बुधवार, 17 नवंबर 2010
घटना ही नहीं प्रतीक भी है लक्ष्मीनगर हादसा
कभी पटना में तो कभी मुम्बई में अक्सर घर गिरते रहते हैं लेकिन चूंकि इस बार घटना दिल्ली की थी इसलिए शोर भी ज्यादा हुआ.दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की राजधानी दिल्ली के लक्ष्मीनगर में ५ मंजिला ईमारत को गिरे दो दिन बीत चुके हैं.अभी भी मकान के मलबे में से जिंदगियों की तलाश जारी है.इस मकान में रहनेवाले लोगों को क्या पता था कि उनका घर ही उनके लिए कब्र बन जाएगा,जिंदा लोगों का कब्र.१०-११ साल के शिबू का सबकुछ छिन गया है.वह अपने परिवार का एकमात्र जीवित सदस्य है.उसकी समझ में यह नहीं आ रहा कि वह अपने को अभागा माने या भाग्यशाली.मैं यह नहीं कहूँगा कि यह घटना केंद्र सरकार की नाक के नीचे हुई.केंद्र सरकार के भीतर ही क्या-कुछ नहीं हो रहा?यह सिर्फ एक घटना मात्र नहीं है यह प्रतीक भी है.यह घटना प्रतीक है हमारी व्यवस्था की नींव में लगे भ्रष्टाचार के घुन का जो लगातार हमारे संप्रभु देश को खोखला कर रहा है.यह घटना प्रतीक है अनिश्चितकालीन सुसुप्तावस्था में चले गए तंत्र का.कैसे एक व्यक्ति ने ईमारत बनाने के लिए सरकार द्वारा निर्धारित मानदंडों का उल्लंघन करते हुए अवैध रूप से इतनी ऊंची ईमारत खड़ी कर दी?जिन लोगों पर निर्माण की निगरानी करने की जिम्मेदारी थी उन्होंने क्यों अपने कर्तव्यों का सम्यक रूप से निर्वहन नहीं किया?सच्चाई तो यह है सभी सरकारी दफ्तरों में रिश्वत का बाज़ार गर्म है और रिश्वत देकर कुछ भी करवाया जा सकता है.जहाँ २ मंजिल से ज्यादा ऊंची ईमारत बनाने की अनुमति नहीं है वहां भी रिश्वत देकर २० मंजिला मकान बड़े शौक से बनाया जा सकता है.अभी कुछ साल पहले जब कलाम साहब भारत के राष्ट्रपति थे तब कुछ पत्रकारों ने उत्तर प्रदेश के किसी प्रखंड में रिश्वत देकर उनके नाम पर राशन कार्ड बनवा लिया था.आए दिन जीवित लोगों के मृत्यु प्रमाण पत्र बना कर संपत्ति हड़पने की घटनाएँ भी देश के विभिन्न भागों से प्रकाश में आती रहती है.१० हजार रूपये से भी कम वेतन पानेवाला हल्के का कर्मचारी महीने में कम-से-कम २-३ लाख रूपये की ऊपरी (अवैध) कमाई कर रहा है.कई साल हुए मैंने 1984 में प्रदर्शित हुई एक फिल्म देखी थी नाम था इन्कलाब.फिल्म में अमिताभ बच्चन एक ऐसे ईमानदार पुलिस अफसर बने हैं जिसे माफिया चक्रव्यूह में फँसा लेते हैं.जनता में बनी उनकी अच्छी छवि के बल पर माफियाओं की पार्टी चुनाव जीतती है.इस फिल्म में अमिताभ के किरदार का नाम है अमरनाथ.फिल्म के अंत में अमरनाथ विधायकों की बैठक में भाग लेने जाते हैं.बाहर जनता जय-जयकार कर रही होती है.भीतर शराब,जुआ,परिवहन,खान,पेट्रोलियम,शिक्षा,चीनी आदि चीजों के माफिया विधायकों के साथ अमरनाथ विचार-विमर्श कर रहे हैं कि किसको कौन-सा महकमा दिया जाए.पार्टी अध्यक्ष उन्हें संभावित मंत्रियों की सूची जिसमें विभागों का भी वर्णन है,थमाता है.सूची में शराब माफिया को उत्पाद मंत्री,परिवहन माफिया को परिवहन मंत्री,जुआ माफिया को गृह मंत्री,खान माफिया को खान मंत्री यानी जो जिस चीज का माफिया होता है उसे ही वह विभाग देने का प्रस्ताव है.अमरनाथ शपथ-ग्रहण से पहले ही इन्हें मशीन गन जिसे वे अटैची में लेकर आए थे से भून डालते हैं.सिनेमा हॉल में जमकर तालियाँ बजती हैं और लोग बाहर निकलने लगते हैं.कितना बड़ा व्यंग्य है हमारी व्यवस्था पर टी. रामाराव की यह फिल्म!आज क्या देश में यही स्थिति नहीं है?क्या हमारे देश में अयोग्यता ही सबसे बड़ी योग्यता नहीं बन गई है?शासन के तीनों अंगों व्यवस्थापिका,न्यायपालिका और कार्यपालिका में सबसे ऊपर से सबसे नीचे तक कमोबेश सभी भ्रष्ट हैं.१०० में ९९ बेईमान हैं फ़िर क्यों न हो लक्ष्मी नगर हादसा?आदर्श सोसाईटी घोटाले में तो सेना के पूर्व आला अधिकारियों पर भी गड़बड़झाला में शामिल होने के आरोप हैं.पूर्वी उत्तर प्रदेश के भारत-नेपाल सीमा पर स्थित एक बैंक का कैशियर नकली नोट को असली से बदलते हुए पकड़ा गया.सुप्रीम कोर्ट स्वयं २जी स्पेक्ट्रम मामले में प्रधान मंत्री कार्यालय की भूमिका पर ऊंगली उठा रहा है तो फ़िर बचा कौन?कुल मिलाकर भारत की हालत संतोषजनक से नाजुक तक पहुँच चुकी है.पूरा का पूरा लोकतान्त्रिक ढांचा चरमरा गया है ऐसे में किसी मकान में अवैध निर्माण करना कौन-सा मुश्किल काम है?जब दिल्ली में बिना भूकंप के ही घर गिर रहे हैं तो भूकंप आने पर क्या होगा?हमें याद रखना चाहिए कि दिल्ली भूकंप जोन ४ में स्थित है और यहाँ कभी भी ८ रियक्टर स्केल का तेज भूकम्प आ सकता है.भगवान न करे कि ऐसा हो लेकिन अगर ऐसा हुआ तो लाखों लोगों के मारे जाने के लिए और कोई नहीं बल्कि भ्रष्टाचार का चारागाह बन चुका तंत्र ही जिम्मेदार होगा.तंत्र हो या व्यक्ति उसको सुधारने के दो ही रास्ते होते हैं-१) पहले समझाया जाता है,गलत काम नहीं करने और अच्छे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया जाता है.२)और जब बात का कोई असर नहीं हो तब लात से काम लेना पड़ता है यानी दण्डित करना पड़ता है.हमारी सरकार ने नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम से ही बाहर कर दिया है और न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल और लाचार है कि सजा दिलवाना भी टेढ़ी खीर है.अगरचे होता तो यह भी है कि अभियोजन पक्ष घूस खाकर केस को ही कमजोर कर देता है और अपराधी छूट जाता है.यानी हमारी सरकारें जिनमें केंद्र और राज्यों दोनों प्रकार की सरकारें शामिल हैं न तो पहले प्रकार के कदम ही उठा रही हैं और न ही दूसरे प्रकार के.इस तरह लक्ष्मीनगर का हादसा इस बात का द्योतक भी है कि हमारी सरकारें यथास्थितिवादी बन गई हैं और इसलिए आगे स्थिति सुधरने के बजाए बिगड़ने ही वाली है.तो फ़िर चाय पीते हुए टी.वी. देखिए,अख़बार पढ़िए और इंतजार करिए अगले और भी दर्दनाक लक्ष्मीनगर का.
मंगलवार, 16 नवंबर 2010
दीवार नहीं पहाड़ हैं हरभजन
यह हमारे लिए गर्व की बात है कि भारत आज टेस्ट क्रिकेट वर्ल्ड रैंकिंग में नंबर १ है.हो भी क्यों नहीं उसके पास एक से एक नायाब हीरे जो हैं.लेकिन जो हीरा वर्तमान भारत-न्यूजीलैंड श्रृंखला में सबसे ज्यादा चमक बिखेर रहा है वह है हरभजन सिंह.भारत के नए संकटमोचक.दीवार तो टीम में पहले से ही कई हैं.हरभजन सिंह तो पहाड़ हैं जिसको लांघे बिना किसी भी टीम के लिए भारत पर जीत दर्ज करना असंभव बन चुका है.८ नवम्बर को समाप्त हुए पहले टेस्ट मैच की दूसरी पारी में जब उन्हें बल्लेबाजी के लिए उतारा गया तब भारत की स्थिति बहुत ही नाजुक थी.रेडियो पर मैच का आंखो देखाहाल सुना रहे उद्घोषक भारत द्वारा टेस्ट क्रिकेट में बनाए गए न्यूनतम स्कोरों का विश्लेषण करने में लगे थे.दर्शकों ने भी मान लिया था कि आज सबसे कम रन पर सिमटने का नया रिकार्ड बनने जा रहा है.हार को तो लगभग तय माना जा ही रहा था.हार के साथ ही भारत का टेस्ट शिखर पर से फिसलना भी तय था.पहला विकेट गंभीर के रूप में ० पर,दूसरा सहवाग के रूप में १ पर,तीसरा द्रविड़ के रूप में २ पर,चौथा और पांचवां सचिन और रैना के रूप में १५ पर और छठा विकेट कप्तान धोनी के रूप में ६५ पर गिर चुका था.मार्टिन और विटोरी की गेदें आग उगल रही थीं लेकिन हरभजन सिंह तो कुछ और ही सोंचकर उतरे थे.मैदान पर दीवार और संकटमोचक के नाम से प्रसिद्ध अटल इरादोंवाले लक्ष्मण पहले से ही मौजूद थे.एक तरफ दीवार और दूसरी तरफ पहाड़.जब लक्ष्मण ७वें विकेट के रूप में मैदान से बाहर गए तो स्कोरबोर्ड पर २२८ रन दर्ज हो चुके थे और भारत खतरे से बाहर था.लेकिन हरभजन की रनों की भूख अभी मिटी नहीं थी.नौवें विकेट के रूप में जब उन्हें टेलर ने अपना शिकार बनाया तब स्कोरबोर्ड २६० की रन संख्या दर्शा रहा था.हरभजन ने न सिर्फ भारत को चिंताजनक स्थिति से उबारा बल्कि अपने टेस्ट कैरियर का पहला शतक भी लगाया.२७२ मिनट तक क्रीज पर रहते हुए १९३ गेंदों पर ३ आसमानी छक्कों और ११ चौकों की मदद से उन्होंने कुल ११५ रन बनाये और साबित कर दिया कि चाहे खेल हो या जीवन,प्रत्येक क्षेत्र में तकनीक से ज्यादा जज्बा काम करता है.इन छक्कों में वह आसमानी छक्का भी शामिल था जिसके द्वारा उन्होंने अपना शतक पूरा किया.इससे पहले वे पहली पारी में भी ६९ रन बना चुके थे.हालांकि इस मैच में गेंदों के द्वारा वे कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं कर सके लेकिन अपनी बल्लेबाजी के द्वारा उन्होंने न सिर्फ इसकी भरपाई कर दी बल्कि ऐसी परियां खेली कि लोग उनमें भारत के महानतम हरफनमौला कपिलदेव का अस्क देखने लगे.इतना ही नहीं अभी हैदराबाद में चल रहे दूसरे टेस्ट में न्यूजीलैंड की पहली पारी में ४ खिलाडिओं को पेवेलियन का रास्ता दिखा चुकने के बाद पहली पारी में बल्ले से एकबार फ़िर जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए नाबाद १११ रन बना चुके है.इन पारी में भी जबरदस्त आतिशबाजी देखने को मिली.अपने प्रशंसकों के बीच भज्जी के नाम से लोकप्रिय इस जाबांज ने ७ छक्के और ७ चौके लगाए और कभी भी दबाव में नहीं दिखे.हरभजन क्रिकेट ही तरह जीवन में भी हरफनमौला हैं.वे रैम्प के भी चैम्प हैं और ठुमके लगाने में भी उनका जवाब नहीं.विवादों से तो जैसे उनका जन्म-जन्म का नाता है.कभी साइमंड्स पर कथित नस्लभेदी टिपण्णी के चलते तो कभी श्रीसंत को तमाचा मारकर वे सुर्ख़ियों में आते रहे हैं.लेकिन उनके प्रदर्शन पर कभी विवादों का असर नहीं पड़ा.जहाँ तक क्रिकेट कैरियर का प्रश्न है तो मुथैय्या मुरलीधरन की नजर में दुनिया का यह सर्वश्रेष्ठ स्पिनर अब तक ८९ टेस्ट मैचों में 373 विकेट और २१० अंतर्राष्ट्रीय एकदिवसीय मैचों में २३८ विकेट ले चुका है.इतना ही नहीं वे टेस्ट मैचों में १८.५८ के औसत से १८८५ रन और एक दिवसीय मैचों में १३.२४ के औसत से १०५९ रन भी बना चुके हैं.बल्लेबाजी के आंकड़े भले ही बहुत आकर्षक नहीं लग रहे हों लेकिन यह भी ध्यान में रखना पड़ेगा कि जब-जब टीम पर संकट आया है तब-तब हरभजन ने जबरदस्त बल्लेबाजी के द्वारा टीम को उबारा है.यानी इन रनों में से अधिकतर रन जबरदस्त दबाव के क्षणों में बने हैं.अभी भज्जी ने कुछ ही महीने पहले अपना ३०वाँ जन्मदिन मनाया है और अभी कम-से-कम ५-६ साल तो अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में रहनेवाले हैं.उन्होंने कई मंजिलें तय की हैं और अभी कई मंजिलें तय करनेवाले हैं हम ऐसी उम्मीद करते हैं.वेलडन भज्जी.
सोमवार, 15 नवंबर 2010
बड़े बेआबरू होकर मंत्रालय से तुम निकले
आखिर यूपीए को बढ़ते जनदबाव के आगे झुकना पड़ा और अपने राजाजी अब राजा नहीं रहे लेकिन वे हमेशा जनता के दिलों में,उनकी यादों में बने रहेंगे.उन्होंने देश को पौने २ लाख रूपये का महाघोटाला जो दिया है.वरना हमने तो चारा और अलकतरा जैसे हजार-पॉँच सौ करोड़ के छोटे-मोटे घोटालों के बारे में पढ़-सुनकर संतोष कर लेना सीख लिया था.हमारे राजाजी ने हमें इस बात की अमूल्य शिक्षा दी है कि हमेशा बड़े की तमन्ना करो.वे अभी भी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं हैं और यह भी नहीं बता रहे कि इतना बड़ा घोटाला फ़िर उजागर हुआ किसकी गलती से.गजब का जीवट है उनका.मामला उजागर होने के बाद भी १ साल तक कुर्सी से चिपके रहे और जब देखा कि अब इस्तीफा देना ही पड़ेगा तब अपनी कालिख भरी बाँहों की आगोश में लेना चाहा प्रधानमंत्री कार्यालय को भी.शायद किसी ने मेरे गाँव की कहानी उन्हें भी सुना दी है.संचार क्रांति का समय जो है.हुआ यूं कि मेरे गाँव के एक गरीब ग्वाले को लड़की की शादी करनी थी.सो काफी परेशान रहा करता था.एक दिन बाल मूड देने के बाद जब गाँव का नाई उसकी दाढ़ी बना रहा था तब उसने उससे अपनी व्यथा सुनाई.नाई ने उससे कहा कि पहले क्यों नहीं बताया?वैसे यह उसका तकियाकलाम था.आगे उसने कहा कि उसके ससुराल में एक बड़ा ही होनहार लड़का है.उन दिनों होनहार का मतलब अच्छी खेती-गृहस्थी करनेवाला माना जाता था.दोनों एक दिन चल पड़े लड़का देखने.तब न तो गाड़ियाँ थी और न ही साईकिल वगैरह.पैदल चलते-चलते बीच जंगल में रात हो गई.कहानियों में रात हमेशा बीच जंगल में ही होती है.उन्होंने एक बड़े पेड़ की तलाश की और उसके मोटे तने पर सो गए.रात गहराई तो डाकुओं का गिरोह आ गया और उसी पेड़ के नीचे अपनी मेहनत की कमाई का बंटवारा करने लगा.जब वे लोग झगड़ने लगे तब तेज आवाज से ग्वाले भाई की नींद खुल गई और डर के मारे तना हाथ से छूट गया.बेचारा डालों से टकराता हुआ नीचे गिरने लगा.तभी नाई की नींद खुल गई.लेकिन नाई ठहरा चतुर-सुजान.सो घबराया नहीं और नाक से बोला,सरदार को ही पकड़ना.डाकुओं को लगा कि कोई भूत-पिचाश है और चूंकि सरदार का नाम लिया गया था इसलिए पहले भागने की बारी भी उसी की थी.आगे-आगे सरदार और पीछे-पीछे अन्य.पलक झपकते मैदान साफ़.सबसे पहले इस लोककथा से प्राप्त शिक्षा का प्रयोग हर्षद मेहता ने किया था प्रधानमंत्री नरसिंह राव के विरुद्ध.बाद में तो जैसे इस तरह के मामलों की बाढ़ ही आ गई.कुछ ही समय पहले कॉमन वेल्थ यानी कॉमन मैन के धन के गबन के आरोपी सुरेश कलमाड़ी भी पी.एम. कार्यालय को लपेटे में लेने की नाकामयाब कोशिश कर चुके हैं.अब इस फार्मूले से वे दोनों ग्रामीण तो बच गए थे.ऊपर से आर्थिक लाभ भी हुआ था.आर्थिक लाभ तो इन लोगों को भी हुआ लेकिन पगड़ीवाला सरदार डरा नहीं.उल्टे कुर्सी छीन ली.राजनीति में २ और २ चार ही हो कोई जरुरी भी तो नहीं.पौने दो लाख करोड़ के ऐतिहासिक घोटाले के कारण अपने राजाजी अभूतपूर्व तो पहले ही हो गए थे अब भूतपूर्व भी हो गए हैं.लेकिन होने से पहले हमें अवसर दे गए गर्व करने का अपने महान राष्ट्र पर.जहाँ मंत्री घोटाले में फँसने पर भी पूरे सालभर तक पद पर बना रहता है.दुनिया के किसी भी अन्य लोकतंत्र में ऐसा कोई उदाहरण नहीं.इट हैप्पेंस ओनली इन इंडिया.अब यूपीए यह कह सकती है कि राजाजी जैसे जिद्दी से इस्तीफा दिलवाकर उन्होंने उदाहरण पेश किया है.लेकिन ऐसा करके उसने देश पर कोई एहसान नहीं किया है.राजाजी तो उसके लिए गले की हड्डी बन गए थे जिसे या तो निगला जा सकता था या फ़िर उगला ही जा सकता था.जब तक बन पड़ा निगलने की कोशिश करते रहे.लेकिन जब देखा कि हड्डी बड़ी होती जा रही है तो उगल दिया और कोई उपाय भी तो नहीं था.मरता क्या नहीं करता?हम भाई लोग कब से अपनी आदत से मजबूर होकर राजाजी को मुफ्त में सलाह दे रहे थे कि सत्ता का मोह त्यागो,सब माया है.लेकिन वे ठहरे नास्तिक पार्टी के नेता सो ध्यान ही नहीं दिया.नहीं तो इस तरह इतना बेईज्जत होकर तो मंत्रालय से बाहर नहीं होना पड़ता.खैर राजाजी को अब भी चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है.बिलकुल भी नहीं.इस घोटाले का उनके कैरियर पर यक़ीनन कोई असर नहीं होगा.हमारी जनता की मेमोरी बहुत कम है १ जीबी से भी कम.वह बहुत जल्दी सबकुछ भूल जाएगी और फ़िर से जय-जयकार करने लगेगी.बस उस समय तक इन्तजार करना पड़ेगा और थोड़ी अंटी भी ढीली करनी पड़ेगी.खैर नेता हो या कोई आम आदमी बुरे वक़्त के लिए ही तो कमाता है.जय राजाजी,जय लोकतंत्र.तो अब आज्ञा दीजिए किसी अन्य राजनेता का घोटाला पुराण लेकर हम बहुत जल्द हाजिर होंगे.हमारे राजनेता बड़े ही योग्य हैं घबराईए नहीं हमें बिलकुल भी इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा और बहुत जल्दी कोई सूरमा इस पौने दो लाख करोड़ के नेशनल रिकार्ड को भंग कर देगा.तब तक के लिए हम कुछ और बात कर लेंगे.और भी बातें हैं ज़माने में घोटालों के सिवा.
शनिवार, 13 नवंबर 2010
राजा तुम कब जाओगे
एक समय वो भी था जब मंत्री लोग भ्रष्टाचार का आरोप लगते ही शर्म के मारे इस्तीफा दे देते थे.लेकिन वक़्त बदला और समाज और देश में नैतिकता दुर्लभ हो गई. बांकी क्षेत्रों में भले ही कुछ नैतिकता बच हुई है भी लेकिन राजनीति से तो यह कपूर की माफिक उर्ध्वपातित ही हो गई है.साथ ही इस व्यवसाय से शर्म भी महानतम पशु गदहे की सिंग की तरह गायब हो गई है.अब मंत्री सारे सबूत खिलाफ होने पर भी पद से इस्तीफा नहीं देता बल्कि ढीठ की तरह कानूनी लड़ाई लड़ता है.जेल जाता भी है तो गर्व के साथ हाथी पर सवार होकर.समर्थकों का जुलूस जय-जयकार करता हुआ उसके पीछे नारा लगाता है-जब तक सूरज-चांद रहेगा.......मानों भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाना शर्म की नहीं गौरव की बात हो.राजतन्त्र में भी राजा जनविद्रोह से डरता था.आज का राजा जनता से नहीं डरता और कुर्सी से फेविकोल लगाकर चिपका रहता है.भले ही उस पर १ लाख ७६ हजार करोड़ रूपये के महाघोटाले का आरोप ही क्यों न हो.पूरा देश पूछ रहा है कि राजा तुम कब जाओगे लेकिन राजा दया प्रदर्शित करने को तैयार नहीं.कोई ऐसा लक्षण नहीं जिससे यह पता चले कि पौने २ लाख के रिकार्डतोड़ घोटाले के बल पर भारत की जनता से भ्रष्टाचार के राजा का ख़िताब पा चुका यह राजा पद छोड़कर त्याग की एक नई मिशाल कायम करने के बारे में सोंच भी रहा है.जब इसे मंत्री बनाया गया था तब जनता को संदेह था कि यह सिर्फ नाम का राजा तो नहीं है.लेकिन वह तो मन का भी राजा निकला,अपने मन का राजा.किसी भी नियम-कानून को नहीं माननेवाला.सरकार का हिसाब-किताब देखनेवाले सीएजी के अनुसार २ जी स्पेक्ट्रम आवंटन में इसने कानून मंत्रालय और दूरसंचार आयोग की सलाहों को नहीं माना और कोई तर्क और कारण बताए बिना मनमानी की.क्या इन दोनों ने उसे गलत सलाह दी थी?लाइसेंस के आवंटन में कुछ ऑपरेटर्स को फायदा पहुँचाने के मकसद से नियमों में ही बदलाव कर दिया.यह यारों का यार है.यार-दोस्तों को लाभ पहुँचाने के लिए कुछ भी कर सकता है.इधर कांग्रेस भी गंभीरता से अपने इस भ्रष्टाचारी दोस्त के साथ राजनीतिक दोस्ती निभा रही है और उसे बचाने के लिए हर तरह के वैध-अवैध हथकंडे अपना रही है.नैतिकता और राजनैतिक शुचिता का तो यू.पी.ए. ने अंतिम संस्कार ही कर डाला है.सरकार अब राजा की तरफ से कानूनी लड़ाई लड़ने के मूड में है और तर्क दे रही है कि राजा के भ्रष्टाचारी कृत्य से जनता को लाभ ही हुआ है.भ्रष्टाचार से लाभ!उसका दावा है कि इस दृष्टिकोण से आवंटन सही है और पूरा का पूरा मामला नीतिगत है.उसके अनुसार सरकार का उद्देश्य टेलीफोन घनत्व को बढ़ाना था न कि अधिक राजस्व वसूली.चलिए इससे यह तो पता चला कि सरकार का कोई उद्देश्य भी है.वह यह तर्क भी दे रही है कि एन.डी.ए. ने भी ऐसा किया था.जबकि उसे समझना चाहिए कि गलत काम चाहे यू.पी.ए. करे अथवा एन.डी.ए. गलत तो गलत ही होता है.सरकार कैग के बारे में कह रही है कि उसे यह पूछने का कोई अधिकार नहीं है कि किस नीति के तहत स्पेक्ट्रम आवंटित किए गए.एक तरफ तो यही सरकार जनता को सूचना के अधिकार के तहत कुछ भी पूछने का अधिकार देती है तो दूसरी ओर कैग जैसी संवैधानिक संस्था के अधिकारों पर ही प्रश्नचिन्ह लगाती है.अगर सरकार को घोटाला करने का अधिकार है तो क्या जनता को पूछने का अधिकार भी नहीं है?क्या भारत का नियन्त्रक और महालेखाकार परीक्षक भारत का नागरिक नहीं है?फ़िर भी अगर कैग को बताने से किसी तरह का संवैधानिक संकट उत्पन्न होता है तो जनता को ही बता दे और इस घोटाले पर श्वेत-पत्र जारी करे.लेकिन वह ऐसा नहीं करेगी क्योंकि जो कुछ भी हुआ है वह गलत हुआ है और उसे छिपाने में ही सरकार की भलाई है.कोर्ट-कचहरी के बल पर सरकार अपने मंत्री की कुर्सी भले ही बचा ले लेकिन उसके कृत्य को वह नैतिकता की दृष्टि से किसी भी तरह से उचित नहीं सिद्ध कर सकती.अगर कैग द्वारा पूछ गया सवाल यू.पी.ए. सरकार को कठिन लग रहा हो तो वो मेरे इस सरल प्रश्न का ही उत्तर दे दे कि वह कब सत्ता पर देशहित को प्राथमिकता देना शुरू करेगी?उत्तर देने की समय-सीमा भी वही तय कर ले.सवा अरब (लोगों) का सवाल है यह.वैसे मेरा पहला सवाल भी जो सीधे राजा से है,अभी तक अनुत्तरित ही है कि राजा तुम कब जाओगे?
शुक्रवार, 12 नवंबर 2010
न्याय की हत्या
कल का दिन भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का काला दिन माना जाना चाहिए.कल कानून के रक्षक से भक्षक बना एक ढीठ अपने रसूख के बल पर फ़िर से आजाद हो गया.१९ सालों से न्याय का इंतजार कर रहे रूचिका के परिवार के लिए यह बेटी को खोने से भी बड़ा सदमा है.भारत में अंग्रेजी शासन की देनों में एक महत्वपूर्ण देन माना जाता है कानून का शासन और कानून के समक्ष समानता.हमारे संविधान में भी इन तत्वों को समाहित किया गया है.लेकिन यथार्थ में न तो अंग्रेजों के समय ही कानून के समक्ष समानता थी और न ही अभी है.गांधीजी ने भी न्यायिक प्रणाली की इस अन्यायी प्रवृत्ति से क्षुब्ध होकर कहा था कि कानून अमीरों की रखैल है.हमारी न्यायिक प्रक्रिया में निहित दोषों के चलते फैसला आने में वर्षों नहीं दशकों लग जाते हैं.पीड़ित बार-बार न्यायालय जाता है और उसे न्याय के बदले थमा दी जाती है तारीख.तारीख पर तारीख बीतती जाती है.तारीख मिलती है फैसला नहीं मिलता और जब दशकों बाद फैसला आता है तो पता चलता है कि न्याय तो मिला ही नहीं.फ़िर ऊपरी अदालतों में अपील और फ़िर से उसी नाटक का दोहराया जाना.रूचिका के पूरी परिवार के लिए संकट की शुरुआत तब हुई जब १२ अगस्त,१९९० को रूचिका गिरहोत्रा नामक १४ वर्षीया उभरती टेनिस खिलाड़ी के साथ हरियाणा पुलिस का तत्कालीन महानिरीक्षक और हरियाणा लॉन टेनिस एसोसिएशन का अध्यक्ष एसपीएस राठौड़ छेड़छाड़ करता है.१६ अगस्त को रूचिका और उसके परिवारवाले राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री हुकुम सिंह और राज्य के गृह सचिव से इसकी शिकायत करते हैं.१७ अगस्त को मुख्यमंत्री तत्कालीन पुलिस महानिदेशक आर.आर.सिंह को जाँच करने के लिए कहते हैं.१८ अगस्त को राठौड़ के खिलाफ शिकायत दर्ज की जाती है.जाँच में आरआरसिंह राठौड़ को प्रथम दृष्टया दोषी पाते हैं और रिपोर्ट और प्राथमिकी दर्ज करने की सिफारिश करते हैं. डीजीपी और गृह सचिव जेके दुग्गल राठौड़ के खिलाफ विभागीय कार्रवाई और आरोप पत्र दाखिल करने की अनुशंसा करते हैं.१२ मार्च १९९१ को गृहमंत्री संपत सिंह विभागीय कार्रवाई की स्वीकृति देते हैं और फाईल मुख्यमंत्री के पास भेज दी जाती है.अगले ही दिन मुख्यमंत्री मंजूरी दे देते हैं.२८ मई १९९१ को राठौड़ के खिलाफ आरोप पत्र स्वीकार किया जाता है.तब तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लग जाता है.इसके बाद २३ जुलाई १९९१ को भजनलाल कांग्रेस पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री बनते हैं और ९ मई १९९६ तक पद पर बने रहते हैं.इनके समय राठौड़ के प्रति सरकारी रवैया अचानक बदल जाता है.वह अपराधी मुख्यमंत्री का कृपापात्र बन जाता है और इसका लाभ उठाकर वह अशुभारम्भ करता है रूचिका के परिजनों को प्रताड़ना देने के कार्य का.अचानक हरियाणा पुलिस द्वारा रूचिका के भाई को कार चोर बना दिया जाता है और ६ अप्रैल १९९२ से ४ सितम्बर १९९३ के काले कालखंड में उसके खिलाफ कार चोरी के एक के बाद एक छह मामले दर्ज किए जाते हैं.सभी मामले भादंसं की धारा 379 के तहत दर्ज किए जाते हैं.२३ अक्तूबर १९९३ को आशु को हरियाणा पुलिस अवैध तरीके से घर से उठा लेती है और दो महीने तक हिरासत में रखती है.इसी दौरान 4 नवम्बर,१९९३ को भजनलाल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार राठौड़ को अपर पुलिस महानिदेशक के रूप में तरक्की दे देती है.पारितोषिक,वाह री आम आदमी की पार्टी की सरकार.कितना ख्याल रखा तूने आम आदमी को प्रताड़ित करनेवाले इस खास आदमी का.२८ दिसंबर,१९९३ को अपने और अपने परिवार के ऊपर हो रही ज्यादतियों को नहीं सह पाने के कारण रुचिका जहर खाकर आत्महत्या कर लेती है और अगले ही दिन आशु को रिहा कर दिया जाता है.जैसे पुलिस और सरकार को उसे रिहा करने के लिए इसी सुनहरे पल का इन्तजार था.रुचिका की मौत के महीनों बाद अप्रैल १९९४ में राठौड़ के खिलाफ आरोप तय कर दिया जाता है.इसी बीच ११ मई १९९६ को बंसीलाल राजपाट सँभालते हैं और ५ जून १९९८ को राठौड़ एक अन्य मामले में निलंबित कर दिए जाते हैं.२१ अगस्त १९९८ को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय हरियाणा पुलिस पर अविश्वास जताते हुए इस मामले यानी रूचिका मामले की सीबीआई जाँच का आदेश देता है इस उम्मीद के साथ कि वह इस हाई प्रोफाईल मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच करेगा.विश्वास और सीबीआई पर!उसे तो ऐसे मामलों को दबाने में मास्टरी हासिल है.३ मार्च १९९९ को बंसीलाल सरकार राठौड़ को अपर पुलिस महानिदेशक के रूप में फ़िर से बहाल कर देती है और उसे फ़िर से खुली छूट मिल जाती है अपने ओहदे के नाजायज इस्तेमाल करने की.२३ जुलाई १९९९ को ओमप्रकाश चौटाला हरियाणा के मुख्यमंत्री बनते हैं और ३० सितम्बर को विभागीय जांच में जैसा कि हरेक हाई प्रोफाईल मामले में होता है,राठौड़ को दोषमुक्त करार दिया जाता है.इसी को तो भाईचारा कहते हैं न!जब तुम फँसों तो हम बचाएँ और जब हम फंसें तो तुम बचाना.१० अक्तूबर १९९९ को लोकतान्त्रिक तरीके से आम आदमी द्वारा चुनी गई चौटाला सरकार द्वारा एक आम परिवार के अमन-चैन की हत्या करनेवाले,कानून का गला घोंत्नेवाले राठौड़ को हरियाणा पुलिस का महानिदेशक बना दिया जाता है.पूरे प्रदेश की पुलिस का मुखिया.१६ नवम्बर २००० को घटना के १० साल बाद आखिरकार सीबीआई रुचिका छेड़छाड़ मामले में राठौड़ के खिलाफ आरोप पत्र दायर करने में सफल हो जाती है.परिणामस्वरूप दिखावे के लिए ५ दिसंबर को उसे डीजीपी के पद से हटा दिया जाता है और छुट्टी पर भेज दिया जाता है.हालांकि इससे उसके रूतबे में कोई कमी नहीं आती है.छुट्टी में रहते हुए ही राठौड़ पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त हो जाता है.क्या इसे ही जनता की सेवा करना कहते हैं जो वह जीवनभर करता रहा.त्वरित न्याय के नए मानदंड स्थापित करते हुए घटना के १९ साल बाद २१ दिसंबर २००९ को सीबीआई की विशेष अदालत राठौड़ को दोषी ठहराती है और छह महीने की कैद और एक हजार रुपए के जुर्माने की मामूली सजा सुनाती है.मानो उसने पड़ोसी के बगीचे से चोरी से आम तोड़ने जैसा कोई छोटा-मोटा अपराध किया हो.८ फरवरी २०१० को नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ फैशन डिजाइनिंग अहमदाबाद का एक छात्र अदालत परिसर में ही राठौड़ पर चाकू से हमला करता है,लेकिन वह बच जाता है.अभी कुछ साल भी पहले महाराष्ट्र में बलात्कार के मामले में एक रसूखदार अभियुक्त को अदालत द्वारा छोड़ देने के बाद कई महिलाओं ने मिलकर छुरा घोंपकर भरी अदालत में वध कर दिया था.क्यों बढ़ रही है इस तरह की प्रवृत्ति,क्या हमारे नीति-निर्मातों का इस ओर ध्यान गया है?जब न्यायालयों से न्याय नहीं मिलेगा तो जनता में गुस्से का उत्पन्न होना स्वाभाविक है.सरकार ने अगर समय रहते स्थिति को नहीं संभाला तो भविष्य में वह दिन दूर नहीं जब पढ़े-लिखे लोग भी कानून को हाथ में लेने को बाध्य हो जाएँगे.२५ मई २०१० को अदालत गिरहोत्रा परिवार की अपील पर छह महीने कैद की सजा को बढ़ाकर डेढ़ साल कर देती है और सीबीआई राठौड़ को गिरफ्तार कर लेती है.लेकिन कल उच्चतम न्यायालय में सीबीआई ने अपना असली रूप दिखा दिया है.उसने बता दिया है कि उसका गठन भले ही भ्रष्टाचार को रोकने के लिए किया गया हो,उसका वास्तविक काम भ्रष्टाचारियों की कानून से रक्षा करना है.शातिर,सुशिक्षित और समाज में उच्च प्रास्थिति रखनेवाला निर्लज्ज अपराधी एक बार फ़िर स्वतंत्र हो चुका है.उसके चेहरे पर फ़िर से दंभ भरी हंसी विराजमान है.अदालत का यह आदेश केन्द्रीय जाँच ब्यूरो के उस फ़ैसले के बाद आया है जिसमें जाँच एजेंसी ने रुचिका गिरहोत्रा मामले में दर्ज किए गए तीन नए केस में से दो में जाँच बंद करने का फ़ैसला किया है.ये केस रुचिका के पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के साथ छेड़-छाड़ करने और उसके भाई आशू को हवालात में प्रताड़ित करने से संबंधित थे.तो क्या यह माँ लेना चाहिए कि पुलिस आशू को झूठे मुक़दमे में फँसाकर हवालात में प्रताड़ित करने नहीं बल्कि दामाद की तरह आवभगत करने के लिए ले गई थी.हालांकि 68-वर्षीय राठौर के ख़िलाफ़ रुचिका को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में जाँच जारी रहेगी.लेकिन कब तक?बहुत जल्दी यह मामला भी निश्चित रूप से दफ़न हो जाएगा और उसके साथ दफ़न हो जाएगा सवा अरब भारतीयों का कानून पर विश्वास,पुलिस अधिकारी की सनक के चलते बर्बाद हो चुके परिवार के न्याय पाने के अरमान.जब न्याय तंत्र न्याय दे ही नहीं सकता तो क्यों खर्च किए जा रहे हैं रोजाना इसके नाम पर करोड़ों रूपये?क्यों नष्ट किया जा रहा है जनता का अमूल्य समय कानूनी कार्यवाहियों में?क्या औचित्य है न्याय के इन कथित मंदिरों का?क्यों नहीं हटा दिया जाता संविधान से समानता का अधिकार प्रदान करने वाले बेकार और बेजान शब्दों को?क्यों???
गुरुवार, 11 नवंबर 2010
छठ-भक्ति और हठयोग का संगम
श्रीमदभगवद्गीता में भक्ति की व्याख्या करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि भक्ति सहजता से करो न कि हठपूर्वक.जो व्यक्ति मेरे नाम पर शरीर को कष्ट देता है वह भक्त है ही नहीं वह दम्भी या हठयोगी है.उन्होंने कहा है कि कर्त्ता भी मैं ही हूँ,कारण भी मैं और कर्म भी मैं ही हूँ.मैं ही आदि हूँ और मैं ही अंत भी.इसलिए सबकुछ मुझे समर्पित करते हुए निष्काम कर्म करो.लेकिन दुनिया के विभिन्न धर्मों में प्राचीन काल से ही भगवान को खुश करने के लिए शरीर को कष्ट देने की परंपरा रही है.कहीं-कहीं तो लोग शरीर में लोहे की सींक भोंक कर खुद को लहू-लुहान भी कर डालते हैं तो कहीं आग पर नंगे पांव चलते हैं.जैन धर्म के मुनियों में उपवास द्वारा प्राण-त्यागा जाता है.बिहार में इन दिनों आस्था का महापर्व छठ मनाया जा रहा है.आज खरना है.इस व्रत में व्रती जितना अपने शरीर को कष्ट देता या देती है उतना बिहार में किए जानेवाले अन्य किसी व्रत में नहीं.शरीर को कष्ट देना योग का विषय है.योगी इसके माध्यम से समाधि पाने का प्रयास करता है.लेकिन भक्ति तो मधुर भाव से उत्पन्न होती है.इसमें शक्ति प्रदर्शन का कोई महत्त्व नहीं.उल्टे भक्त जितना विनीत होता है उसे उतनी ही अधिक ईश्वरीय कृपा प्राप्त होती है.कुम्भ मेले में आनेवाले कई योगी इसलिए आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं कि उनमें से कईयों ने वर्षों से अपने एक हाथ को ऊपर उठा रखा होता है और जो सूखकर कांटा हो चुका होता है.उनमें से कई सिर्फ पानी पीकर जी रहे होते हैं तो कई सिर्फ मिर्ची या कोई अन्य बेस्वाद चीज खाकर.ऐसा करके उन्हें क्या प्राप्त होता है ये तो वही जानें.संत कबीर ने भक्तिमार्ग अपनाने से पहले योग द्वारा ईश्वर प्राप्ति का भी प्रयास किया था.उन्हें ईश्वर का दर्शन भी मिला लेकिन समाधि से बाहर आते ही एकात्म भाव नष्ट हो जाता था.तब कबीर ने कहा था-गगना-पवना विन्से दोनों कहाँ गया योग तुम्हारा और भक्ति की ओर आकर्षित हुए थे.भक्ति में आनंद नष्ट नहीं होता,समय के साथ प्रगाढ़ होता जाता है,उसमें अभिवृद्धि होती जाती है.भक्त प्रवर रामकृष्ण परमहंस का भी कहना था कि भगवान की भक्ति सहज भाव से करो,कुछ मांगो मत.तुम्हें क्या चाहिए वह तुमसे बेहतर जानता है.भगवान की तुलना उन्होंने बिल्ली से की है जो अपने बच्चे को मुंह में दबाये घूमती रहती है.उसके बच्चे को गिरने का भय नहीं होता.वह अपनी सुरक्षा के प्रति निश्चिन्त होता है.छठ महाव्रत में नहा-खा के दिन तक सबकुछ सामान्य होता है.व्रती सेंधा नमक में बनी सब्जी नहाने के बाद खाता है और उसके बाद दिनभर वह चाहे जितनी बार खा सकता है.भोर में चाय-पानी भी पी सकता है.दूसरे दिन जिसे खरना कहते हैं व्रती रात में पूजा करने करने के बाद दिन भर में सिर्फ एक बार खाता है.इस दिन वह नमक नहीं खा सकता,उसे सिर्फ रोटी और गुड की बनी खीर खाने की ही अनुमति होती है.भोर में जितना चाहे पानी पी सकता है.उसके बाद उसे २४ घन्टे से भी ज्यादा समय तक निर्जल उपवास करना होता है.इस दौरान उसे शाम में डूबते हुए और सुबह में उगते हुए सूर्य को अर्क अर्पित करने के लिए २-३ घन्टे तक कमर-भर नदी या तालाब के ठन्डे पानी में खड़ा भी होना होता है.एक तो लम्बा उपवास और उस पर ठन्डे पानी में खड़ा रहना.कई व्रतियों की इस दौरान तबियत बिगड़ जाती है और कईयों को हालात गंभीर होने पर अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है.जान न भी जाए तो स्वास्थ्य पर बुरा असर तो पड़ता ही है.कहा गया है-शरीरमाद्यं धर्म खलु साधनं.हमारे लिए शरीर भगवान की दी हुई विभूति है.चूंकि हम सारे क्रियाकलाप इसी के माध्यम से करते हैं इसलिए इसका समुचित रखरखाव करना हमारा कर्तव्य है.साथ ही भक्ति तो श्रद्धा और विश्वास से की जाती है,मन और ह्रदय से की जाती है.इसमें शरीर को घसीटने का क्या मतलब?जब कोई शारीरिक कष्ट में रहेगा तो भगवान में मन को एकाग्र कैसे कर पाएगा?मेरी माँ पिछले १४-१५ सालों से लगातार शुक्रवार व्रत कर रही थी.धीरे-धीरे उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य गिरता जा रहा था.घर के सभी लोग मना भी कर रहे थे लेकिन वह जिद पर अड़ी थी.कुछ महीने पहले एक शुक्रवार को उसकी तबियत बहुत बिगड़ गई और न चाहते हुए भी व्रत को तोडना पड़ा.भक्ति तो आनंद का विषय है,निरे आनंद का.फ़िर हम क्यों शारीरिक कष्ट सहते हैं?हम सभी भिखारी हैं.हम भगवान से हमेशा कुछ-न-कुछ मांगते रहते हैं और रिश्वत के रूप में ऐसा-वैसा करने का लालच भी उन्हें देते रहते हैं.चूंकि ईच्छाएं अनंत हैं इसलिए यह सिलसिला भी अनवरत चलता रहता है.कुछ महिलाऐं तो सप्ताह के सातों दिन व्रत करती हैं और स्वास्थ्य का भट्ठा बैठा लेतीं हैं.जबकि हम-आप सब लोग जानते हैं कि किसी को भी समय से पहले और भाग्य से ज्यादा कुछ भी,कभी भी नहीं मिलता.मेरी एक जमीन जो कोढ़ा (कटिहार) में है के कागजात रजिस्ट्री के कुछ ही दिनों बाद चोरी हो गए.मुझे लोगों ने पूर्णिया रजिस्ट्री ऑफिस से पता लगाने की सलाह दी.मैं जब पहली बार इस काम के लिए पूर्णिया जा रहा था तो माँ ने गणेशजी का जयघोष किया और बोली कि गणपति की कृपा से बिगड़े काम बन जाते हैं इसलिए कागजात भी मिल जाएँगे.लेकिन दिन-पर-दिन बीतते रहे और रोजाना रवानगी के समय गणेश-स्मरण भी चलता रहा लेकिन कागज को नहीं मिलना था सो नहीं मिला.इसी प्रकार मैंने कई संतानविहीन दम्पतियों को मंदिरों के चक्कर काटते हुए देखा है और इसी चक्कर में बूढ़े होते भी देखा है.मेरे एक नाना ओझागिरी करते थे.एक दिन जब वे दरवाजे पर नहीं थे तभी एक महिला आई उनके भाई को ही ओझा समझ कर झाडफूंक करने को कहा.वह महिला निस्संतान थी.उन्होंने भी मजाक में थोड़ी-सी भभूत उठाई और उसे देते हुए कहा जा तुझे बेटा होगा.एक-डेढ़ साल बाद वह महिला गोद में बच्चा लिए आई और भगत नाना के भाई को दक्षिणा देने लगी और बार-बार आभार प्रकट करने लगी.भगत नाना भी उस समय वहीँ पर थे.महिला के जाने के बाद उन्हें जब असलियत मालूम हुई तो वे भी हमारे साथ ठहाका लगाए बिना नहीं रह सके.कहने का मतलब यह कि जीवन में सबकुछ संयोग है,इत्तिफाक.रामचरित मानस में दशरथ के निधन के समय वशिष्ठ ने भरत को सांत्वना देते हुए कहा है-सुनहूँ भरत भावी प्रबल,बिलखी कहेऊ मुनिनाथ| हानि-लाभ जीवन-मरण जश-अपजश विधि हाथ||इस दृष्टि से भी भक्ति में शरीर को सधाने की कोई आवश्यकता नहीं.भगवान प्रेम करने की चीज हैं और प्रेम में मोलभाव नहीं होता.जहाँ तक छठ का सवाल है तो विज्ञान द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि हम सभी सूर्य के अंश हैं और सृष्टि के अंत में पृथ्वी सूर्य में ही विलीन हो जाएगी.धरती पर जीवन भी बिना सूर्य के संभव नहीं.वे एकमात्र प्रत्यक्ष भगवान हैं.उनकी भक्ति करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन उसमें सहजता होनी चाहिए.अगर इस सूर्यपूजा को सरल बना दिया जाए तो वे लोग भी इसे कर पाएँगे जो नहीं सकने के डर से इसे नहीं कर पाते.गीता में ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि मानव अपने कर्मों के फल से किसी भी प्रकार नहीं बच सकता,उसे उसके कर्मों का फल मिलकर ही रहता है-योगक्षेमं वहाम्यहम.तुसली बाबा ने भी रामचरितमानस में कहा है-कर्म प्रधान विश्व करि राखा,जो जस करहिं सो तस फल चाखा.तब फ़िर वेवजह शरीर को कष्ट देने के बजाए हम अपने कर्मों को क्यों न शुद्ध करें?व्रत भर तो हम बाह्य शुद्धता का खूब ख्याल रखते हैं लेकिन आतंरिक शुद्धता के अभाव में बांकी के सालभर फ़िर कर्म-अकर्म में लिप्त रहते हैं.अशुद्ध कर्म करके अशुद्ध मन (चित्त) से चाहे हम भगवान के नाम पर कितना ही कष्ट क्यों न सह लें,हासिल कुछ नहीं होनेवाला.इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि महापर्व छठ में केवल भक्ति को रहने दें,विशुद्ध आनंदमय भक्ति को और इसमें से हठयोग के तत्व को अलग कर दें.
बुधवार, 10 नवंबर 2010
धंधा है इसलिए गन्दा है
दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में किसी भी राजनेता के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है उसकी सार्वजनिक छवि.लेकिन जब समाज का ही नैतिक पतन हो जाए तो इसका महत्त्व अपने आप ही समाप्त हो जाता है.कहते हैं कि राजनीति काजल की कोठरी होती है और जो भी इसमें आता है उसका दागी हो जाना स्वाभाविक है.लेकिन यह भी सच है कि जहाँ आग होती है धुआं भी वहीँ होता है.आज के दौर में भी कई ऐसे राजनेता मौजूद हैं जिनका दामन पाक साफ़ है.कोई भी तंत्र तकनीक के समान निर्दोष होता है.यह उसे संचालित करनेवाले पर निर्भर करता है कि उसकी सोंच क्या है,उसकी मनोवृत्ति क्या है?आज का सच यह है कि राजनीति अब जनसेवा का माध्यम नहीं रह गई है बल्कि इसने धंधे का स्वरुप अख्तियार कर लिया है.और धंधा है तो गन्दा भी हो सकता है.क्योंकि धंधे का तो कोई उसूल होता ही नहीं.वह तो सिर्फ लाभ के लिए किया जाता है.कहते हैं कि सत्ता व्यक्ति को भ्रष्ट कर देती है.चूंकि कांग्रेस ने देश पर सबसे ज्यादा समय तक शासन किया है इसलिए यह स्वाभाविक है कि भ्रष्टाचार के सबसे ज्यादा आरोप समय-समय पर इसी पार्टी के नेताओं पर लगे हैं.आदर्श सोसाईटी घोटाले में बुरी तरह फंस चुके अशोक चौहान से कांग्रेस ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दिलवा दिया है.लेकिन क्या इससे भ्रष्टाचार पर लगाम लग जाएगी?क्या भ्रष्टाचार के आरोपी नेता को केवल पद से हटा देना ही पर्याप्त है?नहीं कदापि नहीं!यह जहर अब वट वृक्ष रूपी भारतवर्ष के नस-नस में फ़ैल चुका है और सिर्फ फुनगी काट देने से इसका कुछ नहीं बिगड़ने वाला.आदर्श घोटाले में तो सेना भी फंसी हुई है.अभी कुछ ही दिनों पहले हुई वर्धा रैली के समय कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर भी मुख्यमंत्री अशोक चौहान से २ करोड़ रूपये बस के भाड़े के लिए देने के लिए कहने का आरोप स्वयं प्रदेश अध्यक्ष मानिक राव ठाकरे की गलती से सामने आया था और अब बात आई-गई भी हो गई है.यानी भ्रष्टाचार की गन्दगी राजनीति की गंगा में स्वयं शीर्ष नेतृत्व यानी गंगोत्री से ही आ रही है.जब किंग मेकर ही भ्रष्ट होगा तो किंग तो भ्रष्ट होगा ही.पार्टी फंड भी देश में भ्रष्टाचार का माध्यम बन गया है.इसलिए इन इक्के-दुक्के लोगों पर कार्रवाई करने से भ्रष्टाचार न तो कम होने जा रहा है और न ही मिटने जा रहा है.महाराष्ट्र का क्षत्रप चाहे कोई भी हो उसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पेशवा (केंद्रीय नेतृत्व)को सरदेशमुखी तो देना ही होगा.हमारे राजनीतिज्ञों के नैतिक स्तर में लगातार गिरावट आ रही है.अब तो घपले-घोटालों से सीधा सम्बन्ध होने का सबूत होने के बावजूद भी मंत्री-मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री इस्तीफा नहीं देता.राष्ट्रमंडल खेलों में करोड़ों की हेराफेरी का आरोपी होने पर भी कलमाड़ी अंग्रेजी हैट पहने माथा गर्वोन्नत किए घूम रहे हैं.हालांकी कांग्रेस ने उन्हें अपनी कार्यसमिति से हटाकर खुद को पाकसाफ सिद्ध करने का प्रयास किया है.लेकिन क्या इतनी कार्रवाई ही काफी है?क्या उन पर निष्पक्षता से मुकदमा चलाकर उन्हें इसके लिए दण्डित नहीं किया जाना चाहिए?लेकिन यक़ीनन ऐसा नहीं होने जा रहा है.पिछले ५०-६० सालों में सत्ता में रहते हुए कांग्रेस इस तरह के न जाने कितने ही मामलों की लीपा-पोती कर चुकी है.अभी भी भ्रष्टाचार का राजा ए.राजा केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा है और कांग्रेस देशहित पर सत्ता को वरीयता देने के कारण उसे हटा भी नहीं सकता,जेल भेजना तो दूर की कौड़ी है.ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ कांग्रेस में ही गलत लोग हैं.ऐसे लोग सभी पार्टियों में हैं.हमारी विधायिका में एक तिहाई से भी ज्यादा जनप्रतिनिधि दागी हैं.स्थिति संतोषजनक भले ही नहीं हो,सुधार की गुंजाईश समाप्त नहीं हुई है.सबसे पहले तो सभी पार्टियों को निजी स्वार्थों से ऊपर उठना पड़ेगा और सत्ता पर देशहित को प्राथमिकता देनी होगी.लोकतंत्र में नैतिकता का महत्व अन्य शासन प्रणालियों से कहीं ज्यादा होता है.बिहार विधानसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने लगभग ४७ % दागियों को टिकट दिया है.किसी-किसी सीट पर तो सारे उम्मीदवार ही दागी हैं.जनता किसको वोट दे और क्यों वोट दे?इसलिए जनप्रतिनिधित्व कानून में बदलाव करते हुए जनता को उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए.साथ ही अगर नकारात्मक वोट सबसे ज्यादा हो जाएँ तो नए उम्मीदवारों के साथ दोबारा मतदान होना चाहिए.तीसरा सुधार हमारी न्यायिक व्यवस्था में होना चाहिए और इस तरह की व्यवस्था की जानी चाहिए कि कानून के जाल में आने से छोटी ही नहीं बड़ी मछलियाँ भी नहीं बच पाए.
मंगलवार, 9 नवंबर 2010
ग़लतफ़हमी नहीं पाले भारत
ओबामा अपनी चार दिन की यात्रा पूरी कर पूर्वी एशिया के लिए रवाना हो चुके हैं.ओबामा जब तक भारत में रहे,भारत की स्तुति में लगे रहे.हम भारतीयों की यह पुरानी बीमारी है कि हम किसी भी तथ्य को तभी सत्य मानते हैं जब कोई विदेशी उसकी पुष्टि कर दे.चाहे वो वैज्ञानिक हो या कोई लेखक-कवि उसे अपने देश में तभी मान्यता मिलती है जब किसी पश्चिमी देश ने उसे पुरस्कृत कर दिया हो.ओबामा हमारी धरती पर खड़े होकर बार-बार हमें वैश्विक महाशक्ति कह रहे हैं और हम भी मस्त हुए जा रहे हैं.क्या उनके कहने से ही हम महाशक्ति होंगे या फ़िर नहीं होंगे?हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मानव विकास सूचकांक में हम काफी नीचे हैं.स्वच्छ शासन के मामले में भी हमारी स्थिति शर्मनाक है.हमारी जनसंख्या का बड़ा भाग २० रूपये प्रतिदिन से भी कम में गुजारा कर रहा है.सुरक्षा के क्षेत्र में हम पूरी तरह दूसरे देशों पर निर्भर हैं.हम अभी अपने पड़ोसियों से भी निबट पाने में सक्षम नहीं हैं.हमारी हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन पिछले ६०-६५ सालों से चीन और पाकिस्तान के कब्जे में है और हम आज भी उसे छुड़ा पाने की स्थिति में नहीं हैं.फ़िर हम किस तरह की महाशक्ति हैं?ओबामा इस समय याचक की भूमिका में हैं और ठकुरसोहाती करना उनकी जरुरत ही नहीं मजबूरी भी है.इसलिए हमें अतिरिक्त सावधान रहने की जरुरत है.हो सकता है हम भुलावे में आकर ऐसी गलती कर बैठें जिसका खामियाजा हमें लम्बे समय तक भुगतना पड़े.इंग्लैण्ड की तरह अमेरिका भी बनियों का देश है और बनिया कोई भी काम बेवजह नहीं करता.कल की एकमात्र महाशक्ति अमेरिका को एक अन्य महाशक्ति चीन ने सस्ते मालों से पाटकर उत्पादकों के बदले उपभोक्ताओं के देश में बदल दिया है.अमेरिका में एक तरफ उत्पादन में कमी आ रही है तो वहीँ दूसरी ओर आश्चर्यजनक तरीके से मुद्रा-स्फीति में भी कमी देखने को मिल रही है.जी.डी.पी. बढ़ने के बजाए कम हो रही है और बेरोजारी बढ़कर ९ प्रतिशत पर पहुँच गई है.दूसरी ओर चीन दिन-ब-दिन ताकतवर होने के साथ आक्रामक होता जा रहा है.उसकी शक्ति इतनी बढ़ चुकी है कि अकेले अमेरिका उससे नहीं निबट सकता.यह कारण भी है कि ओबामा भारत समेट चीन द्वारा प्रताड़ित अन्य देशों की यात्रा पर हैं.अमेरिका का इतिहास स्वार्थ का इतिहास रहा है.जब भी जैसे भी उसका मतलब साधा है उसने अन्य देशों से दोस्ती-दुश्मनी की है.सद्दाम हुसैन भी कभी उसके दोस्तों में थे.तालिबान भी उसी का मानस पुत्र है.उसने यह कभी नहीं देखा कि जिस देश से उसका हित सध रहा है वहां तानाशाही है या लोकशाही.आज जब उसका हित भारत से सध रहा है तो वह लोकतंत्र का पैरोकार बन गया है.क्या आज से पहले भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं था?ठीक एक साल पहले ओबामा चीन की धरती पर चीन का गुणगान करने और उसे अपना स्वाभाविक मित्र बताते थक नहीं रहे थे.तब क्या चीन में लोकतंत्र था?भारत को ओबामा के गुणगान में बह नहीं जाना चाहिए और वास्तविकताओं को समझना चाहिए.भारत निश्चित रूप से तेज गति से विकास कर रहा है लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि समय रहते अगर हमने बढ़ते भ्रष्टाचार और गरीबी को नियंत्रित नहीं किया तो यह गति कायम नहीं रहनेवाली.अगर ऐसा हुआ तो हमसे ज्यादा दुर्भाग्यशाली कोई और नहीं होगा.हमारे गाँव में एक मंदबुद्धि का युवक था.लोग उसे बराबर चढ़ा-बढ़ा देते-यार तुम तो जन्मजात बहादुर हो.तुम चाहो तो क्या नहीं कर सकते.तुम चाहो हो आसानी से मुक्का मारकर जलते लालटेन को भी फोड़ सकते हो और वह व्यक्ति बहकावे में आकर अक्सर लालटेन को फोड़ डालता.आर्थिक नुकसान तो होता ही था बाद में डांट और मार पड़ती सो अलग.आज भारत के साथ भी ओबामा यही कर रहे हैं.हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हमारी सरकार उनके बहकावे में नहीं आएगी और कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाएगी जिससे हमारा दीर्घकालीन हित प्रभावित होता हो.मैं इस लेख का अंत अपने एक संस्मरण से करना चाहूँगा.उन दिनों मैं विद्यार्थी था.मुझे हर सप्ताह साथ में पढनेवाली किसी-न-किसी लड़की से एकतरफा प्यार हो जाता था और लगता था कि वह लड़की भी मुझे प्यार करती है.जब मैं इस बात का जिक्र अपने सहपाठी अनुज सदृश संतोष उरांव से करता तो वह कहता-क्या भैया आप भी!अच्छा हो कि कुत्ता पाल लीजिए,बिल्ली पाल लीजिए अगर फ़िर भी मन नहीं माने तो सूअर पाल लीजिए लेकिन कभी ग़लतफ़हमी नहीं पालिए.
रविवार, 7 नवंबर 2010
लाईन चरित मानस
वर्ष १८५९,दिन और समय मालूम नहीं,स्थान रंगून.भारत के निर्वासित शायर बादशाह बहादुर शाह ज़फर का मन व्याकुल है.वे अपनी जिंदगी का हिसाब-किताब करने में लगे हैं.धीरे-धीरे फिंजा में उनकी रेशमी आवाज गूंजती है-लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में, किसकी बनी है आलम-ए-नापायेदार में; उम्र-ए-दराज़ मांग के लाये थे चार दिन;दो आरजू में काट गए दो इंतज़ार में.कहते हैं इंतज़ार की घड़ियाँ लम्बी होती हैं.लेकिन हर किसी को कभी-न-कभी इंतज़ार करना पड़ता है.कभी ट्रेन के आने का तो कभी उसके जाने का,तो कभी पत्नी के चुप होने का,किसी को इंतज़ार रहता है माशूक की हामी का तो किसी को क़यामत (सुहागरात) के आने का.कोई अगर बुद्धिजीवी हुआ और साथ में समझदार भी तो उसे इंतज़ार रहता है देश की जनसंख्या के नियंत्रित होने का और नेताओं के सच्चे हो जाने का.निश्चित रूप से इनके इंतजार में भी काफी सब्र रखना पड़ता है लेकिन इंतज़ार की घड़ियाँ सबसे ज्यादा लम्बी और कष्टकारी तब लगती हैं जब हम लाईन में लगे हों और काफी पीछे हों.अगर आप पैसे वाले हैं तो लाईन में खड़े हुए बिना भी आपका काम हो सकता है लेकिन हम तो ठहरे आम आदमी.वर्षों पहले जब मैं महनार के अमरदीप सिनेमाघर में सिनेमा देखने गया तब मुझे पहली बार लाईन में खड़ा होना पड़ा.लेकिन तब टिकट खिड़की खुलने के साथ ही लाईन समाप्त हो जाती थी और शारीरिक बल का प्रदर्शन करके मुझे टिकट लेना पड़ता था.उन्हीं दिनों अख़बार में पढ़ा और फिल्मों में भी देखा कि महानगर मुम्बई में बस में चढ़ने के लिए लाईन में लगना पड़ता है.हंसी भी आई यार ये कैसे लोग हैं जो बस में चढ़ने के लिए लाईन में लगे हैं.अपन तो बस की सीढ़ी,गेट कुछ भी पकड़कर लटक जाते हैं और वो भी मुफ्त में.एक और जगह भी उन दिनों मेरा साबका लाईन से पड़ता था और वह जगह थी रेलवे स्टेशन.लेकिन लाईन छोटी हुआ करती थी.तब मैं कम दूरी की यात्रा ही करता था.लेकिन अब तो अनारक्षित टिकट खिडकियों पर भी लाईन बड़ी होने लगी है.शायद यह जनसंख्या बढ़ने का असर है या फ़िर लोगों ने ज्यादा यात्रा करनी शुरू कर दी है,या फ़िर दोनों का संयुक्त प्रभाव है.अभी इसी गर्मी का वाकया है.मैं अपने मित्र धीरज के तिलकोत्सव से वापस आ रहा था.छपरा स्टेशन पर पाया कि तीन काउंटरों पर टिकट काटा जा रहा है और तीनों पर कम-से-कम ३००-३०० लोग लाईन में खड़े हैं.लाईन देखकर दिल बैठने लगा.फ़िर मन में अपना पुराना डायलाग दोहराया-सोंचना क्या जो भी होगा देखा जाएगा.लाईन में लग गया यह सोंचते हुए कि अगर टिकट लेने से पहले ट्रेन आ जाती है तो टिकट लिए बिना ही यात्रा कर ली जाएगी.लेकिन खुदा के फजल से ट्रेन आने से चंद मिनट पहले टिकट मिल गया, हालांकि मैं पसीने में नहा चुका था.ये तो हुई बात उन लाईनों की जिनका लिंक से कुछ भी लेना-देना नहीं होता.असली परेशानी तो वहां होती है जहाँ आपका काम होने के लिए लिंक का होना आवश्यक होता है.मेरे साथ कई बार ऐसा हो चुका है और शायद आपका भी सामना हुआ हो.होता यूं है कि मैं किसी भी ए.टी.एम. पर २०-३० लोगों के पीछे लाईन में खड़ा हूँ.सूर्य देव पूरे गुस्से में हैं.लाईन में खड़े-खड़े एक घंटा या आधा घंटा बीत चुका है.भगवान की कृपा से मेरी बारी भी आ चुकी है लेकिन आलसी और लापरवाह बैंककर्मियों की कृपा से लिंक फेल हो जाता है.सारे किये धरे पर गरम पानी.कभी-कभी आप बैंक के भीतर ही लाईन में खड़े होते हैं और लिंक अंतर्धान हो जाता है और आपके पास सिवाय लाईन में खड़े होकर इंतजार करने के कोई उपाय नहीं होता.अभी कुछ ही महीने पहले महनार (वैशाली)में सेन्ट्रल बैंक को लिंक से जोड़ा गया.जनता खुश थी कि अब वह कहीं से भी पैसे की जमा-निकासी कर पाएगी.लेकिन १ महीने तक लिंक आँख मिचौली करता रहा.सैंकड़ों लोग रोजाना आते लाईन में खड़े होते और शाम ढलने के बाद खाली हाथ वापस चले जाते,सरकार और बैंक को मीठी-मीठी गालियाँ देते हुए.तब लाईन देखते ही उनके मन में लाचारी मिश्रित क्रोध उमड़ने-घुमरने लगता.कुछ ऐसा ही अनुभव प्राप्त करने का सुअवसर आपको तब प्राप्त हो सकता है जब आप रेलवे आरक्षण काउंटर पर घन्टे-भर लाईन में खड़े होते हैं और लिंक शरारत पर उतारू हो जाता है.मैंने अभी जिन संभावनाओं का जिक्र किया है उससे हम सबका सामना होता रहता है.वैसे आज के भारत में लाईन सर्वव्यापी सत्य है.आपको लाईन में लगने का सौभाग्य अस्पताल से श्मशान तक में कहीं भी प्राप्त हो सकता है.आपने शायद कभी हिसाब नहीं लगाया होगा कि आपका कितना समय लाईन में लगे-लगे गुजरता है यानी जन्म से मृत्यु तक हमारे जीवन का एक बड़ा भाग लाईन में लगे-लगे बीतता है.हम कभी नहीं चाहते कि लाईन में लगें लेकिन काम करवाने के लिए लगना ही पड़ता है.हम लाईन से भाग सकते हैं पर बच नहीं सकते.सिर्फ यमराज की कृपा आप पर हो जाए तभी आप लाईन से मुक्ति (मोक्ष) पा सकते हैं.आज अगर तुलसीदास होते तो क्या कर रहे होते कल्पना कीजिए.कहाँ खो गए?मैं बताता हूँ वे किसी लाईन में खड़े होकर या तो भगवान राम से लाईन से मुक्ति देने की प्रार्थना कर रहे होते या फ़िर लाईन चरित मानस लिख रहे होते.इस कमबख्त मोबाईल को भी अभी ही बजना था.पिछले एक घन्टे से ए.टी.एम.पर लाईन में हूँ और अब जब मेरी बारी आ गई है तब बॉस का फोन आ रहा है.समझ नहीं पा रहा फोन काटकर नौकरी जाने का खतरा उठाऊँ या फोन उठाकर फ़िर से एक घन्टे के लिए लाईन में खड़े होने की फजीहत झेलूं.लीजिये मैंने ये फोन कट कर दिया.
गुरुवार, 4 नवंबर 2010
मैं कांग्रेस हूँ

मैं कांग्रेस हूँ.मेरा जन्म २८ दिसंबर,१८८५ को तेजपाल संस्कृत विद्यालय,मुम्बई में हुआ.मेरे पिता एक अंग्रेज ए.ओ.ह्युम थे जो एक नौकरशाह थे.तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड डफरिन ने मेरे जन्म में अच्छी-खासी अभिरुचि ली थी.मेरी माता थी अंग्रेजों का भय कि देश में फ़िर से १८५७ जैसी क्रांति न भड़क उठे.उन्होंने मुझे इसलिए जन्म दिया ताकि उन्हें मालूम हो सके कि गुलाम भारत के लोग क्या चाहते हैं.मेरे जन्म के समय मात्र ७२ लोग मेरे परिवार में थे.लेकिन १८८८ आते-आते मेरे परिवार में इतने लोग जुड़ गए कि अंग्रेज डर गए और नौकरशाहों के मेरे अधिवेशन में शामिल होने पर रोक लगा दी गई.शुरू में मेरे परिवार के लोग डरे-सहमे थे और उनकी भाषा याचकों की भाषा थी.तब मैं भी बच्ची थी.२५ साल की तरुनाई आते-आते मेरे अन्दर इतना बल आ चुका था मैं अधिकार के साथ अंग्रेजों के समक्ष अपनी मांगे रख सकूँ.मेरे एक पुत्र तिलक ने तो अंग्रेजों से साफ-साफ कह दिया कि स्वाधीनता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा.मेरे चाचा दादा भाई नौरोजी ने अंग्रेजों की देश को लूटने की नीति को समझा और देशवासियों को भी समझाया.अंग्रेज मेरे बढती ताकत से डरने लगे और उन्होंने सांप्रदायिक कार्ड खेलना शुरू कर दिया.उनके ही इशारों पर १९०६ में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना की गई.उन्होंने बंगाल को भी सांप्रदायिक आधार पर १९०५ में बाँटना चाहा.मैंने पूरी ताकत से इस विभाजन का विरोध किया और उन्हें झुका भी दिया.लेकिन इसी बीच १९०७ में अंग्रेजों के बहकावे में आकर उदारवादियों ने कांग्रेस से अपने उग्रपंथी भाईयों को बाहर निकाल दिया.१९१५ तक मैं दो भागों में बँटी रही और कुछ खास नहीं कर सकी.१९१५ में मेरा सबसे महान बेटा मेरे परिवार में शामिल हुआ.उसका नाम था मोहन दास करमचंद गांधी.सत्य और अहिंसा उसके अस्त्र-शस्त्र थे.उसने मुझे शक्तिशाली बनाया लेकिन १९१६ में उसने लखनऊ में मुश्लिम लीग से समझौता कर उसे मान्यता भी प्रदान कर दी.१९२० में असहयोग आन्दोलन मेरे ही झंडे तले प्रारंभ किया गया.लेकिन इसके हिंसक हो जाने और मुस्लिम लीग द्वारा मुझे धोखा देने के कारण आन्दोलन वापस लेना पड़ा.१९२३ में मेरे परिवार के कुछ लोगों ने गांधी की सहमति से स्वराज पार्टी की स्थापना की और चुनावों में भाग लिया.उद्देश्य था केंद्रीय विधान सभा और प्रांतीय विधान परिषदों में घुसकर सरकार के कुत्सित इरादों को बेनकाब करना.बाद में इनमें से कई सत्ता सुख के लिए सरकार के सहयोगी बन गए.गांधी को मर्मान्तक पीड़ा हुई और उसने सविनय अवज्ञा आन्दोलन की घोषणा कर दी.हालांकि उसने इससे पहले अंग्रेजों से बातचीत का भी प्रयास किया.अंग्रेज आन्दोलन को मिल रहे व्यापक जनसमर्थन से डर गए और १६ अगस्त,१९३२ को सांप्रदायिक एवार्ड की घोषणा कर दी.उनका इरादा दलितों को बांकी हिन्दुओं से अलग करने का था.इससे पहले वे १९०९ में मुसलमानों को पृथक निर्वाचक मंडल के द्वारा हिन्दुओं से अलग करने का प्रयास कर चुके थे और इसमें उन्हें काफी सफलता भी मिली थी.गांधी उनकी चाल को समझ गया और अनशन पर बैठ गया.२५ सितम्बर,१९३२ को दलित नेता अम्बेदकर मान गए और पूना समझौता के द्वारा अंग्रेजों के इस कुत्सित प्रयास को निरस्त कर दिया गया.लेकिन अब गांधी की मेरे संगठन पर पकड़ कमजोर पड़ गई थी.निराश होकर उसने १९३४ में मेरी सदस्यता का परित्याग कर दिया.मेरे ऊपर अब नेहरु,प्रसाद और पटेल की तिकड़ी का शासन था.गांधी अब सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो गया.इसी बीच १९३७ के चुनावों में मुझे अपार सफलता हाथ लगी लेकिन नेहरु ने चुनाव हार चुकी लीग को शासन में भागीदारी नहीं देकर बहुत बड़ी गलती कर दी.जोश में गलती हो ही जाया करती है.लीग के नेता जिन्ना ने मेरे खिलाफ मुसलमानों को यह कहकर भड़काना शुरू कर दिया कि आजाद भारत में भी हिन्दू राज स्थापित हो जाएगा.२४ मार्च,१९४० को लाहौर में लीग ने पहली बार पाकिस्तान नाम के अलग देश की मांग की.उधर यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ चुका था.गांधी ने मेरे सामने भारत छोडो आन्दोलन छेड़ने का प्रस्ताव रखा.जब मेरे युवा पुत्रों ने आनाकानी की तो गांधी ने धमकी देते हुए कहा कि मैं साबरमती तट के बालू से कांग्रेस से भी बड़ा संगठन खड़ा कर दूंगा.गांधी कांग्रेस सरकारों में पनप रहे भ्रष्टाचार से भी क्षुब्ध थे.मेरी सभी सरकारों ने आन्दोलन की घोषणा के साथ ही इस्तीफा दे दिया.कुछ भागों को छोड़कर कुछ दिनों के लिए पूरे देश में अंग्रेजी शासन समाप्त हो गया.लेकिन अंग्रेज सोने का अंडा देनेवाली मुर्गी को आसानी से आज़ाद कैसे कर देते?पूरे देश में आन्दोलन को बन्दूक के बल पर दबा दिया गया.पूरा भारत एक जेलखाने में बदल गया.परिणामस्वरूप आन्दोलन कमजोर पड़ गया.अब लीग मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र से कम पर मानने को तैयार नहीं था.उसने १६ अगस्त,१९४६ को हिन्दुओं पर हमला शुरू कर दिया.पूरे देश में भीषण दंगे भड़क उठे.लाखों लोग मारे गए और गांधी को भी भरे मन से विभाजन के लिए तैयार होना पड़ा.मैं इसके लिए सिर्फ लीग को ही दोषी नहीं मानती १९१६ में गांधी और १९३७ में नेहरु द्वारा की गई गलतियाँ भी कम गंभीर नहीं थीं.१५ अगस्त को देश की आजादी का दिन निर्धारित हो गया.तब तक गांधी मेरे संगठन में उभर रही गलत प्रवृत्तियों से सशंकित हो चुके थे और इसलिए कि कोई जनता में मेरे प्रति बनी हुई सदाशयता बेजा लाभ नहीं उठाया जा सके उसने मेरी समाप्ति का प्रस्ताव रखा.लेकिन नेहरु,प्रसाद और पटेल चुनावों में मेरी स्वर्णिम योगदान से लाभ उठाना चाहते थे सो उन्होंने उनके आग्रह तो निष्ठुरता से ठुकरा दिया.चुनावों के बाद भी मेरी बागडोर नेहरु के हाथों में थी.उसने कश्मीर और तिब्बत में कई गलतियाँ की.उसने व्यापक पैमाने पर निर्माण कार्य कराया.ठेकेदारों के वारे-न्यारे हो गए.पूरे देश में भ्रष्टाचार पनपने लगा लेकिन अभी वह डरा-सहमा था.नेहरु एक स्वप्न-द्रष्टा था और सपने को सच मान लेने के कारण कश्मीर में एक के बाद एक कई गलतियाँ करता गया,१९६२ में उसे चीन के आगे मुंह की खानी पड़ी.१९६४ में उसके देहावसान के बाद नाटे कद का लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बना.गजब का जीवट था उसमें.सीमित साधनों से उसने १९६५ में पाकिस्तान को धूल चटा दी.तब मेरे संगठन में भ्रष्टाचार का घुन लगना शुरू तो हो गया था लेकिन स्थिति नियंत्रण में थी.१९५९ में जब जवाहरलाल नेहरु की बेटी इंदिरा गांधी जो घोर महत्वकांक्षी महिला थी मेरी अध्यक्ष बनी तब मैं इस आशंका से सिहर उठी कि मेरे ऊपर एक ही परिवार का वर्चस्व कायम हो जानेवाला तो नहीं है.लेकिन एक साल बाद ही आलोचनाओं से घबराकर नेहरु ने नीलम संजीव रेड्डी को मेरा अध्यक्ष बनवा दिया.१९६६ में मेरे ईमानदार पुत्र लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद में निधन हो गया.उसकी मृत्यु स्वाभाविक थी या हत्या आज तक रहस्यों के घेरे में है और शायद आगे भी रहेगी.इंदिरा को कांग्रेसी बेबी डौल समझ रहे थे और उन्हें लग रहा था कि इसके द्वारा उनका हित आसानी से सध सकेगा.इसलिए तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष कामराज समेत बहुमत ने इंदिरा का साथ दिया और इंदिरा मोरारजी भाई को पछाड़कर प्रधानमंत्री बन बैठी.अगले कुछ सालों में ही उसने तमाम तिकड़मों का इस्तेमाल कर पार्टी संगठन पर भी पकड़ मजबूत कर ली.उसकी तानाशाही प्रवृत्ति से नाराज होकर मेरे परिवार के कई लोग मुझसे अलग हो गए और मेरा विभाजन हो गया.इसी बीच उसने गरीबी हटाने के वादे के साथ १९७१ का चुनाव लड़ा जीत भी हासिल की.आज तलक कितनी सरकारें बदल गईं लेकिन यह नारा और वादा बना हुआ है.१९७१ में पाकिस्तान पर जीत के बाद वह पूरी तरह से निरंकुश हो गई.इस चुनाव में भारी पैमाने पर धांधली की गई थी और स्वयं इंदिरा गांधी के निर्वाचन पर भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मुकदमा चल रहा था.१२ जून,१९७५ को न्यायालय ने इंदिरा के खिलाफ निर्णय दिया जिससे वह घबरा गई और २६ जून,१९७५ को देश में आतंरिक आपातकाल लगा दिया गया.सारे मौलिक अधिकार निरस्त कर दिए गए और मानवाधिकारों की जमकर धज्जियाँ उडाई गई.ऐसे समय में मेरा ही एक वृद्ध बेटा बीमार रहने के बावजूद सामने आया देश के नवजात लोकतंत्र को बचाने के लिए जान की बाजी लगा दी.पूरे देश में आपातकाल का व्यापक विरोध हुआ.१९७७ में जब चुनाव हुए तो मुझे इंदिरा की गलतियों का खामियाजा भुगतना पड़ा और मैं पहली बार सत्ता से बाहर हो गई.अब मैं आजादी के पहले वाली कांग्रेस नहीं रह गई थी.मेरे नाम पर अनगिनत पाप किए जा रहे थे,देश को बेचा जा रहा था.१९८० में विपक्षी सरकार की गलतियों की वजह से मेरी सत्ता में वापसी हुई.लेकिन इंदिरा के रंग-ढंग में कोई खास बदलाव नहीं आया.१९८४ में अतीत में की गई गलतियों और पंजाब में भिन्दरवाले को दिए गए समर्थन के कारण इंदिरा की हत्या कर दी गई.लेकिन अब मेरे ऊपर उसके परिवार का वर्चस्व इतना ज्यादा बढ़ चुका था कि वह मेरा पर्याय बन गया था.यानी कांग्रेस मतलब गांधी-नेहरु परिवार.१९७५ में मेरे अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने कहा भी था कि इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया.३१ अक्तूबर,१९८४ को इंदिरा का बेटा प्रधानमंत्री बना और बाद में माँ की जगह अध्यक्ष भी.हत्या के समय इंदिरा मेरी अध्यक्ष भी थी.राजीव एक भोला-भाला इन्सान था.भारतीय राजनीति की उसे समझ ही नहीं थी.वह अपने चापलूसों के कहने पर चलने लगा और श्रीलंका में अपने ही देश से गए तमिल विद्रोहियों के खिलाफ सेना भेजने की गलती कर दी.उस पर भ्रष्टाचार सम्बन्धी भी कई आरोप लगे और १९८९ के चुनाव में मैं एक बार फ़िर सत्ता से बाहर हो गई.२ सालों तक मेरे विरोधियों ने किसी तरह शासन चलाया.१९९१ के मध्यावधि चुनाव के समय मेरी सत्ता में वापसी निश्चित लग रही थी.मैं बहुत खुश थी क्योंकि राजीव अब परिपक्व नेता की तरह व्यवहार कर रहे थे.लेकिन २१ मई,१९९१ को तमिल विद्रोहियों ने उसकी हत्या कर दी.पी.वी.नरसिंह राव मेरी जीत के बाद प्रधानमंत्री बना.वह एक अनुभवी और विद्वान नेता था लेकिन भ्रष्ट भी था.उसका ज्यादातर समय न्यायालय में भ्रष्टाचार के आरोपों का जवाब देने में गुजरता था.उसकी काली करतूतों के कारण मुझे एक बार फ़िर १९९६ में हार का सामना करना पड़ा और फ़िर से विपक्षी गठबंधन सत्ता में आ गया जिसे बाहर से मेरा ही समर्थन प्राप्त था.१९९८ में हुए मध्यावधि चुनाव करवाना पड़ा जिसमें फ़िर से मेरी हार हुई.अब भारतीय इतिहास में तीसरी बार बिना मेरे समर्थन के सरकार बनी.चुनाव के तत्काल बाद राजीव गांधी की विधवा सोनिया गांधी को मेरे तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी को अपमानित तरीके से हटाते हुए अध्यक्ष बना दिया गया.मेरे वरिष्ठ पुत्रों का मानना था कि बिना इंदिरा परिवार के नेतृत्व के मैं सत्ता में नहीं आ सकती.कितनी गलत सोंच थी!सत्ता काम के आधार पर भी मिल सकती है,नाम कोई जरुरी नहीं होता.विपक्षी एन.डी.ए. गठबंधन ने इस दौरान (१९९८-२००४) देश को शानदार नेतृत्व और शासन दिया.लेकिन उसके शासन में आम आदमी अपने को उपेक्षित महसूस करने लगा था.किसानों द्वारा आत्महत्या की ख़बरें सामने आने लगी थीं.सोनिया ने मौके को भुनाया और आम आदमी से आम आदमी की सरकार बनाने का आह्वान किया.२००४ में मेरी फ़िर से सत्ता में वापसी हुई.लेकिन इस बार सोनिया का उद्देश्य सिर्फ सत्ता में बने रहना था,देश हित से उसका कुछ भी लेना-देना नहीं था.देश में महंगाई बढ़ने लगी,भ्रष्टाचार चरम सीमा तक पहुँचने लगा.आज ६ सालों में मैं सत्ता में हूँ.मनमोहन सिंह नाम मात्र के प्रधानमंत्री बने हुए हैं.वास्तविक सत्ता सोनिया के हाथों में है.किसान अब भी आत्महत्या कर रहे हैं.गोदामों में अनाज सड़ रहे हैं और देश में अन्न-उत्पादन गिर रहा है.चपरासी से लेकर सचिव तक और वार्ड आयुक्त से लेकर मंत्री तक भ्रष्ट है और डंके की चोट पर भ्रष्ट है.मेरी सरकार के २००९ में दोबारा सत्ता सँभालने के बाद हर महीने कोई-न-कोई घोटाला सामने आ रहा है.हद तो यह है कि कोई मंत्री इस्तीफा भी नहीं दे रहा.उच्चतम न्यायालय को टिपण्णी करनी पड़ रही है कि ऐसे मंत्री को हटाया क्यों नहीं जा रहा?साथ ही उसने यह भी कहा है कि जब सरकार भ्रष्टाचार को रोकने का प्रयास नहीं कर रही तो इसे वैधानिक मान्यता क्यों नहीं दे देती?देश के एक तिहाई हिस्से पर लोकतंत्र विरोधी नक्सलियों ने कब्ज़ा कर लिया है.मेरे पुत्र नेहरु और राजीव द्वारा की गई गलतियाँ कश्मीर में नासूर बन गई हैं.अब फ़िर से इतिहास से सबक नहीं लेते हुए कश्मीर मे मेरी सरकार गलतियाँ करने पर आमादा है.मेरे भीतर अब आतंरिक लोकतंत्र भी नहीं रहा.सोनिया ही सारे फैसले ले रही है.२०२० तक देश को विकसित भारत बनाने का वाजपेयी का सपना पृष्ठभूमि में जा चुका है.अब तो मेरे घर के लोग २० सालों तक मेरे नाम पर सिर्फ सत्ता में बने रहने के प्रयास में लगे हैं.चीन से मेरे प्यारे देश को प्रतियोगिता का तो सामना करना पड़ ही रहा है,खतरा भी उत्पन्न हो गया है.कोई स्वतंत्र नीति अपनाने के बदले मेरी सरकार अमेरिका की गोद में जा बैठी है और भारत अमेरिका का ५१वां राज्य बनकर रह गया है.देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पुष्टि की जाने लगी है.मेरी अध्यक्ष पर भी वर्धा रैली के समय मुख्यमंत्री से पैसा लेने के आरोप लगे हैं.पार्टी फंड लबालब भरा हुआ है और पदाधिकारियों को महँगी गाड़ियाँ बांटी जा रही है.बिहार के चुनाव में जनता के बीच भी मेरे परिवार द्वारा पैसे बांटने के मामले सामने आ रहे हैं.देश रसातल की ओर जा रहा है और वह भी मेरे नेतृत्व में.मैं शर्मिंदा हूँ लेकिन मेरी कोई नहीं सुन रहा.काश आजादी के तत्काल बाद गांधी की सलाह पर अमल करते हुए मुझे मृत्यु-दान दे दिया गया होता!
सोमवार, 1 नवंबर 2010
बीमा कष्ट की विषय-वस्तु है

जीवन का कोई ठिकाना नहीं.कब क्या हो जाए कोई नहीं जानता.इसी अनिश्चितता ने जन्म दिया बीमा के व्यवसाय को.निश्चित रूप से बीमा कम्पनियों ने लाखों-करोड़ों घरों को उजड़ने से बचाया है.बीमा अच्छी चीज है इस पर तो विवाद हो भी नहीं सकता;लेकिन बीमा-एजेंटों की खुदगर्जी के चलते बीमा गले का फाँस भी बन सकती है.अचानक आपके घर कोई पूर्व परिचित व्यक्ति आ धमकता है.एक बड़ा-सा बैग लेकर और इतनी मीठी बातें करना शुरू करता है कि आप उसे अपना सबसे बड़ा शुभचिंतक मान बैठते हैं.आपके दिलों-दिमाग पर कब्ज़ा कर चुकने के बाद वह धीरे से आपके सामने बीमा करवाने का प्रस्ताव रख देता है.पहली बार में आप फँस गए तो ठीक नहीं तो वह आपसे विचार करने का आश्वासन लेकर चल देता है और जब दोबारा आता है तो १-२ किलोग्राम अपने खेत में उपजी गोभी,आलू या कोई अन्य खाद्य-सामग्री लेकर आता है.अब तो आपको फंसना ही है.आप कहते हैं कि मेरा बीमा कर दो तो वह आपको बच्चों का बीमा कराने से होनेवाले लाभों को गिनाने लगता है.आप भी मान लेते हैं कि इसी में आपका फायदा है लेकिन आपको यह पता नहीं होता कि इसमें आपसे ज्यादा उसका फायदा होने वाला है.बच्चा ज्यादा दिन तक जिएगा और एजेंट को ज्यादा दिनों तक बोनस/कमीशन प्राप्त होता रहेगा.यानी कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना.कभी-कभी एजेंट धार्मिक प्रवृत्ति का प्रदर्शन कर (बगुला भगत बनकर) भी आपको प्रभावित करने का प्रयास कर सकता है.जब तक तीन प्रीमियम जमा नहीं हो जाता तब तक हो सकता है वह पैसा जमा करने के लिए समय पर हाजिर हो जाए.तीन प्रीमियम तक उसे आपके द्वारा जमा राशि पर सीधे कमीशन प्राप्त होता है.कई बार हो सकता है कि एजेंट पहले प्रीमियम की राशि ही आपसे झटककर दुर्लभ हो जाए.अब आप आगे पैसा जमा करें या न करें आपकी बला से,उसे तो प्रथम जमा से १० से ४०% तक का कमीशन प्राप्त हो ही गया.एक बात और आप जब भी बीमा कराएँ सालाना ही कराएँ नहीं तो आपको प्रत्येक ३ या ६ महीने पर खुद एलआईसी कार्यालय जाने का दुर्भाग्य प्राप्त हो सकता है.कई बार ऐसा भी होता है कि जब तक आपसे और पॉलिसी मिलने की सम्भावना रहती है एजेंट आता रहता है और जैसे ही आपकी आर्थिक स्थिति ख़राब हुई गदहे की सिंग की तरह गायब हो जाता है.ये सिर्फ सुख के साथी होते हैं.दुःख की घड़ियों में कन्धा देने के बजाये पीठ दिखा जाते हैं.एक बार मेरा एक बीमा एजेंट कई बार समय देने के बाद ठीक ३१ मार्च को यानी वित्तीय वर्ष के अंतिम दिन हाजिर हुआ और भीड़ का हवाला देते हुए मुझे साथ चलने को कहा.उसके बाद जो हुआ उसे मैं याद तो नहीं करना चाहता लेकिन व्यापक जनहित में बताये देता हूँ.माशाल्लाह तब मैंने सचमुच का किशोर हुआ करता था अब सिर्फ नाम का रह गया हूँ.मुझे अपनी ताकत पर स्वाभाविक तौर पर अभिमान था.एक पंक्ति में चिपक गया.अब पंक्ति खिसकने का नाम ही नहीं ले रही थी.मेरे अलावा पंक्ति में खड़े सारे लोग एजेंट थे और थोक में रसीद कटवा रहे थे.दिन तो रोज ही ढलता था और आज भी ढलता है लेकिन उस दिन वक़्त गुजरने का नाम ही नहीं ले रहा था.सूरज जब अपनी समस्त प्रकाशराशि समेट कर जाने लगा तब जाकर मेरी बारी आई.घुटनों में जोश की जगह दर्द भर गया था और पेट में चूहे दंड पेलने लगे थे.किसी तरह जान बच सकी.कहाँ तो जीवन को जोखिम से बचाने के लिए बीमा कराया और कहाँ यही बीमा जान जाने का कारण बनते-बनते रह गई.तो श्रीमान अगर आपके घुटनों में दम हो तभी करवाईये बीमा.सरकार ने जनता की सुविधा को ध्यान में रखते हुए जगह-जगह संग्रह केंद्र खोल दिए हैं.लेकिन यहाँ भी खुद जमा करने जाने में कम परेशानी नहीं.हो सकता है आप जिस संग्रह केंद्र पर जमा करने जाएँ वहां का लिंक फेल हो.बार-बार जाने पर भी कैडबरी के विज्ञापन के पप्पू की तरह फेल ही मिले.इन परिस्थियों में आपको सब कामकाज छोड़कर कई-कई बार संग्रह केंद्र के चक्कर काटने पड़ सकते हैं.तब आप अपने आपको अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में फँसा हुआ महसूस करेंगे,ठीक मेरी तरह.हाथ तो डाल दिया अब निकालें कैसे?चिंता करने से कोई लाभ नहीं आयु के साथ-साथ आपकी बुद्धि भी क्षीण होगी और खुदा न करे मर-मरा गए तो आपको कुछ नहीं मिलेगा,परिवार मालामाल जरूर हो जाएगा.जैसे हर समस्या का समाधान होता है उसी तरह इसका भी समाधान है और वह है सरकार यानी केंद्र के हाथों में.केंद्र को चाहिए कि वह संशोधन करके ऐसा प्रावधान कर दे कि जिससे पोस्ट ऑफिस एजेंटों की तरह बीमा एजेंटों को भी तभी कमीशन या बोनस का लाभ मिले जब वो खुद जमा कराने जाएँ अन्यथा यह राशि ग्राहक को ही दे दी जाए,आखिर वह बेवजह घुटनों का दर्द जो सहता है.अभी तो भैया सीधे माल महाराज के मिर्जा खेले होली वाली स्थिति है.और अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकती तो उसे विज्ञापित कर यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि बीमा आग्रह की विषय-वस्तु है.बल्कि इसके बदले यह प्रसारित/प्रकाशित करना चाहिए कि बीमा कष्ट की विषय-वस्तु है.
शनिवार, 30 अक्टूबर 2010
भारत में लोकतंत्र नहीं भ्रष्टतंत्र

अमेरिका के १६वें राष्ट्रपति और दुनिया के सार्वकालिक महान नेताओं में से एक अब्राहम लिंकन ने प्रजातंत्र की सबसे प्रसिद्ध परिभाषा देते हुए कहा था कि प्रजातंत्र जनता का,जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन है.शायद अमेरिका में आज भी प्रजातंत्र लिंकन के इन मानदंडों पर खरा है.लेकिन दुनिया के अधिकतर विकासशील देशों में प्रजातंत्र का मतलब वह नहीं रह गया है जो लिंकन के लिए था.भारतीय संविधान सभा ने बहुत ही सोंच-समझकर ब्रिटिश मॉडल की नक़ल करते हुए संसदीय प्रजातंत्र को अपनाया था और मान लिया था कि जिस तरह यह प्रयोग इंग्लैंड में सफल रहा उसी तरह भारत में भी सफल रहेगा.लेकिन वो कहावत है न कि नक़ल के लिए भी अक्ल चाहिए.दूसरे आम चुनाव में ही मतदान केन्द्रों पर कब्जे की घटनाएँ सामने आने लगीं.चुनावों में धन का दुरुपयोग भी होने लगा.विधायिका जो संसदीय लोकतंत्र में सर्वोपरि होती है में भ्रष्ट और आपराधिक पृष्ठभूमिवाले प्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढती गई.अब जब रक्षक ही भक्षक हो गए तो समाज का नैतिक पतन तो होना ही था.श्रीकृष्ण ने गीता में कहा भी है कि समाज अपने संचालकों और समर्थ लोगों का अनुकरण करता है.आज स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक को कहना पड़ रहा है कि जब सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना चाहती ही नहीं तो क्यों नहीं इसे वैधानिक स्वीकृति दे देती?प्रत्येक कार्यालय में क्यों नहीं रिश्वत का रेट लिस्ट लगा दिया जाता जैसे भोजनालयों में रोटी-भात के दर की सूची लगी होती है?सच्चाई से भागने से क्या लाभ?इससे जनता की परेशानी भी कम हो जाएगी.सर्वोच्च न्यायालय की सलाह पर निश्चित रूप से अमल किए जाने की जरुरत है.आप सड़कों पर किसी भी आदमी से बात करके देख लीजिए हर कोई यही कहेगा कि बिना पैसा दिए कार्यालयों से कोई काम नहीं कराया जा सकता.हमारा पूरा तंत्र जनता की सेवा के लिए नहीं बल्कि जनता से रिश्वत (लेवी) की उगाही के लिए है.दुनिया के सभी देशों में पारदर्शिता का स्तर बताने वाली सूची में हमारा देश पिछले साल ८४वें स्थान पर था इस साल ३ स्थान लुढ़ककर ८७वें स्थान पर पहुँच गया है.वैसे यह संतोष की बात है कि हमसे नीचे भी कई देश हैं और अभी सूची में हमारे और नीचे खिसकने की गुंजाईश बची हुई है.वास्तविक प्रजातंत्र शक्तियों के विकेंद्रीकरण से आता है लेकिन हमारे यहाँ संविधान के ७३वें और ७४वें संशोधन के माध्यम से शक्तियों का ही विकेंद्रीकरण नहीं किया गया बल्कि बड़े ही धूम से भ्रष्टाचार का भी विकेंद्रीकरण किया गया.कोई पश्चिमी देश होता तो भ्रष्टाचार का मामला उजागर होते ही राजनेताओं का राजनैतिक जीवन ही समाप्त हो जाता लेकिन हमारे यहाँ राजनीतिज्ञ अपने राजनैतिक कैरियर की शुरुआत ही भ्रष्टाचार से करते हैं.पहले उल्टे-सीधे किसी भी तरीके से टिकट और वोट खरीदने लायक पैसा जमा किया जाता है,तब जाकर चुनाव लड़ने का अवसर प्राप्त होता है.अगर विधायक का चुनाव लड़ना है तो कम-से-कम १ करोड़ तो चाहिए ही,संसाद बनने के लिए और भी ज्यादा.चुनाव आयोग उम्मीदवारों का बैंकों में खाता खुलवाता है और यह झूठी उम्मीद करता है कि उम्मीदवार इसी खाते में से खर्च करेगा.ऐसा भी नहीं है आयोग को असलियत नहीं पता लेकिन वह कुछ नहीं कर सकता क्योंकि उनकी नियुक्ति केंद्र सरकार के हाथों में होती है.चुनाव जीतने के बाद शुरू होता है वन-टू का फोर का खेल.अगर कर्नाटक और झारखण्ड की तरह विधानसभा त्रिशंकु हो गई तो और भी पौ-बारह.फ़िर मंत्री-मुख्यमंत्री बनकर राज्य के खजाने पर भ्रष्टाचार का (मधु) कोड़ा जमकर चलाया जाता है.जब राजा ही चोर-लुटेरा हो जाएगा तो उसके अधिकारी-कर्मचारी तो यमराज हो ही जाएँगे और इस तरह तंत्र शासन का नहीं शोषण का माध्यम बन जाता है.चपरासी से लेकर सचिव तक और वार्ड आयुक्त से से लेकर मंत्री तक सभी हमारे देश में भ्रष्ट हो चुके हैं.यदि कोई सत्येन्द्र दूबे की श्रेणी का सिरफिरा ईमानदारी की खुजली से ग्रस्त व्यक्ति तंत्र में घुस भी आता है तो उसे किनारे हो जाना पड़ता है नहीं तो हमारा तंत्र बड़ी आसानी से उसे दुनिया से ही कल्टी कर देता है हमेशा के लिए.अगर अर्थशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो हमारे देश में अमीरों का,अमीरों के लिए,अमीरों के द्वारा गरीबों पर शासन है.गरीबों को बार-बार यह भुलावा जरूर दिया जा रहा है कि अंततः शासन की बागडोर आपके ही हाथों में है.इसी तरह अगर हम राजनीति शास्त्र के दृष्टिकोण से लिंकन की उपरोक्त परिभाषा को मद्देनजर रखते हुए वर्तमान भारत पर विचार करें तो भारत में भ्रष्टों का,भ्रष्टों के द्वारा और भ्रष्टों के लिए शासन है.हमारे यहाँ एक सर्वथा नई शासन-प्रणाली है जिसे हम संसदीय भाषा में भ्रष्टतंत्र कह सकते हैं.लगभग सबका ईमान बिकाऊ है सिर्फ सही कीमत देनेवाला चाहिए.यह मैं ही नहीं कह रहा बल्कि हमारे लिए सबसे बड़े शर्म की बात तो यह है कि माननीय उच्चतम न्यायालय का भी यही मानना है.तालियाँ.
बुधवार, 20 अक्टूबर 2010
खतरे में मानवता,करो या मरो

बात ८० के दशक की है.तब मैं मिडिल स्कूल में पढता था.मेरा स्कूल मेरे गाँव से ३ किलोमीटर की दूरी पर था.रास्ते में कई घरों पर गेरूए रंग से लिखा हुआ था:-कलियुग जाएगा,सतयुग आएगा,जय गुरुदेव.मैं सोंचता क्या सचमुच निकट भविष्य में ऐसा होनेवाला है?कब आएगा और कैसा होगा सतयुग?मैं अकसर सतयुग की कल्पनाओं में खो जाता.फ़िर वक़्त आया १९९७-९८ का.पूरी दुनिया में नास्त्रेदमस की ३०० साल पहले की गई भविष्यवाणियों की चर्चा थी.दावे किए जा रहे थे कि अब तक इस फ़्रांसिसी की कोई भी भविष्यवाणी गलत साबित नहीं हुई है इसलिए वर्ष २००० में दुनिया का अंत निश्चित है.संयोग से उस समय मेरा मन भी दुनिया से कुछ उचटा हुआ था.परिणाम यह हुआ कि मैंने भी इस अफवाह पर विश्वास कर लिया और पढाई छोड़ी तो नहीं, कम जरुर कर दी.जब दुनिया समाप्त ही होनी है तो पढ़कर क्या फायदा?वर्ष २००० आया भी और गया भी.लेकिन प्रलय का कहीं अता-पता नहीं था.अभी पिछले कुछ दिनों से अन्धविश्वास बढ़ाने के लिए विख्यात कई टी.वी. चैनलों पर सदियों पहले नष्ट हो चुकी माया सभ्यता के हवाले से यह भविष्यवाणी प्रसारित की जा रही है कि २०१२ दुनिया के लिए अंतिम साल साबित होने जा रहा है.हालांकि यह भी वक़्त आने पर एक अफवाह ही सिद्ध होगी.क्योंकि इस तरह की किसी भी भविष्यवाणी का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है.लेकिन इसका यह मतलब हरगिज नहीं कि हम धरती पर पूरी तरह सुरक्षित हैं.क्योंकि इन भविष्यवाणियों के साथ-साथ दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में से एक स्टीफन हॉकिंग ने भी कुछ कहा है जिसे हम कोरी भविष्यवाणी की श्रेणी में नहीं रख सकते.क्योंकि यह एक महान वैज्ञानिक द्वारा दी गई चेतावनी है और इसलिए इसका वैज्ञानिक आधार भी है.उन्होंने आशंका व्यक्त की है कि अगले दो सौ सालों में धरती इंसानों के रहने लायक नहीं रह जाएगी.चेतावनी में दो तरह के खतरों की बात की गई है.उनके अनुसार मानवता को परग्रहवासी एलियंस,क्षुद्र ग्रहों और धूमकेतुओं से खतरा है.उनका मानना है कि धरती से बाहर भी जीवन है क्योंकि जीवन उबलते पानी और जमी हुई बर्फ में भी संभव है,यह प्रमाणित भी हो चुका है.इन खतरों को हम अन्तरिक्षीय खतरों की श्रेणी में रख सकते हैं.इन पर मानव का कोई नियंत्रण भी नहीं है इसलिए इन पर विस्तार से विचार करने का कोई मतलब नहीं.दूसरी तरह के खतरे वे हैं जिन्हें हम मानवों ने खुद ही पैदा किया है.इनमें बढती जनसंख्या,घटते संसाधन,पर्यावरणीय विनाश,जलवायु परिवर्तन,भूमंडलीय ताप-वृद्धि और परमाणु बम शामिल हैं.जिस रफ़्तार में धरती पर मानवों की तादाद बढ़ रही है वह निकट भविष्य में मानवों के लिए ही नुकसानदेह साबित होनेवाली है.प्रत्येक २०-३० सालों में १ अरब लोग बढ़ जा रहे हैं.इनके लिए भोजन तो चाहिए ही,रहने के लिए आवास भी चाहिए.आवास के लिए उपजाऊ जमीन में घर बनाये जा रहे हैं.अब अगर कृषि-भूमि कम होगी तो खाद्यान्न भी कम पैदा होगा.कितना भीषण दुष्चक्र है?एक तरफ जनसंख्या सुरसा के मुंह की तरह बढ़ी जा रही है तो दूसरी ओर अनाज-उत्पादन कम होता जा रहा है.पूरी दुनिया में इस समय जो अनाजों के दाम चढ़े हुए हैं वह इसी दुष्चक्र का दुष्परिणाम है.हम जानते हैं कि धरती पर उपलब्ध जल में से सिर्फ ३ प्रतिशत हमारे काम के लायक है.आदमी बढ़ रहे हैं लेकिन पानी की मात्रा तो सीमित है.धीरे-धीरे इस शताब्दी के अंत तक स्थितियां ऎसी हो जानेवाली हैं कि पीने के लिए भी पानी पूरा नहीं पड़ेगा फ़िर खेती के लिए कहाँ से आएगा?आदमी बसने के लिए धड़ल्ले-से पेड़ काट रहा है.एक घर बनाने के लिए औसतन ३ पेड़ काटे जा रहे हैं.आदमी एक साल में जितने ऑक्सीजन का उपयोग कर जाता है उतना ऑक्सिजन बनाने के लिए ४ पेड़ चाहिए.लेकिन यहाँ तो स्थितियां उल्टी है.हम पेड़ लगाने के बदले काट रहे हैं.धीरे-धीरे धरती पर ऑक्सीजन भी कम होता जाएगा और वह दिन भी आएगा जब धरती मानवों के रहने लायक रह ही नहीं जाएगी.हमने पारंपरिक खेती को छोड़कर बहुत बड़ी गलती की है.रासायनिक खादों और कीटनाशकों के प्रयोग से अन्न-पानी दूषित हो गए हैं जिससे मधुमेह और रक्तचाप जैसी बीमारियाँ आम हो गई है.इतना ही नहीं भूमि का तात्विक संतुलन भी बिगाड़ गया है जिससे जमीन ऊसर होने लगी है.निकट भविष्य में धरती से कोयला और खनिज तेल भी समाप्त होनेवाला है.बांकी खनिज-अयस्कों के साथ भी यही होनेवाला है.भगवान न करें अगर तीसरे विश्वयुद्ध की नौबत आई तो दो सौ साल से पहले भी मानवता समाप्त हो सकती है.क्योंकि धरती पर जितने परमाणु बम उपलब्ध हैं वे धरती को एक बार तो क्या कई बार विनष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं.खतरों की सूची में अगला नाम है धरती की ताप-वृद्धि और उसके कारण होनेवाले जलवायु परिवर्तन का.धरती लगातार गरम हो रही है.इस साल तो वैश्विक औसत तापमान के सामान्य १५ डिग्री सेंटीग्रेड से डेढ़ डिग्री ऊपर हो जाने का अनुमान है.अगर ताप-वृद्धि की यही रफ़्तार रही तो वह दिन दूर नहीं जब हम घर में बैठे-बैठे उबल जाएँगे.रेगिस्तान में बाढ़ आएगी और चेरापूंजी रेगिस्तान बन जाएगा.पूरी कृषि विनष्ट हो जाएगी.गंगा और अन्य हिमालीय नदियाँ सरस्वती की तरह विलुप्त हो जाएंगी.वैज्ञानिक अनुसंधानों से पता चला है कि पहले इंसान के आनुवांशिक कोड में जो आक्रामक प्रवृत्तियां थी,वे अब नहीं है.यानी अब इन्सान का खुद को बदलती प्राकृतिक स्थितियों के अनुसार ढाल पाना संभव नहीं है.हौन्किंग साहब की चेतावनी से पूरी तरह निराश होने की जरुरत नहीं है.ऐसा करने से कुछ नहीं हासिल होनेवाला.जो हमारे हाथों में है वह तो हम कर ही सकते हैं.जनसंख्या नियंत्रण,जैविक कृषि,वृक्षारोपण,परमाणु बमों की समाप्ति,पारंपरिक जल-संरक्षण विधियों को अपनाना,प्लास्टिक के प्रयोग पर पूर्ण प्रतिबन्ध,बिजली की बचत,उद्योगों को एको-फ्रेंडली बनना और नवीकरणीय बिजली-उत्पादन आदि कई कदम उठाये जा सकते हैं.लेकिन क्या हम ऐसा करेंगे?करेंगे तो बचेंगे,नहीं तो प्रलय दूर नहीं.
सोमवार, 18 अक्टूबर 2010
समय के साथ बदलता एक गाँव-भाग एक

मेरा जन्म ७० के दशक के उत्तरार्द्ध में बिहार के वैशाली जिले के एक मध्यमवर्गीय राजपूत परिवार में हुआ.मेरा परिवार उस समय मेरे ननिहाल में रहता था.पिताजी पास के ही गाँव में एक प्राईवेट कॉलेज में अवैतनिक व्याख्याता थे.हमारी आर्थिक स्थिति इतनी ख़राब थी कि मेरे जन्म से समय माँ को एक ग्राम भी दूध के दर्शन नहीं हुए.काफी समय तक,जब तक मैं ६-७ साल का नहीं हो गया मुझे यह पता नहीं था कि हमारा समाज जातियों में विभाजित है.तब तक मेरी गतिविधियाँ ज्यादातर अपनी ही जाति के बच्चों तक ही सीमित थी.बीच-बीच में जब बगल के गाँव से डोमिन सूप-टोकरी लेकर आती तब जरूर मुझे उसके स्पर्श से बचने के लिए सचेत किया जाता.मैंने उस अस्पृश्य वृद्धा को अपने छोटे नाना के श्राद्ध में जूठे पत्तलों में से खाद्य-सामग्री इकठ्ठा करते भी देखा और दुखी हुआ.कितनी विचित्र प्रथा थी यह वह महिला अन्य लोगों के साथ बैठकर भोजन भी नहीं कर सकती थी और उसे भोज-भात में जब अच्छे भोजन के मौके आते थे बांकी जातियों की जूठन खानी पड़ती थी.बाद में मुझे बताया गया कि जब मैं नवजात था तो ग्रह-दोष-निवारण के लिए उसे मुझे स्तनपान कराने का अवसर भी दिया गया था.गाँव में राजपूतों के अलावा ब्राह्मण,चमार,मल्लाह,हज्जाम,दुसाध,धोबी,कानू,कहार और कुम्हार थे.मेरी नानी राजपूतों के बीच बड़की माई के नाम से जानी जाती थी.मेरे नाना भाइयों में सबसे बड़े थे.उनका देहांत मेरे जन्म से पहले ही हो गया था.मामा नहीं थे और चचेरे मामा नानी को वक़्त-वेवक्त पीटते रहते इसलिए हमें यहीं रह जाना पड़ा.आज भी मैं इसे ही अपना गाँव कहता हूँ.नानी लगभग रोज चूहेदानी में रोटी लगाती और जगह बदल-बदल रख देती.कभी-कभी चूहे फंस भी जाते.रोजाना एक बार कुम्हार पंडित की वृद्धा पत्नी नानी से मिलने आती.नानी उसे कभी रोटी तो कभी भात खाने और घर ले जाने के लिए देती और जब चूहे पकड़े जाते तो चूहे भी दे देती.मैंने जब नानी से पूछा कि ये लोग चूहे का क्या करेंगे तो उसने बताया कि पका कर खा जाएँगे.साथ ही यह भी बताया कि मेरे एक चचेरे नाना भी चूहा खाते हैं.मेरा मन घृणा से भर गया था छिः चूहे भी कोई खाने की चीज हैं.मेरी नानी के रैयतों में एक की दृष्टि युवावस्था में ही चली गई थी.अब उनकी उम्र यही कोई ७० की होगी .वे जाति के चमार थे.रोज हमारे दरवाजे पर आते.उनका दोपहर का भोजन हमारे यहाँ ही होता.नानी कहती रैयत-प्रजा है यहाँ नहीं आएगा तो कहाँ जाएगा?भोजन के बाद सूरदास निर्गुण सुनाते.बड़ा ही मीठा स्वर था उनका.वे कभी 'सिया ओढले चदरिया राम नाम के' तो कभी 'चलु-चलु सखिया यशोदा जी के बगिया,बगिया में झुलुआ लगवले बानी' गाते तो सारा वातावरण भक्तिमय हो गाता.हम अक्सर उनकी लाठी पकड़ उन्हें घर छोड़ आते.नानी उन्हें प्यार से फूल (कांसे) के बर्तन में घर ले जाने के लिए खाना देती जैसे कोई माँ बेटे को देता है.जब बरतन वापस आता तो उसका शुद्धिकरण संस्कार भी करती आग में तपाकर,उपले की लाल आग में और मान लेती कि बरतन से सारा स्पर्श दोष निकाल गया है और वह शुद्ध है पहले की तरह.
शनिवार, 16 अक्टूबर 2010
आईये हम अपने भीतर के रावण को मारें

राम और रावण भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित चरित्र रहे हैं.कल विजयादशमी है और इस अवसर पर हम प्रत्येक वर्ष प्रतीकात्मक रावण वध करते हैं.लेकिन क्या हमारे ऐसा करने से समाज से आसुरी शक्तियों का विनाश हो गया है?अगर रावण सिर्फ एक व्यक्ति होता तो उसका विनाश तो त्रेता में ही हो गया था.लेकिन रावण न तो व्यक्ति था और न ही एक पुतला है.रावण तो एक प्रतीक है आसुरी शक्तियों का,जिस प्रकार राम दैवी (सात्विक) शक्तियों के प्रतीक हैं.राम जहाँ एकपत्नीव्रता हैं वहीँ रावण इन्द्रिय सुख के लिए परस्त्री के हरण से भी नहीं चूकता.रावण सत्ता के लिए भाई पर पद-प्रहार करता है तो राम भाई के लिए सत्ता को ठुकरा कर वनगमन कर जाते हैं.राम अपनी विनम्रता के लिए जाने जाते हैं वहीँ रावण घमंड की पराकाष्ठा है.राम और रावण दोनों महायोद्धा हैं,शस्त्र-संचालन में पारंगत.दोनों महाशक्ति हैं.लेकिन राम की शक्ति जगत-कल्याण के लिए है तो रावण की शक्ति परपीड़ा के निमित्त.रावण विद्वान है,लेकिन इस विद्या से उसमें विनय के बदले अभिमान ही बढ़ता है और अभिमान तो सभी विनाशों का मूल है.राम की विद्या परोपकारी है तो रावण की विद्या परपीड़क.राम और रावण दोनों शिवभक्त हैं.एक की भक्ति सात्विक है तो दूसरे की हठधर्मिता वाली.रावण भक्ति में भी शक्ति-प्रदर्शन का समर्थक है.वह आराधना के समय भी अभिमान का परित्याग नहीं करता ईधर राम में तो अभिमान है ही नहीं.वो तो शत्रुओं का भी आदर करते हैं.राम को त्याग में ख़ुशी मिलती है वहीँ रावण को छीनने में.राम का मार्ग सन्मार्ग है,नैतिकता का मार्ग है;जबकि रावण के लिए साधन की पवित्रता आवश्यक नहीं उसके लिए तो सिर्फ साध्य की प्राप्ति ही अभीष्ठ है.रावण त्रेता में भी आसानी से नहीं मारा था.राम ने जितनी बार उसके सिर काटे वह पुनर्जीवित होता रहा.इसलिए हमें भी अपने भीतर के रावण को अगर मारना है तो उसके उद्गम स्थल यानी नाभि-कुंड पर प्रहार करना पड़ेगा.राम वाले पक्ष यानी सद्गुणों का पलड़ा भारी करना पड़ेगा,रावण खुद ही हार जायेगा और हमारे तन-मन से बाहर निकलने को बाध्य हो जायेगा.तो आप तैयार हैं न अपने भीतर के रावण को मारने के लिए!
गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010
टेढ़े-मेढ़े रास्ते और मंजिल तेरी दूर
राष्ट्रमंडल खेल का समापन समारोह शुरू है.सभी पदकों का फैसला हो चुका है और भारत कुल मिलाकर दूसरे स्थान पर रहा है कुल ३८ स्वर्ण पदकों के साथ. ऐसा पहली बार हुआ है इसलिए खुश हुआ जा सकता है.लेकिन यदि हम २ करोड़ जनसंख्या वाले आस्ट्रेलिया के प्रदर्शन को देखें या तुलना करें तो प्रदर्शन संतोषजनक नहीं कहा जा सकता.उसके पदक हमसे दोगुने से भी ज्यादा हैं.हमारी जनसंख्या १२० करोड़ के लगभग है और हमसे ज्यादा जनसंख्या वाला एकमात्र देश चीन खेलों के मामले हमसे मीलों आगे निकाल चुका है.जबकि १९७० के दशक तक चीन खेलों की दुनिया में हमारा समकक्षी था.हमने इस बार एक मिथक को जरूर तोड़ा है कि साबित किया है कि हम जेनेटिकली कमजोर नहीं हैं और एथलेटिक्स में पदक जीतना हमारे वश में है.हमने न सिर्फ एथलेटिक्स बल्कि भारोत्तोलन और जिम्नास्टिक में भी पदक जीते हैं.शूटिंग,कुश्ती,बैडमिंटन,टेनिस और मुक्केबाजी में तो पहले से भी पदक जीतने की उम्मीदें जतायी जा रही थीं.हालांकि आज हॉकी के फाइनल में हमारी विश्व चैम्पियन आस्ट्रेलिया के हाथों ८-० की हार से हमें निराशा भी हुई है और यह निराशा इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि हमारी टीम ने मैच जीतने की बिलकुल भी कोशिश नहीं की.अगर हम इस मैच को अपवाद मान लें तो हमारे सभी खिलाड़ियों ने सभी खेलों में जिस दमखम और उससे भी ज्यादा जिस मनोबल का परिचय दिया वह भविष्य के लिए आशाओं को तो जगाता ही है.१९८२ के दिल्ली एशियाड में चीन ने पहली बार दिखाया कि खेलों की तैयारी कैसे की जाती है और फ़िर २००८ के बीजिंग ओलम्पिक में तो उसके सामने अमेरिका को भी नतमस्तक होना पड़ा.इन २६ सालों में हम भी यह कर सकते थे यदि देश में खेल-संस्कृति को बढ़ावा दिया गया होता.अगर खेल मंत्रालय और भारतीय ओलम्पिक असोशिएशन में तालमेल होता.अगर हम इस प्रतियोगिता में पदक जीतनेवाले अपने खिलाड़ियों की पृष्ठभूमि को देखें तो हमारे आधे खिलाड़ी गरीब परिवारों से हैं या फ़िर गांवों या छोटे शहरों से हैं.खेलों में बड़े परिवारों के लड़कों को भी आगे लाना होगा और वे इस क्षेत्र में तभी आयेंगे जब उन्हें इस बात के लिए आश्वस्त किया जाए कि उनका आर्थिक भविष्य सुरक्षित रहेगा.ऐसा करना असंभव भी नहीं है क्योंकि हम दुनिया की दूसरी सबसे तेज गति से विकास कर रही अर्थव्यवस्था हैं इसलिए पैसों की कोई कमी नहीं,कमी है तो सिर्फ मनोबल की.खेलों के विकास के लिए राष्ट्रीय खेलों का समय पर आयोजन होना भी जरुरी है.२००७ में ही झारखण्ड में इनका आयोजन होना था लेकिन अब तक नहीं हो पाया और अगले खेलों का समय भी आ गया. इस तरह की लापरवाही खेलों के लिए अच्छी नहीं.साथ ही इन राष्ट्रीय खेलों में जो रहने के और अन्य इंतजाम किये जाएँ वे विश्वस्तरीय हों क्योंकि प्रदर्शन का सीधा सम्बन्ध सुविधाओं से होता है.हम देखते हैं कि राजनीति में बराबर खेल जारी रहता है,सत्ता के लिए.लेकिन हमारी राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे से खेल पूरी तरह गायब है.इस स्थिति को भी बदलना होगा और राजनीतिक पार्टियों को अपने घोषणापत्रों में बताना होगा कि उनके पास खेलों के लिए क्या योजनायें हैं?वर्तमान संतोषजनक भले ही नहीं हो भविष्य जरूर शानदार हो सकता है आखिर हम दुनिया के सबसे युवा देश हैं.
वोटों के लुटेरों से सावधान
बिहारी मतदाताओं,हमारे राज्य में प्रथम चरण के मतदान में अब कुछ ही दिन शेष हैं.नेताओं का आपके दरवाजों पर आना जारी होगा.आप यथार्थ शुभचिंतकों और वोटों के लुटेरों में फर्क करिए अन्यथा आप फ़िर से लूटे जायेंगे और चुनाव-दर-चुनाव यह सिलसिला चलता रहेगा.जिस तरह एक-एक ईंट के जुड़ने से घर बनता है और निर्माण की मजबूती ईटों की गुणवत्ता पर निर्भर करता है, उसी तरह हमारा राज्य कैसा होगा यह हम मतदाताओं के निर्णय पर निर्भर करता है.हमारा राज्य इसलिए गरीब नहीं है क्योंकि इसके पास पैसा नहीं है बल्कि राज्य की स्थितियां कहीं-न-कहीं हमारे द्वारा जनप्रतिनिधियों के चयन पर प्रश्न चिन्ह लगाती है.भूतकाल में हम मतदाताओं ने जो गलतियाँ की हैं वर्तमान उसी का प्रतिफल है और उसी प्रकार राज्य का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम इस चुनाव में कितनी बुद्धिमानी से वोट डालते हैं.वैसे आप खुद भी सही-गलत उम्मीदवारों में फर्क कर सकते हैं लेकिन मैं भी इस मामले में आपकी सहायता करना चाहूँगा.सबसे पहले तो आप यह देखें कि उम्मीदवार आपराधिक प्रवृत्ति का तो नहीं है.अगर ऐसा हो तो हरगिज ऐसे व्यक्ति को मत न दें.अगर ऐसा आदमी आपका विधायक बन जाता है तो आप खुद अपनी समस्याओं को उसके पास ले जाने से डरेंगे और क्षेत्र का विकास नहीं हो पायेगा.फ़िर आप उम्मीदवार की शैक्षिक योग्यता देखें.उसके बाद आपको यह देखना चाहिए कि उम्मीदवार के बारे में उसके गाँव के लोगों की क्या राय है.क्या वह ईमानदार है या झूठा-बेईमान है?कहीं उसने गलत तरीके से धन-संपत्ति अर्जित तो नहीं किया है.अगर ऐसा हो तो ऐसे व्यक्ति को हरगिज वोट न दें.नहीं तो वह निश्चित रूप से भविष्य में सार्वजनिक राशि का गबन करेगा और उसे वोट देकर आप भी उसके पापों में भागीदार बन जायेंगे.कई उम्मीदवार और नेता आपको जाति-धर्म के नाम पर बरगलाने का प्रयास भी करेंगे.आप सिर्फ गुण-दोष के आधार पर वोट दीजिए और भावनात्मक बहकावे में नहीं आएं.कई बार आपके वोट को पैसों या शराब या कोई अन्य वस्तु की रिश्वत देकर खरीदने की कोशिश भी की जाती है.मत दान करने की वस्तु है न कि बेचने की.अगर आप इसे बेच देते हैं तब आप आपके मत से विजयी होनेवाले उम्मीदवार के दुष्कृत्यों पर ऊंगली उठाने का नैतिक अधिकार खो देते हैं.अगर आपको किसी भी तरीके से वोट डालने से रोका जाता है तो उसका विरोध करें और चुनाव पर्यवेक्षकों को इसकी सूचना दें.वोट देना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है और अपने इस अधिकार की यथासंभव रक्षा करें.अपने विवेक का इस्तेमाल करें और बुद्धिमानी से मतदान का प्रयोग करें.
बुधवार, 13 अक्टूबर 2010
लौट के बुद्धू घर को आए
कल वह उससे मिला एक लम्बे अरसे के बाद.वैसे एक महीने का वक़्त कोई ज्यादा नहीं होता लेकिन फ़िर भी यह समय एक युग कम भी तो नहीं था उसके लिए.वह उसके भीतर ही तो रहता था पर मुलाकात नहीं होती थी.वह कोई और नहीं था उसकी अंतरात्मा थी,उसका सच्चा स्वरुप.वर्ष २००२ में जब वह पहली बार दिल्ली गया तो यह देखर आश्चर्यचकित हुआ था कि कैसे एक ही कमरे में रहनेवाले दिन और रात की अलग-अलग शिफ्टों में काम करनेवाले लोगों में महीनों मुलाकात नहीं होती थी.एक जब तक ड्यूटी से वापस आता दूसरा ड्यूटी के लिए जा चुका होता था.वह यानी उसका मन और उसकी अंतरात्मा एक ही कमरे यानी शरीर में तो रहते थे.लेकिन वह पिछले एक महीने से अपने-आपमें नहीं था.उसने श्रम के साथ-साथ मन-मस्तिष्क को भी बेच डाला था चंद कागज के टुकड़ों के लिए.उसे लगता था कि यह अख़बार तो अख़बार है ही नहीं बल्कि यह तो घोषित रूप से एक आन्दोलन है.यहाँ उसे पैसों के साथ मानसिक संतुष्टि भी मिलेगी.लेकिन वह कुछ भी तो हासिल नहीं कर पाया.माया मिली न राम.वह कितना खुश था उस दिन जनशताब्दी में सवार होते समय.खुश होता भी क्यों नहीं?उसे भारत के महान पत्रकारों में से एक माने जानेवाले प्रधान सम्पादकजी ने खुद ही मिलने के लिए आमंत्रित किया था.वो भी उसके लेखों से प्रभावित होकर.सम्पादकजी अपने लेखों में हमेशा बड़ी-बड़ी बातें करते.कभी किसी निष्कासित विदेशी क्रांतिकारी के मन की बेचैनी को स्वर देते हुए पाठकों के साथ-साथ खुद अपने-आपसे यह सवाल करते कि हमारे देश में ऐसे लोग क्यों नहीं पैदा होते तो कभी लोकनायक पर पूरा-का-पूरा पृष्ठ ही काला कर डालते.छोटे-छोटे वाक्यों में बड़ी-बड़ी बातें उनके लेखन की विशेषता थी.वह निश्चित समय पर अख़बार के प्रधान कार्यालय में मिलने के लिए उपस्थित भी हुआ था,दिल में हिलोरें लेतीं जवां उमंगों के साथ.करीब एक घंटे के इंतज़ार के बाद ऊपर से बुलावा आया पत्रकारिता जगत के भगवान का.वह इंतजार के इन लम्हों में समझ चुका था कि रहीम कवि ने कितना सही कहा था-रहिमन याचकता गहै बडौ छोट ह्वै जात.भगवान ने मिलते ही कहा आप जो लिखते हैं बहुत अच्छा लिखते हैं लेकिन इसका कहीं कोई प्रभाव नहीं पड़नेवाला.उसके दिल को आघात लगा;हृदयाघात से भी तेज और दर्दनाक.उसने भी टका-सा जवाब दिया कि ऐसा तभी होता है जब लेखक की कथनी और करनी में अंतर हो.जैसे नेताओं की बकवासों पर जनता ध्यान नहीं देती वैसे ही ऐसे दोहरे चरित्रवाले लोगों की वाणी भी खाली जाती है.निराशा हुई कि इतना बड़ा चिन्तक और इतना प्रोफेशनल.फ़िर ऐसे लोग किसलिए लिखते हैं?क्या सिर्फ शब्दों के बाजार में अपनी रेटिंग बढ़ाने के लिए?ये श्रीमान तो बाजारवाद के घोर विरोधी माने जाते हैं और खुद सबसे बड़े बाजारवादी भी हैं.विचारों और व्यवहारों में सीधी शत्रुता.इसके बाद उसकी परीक्षा ली गई कि वह उनके अख़बार के लिए कहाँ तक उपयोगी सिद्ध होगा.अनुवाद करवाया गया,खबर सम्पादित कराई गई और सूचना के अधिकार पर एक लेख भी लिखवाया गया.उसकी एच.आर. प्रमुख से मुलाकात भी करवाई गई जो वास्तव में आदमी को आदमी नहीं बल्कि संसाधन समझते थे.उनका कहना था कि चूंकि उसकी एक साल से आमदनी शून्य थी इसलिए वेतन की शुरुआत फ़िर से यानी शून्य से ही करनी पड़ेगी.वह उन्हें सिर्फ धन्यवाद कह पाया और लौट आया था अपने घर में.लेकिन कुछ ही दिनों बाद उसे सुखद आश्चर्य हुआ जब उसे अख़बार की नई खुल रही यूनिट में काम करने के लिए बुलाया गया.फ़िर से उसकी सूनी आँखों में सपनों के महासागर हिलोरे लेने लगे.नियत समय पर जब दफ्तर पहुंचा तो देखकर हैरान रह गया कि वह तो दफ्तर था ही नहीं.उससे ज्यादा साफ-सुथरा तो तबेला (बिहार में बथान) होता है.ट्यूबलाईटों पर भनभनाते असंख्य कीड़े-मकोड़े,शौचालय में बल्ब नहीं,घुप्प अँधेरा.पीने के लिए टंकी का गन्दा पानी.आधे लोग सिस्टम के खाली होने के इंतजार में खड़े थे.उस पर खून चूसने को तैयार मच्छरों की टोलियाँ.कई दिनों तक तो उसे कम्प्यूटर छूने को भी नहीं मिला.उसे इस बात का भी डर लगने लगा था कि कहीं वह काम करना भी न भूल जाए.वहां का संपादक भी अजीब था.वह कभी भी कहीं भी मिल जाता.कभी चाय की दुकान पर तो कभी पान की दुकान पर.आवाज कड़क और शब्द कभी-२ बदतमीजी की हद से भी ज्यादा गंदे.एक दिन सबके सामने एक संवाददाता को गालियाँ देने लगा.ऐसी गालियाँ जिन्हें सुनकर कोई भी शरमा जाए.अपने लोगों से ज्यादा उन्हें राजधानी कार्यालय के लोगों पर विश्वास था. इन परिस्थियों में उसका स्वास्थ्य बिगड़ना ही था.मानसिक के साथ-२ उसका शारीरिक स्वास्थ्य भी बिगड़ने लगा.फ़िर भी उसने दफ्तर जाना नहीं छोड़ा.हाँ अब वह रोज-२ नहीं जा पा रहा था.वह जाता और बैठकर चला आता.लेकिन जब भी संपादक मिलता तो कहता यार तबियत ठीक करो,तबियत आपकी ख़राब हो रही है और दिल मेरा बैठ रहा है.उसे दुःख तो हटा लेकिन यह जानकार ख़ुशी भी होती कि इस शख्स के पास दिल भी है.फ़िर एक दिन भगवानजी का आगमन हुआ.शौचालय में बल्ब लग गया.बांकी चीजें यथावत रहीं.अब वह कुछ काम भी करने लगा.लौन्चिंग के दिन चार पृष्ठों के विशेषांक की उसी ने प्रूफ रीडिंग की जिसकी प्रशंसा भी की गई.लेकिन अब एक नई मुसीबत सर पर थी.जब भी वह पेज बनाने बैठता चार सीनियर घेर कर बैठ जाते और पेज बनवाने लगते.वह सिर्फ माटी की मूरत था.विरोध करने पर संपादक उसी पर फट पड़ा और कहने लगा यहाँ काम करना है तो इसी तरह काम करना पड़ेगा.वह तत्काल निकल गया.वह समझ चुका था कि यह उसकी दुनिया नहीं है.अब वह आजाद था अपनी दुनिया में निर्भय उड़ान भरने के लिए.उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था और पाने के लिए सारा जहाँ.
शनिवार, 9 अक्टूबर 2010
हिंदी भाषा अवनति अहै टेबुलायड को उन्नति को मूल
यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम १५ अगस्त, १९४७ को राजनीतिक रूप से तो आजाद हो गए लेकिन मानसिक स्तर पर हम आज भी अंगेजी के गुलाम हैं.हम आज भी अपनी राष्ट्रभाषा में बोलने में शर्म महसूस करते हैं.आजादी के बाद हमारी सरकारें हिंदी को बढ़ावा देने का झूठा दिखावा करती रही.कभी इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किया गया.फ़िर भी कम-से-कम हिंदी के समाचार-पत्रों ने शुद्ध मन से इस दिशा में अपना प्रयास जारी रखा.उन्होंने बेशक लम्बे समय तक हिंदी की सेवा की.लेकिन नई शताब्दी आने तक इनकी बागडोर युवाओं के हाथों में आ चुकी थी जिनमें से अधिकतर अमेरिका/यूरोप रिटर्न थे और उनका हिंदी और हिंदी की उन्नति से कोई लेना-देना नहीं था.दूसरी तरफ पूरी दुनिया में एल.पी.जी. यानी लिब्रलाईजेशन ,प्राइवेटाईजेशन और ग्लोबलाइजेशन की धूम मची थी.पैसा भगवान बन चुका था.सारे सामाजिक मानदंड बदल चुके थे.आदर्शवाद अब सिर्फ किताबों में शोभा पा रही थी.अख़बार भी अब मिशन नहीं रह गए थे और विशुद्ध रूप से धंधा का रूप ले चुके थे.उनका उद्देश्य अब समाज या हिंदी की सेवा करना नहीं बल्कि सिर्फ पैसा कमाना रह गया था.उनकी इसी धनलोलुपता ने उनसे शुरू करवाया टेबुलायड अख़बारों का प्रकाशन.उनका मानना है कि अगर हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा में अख़बार निकले जाएँ तो ज्यादा-से-ज्यादा युवाओं को आकर्षित किया जा सकता है.इस तरह हिंदी क्षेत्रों में एक अजीब सी खिचड़ी भाषा का प्रचार शुरू कर दिया गया है और वह भी संस्थागत रूप से.निश्चित रूप से यह हिंदी के लिए नुकसानदेह और अंग्रेजी के लिए लाभकारी होने जा रहा है.कुछ लोग इसका इस आधार पर समर्थन कर रहे हैं कि भाषा को चलायमान रहना चाहिए लेकिन मैं पूछता हूँ कि हिंदी बहुप्रचलित शब्दों के बदले जबरन अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग क्यों किया जा रहा है.हाथी को एलेफैन्त और टोकरी को बास्केट,मैदान को फील्ड कहने से कैसे हिंदी का भला हो रहा है?क्या हिंदीभाषी युवा इन शब्दों के अर्थ रातों-रात भूल गए हैं?इसे जो बिकता है वो दिखता है के फार्मूले पर सही साबित करने की कोशिश की जा रही है.यह प्रवृत्ति भी गलत तर्कों पर आधारित है.हिंदी में तो सस्ते और अश्लील साहित्य का भी अपना पाठक वर्ग रहा है.अन्तर्वासना जैसी वेबसाइटें काफी लोकप्रिय रहीं हैं तो अख़बारवाले क्यों नहीं ऐसे साहित्य बेचते?अगर यह अनैतिक है तो फ़िर हिंदी के साथ सरेआम बलात्कार करना कैसे नैतिक है?जिस हिंदी की ये अखबारवाले लम्बे समय से खाते रहे हैं अब उसी (थाली) में छेद कर रहे हैं और वो भी धूम-धाम से.चाहे इनके जो भी तर्क-कुतर्क हों इन्होंने जिस हिंदी से कभी बिल गेट्स ने खतरा जताया था उस लगातार मजबूत हो रही हिंदी को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है इसमें कोई संदेह नहीं.मैं युवाओं सहित सभी हिंदीभाषियों को सचेत करना चाहूँगा कि इनके नापाक मंसूबों को सफल नहीं होने दीजिये अन्यथा हिंदी संस्कृत आधारित भाषा के बदले अंग्रेजी आधारित भाषा बनकर रह जाएगी और हम भविष्य में इस बात पर गर्व नहीं कर पाएँगे कि हमारी संस्कृति दुनिया की सबसे पुरानी जीवित संस्कृति है.वास्तव में जो संस्कृति-विनाश का काम अंग्रेज अपने २०० सालों के शासन में नहीं कर सके उसी काम का बीड़ा टेबुलायड अख़बारों ने,हमारे कुछ धनपशु भाइयों ने उठा लिया है.सावधान!
शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010
हे राम!
धर्म का जन्म चाहे वो कोई भी धर्म क्यों न हो लोगों को उनके कर्तव्यों का ज्ञान करने के लिए हुआ है.लेकिन यथार्थ में ऐसा होता नहीं.लगभग सारे धर्मों के अनुयायी समय-२ पर अपनी राह से भटकते रहे हैं जिससे जन्म होता है टकराव का.बच्चा जब पहली साँस लेता है तब उसे उसके धर्म के बारे में पता नहीं होता.हम उसके मन में भेद के बीज बोते हैं आठों पहर यह बता-बताकर कि तुम इस संप्रदाय से आते हो और वह उस संप्रदाय से.
इतिहास साक्षी है कि भारत में प्राचीन काल से ही भारी संख्या में विदेशियों का आगमन होता रहा है.भिन्न-२ विचारधाराओं और विभिन्न विश्वासों को धारण करनेवाले लोग यहाँ आते रहे हैं और विशाल भारतीय समाज में समाहित होते रहे हैं.कौन बता सकता है प्राचीन काल में भारत आनेवाले हूण,शक,कुषाण और यूनानियों का पता-ठिकाना?हमने अपनी बाँहों को,अपने मन-मस्तिष्क को विस्तार दिया और उन्हें अपने भीतर समाहित करते गए.पहली बार भारतीय समाज का पाला नई तरह के लोगों से तब पड़ा जब भारत में इस्लामी हमलावरों का आगमन हुआ,एक हाथ में कुरान और दूसरे में तलवार लिए.हमारे लिए यह अब तक का पहला ऐसा पंथ था जो मिलने नहीं मिलाने की भाषा बोल रहा था वो भी ताकत के बल पर.लेकिन यह धींगामुश्ती ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी और भारत के प्रभाव में आकर वे भी प्रेम की भाषा बोलने लगे और विकास हुआ सूफी धर्म का.फ़िर तो गंगा-जमुनी संस्कृति पूरे देश में हिलोरे लेने लगी.ढोलक के साथ तबला संगत करने लगा और वीणा के साथ शहनाई.कई मुसलमानों ने खड़ी बोली और अवधि में कवितायेँ लिखीं और क्या खूब लिखी.राम और कृष्ण सिर्फ हिन्दुओं के नहीं रह गए बल्कि उनसे कहीं ज्यादा वे रहीम और रसखान के हो गए.कई हिन्दुओं ने भी सूफियों की शागिर्दी कबूल कर ली.इस्लाम भारतीय संस्कृति में पच तो नहीं पाया लेकिन उसका भारतीयकरण जरुर हो गया.१८५७ का विद्रोह वास्तव में न तो हिन्दुओं का विद्रोह था और न ही मुसलमानों का.तब गंगा और जमुना दोनों में एकसाथ उबाल आया था.इस विद्रोह ने अंग्रेजों को जड़ से हिला दिया.अब वे इस बात को समझ चुके थे कि जब तक हिन्दू और मुसलमान एक हैं भारत को गुलाम बनाए रखना संभव नहीं होगा.लन्दन में दोनों सम्प्रदायों में फुट डालने की साजिश रची जाने लगी.पहले कुछ पढ़े-लिखे मुसलमान उनके बहकावे में आए फ़िर कुछ पढ़े-लिखे हिन्दू.फ़िर तो धीरे-धीरे ऐसी स्थितियां उत्पन्न कर दी गईं कि अनपढ़ ग्रामीण भी साम्प्रदायिकता के रंग में रंगने लगा जिसकी अंतिम परिणति थी देश का विभाजन.विभाजन शांति की अंतिम और पहली शर्त थी जिसे हमने न चाहते हुए भी स्वीकार किया.आजादी की बेला में आँखों में आंसू भी थे तो अनगिनत सपने भी थे.उम्मीद थी कि अब देश में शांति होगी और शांतिपूर्ण माहौल में देश का काफी तेज गति से चतुर्मुखी विकास होगा.लेकिन सपने तो सपने होते हैं उन्हें हकीकत का रूप कौन दे?यहाँ तो हर किसी को तो सिर्फ सत्ता चाहिए थी .भारतीय लोकतंत्र में निहित कमजोरियां भी जल्दी ही दृष्टिगोचर होने लगीं.व्यक्तिगत हितों की बातें पृष्ठभूमि में चली गईं और प्रत्येक स्थान पर जाति और संप्रदाय वोट बैंक के रूप में दबाव समूह बनकर उभरने लगे.सियासतदानों ने सभी महापुरुषों को जातियों में बाँट डाला.यहाँ तक कि उनके इस कुत्सित खेल से राम भी अपने-आपको नहीं बचा पे.अब चुनाव राम के नाम पर लड़े जाने लगे.ध्रुवीकरण सिर्फ सांप्रदायिक आधार पर ही नहीं हुआ,जातीय आधार पर भी हुआ.देश में दंगों की बाढ़ आ गई.मुम्बई से गुजरात तक भारत माँ का आँचल बार-बार लहू-लुहान होता रहा.लेकिन लगता है कि अब राम के नाम पर होनेवाली राजनीति के दिन पूरे हो गए हैं.यह बड़ी ही ख़ुशी की बात है कि इलाहबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ का फैसला आ गया है और उसमें सबकी जीत हुई है.अब वहां मंदिर भी बनेगा और मस्जिद भी बनेगी.लेकिन कुछ लोगों ने निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है इस तरह की प्रवृत्ति सहिष्णु भारतीय समाज में अपवाद ही मानी जानी चाहिए.एक साथ परस्पर विरोधी पक्ष अपना अस्तित्व बनाए रखें यही तो सदियों से भारतीय आदर्श रहा है.लेकिन अगर जनता को बाँटने की कोशिशें सफल हो जा रहीं हैं तो दोषी कहीं-न-कहीं जनता भी है.उसे सत्तालोलुप राजनीतिज्ञों की असली मंशा को समझना होगा.उन्हें समझना होगा कि जाति और धर्म की बातें ये लोग सिर्फ कुर्सी पाने के लिए करते हैं और फ़िर अपनी जेबें भरते हैं.इस तरह तो भारत विकसित देश बनने से रहा.हमारे नेता दरअसल अंग्रेजों के भारतीय संस्करण हैं और फूट डालो और शासन करो इनका सूत्र वाक्य है.वास्तव में मुद्दा देश का विकास होना चाहिए,भ्रष्टाचार का खात्मा होना चाहिए,बेरोजगारी और जनसंख्या-नियंत्रण होना चाहिए,शिक्षा और स्वास्थ्य होना चाहिए लेकिन यह दुर्भाग्य की बात है की आज भी चुनाव जाति और धर्म के नाम पर लड़े जाते हैं और इसलिए सियासतदानों को गन्दी राजनीति करने का मौका मिल जाता है,साथ ही गलत लोगों को राजनीति में प्रवेश भी.
इतिहास साक्षी है कि भारत में प्राचीन काल से ही भारी संख्या में विदेशियों का आगमन होता रहा है.भिन्न-२ विचारधाराओं और विभिन्न विश्वासों को धारण करनेवाले लोग यहाँ आते रहे हैं और विशाल भारतीय समाज में समाहित होते रहे हैं.कौन बता सकता है प्राचीन काल में भारत आनेवाले हूण,शक,कुषाण और यूनानियों का पता-ठिकाना?हमने अपनी बाँहों को,अपने मन-मस्तिष्क को विस्तार दिया और उन्हें अपने भीतर समाहित करते गए.पहली बार भारतीय समाज का पाला नई तरह के लोगों से तब पड़ा जब भारत में इस्लामी हमलावरों का आगमन हुआ,एक हाथ में कुरान और दूसरे में तलवार लिए.हमारे लिए यह अब तक का पहला ऐसा पंथ था जो मिलने नहीं मिलाने की भाषा बोल रहा था वो भी ताकत के बल पर.लेकिन यह धींगामुश्ती ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी और भारत के प्रभाव में आकर वे भी प्रेम की भाषा बोलने लगे और विकास हुआ सूफी धर्म का.फ़िर तो गंगा-जमुनी संस्कृति पूरे देश में हिलोरे लेने लगी.ढोलक के साथ तबला संगत करने लगा और वीणा के साथ शहनाई.कई मुसलमानों ने खड़ी बोली और अवधि में कवितायेँ लिखीं और क्या खूब लिखी.राम और कृष्ण सिर्फ हिन्दुओं के नहीं रह गए बल्कि उनसे कहीं ज्यादा वे रहीम और रसखान के हो गए.कई हिन्दुओं ने भी सूफियों की शागिर्दी कबूल कर ली.इस्लाम भारतीय संस्कृति में पच तो नहीं पाया लेकिन उसका भारतीयकरण जरुर हो गया.१८५७ का विद्रोह वास्तव में न तो हिन्दुओं का विद्रोह था और न ही मुसलमानों का.तब गंगा और जमुना दोनों में एकसाथ उबाल आया था.इस विद्रोह ने अंग्रेजों को जड़ से हिला दिया.अब वे इस बात को समझ चुके थे कि जब तक हिन्दू और मुसलमान एक हैं भारत को गुलाम बनाए रखना संभव नहीं होगा.लन्दन में दोनों सम्प्रदायों में फुट डालने की साजिश रची जाने लगी.पहले कुछ पढ़े-लिखे मुसलमान उनके बहकावे में आए फ़िर कुछ पढ़े-लिखे हिन्दू.फ़िर तो धीरे-धीरे ऐसी स्थितियां उत्पन्न कर दी गईं कि अनपढ़ ग्रामीण भी साम्प्रदायिकता के रंग में रंगने लगा जिसकी अंतिम परिणति थी देश का विभाजन.विभाजन शांति की अंतिम और पहली शर्त थी जिसे हमने न चाहते हुए भी स्वीकार किया.आजादी की बेला में आँखों में आंसू भी थे तो अनगिनत सपने भी थे.उम्मीद थी कि अब देश में शांति होगी और शांतिपूर्ण माहौल में देश का काफी तेज गति से चतुर्मुखी विकास होगा.लेकिन सपने तो सपने होते हैं उन्हें हकीकत का रूप कौन दे?यहाँ तो हर किसी को तो सिर्फ सत्ता चाहिए थी .भारतीय लोकतंत्र में निहित कमजोरियां भी जल्दी ही दृष्टिगोचर होने लगीं.व्यक्तिगत हितों की बातें पृष्ठभूमि में चली गईं और प्रत्येक स्थान पर जाति और संप्रदाय वोट बैंक के रूप में दबाव समूह बनकर उभरने लगे.सियासतदानों ने सभी महापुरुषों को जातियों में बाँट डाला.यहाँ तक कि उनके इस कुत्सित खेल से राम भी अपने-आपको नहीं बचा पे.अब चुनाव राम के नाम पर लड़े जाने लगे.ध्रुवीकरण सिर्फ सांप्रदायिक आधार पर ही नहीं हुआ,जातीय आधार पर भी हुआ.देश में दंगों की बाढ़ आ गई.मुम्बई से गुजरात तक भारत माँ का आँचल बार-बार लहू-लुहान होता रहा.लेकिन लगता है कि अब राम के नाम पर होनेवाली राजनीति के दिन पूरे हो गए हैं.यह बड़ी ही ख़ुशी की बात है कि इलाहबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ का फैसला आ गया है और उसमें सबकी जीत हुई है.अब वहां मंदिर भी बनेगा और मस्जिद भी बनेगी.लेकिन कुछ लोगों ने निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है इस तरह की प्रवृत्ति सहिष्णु भारतीय समाज में अपवाद ही मानी जानी चाहिए.एक साथ परस्पर विरोधी पक्ष अपना अस्तित्व बनाए रखें यही तो सदियों से भारतीय आदर्श रहा है.लेकिन अगर जनता को बाँटने की कोशिशें सफल हो जा रहीं हैं तो दोषी कहीं-न-कहीं जनता भी है.उसे सत्तालोलुप राजनीतिज्ञों की असली मंशा को समझना होगा.उन्हें समझना होगा कि जाति और धर्म की बातें ये लोग सिर्फ कुर्सी पाने के लिए करते हैं और फ़िर अपनी जेबें भरते हैं.इस तरह तो भारत विकसित देश बनने से रहा.हमारे नेता दरअसल अंग्रेजों के भारतीय संस्करण हैं और फूट डालो और शासन करो इनका सूत्र वाक्य है.वास्तव में मुद्दा देश का विकास होना चाहिए,भ्रष्टाचार का खात्मा होना चाहिए,बेरोजगारी और जनसंख्या-नियंत्रण होना चाहिए,शिक्षा और स्वास्थ्य होना चाहिए लेकिन यह दुर्भाग्य की बात है की आज भी चुनाव जाति और धर्म के नाम पर लड़े जाते हैं और इसलिए सियासतदानों को गन्दी राजनीति करने का मौका मिल जाता है,साथ ही गलत लोगों को राजनीति में प्रवेश भी.
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