शुक्रवार, 7 मार्च 2014

केजरीवाल के 16 सवालों के 17 जवाब

07-03-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,गुजरात में विकास के दावों की पड़ताल करने पहुंचे आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने 2 दिन प्रदेश में घूमने के बाद नरेंद्र मोदी की तरफ से 16 सवाल उछाल दिए और कहा कि मैं इन सवालों का जवाब मांगने उनसे मिलने जा रहा हूं। हालांकि, पहले से मिलने का समय नहीं लेने की वजह से उनके काफिले को गांधीनगर में सीएम ऑफिस से पहले ही रोक लिया गया। इसके बाद पार्टी नेता मनीष सिसोदिया मुख्यमंत्री के सेक्रेटरी से मिलने पहुंचे और वक्त मांगा, लेकिन फिलहाल मिलने का समय नहीं मिला।
गुजरात में दो दिनों के दौरे के बाद अरविंद केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि गुजरात में विकास के बारे में नरेंद्र मोदी जो दावे करते हैं, वे खोखले हैं। केजरीवाल ने कहा कि मोदी के तमाम दावे झूठ की बुनियाद पर टिके हैं। उन्होंने कहा कि मोदी कहते हैं कि यहां रोजगार के अवसर सबसे ज्यादा हैं, लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। प्रदेश में भारी बेरोजगारी है।
केजरीवाल ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि मोदी को बताना होगा कि उनका मुकेश अंबानी से क्या रिश्ता है? उन्हें बताना होगा कि आखिर करप्शन के आरोपों के बाद भी बाबू भाई बुखेरिया और पुरुषोत्तम सोलंकी जैसे लोगों को अब तक मंत्री क्यों बना रखा है?
साथ ही अरविंद केजरीवाल ने गुजरात में मोदी के 11 फीसदी कृषि विकास दावे को भी बेबुनियाद करार दिया। उन्होंने पूछा कि अगर गुजरात में कृषि क्षेत्र में विकास इतना ज्यादा है तो सैकड़ों की संख्या में किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? उन्होंने कहा कि गुजरात में किसानों को पानी नहीं मिल पा रहा है।
इतना ही नहीं उन्होंने यह पूछा है कि नरेंद्र मोदी बताएं कि उनके पास कितने हवाई जहाज और कितने हेलिकॉप्टर हैं? अगर अपने नहीं हैं तो किनके हैं? क्या वह इसके लिए पैसे देते हैं या फिर मुफ्त में इसका इस्तेमाल करते हैं?
केजरीवाल के मोदी से 16 सवाल
1. क्या आप प्रधानमंत्री बनने के बाद केजी बेसिन से निकली गैस के दाम बढ़ाएंगे?
2.पढ़े-लिखे युवाओं को ठेके पर नौकरी क्‍यों दे रहे हैं और उन्‍हें मात्र 5300 रुपये प्रति महीना दे रहे हैं, इतने में कोई कैसे जिंदगी चलाएगा?
3. गुजरात के सरकारी अस्‍पतालों में इलाज की सुविधा क्‍यों नहीं है?
4. पिछले दस सालों में राज्‍य में लघु उद्योग क्‍यों बंद हुए हैं?
5. किसानों की जमीनें बड़े उद्योगपतियों को कौड़ियों के भाव क्‍यों दिए जा रहे? आपने किसानों की जमीन छीनकर अडानी और अंबानी को दे दी है।
6. आपके पास कितने निजी हेलिकॉप्‍टर या प्लेन हैं? आपने ये खरीदे हैं या बतौर तोहफा मिला है? आपकी हवाई यात्राओं पर कितना खर्च आता है और इसके लिए पैसे कहां से आते हैं?
7.आपने हाल में पंजाब में कहा था कि कच्छ के सिख किसानों की जमीन नहीं छीनी जाएगी, तो इस मामले में गुजरात सरकार सुप्रीम कोर्ट क्यों गई है?
8.गुजरात में विकास के दावे झूठे हैं, मोदी जी आप बताइए कि गुजरात में कहां विकास हुआ है?
9. आपके मंत्रिमंडल में दागी मंत्री क्यों शामिल है, बाबू भाई बुखेरिया और पुरुषोत्तम सोलंकी जैसे दागी मंत्री सरकार का हिस्सा कैसे बने हुए हैं?
10. गुजरात के किसान बेहाल है। किसान खुदकुशी कर रहे हैं। हाल के वर्षों में गुजरात में 800 किसानों ने खुदकुशी की, क्यों?
11. प्रदेश में रोजगार का बुरा हाल क्यों है और बेरोजगारी क्यों बढ़ी है?
12.चार लाख किसानों ने बिजली के लिए कई साल से आवेदन दिया है, उन्हें अब तक बिजली क्यों नहीं मिली है?
13. मुकेश अंबानी से आपके क्या रिश्ते हैं, आपने अंबानी परिवार के दामाद सौरभ पटेल को मंत्रिमंडल में क्यों जगह दी?
14. गुजरात में सरकारी स्कूलों के हालात बदहाल क्यों है?
15. सरकारी दफ्तरों में बहुत ज्यादा करप्शन है, विभागों में भारी भ्रष्टाचार क्यों है?
16. कच्छ के किसानों को पानी नर्मदा बांध के बावजूद आज तक क्यों नहीं मिला? सारा पानी उद्योगपतियों को दे दिया गया।
झूठ-शिरोमणि श्री अरविन्द केजरीवाल ने जो सवाल उछाले हैं उनकी सच्चाई का परीक्षण करते हुए अब हम उनके 16 सवालों का बारी-बारी से जवाब देंगे-
1) उस स्थिति में गैस के दाम बिल्कुल नहीं बढ़ाए जाएंगे बल्कि उनको तर्कसंगत रखा जाएगा जैसे कि अटल जी के समय में था। महंगाई को कम करने के लिए दाम में कमी भी की जा सकती है उसी तरह के उपायों द्वारा जैसे कि केजरीवाल ने दिल्ली में बिजली और पानी के दाम कम किए थे।
2) ठीक उसी तरह चलाएंगे जैसे कि दिल्ली में ठेके और फिक्स वेतन पर बहाल शिक्षक और परिवहन कर्मचारी केजरीवाल जी के 49 दिनों के महान शासन के बाद भी चला रहे हैं।
3) कहाँ देख लिया आपने कि गुजरात के अस्पतालों में इलाज की सुविधा नहीं है? गुजरात के ज्यादातर अस्पतालों में दिल्ली के अस्पतालों से भी ज्यादा अच्छी सुविधा है केजरीवाल के 49 दिनों के शासन के बाद भी।
4) जो लघु उद्योग प्रतिस्पर्धा में नहीं टिकेंगे वे बंद तो होंगे ही। क्या उनके बंद होने के लिए गुजरात सरकार सीधे-सीधे जिम्मेदार है? अभी पूरी दुनिया में मंदी का दौर था ऐसे में मांग कम होने पर लघु उद्योगों की हालत तो खराब होनी ही थी। भारत की विकास दर 5 प्रतिशत से भी कम हो गई है तो गुजरात अछूता कैसे रह सकता है?
5) किसानों की जमीनें बाजार भाव पर खरीदी गई हैं न कि कौड़ियों के भाव में। अगर ऐसा होता तो वहाँ के किसान भी प. बंगाल के किसानों की तरह विरोध जरूर करते।
6) जैसा कि अमित शाह पहले ही बता चुके हैं कि गुजरात सरकार के पास 3 जेट विमान और 8 हेलीकॉप्टर हैं और मोदी गुजरात सरकार के विमानों में उड़ान भरते हैं। जहाँ तक इसमें होनेवाले व्यय का सवाल है तो सारा खर्च पार्टी उठाती है जिसके फंड में पार्टी के करोड़ों कार्यकर्ता प्रति वर्ष 1000,5000 और 10000 रुपए का सदस्यता शुल्क देते हैं। इसके अलावा अभी पार्टी फंड में करोड़ों देशवासी खुलकर अपना योगदान दे रहे हैं।
7) सुप्रीम कोर्ट में तो सरकार पहले ही चली गई थी इसलिए अच्छा होगा कि दूध-का-दूध और पानी-का-पानी कोर्ट में ही हो जाए। जहाँ तक जमीन छीनने का सवाल है तो जमीन कोई कानून का उल्लंघन करके कैसे छीन सकता है गुजरात कोई कश्मीर तो है नहीं?
8) यह भी बताना पड़ेगा कि गुजरात में विकास कहाँ हुआ है? गुजरात की सड़कें और आधारभूत संरचना,वहाँ की विकास-दर खुद ही बताती है कि राज्य का कितना विकास हुआ है? आज भारतभर के मजदूरों की पसंदीदा कार्यस्थली गुजरात क्यों बना हुआ है अगर वहाँ का विकास नहीं हुआ है?
9) क्या सिर्फ आरोप लगने से ही कोई भ्रष्ट हो जाता है? क्या किसी कोर्ट ने उनको इसके लिए दोषी ठहराया है? क्या केजरीवाल के पास उनके पास कोई सबूत है जैसे कि कभी शीला दीक्षित के खिलाफ हुआ करते थे तो वे प्रस्तुत करें? भाजपा के आंतरिक लोकपाल ने अपनी जाँच में पाया है कि ये लोग पाक-साफ हैं।
10) आत्महत्या तो आईएएस भी करते हैं तो क्या वे गरीबी के कारण ऐसा करते हैं? आधुनिक जीवन-शैली ने आदमी के अकेलेपन को बढ़ा दिया है और आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण तनाव है न कि गरीबी। अगर गरीबी इसका कारण होता तो गरीब राज्यों के किसान ज्यादा आत्महत्या करते। क्या केजरीवाल जी बताएंगे कि उनको ये झूठे आँकड़े कहाँ से मिले और कितने सालों में उनके कथनानुसार 800 किसानों ने आत्महत्या की? क्या वे बताएंगे कि विदर्भ में पिछले एक साल में कितने किसानों ने आत्महत्या की है?
11) जब रोजगार-कार्यालय में निबंधित 99 प्रतिशत बेरोजगारों को रोजगार मिल रहा है तो फिर कहाँ बेरोजगारी बढ़ रही है? गुजरात तो दूसरे राज्यों के भी लाखों बेरोजगारों को रोजगार दे रहा है तो वहाँ के लोग कैसे बेरोजगार हो सकते हैं?
12) फिर से झूठ। गुजरात में बिजली के पेंडिंग आवेदनों की संख्या हजारों में है न कि लाखों में और इन सबका निपटारा शायद कुछ महीनों में ही कर दिया जाएगा।
13) क्या अंबानी के दामाद को मंत्री बनने का अधिकार नहीं है? क्या वह अच्छा प्रशासक नहीं हो सकता? केजरीवाल बताएंगे कि सोनिया के दामाद को क्लिनचिट देनेवाले युद्धवीर सिंह को उन्होंने टिकट क्यों दिया? सोनिया के दामाद से उनका क्या रिश्ता है? अंबानी के दामाद पर तो फिर भी भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है।
14) सरकारी स्कूल तो हर जगह बदहाल हैं। गुजरात के स्कूलों की हालत तो फिर भी अच्छी है। जब तक समाज के सम्मानित लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाएंगे इनकी स्थिति नहीं सुधरेगी। क्या केजरीवाल बताएंगे कि उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ने के लिए सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं भेजा?
15) कोई ऐसा दावा नहीं कर सकता कि गुजरात के दफ्तरों में भ्रष्टाचार है ही नहीं लेकिन वहाँ पूरे भारत में सबसे कम भ्रष्टाचार जरूर है। ऐसा हम ऐसे ही नहीं बल्कि वहाँ रहनेवाले अपने रिश्तेदारों की आपबीति के आधार पर दावा कर रहे हैं।
16) कच्छ के किसानों को अगर सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल रहा है तो फिर पंजाब के उन सिख किसानों के खेत में पानी क्या केजरीवाल पटाते हैं जिनका कि जिक्र उन्होंने अपने सवालों में किया है? नहरों में जब पानी आएगा तो उसमें से ही किसानों के साथ-साथ उद्योगपतियों को भी पानी दिया जाएगा। केजरीवाल जी बताएंगे कि क्या उनको उद्योग-धंधों से नफरत है? क्या वे चाहते हैं कि भारत की औद्योगिक विकास-दर ऋणात्मक हो जाए? भारत गुलाम हो जाए और पूरी तरह से बर्बाद हो जाए? क्या सीआईए ने आपको ऐसा ही करने को कहा है?
17) अब हम पूछेंगे और उत्तर देंगे आप केजरीवाल जी। आपका समय हुआ समाप्त और हमारा हुआ शुरू-क्या आप बताएंगे कि क्या आप सचमुच सीआईए के एजेंट हैं? क्या आदेश दिया है आपको अमेरिका में बैठे हुए आपके आकाओं ने? क्या आपका पाकिस्तानी आईएसआई के साथ भी कोई संबंध है? क्या इस खेल में आपके साथ-साथ कांग्रेस पार्टी भी शामिल है? क्या दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी में खटमल है फिर उसने शीला दीक्षित को क्यों नहीं काटा? आपने अपना दिल्लीवाला सरकारी आवास तय समय में क्यों खाली नहीं किया? क्या आप उसको कभी खाली करेंगे भी? क्या आपको पता नहीं कि सामान्य शिष्टाचार कहता है कि किसी से मिलना हो तो पहले से समय ले लेना चाहिए? मोदी तो मोदी आप मुझ जैसे बेरोजगार से भी अगर बिना पहले से समय लिए मिलना चाहेंगे तो मैं भी आपसे नहीं मिलूंगा। यकीन नहीं हो तो प्रयास करके देख लीजिए। परसों आपकी कार का शीशा क्या सचमुच आपने खुद ही फोड़ा था जैसा कि कार के मालिक मनीष ब्रह्मभट्ट दावा कर रहे? आपने सच की तरह झूठ बोलना इसी जन्म में सीखा है या आपने कई जन्मों के परिश्रम के बाद इस काम में प्रवीणता प्राप्त की है?
हमको कोई हड़बड़ी नहीं है आप इत्मीनान से मेरे सवालों के उत्तर दे सकते हैं लेकिन उत्तर देने में झूठ नहीं बोलिएगा क्योंकि हमको झूठ से सख्त नफरत है। चलिए हम आपको एक सप्ताह का समय देते हैं मेरे इन आसान सवालों का उत्तर देने के लिए। हम नहीं मानते कि आपको इस सवालों के जवाब मालूम नहीं हैं बल्कि हम तो मानते हैं कि इन प्रश्नों के सबसे उम्दा जवाब आप ही दे सकते हैं। सवाल और भी हैं लेकिन मैं जानता हूँ कि आपको उत्तर देने की आदत नहीं है और आप मेरे द्वारा पूछे गए इन प्रश्नों के उत्तर नहीं देने जा रहे हैं इसलिए अभी इतना ही। जब आप मेरे इन प्रश्नों के उत्तर दे देंगे तो मैं आपसे निश्चित रूप से और भी सवाल पूछूंगा जो इन्हीं प्रश्नों की तरह अति सरल होंगे। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 6 मार्च 2014

मेरी सरकार खो गई है हुजूर

06-03-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैं इन दिनों बहुत परेशान चल रहा हूँ। होऊँ भी क्यों नहीं मेरी सरकार जो खो गई है। आप कहेंगे कि मुझे थाना जाना चाहिए मगर वहाँ तो पहले से ही सरकार नहीं थी। सरकार को इंटरनेट पर भी ढूंढ़ा मगर वहाँ भी नहीं मिली।
मित्रों,दरअसल कुछ महीने पहले तक बिहार में सरकार नाम की चीज थी लेकिन अब नहीं है। ऐसा भाजपा के सरकार से हटने के कारण हुआ है या इसका कोई और कारण है मुझे नहीं पता। आज से बिहार में दसवीं की परीक्षा होनेवाली है। हजारों छात्र-छात्राओं को एडमिट कार्ड नहीं मिला। कहते हैं कि उनको स्कूल ने अंडर एज बना दिया है। कैसे बना दिया,क्यों बना दिया और बनानेवालों पर क्या कार्रवाई होगी या नहीं या इन बच्चों का क्या होगा कोई नहीं बता रहा है क्योंकि सरकार खो गई है हुजूर! मैं अब तक भ्रम में था कि बिहार में संवैधानिक सरकार चल रही है। तभी एक दिन ससुराल गया,कुबतपुर (भिखनपुरा)। लैपटॉप लेकर गया कि जेनरेटर की सायंकालीन बिजली से बैट्री चार्ज कर लूंगा और वहीं से समाचार डालूंगा। मगर उस शाम जेनरेटर की बिजली आई ही नहीं। फिर सोंचा कि गांव में बिजली लाई जाए।  सो हाजीपुर वापस लौटते ही पहले वैशाली जिले के बिजली विभाग के कार्यपालक अभियंता को फोन लगाया। श्रीमान को बताया कि इस गांव में 8 साल से ट्रांसफार्मर जला हुआ है और ठेकेदार 20000 रुपया घूस में मांग रहा है। महोदय ने छूटते ही कहा कि वे इस बारे में कुछ नहीं कर सकते। मैंने पूछा कि फिर कौन कर सकता है तो बताया गया कि वहाँ ट्रांसफार्मर पॉवर ग्रिड कारपोरेशन ऑफ इंडिया के माध्यम से लग रहा है। फिर इंटरनेट पर खोजखाज कर ग्रिड कारपोरेशन का नंबर निकाला। फोन करने पर फोन उठानेवाले महाशय ने एक नंबर देकर बताया कि इस नंबर पर फोन करिए कोई झा जी उठाएंगे। फिर मैं दिनभर फोन करता रहा मगर किसी ने फोन नहीं उठाया। फिर मैंने सोंचा कि हाजीपुर के सांसद रामसुंदर दास से शिकायत करता हूँ मगर उनका तो फोन ही ऑफ था शायद रमई राम ने मीडिया में कोई बयान दे दिया था जिससे दासजी नाराज हो गए थे। वैसे इससे पहले भी मैं इसी मामले में उनको फोन कर चुका हूँ लेकिन तब भी उनके पीए ने उनसे बात नहीं होने दी थी और टाल दिया था। उनके पुत्र और राजापाकर के विधायक संजय कुमार जी का नंबर तो चुनाव जीतने के बाद से ही हमेशा ऑफ रहता है इसलिए उस दिन भी ऑफ था। बिजली बोर्ड के संजय अग्रवाल को भी फोन मिलाया तो पता चला कि वे मीटिंग में हैं। फिर फोन लगाया बिजली मंत्री को। पीए ने कहा कि मंत्रीजी हाऊस में हैं फैक्स कर दीजिए। अंत में थकहारकर एक समाचार बनाया 17 फरवरी को 'एक गांव सुशासन ने जिसकी रोशनी छीन ली' शीर्षक से और उसको बिहार के मुख्यमंत्री,ऊर्जा मंत्री,संजय अग्रवाल जी,पावर ग्रिड ऑफ इंडिया को भी ईमेल कर दिया। कुछ दिन बाद बिजली विभाग से अधिकारी गांव आए भी और सतही पूछताछ करके वापस चले गए और गांववालों की जीते जी दोबारा बिजली देखने की उम्मीद धरी-की-धरी रह गई। दोबारा भी एक खबर बनाई 3 मार्च को 'फिर किस मुँह से वोट मांगेंगे नीतीश कुमार?' शीर्षक से,फिर से सबको ईमेल किया लेकिन अभी तक ट्रांसफार्मर और ट्रांसफार्मर लगानेवाले ठेकेदार का कहीं अता-पता नहीं है। सोंच रहा हूँ कि अब किसको ईमेल करूँ एंजिला मार्केल को या ओबामा को?
मित्रों,इसी बीच मेरे वयोवृद्ध चाचाजी हाजीपुर आए और बताया कि मेरे गांव जुड़ावनपुर बरारी में पिछले 2 सालों से न तो वृद्धावस्था पेंशन का और न ही विधवा पेंशन का ही वितरण हुआ है। मैं सुनकर सन्नाटे में आ गया यह सोंचकर कि ऐसा कैसे हो सकता है? सरकार तो वृद्धों और महिलाओं का बहुत सम्मान करती है। तुरंत बीडीओ को फोन मिलाया। उसने बताया कि हमारी पंचायत का पंचायत सेवक रविशंकर प्रसाद कई महीनों से ड्यूटी पर नहीं आ रहा है। मैंने पूछा कि वेतन कैसे पा जाता है तो उन्होंने बताया कि उनको पता नहीं। फिर किसे पता होगा तो कहने लगे कि यह भी मुझे नहीं पता। फिर मैंने कहा कि शशिभूषण जी आपके प्रखंड कार्यालय में तो लाभार्थियों की सूची होगी न उससे क्यों नहीं बँटवाते हैं तो उन्होंने आश्वासन दिया कि इसी आगामी सोमवार से बँटवा देंगे। लेकिन देखते-देखते कई सोमवार बीत गए पेंशन नहीं बँटा। इसी बीच मेरे चाचाजी फिर से हाजीपुर आए और बताया कि एक-एक व्यक्ति का 10-10 हजार से ज्यादा का पेंशन मद में सरकार पर बकाया हो गया है। मैंने फिर से सरकार को ढूंढ़ने की कोशिश की और इस बार सीधे डीएम को फोन किया। तारीख थी-28 फरवरी।  उन्होंने बड़ा छोटा-सा उत्तर दिया कि देखता हूँ। अभी कल चाचाजी ने बताया कि अब तक भी पैसा नहीं मिला है ऊपर से बच्चों को छात्रवृत्ति भी नहीं मिली है। कल ही फिर से मैंने डीएम को फोन लगाया तो फिर से उनका वही उत्तर था कि देखते हैं। वह कैसे देखते हैं कि देखते ही नहीं हैं यह तो उनको ही पता होगा। फिर मैंने राघोपुर विधायक सतीश कुमार को फोन लगाया। उन्होंने फोन तो नहीं उठाया लेकिन उधर से पलटकर फोन जरूर किया। मैंने जब समस्या बताई तो कहा कि वे अकेले क्या करें यहाँ तो हर कोई भ्रष्ट है। पहलेवाला बीडीओ पूरा गोबर था। उसकी बदली करवा दी है। नई बीडीओ आई है अब शायद पेंशन बँट जाए। जब मैंने छात्रवृत्ति का मुद्दा उठाया तो उन्होंने बताया कि सरकार ने ही स्कूलों में कम पैसा भेज दिया है। शिक्षक छात्रों द्वारा पीटे जाने के डर से बाँटने को तैयार ही नहीं हैं सो उन्होंने नियमावली बना दी है कि सबसे पहले पैसा एससी को,फिर अतिपिछड़ों को,फिर पिछड़ों को और अगर फिर भी पैसा बच जाए तो सामान्य वर्ग को दिया जाए मगर शिक्षक फिर भी हंगामे से डर रहे हैं।
मित्रों, तत्क्षण मेरी समझ में आ गया कि जिले के विभिन्न स्कूलों में छात्रवृत्ति को लेकर हंगामा क्यों हो रहा है। यह आग तो खुद सरकार ने ही लगाई है। उसी सरकार ने जिसको मैं ढूंढ़ रहा हूँ और जो मेरे खोजने से भी नहीं मिल रही है। न जाने कहाँ गुम हो गई है हमारी सरकार? कहाँ जाकर ढूंढूँ समझ में नहीं आता? मैं कोई अफीमची तो हूँ नहीं कि पैसा कहीं भी अंधेरे में गिरे उसे उजाले में जाकर ही ढूंढूंगा नहीं तो अमेरिका या जर्मनी जाकर ढूंढ़ता। इसी बीच राघोपुर का पीपा पुल फिर से टूट गया है मगर मुझमें इतनी हिम्मत नहीं बची है कि मैं किसी को फोन करूँ। वैसे आपने अगर कहीं हमारी सरकार को देखा तो जरूर बताईगा। मुझे अपने गांव में पेंशन और छात्रवृत्ति बँटवानी है और अपनी ससुराल में बिजली लानी है। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 3 मार्च 2014

फिर किस मुँह से वोट मांगेंगे नीतीश कुमार?

3-3-2014,कुबतपुर (भिखनपुरा) (देसरी)। ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,वर्ष 1995 में विधानसभा चुनाव का प्रचार पूरे शबाब पर था। नीतीश कुमार जनता दल से अलग हो चुके थे और समता पार्टी का गठन कर चुके थे। नीतीश हरनौत से विधानसभा सदस्यता के लिए उम्मीदवार भी थे। तब उनका भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन नहीं हुआ था। तभी नीतीश ने लालू को चुनौती दी कि वे एक बार भी वोट मांगने हरनौत नहीं जाएंगे और फिर भी चुनाव जीत जाएंगे। बाद में उन्होंने ऐसा किया भी और चुनाव भी जीते। हालांकि लालू ने उनकी चुनौती स्वीकार तो कर ली लेकिन बाद में बात से मुकरते हुए कई-कई बार राघोपुर का दौरा किया।
मित्रों,एक बार फिर से उन्हीं नीतीश कुमार ने उसी तरह का दावा किया है। मुख्यमंत्री जी का कहना है कि वर्ष 2015 के विधानसभा चुनावों की घोषणा से पहले अगर बिहार के प्रत्येक गांव में बिजली नहीं पहुँची तो वे विधानसभा चुनावों में जनता से वोट ही नहीं मांगेंगे। जाहिर है इस बार नीतीश कुमार जी के समक्ष चुनौती 1995 के मुकाबले काफी कठिन है। बिहार में अभी भी हजारों गांव ऐसे हैं जो बिजली की रोशनी से वंचित हैं और विधानसभा चुनावों की घोषणा होने में डेढ़ साल से भी कम समय बचा है। चुनौती इसलिए भी ज्यादा कड़ी है क्योंकि बिहार की अफसरशाही नहीं चाहती कि बिहार के प्रत्येक गांव में बिजली पहुँचे। बिहार राज्य विद्युत बोर्ड के अधिकारी नहीं चाहते कि बिहार के प्रत्येक गांव में रहनेवालों तक विकास की रोशनी पहुँचे।
मित्रों,जैसा कि आप जानते हैं कि मैंने 17 फरवरी,2014 को एक समाचार 'एक गांव सुशासन ने जिसकी रोशनी छीन ली' लिखा था जिसमें मैंने एक ऐसे गांव कुबतपुर (भिखनपुरा) के दर्द को शब्द प्रदान किया था जिसकी बिजली सुशासन बाबू के शासन में ही छिन गई लगभग 700 की आबादी वाले इस गांव ने वर्ष 2006 से बिजली की रोशनी नहीं देखी। पिछले 8 साल से दिन ढलते ही पूरा गांव अंधेरे के महासागर में डूब जाता है। मेरे लिखने और समाचार को मुख्यमंत्री, ऊर्जा मंत्री और बिजली विभाग के आला अधिकारियों को ई-मेल करने के कुछ दिन बाद विभाग अधिकारियों की एक टीम गांव पहुँची और पूछताछ की। पता चला कि वे लोग वहाँ मुझे खोज रहे थे।
मित्रों,मैं एक पत्रकार हूँ क्या यह संभव है कि मैं हर जगह मौजूद रहूँ? वैसे अगर कोई चाहे तो मुझसे मेरे नंबर 7870256008 पर जब चाहे बात कर सकता है। गांववालों को लगा कि अब उनकी मुश्किलों के हल होने के दिन निकट आ गए हैं लेकिन फिर सबकुछ पूर्ववत हो गया। न तो गांव में ठेकेदार आया और न ही जला हुआ ट्रांसफॉर्मर ही लगा। कदाचित् बिजली बोर्ड वाले भी चाहते हैं कि गांववाले ठेकेदार की रिश्वत की मांग को मान लें या फिर वे चाहते हैं कि अंधेरा कायम रहे। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर इस गांव सहित बिजली से वंचित हजारों गांवों में विधानसभा चुनावों की घोषणा तक बिजली नहीं आई तो फिर नीतीश कुमार चुनावों में वोट किस मुँह से मांगेंगे? 1995 में तो उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा की पूरे मनोयोग से रक्षा की थी तो क्या वे इस बार अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ देंगे? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

यह 24000 करोड़ किसका है सहारा श्री जी?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हम काफी दिनों से यह सुनते आ रहे थे कि अपने देश में काले धन को सफेद धन में बदला जाता है। अभी तक तो हम सुनते ही थे अब अपनी आँखों से देख भी रहे हैं कि कैसे सहारा श्री अज्ञात सफेदपोश लोगों के धन को काला से उजला बना रहे हैं। वे बताते हैं कि उनकी कंपनी में लाखों निवेशकों ने 24000 करोड़ रुपये लगाए हैं लेकिन सेबी के पूछने पर वे यह नहीं बता पाते कि वे लाखों निवेशक हैं कौन? प्रश्न अब यह नहीं है कि 24000 करोड़ रुपये हैं भी या नहीं बल्कि उससे भी बड़ा सवाल अब यह पैदा हो गया है कि निवेशक हैं भी या नहीं? अगर हैं तो उनका नाम और पता क्या है? किसी निवेशक का पता सिर्फ एनएच 2 या 4 तो नहीं हो सकता।
मित्रों,तो क्या यह 24000 करोड़ रुपया नेताओं का है जिसको सुब्रत राय अवैध तरीके से सफेद धन में बदलने का असफल प्रयास कर रहे थे? देखना तो यह भी है कि सुब्रत राय को उनकी खुद की चहेती सरकार की पुलिस किस प्रकार से हिरासत में रखती है। उनको आम आदमी की तरह हिरासत में रखती है या फिर पाँच सितारा सुविधाएँ उपलब्ध करवाती है और कानून की नजर में सबके समान होने के सिद्धांत का खुलेआम मखौल उड़ाती है? जाहिर है कि सहारा श्री देश के बड़े रसूखदार लोगों में से हैं ऐसे में उनको सजा दिलवाना किसी भी तरह आसान नहीं रहनेवाला है क्योंकि आज कानून गांधी के जमाने से भी ज्यादा पैसेवालों की रखैल बन चुका है। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

भाजपा के लिए आत्मघाती होगा रामविलास से गठबंधन

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों, पिछले दो दिनों से ऐसी चर्चा बिहार में जोरों पर है कि भारतीय जनता पार्टी और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के बीच लोकसभा चुनावों के लिए चुनावी गठबंधन हो गया है। सूत्रों के अनुसार इस गठबंधन के लिए पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का ज्यादा जोर है। पता नहीं सुशील कुमार मोदी को ऐसा क्यों लगता है कि भाजपा बिहार में अकेली चुनावों में जा ही नहीं सकती है। यह वहीं मोदी हैं जिन्होंने बिहार में कभी भाजपा का गठबंधन उस पार्टी से करवाया था जिसको 1995 के चुनावों में मात्र 6 विधानसभा सीटें मिली थीं और वो भी बड़ा भाई बनाकर और अपनी पार्टी से ज्यादा सीटें देकर जबकि 1995 में भाजपा के पास 30 विधानसभा सीटें थीं। यह वही छोटे मोदी हैं जिनको अभी कुछ महीने पहले तक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पीएम पद के लिए योग्यतम व्यक्ति नजर आते थे।
मित्रों,छोटे मोदी ने एकबार फिर से भाजपा को बेमेल और आत्मघाती गठबंधन की आग में झोंकने की नापाक कोशिश की है। उपेंद्र कुशवाहा से गठबंधन किया कोई बात नहीं क्योंकि उनपर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है लेकिन रामविलास पासवान से गठबंधन क्यों? ऊपर से छोटे मोदी रामविलास पासवान के खिलाफ सीबीआई जाँच के मामले में उनका खुलकर बचाव भी कर रहे हैं जबकि बोकारो स्टील कारखाने के प्रस्तावित बेतिया इकाई में बहाली में केंद्रीय मंत्री रहते उनके खिलाफ जमकर भ्रष्टाचार करने के सबूत सामने आ चुके हैं। ऊपर से रामविलास पासवान का बिहार में कोई खास वोट-बैंक भी नहीं है। पिछले लोकसभा चुनावों में तो हाजीपुर में उनको उनकी अपनी जाति ने भी एकजुट होकर वोट नहीं दिया था ऐसे में यह तो निश्चित है कि इस गठबंधन से भाजपा को मतों की दृष्टि से कोई लाभ नहीं होने जा रहा है। गठबंधन से जो भी लाभ होगा वह एकतरफा होगा और लोजपा को होगा।
मित्रों,हम सभी जानते हैं रामविलास पासवान राज्य के ही नहीं देश के भी महानतम अवसरवादी नेता है। वे सत्ता से दूर रह ही नहीं सकते। उनको केंद्र में मंत्री बनकर मलाई काटने की पुरानी बीमारी है। भूतकाल में अगर हम झाँककर देखें तो  1998 में रामविलास ने भाजपा के साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा था और केंद्र सरकार में महत्त्वपूर्ण विभागों के मंत्री भी रहे थे। बाद में जब उनको संचार मंत्रालय से हटा दिया गया तो उन्होंने गुजरात दंगों का बहाना बनाकर मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। 1999 में लोकसभा में विश्वास-प्रस्ताव पर मतदान के दौरान उन्होंने राजग को धोखा दिया जिससे वाजपेयी जी की सरकार एक मत से गिर गई थी। फिर आज तो गुजरात दंगों के समय मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी भाजपा के पीएम उम्मीदवार हैं फिर रामविलास भाजपा के साथ कैसे गठबंधन कर सकते हैं और भाजपा भी ऐसे धोखेबाज के साथ कैसे गठबंधन बना सकती है? शायद रामविलास जी कांग्रेस पर ज्यादा सीटों के लिए दबाव बनाने के लिए भाजपा से गठबंधन का झूठा स्वांग कर रहे हैं या फिर कांग्रेस पर उनके खिलाफ सीबीआई जाँच रोकने के लिए बीजेपी से गठबंधन का नाटक कर रहे हैं। अगर वे भाजपा से सचमुच में गठबंधन करना चाहते हैं तो इसका एक कारण तो मोदी लहर हो सकती है और दूसरा कारण चुनावों के बाद बननेवाली एनडीए सरकार के समय सीबीआई के शिकंजे में आने से खुद को बचाना। श्री पासवान से गठबंधन करते समय भाजपा को इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि रामविलास मूलतः लालू-मुलायम-येचुरी-सोनिया-ममता-जया आदि की तरह मुस्लिमपरस्त नेता हैं और स्वार्थवश अभी वे भले ही एनडीए की बारात में डांस करने को तैयार हो जाएँ लेकिन कभी भी बारात से भाग सकते हैं और पिटवा भी सकते हैं। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

क्या केजरीवाल और अंबानी में साँठगाँठ है?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। रविवार को रोहतक में रैली करने पहुंचे अरविन्द केजरीवाल ने क्या बातों ही बातों में अपनी ही पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष की पोल खोल दी है? अगर घटनाओं को सही मानें तो शायद हां। रविवार को रोहतक में रैली करने पहुंचे अरविन्द केजरीवाल के साथ आईबीएन-7 के पूर्व एडीटर इन चीफ आशुतोष भी थे। उन्होंने वहां अरविन्द से पहले रैली को संबोधित भी किया। लेकिन जब खुद केजरीवाल संबोधित करने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने ऐसी बात कह दी जिससे शक हुआ कि कहीं वे यह बात अपनी ही पार्टी के नेता आशुतोष के बारे में तो नहीं कह गए?
असल में रोहतक की रैली में अरविन्द केजरीवाल ने मुकेश अंबानी और मोदी के साथ साथ मीडिया पर भी जमकर हमला बोला और कहा कि मीडिया का एक हिस्सा जानबूझकर उन्हें और उनकी पार्टी को बदनाम कर रहा है। केजरीवाल ने मीडिया पर सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि यह सब मुकेश अंबानी के इशारे पर हो रहा है क्योंकि मीडिया में आज हर जगह मुकेश अंबानी का पैसा लगा हुआ है।
मुकेश और मीडिया के रिश्तों पर बोलते बोलते अरविन्द केजरीवाल बोल गये कि कैसे एक एडीटर इन चीफ उनके पास आया और कहने लगा कि उसके ऊपर दबाव बनाया जा रहा है कि वह मोदी के बारे में ही खबरें दिखाएं। उस एडीटर इन चीफ से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई और उसने अरविन्द से कहा कि इसलिए उसने इस्तीफा दे दिया है।
अगर अरविन्द की बात को सही मानें और मीडिया में मुकेश अंबानी की मौजूदगी को देखें तो निश्चित रूप से यह एडीटर इन चीफ कोई और नहीं बल्कि खुद आशुतोष ही हो सकते हैं क्योंकि आशुतोष जिस आईबीएन-7 के संपादक थे वह नेटवर्क-18 का हिस्सा है जिसमें मुकेश अंबानी ने पैसा निवेश कर रखा है। तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आशुतोष के आम पार्टी ज्वाइन करने की पोल खुद केजरीवाल ने ही खोल दी?
हालांकि ऐसा पहली बार हुआ है जब अरविन्द केजरीवाल खुद मीडिया के एक हिस्से पर जमकर बरसे और अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि अगर कोई खबर ऐसी दिखे जिसे देखकर लगे कि यह जानबूझकर गलत खबर चलाई जा रही है तो पार्टी कार्यकर्ता टीवी चैनलों के दफ्तर में फोन करके अपना विरोध दर्ज करवाएं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर ये लोग गलत खबर दिखाना बंद नहीं करते हैं तो मीडियावालों को भी ठीक करना पड़ेगा।
हालाँकि अधिकतर टीवी दर्शकों का यह मानना है कि आईबीएन 7 आशुतोष के होते हुए तो केजरीवाल का समर्थक था ही उनके हटने के बाद तो और भी अंधसमर्थक ही हो गया है। दिन-रात नॉन स्टॉप सिर्फ केजरीवाल के पक्ष में ही समाचार और कार्यक्रम चलाता रहता है। तो क्या केजरीवाल और अंबानी में भी भीतर-ही-भीतर साँठगाँठ है? अगर ऐसा नहीं है तो फिर आईबीएन 7 आज केजरीवाल का सबसे बड़ा समर्थक चैनल क्यों बना हुआ है? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

फिर तो आईपीएल इंडियन फिक्सिंग लीग बन जाएगा?

22-2-14,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जैसा कि बीसीसीआई सूत्रों ने मीडिया को बताया है कि इस साल का आईपीएल यानि आईपीएल 7 दक्षिण अफ्रीका में होने जा रहा है तो अगर ऐसा हुआ तो इस साल का आईपीएल इंडियन प्रीमियर लीग के बदले इंडियन फिक्सिंग लीग बन जाएगा। ऐसा होना सिर्फ इसलिए ही तय नहीं माना जा रहा क्योंकि दक्षिण अफ्रीका में सट्टेबाजी प्रतिबंधित नहीं है बल्कि इसलिए भी क्योंकि जस्टिस मुद्गल समिति ने आईपीएल सट्टेबाजी की जांच रिपोर्ट में बताया है कि सारी सट्टेबाजी के पीछे कुख्यात डॉन दाऊद इब्राहिम का हाथ है। रिपोर्ट में न सिर्फ मयप्पन को बल्कि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान धोनी और रैना को भी संदेह के घेरे में रखा है। विदित हो कि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में फिक्सिंग का गंदा खेल सबसे पहले दक्षिण अफ्रीका में ही उजागर हुआ था।
मित्रों,जिस तरह से दाऊद आसानी से आईपीएल सट्टेबाजी में भाग लेकर मैचों को फिक्स कर ले रहा है उससे आम जनता के मन में ऐसी आशंका भी उत्पन्न हो रही है कि न सिर्फ आईपीएल और बीसीसीआई में उसकी पैठ बनी हुई है बल्कि केंद्र सरकार के एक से ज्यादा मंत्री भी उसके ही इशारों पर नाचते रहे हैं। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सामने आने लगे केजरीवाल के 'मृत-दल' के छिपे हुए उद्देश्य

22-2-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपनी सबसे प्रसिद्ध कविता 'अंधेरे में' में कहा है कि
'भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब
साफ़ उभर आया है,
छिपे हुए उद्देश्य
यहाँ निखर आये हैं,
यह शोभायात्रा है किसी मृत-दल की।'
चुनावी महासमर नजदीक आने के साथ ही अरविंद केजरीवाल के छिपे हुए उद्देश्य भी सामने आने लगे हैं। केजरीवाल ने अपनी रणनीति बदलते हुए अपने 'मृत-दल' के निशाने पर नरेंद्र मोदी को राहुल गांधी से भी ऊपर कर लिया है। कांग्रेस को बचाने का उनका राक्षसी स्वार्थ अब साफतौर पर उभर आया है। भाजपा के पीएम प्रत्याशी की चौतरफा घेराबंदी के लिहाज से उन पर आरोपों की बौछार कर दी है। साथ ही उनके खिलाफ महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी के रूप में एक सशक्त उम्मीदवार उतारने की तैयारी भी कर ली है।
अरविंद केजरीवाल ने शुक्रवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रमुख मुकेश अंबानी के साथ रिश्तों को लेकर मोदी पर सवाल खड़े कर दिए। साथ ही उन्होंने अपने और अपने दल के ऊपर लगनेवाले किसी भी आरोप का स्पष्टीकरण न देने की महान परंपरा की रक्षा भी की है। उन्होंने यह नहीं बताया है कि वो ली कौन थी और उसका उद्देश्य क्या था? मोदी को पत्र लिखकर केजरीवाल ने कहा है, ‘लोग कहते हैं कि संप्रग की सरकार मुकेश अंबानी चला रहे हैं। अगर आपके पीछे भी मुकेश ही हैं तो लोगों के साथ धोखा हो जाएगा। किसी तरह आप प्रधानमंत्री बन भी जाते हैं तो क्या आपकी सरकार भी मुकेश ही चलाएंगे? चर्चा है कि आपकी एक-एक रैली पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि मुकेश अंबानी आपको फंड कर रहे हैं। क्या यह सच है?’ आप और राहुल गांधी देश-विदेश में घूमने के लिए हेलीकॉप्टर व निजी हवाई जहाजों का उपयोग करते हैं। खबरों के मुताबिक ये जहाज मुकेश अंबानी के हैं। ये फ्री में मिलते हैं या आप इनका किराया देते हैं? इस बीच परम प्रपंची और बुढ़ापे में नग्न नवयुवतियों के साथ शयन कर ब्रह्मचर्य संबंधी प्रयोग करनेवाले मोहनदास करमचंद गांधी के प्रपौत्र राजमोहन गांधी ने शुक्रवार को आम आदमी पार्टी की सदस्यता ली। उन्होंने कहा कि पार्टी का जो आदेश होगा उसका पालन करेंगे। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

क्या अन्ना विश्वसनीय व्यक्ति हैं?

19-2-18,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कथित गांधीवादी अन्ना हजारे ने एक बार फिर से अपने विचार बदल लिए हैं। कदाचित यू-टर्न लेने की उनमें और उनके कथित चेले अरविन्द केजरीवाल में होड़-सी लगी हुई है। कभी अन्ना को नीतीश कुमार अच्छे लगने लगते हैं तो कभी अरविन्द केजरीवाल और कभी ममता बनर्जी। आजकल ममता बनर्जी की बारी आई हुई है। इतना ही नहीं कभी अन्ना को संसद द्वारा पारित लोकपाल अच्छा लगने लगता है तो कभी केजरीवाल का जनलोकपाल। समझ में नहीं आता कि अन्ना आखिर चाहते क्या हैं? क्या उनका चित्त स्थिर है? क्या उनके ऊपर विश्वास किया जा सकता है? अन्ना की कौन-सी बात सही है और कौन-सी गलत?
मित्रों,आपको याद होगा कि जब अरविन्द केजरीवाल ने राजनैतिक दल के गठन की घोषणा की थी तो अन्ना ने खुलकर उसका विरोध किया था। फिर कभी उन्होंने केजरीवाल का विरोध किया तो फिर अगले ही दिन समर्थन भी कर दिया। अभी कुछ दिन पहले कांग्रेस ने संसद से लोकपाल को पास करने की घोषणा की। यह जानने के बावजूद अन्ना अनशन पर बैठ गए। फिर राहुल गांधी ने लोकपाल की जरुरत पर बल दिया और सरकार ने बिल लाकर उसे पारित करवा लिया। जब अन्ना और पूरे देश को पता था कि उक्त सत्र में सरकार लोकपाल लाने जा रही है तो फिर समझ में नहीं आता कि अन्ना क्यों अनशन पर बैठे? क्या वे इसका श्रेय पूरी संसद के स्थान पर सिर्फ राहुल गांधी को दिलवाना चाहते थे?
मित्रों,अभी तक अन्ना का जो विचित्र व्यवहार रहा है उससे ऐसा प्रतिध्वनित होता है कि अन्ना कहीं-न-कहीं कांग्रेसी हैं और वे चाहते हैं कि केंद्र में किसी-न-किसी तरह से कांग्रेस की ही सरकार रहे। हम अपने अनुभव के आधार पर जानते हैं कि चुनावों से पहले ये कथित धर्मनिरपेक्ष दल चाहे जितनी भी तू तू मैं मैं कर लें चुनावों के बाद सबके सब कांग्रेस से मिल जाते हैं। यहाँ तक कि सपा और बसपा जैसे धुर विरोधी दल भी कांग्रेसी घाट पर एकसाथ पानी पीने लगते हैं। फिर अन्ना की ऐसी क्या मजबूरी है कि वे हमेशा इन कथित धर्मनिरपेक्ष दलों का ही समर्थन करते हैं? पहले केजरीवाल अच्छे लगे लेकिन जब देखा कि यह बंदा तो अब काफी बदनाम हो चुका है तो उन्होंने एक अन्य ऐसे दल का समर्थन कर दिया जिसके नाम में भी कांग्रेस लगा हुआ है और जिसका चाल,चरित्र और चेहरा तो कांग्रेसवाला है ही। अन्ना को कैसे ममता का शासन अच्छा लग रहा है जबकि पश्चिम बंगाल के अस्पतालों में सरकारी भ्रष्टाचार के चलते जबसे ममता शासन में आई हैं मौत का तांडव चल रहा है।
मित्रों,मूलतः ममता और साम्यवादी दलों के शासन में कोई अंतर नहीं है। जो गुंडागर्दी और सामूहिक बलात्कार पहले साम्यवादी कार्यकर्ता कर रहे थे वही गुंडागर्दी और सामूहिक बलात्कार अब तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता कर रहे हैं। आखिर वो कौन-सा चश्मा है जिससे देखने पर अन्ना को ममता बनर्जी दूध की धुली नजर आ रही हैं?
मित्रों,प्रश्न उठता है कि क्या अन्ना दिल से भारत का भला चाहते हैं? क्या वे चाहते हैं कि भारत का तीव्रतर विकास हो और भारत से भ्रष्टाचार का समूल नाश हो जाए? अगर हाँ तो फिर उनको नरेंद्र मोदी और भाजपा से शत्रुता क्यों है? मुझे तो लगता है कि अन्ना उस दिलफेंक आशिक की तरह चलंतमति हैं जिसका दिल रह-रहकर कभी इस पर तो कभी उस पर आता रहता है। सिर्फ वंदे मातरम का नारा भर लगा देने से भारत महान नहीं हो जाएगा। ममता ने पश्चिम बंगाल में ऐसा क्या कर दिया है कि अन्ना उस पर मोहित हो गए? ममता का शासन तो इतना निर्मम है कि उसने एक बिहारी बेटी को जिसका कि बंगाल में सामूहिक बलात्कार हुआ था अपने हाल पर छोड़ दिया। यहाँ तक कि घटना के बाद लंबे समय तक बलात्कारियों को गिरफ्तार तक नहीं किया,ममता की पुलिस ने साक्ष्यों को नष्ट हो जाने दिया और जब बिहार सरकार ने उसकी मदद करनी चाही तो उसके एक मंत्री ने उसका भी विरोध किया।
मित्रों,हमें कोरे नारे नहीं चाहिए। नारे तो पिछले 65 सालों से लग रहे हैं। अब हमें मजबूर की जगह मजबूत सरकार चाहिए,अब हमें गठबंधन की जगह एकदलीय सरकार चाहिए,अब हमें नीति नहीं नीयत चाहिए, कोरे नारे नहीं धरातल पर काम चाहिए,योजनाएँ नहीं उनका सटीक और पारदर्शी क्रियान्वन चाहिए,ममता जैसी 10-20 सांसदों वाला कमजोर और पिलपिला प्रधानमंत्री नहीं 273 प्लस वाला सिंहनाद करनेवाला शेर चाहिए जिसकी गर्जना से चीन से लेकर अमेरिका तक काँपने लगे। वही अमेरिका जिसका एजेंट होने के आरोप इन दिनों यू टर्न गुरू अन्नाजी के चेले पर लग रहे हैं। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

क्या केजरीवाल सीआईए के एजेंट हैं?

नई दिल्ली (एजेंसी)।  आज दिल्ली भाजपा नेता डॉ. हर्षवर्धन ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से मिले होने के आरोप लगाए हैं और पूछा है कि उनका शिमिरित ली से किस तरह का संबंध रहा है? ऐसे में प्रश्न उठता है कि यह शिमिरित ली कौन है, शोधार्थी या सीआईए एजेंट? दस्तावेज बताते हैं कि वह बतौर शोधार्थी ‘कबीर’ संस्था से जुड़े थी। इस संस्था के गॉड-फादर अरविंद केजरीवाल रहे हैं। विदित हो कि अरविन्द केजरीवाल को जब रमन मैग्सेसे पुरस्कार दिया गया था तो विस्तार से बताया नहीं गया था कि उन्होंने ऐसी कौन-सी महान उपलब्धि प्राप्त की है। वैसे मैग्सेसे पुरस्कार की फंडिंग भी अमेरिकी संस्था फोर्ड फाउंडेशन ही करती है जिससे भारी मात्रा में चंदा लेने के आरोप केजरीवाल की संस्था कबीर पर लग रहे हैं।
शिमरित ली को लेकर अटकलें लग रही हैं, क्योंकि शिमरित ली कबीर संस्था में रहकर न केवल भारत में आंदोलन का तानाबाना बुन रही थी, बल्कि लंदन से लेकर काहिरा और चाड से लेकर फिलिस्तीन तक संदिग्ध गतिविधियों में संलिप्त थी। शिमिरित ली दुनिया के अलग-अलग देशों में विभिन्न विषयों पर काम करती रही है। भारत आकर उसने नया काम किया। कबीर संस्था से जुड़ी। प्रजातंत्र के बारे में उसने एक बड़ी रिपोर्ट महज तीन-चार महीनों में तैयार की। फिर वापस चली गई। आखिर दिल्ली आने का उसका मकसद क्या था? इसे एक दस्तावेजी कहानी और अरविंद केजरीवाल के संदर्भ में समझा जा सकता है।
बहरहाल कहानी कुछ इस प्रकार है। जिस स्वराज के राग को केजरीवाल बार-बार छेड़ रहे हैं, वह आखिर क्या है? साथ ही सवाल यह भी उठता है कि अगर इस गीत के बोल ही केजरीवाल के हैं तो गीतकार और संगीतकार कौन है? यही नहीं, इसके पीछे का मकसद क्या है? इन सब सवालों के जवाब ढूंढ़ने के लिए हमें अमेरिका के न्यूयार्क शहर का रुख करना पड़ेगा। न्यूयार्क विश्वविद्यालय दुनिया भर में अपने शोध के लिए जाना जाता है। इस विश्वविद्यालय में ‘मध्यपूर्व एवं इस्लामिक अध्ययन’ विषय पर एक शोध हो रहा है। शोधार्थी का नाम है, शिमिरित ली। शिमिरित ली दुनिया के कई देशों में सक्रिय है। खासकर उन अरब देशों में जहां जनआंदोलन हुए हैं। वह चार महीने के लिए भारत भी आई थी। भारत आने के बाद वह शोध करने के नाम पर ‘कबीर’ संस्था से जुड़ गई। सवाल है कि क्या वह ‘कबीर’ संस्था से जुड़ने के लिए ही शिमिरित ली भारत आई थी? अभी यह रहस्य है। उसने चार महीने में एक रिपोर्ट तैयार की। यह भी अभी रहस्य है कि शिमरित ली की यह रिपोर्ट खुद उसने तैयार की या फिर अमेरिका में तैयार की गई थी।
बहरहाल, उस रिपोर्ट पर गौर करें तो उसमें भारत के लोकतंत्र की खामियों को उजागर किया गया है। रिपोर्ट का नाम है ‘पब्लिक पावर-इंडिया एंड अदर डेमोक्रेसी’। इसमें अमेरिका, स्विट्जरलैंड और ब्राजील का हवाला देते हुए ‘सेल्फ रूल’ की वकालत की गई है। अरविंद केजरीवाल की ‘मोहल्ला सभा’ भी इसी रिपोर्ट का एक सुझाव है। इसी रिपोर्ट के ‘सेल्फ रूल’ से ही प्रभावित है, अरविंद केजरीवाल का ‘स्वराज’। अरविंद केजरीवाल भी अपने स्वराज में जिन देशों की व्यवस्था की चर्चा करते हैं, उन्हीं तीनों अमेरिका, ब्राजील और स्विट्जरलैंड का ही जिक्र शिमिरित भी अपनी रिपोर्ट में करती हैं।
‘कबीर’ के कर्ताधर्ता अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया हैं। यहां शिमरित के भारत आने के समय पर भी गौर करने की जरूरत है। वह मई 2010 में भारत आई और कबीर से जुड़ी। वह अगस्त 2010 तक भारत में रही। इस दौरान ‘कबीर’ की जवाबदेही, पारदर्शिता और सहभागिता पर कार्यशालाओं का जिम्मा भी शिमरित ने ही ले लिया था। इन चार महीनों में ही शिमरित ली ने ‘कबीर’ और उनके लोगों के लिए आगे का एजेंडा तय कर दिया। उसके भारत आने का समय महत्वपूर्ण है।
यहूदी परिवार से ताल्लुक रखने वाली शिमिरित ली को 2007 में कविता और लेखन के लिए यंग आर्ट पुरस्कार मिला। उसे यह पुरस्कार अमेरिकी सरकार के सहयोग से चलने वाली संस्था ने नवाजा। यहीं वह सबसे पहले सीआईए अधिकारियों के संपर्क में आई। जब उसे पुरस्कार मिला तब वह जेक्शन स्कूल फॉर एडवांस स्टडीज में पढ़ रही थी। यहीं से वह दुनिया के कई देशों में सक्रिय हुई।
जून 2008 में वह घाना में अमेरिकन ज्यूश वर्ल्ड सर्विस में काम करने पहुंचती। नवंबर 2008 में वह ह्यूमन राइट वॉच के अफ्रीकी शाखा में बतौर प्रशिक्षु शामिल हुई। वहां उसने एक साल बिताए। इस दौरान उसने चाड के शरणार्थी शिविरों में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा संबंधी दस्तावेजों की समीक्षा और विश्लेषण का काम किया। जिन-जिन देशों में शिमिरित की सक्रियता दिखती है, वह संदेह के घेरे में है। हर एक देश में वह पांच महीने के करीब ही रहती है। उसके काम करने के विषय भी अलग-अलग होते हैं। उसके विषय और काम करने के तरीके से साफ जाहिर होता है कि उसकी डोर अमेरिकी अधिकारियों से जुड़ी है। दिसंबर 2009 में वह ईरान में सक्रिय हुई। 7 दिसंबर, 2009 को ईरान में छात्र दिवस के मौके पर एक कार्यक्रम में वह शिरकत करती है। वहां उसकी मौजूदगी भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि इस कार्यक्रम में ईरान में प्रजातंत्र समर्थक अहमद बतेबी और हामिद दबाशी शामिल थे।
ईरान के बाद उसका अगल ठिकाना भारत था। यहां वह ‘कबीर’ से जुड़ी। चार महीने में ही उसने भारतीय लोकतंत्र पर एक रिपोर्ट संस्था के कर्ताधर्ता अरविंद केजरावाल और मनीष सिसोदिया को दी। अगस्त में फिर वह न्यूयार्क वापस चली गई। उसका अगला पड़ाव होता है ‘कायन महिला संगठन’। यहां वह फरवरी 2011 में पहुंचती। शिमिरित ने वहां “अरब में महिलाएं” विषय पर अध्ययन किया। कायन महिला संगठन में उसने वेबसाइट, ब्लॉग और सोशल नेटवर्किंग का प्रबंधन संभाला। यहां वह सात महीने रही। अगस्त 2011 तक। अभी वह न्यूयार्क विश्वविद्यालय में शोध के साथ ही ‘अर्जेंट एक्शन फंड’ से बतौर सलाहकार जुड़ी हैं। पूरी दुनिया में जो सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और स्त्री संबंधी मुद्दों पर जो प्रस्ताव आते हैं, उनकी समीक्षा और मूल्यांकन का काम शिमिरित के जिम्मे है। अगस्त 2011 से लेकर फरवरी 2013 के बीच शिमिरित दुनिया के कई ऐसे देशों में सक्रिय थी, जहां उसकी सक्रियता पर सवाल उठते हैं। इसमें अरब देश शामिल हैं। मिस्र में भी शिमिरित की मौजूदगी चौंकाने वाली है। यही वह समय है, जब अरब देशों में आंदोलन खड़ा हो रहा था।
शिमिरित ली 17वें अरब फिल्म महोत्सव में भी सक्रिय रहीं। इसका प्रीमियर स्क्रीनिंग सेन फ्रांसिस्को में हुआ। स्क्रीनिंग के समय शिमिरित ने लोगों को संबोधित भी किया। इस फिल्म महोत्सव में उन फिल्मों को प्रमुखता दी गई, जो हाल ही में जन आंदोलनों के ऊपर बनी थी।
शिमिरित ली के कबीर संस्था से जुड़ने के समय को उसके विदेशी वित्तीय सहयोग के नजरिए से भी देखने की जरुरत है। एक वेबसाइट ने ‘सूचना के अधिकार’ के तहत एक जानकारी मांगी। उस जानकारी के मुताबिक कबीर को 2007 से लेकर 2010 तक फोर्ड फाउंडेशन से 86,61,742 रुपए मिले। 2007 से लेकर 2010 तक फोर्ड ने कबीर की आर्थिक सहायता की। इस बीच केजरीवाल को वर्ष 2006 में रमन मैग्सेसे पुरस्कार के माध्यम से 50000 डॉलर देकर उपकृत किया जा चुका था। इससे पहले केजरीवाल सरकारी नौकरी छोड़ चुके थे। इसके बाद 2010 में अमेरिका से शिमिरित ली ‘कबीर’ में काम करने के लिए आती हैं। चार महीने में ही वह भारतीय प्रजातंत्र का अध्ययन कर उसे खोखला बताने वाली रिपोर्ट केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को देकर चली जाती है। शिमिरित ली के जाने के बाद ‘कबीर’ को फिर फोर्ड फाउंडेशन से दो लाख अमेरिकी डॉलर का अनुदान मिला। इसे भारत की खुफिया एंजेसी ‘रॉ’ के अपर सचिव रहे बी. रमन की इन बातों से समझा जा सकता है।
एक बार बी. रमन ने एनजीओ और उसकी फंडिंग पर आधारित एक किताब के विमोचन के समय कहा था कि “सीआईए सूचनाओं का खेल खेलती है। इसके लिए उसने ‘वॉयस ऑफ अमेरिका’ और ‘रेडियो फ्री यूरोप’ को बतौर हथियार इस्तेमाल करती है।” अपने भाषण में बी. रमन ने इस बात की भी चर्चा की थी कि विदेशी खुफिया एजेंसियां कैसे एनजीओ के जरिए अपने काम को अंजाम देती हैं। किसी भी देश में अपने अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए सीआईए उस देश में पहले से काम कर रही एनजीओ का इस्तेमाल करना ज्यादा सुलभ समझती है। उसे अपने रास्ते पर लाने के लिए वह फंडिंग का सहारा लेती है। जिस क्षेत्र में एनजीओ नहीं है, वहां एनजीओ बनवाया जाता है। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

यह अंतरिम बजट नहीं यह पार्टी का घोषणापत्र है

18-2-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों, किसी भी आम बजट में दो बातें प्रमुख होती हैं. पहला, बजट से सरकार और पार्टी की आर्थिक और राजनीतिक सोच का पता चलता है और दूसरा, देश की वित्तीय नीतियों के बारे में पता चलता है। बजट के प्रावधानों से पता चल जाता है कि केंद्र सरकार की आर्थिक नीति कैसी होगी। दुर्भाग्यवश चिदंबरम अपनी सरकार और पार्टी की सोंच और नीतियों की बात तब करने चले हैं जबकि इस सरकार के दिऩ पूरे हो गए हैं।
यह साफ है कि वित्त मंत्री पी चिदंबरम द्वारा पेश अंतरिम बजट सिर्फ लोकसभा चुनाव को ध्यान में रख कर तैयार किया गया है। इस बजट का न  तो देश के वर्तमान से ही कुछ लेना-देना है और न ही भविष्य से ही।  हमें ध्यान रखना चाहिए कि ‘वोट ऑन एकाउंट’ में करों से संबंधित विशेष प्रावधान नहीं किये जाते हैं। चुनाव से पहले सरकारी खर्च के लिए ही अंतरित बजट पेश किया जाता है।
2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार और 2009 में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी अंतरिम बजट में करों का कोई नया प्रावधान नहीं किया था, लेकिन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इस बार ऐसा कर दिया। पहली बात तो यह कि यह संसदीय परंपराओं के खिलाफ है।
कुछ महीने बाद आम चुनाव होनेवाले हैं और मई, 2014 तक नयी सरकार का गठन हो जायेगा। नयी सरकार अपना पूर्ण बजट पेश करेगी। अगर यूपीए की सरकार फिर से बनती है और पी चिदंबरम ही फिर से वित्त मंत्री बनते हैं, तब भी अंतरिम बजट में की गयी घोषणाओं को लागू करना मुश्किल होगा। नियमों के तहत चिदंबरम यूपीए सरकार की दस साल की उपलब्धियों के बारे में बखानभर कर सकते थे।
हालांकि इस बात के लिए भी उनकी आलोचना होती, लेकिन चुनावी साल में अमूमन सभी ऐसा करते हैं। अंतरिम बजट में चिदंबरम द्वारा की गयी कुछ घोषणाओं को वास्तविकता में लागू नहीं किया जा सकता है। अब देश की जनता जागरूक हो गयी है। चुनावी साल में लोक लुभावन घोषणाओं से उसे बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है। आर्थिक लिहाज से भी इन घोषणाओं का कोई मतलब नहीं है।
यह ध्यान देने की बात है कि 2008-09 तक आर्थिक मंदी का सामना करने में भारत इसलिए सफल हो पाया था, क्योंकि तब उसकी बुनियाद मजबूत थी। वर्ष 2008 के बाद घरेलू निवेश का हिस्सा 65 फीसदी, जबकि घरेलू बचत 35 फीसदी था। वर्ष 2014 में कमरतोड़ महंगाई के कारण निवेश 34 फीसदी रह गया है। आज भारत के बड़े-बड़े उद्योगपति ही देश में निवेश नहीं  कर रहे हैं। पिछले पांच साल में भारत की आर्थिक बुनियाद काफी कमजोर हो गयी है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कमजोर और संकटग्रस्त है। भारतीय अर्थव्यस्था संस्थागत चुनौती का सामना कर रही है।  राजकोषीय घाटे को जिस तरह से कम करके बताया जा रहा है वह सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी है क्योंकि चिदंबरम ने बड़ी धूर्तता से सब्सिडी के 35000 करोड़ रुपए को अगले साल पर डाल दिया है। इतना ही नहीं इसके लिए आधारभूत संरचना और सामाजिक क्षेत्र पर होनेवाले खर्च में भी 90 हजार करोड़ रुपए की कटौती की गई है। ईंधन के लिए जो 65000 करोड़ रुपए की सब्सिडी रखी गई उसको प्राप्त करना तभी संभव होगा जबकि या तो सब्सिडी में अभूतपूर्व कमी कर दी जाए या फिर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के मूल्य धराशायी हो जाएँ। जाहिर है कि सब्सिडी कम करने की महती जिम्मेदारियों से आनेवाली सरकार को जूझना होगा। यूपीए-2 सरकार ने इस चुनौती का ख्याल नहीं रखा। महंगाई को कम करने पर ध्यान नहीं दिया गया। सिर्फ महंगाई रिजर्व बैंक की नीतियों से नियंत्रित नहीं हो सकती है। रिजर्व बैंक सिर्फ रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट को घटाने और बढ़ाने जैसे छोटे कदम उठा सकता है। महंगाई को कम करने के लिए सरकार को व्यापक कदम उठाने की जरुरत है। इसके लिए सरकार को पीडीएस व्यवस्था को दुरुस्त करने की कोशिश करनी चाहिए थी, लेकिन विभिन्न सेक्टरों में महंगाई को काबू में करने की कोशिश नहीं की गई। यह कोशिश न तो पिछले दस साल में दिखी, और न ही अंतरिम बजट में कोई प्रावधान किया गया। प्रणव दा द्वारा प्रस्तावित सब्सिडी को सीधे लाभार्थियों के खाते में डालने की योजना का अभी तक कहीं अता-पता नहीं है। आज देश के सामने आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ाने और महंगाई को कम करने की विकराल चुनौती है। यह आगे भी बनी रहेगी।
यूपीए सरकार के पूरे कार्यकाल में आधारभूत संरचना के विकास की गति काफी धीमी हो गयी। इससे रोजगार के अवसर भी कम हुए हैं। बड़ी परियोजनाएं कानूनी अड़चनों के कारण परवान नहीं चढ़ पायी। घोटालों के कारण नीतिगत स्तर पर ठहराव आ गया। रक्षा क्षेत्र की जरुरतों की छोटी-छोटी सामग्री भी विदेशों से आयात किए जाने लगे। इस कारण दूसरे दौर की सुधार प्रक्रियाओं को लागू करने में सरकार विफल रही। सरकार की इस नाकामी के कारण निवेशकों का विश्वास डोल गया जिसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा और आर्थिक विकास दर सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। अंतरिम बजट में आर्थिक विकास दर को बढ़ाने की कोई ठोस घोषणा नहीं की गयी। कुल मिला कर यह यूपीए सरकार का अंतरिम बजट नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी का अंतरिम घोषणापत्र है। सरकार ने इस बजट में लोकलुभावन नीतियों द्वारा ज्यादा-से-ज्यादा जनता को अपने पक्ष में करने का प्रयासभर किया है जिनमें किसान,पूर्व सैनिक,छात्र,अल्पसंख्यक आदि शामिल हैं। यह आरोप इसलिए भी सच लगता है क्योंकि पूर्व सैनिकों के लिए समान रैंक के लिए समान पेंशन की पार्टी युवराज राहुल गांधी द्वारा की गई मांग को अभी 48 घंटे भी पूरे नहीं हुए थे और मांग को तमाम परंपराओं को ताक पर रखते हुए पूरा भी कर दिया गया। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

एक गांव सुशासन ने जिसकी रोशनी छीन ली

17-2-14,भिखनपुरा (कुबतपुर),ब्रजकिशोर सिंह। कैसी बिडंबना है कि एक तरफ तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जोर-शोर से घोषणा करते फिर रहे हैं कि 250 की आबादी तक के गांवों को भी बिजली से जोड़ा जाएगा वहीं वैशाली जिले का एक गांव भिखनपुरा (कुबतपुर) ऐसा भी है जिसकी रोशनी खुद सुशासन ने छीन ली। वर्ष 2006 तक हाजीपुर-महनार मुख्य सड़क पर बिलट चौक के पास स्थित यह गांव दिन ढलते ही बिजली की रोशनी में नहा उठता था। उसी साल दुर्भाग्यवश ट्रांसफार्मर जल गया और तभी से गांव के 700 लोग बिजली का इंतजार कर रहे हैं। बीच में राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण परियोजना आई और चली भी गई लेकिन इस अभिशप्त गांव की किस्मत में मानो अंधेरा ही लिखा था। बगल के गांव खोरमपुर में इस परियोजना के अंतर्गत बिजली आ गई लेकिन कुबतपुर को इस परियोजना का लाभ नहीं मिल पाया।

पिछले साल गांव के लोगों में तब उम्मीद जगी जब गांव में बिजली लाने के लिए किसी को ठेका दे दिया गया। पोल गाड़े गए और टूटे हुए तारों को ठीक भी कर दिया गया मगर मामला फिर ट्रांसफार्मर पर आकर अँटक गया। ठेकेदार का मुंशी रंजन कुमार ट्रांसफार्मर लगाने के ऐवज में 20 हजार रुपए की रिश्वत मांग रहा है जिससे बाँकी के सारे काम पूरे हो जाने के बावजूद पिछले 6 महीने से गांव दिन ढलते ही अंधेरे में डूब जाता है। इस संबंध में जब जिले के कार्यपालक अभियंता रामेश्वर सिंह को जानकारी दी गई तो उन्होंने बताया कि वहाँ पर विद्युतीकरण का काम पावर ग्रिड कारपोरेशन ऑफ इंडिया कर रहा है इसलिए वे इस मामले में कुछ नहीं कर सकते। जब पावर ग्रिड कारपोरेशन ऑफ इंडिया के नंबर-0124-2571845 पर फोन किया गया तो कहा गया कि कंपनी के डीएमएस विभाग में 0124-2571929 पर फोन किया जाए कोई झा जी फोन उठाएंगे। हमने इस नंबर पर भी कई बार फोन किया मगर किसी ने फोन नहीं उठाया। हमने हाजीपुर के सांसद रामसुंदर दास और राजापाकर के विधायक श्री दास के पुत्र संजय कुमार के नंबर पर भी कई बार बात करने का प्रयास किया लेकिन हर बार मोबाईल बंद मिला।

इसके बाद हमने बिजली मंत्री,बिहार विजेंद्र प्रसाद यादव को फोन मिलाया तो कहा गया कि मंत्री जी इस समय हाउस में हैं इसलिए हम चाहें तो समस्या को फैक्स कर सकते हैं। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

मोदी,केजरीवाल और अंबानी

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,लोकसभा चुनाव के लिए चल रहा चुनाव प्रचार अब निर्णायक दौर में प्रवेश करने जा रहा है। भाजपा के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी अभी भी प्रधानमंत्री पद के अपने निकटतम अघोषित उम्मीदवार कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी से काफी आगे चल रहे हैं। तीसरे स्थान के लिए काफी जद्दोजहद है और इस स्थान पर आने के लिए इन दिनों जो व्यक्ति सबसे ज्यादा व्याकुल हो रहा है उसका नाम है रणछोड़ अरविन्द केजरीवाल।
मित्रों,श्री केजरीवाल ने 40000 रुपए मासिक की पेंशन और दिल्ली में ताउम्र एक बंगले पर अपने कब्जे को सुनिश्चित करते हुए मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया है। श्रीमान का झूठा और आधारहीन आरोप है कि भारत के सबसे धनवान व्यक्ति मुकेश अंबानी ने कांग्रेस और भाजपा को एक कर दिया है। यह तो नीरा राडिया प्रकरण में ही साबित हो गया था कि भारत की वर्तमान केंद्र सरकार को वास्तव में मुकेश अंबानी चला रहे हैं। यह तो स्थापित तथ्य है फिर नए सिरे से कांग्रेस पर आरोप लगाकर केजरीवाल क्या साबित करना चाहते हैं और क्या प्राप्त करना चाहते हैं? इससे पहले जब भाजपा की सरकार केंद्र में थी तब तो अंबानी परिवार की नहीं चलती थी और उसको बाँकी उद्योगपतियों से इतर कोई विशेष लाभ नहीं पहुँचाया गया था। फिर इस मामले में भाजपा को घसीटने का केजरीवाल का क्या औचित्य है? क्या यह आरोप भी आप विधायक मदनलाल के माध्यम से लगाए गए आरोपों की तरह मात्र पब्लिसिटी स्टंट नहीं है?
मित्रों,श्री केजरीवाल ने मोदी से अंबानी के बारे में राय मांगी है। क्या उन्होंने ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं किया है क्योंकि अंबानी भी मूल रूप से गुजराती है? मोदी ने तो टाटा,बिरला सहित सारे बड़े उद्योगपतियों के कारखाने गुजरात में स्थापित करवाए हैं और खुद पहल करके करवाए हैं फिर सिर्फ अंबानी पर ही मोदी से क्यों राय मांगी जा रही है? अगर मोदी ने बाँकी उद्योगपतियों की उपेक्षा करके अंबानी को कोई लाभ पहुँचाया है और इस तरह का कोई सबूत झूठ शिरोमणि श्री श्री केजरीवाल के पास है तो हम मीडिया के लोग उसका स्वागत करेंगे उसे अविलंब मीडिया के सामने प्रस्तुत किया जाए। वरना केजरीवाल जी बेबुनियाद बातें करना बंद करें क्योंकि उनकी कलई दिल्ली के 49 दिन के उनके कुशासन ने खोलकर रख दी है। श्री केजरीवाल न तो देश को सुशासन दे सकते हैं,न ही भ्रष्टाचार ही दूर कर सकते हैं वे तो बस अराजकता पैदा कर सकते हैं और जनता को दिन-रात झूठ बोलकर गुमराह कर सकते हैं,धोखा दे सकते हैं। देश-विदेश की भारतविरोधी ताकतों से अरबों-खरबों का बेहिसाब चंदा इकट्ठा कर सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि केजरीवाल ने पिछले 49 दिनों में यह साबित कर दिया है कि वे सिर्फ हंगामा कर सकते हैं सूरत को बदलना उनके बूते का रोग है ही नहीं। हम उन चंद भाग्यशाली व्यक्तियों में से हैं जिसने केजरीवाल की असलियत को तभी समझ लिया था जब वे दिल्ली विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार कर रहे थे।
मित्रों,इन दिनों कांग्रेस पार्टी जोर-शोर से प्रचार कर रही है कि मोदी के चाचा ने कैंटिन का ठेका ले रखा था। मैं उन कांग्रेस के झूठे,लफ्फाज अहमकों से पूछना चाहता हूँ कि प्रधानमंत्री तो श्री वरूण गांधी के चाचा भी थे फिर युवराज का दर्जा सिर्फ राहुल जी को ही क्यों प्राप्त है? क्यों कांग्रेस ने राजीव के छोटे भाई संजय को भुला दिया है? क्यों आज भी उनकी विधवा श्रीमती मेनका गांधी को गांधी परिवार में सदस्य का दर्जा प्राप्त नहीं है? जब वरूण के लिए पिता और चाचा में इतना बड़ा अंतर है तो फिर मोदी के लिए चाचा और पिता एकसमान कैसे हो गए? हो सकता है कि मोदी के चाचा धनवान हों मगर पिता गरीब हों जैसे कि राहुल कांग्रेस के युवराज है और वरूण कुछ भी नहीं हैं।
मित्रों,कांग्रेस ने किसी चायवाले के संगठन से यह प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लिया है। मैंने तो बिहार में कहीं भी चायवालों का संगठन नहीं देखा फिर गुजरात में उनका कौन-सा संगठन इस चुनावी मौसम में पैदा हो गया और अगर ऐसा कोई संगठन है भी तो क्या वह 40-45 साल पुराना है और क्या श्री मोदी के पिता दामोदर मोदी उसके सदस्य थे? वास्तव में कांग्रेस के ये अहमक नेता मोदी पर चाय संबंधी बयान देकर फँस गए हैं और इसलिए इन्होंने चायवालों का झूठा संगठन खड़ा करके और उसको प्रलोभन देकर ऐसा बयान दिलवाया है। अभी तो कांग्रेस पार्टी ने यह साबित करने की कोशिश ही की है कि मोदी की चाय की दुकान नहीं थी हमें तो उस दिन का भी इंतजार है जब वह यह कहेगी कि चाय पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और ऐसा वो चायपत्ती के पैकेटों पर भी छपवाएगी।
मित्रों,यह कोई संयोग नहीं है कि कांग्रेस ने मोदी के बारे झूठ की यह खेती तब नए सिरे से शुरू की है जबकि केजरीवाल सरकार ने खुदकुशी कर ली है और लोकसभा के चुनाव में हाथ आजमाने के लिए ताल ठोंकना शुरू कर दिया है। जाहिर है कि पहले भी कांग्रेस और केजरीवाल में मिलीभगत थी और आज भी है। अंत में एक शेर कलियुगी रणछोड़,हर बार अपनी जिम्मेदारियों को छोड़कर पलायन कर जानेवाले केजरीवाल सर के नाम-
झूठ और मक्कारी है यह इसे ईबादत का नाम न दो,
तुमने खुदकुशी की है इसे शहादत का नाम न दो।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

गुजरात गरीबी रेखा मामले में गलती किसकी?

ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। पिछले कई दिनों से मीडिया में गुजरात सरकार के खाद्य आपूर्ति विभाग द्वारा गरीबी रेखा के बारे में दिए गए निर्देश काफी चर्चा में हैं। इस बात को मद्देनजर रखते हुए गुजरात सरकार द्वारा इस संबंध में जो स्पष्टीकरण दिया गया है उसके अनुसार गरीबी रेखा का निर्धारण वह नहीं करती बल्कि भारत सरकार का योजना आयोग करता है। योजना आयोग ने वर्ष 2004 में इस संबंध में गुजरात सरकार को पत्र लिखा था और उसके बाद उसने कोई पत्र नहीं लिखा। गुजरात सरकार ने गरीबी रेखा के संबंधित जो भी दिशा-निर्देश 2004 के बाद से जारी किए हैं वे सभी उसी पत्र के आधार पर जारी किए गए हैं।
भारत सरकार के योजना आयोग ने गुजरात के बारे में वर्ष 2004 में इन मानदंडों के आधार पर अनुमान लगाया था कि उस समय गुजरात में 21 लाख परिवार गरीब थे। हालांकि गुजरात सरकार ने 11 लाख अतिरिक्त परिवारों को भी गरीबी रेखा के नीचे माना है। इन 11 लाख परिवारों में वे परिवार भी शामिल हैं जो गुजरात में अन्य राज्यों से आए हैं। इस तरह गुजरात में 32 लाख परिवारों को सब्सिडी वाले अनाज दिए जा रहे हैं। माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी गुजरात की जन वितरण प्रणाली की छत्तीसगढ़ के साथ ही प्रशंसा भी की है। सरकार ने यह स्पष्ट भी किया है कि 324 और 501 रुपये प्रति माह आयवाला यह मापदंड सिर्फ उन्हीं परिवारों के लिए है जिनका नाम अच्छी सम्पत्ति के कारण इस सूची में नहीं है। गुजरात सरकार ने भारत सरकार से बीपीएल संबंधी मापदंडों को बदलने की और राज्य सरकार को इससे संबंधित पत्र लिखने की गुजारिश भी की है जिससे वर्ष 2004 वाला पुराना मापदंड स्वतः निरस्त हो जाए। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

क्या केजरीवाल सचमुच जनलोकपाल को दिल्ली में लागू करना चाहते हैं?

ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। दिल्ली जन लोकपाल बिल 2014 को दिल्ली कैबिनेट द्वारा पास कर दिया गया है। परन्तु कैबिनेट इस बिल को सीधे दिल्ली विधानसभा में पेश करेगी, इसे केंद्र सरकार के सामने पेश नहीं किया जाएगा। संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला हुआ है ऐसे में केंद्र सरकार को बाईपास करके कोई बिल दिल्ली विधानसभा में सीधा पेश करना सीधे संविधान के ही खिलाफ है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या केजरीवाल दिल्ली में सचमुच इस कानून को लागू करना चाहते हैं? या फिर वे कानून पारित तो करना चाहते हैं लेकिन लागू करना नहीं चाहते यानि सांप भी मर जाए और लाठी चलानी भी नहीं पड़े।
हो सकता है कि केजरीवाल इसको असंवैधानिक तरीके से लागू करवाने पर भविष्य में अड़ जाएं और फिर से धरने पर बैठ जाएं कि हम तो इस संविधान को नहीं मानते बल्कि हम जैसे चाहते हैं वैसे ही पारित होने को संवैधानिक मान लिया जाए। अगर यह कानून दिल्ली विधानसभा से पारित हो भी गया तो वह असंवैधानिक हो जाएगा बस किसी के कोर्ट जाने भर की देरी है फिर केजरीवाल इस विधेयक को विधानसभा में पेश करने से पहले राष्ट्रपति के पास उसी तरह क्यों नहीं भेजना चाहते जैसे कि उन्होंने शीला दीक्षित पर मुकदमा चलाने के मामले में प्रस्ताव भेजा है। इतना ही नहीं इस विधेयक में दिल्ली पुलिस और दिल्ली विकास प्राधिकरण को भी लपेट लिया गया है जो दिल्ली सरकार के दायरे में आते ही नहीं हैं। क्या ऐसा करके केजरीवाल यह नहीं चाहते कि वे कानून बनाने का श्रेय भी ले लें और कानून  लागू भी न होने पाए? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

लगता है कांग्रेसियों ने वक-नकुल कथा नहीं पढ़ी

ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। संस्कृत में ऐसी बेशुमार शिक्षाप्रद कहानियाँ हैं जिनसे हम वर्तमान जीवन में भी सीख ले सकते हैं। कभी कांग्रेस का भी संस्कृत और भारतीय संस्कृति से लगाव हुआ करता था लेकिन अब तो कांग्रेस के कर्णधार अमेरिका-इंग्लैंड से पढ़कर आते हैं सो वे अपने संस्कृत वांग्मय से पूरी तरह से अनभिज्ञ होते हैं उनसे शिक्षा लेने की बात तो दूर ही रही।
हमने बचपन में अपनी संस्कृत की पाठ्य-पुस्तक में एक कथा पढ़ी थी-नक-वकुल कथा। कथा एक बगुले की है जो एक पेड़ की कोटर में परिवार सहित रहता है। उसके कोटर से एक बिल जाता है जो एक साँप के बिल तक जाता है। परिणाम यह होता है कि जब भी मादा बगुला अंडा देती है और उनके बच्चे होते हैं साँप आकर उनका भक्षण कर जाता है। इस तरह बगुला दम्पति परेशान रहता है कि आगे हमारा संतति कैसे चलेगी। फिर एक दिन बगुला पेड़ के पास एक नेवले को देखता है और साँप को मारने की फुलप्रुफ योजना बनाता है। वह नदी से मछली पकड़कर लाता है और उसके टुकड़े करके नेवले के बिल से लेकर साँप के बिल तक बिछा देता है। नेवला भी ठहरा मांसाहारी सो मछलियों के टुकड़ों को खाता-खाता अंत में साँप के बिल तक पहुँचता है और साँप को मार देता है। लेकिन अब बगुले के समक्ष एक नई समस्या खड़ी हो जाती है। साँप को मारने के बाद नेवला वहीं से वापस नहीं हो जाता बल्कि पेड़ पर बिल से और ऊपर चढ़ता हुआ नेवला बगुले के कोटर तक पहुँच जाता है और उसके सारे अंडों और बच्चों को खा जाता है। इस तरह बगुले की समस्या जस-की-तस बनी रह जाती है। साँप का तो ईलाज उसने कर दिया अब नेवले का ईलाज कहाँ से लाए?
मेरा मानना है कि अगर कांग्रेसियों ने यह नीति-कथा पढ़ी होती तो आज उनके समक्ष और देश के सामने भी अरविन्द केजरीवाल एंड गिरोह की समस्या नहीं खड़ी हुई होती। माना कि अरविन्द केजरीवाल मोदी-रथ को आगे बढ़ने से रोक देगा लेकिन उसके बाद वो देश में जो अराजकता फैलाएगा जिस तरह कि इन दिनों दिल्ली में फैला रहा है तो उसका ईलाज कांग्रेस और देश कहाँ से लाएगा? यह आदमी मिनट-मिनट पर झूठ बोलता है,पैंतरे बदलता है। आज यह न्यायिक जाँच और न्यायपालिका पर अविश्वास प्रकट करते हुए मांग नहीं मानने पर गणतंत्र दिवस जो भारत की अस्मिता का प्रतीक है को बाधित करने की धमकी दे रहा है कल कहेगा कि वो खुद नया संविधान बनाएगा क्योंकि पूरे देश में सिर्फ उसी के पास दिमाग है और पूरे देश को उस संविधान पर चलना पड़ेगा। आज वो संवैधानिक पद पर रहते हुए खुलेआम,बेशर्मी से कानून तोड़ रहा है,निषेधाज्ञा का उल्लंघन कर रहा है और कांग्रेस उसको गिरफ्तार करने के बदले सिर्फ मुँहजबानी आलोचना कर रही है कल वो कहेगा कि मैं जो कहता हूँ वही कानून है और सबको न चाहते हुए भी उसी के कानून को मानना पड़ेगा तब कांग्रेस के साथ-साथ पूरे देश के सामने जो समस्या खड़ी होगी क्या उसका हल है कांग्रेस के पास? जिस आदमी को कश्मीरी अलगाववाद,वामपंथी उग्रवाद के समर्थन के आरोप में जेल में होना चाहिए उसे कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बना दिया? अगर केजरीवाल की जगह कोई आम आदमी होता और उसने निषेधाज्ञा का उल्लंघन किया होता तो कब की पुलिस उसे वहाँ से गिरफ्तार कर हटा चुकी होती फिर स्वघोषित आम आदमी केजरीवाल के साथ वीआईपी जैसा व्यवहार क्यों? देश रहेगा,संविधान रहेगा,कानून रहेगा तभी कांग्रेस के दोबारा सत्ता में आने की संभावना भी रहेगी लेकिन अगर एक अराजकतावादी को कांग्रेस साजिशन देश का भाग्य-विधाता बन जाने देगी तो न तो देश रहेगा न ही देश का बाबा साहेब का बनाया संविधान और न ही कानून का राज। एक पागल दिन-रात जनता की ईच्छा के नाम पर उल्टे-सीधे आदेश दिया करेगा और लोग उत्तर कोरिया के नागरिकों की तरह न चाहते हुए उन पर अमल करने को बाध्य होंगे। तब उस नेवले का ईलाज कांग्रेस के बगुले कहाँ से लाएंगे? तब क्या उन कांग्रेसी घुनों के साथ-साथ देश की गेहूँ रूपी जनता भी अराजकता और एक पागल की प्रलाप रूपी चक्की में नहीं पिस जाएगी?
मुझे याद आता है अपना पढ़ा एक प्रसंग। तब कांग्रेस नेता सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं। उनके पति आचार्य कृपलानी कांग्रेस छोड़ चुके थे और लखनऊ में कांग्रेस-सरकार के खिलाफ ही आंदोलन कर रहे थे। उन्होंने भी निषेधाज्ञा का उल्लंघन किया। डीजीपी ने सुचेता जी से पूछा कि क्या करें? सुचेता जी ने बेहिचक गिरफ्तार करने का आदेश दिया। शाम में वे खुद थाने में जमानत देने भी पहुँची तो आचार्य कृपलानी ने नाराजगी दिखाते हुए पूछा कि यह सब क्या है? पहले गिरफ्तार करवाया अब जमानत दे रही हो तब सुचेता जी ने कहा था कि गिरफ्तार करवाना एक मुख्यमंत्री का कर्त्तव्य था और अब जमानत देना एक पत्नी का फर्ज है। कहाँ गई कांग्रेसियों की वो नैतिकता? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 20 जनवरी 2014

शुरू हो गया दिल्ली की सड़कों पर हाई वोल्टेज ड्रामा

ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। आपने ड्रामें तो बहुत सारे देखे होंगे लेकिन माँ कसम इतना बड़ा और हाई वोल्टेज ड्रामा कभी नहीं देखा होगा। दिल्ली की पूरी सरकार सारे नियमों-कानूनों को रौंदती हुई,शपथ-ग्रहण के समय खाई हुई सारी शपथों पर थूकती हुई निषेधाज्ञा का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन करती हुई खुद ही धरने पर बैठ गई है। चोरी और सीनाजोरी ऐसा उदाहरण शायद ही फिर से कभी देखने को मिले। जिन्होंने समर्थन देकर सरकार बनवाई यह उनकी ही सरकार के खिलाफ एक दूसरी सरकार का आंदोलन है। कई विदेशी महिलाओं को इनके मंत्री ने आधी रात में नाजायज तरीके से बंदी बना लिया। यहाँ तक कि सबके सामने ही मूत्र-विसर्जन करने के लिए बाध्य किया और खुद ही पीड़ित बनकर अब धरने पर जा बैठे हैं।
यह सही है कि दिल्ली पुलिस भ्रष्ट है। दिल्ली पुलिस क्या सारे राज्यों की पुलिस भ्रष्ट है। मगर क्या इस तरह पूरी दिल्ली को जाम कर देने,चार-चार मेट्रो स्टेशनों को बंद कर देने से दिल्ली पुलिस ईमानदार हो जाएगी? क्या निर्दोष विदेशी महिलाओं के मानवाधिकारों का उल्लंघन करने से,उनको नाजायज तरीके से हिरासत में रखने से दिल्ली पुलिस ईमानदार हो जाएगी? गृह-मंत्री द्वारा पैसे लेकर थाना बेचने का आरोप तो पूर्व गृह सचिव व भाजपा नेता आर.के. सिंह ने भी लगाए थे जो कदाचित् सही भी हैं तो क्या चार वांछित लोगों का तबादला कर देने से गृह-मंत्री ईमानदार हो जाएंगे? कल हो सकता है कि केंद्र इनकी मांग मान भी ले क्योंकि इनका रिमोट तो कांग्रेस के पास ही है तो आज जो जनता को परेशानी हुई वो वापस हो जाएगी? क्या अरविन्द केजरीवाल की चांडाल चौकड़ी उसको वापस कर सकती है? सरकार चलाना और आंदोलन करना दो अलग-अलग काम हैं,बिल्कुल अलग-अलग तरीके के काम हैं। अन्ना अच्छे आंदोलनकारी हैं लेकिन कोई जरूरी नहीं कि मौका मिलने पर वे अच्छा शासन भी कर सकें। हो सकता है कि वे इस मामले में टांय-टांय फिस्स हो जाएँ। अरविन्द भी अच्छे आंदोलनकारी हैं,कहीं उससे अच्छे रंगमंच-कलाकार भी हो सकते हैं लेकिन उनका 20 दिन का काम बताता है कि वे शासक अच्छे नहीं हैं बल्कि बुरे हैं। वे ड्रामा कर सकते हैं,हंगामा भी कर सकते हैं लेकिन अच्छी सरकार नहीं दे सकते। कभी इसी कारण से ब्रिटेन की जनता ने उनको द्वितीय विश्वयुद्ध में जीत दिलानेवाले प्रधानमंत्री चर्चिल को पदमुक्त कर दिया था क्योंकि चर्चिल युद्ध के दिनों के लिए तो इस पद के लिए उपयुक्त थे परंतु निर्माण-काल के लिए अनुपयुक्त।
केजरीवाल को समझना चाहिए कि दिल्ली की सरकार को शासन का पूरा अधिकार नहीं है क्योंकि दिल्ली एक केंद्रशासित प्रदेश है और आगे भी रहना चाहिए अन्यथा कल को बिहार-यूपी वालों के साथ भी वही सलूक होगा जो मुम्बई में अक्सर होता है। मैं तो मांग करता हूँ कि मुम्बई को भी केंद्रशासित प्रदेश ही होना चाहिए। फिर भी दिल्ली सरकार के हाथों में काफी अधिकार है जिनका इस्तेमाल करके वो चाहे तो दिल्लीवालों का काफी भला कर सकती है। इस समय दिल्ली की सड़कों पर सर्वाहारा वर्ग के लोग ठंड के मारे दम तोड़ रहे हैं और सरकार गायब है। अरविन्द और उनकी सरकार को वहाँ होना चाहिए न कि धरने पर। दिल्ली की सरकार को तेज गति से उन वादों को पूरा करने के लिए मुस्तैद होना चाहिए जो उसने चुनाव-परिणाम आने से पहले किए थे  न कि धरने पर। दिल्ली सरकार को पहले उन नौ लाख लोगों की चिंता करनी चाहिए थी जिन्होंने उनलोगों की बातों में आकर पिछले एक साल से बिजली और पानी का बिल उनके इस वादे पर भरोसा करके नहीं भरा कि हमारी सरकार आने पर हम उनका सारा-का-सारा बिल माफ कर देंगे। उनको उन दिल्लीवासियों की चिंता करनी चाहिए जिनको उनके द्वारा पानी और बिजली पर दी जानेवाली छूट से कोई फायदा नहीं होनेवाला है बल्कि बढ़ी हुई दरों से नुकसान होनेवाला है। शायद ऐसे ही किसी मौके पर किसी दूरदराज के गांव में यह कहावत गढ़ी गई होगी-नाच न जाने आंगन टेढ़ा। करो,करते रहो आंगन को सीधा। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

किनारे से निकल गए केजरीवाल



दिल्ली विधानसभा में विश्वासमत पर हुई चर्चा के दौरान अपने उत्तर में दिल्ली के नए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने विपक्ष के नेता डॉ. हर्षवर्द्धन और रामवीर सिंह विधूड़ी द्वारा उठाए गए किसी भी प्रश्न का सीधे-सीधे जवाब नहीं दिया और गोल-मोल उत्तर देते हुए किनारे से निकल गए। उन्होंने यह नहीं बताया कि चुनाव प्रचार के समय उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और उनके मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लगाए थे उनका क्या होगा? उन्होंने यह भी नहीं बताया कि पिछली सरकार में हुए भ्रष्टाचारों की जाँच कब कराई जाएगी या फिर कराई जाएगी भी या नहीं। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि बिजली-पानी पर उन्होंने जो सब्सिडी का गंदा खेल शुरु किया है उसका देश की अर्थव्यवस्था पर कैसे प्रभाव पड़ेगा? अगर बाँकी सरकारों ने भी मजबूरी में इस मामले में उनका अनुशरण करना शुरु कर दिया तो पहले से ही मंदी भुगत रही अर्थव्यवस्था तो दम ही तोड़ देगी। सिर्फ भारतमाता की जय का झूठा नारा लगाने से ही तो भारतमाता की जय नहीं हो जाएगी। उनकी प्रत्येक पंक्ति में एक शब्द जरुर आ रहा था और वो शब्द था-आम आदमी। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार को आम आदमी चलाएगा। तो क्या सचिवालय में प्रेस के प्रवेश पर रोक उन्होंने एसएमएस और जनसभाओं द्वारा आमआदमी की राय लेकर लगाई है? आप चुनाव-प्रचार के समय तो हर काम प्रेस को बुलाकर किया करते थे। यहाँ तक कि शपथ-ग्रहण के लिए आते समय मेट्रो में महिलाएँ सीट पर बैठकर आपने बड़े ही ठाठ से फोटों खिंचवाया फिर मुख्यमंत्री बनते ही आपने मीडिया से दूरी क्यों बना ली? क्या उन्होंने या उनकी पार्टी ने राष्ट्रमंडल घोटाले में शीला दीक्षित को क्लिन चिट भी आमआदमी से पूछकर दी है? क्या शीला और उसके मंत्रियों के खिलाफ सबूत जुटाना भी आम आदमी का ही काम है?
इतना ही नहीं केजरीवाल ने अपने भाषण में आम आदमी की परिभाषा को भी बदल दिया। पहले जहाँ पीड़ित-दलित-शोषित-ग्रास रूट लेवल पर स्थित व्यक्ति को आम आदमी माना जाता था केजरीवाल के अनुसार आम आदमी वह है जो भ्रष्ट नहीं है और खास आदमी वह है जो भ्रष्ट है। क्या केजरीवाल बताएंगे कि कौन भ्रष्ट है और कौन नहीं का निर्णय कौन करेगा? क्या वे खुद ही इसका निर्णय लेंगे और सिर्फ वही निर्णय लेंगे? फिर तो भ्रष्टाचार और भ्रष्ट व्यक्ति की भी परिभाषा निर्धारित करनी पड़ेगी। खुद केजरीवाल भ्रष्ट हैं या नहीं इसका पता कैसे चलेगा? जो व्यक्ति अपने बच्चों की कसमें खाकर मुकर गया हो वो सच बोलता भी होगा कौन मानेगा? क्या आप कभी आयकर आयुक्त थे भी जैसा कि आप दावा करते रहे हैं? आयकर अधिकारियों का संगठन तो आपको इस मामले में भी झूठा ठहरा रहा है। केजरीवाल जी मनोहर पार्रीकर,माणिक सरकार,डॉ. हर्षवर्द्धन जैसे कई राजनेता भारत की धरती पर इस समय पहले से ही मौजूद हैं जो अपनी ईमानदारी और सच्चाई के लिए जाने जाते हैं। न तो उनको अपनी ईमानदारी साबित करने के लिए बच्चों की कसमें खानी पड़ती है और न ही किसी मान्य परिभाषा को बदलने की। ईमानदारी स्वयंसिद्ध होती है। उसको दिखावे द्वारा जबरन साबित करने की कोशिश न तो पहले कभी सफल हुई है और न तो आगे सफल होनेवाली है। हाँ,कुछ देर के लिए झूठ का सिक्का जरुर चल जा सकता है लेकिन एक-न-एक दिन तो उसकी कलई उतर ही जाती है। आपको बड़े-बड़े उजले कॉलर वाले पदाधिकारियों व धनपतियों को आम आदमी पार्टी में शामिल करना है तो करिए मगर आम आदमी की परिभाषा को तो भ्रष्ट नहीं करिए। हमारे कुछ मित्र कह सकते हैं कि भाजपा ने भी तो येदुरप्पा को वापस लिया तो मैं उन मित्रों की जानकारी के लिए बता दूँ कि येदुरप्पा भ्रष्टाचार के सारे मामलों में पहले ही कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा बरी किए जा चुके हैं। ऐसे में मैं नहीं मानता कि उनको पार्टी में वापस लेने में कोई बुराई है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि इंसाफ का तकाजा तो यह है कि जब तक कोर्ट सजा न दे दे कोई अपराधी नहीं होता,व्यक्ति ईमानदार हो या नहीं हो उसको कानून की नजरों में ईमानदार होना चाहिए लेकिन नैतिकता को तकाजा तो यही है कि व्यक्ति को न सिर्फ ईमानदार दिखना चाहिए बल्कि होना भी चाहिए। मैं आपसे नैतिकता की आशा इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि आप कथित रूप से राजनीति की मरुभूमि में नैतिकता की गंगा प्रवाहित करने आए हैं। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

मैं कुतिया हूँ!


मैं दुनिया की कथित रूप से सबसे सभ्य प्रजाति आदमी की भाषा में एक कुतिया हूँ। मैं जानती हूँ कि उनकी भाषा में यह एक गाली है यानि मैं दुनिया के लिए एक गाली हूँ। इंसानों को क्या पता कि मेरा जीवन कितना दुःखमय रहा है। जबसे पैदा हुई जाड़ा,गर्मी और बरसात सब मैंने नीले आसमान के तले गुजारी है। कभी किसी ने रोटी दे दी तो किसी ने लात मार दी। रोटी देनेवाले को मैंने पूँछ हिलाकर हमेशा शुक्रिया कहा मगर लात मारनेवाले को कभी काटा नहीं। मैं खुदमुख्तार और आजाद हूँ इसलिए भी मुझे दुःख के थपेड़ों का ज्यादा सामना करना पड़ा। कई बार इंसान हम जैसे स्वतंत्रता पसंद कुत्तों को आवारा भी कह डालते हैं लेकिन हम आवारा नहीं हैं हम तो समय के मारे हैं। इतना कष्ट उठाने के बावजूद मुझे अपनी जिंदगी को लेकर तब तक कोई शिकायत नहीं थी जब तक कि मैं माँ नहीं बनी थी।
                        यही कोई एक महीना पहले मैंने 8 छोटे-छोटे बच्चों को जन्म दिया। 5 काले,दो भूरे और एक चितकबरा। उनमें से चितकबरे को मेरे निवास-स्थान यानि जिस खुले मैदान में मैं रहती हूँ के सामनेवाले घर ने अपना लिया और इस तरह मेरे पास बच गए 7 बच्चे। जब भी कोई इंसान हमारे बच्चों को अपनाता है तो एक साथ हमें दुःख और सुख दोनों होता है। दुःख होता है अपने बच्चे से बिछुड़ने का और सुख होता है यह सोंचकर कि मेरे एक बच्चे का जीवन अब सुरक्षित हो गया। उसी घर के बगल के घर में एक बुढ़िया रहती है जो जब-तब मेरे बच्चों को डंडे और लात से मारती रहती है। बच्चों का क्या वे चले ही जाते हैं उसके कैंपस में रोटी के लालच में।
                                           अभी दस दिन भी नहीं बीते थे मुझे माँ बने कि ठंड पड़नी शुरू हो गई। आप इंसान तो रजाई ओढ़कर आराम से ठंड गुजार लेते हो हम पर इस मौसम में क्या बीतती है यह हमीं जानते हैं। गाँव में तो बुझे हुए अलाव के गड्ढ़ों में बैठकर या घास-भूसे के ढेर में घुसकर हमारे रिश्तेदार गर्मी प्राप्त कर लेते हैं परंतु शहरों में तो खुले आसमान के तले ठिठुरने के सिवाय कोई रास्ता ही नहीं बचता। अकेली थी तो कोई चिंता नहीं थी लेकिन इस बार 7-7 बच्चे भी तो थे। मैं सातों बच्चों को अपने तन से ढँक लेती और रातभर अपने शरीर की गर्मी देती रहती जिससे उनको ठंड न लगे और उनकी मृत्यु न हो। सुबह होते ही फिर पेट भरने की जद्दोजहद। अगर खाना न खाऊँ तो दूध कैसे बने और बच्चों को क्या पिलाऊँ? यकीन मानिए मैं कभी अपने अपने बच्चों को अकेले नहीं छोड़ना चाहती मगर एक तो मेरे पेट की आग और फिर बच्चों को भी दूध चाहिए इसलिए जहाँ-जहाँ इंसान कूड़े फेंकता है मैं भटकती रहती हूँ कि कुछ अवशिष्ट-जूठन मिल जाए।
                                            इसी तरह एक दिन मैं बच्चों के पास नहीं थी। बच्चों को आपस में खेलता-कूदता छोड़कर दूर निकल गई थी कि अचानक इंसानों के तीन-चार शरारती बच्चे आए और मेरे एक काले रंगवाले बच्चे को पूँछ से पकड़कर उठाकर ले गए। मैं दूर से ही सबकुछ देख रही थी। फिर उन्होंने उसको जूठी सब्जियों के रस से भरे गड्ढ़े में डूबा दिया। बेचारा तड़प उठा एक तो भीषण ठंड उस पर मिर्च-मसालों की जलन। उन बच्चों का दिल इतने से ही नहीं माना और वे उस पर पत्थर भी बरसाने लगे। तभी उस पर एक देवदूत सरीखे इंसान की नजर पड़ी और उन्होंने बच्चों को भगाकर मेरे बच्चे को अपने हाथों से बाहर निकाला। जब वह देवदूत बच्चे को अन्य बच्चों के पास छोड़ने आ रहा था तब गलतफहमी में मैं उस पर गुर्राई भी थी मगर उसने कुछ भी बुरा नहीं माना। फिर मैं उस बच्चे को देर तक चाटती रही जिससे उसका तन तो सूख ही जाए उसकी थरथराहट भी दूर हो जाए। खैर किसी तरह मेरा वह प्यारा बच्चा जीवित बच गया।
                          लेकिन वो कहते हैं न कि जब विपदा आती है तो अकेली नहीं आती। कल होकर वही क्रूर बच्चे फिर से आए और मेरे एक भूरेवाले बच्चे को साथ लेकर चले गए। उसी दिन शाम में मैंने उसकी लाश बगल के चौराहे पर पड़ी हुई देखी। वो मेरा सबसे बड़ा बच्चा था। भोला था,तुरंत इंसानों पर विश्वास कर लेता था और थोड़ा-सा पुचकारने पर पीछे-पीछे चल देता था। मैं उसके मृत शरीर को दूर से ही देखती रही और रोती रही,अकेली,चुपचाप। फिर भी मैं उन शरारती बच्चों को शाप नहीं दूंगी मैं इंसान थोड़े ही हूँ कि बदले की भावना रखूँ।
                              यह मेरा सौभाग्य है कि मेरे निवास के पास एनएच नहीं है अन्यथा मेरे कई बच्चे अब तक सड़क-दुर्घटना के शिकार हो चुके होते और इंसानों की मौत मर चुके होते। आज कई दिनों के बाद आसमान पर चटख धूप खिली हुई है। रातभर मेरे छहों बच्चे मुझसे चिपककर ठंड के मारे कराहते रहे लेकिन अभी आपस में खेल-कूद रहे हैं। उनमें से कुछ इतने बड़े हो गए हैं कि खड़े-खड़े ही मेरा दूध पी लेते हैं और मुझे उनको दूध पिलाने के लिए झुकना या बैठना नहीं पड़ता। लगभग सारे-के-सारे बच्चे अब भोजन की तलाश में खुद ही कूड़ों का चक्कर भी लगाने लगे हैं। मैं क्या करूँ बड़ा होने के साथ उनका पेट भी तो बढ़ने लगा है और सिर्फ मेरे दूध से उनकी भूख नहीं मिट पा रही। इंसानों ने भी अब बचा हुआ भोजन फेंकना कम कर दिया है और जो कुछ भी बचता है वे उसे फ्रिज में रख देते हैं। पता नहीं आनेवाले समय में मेरे बच्चों का जीवन कैसे कटेगा? वैसे भी दिन-प्रतिदिन इंसानों का नैतिक पतन होता जा रहा है। वे अब अपनों को भी नहीं बख्श रहे। हमारे बच्चों को भी तो रहना आखिर इंसानों की दुनिया में ही है। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)    
पुनश्च-11-01-2014, मित्रों कल रात से ही हाजीपुर में बरसात हो रही है। मेरी पड़ोसन कुतिया के तीन काले वाले बच्चे रात की बारिश और ठंड को झेल नहीं सके और रात में ही दम तोड़ दिया। खुले मैदान में वो जीवित रह भी कैसे सकते थे जबकि सबकुछ जमा देनेवाली ठंड पड़ रही हो? सुबह अपने बचे हुए बच्चों को लेकर वो कई परिसरों में गई कि कोई तो ऐसा दयालु इंसान होगा जो उसे और उसके बचे हुए तीनों बच्चों को आश्रय दे देगा लेकिन कहीं तो उस पर डंडों की बरसात की गई तो कहीं लात-जूतों की। बरसात अभी भी जारी है और ठंड लगातार बढ़ती जा रही है लेकिन वो बेचारी कुतिया अपने बच्चों के साथ लगातार वर्षा में भींग रही है।                  

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

नो वन किड्नैप्ड नवरुणा


मुजफ्फरपुर से अपने घर से सोते समय खिड़की तोड़ कर 18 सितंबर,2012 की रात में अपहृत कर ली गई नवरुणा के मामले में उस समय दिलचस्प मोड़ आ गया जब केन्द्रीय जाँच एजेंसी सीबीआई ने मामले की जाँच के बिहार सरकार के अनुरोध को ठुकराते हुए केस से संबंधित कागजात वापस कर दिए। ऐसे में प्रश्न उठता है कि अब इस मामले का होगा क्या? क्या इस मामले का भी हश्र वही होने जा रहा जो कभी जेसिका हत्याकांड का हुआ था कि नो वन हैव किल्ड जेसिका? अगर अपहरण हुआ तो लड़की गई कहाँ और अगर नहीं हुआ तो लड़की कहाँ है? जब तीन-चार घंटे में निर्भया के साथ दुष्कर्मी दरिंदगी की प्रत्येक हद को तोड़ सकते हैं तो अपहर्त्ताओं ने 12 साल के उस मासूम के साथ इतने दिनों में कितनी दरिंदगी की होगी यह सोंचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
नवरुणा अपहरण कांड न सिर्फ बिहार पुलिस,सीआईडी बल्कि पूरी बिहार सरकार की कार्यक्षमता पर लगा हुआ एक बहुत बड़ा प्रश्न-चिन्ह है। इस अपहरण कांड और उसके उद्भेदन में बिहार सरकार के तंत्र की विफलता से यह आशंका भी जन्म लेती है कि इसके पीछे कहीं-न-कहीं बहुत-ही प्रभावशाली लोगों का हाथ है। वे कदाचित मुजफ्फरपुर में पीढ़ियों से बसे बंगालियों को भगाकर उनकी बहुमूल्य जमीन पर कब्जा जमाना चाहते हैं। यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि पिछले दिनों कई बंगालियों पर मुजफ्फरपुर में जानलेवा हमले हो चुके हैं। ये लोग इतने अधिक प्रभावशाली हैं कि शायद इनकी सीधी पहुँच न सिर्फ पटना बल्कि दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठानों तक भी है। संदेह तो यह भी उत्पन्न हो रहा है कि क्या सचमुच बिहार सरकार या पुलिस जाँच को लेकर गंभीर है या फिर जाँच का ढोंग मात्र कर रही है? सीबीआई ने हालाँकि जाँच से इन्कार करके बिहारवासियों व नवरुणा के परिजनों को निराश किया है तथापि उसको इसलिए कर्त्तव्यविमुखता के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि कानून-व्यवस्था मूल रूप से राज्य का विषय होता है न कि केंद्र का। (हाजीपुर टाईम्स से साभार)

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

कहीं यह कांग्रेस-केजरीवाल का फिक्स मैच तो नहीं?

मित्रों,अभी कुछ दिन जब अरविन्द केजरीवाल अपने कथित पूजनीय गुरू अन्ना हजारे पर कांग्रेस के हाथों की कठपुतली होने और दोनों के बीच सबकुछ पूर्वनिर्धारित होने का आरोप लगा रहे थे तब मैं यह सोंचने में लगा था कि कहीं कांग्रेस और केजरीवाल के बीच फिक्स मैच तो नहीं चल रहा है? वरना ऐसा न तो पहले देखा गया था और न ही सुना गया था कि कोई पार्टी उसी पार्टी की सरकार को बिना शर्त समर्थन दे जिसने उसके अस्तित्व पर ही प्रश्न-चिन्ह लगा दिया हो और कांग्रेस जैसी धूर्त पार्टी ऐसा महामूर्खता तो बिना वजह के कर ही नहीं सकती।
                    मित्रों,जहाँ तक मुझे लगता है कि आप पार्टी कांग्रेस की प्रयोगशाला में तैयार तजुर्बा है जो मोदी रथ को रोकने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। याद कीजिए कि केजरीवाल को प्रमोट किसने किया-केंद्र की कांग्रेस सरकार ने। अन्ना हों या केजरीवाल दोनों ही कांग्रेस द्वारा फिक्स किए गए मैच को खेल रहे हैं। कहना न होगा कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का आप पार्टी प्रयोग बेहद सफल रहा है। सत्ता का जाम भाजपा के होठों तक पहुँचते-पहुँचते दूर हो गया है। सोंचिए,कल्पना कीजिए कि अगर कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन देकर आप को सत्ता में आने का अवसर नहीं दिया होता तो क्या होता? तब केजरीवाल अभी तक मीडिया से सिरे से गायब हो चुके होते और यह चर्चा शुरू ही नहीं होती कि क्या केजरीवाल अब मोदी का रथ रोकेंगे? जाहिर है कि अगर दिल्ली विधानसभा की तरह ही लोकसभा चुनावों में भी त्रिशंकु की स्थिति बनती है तो सबसे ज्यादा संतोष कांग्रेस को होगा। चाहे मुख्यमंत्री केजरीवाल हों या शीला दीक्षित या फिर प्रधानमंत्री अरविन्द केजरीवाल हों या मनमोहन सोनिया गांधी परिवार को कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता क्योंकि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण सहित अधिकांश मुद्दों पर आप और कांग्रेस की विचारधारा एक है। कांग्रेस को अगर नफरत है तो सिर्फ हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व से जिसके उभार को रोकने के लिए वो केजरीवाल तो क्या ड्रैकुला से भी हाथ मिला सकती है। जो मित्र केजरीवाल के बार-बार जनता के पास जाने और हर काम को जनता की ईच्छा बताकर करने को नई तरह की राजनीति की शुरुआत मान रहे हैं उनको मैं हिटलर का इतिहास पढ़ने की सलाह दूंगा जो केजरीवाल की ही तरह जनता की ईच्छा बताकर बुरे-से-बुरे काम को अंजाम दिया करता था। जनलोकप्रियता की राजनीति हमेशा अच्छा परिणाम नहीं देती बल्कि कई बार शासन को देश-प्रदेश के हित में जनाकांक्षाओं की अनदेखी भी करनी पड़ती है।
                               मित्रों,इस बीच आप पार्टी के नेताओं के सुर भी आरोपों और वादों को लेकर बदलने लगे हैं। पहले जहाँ ये स्वयंभू-स्वघोषित ईमानदार बिजली कंपनियों से कमीशन खाकर कांग्रेस सरकार पर बिजली के दर बढ़ाने के आरोप लगा रहे थे और यह दावा भी कर रहे थे कि वे बिजली कंपनियों का ऑडिट करवाएंगे और अगर जरूरी हुआ तो उनको हटाकर नई कंपनियों को राष्ट्रीय राजधानी में बिजली वितरण का ठेका देंगे अब सरकारी खजाने से सब्सिडी देकर बिजली बिल को आधा करने और प्रत्येक परिवार को 750 लीटर पानी मुफ्त में देने की बातें कर रहे हैं। मियाँ जब सब्सिडी देकर ही वादों को पूरा करना था जो कि एक छोटा-सा बच्चा भी कर सकता है तो फिर चुनाव से पहले हथेली पर दूब जमा देने के वादे किए ही क्यों थे? ये लोग फरमाते हैं कि जनता का पैसा जनता के ऊपर ही खर्च कर देंगे। मगर यह खर्च करना तो हुआ नहीं लुटा देना हुआ जो बाँकी दल पहले से ही टीवी-लैपटॉप-साईकिल जनता के बीच बाँटकर कर रहे हैं। क्या केजरीवाल एंड कंपनी यह बताएगी कि 36000 करोड़ रुपए के कुल वार्षिक बजटवाले दिल्ली राज्य के लिए वो 20-तीस हजार करोड़ रुपए की सब्सिडी के लिए पैसे कहाँ से लाएगी? इस 36000 करोड़ रुपए में से भी कुछ राशि योजनागत व्यय के लिए होगी जिसमें से वे राशि डाईवर्ट कर नहीं सकते ऐसे में दिल्ली के विकास,नए निर्माण, मेंटनेंस और वेतन के लिए पैसा कहाँ से आएगा? ऐसे में लगता है कि आप पार्टी सरकार बनाने से पहले ही यानि परीक्षा शुरू होने से पहले ही अनुत्तीर्ण हो गई है। केजरीवाल जी चुनाव में मुद्दा बिजली-पानी था न कि यह कि मुख्यमंत्री या विधायकों-मंत्रियों को जेड श्रेणी की सुरक्षा और अन्य सुविधाएँ मिलनी चाहिए या नहीं। (हाजीपुर टाईम्स पर भी एक साथ प्रकाशित)

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

चाहते क्या हैं केजरीवाल और अन्ना?

मित्रों,प्रसंग महाभारत से है। तब पांडव और द्रौपदी अज्ञातवास में राजा विराट के यहाँ शरण लिए हुए थे। कौरव सेनानायक सुशर्मा ने दक्षिण दिशा से हमला कर विराट को बंदी बना लिया था। अर्जुन को राजमहल में छोड़कर बाँकी पांडव उनको छुड़ाने जा चुके थे तभी सूचना मिली कि उत्तर से विशाल कौरव सेना ने आक्रमण कर दिया है। रनिवास में मारे भय के सन्नाटा छा गया। तभी विराटकुमार उत्तर जिनके अभी दूध के दाँत भी नहीं टूटे थे जोश से भर उठे और रथ लेकर युद्धभूमि में पहुँच गए। बृहन्नला बने अर्जुन उनके सारथी थे। जैसे ही बालक उत्तर ने भीष्म,द्रोण,कर्णादि से सुसज्जित कौरव सेना देखी उसके हाथ-पाँव भूल गए और वो रथ से उतरकर भागने लगे। लगता है यही हालत इन दिनों आप पार्टी के अरविन्द केजरीवाल की हो रही है। उन्होंने चुनावों में असंभव वादे कर तो दिए परन्तु अब उनको पूरा करने की सोंचकर ही उनको पसीना आ रहा है और सत्ता की चाबी हाथ में होते हुए भी वे सरकार बनाने से भाग रहे हैं।
               मित्रों,सत्ता की चाबी से एक और प्रसंग याद आ रहा है। वर्ष 2005 में फरवरी में बिहार में विधानसभा चुनाव हुआ। जनता ने कुछ इसी तरह का जनादेश दिया। रामविलास पासवान के 32 विधायक थे और बिना उनको समर्थन दिए या उनसे समर्थन लिए कोई भी सरकार नहीं बननी थी। इसी तरह रामविलास जी अड़ गए थे कि हम न तो किसी को समर्थन देंगे और न ही किसी से समर्थन लेंगे बल्कि हम तो फिर से चुनाव चाहते हैं। उनको लगा कि दोबारा चुनाव होने पर उनको अकेले बहुमत मिल जाएगा लेकिन जनता ने नवंबर में हुए चुनावों में उनसे सत्ता की चाबी ही छीन ली और तब से बेचारे की हालत दिन-ब-दिन पतली ही होती गई। यह संदर्भ ज्यादा पुराना नहीं है और केजरीवाल अगर चाहें तो इससे शिक्षा ले सकते हैं।
                              मित्रों,इस समय यह पता नहीं चल रहा कि केजरीवाल चाहते क्या हैं। अगर वे दिल्ली में जनलोकायुक्त लाना चाहते हैं या जनता को सचमुच बिजली,पानी और दाल-सब्जियों की महँगाई से राहत दिलवाना चाहते हैं,अगर उनको मुद्दों की राजनीति करनी है तो उनको सरकार बनानी चाहिए। अन्यथा अगर उनको सिर्फ सत्ता की राजनीति करनी है तो फिर करें। कुछ लोग कह सकते हैं कि सरकार तो भाजपा भी बना सकती है उनको मैं बता दूँ कि भाजपा किसी भी स्थिति में सरकार बना पाने की स्थिति में नहीं है। केजरीवाल पहले ही कह चुके हैं कि वे न तो किसी को समर्थन देंगे और न ही किसी से समर्थन लेंगे। कांग्रेस भी भाजपा को समर्थन नहीं देगी। अन्य दो को अगर भाजपा अपने साथ ले भी आती है तब भी उसकी संख्या मात्र 34 तक पहुँचती है जबकि केजरीवाल को कांग्रेस बिना शर्त समर्थन देने को तैयार है और भाजपा भी कह रही है कि यदि केजरीवाल उनसे समर्थन मांगते हैं तो वह जरूर उस पर विचार करेगी इसलिए इस समय दिल्ली अगर किसी की सरकार बन सकती है तो वो है आप पार्टी। माना कि केजरीवाल दिल्ली में फिर से चुनाव चाहते हैं परन्तु अगर चुनावों के बाद भी संख्या-समीकरण नहीं बदलता है तब क्या होगा? तब वे क्या कहेंगे और करेंगे? तब क्या वे यह कहेंगे कि वे तीसरी बार चुनावों में जाना चाहते हैं? फिर चुनावों में जो व्यय होगा उसका बोझ कौन उठाएगा?
                            मित्रों,केजरीवाल ने उन सभी ईमानदार नेताओं को जो अपने मूल दल में घुटन महसूस कर रहे हैं को आप पार्टी में आमंत्रित किया है। तो क्या केजरीवाल को सिर्फ जिताऊ उम्मीदवार चाहिए,राजनीति में शुचिता और पवित्रता नहीं चाहिए? क्या केजरीवाल की पार्टी में आ जानेभर से कोई ईमानदार हो जाएगा या हो जाता है? इसी बीच कुछ सर्वेक्षणवीरों ने दिल्ली की 7-8 सौ जनता के बीच इस बात पर सर्वेक्षण किया है कि क्या केजरीवाल को वर्तमान स्थिति में सरकार बनाने के प्रयास करने चाहिए या नहीं। जब चुनावरूपी महासर्वेक्षण से यह पता नहीं चला कि दिल्ली की जनता चाहती क्या है तो फिर 7-8 सौ लोगों का सर्वेक्षण करने से क्या पता लगेगा? ये भाई लोग दरअसल पहले नतीजे सेट करते हैं और फिर बाद में सर्वेक्षण करते हैं।
                              मित्रों,इन दिनों अन्ना हजारे संसद के वर्तमान सत्र में जो कि इसका अंतिम सत्र भी है में जनलोकपाल पारित करने की मांग को लेकर अनशन कर रहे हैं। उनका लक्ष्य पवित्र है लेकिन उनकी कार्यशैली विचित्र है। कभी उनको अतिभ्रष्ट नीतीश शासन स्वच्छ नजर आता है तो कभी वे अपने पुराने चेले अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ नजर आते हैं तो अगले ही पल उनको अरविन्द अच्छे लगने लगते हैं। पता ही नहीं चलता कि अन्ना चाहते क्या हैं? अब तो केंद्र सरकार ने कह भी दिया है कि वर्तमान सत्र में ही लोकपाल विधेयक को पारित करवाया जाएगा इसलिए अब अन्ना के अनशन का कोई मतलब नहीं रह जाता। अन्ना कभी कहते हैं कि उनके मंच पर कोई राजनीतिज्ञ नहीं आएगा फिर महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री से मिलते भी हैं और तब कहते हैं कि उनके मंच पर सबका स्वागत है। इसलिए मैं अन्ना से निवेदन करता हूँ कि पहले वे अपने चित्त को स्थिर कर लें फिर चाहे तो आंदोलन करें,जनजागरण या फिर आमरण अनशन।

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

केजरीवाल की जीत जनता की हार

 मित्रों,दिल्ली, 2014, इंडिया कप टुर्नामेंट का सेमीफाइनल दौर समाप्त हो चुका है। भाजपा ने कांग्रेस को और मोदी ने राहुल को इसमें 4-0 से करारी पटखनी दी है। राजस्थान में तो मोदी नाम के राजनैतिक तूफान ने इतना जोर पकड़ा कि कांग्रेस का तंबू ही उखड़ गया। वहीं मध्य प्रदेश में भी कांग्रेसी खेमा पूरी तरह से नष्ट व बर्बाद गया है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का शामियाना पूरी तरह से उखड़़ा तो नहीं लेकिन उसे मोदी नामक तूफान ने भारी क्षति जरूर पहुँचाई है। भारत के दिल दिल्ली में जरूर स्थिति अलग रही जहाँ कांग्रेस को तूफान से जितना नुकसान हुआ उससे कहीं ज्यादा क्षति उसको अरविन्द केजरीवाल नामक बगुला भगत के हाथों उठानी पड़ी और एक तरह से उसका सफाया ही हो गया।
                          मित्रों,जहाँ तीनों राज्यों के परिणामों से मैं अतिप्रसन्न हूँ वहीं दिल्ली के नतीजों से मुझे हर्षमिश्रित दुःख हो रहा है। दुःख इसलिए क्योंकि बड़ी-बड़ी बातों के मसीहा अरविन्द केजरीवाल का न तो साध्य ही पवित्र है और न तो साधन ही। कहने को तो यह व्यक्ति राजनीतिज्ञों को राजनीति सिखाने आया था परन्तु कर वही रहा है जो पहले से अन्य लोग करते रहे हैं। गांधीजी कहा करते थे कि न सिर्फ साध्य की पवित्रता जरूरी है बल्कि साधन की पवित्रता उससे कहीं अधिक आवश्यक है। अरविंद ने यह जीत बरेली दंगों के आरोपी तौकीर रजा और इस्लामिक कट्टरपंथ के प्रतीक बुखारी के समर्थन से पाई है,उसने यह जीत अमर शहीद मोहनचंद शर्मा की शहादत को कलंकित करके पाई है और उसने यह जीत ईमानदारी का नकली मुखौटा जनता को दिखाकर पाई है।
                                  मित्रों,अरविंद के चुनाव जीत जाने से यह साबित नहीं हो जाता कि अरविंद केजरीवाल सच्चे,देशभक्त और ईमानदार हैं। अगर चुनाव इस बात की कसौटी हो सकती है तो लालू, मुलायम ,माया ,मनमोहन,पवार,राजा,कलमाडी आदि तो दर्जनों बार चुनाव जीत चुके हैं और इनमें से कईयों ने तो कई-कई बार विभिन्न राज्यों पर शासन भी किया है। इसलिए मैंने या अनुरंजन झा ने या किसी अन्य चुनाव परिणामों के आने से पहले केजरीवाल की विश्सनीयता पर जो प्रश्न-चिन्ह लगाए थे वे अब भी अपनी जगह बने हुए हैं और मैं समझता हूँ कि आप पार्टी की शानदार सफलता के बाद उनका महत्त्व और प्रासंगिकता पहले से और भी ज्यादा हो गई है। मैं इस बात के लिए जरूर अरविन्द को धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने बाँकी पार्टियों के नेताओं को बता दिया है कि एसी में बैठने से अब काम नहीं चलनेवाला। अब उनको जनता का पास जाकर उनकी समस्याओं को समझना होगा और उनके लिए सड़कों पर भी संघर्ष करना होगा,मुकदमे झेलने पड़ेंगे,जेल भी जाना होगा। (पढ़ें आलेख झूठों का सरताज अरविन्द केजरीवाल)
                               मित्रों,अंत में मैं चारों राज्यों विशेष रूप से मध्य प्रदेश और राजस्थान की सभी हिन्दू जनता का अभिनंदन करता हूँ कि उनमें से 90-95 प्रतिशत ने देश की वस्तुस्थिति को समझा। यह उनकी चट्टानी एकजुटता का ही परिणाम है कि जो लोग चुनाव के दौरान मोदी लहर से लगातार इन्कार कर रहे थे अब सन्निपात के शिकार हो गए हैं। इसमें संदेह नहीं कि इन दोनों राज्यों में भाजपा को वोट देकर मुसलमानों के एक बड़े हिस्से ने छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी ठगों के भ्रष्टाचार से लाल-लाल फूले-फूले गालों पर करारा तमाचा जड़ा है। मैं उम्मीद करता हूँ कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में भारत की जनता न सिर्फ कांग्रेस बल्कि आम आदमी पार्टी समेत सारी छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी बगुला भगत पार्टियों के वजूद को ही मिटाकर रख देगी और भारतीय राजनीति के रुपहले क्षितिज पर नरेंद्र मोदी नामक ऐसा सूरज चमकेगा जिसकी चमक से चीन तो क्या अमेरिका और यूरोप की आँखें भी चौंधिया जाएंगी।

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

हाजीपुर टाईम्स यशस्वी भव

मित्रों,एक आम बिहारी मेधावी छात्र की तरह बचपन से मैंने बस एक ही सपना देखा था आईएएस बनने का परंतु होनी को मंजूर नहीं था। न जाने क्यों जब भी मेरी प्रतियोगिता परीक्षा होती मैं बीमार पड़ जाता या अन्य किसी कारण से उसमें उपस्थित नहीं हो पाता और सिविल सेवा परीक्षा के दौरान भी ऐसा ही हुआ। खैर उसके बाद मैंने सोंचा कि तंत्र को भीतर घुसकर साफ नहीं कर पाया तो क्या हुआ अब पत्रकार बनकर बाहर से हल्ला मचाकर ही साफ करूंगा परंतु कई-कई अखबारों में काम करने के बाद मैंने पाया कि सारे-के-सारे मीडिया संस्थान तो सरकारी विज्ञापन की बीन पर नाचते हैं। फिर मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया और जमकर लिखा भी। लेकिन इसमें भी समस्या थी। कभी किसी अखबार ने मनमाफिक पाया तो ले लिया वरना छोड़ दिया। फिर पेट भरने की समस्या भी सामने थी।
                         मित्रों,इसलिए काफी सोंच-समझकर मैंने इस वेबसाईट हाजीपुर टाईम्स की शुरुआत की है। मैं जानता हूँ कि किसी भी साधन का सदुपयोग भी हो सकता है और दुरूपयोग भी। मैं आपलोगों को भरोसा दिलाता हूँ कि मैं इसका सिर्फ-और-सिर्फ सदुपयोग ही करूंगा। मैं ऐसा इसलिए कर सकता हूँ क्योंकि मैं साईं इतना दीजिए जामे कुटुम्ब समाय में विश्वास रखता हूँ। मेरे लिए पैसा कमाने मूल लक्ष्य न तो कभी रहा है और न ही आगे रहनेवाला है। धनालाभ होना तो चाहिए लेकिन मुख्य उत्पाद के रूप में नहीं सहउत्पाद के रूप में। मेरी यह वेबसाईट साधन बनेगी वैशाली से भ्रष्टाचार के समूल उन्मूलन का और आवाज बनेगी आम आदमी की पीड़ा का। इसके तेवर वही रहेंगे जो मेरे ब्लॉग ब्रज की दुनिया के थे या हैं। हमने यह वेबसाईट मौजूदा ढर्रे पर पत्रकारिता करने के लिए स्थापित नहीं किया है बल्कि संपूर्ण पत्रकारिता जगत को यह बताने के लिए किया है कि पत्रकारिता कैसे की जानी चाहिए। मैं अब तक सच्चाई और ईमानदारी के मार्ग पर चला हूँ और आगे भी चलता रहूंगा। सरकारी नौकरी अगर मुझे पानी रहती तो मैं रामविलास पासवान के रेलमंत्री रहते हुए सेटिंग करके रेलवे में घुस गया होता। मैं जानता हूँ कि मेरा पथ अग्निपथ है। कदम-कदम पर मुझे मरणांतक पीड़ा झेलनी पड़ेगी परंतु मेरे हौंसले हमेशा की तरह बुलंद हैं।
                                  मित्रों,एक बात और। हो सकता है कि मेरी वेबसाईट का नाम हाजीपुर टाईम्स देखकर आपको लग रहा हो कि इसका परास सिर्फ हाजीपुर शहर या ज्यादा-से-ज्यादा वैशाली जिला रहनेवाला है। ऐसा हरगिज नहीं होने जा रहा है। जैसा न्यूयार्क टाईम्स मतलब केवल न्यूयार्क नहीं होता या वाशिंगटन पोस्ट का अर्थ केवल वाशिंगटन भर नहीं होता वैसे ही हाजीपुर टाईम्स नाम होने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इसमें सिर्फ हाजीपुर से समाचार ही शामिल होंगे या हाजीपुर या वैशाली की घटनाओं की ही विवेचना की जाएगी बल्कि इसकी जद में पूरी दुनिया होगी,पूरी मानवता होती। हाँ,उसका परिकेंद्र जरूर हाजीपुर में होगा। अंत में मैं आप सभी शुभेच्छुओं से अपने इस नवजात शिशु के लिए आशीर्वाद की कामना करता हूँ और आशा करता हूँ कि आपलोग मुझे निराश नहीं करेंगे।