मंगलवार, 31 जनवरी 2012

सरस्वती के उद्दंड बेटे

मित्रों,वक़्त को आते हुए तो सभी देखते हैं पर कब वह चुपके से,दबे पांव सरक लेता है कोई नहीं जान पाता.देखते-देखते नववर्ष और मकर-संक्रांति की तरह ही वसंत पंचमी भी गुजर गयी और साथ ही सरस्वती पूजा भी.फिर शुरू हुआ विद्या और विवेक की अधिष्ठात्री भगवती सरस्वती की प्रतिमाओं को विसर्जित करने का सिलसिला.सरस्वती-पुत्र जुलूस की शक्ल में सड़कों से गुजरने लगे.ठेले पर देवी की प्रतिमा सबसे पीछे,उसके आगे भारी-भरकम साउंड बॉक्सों से लैस ट्रॉली और सबसे आगे शराब के नशे में धुत्त,अश्लील-फूहड़ गानों की बेहूदा धुनों पर लड़खड़ाते हुए नृत्य-जैसा कुछ करते सरस्वती के बेटे अथवा भक्त.कई बार तो जी में आया कि लाठी उठाऊँ और एक सिरे से सबकी पिटाई कर दूं परन्तु परिणाम की सोंचकर हर बार गुस्से को जज्ब कर गया.
                        मित्रों,लगभग पूरे बिहार से इस समय प्रतिमा-विसर्जन के दौरान नदियों-तालाबों में युवकों के डूबकर मारे जाने की ख़बरें आ रही हैं.क्या जरुरत है खतरा मोल लेकर ज्यादा गहरे पानी में प्रतिमा  को विसर्जित करने की?यहाँ तक कि खचाखच भरी नावों में भी इन नशेड़ियों की उच्छृंखलता नहीं रूकती जिसका परिणाम होती है जानलेवा दुर्घटनाएं.जुलूस के रास्ते में भी इनका रवैया निहायत अफसोसनाक होता है.कभी-कभी ये लोग रास्ते में वैध-अवैध आग्नेयास्त्रों से गोलीबारी भी करते चलते हैं.कल कुछ इसी तरह की एक दुखद घटना में सहरसा में रेशमा नाम की एक लड़की मारी गयी.इसी तरह की एक और हिंसात्मक घटना में मुजफ्फरपुर में विवेक नाम के एक सरस्वती-भक्त की दूसरे भक्तों ने चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी.
                         मित्रों,आप सोंच रहे होंगे कि इस तरह की घटनाएँ क्यों हो रहीं है?निश्चित रूप से इसके लिए हमारी दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली और समाज का नैतिक-स्खलन तो जिम्मेदार हैं ही हमारे द्वारा दिया गया चंदा भी कम दोषी नहीं है.हम चंदा तो दे देते हैं लेकिन यह नहीं देखते कि हमारे बच्चे उन पैसों का कर क्या रहे हैं जबकि यह हमारा ही कर्त्तव्य है.हम उन्हें चंदा देते हैं पूजा-पाठ में खर्च करने के लिए और वे जनाब उसका शराब पी जाते हैं.इतना ही नहीं कभी-कभी तो हमारे द्वारा प्रदत्त राशि से नृत्यांगनाएं भी बुलाई जाती हैं और उनसे कामुक और भौंडे नृत्य कराए जाते हैं.भगवान वैद्यनाथ की नगरी देवघर की  एक ऐसी ही घटना इनदिनों खूब चर्चा में है.आश्चर्य है कि ये लोग जाहिर तौर पर पूजा तो कर रहे हैं बुद्धि और विवेक की देवी सरस्वती की और कर रहे हैं बुद्धि और विवेक के सबसे बड़े शत्रु मदिरा का सेवन और अर्द्धनग्न स्त्रियों का साक्षात् दर्शन.मुझे नहीं लगता कि जिन स्थानों पर टिंकू जिया,शीला की जवानी और उ लाला उ लाला जैसे अतिअश्लिल गीत बजे जाते हैं वहां माता सरस्वती का क्षण भर भी टिक पाना संभव होता होगा.
                                       क्या सरलता,सादगी और पवित्रता की देवी की अर्चना सरल सामग्री-साधनों द्वारा,बिना किसी तड़क-भड़क के और सरल-सच्चे मन से नहीं की जानी चाहिए?अन्यथा पूजा का कोई मतलब भी नहीं रह जाता क्योंकि कोई भी पूजा अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए की जाती है न कि दिखावे,प्रदर्शन और अपने उच्छृंखल मन को संतुष्ट करने के लिए.सरस्वती पूजा कोई आप युवा सरस्वती-पुत्रों की ईजाद नहीं है.पूजा हमने भी की थी.तब यानि आज से कोई २५ साल पहले हम अपने नाजुक कन्धों पर उठाकर देवी को १० किलोमीटर दूर बांदे करनौती से जगन्नाथपुर लाया करते थे.कोई लाउडस्पीकर या साउंड बॉक्स नहीं होता था पूजा-स्थल पर.विसर्जन के समय भी हम प्रतिमा को अपने कन्धों पर ही उठाते थे और गाँव के प्रत्येक अमीर-गरीब के घर के सामने रखते थे ताकि महिलाएँ देवी को विधिवत-पुत्रीवत खोईछा भरकर विदाई दे सकें.तब सूरज पासवान की कमर में ढोलक बंधा होता था और जयलाल रविदास अति मधुर और भक्ति-भीना स्वर में 'हंसा पर सवार हे माता,हंसा पर सवार हे' गाते चलते थे.साथ में हम जैसे अन्य युवा-किशोर झाल-करताल बजा-बजाकर संगत करते चलते थे.कहीं कोई उच्छृंखलता या अश्लीलता नहीं;चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ भक्ति का पवित्र वातावरण.क्या वह युग फिर से वापस नहीं आ सकता?अगर नहीं तो क्यों नहीं?बंद करिए लाउडस्पीकर,डीजे और म्युजिक ट्रॉली का प्रयोग.उठाईये ढोलक और झाल-करताल.शराब पीना और अश्लील सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तो निर्विकल्प रूप से बंद होना ही चाहिए.अंत में,मेरी सरस्वती के सभी उद्दंड पुत्रों से हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन है कि जो हुआ सो हुआ आगे से अगर वे सचमुच माता सरस्वती को प्रसन्न करना चाहते हैं तो इन बातों का अवश्य ख्याल रखेंगे.लेकिन क्या मेरे युवा-किशोर अनुज मेरी यानि सरस्वती के इस तुच्छ साधक की सुनेंगे?

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

लोकतंत्र का पेड़ और जनांदोलनों की आंधी

मित्रों,जबसे भारत में अन्ना हजारे के प्रखर नेतृत्व में जनांदोलन शुरू हुआ है इसके भारतीय लोकतंत्र पर संभावित प्रभावों का लगातार विश्लेषण किया जा रहा है.ताजा विश्लेषण किया है हमारी राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल जी ने.उनके मतानुसार भारतीय लोकतंत्र एक वृक्ष है और जनांदोलन उसे लगातार आंधी-तूफ़ान की तरह हिला रहे हैं,जिसके चलते हो सकता है कि यह पेड़ ही जड़ से उखड जाए.उन्होंने सीधे-सीधे जनांदोलनों का जिक्र तो नहीं किया है लेकिन उनके कथन के आशय को लेकर वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए किसी तरह के भ्रम की गुंजाईश भी नहीं है.अब प्रश्न उठता है कि क्या सचमुच भारत में लोकतंत्र खतरे में है और अगर खतरे में है भी तो उसे किन-किन तत्वों से और किस तरह का और कितना गंभीर खतरा है?
                       मित्रों,चाहे कोई भी शासन हो,किसी भी तरह का शासन हो उसकी मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि आम जनता का उसके ऊपर कितना विश्वास है.इतिहास गवाह है कि किसी भी शासन को सबसे ज्यादा खतरा होता है भ्रष्टाचार से और गरीबी तथा बेरोजगारी से.चाहे फ़्रांस की क्रांति हो या रूस की या फिर मिस्र या लीबिया की;ये क्रांतियाँ इसलिए हुई क्योंकि पूर्व प्रचलित शासन समय रहते जनाक्षाओं के अनुरूप खुद को नहीं बदल सका.चीन में च्यांग काई शेक अमेरिका आदि अतिशक्तिशाली देशों द्वारा खुले दिल से सहायता मिलने के बाबजूद गृहयुद्ध में इसलिए हार गया क्योंकि उसके शासन में इतना अधिक भ्रष्टाचार बढ़ गया था कि उसके सैनिक चंद पैसों के लिए अपने हथियार और गोलियां तक माओवादियों के हाथों बेच डालते थे.बढ़ते भ्रष्टाचार ने उसके मजबूत शासन को अन्दर से खोखला कर दिया था और जनता का उसमें विश्वास भी समय गुजरने के साथ निराशा के कारण कम होता जा रहा था.
                          मित्रों,वर्तमान भारत की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं है.निश्चित रूप से हमारा लोकतंत्र इस समय खतरे में है और खतरा भी बाह्य नहीं आतंरिक है शेक के चीन की तरह.हमारे लोकतंत्र को मधु कोड़ा,ए. राजा,सुखराम,मायावती,सुरेश कलमाड़ी,लालू प्रसाद यादव जैसे अनगिनत भ्रष्ट जनप्रतिनिधि मुँह चिढ़ा रहे हैं और वर्तमान केंद्र सरकार है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई प्रभावी कदम उठाना चाहती ही नहीं.ऐसे में जब अख़बारों और सोशल मीडिया में भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार आवाज उठाने और सरकार को कदम उठाने के लिए प्रेरित  करने का कोई प्रभाव होता नजर नहीं आ रहा था तब जनता के सामने सिवाय जनांदोलन करने के कोई विकल्प ही नहीं था.पहले तो आम जनता ने अपने खास जनप्रतिनिधियों से 'तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपति सिन्धु किनारे,पढ़ते रहे छंद अनुनय के प्यारे-प्यारे.'शैली में हाथ जोड़कर विनती की और कहा कि "हे कृपानिधान!कृपया आप हमारी मांगों को मानते हुए जनलोकपाल कानून बनाईये जिससे हमें भ्रष्टाचार रुपी दानव से राहत मिल सके."परन्तु सत्ता की मद-वारुणी के पान में मस्त जनता द्वारा ही गलती से निर्वाचित हुई सरकार ने उनकी विनम्रता को उनकी कमजोरी का संकेत मान लिया.साथ ही वे आम जनता की ईच्छा को भी नहीं समझ सके.उन्हें लगा कि इस जनांदोलन में कोई आंतरिक ऊर्जा है ही नहीं और यहीं पर उन्होंने १६ अगस्त,२०११ को वह गलती कर दी जो ७-८ नवम्बर,१९१७ को रूस में जार निकोलस द्वितीय ने और १४ जुलाई,१७८९ को फ़्रांस में लुई १६वाँ ने की थी;उन्होंने क्रांति के सूरज को ही कैद करने की कोशिश की और नतीजे में अपना हाथ जला बैठे.बाद में उन्होंने भयभीत मन से अन्ना को अनशन की अनुमति तो दे दी लेकिन उनके हाव-भाव से आज भी ऐसा बिलकुल भी नहीं लग रहा है कि उन्होंने अपनी गलतियों से कुछ सीखा भी है.बाद में संसद में एक दन्त और विषविहीन लोकपाल की स्थापना का कुत्सित प्रयास भी सरकार द्वारा किया गया जो जनता के दबाव के चलते सौभाग्यवश असफल भी हो गया.इस बीच प्रधानमंत्री ने नए साल पर देशवासियों को भरोसा दिलाया कि वे नए साल में भ्रष्टाचार और कुशासन को दूर करने के लिए अपेक्षित कदम उठाएंगे परन्तु अभी तक इस तरह के कोई संकेत दृष्टिगत नहीं हो रहे हैं.
                         मित्रों,कुछ करने के लिए एक दिन ही काफी होता है और नहीं करने के लिए सदियाँ भी नाकाफी होती हैं.सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की ग़लतफ़हमी पालने की बीमारी अभी भी गई नहीं है.वह अन्ना के मुम्बई आन्दोलन की विफलता के बाद यह मान बैठी है कि उनके जनांदोलन में अब कोई ऊर्जा शेष ही नहीं रही और अगर पार्टी को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में जीत हासिल होती है तब सीधे-सीधे यह मान लेना चाहिए कि जनता ने अन्ना और उनकी मांगों को ख़ारिज कर दिया है.हम यह अच्छी तरह से जानते हैं कि विधानसभा चुनावों की प्रकृति लोकसभा चुनावों से अलग होती है.इन चुनावों में ज्यादातर स्थानीय मुद्दे हावी होते हैं और राष्ट्रीय मुद्दों का प्रभाव कम ही होता है.यह बात कांग्रेस के नेता भी जानते हैं इसलिए इन चुनावों को किसी भी तरह अन्ना आन्दोलन पर जनमत संग्रह नहीं माना जा सकता है;नहीं माना जाना चाहिए.इस सत्य में कोई संदेह नहीं कि इस आन्दोलन में अभी भी पर्याप्त ऊर्जा है और अगर सही वक़्त में फिर से आन्दोलन छेड़ा जाता है तो हमारे मदांध शासकों को झुकाया जा सकता है और घुटनों पर आने के लिए मजबूर भी किया जा सकता है.इस आन्दोलन को न तो बैरम खान दिग्विजय सिंह के कुतर्क ही कमजोर कर सकते हैं और न ही अकबर राहुल गाँधी की कोरी राजनीतिक विरासत ही.यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूं कि यह आन्दोलन लोकतंत्र के खिलाफ हरगिज नहीं है बल्कि यह तो शासन-प्रशासन में लगातार बढ़ते भ्रष्टाचार के विरुद्ध है इसलिए इससे लोकतंत्र के पेड़ के जड़ से उखड जाने का खतरा राष्ट्रपति जी को क्यों महसूस हो रहा है,शायद उन्हें ही इसका बेहतर पता होगा.राष्ट्रपति जी लोकतंत्र अगर एक पेड़ है तो उसकी जड़ें है भ्रष्टाचार-मुक्त सुशासन और उसके इर्द-गिर्द की मजबूत मिटटी है जनता का उसके प्रति अटूट विश्वास.अगर इस पेड़ को समय रहते भ्रष्टाचार की इस विषबेल से नहीं बचाया गया और इसका वक़्त पर उपचार नहीं किया गया तो फिर एक दिन निश्चित रूप से यह पेड़ खोखला होकर सूखे ठूंठ में बदल जाएगा और मर जाएगा.शायद वह दिन अब ज्यादा दूर रह भी नहीं गया है.तब न तो इसे हिलाने की आवश्यकता होगी और न ही ईलाज करने की ही.इसलिए हमें अब से और अभी से ही भ्रष्टाचार की इस विषबेल को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाने शुरू कर देने चाहिए.तभी भारत में लोकतंत्र बच पाएगा और हमारे मदमस्त जनप्रतिनिधियों के पद भी शेष रह रह पाएँगे.वास्तव में भारतीय लोकतंत्र के वटवृक्ष को खतरा भ्रष्टाचार से है न कि जनांदोलनों से.बल्कि जनांदोलनों की सफलता से ही हमारे लोकतंत्र की सफलता का मार्ग अग्रसर होने वाला है.अब तो सरकार द्वारा इस दिशा में कदम उठाये जाने की भी इन्तहां हो रही है.दुष्यंत कुमार के शब्दों में 'हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए;सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.'          

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

आग,धुंआ और टीम इंडिया

मित्रों,हमारे गांवों में एक कहावत है कि जो पंडित विवाह का मंत्र जानता है उसे श्राद्ध का मंत्र भी पता होता है.मतलब  कि बीसीसीआई के जो अधिकारी किसी युवक को स्टार बनने का मौका दे सकते हैं नाराज होने पर उसे बर्बाद भी कर सकते हैं.जो दर्शक चौबीसों घंटे टीवी के परदे पर किसी प्यासे चातक की तरह नजरें गड़ाए रहते हैं उन्होंने सपने में भी यह नहीं सोंचा होता है कि भारतीय क्रिकेट का असली खेल टीवी के परदे पर नहीं बल्कि परदे के पीछे चल रहा होता है भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड में.ये क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड वाले पहले तो किसी कप्तान या खिलाडी की पतंग को खूब ऊंचाई तक उड़ने की ढील देते हैं और जब उनकी पतंग ऊंचाईयों की उनकी बनाई हुई हदों तक पहुँच जाती है तब चुपके से डोर को ही काट देते हैं.
                मित्रों,कुछ इसी तरह की शरारत भारतीय क्रिकेट इतिहास के तब तक के सबसे सफल कप्तान सौरव गांगुली के साथ भी की गयी और अब शायद महेंद्र सिंह धोनी के खिलाफ भी कुछ उसी तरह की साजिश रची जा चुकी है.वर्ना धोनी जैसा जीवटवाला कप्तान जिसके नेतृत्व में भारतीय टीम ने न केवल २८ साल बाद विश्वकप जीता बल्कि पहली बार टेस्ट क्रिकेट में नंबर एक का ताज भी पहना अब टेस्ट क्रिकेट से ही संन्यास लेने की बात नहीं करता.तर्कशास्त्र में एक सूक्ति खूब प्रचलित है कि धुंआ वहीं पर होता है जहाँ आग होती है.मतलब कि बिना धुंए की आग भले ही इस २१वीं सदी में जलाना संभव हो गया हो लेकिन बिना आग जलाए असली धुंआ उत्पन्न हो ही नहीं सकता;उसके लिए तो निर्धारित तापमान चाहिए ही.
                        मित्रों,कुछ ही दिनों पहले से ऑस्ट्रेलियन मीडिया में भारतीय क्रिकेट टीम से जुडी हुई कुछ इस तरह की ख़बरें छन-छन कर बाहर आ रही हैं कि इस समय भारतीय क्रिकेट टीम में कप्तान धोनी के खिलाफ विद्रोह भड़क उठा है और जिस तरह गांगुली को बेआबरू करके टीम से निकालने के समय विद्रोह का नेतृत्व राहुल द्रविड़ ने किया था उसी तरह इस समय वीरेंदर सहवाग विद्रोह की कमान संभाल रहे हैं.इन आशंकाओं को तब और भी बल मिल गया जब ब्रायन लारा और सौरव गांगुली ने ऑस्ट्रेलिया में टीम की हार पर धोनी का बचाव करते हुए कहा कि धोनी बहुत अच्छे कप्तान हैं और उनकी कप्तानी में अब भी कोई कमी नहीं है उन्हें अपनी टीम का सहयोग नहीं मिल पा रहा.ऐसा टीम के अन्य खिलाडी क्यों कर रहे हैं यह उन्होंने नहीं बताया.बस एक संकेत भर देकर चुप हो गए. क्रिकेट पिच पर तो अनिश्चितताओं का खेल है ही;भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की अंदरूनी राजनीति भी कम अनिश्चिततापूर्ण नहीं है.कब किसको बाहर बिठाना है और किसको अर्श से फर्श पर चढ़ाना है और फिर किसको सफलता की बुलंदियों पर चढ़ने के मौका देकर धक्का दे देना है;इसका फैसला खिलाडियों का प्रदर्शन नहीं करता हमारी बीसीसीआई के घाघ अधिकारी करते हैं.शायद इन शानिदेवों की वक्रदृष्टि के ताजा शिकार बने हैं क्रिकेट के तीनों संस्करणों में भारत के सबसे सफल कप्तान बन चुके महेंद्र सिंह धोनी.हो सकता है कि टीम के सहवाग सरीके खिलाडियों को और टीम प्रबंधन को भी अब एक जन्मना बिहारी का नेतृत्व खटकने लगा हो.टीम इण्डिया हमेंशा से ही भारतीय एकता का प्रतीक रही है.उसमें क्षेत्रवाद का उभार होना न केवल भारतीय क्रिकेट के लिए हानिकारक होनेवाला है वरन यह इस संक्रमण काल में देश की एकता को भी कमजोर करेगा अच्छा होता अगर टीम इण्डिया और प्रबंधन धोनी पर पूरा विश्वास करते और उसके साथ पूर्ण सहयोग करके भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाईयों तक पहुँचाने का अवसर देते क्योंकि धोनी जैसे कप्तान किसी देश और टीम को बार-बार नहीं मिला करते.अगर यह सच है तो धोनी की कप्तानी में जानबूझ कर कुछ खिलाडियों का ख़राब खेलना देश के साथ-साथ खेल-भावना के साथ भी धोखा है.

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

शिकारी आएगा जाल बिछाएगा

मित्रों,मौसम विज्ञान के आंकड़ों पर अगर हम विश्वास करें तो भारत में सबसे ज्यादा ठंडा जनवरी का महीना होता है लेकिन अगर हम देश की राजनीतिक जलवायु की दृष्टि से विचार करें तो यह गुजर रहा मौजूदा महीना सबसे ऊंचे तापक्रम वाला है.सारे राजनीतिक दल इस समय अचानक पेशेवर शिकारी बन गए हैं और पाँच राज्यों की जनता को अतिमधुर लोरियाँ सुनाने में लगे हुए हैं और इस फ़िराक में हैं कि कब जनता सोए और वे उसका बहुमूल्य वोट ले उड़ें.कोई तो सीधे पैसे देकर वोट खरीद रहा है तो कोई जनता को वायदों की मीठी चाशनी में नहलाने में व्यस्त है.
                   मित्रों,मेरे गुरूजी श्रीराम बाबू जब मैं मध्य विद्यालय में पढ़ता था तब एक कहानी सुनाया करते थे.कहानी में भी एक गुरूजी थे लेकिन थे गुरुकुल के जमानेवाले.गुरूजी ने कई तोते पाल रखे थे जिन्हें अक्सर शिकारी बहेलिये जाल में फंसा लिया करते और बाजार में बेच देते.गुरूजी ने फिर अपने तोतों को बहेलिए से बचाने की एक फुलप्रूफ योजना बनाई.उन्होंने अपने तोतों को पाठ रटाना शुरू कर दिया कि शिकारी आएगा,जाल बिछाएगा;दाना डालेगा,लोभ से उसमें फँसना नहीं.अगली बार जब शिकारी आया तो पास के पेड़ पर बैठे गुरूजी के तोतों ने एक साथ शोर मचाना शुरू कर दिया कि शिकारी आएगा,जाल बिछाएगा;दाना डालेगा,लोभ से उसमें फँसना नहीं.शिकारी परेशान हो गया कि आज तो बहुत गड़बड़ है.तोते पहले से ही लोभ से नहीं फंसने का राग अलाप रहे हैं.फिर भी उसने अपने आराध्य का नाम लेकर डूबती हुई उम्मीद से ही सही जाल बिछाया और दाना डाला.परन्तु यह क्या लोभ से नहीं फँसने का तुमुल शाब्दिक नाद करनेवाले सारे-के-सारे तोते तो एक ही बार में आकर जाल में फँस गए.
                       मित्रों,कहीं फिर से यह पौराणिक प्रतीकात्मक कथा तो ५ राज्यों में नहीं दोहराई जाने वाली है.डर लगता है कि हमारी निरीह जनता कहीं फिर से वोटों के शिकारियों के जाल में तो नहीं फँस जाने वाली है.कोई उन्हें आरक्षण देने का दाना दाल रहा है तो कोई देश को केंद्र में कुशासन देने के बाद राज्यों में सुशासन देने का वादा किए जा रहा है.किसी को अपने जातिवादी सामाजिक समीकरण पर अटूट भरोसा है तो कोई दूसरे दलों के भ्रष्ट और रिजेक्टेड नेताओं को अपनाने के लिए पगलाया जा रहा है तो कोई जनता को जाति-धर्म में बाँटने के बाद राज्य को ही कई-कई भागों में बाँट देने का वादा कर रहा है.जोड़ने की बात कोई नहीं कर रहा सबके सब तोड़ने में ही लगे हैं.जनता भी विकल्पहीन है क्योंकि जब सबके सब रिजेक्ट करने के ही लायक हैं तो फिर वोट दिया जाए तो किसे?राईट टू रिजेक्ट का अधिकार होता तो इस समय उसका भरपुर लाभ उठा लिया जाता परन्तु वो तो अभी भी बहुत दूर की कौड़ी है.इसलिए किसी-न-किसी को तो वोट देना और चुनना है ही भले ही वो कितना भी डिफेक्टिव और रिजेक्टेबल क्यों न हो.फिर भी इस उपलब्ध अवस्था में भी अगर वे अपने विवेक का समुचित इस्तेमाल करें तो देश और प्रदेश की लगातार बिगडती स्थिति को समय रहते संभाला जा सकता है.बस उन्हें करना यही है कि वे भी इस सूत्र-वाक्य का रट्टा लगा डालें और गुरूजी के तोतों की तरह सिर्फ रट्टा ही नहीं लगाएँ बल्कि उस पर गंभीरता से अमल भी करें कि शिकारी आएगा,जाल बिछाएगा;दाना डालेगा,लोभ से उसमें फँसना नहीं.बस!!
                  

शनिवार, 14 जनवरी 2012

अब तो भगवान भी नहीं रहे सुरक्षित


मित्रों,हमारा देश इस समय जनसंख्या-विस्फोट के युग से गुजर रहा है.जहाँ देखिए वहीं अनियंत्रित और अनुशासनहीन भीड़.नई पीढ़ी प्रत्येक पुराने मूल्य को नकारने पर आमादा है.मानो केवल पुराना होना ही सबसे बड़ा कलंक हो गया.पुराने मूल्य ध्वस्त हो रहे हैं और नए मूल्यों की स्थापना भी नहीं हो रही.परिणाम यह है कि हमारा भारतीय समाज एक शाश्वत मूल्यहीनता के दौर में प्रवेश कर गया है.एक ऐसे दौर में जिसके दोनों सिरों पर अंधेरा-ही-अंधेरा है,अंधेरे का विकट साम्राज्य.
                    मित्रों,एक समय था जब हम लोग मंदिरों और देवमूर्तियों को सत्य का अंतिम ठिकाना मानते थे.दो लोगों में किसी बात को लेकर गंभीर विवाद पैदा हो गया और सच-झूठ का निर्णय नहीं हो पा रहा है तो फिर चलिए दोनों पक्ष देवमूर्ति को छूकर खाइए कसम कि पुत्र मर जाए या पति मर जाए जो मैं झूठ रहा/रही होऊँ.लोगों का अटल विश्वास था कि कोई बेईमान-से-बेईमान व्यक्ति भी देवमूर्तियों को छूकर झूठी कसमें नहीं खाएगा और अगर वह ऐसा करता है तब वह देवमूर्ति उसे अवश्य दण्डित करेगी.इस प्रकार समाज में धर्म और अधर्म व विश्वास और अविश्वास के बीच एक प्रभावकारी संतुलन बना रहता था.
                            मित्रों,फिर वो दौर भी आया जब झूठी कसमें खानेवालों ने पाया कि ऐसा करने से कोई नुकसान तो होता ही नहीं.फिर तो हमारे धर्मभीरु समाज में ऐसा करनेवालों की संख्या बढती ही चली गयी.साथ ही क्रमशः देव मूर्तियों और मंदिरों के प्रति लोक-आस्था में भी गिरावट का दौरे-दौरा चलता रहा और आज हमारा समाज एक ऐसे मुकाम पर आ पहुंचा है जहाँ इन मंदिरों और देवमूर्तियों के अस्तित्व पर ही खतरा उत्पन्न हो गया है.सबसे पहले २०१० में रजरप्पा स्थित महान छिन्नमस्तिका मंदिर से माता की पिण्डिका को चोरों द्वारा ध्वस्त कर देने और उसमें से मूल्यवान धातुओं और पत्थरों की चोरी की घटना घटी और फिर तो यह सिलसिला ही चल पड़ा.अब हालत ऐसी हो गयी हैं कि हमारे प्रदेश का कोई भी मंदिर या मूर्ति सुरक्षित नहीं है.ये मंदिर या इनमें स्थापित मूर्तियाँ केवल एक जड़-वस्तु नहीं हैं बल्कि ये लोक-आस्था के उद्दाम प्रतीक भी हैं.लोगों के इस विश्वास का प्रतीक कि जब भी मन निराश हो  जाए और चारों तरफ से पंगु हो जाए तब उसे ईश्वर सहारा देता है.लोगों की इस आस्था के प्रतीक हैं ये कि जब भी कोई पाप करेगा तो उसे उसका दंड अवश्य भुगतना पड़ेगा.अगर ये आस्था और विश्वास के दुर्ग ढह गए तो फिर कोई भी अधर्म करने से नहीं डरा करेगा और तब निश्चित रूप से समाज में कभी दूर नहीं हो सकनेवाली अव्यवस्था उत्पन्न हो जाएगी और हम फिर से एकबारगी आदिकालीन सामाजिक स्थिति में पहुँच जाएँगे जिस समाज का सिर्फ एक ही धर्म होगा और आस्था भी एक ही होगी कि जिसकी लाठी उसकी भैंस.फिर तो बलवान अपने से निर्बलों पर इस कदर कहर ढाएंगे कि मानवता की रूह ही कांपने लगेगी.न तो किसी का धन ही सुरक्षित रहेगा और न ही स्त्री ही.तब भाई ही बहनों के साथ बलात्कार किया करेंगे अथवा बहनें ही भाइयों के साथ सम्बन्ध बनाने के लिए बेहाल होने लगेंगी.
                मित्रों,प्रत्येक क्रिया का कोई-न-कोई कारण होता है.नई पीढ़ी की मूल्यहीनता के भी कारण हैं.मेरी समझ से सबसे बड़ा कारण है दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली.हम उन्हें शिक्षित तो कर रहे हैं परन्तु दीक्षित नहीं कर रहे.हमने उन्हें यह तो रटा दिया की सत्यं वद,धर्मं चर परन्तु खुद कभी सत्याचरण नहीं किया और जीवनपर्यंत अधर्म और अनीति में लीन रहे.हमारी नई पीढ़ी को केवल कोरे शब्द नहीं चाहिए उन्हें तो उदहारण भी चाहिए और अगर हमें सनातन भारतीय सामाजिक मूल्यों की रक्षा करनी है,अपनी इस अमूल्य थाती को बचाना है तो हमें खुद ही उदाहरण बनना पड़ेगा.कोई राम या कृष्ण धर्म की स्थापना के लिए नहीं आनेवाले जो भी करना होगा हमें ही करना होगा.परन्तु क्या हम ऐसा करेंगे.............?

शनिवार, 7 जनवरी 2012

सुशासन मतलब अंधा,बहरा और बड़बोला शासन

मित्रों,यह घटना तब की है जब १९८० में स्वर्ग सिधार चुके मेरे दादाजी अनिवार्य रूप से जीवित थे.हुआ यूं कि मेरे गाँव जुड़ावनपुर के पडोसी गाँव चकसिंगार से नाई भोज का न्योता देने आया और गलती से मेरे घर भी न्योता दे गया जबकि उसे देना नहीं था.दो घंटे बाद वह सकुचाता हुआ दोबारा आया और मेरे दादाजी से बोला कि वह न्योता वापस लेने आया है.दादाजी ने भी छूटते ही कहा कि दरवाजे पर जो संदूक रखा हुआ है अभी तक न्योता उसी पर पड़ा हुआ है,उन्होंने न्योते को घर तो भेजा ही नहीं है.जाओ और संदूक पर से ले लो.बेचारे नाई की समझ में कुछ भी नहीं आया.न्योता कोई भौतिक वस्तु तो था नहीं कि दिखाई दे और वह उसे अपने साथ उठाकर ले जा सके.
                  मित्रों,कुछ इसी तरह की स्थिति इन दिनों बिहार में सुशासन की है.प्रिंट मीडिया लगातार राज्य में सुशासन स्थापित होने का रट्टा लगे हुए है.उसे सरकारी तंत्र के कण-कण में सुशासन दिखाई दे रहा है.कैसे और क्यों दिखाई दे रहा है यह मीडिया ही जाने.कभी 'खींचो न कमान न तलवार निकालो,जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो' कहनेवाले अकबर इलाहाबादी ने अख़बारों से मोहभंग होने के बाद उन पर व्यंग्य करते हुए कहा था कि 'मियां को मरे हुए हफ्ते गुजर गए,कहते हैं अख़बार मगर अब हाले मरीज अच्छा है.'अकबर इलाहाबादी को मरे सौ साल पूरे होने को हैं मगर देश के अख़बारों की स्थिति अब भी वैसी ही है.अभी कल ही पटना उच्च न्यायालय ने बिहार की सर्वोच्च नियुक्ति करनेवाली संस्था बीपीएससी को ५३वीं  से 55वीं प्रारंभिक संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा के प्रश्न-पत्र से ८ गलत प्रश्नों को हटाकर फिर से असफल परीक्षार्थियों की कापियों का मूल्यांकन कर १४२ को पूर्णांक मानते हुए अतिरिक्त परिणाम प्रकाशित करने का आदेश दिया है.क्या प्रतिष्ठित बिहार लोक सेवा योग द्वारा १५० सही-सही प्रश्नोत्तर तैयार नहीं कर पाने में दोबारा अक्षम रहने को सुशासन का नाम दिया जा सकता है?अभी कल की ही बात है कि मैं महनार से हाजीपुर बस से आ रहा था.मेरे बगल में एक महनार थाना के स्टाफ बैठे हुए थे.उन्होंने भाड़ा मांगने पर खुद को थाना स्टाफ बताया और सामान्य यात्रियों से १ रूपया कम मिलने पर भी १ घंटे तक बहस और गाली-गलौज करने की भरपूर क्षमता से युक्त कंडक्टर बिना प्रतिवाद किए चला भी गया.जब मैंने उनसे उनकी मुफ्तखोरी का विरोध किया तो वे मुझ पर ही आग हो गए परन्तु खुद को प्रेसवाला बताते ही फिर पानी-पानी भी हो गए और बताया कि चूंकि बस वाले कागजात ठीकठाक नहीं रखते हैं इसलिए वे भी उन्हें भाड़ा नहीं देते.दानापुर निवासी श्रीमान का यह भी कहना था कि जब नेता और अफसर बड़े-बड़े घोटाले करते रहते हैं तब तो प्रेस चुपचाप रहता है और आप मेरे द्वारा २५ रूपये बचाने पर मेरे पीछे पड़े हुए हैं?गजब चीज है यह कथित सुशासन भी.चाहे बिना परमिट के बसें चलाओ या फिर एक ही नंबर पर कई-कई बसें चलाओ कोई भी पुलिस अधिकारी आपको रोकेगा-टोकेगा नहीं बस थाना-स्टाफ को अपने बसों में मुफ्त में चढ़ाते रहो.
              मित्रों,कई वर्ष हुए.२००६-०७ में मेरे चचेरे मामा जिन्हें मैं शुरू से ही भ्रष्टाचारियों के लिए आदर्श मानता हूँ राजेश्वर प्रसाद सिंह जो तब जन्दाहा प्रखंड के नाड़ी महथी या नाड़ी खुर्द में प्रधानाध्यापक थे एक सहायक शिक्षक से घूस लेते रंगे हाथों निगरानी द्वारा पकडे गए.करीब डेढ़ साल तक जेल में रहने के बाद वे बाहर आए और बाहर आते ही न जाने कैसे राजकीय मध्य विद्यालय,बासुदेवपुर चंदेल के प्रधानाध्यापक बना दिए गए और साथ ही कई-कई अन्य विद्यालयों के सुपरवाईजर भी.सुशासन की कृपा से एक बार फिर इस भ्रष्टाचारी की बीसों ऊंगलियाँ घी में हैं और सिर कराह में.फिर से श्रीमान दोनों हाथों से घूस खाकर सच्चा सुशासन स्थापित करने में मशगूल हो गए हैं.निगरानी द्वारा वर्ष २००६-०७ में उन पर दर्ज मुकदमें का क्या हश्र हुआ यह शायद सुशाशन बाबू को बेहतर पता होगा.निगरानी द्वारा छापा मारने और फिर बाद में ले-देकर मामले को कमजोर कर देने ताकि मुजरिम आसानी से कानून के शिकंजे से छूटकर फिर से तंत्र को खोखला कर सके;का यह न तो पहला उदाहरण है और न तो अंतिम ही.हुआ तो मुजफ्फरपुर/हाजीपुर में ऐसा भी है कि राज्य खाद्य निगम के एक पदाधिकारी को जब निगरानी द्वारा घूस लेते रंगे हाथों पकड़ा गया तब निगरानी के पदाधिकारी ने उससे उसके आधा दर्जन से अधिक एटीएम कार्ड छीन लिए और डंडे के जोर पर पिन भी जान लिया.बाद में अभियुक्त ने शिकायत की कि उसके बैंक एकाउंट से उक्त पदाधिकारी ने लाखों रूपये निकाल लिए हैं.क्या मिलेगा आपको इस भूमंडल पर गुड गवर्नेंस का दूसरा ऐसा नायाब उदाहरण?
                  मित्रों,बिहार में सुशासन ने सबको लूटने का समान अवसर दिया है.पूरी तरह से इस मामले में यहाँ साम्यवाद स्थापित हो गया है.जो जनवितरण प्रणाली के दुकानदार लालू-राबड़ी राज में फटेहाली की अवस्था में पहुँच गए थे इन दिनों दिन अढ़ईया रात पसेरी की दर से मोटे होते जा रहे हैं.साल में छह महीने भी अगर बी.पी.एल. के लिए आनेवाले अनाज की कालाबाजारी कर दी तो हो गए बिना के.बी.सी. में भाग लिए करोड़पति.आटा चक्की वालों की भी पौ बारह है.इन्हें भी बाजार से काफी कम कीमत पर गेहूँ-चावल मिल जाता है और फिर ये लोग जो पहले गेहूँ के साथ सिर्फ घुन को पीसते थे अब जबरदस्त तरक्की करते हुए गेहूँ में मिलाकर चावल पीसने लगे हैं.फिर यह अतिपौष्टिक मिश्रण किराना दुकानदारों के हाथों बेच दिया जाता है जिसे खरीदनेवाला ग्राहक भी परेशान रहता है कि आटे की रोटी क्यों अच्छी नहीं बन रही है?ग्राम पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधियों का तो कहना ही क्या?सुशासनी भ्रष्टाचार की कृपा से गांवों में इस दिनों रामराज्य उतर आया है-काजू भुने प्लेट में व्हिस्की है गिलास में,उतरा है सुशासन ग्राम-प्रधान के निवास में.
            मित्रों,सुशासनी अफसरशाही का तो नाम ही मत लीजिए.सुशासन और अफसरशाही का तो गठबंधन ही अनोखा है.'मेरे शासन में मेरा कुछ नहीं जो कुछ है सब तोर,तेरा तुझको सौंपते क्या लागे है मोर?'इस समय पूरा बिहार अफसरों के हवाले है.कोई विधायक तो क्या मंत्री भी थाने तक में कदम रखने से हिचकिचाते हैं.पूरे बिहार में 'पहले पुलिस को बाखबर करना,फिर चाहे जुर्म रातभर करना' की तर्ज पर अपराध किए जा रहे हैं,घोटाले भी किए जा रहे हैं.कुछ लोग तो इस स्थिति से इतने अधिक निराश हो चुके हैं कि उनका मानना है कि अगर इसी तरह से चलता रहा तो २०५० आते-आते भगवान को प्रलय करना पड़ेगा.
                       मित्रों,चर्चा सुशासन की हो और शिक्षा की बात नहीं हो तो बात कुछ हजम ही नहीं होती.सुशासन छात्र-छात्रों के बीच लगातार साइकिल और पोशाक की राशि वितरित कर रहा है.चाहे पढ़ानेवाले मारसाहेब पढाई या लिखाई में जीरो-जीरो ही क्यों न हों या फिर सिर्फ खिचड़ी का अनाज बेचकर पैसे बनाने में ही मशरूफ क्यों न हों.छात्र-छात्राएं खुश हैं कि उन्हें सुशासन से मुफ्त में साइकिल और पोशाक के लिए पैसे प्राप्त हो रहे हैं.अभी से ही उन्हें मुफ्तखोरी की आदत लगाई जा रही है ताकि वे भी बड़े होकर बैठे-बैठे मनरेगा से पैसा उठाएं और सस्ता अनाज लक्षित जनवितरण प्रणाली की दुकान से खरीद कर पड़े-पड़े खाते रहें.परन्तु जब किसानों को मुफ्त में ही पैसा और अनाज मिल रहा है तो फिर खेती कोई क्यों करेगा और फिर कृषि-क्षेत्र में सुशासन बाबू की इन्द्रधनुषी क्रांति का क्या होगा?
                    मित्रों,अभी-अभी १८ दिसंबर को सचिवालय सहायक की परीक्षा कथित सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई है.परीक्षा के दौरान तीन किताबें साथ रखने की अनुमति थी.प्रश्न-पत्र मिला तो पता चला कि निगेटिव मार्किंग भी है.पृष्ठ उलटने पर पाया कि प्रश्न बहुत-ही कठिन प्रकृति के हैं.इतने कठिन कि पूरा बना पाना भी संभव नहीं था सो अधिकांश परीक्षार्थियों ने उत्तर-पत्रक पर कई प्रश्नों के उत्तर बिना रंगे ही छोड़ दिए.बस यहीं से बन गयी गड़बड़ी की गुंजाईश.अब अगर परीक्षा संचालित करनेवाले लोगों ने खाली खानों में जानबूझकर गलत उत्तर को रंग कर अंक कम करवा दिया तो परीक्षार्थी क्या कर लेगा?कुछ भी नहीं न!सूत्रों से पता यह भी चल रहा है कि इस परीक्षा के लिए सीटें बिक भी चुकी हैं और ज्यादातर पद मंत्रियों के परिवारवाले ले उड़ने वाले हैं.एक तो निगेटिव मार्किंग फिर उस पर सितम यह कि प्रश्न-पत्र भी वापस ले लिया जबकि बिहार लोक सेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षाओं की तरह ही इस परीक्षा में भी कई प्रश्नोत्तर गलत थे.अब तो परीक्षार्थी मुकदमा भी नहीं कर सकता.होना तो यह चाहिए कि यह परीक्षा फिर से ली जानी चाहिए.इस बार परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र परीक्षा के बाद घर ले जाने की इजाजत मिलनी चाहिए और निगेटिव मार्किंग भी नहीं की जानी चाहिए.ऐसा होने पर ही इस परीक्षा में गड़बड़ी की आशंकाओं को निर्मूलित किया जा सकेगा वर्ना यह परीक्षा और इसके द्वारा होनेवाली नियुक्तियाँ हमेशा संशय के घेरे में रहेंगी.
                मित्रों,अब थोड़ी बात कर लें बहुचर्चित सेवा का अधिकार कानून की जो हाथी का या यह भी कह सकते हैं कि सुशासन का दिखाने का दांत बनकर रह गया है.लोग रसीद हाथों में लिए महीनों से दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं और उन्हें बिना मेवा खिलाए सेवा प्राप्त ही नहीं हो रही.अगरचे अधिकतर प्रार्थियों को तो रसीद भी नहीं दी जाती.एक अदद आय प्रमाण-पत्र या आवासीय प्रमाण-पत्र के लिए लोग कहाँ-कहाँ अपील करते फिरें समझ में ही नहीं आता?कागजों पर तो सेवा का अधिकार मिल गया परन्तु हकीकत में क्या कभी मिल भी पाएगा;यह आज भी सबसे बड़ा प्रश्न बना हुआ है?सुशासन ने पहले ही सूचना के अधिकार में मनमाना संशोधन कर उसे मृतप्राय बना दिया है फिर जनता भ्रष्टाचार से पीड़ित होने या काम नहीं होने की दशा में करे भी तो क्या करे?कुछ ऐसा ही हाल अगर निकट-भविष्य में नवस्थापित लोकायुक्त का भी देखने को मिले तो किसी को भी उसकी परिणति पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए.आखिर सुबह को देखकर ही तो दिन के मौसम का अंदाजा लग जाता है.
               मित्रों,अंत में हम आते हैं नीतीश कुमार जी द्वारा समय-समय पर की जानेवाली यात्राओं पर.आज ही उनकी सेवा-यात्रा समाप्त हो रही है.कभी धन्यवाद्-यात्रा तो कभी कोई और यात्रा.कभी सम्राट हर्षवर्धन भी छठी शताब्दी में इसी तरह यात्राओं पर निकला करते थे और जनता के सुख-दुःख को समझा करते थे.परन्तु नीतीशजी तो अपनी यात्राओं के दौरान जनता और अधिकारियों को बोलने ही नहीं देते.धन्यवाद्-यात्रा के दौरान पिछली बार सुशासन बाबू ने धड़ल्ले से अनगिनत शिलान्यास कर डाले और फिर भूल भी गए.इस दौरान सारी जनता से मिलते भी नहीं और न ही सबका दुःख-दर्द ही सुनते हैं.उन्हें तो बस वही सुनाई देता है जो वे सुनना चाहते हैं,उन्हें तो सिर्फ वही दिखाई देता है जो वे देखना चाहते हैं और फिर प्रिंट मिडिया वही बोलता है जो वे उससे बोलवाना चाहते हैं.वरना सेवा-यात्रा के दौरान जदयू सांसद महाबली सिंह को नीतीश कुमार की मौजूदगी में जनता द्वारा सैंकड़ों की संख्या में मंच के सामने पंक्तिबद्ध होकर जूते दिखाए जाने और बाद में मुख्यमंत्री द्वारा स्वयं हस्तक्षेप करने पर शांत होने की खबर अख़बारों से गायब नहीं हो गयी होती.मैंने खुद कई बार कई तरह के मामलों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी को ई-मेल किया है,खुले पत्र भी लिखे हैं और अपने पूर्व के लेखों की तरह ही अपने इस लेख को भी उन्हें ई-मेल करने जा रहा हूँ परन्तु मेरे पूर्व के सारे प्रयासों का परिणाम अब तक शून्य ही रहा है और उम्मीद की जानी चाहिए कि इस लेख को पढ़कर भी सुशासन बाबू के छोटे-छोटे कानों पर जूँ तक नहीं रेंगनेवाली है.कुल मिलाकर हमने अब तक की माथापच्ची से पाया कि सुशासन अंधा और बहरा होता है लेकिन गूंगा नहीं होता बल्कि बड़बोला होता है.हो सकता है कि मेरे किसी अन्य राज्य में रह रहे भाई-बन्धुओं द्वारा सुशासन की दी गयी परिभाषा मेरी परिभाषा से अलग हो लेकिन बिहार में तो फ़िलहाल सुशासन का मतलब यही है.

रविवार, 1 जनवरी 2012

नए साल की प्रातः बेला में

नए साल की प्रातः बेला में,
आओ मिलकर दिया जलाएँ;
ईश्वर से हम करें प्रार्थना,
उच्च आदर्शों के  पुष्प चढ़ाएँ.

सरक जाता है जिस तरह रेत
समझ ले मानव मुठ्ठी से,
निकल गया यह कालखंड भी
सरककर आज हमारी मुठ्ठी से;
दुर्गुणों पर विजय करें हम
देश का जग में मान बढाएँ;
नए साल की प्रातः बेला में,
आओ मिलकर दिया जलाएँ.

क्या खोया क्या पाया हमने,
देखी प्रभु  की माया हमने?
भटक रहे हम जिसकी खोज में
क्या उसे पाकर भी पाया हमने?
भटक गए हम स्वयं के अरण्य में
आओ खुद का पता लगाएँ;

नए साल की प्रातः बेला में,
आओ मिलकर दिया जलाएँ.

क्या सीखा हमने इस बीते वर्ष से?
क्या किया हमने इस बीते वर्ष में?
सोंचा है कभी शांतचित्त होकर
करना क्या है नए वर्ष में?
आओ मिलकर सोंचें-विचारें
नववर्ष की योजना बनाएँ;

नए साल की प्रातः बेला में,
आओ मिलकर दिया जलाएँ.

आया है समय नए अवसर लेकर
करें प्रयत्न हम नव निर्माण का;
बीते दिनों के ध्वंस भुलाकर
करें स्वागत हम नवविहान का;
जाना है हमें मंजिल तक
आओ मिलकर कदम बढाएँ;  

नए साल की प्रातः बेला में,
आओ मिलकर दिया जलाएँ;
ईश्वर से हम करें प्रार्थना,
उच्च आदर्शों के  पुष्प चढ़ाएँ. 

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

अनशन तोड़ना अन्ना का सराहनीय कदम

मित्रों,कोई भी आन्दोलन खड़ा करना और फिर उसे सफलतापूर्वक संचालित करना कोई बच्चों का खेल नहीं होता.कांग्रेस गाँधी के पहले भी थी.उसके पास गाँधी से भी कहीं ज्यादा योग्य नेता भी थे लेकिन वे लोग लाख कोशिश करके भी ऐसा आन्दोलन खड़ा नहीं कर पाए जिसे सही परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय कहा जा सकता हो.गाँधी ने १९२० में असहयोग आन्दोलन शुरू करने से पहले मुस्लिम लीग को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि दल स्वीकार करने की महान भूल करते हुए असहयोग आन्दोलन को खिलाफत आन्दोलन से जोड़ दिया था.जैसे ही तुर्की में मुस्तफा कमाल पाशा सत्ता पर काबिज हुआ मुसलमान लोग कट लिए और केरल में तो हिन्दुओं के खिलाफ दंगा-फसाद भी शुरू कर दिया.इसी बीच गोरखपुर में चौरी-चौरा की दुखद घटना हो गयी और गाँधी को १२ फरवरी,१९२२ को न चाहते हुए भी अपनी सारी विश्वसनीयता को दांव पर लगाते हुए असहयोग आन्दोलन को असमय बिना किसी परिणति तक पहुंचे हुए ही वापस  ले लेना पड़ा.कुछ यही हाल १९३० के सविनय अवज्ञा आन्दोलन का भी हुआ.पहले तो १९३१ में गाँधी-इरविन समझौते के बाद उन्होंने आन्दोलन को स्थगित कर दिया.फिर द्वितीय गोलमेज सम्मलेन की विफलता के बाद फिर से आन्दोलन शुरू किया परन्तु इस बार आन्दोलन में वो खनक नहीं थी आने पाई जो इसके पहले भाग में थी.कारण यह था कि इस बार इसमें जनभागीदारी काफी कम थी.किसी भी देश-प्रदेश की जनता की संघर्ष की क्षमता सीमित होती है.वो लगातार अनंत काल तक संघर्ष नहीं कर सकती.हरेक की घर-गृहस्थी भी होती है और उसे भी देखना होता है.इसलिए गांधीजी ने समझदारी का परिचय देते हुए अप्रैल,१९३४ में आन्दोलन को वापस ले लिया.
                                मित्रों,कुछ इसी तरह की स्थिति १९४२ के भारत छोडो आन्दोलन के दौरान भी रही.धीरे-धीरे इसका भी प्रभाव कम होता गया और अंत में सितम्बर १९४२ के बाद यह आन्दोलन भूमिगत होकर रह गया.दिसंबर,१९४३ आते-आते भूमिगत क्रांतिकारियों की गतिविधियाँ भी समाप्तप्राय हो गयी.हाँ,लेकिन गाँधी के साथ एक बात और भी थी.वे जब आन्दोलन नहीं कर रहे होते थे तब सामाजिक-रचनात्मक कार्य कर रहे होते थे.इससे समाज में नई चेतना का प्रसार तो होता ही था नए लोगों को भी कांग्रेस के साथ जोड़ा जाता था.जहाँ तक गाँधी के आंदोलनों में मुसलमानों की भागीदारी का प्रश्न है तो इस मामले में गाँधी भी भाग्यशाली नहीं थे और तब मुस्लिम लीग गाहे-बेगाहे इस बात का ढिंढोरा पीटती रहती थी कि कांग्रेस सिर्फ हिन्दुओं की पार्टी है और इस प्रकार एक सांप्रदायिक संगठन है.
                             मित्रों,इस समय अन्ना के आन्दोलन के सन्दर्भ में कुछ यही काम गाँधी की विरासत का दावा करनेवाली कांग्रेस पार्टी कर रही है.टीम अन्ना के लाख प्रयासों के बाबजूद कांग्रेसी प्रोपेगेंडे ने असर दिखाया और इस बार मुसलमान आन्दोलन से दूर ही रहे.साथ ही,दूसरी आम जनता की भी इस तीसरी बार हो रहे अन्ना के अनशन में काफी कम भागीदारी देखी गयी.कहाँ रह गयी कमी?शायद कमी रह गयी टीम अन्ना की रणनीति में.मेरे मतानुसार पहली कमी तो यह थी कि टीम अन्ना ने आन्दोलन के लिए गलत समय का चयन कर लिया.इस समय संसद में लोकपाल पर बहस चल रही है और पूरे देश की निगाहें उसी पर टिकी हुई हैं ऐसे में लोगों से यह उम्मीद कर लेना कि वे संसद पर पूरी तरह से अविश्वास प्रकट करते हुए अन्ना के समर्थन में सड़कों पर आ जाएँगे बेमानी थी.दूसरी कमी रही आन्दोलन के लिए स्थान चयन में.अन्ना ने अपनी और जनता की सुविधाओं का ख्याल करते हुए दिल्ली के बजाये मुम्बई को आन्दोलन का केंद्र बनाने का फैसला कर लिया.वे भूल गए कि आन्दोलन सुविधाओं को ध्यान में रखकर नहीं छेड़े जाते हैं बल्कि इसके लिए तो जनभावनाओं का उभार चाहिए होता है.दिल्ली और मुम्बई के लोगों के मिजाज में ही मौलिक अंतर है.मुम्बई एक बेहद व्यस्त शहर है.वहां के लोग इतने अधिक स्वयंसीमित होते हैं कि उनकी दिनचर्या पर २६-११ से भी कोई फर्क नहीं पड़ता.वहीं दिल्ली के लोगों के दिलों के किसी कोने में देशभक्ति भी बसती है.साथ ही,यहाँ का जीवन उतना व्यस्त भी नहीं है.११-१२ बजे दुकानों का खुलना दिल्ली के लिए आमबात है.इसलिए रामलीला मैदान चंद मिनटों में ही खचाखच भर जाता है चाहे आह्वान करनेवाला रामदेव हों या अन्ना हजारे.हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि रामलीला मैदान में जमा लोगों में बहुत बड़ा हिस्सा दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों से आनेवाले लोगों का भी होता है जैसे मध्य प्रदेश,उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान, उत्तराखंड,झारखण्ड इत्यादि.जंगे आजादी में भी चाहे असहयोग आन्दोलन हो या सविनय अवज्ञा आन्दोलन या फिर भारत छोड़ो आन्दोलन उस समय भी इन्हीं क्षेत्रों में आंदोलनों का असर ज्यादा रहा था.दक्षिण भारत तो अंत तक लगभग निष्क्रिय बना रहा था.साथ ही,दिल्ली हमेशा से भारतीय संप्रभुता की प्रतीक भी रही है इसलिए लगभग सारे आन्दोलनकारी दिल्ली चलो का नारा देते हैं.
                   मित्रों,कोई भी आन्दोलन जनभागीदारी से ही सफल और विफल होती है.अन्ना कहते भी हैं कि समर्थकों की भीड़ से ही उन्हें भूखे रहकर भी ऊर्जा मिलती है.कुछ सरकारी और कांग्रेसी षड्यंत्रों के चलते और  कुछ टीम अन्ना द्वारा आन्दोलन के लिए गलत वक्त और गलत स्थान चुनने के चलते भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का तीसरा चरण दुर्भाग्यवश सफल नहीं हो पाया.कोई बात नहीं ऐसा तो गाँधी के साथ भी हुआ था.अच्छा रहेगा कि टीम अन्ना भी गाँधी की तरह ही खाली समय में यानि दो आंदोलनों या आन्दोलन के दो चरणों के मध्यांतर में कोई सामाजिक-रचनात्मक कार्यक्रम का सञ्चालन करे.इससे दो फायदे होंगे-एक तो देश व समाज में नई चेतना आएगी और दूसरी इससे उनके आन्दोलन से नए-नए लोगों के निष्ठापूर्वक जुड़ने से संचित ऊर्जा में बढ़ोत्तरी होगी.मैं टीम अन्ना और अन्ना हजारे द्वारा फ़िलहाल आन्दोलन वापस लेने के निर्णय का स्वागत करता हूँ क्योंकि जोश जरुरी तो है ही लेकिन उससे कम आवश्यक होश भी नहीं है.आप लोगों के बीच जाईये,उनके दुःख-दर्द में भागीदार बनिए,कोई निर्माणात्मक कार्यक्रम चलाईये;फिर जब लगे कि आपने आन्दोलन के लिए आवश्यक ऊर्जा अर्जित कर ली है तो फिर से आन्दोलन का शंखनाद करिए.याद रखिए,कभी-कभी जोरदार टक्कर मारने के लिए पीछे भी हटना पड़ता है.जय हिंद,वन्दे मातरम.                           

रविवार, 25 दिसंबर 2011

गरीबी जाति नहीं देखती जनाब


मित्रों,भारत में जाति का क्या स्थान है इससे आप भी भली-भांति परिचित होंगे.हमारे कुछ पढ़े-लिखे मित्र भी जाति नाम परमेश्वर में विश्वास रखते हैं.हमारे एक पत्रकार मित्र जो यादव जाति से आते हैं किसी से परिचित होने पर सबसे पहले उसकी जाति पूछते हैं.एक बार उन्होंने पटना से मुजफ्फरपुर तक पदयात्रा की योजना बनाई.तब मुझसे पूछा कि हाजीपुर से मुजफ्फरपुर के बीच सड़क किनारे यादवों के कितने गाँव हैं और तब मैं उनकी जातिभक्ति से हतप्रभ रह गया.यही वे लोग होते हैं जो सड़क पर पड़े घायल की तब तक मदद नहीं करते जब तक उन्हें इस बात की तसल्ली न हो जाए कि दम तोड़ रहा व्यक्ति उनकी ही जाति से है.ऐसे लोग ढूँढने पर बड़ी जातियों में भी बड़ी आसानी से मिल जाएँगे.
                  मित्रों,जहाँ तक मेरा मानना है कि व्यक्ति की जाति सिर्फ तभी देखनी चाहिए जब बेटे-बेटी की शादी करनी हो वरना २४ घंटे,सोते-जागते,उठते-बैठते जाति के बारे में सोंचना अमानवीय तो है ही मूर्खतापूर्ण भी है.ये तो हो गई आम जनता की बात लेकिन हम उनका क्या करें जो विभिन्न जातियों और धर्मों के बीच तनाव की ही खाते हैं.आपने एकदम ठीक समझा है मैं बात कर रहा हूँ उन नेताओं की जो गरीब और गरीब तथा वंचित और वंचित और इस तरह इन्सान और इन्सान के बीच में फर्क करते हैं.
           दोस्तों,गरीबी,जहालत और बेबसी ये ऐसे शह हैं जो कभी जाति-जाति और धर्म-धर्म के बीच भेदभाव नहीं करते.ये तो उतनी ही संजीदगी के साथ सवर्ण हिन्दुओं पर भी नमूदार हो जाते हैं जितनी संजीदगी के साथ अन्य जाति और धर्मवालों पर.फिर अगर हम गरीबों के बीच जाति और धर्म के नाम पर सुविधाएँ और आरक्षण देने में भादभाव करते हैं तो हमसे बड़ा काईयाँ और कोई हो ही नहीं सकता.
         मित्रों,अभी कुछ ही दिनों पहले देश के अग्रणी दलित उद्यमियों ने एक मेले का आयोजन किया शायद मुम्बई में.वहां उन्होंने बताया कि वे लोग अपनी फर्मों और कारखानों में ५०% सीटें दलितों के लिए आरक्षित रखते हैं और बाँकी ५०% अन्य सारी बड़ी-छोटी जातियों के लिए;आखिर गरीबी तो उनमें भी है न.क्या हमारी सरकार और हमारे राजनेताओं को भी इन दलित उद्यमियों से शिक्षा लेने की आवश्यकता नहीं है?ये दलित उद्यमी कोई रामविलास पासवान के परिवार से नहीं हैं और न हो चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुए हैं.इन्होंने गरीबी में जन्म लिया और गरीबी में ही पले-बढ़े.फिर अपनी बुद्धि और बाहुबल से गरीबी से लड़कर उसे पराजित किया और आज सफलता के शिखर पर जा पहुंचे हैं.लेकिन ये लोग नहीं भूले हैं गरीबी के दर्द को जो अपने आपमें सबसे बड़ी बीमारी है.अगर हम इनकी तुलना गरीबी से उठकर आए राजनेताओं से करें तो सिवाय निराशा के कुछ भी हाथ नहीं आएगा.लालू-रामविलास-मुलायम-मायावती जैसे बहुत-से राजनेता हैं जो वास्तव में गुदड़ी के लाल हैं लेकिन सफलता पाते ही,अमीर बनते ही ये अपने गरीबी धर्म को भूल गए और जाति-धर्म की राजनीति में खोकर रह गए.
                     मित्रों,गरीब सिर्फ गरीब होता है;उसकी कोई जाति नहीं होती.अभाव उसका भाई होता है,दुःख उसका पिता और जहालत उसकी माँ.बेबसी और भूख ही उसके भाई-बन्धु होते हैं.मैंने अपने गाँव में कई ऐसे राजपूत-ब्राह्मण देखे हैं जिनके पास पहनने के लिए ढंग का कपड़ा तक नहीं है.जाकर उनकी मजबूरी से पूछिए कि उसकी क्या जाति है?जाकर उनके परिजनों के फटे पांवों और खाली पेटों से पूछिए कि उसका मजहब क्या है?यक़ीनन वो राजपूत-ब्राह्मण-यादव-दलित या मुसलमान नहीं बताएँगे बल्कि अपनी जाति और धर्म दोनों का नाम सिर्फ और सिर्फ गरीबी बताएँगे.मैंने अगर दलितों के घर में गरीबी के कारण भैस बेचने पर लोगों को मातम मनाते देखा है तो मैंने बड़ी जातिवालों के घर में भी बेटी की शादी में इकलौता बैल बेचने के बाद दो-दो दिनों तक चूल्हे को ठंडा रहते हुए भी देखा है.क्या इन दोनों परिवारों की मजबूरी की,उनके आंसुओं की कोई जाति है?क्या इन दोनों घरों में पसरे मातमी सन्नाटे का कोई मजहब है?खुद मेरे चचेरे चाचा को लम्बे समय तक अपनी माँ के पेटीकोट को लुंगी बनाकर पहनना पड़ा और पढ़ाई भी बीच में ही छोडनी पड़ी.क्या मेरे उन चाचा की दीनता और हीनता को किसी खास जाति या धर्म की दीनता या हीनता का नाम देना अनुचित नहीं होगा?मेरे उन्हीं चाचा की पत्नी और बच्चों के कपड़ों पर लगे पैबन्दों की क्या कोई जाति हो सकती या कोई मजहब हो सकता है?पहले भले ही विभिन्न जातियों में गरीबी का अनुपात काफी अलग रहा हो अब लम्बे समय से चले आ रहे जाति-धर्म आधारित आरक्षण के बाद स्थिति बहुत ज्यादा अलग नहीं रह गयी है.इस बात का गवाह सिर्फ एक मैं ही नहीं हूँ बल्कि सरकारी अमलों द्वारा निर्मित गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीनेवालों की सूची भी चीख-चीखकर यही कह रही है कि गरीबों की और गरीबी की कोई जाति नहीं होती,कोई धर्म नहीं होता.
          दोस्तों,अंत में मैं सत्ता पक्ष और विपक्ष के सभी नेताओं से विनम्र निवेदन करता हूँ कि वे कृपया इंसानियत को जातियों और धर्मों में विभाजित न करें.जब गरीबी ने कभी इंसानों और इंसानों के बीच अंतर नहीं किया तो वे कौन होते हैं ऐसा करनेवाले?गरीबी अपने-आपमें ही बहुत बड़ा ईश्वरीय मजाक होती है इसलिए कृपया वे इस क्रूर मजाक का और भी मजाक नहीं बनाएँ.आरक्षण देना हो या कोई और सुविधा देनी हो दीजिए,शौक से दीजिए परन्तु सुविधा दीजिए सिर्फ गरीबी देखकर,गरीबों की पहचान करके;न कि उसकी जाति और धर्म देखकर क्योंकि इस तरह तो बहुत-से ऐसे लोग सुख की उस रौशनी और अवसर से वंचित रह जाएँगे जिन पर उनका भी वास्तविक हक़ है और फिर पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी उनके लिए घर में जबरदस्ती घुस आए मेहमान की तरह अड्डा जमा लेगी.         

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

मांगा था लोकपाल मिला मरा हुआ साँप

मित्रों,क्या आपके साथ कभी आपके किसी अपने ने विश्वासघात किया है?यक़ीनन किया है मियां.वर्तमान में देश को चलानेवाले नेता भी तो कोई गैर नहीं हैं,अपने ही हैं.धोखा देने की क्या गजब की क्षमता है इनकी?एक-एक मुँह में सैंकड़ों जुबान रखते हैं ये लोग.आज ६१-६२ सालों से ये लोग जनता को यह झूठा विश्वास दिलाने में लगे हैं कि देश में लोकतंत्र है.ऐसा लोकतंत्र जिसमें लोक की नहीं चलती,उनकी बिलकुल भी नहीं सुनी जाती बल्कि यह लोकतंत्र तो ऐसा लोकतंत्र है जैसा कि नेता चाहते हैं.यह नेताओं का,नेताओं के लिए और नेताओं के द्वारा लोकतंत्र है.हम चुनाव-दर-चुनाव धोखा खा रहे हैं.हम वास्तव में चुनावों में अपना प्रतिनिधि नहीं चुनते हैं बल्कि हालत तो ऐसी हो गयी हैं कि मानो हम बकरियां हैं और प्रत्येक चुनाव में हम अपने ही हाथों अपने कसाई का चुनाव करते हैं:-वो बेदर्दी से सर काटे 'आमिर' और मैं कहूं उनसे,हुजुर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता.
          मित्रों,अब हम लोकपाल के मुद्दे को ही लें जिसके चलते इस जिस्म में बहते खून को भी जमा देनेवाली सर्दी में भी केंद्र सरकार को पसीने आ रहे हैं.सरकार ने अप्रैल में बिल ड्राफ्टिंग कमिटी बनाई और अंत में अपनी मर्जी का बकवास बिल बनाकर संसद के आगे रख दिया.फिर वह बिल विचारार्थ स्टैंडिंग कमिटी में गयी और अब जब अंतिम रूप में पेश की गयी हैं तब पता चला है कि यह तो खोदा पहाड़ और निकली चुहिया भी नहीं बल्कि मरा हुआ साँप निकला;वो भी विषहीन और दंतहीन.देश ने माँगा था एक ऐसा हथियार जिसे हाथ में लेकर देशवासी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ सकें लेकिन थमाया तो झुनझुना थमा दिया.बस बजाते रहिए और छोटे बच्चे की तरह खुश होते रहिए.बिल बनाने वाली स्टैंडिंग कमिटी में लोग भी कैसे-कैसे थे किसी से छुपा हुआ नहीं है.इनमें से कोई है घोटाला विशेषज्ञ तो कोई जातिवादी राजनीति का प्रणेता है.
           मित्रों,यह कैसा लोकपाल है जो न तो किसी भ्रष्टाचारी के विरुद्ध स्वतः कोई कदम ही उठा सकता है और न तो खुद जाँच ही कर सकता है.फिर क्या करेगा देश ऐसा पोस्टमास्टरनुमा लोकपाल लेकर?अगर ५५ हजार लोग चाहिए ५५ लाख कर्मचारियों पर नजर रखने के लिए तो बहाल करिए.किसने रोका है आपको बहाल करने से?आप ५५ लाख लोगों को तो देश को लूटने के लिए बहाल कर सकते हैं लेकिन उस लूट को रोकने के लिए ५५ हजार को नहीं बहाल कर सकते?क्या सरकार यह बताएगी कि दो-ढाई सौ सीवीसी कर्मी भला कैसे इन ५५ लाख कर्मचारियों पर नियंत्रण रखेंगे?साथ ही इस बिल में यह प्रावधान भी कर दिया गया है कि भ्रष्टाचार में आरोपित लोगों को सरकार मुफ्त में २ सालों तक कानूनी सहायता देगी.क्या इस तरह मिटेगा भ्रष्टाचार?साथ ही निजी कंपनियों को भी इसमें कई प्रकार की राहत दे दी गयी है.क्या इस तरह से कम होगा भ्रष्टाचार?इस बिल में यह भी प्रावधान किया गया है कि राज्यों में लोकायुक्त राज्य पुलिस से मामलों की जाँच करवाएगा.जो प्रदेश पुलिस खुद ही भ्रष्टाचार का अड्डा है वो भला कैसे भ्रष्टाचार मिटाने में कैसे सहायक हो सकती है?क्या इस तरह से मिटेगा भ्रष्टाचार?बिल में लोकपाल में कम-से-कम ५०% से अधिक आरक्षण का प्रावधान किया गया है.इस तरह तो ९ में से कम-से-कम ५ पद आरक्षित हो जाएँगे.क्या यह उच्चतम न्यायालय के आरक्षण सम्बन्धी निर्णय के विपरीत नहीं है?साथ ही इसमें संविधान का घोर उल्लंघन करते हुए धर्म के आधार पर आरक्षण दे दिया गया है.ऐसे में अगर इस बिल को सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित कर दिया तब लोकपाल सम्बन्धी इस पूरी जद्दोजहद का और इस बिल का क्या होगा?
               मित्रों,राजमाता,त्यागमूर्ति सोनिया जी का कहना है कि उन्होंने जो लोकपाल दिया है वह बहुत सशक्त है;वाकई बहुत सशक्त है.उसको एक कार्यालय चलाने का अधिकार दिया गया है जिसमें काम करनेवाले चपरासियों पर उसका ही रोबदाब चलेगा.चाहे जितना पानी पीए,उन्हें बाजार भेजकर चाहे जितना खाना मंगवाए और जब जी चाहे लघुशंका और दीर्घशंका से भी हो आवे.हाँ,वो अपनी मर्जी से किसी भी भ्रष्टाचारी के विरूद्ध न तो कोई जाँच ही कर सकता है और न ही जाँच शुरू करवा सकता है.बहुत ज्यादा अधिकार दे दिया है इन्होंने लोकपाल को;इतनी अधिक मनमानी करने की अनुमति तो इन्होंने प्रधानमंत्री को भी नहीं दी है;अब और कितना अधिकार चाहिए?सही तो कहा है इन्होंने,वो बेचारा अर्थशास्त्री तो इनसे पूछे बिना पाखाना-पेशाब करने भी नहीं जा पाता है.
               मित्रों,जहाँ तक लोकपाल की नियुक्ति का प्रश्न है तो सोनिया-राहुल जी भला कैसे नियुक्ति समिति में सरकारी बहुमत नहीं रहने दें?कल को अगर कोई अपने पालतू की जगह दूसरा आदमी लोकपाल बन जाता है तो फिर उन्हीं को भीतर कर देगा.आखिर ये लोग भी इन्सान हैं,नेता हैं;इनके हाथों से भी सजा होने लायक गबन-घोटाला हो सकता है और क्या पता कि हो भी चुका हो.ऐसे में ये लोग भला कैसे जेल जाने का जोखिम ले सकते हैं?भला कैसे ये लोग अपने ही गले की नाप का फंदा बना कर अपनी ही गर्दनों में उनके भीतर डाल दें?इसलिए तो लोकपाल को निलंबित करने या हटाने का अधिकार भी इनलोगों ने अपने ही सुरक्षित हाथों में रखा है.
                  मित्रों,इन विश्वासघातियों ने देश को लूटने में पहले से ही आरक्षण दे रखा है और अब इसे रोकनेवाली संस्था में भी आरक्षण दिया जा रहा है जिससे कि उनकी जाति-धर्म के लोगों द्वारा की जानेवाली लूट में बाधा न आने पाए.अब आगे लोकपाल के मुद्दे का और मुद्दे पर क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता.इस मामले में देश फिर से अप्रैल २०१० में आकर खड़ा हो गया है.अन्ना अनशन तो जरुर करेंगे,शायद सरकार फिर से झुकती हुई नजर भी आएगी और फिर से देश से कोई वादा भी कर देगी लेकिन पूरी हरगिज नहीं करेगी.जनता जिसे लोकतंत्र में वास्तविक मालिक कहा जाता है भविष्य में सशक्त लोकपाल की मांग का भविष्य भी उसी के रूख पर निर्भर करेगा.शायद जनता रूपी कुत्ते के आगे अगले कुछ ही दिनों में खाद्य सुरक्षा गारंटी और अल्पसंख्यक आरक्षण के नाम की रोटी फेंक दी जाएगी और शायद उसके लालच में आकर आकर जनता एक बार फिर कांग्रेस को वोट दे देगी.आपको अपनी बेबकूफी पर कितना यकीन है यह तो आप ही बेहतर जानते होंगे लेकिन सोनिया-राहुल को तो आपकी मूर्खता पर अटूट विश्वास है.तभी तो वे लोकपाल के मामले में अपनी मक्कारी पर इतराते हुए दंभ भर रहे हैं कि पिछले सवा सौ सालों में (इसे अगर संशोधित कर पिछले ६४ सालों में कहा जाए और आजादी के बाद के वर्षों की ही गणना की जाए तो बेहतर होगा) तेरे जैसे लाखों आए,लाखों ने हमको आँख दिखाए,
रहा न नामोनिशान रे अन्ना,
तू क्या कर पाएगा हमारा नुकसान रे अन्ना,
तू क्या कर पाएगा हमारा नुकसान.
वैसे इस पूरे लोकपाल प्रकरण से एक बात तो निश्चित हो ही गयी है कि जनता के लिए सत्ता को बदल देना आसान रहा है और रहेगा भी परन्तु व्यवस्था बदलना आज भी नामुमकिन की हद तक मुश्किल है और आगे भी बना रहेगा.          

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

आह दिल्ली वाह दिल्ली

मित्रों,वर्ष २००२ के १२ सितम्बर से पहले मैंने दिल्ली को केवल सुना था देखा नहीं था.मैंने दिल्ली को सुना था अपने से उम्र में बड़े मामा लोगों के मुंह से और अपने उन हमउम्र दोस्तों की जुबानी जो तब कमाने के लिए दिल्ली में रहने लगे थे.कोई हमें मकान मालिक या पड़ोसी की बेटी से अपने अवैध मुहब्बत की दास्तान सुनाता तो कोई बताता कि दिल्ली में कैसे पैसा कमाया जाता है तो कोई वीर रस के मूर्धन्य कवियों को कई प्रकाशवर्ष पीछे छोड़ते हुए बताता कि उसने बिहारी कहने पर कैसे किसी स्थानीय व्यक्ति की पिटाई कर दी.कुल मिलाकर मुझे लगने लगा कि दिल्ली के लोग बिहारियों से बहुत डरते हैं.लेकिन जब मैंने १२ सितम्बर,२००२ को दिल्ली की धरती पर अपने कदम रखे तो पाया कि वे सबके सब झूठ बोल रहे थे.
               मित्रों,इससे पहले ११ सितम्बर को महनार से मेरी विदाई की गयी आरती उतारकर और ललाट पर विजय तिलक लगाकर;मैं आईएएस बनने का सपना आखों में लेकर जो रवाना हो रहा था.इस अवसर पर मेरी मकान मालकिन ने मुझसे मजाक करते हुए कहा भी कि तुम दिल्ली जाकर बदल जाओगे और शायद वापस आओ तो एक से भले दो होकर.तब मैंने भी अपने स्वभावानुरूप जवाब जड़ दिया था कि मैं दिल्ली बदल जाने के लिए नहीं जा रहा हूँ बल्कि दिल्ली को ही बदल देने के लिए जा रहा हूँ.परन्तु अंत में न तो मेरा दावा ही सत्य सिद्ध हुआ और न ही उनकी आशंका ही सच्चाई के धरातल पर उतर पाई.
           मित्रों,नई दिल्ली जंक्शन पर उतरकर हमारा सबसे पहले सामना हुआ रिक्शेवाले से जिसने कुल बीस कदम दूर बस स्टॉप तक हमारा सामान ले चलने के लिए हमसे २० रूपये ऐंठ लिए.तब देश में वाजपेयी की सरकार थी और बीस रूपया बहुत हुआ करता था.जब हम खानपुर में बस से उतरे तो झमाझम वर्षा हो रही थी और सड़क पर रिक्शेवाले नजर भी नहीं आ रहे थे.बाद में मैंने जाना कि वहां रिक्शा चलाने पर प्रतिबन्ध लगा हुआ था.किसी तरह एक ऑटो रिजर्व करके हम गंतव्य मकान तक यानि सुरेश के निवास पर पहुंचे.सुरेश मेरे बड़े जीजाजी के मित्र थे,ग्रामीण भी थे और भतीजे भी.फिर शुरू हुई ढंग का डेरा खोजने के लिए भागदौड़.तब मैंने एक अच्छी बात यह देखी कि सभी प्राइवेट बसों पर लिखा हुआ रहता था कि कौन-सी बस किस-किस इलाके से होकर गुजरेगी.लेकिन मेरे बड़े जीजाजी को न जाने क्यों उन पर लिखे पर विश्वास ही नहीं था.वे बिना पूछे बसों में चढ़ते ही नहीं थे.इसी दौरान एक बार हम किंग्जवे कैंप से खानपुर के लिए लौट रहे थे.जिस बस में हम चढ़े वो केवल सराय काले खान तक के लिए थी.उतरने के बाद अँधेरा हो जाने के कारण सुरेश और जीजाजी की समझ में ही नहीं आ रहा था कि खानपुर की बस सड़क के इस पार से मिलेगी या उस पार से.फिर उन्होंने मेरे मना करने पर भी सड़क पार की और एक बस में जिस पर खानपुर लिखा हुआ था सवार हो गए.कंडक्टर से खानपुर का तीन टिकट माँगा तो उसने बिना कुछ कहे-सुने १०-१० के तीन टिकट थमा दिए.बस के थोड़ी दूर चलने के बाद ही मुझे लगा कि बस तो यमुना पार जा रही है.फिर हमने बस रूकवाई और पैसे वापस मांगे लेकिन उस कंडक्टर ने बड़ी बेहयाई से हमारी अज्ञानता की हँसी उड़ाते हुए यह कहकर पैसे लौटाने से मना कर दिया कि हमने तो नहीं कहा था तुमको बस में चढ़ने के लिए.तब हमें अपने बिहार की भी याद आई क्योंकि बिहार में छोटे बच्चे को भी आप कहने का रिवाज है.लेकिन दिल्ली तो जैसे आप कहना जानती ही नहीं थी,बाप को भी तुम और बेटे को भी तुम.इसी दौरान मैंने एक और अजीब बात जिंदगी में पहली बार देखी वो यह कि दिल्ली में पैसा लेकर पानी पिलाया जाता था.
          मित्रों,करीब एक सप्ताह तक बसों में जमकर ठगाने के बाद डेरे का इंतजाम भी हो गया.ठगाने की बात मैंने इसलिए कही क्योंकि हमें तब यह पता नहीं था कि जहाँ हमें जाना है वह जगह वहां से कितनी दूर है और वहां का किराया कितना है.कंडक्टर हमारे बातचीत करने के लहजे से ही समझ जाता था कि कबूतर इस शहर के लिए नया है.फिर तो उसको जितने का जी में आता उतने का टिकट काट देता.हमारा डेरा ठीक किया था त्रिभुवन ने जो इन दिनों आई.आई.एम. इंदौर में पढ़ रहा है.वो उन दिनों किरोड़ीमल कॉलेज में मेरे दूर के भांजे उमाशंकर का जूनियर हुआ करता था.जब हम चार-पाँच दिन रह लिए तब एक लफुआनुमा युवक मोटा चश्मा लगाकर प्रकट हुआ और हमसे हमारा परिचय पूछने लगा.उसके साथ भाड़ा तय हुआ १७०० रू. लेकिन उसने हमसे २२०० रूपये मांगे जो मैंने देने से ही मना कर दिया.तब भी मेरी नजर दलाली लेना और देना दोनों अनैतिक थे.फिर उसने कहा कि अगर मकान मालिक या मकान मालिक का कोई आदमी तुमसे यह पूछे कि तुम इस कमरे में कबसे रह रहे हो तो तुम उसी दिन से बता देना जिस दिन तुमसे पूछ जाए.लेकिन महीनों तक कोई नहीं आया और इस तरह वह व्यक्ति कई महीने का किराया अपनी जेब में डालता रहा.वह एक कथित प्रोपर्टी डीलर था.इससे पहले मैंने कभी इस जीव का नाम सुना भी नहीं था अलबत्ता दलाल तो मेरे गाँव और शहर में भी थे.वह प्रोपर्टी डीलर जिसका नाम मुकेश था और जो विवाहित भी था लौज में एक कमरे को हमेशा खाली रखता था.कभी-कभी सप्ताह में एक बार तो कभी-कभी दो बार वो लड़की लाता.फिर वे और उसके पाँच-छः दोस्त बारी-बारी उसके साथ उस कोनेवाले ९ नंबर के कमरे में सेक्स करते.कई बार तो लड़की नवविवाहिता भी होती.मुझे छात्रों ने बताया कि दिल्ली में सहपाठी लड़कियों को फँसाना बड़ा आसान था.बस एक बाईक खरीद लो लडकियाँ खुद ही फँस जाएंगी.मेरा भांजा उमा भी न जाने कैसे प्रेम में गिर गया और अपने ही मकान मालिक की बेटी को साथ में लेकर गाँव पहुँच गया.कुछ यही हाल मेरे लॉज के अन्य दोस्तों का भी था.सबके सब जोड़ियाँ बना चुके थे.तन्हा था तो सिर्फ मैं.एक बात और दिल्ली की लड़कियों के लिए लड़कों के साथ दोस्ती या सेक्स सिर्फ पार्टटाइम जॉब की तरह था.अगर लड़के ने इसे फुलटाईमर बनाने की यानि शादी करने की कोशिश की तो ज्यादा सम्भावना यही होती थी कि दोस्ती ही टूट जाए.
           मित्रों,इस तरह मेरे दिन मजे में बीतने लगे.मेरी हमेशा से एक आदत रही है कि मैं सबेरे सोता हूँ और सबेरे जगता भी हूँ.कुछ दिनों तक तो सबकुछ सामान्य रहा लेकिन एक दिन ज्यों ही मैंने बल्ब ऑफ़ किया पड़ोस के कमरे से हास्यमिश्रित स्वर में आवाज आने लगी कि अब हम समझे कि बिहार क्यों पिछड़ा हुआ है.व्यंग्य करने वाला बंगाली था और नाम था स्वरुप दत्ता.तबसे मैंने बल्ब ऑफ़ करना ही छोड़ दिया और जलता हुआ छोड़कर ही मुँह ढककर सोने लगा.इसके बाद भी कई बार सड़कों पर,बसों में मुझे बिहारी कहकर संबोधित किया गया.कभी चुपचाप अपमान के घूँट पीकर रह जाता तो कई बार मारपीट की नौबत भी आ जाती.इसी कारण किंग्जवे कैम्प चौक पर एक किराना दुकानदार से हाथापाई भी कर ली और उसे पीटा भी.जब मुझे कमलानगर,९जी में रहते हुए कई महीने हो गए तब एक दिन विनय जो मेरे ही जिले का रहनेवाला था और त्रिभुवन अपने कॉलेज किरोड़ीमल से एक कागज पर ब्रजकिशोर सिंह,फ्यूचर आई.ए.एस. प्रिंट करके ले आए और उसे मेरी किवाड़ पर चिपका दिया.हो सकता है कि मेरी नाकामियों पर आंसू बहाता हुआ वह पोस्टर अब भी उस किवाड़ पर चिपका हुआ हो.

          मित्रों,फिर मैंने बाराखम्बा रोड स्थित राउज आई.ए.एस. स्टडी सर्किल में नामांकन करवाया और बड़े ही जतन से अपने सपनों में हकीकत के रंग भरने लगा.यहाँ भी गैर बिहारी छात्र-छात्राएं हम बिहारियों को हिकारत भरी निगाहों से देखते.शायद यही वो कारण था जिसके चलते मैंने जमकर मेहनत की.मैं एक मिनट भी जाया नहीं करता था.आते-जाते बसों में भी नोट्स देखता रहता.इसी बीच कोचिंग में टेस्ट होना शुरू हो गया.इतिहास के पहले टेस्ट में मुझे ५० में ३७ अंक आए थे लेकिन दूसरे टेस्ट में तो कमाल ही हो गया.बतौर शिक्षक ओमेन्द्र सिंह मेरे सिर्फ पांच उत्तर ही गलत थे.मैं टेस्ट में प्रथम आया था.उस दिन मेरी कक्षा के बिहारी छात्रों की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था.सबने मुझे अपने कन्धों पर उठा लिया.बाद में भी यह सिलसिला बना रहा.सामान्य अध्ययन के टेस्ट में भी मैं एक नए रिकार्ड बनाता हुआ प्रथम आया.मेरे प्रथम होने की घोषणा खान सर ने कुछ इस तरह से की-प्रथम आए हैं ब्रह्मकिशोर सिंह.मैंने फिर हस्तक्षेप करके अपना नाम सुधरवाया.बाद में साथ में पढनेवाले यूपी और राजस्थान वालों से हमारा पंगा भी हुआ.उनलोगों को मेरा यानि एक बिहारी का प्रथम आना रास जो नहीं आ रहा था.वे मेरे अभिन्न मित्र बन चुके अविनाश उर्फ़ मराठा (यह नाम उसे कोचिंग में भी हमने दिया था) पर मुझसे दोस्ती तोड़ने के लिए दबाव बनाने लगे लेकिन खुदा के फजल से हमारी दोस्ती आज भी कायम है.कोचिंग के अंतिम दिन हम सबकी आँखों में आंसू थे.मराठा तब तक हमारे साथ पढनेवाली एक लड़की से अपना दिल तोड़वाकर महाराष्ट्र वापस जा चुका था.कोंचिंग ने मुझे कई अच्छे मित्र दिए जिनमें से कुछ तो दिल्ली के भी थे.दिल्ली वासी मनीष,अमित और प्रवीण तब तक मेरे गहरे दोस्त बन चुके थे.मनीष जनकपुरी का जाट था और अमित शर्मा और प्रवीण धीमान मौजपुर में रहते थे.तीनों मस्तमौला थे और दोस्तों के लिए कुछ भी कर गुजरनेवाले भी.
           मित्रों,इसी बीच मेरी दूध विक्रेता संजीव विश्नोई से भी गहरी छनने लगी.संजीव एक हाजिर जवाब तो थे ही बड़े ही सुरीले कलाकार भी थे.चूंकि मैं उनसे शुद्ध हिंदी में बात करता था इसलिए महीनों बाद उन्हें पता चला कि मैं एक बिहारी हूँ वो भी तब जब मैंने एक दिन अपने घर पर उनके एस.टी.डी. फोन से बात की.मुझे कई बार उनके और उनकी पत्नी के बीच घरेलू विवाद को सुलझाने का सुअवसर भी मिला.बाद में उन्होंने मुझे अपने द्वारा गाए गए भजनों के कई कैसेट भी दिए.उनकी डी.एम.एस. की दुकान थी.कोई जब उनसे पूछने आता कि क्या यह मदर डेयरी है तो वे बड़े ही नाटकीय तरीके से उत्तर देते कि यह फादर डेयरी है मदर डेयरी तो बगल में है और फिर एक साथ कई ठहाके फिंजाओं में गूंजने लगते.साथ ही कमलानगर में अख़बारों की एजेंसी चलानेवाले बिल्ले और जैन साहब से भी मेरी गहरी मित्रता हो गयी.मल्कागंज वासी अख़बार वेंडर धर्म सिंह तो जैसे मेरे परिवार के सदस्य ही हो गए.यही हाल डाकिया विजय का भी था.
           मित्रों,वर्ष २००३ की दिवाली के समय मेरी यूपीएससी की प्रधान परीक्षा चल रही थी.सिर्फ अंतिम दो पेपर बाँकी थे कि मुझे डेंगू हो गया.रात में सोया तो अपने ही कमरे में लेकिन जब जगा तो अस्पताल में और वो भी चार दिनों के बाद.मेरे साथ लॉज में रहनेवाले विद्यार्थियों ने मुझे अस्पताल में भरती करवाया फिर मेरे मंझले जीजाजी के फुफेरे भाई अजय को सूचित किया.जान तो बच गयी लेकिन आईएएस बनने का सपना टूट चुका था.आँखों में सपने के टूटे हुए किरमिचों के चुभने का दर्द था.वहां उपस्थित मेरे सभी शुभचिंतकों की आँखें भरी हुई थीं.एक तरफ उन्हें मेरे जीवित बच जाने की ख़ुशी हो रही थी तो उनके मन में मेरे सपने के टूटने का अहसास भी था.मैं पहला मोर्चा जीतकर अंतिम लड़ाई को हार गया था.दरअसल डेंगू ने मेरे दिमाग पर भी बुरा असर डाला था.अब मैं पढ़ी हुई बात को ज्यादा समय तक याद नहीं रख पाता था.बाद में पड़ोसी से परेशान होकर डेरा बदला.यह नया पड़ोसी अभय दूबे जो गोरखपुर का था रात में तेज आवाज में गाना सुनता था जिससे मैं सो नहीं पाता था.अभय ने अपनी मोटर साईकिल घर भेज दिया और चोरी की एफ.आई.आर. दर्ज करवा कर बीमा का पैसा खा गया.वो अपने कमरे में लड़कियां लाता और कभी-कभी रात में उनके साथ हमबिस्तर भी होता.हमने उसे रात में गाना नहीं बजाने के लिए कई बार समझाया लेकिन वो नहीं समझा.अंत में मारपीट हुई जिसमें मेरे मित्र मनोज,एल.एल.बी. को चोट भी आई और फिर हमने आशियाना बदल दिया.अब हम आ गाए घंटाघर के पास.सारा सामान रिक्शा पर उमा और उसके मित्रों ने ढो दिया था.यहाँ मेरे साथ रहने के लिए मराठा भी आया लेकिन एक ही महीने बाद अलग भाग गया जिससे आगे २ सालों तक मुझे अकेले फ़्लैट का किराया ३५०० रू. मासिक भरना पड़ गया.यहाँ आकर मकान मालिक पी.के. अग्रवाल से दोस्ती हुई और दोस्ती हुई उनके स्टाफ पंकज से.घंटों मैं उनलोगों से बातचीत करता रहता.पंकज बहुत ही दिलचस्प इन्सान था.उसकी अंग्रेजी अच्छी थी.जब भी उसके घर पर कुम्हरे की सब्जी बनती तो वो जरुर इसका जिक्र मुझसे करता वह भी सीना तानकर यह कहते हुए कि आज मैंने सीताफल की सब्जी खाई है.साथ ही जब एक दिन उसने मुझे बताया कि वो कभी जिभिया (स्टील की या प्लास्टिक की पत्ती से जीभ साफ़ करना) नहीं करता है तब मुझे घोर आश्चर्य हुआ.उसने यह भी बताया कि यहाँ पर सभी नाख़ून से ही खखोरकर जीभ साफ़ कर लिया करते हैं.यहाँ तक कि मैंने भी बाद में पाया कि जिभिया वहां की दुकानों में बिकता ही नहीं था.जहाँ तक अग्रवाल साहब का सवाल है तो वे ऊंचे दर्जे के फेंकू और कंजूस थे.दुकान में बातें करते-करते सो जाना और ग्राहकों से जबरन बात करने की कोशिश करना उनका शगल था.वे बड़े ही नाटकीयतापूर्ण तरीके से बताते कि मैं जब ब्रजकिशोर सिंह,आई.ए.एस. यानि मेरे चेंबर में मुझसे मिलने जाएँगे तो किस तरह दरवाजे को लात से मारकर खोलेंगे.
           मित्रों,मेरे बगल में एक बूढी आंटी भी रहती थी चंद्रावल रोड,१५२९ में.उन्होंने मुझे परदेश में माँ का प्यार दिया.अगाध स्नेह था उनका मुझपर.जब भी मैं उनके पास होता तो मुझ पर मानो प्रेम की बरसात होती रहती.मुझसे भी जहाँ तक बना मैंने उनकी सेवा की.वे अपने एक गूंगे बेटे और पति के साथ वहां रहती थीं.छोटे बेटे की ज्वेलरी की घंटाघर के पास ही बहुत बड़ी दुकान थी मगर वो इन लोगों से अलग अशोक विहार में फ़्लैट खरीदकर रहता था.अंत में २००५ की यू.पी.एस.सी. प्रधान परीक्षा में भी असफल घोषित कर दिए जाने के बाद मैंने नोएडा स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में नामांकन करवा लिया और दिल्ली को हमेशा के लिए छोड़ दिया.एक महीने तक तो नोएडा से आना-जाना किया लेकिन इसमें समय की बहुत बर्बादी होती थी.इसलिए नोएडा के सेक्टर २० में ही जहाँ उस समय विश्वविद्यालय का नोएडा परिसर अवस्थित था डेरा ले लिया.मुँह अँधेरे ही सामान को ट्रक पर लदवाया.उस दिन शायद २ अगस्त की तारीख थी.अब दिल्ली हमेशा के लिए मुझसे छूट जानेवाली थी.मैंने चलते वक़्त आंटी को प्रणाम किया और ट्रक में जाकर बैठ गया.आंटी फूट-फूटकर रो रही थीं.तब तक अंकल राजाराम पुरी भी दुनिया को अलविदा कर चुके थे.मैंने अपना सामान ट्रक पर लोड करवाया और चल पड़ा.वे दूर तक जाते हुए ट्रक को देखती रहीं और रोती रहीं.बाद में जब भी दिल्ली आता तो सिर्फ उनसे मिलने के लिए.फिर यह सिलसिला कम होता गया और अंत में बंद भी हो गया.अभी पिछले साल यहाँ हाजीपुर से फोन करने पर उनके छोटे बेटे ने बताया कि उसका गूंगा भाई भी अब इस दुनिया में नहीं है.दुर्भाग्यवश उसका नंबर भी बदल गया है जिससे मैं अब यह जान पाने में असमर्थ हूँ कि आंटी जीवित भी हैं या नहीं और अगर जीवित हैं तो कहाँ पर हैं और किस हाल में हैं.  

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

कौन है अन्ना की जान का दुश्मन?

मित्रों,हर अच्छे-बुरे आदमी का विरोध होता है,प्रत्येक उचित-अनुचित बात की निंदा भी की जाती है;अन्ना का भी हुआ और हो रहा है.लोकतंत्र का तो मतलब ही है विरोध करने की आजादी लेकिन यह आजादी तभी तक देय है जब तक कि विरोध अहिंसक हो.लोकतंत्र में विरोध का एकमात्र मतलब होता है तर्क द्वारा मतभिन्नता प्रदर्शित करना,अपने विचारों के माध्यम से विरोधी पर दबाव बनाना.विरोध का यह मतलब हरगिज नहीं होता कि जिससे आप सहमत नहीं हैं उसकी हत्या ही कर दें.परन्तु लोकतंत्र के ढाई-तीन सौ सालों के इतिहास में लिंकन,केनेडी,मार्टिन लूथर किंग,ओल्फ पाल्मे,अनवर सादात,इंदिरा गाँधी,राजीव गाँधी,प्रेमदास,जयवर्धने,शेख मुजीब,बुरहानुद्दीन रब्बानी जैसे सैंकड़ों ऐसे जननेता रहे हैं जिनकी संसार के अलग-अलग हिस्सों में समय-समय पर उनके धुर विरोधियों ने हत्या कर दी.
               मित्रों,इन छोटी-सी सूची में मैंने महात्मा गाँधी को इसलिए स्थान नहीं दिया क्योंकि वे इन सबमें विशिष्ट थे.गाँधी ने कभी हिंसा को उचित नहीं माना और अहिंसा के बल पर ही मानव इतिहास के सबसे रक्तरंजित कालखंड में दुनिया की सबसे शक्तिशाली सत्ता से सफलतापूर्वक लोहा लिया.गाँधी के बारे में कभी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी कि उनकी हत्या भी हो सकती है.गाँधी ने यह जानते हुए भी कि उनसे विचारधारात्मक मतभेद रखनेवाले लोग उनके खून के प्यासे हो रहे हैं कभी सरकारी सुरक्षा स्वीकार नहीं की.वे हमेशा लोगों से बेख़ौफ़ होकर मिलते रहे जिसका फायदा उठाया उन लोगों ने जो उनकी हत्या करना चाहते थे.गाँधी की हत्या से देश को कितना नुकसान हुआ आज हम इसका अच्छी तरह से मूल्यांकन कर सकते हैं.अगर हम सिर्फ सोंचने के लिए भी सोंचें तो अगर गाँधी की हत्या नहीं हुई होती तो शायद वर्तमान भारत की हालत इतनी बुरी नहीं होती.
                मित्रों,दुर्भाग्यवश आज भारत फिर से उसी प्रस्थान बिंदु पर आ खड़ा हुआ है जहाँ वह ३० जनवरी,१९४८ को खड़ा था.दिल्ली पुलिस और इंटेलिजेंस ब्यूरो को ऐसी सूचनाएं मिल रही हैं कि कुछ अज्ञात लोग और संगठन देश के शुद्धिकरण में लगे अन्ना हजारे की हत्या की साजिश रच रहे हैं.अन्ना भी गाँधी की ही तरह अत्यंत सरल हैं और हर किसी को उपलब्ध हैं.ऐसे में कोई भी व्यक्ति भीड़ का हिस्सा बनकर उनके निकट पहुँच कर उन पर जानलेवा हमला कर सकता है.दिल्ली पुलिस को इस आशय का एक गुमनाम पत्र मिला है जिसमें धमकी दी गयी हैं कि अगर अन्ना ने अपनी गतिविधियों पर विराम नहीं लगाया तो ५०० युवाओं का ग्रुप उन पर एचआईवी संक्रमित सूईयों द्वारा रामलीला मैदान में प्रस्तावित अनशन के समय हमला कर सकता है.उधर सरकारी ख़ुफ़िया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो के अनुसार आईएसआई ने भी अन्ना की हत्या की साजिश रची है और इस पापकर्म को अंजाम तक पहुँचाने की जिम्मेदारी सौंपी है पाकिस्तान के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के मुखिया मौलाना मसूद अजहर को.यह वही मौलाना अजहर है जिसको कंधार विमान अपहरण के समय यात्रियों के बदले रिहा किया गया था.इसी तरह के कुछ और भी संकेत मिले हैं जिनसे पता चलता है कि अन्ना की जान को वास्तव में खतरा है.
                मित्रों,हो सकता है कि इस तरह के संकेत और ख़ुफ़िया चेतावनियाँ पूरी तरह से पुख्ता नहीं हों लेकिन हमारा देश अभी इस स्थिति में नहीं है कि वह अन्ना की जान को लेकर किसी भी तरह का जोखिम उठाए.अन्ना की जिंदगी अनमोल है क्योंकि देश की आजादी के बाद पहली बार हमारे देश को ऐसा नेतृत्व मिला है जिसके जुझारूपन और दृढ़ता के चलते भारतवासियों में व्यवस्था-परिवर्तन की उम्मीद जगी है.इसलिए टीम अन्ना और सरकार को अन्ना की अचूक सुरक्षा-व्यवस्था के लिए प्रयास करने चाहिए.साथ ही बेशक उनकी सुरक्षा-व्यवस्था बढ़ाई जानी चाहिए लेकिन इस बात का ख्याल रखते हुए कि इससे अन्ना को जनसाधारण के साथ सीधा संपर्क कायम करने में बाधा उत्पन्न नहीं हो.साथ ही हम सवा अरब भारतीयों की ओर से देश के भीतर और बाहर स्थित अन्ना और भारतवर्ष के दुश्मनों को यह भी बता देना चाहते हैं कि अब तक भारत की जो जनता सो रही थी अब वो जाग गयी है और अब पवित्र भारतभूमि से भ्रष्टाचार को मिटने से कोई भी नहीं रोक सकता,चाहे अन्ना हमारे समक्ष सशरीर उपस्थित रहें या न रहें.

रविवार, 11 दिसंबर 2011

अंगुलीमाल बना महावीर की धरती वैशाली का समाज


मित्रों,एक समय जब मैं वर्ष २००७ से २००८ तक दैनिक हिंदुस्तान,पटना के प्रादेशिक डेस्क पर काम कर रहा था तब अख़बार के वैशाली संस्करण में कुछ एक ही तरह की घटनाओं को लेकर छपनेवाली ख़बरों को लेकर परेशान रहा करता था.न जाने क्यों वैशाली संस्करण में रोजाना कुछ इस तरह की ख़बरें छपा करती थीं-पाँच बच्चों की माँ प्रेमी के साथ भागी,शिष्य को लेकर ट्यूशन शिक्षक फरार,प्रेमी के साथ कोर्ट में उपस्थित हुई नाबालिग छात्रा आदि.डेस्क के मेरे सहकर्मी खासकर महेंद्र झा मुझ पर हँसते कि ऐसा क्यों हो रहा है कि लड़कियों और महिलाओं के भागने की घटनाएँ पूरे राज्य में सबसे ज्यादा आपके जिले में ही घट रही हैं.उस समय सिवान से सियार द्वारा काट खाने,छपरा से फर्जीवाड़ा कर रजिस्ट्री करवाने और खगड़िया से अस्पतालों में सर्पदंश की दवा अनुपलब्धता की ख़बरें भी रोज ही आया करती थीं.लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे बीच सबसे ज्यादा हंसी का पात्र बनता था मैं और मेरा वैशाली जिला.खैर,इसमें दोष हाजीपुर ब्यूरो का भी नहीं था.जब जिले में अक्सर इस तरह की घटनाएँ घटित होती थीं तभी तो वह पटना मुख्यालय को भेजता था.
              मित्रों,वक़्त गुजरा और आज दिसंबर,२०११ चल रहा है.इन दिनों मैं एक बार फिर से परेशान हूँ अपने जिले में रोज-रोज घटनेवाली कुछ एक ही तरह की घटनाओं को लेकर.अब अख़बारों में वैध-अवैध प्रेम में घर छोड़कर भागने की ख़बरें नहीं आ रही बल्कि अब तो गणतंत्र की जननी वैशाली में तेजी से पसरते गनतंत्र की ख़बरें रोज-रोज आ रही हैं.लगता है जैसे हमारे जिले में इंसानों का नहीं बल्कि सिर्फ दरिंदों का निवास हो गया है.कुछ उदाहरण पेशे खिदमत है-पहली घटना ६ दिसंबर की है.बारात लगाने में हुए विवाद में पातेपुर थाने के बाजितपुर गाँव में लड़की का चाचा मदनमोहन मिश्र एक गाड़ी चालक टुनटुन राय की गोली मारकर हत्या कर देता है और हत्यारे लाश लेकर भी भाग जाते हैं.हद तो यह है कि हमारी काबिल पुलिस घटना के बाद ४८ घंटा बीत जाने के बाद भी इस मामले में कोई गिरफ़्तारी नहीं कर पाई है.फिर दूसरी स्तब्ध कर देनेवाली घटना को अंजाम दिया जाता है ७ दिसंबर को.इस घटना में सराय थाने के इनायतपुर प्रबोधी गाँव के दबंग और पूर्व मुखिया के बेटे एक वृद्ध धोबिन को कपड़ा धुलाई का मेहनताना मांगने पर गालियाँ देने लगते हैं.स्वाभाविक तौर पर उसका बेटा इसे बर्दाश्त नहीं कर पाता और विरोध करने लगता है.फिर तो उस गुड्डू रजक नामक युवक की अखिलेश सिंह,मिथिलेश सिंह और मनोज सिंह वगैरह के द्वारा इतनी बेरहमी से धुलाई की जाती है कि गाँव के वर्तमान मुखिया और जिला पार्षद को उसकी बेबस माँ की गुहार पर हस्तक्षेप करना पड़ता है.जान बचने के लाख प्रयासों के बावजूद सदर अस्पताल के बेड पर वह मातृभक्त दम तोड़ देता है.बाद में जनता द्वारा दबाव बनाने पर ही उसका पोस्टमार्टम संभव हो पाता है.अभी मातृभक्त गुड्डू की चिता की आग ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि ७ दिसंबर की रात को ही तीसरी मानवता को शर्मसार कर देने वाली घटना भी घट जाती है.थाना वही है सराय जहाँ कभी पूरी दुनिया को करूणा और अहिंसा का अमर सन्देश देने वाले वैशाली के ही बेटे,अंतिम जैन तीर्थंकर भगवान महावीर ने रिजुपलिका नदी के तट पर ज्ञान प्राप्त किया था.इस बार यमदूतों के भी रोंगटे खड़े कर देनेवाली घटना का गवाह बनता है सराय थाने का धरहरा गाँव.गाँव का एक दबंग मल्लाह परिवार जो अतिपिछड़े वर्ग से आता है गाँव के एक ब्राह्मण अशोक पांडे पर दबाव डालता है कि वो अपनी बेटी जूली का विवाह उसके लम्पट बेटे ज्योति सहनी के साथ कर दे.जैसा कि इस तरह के मामलों में होना चाहिए लड़की का पिता कमजोर होने पर भी ऐसा करने से इंकार कर देता है.फिर तो ७ दिसंबर की कोहरे भरी रात में उसकी नाबालिग बेटी को हथियारों के बल पर सहनी परिवार घर में से उठा लेता है और उसकी हत्या करके लाश को पास के ही बगीचे में पेड़ से लटका देता है.गाँव के जिस किसी की नजर लाश पर पड़ती है उसका मन इस जघन्य कृत्य पर भिनभिना उठता है.हत्या करने से पहले घटना में शामिल २ दर्जन दरिंदों ने उस मासूम के साथ बलात्कार भी किया था या नहीं अभी स्पष्ट नहीं है.
             मित्रों,अभी-अभी अख़बार हाथ में आया है और अबोध जूली की नृशंस हत्या का यह समाचार पढ़ते ही मैं खुद के वैशाली जिले का होने को लेकर बहुत ही शर्मिंदा महसूस करने लगा हूँ.मैं डर रहा हूँ कि क्या कल फिर से मुझे अख़बार में अपने जिले में घटित इस तरह की घटना का समाचार पढना पड़ेगा?छिः,मैंने कैसे जिले में जन्म लिया है जिसका इतिहास तो गौरवमय है लेकिन वर्तमान कलंकित!!!जहाँ रोज-रोज इंसानों की पशुता उजागर हो रही है.जहाँ मानवता की और मानवों की जान की कौड़ी जितनी भी कीमत नहीं.मैं सोंचता हूँ कि मैं ऐसे बिगड़ते माहौल में कब तक अपनी निर्मल मनुष्यता की रक्षा कर पाऊँगा?वैशाली पुलिस की तो बात ही नहीं करिए.उसकी मनमानी कार्यप्रणाली और बेईमानी का ही तो यह प्रतिफल है कि पूरे वैशाली जिले में जिसकी लाठी उसकी भैंस की कहावत सत्य साबित हो रही है.पूरे जिले के सभी थानों में सिर्फ और सिर्फ पैसे और पैसेवालों का बोलबाला है.शौक से हत्या करिए और थाने में उड़ेलकर पैसा दे दीजिए और फिर निश्चिन्त हो जाईए;आपका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगा.तो क्या भविष्य में जिले के शरीफों की बहू-बेटियों को दबंग घर से उठा लिया करेंगे?क्या इसी तरह गुड्डू रजक नामक दलित मातृभक्त शहीद होता रहेगा??क्या इसी तरह हमें रोजाना बारात में गोली चलने से निर्दोष टुनटुन रायों की मौत की ख़बरें पढनी पड़ेगी???हमारा २१वीं सदी का समाज यह किस दिशा में अग्रसर हो गया है????क्या हमारी महान सभ्यता और संस्कृति सही दिशा में अग्रसर है?????हम जानते हैं कि वक़्त की और समाज की अपनी एक दिशा होती है,गति होती है.लेकिन जब दिशा और गति दोनों गलत हो जाए तो धरती पर रेंगनेवाला क्षुद्र कीड़ा इन्सान करे भी तो क्या करे?जब कोई पथभ्रष्ट समाज उसकी नेक सलाह को किसी पागल का प्रलाप समझकर अनसुना कर दे तब कोई पथप्रदर्शक सुकरात कर भी क्या सकता है सिवाय............?!अरे डरिए मत!मैं कोई सुकरात नहीं हूँ जो निराश होकर जहर पी लूँगा.मैं तो आल्हा-ऊदल का वंशज हूँ और मैं संघर्ष करूंगा,समझाता रहूँगा लोगों को और समाज को अंतिम साँस तक,रक्त की अंतिम बूँद के शरीर में शेष रहने तक;चाहे अंत में सफलता हाथ लगे या असफलता.न दैन्यं न पलायनम!
(मित्रों,यह लेख मैंने ९ दिसंबर को ही लिख लिया था.इस बीच वही हुआ है जिसका मुझे डर था.कल यानि १० दिसंबर को मेरे जिले के जुडावनपुर थाने के राघोपुर गाँव में जगदीश राय नामक वृद्ध की रस्सी से बांधकर चार नरपशुओं ने पिटाई कर दी जिससे घटनास्थल पर ही उनकी मौत हो गयी.साथ ही सच यह भी है कि मूल लेख में वर्णित तीनों मामलों में वैशाली पुलिस न तो अभी तक कोई गिरफ़्तारी ही कर पाई है और न ही अब तक टुनटुन राय का शव ही बरामद कर सकी है.एक सूचना और जो वैशाली पुलिस से ही सम्बद्ध है कि मेरे पडोसी और वैशाली पुलिस के जवान बालेश्वर साह ने अब चोरी की बिजली से मोटर चलाना भी शुरू कर दिया है.साथ ही अब उसके टेंट में रोजाना शाम में गाँजा का धुंआ भी उड़ने लगा है.)

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

कि खूने दिल में डुबो ली है ऊंगलियाँ मैंने

मित्रों,हमारे देश में लोकतंत्र की ट्रेन एक अजीब मोड़ पर आकर फँस गयी है.हमारी जनमोहिनी-मनमोहिनी केंद्र सरकार चाहती है कि ट्रेन उसकी मर्जी से उसके द्वारा बनाई हुई पटरी पर दौड़े.लेकिन अगर ट्रेन उस पटरी पर गयी तो दुर्घटना निश्चित है.मुश्किल यह है देश के शुभेच्छु विपक्षी दल,टीम अन्ना और जनता उसे बार-बार ऐसा करने से रोकना चाहते हैं लेकिन सरकार है कि किसी की सुनने को तैयार ही नहीं है.उसका तो बस इतना ही मानना और कहना है कि देश की ट्रेन को जनता ने उसे पांच साल के लिए सौंपी है.अब वो उसको अप लाईन पर चलाए,डाऊन लाईन पर दौड़ाए या लूप लाईन पर भगाए या फिर बंगाल की खाड़ी में गिरा दे;कोई कौन होता है उसे टोकने और रोकनेवाला?इन मूर्खों की जमात को यह नहीं दिख रहा कि जो भी आदमी उसके जैसी पागल चालकवाली ट्रेन में सवार है उसे अपने जान और माल की चिंता तो होगी ही.
                मित्रों,पिछले सालों में हम समाचार पत्रों में यह खबर अक्सर पढ़ते आ रहे हैं कि हमारा पड़ोसी मुल्क चीन गूगल,फेसबुक आदि सामाजिक वेबसाईटों पर आने वाली सामग्री पर नियंत्रण करना चाहता है.चीन को ऐसा करना शोभा भी देता है क्योंकि वहां एकदलीय शासन है,तानाशाही है और वस्तु उत्पादन से लेकर विचारोत्पादन तक प्रत्येक राजनीतिक और सामाजिक गतिविधि पर सरकार का पूर्ण या यथासंभव नियंत्रण है.लेकिन क्या ऐसा प्रयास करने की सोंचना भी भारत सरकार के लिए शोभनीय है?क्या भारत में भी चीन की ही तरह एकदलीय शासन और तानाशाही है?कम-से-कम सैद्धांतिक और संवैधानिक रूप से तो ऐसा बिलकुल भी नहीं है.फिर हमारी सरकार हमारी सोंच पर,हमारी विचार शक्ति पर कैसे प्रतिबन्ध लगा सकती है?हम गूगल,फेसबुक या किसी अन्य वेबसाईट पर कोई शौक से नहीं लिखते हैं बल्कि ऐसा करना हमारी मजबूरी है.हम भी चाहते हैं कि हमारे विचार मुख्यधारा के समाचार-पत्रों में प्रकाशित हों लेकिन उन पर तो चंद पूंजीपतियों का कब्ज़ा है जो सरकार के खिलाफ कुछ भी छापने से डरते हैं.वे सब-के-सब सरकारी विज्ञापन की बीन की धुन पर बहरे,अंधे और गूंगे बनकर नाच रहे हैं.ऐसे में हम सामाजिक वेबसाईट्स पर नहीं लिखें तो कहाँ लिखें?सरकार अगर यह सोंचती है कि लोकतंत्र की ट्रेन को वह शौक से दुर्घटनाग्रस्त करा देगी और हम सब कुछ भगवान भरोसे छोड़कर मुंह ताकते रहेंगे तो उसे या तो इस अगहन पूणिमा के दिन प्राथमिक उपचार के तौर पर ठंडा ठंडा कूल कूल नवरत्न तेल के तालाब में डुबकी लगानी चाहिए और अगर फिर भी उसकी मानसिक स्थिति में सुधार नहीं हो तो उसके सभी मंत्रियों को सामूहिक रूप से मानसिक चिकित्सालय में बिना कोई देरी किए भर्ती हो जाना चाहिए.हमारी केंद्र सरकार आखिर यह कैसे भूल गयी कि हमारी भारतमाता कभी बंध्या नहीं हो सकती.भारतभूमि उससे उत्कट प्रेम करनेवाले वीरों से न तो कभी खाली रही है और न ही आगे कभी खाली ही होनेवाली है.इसलिए जब भी कोई सरकार देश को बेचने का अथवा देशहित को अपने लोभ और लालच के प्रदूषित जल में विसर्जित कर देने का प्रयास करेगी तो जान हथेली पर लेकर घूमनेवाले बच्चे,नौजवान और बूढ़े देश की लक्ष्मीबाई सदृश बेटियों सहित उसका और उसके प्रत्येक कदम का विरोध करने को उतावले हो उठेंगे.
               मित्रों,जहाँ तक मैंने पढ़ा है लोकतंत्र का मतलब ही होता है सहअस्तित्व और विरोधियों का और उनके विचारों का सम्मान.अगर हमारी सरकार सामाजिक साईटों को सरकारी बंदूकों या सत्ता की बेलगाम ताकत का भय दिखाकर झुका लेने में सफल हो जाती है तो फिर लोकतंत्र तो हमारे देश में अपने अर्थ ही खो देगा.अगर जनता अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र नहीं होगी तो फिर क्या मतलब रह जाएगा ऐसी दिखावटी और अर्थहीन स्वतंत्रता का?कहीं हमारी वर्तमान सरकार भारतीय लोकतंत्र को फासीवादी और नाजीवादी अंधकूप में धकेलने के चक्कर में तो नहीं है?सनद रहे कि इस सरकार की सूत्रधार सोनिया गाँधी की जन्मभूमि इटली में भी कभी फासीवाद लोकतंत्र की सीढियों पर चढ़कर ही सत्ता के शिखर पर पहुंचा था.तो कहीं सरकार की जनसामान्य के विचारों पर जंजीर डालने की कोशिश के पीछे सोनिया गाँधी का इटालियन मुसोलिनीवादी संस्कार तो नहीं काम कर रहा?
              मित्रों,कांग्रेस की वर्तमान सरकार की वर्ष २००४ से ही कोशिश रही है कि देश की जनता को बांटकर रखा जाए और फिर भ्रष्टाचार के माध्यम से छककर सत्ता की मलाई चाभी जाए.हिन्दू जनमानस को तो पहले ही जातीय राजनीति द्वारा बांटा जा चुका है इन दिनों आरक्षण की विभाजक दीवार हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच खड़ी करने का कुत्सित प्रयास चल रहा है.इन सबके बावजूद जनता के सभी तबकों के बीच सरकार की छवि में चुनाव जिताने के लायक सुधार नहीं हो पा रहा है.शायद इसलिए झुंझलाकर,घबराकर,हड़बड़ाकर,नाराज होकर,नासाज़ होकर और सत्ता के मद्यपान से मदमस्त होकर हमारी आम आदमी की अमीरपरस्त सरकार आम आदमी के विचारों पर ही ताला जड़ने का प्रयास करने लगी है.अगर सरकार सोशल वेबसाईट्स के संचालकों को भ्रष्टाचार के कीचड़ से सने अपने गंदे पैरों में झुका भी लेती है तो भी हम देशभक्त और आजादी के मतवाले उसकी देशविरोधी-जनविरोधी नीतियों के प्रति अपना विरोध दर्ज करने के लिए नए विकल्प तलाश लेंगे.वैसे वर्तमान वैश्विक ग्राम में कोई भी सरकार चाहे वो चीन की हो या भारत की विचारों की अभिव्यक्ति पर प्रभावी रोक नहीं लगा सकी है और न ही लगा सकती है फिर यह चमचा शिरोमणि कपिल सिब्बल किस बंजर खेत का आलू है?बतौर फैज़-"मताए लौहो कलम छीन गई,तो क्या गम है/कि खूने दिल में डुबो ली है उंगलियाँ मैंने/जबान पे मुहर लगी है,तो क्या कि रख दी है/हर एक हल्का-ए-जंजीर में जबाँ मैंने."      
           

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

दुश्शासनों के भरोसे सुशासन

मित्रों,किसी भी व्यक्ति के जीवन में परिवारवालों के बाद सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है पड़ोसियों का.बतौर अटल बिहारी वाजपेयी आप मित्र बदल सकते हैं,शत्रु भी बदले जा सकते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं बदले जा सकते.न जाने मैंने किस जनम में कौन-सा गंभीर पाप किया था जो दो-दो पुलिसकर्मी मेरे पड़ोसी बन गए हैं.दोनों बिहार पुलिस में सिपाही हैं.एक की गुंडागर्दी का तो मैं अपने पूर्ववर्ती लेख ''पुलिस वाला लुटेरा अथवा वर्दी वाला गुंडा'' में जिक्र भी कर चुका हूँ लेकिन मेरा नया पड़ोसी तो वर्दी का रोब झाड़ने के मामले में पहले का भी बाप है.
                    मित्रों,इस शख्स का नाम है बालेश्वर साह और हाजीपुर शहर से सटे जढुआ  नवादा का रहनेवाला है.उम्र यही कोई ४०-४५ साल होगी.उसके कुल छः बच्चे हैं.सबसे बड़ी बेटी तो सयानी भी हो चली है.इन दिनों वो हमारे रोड नंबर-२,संत कबीर नगर,जढुआ स्थित वर्तमान निवास के पड़ोस में घर बनवा रहा है.मेरी समझ में यह नहीं आता कि इन पुलिसकर्मियों के पास जिनका वेतन मुश्किल से ५ अंकों में पहुँचता है इतना पैसा कहाँ से आ जाता है कि ये हाजीपुर जैसे महंगे शहर में जमीन खरीदकर घर बनवा रहे हैं.यहाँ मैं आपको यह भी बता दूं कि मेरे मोहल्ले में ९०% घर वर्तमान या भूतपूर्व पुलिसकर्मियों के हैं.तो मैं बता रहा था कि मेरे पड़ोस में जो सिपाही जी के नाम से मशहूर व्यक्ति घर बनवा रहा है एकदम महामूर्ख है,दम्भी है,कामुक है,वर्दी के घमंड में फूला हुआ है,मनमौजी है और नशेड़ी भी है.उसकी दुष्टता से मेरा पहला परिचय तब हुआ जब वह मेरे पड़ोसी त्रिवेदी जी के दामाद को भूमिविवाद के दौरान रंडी की औलाद इत्यादि विशेषणों से विभूषित करने लगा.आप भी सोंच सकते हैं कि तब त्रिवेदी जी और उनके पूरे परिवारवालों के दिलों पर क्या गुजर रही होगी लेकिन उन्होंने जवाब तक नहीं दिया.पचासों लोग उसे ऐसा करने से मना कर रहे थे लेकिन वह बार-बार त्रिवेदी परिवार को मोहल्ला से भगा देने और जीना मुश्किल कर देने की धमकी दे रहा था.मैंने अपनी जिंदगी में न जाने कितने पुलिसवाले देखे हैं लेकिन आज तक इतना लम्पट और बदतमीज पुलिसवाला नहीं देखा.इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि फ़िलहाल उसकी पोस्टिंग एक लम्बे समय से हाजीपुर शहर में ही है.आश्चर्य है कि बिहार सरकार को शिवदीप लांडे जैसे ईमानदार पुलिस अधिकारियों की बदली करने की तो खूब सूझती है लेकिन इन भ्रष्ट,लम्पट और गुंडानुमा पुलिसवालों की बदली करने के बजाए उन्हें सालों तक गृह जिला में पोस्टिंग कैसे मिली रहती है?
                  मित्रों,टीम अन्ना के अनुसार जिस प्रकार निचले स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा ही जनता ज्यादा प्रताड़ित होती है ठीक उसी तरह बिहार पुलिस या अन्य राज्यों की पुलिस के ये सिपाही,हवलदार और थानेदार ही होते हैं जो अपने पड़ोसियों सहित पूरे जनसमाज का जीना मुहाल किए रहते हैं.मेरा यह नया पड़ोसी दिन-रात मोबाईल फोन पर फुल वॉल्युम में ''लगाई दिहीं चोलिया के हूक राजाजी'' और ''ओही रे जगहिया दांती काट लिहलअ राजाजी'' जैसे अश्लील भोजपुरी गाने बजाता रहता है.फिर दिन ढलते ही उसका छोटा-सा टेंट मधुशाला में बदल जाता है और विभिन्न असामाजिक तत्व उसके साथ जाम छलकाते हैं.सत्र के अंत में पूरे मोहल्ले वालों को जमकर गलियां दी जाती हैं.इन असामाजिक तत्त्वों में से एक को तो मैं भली-भांति जानता भी हूँ जिसका नाम है संतोष पासवान.पास में ही संत कबीर नगर में ही उसका घर है और वो चोरी के कई मामलों में नामजद अभियुक्त भी रह चुका है.            
             मित्रों,इस प्रकार त्रिवेदी जी का परिवार इस पुलिसवाले से भले ही परेशान नहीं हुआ हो लेकिन हमलोग तो अच्छी मात्रा में रोजाना परेशान हो रहे हैं.हो भी क्यों नहीं घर में महिलाएँ तो हैं ही छोटे-छोटे बच्चे भी हैं?हमारे बच्चे इस पड़ोसी से क्या सीख लेंगे;आसानी से समझा जा सकता है?पूर्व के लेख ''पुलिस वाला लुटेरा अथवा वर्दी वाला गुंडा'' में वर्णित पप्पू यादव की तरह ही इस वर्दी वाले गुंडे ने भी साधिकार बिजली का टोंका फंसाकर चोरी की बिजली का उपयोग करना प्रारंभ कर दिया है.पप्पू यादव तो अब चोरी की बिजली से मोटर भी चला रहा है.मुझे घोर आश्चर्य हो रहा है कि एक तरफ बिहार राज्य विद्युत् बोर्ड लगातार बिजली महंगा करता जा रहा है वहीं इन चोर पुलिसकर्मियों के खिलाफ कोई कदम भी नहीं उठा रहा.इनके जैसे लोगों के चलते उसे जो रोजाना करीब ४ करोड़ रूपये का घाटा हो रहा है;उसे कौन भरेगा?हम जैसे शरीफ और कानूनप्रेमी ही न?हाँ,एक बात और है कि अगर इन वर्दीवालों के स्थान पर हमने टोंका फंसाया होता तो कब के हाजीपुर जेल की शोभा बढ़ा रहे होते.इसी को तो कहते हैं कि वो करें तो रासलीला और हम करें तो कैरेक्टर ढीला.
               मित्रों,देश की सीमा की रक्षा करते हैं सेना के जवान और लोगों के घरों की रक्षा करती है पुलिस.मुठभेड़ों में मरते दोनों ही हैं लेकिन जब एक सेना का जवान मरता है तब पूरा जनसमुदाय श्रद्धा से सिर झुका लेता है.लोगों में शोक की एक स्वतःस्फूर्त लहर-सी दौड़ जाती है.परन्तु जब एक पुलिसकर्मी मारा जाता है तब जनता शोकमग्न नहीं होती बल्कि खुश होती है.खुश होती है कि एक आदमीनुमा जानवर मर गया.खुश होती है कि उसे रोज-रोज नोचनेवाला,काट खाने वाला और उस पर बेवजह भौंकनेवाला कुत्ता मर गया.कितनी बिडम्बनापूर्ण स्थिति है कि जिस जनता के पैसे से इन पुलिसवालों का घर चलता है उससे वे सीधे मुंह बात तक नहीं करते,ईज्जत देने की तो बात ही दूर रही.दुर्भाग्यवश आपको कभी थाने में जाना पड़ा तो वहां आपको जमकर जलील किया जाएगा लेकिन दलालों को,जेबकतरों को,गुंडों को खूब ईज्जत दी जाएगी;उनकी सेवा की जाएगी.आज जुए का अड्डा चलानेवाला कल राज्य या शहर को चलाने लगता है तो दोषी कौन है?ये पुलिसवाले! आज लोगों की जेबों को काटनेवाला कल लोगों का गला काटने लगता है तो दोषी कौन है?? एक बार फिर से वही पुलिसवाले!! कल तक चकला चलानेवाला आज प्रदेश और देश की सरकार चलाने लगता है तो दोषी कौन है??? फिर से वही पुलिसवाले!!! कल तक शराब बेचनेवाला आज देश को बेचने लगता है तो दोषी कौन है???? फिर से वही पुलिसवाले,वही पुलिसवाले,वही पुलिसवाले!!!! और बिडम्बना यह है कि इन्हीं दुश्शासन सदृश पुलिसवालों के बल पर नीतीश कुमार राज्य में सुशासन लाना चाहते हैं.सुशासन बाबू पहले इन सिपाहियों को सुधारिए चोर तो खुद ही सुधर जाएँगे.    
                    

बुधवार, 30 नवंबर 2011

1 अमेरिकी=22 करोड़ भारतीय

मित्रों,पिछले कुछ समय से पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था मुद्रास्फीति या महंगाई के ताप से जल रही है.जनता की थाली में से बारी-बारी से मांस,दाल और सब्जियों के छीने जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है.हमारे परम विद्वान व कथित अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री जानबूझकर अनजान बन रहे हैं मानो उन्हें पता ही नहीं हो कि देश में महंगाई क्यों बढ़ रही है.बीमारी कुछ है और ईलाज कुछ और का ही किया जा रहा है.पहले तो सप्ताह-दर-सप्ताह ब्याज दर बढ़ा-बढ़ाकर महंगाई को कम करने की बेवकूफाना कोशिश की गयी और अब जो ईलाज पेश किया जा रहा है उससे तो देश की पूरी खाद्य-सुरक्षा ही खतरे में पड़ जानेवाली है.
               मित्रों,मैं बात कर रहा हूँ भारत सरकार द्वारा देश के खुदरा व्यापार में ५१% विदेशी पूँजी निवेश करने की अनुमति देने की.हमारी अब तक की सबसे कमजोर-कामचोर जनमोहिनी-मनमोहिनी सरकार ने मानो ६ साल तक देश को शोधने के बाद महंगाई की असली जड़ का पता लगा लिया है.इस लाल बुझक्कड़ सरकार का मानना है कि किसानों अथवा उत्पादकों और उपभोक्ताओं के बीच जो २२ करोड़ खुदरा व्यवसायी यानि बिचौलिए हैं वही महंगाई को बढ़ाते हैं.वरना महंगाई तो कब की कोसों दूर भाग चुकी होती.इसलिए हमारी सरकार ने महंगाई के चलते पतली हो चुकी हमारी हालत पर तरस खाते हुए दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अनुमति दे दी कि वे देश में आएं और अपनी दुकानें खोलें,शीतगृह स्थापित करें और किसानों से सीधे-सीधे अनाज खरीदें.मतलब यह कि २२ करोड़ छोटे व्यापारियों या बिचौलियों के बदले अब सिर्फ एक ही या कुछेक ही बिचौलिए होंगे.लेकिन बिचौलिए तो फिर भी होंगे;२२ करोड़ भुक्खड़ ब्लडी इंडियंस के बदले एक या दो-चार गोरे धनपति.इनके आने से २२ करोड़ भारतीय बेरोजगार हो जाएँ तो हो जाएँ,भूखो मरें तो मरें लेकिन देश का जीडीपी तो ऊपर चढ़ेगा.पूँजी आएगी तो शेयर बाजार का ग्राफ तो उर्ध्वगामी होगा और कुल जमा कुछेक लाख शेयरधारकों को तो भारी लाभ तो होगा.सुबह से शाम तक मुम्बई-दिल्ली की सड़कों पर अपने ठेले पर ३०० रूपए की सब्जी बेचकर ५० रूपया कमानेवाला गरीब भारतीय भले ही रोजगार खोकर भूख से मर जाए लेकिन अमेरिकन कंपनी वालमार्ट को तो अरबों-खरबों का फायदा होगा.
              मित्रों,सोंचिए कि देश के खेतों से लेकर गोदामों,शीतगृहों और विक्रय-केन्द्रों तक पर अगर एक या कुछेक विदेशी कंपनी या कंपनियों का कब्ज़ा हो जाता है तो देश की खाद्य-सुरक्षा का क्या हाल होगा?वे जब चाहे तब देश में कृत्रिम अकाल जैसी हालत पैदा कर भरपुर मुनाफा कमा सकेंगी.वैसे भी घोर पूंजीवादी देशों की इन कंपनियों का एकमात्र धर्म और कर्म ज्यादा-से-ज्यादा मुनाफा कमाना ही तो है.केंद्र की वर्तमान सरकार की मूर्खताओं के चलते हमारी औद्योगिक सुरक्षा तो पहले से ही हमारे चिर शत्रु-देश चीन के हाथों गिरवी पड़ती जा रही है और अब खाद्य-सुरक्षा पर भी हमारी वही सरकार खुद ही तलवार लटकाने जा रही है.
               मित्रों,आजकल में एक और अजीबोगरीब घटना हुई हैं जो हमारे देश की संप्रभुता के लिए है तो बहुत-ही महत्वपूर्ण लेकिन उसकी मीडिया में उतनी चर्चा हुई नहीं जितने की वो हकदार थी.हुआ यह है कि वालमार्ट के देश अमेरिका के भारत में राजदूत ने खुदरा क्षेत्र को विदेशी कंपनियों के लिए खोलने का पुरजोर समर्थन किया है.मैं पूछता हूँ ये अंकल सैम कौन होते हैं हमारे आतंरिक मामलों में दखल देनेवाले.परन्तु करें तो क्या करें?जब अपना ही सिक्का खोटा निकल जाए तब दूसरों पर दोषारोपण करने का क्या लाभ?अपने ही देश की सरकार जब २२ करोड़ जनता के रोजगार को समाप्त कर मौत के मुंह में धकेल देने और पूरे सवा सौ करोड़ जनता की रोटी की सुरक्षा को चंद विदेशियों के हाथों गिरवी रख देने पर उतारू हो,बेच देने पर आमादा हो तो फिर हम कहाँ-किसके पास जाकर रोयें और फ़रियाद करें?
             मित्रों,सरकार कह रही है कि इससे १ करोड़ लोगों को रोजगार मिलेगा लेकिन वालमार्ट जैसी कम्पनियाँ तो घंटे के हिसाब से पैसा देती हैं.जितना काम उतना पैसा और काम नहीं तो पैसा भी नहीं;चाहे मरो या जियो अपनी बला से.जहाँ तक किसानों को लाभ होने की बात है तो भारत के किसान एक बार फिर से निलहा खेती के ज़माने में जानेवाले हैं.अब फिर से हमारे गोरे साहब हमें आदेश देंगे कि खेतों में क्या उपजाना है और क्या नहीं?उनको जिस फसल को बेचने से ज्यादा फायदा होगा उसको छोड़कर वे देश को क्या उपजने से लाभ होगा थोड़े ही उपजाने देंगे.तो आईये मित्रों हम सब जश्न मनाएँ कि हम फिर से गुलामी की ओर बढ़ चले हैं;फिर से देश में स्वतंत्रता आन्दोलन होगा जिससे फिर से चोर मसीहा उत्पन्न होंगे और अंततः यह सिलसिला चलता जाएगा.         

रविवार, 27 नवंबर 2011

मजीठिया वेतन आयोग को लागू करवाए सरकार

हमारे गांवों में एक कहावत है कि हर बहे से खर खाए बकरी अँचार खाए अर्थात जो बैल हल में जुते उसके हिस्से घास-भूसा और जो बकरी बैठी-बैठी में-में करती रहे उसके भोजन में स्वादिष्ट अचार.खैर,बैलों द्वारा खेती तो बंद हो गयी लेकिन इस कहावत में जो व्यंग्य छिपा हुआ था आज भी अपनी जगह सत्य है और सिर्फ गांवों ही नहीं बल्कि शहरों के लिए भी उतना ही सत्य है.अब समाचारों की दुनिया को ही लें कोल्हू के बैल की तरह;खासतौर पर निचले स्तर के मीडियाकर्मी दिन-रात खटते रहते हैं और महीने के अंत में जब पैसा हाथ में आता है तो इतना भी नहीं होता कि जिससे उनका और उनके परिवार का १० दिन का खर्च भी निकल सके.ऐसा भी नहीं है कि उनकी नियोक्ता मीडिया कम्पनियाँ ऐसा मजबूरी में करती हैं बल्कि अगर हम उनकी सालाना बैलेंस शीट को देखें तो पाएँगे कि वे तो हर साल भारी लाभ में होती हैं.हाँ,यह बात अलग है कि अकूत धन के ढेर पर बैठा उसका मालिक पूरे लाभ को अकेले ही हजम कर जाना चाहता है और चाहता क्या है वह बाजाप्ता ऐसा कर भी रहा है.इस तरह भारतीय मीडिया उद्योग में कमाएगा लंगोटीवाला और खाएगा धोतीवाला वाली कहावत बड़े ही मजे में चरितार्थ हो रही है.
                   मित्रों,हमारे पूर्वज राजनीतिज्ञों ने,जिनमें से अधिकतर कभी-न-कभी पत्रकार भी रह चुके थे;आनेवाले समय में हृदयहीन पूँजी के हाथों पत्रकारों की संभावित दुर्गति को अपनी दूरदृष्टि के माध्यम से साफ-साफ देख लिया था और इसलिए उन्होंने प्रेस अधिनियम द्वारा उनके हितों की रक्षा करने की कोशिश की.हालाँकि,आश्चर्यजनक रूप से इलेक्ट्रोनिक और वेब मीडिया कर्मी अभी भी इस सुरक्षा छतरी से बाहर हैं.क्यों बाहर हैं शायद सरकार को पता हो लेकिन जो इसके दायरे में आते हैं उन समाचारपत्र कर्मचारियों को भी दुर्भाग्यवश इस अति महत्वपूर्ण कानून का फायदा नहीं मिल पा रहा है.उन्हें इसके दायरे से बाहर करने के लिए कई तरह के सादे प्रपत्रों पर नियुक्ति के समय ही हस्ताक्षर करवा लिया जाता है और फिर मिल जाती है प्रबंधन को छूट उनकी रोटी के साथ खुलकर खेलने की.यानि सरकार जब तक पेड़ पर चढ़ने को तैयार होती है तब तक मीडिया कंपनियों के मालिक पात-पात को गिन आते हैं.भारत का ऐसा कोई भी कानून नहीं जिसमें कुछ-न-कुछ लूप होल्स नहीं हो,कमियाँ न हों फिर पूंजीपतियों के पास तो हमेशा उनके साथ नाभिनालबद्ध दुनिया के सबसे बेहतरीन दिमाग भी होते हैं;हर जोड़ का तोड़ निकालने के लिए.
              मित्रों,सभी पत्रकार व गैर पत्रकार समाचार-पत्र कर्मियों के लिए मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को आए एक साल होने को है लेकिन कोई भी समाचार-पत्र या समाचार एजेंसी प्रबंधन के कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही;ऊपर से वे मजीठिया की सिफारिशों का विरोध भी कर रहे हैं.उनमें से कुछ तो कथित न्याय की आशा में न्यायालय भी पहुँच गए परन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें राहत देने से मना कर दिया और सब कुछ सरकार पर छोड़ दिया.
                    मित्रों,इस प्रकार इस समय जो वस्तु-स्थिति है वो यह है कि मीडिया कंपनियों के मालिक किसी भी स्थिति में अपने कर्मचारियों को मजीठिया आयोग की सिफारिशों के अनुरूप वेतन बढाकर अपने मुनाफे को कम करने को तैयार नहीं हैं और वे इसके लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं.क्या वे भारतवर्ष के सारे कानूनों से परे हैं?संविधान में तो ऐसा कुछ नहीं लिखा.अभी कुछ भी दिन पहले मैंने bhadas4media पर यह समाचार देखा कि दैनिक जागरण,कानपुर ने अपने कर्मचारियों से जबरन एक प्रपत्र पर हस्ताक्षर भी करवा लिया है.उस कथित प्रपत्र पर यह लिखा हुआ है कि ''मैं जागरण की सेवाओं से संतुष्ट हूं और जागरण मेरे और मेरे परिवार के हितों की पूरी तरह सुरक्षा कर रहा है. मुझे मजीठिया आयोग की सिफारिशों के अनुरूप कोई वेतनमान नहीं चाहिए.''अब आप ही बताईए बेचारे दस्तखत नहीं करें तो करें क्या?ऐसा नहीं करने पर उन्हें बिना कोई कारण बताए बाहर का दरवाजा दिखा दिया जाएगा और यह तो आप भी जानते हैं कि तुलसीदास के ज़माने से ही ''तुलसी बुझाई एक राम घनश्याम ही ते,आगि बड़वागि ते बड़ी है आगि पेट की''.हो सकता है कि ऐसे मीडियाकर्मियों के पेट पर लात मारने का हस्ताक्षर अभियान गुप्त रूप से अन्य मीडिया कंपनियों में भी चलाया जा रहा हो.
               मित्रों,जाहिर है समाज के दबे,कुचलों और पीड़ितों को न्याय दिलानेवाले मीडियाकर्मी खुद ही अन्याय के सबसे बड़े शिकार हैं.अगर उन्होंने पूर्वोक्त प्रपत्र पर हस्ताक्षर कर दिया तो फिर वे मजीठिया आयोग की सिफारिशों से कथित रूप से अपनी मर्जी से पूरी तरह से वंचित रह जाएँगे.अब यह भारत सरकार पर निर्भर करता है कि वह इस आयोग की सिफारिशों को लागू कराने की दिशा में किस हद तक जाती है.कुछ इसी तरह की स्थिति १९८९ में भी बनी थी.तब भी मीडिया कम्पनियाँ बछावत आयोग की सिफारिशों को लागू करने में नानुकूर कर रही थीं लेकिन तब स्व.राजीव गाँधी की सरकार ने सख्ती बरतते हुए उन्हें बछावत आयोग की सभी सिफारिशों को लागू करने के लिए बाध्य कर दिया था.परन्तु आज स्थिति बिलकुल उलट है.आज केंद्र में अब तक की सबसे भ्रष्ट और कमजोर-कामचोर सरकार सत्ता में है.उस पर नीम पर करेला यह कि यह सरकार बाजार को ही भगवान मानते हुए सबकुछ बाजार के हवाले कर देने की सख्त हिमायती भी है.उस करेले पर चिरैता यह कि सरकार कथित कार्पोरेट संस्कृति की भी अंधसमर्थक है.फिर भी अगर सरकार ने सोडा वाटर के नशे (जोश) में आकर सख्ती बरती और मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हो भी गईं तब भी लगभग सारे कर्मियों के पल्ले कुछ नहीं पड़ने वाला क्योंकि तब तक वे बिना कोई विरोध किए एकतरफा संधि-प्रपत्र या और भी स्पष्ट रूप से कहें तो आत्मसमर्पण-पत्र अथवा सुसाईडल नोट पर हस्ताक्षर कर चुके होंगे.इसलिए अगर सरकार इस वेतन-आयोग की सिफारिशों को लागू करवाना ही चाहती है और सही मायने में लागू करवाना चाहती है तो फिर उसे मीडिया कंपनियों द्वारा चलाए जा रहे हस्ताक्षर अभियान का तोड़ भी निकालना पड़ेगा.