
मित्रों,जब भी किसी प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होते हैं तो वहाँ की जनता इस उम्मीद में सत्ता-परिवर्तन करती है कि आनेवाली सरकार निवर्तमान सरकार की तरह भ्रष्ट नहीं होगी और कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार लाएगी। परंतु मेरी समझ में यह नहीं आता कि उत्तर प्रदेश की जनता ने किस उम्मीद पर 17 महीने पहले समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत देकर जिताया। पुराने रिकार्ड तो यही बता रहे थे कि जब भी समाजबाँटी पार्टी यूपी में सत्ता में आती है भ्रष्टाचार बढ़ता है और पूरी तरह से गुंडा-राज कायम हो जाता है। बात यहीं तक रहती तो फिर भी गनीमत थी इस बार तो जबसे सपा की सरकार बनी है राज्य में हर हफ्ते कहीं-न-कहीं जेहादी दंगे हो रहे हैं। 17 महीने में 104 से भी ज्यादा सांप्रदायिक दंगे वो राज्य के 30 विभिन्न जिलों में। आखिर उत्तर प्रदेश को इन 17 महीनों में हो क्या गया है? क्या उसका नाम बदलकर अब दंगा प्रदेश रखना पड़ेगा?
मित्रों,जब भी दंगों की बात चलती है तो मीडिया और छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी दलों की जुबान पर सिर्फ एक ही नाम होता है-2002 के गुजरात के दंगे। मानो न तो उसके पहले भारत ने कभी सांप्रदायिक दंगा देखा था और न तो उसके बाद ही दंगे हुए। पिछले आठ दिनों से मुसलमान मुजफ्फरनगर में जो कुछ भी कर रहे हैं क्या वो सांप्रदायिकता नहीं है या उन्हें दंगों की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए? जब 21 में से 16 मरनेवाले हिन्दू हों तो सिर्फ हिंसक झड़प या हिंसा और जब 12 में से 7 मुसलमान हों तब सांप्रदायिक दंगा,फासिज्म वगैरह।
मित्रों,मैं यहाँ यह कामना नहीं कर रहा हूँ कि जब भी दंगे हों तो ज्यादा संख्या में मुस्लिम मारे जाएँ परंतु मैं यह भी नहीं चाहता हूँ कि हम इस तथ्य से मुँह चुराने लगें कि पिछले 100 सालों में भारत में क्यों दंगे होते रहे हैं। इतिहास गवाह है कि ये मुसलमान ही थे जिन्होंने 16 अगस्त,1946 की तिथि निर्धारित करके बाजाप्ता दंगों की शुरुआत की थी और उसके बाद तो 40 लाख लोग उन दंगों में मारे गए। मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ यह दावा करता हूँ कि दंगे चाहे मुजफ्फरनगर में हों या आजाद मैदान में या फिर गुजरात या भागलपुर में हों दंगों की शुरुआत हमेशा मुसलमान करते हैं क्योंकि उनका धर्म सिर्फ नाम से ही शांतिवादी है व्यवहार में तो घनघोर असहिष्णुतावादी और असहअस्तित्ववादी है। मुगल सल्तनत के कुछेक सालों और बाद के टीपू सुल्तान सरीखे गिनती के शासकों को छोड़कर उसके दोनों हाथों में कभी कुरान नहीं रहा बल्कि उसके एक हाथ में हमेशा कुरान रहा तो दूसरे हाथ में तलवार। आज जो लोग पानी पी-पीकर मोदी को गुजरात दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं उनको भी यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि अगर 27 फरवरी,2002 को गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के 59 रामसेवकों जिनमें से अधिकतर महिलाएँ और बच्चे थे को स्थानीय मुसलमानों द्वारा जिंदा जलाया नहीं गया होता तो कदापि गुजरात में 28 फरवरी से 2 मार्च तक दंगे नहीं हुए होते। उनको यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उसके बाद गुजरात में फिर कभी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए जबकि घनघोर अल्पसंख्यकवादी समाजबाँटी पार्टी की सरकार में यह रोजाना की बात हो गई है।
मित्रों,अभी कुछ दिनों पहले समाजबाँटी पार्टी के प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने कहा था कि उनकी पार्टी यूपी को गुजरात नहीं बनने देगी। मैं उनसे बिल्कुल सहमत हूँ कि वे लोग यूपी को कभी गुजरात बना ही नहीं सकते बल्कि उनकी पार्टी की सत्तालोलुप नीतियाँ उत्तर प्रदेश को अफगानिस्तान जरूर बना देगी। वो दिन दूर नहीं जब हिन्दू यूपी में न तो पूजा-पाठ ही कर पाएंगे और न ही श्मशानों में अंतयेष्टि ही संपन्न कर सकेंगे। पाकिस्तान और अफगानिस्तान की तरह हिन्दुओं की बहू-बेटियों को जबर्दस्ती घरों से उठा लिया जाएगा। ज्ञातव्य हो कि मुजफ्फरनगर के दंगों की शुरुआत भी मुस्लिम शोहदों द्वारा हिन्दू दलित लड़कियों से छेड़खानी के कारण हुई। इस सिलसिले में हुई हिंसा में 27 अगस्त को कावल गाँव में दो लोग मारे गए। कई दिनों तक लगातार परेशान किए जाने के बाद जब हिन्दुओं ने महापंचायत का आयोजन किया तो पहले तो यूपी पुलिस ने उनके हथियार जब्त कर लिए और बाद में मुसलमानों ने आग्नेयास्त्रों से उन पर हमला कर दिया जिससे कम-से-कम आधा दर्जन हिन्दू घटनास्थल पर ही मारे गए। बाद में जब हिन्दू भड़क उठे तब मुसलमानों की रक्षा के लिए तुरंत सेना बुला ली गई।
मित्रों,क्या इस घृणित कृत्य के बाद भी मुल्ला यम सिंह यादव परिवार को हिन्दू बिरादरी का सदस्य मानते हैं और अगर मानते हैं तो क्या मानना चाहिए? यह परिवार जबसे 15 मार्च,2012 से सत्ता में आया है इसने जेहादियों को अपने धर्मभाइयों को निबटाने का ठेका दे दिया है। पहले इसने गोवधशालाओं में गायों को काटने का लाइसेंस दिया और अब जैसे अपने धर्मभाइयों के संहार का परमिट दे दिया है। मैं उत्तर प्रदेश में रहनेवाले उन हिन्दुओं से पूछना चाहता हूँ जो अभी भी सपा,बसपा और कांग्रेस के समर्थक हैं कि मुजफ्फरनगर क्या गुजरात में स्थित है? क्या उन्होंने तब तक होश में नहीं आने की कसम ले रखी है जब तक कि जेहादी हिंसा की लपटें उनके परिवार को झुलसाने न लगे? आँखे खोलिए और न सिर्फ यूपी बल्कि पूरे भारत को गुजरात बनाईए और नरेन्द्र मोदी को उसका पीएम तभी सांप्रदायिक दंगों से स्थायी रूप से मुक्ति मिल पाएगी। अभी तो यूपी में 20% ही मुस्लिम जनसंख्या है जब यह 45-50% हो जाएगी तब आपकी बहन-बेटियों का क्या होगा आपलोग खुद ही समझ सकते हैं। आपने मुंबई के शक्ति मिल गैंग रेप के बारे में वो खबर तो जरूर पढ़ी होगी कि इन बलात्कारियों (जिनमें से कम-से-कम 4 बांग्लादेशी मुसलमान घुसपैठिए हैं) ने बलात्कारों की एक स्वर्णिम शृंखला कायम की है और हमारी अतिथि देवो भव के महान विश्वास की पूरी तरह से गलत ठहराते हुए अब तक हमारी कम-से-कम 10 बच्चियों के साथ सामूहिक बलात्कार जैसे नृशंस अपराध को अंजाम दे चुके हैं।

मित्रों,क्या आपको मेरी बातें अटपटी लग रही हैं? हो भी सकता है लेकिन मैं किसी भी तरह का नशा नहीं करता हूँ और चौबीसों घंटे होशोहवाश में रहता हूँ। यह पूरी तरह से सच है कि चीन भारत पर हमला कर चुका है। इतना ही नहीं उसके आक्रमण का पहला चरण पूरा हो भी चुका है और उसका हमला अब दूसरे चरण में प्रवेश कर चुका है। पहले चरण में चीनी सेना बार-बार हमारे इलाके में घुसती थी और फिर वापस चली जाती थी। ऐसा वो बार-बार करती रही। दूसरे चरण में चीनी सेना जिस इलाके में दाखिल हो रही है उस पर कब्जा कर ले रही है और फिर हमारी सेना को उस इलाके में गस्त भी नहीं करने दे रही है। जब हम इसका विरोध करेंगे तो सैनिक झड़पें होंगी और फिर चीनी हमले का तीसरा और निर्णायक चरण शुरू होगा जिसमें वो हमारे खिलाफ इस आरोप के साथ पूर्ण युद्ध की घोषणा कर देगा कि हमने ही उनके इलाकों पर हमला किया है। अगर आपने पिछले दो दिनों के अखबार पढ़े हैं या समाचार चैनल देखे हैं तो आप इस बात से अच्छी तरह वाकिफ होंगे कि चीनी सेना ने लद्दाख में हमारे 640 वर्ग किमी क्षेत्र पर अधिकार कर लिया है और अब हमारे सैनिकों को वो उस इलाके में गस्त भी नहीं करने दे रही है। इस तरह मेरा यह कहना शत-प्रतिशत सही है कि चीन का हमारे देश पर हमला अब दूसरे चरण में पहुँच चुका है और आगे तीसरा चरण बेसब्री से हमारा इंतजार कर रहा है।
मित्रों,ऐसा मैं किसी स्वप्न के आधार पर नहीं कह रहा हूँ और न ही मैं कोई भविष्यवक्ता ही हूँ बल्कि ऐसा मैं 1962 के भारत-चीन युद्ध के आधार पर कह रहा हूँ। परन्तु हम इस बात से बेखबर हैं और हमारी केंद्र सरकार अगंभीर कि चीनी सेना धीरे-धीरे दिल्ली की तरफ बढ़ने लगी है। आपने कभी सोंचा है कि हमारी सरकार ऐसा क्यों कर रही है? जिस तरह से हमारी इस सरकार ने चीन की सारी गुस्ताखियों पर मिट्टी डालकर चीन के साथ रिश्ते प्रगाढ़ किए हैं और जिस तरह से इस सरकार के द्वारा पिछले सालों में सैन्य व्यय में चीन के समानुपात में भारी कटौती की गई और जिस तरह जानबूझकर हमारी तीव्रगामी अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया गया उससे तो एक अलग ही तरह का संदेह मेरे मन में पैदा हो रहा है। अभी भी जबकि चीन की हमारी सीमाओं पर आक्रामकता खुलकर सामने आ चुकी है तब भी हमारी केंद्र सरकार चीन को भारत में सड़कें और रेल फैक्ट्री बनाने का ठेका दे रही है। मैं देश के कथित प्रधानमंत्री जी से यह पूछना चाहता हूँ कि प्रधानमंत्री जी क्या दुनिया के किसी दूसरे देश में ऐसा होता है क्या? अभी-अभी कुछ ही दिन पहले बिहार के मधेपुरा में चीन को रेलवे फैक्ट्री बनाने का काम दिया गया है।
मित्रों, हम सभी जानते हैं कि सीमांचल का वह इलाका जिसमें मधेपुरा आता है सामरिक दृष्टि से हमारे लिए काफी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि किशनगंज के पास हमारा गलियारा मात्र 32 किमी चौड़ा है जिस पर अगर चीन कब्जा कर लेता है तो हमारा पूर्वोत्तर इलाका हमसे छिन जाएगा। फिर क्यों उस इलाके में चीनियों को आने-जाने के अवसर दिए जा रहे हैं? सवाल यह भी उठता है कि ऐसा हमारी केंद्र सरकार कहीं जानबूझकर तो नहीं कर रही है? मैं नहीं मानता कि हमारी सरकार के मंत्री इन तथ्यों से पूरी तरह से अनजान हैं और बच्चे हैं। आश्चर्य होता है कि हमारी सरकार को हो क्या गया है? क्यों उसे चीनी हमला नहीं दिखाई दे रहा? उसे तेल और सोने के आयात का बिल तो दिख रहा है लेकिन चीन-भारत के बीच लगातार बढ़ता और 2012-13 में 40.77 अरब डॉलर तक पहुँच गया व्यापार घाटा दिखाई नहीं दे रहा? आपको यह जानकर अचरज होगा कि 2001-02 में भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा मात्र 1.08 अरब डॉलर था। हमारी कीमत पर चीन फल-फूल रहा है और हमारी सरकार कोई सार्थक कदम उठाने के बदले उसके साथ प्यार की पींगे पढ़ रही हैं? केंद्र सरकार ने अब तक क्यों चीन से आयात होनेवाले 30000 करोड़ रुपए के मोबाइलों और हजारों करोड़ रुपए के अन्य इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के आयात पर रोक नहीं लगाई या आयात-कर नहीं बढ़ाया? कहीं हमारी केंद्र सरकार ने हमें और हमारे देश के हितों को चीन के हाथों बेच तो नहीं दिया है? जो लोग कागज के चंद टुकड़ों की खातिर भारत के पाताल,जमीन और आकाश पर अनगिनत घोटाले कर सकते हैं और फिर सबूत मिटाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय जैसे अतिसुरक्षित क्षेत्र से भी फाइलें चोरी करवा सकते हैं या कर सकते हैं वे क्या कुछ ज्यादा पैसा मिल जाने पर देश का ही एकमुश्त सौदा नहीं कर सकते? हमारे देश में कुछ लोग ईमान का सौदा करते हैं लेकिन जिनके पास ईमान है ही नहीं वे किसका सौदा करेंगे? क्या वो बेहिचक अपनी माँ और मातृभूमि को भी नहीं बेच डालेंगे?
मित्रों,याद कीजिए कि जब वर्ष 2004 में यूपीए की सरकार सत्ता में आई थी तब नेपाल में राजतंत्र हुआ करता था जो भारत के लिए मुफीद भी था परन्तु न जाने क्यों हमारी आत्मघाती सरकार ने सबकुछ समझते-बूझते हुए भी नेपाल में राजतंत्र का अंत हो जाने दिया और उसे थाली में सजाकर माओवादियों को उपहार में दे दिया। आज यह एक कटु सच्चाई है कि आज का नेपाल हमसे ज्यादा चीन के निकट है। इसी तरह से वर्ष 2004 में हम आर्थिक मोर्चे पर चीन से बहुत पीछे नहीं थे लेकिन आज हम उससे कई दशक पीछे हो चुके हैं। चीन जहाँ आज दुनिया की दूसरी आर्थिक महाशक्ति है हम फिर से अंतर्राष्ट्रीय भिखारी बन गए हैं। आज हमारी हालत 1991 से भी कहीं ज्यादा खराब हो चुकी है। क्या हमारी केंद्र सरकार का पूरा-का-पूरा मंत्रीमंडल पिछले साढ़े चार सालों में देश को आर्थिक मोर्चे पर कमजोर करने में जानबूझकर नहीं लगा हुआ है? क्या गार (General Anti Avoidance Rules) कानून लाते समय हमारे तत्कालीन वित्त मंत्री और वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को पता नहीं था कि यह कानून विदेशी निवेशकों को बिदका देगा? क्या 2005 में मनरेगा लाते समय हमारे वित्त मंत्री पी. चिदंबरम नहीं जानते थे कि इसके माध्यम से दोबारा सत्ता भले ही प्राप्त हो जाए देश की अर्थव्यवस्था को कोई लाभ नहीं होगा बल्कि उल्टे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा? जहाँ 1930 के दशक में अमेरिका में लागू किए गए न्यू डील से अमेरिका की सिंचाई-व्यवस्था को अभूतपूर्व लाभ हुआ मनरेगा से भारतीय अर्थव्यवस्था को सिर्फ हानि हुई लाभ कुछ भी नहीं हुआ और यह योजना राशि की बंदरबाँट बनकर रह गई।
मित्रों,क्या हमारी वर्तमान सरकार नहीं जानती है कि खाद्य सुरक्षा कानून से जहाँ गरीबों को मिलनेवाले खाद्यान्न में कमी आएगी वहीं सरकार का खर्च भी 30-40 हजार करोड़ रुपए तक बढ़ जाएगा जिसके परिणामस्वरूप पहले राजकोषीय घाटा बढ़ेगा और फिर बाद में महँगाई भी। इतना ही नहीं हमारी केंद्र सरकार यह भी भलीभाँति जानती है कि अभी संसद में विचाराधीन भूमि अधिग्रहण विधेयक के आने से अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी के इस घनघोर संकट काल में नए उद्योग स्थापित करने में न केवल बाधा आएगी बल्कि नए उद्योगों की स्थापना पूरी तरह से असंभव ही हो जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने जब सिर्फ गोवा में लौह-अयस्क की खुदाई पर रोक लगाई तो क्या कारण था कि भारत सरकार ने पूरे देश में इसकी खुदाई और निर्योत रोक दिया और व्यापार-घाटे को जान-बूझकर बढ़ जाने दिया? जबकि भारत में कोयले का अकूत भंडार है तब भी भारत सरकार ने कोयले के उत्पादन को क्यों नहीं बढ़ाया और उल्टे कोयले के आयात को क्यों प्रोत्साहित किया गया? आज हम बेवजह 20 हजार करोड़ रुपए का कोयला आयात करते हैं। हमारे रक्षा मंत्री किसी पेशेवर झूठे की तरह फरमा रहे हैं कि चीन सैन्य-मोर्चे पर हमसे डरने लगा है। क्या डरा हुआ पक्ष उल्टे जमीन पर कब्जा करता है?
मित्रों,अब तक आप यह अच्छी तरह से समझ गए होंगे कि हमारी अर्थव्यवस्था की बदहाली के लिए अंतर्राष्ट्रीय हालात कतई जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि उसे तो षड्यंत्रपूर्वक हमारी केंद्र सरकार द्वारा बर्बाद किया गया है। हमारी सैन्य-क्षेत्र में आत्मनिर्भरता स्वतः नष्ट नहीं हुई है َऔर हम आज दुनिया के सबसे बड़े हथियार-आयातक यूँ ही नहीं बने हैं वरन् इन सबके पीछे कमीशनखोरी तो है ही कदाचित् हमारी सुरक्षा को हमें धोखा देकर हमारे नीति-निर्माताओं ने चीन के हाथों बेच दिया है। अगर ऐसा नहीं है और हमारी सरकार अभी से भी मुझे और मेरे आरोपों को गलत साबित करना चाहती है तो मैं उसे खुली चुनौती देता हूँ कि वो अविलंब चीन से भारत में होनेवाले आयात पर प्रभावी रोक लगाए। याद रहे कि आज हम चीन के हाथों जितने रुपए का सामान बेचते हैं वो हमारे हाथों उससे कहीं 8 गुना ज्यादा का बेचता है। इतना ही नहीं जिस तरह से चीनी सेना हमारे क्षेत्रों पर कब्जा कर रही है जैसे कि उसने अभी लद्दाख में किया है वैसे ही भारतीय सेना को भी चीनी कब्जेवाले क्षेत्रों पर कब्जा करने की छूट दी जानी चाहिए। सीमा पर हमारी तैयारियों को पुख्ता किया जाए और युद्ध-स्तर पर सड़कें और रेलवे-लाईन बिछाई जाए। इन सबके लिए अगर देश में वित्तीय आपातकाल भी लगाना पड़े तो वो भी लगाया जाए। इतना ही नहीं केंद्र सरकार को भारत में भी विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण के लिए हरसंभव प्रयास करने चाहिए। इसके लिए अगर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को 100 प्रतिशत तक भी करना पड़े तो करना चाहिए।
मित्रों,मैं जानता हूँ कि हमारी वर्तमान सरकार कभी ऐसा नहीं करेगी। बल्कि मुझे तो यह भी लगता है कि आईएनएस सिंधुरक्षक दुर्घटना में भी चीन-पाक का हाथ है और हमारी सरकार मिलीभगत के चलते मामले को दबा रही है। हमारी सरकार बिक चुकी है और साथ ही हमें भी बेच चुकी है। अब तो इस सरकार ने एक घोटाला मास्टर को ही सीएजी बना दिया है। अब तो सीएजी कोई घोटाला उजागर करेगी ही नहीं। सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का? करो घोटाले,खूब करो,नंगा नृत्य करो देश की अर्थव्यवस्था के सीने पर क्योंकि अब घर की बात घर में ही रह जानेवाली है। भैया दाग अच्छे ही नहीं बहुत अच्छे हैं। ढूंढ़ों और दागियों को और बिठाओ सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर।
मित्रों,ऐसे में अगर 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी व पारिवारिक पार्टियाँ जिनमें जदयू,राजद,बसपा,सपा,सीपीएम,सीपीआई आदि शामिल हैं जीत जाती हैं तो यकीन मानिए कि हमारे प्यारे भारत को एक बार फिर से आर्थिक,भौगोलिक और राजनैतिक रूप से गुलाम होने से कोई नहीं बचा सकता है। फैसला आपके हाथों में हे कि आप एक आजाद देश का आजाद नागरिक बनकर रहना चाहते हैं या एक गुलाम राष्ट्र का गुलाम नागरिक बनकर?

मित्रों,इन दिनों दुर्भाग्यवश मीडिया से लेकर नुक्कड़ तक पर सबसे ज्यादा चर्चा जिस व्यक्ति की हो रही है वह एक प्रतिष्ठित हिन्दू संत है और उसका नाम है आशाराम बापू। मुझे इस व्यक्ति पर संदेह करीब दो दशक पहले पहले-पहले तब हुआ था जब मैंने बनारस में उसका पंचसितारा आश्रम देखा परंतु मैंने यह कभी सोंचा भी नहीं था कि यह आदमी इतना घृणित निकलेगा। आशाराम जैसे ढोंगी,पाखंडी और व्यभिचारी का इस कदर हिन्दुओं के बीच लोकप्रिय हो जाना कि उसके 2 करोड़ शिष्य हों हिन्दुओं के विवेक पर ही प्रश्न-चिन्ह लगाता है। जब रुपया गिरता है,जब चीन-पाकिस्तान हमारे देश की सीमाओं पर घुसपैठ करते हैं,जब कोई नेता महाघोटाला करता है या जब किसी नेता के खिलाफ सीबीआई आय से बहुत अधिक संपत्ति रखने के मामले को बंद करने की दिशा में पहल करती है तब तो भारत की गलियों में कोई इन्सान तो क्या कुत्ता तक नहीं भूँकता है और जब आशाराम जैसे पामर पर बलात्कार का मामला दर्ज भर होता है तो हजारों जनता उमड़ पड़ती है सड़कों पर लाठी-डंडा लेकर। जिस देश में इस तरह की अंधी जनता रहती हो और सरकार चुनती हो उस देश की दुर्गति नहीं होगी तो और क्या होगा?
मित्रों,आज सुबह आजतक पर मैंने भी आशाराम का एक स्टिंग ऑपरेशन देखा जिससे यह प्रमाणित हो जाता है कि आशाराम एक निहायत लंपट और कामुक ड्रैकुला है। इस वीडियो में उसने सचमुच अपनी पोती की उम्र की महिला पत्रकार को अपने साथ में अकेले जंगल जाने और सोने का आमंत्रण दिया है। प्रश्न उठता है कि क्या आशाराम को आदमी की श्रेणी में रखा जा सकता है? क्या वो राक्षस नहीं है? क्या कोई शैतान,अपराधी,नरपिशाच केवल संत का बाना धारण कर लेने से संत हो जाता है? क्या हम हिन्दुओं को अपना गुरू चुनने और उससे दीक्षा लेने में पूरी सावधानी नहीं रखनी चाहिए? क्या ईश्वर हमारे बाहर हैं,हमारे भीतर नहीं हैं जो हम उसे दर-दर ढूंढते फिरते हैं? क्या कोई दूसरा व्यक्ति किसी के ग्रह-नक्षत्रों को ठीक कर सकता है? क्या ईश्वर और भक्त के बीच किसी बिचौलिये की उपस्थिति अनिवार्य है? क्या भक्ति पूर्णतया व्यक्तिगत मामला नहीं है?
मित्रों,आजकल एक बार फिर से निर्मल बाबा के कृपा बेचने का धंधा चल निकला है। हमारे टीवी चैनलों की धनलोलुपता से फायदा उठाकर यह शैतान फिर से जनता को ठगने में सफल होने लगा है। जिस दिन हम हिन्दू यह समझ लेंगे कि सफलता को कोई शॉर्ट कट नहीं होता और परिश्रम का कोई विकल्प नहीं होता उसी दिन चाहे आशाराम हों या निर्मल बाबा या फिर कोई और इन सभी ठगों,साधू के वेश में छिपे राक्षसों की दुकानों पर ताला लग जाएगा। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं कहा है कि सर्वधर्मपरित्यज्यमामेकंशरणंब्रज फिर हम क्यों किसी हाड़-मांस के पुतले को भगवान मान लेते हैं?
मित्रों,मुझे महनार में गंगा तट पर एक बार कोई ढाई दशक पहले परम संत स्वामी सच्चिदानंद सरस्वती के साक्षात्कार का अवसर मिला था। सरस्वती जी प्रत्येक मनुष्य,प्रत्येक जीव को साक्षात् नारायण समझते थे और नारायण कहकर ही संबोधित भी करते थे। अति विनम्र और मृदुभाषी थे सरस्वती जी। पूरी तरह से निराभिमानी। उनके मन में न तो कभी मुख्यमंत्रियों से मिलने की अभिलाषा जागी और न तो ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जीने की। उनके मन में काम या अर्थ वासना के लिए तो दूर-दूर तक कोई स्थान ही नहीं था। किसी ने कुछ दे दिया तो खा लेते वरना भूखे सो जाते। किसी भक्त की दी हुई एक नाव ही उनका घर और सबकुछ था। लोग उनको नैया वाला बाबा कहते। उन्होंने किसी को दीक्षा नहीं दी और न तो शिष्य ही बनाया। जो हर इन्सान को नारायण समझेगा वह भला ऐसा कर भी कैसे सकता है?
मित्रों,संत ऐसे होते हैं। संन्यासी का मतलब होता है पूर्ण त्यागी। जिसके सैंकड़ों आश्रम हों,जिसके पास हजारों एकड़ महँगी जमीन हो,राजाओं की तरह जिसके हजारों सेवक-सेविकाएँ हों और जो एकांत में किशोर-युवा लड़कियों के साथ कथित साधना करता हो वह कैसे संत या संन्यासी हो सकता है? सवाल यह भी उठता है कि आशाराम तो लगातार विवादों में घिरे रहे हैं। उन पर कभी जमीन हड़पने तो कभी तंत्र-साधना के दौरान मासूम बच्चों की बलि देने तो कभी किसी श्रद्धालु को लात मारने और गालियाँ देने के आरोप लगातार लगते रहे हैं। अब जबकि उनका सबसे विकृत और घिनौना रूप भी अनावृत हो गया है तब भी उनके करोड़ों कथित भक्तों की आँखें क्यों नहीं खुल रही हैं? धिक्कार है ऐसे अंधे भक्तों पर,धिक्कार है ऐसे धर्म पर भी जिसके करोड़ों अनुयायी ऐसे महामूर्ख हों,आदमी नहीं भेड़ हों।

मित्रों,भारतीय अर्थव्यवस्था के गहरे संकट में फंसने की आशंका सच साबित हो रही है। सरकार में छाये भ्रष्टाचार,नीतिगत जड़ता और फैसले लेने में देरी के चलते चालू वित्त वर्ष 2013-14 की पहली तिमाही में आर्थिक विकास दर ने भी रुपये की तरह गोता लगा दिया है। इस अवधि में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर घटकर मात्र 4.4 फीसद पर सिमट गई है। बीते चार साल में किसी एक तिमाही में अर्थव्यवस्था की यह सबसे कम रफ्तार है। बीते एक साल में आर्थिक हालात तेजी से खराब हुए हैं। वित्त वर्ष 2012-13 की पहली तिमाही में आर्थिक विकास दर 5.4 फीसद रही थी। महंगे कर्ज और रुपये के गोता लगाने से न सिर्फ औद्योगिक उत्पादन व खनन क्षेत्र की रफ्तार घटाई, बल्कि सरकार के फैसलों की सुस्ती का असर देश में होने वाले निवेश पर भी पड़ा है। बीते वित्त वर्ष के मुकाबले चालू साल की पहली तिमाही में कुल निवेश 1.4 फीसद घट गया है। पहली तिमाही में कारखानों की सुस्ती से विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर 1.2 फीसद नीचे आ गई है। यही हाल खनन क्षेत्र का भी रहा है। इसकी विकास दर 2.8 फीसदी गिर गई। बीते साल विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर में एक फीसद की कमी आई थी। खनन क्षेत्र की विकास दर 0.4 फीसद रही थी। सरकार द्वारा जारी पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़ों के मुताबिक कृषि से भी जीडीपी को बहुत अधिक मदद नहीं मिली और इस क्षेत्र की विकास दर 2.7 फीसद पर सिमट गई। बीते वित्त वर्ष की इस अवधि में कृषि क्षेत्र ने 2.9 फीसद की बढ़त हासिल की थी। वित्तीय और सामाजिक सेवा क्षेत्रों ने अवश्य सरकार को कुछ राहत दी है। लेकिन ऊर्जा और कंस्ट्रक्शन क्षेत्र की विकास दर ने सरकार को निराश किया है। बिजली, गैस क्षेत्र की विकास दर बीते साल के 6.2 से घटकर पहली तिमाही में 3.7 फीसद पर आ गई है। कंस्ट्रक्शन क्षेत्र की विकास दर सात फीसद से लुढ़कती हुई 2.8 फीसद पर आ टिकी है। अर्थव्यवस्था में बदहाली का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहली तिमाही में सकल पूंजी निर्माण की रफ्तार भी धीमी हुई है। बीते साल की पहली तिमाही में पूंजी निर्माण यानी निवेश की दर 33.8 फीसद रही थी। लेकिन चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में यह 32.6 फीसद पर रुक गई है। इसका मतलब है कि देश में घरेलू निवेश की रफ्तार रुक गई है। यह गिरावट निजी और सरकारी दोनों तरह के निवेश में हुई है।
मित्रों, हमारी केंद्र सरकार किसी अफीमची की तरह अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार और शर्मनाक हालत के बावजूद पांच करोड़ लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने की बात कर रही है। जबकि सच तो यह है कि अर्थव्यवस्था में नरमी के चलते भारत में रोजगार के नए अवसरों के सृजन में कमी आई है। 2012-13 की अक्टूबर-मार्च अवधि के दौरान देश में रोजगार के नए अवसरों के सृजन की रफ्तार 14.1 प्रतिशत तक घट गई और इस दौरान 2.72 लाख रोजगार पैदा हुए। उद्योग मंडल एसोचैम द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक, अक्टूबर-मार्च, 2011 -12 के दौरान 3.17 लाख नौकरियां पैदा हुई थीं। सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत की नरम पड़ती आर्थिक वृद्धि दर और नीतिगत अनिश्चितताओं से नए निवेश आने की रफ्तार धीमी पड़ी है जिससे देशभर में रोजगार सृजन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इतना ही नहीं हमारी सर्वनाशी केंद्र सरकार इस लोकसभा चुनावों में 1971 की तरह एक बार फिर गरीबी हटाओ का नारा देनेवाली है। सिर्फ नारों से अगर गरीबी को भागना होता तो वो कब की भाग चुकी होती। सरकार को खैरात बाँटने के बदले देश के लिए लाभकारी रोजगारों के सृजन के उपाय करने चाहिए क्योंकि दुनिया के सबसे युवा राष्ट्र भारत में बेराजगारी बढ़ने लगी है। कोरे नारों से न तो आज तक गरीबी का बाल बाँका हुआ है और न ही भविष्य में होने वाला ही है।
मित्रों,सरकार ने अर्थव्यवस्था के इस संक्रमण काल में राजकोषीय घाटा और मुद्रास्फीति को बढ़ानेवाला खाद्य सुरक्षा बिल और नए उद्योगों की स्थापना को लगभग असंभव बना देना वाला भूमि अधिग्रहण विधेयक अभी-अभी पारित करवाया है। ये तो वही बात हुई कि कोई डायबिटीज का मरीज हो और डॉक्टर उसको जान-बूझकर चीनी खिलाए या कोई सरे बाजार लुट रहा हो और लोगों से मदद की गुहार लगा रहा हो और लोग बजाए उसकी मदद करने के उसको पीटने लगें। अर्थव्यवस्था की वर्तमान दुरावस्था ने सार्वकालिक सत्य को जरूर हमारे सामने एक बार फिर से प्रकट कर दिया है और वो यह है कि हम चाहे जितना भी आर्थिक सुधार कर लें परन्तु तब तक हमारे देश का कुछ भी भला नहीं हो सकता जब तक कि उनको लागू करनेवाले हाथ ईमानदार न हों। वरना सुधारों की बटलोही से देश का कल्याण बाहर नहीं निकलेगा,निकलेगा तो सिर्फ आर्थिक घोटाला।
मित्रों,मैं अपने पूर्व के दो आलेखों समय की जरुरत है अध्यक्षीय शासन प्रणाली (15 जनवरी,2013) और लोकतंत्र का मंदिर नहीं कैदखाना है संसद (6 अगस्त,2013) में निवेदन कर चुका हूँ कि हमारी संसद और संसदीय प्रणाली अब देश पर छाये संकटों से निबटने में सर्वथा असमर्थ है और उसने हमारे लोकतंत्र को ही बंधक बना लिया है। अगर सरकार द्वारा उठाया गया कदम देशविरोधी या सामयिक नहीं था तो फिर विपक्ष ने संसद में सरकार का समर्थन क्यों किया? अगर खाद्य सुरक्षा विधेयक में कोई नई बात नहीं थी बल्कि वह भोजन छीनने वाला कानून था या वोट सुरक्षा बिल था या उससे राजकोषीय घाटा के बढ़ने की संभावना थी तो फिर क्या मजबूरी थी विपक्ष की उसके पक्ष में मतदान करने की? इसी तरह विपक्ष ने सरकार से कदम मिलाते हुए भूमि अधिग्रहण विधेयक,सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक (जिसके द्वारा राजनैतिक दलों को इसकी परिधि से बाहर कर दिया गया) और जन प्रतिनिधित्व कानून संशोधन विधेयक (जिससे दागी नेताओं के चुनाव लड़ने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का आदेश निरस्त हो गया) पर भी विधेयकों के पक्ष में मतदान किया और यह साबित कर दिया कि आज की तारीख में पूरा-का-पूरा संसद देशविरोधी मानसिकता से ग्रस्त है। ऐसे में हम कैसे यह उम्मीद रख सकते हैं कि भविष्य में सत्ता में आने के बाद विपक्ष देशोद्धार की दिशा में अलोकप्रिय व कड़वे कदम उठाएगा? अच्छा तो होता कि हम अगले चुनावों में सरकार के बदलने का इंतजार करने के बजाए भारत में नए तरह का अमेरिका सदृश अध्यक्षीय लोकतंत्र की स्थापना के लिए एक वृहत आंदोलन शुरू करते। परन्तु सवाल यह उठता है कि ऐसा करेगा कौन? कहाँ से आएगा ऐसा विश्वसनीय नेतृत्व? बेशक अन्ना हजारे ऐसा कर सकते थे। उन्होंने कुछ दिन पहले अमेरिका की धरती से मेरे इन विचारों का समर्थन भी किया है लेकिन वे जिस तरह बार-बार हमारे वर्तमान भारत के सत्तालोलुप नेताओं कभी नीतीश तो कभी केजरीवाल पर मोहित हो जा रहे हैं उससे एक आम भारतीय का मन उनको लेकर सशंकित हो उठा है। फिर भी मैं समझता हूँ कि अब हम देशभक्तों के लिए वेट एंड वाच का समय नहीं रहा अब कुछ कर गुजरने का समय आ गया है। हमें अब दूसरे स्वतंत्रता संग्राम के लिए कमर कस लेना होगा जो होगा संसद से हमारे लोकतंत्र की आजादी के लिए। ऐसा करके ही हम चीन और पाकिस्तान जैसे गद्दार पड़ोसियों से अपनी सीमाओं व सोनिया,मनमोहन जैसे देशद्रोही नेताओं से अपनी राष्ट्रीय संपदा की रक्षा कर सकते हैं और यह साबित भी कर सकते हैं कि भारत की आजादी के समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने गलत कहा था कि अभी भारतीय अपनी स्वतंत्रता और लोकतंत्र की रक्षा करने के योग्य नहीं हुए हैं।
अंत में एक ताजातरीन दोहा अर्ज कर रहा हूँ-
रुपया मरा बाजार में
मांगे सरकार का साथ।
सरकार ने की गजब मदद
गले पर रक्खा हाथ।।

मित्रों,जब वर्ष 2004 में लोकसभा चुनावों के बाद इटली से आयातित कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने परम-त्यागमयी महिला होने का परिचय देते हुए तब तक ईमानदार,सज्जन और गैरराजनैतिक माने जाने वाले अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया तब पूरे भारत की जनता को लगा कि अब भारतीय अर्थव्यवस्था को पंख लगने के दिन आ गए हैं। वर्ष 2004 से वर्ष 2009 तक उनकी पहली पारी में देश की जीडीपी लगातार तेज रफ्तार में दौड़ती रही लेकिन जैसे ही दूसरी पारी शुरू हुई देश के विकास को न केवल ब्रेक लग गया बल्कि वो रिवर्स गियर में द्रुत गति से चलने लगा। धीरे-धीरे जैसे-जैसे वक्त गुजरा एक-एक करके एक से बढ़कर एक महाघोटाले सामने आने लगे और माननीय मनमोहन सिंह के चेहरे पर की गई ईमानदारी और सज्जनता की सुनहरी कलई उतरने लगी और आज स्थिति यह है कि उनका चेहरा जनता की नजरों में पूरी तरह से स्याह पड़ चुका है।
मित्रों,भारतीय रुपये की तरह मात्र चार वर्षों में मनमोहन सिंह की छवि का भारी और तीव्र गति से अवमूल्यन हुआ है और अब कुछ भी पर्दे में नहीं रह गया है। सबकुछ दुनिया के सामने आ गया है। आज की तारीख में हमारे देश के कथित प्रधानमंत्री जी काफी दुःखी हैं। उनको देश की बदहाल हालत बिल्कुल भी परेशान नहीं कर रही है वे तो सिर्फ इसलिए दुःखी हैं कि संसद में विपक्ष उनको चोर क्यों कह रहा है? उधर विपक्ष भी उनके ऐतराज पर ऐतराज जताते हुए उनसे पूछ रहा है कि चोर को चोर न कहें तो क्या कहें? गलती दोनों तरफ से बराबर की हो रही है। मनमोहन को तो परेशान होने के बदले खुश होना चाहिए कि उनको विपक्ष द्वारा चोर के साथ-साथ झूठा,मक्कार,भ्रष्ट,ढोंगी,धोखेबाज,गैरजिम्मेदार इत्यादि नहीं कहा जा रहा है जबकि कायदे से वे इन विशेषणों से विभूषित हो सकने की योग्यता बहुत समय पहले ही अर्जित कर चुके हैं।
मित्रों,वहीं विपक्ष को भी मनमोहन सिंह जी को कम करके नहीं आँकना चाहिए और सिर्फ चोर नहीं कहना चाहिए। आखिर उन्होंने काफी मेहनत करके दर्जनों घोटाले करवाए। फिर फाइलें गायब करवाईं या जलवाईं और बिडंबना यह है कि उनके इन महान कार्यों में पानी की तरह पसीना बहाने के बाद भी उनकी महानता को विपक्ष कम करके बता रहा है। क्या विपक्ष भूल गया है कि अब मनमोहन सिंह कितनी खूबसूरती से झूठ बोल लेते हैं और मिनटभर में बेझिझक ए.राजा,अश्विनी कुमार,बंसल और कलमाड़ी को पाक-साफ बता देते हैं? क्या विपक्ष को यह भी याद नहीं कि मनमोहन सिंह आज भी किस तरह चेहरे पर उदासी ओढ़कर खुद के देश और अपने कर्त्तव्यों के प्रति ईमानदार होने का ढोंग कर लेते हैं?
मित्रों,कई बार इन्सान से गलतियाँ हो जाया करती हैं। फिर भी विपक्ष का यह अपराध तो अक्षम्य है कि उसने नारे लगाते समय महान मनमोहन के इस गुण को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया कि वे किस अदा और बेशर्मी से सर्वोच्च न्यायालय,सीएजी,आरबीआई इत्यादि महत्त्वपूर्ण संस्थाओं पर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं निभाने और लक्ष्मण-रेखा पार करने का आरोप लगाते रहे हैं। मानो उनकी सरकार की विफलता के लिए वे नहीं ये संस्थाएँ ही जिम्मेदार हों। मनमोहन सिंह की गैर-जिम्मेदारी का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि उनके मंत्रालय से फाइलें गायब हो जाती हैं और वे संसद में फरमाते हैं कि मैंने फाइलों की सुरक्षा का ठेका नहीं ले रखा है? अगर वे ऐसा कहते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात भी नहीं है क्योंकि जहाँ तक मैं समझता हूँ कि श्री मनमोहन सिंह जी ने सपने में भी कभी खुद को भारत का प्रधानमंत्री समझा ही नहीं है बल्कि उन्होंने तो खुद को सिर्फ सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री समझा और लगातार अपने भाषणों में बस यही दोहराते रहे कि देश में यह होना चाहिए और ऐसे होना चाहिए। अगर वे खुद को भारत का प्रधानमंत्री समझते तो उनकी भाषा कुछ इस तरह होती कि मैं यह करूंगा और ऐसे करूंगा,मैंने यह किया और ऐसे किया। मनमोहन कहते रहे कि अच्छा होना चाहिए और स्वयं करते रहे बुरा। मनमोहन के जहाँ तक चोर होने का सवाल है तो वे चोर तो हैं ही और कोई मामूली चोर नहीं हैं। उन्होंने भारत के सभी देशप्रेमियों की नींद और चैन एकसाथ चुरा ली है। मैं चुनौती देता हूँ कि है दुनिया की किसी भी खुफिया एजेंसी में दम तो उनके द्वारा दिनदहाड़े चोरी की गई इन अमूल्य वस्तुओं को बरामद करके बताए।
मित्रों,मैं अंत में विपक्ष से निवेदन करता हूँ कि उनको मनमोहन सिंह से तहेदिल से माफी मांगनी चाहिए क्योंकि उसने हमारे हरफनमौला कथित पीएम को सिर्फ चोर कहने का गंभीर अपराध किया है। जबकि देश की जनता उनको चोर के साथ-साथ झूठा,भ्रष्ट,ढोंगी,धोखेबाज,मक्कार और गैरजिम्मेदार भी मान चुकी है तो फिर विपक्ष को किसने यह अधिकार दे दिया कि वो महान शैतानावतार मनमोहन सिंह को अंडरस्टीमेट करे और ऐसा करके अपमानित करे? दुनिया में कृत्रिम बुद्धि से युक्त पहले यंत्र-मानव मनमोहन सिंह जी को यह शिकायत भी है कि संसार में सिर्फ भारत में भी संसद के बेल में आकर विपक्ष प्रधानमंत्री चोर है का नारा लगाता है। मैं उनसे अर्ज करता हूँ कि प्यारे मनमोहन आपको तो खुश होना चाहिए कि आप भारत जैसे मुर्दादिल और नपुंसक देश के प्रधानमंत्री हैं वरना अगर आप किसी यूरोपीय देश के प्रधानमंत्री होते और आपने वहाँ वैसे ही और उतने ही महान कार्य किए होते जितने कि भारत में किए हैं तो उस देश की जनता अपने घरों में बैठी नहीं रहती और सड़कों पर उतरकर आपके घर समेत पूरी दिल्ली को कई साल पहले घेर चुकी होती और फिर आप चार साल तो क्या चार दिन के लिए भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नहीं रह पाते और पिछले कई सालों से अपने प्रायोजक गांधी परिवार और अपने अधिकांश मंत्रिमंडल के साथ तिहाड़ जेल में अपने करकमलों से मुलायम-मुलायम रोटियाँ तोड़ रहे होते।

मित्रों,पिछले कुछ महीनों से हमारी मीडिया और हमारी केंद्र सरकार भारत-चीन सीमा पर चीन की आक्रामक गतिविधियों से इस कदर भयभीत हैं जैसे चीन कोई अजगर (ड्रैगन) हो और भारत कोई मेमना। जबकि असलियत तो यह है कि न तो चीन अजगर है और न ही भारत मेमना। भले ही चीन सैन्य तैयारियों के मामले में हमसे दो दशक आगे है,भले ही उसका सालाना रक्षा बजट हमसे 15 गुना ज्यादा है,भले ही उसकी जीडीपी हमसे 5 गुना अधिक है लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि हम युद्ध से पहले ही मनोवैज्ञानिक तौर पर पराजित हो जाएँ। इतिहास गवाह है कि वर्ष 1979 ई. के चीन-वियतनाम युद्ध में एक छोटे-से देश जिसका क्षेत्रफल मात्र सवा तीन लाख वर्ग किलोमीटर है और जिसकी वर्तमान समय में आबादी मात्र 9 करोड़ है के सामने विशालकाय चीन को मुँह की खानी पड़ी थी। हम चाहे सैन्य-संसाधन में कितने भी कमजोर क्यों न हों तो भी हरेक दृष्टिकोण से हम वियतनाम से तो कई गुना ज्यादा मजबूत हैं। फिर चीन से भय कैसा? चीन का सामना करने में घबराहट क्यों और कैसी? संस्कृत में एक कहावत है कि जब तक आपदा सामने न जाए तब तक हमें उससे नहीं डरना चाहिए और जब सामने आ जाए तो डरने से कुछ लाभ नहीं होनेवाला इसलिए बुद्धिमत्ता से उसका सामना करना चाहिए।
मित्रों,जब शत्रु अत्यंत क्रूर और निर्दय हो और इस कदर नास्तिक हो कि बंदूक को ही अपना भगवान मानता हो तो उसके सामने गिड़गिड़ाने और दंडवत होने से तो और भी कुछ हासिल नहीं होनेवाला है सिवाय जलालत के। इतिहास गवाह है कि लड़ाइयाँ साजो-सामान से नहीं जीती जातीं जज्बे से जीती जाती हैं। 1965 की लड़ाई में निश्चित रूप से पाकिस्तान के पास हमसे अच्छे अस्त्र-शस्त्र थे लेकिन लाल बहादुर शास्त्री के तेजस्वी नेतृत्व ने दोनों सेनाओं के बीच बहुत बड़ा फर्क पैदा कर दिया। 1962 में हम चीन को कड़ी टक्कर दे सकते थे लेकिन तब नेहरू इस कदर भयग्रस्त थे कि बिना लड़े ही उन्होंने गौहाटी तक से सेना वापस बुला ली थी। दुर्भाग्यवश हमारा वर्तमान राजनैतिक नेतृत्व भी उसी नेहरूवादी,पलायनवादी मानसिकता का शिकार है जिसके चलते हमें 1962 में अकारण मुँह की खानी पड़ी थी। कभी-कभी जोरदार टक्कर मारने के लिए पीछे भी हटना पड़ता है लेकिन हमारी वर्तमान सरकार तो ऐसा करती हुई भी नहीं दिखती बल्कि वो बेवजह पीछे हटती जा रही है और चीन के हाथों अपमान-पर-अपमान बर्दाश्त करती जा रही है।
मित्रों,नेपोलियन बोनापार्ट के पास कोई दुनिया या यूरोप की सबसे बड़ी सेना नहीं थी लेकिन उसने अपनी यूरोपजयी सेना को मानसिक तौर पर काफी सख्त बना दिया था। उसके जोशीले भाषण सेना पर जादू कर जाते थे और तब वे तब तक अलंघ्य समझे जानेवाले आल्प्स पर्वत को भी छोटा-सा टीला समझकर आसानी से पार कर जाते थे। बाबरनामा बताता है कि 17 मार्च,1527 के खानवा के युद्ध में एक समय बाबर की सेना मैदान छोड़कर भाग निकली थी लेकिन बाबर का मनोबल तब भी ऊँचा था। बाबर ने अपनी हताश सेना के सामने ही अपने शराब के प्यालों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और फिर कभी शराब नहीं पीने की प्रतिज्ञा की। इस छोटी-सी घटना का उसकी सेना पर जादुई असर हुआ और एक छोटी-सी सेना ने सही व्यूह-रचना का उपयोग कर अपने से कई गुना बड़ी सेना हरा दिया। छत्रपति शिवाजी को ही लीजिए जिन्होंने सह्याद्रि में महान मुगलों को लोहे के चने चबवा दिए थे। शिवा ने अपनी सूक्ष्म बुद्धि और छापेमार रणनीति से मुगल सेना की विशालता को ही उसकी कमजोरी बना दिया था।
मित्रों,इसलिए मैं कहता हूँ कि विश्वास रखिए अभी भी देर नहीं हुई है। बस हमें अपने प्रतिरक्षा सेक्टर की ओवरहॉलिंग करनी होगी। हमें अल्पकालीन के साथ-साथ दीर्घकालीन रणनीतियाँ भी बनानी होंगी। 1990 के दशक में कलाम साहब के नेतृत्व में बनी एक कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार हमें जहाँ वर्ष 2005 तक 70% रक्षा निर्माण खुद करना था और 30% ही आयात करना था आज हम अपनी जरुरतों का 70% आयात करते हैं। पूर्वनिर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम हमें नेता,अफसर और सैन्य-संस्थानों के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित करना होगा। फिर हमें निजी क्षेत्र के लिए प्रतिरक्षा क्षेत्र को भी खोलना होगा। विदेशों से साजो-सामान मंगाने पर हमें दोगुना खर्च करना पड़ता है। वर्ष 2006 में पूरे विश्व के हथियार आयात में हमारी हिस्सेदारी 9% थी जिसको हम बदल सकते हैं। इसके लिए हमें प्रतिरक्षा क्षेत्र को भी यथासंभव विदेशी निवेशकों के लिए खोलना होगा। हमें बेहतरीन तकनीकी से लैस हथियारों के आयात को जारी रखते हुए आत्मनिर्भरता की ओर तेज गति से कदम बढ़ाना होगा और आलतू-फालतू सामानों के आयात और निर्माण पर व्यय करने से बचना होगा। सिर्फ मिसाइलें दागने और परमाणु हथियार इकट्ठा कर लेने से हमें कुछ भी हासिल नहीं हो्गा। हमें परंपरागत हथियारों और तरीकों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करना चाहिए। सिर्फ सही जगह पर,सही साजो-सामान पर पैसा खर्च करना होगा। हमें रणनीतिक मामलों में योजना बनाते समय वियतनाम,ईजराइल और जापान जैसे उन देशों की मदद भी लेनी होगी जो रणनीतियाँ बनाने के फन में माहिर हैं और जिन्होंने कभी-न-कभी भूतकाल में मदांध चीन को पराजित किया है। इसके साथ ही हमें अपने उन तजुर्बेकार जनरलों और सेनानायकों की सलाहों पर भी काफी संजीदगी से अमल करना होगा जिन्होंने 1962,65,71 और 99 की लड़ाइयों में सक्रिय भागीदारी की है।
मित्रों,चीन की बात करते समय हमें यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि अगर वियनामियों की तरह जीवट और समुचित व सामयिक रणनीति बनाकर उस पर पूरी गंभीरता से अमल किया जाए तो सीमित साधनों के बूते भी चीन ही नहीं महाशक्ति अमेरिका को भी युद्ध के मैदान में हराया जा सकता है। हमें चीन की बात करते समय यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारा वर्तमान राजनैतिक नेतृत्व भले ही चीन के भय से काँप रहा हो हमारे तीनों सेनाओं के जवानों का मनोबल हमेशा की तरह आठवें आसमान पर है। हम दुनिया के सबसे युवा राष्ट्र हैं और हमारा एक-एक युवा मर-मिटेगा मगर देश को अपमान का मुँह कभी देखने नहीं देगा। हमें आज भी यह बात याद है कि कभी हमारे जवानों की हिम्मत और बहादुरी की प्रशंसा करते हुए इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने कहा था अगर उन्हें आधी भारतीय सेना दे दी जाए तो वे इसके बूते पूरी दुनिया को जीतकर दिखा सकते हैं।
मित्रों,मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि भयभीत होने या घबराने से हमारे राजनैतिक नेतृत्व को कोई लाभ नहीं होगा। हमें होश को बनाकर और बचाकर रखना होगा और जोश को भी। फिर अकेले चीन तो क्या हम एक साथ चीन और पाकिस्तान दोनों को ही पराजित कर सकते हैं। परन्तु हमारे गले में विजयश्री तभी वरमाला डालेगी जब हमारा नेतृत्व लाल बहादुर शास्त्री की तरह वास्तव में नेशन फर्स्ट एंड लास्ट की नीति पर चले जो हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री और यूपीए के सत्ता में रहते संभव ही नहीं है। मनमोहन सिंह और इन दिनों की कांग्रेस पार्टी के लिए तो सत्ता और सत्ता से उपजनेवाला कालाधन ही अथ भी है और इति भी। उनकी प्राथमिकता सूची में देश और देशहित कहीं है ही नहीं।

मित्रों,मई महीने का पहला सप्ताह था। एक महीना होने को था व्यवहार न्यायालय,हाजीपुर से हमारी जमीन की दखलदहानी का पत्र एसडीएम,महनार को गए। हमने इस बीच पत्रोत्तर के लिए महनार,अंचलाधिकारी के दफ्तर में क्लर्क श्री देवानंद सिंह से संपर्क भी किया। फोन करने पर वे रोज कहते कि आज मैं एसडीएम के नाजिर से जरूर बात करूंगा। पिताजी तो काम के लिए कुछ लेने-देने को भी तैयार थे। इसी बीच हमारा एक पूर्वपरिचित फेंकू मुकेश प्रभाकर हमारे डेरे पर आया और झूठ-मूठ के ईधर-उधर फोन घुमाने लगा। हालाँकि उस समय मैं यूजीसी नेट की तैयारी में पूरी गंभीरता से लगा हुआ था लेकिन अब मामला मेरे लिए भी असह्य होने लगा था।
मित्रों,मैंने टेलीफोन डायरेक्टरी से महनार के एसडीएम का लैंडलाईन का नंबर निकाला और डायल कर दिया। उधर से सुझाव आया कि आप अगर पत्रकार हैं तो सीधे उनके मोबाईल पर बात क्यों नहीं करते? मैंने उन्हीं महाशय से नंबर लेकर फिर से डायल किया। फोन उठानेवाले स्वयं एसडीएम साहब थे। मैंने उनसे विनम्र शब्दों में कहा कि पिछले एक महीने से हमारा एक पत्र पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में आपके कार्यालय में पड़ा हुआ है। पत्र-संख्या भी बताई। कुछ देर बाद एसडीएम साहब ने उधर से ही फोन कर मुझे बताया कि पत्र को उन्होंने बहुत ढुंढवाया लेकिन मिला नहीं सो मैं खुद ही पत्र की कॉपी लेकर आ जाऊँ।
मित्रों,सच कहूँ तो तब तक अफसरों को लेकर मेरी अवधारणा अच्छी नहीं थी सो मैं उनसे मिलने-जुलने से यथासंभव बचता ही था। उसी दिन 4 मई को मैंने न्यायालय से पत्र की कॉपी प्राप्त की और परसों होकर 6 मई,2013 को फर्स्ट ऑवर में ही मैं एसडीएम साहब के कार्यालय पर जा धमका। तब तक वे कार्यालय में आए नहीं थे और मैंने तब तक नाश्ता भी नहीं किया था। सो परिसर के बाहर सड़क पर जाकर नाश्ता-पानी करने लगा। लौटा तो वे अपने कार्यालय में विराजमान हो चुके थे। मैंने एक चिट पर अपना नाम लिखकर दरबान को दिया। तुरंत बुलावा आया। तब महनार नगर पंचायत के कुछ मोटी चमड़ीवाले नेता उनसे पिछले कई महीने से जन्म-मृत्यु प्रमाण-पत्र जारी नहीं होने और इस प्रकार 10000 प्रमाण-पत्रों के लंबित होने की शिकायत कर रहे थे। उनको विदा करने के बाद उन्होंने मुझसे पत्र की कॉपी मांगी और नाजिर कैलाश बाबू को तत्काल सीओ,महनार अनिल कुमार सिंह को पत्र लिखकर उनसे उनका एक दिन का वेतन पत्र द्वारा बताने का आदेश देने को कहा। इस बीच मैं उनके पास ही बैठा रहा। तब उन्होंने चपरासी को भेजकर बीडीओ,महनार प्रवीण कुमार सिन्हा को बुला लाने को कहा। यहाँ मैं आपको बता दूँ कि महनार में अनुमंडल,प्रखंड और अंचल कार्यालय एक ही परिसर में है। बातचीत के दौरान एसडीएम संदीप शेखर प्रियदर्शी ने मुझे बताया कि डीएम जितेन्द्र प्रसाद जी ने उनको महनार में ही रहने को कहा है। उनसे पहले कोई एसडीएम महनार में रहा नहीं। पटना या हाजीपुर से आता-जाता रहा। अभी परिसर में ही स्थित कृषि भवन में उन्होंने अपना आवास बनाया है। एक अकेले के लिए कितनी जगह चाहिए ही? पहली रात को अंधेरे में जब वे अकेले सोये हुए थे तो बर्रे ने उनको डंक मार दिया। पहले तो वे डर गए कि कहीं साँप ने तो नहीं काट लिया लेकिन बाद में खयाल आया कि वे तो प्रथम तल पर हैं सो यहाँ तो साँप आएगा नहीं।
मित्रों,इसी बीच बीडीओ,महनार प्रवीण कुमार सिन्हा पसीना पोंछते हुए हाजिर हुए। फिर शुरू हुआ डाँट-फटकार का लंबा दौर। उनसे प्रियदर्शी जी ने मेरे सामने ही पूछा कि क्या वे खुद को जनता का मालिक समझते हैं? क्या बीडीओ ऑफिस उनके बाबूजी का दालान है? उनको बड़े ही कठोर शब्दों में उन्होंने समझाया कि वे जनता के नौकर हैं मालिक नहीं और आदेश दिया कि दो दिनों में सारे पेंडिंग प्रमाण-पत्रों को निर्गत करें।
मित्रों,इसी बीच नाजिर कैलाश बाबू उपस्थित हुए और प्रियदर्शी जी से पहले के एसडीएम की बड़ाई करने लगे। प्रियदर्शी जी ने उनको भी जमकर लताड़ लगाई और कहा कि उनको अच्छी तरह से पता है कि पिछले एसडीएम किस तरह से काम करते थे। उस समय तो कार्यालय में आनेवाली चिट्ठियाँ एसडीएम की गाड़ी में ही उनके साथ ही घूमती रह जाती थीं और बाद में फेंक दी जाती थीं। उन्होंने नाजिर बाबू से मेरे काम के बारे में पूछा तो बताया गया कि पत्र अभी टाईप हो रहा है। थोड़ी देर में पत्र आ गया और तत्क्षण प्रियदर्शी जी ने उस पर हस्ताक्षर करके मुझे थमा दिया और कहा कि मैं खुद ही जाकर सीओ,महनार अनिल कुमार सिंह से पत्र का जवाब ले आऊँ। मैं जब सीओ कार्यालय पहुँचा तो सीओ अपनी कुर्सी से गायब मिले। वे तब अपने बड़ा बाबू के कक्ष में उनके सामने की कुर्सी पर बैठे हुए थे। मैंने जब उनको पत्र देकर उसका तुरंत जवाब देने को कहा तो उन्होंने टालू अंदाज में कहा कि मैं एक सप्ताह बाद आऊँ क्योंकि आज काम का हो पाना संभव ही नहीं है। फिर मैंने प्रियदर्शी जी को फोन लगाया और सीओ की उनसे बात कराई। डाँट-फटकार का तेज असर हुआ और 5 मिनट में ही पत्र का जवाब मेरे हाथों में था। फिर मैंने रसीद कटवाया और घर लौट आया। कल होकर न्यायालय से पता चला कि सिर्फ रसीद से काम नहीं चलेगा एसडीएम के यहाँ से एक पत्र भी चाहिए कोर्ट के नाम से।
मित्रों, मैंने फिर से एसडीएम साहब से बात की और 9 मई को मिलने पहुँचा। इस बार भी लगभग पूरे दिन उनके सानिध्य में ही रहा। तब उनके साथ बीडीओ और सीओ,महनार भी मौजूद थे और निर्देश प्राप्त कर रहे थे। मेरा काम हो जाने पर उन्होंने मुझसे पूछा कि आपका जो काम बमुश्किल दस मिनट का था,को होने में पूरे दो दिन लग गए। आप ही बताईए कि इस सुस्त और महाभ्रष्ट तंत्र में मैं कैसे सुधार लाऊँ? उन्होंने यह भी बताया कि वे हाई डाईबिटिज के मरीज हैं और यह बीमारी नौकरी के दौरान पैदा होनेवाले तनाव की ही देन है। उन्होंने मुझे यह भी बताया कि उन पर अभी करीब पौने दो सौ मुकदमे चल रहे हैं। किसी कर्मी को डाँट लगा दी तो हो गया एक मुकदमा दर्ज। उन्होंने मुझसे इस बात की शिकायत भी की कि मीडिया किसी अधिकारी की बुराइयों को तो खूब उछालती है लेकिन उनके अच्छे कामों पर चुप्पी लगा जाती है। इसी बीच कोई जिला परिषद् सदस्य उनसे मिलने आया मगर उन्होंने मिलने का समय समाप्त हो जाने का हवाला देते हुए मिलने से मना कर दिया। थोड़ी देर बाद कोई गरीब फरियादी आया जो हसनपुर,महनार का था और जिसके घर पर उसकी अनुपस्थिति में उसके किसी दबंग रिस्तेदार ने कब्जा कर लिया था। प्रियदर्शी जी न केवल उससे गर्मजोशी से मिले बल्कि तुरंत समुचित कार्रवाई का निर्देश भी दिया। मैं अभिभूत और हतप्रभ था कि क्या कोई अफसर ऐसा भी हो सकता है? मैंने जब उनको बताया कि मैंने भी यूपीएससी और बीपीएससी की मुख्य परीक्षा कई-कई बार दी थी तो उन्होंने मुझे कहा कि अच्छा हुआ कि आप पास नहीं हुए। ईधर हम जैसे लोगों के लिए सिर्फ परेशानी-ही-परेशानी है। अब मैं उनको क्या बताता कि वर्तमान काल में पत्रकार तो और भी बँधुआ मजदूर बनकर रह गए हैं सो मुस्कुरा कर रह गया।
मित्रों,यही मेरी प्रियदर्शी जी से दूसरी और अंतिम मुलाकात थी लेकिन बाद में मैं अखबारों में उनके कारनामे लगातार पढ़ता रहा। उन्होंने कैसे बीडीओ,महनार के 12 बजे ही ऑफिस से भाग जाने पर उनकी गाड़ी की चाबी ही जब्त कर ली,कैसे सीओ ऑफिस के किसी भ्रष्ट कर्मी पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की या कैसे किसी पियक्कड़ मुखिया को परिसर से बाहर निकलवाया या कैसे मुरौवतपुर के घूसखोर विद्युतीकरण ठेकेदार को गिरफ्तार करवाया। इस बीच मैं भिखनपुरा,बिलट चौक अपनी ससुराल गया तो पता चला कि कोई रंजन सिंह नाम का विद्युतीकरण ठेकेदार उनलोगों से विद्युतीकरण के लिए प्रति परिवार 300-300 रुपए की रिश्वत मांग रहा है। मैंने अपने साले को ग्रामीणों के साथ प्रियदर्शी जी से मिलने की सलाह दी और आश्वस्त किया कि मिलने के बाद यह समस्या निश्चित रूप से समाप्त हो जाएगी।
मित्रों,लेकिन ऐसा हो पाता कि इससे पहले ही कल 21 अगस्त के समाचार-पत्र में पढ़ने को मिला कि एसडीएम,महनार संदीप शेखर प्रियदर्शी का तबादला बेगूसराय कर दिया गया है। पढ़ते ही झटका लगा। मैं तो अभी तक खुश हो रहा था कि महनार अनुमंडल में पहली बार एक ईमानदार,कर्त्तव्यनिष्ठ और ओजस्वी अफसर आया है जो पूरी तस्वीर को एकबारगी ही बदल देने की क्षमता रखता है। अभी-अभी तो वे आए थे,अभी तो ठीक से सेटल भी नहीं हुए थे कि तबादला हो गया। जाने अब अगला एसडीएम कैसा हो? क्या इस तरह बार-बार जल्दी-जल्दी के तबादलों पर रोक नहीं लगनी चाहिए? जब किसी अधिकारी को काम करने और स्थिति को सुधारने के लिए समय ही नहीं दिया जाएगा तो सुधार होगा कैसे? प्रियदर्शी जी को दो-तीन सालों तक महनार का एसडीएम बने रहने देना था। खैर संदीप शेखर प्रियदर्शी जी जहाँ भी रहें खुश रहें,स्वस्थ रहें यही हमारी कामना है। आई सैल्यूट यू,संदीप शेखर प्रियदर्शी।

मित्रों,काफी समय पहले मैंने उपनिषदों से ली गई एक कथा पढ़ी थी। एक ब्राह्मण था जो जब भी कुछ अच्छा करता तो उसका भरपुर श्रेय खुद लेता और जब भी कुछ बुरा करता तो उसके लिए देवराज इन्द्र को दोषी ठहरा देता क्योंकि शास्त्र कहते हैं कि मनुष्य की भुजाओं में इन्द्र का निवास होता है। एक दिन खेत से हाँकते वक्त कोई गाय उसकी पिटाई से मर जाती है। तभी इन्द्र वेष बदलकर आते हैं और उससे पूछते हैं कि यह गोहत्या किसने की। ब्राह्मण आदतन जैसे ही इन्द्र का नाम लेता है वैसे ही इन्द्र प्रकट हो जाते हैं। ब्राह्मण की बोलती बंद हो जाती है और तब इन्द्र उसे कड़ी फटकार लगाते हैं कि अगर अच्छे कार्यों का श्रेय तुम लेते हो तो बुरे कर्मों की जिम्मेदारी भी तुम्हें ही लेना पड़ेगी।
मित्रों,हमारे प्रदेश बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का व्यवहार भी इन दिनों उपरोक्त ब्राह्मण जैसा हो गया है। राज्य में जब भी कुछ अच्छा होता है तो वे उसका श्रेय लेने में क्षणभर की भी देरी नहीं करते लेकिन जब कोई बुरी या शर्मनाक घटना घट जाए तो जनाब कभी उसकी जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेते। अभी कल की ही बात है कि खगड़िया के धमारा घाट स्टेशन पर ट्रेन से कटने से माता कात्यायनी के दर्शन के लिए जा रहे तीन दर्जन हिन्दू श्रद्धालु मारे गए लेकिन उन्होंने घटना की सारी जिम्मेदारी रेलवे और केंद्र सरकार पर डाल दी। मानो स्थानीय मेले का सुचारू प्रबंधन करना और छोटे-छोटे स्टेशनों पर लोगों को पटरी से हटाने सहित कानून-व्यवस्था संभालना और घायलों को अविलंब अस्पताल पहुँचाना भी सिर्फ केंद्र सरकार का ही काम हो। इससे पहले भी जब छपरा में मिड डे मिल खान से 23 बच्चे मारे गए थे तब भी उन्होंने इसके लिए विपक्षी दल राजद को जिम्मेदार ठहरा दिया था। इसी तरह उनकी पार्टी कुछ ही दिनों पहले कांग्रेस के सुर-में-सुर मिलाती हुई नवादा में हुए सांप्रदायिक दंगों के लिए मुख्य विपक्षी दल भाजपा को दोषी ठहरा चुकी है। मानो मिड डे मिल का सुचारू प्रबंधन और कानून-व्यवस्था संभालना भी सिर्फ-और-सिर्फ विपक्ष की जिम्मेदारी है। फिर नीतीश जी के जिम्मे क्या है? खाली चपर-चपर करते रहना कि गठबंधन तोड़ने का उनका निर्णय सही था और आतंकियों को अपना बेटा-बेटी बताते रहना? अभी चार दिन पहले जब वैशाली जिले में जहरीला मिड डे मिल खाने से कई दर्जन बच्चे बीमार हो गए तो नीतीश जी ने फरमाया कि ऐसा तो होता ही रहता है,कोई मरा तो नहीं न। मैं मानता हूँ कि कोई मरता तो वे जरूर विपक्ष को जिम्मेदार ठहराते। दुर्भाग्यवश कोई नहीं मरा इसलिए उनको ऐसा करने का सुअवसर भी नहीं मिल सका।
मित्रों,अभी कुछ सप्ताह पहले ही नीतीश जी ने प्रदेश के विधायकों को यह प्रावधान करके खुश कर दिया है कि विधायक-कोष से होनेवाले साढ़े सात लाख रुपए तक के काम के लिए अब निविदा आमंत्रित नहीं करनी होगी। यानि विधायक जी जिस चेले को चाहें ठेका दे सकेंगे। अब साढ़े 7 लाख के टुकड़े में माननीय जी पूरा काम करवाएंगे और घुमा-फिराकर विधायक-कोष की दो करोड़ रुपए वार्षिक की राशि में से कम-से-कम आधी तो उनकी जेबों वापस आ ही जाएगी। अब अगर विधायक-कोष से बनी सड़कें या पुल उद्घाटन से पहले ही टूट या धँस जाए तो दोषी कौन होगा? तब नीतीश जी तो यकीनन अपनी आदत के अनुसार अपना पल्ला झाड़ लेंगे और कहेंगे कि इसके लिए वे नहीं बल्कि विधायक जी जिम्मेदार हैं लेकिन प्रश्न तो यह उठता है कि मौजूदा कानून को बदला किसने? किसने माननीयों को लूट की छूट दी?
मित्रों,कुल मिलाकर पीएम बनने से पहले ही पीएम पद के लिए हॉट मैटेरियल बन चुके नीतीश कुमार जी में हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री के सारे गुण एकबारगी पधार चुके हैं। जिस तरह आर्थिक दुरावस्था,रुपए के अवमूल्यन और महँगाई के लिए मनमोहन सिंह कभी अपनी ऐतिहासिक सरकार को जिम्मेदार नहीं मानते उसी प्रकार से हमारे राज्य के मुख्यमंत्री जी भी किसी भी ऊँच-नीच के लिए अपने को और अपनी सरकार को बिल्कुल भी दोषी नहीं मानते हैं। जाँच आयोग बनाने में भी वे मनमोहन से पीछे नहीं आगे हैं। प्रदेश में फारबिसगंज न्यायिक जाँच आयोग और कोसी जाँच आयोग समेत कई जाँच आयोग इस समय अस्तित्व में हैं और इन्होंने कदाचित् अगले विधानसभा चुनाव से पहले अपनी रिपोर्ट नहीं देने की कसम उठा रखी है। अब इनके मंत्रीमंडल को ही लें तो उसमें आपको कई ऐसे नायाब मंत्री मिल जाएंगे जो कभी लालू-राबड़ी मंत्रीमंडल के नवरत्नों में शुमार थे और तब राज्य में जंगलराज कायम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका भी निभाई थी। इनमें से रमई बाबू तो लगभग अनपढ़ हैं और अपने पद के लिए पूरी तरह से अयोग्य तो वे हैं ही। अब आप ही बताईए कि इन जंगलराज विशेषज्ञों की बदौलत कोई कैसे राज्य में सुशासन स्थापित कर सकता है? वेसे नीतीश जी का एक और कारनामा अद्वितीय की श्रेणी में रखा जा सकता है। इस समय वे अकेले 18 विभागों के मंत्री हैं जबकि किसी के लिए सुचारू तरीके से एक अकेले विभाग को संभालना ही कठिन होता है। अच्छा तो यह होता कि नीतीश जी सारे मंत्रियों की छुट्टी कर देते और राष्ट्रपति शासन की तरह अकेले ही पूरी सरकार चलाते वो भी बिना किसी जिम्मेदारी के।
मित्रों,अब तो एक ही बात नीतीश कुमार जी के मुखारविंद से सुननी बाँकी रह गई है। मैं उम्मीद ही नहीं करता हूँ बल्कि मेरा पूरा विश्वास है कि भविष्य में जब भी कोई बड़ी और बुरी घटना प्रदेश में घटती है तो श्रीमान् यही कहेंगे कि इसके लिए और कोई नहीं सीधे तौर पर राज्य की जनता ही जिम्मेदार है। केवल राज्य की जनता की लापरवाही से ही (वैसे हम कुछ लापरवाह तो हैं भी) यह दुःखद घटना घटी है। आखिर किसी भी दुःखद घटना की जिम्मेदारी शासन-प्रशासन उठाए ही क्यों? वैसे वे जब ऐसा कहेंगे तब कहेंगे हम तो जनता की तरफ से अपनी गलती एडवांस में ही मान लेते हैं क्योंकि यह हमारी ही गलती थी जो हम 2010 में दोबारा नीतीश जी की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गए और उनको दोबारा के लिए सीएम मैटेरियल समझ लिया।

मित्रों,कल लगातार दसवीं बार मुझे लाल किले से अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सुनने का अवसर मिला। इसे मैं सुअवसर कहूँ या कुअवसर समझ में नहीं आता। कितनी बड़ी विडंबना है कि आज आजादी के 67 साल बाद भी प्रधानमंत्री ने देश के समक्ष कमोबेश वही चुनौतियाँ गिनाईं जिनको 15 अगस्त,1952 को पं. जवाहरलाल नेहरू ने गिनाई थी। इसका सीधा मतलब यह है कि कैलेंडरों में भले ही 60 साल गुजर गए मगर हमारा देश आज भी वहीं-का-वहीं खड़ा है। वही गरीबी,वही भुखमरी,वही बेरोजगारी,वही सीमा विवाद,वही जनसंख्या-विस्फोट और वही सांप्रदायिक दंगे।
मित्रों,फिर हमने गुजरात के मुख्यमंत्री और भारत के कथित भावी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को भी सुना जो लालन कॉलेज,भुज से जनता को संबोधित कर रहे थे। उनमें जोश था,ओज था,देश के बेहतर भविष्य के लिए योजनाएँ थीं। उन्होंने भ्रष्टाचार पर खूब बातें कीं,जमकर हल्ला बोला। पारदर्शिता बढ़ाने पर भी जोर दिया लेकिन यह नहीं बताया कि राजनैतिक दलों को सूचना का अधिकार के दायरे से बाहर कर देने से कैसे तंत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि गुजरात में लोकायुक्त नहीं होने से भ्रष्टाचार को कम करने में कैसे सहायता मिल रही है। वैसे मैं आपको यह भी बता दूँ कि अधिकतर राज्यों में लोकायुक्त महोदय भ्रष्टाचार का कुछ खास नहीं उखाड़ पाए हैं और यह पद अभी भी महज सांकेतिक ही बना हुआ है। इतना ही नहीं आज भी जबकि मोदीजी की पार्टी में दागियों की बड़ी फौज मौजूद है तो फिर उनकी पार्टी कैसे पार्टी विथ डिफरेंस हुई?
मित्रों,2014 के चुनावों में किस पार्टी को बहुमत मिलेगा या फिर किसी भी पार्टी या गठबंधन को बहुमत नहीं मिलेगा अभी से कहा नहीं जा सकता। ऐसे में अगर भाजपा और एनडीए को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाता है तो पता नहीं कि भाजपा और नरेंद्र मोदी को किन-किन मुद्दों पर कौन-कौन से समझौते करने पड़ेंगे? फिर क्या पता कि आज से दस साल बाद नरेंद्र मोदी की भी वही स्थिति हो जाए,उनका स्वर भी उसी तरह निराशाजनक हो जाए जिस तरह कि आज 15 अगस्त,2004 को उम्मीदों से लबरेज रहे मनमोहन सिंह का है।
मित्रों, यह सच है कि वर्तमान दशक में हमारे राजनेताओं का काफी तेजी से नैतिक स्खलन हुआ है जिससे जनता का उनमें विश्वास लगातार बहुत तेजी से कम हुआ है लेकिन यह हमारे लोकतंत्र की मूलभूत कमजोरी नहीं है। हमारे लोकतंत्र की मूलभूत समस्या नेता नहीं हैं बल्कि मौलिक समस्या है हमारी गलत और खर्चीली चुनाव प्रणाली। आपको यह जानकर घोर आश्चर्य हो सकता है कि कई बार चुनावों में कुल जमा ज्यादा मत पानेवाला दल हार जाता है और कुल जमा कम मत पानेवाले दल की जीत हो जाती है। कोई भी दल मात्र 20-30% मतदाताओं का समर्थन पाकर ही प्रचंड बहुमत से सत्ता में आ जाता है जबकि असलियत तो यही होती है कि वह सरकार कुल प्राप्त मतों के आधार पर अल्पमत की सरकार होती है।
मित्रों,यह घोर दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले कुछ सालों में गाँव से लेकर संसद तक के लिए होनेवाले चुनावों में पैसों का जोर बढ़ा है। आज किसी भी विधानसभा चुनाव में प्रति उम्मीदवार कम-से-कम 1 करोड़ और लोकसभा चुनाव में प्रति उम्मीदवार कम-से-कम 10 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। हमारे राजनेताओं ने चुनाव-दर-चुनाव जनता के साथ इतनी वादाखिलाफी की है कि अब जनता यह मानकर चलने लगी है कि हमारा नेता वादों को पूरा करनेवाला है नहीं इसलिए जनता चुनावों के समय ही उम्मीदवारों से पैसे मांगने लगी है और अब वह मत का दान नहीं करती बल्कि अपनी मत बेचती है। जनप्रतिनिधियों और जनता के इस द्विपक्षीय नैतिक स्खलन का परिणाम यह हुआ है कि अब ईमानदार और गरीब व्यक्तियों के लिए चुनाव लड़ना और लड़कर जीतना संभव ही नहीं रह गया है। जनबल पर धनबल के हावी होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम जो बीते वर्षों में सामने आया है वह यह है कि राज्यसभा और विधान परिषद् जो कभी गैर राजनैतिक गणमान्य लोगों की सभा मानी जाती थी आज पूंजीपतियों का आरामगाह बन गई है। आज सरकारों के गठन में जमकर सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त की जाती है। राजनीति ने व्यवसाय का स्वरूप ग्रहण कर लिया है। पहले चुनाव में पूंजी लगाओ और फिर जीत के बाद वैध-अवैध तरीके से जमकर पैसे बनाओ और बनाने दो। लूटो और लूटने दो। कभी तो नेताओं के खराब होने से तंत्र खराब होता है तो कभी तंत्र के भ्रष्ट होने से नेता भ्रष्ट हो जा रहे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि इस बिगड़ैल तंत्र को सुधारने का मंत्र क्या है?
मित्रों,मैं आपसे बार-बार निवेदन कर चुका हूँ कि जब तक भारत में संसदीय शासन-प्रणाली है हम भय,भूख और भ्रष्टाचार का कुछ नहीं उखाड़ सकते। देश में जनप्रतिनिधियों द्वारा सत्ता के प्रधान के चुनाव की परंपरा तुरंत बंद होनी चाहिए क्योंकि हमारे वार्ड सदस्य,पंचायत-समिति सदस्य,जिला-परिषद् सदस्य,विधायक और सांसद चोर और लालची हो गए हैं,उनके मन में अब रंचमात्र भी जनकल्याण की भावना शेष नहीं बची है। कुछेक को छोड़कर सबके सब सिर्फ आत्मकल्याण में लगे हुए हैं इसलिए अब जनता को सीधे-सीधे अपना शासक चुनने का अधिकार मिलना चाहिए कुछ-कुछ उसी तरह जैसे ग्राम-पंचायतों में ग्रामीणों को मुखिया को चुनने का मिला हुआ है। चुनावों के समय जनता दोहरा मतदान करे। मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री के लिए अलग और विधायक-सांसद के लिए अलग ठीक पंचायत चुनावों की तरह।
मित्रों,ऐसा जब होगा तब होगा आज की कड़वी सच्चाई तो यही है कि हमें संसदीय शासन-प्रणाली के माध्यम ही अगले साल मोदी और मनमोहन में से एक को चुनना होगा। यदि हम दोनों के कल के भाषण की तुलना और देश की विस्फोटक स्थिति पर दृष्टिपात करें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि हमारे सामने मोदी को चुनने के अलावा कोई विकल्प है ही नहीं। दरअसल मनमोहन चुके हुए तीर हैं,गीले हो चुके बारूद हैं,बुझी हुई मोमबत्ती के मोम हैं,घोटालों के घंटाघर और नाकामियों का नगाड़ा हैं,मात खा चुके राजा हैं इसके विपरीत मोदी में अपार संभावनाएँ हैं,उम्मीदें हैं,जोश है,जुनून है और सिर्फ देश के लिए जीने-मरने का जज्बा है। एक डूबता हुआ सूरज है दूसरा ऊपर चढ़ता पूर्णमासी का चंद्रमा। एक ने विषम परिस्थितियों से पूरी तरह से हार मान ली है तो दूसरे ने कभी हार मानना सीखा ही नहीं है। एक बीमार है तो दूसरा बलवान तन से भी और मन से भी। मोदी कुछ भाइयों के लिए कड़वे कुनैन भी हो सकते हैं लेकिन सच्चाई तो यही है कि देश को चढ़ रहे मलेरिया बुखार से निजात पाने के लिए हमें देर-सबेर उनको स्वीकार करना ही पड़ेगा।
मित्रों,आईए हम डूबते हुए सूरज को अलविदा कहें और क्षितिज पर निविड़ अंधकार को अपने तेज से चीर कर उभरते हुए मृगांक का स्वागत करें। यही वर्तमान समय की जरुरत है और हमारी खतरे में पड़ती दिख रही आजादी की रक्षा के लिए अपरिहार्य भी। अगर हम आजाद रहे फिर कभी संविधान और शासन-प्रणाली को भी बदल लेंगे। देखिए नजर उठाकर उत्तर की ओर कि किस प्रकार से शंकरपुरी में चीन की सेना आक्रामक हो रही है और किस तरह कश्मीर में पाकिस्तान पागल हुआ जा रहा है। मनमोहन की अब तक की सबसे मजबूर,कमजोर और सत्तालोलुप सरकार ने अपनी नाकामियों से इनके मन में एक बार फिर भारत-विजय की आस जगा दी है। अब हमें कदापि केंद्र में मजबूर नेता या सरकार नहीं चाहिए बल्कि बेहद मजबूत मनस्वी प्रधानमंत्री और सिंह-गर्जना करनेवाली सरकार चाहिए (हमारे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी यही चाहते हैं) और वैसी सरकार खुद को देंगे,खुद के लिए चुनेंगे हम। क्योंकि हमीं इस मुल्क के असली मालिक हैं,कोई संसद या सांसद नहीं।

मित्रों,मुझे जबसे होश हुआ है तभी से मैं पढ़ता और सुनता आ रहा हूँ कि भारत में न केवल लोकतंत्र है बल्कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भी है। अन्ना के अनशन के समय यह जुमला हमारे सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं के मुखारविंदों से अनगिनत बार दोहराया गया कि चूँकि भारतीय संविधान ने संसद को सर्वोच्चता प्रदान की है अतः उसकी गरिमा को मटियामेट करने का कुत्सित प्रयास नहीं किया जाना चाहिए। मैं भी यह मानता हूँ और हमारे देश की 90 प्रतिशत मूर्ख और 10 प्रतिशत बुद्धिमान जनता (बतौर काटजू साहब) भी मानती है कि भारत के वर्तमान संविधान के अनुसार संसद सर्वोच्च है लेकिन हमारे राजनेता यह भूल रहे हैं कि संविधान के अनुसार संसद सर्वोच्च जरूर है सबकुछ तो कतई नहीं है। संसद के अलावे कार्यपालिका (आजकल सपा नेता खुद के बिना नौकरशाही के ही उसी तरह का सुशासन दे सकने में सक्षम होने के दावे कर रहे हैं जैसा कि वे इन दिनों उत्तर प्रदेश में दे रहे हैं),न्यायपालिका (हमारे महानिकम्मे प्रधानमंत्री तक इसको अपनी सीमा में रहने की हिदायत अक्सर देते देखे जा सकते हैं) और मीडिया सहित ऐसा बहुत-कुछ है जिनका महत्त्व लोकतंत्र में जनविश्वास को बनाए रखने की दृष्टि से संसद से किंचित भी कम नहीं है। वैसे भी संविधान जनता द्वारा जनता को समर्पित है इसलिए सर्वोच्च तो जनता ही है। साथ ही यह भी गौरतलब है कि हमारी संविधान-सभा के सदस्यों ने जिस संसद को सर्वोच्चता सौंपी थी वो आदर्श संसद थी। उन्होंने तो सपने में भी एक-तिहाई शातिर अपराधियों और दो-तिहाई घोटालेबाजों से लबालब भरे पाप के घड़े समान संसद की कल्पना तक नहीं की थी।
मित्रों,यह बहुत-ही बिडंबनापूर्ण है कि आज भारतीय जनता और जनाकांक्षा की सर्वोच्च प्रतिनिधि संसद ही भारतीय लोकतंत्र के स्वस्थ विकास के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बन गई है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोकतंत्र के मंदिर संसद को दागमुक्त करने की जो पहल संसद को खुद करनी चाहिए थी वो उच्चतम न्यायालय को करनी पड़ रही है। और यह नितांत दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब संसद उच्चतम न्यायालय के संसद के दामन को पाक-साफ करने के प्रयासवाले क्रांतिकारी और ऐतिहासिक फैसले को ही पलटने की तैयारी में है। अगर वह ऐसा करती है तो उसका यह कदम निश्चित रूप से पश्चगामी और यथास्थितिवादी कदम होगा। अगरचे संसद को अपने दामन पर लगे कलंक को धोने के प्रयास खुद करने चाहिए थे तो वह बेहद शर्मनाक तरीके से उन्हें बनाए और बचाए रखने की यथासंभव कोशिश कर रही है। ऐसे में प्रश्न यह भी उठता है कि संसद की गरिमा को बढ़ाने या बनाए रखने की महती जिम्मेदारी किसकी है और किस पर है? अगर सांसद खुद ही संसद की गरिमा को गिराएंगे तो जनता के मन में उसके प्रति सम्मान कैसे,कहाँ से और क्यों पैदा होगा?
मित्रों,इसी प्रकार यह बेहद अफसोसनाक है कि भारतीय लोकतंत्र में जनमत का निर्माण और शासन का संचालन करने की महान जिम्मेदारी जिन राजनैतिक दलों के कंधों पर है वे अपनी अकूत आमदनी का हिसाब-किताब देने से भाग रहे हैं। जबकि कुछ अपवादों के साथ पूरे भारत के पूरे सरकारी-तंत्र को सूचना का अधिकार (बिहार सहित कहीं-कहीं कागजी ही सही) के दायरे में ला दिया गया है तो फिर खुद के 'जनरंजन-चरण-कमल' (पढ़ें और समझें महाप्राण निराला की प्रसिद्ध कविता 'राम की शक्ति पूजा') होने का दावा करनेवाले राजनैतिक दलों को भी सूचना के अधिकार की सीमा में होना ही चाहिए। हमारे तंत्र में पारदर्शिता का होना जितना जरूरी है कहीं उससे ज्यादा आवश्यक है तंत्र के वास्तविक संचालनकर्त्ता राजनैतिक दलों का पारदर्शी होना क्योंकि वे वर्तमान काल में भ्रष्टाचार की गंगोत्री बन गए हैं। राजनैतिक दल किसी भी दृष्टि से निजी कंपनी या संपत्ति नहीं हो सकते क्योंकि वे सिर्फ और सिर्फ जनता के विश्वास और चंदे से संचालित होते हैं। अब जबकि भारत के मुख्य सूचना आयुक्त ने सभी राजनैतिक दलों को जनता को वांछित सूचना देने के लिए सूचना अधिकारियों की नियुक्ति करने और प्रार्थियों को वांछित सूचना उपलब्ध करवाने का आदेश दिया है तब सारे-के-सारे राजनैतिक दल (तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर) सूचना देने से बचने की फिराक में सारे मतभेदों और मनभेदों को भुलाकर एकजुट हो गए हैं। वे लोग संसद से ऐसा विधेयक पारित करनेवाले हैं जिससे देश के सारे राजनैतिक दल सूचना का अधिकार के अधिकार-क्षेत्र से ही बाहर हो जाएंगे और उनको अपने लाखों करोड़ के आय-व्यय का ब्योरा नहीं देना पड़ेगा। इतना ही नहीं संसद में एम्स सहित विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में आरक्षण-संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को भी पलटने की तैयारी भी चल रही है।
मित्रों,आप ही बताईए कि अगर संसद इस तरह के पश्चगामी कानून बनाती है तो फिर कैसे जनता के मन में उसके प्रति सम्मान बढ़ेगा और कैसे उसकी गरिमा बढ़ेगी? अगर संसद के ऐसे क्रियाकलापों को ही लोकतंत्र और उसका विकास कहते हैं तो फिर क्या जरुरत है देश में ऐसे लोकतंत्र की? क्यों नहीं ऐसे लोकतंत्र का सर्वनाश हो जाना चाहिए?क्या करेंगे हम ऐसे लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं को बचाकर जिनके संचालकों के मन में देशहित की भावना है ही नहीं, जिनके हृदय में किसी देशभक्त का दिल नहीं धड़कता बल्कि जिनके जिस्म में सिर्फ महास्वार्थी व दरिन्दे भेड़िये का दिमाग है?
मित्रों,अभी हमारा प्यारा देश चहुमुखी-बहुमुखी संकट के मुहाने पर खड़ा है। एक तरफ विकट आर्थिक संकट डरा रहा है तो दूसरी तरफ चीन-पाक की सीमा पर गुस्ताखी है तो वहीं तीसरी तरफ है बढ़ती बेरोजगारी और चौथी तरफ है अमीरी-गरीबी के मध्य लगातार बढ़ती खाई और पाँचवी,छठी,सातवीं तरफ है भुक्खड़ों की बढ़ती संख्या,नक्सलवाद,जनसंख्या-विस्फोट,आतंकवाद और जानलेवा महँगाई।
मित्रों,मैं नहीं समझता कि हमारी संसद या हमारा लोकतंत्र इन हिमालय सरीखी चुनौतियों से निबटने में सक्षम है। क्या करेंगे हम ऐसे लोकतंत्र को लेकर? क्या अँचार डालेंगे उसका या गले में ताबीज बनाकर पहनेंगे उसको? हमारी संसद और हमारा लोकतंत्र इस कदर पंगु और बेकार हो चुका है वो छोटे-से-छोटे संकट का भी सामना नहीं कर सकता इन बड़े संकटों का सामना करना तो उसके लिए दूर की कौड़ी ठहरी। लोकतंत्र वही सफल और दीर्घजीवी हो सकता है जो जनता की ईच्छाओं का सम्मान करे और बदलते वक्त के अनुसार खुद को बदलता रहे। जो लोकतंत्र बदलती जनाकांक्षाओं के अनुरूप खुद को नहीं बदलता है इतिहास गवाह है कि वह निश्चित रूप से अकाल-मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। वास्तव में असलियत यह है कि हमारी संसद अब लोकतंत्र का मंदिर नहीं रह गई है बल्कि उसने हमारे लोकतंत्र को कैद कर लिया है और वह लोकतंत्र का कैदखाना बन गई है और लोकतंत्र को उसके जेलखाने से मुक्त करवाने की महती जिम्मेदारी अब हम जनता को ही निभानी पड़ेगी। दोस्तों,जो लोकतंत्र देश को फिर से गुलामी की अंधेरी सुरंग में धकेल दे क्यों नहीं उसको समाप्त हो जाना चाहिए और उसके अवशेषों पर किसी नई शासन-प्रणाली को स्थापित किया जाना चाहिए जैसे कि अध्यक्षीय शासन-प्रणाली।

मित्रों,आप सभी देश के मौजूदा हालात से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। चाहे देश की उत्तरी,दक्षिणी,पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा का सवाल हो या फिर देश की आंतरिक सुरक्षा का। चाहे देश की अर्थव्यवस्था का प्रश्न हो या विदेशी व्यापार का हर मोर्चे पर आज की तारीख में देश की हालत खस्ता है। चीन बार-बार हमारी सीमाओं में दाखिल होकर हमारी संप्रभुता को खुली चुनौती दे रहा है। कोई नहीं जानता कि वह गद्दार कब हमारे देश पर हमला कर दे और सच्चाई तो यही है कि अगर ऐसा हुआ तो इस बार हमें एक साथ चीन और पाकिस्तान दोनों से लोहा लेना पड़ेगा। इधर भारत-चीन सीमा पर हमारी तैयारी की हालत कदाचित 1962 से भी ज्यादा खराब है। जहाँ चीन ने भारत-चीन सीमा के समानान्तर रेल-लाइनों और सड़कों का जाल बिछा दिया है हमारी सड़कें सीमा से 40-50 किलोमीटर पहले ही समाप्त हो जाती हैं,रेल-लाइनों को बिछाने का प्रश्न ही नहीं उठता। पाकिस्तान तो हमेशा हमें नुकसान पहुँचाने की ताक में लगा रहता ही है,नेपाल,मालदीव,भूटान और श्रीलंका भी वर्तमान केंद्र सरकार की आत्मविनाशक विदेश नीति के कारण हमारे विश्वस्त मित्र नहीं रह गए हैं। बांग्लादेश की हमारे प्रति नीति भी दो राजनैतिक दलों के बीच पेंडुलम की भाँति झूलती रहती है।
मित्रों,क्या आपने कभी विचार किया है कि देश के इन हालातों के लिए कौन जिम्मेदार है? कहते हैं कि लोकतंत्र में यथा प्रजा तथा राजा का नियम काम करता है। हमारे लुटेरे छद्म धर्मनिरपेक्ष सियासतदानों ने पहले आरक्षण के नाम पर बहुसंख्यक हिन्दुओं को आपस में लड़वाया फिर पूरे भारत को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक में बाँट दिया। आज हम हिन्दुओं की स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि हमारे देश का प्रधानमंत्री लाल-किले से खुलेआम ऐलान करता है कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है। पारसी,इसाई,बौद्ध,जैन और सिक्खों की स्थिति तो पहले से ही हिन्दुओं से अच्छी है। तो फिर इसका तो यही मतलब हुआ कि ऐसा कहके और करके केंद्र सरकार सिर्फ मुसलमानों को खुश करना चाहती है। आज हम अपनी मातृभूमि-आदिभूमि हिन्दुस्थान में मंदिरों में लाऊडस्पीकर और घंटे-घड़ियाल तक नहीं बजा सकते (उदाहरण के लिए हैदराबाद का भाग्यलक्ष्मी मंदिर)। आज ही उत्तर प्रदेश के मेरठ में मंदिर में लाऊडस्पीकर बजाने पर मुसलमानों ने मंदिर पर हमला कर दिया जिसमें दो लोग मारे भी गए। ऐसा कब तक चलेगा? हमने तो कभी नहीं रोका उनको नमाज पढ़ने या अजान देने से फिर वो क्यों हम पर गोलियाँ चलाते हैं? इतिहास गवाह है कि दंगे चाहे भागलपुर में हुए हों या गुजरात में,शुरू हमेशा मुसलमान ही करते हैं।
मित्रों, लाल किले से ऐसा कहकर और मुसलमानों के लिए अलग से विशेष योजनाएँ चलाकर हमारे ही वोटों से चुनी गई हमारी केंद्र सरकार ने हमें हमारे ही देश हिन्दुस्थान में द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना दिया है। अंग्रेजों के जमाने से ही भारत में हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए आपराधिक कानून या संहिता तो एक है लेकिन दीवानी कानून या नागरिक संहिता अलग-अलग हैं। यह घोर दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के बाद भी जो भी संशोधन और बदलाव हमारी सरकारों ने किए सिर्फ और सिर्फ हिन्दू उत्तराधिकार कानून और विवाह कानून में किए मुगलकाल से चले आ रहे तत्संबंधी इस्लामिक कानूनों को कभी छुआ तक नहीं गया। हिन्दू पुरूष एक विवाह करे और मुसलमान पुरूष चार फिर क्यों नहीं मुसलमानों की जनसंख्या ज्यादा तेजी से बढ़ेगी? बीच में स्व. संजय गांधी ने 1974-77 में जबरन नसबंदी के प्रयास भी किए लेकिन उनको भी दूसरी बार सत्ता में आने के बाद अपने कदम पीछे खींचने पड़े। मैं सर्वधर्मसमभाव पर अमल का दावा करनेवाली केंद्र सरकार से जानना चाहता हूँ कि क्यों सारे सुधार और संशोधन हिन्दुओं के विवाह और सम्पत्ति कानून में ही किए जाते हैं,मुसलमानों के कानूनों को क्यों नहीं बदला जाता है? ٍक्यों बार-बार सारे-के-सारे प्रतिबंध हिन्दुओं पर ही लादे जाते हैं? सुप्रीम कोर्ट ने भी वर्तमान और पूर्व की केंद्र सरकारों की इस प्रवृत्ति पर कई बार सवाल उठाए हैं। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कई बार सरकारों को समान नागरिक संहिता लागू करने परामर्श दिया है लेकिन सब बेकार।
मित्रों,इसी तरह अंग्रेजों के जमाने से ही हिन्दू मंदिरों पर तो सरकार का कब्जा और नियंत्रण है मगर मस्जिदों,दरगाहों और कब्रगाहों पर शिया या सुन्नी वक्फ बोर्ड का। जब सरकार या दूसरों के पैसों से हज करना शरियत के अनुकूल नहीं है तो फिर क्यों केंद्र सरकार मुसलमानों को हज-सब्सिडी दे रही है और क्यों भारतीय मुसलमान इसका लाभ उठा रहे हैं? अमरनाथ या कैलाश-मानसरोवर-यात्रा पर हिन्दुओं को क्यों सब्सिडी नहीं दी जा रही है? क्यों हिन्दू मंदिरों के खजाने पर कोर्ट-कानून का डंडा चलता है और क्यों मुस्लिम दरगाहों की कमाई को सरकार के अधिकार-क्षेत्र से बाहर रखा गया है?
मित्रों,हम यह भी जानना चाहते हैं कि कांग्रेस की तरफ से प्रधानमंत्री पद के अघोषित उम्मीदवार राहुल गांधी किस धर्म को मानते हैं? क्या वे हिन्दू-धर्म को मानते हैं? अगर वे किसी दूसरे धर्म को मानते हैं तो फिर क्या गारंटी है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद वे हिन्दुओं का खास ख्याल रखेंगे और अल्पसंख्यक-फर्स्ट की कुत्सित नीति पर नहीं चलेंगे? हम यह भी जानना चाहेंगे कि राहुल गांधी के गोहत्या के बारे में क्या विचार हैं? वे इसका समर्थन करते हैं या विरोध? क्या उन्होंने कभी गोमांस-भक्षण किया है या वे अब भी गोमांस खाते हैं? क्या सोनिया गांधी ने कभी गोमांस खाया है या अब भी वे उतने ही चाव से इसका सेवन करती हैं?
मित्रों,हमारे गाँवों में एक कहावत बड़ी ही मकबूल है कि जो खाए गाय का गोश्त,वो हो नहीं सकता हिन्दुओं का दोस्त। अब आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि कौन हम हिन्दुओं का शुभचिंतक है और कौन नहीं? चाहे वो गोहत्या पर से कर्नाटक में पाबंदी हटानेवाला सिद्धरमैया हो या उत्तर प्रदेश में नए बूचड़खानों के लिए टेंडर मंगवानेवाला अखिलेश यादव,ये लोग कभी हिन्दुओं के दोस्त या हितचिंतक हो ही नहीं सकते। इतना ही नहीं हम प्रधानमंत्री की कुर्सी की तरफ काफी तेज कदमों से बढ़ रहे श्रीमान् नरेंद्र मोदी जी से भी स्पष्ट शब्दों में यह जानना चाहते हैं,बल्कि हम उनके मुखारविन्द से यह सुनना चाहते हैं कि वे प्रचंड बहुमत से प्रधानमंत्री बनने के बाद संसद से गोहत्या पर रोक लगाने का कानून बनवाएंगे।
मित्रों,जबकि 85 प्रतिशत मुसलमान पहले से ही आरक्षण के दायरे में हैं फिर भी मात्र 15 प्रतिशत अगड़े मुसलमानों को आरक्षण देने की जी-तोड़ कोशिश की जा रही है। क्या अगड़े मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए पिछड़ी जाति के हिन्दू जिम्मेदार हैं? फिर क्यों उनका कोटा कम करके अगड़े मुसलमानों को संविधान की खुलेआम अनदेखी करते हुए धर्म के आधार पर आरक्षण देने की नापाक कोशिश की जा रही है?
मित्रों,हमारे छद्म धर्मनिरपेक्ष नेता आज देश पर मरनेवालों पर आँसू नहीं बहाते,उत्तराखंड में उनकी लापरवाही के चलते मारे गए हजारों बेगुनाह हिन्दुओं की लाशों पर भी आँसू बर्बाद नहीं करते बल्कि वे आँसू बहाते हैं मुस्लिम आतंकियों की मौत और गिरफ्तारी पर। क्या इसको सर्वधर्मसमभाव का नाम दिया जा सकता है? क्या इस तरह की आत्मघाती रणनीति अपनाकर देश से आतंकवाद का खात्मा किया जाएगा?
मित्रों,कुल मिलाकर इस सारी मगजमारी का लब्बोलुआब यह है कि देश की दुर्दशा इसलिए हो रही है क्योंकि इस देश के बहुसंख्यक अर्थात् हिन्दू एक नहीं हैं। कम-से-कम हिन्दुओं को तो इस संकट-काल में देशहित में एक हो ही जाना चाहिए और अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर वो दिन दूर नहीं जब इस देश का एक नाम हिन्दुस्थान या हिन्दुस्तान न होकर चीन या पाकिस्तान हो जाएगा। आज नेफा से लेकर राजस्थान तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पूरे हिन्दुस्थान को कांग्रेस की लुटेरी और देशबेचवा सरकार ने अपनी शत्रुतापूर्ण नीतियों के चलते खतरे में डाल दिया है। चूँकि हमारा धर्म इस देश और पृथ्वी पर सबसे पुराना धर्म है इसलिए इस देश की अस्तित्व-रक्षा के प्रति अगर किसी की पहली जिम्मेदारी बनती है तो वो हम हिन्दुओं की। वैसे अगर दूसरे धर्मवाले देशभक्त भी इस परमपुनीत कार्य में अपना महती योगदान देना चाहें तो हम तहेदिल से उनका स्वागत करेंगे। और हिन्दुओं को भी एक कुछ इस तरह से होना चाहिए कि हमारे देश की एकमात्र बहुसंख्यकवादी राष्ट्रीय पार्टी भाजपा को अकेले ही दो-तिहाई बहुमत प्राप्त हो जाए और अल्पसंख्यकवादी देशबेचवा नेताओं की दाल चुनावों के बाद किसी भी सूरत में गलने नहीं पाए।
मित्रों,हम हिन्दू एक होंगे तो न केवल अपने देश में ही हमारे धर्माम्बलंबियों की स्थिति सुधरेगी बल्कि हमारे पड़ोसी देशों में भी हिन्दुओं की स्थिति में सुधार आएगा। तब पाकिस्तान में हिन्दुओं की बहु-बेटियों का दिन-दहाड़े अपहरण नहीं होगा और उनको अपनी मातृभूमि छोड़कर प्राण-प्रतिष्ठा बचाकर भारत नहीं भागना पड़ेगा। हमें हमेशा यह बात अपने जेहन में रखनी चाहिए कि दुनिया में भारत के अलावा ऐसा कोई दूसरा देश नहीं है जहाँ कि बहुसंख्यकों को द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनकर रहना पड़ता हो।

मित्रों,क्या आप बहुत बड़ी खिलाड़ी पूनम पांडे को जानते हैं? अगर नहीं जानते तो जान लीजिए। वे ऐसी-वैसी खिलाड़ी नहीं हैं बल्कि विश्व कप विजेता खिलाड़ी हैं। मैंने तो आज भी अखबार में पढ़ा है। क्या कहा मेरा ही सामान्य ज्ञान कमजोर है और उन्होंने कभी कोई वर्ल्ड कप नहीं जीता। परंतु ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई बिना वर्ल्ड कप जीते ही वर्ल्ड कप फेम हो जाए या कहलाने लगे? क्या कहा उन्होंने वर्ल्ड कप नहीं जीता था बल्कि वर्ल्ड कप के समय अपने नंग-धड़ंग होने के वादे को पूरा किया था। अरे भाई तो इसमें कौन-सी बड़ी बात है,हम्माम में तो सभी नंगे होते ही हैं? क्या कहा वे कैमरे के आगे पूरी तरह से नंगी हो गई थीं और फिर बाद में वीडियो को सार्वजनिक भी कर दिया था। लीजिए मैं तो उनको कुछ और ही समझ रहा था वो क्या कहते हैं कि खिलाड़ी। अब समझा कि वे खिलाड़ी हैं ही नहीं बल्कि उन्होंने तो जमाने के सामने नंगा होने का वर्ल्ड कप जीता है। वैसे मैंने कई बार सड़कों पर विक्षिप्त पुरूष-महिलाओं को नंगे घूमते देखा है तो कहीं यह पूनम पांडे भी पागल तो नहीं है? अरे तू समझता क्यों नहीं है भाऊ पूनम पांडे पागल नहीं है वो तो दूसरों को पागल बनाती है रे।
मित्रों,वास्तव में यह अश्लील सत्य है कि इस समय पूरी दुनिया में अश्लीलता और नंगेपन का विश्व कप चल रहा है। आदमी खुद तो नंगा हो ही रहा है उसने प्रकृति को भी नंगा करके रख दिया है जंगल काटकर। लेकिन यहाँ हम आदमी और उसकी आत्मा के नंगेपन तक ही सीमित रहेंगे वरना बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। पहले भारत इस विश्वकप से बाहर था लेकिन अब संचार-क्रांति और अपसंस्कृतिकरण की कृपा के चलते वो भी इस महाआयोजन में शामिल ही नहीं हो गया है वरन् धूम मचा रहा है। कहिए तो सभी पूर्व खिताब विजेता क्लिंटनों और बर्लस्कोनियों को प्रतियोगिता से बाहर ही कर दिया है। अब इस विश्वकप का मतलब ही अखिल भारतीय कप रह गया है। क्या बूढ़े,क्या जवान और क्या किशोर हर कोई हर किसी से बाजी मार लेना चाहता है। जहाँ पहले नंगा शव्द गालियों में शुमार होता था अब उसने बदलते युगधर्म में पर्याप्त प्रतिष्ठा अर्जित कर ली है। बाजारवाद का जमाना जो ठहरा। पहले कहावत थी कि हम्माम में सभी नंगे हैं अब गर्व से हम कह सकते हैं कि बाजार में सभी नंगे हैं क्योंकि बाजार में तो सिर्फ पैसा बोलता है न भाई। पैसा है तो अनैतिकता भी नैतिकता है वरना नैतिकता भी अनैतिकता।
मित्रों,अभी-अभी दो-तीन दिन पहले ही दिल्ली से सटे गुड़गाँव में लगभग 100 होनहार किशोरों को सेक्स एंड पार्टी का आनंद लेते गिरफ्तार किया गया। आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं कि हमारा समाज किस तरह एकदम सही दिशा में अग्रसर हो गया है। अभी दो-तीन दिन पहले ही राजस्थान से एक बेहद शोचनीय मामला सामने आया। एक पिता ने अपनी 5 बेटियों के साथ कई महीने तक बलात्कार किया,उनको जबर्दस्ती ब्लू फिल्म दिखाया और परिणामस्वरूप कई-कई बार गर्भपात भी करवाया। तो क्या भविष्य में हमारी बेटियाँ अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं रह जाएंगी? परंतु हमारी बेटियाँ तो वे भी हैं जो पूनम पांडे,सन्नी लियोन की तरह इस विश्वकप में खुद ही कपड़ों को तिलांजली देकर शामिल हो गई हैं और समाज तो दिक्भ्रमित कर रही हैं।
मित्रों,इसी बीच सर से पाँव तक और उससे भी कहीं ज्यादा आत्मा तक नंगी केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट को साफ-साफ शब्दों में बता दिया है कि वो अच्छे कहलानेवाले सरकार-विरोधी हजारों वेबसाइटों को तो जब चाहे तब बैन कर सकती है लेकिन अश्लील वेबसाइटों को कतई नहीं क्योंकि उसके मतानुसार ये वेबसाइटें हजारों सदियों से असभ्य रहे भारत का संस्कृतिकरण कर रहीं हैं। आजादी से पहले जहाँ ऐसा करना अंग्रेजों के लिए ह्वाईट मेन्स बर्डेन था अब इटली से अवतरित सोनिया गाँधी के लिए भारी बोझ बन गया है।
मित्रों,समझ में नहीं आता कि नंगई का वर्ल्ड कप किसे प्रदान किया जाए? जहाँ ओलंपिक में हमारे देश को पदकों के लाले पड़ जाते हैं यहाँ तो एक-से-एक प्रतियोगी मौजूद हैं। हमारे नेताओं को जिन्होंने घोटाला करने और जनता को धोखा देने में,झूठ बोलने और बरगलाने में और साथ-साथ कैमरे की उपस्थिति या अनुपस्थिति में नंगा होने में विश्व ही नहीं,ब्रह्माण्ड रिकार्ड बनाया हुआ है? या फिर अपने यहाँ के अधिकारियों को दे दिया जाए जिन्होंने संवेदनहीनता और घूस-कमीशनखोरी में पत्थरों और पशुओं तक को मीलों पीछे छोड़ दिया है। या फिर उन न्यायाधीशों को जो पैसे या लड़की लेकर न्याय के बदले अन्याय करते हैं। या फिर आम जनता को जिसने 16 दिसंबर जैसे कई महाक्रूर घटनाओं को अंजाम दिया है और जिनके मन-मस्तिष्क पर पूरी और बुरी तरह से अश्लीलता के वाईरस का कब्जा हो गया है,जिन्होंने देशभक्ति समेत समस्त नैतिक मूल्यों की एक बार में ही सामूहिक अंत्येष्टि कर दी है और अवशेषों को उपभोक्तावाद और बाजारवाद के गंदे गटर में ससम्मान प्रवाहित कर दिया है।
मित्रों,नंगई के विश्वकप के लिए नामांकन सालोंभर चलता रहता है। बहुत मारामारी है यहाँ। लालू, नीतीश, मुलायम, सोनिया, चांडी, राहुल, राघवजी, सन्नी लियोन, शरद पवार,पूनम पांडे आदि ने तो अपना नाम दर्ज करवा भी लिया है। आपने अपना नामांकन करवाया या नहीं? नहीं?? तो जल्दी करवाईए,आजकल नंगई बेस्ट कैरियर ऑप्शन बन गया है। जमकर पैसा बनाईए और अगर महेश भट्ट ने चाहा तो आपको फिल्मों में भी मौका मिल सकता है। अंदरखाने की एक बात बताऊँ आपको। आप पहले वादा करिए कि आप भी मेरी तरह किसी की नहीं बताएंगे-महेश भट्ट ने अपनी अगली अनाम फिल्म के लिए राघवजी और अभिषेक मनु सिंघवी को साईन कर भी लिया है। अब तो आप समझ ही गए होंगे कि इस दुनिया और भारत के सबसे तेजी से उभरते सुनहरे क्षेत्र में कितनी मारामारी है। जल्दी करिए,जल्दी भरिए मित्रों,नहीं तो आप कप की रेस में काफी पीछे छूट जाएंगे/जाएंगी और तब कितना भी नंगा होने के बाद भी आपके पास सिर्फ एक ही विकल्प बचेगा खुद को कोंसने का और हाथ मलने का।

मित्रों,कल की ही तो बात है। घड़ी में दोपहर के एक बज रहे थे। धर्मासती प्राथमिक विद्यालय,जिला-सारण (बिहार) की घंटी घनघना उठी। बच्चे शोर मचाते हुए पंक्तिबद्ध होकर बैठ गए। मिडडेमिल योजनान्तर्गत चावल,दाल और सब्जी परोसी जाने लगी। न जाने क्यों आज सब्जी कुछ ज्यादा ही तीखी और अलग स्वादवाली थी। रसोईया मंजू को विश्वास नहीं हुआ तो उसने भी चखकर देखा। एक पंक्ति उठी और अभी दूसरी पंक्ति को भोजन परोसा भी नहीं गया था कि भोजन कर चुके बच्चों के पेट में भयंकर दर्द होने लगा। कुछ तो तत्काल ही बेहोश भी हो गए। पूरे गाँव में कोहराम मच गया। दो बच्चों ने चंद मिनटों में वहीं पर देखते-ही-देखते दम तोड़ दिया। बाँकियों को मशरख के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया और कुछ बच्चों को मशरख के ही निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया। परंतु वहाँ न तो सुविधाएँ ही थीं और न तो डॉक्टर कुछ समझ ही पा रहे थे। तब तक 5 अन्य बच्चे दुनिया को अलविदा कह चुके थे। शाम के 6 बजे जीवित बचे 40 बच्चों को मशरख से हटाकर छपरा,सदर अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया लेकिन वहाँ की तस्वीर भी कोई अलग नहीं थी। वहाँ न तो कोई डॉक्टर ही उपस्थित था और न तो जहर काटने की दवा ही उपलब्ध थी,ऑक्सीजन का तो सवाल ही नहीं उठता। सूर्यास्त तक अस्पताल में मौत तांडव करने लगा और 9 अन्य बच्चों ने भी दम तोड़ दिया। रात के नौ बजे स्थिति बिगड़ती देख जिंदा बचे 30 बच्चों को पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेज दिया गया जहाँ वे करीब 12 बजे पहुँचे। तब तक रास्ते में भी 4 बच्चों की साँसें थम चुकी थीं। बाद में पीएमसीएच में भी 7 बच्चों ने दम तोड़ दिया। लाशों की गिनती 27 मौतों के बाद भी अभी थमी नहीं है और कई बच्चों की हालत गंभीर बनी हुई है। दुर्भाग्यवश रसोईया मंजू देवी ने भी चूँकि उस भोजन को चखकर देखा था इसलिए वे भी पीएमसीएच में दाखिल हैं लेकिन उसके भी दो बच्चे इस घटना में काल-कवलित हो गए हैं। कल ही राज्य सरकार ने मामले की जाँच के लिए कमिश्नर और आईजी की जाँच कमिटी बना दी थी जो अब तक भी गाँव नहीं पहुँची है। अलबत्ता सुबह-सुबह पुलिस जरूर गाँव में आई थी और लोगों के सख्त विरोध के बाबजूद बर्तन और तैयार भोजन समेत सारे प्रमाण अपने साथ ले गई। इस बीच बिहार के शिक्षा मंत्री ने एक प्रेस वार्ता में कहा है कि उनका पुलिसिया जाँच में विश्वास नहीं है क्योंकि वे मानते हैं कि पुलिस पक्षपाती होकर काम करती है। इस मामले की जाँच से तो सरकार ने पुलिस को अलग कर दिया लेकिन उन बाँकी हजारों मामलों का क्या जिनका अनुसंधान बिहार पुलिस कर रही है?
मित्रों,इतनी बड़ी संख्या में इन नौनिहालों की मौत के लिए जिम्मेदार कौन है? केंद्र
सरकार ने तो योजना बना दी,आवंटन भी कर दिया लेकिन उसे सही तरीके से लागू कौन करवाएगा? क्यों एफसीआई के गोदाम से ही 50 किलो की बोरी में 45 किलो अनाज होता है? फिर कैसे स्कूल तक पहुँचते-पहुँचते रास्ते में ही बोरी का वजन घटकर 30-35 किलो हो जाता है? क्यों स्कूलों के शिक्षक पढ़ाना छोड़कर दिन-रात मिडडेमिल योजना में से पैसे बनाने और आपस में बाँटने की जुगत में लगे रहते हैं? क्यों मिडडेमिल प्रभारी अधिकारियों को सड़े और फफूंद लगे चावल-दाल नजर नहीं आते? कल धर्मासती में भोजन में जहर कहाँ से आ गया? जाहिर है कि रसोईये न तो नहीं मिलाया क्योंकि अगर वो ऐसा करती तो न तो उसको खुद खाती और न ही अपने दोनों बच्चों को ही खिलाती। अगर सरसों तेल जहरीला था तो कैसे और क्यों जहरीला था? चूँकि खाद्य-सामग्री प्रधानाध्यापिका के पति की दुकान से खरीदी जाती थी जो राजद का दबंग नेता भी है इसलिए हो सकता है कि उसने राजनैतिक फायदे के लिए जानबूझकर सरसो तेल में जहर मिला दिया हो या गलती से वहीं पर तेल जहर के संसर्ग में आ गया हो। हो तो यह भी सकता है कि प्रधानाध्यापिका के दरवाजे पर ही तेल में जहर मिल गया हो क्योंकि वहाँ खाद्य-सामग्री के साथ-साथ कीटनाशक और रासायनिक खाद भी रखा हुआ था। अगर यह मान भी लिया जाए कि इस घटना के पीछे कोई राजनैतिक साजिश थी तो भी प्रधानाध्यापिका तो सरकारी अधिकारी थीं उन पर निगरानी रखना तो सरकार का काम था। इतना ही नहीं इस योजना की निगरानी के लिए राज्य में अधिकारियों व स्थानीय निकाय के जनप्रतिनिधियों की एक लंबी फौज मौजूद है फिर राज्यभर में बराबर इस तरह की घटनाएँ कैसे घटती रहती हैं,क्या सुशासन बाबू जवाब देंगे? बाद में जब सहारा,बिहार संवाददाता पंकज प्रधानाध्यापिका मीना देवी यादव जिनके पति अर्जुन यादव इलाके के जानेमाने राजद नेता भी हैं के दरवाजे पर पहुँचे तो पाया कि एक टोकरी में आलू रखा हुआ है था जो पूरी तरह से सड़ चुका था और जानवरों के खाने के लायक भी नहीं था। प्रश्न तो यह भी उठता है कि उक्त स्कूल में पिछले 3 सालों से भोजन की देखभाल करनेवाली समिति भी भंग है और संबद्ध अधिकारी कान पर ढेला डाले हुए हैं।
मित्रों,क्या उन बच्चों को गाँव से सरकारी हेलिकॉप्टर भेजकर सीधे पटना नहीं लाया जा सकता था। क्या सरकारी हेलिकॉप्टर सिर्फ मुख्यमंत्री की जागीर होती है? अगर नहीं तो फिर ऐसा क्यों नहीं किया गया? स्वास्थ्य मंत्रालय तो इस समय मुख्यमंत्री के पास ही है फिर सरकारी अस्पतालों में इंतजाम की इतनी भारी कमी क्यों है और अव्यवस्था और गैरजिम्मेदारी का माहौल क्यों है? क्यों अभी तक मुख्यमंत्री ने अभी तक पीएमसीएच,सदर अस्पताल,छपरा या धर्मासती गाँव का दौरा नहीं किया? वे जब पैर में फ्रैक्चर होने बाबजूद सांस्कृतिक कार्यक्रम को देखने जा सकते हैं तो प्रभावित गाँव क्यों नहीं जा सकते हैं? कहीं भी पुलिस फायरिंग में लोग मारे जाएँ या नरसंहार में या किसी दुर्घटना में क्यों मुख्यमंत्री लोगों को सांत्वना देने नहीं जाते? क्या उनको राज्य की जनता की कोई चिंता भी है? क्या उनको आनन-फानन में मुआवजा और जाँच समिति की घोषणा करने के बदले बचे हुए बीमार बच्चों को जल्दी-से-जल्दी पीएमसीएच लाने का इंतजाम नहीं करना चाहिए था? क्या दो-दो लाख रूपए प्रति मृतक बाँट देने से मरे हुए बच्चे जीवित हो जाएंगे?
मित्रों,अभी पूरे गाँव में शोक का माहौल है। किसी-किसी परिवार ने तो एकसाथ अपने 5-5 नौनिहाल खोए हैं। पूरे गाँव में किसी भी घर में चूल्हा नहीं जल रहा है। कल तक जहाँ किलकारियाँ गूँजा करती थीं आज चीत्कारें आसमान का भी सीना चीर दे रही हैं। कल तक स्कूल के सामने स्थित जिस तालाब किनारे के जिस मैदान में बच्चे कबड्डी खेला करते थे आज उसी मैदान में वे 27 बच्चे सोये हुए हैं,गीली और नम मिट्टी की चादर ओढ़कर। गाँववाले अभी भी उसी मैदान में जमा हैं,हाथों में कुदाल लिए इंतजार में कि न जाने अगली बारी किसके बच्चे की हो और न तो इस समय 18 मंत्रालय संभाल रहे सुशासन बाबू का ही कहीं पता है और न तो जिले के जिलाधिकारी का ही। उत्तराखंड की ही तरह बिहार में भी पूरा-का-पूरा तंत्र लापता हो गया लगता है। दिल्ली में योजनाएँ बनाईं जाती हैं जनता का कुपोषण दूर करने के लिए और लागू करने में व्याप्त भ्रष्टाचार और लापरवाही उसे जानलेवा बना देती है। क्या केंद्र सरकार द्वारा योजना बना देने से ही और राशि का आवंटन कर देने से उसके कर्त्तव्यों की इतिश्री हो जाती है? अगर राज्य सरकारें उनको ठीक तरह से लागू नहीं करे तो उन्हें इसके लिए कौन बाध्य करेगा?
मित्रों,क्या कभी बिहार के हालात को बदला जा सकेगा? मिश्र गए,लालू भी गए और अब नीतीश भी चले जाएंगे लेकिन क्या कभी भ्रष्टाचार राज्य से जाएगा? क्या कभी तंत्र की लोक के प्रति संवेदनहीनता समाप्त होगी? या फिर गरीबों को पढ़ाई की आस ही छोड़ देनी होगी? निजी विद्यालयों की मोटी फीस तो वे भरने से रहे,बच्चों के खाली पेट को भर सकना भी जानलेवा महँगाई ने असंभव बना दिया है तभी तो वे मुफ्त की शिक्षा और भोजन के लालच में बच्चों को सरकारी स्कूल भेजते हैं। अगर बार-बार इसी तरह मिडडेमिल जान लेता रहा तो क्या वे बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने का जोखिम उठाएंगे? क्या वे अपने बच्चों की पढ़ाई छुड़वाकर उनको मजदूरी में नहीं लगा देंगे यह सोंचकर कि जिएगा तो बकरी चराकर भी पेट भर लेगा?
मित्रों,एक बात और! मैं हमेशा से इस तरह की भिक्षुक-योजनाओं के खिलाफ रहा हूँ जिनका वास्तविक उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ अपने वोट-बैंक को बढ़ाना है। देना है तो सरकार बच्चों के माता-पिता को योग्यतानुसार काम दे मिडडेमिल का घटिया भोजन खाकर और घटिया शिक्षा पाकर सरकारी स्कूलों से पास होनेवाले विद्यार्थी भविष्य में करेंगे भी तो क्या करेंगे? कैसा होगा उनका भविष्य? मेरा यह भी मानना रहा है कि शिक्षकों को शिक्षा के अलावा और किसी भी काम में नहीं लगाना चाहिए। शिक्षक पढ़ाए या भोजन बनवाए और उसकी गुणवत्ता जाँचे? इस बीच बिहार के मधुबनी में भी 15 बच्चे मिडडेमिल खाकर बेहोश हो गए हैं। इतना ही नहीं पूरे उत्तर भारत पश्चिम बंगाल से राजस्थान तक से मिडडेमिल की हालत खराब होने के समाचार लगातार हमें मिलते रहते हैं। गुजरात ने जरूर भोजन का शिक्षक द्वारा चखना अनिवार्य किया हुआ है और इस आदेश का अनुपालन भी होता है। जिस तरह कि पूरे उत्तर भारत में इस योजना में अफरातफरी और भ्रष्टाचार व्याप्त है उससे तो यही लगता है कि अच्छा होता कि बच्चों को बिस्कुट वगैरह डिब्बाबंद पौष्टिक खाद्य-पदार्थ दे दिया जाता या फिर घर ले जाने के लिए कच्चा अनाज ही दे दिया जाता। इस बीज बिहार के मुजफ्फरपुर और कई अन्य स्थानों से ऐसे समाचार भी मिल रहे हैं कि कई स्कूलों में आज बच्चों ने मिडडेमिल खाने से ही मना कर दिया है।