास है कि शिखंडी के नहीं मिल पाने की स्थिति में वो सीधे-सीधे दिव्यास्त्रों से लैश अर्जुन नरेंद्र मोदी का सामना कर सकें? मुझे तो इसकी संभावना नहीं लग रही और आपको?

बुधवार, 29 मई 2013

शिंदे तो नीरो का बाप निकला

मित्रों,आपने भी किताबों में पढ़ा होगा कि भारत में इस समय लोकतंत्र है और इस समय सुशील कुमार शिंदे भारत के गृह मंत्री हैं। आपको क्या लगता है कि किताबों में लिखी गई ये बातें सही हैं? मुझे तो लगता है कि भारत में इस समय भी राजतंत्र है और श्री शिंदे किसी लोकतांत्रिक सरकार के नहीं बल्कि किसी राजा या रानी के मंत्री हैं। देश के प्रति कोई जिम्मेदारी या वफादारी नहीं। अगर ऐसा नहीं है तो फिर शिंदे किससे पूछकर इस संकट काल में अमेरिका में रूक गए? क्या गृह मंत्री होने के नाते यह उनका कर्त्तव्य नहीं था कि वे 25 मई को ही अमेरिका से भारत वापस आ जाते? कोई मामूली घटना नहीं घटी है देश पर हमला हुआ है बकौल सोनिया गांधी भारतीय लोकतंत्र पर हमला हुआ है और भारत का गृह मंत्री जिसके कंधों पर देश की आंतरिक सुरक्षा की महती जिम्मेदारी होती है विदेश में रंगरलियाँ मना रहा है?
                                     मित्रों,श्री शिंदे पहले भारत के गृह मंत्री हैं या किसी के भाई या बाप? प्रश्न यह भी उठता है कि क्या उनको सोनिया-राहुल ने वहाँ रूकने की अनुमति दी? मैं नहीं समझता कि बिना सोनिया-राहुल की रजामंदी के शिंदे संडास भी जा सकते हैं। तो क्या यह समझा जाना चाहिए कि शिंदे को खुद सोनिया-राहुल ने ही विदेश में रोक दिया? अगर हाँ तो इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? पहला कारण तो यह हो सकता है कि इन दोनों को शिंदे जी की योग्यता पर भरोसा नहीं है,उनको लगता है कि शिंदे स्थिति को संभाल नहीं पाएंगे और इसलिए उनको लगता हो कि ऐसे नाजुक समय में शिंदे देश से बाहर ही रहें तो अच्छा है वरना यहाँ आकर वे उटपटांग,पागलपन भरा बयान देकर रायता ही फैलाएंगे। दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि ये माँ-बेटे समझते हों कि अंधा चाहे सोया रहे या जगा क्या फर्क पड़ता है। फिर प्रश्न यह भी उठता है कि तो फिर ऐसे काम के न काज के वाले व्यक्ति को क्यों केन्द्रीय सरकार में दूसरा सर्वोच्च पद दे रखा है?
                                                मित्रों,मैं न तो कभी केंद्रीय मंत्री रहा हूँ और न ही कभी अमेरिका तो क्या नेपाल भी गया हूँ जो बता सकूँ कि शिंदे जी ने अमेरिका में किस प्रकार छुट्टियाँ मनाई होंगी। गोरी-गोरी मेमों से मसाज करवाकर बुढ़ापे को मुँह चिढ़ाया होगा या डिस्को में बालाओं के साथ डांस किया होगा या फिर किसी बीच पर मुँह औंधे घंटों पड़े रहे होंगे। जो जी चाहे वे करें उनकी जिन्दगी है लेकिन उन्होंने इसके लिए समय जरूर गलत चुना। वे चाहते तो बाद में दोबारा-तिबारा भी अमेरिका जा सकते थे। अब उनसे गलती तो हो ही चुकी है सो लोग चुप तो रहेंगे नहीं और कहनेवाले तो चाहें तो उनकी तुलना मजे में रोम के नीरो से कर सकते हैं और कह सकते हैं कि भाइयों एवं उनकी बहनों निराश मत होईए कि आप रोम के नीरो को नहीं देख सके। आप उसको आज भी देख सकते हैं। मिलिए इनसे ये हैं 21वीं सदी के जीवित नीरो,दुनिया के कथित रूप से सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के गृह मंत्री श्री श्री अनंत सुशील कुमार शिंदे। भूल जाईए नीरो को और उस कहावत को भी आज से एक नई कहावत ने उसका स्थान ले लिया है और वो कहावत अब इस तरह से जाना जाएगा कि जब भारत नक्सली हिंसा की आग में जल रहा था तब भारत का गृह मंत्री शिंदे अमेरिका में छुट्टियाँ मना रहा था,ठंडी हवा खा रहा था।
                            

सोमवार, 27 मई 2013

जो भी हुआ बुरा हुआ जो भी होगा ...?

मित्रों,मैं कई बार लिख चुका हूँ कि हमारी वर्तमान केंद्र सरकार नक्सली समस्या को जितने हल्के में ले रही है यह समस्या उतनी हल्की है नहीं। यह समस्या हमारी संप्रभुता को खुली चुनौती है,हमारी एकता और अखंडता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है लेकिन केंद्र सरकार को वोटों का हिसाब लगाने से फुरसत कहाँ। इसलिए तो वो इसे सिर्फ कानून-व्यवस्था की स्थानीय समस्या बताती रही है। उसको अपने प्रचार-तंत्र पर अटूट विश्वास भी है। वो समझती है कि मीडिया में सिर्फ यह बताकर कि सरकार ने गरीबों-आदिवासियों के लिए कितनी योजनाएँ चला रखी हैं नक्सलवाद को समाप्त किया जा सकता है।
             मित्रों,मैंने अपने पहले के आलेखों में अर्ज किया है कि आज का नक्सल आंदोलन 1967 वाला आदर्शवादी आंदोलन नहीं है बल्कि यह लुम्पेन साम्यवादियों के रंगदारी वसूलनेवाले आपराधिक गिरोह में परिणत हो चुका है। इन पथभ्रष्ट लोगों का साम्यवाद और गरीबों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। हाँ,इनका धंधा गरीबों के गरीब बने रहने पर ही टिका जरूर है इसलिए ये लोग अपने इलाकों में कोई भी सरकारी योजना लागू नहीं होने देते हैं और यहाँ तक कि स्कूलों में पढ़ाई भी नहीं होने देते। आप ही बताईए कि जो लोग देश के 20 प्रतिशत क्षेत्रफल पर एकछत्र शासन करते हैं वे भला क्यों मानने लगे समझाने से? क्या कोई ऐसी समस्या जिसका विस्तार देश के 20 प्रतिशत भाग पर हो स्थानीय हो सकती है? क्या यह सच नहीं है कि हमारे संविधान और कानून का शासन छत्तीसगढ़ राज्य के सिर्फ शहरी क्षेत्रों में ही चलता है? क्या यह सच नहीं है कि वहाँ के नक्सली क्षेत्रों में जाने से हमारे सुरक्षा-बल भी डरते हैं योजनाएँ क्या जाएंगी? इसलिए बल-प्रयोग कर वहाँ पहले संविधान और कानून का राज स्थापित करना पड़ेगा तब जाकर उन क्षेत्रों में भी 1 रुपया में से 10 पैसा भी जा पाएगा। अब ये दूसरी बात है कि जब संविधान और कानून का सम्मान केंद्र सरकार खुद ही नहीं कर रही है तो फिर वो इनका सम्मान करने कि लिए नक्सलियों को कैसे बाध्य कर पाएगी? कहाँ से आएगा उनके पास इस अतिकठिन कार्य के लिए नैतिक बल जो खुद ही लगातार अनैतिक कार्यों में,गैरकानूनी कृत्यों में आपादमस्तक संलिप्त हैं? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर जेपी और रविशंकर महाराज ने चंबल के डाकुओं से आत्मसमर्पण करवाया था तो अपने नैतिक बल पर ही करवाया था।
                             मित्रों,यह सच है कि महेन्द्र कर्मा सलवा जुडूम के कारण नक्सलियों की हिट लिस्ट में सबसे ऊपर थे इसलिए अगरचे तो उन्हें उनके इलाके में जाना ही नहीं चाहिए था और अगर गए भी तो स्थल-मार्ग से नहीं जाना चाहिए था। जब एक अदना-सा डाकू वीरप्पन अगर जंगल में छिप जाए तो उससे पार पाना कठिन होता है तो फिर नक्सलियों ने तो बाजाप्ता फौजी ट्रेनिंग ले रखी है,फौज बना रखी है। जंगल में सबसे बड़ी कठिनाई यही होती है कि आप उनको नहीं देख रहे होते हैं जबकि वे आपको हर वक्त देख रहे होते हैं। वहाँ जेड प्लस-माईनस का कोई अर्थ नहीं होता। कुछ लोग इस घटना के लिए राज्य सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं और राजनैतिक लाभ पाना चाहते हैं। मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि श्रीमती इन्दिरा गांधी की जब हत्या हुई तब तो वे खुद ही प्रधानमंत्री थीं,बेअंत सिंह को जब मारा गया तब तो वे स्वयं पंजाब के मुख्यमंत्री थे फिर उनकी सुरक्षा में चूक के लिए कौन जिम्मेदार था? बल्कि इंदिरा को तो उनके सुरक्षा बलों ने ही मार डाला था इसलिए मैं कहता हूँ कि आरोप-प्रत्यारोप बंद करो,कुर्सी की राजनीति बंद करो और इस बात पर विचार करो कि इस नक्सली समस्या को कैसे जड़-मूल से समाप्त किया जाए?
                                                        मित्रों,हमारे कुछ मित्र अभी भी उन आदिवासियों को जो नक्सल आंदोलन में शामिल हैं भोला भाला और गुमराह कर दिया मानते हैं। मैं उनलोगों से पूछता हूँ कि परसों कांग्रेसी नेताओं की बेरहमी से हत्या करके लाशों पर नृत्य करनेवाला कैसे भोला-भाला हो सकता है? जब सुरक्षा बलों की गोलियाँ समाप्त हो गई थीं तब तो वे निहत्थे थे तो क्या निहत्थों पर बेरहमी से वार करने को मानवाधिकार का सम्मान कहा जाना चाहिए? क्या सिर्फ नक्सलियों का ही मानवाधिकार होता है?  क्या यह फर्जी मुठभेड़ नहीं हुई? मैं दावे के साथ कहता हूँ कि न तो ये लोग भोले भाले हैं और न ही गुमराह बल्कि ये लोग असभ्य हैं,नरपिशाच हैं,ड्रैकुला हैं,हार्डकोर वधिक हैं इसलिए बातों से नहीं मानेंगे कभी नहीं मानेंगे। इनके लिए मनमोहन जैसा पिलपिला शासक नहीं चाहिए बल्कि राम जैसा अस्त्र-शस्त्रधारी चाहिए जो सिंहासन पर बैठते ही प्रतिज्ञा ले कि-निशिचरहीन करौं मही हथ उठाई पन किन्ह।
                                  मित्रों,कुल मिलाकर यह हमला न तो केवल राजनीति पर हमला है और न ही कांग्रेस नेताओं पर बल्कि यह भारत की संप्रभुता पर हमला है,भारत पर हमला है और इससे पहले के वो सारे हमले भी सीधे-सीधे भारत की संप्रभुता पर ही किए गए थे जिनमें हमारे सैंकड़ों जवान मारे गए। मैं नहीं समझता कि उनमें और इसमें कोई अंतर है या किया जाना चाहिए। प्रश्न अब यह उठता है कि हमारी केंद्र सरकार अब करेगी क्या? मुझे नहीं लगता कि इस सरकार के मंत्री और प्रधानमंत्री माँ के गर्भ से वो जिगर लेकर पैदा हुए हैं जिनकी आवश्यकता नक्सलियों और माओ की वैचारिक,रक्तपिपासु संतानों से निबटने के लिए होती है। बल्कि इन लोगों ने तो लूट-पर्व में भाग लेने के लिए सत्ता संभाली है इनको कहाँ देश सों काम। सो पहले की तरह कुछ दिनों तक बड़े-बड़े बयान दिए जाएंगे,किसी भी दोषी को नहीं बक्शने के बेबुनियाद दावे किए जाएंगे और इस घटना को भी भुला दिया जाएगा तब तक के लिए जब तक कि कोई अगली बड़ी घटना न घट जाए।

रविवार, 26 मई 2013

बैंड,बाजा,बारात और आगे?

मित्रों,इन दिनों शादी-ब्याह का मौसम पूरे शबाब पर है। हो सकता है कि इस साल अब तक आपलोग भी कई-कई बार बाराती बन चुके हों। वैसे अब बारात जाने में वो बात कहाँ रही जो 20-30 साल पहले थी। पहले जो शान बैलगाड़ी और डोली में थी अब वो मर्सिडीज में भी कहाँ। तब अहले सुबह ही बारात गाँव से निकल पड़ती थी। रास्ते में कई जगहों पर जनवासा रखा जाता था। बैलगाड़ियों और कभी-कभी हाथियों पर भी सिर्फ आदमी ही लदे-फदे नहीं होते थे बल्कि जानवरों का चारा और बारातियों के लिए कच्ची-पक्की पर्याप्त खाद्य-सामग्री भी होती थी। लंबी यात्रा की थकान को ध्यान में रखते हुए विवाहोपरांत एक दिन मर्यादा के लिए रखा जाता था। इस दिन गीत-संगीत की महफिल सजती थी। वारांगनाएँ नृत्य करती थीं और आल्हा-गायक ओजस्वी स्वरों में आल्हा गाया करते थे जिनको सुनकर खाट पर पड़े बूढ़ों की भा नसें फड़कने लगती थीं। बार-बार बारातियों पर इत्रदानगुलेपाश से इत्र और गुलाबजल की बौछारें की जातीं और बार-बार परात में पान-सुपारी पेश किए जाते। जब नर्तकी किसी पोपले वृद्ध के साथ घूंघट साझा करके मुँहमांगी रकम की जिद करके बैठ जाती तब पूरा जनवासा कहकहों से गूँज उठता। महफिल के दौरान प्रश्नोत्तर का भी सत्र चलता और अंग्रेजी में बहस भी होती। बड़े-बुजुर्ग जहाँ महफिल का आनंद लेते बच्चे हाथियों को घेरे रहते। विदाई से बाद जब हाथी जाने लगते तब बच्चे उनके पीछे-पीछे हाथी-हाथी दाम दे घोड़े को लगाम दे चिल्लाते हुए दौड़ते। कभी-कभी हाथी पलटकर उनका पीछा भी करता मगर वे कौन-से उसके हाथ आनेवाले थे तीर की तरह भाग निकलते।
                       मित्रों,बारातियों को तब आदरपूर्वक बैठाकर भोजन कराया जाता था। समधी और दुल्हे के बहनोइयों का खास ख्याल रखा जाता था। पियक्कड़ई का तो नामोनिशान तक नहीं था। अगर कोई पियक्कड़ होता भी था वो अपवाद। जबकि आज बारात में अगर कोई शराब नहीं पीनेवाला होता है तो वह अपवाद बन जाता है। बारातियों को भरपुर शरबत पिलाई जाती थी और कभी-कभी तो अत्यंत अनूठे तरीके से। किसी कुएँ में पाँच-दस बोरी चीनी डाल दी फिर पीते रहिए जितनी शरबत पीनी हो। बारात अगर नजदीक के गाँव से आती थी तब बाराती नाश्ता-पानी करके घर चले जाते और फिर माल-मवेशी को चारा-पानी देकर भोजन के समय फिर से वापस आ जाते।
                 मित्रों,अब तो बिना डोली की शादियाँ होती हैं। आज से 20-25 साल पहले बिना डोली की शादी अकल्पनीय थी। दुल्हा और दुल्हन जब अलग-अलग डोलियों में बैठकर विदा होते तब रास्ते में बच्चे काफी दूर तक दुल्हे को छेड़ते हुए उनका पीछा करते। कई बार तो नावों पर दुल्हनों के आपस में बदल जाने की घटनाएँ भी हो जाया करती थीं। लेकिन अब शादियों में वो बात रही कहाँ? बाँकी संस्कारों की तरह शादियाँ भी अब औपचारिकता मात्र रह गईं हैं। लोग गाड़ियों में लद-फदकर रात में बारात लाते हैं। रास्ते में जनवासा होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। बल्कि गाड़ियों को शराब की दुकानों पर अवश्य रोका जाता है और जमकर शराब पी जाती है। पहले जहाँ तुरतुरिया, सिम्हा और अंग्रेजी बैंड बजा करते थे अब मुआ डीजे पर बजनेवाले अश्लील गानों की धुन पर और शराब की पिनक पर लोग अजीबोगरीब नृत्य करते हैं। कई दफे तो महिलाएँ भी बाराती बनकर ऐसा करती हैं। फिर नाश्ता-पानी होता है और विदेशी कंपनियों द्वारा निर्मित कोल्ड-ड्रिंक पिलाई जाती है। फिर एक-दो घंटे के भीतर ही ताबड़तोड़ भोजन भी करा दिया जाता है। उसके बाद वर-पक्ष के 5-10 लोगों को छोड़कर बाँकी बाराती रात में ही गाड़ियाँ खुलवाकर घर चले आते हैं। बाँकी लोगों को भी सुबह होते ही वधू के साथ विदा कर दिया जाता है। एक दिन की मर्यादा और महफिल का तो सवाल ही नहीं।
                    मित्रों,अगर टेबुल-कुर्सी पर बिठाकर बारातियों को ससम्मान भोजन कराया गया तो ठीक नहीं तो बुफे सिस्टम में कुत्तों की तरह छीना-झपटी करते हुए खड़े-खड़े भोजन करना पड़ता है। कई बार तो इस धींगामुश्ती में परमादरणीय बुजूर्ग भूखे भी रह जाते हैं। लड़की वाले शांतिप्रिय रहे तो ठीक नहीं तो पियक्कड़ई के चलते गाली-गलौज और मारपीट की आशंका लगातार बनी रहती है। विवाह के किसी भी चरण में,विधि में कहीं भी भाव नहीं,आस्था नहीं,प्रेम नहीं,सबकुछ महज औपचारिकता।
                       मित्रों, जहाँ पहले जहाँ शादी से पहले वर-वधू के मिलने-जुलने और बातचीत करने को बुरा माना जाता था अब मोबाईल और कंप्यूटर के चलते ऐसी कोई रूकावट नहीं रह गई है। शादी के पहले अगर मंगनी हो गई हो तब तो वे साथ-साथ मौज-मस्ती और सैर सपोटे भी कर सकते हैं। वैसे जिस कुमार्ग पर हमारा समाज अग्रसर हो चुका है और जिस तरह कामुकता का जोर बढ़ रहा है,जिस तरह लिव ईन रिलेशनशिप का प्रचलन बढ़ रहा है मुझे तो इस बात का भी डर सता रहा है कि भविष्य में शादी नाम की यह औपचारिकता भी कहीं इतिहास के पन्नों में सिमट कर न रह जाए अथवा आपवादिक घटना न बन जाए। तब न तो कोई मैरेज एनिवरसरी ही मनाएगा,अखबारों में वर-वधू चाहिए का विज्ञापन नहीं दिखेगा,शादी डॉट कॉम जैसी वेबसाईटों के दफ्तरों पर ताले लटक जाएंगे और बैंडवालों,डीजेवालों,डोलीवालों,कैटरिनवालों के साथ-साथ शादी का लड्डू,चट मंगनी पट ब्याह,हड़बड़ी की शादी कनपटी में सिंदूर,कानी की शादी में 9-9 गो बखरा,हँसुआ के लगन आ खुरपी के बियाह जैसी अनगिनत कहावतें भी बेरोजगार हो जाएंगी।

गुरुवार, 16 मई 2013

लोभी जनता ठग सरकार

मित्रों,काफी दिन पहले मैंने प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित होनेवाली मासिक पत्रिका बाल भारती में एक बाल कहानी पढ़ी थी। एक राज्य में वयोवृद्ध राजा की मृत्यु के बाद उसका युवा पुत्र राजा बना। वह बड़ा दानी और दयालु था। दोनों हाथों से दान करता। उसके राज्य में कोई भी दुःखी नहीं था सिवाय वृद्ध मंत्री के। धीरे-धीरे खजाने में राजस्व वसूली घटने लगी और खजाना खाली हो गया। दुःखी राजा ने मंत्री से इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि महाराज अंधाधुंध दान-वितरण के चलते लोग आलसी होते जा रहे हैं क्योंकि उनकी जरुरतें बैठे-बिठाए ही पूरी हो जा रही हैं। राजा द्वारा समाधान जानने की ईच्छा प्रकट करने पर मंत्री ने सुझाव दिया कि दान बंद कर उसी राशि से नए उद्योग-धंधे स्थापित किए जाएँ।
                          मित्रों,बचपन की पढ़ी एक और कहानी याद आ रही है। वह कहानी भी एक दानवीर से ही संबंधित है। परंतु वह दानवीर राजा नहीं था अपितु एक अमीर व्यवसायी था। वह व्यवसायी दान में खुल्ले पैसे नहीं देता था बल्कि मोटी रकम देता था और लाभार्थी को खुद का व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रोत्साहित भी करता था। उसने प्रत्यक्ष अनुभव किया था कि लोग भीख में मिले पैसों को खा-पीकर उड़ा देते हैं और फिर से भीख प्राप्त करने पहुँच जाते हैं जबकि उद्यम-व्यवसाय से उनको स्थायी लाभ होता है।
                   मित्रों,अब कल्पना कीजिए कि अगर पहली कहानी के राजा के राज्य में राजतंत्र के स्थान पर लोकतंत्र होता और राजा मनमोहन सिंह होते तब क्या होता? तब निश्चित रूप से वहाँ वही होता जो इस समय भारत में हो रहा है। तब राजा खैरात बाँटना बंद नहीं करता चाहे राज्य अराजकता और दिवालियेपन का शिकार ही क्यों न हो जाता। चाहे देश को एक बार फिर सोने को गिरवी ही क्यों न रखना पड़ता। तब राजा संसद से लेकर गाँव तक नोट फॉर वोट का गंदा खेल खेलता और लगातार चुनाव जीतता रहता,रोज-रोज नए-नए घोटाले करता रहता।
           मित्रों,अपने देश में पहले जहाँ सिर्फ चुनावों के समय पैसे बाँटकर वोट खरीदे जाते थे और अवैध तरीके से नजर बचाकर बाँटे जाते थे अब केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा खुलेआम और कानूनी तरीके से बाँटे जा रहे हैं। इतना ही नहीं अब मतदाताओं के बीच सिर्फ पैसे ही नहीं बाँटे जा रहे हैं बल्कि इसके अलावा कोई लैपटॉप बाँटता है तो कोई साईकिल तो कोई अनाज तो कोई टीवी-रेडियो और और भी बहुत कुछ। राजा भी मस्त और जनता भी प्रफुल्लित। एक भ्रष्टाचरण द्वारा मलाई चाभकर खुरचन जनता को थमा दे रहा है तो दूसरा भिखारी बनकर,मुफ्त की रोटियाँ तोड़ने में मस्त है। इस तरह भारत में इन दिनों एक नई तरह की अर्थव्यवस्था का निर्माण हो रहा है (और केंद्र सरकार कहती है कि हो रहा भारत निर्माण) जिसे अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्री अगर चाहें तो खैराती अर्थव्यवस्था का नाम दे सकते हैं। अगर आप भी इस समय भारत में रहते हैं और केंद्र सरकार की धूर्तता से धूर्ततापूर्वक लाभ उठाना चाहते हैं तो आपको भी चाहिए कि अपना नाम 100-50 रुपया देकर बीपीएल सूची में डलवा लीजिए और फिर आपका और आपके पूरे परिवार का जन्म से लेकर मृत्यु तक बहुत सारा भार सरकार उठायेगी। आप वास्तव में अमीर भी हैं तो कोई बात नहीं आप कागजी तौर पर खराब ताउम्र गरीब बने रह सकते हैं कोई भी आपको रोकेगा-टोकेगा नहीं।
                          मित्रों,मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री रहते हुए शुरू की गई नई आर्थिक नीति से हमारे देश की अर्थव्यवस्था को जो कुछ भी कथित लाभ हुआ था प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह उसे नई खैराती और घोटालावेशी अर्थव्यवस्था द्वारा बर्बाद कर चुके हैं। कदाचित् अब भी मनमोहन की समझ में यह नहीं आया होगा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की वास्तविक महाशक्ति बहुर्राष्ट्रीय पूंजीपति हैं न कि बड़ी जनसंख्यावाले बाजार।
                   मित्रों,जब सरकार का ध्यान उत्पादन और निर्यात बढ़ाने के बदले खैरात बाँटने पर होगा तो फिर क्यों कर उत्पादन और निर्यात में अपेक्षित वृद्धि होने लगी? खैरात बाँटने से खजाने को तो क्षति पहुँच ही रही है खैरात का ज्यादातर पैसा जनता तक पहुँच भी नहीं रहा है बल्कि भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़ जा रहा है। इस तरह देश को दोहरी क्षति उठानी पड़ रही है। हमारी वर्तमान केंद्र सरकार इन दिनों भोजन के अधिकार के नाम पर खैरात में 6 लाख करोड़ रुपए सालाना की बढ़ोत्तरी करने की कोशिश में है। निश्चित रूप से यह  योजना भी भविष्य में तेल,चीनी,गेहूँ और चावल की तरह ही भ्रष्ट जनवितरण प्रणाली के हत्थे चढ़ जानेवाली है और भोजन का अधिकार एक नारा बनकर रह जानेवाला है।
                              मित्रों,सरकारों को अगर देना ही है तो जनता को साईकिल के बदले अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे,लैपटॉप के बदले टॉप क्लास की फैकल्टी दे,पैसों और कम मूल्य पर अनाज के बदले स्थायी और गरिमापूर्ण रोजगार दे। हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि वैशाखी चाहे सोने की ही क्यों न हो वैशाखी ही होती है और भीख का कटोरा चाहे रत्नजटित ही क्यों न हो भीख का कटोरा ही होता है। खैरात बाँटकर दस-बीस सालों तक देश पर राज जरूर किया जा सकता है,लूटा जरूर जा सकता है लेकिन देश को वैश्विक अर्थव्यवस्था का सिरमौर नहीं बनाया जा सकता। दुनिया में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि कोई देश जनता के बीच केवल खैरात बाँटकर महाशक्ति बन गया हो। लोककल्याणकारी कार्य अवश्य होने चाहिए लेकिन इन कार्यों और विकास के कार्यों के बीच एक व्यावहारिक संतुलन भी जरूर होना चाहिए। आखिर वर्तमान केन्द्र सरकार और कुछेक राज्य सरकारों का उद्देश्य क्या है? क्या वे हमारे देश और प्रदेश को विकसित करने की सोंच और ईच्छाशक्ति रखती हैं या फिर वे पैसे और खैरात बाँटकर पूरे मनोयोग से लोभियों के गाँव में कभी ठग भूखा नहीं मरता कहावत को चरितार्थ करने में जुटे हुए हैं? अर्थशास्त्र और इतिहास तो यही कहता है कि नवीन अनुसंधान,निर्यात और उत्पादन ही हैं जो किसी भी अर्थव्यवस्था को महान् और महानतम बनाते हैं न कि जनाधिक्य,आयात और खैरात। इसलिए सरकार को चाहिए कि बेवजह की योजनाओं को बंद करे,बेकार की नई योजनाएँ न लाए,जनता पहले से ही अधिकारों के आधिक्य से पीड़ित है इसलिए उसको नए अधिकार भी नहीं दिए जाएँ बल्कि उसी पैसे से उद्योग-धंधे स्थापित करे,आधारभूत संरचना का विकास करे और न्याय को द्रुत बनाए। देना ही है तो हर हाथ को काम दे फिर हाथ खुद ही अपना पेट भर लेगा। सीधे-सीधे पेट भरने का प्रयास कहानी संख्या एक और दो की तरह मूर्खतापूर्ण तो है ही देश और देश की अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती भी है।

रविवार, 5 मई 2013

चर्चिल ने कहा था

मित्रों,साहित्य के लिए वर्ष 1953 के नोबेल पुरस्कार विजेता और ब्रिटेन के कथित महानतम प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय भारत को आजादी देने की मांग को यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि भारत के लोग अभी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि वे देश और आजादी को संभाल सकें। तब से न जाने कितनी बार खासकर चुनावों के बाद मैं खुद अपने देश के महानतम् बुद्धिजीवियों को यह लिखते-कहते हुए देख चुका हूँ कि महान भारत की महान जनता ने समय के साथ चर्चिल को पूरी तरह से गलत साबित कर दिया है। वे शायद ऐसा सिर्फ इस एक आधार पर कहते रहे हैं कि भारत में सत्ता बंदूकों के बल पर नहीं बल्कि जनता के मत से बदलती है। मगर क्या सिर्फ इस एक आधार पर चर्चिल को गलत ठहराना उचित होगा या हो सकता है जबकि चर्चिल को सही साबित करने के अनगिनत आधार मौजूद हों।
                               मित्रों,निश्चित रूप से मतदान द्वारा सत्ता-परिवर्तन अच्छी उपलब्धि है लेकिन भारतीय लोकतंत्र के समक्ष सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि हर पाँच साल पर सत्तारूढ़ दलों या समूहों के बदलते रहने से क्या बदला और जो कुछ भी बदला वह सकारात्मक था या नकारात्मक? दिन-ब-दिन सरकार के प्रत्येक अंग में नए प्रतिमान स्थापित करते भ्रष्टाचार,कुव्यवस्था और अराजकता क्या यह चीख-चीखकर,अट्टहास करते हुए नहीं कह रहे हैं कि न केवल चर्चिल अंशतः ही ठीक था बल्कि पूरी तरह से सही था। कल और आज का अखबार कहता है कि रेलवे बोर्ड के सदस्यों को करोड़ों रूपया लेकर नियुक्त किया जा रहा है जिसमें से पहली किस्त लेता हुआ रेलमंत्री का भांजा पकड़ा भी गया है। कौन यकीन करेगा कि यह सब बिना रेलमंत्री की ईच्छा और जानकारी के हो रहा है। रेलवे बोर्ड का कोई सदस्य क्यों रेलमंत्री के भांजे को यूँ ही 2 करोड़ रूपया देगा? इसका दूसरा मतलब यह भी है कि सीबीआई को सरकारी महकमों में व्याप्त भ्रष्टाचार की पूरी जानकारी रहती है फिर भी वो जानबूझकर कान पर ढेला डाले बैठी रहती है। आज भारत का बच्चा-बच्चा यह जानता है कि इस सरकार में राज्यपाल का गरिमामय पद भी क्रय-विक्रय की वस्तु बन चुका है। आज भारत की जनता और भारतीय लोकतंत्र का सर्वोच्च वास्तविक प्रतिनिधि प्रधानमंत्री खुद कोयला,अंतरिक्ष और 2जी घोटाला करता है और सीधी संलिप्तता साबित हो जाने पर भी पूरी निर्लज्जता के साथ पद पर बना रहता है। यहाँ तक कि आज भारत के वर्तमान और हाल ही में भूतपूर्व हुई राष्ट्रपति पर भी भ्रष्टाचार के सैंकड़ों आरोप लगे हुए हैं। आज हमारा चिर-विश्वासघाती पड़ोसी चीन जो कभी एशिया का मरीज हुआ करता था हमारी सीमा में 19 किमी भीतर तक घुस आया है और फिर भी हमारा चिंदीचोर विदेश मंत्री मामले को तूल नहीं देने की नसीहतें बाँटता फिर रहा है। कल तक अमेरिका और नरेन्द्र मोदी को लेकर आसमान सिर पर उठा लेनेवाले गद्दार कम्युनिस्टों ने 1962 की तरह ही आज चीनी घुसपैठ पर अपने मुँह सी लिए हैं। पता नहीं लड़ाई छिड़ने पर ये भारत का साथ देंगे या चीन का। आज हमारे छोटे-छोटे पड़ोसी देशों में भी हमारा रसूख इतना गिर चुका है कि हमारे देशवासियों की जान इन देशों की जेलों में भी सुरक्षित नहीं रह गई है। आज कोई भी आम आदमी बिना घूस दिए सरकारी नौकरी नहीं पा सकता। आज आरक्षण भी बेमानी हो चुका है और आरक्षित वर्गों से भी केवल उनको ही नौकरियाँ मिल रही हैं जिनके माता-पिता के पास पैसा है। कुल मिलाकर इस समय शिवपालगंज से लेकर नई दिल्ली तक जित देखूँ तित लूट का वातावरण बना हुआ है।
                     मित्रों,मैं वर्षों पहले ही अपने एक आलेख ........... में भारत को एक असफल राष्ट्र घोषित कर चुका हूँ। उस समय हो सकता है कि मेरे कई मित्र मुझसे असहमत रहे हों लेकिन मैं आश्वस्त हूँ कि आज की तारीख में मुझसे कोई असहमत नहीं होगा। तो फिर ऐसा क्यों हुआ कि आज भारत एक पूरी तरह से बर्बाद राष्ट्र बन चुका है? गलती किसकी है? क्या हमारी ही गलतियों की वजह से ऐसा नहीं हुआ है?  पिछले 66 सालों में 15 लोकसभा और सैंकड़ों विधानसभा या स्थानीय-निकाय चुनावों में कौन मतदान करता रहा है? आजादी के शुरूआती सालों में जहाँ इंसानियत और अच्छाई के आधार पर प्रतिनिधि जीतते थे आज क्यों सिर्फ पैसेवाले,चोर-डकैत-बलात्कारी-भ्रष्टाचारी-जाति व धर्म के ठेकेदार ही चुनाव जीतते हैं? कौन चुनता है इनको? क्या हमहीं नहीं चुनते हैं? क्यों चुनते हैं? हम भारतीयों का बहुमत क्यों चुनता है ऐसे गलत लोगों को? क्या हमने कभी सोंचा है कि जब हमारे प्रतिनिधि जिनके हाथों में हम अपना शासन,अपना वर्तमान और भविष्य,अपना 5 साल सौंप रहे हैं ही ठीक नहीं होंगे तो फिर हमारा शासन-प्रशासन कैसे अच्छा होगा? जब हमारे जन-प्रतिनिधि चुनाव-दर-चुनाव और भी ज्यादा चरित्रहीन और नैतिकताशून्य होते जाएंगे तो फिर शासन-प्रशासन के चरित्र में सुधार कहाँ से होगा?
                                  मित्रों,मैं बिल्कुल भी नहीं चाहता था,भारतमाता की कसम मैंने कभी नहीं चाहा कि दुष्ट चर्चिल की भविष्यवाणी सत्य साबित हो जाए लेकिन सच तो सच है। क्या यह सच नहीं है कि हमारे बहुमत ने देश और समाज की भलाई के बारे में सोंचना ही बंद कर दिया है और आप भला देश और समाज चाहे बुरा या भला हमारा जीवन-मंत्र बन चुका है। हम इस बारे में अपने मन में विचार करें या न करें,सोंचें या न सोंचें लेकिन अंतिम सत्य तो यही है कि अगर समय रहते हमारी जनसंख्या के बहुमत ने देश और भलाई के बारे में सोंचना प्रारंभ नहीं किया तो फिर एशिया का नया मरीज बन चुके भारत नामक राष्ट्र का राम नाम सत्य है होना तय है,अटल है। तो क्यों नहीं हमें यह मान लेना चाहिए कि हम भारतीय 1947 तो क्या आज 2013 में भी आजादी पाने के काबिल नहीं हुए हैं। हमें आज भी किसी दूसरे मुल्क का ही गुलाम होना चाहिए और कदाचित् हमारे अगले शासक चीनी होंगे।

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

फिर से 62?

मित्रों,हम भारतीयों की यह सन् 47 की ही आदत है कि हम इतिहास से सबक नहीं लेते और उसे बार-बार अपने-आपको दोहराने का मौका देते रहते हैं। चाहे पाकिस्तान का मुद्दा हो या आतंकवाद का या फिर कांग्रेस को सत्ता में लाने का,क्या सरकार और क्या जनता दोनों ने ही कभी इतिहास से सबक नहीं लिया। पाकिस्तान बार-बार हमारी पीठ में छुरा भोंकता रहता है फिर भी हम उसको गले लगाने के लिए हमेशा बेताब बने रहते हैं,आतंकी हमले होते रहते हैं परन्तु हम कोई एहतियाती उपाय नहीं करते और निश्चिंत होकर फिर से अगले हमले के इंतजार में लग जाते हैं। इसी तरह कांग्रेस पार्टी जब भी केंद्र में सत्ता में आती है दोनों हाथों से देश को लूटने,लुटाने,खाने और बेचने में लग जाती है फिर भी हम उसी को वोट देकर बार-बार देश को लूटने,लुटाने,खाने और बेचने का अवसर देते रहते हैं। अब तो विकीलिक्स के खुलासों से भी साबित हो चुका है कि नेहरू-गांधी परिवार शुरू से ही दलालों और देशद्रोहियों का परिवार रहा है।
             मित्रों,हमारी चीन नीति भी हमारी इस चिरन्तन आदत का अपवाद नहीं है। हमने चीन के हाथों 1962 में जबर्दस्त धोखा खाया और हमें शर्मनाक पराजय से भी दो-चार होने पड़ा लेकिन हमने फिर भी सबक नहीं लिया। एनडीए की वाजपेयी सरकार तो स्थिति फिर भी ठीक थी लेकिन कांग्रेस पार्टी की वर्तमान सरकार ने तो चीन की तरफ से आँखें ही मूँद ली-मूँदहुँ आँख कतहुँ कछु नाहिं। इस सरकार ने पिछले नौ सालों में चीन को भारत की फैक्ट्री बन जाने दिया। हमारे उद्योगपतियों को चीन में उद्योग बिठाने की महामूर्खतापूर्ण छूट दे दी।परिणाम हुआ कि हमारे रसोईघर से लेकर शयनकक्ष तक में आज मेड इन चाईना का राज है। इस सरकार ने चीन से वस्तुओं की आमद पर भी कभी किसी तरह की रोक नहीं लगाई नतीजा यह हुआ कि हमारी मूल्यवान विदेशी मुद्रा चीन के खजाने में जाती रही और हमारा चीन के साथ और कुल व्यापार-घाटा नित नए रिकार्ड बनाता रहा।
              मित्रों,आज हम अर्थव्यवस्था के आकार के मामले में भी चीन से काफी पीछे छूट चुके हैं। पिछले नौ सालों में हमारे देश में सिर्फ घोटाले ही हुए हैं विकास नहीं के बराबर हुआ है जबकि इसी अवधि में चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। आज की तारीख में महाशक्ति अमेरिका भी उससे सीधी टक्कर नहीं ले सकता फिर भारत किस खेत की मूली है?
                       मित्रों,चीन ने पिछले कुछ वर्षों में भारत-चीन नियंत्रण रेखा पर सड़कों और रेल लाईनों का जाल बिछा दिया है,भारत के चारों तरफ के पड़ोसी देशों को अपने पक्ष में कर लिया है,शस्त्रास्त्र-उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली है,विज्ञान और तकनीकी विकास में अग्रणी स्थान प्राप्त कर लिया है। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी की निर्लज्ज,घोटालेबाज और देशद्रोही सरकार के चलते हमारी अर्थव्यवस्था पातालगामी है,तमाम सुरक्षा-विशेषज्ञों और इस नाचीज द्वारा लाख सचेत करने पर भी इसने भारत-चीन नियंत्रण-रेखा पर न तो सड़कें ही बनाईं और न ही रेल लाईनें ही बिछाईँ फिर हमारे सैनिक मोर्चे पर सही समय पर या असमय पर पहुँचेंगे कैसे? आज अपने पड़ोसियों के साथ भी हमारे संबंध मधुर नहीं रहे हैं और पिछले 9 सालों में इन देशों में भारतीय रूपए के प्रभाव में लगातार कमी आई है। वहीं चीन ने इन सालों में इन देशों में भारी पूंजी निवेश किया है। यहाँ तक कि कुछ ही दिन पहले उसने हमारी आर्थिक राजधानी मुंबई में भी मेट्रो परियोजना में निवेश का प्रस्ताव रखा है। परिणामस्वरूप हमारे जो पड़ोसी मुल्क कभी हमारे भरोसेमंद दोस्त थे आज चीन की गोद में बैठकर हमें ही आँखें दिखा रहे हैं। पिछले नौ सालों में हमारी इस महाभ्रष्ट और निकम्मी सरकार ने भारत को शस्त्रास्त्रों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के प्रयासों को बिल्कुल तिलांजलि ही दे दी है और भारत को दुनिया का सबसे बड़ा हथियार उत्पादक बनाने के बदले सबसे बड़ा आयातक बना दिया है। इसके पीछे क्या कारण हैं यह वीके सिंह और एसपी त्यागी प्रकरण से और विकीलिक्स के खुलासों से पहले ही जगजाहिर हो चुका है।
                            मित्रों,आज सरकार के अन्य अंगों की तरह सेना के प्रत्येक अंग में भी भ्रष्टाचार इस कदर अपनी पैठ बना चुका है कि अगर चीन से आज की तारीख में लड़ाई होती है तो हमें तब आश्चर्य नहीं होना चाहिए जब हमारी सेना 1962 की ही तरह बिना लड़े ही मारी जाए,जब सैनिकों की बंदूकें और अन्य उपकरण युद्धभूमि में काम ही न करें और इस तरह हमें 1962 की तरह ही एक और शर्मनाक पराजय का मुँह देखना पड़े।
                            मित्रों,आप खुद भी हालात पर दृष्टिपात करके देख सकते हैं कि मतदान के दौरान की गई हमारी सिर्फ एक गलती ने किस तरह हमें फिर से 1962 में वापस लाकर खड़ा कर दिया है। हमें भूलना नहीं चाहिए कि तब भी लड़ाई की शुरुआत घुसपैठ से ही हुई थी। शायद आपको भी याद होगा कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने कैसे अपनी शानदार विदेश नीति की बदौलत चीन को सिक्किम पर अपनी नीति और मानचित्र को बदलने के लिए बाध्य कर दिया था,कैसे भारत के तब के रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने शेर की तरह दहाड़ते हुए कहा था कि दूसरा पोखरण पाकिस्तान को ध्यान में रखकर नहीं किया गया है बल्कि भारत चीन को अपना प्रथम और सबसे बड़ा शत्रु मानता है। फिर कैसे मात्र नौ सालों में दहाड़ मिमियाहट में बदल गई? क्यों आज की भारत सरकार चीन तो क्या मालदीव और श्रीलंका के आगे भी लाचार और असरहीन है? कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में छोटे-से जापान और वियतनाम ने तो चीन के आगे घुटने नहीं टेके और गोली का जवाब तुरंत गोली से दिया फिर हम क्यों व्यर्थ की बातचीत में समय जाया कर रहे हैं? हमें चीन में हजारों सालों से प्रचलित इस कहावत को कभी नहीं भूलना चाहिए कि युद्ध लड़कर तीव्रता से हजार मील हासिल करने से ज्यादा बेहतर है चुपके से दशकों में एक-एक ईंच करके धीरे-धीरे अपना सीमा विस्तार करना।
                           मित्रों,मैं बिना किसी लाग-लपेट के यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि आज भारत फिर से वर्ष 1962 के कगार पर खड़ा है। अगर आज चीन से युद्ध हुआ तो हमारी पराजय अवश्यम्भावी है और वह पराजय कदाचित 1962 से भी ज्यादा शर्मनाक होगी। उस समय तो चीन अमेरिका के डर से रूक गया था आज तो उसका वो डर भी जाता रहा है। वाजपेयी के वीजन 2020 को ठंडे बस्ते में डालने के लिए,गलत आर्थिक और विदेश नीति के लिए हमारी वर्तमान केंद्र सरकार तो दोषी है ही इस सरकार को लगातार दो-दो बार चुनने के लिए उससे कहीं ज्यादा दोषी स्वार्थी जनता स्वयं है और हम अपनी इस जिम्मेदारी से किसी भी स्थिति में नहीं बच सकते-जैसी करनी वैसी भरनी।                                

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

गरीब सवर्णों को भी मिले आरक्षण

मित्रों,मैं अपने बहुत पहले लिखे एक आलेख गरीबी जाति नहीं देखती जनाब में इस विषय पर विस्तार से विचार कर चुका हूँ कि भारत में गरीबी सर्वव्यापी है। अगर एक चमार गरीब है तो एक राजपूत भी गरीब है अर्थात् न तो गरीबों की कोई खास जाति होती है और न ही गरीबी की ही।
              मित्रों,पिछले दो दशकों से भारत में और बिहार में भी सरकारी नौकरियों में 50 % आरक्षण लागू है। अगर बैकलॉग हुआ तो नियुक्ति विशेष में आरक्षण इससे ज्यादा भी हो सकता है। इतना ही नहीं आजकल अनारक्षित सीटों पर भी बड़ी संख्या में, बिहार में तो आधी से भी ज्यादा पर पिछड़े और दलित वर्गों के उम्मीदवार ही काबिज हो जाते हैं। अब आप ही बताईए कि जो अवर्ण उम्मीदवार सवर्ण उम्मीदवारों से भी ज्यादा मेधावी,योग्य और सक्षम हैं उनको आरक्षण की आवश्यकता ही क्या है?
               मित्रों,बाद में बिहार सरकार ने ग्राम-पंचायतों में भी अति-पिछड़ी और दलित जातियों को आरक्षण दे दिया जिससे बहुत से पंचायतों में लोकतंत्र के लिए हास्यास्पद स्थिति पैदा हो गई है। जैसा कि आप सभी भी जानते हैं कि लोकतंत्र संख्या-बल पर चलता है परन्तु बिहार में आपको ऐसे पंचायत भी मिल जाएंगे जहाँ दो-चार घर ही हरिजन हैं फिर भी वे ही पंचायत के मुखिया,सरपंच आदि सबकुछ हैं। यह लोकतंत्र और बहुमत के सिद्धांतों के साथ मजाक नहीं है तो और क्या है? इसलिए मैं बिहार सरकार से मांग करता हूँ कि वो जातीय आधार पर पंचायतों में लागू अतार्किक आरक्षण को समाप्त करे,लिंग आधारित आरक्षण को वो चाहे तो जारी रख सकती है। हाँ,अगर पंचायतों में भी आर्थिक आधार पर आरक्षण करना हो तो ऐसा जरूर किया जा सकता है।
              मित्रों,कदाचित् हमारे राजनेताओं द्वारा ऐसा मान लिया गया है कि सिर्फ पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जातियों-जनजातियों में ही गरीबी है। हालाँकि बीपीएल सूची चीख-चीख कर यह सच्चाई बयान कर रही है कि बिहार के कम-से-कम 90 % सवर्ण भी गरीब हैं। फिर क्यों नहीं मिलना चाहिए सवर्णों को भी आरक्षण का लाभ?
                 मित्रों,जब बिहार में 2010 में विधानसभा चुनाव प्रचार चल रहा था तब सत्ता और विपक्ष दोनों ही से संबंधित दलों ने एकस्वर में गरीब सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का वादा किया था। चुनावों में सवर्णों ने एकजुट होकर अपना विश्वास एकबार फिर से राजग के प्रति व्यक्त किया। सुशासनी सरकार ने चुनावों के बाद इस मुद्दे पर विचार करने के लिए एक लॉलीपॉपी या झुनझुना सदृश सवर्ण आयोग का गठन भी किया। परन्तु अब दो साल से ज्यादा वक्त गुजरने के बाद भी इस दिशा में कोई खास प्रगति होती दिख नहीं रही है जिससे बिहार की सवर्ण जातियों में राजग के प्रति गुस्सा दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। पिछले दो सालों में आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों ने सिर्फ नौ जिलों वैशाली, लखीसराय, मुंगेर, भागलपुर, खगडिय़ा, बेगूसराय, जहानाबाद, अरवल और भोजपुर का दौरा किया है। वहीं, उपाध्यक्ष श्रीकृष्ण प्रसाद सिंह ने इन जिलों के अलावा सुपौल, सहरसा, समस्तीपुर, दरभंगा और मधुबनी जिलों का दौरा किया है। पांच सदस्यीय आयोग में अध्यक्ष दिनेश कुमार त्रिवेदी को वेतन मद में 1.14 लाख, उपाध्यक्ष श्रीकृष्ण प्रसाद सिंह को 1.20 लाख रुपए मिलते हैं। जबकि सदस्य नरेंद्र कुमार सिंह, मो.अब्बास उर्फ फरहत, संजय प्रकाश मयूख को 1.34 लाख रुपए वेतन के रूप में प्रतिमाह भुगतान होता है। आयोग के लिए राज्य सरकार अब तक 1.78 करोड़ रुपए का अनुदान दे चुकी है। वर्ष 2011-12 में 1.40 करोड़ और वर्ष 2012-13 में 38.29 लाख रुपए। इन पैसों से आयोग के सदस्यों के वेतन भुगतान व अन्य कार्य हो रहे हैं। इसके अलावा आयोग के लिए राज्य सरकार अन्य सुविधाएं भी मुहैया करवाती है। इनमें सरकारी वाहन आदि शामिल हैं।
                    मित्रों,हाल ही में जदयू के जन्मना ब्राह्मण और बड़बोले नेता शिवानंद तिवारी ने आदतन बकवास करते हुए कहा है कि बिहार के सवर्णों को आरक्षण देने की कोई जरुरत नहीं है। बल्कि बिहार के सवर्णों को इस बात से ही संतोष कर लेना चाहिए कि राज्य का विकास हो रहा है। दीगर है कि श्री तिवारी ने कभी जीवन में सवर्णों की राजनीति की ही नहीं है बल्कि वे हमेशा पिछड़ों की राजनीति करते रहे हैं इसलिए उनके लिए यह स्वाभाविक है कि वे वंश की कुल्हाड़ी की तरह व्यवहार करें और अपनी ही जाति ब्राह्मणों सहित सवर्णों को शेष जीवनपर्यन्त क्षति पहुँचाते रहें। मैं शिवानंद जी और उनकी तरह की सोंच रखनेवाले दुर्लभ स्वार्थी नेताओं से जानना चाहता हूँ कि जब सामाजिक रूप से पिछड़ों (आर्थिक रूप से नहीं) को आरक्षण देने का सवाल देश के सामने था तब तो देश की समस्त जनता को संसाधनों पर समान अधिकार और उनके समान बँटवारे का तर्क दिया जा रहा था तो क्या गरीब सवर्ण विदेशी हैं? क्यों उनको देश के संसाधनों पर समान अधिकार और समान अवसर नहीं दिया जाना चाहिए? उनको यह भी बताना चाहिए कि कैसे राज्य का विकास-दर ऊँचा रहने से गरीब सवर्ण स्वतः लाभान्वित हो जा रहे हैं और कैसे पिछड़ी और दलित जातियों के लोग स्वतः लाभान्वित नहीं हो पा रहे हैं। आज मेरे गाँव वैशाली जिले के जुड़ावनपुर बरारी में मेरे सगे चाचा सहित 90 % राजपूतों की आर्थिक हालत पिछड़ी जातियों के पड़ोसियों से भी ज्यादा खराब है। उनकी ही तरह वे भी सरकारी गेहूँ-चावल खाकर दिन काट रहे हैं। उनके बच्चे भी भुखमरी के चलते अपनी स्कूली शिक्षा तक पूरी नहीं कर पाए। वे भी अपनी लड़कियों की शादी में कुछ हजार रुपए तक भी व्यय नहीं कर सकते। फिर उनकी हालत,उनकी फटेहाली,उनके बच्चों की अधूरी शिक्षा,उनकी भूख,उनकी गरीबी,उनकी बेबसी,उनका कुपोषण,उनका दर्द हमारे पिछड़े और दलित पड़ोसियों से अलग कैसे है? और जब अलग नहीं है तो फिर क्यों उनको और उनके बच्चों की आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए?
                                       मित्रों,एक बात और जैसा कि हम जानते हैं कि माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश से पिछड़ी जातियों में क्रीमी लेयर का नियम लागू है। मैं मानता हूँ कि इसे गरीब सवर्णों को मिलनेवाले आरक्षणों में भी लागू किया जाना चाहिए और वो भी वास्तविक रूप में न कि सिर्फ कागजों पर जैसा कि अभी हो रहा है। खाते-पीते घरों के जन्मना पिछड़ी जातियों के बच्चे भी गलत आय-प्रमाण पत्र देकर अभी जो आरक्षण का लाभ ले ले रहे हैं इसे बंद करना होगा। मैं समझता हूँ कि संसद आरक्षण के नियमों में संशोधन करे और एक परिवार के सदस्यों को सिर्फ एक बार ही आरक्षण का लाभ दिए जाने का प्रावधान करे तो बेहतर होता क्योंकि ऐसा होने से अवसर से वंचितों वास्तविक लोगों को भी आरक्षण का लाभ प्राप्त हो पाता।

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

भारत पाकिस्तान से क्या सीख सकता है?

मित्रों,क्या आप शीर्षक देखकर हैरान हो रहे हैं? कहीं आप यह तो नहीं सोंच रहे कि पाकिस्तान तो हमारा चिरशत्रु देश है फिर उससे सीखना कैसा और वह हमें सिखा ही क्या सकता है? अगर ऐसा है तो फिर आप भूल रहे हैं कि रावण जब युद्ध-भूमि में घायल होकर मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था तब राम ने लक्ष्मण को उससे शिक्षा लेने के लिए भेजा था। बेशक आज के पाकिस्तान में रोजाना बहुत-कुछ ऐसा सकारात्मक घट रहा है जिससे हम भारतीय बहुत-कुछ सीख सकते हैं।
             मित्रों,क्या आपने कभी अपने देश भारत में इस बात की कल्पना की है कि प्रधानमंत्री को सुप्रीम कोर्ट आदेश न मानने पर पद के अयोग्य घोषित कर दे? नहीं न, लेकिन पाकिस्तान में ऐसा हो चुका है। जहाँ हमारे भारत के अब तक के सबसे बेकार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आये दिन न्यायपालिका को अपने दायरे में रहने की चेतावनी देते रहते हैं लेकिन खुद स्थितियों के सुधारने की दिशा में कोई सार्थक कदम नहीं उठाते वहीं पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को उच्चतम न्यायालय की अवमानना के अपराध के चलते 19 जून,2012 को अपने पद से हाथ धोना पड़ा। जाहिर है पाकिस्तान की न्यायपालिका को भारत की न्यायपालिका की तुलना में ज्यादा व्यापक अधिकार दिए गए हैं। पाकिस्तान की न्यायपालिका किसी भी मुद्दे पर स्वतः संज्ञान ले सकती है।
              मित्रों,पाकिस्तान के संविधान में यह प्रावधान किया गया है कि आम चुनाव के समय वहाँ का चुनाव आयोग किसी निष्पक्ष और योग्य व्यक्ति को कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त करता है। इन्हीं प्रावधानों के तहत इन दिनों ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मीर हाजरखान खोसो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हैं। वे अगले नियमित प्रधानमंत्री के चुने जाने तक इस पद पर रहेंगे। इतना ही नहीं पाकिस्तानी अखबार डेली टाइम्स और पत्रिका फ्राइडे टाइम्स के प्रधान संपादक एवं प्रकाशक नजम सेठी इन दिनों पाकिस्तानी पंजाब प्रांत के कार्यवाहक मुख्यमंत्री हैं। है न यह लाजवाब व्यवस्था? न तो चुनावी धांधली का भय और न ही सरकारी तंत्र के दुरूपयोग की आशंका ही,मतपेटियों में से जिन के निकलने का तो सवाल ही नहीं। सोंचिए अगर भारत में भी ऐसी व्यवस्था होती तो कुछ दिन के लिए ही सही हम भारतीयों को भी चुनावी जोड़-तोड़ से दूर रहनेवाले अच्छे शासन में रहने का मौका मिल जाता।
             मित्रों,यह तो आप समझ ही गए होंगे कि पाकिस्तान में चुनाव आयोग हमारे चुनाव आयोग से कहीं ज्यादा शक्तिशाली है। जहाँ हमारा चुनाव आयोग छोटे-मोटे चुनाव-सुधार के लिए सरकार और संसद का मुँहतका बना रहता है वहीं पाकिस्तानी चुनाव आयोग ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए मतदाताओं को 11 मई को होनेवाले चुनाव में उम्मीदवारों को नकार देने का अधिकार प्रदान कर दिया है। इन चुनावों में अगर किसी निर्वाचन क्षेत्र के 51 प्रतिशत मतदाता इस विकल्प पर मतदान करते हैं तो उस निर्वाचन क्षेत्र में दोबारा मतदान करवाया जाएगा।
                    मित्रों,कहते हैं कि अच्छी चीजें जहाँ से मिले सीखनी चाहिए इसलिए अगर हम पाकिस्तान से शिक्षा लेकर अपने संविधान में सकारात्मक परिवर्तन करें तो इसमें कुछ भी बुरा नहीं। भारत में संसदीय लोकतंत्र पर से जनता का विश्वास तेजी से उठता जा रहा है इसलिए ऐसा करना और भी आवश्यक है। भारत में भी जनता को राईट टू रिजेक्ट का अधिकार तो मिले ही न्यायपालिका और चुनाव आयोग को भी पाकिस्तान की तरह शक्तिशाली बनाया जाना चाहिए। हमारे संविधान-निर्माताओं ने संसद को सर्वशक्तिमान बना देने की जो भूल की थी उसके दुष्परिणाम अब सामने आने लगे हैं। अगर संसद के अधिकारों में कुछ कटौती कर देने से तंत्र और व्यवस्था में सुधार आ सकता है तो ऐसा जरूर किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं पाकिस्तान और बांग्लादेश की तरह हमारे देश में भी चुनावों के समय निष्पक्ष कार्यवाहक प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री नियुक्त करने की परंपरा को लागू करना चाहिए।

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

पवार को हजारों करोड़ जनता को महँगी चीनी

मित्रों,यूँ तो वर्तमान केन्द्र सरकार आम आदमी की सरकार है लेकिन यह जब-न-तब तेल का दाम बढ़ाकर जनता का तेल निकालती रहती है। महँगाई से मर रही जनता को महँगाई बढ़ाकर राहत देकर इन दिनों सोनिया-मनमोहन सिंह की सरकार नवीन अर्थशास्त्र का निर्माण कर रही है। इसने पहले पेट्रोल और रासायनिक खाद को नियंत्रण मुक्त किया और अब चीनी को भी उद्योगपतियों के हवाले कर दिया है। वह दिन दूर नहीं जब पूरा-का-पूरा वतन उद्योगपतियों के हवाले करके यह सरकार गीत गाया करेगी कि अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों। आज से ही उद्योगपति बाजार में मांग और आपूर्ति के सिद्धांत के तहत अपने मनमाफिक दाम पर चीनी बेच सकेंगे। ऐसा भी नहीं है कि इससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ कम होता हो बल्कि इससे चीनी उद्योग को जरूर 3000 करोड़ रुपये का सीधा लाभ हो जाएगा लेकिन केंद्र सरकार को 2600 करोड़ रुपये की सीधी क्षति ही होगी।
               मित्रों,ऐसा क्यों हुआ कि केंद्र सरकार ने आर्थिक मंदी के संकट काल में खुद घाटा उठाकर चीनी उद्योग को मोटा लाभ देने का निर्णय किया? आर्थिक-दृष्टि से हो या वोट बैंक की दृष्टि से इस निर्णय को किसी भी तरह से बुद्धिमत्तापूर्ण तो नहीं कहा जा सकता है। मैं ठीक-ठीक तो नहीं जानता हूँ कि भारत के कृषि और खाद्य-आपूर्ति मंत्री शरद पवार की खुद की कितनी चीनी मिलें हैं लेकिन इतना जरूर जानता हूँ कि उनका कुछ-न-कुछ आर्थिक हित जरूर सीधे तौर पर चीनी से जुड़ा हुआ है। पवार ने जब नौ साल पहले केंद्रीय कृषि और खाद्य-आपूर्ति मंत्री का पदभार संभाला था तभी से इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि उनके कार्यकाल में ही देर-सबेर चीनी को भी बाजार के हवाले कर दिया जाएगा। केंद्र सरकार में गलत सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी भरमाते हैं कि इस कदम से आम जनता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मगर उन्होंने यह नहीं बताया है कि कब तक?  कब तक मुनाफाखोर-धनपशु चीनी मालिक सब्र रख सकेंगे? जब चीनी का मूल्य-निर्धारण उनको ही करना है तो फिर वे कब तक और क्यों ज्यादा लाभ के लालच से बचे रहेंगे?
               मित्रों,क्या बिडंबना है कि जिस समय राजनीति के तालाब के नए मरमच्छ राहुल गांधी आम आदमी की समस्याओं के बारे में बातें करके घुटने से आँसू बहा रहा होता है ठीक उसी समय उसकी सरकार आम आदमी से सस्ती चीनी खाने का अधिकार छीन रही होती है?! हमारे देहात में कहावत हे कि बिल्ली को अगर दही की रखवाली का भार दे दिया जाए तो दही भला कब तक बचा रहेगा? फिर चाहे वो दही किसी व्यक्ति का हो या फिर पूरे समाज का। बिल्ली के लिए तो सारे दही एकसमान हैं। यह कितना हास्यास्पद है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले 9 सालों से चीनी उद्योग को एक ऐसे व्यक्ति के हवाले किया हुआ है जो खुद ही इस क्षेत्र का बहुत बड़ा माफिया है। आप ही बताईए कि फिर भारत और सोमालिया मे क्या मौलिक अंतर है जहाँ की सरकार में डाकू भी मंत्री हैं। कल राजा भैया को उत्तर प्रदेश का जेल मंत्री बना दिया गया था,ए. राजा को भारत का दूरसंचार मंत्री बना दिया गया था,आज शरद पवार कृषि और खाद्य-आपूर्ति मंत्री है और उनके साथ-साथ केंद्र और राज्यों की सरकारों में न जाने कितने माफिया मंत्री हैं तो कल को नवीन जिंदल इस्पात मंत्री होंगे,सुरेश कलमाडी खेल मंत्री,कनिष्क सिंह रक्षा मंत्री,मूकेश अंबानी पेट्रोलियम मंत्री और विजय माल्या नागरिक उड्डयन मंत्री। केंद्र और प्रदेशों के गृहमंत्री पद के तो हजारों योग्य खूनी-बलात्कारी उम्मीदवार टकटकी सालों से टकटकी लगाए बैठे हैं। फिर देश और उसके आम आदमी का क्या होगा?
                            मित्रों,वर्ष 1984 में मैंने अमिताभ बच्चन अभिनीत एक फिल्म देखी थी। नाम था इन्कलाब। उसमें भी शराब माफिया खुद को उत्पाद मंत्री,अनाज माफिया खाद्य-आपूर्ति मंत्री,हथियार तस्कर गृह मंत्री,सड़क माफिया सड़क परिवहन मंत्री आदि बनाने की मांग करते हैं। मुझे नहीं पता था कि 20-30 साल के बाद इस फिल्म की कहानी सच साबित हो जाएगी। फिल्म में तो मुख्यमंत्री पद के लिए नवनिर्वाचित अमिताभ बच्चन सारे माफियाओं को मंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही गोली मार देते हैं। काश,ऐसा केंद्र और राज्य सरकार में काबिज माफिया मंत्रियों के साथ सचमुच में हो जाता!!

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

आज भी प्रासंगिक हैं भवानी प्रसाद मिश्र

मित्रों,हम हिन्दीभाषियों को अपनी भाषा और अपने लेखकों-कवियों से कितना प्रेम है कहने की जरूरत नहीं है। हम एक तरफ तो हिंदी की बदहाली का रोना रोते हैं वहीं दूसरी ओर अपने बच्चों को सिर्फ अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने भेजते हैं। आज हममे से कितने लोगों को याद होगा या पता होगा कि इस साल हमारे किन-किन लेखकों-कवियों की जन्मशताब्दी है? भले ही हमें याद हो या नहीं हो लेकिन सच तो यही है कि अगर अभी महाकवि भवानी प्रसाद मिश्र जीवित होते तो सौ साल के होते। आज से 100 साल पहले 29 मार्च,1913 को भारत का हृदय कहे जानेवाले मध्य प्रदेश में सतपुड़ा के घने जंगलों के बीच अपनी धुन के पक्के एक महाकवि का जन्म हुआ था। माता-पिता ने उसको माता भवानी का आशीर्वाद मानते हुए नाम रखा भवानी प्रसाद अर्थात् भवानी प्रसाद मिश्र। बड़ा होकर यही बच्चा कवि बना,महाकवि। उसकी भाषा जनभाषा के अत्यंत निकट थी और उसके शब्द उसकी ही तरह सरल होते थे लेकिन उतने ही अर्थपूर्ण। वो जिस तरह सोंचता था उसी तरह से बोलता था और जिस तरह से बोलता था उसी तरह से लिखता था और ताल ठोंककर लिखता था। उसकी अपने समकालीन कवियों को खुली चुनौती थी-
जिस तरह हम बोलते हैं,उस तरह तू लिख
और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख
चीज ऐसी दे कि जिसका स्वाद सिर चढ़ जाय
बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाय।
बचपन से ही वह जब भी लिखता इतनी तन्मयता से लिखता कि कागज,कलम और खुद को एकाकार कर देता था-
जब मैं कविता लिखने नहीं बैठा था
तब कागज कागज था
मैं मैं था और कलम कलम
मगर जब लिखन बैठा
तो तीन नहीं रहे हम एक हो गए।
           मित्रों,जवानी आने पर भवानी प्रसाद को नए जमाने की छल-चातुरी कभी नहीं भाई। खुद तो इससे दूर रहे ही छली-चतुर लोगों को भी अपने से दूर रखा-
चतुर मुझे कुछ भी
कभी नहीं भाया
न औरत न आदमी
न कविता
उस कवि को कला कला के लिए में तनिक भी विश्वास नहीं था। उसने जो भी लिखा मजबूरों के लिए लिखा,मजलूमों के हक के लिए लिखा। उसका सीधा-सीधा मानना था कि
कवि आसमान का नहीं
धरती का होता है
अपने से ज्यादा
अपनों का होता है।
वह भदेसपन का कवि था और पूंजीवादी-शहरी और स्वार्थवादी सभ्यता सदैव उसके अचूक निशाने पर रही-
आप सभ्य हैं क्योंकि आपके कपड़े महज बने हैं
आप सभ्य हैं क्योंकि आपके जबड़े खून सने हैं।
                मित्रों,हालाँकि भवानी जी जीवनपर्यंत लेखन को अपना सहज कर्त्तव्य समझते थे परंतु हिन्दी और हिंदी लेखकों की फटेहाली उनसे छिपी हुई भी नहीं थी वे खुद भुक्तभोगी जो थे। तभी तो इस मशहूर कविता में उन्होंने अपने साथ-साथ समस्त हिंदी कवियों-लेखकों के दर्द को उड़ेलकर रख दिया है-
जी हाँ हुजूर,मैं गीत बेचता हूँ
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ
जी माल देखिए दाम बताऊंगा
.........................गीत बेचता हूँ।
                       मित्रों,देश के राजनैतिक,सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में जो स्खलन हो रहा था,खालीपन आ रहा था उससे महाकवि खुद को भी रीता हुआ महसूस करते थे-
भैया
मैं तो पात्र हूँ तुम्हारा
इस आशा से आता हूँ सामने
कि तुम मुझे भरोगे
जी होने पर मेरा खालीपन
खुद तुम ही हरोगे।
भवानी जी अपने परिवेश के प्रति खासे संवेदनशील थे। उनको न केवल उनके दौर में हो रहे मूल्यों का अवमूल्यन ही बल्कि दिखावेवाली झूठी चेतना भी न सिर्फ चिंतित करती थी बल्कि डराती भी थी क्योंकि भविष्य का निर्माण वर्तमान ही से तो होता है-
चेतना का मतलब है पैदा होओ,मरो
चेतना का मतलब है हंसो रोओ,डरो
चेतना का मतलब है क्रोध करो,घृणा करो
चेतना का मतलब है हिलो,मिलो विरोध करो
झूठमूठ प्यार करो,झूठमूठ शरम करो
झूठमूठ सत्य कहो,झूठमूठ धरम करो।
                  मित्रों,यूँ तो भवानी बाबू का पूरा जीवन आम-आदमी को जगाने की जुगत में ही बीता परंतु जब उन्हें इस काम में अपेक्षित सफलता मिलती नहीं दिखी तब उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों को आह्वान किया कि वे सोये हुए आम आदमी को जगाएँ उनसे तो यह जगाए नहीं जग रहा-
भई सूरज जरा इस आदमी को जगाओ
भई पवन जरा इस आदमी को हिलाओ
यह आदमी जो सोया पड़ा है
जो सच से बेखबर
सपनों में सोया पड़ा है
भई पक्षी उसके कानों में चिल्लाओ।
निश्चित रूप से भवानी बाबू शाश्वत जागरण के कवि थे और परिवर्तन चाहते थे परंतु उनकी इस मामले में एक शर्त भी थी कि वह परिवर्तन दिशाहीन न हो,रक्तरंजित न हो। इस मामले में वे क्रूर साम्यवादी नहीं थे बल्कि सदय गांधीवादी थे-
हम मुँह से कहते रहे अहिंसा मन में हिंसा धरे रहे
हम गांधी जी के बावजूद प्रतिक्षण हिंसा में भरे रहे।
अगर तुम्हे लड़ना है लड़ो हम नहीं लड़ेंगे
तुम हमारी सीमा में बढ़ो,हम नहीं बढ़ेंगे
..कोरे मारने वालों को हिला दो
हमेशा के लिए हिंसा को खाक में मिला दो।
भवानी प्रसाद जी परिवर्तन ला सकने में असफल तो हुए थे परंतु निराश नहीं थे और हताश तो बिल्कुल भी नहीं क्योंकि उनको इस बात का संतोष था कि उन्होंने प्रयास तो किया था-
मगर तय है कि यह उदास होने से नहीं होगा
निराश होने से तो होगा ही नहीं
हिम्मत और प्रसन्नता से
छोटे-छोटे कामों में
जुट जाने से होगा। (उनकी प्रसिद्ध कविता तख्तोताज कबाड़ी बाजार में बिकते हैं से)
इतना ही नहीं भवानी बाबू परिवर्तन के दौरान भी अच्छी भारतीय परंपरा के रक्षण के समर्थक थे क्योंकि उनका मानना था कि सुनहरे और सुरक्षित भविष्य का निर्माण शून्य में नहीं हो सकता-
पुराना और कठोर जैसा स्फटिक
हर चोट पर फेंकता है नई से नई चिनगारी
...... अर्थ पुराने से पुराने शब्दों में से नए संदर्भों में
मेरा आज का मन एक नया संदर्भ है
मगर ऐसा नया भी नहीं कि लगाव न हो उसका किसी पुराने के साथ
लगाव के बिना कुछ भी नहीं रह सकता।
भवानी बाबू की मानवता और मानवीय गुणों में अगाध आस्था थी और सबसे ज्यादा आस्था थी प्यार में,प्रेम में-
कितना भी भ्रष्ट जमाना हो
हर जगह प्यार जा सकता है।
               मित्रों,भवानी बाबू ने कभी सम्मान या कुर्सी की अभिलाषा नहीं की बल्कि उनके लिए तो तख्तो-ताज कबाड़ी बाजार में बेचने लायक वस्तु थी-
कई बार तख्तोताज
कबाड़ी बाजारों में बिकते हैं
या कहो धरे के धरे रह जाते हैं
कबाड़ी बाजारों में
लोग उन्हें सिर्फ देख-दाख कर
निकल जाते हैं।
जाहिर है ऐसी बात वही व्यक्ति कर सकता है जिसको लालच और स्वार्थ छू भी नहीं गया हो। भवानी बाबू सार्थक जीवन जीने की बात करते थे। उनके मत में सार्थक जीवन वही है जो-
तपित को स्निग्ध करे
प्यासे को चैन दे
सूखे हुए अधरों को फिर से बैन दे। (असाधारण)
भवानी बाबू ने अगर जीवन को अपनी शर्तों पर जिया तो मौत से भी आँखों में आँखे डालकर बातें की। उनके अनुसार खामोशी से मरना भी कोई मरना होता है बल्कि मरना तो वही अच्छा है जो-
लंगड़े को पांव और लूले को हाथ दे बोले जो हमेशा सच
...रूकती-सी दुनिया को आगे बढ़ा दे जो मरना वही अच्छा है।
सच भी यही है कि भवानी प्रसाद मिश्र ने यथास्थिति को भंग करने का अथक प्रयास किया और रूकती-सी दुनिया को गति दी-
यह गीत सख्त सरदर्द भुलाएगा
यह गीत पिया को पास बुलाएगा
यह गीत पहाड़ी पर चढ़ जाता है
यह गीत बढ़ाए से बढ़ जाता है।
                मित्रों,कहते हैं कि जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि। भवानी प्रसाद मिश्र भले ही आज सदेह हमारे बीच उपस्थित नहीं हों लेकिन अपनी कविता के माध्यम से वे कालोत्तीर्ण हैं और रहेंगे। यह हमारा दुर्भाग्य है कि दिनोंदिन हमारे लिए उनकी प्रासंगिकता बढ़ती ही जा रही है। भवानी बाबू ने जिन आर्थिक,राजनैतिक और सामाजिक विद्रूपताओं पर अपनी लेखनी द्वारा भरपुर प्रहार किया था उनमें उनके जाने के बाद (20 फरवरी 1985) किंचित भी कमी नहीं आई है उल्टे स्थितियाँ बद से बदतर ही हुई हैं और होती जा रही हैं। जिस तरह भारत के लोगों ने त्रेता में वाल्मिकी और द्वापर में वेदव्यास को अनसुना कर दिया था अब तक उन्होंने भवानी बाबू पर कान नहीं दिया है तो यह हम भारतीयों की सीमा अथवा कमी है न कि महाकवि स्व. भवानी प्रसाद मिश्र की।