बुधवार, 18 मई 2011

भारतीय राजनीति का सबसे विकृत चेहरा अमर सिंह

amar
मित्रों,कभी जनसेवा का सर्वश्रेष्ठ माध्यम मानी जानेवाली राजनीति आज अपने वास्तविक अर्थ को खोकर एक गाली बन गयी है.पिछले दिनों कुछ राजनेताओं (अमर सिंह भी शामिल) की आलोचनाओं से क्षुब्ध होकर भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को कहना पड़ा कि आज भी भारत में अच्छे नेता हैं.कभी साफ-सुथरा माने जानेवाले इस क्षेत्र को काजल की कोठरी बनाने में यूं तो अनगिनत भ्रष्ट राजनेताओं का हाथ है लेकिन कुछ नेता तो स्वयं इस कोठरी के काजल हैं;जो कोई भी उनके संपर्क में आया उसने अपना चेहरा काला करवाया;बच पाने का प्रश्न ही नहीं.ऐसे नेताओं में सबसे आगे माने जाते हैं अमर सिंह.
           मित्रों,अमर सिंह राजनेताओं की उस जमात का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सिर्फ परिणाम की चिंता करता है.साधन की पवित्रता और अपवित्रता से जिसका दूर-दूर तक कुछ भी लेना-देना नहीं होता.यूं तो इसे राजनीति में लाने का श्रेय जाता है उत्तर प्रदेश के स्वर्गीय मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह को लेकिन वास्तव में यह व्यक्ति तब चर्चा में आया जब इसने कर्ज में डूबे बालीवुड मेगास्टार अमिताभ बच्चन की मदद की और प्रत्येक जगह कुत्ते की दुम की तरह उनके साथ दिखने लगा.वैसे इससे पहले वह कथित रूप से लोहिया के अनुयायी मुलायम सिंह यादव से चिपक चुका था.फिर तो वह समय भी आया कि जब वह गाड़ी में चलता तो भारत के सबसे बड़े चार धनपति उसके साथ होते.वह उनकी अक्सर सरकार से मदद करवाता.उसकी पहुँच समान रूप से विभिन्न घोर विरोधी विचारधारा वाले नेताओं तक थी.होती भी क्यों नहीं वह एक अच्छा लायर तो है ही उससे भी कहीं अच्छा सप्लायर है.
             मित्रों,उसके लिए कोई नैतिकता-अनैतिकता की कोई सीमा नहीं;कोई हिचक नहीं.वह इन समस्त सीमाओं से ऊपर है.वह खुलेआम खुद को भोगवादी बताता है और कहता है कि जब उसकी पत्नी को इससे कोई परेशानी नहीं;बेटी को कोई समस्या नहीं तो आपको क्यों है?वह यह नहीं समझ पाता कि कहीं-न-कहीं उसकी विकृत गतिविधियों के कारण समाज भी विकृत होता है.वह अपनी बेटी की उम्र की लड़कियों के साथ फोन पर अश्लील बातें करता है और मामला उजागर हो जाने पर बेशर्मी से स्वीकार भी कर लेता है.क्या पता वह अपनी बेटियों का सामना कैसे करता है?उसके कुकर्मों से शायद शर्म को भी शर्म आ जाए लेकिन उसकी आँखों का पानी तो कब का सूख चुका है.मित्रों अपने वाक्-चातुर्य और विवादस्पद बयानों के चलते यह शख्स जल्दी ही टेलीविजन चैनलों पर सबसे ज्यादा नजर आनेवाला चेहरा बन जाता है.रिमोट से चैनल बदलते जाइए,प्रत्येक चैनल पर यही नजर आता है;आप चाहे तो देखें या टी.वी. ही बंद कर दें.
              मित्रों,अमर सिंह भारतीय राजनीति में संकटमोचक के नाम से भी जाने जाते हैं.सरकार को बचाने के लिए विधायक या सांसदों का जुगाड़ करना है अमर सिंह हैं न,किसी ईमानदार शख्सियत को बदनाम करना है नकली सी.डी.बनवाने के लिए अमर सिंह हैं न.काम चाहे कितना भी घटिया क्यों न हो अमर सिंह हैं न;इन्हें तो सिर्फ अपना उल्लू सीधा होने से मतलब है चाहे इसके लिए किसी को भी उल्लू क्यों न बनाना पड़े.इससे लाभ लेनेवाले कई बार हानि भी उठाते हैं.देखिए आजकल अनिल अम्बानी की क्या गत है?अनिल २-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जेल जाते-जाते बचे हैं तो अमर सिंह के ही कारण.यह बात और है कि उनके जेल जाने की नौबत भी इसलिए आई क्योंकि वे अमर सिंह के नजदीकी थे.
                 मित्रों,संस्कृत में एक श्लोक है-दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः,दुखभागी च सततं व्याधिरल्पायुरेव च.अमर सिंह को निंदा से कोई फर्क ही नहीं पड़ता बल्कि वे तो उन लोगों में से हैं जो यह मानते हैं कि बदनाम हुआ तो क्या हुआ फिर भी नाम तो हुआ ही.बुढ़ापे में दुखभागी तो प्रत्येक व्यक्ति होता है;अब बचा उसके अल्पायु होने का प्रश्न तो यह व्यक्ति यमराज की कृपा से अच्छी-खासी जिंदगी जी ही चुका है.यानि अमर सिंह शाश्वत सत्य को धारण करनेवाले इस श्लोक को भी पूरी तरह से झूठा साबित कर चुका है;लगता है जैसे उसने भगवान को भी कुछ सप्लाई-तप्लाई करके मैनेज कर लिया है और युग के अनुसार युगधर्म निभाने के कारण भगवान ने उसे माफ़ भी कर दिया है.दोस्तों,अभी तो अमर सिंह दिल से जवान हैं.आगे उन्हें बहुत-सारे कारनामे करने बांकी हैं;अभी उन्हें अपनी नातिन की उम्र की लड़कियों के साथ रंगरेलियां मनाना भी शेष है;बहुत-सी भ्रष्ट सरकारों और भ्रष्ट लोगों के लिए संकटमोचक बनना है और देश को संकट के महासागर में धकेलना है.तो आईये आप भी सुबह-सुबह मेरे साथ इनके लिए प्रार्थना करिए-हे ईश्वर,इन्हें शतजीवी बनाना.

सोमवार, 16 मई 2011

आदर्श स्थापित कर रही आदर्श घोटाले की जाँच

adarsh

मित्रों,वर्षों पहले की घटना है.वर्ष १९८७ में बिहार के तत्कालीन शिक्षा राज्यमंत्री स्व.अनुग्रह नारायण सिंह मेरे स्कूल राजकीय मध्य विद्यालय,बासुदेवपुर चंदेल में पधारे थे.कुछ फूले से,कुछ भूले से.कुर्सी की गर्मी सर-माथे पर चढ़कर बोल रही थी.मंत्री जी बार-बार एक ही शब्द का रट्टा लगा रहे थे.यह शब्द उनके दिलो-दिमाग पर छाया हुआ लगता तो नहीं था लेकिन मुंह से फिर भी बार-बार निकल रहा था.प्रत्येक पंक्ति में कम-से-कम एक बार और किसी-किसी पंक्ति में उससे भी ज्यादा मर्तबा.मंत्रीजी फरमा रहे थे कि हमें विद्यालय को आदर्श विद्यालय बनाना है और समाज को आदर्श नागरिक देकर आदर्श स्थापित करना है.मैं दर्शकों के बीच बैठा सोंच रहा था कि आखिर आदर्श होता क्या है?कर्मों की दृष्टि से भी पवित्रता बरतना या फिर खुद तो निषिद्ध कर्मों में संलिप्त रहना और दूसरों को आदर्श स्थापित करने की शिक्षा देना.           मित्रों,फिर आया १९९० का साल.लालू जी बिहार को आदर्श प्रदेश बनाने के वादे के साथ सत्तासीन हुए.उनके और उनकी अनपढ़ पत्नी के शासन में बिहार आदर्श प्रदेश तो नहीं बन सका लेकिन अनगिनत घोटालों का गवाह जरूर बना.चारा,अलकतरा,मेधा आदि जितने मंत्रालय उतने घोटाले.फिर मैंने सोंचा कि शायद राजनीतिज्ञों द्वारा आदर्श प्रदेशों का निर्माण ऐसे ही किया जाता है.
               मित्रों,लालू जी की पार्टी में एक नेता हुआ करते हैं श्री रघुवंश प्रसाद सिंह जो मेरे मामा लगते हैं.उनका गाँव मेरे ननिहाल जगन्नाथपुर के बगल में है,एक ही पंचायत में भी.मामा जी अपने गंवई अंदाज के लिए सर्वत्र जाने जाते हैं.उन्होंने गांवों को आदर्श बनाने की ठानी,केंद्र में ग्रामीण विकास मंत्री जो थे.फिर बड़ी संख्या में गांवों को आदर्श-ग्राम का पुरस्कार दिया जाने लगा.मेरे मन में उत्कंठा जगी देखूं तो आदर्श गाँव होते कैसे हैं?कई गांवों में घूमा,कोई बदलाव नजर नहीं आया;जो कुछ भी आदर्श था सब सिर्फ कागजात पर था.
             मित्रों,मेरे मन को फिर भी एक कमी खटक रही थी.अब तक व्यक्तियों,प्रदेशों और गांवों को तो आदर्श बनाया जा चुका था लेकिन घोटालों को आदर्श नहीं बनाया जा सका था.नामानुसार भारत के एकमात्र महान राज्य महाराष्ट्र के परम भ्रष्ट राजनेताओं,महाराष्ट्र सरकार के अति उर्वर मस्तिष्क वाले अधिकारियों और भारतीय सेना के सबसे ज्यादा देशभक्त कई-कई वीरता पुरस्कारों से सम्मानित अवकाशप्राप्त अफसरों की कृपा से यह भी बहुत ही जल्दी संभव हो गया.अचानक एक घोटाला सामने आया और देखते-ही-देखते सारे समाचार माध्यमों में छा गया;नाम था आदर्श सोसाईटी घोटाला.नाम से भी और काम से भी आदर्श.इन भाई लोगों ने देशभक्ति से सराबोर होकर निर्णय लिया था कि कारगिल के शहीदों के परिवारवालों के लिए मुम्बई के सबसे पॉश इलाके में एक शहरी सोसाईटी बनाई जाए,बहुमंजिली और गगनचुम्बी.जमीन सेना की,स्थान पर्यावरणीय और सामरिक तौर पर अतिसंवेदनशील.चूंकि मामले में अतिविशिष्ट लोगों की खासी अभिरूचि थी इसलिए फाइलें बुलेट ट्रेन की रफ़्तार में चलीं और टेबल-टेबल पर विभिन्न नियमों-उपनियमों की अवहेलना करती हुई चली.काम शुरू भी हुआ और ख़त्म भी.जब १५-१५ करोड़ रूपये बाजार मूल्य के फ्लैटों वाली सोसाईटी में लोग रहने को आने लगे तब पता चला कि ईमारत में से कारगिल के शहीदों के किसी परिवारवाले को तो कोई आवासीय इकाई मिली ही नहीं.महाभोज में जो कुछ भी मिला,भ्रष्ट नेता,सिविल अफसर और फौजी अधिकारियों के रिश्तेदारों को.
                  मित्रों,आनन-फानन में केंद्र और राज्य में ब्लैक मेंस बर्डेन संभाल रही कांग्रेस पार्टी ने अपनी छवि की क्षतिपूर्ति का काम शुरू कर दिया.मुख्यमंत्री को बदल दिया गया और जोर-शोर से सरकारी भोंपुओं द्वारा घोषणा की और करवाई जाने लगी कि इस आदर्श घोटाले की जाँच पूरी तरह आदर्श तरीके से करवाई जाएगी.फिर शुरू हुई आदर्श तरीके से जाँच.बारी-बारी से घोटाले की फाइलें विभिन्न सम्बद्ध विभागों से गायब होने लगीं.न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी.जब फाइलें ही नहीं मिलेंगी तो सजा कैसे होगी और किसको होगी?ऊपर से केंद्र सरकार का कुत्ता यानि सी.बी.आई.अपनी आदर्श मजबूरी का रोना रही है.इस सरकार में मजबूर होना ही सबसे बड़ा आदर्श जो है,प्राप्य जो है.
                 मित्रों,आप अब तक समझ ही गए होंगे कि आदर्श सोसाईटी घोटाले की आदर्श जाँच का क्या आदर्श परिणाम निकलने वाला है.अंत में किसी भी आरोपी को सजा नहीं होगी और सभी लोग किसी आदर्श न्यायाधीश द्वारा आदर्श सुनवाई के बाद आदर्श तरीके से बाइज्ज़त बरी कर दिए जाएँगे.लालू राज में बिहार सरकार के सचिवालयों में बराबर शार्ट सर्किट हो जाने से आग लग जाया करती थी और शार्ट सर्किट भी होने के लिए उन्हीं विभागों को चुनती थी जिनमें घोटाला हुआ करता था.महाराष्ट्र में इस समय बिना आग लगाए घोटाले की फाइलों का निबटान किया जा रहा है.उस समय जहाँ लालू का सामना (सख्त ईमानदार)सी.बी.आई.के तत्कालीन संयुक्त निदेशक यू.एन.विश्वास (जो इस बार पश्चिम बंगाल से विधायक बन गए हैं)से था जबकि आदर्श घोटालेबाजों के सामने केंद्र के अति आज्ञाकारी सी.बी.आई. अधिकारी हैं.इसलिए आग लगाने की कोई जरुरत ही नहीं.घोटाले की जाँच की कहानी,संवाद,संगीत और क्लाईमेक्स सबकुछ केंद्र सरकार द्वारा पूर्व निर्धारित है;इसलिए तो मेरे भीतर का कवि कहता है कि भाया जो होना है सो होगा रोता है क्या;आगे-आगे देखो होता है क्या?अभी भी बहुत से क्षेत्र आदर्श स्थापित किए जाने के इंतजार में लाइन लगाए खड़े हैं.देखिए उन उपेक्षित क्षेत्रों पर हमारे नीति-नियंताओं की कृपादृष्टि कब तक पड़ती है.

शनिवार, 14 मई 2011

सांपनाथ हारे नागनाथ जीते

trinmool
यह युग चयन की समस्या का युग है.जरुरत होने का नहीं जरुरत पैदा करने का समय है.आप कोई भी सामान खरीदने जाईए सेल्समैन आपके सामने उत्पादों का ढेर लगा देगा और सबमें अलग-अलग विशेषता होगी.क्या ऐसी ही समस्या कमोबेश हमारे मतदाताओं के सामने नहीं है?कमोबेश इसलिए क्योंकि उपभोक्ता के रूप में जो व्यक्ति संतुष्टि नहीं होने पर सारे उत्पादों को एकसाथ नकार दे सकता है मतदाता के रूप में उसके समक्ष यह नकारने का विकल्प नहीं होता.जब संविधान का निर्माण चल रहा था तब शायद हमारे तपोपूत पूर्वजों ने यह सोंचा भी नहीं होगा कि मतदाताओं के समक्ष कभी इस तरह की समस्या भी उत्पन्न होगी और उन्हें सांपनाथ और नागनाथ के बीच में से किसी एक को चुनना होगा.
               मित्रों,सबसे पहले बात करते हैं उस राज्य की;उत्सवधर्मिता जिसके खून में है.वहां लगातार रिकार्ड ३४ सालों तक सत्ता में रहने के बाद साम्यवादियों को पराजय का मुंह देखना पड़ा है.इसलिए उनकी यह हार बेशक महान हार है;शायद जीतने वाले की जीत से भी ज्यादा महान.साम्यवाद ने बंगाल के निवासियों को बराबरी दी लेकिन उनकी समृद्धि नष्ट कर दी;सबको गरीब बना दिया.आज भी कोलकाता गरीबों के लिए सबसे मुफीद शहर है.आप वहां २० रूपये में भरपेट गुणवत्तापूर्ण खाना खा सकते हैं,दस रूपये में पूरे महानगर की सैर कर सकते हैं.लेकिन सैर करते समय आपको वह शहर अपने पुराने वैभव को खोता हुआ-सा दिखेगा.बंद कल-कारखानों,ढहते महलों वाला शहर.कमोबेश ऐसी ही स्थिति राज्य के बाँकी हिस्सों की भी है.दरअसल वहां के साम्यवादियों की स्थिति धीरे-धीरे गाँव के उस जमींदार वाली हो गयी थी जो बदलते समय से सीख नहीं लेने की जिद पर अड़ा है और कहता है कि मैं तो अवर्णों को बराबरी का दर्जा नहीं दूंगा बाँकी गांववालों को देना है तो दें.१९९० के बाद से ही पूरे भारत की स्थिति बदलने लगी.देश के विभिन्न राज्यों के बीच उदार शर्तों पर ज्यादा-से-ज्यादा घरेलू और विदेशी निवेश को आकर्षित करने की होड़ लग गयी लेकिन बंगाल के साम्यवादी अपनी जिद पड़ अड़े रहे कि हमारी शर्तों को जो मानेगा वही बंगाल में उद्योग बिठाएगा या चलाएगा.बाँकी प्रदेशों में अप्रासंगिक हो चुके श्रमिक संगठनों और कानूनों का यहाँ ९० के बाद भी जोर बना रहा.परिणाम यह हुआ कि राज्य में नई पूँजी तो नहीं ही आई पुरानी पूँजी भी दूसरे उन राज्यों;जो उदारवादी रवैय्या अपना रहे थे;की ओर पलायन कर गयी.स्थिति इतनी बद-से-बदतर होती गयी कि जो बंगाल कभी दूसरे प्रदेशों वालों को नौकरी देने के लिए प्रसिद्ध था अब उसकी बेटी-बहुएँ दिल्ली आदि महानगरों में बर्तन मांजने का काम करने लगीं.
           मित्रों,हालाँकि वहां ममता को लम्बे संघर्ष के बाद सत्ता मिल गयी है परन्तु यह ताज वास्तव में फूलों से नहीं काटों से भरा ताज है.जिस तरह उन्होंने अल्पकालिक राजनैतिक लाभ के लिए सिंगूर और नंदीग्राम में भूमि-अधिग्रहण और वृहत उद्योग स्थापना का विरोध किया अब वैसी ही स्थिति उनके समक्ष भी आ सकती है.उनका किया खुद उनके लिए ही परेशानियाँ पैदा कर सकता है.नए उद्योग जमीन पर ही लगेंगे आसमान में नहीं.फिर अब तक जो असामाजिक तत्व साम्यवादियों के साथ थे उन्होंने भी पाला बदल लिया है और ममता की ठंडी छाँव में आ गए हैं;उन्हें नियंत्रण में रखना भी उनके लिए काफी मुश्किल होनेवाला है.जिस तरह की अकर्मण्यता उन्होंने रेल मंत्रालय चलाने में दिखाई है अब उन्हें उससे भी ऊपर उठना होगा अन्यथा जनता एक झटके में उन्हें फिर से विपक्ष में पहुंचा सकती है.वैसे भी जनता ३४ साल के शासन को ५ सालों में भूलनेवाली नहीं है.ममता का रवैय्या भी साम्यवादियों वाला ही है तानाशाहीपूर्ण.इससे भी नहीं लगता कि बंगाल में सत्ता बदल जाने से व्यवस्था भी बदल जाएगी.ममता बनर्जी मन-मिजाज और चाल-ढाल से कम्युनिस्ट हैं और नीतिगत तौर पर कॉंग्रेसी;जिसकी सरकार के वे केंद्र में हिस्सा भी हैं.
           मित्रों,सुदूर दक्षिणी प्रदेश तमिलनाडु में शुरू से ही क्रमिक परिवर्तनवाला प्रदेश रहा है.वहां प्रत्येक चुनाव में सत्ता बदल जाती रही है.वहां इस बार भी मुकाबला पिछली बार की ही तरह जयललिता और करूणानिधि के बीच था.अन्य चारों राज्यों की ही तरह वहां भी धड़ल्ले से मतदाताओं के बीच पैसों और महंगी वस्तुओं का वितरण किया गया.पहले जहाँ सिर्फ जयललिता भ्रष्ट मानी जाती थी इस बार जनता के भ्रष्टाचार-प्रिय वर्ग के समक्ष एक विकल्प और बढ़ गया और पूरा करूणानिधि परिवार २-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जद में आ गया.परिवार में से कोई जेल जा चुका है तो कोई बेचैनी से अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रहा है.इस प्रकार वहाँ एक महाभ्रष्ट जयललिता ने जनता की मजबूरी का फायदा उठाकर दूसरे करूणानिधि को बाहर का रास्ता दिखा दिया है.
           मित्रों,पांडिचेरी एक छोटा-सा केंद्र-शासित प्रदेश है और वहां की हवा तमिलनाडु के हिसाब से बदलती रहती है.इस बार भी वहां यही हुआ और अन्नाद्रमुक ने द्रमुक को शिकस्त दी.
          दोस्तों,केरल ने भी सत्ता को भी पटखनी दी है लेकिन साम्यवादियों की प्रतिष्ठा को बहुत ज्यादा आघात भी नहीं दिया है.वहां दोनों कांग्रेस और साम्यवादी लगभग बराबरी पर हैं.केरल के साम्यवादियों ने कभी जड़ श्रमिक आन्दोलनों और कानूनों का दुरुपयोग कर राज्य के औद्योगिकीकरण में बाधा नहीं डाली.साथ ही वहां भी तमिलनाडु की ही तरह लगातार सत्ता बदलती रही है.चूंकि वहां कांग्रस और साम्यवादियों में कोई नीतिगत अंतर नहीं है इसलिए सत्ता के बालने से वहां के जनजीवन में कोई अंतर नहीं आनेवाला.
              मित्रों,असम में दुर्भाग्यवश फिर से कांग्रेस जीत गयी है.वहां पूरा शासन-प्रशासन उग्रवादियों और भ्रष्टाचारियों की गिरफ्त में है;जो विकल्प था वह भी दूसरे प्रकार का नहीं था.फिर भी अगर सत्ता में बदलाव आता तो बेहतर होता.तब सत्ता बदलने से आनेवाला आवश्यक बदलाव भले ही कम महत्वपूर्ण होता लेकिन शासन-प्रशासन की जड़ता को कुछ तो कम करता ही.अब पहले की ही तरह केंद्र राज्य को विकास के नाम पर धड़ल्ले से पैसे देगा और वह पैसा पहुँच जाएगा भारत विरोधी उग्रवादियों के हाथों में.यह एक कटु सत्य है कि पूरे पूर्वोत्तर में जिलाधिकारी तक को उग्रवादियों को रंगदारी टैक्स देना पड़ता है.
                     मित्रों,इस प्रकार पाँचों राज्यों के चुनाव-परिणामों का संक्षिप्त विश्लेषण करते हुए हमने पाया कि पाँचों राज्यों में नीतिगत तौर पर जीतनेवाला और हारनेवाला दोनों एक ही था;जित देखूं तित तूं.जनता के सामने जो विकल्प थे उसे उसी में से एक को चुनना था.उसे चुनना था दो महाभ्रष्टाचारियों में से एक को;उसे चुनना था दो तानाशाहों में से एक को.अब तक उसे नकारात्मक मतदान का विकल्प दिया नहीं गया है.ऐसी स्थिति में माना जाना चाहिए कि इन चुनावों से एक बार फिर सिर्फ सत्ता बदली है,व्यवस्था नहीं.वह ऐसे धनबल और पशुबल के भोंडा प्रदर्शन वाले चुनावों द्वारा बदल भी नहीं सकती.इसके लिए तो जनता को सड़कों पर संघर्ष करना पड़ेगा;फिर से राष्ट्रव्यापी अहिंसक आन्दोलन खड़ा करना पड़ेगा.ऐसे हालात बन भी रहे हैं.कुछ अच्छे लोग नेतृत्व देने को भी तैयार हैं परन्तु क्या हम भारत की जनता कटिबद्ध हैं उनके पीछे चलकर पूरी व्यवस्था को बदल देने के लिए?

सोमवार, 9 मई 2011

हिटलर की अवतार मायावती

noton kii mala

मित्रों,जब हिटलर को मरे कई साल बीत गए तब उसकी शासन-प्रणाली पर आदत से लाचार भाई लोगों ने शोध करना शुरू किया.अब तक बेचारे नाख़ून क्यों बढ़ते है,हजामत का पैसा कैसे बचाया जाए;जैसे बेकार के विषयों पर शोध करते चले आ रहे थे.हिटलर का शासन नया विषय तो था ही रोमांचक भी था.लेकिन हर किसी के पास पैसा होता कहाँ है जो जर्मनी की अध्ययन-यात्रा कर सके और हर किसी की सत्ता तक पहुँच भी नहीं होती जिससे सरकारी पैसों पर बर्लिन में बैठकर गुलछर्रे उड़ा सके.मैं बचपन से ही सुनता आ रहा था कि ईश्वर बड़ा दयालु है.अब विश्वास भी करने लगा हूँ.क्यों न करूँ विश्वास?अगर वह दयालु नहीं होता तो गरीब शोधार्थियों पर कृपा करके भारत में हिटलर का अवतरण नहीं करवाता.आप सोंच रहे होंगे कि वर्तमान भारत के किस महामानव को स्वनामधन्य हिटलर का अवतारी होने का सौभाग्य प्राप्त है तो इसके लिए दिमाग के न्यूरोन्स पर ज्यादा दबाव डालने की जरुरत बिलकुल भी नहीं है.हिटलर का भारतीय संस्करण होने का सौभाग्य किसी और को नहीं मिला है;मिल भी नहीं सकता.वे महामहिला हैं बहुजनवाद से सर्वजनवाद तक सारे वादों की तेज राजनैतिक यात्रा करनेवाली माननीया मायावती.
                  मित्रों,मायावती भी हिटलर की तरह जनमत के कन्धों पर सवार होकर मुख्यमंत्री बनी हैं.हमारे सभी नेता कुर्सी का दुरुपयोग करते हैं लेकिन इस मामले में सबसे आगे हैं बहन मायावती.उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार के सभी कार्यालयों को वसूली केंद्र बना दिया है.बिना घूस दिए आप दफ्तरों में कोई वाजिब काम भी नहीं करवा सकते.यू.पी. सरकार का ऐसा कोई अधिकारी नहीं जो बहनजी के एजेंटों को रंगदारी देने से मना करने के बाद जीवित रह गया हो.आपने अभी-अभी देखा होगा कि यू.पी. सरकार के एक ईन्जीनियर मनोज गुप्ता का ऐसी जुर्रत करने पर क्या हस्र हुआ?अगर आप यू.पी. के हैं और आपकी बेईमानीवाली फ़ाइल किसी ईमानदार अधिकारी के टेबल पर जाकर अटक गयी है तो परेशां होने की बिलकुल भी जरुरत नहीं है.बस इंतजार करिए और मायावतीजी को वोट देते रहिए.निश्चित रूप से यू.पी. सरकार में नौकरी करनेवाले ईमानदारी के सारे नुमाइंदे एक-न-दिन मारे जाएँगे इसी तरह धीरे-धीरे;साल के मध्य में अगर कोई बच भी गया तो बहनजी के जन्मदिन पर तो मरेगा ही मरेगा.दरअसल जन्मदिन के निकट आने पर मायावतीजी की पैसों की भूख बढ़ जाती है बहुत ज्यादा;कुम्भकर्ण से भी ज्यादा.कभी-कभी तो दलितों की यह मसीहा,लोकतंत्र की यह देवी पैसों की माला भी पहनती हैं वो भी पूरी दुनिया को दिखा कर.बाल-बच्चेदार नेता तो देश को लूटते हैं अपने उत्तराधिकारियों के लिए यह कुंवारी कन्या क्यों धन जमा कर रही है यह भी शोध का अच्छा विषय हो सकता है.
               मित्रों,भारतीय गणतंत्र के सभी राज्यों को संविधान की नौवीं अनुसूची और प्रथम संविधान संशोधन के द्वारा यह अधिकार प्राप्त है कि राज्य सरकार जब चाहे जनहित में किसी की भी जमीन का अधिग्रहण कर सकती है.यह अधिकार अपरिमित है और इसे न्यायालय में चुनौती भी नहीं दी जा सकती.सौभाग्यवश आज तक सारी राज्य सरकारें इसका उपयोग सिर्फ जनहित में करती आ रही थी.बहनजी की बड़ी-सी खोपड़िया में यह आईडिया सबसे पहले आया कि इस अधिकार का दुरुपयोग कर अगर कृषि-योग्य भूमि को बिल्डरों के हाथों में सौंप दिया जाए तो बहुत सारा माल बनाया जा सकता है.सो लगा दी बुद्धि और छीन ली नोयडा से आगरा तक सड़क किनारे बसे सभी किसानों की जमीन कौड़ियों के सरकारी दाम पर और दे दिया जे.पी. कंपनी को बाजार भाव पर बेचने के लिए.कहना न होगा कि बढती जनसँख्या के चलते इस समय रियल स्टेट क्षेत्र सबसे ज्यादा फायदा पहुँचाने वाला क्षेत्र बन चुका है.अब दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री भी पैसा कमाने के लिए इस फ़ॉर्मूले का उपयोग करते हैं या नहीं यह तो समय ही बताएगा.इस महाघमंडी नेता को जनता की रत्ती-भर भी चिंता नहीं है.यह सरकारी दाम पर अधिग्रहण का विरोध करने पर किसानों पर गोलियां चलवा देती हैं;घरों और खेतों को जलवा देती है.यहाँ तक कि इसके पुलिसवाले घायल किसानों की तस्वीर लेने की कोशिश करने पर बी.बी.सी. रिपोर्टर राजेश जोशी पर भी राईफल तान देते हैं.यानि यह माया के पीछे भागनेवाली स्वनामधन्य देवी सत्ता के बल पर किसानों से जीने का अधिकार तो छीन ही रही है;पत्रकारों की अभिव्यक्ति के अधिकार का भी इसके मन में कोई सम्मान नहीं.
          मित्रों,मैंने बचपन में एक कहानी पढ़ी थी कि एक बार किसी राज्य की रानी नदी किनारे स्नान करने जाती है.जाड़े का समय रहता है इसलिए खुले में नहाने के चलते थर-थर कांपने लगती है.वह बिना कुछ सोंचे-विचारे अपने अंगरक्षकों को नदी किनारे स्थित झोपड़ियों में आग लगाने का आदेश देती है और उसके ताप से अपने को सेंकती है.जब राजा को इस घटना के बारे में पता चलता है तो वह आगबबूला हो जाता है और दंडस्वरूप रानी को झोपड़ियों के निर्माण में श्रम करने की आज्ञा देता है.इस कहानी में तो रानी को नियंत्रित करने के लिए एक राजा था लेकिन इस लोकतंत्र की बेलगाम देवी को कौन दंड देगा?प्रजातंत्र में राजा तो होता ही नहीं और प्रजा अगर इतनी ही समझदार होती तो इसे कुर्सी पर बिठाती ही क्यों?उधर केंद्र सरकार भी जानबूझकर कुछ न देख पाने का बहाना कर रही है;न तो भूमि अधिग्रहण से सम्बंधित संवैधानिक धाराओं में ही संशोधन कर रही है और न ही उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन ही लगा रही है.वह ऐसा कर भी कैसे सकती है?उसकी सरकार को समय-समय पर बचाने में यह जालिम मदद जो करती रही है.अभी पी.ए.सी. रिपोर्ट मामले में भी तो बसपा ने केंद्र की भ्रष्टतम सरकार का साथ दिया.ऐसे में उत्तर प्रदेश के लोगों को इस अत्याचारी से सिर्फ नारायण ही बचा सकते हैं.हाँ,जो भाई अर्थाभाव के कारण जर्मनी जाकर हिटलर के शासन और उसके शासन में जनता की स्थिति का अध्ययन कर सकने में असमर्थ हैं वे निश्चित रूप से एक बार यथाशीघ्र उत्तर प्रदेश की शोध-यात्रा कर लें;यक़ीनन उन्हें निराश नहीं होना पड़ेगा.

रविवार, 8 मई 2011

घघ्घो रानी कितना पानी

ganga

घघ्घो रानी कितना पानी?इतना;नहीं इतना.मित्रों,एक समय था जब बिहार के गांवों के बच्चे काल्पनिक नदी के पानी की थाह लगानेवाला यह खेल खूब खेला करते थे.तब बिहार में बरसात भी खूब हुआ करती थी.गांवों में कुओं-तालाबों की भी कोई कमी नहीं थी.
         मित्रों,फिर समय आया जब आजादी के बाद वैज्ञानिक कृषि के नाम पर चारों तरफ बोरिंग गाड़े जाने लगे और कुएँ-तालाबों को भरने का काम शुरू हुआ.फिर भी स्थिति नियंत्रण में थी क्योंकि अब भी इन्द्रदेव मेहरबान बने हुए थे और पाताल का पानी प्राकृतिक रूप से ही रिचार्ज हो जा रहा था.
          मित्रों,एक समय यह भी है जो अभी हमारे साथ-साथ गुजर रहा है.पिछले दो सालों से बिहार की प्यासी धरती बरसात की एक-एक बूँद के लिए तरस रही है.कुएँ-तालाब जैसे पारंपरिक जलस्रोत जैसा कि मैंने ऊपर बताया है कि कबके इतिहास का विषय बन चुके हैं.लगातार पाताल से पानी खींचने के चलते जलस्तर में तेजी से कमी आ रही है.पिछले २ सालों में लगभग पूरे बिहार में भूमिगत जल के स्तर में १० से २० फीट की कमी आई है.हुआ तो ऐसा भी है कि जिन लोगों ने पिछले साल बोरिंग करवाई इस साल उन्हें पाईप को और धंसवाना पड़ा.दोनों तरह के सरकारी चापाकल यानि एक तो वे जिनमें निर्धारित लम्बाई का पाईप सचमुच में गाड़ा गया है और दूसरे वे जिनको निर्धारित लम्बाई से कम पाईप लगाकर ही चालू कर दिया गया (बांकी का पाईप अधिकारी गटक गए);सूखने लगे हैं या फिर बहुत कम पानी दे रहे हैं.
             मित्रों,बिहार के २० से भी अधिक जिलों में बड़े-बड़े वृक्ष तक सूख रहे हैं.बिहार का तीव्र गति से राजस्थानीकरण हो रहा है.लेकिन बिहार और राजस्थान में बहुत अंतर है.बिहार की आबादी बहुत घनी है.साथ ही यहाँ की अर्थव्यवस्था भी कृषि-आधारित है.सोंचिए स्थिति कितनी खतरनाक हो सकती है?जब पीने के पानी की ही किल्लत होने लगी है तब फिर खेती के लिए पानी कहाँ से आएगा?उधर बिहार की नदियों में भी पानी नहीं है.आप चाहें तो कहीं-कहीं भारत की सबसे बड़ी नदी गंगा को भी बिना तैरे पार कर सकते हैं.नदियों में पानी भी नहीं है और नहर-प्रणाली भी कुछेक जिलों को छोड़कर ध्वस्त है.सरकारी नलकूप पहले से ही बंद हैं और दो-चार चालू हैं भी तो भूमिगत जलस्तर भागने के प्रभाव से अछूते नहीं हैं.
              मित्रों,दक्षिण बिहार के कई जिलों में तो स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि गरीब गांववाले गड्ढों का गन्दा पानी पीने को विवश हो रहे हैं और जिनके पास पैसा है वे बोतलबंद पानी पीकर दिन काट रहे हैं और पानी का बाजारीकरण करनेवाली कम्पनियों को लाभ पहुंचा रहे हैं.आप सोंच रहे होंगे कि मैंने राज्य सरकार का तो जिक्र किया ही नहीं.क्या बिहार में इस समय सरकार नहीं है?है भाई है;सरकार है और खूब घोषणाएं करनेवाली सरकार है.
            मित्रों,घोषणावीर बाबू की सरकार अपनी आदत के अनुसार इस साल भी;इस आपदा के समय भी देर से जागी है.जो काम मार्च में ही शुरू हो जाना चाहिए था;अब उसकी घोषणा होनी शुरू हुई है.सरकार ने कहा है कि जिस गाँव में भी पानी की किल्लत है वहां के लोग निर्दिष्ट नंबर पर फोन करके पानी का टैंकर मंगवा सकते हैं.लेकिन सरकार के पास इतने टैंकर हैं ही कहाँ?इतनी देरी से टैंकर के लिए निविदा भी आमंत्रित की गयी है कि जब तक प्रक्रिया पूरी होगी गर्मी का मौसम जा चुका होगा.यानि तब जागे जब अंधेरा.हमारी सरकार नदियों को जोड़ने की बात कर रही है लेकिन अगर ऐसा हो भी गया तो इसका लाभ हम तभी प्राप्त कर पाएँगे जब हमारी नहर-प्रणाली दुरुस्त होगी.हमारी लगभग सारी नहरें गाद भरने की समस्या के चलते दशकों पहले ही निष्प्रभावी हो चुकी हैं;पहले तो उन्हें दुरुस्त करना होगा.साथ ही करना होगा पारंपरिक जल-संग्रहण प्रणाली का पुनरुद्धार.इसके अलावा सरकार को रियल स्टेट क्षेत्र द्वारा ६ ईंच या इससे मोटी बोरिंग धंसाने पर रोक लगानी होगी.तब जाकर बिहार के बच्चे फिर से खेल पाएँगे घघ्घो रानी कितना पानी का वास्तविक खेल असली पानी में.

शुक्रवार, 6 मई 2011

काहे को भेजे विदेश

IMG0134B

आज सुबह जब मैं जगा तो पड़ोसी की लड़की की विदाई हो रही थी.मैं पाषाण-ह्रदय हूँ.मेरी आँखें रोना नहीं जानतीं.फिर भी आँखें गीली हो गईं और याद आने लगी दीदी और उसकी विदाई.दीदी की शादी को २४ साल हो चुके हैं.अब उसके बच्चे शादी-योग्य हो चुके हैं लेकिन वो पिछले २४ सालों से हमारे घर में नहीं होते हुए भी हर पल हमारे साथ है.कोई कुछ भी करता है तो जुबान हठात कह उठती है कि दीदी यहाँ होती तो यह करती,वह करती,ऐसा कहती;वैसा कहती.
      जब मैं चलने लगा और कुछ-कुछ समझ विकसित होने लगी तब मैंने खुद को दीदी की गोद में पाया.दीदी मुझसे उम्र में १२ साल बड़ी है.वह दूध-रोटी कटोरे में ले लेती और घर के पिछवाड़े में स्थित कटहल के विशाल पेड़ के नीचे ले जाती.चाँद आसमान में पूरी तरुणाई में चमकता रहता.मैं दूध-रोटी खाने में बहुत नानुकुर करता;तब वह मुझे डराती;खा लो नहीं तो चाँद खा जाएगा.एक कौर मैं खाता और एक कौर वह खाती.
             फिर जब मैं स्कूल जाने लगा तब वह मेरे लम्बे-लम्बे बालों को संवारती और रिबन व रूमाल लगाकर सिख बच्चों की तरह बांध देती.उस समय मैं कपड़ों को लेकर बिलकुल ही बेपरवाह था.बरसात में जब घर लौटता तब मेरे कपड़े कीचड़ और काई से सने होते लेकिन दीदी ने कभी मुझे इसके लिए मीठी झिड़की तक नहीं सुनाई.हमेशा उसके ह्रदय में मेरे लिए स्नेह का अजस्र स्रोत बहता रहता.मुझे उसकी गोद और साथ हमेशा अच्छा लगता सिर्फ नहाने के समय को छोड़कर.दीदी घर के पिछवाड़े वाले कुएँ पर मुझे स्नान कराती,रगड़-रगड़ कर.इस प्रक्रिया में कम-से-कम १ घंटा लगता था.एक तो मैं ज्यादा समय लगने के कारण उब जाता तो वहीं दूसरी तरफ मुझे उस समय न जाने क्यूं ठण्ड भी बहुत लगती थी.मैं कई-कई दिनों तक बिना स्नान किये रह जाता;यहाँ तक कि गर्मियों में भी.बाद में जब मैं सरपट दौड़ने लगा तो कभी-कभी अवसर देखकर नंग-धड़ंग खेतों में भाग जाता.पहले कुछ देर तो सोंचता कि घर छोड़कर ही भाग लिया जाए.उस समय गाँव में बच्चों के भागने की घटनाएँ बहुत घट रही थीं.फिर कहीं बीच खेत में बैठ जाता और इन्तजार करता रहता कि कब कानों में दीदी के पुकारने की आवाज सुनाई दे.तब तक भूख भी लग चुकी होती थी.
              दीदी मेरे टिफिन में कुछ ज्यादा ही रोटियाँ रख देती और जब मैं स्कूल से लौटकर आता तो देखती कि कुछ बचा भी है क्या.वह टिफिन में बचे मेरे जूठन को इतना मगन होकर खाती कि मैं बस देखता ही रह जाता.उसके हाथों में मानों जादू था.उसके हाथों का बना पराठा-भुजिया इतना स्वादिष्ट होता कि उसकी शादी के २४ साल बाद आज तक मैं उस स्वाद की तलाश में हूँ.जब मैं बच्चा था तो बड़ा सीधा था.कई बार मेरे हमउम्र बच्चों ने मेरी बेवजह पिटाई की.मैं रोता हुआ जब घर आता तब दीदी उस बच्चे को कुछ कहने के बजाए उल्टे मुझे ही पीटती.फिर तो डर के मारे मैंने उसे बताना ही छोड़ दिया और जिससे भी निबटना होता;घटनास्थल पर ही निबट लेता.मैं हमेशा उससे छुट्टियों के दिनों में कहाँ-कहाँ भटका छिपाने की कोशिश करता लेकिन न जाने उसे कैसे पहले से ही सबकुछ पता होता.जब भी मैं बीमार हो जाता दीदी परेशान हो जाती.दिन-रात मेरे पास ही बैठी रहती और बैठे-बैठे ही सो जाती.
      मैंने कभी सोंचा भी नहीं था कि मेरी दीदी एक दिन हमें छोड़कर ससुराल चली जाएगी.उसकी शादी के समय मेरा किशोर मन चमक-दमक में खोया रहा.तब मैं सातवीं में पढ़ता था.लेकिन जब वह डोली में बैठने लगी तब जैसे मुझ पर वज्रपात ही हो गया.मैं दीदी की डोली के साथ-साथ दौड़ रहा था,दहाड़ें मारता.उधर दीदी भी रो रही थी और बार-बार मेरा नाम पुकार रही थी.लेकिन इसका कोई लाभ नहीं.गाँव के सिमाने तक जाकर मेरे पांव थम गए और डोली धीरे-धीरे आँखों से ओझल हो गयी.उसके बाद कई दिनों तक घर मानो काटने को दौड़ता.मैं कई दिनों तक रोता रहा,बस रोता रहा.फिर मैं इंतजार करने लगा कि कब दीदी वापस आएगी.आज भी मेरे लिए सर्वाधिक ख़ुशी के दिन वही होते हैं जब दीदी ससुराल से हमारे घर आती है.आज भी वापसी के समय उसकी आँखें गीली हो जाती हैं लेकिन मेरी नहीं होती.अब मैं बड़ा जो हो गया हूँ,बहुत बड़ा.

बुधवार, 4 मई 2011

लोहा गरम है चोट करे भारत

krishna


मित्रों,अगर आप वर्तमान सरकार की पाकिस्तान नीति पर नजर डालें तो आप उस पर बिना हँसे नहीं रह सकेंगे.आप चाहें तो अपना सिर भी पीट सकते हैं लेकिन वह निश्चित रूप से आपके स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं रहेगा.जब दुनिया २६/११ के बाद पाक समर्थित आतंकवाद के मुद्दे पर भारत की आपबीती सुनने को तैयार नहीं थी तब तो हमने खूब शोर मचाया और आज जब भारत का सबसे बड़ा दुश्मन पाकिस्तान उसकी सरजमीं पर दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी लादेन की बरामदगी और मौत के बाद पूरी दुनिया के सीधे निशाने पर है तब पाक समर्थित आतंकवाद का सबसे बड़ा और बुरा शिकार भारत;उसके प्रति नरमी बरत रहा है.
              मित्रों,भारत सरकार इस समय पाकिस्तान के प्रति अजीबोगरीब नरम-गरम खेल खेल रही है.एक तरफ उसके गृह मंत्री पी.चिदंबरम जिन पर आतंरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी है मुखर हैं वहीं विदेश मंत्री एस.एम.कृष्णा आश्चर्यजनक तरीके से चुप हैं.क्या उन्हें पता नहीं है कि वे किस विभाग के मंत्री हैं और उन्हें क्या करना होता है?अगर यह सच भी हो तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए क्योंकि ये वही महाशय हैं जो कुछ महीने पहले ही संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने बदले पुर्तगाली विदेश मंत्री का भाषण पढने लगे थे.प्रधानमंत्री जो खुद भी शाहे बेखबर हैं या दिखते हैं;ने एकदम अपनी बिरादरी के व्यक्ति को ही विदेश मंत्री बनाया है.
             मित्रों,भारत सरकार और कांग्रेस पार्टी को मुगालते में रहने की पुरानी आदत है.शायद ये लोग यह समझ रहे हैं कि आतंकवादी ओसामा को ओसामाजी कहने से या पाकिस्तान के प्रति इस समय नरमी बरतने से मुस्लिम समाज खुश होगा.यह मुगालता भी तब है जबकि भारतभर के सभी मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने एक स्वर में भारत सरकार से वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए पाकिस्तान के प्रति कठोर रवैय्या अपनाने का अनुरोध किया है.क्या आपको पता है कि कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह से खूंखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन का क्या रिश्ता था जिसके चलते वे उसे कैमरे के सामने ओसामाजी कहते और उसके अंतिम संस्कार करने के तरीके पर प्रश्न-चिन्ह लगाते फिर रहे हैं?क्या वह उनका बहनोई था या समधी था?ऐसा होने की जब दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं है तो शायद दोनों के बीच मित्रता जैसा कोई अन्तरंग सम्बन्ध हो?
           मित्रों,हमारे गाँव में कहावत है कि चोट तभी करनी चाहिए जब लोहा गरम हो;जब लोहा ठंडा पड़ जाता है तब उस पर हथौड़ा मारने से कोई फायदा नहीं होता.अभी जब पूरी दुनिया पाकिस्तान से आतंकवाद के प्रति उसके दोहरे रवैय्ये पर कैफियत मांग रही है तब उचित ही नहीं भारत सरकार के लिए एकमात्र करणीय कर्म यही रहेगा कि वह दुनिया के सामने पाकिस्तानी सरकार समर्थित आतंकवाद का मुद्दा और भी जोर-शोर से उठाए.अभी जोर लगाने से संभव है कि पाकिस्तान को आतंकवाद की सभी नर्सरियों को अपनी जमीन पर से उजाड़ना पड़े और भारत को इस समस्या से स्थाई रूप से निदान मिल जाए.अगर भारत सरकार इस समय नरमी बरतती है और दुनिया के सुर में सुर नहीं मिलाती है तो बाद में २६/११ जैसी किसी घटना के घटने के बाद वह किस मुंह से दुनिया को पाकिस्तान पर दबाव डालने के लिए कहेगी?
           मित्रों,इतिहास की पुस्तकों के काले पन्ने इस बात के साक्षी हैं कि पाकिस्तान ने न तो कभी भारत को अपना मित्र माना है और न ही आगे कभी मानने ही वाला है;इसलिए हमें शठं शठे समाचरेत की नीति अपनाते हुए ईश्वर की कृपा से प्राप्त हुए इस सुअवसर को भुनाना चाहिए.कहते हैं कि अवसर के सिर में सिर्फ आगे से ही बाल होते हैं;पीछे से नहीं होते इसलिए जो व्यक्ति मिले हुए अवसर का लाभ समय पर नहीं उठा पाता बाद में उसके पास सिर्फ हाथ मलते रहने के और कोई विकल्प नहीं रह जाता.इसलिए अंत में मैं भारत सरकार से भारत की सवा अरब जनता की ओर से अनुरोध करता हूँ कि वह वोट बैंक की सोंच से ऊपर उठाते हुए अभी नहीं तो कभी नहीं की नीति पर चलते हुए पाकिस्तान को आतंकी ट्रेनिग कैम्पों को नष्ट करने के लिए और अपनी नीतियाँ बदलने के लिए मजबूर करे नहीं तो वह वक्त भी जल्दी ही आ जाएगा जब उसके और उसके निकम्मे मंत्रियों के पास गलतियाँ करने का अधिकार भी नहीं रह जाएगा.आखिर उसे चुनाव तो लड़ना है ही;एक माघ के कट जाने से जाड़ा हमेशा के लिए समाप्त थोड़े ही हो जाता है.   

सोमवार, 2 मई 2011

व्यक्ति नहीं विचारधारा है ओसामा

osama

मित्रों,१० साल के लम्बे संघर्ष के बाद आखिरकार अमेरिका ओसामा बिन लादेन को मारने में सफल हो गया.ओसामा जिस तरह का व्यक्ति था;उसकी मौत पर निश्चित रूप से दुनिया-भर में खुशियाँ मनाई जानी चाहिए.लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ओसामा एक व्यक्ति-मात्र नहीं था बल्कि वह एक विचारधारा था जिसकी जड़ें कोई माने या न माने इस्लाम धर्म के पवित्र ग्रन्थ कुरान शरीफ में है.इसलिए तब तक हम मुसलमानों की सोंच और विचारधारा में मौलिक परिवर्तन नहीं कर देते मुस्लिम आतंकवाद चलता रहेगा.हम एक ओसामा को मारेंगे तो रक्तबीज की तरह उसके रक्त से दस ओसामा पैदा हो जाएँगे.
           मित्रों,ओसामा कोई असमान से टपका हुआ परग्रहीय प्राणी नहीं था.वह भी कभी एक आम इन्सान था,दया और धर्म के रास्ते पर चलने वाला.उसे आतंकवादी बनाया उसी अमेरिका ने जो आज उसकी मौत पर जश्न मना रहा है.उसी अमेरिका ने उसे धन और हथियार उपलब्ध करवाए क्योंकि तब ओसामा और अमेरिका का एक ही दुश्मन था और वह था सोवियत रूस.मैंने संस्कृत में एक कहानी पढ़ी है जिसमें सांप से परेशान एक पक्षी-दम्पति सांप के कोटर से नेवले के कोटर तक मांस के टुकड़े बिछा देता है.नेवला पक्षियों की योजनानुसार सांप को तो मार देता है लेकिन उसके बाद उसकी नजर में आने से पक्षियों का आशियाना नहीं बच पाता और इस तरह उन पक्षियों की गति ताड़ से गिरे और खजूर पर अंटके वाली हो जाती है.कुछ ऐसा ही ओसामा के मामले में अमेरिका के साथ हुआ.
         मित्रों,सोवियत रूस के खिलाफ अमेरिका ने जो षड्यंत्र रचा उसमें पाकिस्तान उसका सामरिक साझेदार था.अमेरिकी धनबल के बल पर पाकिस्तान में जेहादी आतंकवादियों के हजारों ट्रेनिंग कैम्प लगाए गए जिनमें से अधिकतर आज भी मौजूद हैं और उनमें से कई दुर्भाग्यवश भारत के खिलाफ सक्रिय हैं.बाद में स्थितियां बदलीं और अमेरिका को अफगानिस्तान पर हमला करना पड़ा.एक दौड़ में दाँतकटी मित्रता वाले अमेरिका और लादेन एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए.ऐसी स्थिति में महाबली अमेरिका के लिए यह स्वाभाविक था कि वह इस लडाई में पाकिस्तान से सहायता की उम्मीद करे.पाकिस्तान ने अमेरिका की सहायता की ही;उसने ओसामा की भी भागने और छिपने में भरसक मदद की.वह एक साथ दूल्हा और दुल्हन दोनों का चाचा बना रहा.ओसामा मारा भी गया है तो पाकिस्तान की ही धरती पर जिससे पाकिस्तान पर अब भी आतंकियों का पनाहगाह होने का भारत और कुछ अन्य देशों द्वारा लगाए जाने वाले आरोपों की पुष्टि ही होती है.हद तो यह है कि जहाँ ओसामा रह रहा था वह स्थान पाकिस्तानी मिलिटरी अकादमी से मात्र ८०० मीटर दूर था.ऐसे में यह संभव ही नहीं कि वह कहाँ है और क्या कर रहा है;का पता पाकिस्तान सरकार को नहीं हो.
         मित्रों,ओसामा के मारे जाने से अमेरिका को भले ही कोई लाभ हो;मुझे नहीं लगता कि इससे भारत को कोई फायदा होने वाला है.हालाँकि भारत भी अमेरिका की ही तरह पाक समर्थित आतंकवाद का शिकार है लेकिन अमेरिका या कोई भी अन्य देश भारत के लिए पाकिस्तान पर दबाव नहीं डालने वाला.आपने अपने गाँव-समाज में भी देखा होगा कि कोई दूसरा दूसरे की लडाई नहीं लड़ता.ठीक उसी तरह भारत को आतंकवाद के खिलाफ अपनी लडाई खुद ही लडनी पड़ेगी.यह लडाई कूटनीतिक,आर्थिक,राजनीतिक,आन्तरिक प्रत्येक मोर्चे पर लड़नी होगी.जब तक सीमा पार से संचालित आतंकवाद को अपने देश में समर्थन मिलता रहेगा तब तक भारत पर आतंकी हमले होते रहेंगे.इसलिए हमें जेहादी आतंकवाद के भारतीय कनेक्शन को काटना होगा और इसके लिए पुचकार के साथ-साथ कड़े कदम भी उठाने पड़ेंगे.केंद्र सरकार की अल्पसंख्यकवाद की नीति और दिग्विजय सिंह और अमर सिंह की आतंकवादियों को शहीद घोषित करने के प्रयासों से जेहादी आतंकवाद को समाप्त करने में कोई मदद नहीं मिलेगी.बल्कि मदद मिलेगी मुसलमानों के उदार धड़े के नेताओं को बढ़ावा देने से और छोटे-छोटे मासूम मुसलमान बच्चों को आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा देने से;सर्वधर्मसमभाव,सहिष्णुता और सहस्तित्व की शिक्षा देने से.मित्रों,कुछ ऐसा ही प्रयास मुस्लिमों के मन से कट्टरपंथ को समाप्त करने के लिए वैश्विक स्तर पर भी करने होंगे.
     मित्रों,मौत व्यक्ति की होती है विचारधारा की नहीं.व्यक्ति के तौर पर ओसामा भले ही मारा गया हो विचारधारा के तौर पर वह जिन्दा है और तब तक जिन्दा रहेगा जब तक मुसलमानों के मन में जेहादी मानसिकता जिंदा रहेगी,जब तक मुसलमान पिछड़े और अनपढ़ रहेंगे.भारत हमेशा से विश्व को संकट की स्थितियों में मार्ग दिखाता रहा है.भारत हमेशा से शांति और अहिंसा का पुजारी रहा है इसलिए सम्राट अशोक जैसी शख्सियत सिर्फ भारत में देखने को मिलती है.बांकी दुनिया में अनगिनत सिकंदर और तैमूर मिलते हैं पर अशोक एक भी नहीं मिलता.हम भारतवासी जानते हैं और मानते भी हैं कि चाहे रास्ते कितने भी अलग-अलग क्यों न हों सभी सम्प्रदायों की मंजिल एक हैं;इस दुनिया को बनानेवाला दो नहीं एक है.बांकी दुनिया भी जिस दिन इस सार्वभौम सत्य को तहे दिल से स्वीकार कर लेगी उसी दिन दुनिया से साम्प्रदायिकता और इससे उत्पन्न होने वाली सभी प्रकार की हिंसा समाप्त हो जाएगी.लेकिन क्या ऐसा हो सकेगा?क्या अमेरिका और दुनिया के अन्य नीति-निर्धारक देश ऐसा होने देंगे?क्या वे अपने फायदे के लिए आगे कोई और ओसामा पैदा नहीं करेंगे?

रविवार, 1 मई 2011

अनगिनत घूंघटों वाला चेहरा

congress party

मित्रों,पिछले दिनों अन्ना एंड फ्रेंड्स के ऊपर उन्हें बदनाम करने की नियत से जब कांग्रेस के बडबोले नेताओं ने आरोपों के सच्चे-झूठे गोले दागने शुरू कर दिया और जवाब में अन्ना ने कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी को पत्र लिखकर इसकी शिकायत की और सोनिया गाँधी ने पत्रोत्तर में मजबूरी दिखाई कि उनका उनकी ही पार्टी के अस्तित्वहीन नेताओं द्वारा लगाए जा रहे आरोपों से कुछ भी लेना-देना नहीं है,तब देश की बहुसंख्यक जनता को उनकी सफाई पर बिलकुल भी यकीन नहीं हुआ.आखिर वन मैन,वन फैमिली पार्टी में ऐसा कैसे संभव है कि बिना सोनिया-राहुल के इशारे और अनुमति के पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की ओर से इतना बड़ा अभियान चलाया जाए?
      मित्रों,इस समय कांग्रेस नेतृत्व डबल या ट्रिपल नहीं बल्कि कई-कई दर्जन भूमिकाओं वाला किरदार निभाने में लगी है.अद्भूत बात तो यह है कि वह अपने प्रत्येक किरदार का ठीक विपरीत किरदार भी एक ही साथ;एक ही दृश्य में निभाता हुआ नजर आ रहा है.इतनी विविधता तो एक ही फिल्म नौ दिन ओर नौ रातें में ९ रोल निभानेवाले संजीव कुमार के अभिनय में भी नहीं थी.उसका पहला रोल तो वह है जिसमें वह प्रधानमंत्री पद का त्याग करके त्याग की प्रतिमूर्ति बन जाता है.दूसरा रोल वह है जिसमें वह केंद्र की सरकार को बचाने के लिए सांसदों को घूस देने और भ्रष्ट लोगों को मंत्री बनाने से भी परहेज नहीं करता.हद तो तब हो जाती है जब उसका प्रधानमंत्री पहले तो अपने भ्रष्ट मंत्री को पाक-साफ साबित करने के लिए अपनी कथित क्लीन-मैन वाली छवि को दांव पर लगा देता है;लेकिन जब मंत्री न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद जेल चला जाता है;तब वह गठबंधन सरकार की मजबूरी का रोना रोने लगता है.
     मित्रों,कांग्रेस नेतृत्व का तीसरा चेहरा वह है जिसके द्वारा वह भ्रष्टाचार को कतई बर्दाश्त नहीं करने की बात करता है और इसके ठीक विपरीत उसका चौथा चेहरा वह है जिसके द्वारा वह भ्रष्टाचार रोकने के लिए काम करने वाली सबसे बड़ी सरकारी एजेंसी केंद्रीय सतर्कता आयोग के मुखिया के पद पर विपक्ष की नेता के घोर प्रतिरोध के बावजूद एक अति-भ्रष्ट अफसरशाह को बैठा देता है.कांग्रेस नेतृत्व का पांचवां किरदार वह है जिसमें वह महंगाई कम करने के लिए लगातार तारीखों की घोषणा करता रहता है और छठे किरदार में इसके ठीक विपरीत उसकी सरकार का वित्त मंत्री ऐसा बजट पेश करता है जो महंगाई की आग में घी का नहीं बल्कि सीधे किरासन तेल का काम करता है.
        मित्रों,उसका सातवाँ रोल है केंद्रीय मंत्रिमंडल जिसमें आप घोर भ्रष्ट और कथित ईमानदार लोगों को एक साथ काम करता हुआ देख सकते हैं.उसका आठवां चेहरा घोर धर्मनिरपेक्ष (सही शब्द पंथनिरपेक्ष है) है जिसके जरिए वह सर्वधर्मसमभाव की बातें करता है और ठीक इसके विपरीत उसका नौवां चेहरा है अति-सांप्रदायिक जिसके माध्यम से वह देश को एक और विभाजन की ओर धकेल रहा है.उसका दसवां चेहरा है उसकी विरोधाभासी और देशविरोधी विदेश नीति.वह मुंबई हमलों के समय स्पष्ट घोषणा करता है कि इस बार पाकिस्तान को आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करनी ही पड़ेगी और जब तक पाकिस्तान ऐसा नहीं करता है तब तक उसकी सरकार उसके साथ किसी तरह की बातचीत ही नहीं करेगी.लेकिन अचानक ५ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए मुसलमानों के एक वर्ग को खुश करने के लिए वह पाकिस्तान के साथ बिना शर्त बातचीत के लिए उतावला हो उठता है.
              मित्रों,अब आते हैं कांग्रेस नेतृत्व के उस चेहरे पर,उस बात पर जिससे हमने इस लेख की शुरुआत की थी यानि भारत की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार के खिलाफ ठोस कदम उठाने के मामले में कांग्रेस नेतृत्व की कथनी और करनी में अंतर पर.सबसे पहले राष्ट्रमंडल खेल घोटाले की बात करते हैं.अभी-अभी आपने देखा,सुना और पढ़ा होगा कि घोटाले में शामिल कई अधिकारी सरकारी वाच डॉग (या कुत्ता) सी.बी.आई. द्वारा समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाने के कारण जेल से बाहर आ गए.मतलब साफ़ है कि इस मामले में जो भी गिरफ़्तारी की गयी थी;दिखावा मात्र थी.खेल अधिकारियों की रिहाई के कल होकर ही सी.बी.आई. घोटाले के कथित मुख्य अभियुक्त सुरेश कलमाड़ी को गिरफ्तार करती है.टाईमिंग पर ध्यान दिया आपने?कलमाड़ी की गिरफ़्तारी के शोर में किस तरह खेल अधिकारियों की रिहाई दबकर रह गयी;देखा आपने?यहाँ मैंने कलमाड़ी को कथित मुख्य अभियुक्त इसलिए कहा क्योंकि जो प्रमाण सामने आ रहे हैं उनके अनुसार इस महाघोटाले में सबसे प्रमुख भूमिका प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की थी,कलमाड़ी बेचारा तो एक छोटा-सा मोहरा था.आपको याद होगा कि जेपीसी का जब तक गठन नहीं हुआ था कांग्रेस नेतृत्व बार-बार यह कहने में लगा हुआ था कि भारत में घोटालों के इतिहास में मील का पत्थर दूरसंचार घोटाले की जाँच करने में पीएसी ही सक्षम है और अब जब पीएसी अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी जांच रिपोर्ट सौंपना चाह रहे हैं तब सरकार लेने को ही तैयार नहीं है;उस पर कार्रवाई करने की तो कल्पना करना भी बेकार है.
      मित्रों,वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व के और भी चेहरे हैं.मैं जनता हूँ कि लेख अभी अधूरा है लेकिन इस अकिंचन के सोंचने और लिखने की अपनी सीमा है;जो बहुत-ही छोटी है.आखिर यहाँ मैं वेदव्यास भी हूँ और गणेश भी.एक तरफ कांग्रेस नेतृत्व के चेहरे और किरदार अनंत हैं वहीँ दूसरी तरफ मेरी क्षमता अत्यंत सीमित.कांग्रेस नेतृत्व द्वारा तैयार स्क्रिप्ट,उसका अभिनय,उसके द्वारा तैयार संवाद सभी कुछ लाजवाब हैं;हॉलीवुड से लेकर बालीवुड तक उसकी प्रतिभा का कोई जोड़ नहीं.वो कहते हैं न मिला न जोड़ा रे वसुधा में.भारत की सत्ता पक्ष की राजनीति का रंगमंच भी कांग्रेस नेतृत्व है,अभिनेता-अभिनेत्री भी,स्क्रिप्ट और डायलोग राईटर भी और निर्माता-निर्देशक तो वह है ही.इस मंच पर जो कुछ भी घटित हो रहा है;सब आभासी है,नाटक-मात्र है.
           मित्रों,हिंदी के महान उपन्यासकार अमृत लाल नागर जो चेहरों को पढने में मुझसे कई गुना ज्यादा सक्षम थे,अपने उपन्यास सात घूंघटों वाला चेहरा में नायिका के सात चेहरों को अनावृत करने में ही थक गए थे.कांग्रेस के तो विशालकाय प्याज की तरह अनंत चेहरे हैं.उसके सभी चेहरों का गुणगान तो शायद शेषनाग भी नहीं कर पाएँगे.इसलिए यह जानते हुए कि मेरा यह लेख अधूरा है;मैं अपनी लेखनी को विराम दे रहा हूँ.फिर भी अगर आप पाठकों को लगे कि कांग्रेस नेतृत्व के किसी अतिमहत्वपूर्ण चेहरे या किरदार का जिक्र यहाँ नहीं हो पाया है तो बेझिझक सुझाव दीजिए;उसे इस लेख में निश्चित रूप से शामिल कर लिया जाएगा.यह किसी नेता या राजनैतिक दल का कोरा आश्वासन नहीं है बल्कि एक मित्र से दूसरे मित्र का वादा है.        

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

हे ईश्वर,दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान नहीं करना

sai baba
मित्रों,गोस्वामी तुलसीदास ने अपने विश्वप्रसिद्ध ग्रन्थ रामचरितमानस में वर्षा ऋतु का वर्णन करते हुए कहा है कि जहँ-तहँ जामि तृण भूमि समुझि पड़हिं नहिं पंथ;जिमि पाखंडवाद ते लुप्त होहिं सद्पंथ.यानि वर्षा ऋतु में पगडंडियों पर इतनी घनी घास उग आती है कि राही को पता ही नहीं चलता कि वास्तव में रास्ता है किधर से.कुछ इसी तरह जब राष्ट्र और समाज में पाखंडवाद का बोलबाला हो जाता है तब लोग सन्मार्ग को भूलने लगते हैं.दुर्भाग्यवश वर्तमान भारत के राजनैतिक,सामाजिक और धार्मिक जीवन में भी बहुत-कुछ ऐसा ही हो रहा है.

              मित्रों,आध्यात्मिक दृष्टि से दुनिया में हमेशा से तीन तरह के लोग रहे हैं.एक वे जो ईश्वर में विश्वास रखते हैं,दूसरे वे जो ईश्वर में विश्वास नहीं रखते और तीसरी श्रेणी उन लोगों की है जो अन्धविश्वासी हैं.इसी तीसरी श्रेणी की मौजूदगी का लाभ उठाते हैं बगुला भगत की तरह पाखंडपूर्ण जीवन जीनेवाले लोग.भारतीय इतिहास के पन्नों को अगर हम पलटें तो पहली बार अथर्ववेद में मंत्र-तंत्र,जादू-टोने और चमत्कार का जिक्र आता है.हालाँकि सिन्धु-घाटी सभ्यता के शहर मोहनजोदड़ो से एक पुजारीनुमा व्यक्ति की मूर्ति प्राप्त हुई है लेकिन वह जनसमुदाय को प्रभावित करने के लिए जादू-टोने और चमत्कार का प्रयोग करता था या नहीं;का कोई साहित्यिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है और जब तक सिन्धु-घाटी सभ्यता की लिपि पढ़ नहीं ली जाती तब तक ऐसा हो पाने की कोई सम्भावना भी नहीं है.उत्तरवैदिक काल में चार पुरुषार्थों का सिद्धांत आया.अर्थ,काम,धर्म और मोक्ष में मोक्ष की महत्ता सबसे ज्यादा मानी गयी.इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को स्वयं प्रयत्न करना पड़ता था.लेकिन बाद में जब बौद्ध धर्मं में पाखंड का प्रभुत्व बढ़ा और तंत्रयान और वज्रयान का प्रभाव बढ़ा तब बोधिसत्व (बौद्ध मुनि) धन लेकर दूसरे लोगों के दुखों-पापों को अपने ऊपर लेने और अपने तपोबल से मोक्ष दिलवाने का दावा करने लगे.बुद्ध की जातक कथा से प्रेरित होकर ब्राह्मणों ने विभिन्न हिन्दू देवी-देवताओं का अवतार करवाना शुरू कर दिया.पहले राम,फिर कृष्ण जैसे महामानवों को विष्णु का अवतार बना दिया गया.ऐसा भारत में हमेशा से होता आया है कि किसी असाधारण मनुष्य के मरने के बाद लोग उसे अवतार मानकर उसकी पूजा करने लगते हैं.बुद्ध और कबीर जैसे अनीश्वरवादी और निर्गुण भी कुछ चतुर लोगों के इस प्रकार के षड्यंत्रों के शिकार हो चुके हैं.कुछ ऐसे भी लोग हुए जो अपने जीवनकाल में ही खुद के अवतारी होने का दावा करने लगे.श्रीमदभागवतपुराण जो कथित रूप से विष्णु के कृष्णावतार की कथा है;में भी एक ऐसे हीमिथ्याचारी राजा का उल्लेख है जिसने काठ की दो अतिरिक्त भुजाएँ लगवा ली थीं और खुद के विष्णु का वास्तविक अवतार होने का दावा करता था.

          मित्रों,१९वीं-२०वीं सदी में महाराष्ट्र में एक महान संत ने जन्म लिया जिसका नाम लोगों ने रखा साईं बाबा.साईं ने कभी यह नहीं कहा कि वे अवतारी हैं,बल्कि उनका चित्त,स्वभाव और जीवन-शैली तो एक छोटे-से बच्चे की तरह सरल थे.अब किसने उनमें शिव को देखा और किसने राम को;यह देखनेवाला जाने.वे तो खुद को सिर्फ एक भक्त मानते थे.हालांकि उन्होंने कुछ चमत्कार भी दिखाए जो किसी त्यागी-तपोनिष्ठ संत के लिए किसी भी तरह से असंभव नहीं है.साईं ने कोई संपत्ति भी जमा नहीं की.मरे तब पांव में जूता-चप्पल तक नहीं था.मेरे एक मामा जिन पर किसी आत्मा-वात्मा का साया था;किसी भी चीज की बरसात करा देने में सक्षम थे.तो क्या वे शिर्डी के साई बाबा के अवतार हो गए.शिर्डी के साई के देहत्याग के कुछ ही साल बाद २३ नवम्बर,१९२६ को आंध्र प्रदेश के पुट्टपर्थी गाँव में एक बच्चे ने जन्म लिया.माता-पिता ने नाम रखा सत्यनारायण राजू.चौदह साल की उम्र में अति उर्वर मस्तिष्क के स्वामी सत्यनारायण ने स्वयं को शिर्डी के साई बाबा का अवतार घोषित कर दिया.उनकी जीवन शैली भव्य थी और जीवन यौन-स्वच्छंदता के आरोपों के कारण विवादस्पद.वह जनसामान्य को प्रभावित करने के लिए कभी भभूत को मिठाई बना देता तो कभी मिश्री.वह ऐसे चमत्कार थोक में दिखाता जो कोई भी साधारण-सा जादूगर भी दिखा सकता था.मानों उसके रूप में साई ने सिर्फ इसी मकसद से अवतार लिया था.इस बात की पुष्टि के लिए स्वयं इंटरनेट पर उसकी हाथ की सफाई की पोल खोलनेवाले कई वीडियो मौजूद हैं.हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या!
          मित्रों,त्यागमूर्ति शिर्डी के साई बाबा का यह कथित अवतारी अपने पीछे १.५ लाख करोड़ रूपये की अकूत संपत्ति छोड़ गया है.क्या ऐसा व्यक्ति शिर्डी के साई बाबा का अवतार हो सकता है?आप यह भी सोंच सकते हैं कि अगर वह संन्यासी था भी तो किस तरह का संन्यासी था?संन्यास का तात्पर्य ही पूर्ण विरक्ति होता है लेकिन यह व्यक्ति तो माया के प्रति एक सामान्य गृहस्थ से भी ज्यादा अनुरक्त था.लोगों पर अपना विश्वास ज़माने के लिए इसने अपनी मृत्यु के वर्ष की भविष्यवाणी कर रखी थी;20२२ ईस्वी.साथ ही उसने यह भी घोषणा कर रखी थी कि उसकी मृत्यु के ८ साल बाद यानि २०३० ईस्वी में वह फिर से धरती पर आएगा;प्रेम साई के रूप में.लेकिन उसकी ये दोनों भविष्यवाणियाँ उसकी मौत के साथ ही झूठी साबित हो चुकी हैं.
     मित्रों,हालाँकि उसने गरीबों की भलाई के लिए अस्पताल और स्कूल भी खोले और इन कार्यों के लिए उसकी प्रशंसा भी की जानी चाहिए.लेकिन भारत में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है और उनमें से किसी ने आज तक स्वयं के अवतार होने का दावा भी नहीं किया है.कुछ लोग भारतीय परंपरा का हवाला देकर कह सकते हैं कि हमारे यहाँ मरे हुए व्यक्तियों की निंदा करना उचित नहीं माना जाता.अगर ऐसा मानना सही है तो फिर रावण और कंस जैसे पापियों के प्रसंगों को शास्त्रों से पूरी तरह हटा क्यों नहीं दिया जाता?किसी पापी का जो कर्म उसके जीवित रहते निंदनीय रहता है वह उसकी मृत्यु होते ही स्तुत्य कैसे हो जा सकता है?तो आईये मित्रों हम सब मिलकर ईश्वर से यह प्रार्थना करें कि वह सत्य साई और उसके जैसे सभी पाखंडियों की आत्माओं को शांति प्रदान नहीं करे और रौरव नरक में अनंत काल तक निवास दे.      

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

बिहार जहाँ आईने भी झूठ बोलते हैं

nitish
मित्रों,हिंदी में एक कहावत बहुत ही मशहूर है कि जब आप आईने के सामने खड़े हों और आपको अपने चेहरे पर दाग नजर आए तो आपको आईने को बुरा-भला कहने के बजाए अपना चेहरा साफ करना चाहिए.दोस्तों,लोकतंत्र में मीडिया आईने का काम करता है;समाज के लिए भी और सरकार के लिए भी.उसकी ही जिम्मेदारी होती है जनता को सच्चाई से रू-ब-रू करवाना.लेकिन बिहार में इनदिनों यह लोकतंत्र का आईना सचबयानी नहीं कर रहा.शासन और प्रशासन के चेहरे कई तरह के दागों से अटे-पटे पड़े हैं लेकिन मीडियारुपी आईना उन्हें जबरन साफ़-सुथरा दिखाने में लगा है.
      मित्रों,कभी कल्याण सिंह ने अटल बिहारी वाजपेयी को भाषणवीर का ख़िताब दिया था.आज बिहार में एक घोषणावीर शासन कर रहा है;जो रोज-रोज नई-नई घोषणाएं करता रहता है;परन्तु उन पर अमल नहीं करता.हालाँकि उसे यह भी अच्छी तरह से पता है कि सिर्फ बातें बनाने से बात नहीं बननेवाली;काम करके दिखाना भी जरुरी है.वह करता भी है तो करता कम है लेकिन दिखावा बहुत ज्यादा का करता है.
          मित्रों,बिहार में सर्वव्याप्त और रात दूनी दिन चौगुनी की रफ़्तार से बढ़ते भ्रष्टाचार की चर्चा कहाँ से शुरू करूं और कहाँ पर ख़त्म करूं समझ में नहीं आता?जहाँ भी निगाह जाती है घूसखोरी व कमीशनखोरी ही नजर आती है.राज्य का मुखिया पटना में बैठा-बैठा भ्रष्टाचार को जड़ सहित उखाड़ फेंकने का राग जुबानी खर्च अलापने में लगा है और भ्रष्टाचार उसी तरह बढ़ता जा रहा है जैसे कौए के टरटराते रहने पर भी धान सूखता रहता है.वह घोषणा करता है कि अब बिहार में भ्रष्टाचारियों की खैर नहीं.सारे भ्रष्टाचारियों के घरों को जब्त कर उनमें स्कूल खोले जायेंगे.लेकिन ईधर वह घोषणा करता रहता है और उधर भ्रष्टाचारी अपनी अवैध कमाई से हजारों नए घर बनवाने में लग जाते हैं.शुरुआत में दो-चार घर दिखावे के तौर पर जब्त भी किए जाते हैं और फिर सरकार कान में तेल डालकर सो जाती है.आज इस उद्देश्य से गठित विजिलेंस की विशेष यूनिट अधिकारीविहीन होकर अपने हाल पर रो रही है.
           मित्रों,घोषणावीर जी जनता से आह्वान करते हैं कि निगरानी विभाग को सूचना देकर घूसखोरों को पकड़वाईए.लोग उनके बहकावे में आ भी जाते हैं.परिणामस्वरूप कुछ लोग पकडे जाते हैं लेकिन एक हाथ से घूस लेते पकडे जाते हैं और दूसरे हाथ से घूस देकर छूट भी जाते हैं.फिर जो भी नुकसान उठाना पड़ता है वह उठाता है शिकायतकर्ता.बिजली के बारे में इनकी घोषणाओं को अगर लिपिबद्ध कर दें तो ब्रिटेनिका इनसाईक्लोपीडिया से भी मोटी पुस्तक तैयार हो जाएगी.श्रीमान वर्षों नहीं महीनों में बिजली की हालत सुधारने का दावा कर रहे थे लेकिन ज्यों-ज्यों समय बीता इस बेहया की बेवफाई बढती ही गयी.कब आए और कब चली जाए की भविष्यवाणी करने में निस्संदेह आज बेजान दारूवाला के गणेशजी भी सक्षम नहीं हैं.अब घोषणावीर जी इस दिशा में कुछ करने के बजाए सारा ठीकरा केंद्र के माथे फोड़कर बिजली संकट झेलिए और कौन उपाय है;का स्यापा गाने लगे हैं.करूं क्या आस निराश भई?
           मित्रों,गरीब बिहार भी इन दिनों महंगाई के ताप से तप रहा है और वो भी भारत के अधिकतर राज्यों से कहीं ज्यादा.घोषणावीर बाबू बारहा फरमा रहे हैं कि मुद्रास्फीति पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता है;यह तो केंद्र सरकार के इशारों पर नाचनेवाली मदारी है;वही जाने.लेकिन क्या सुशासन बाबू बताएँगे कि जबसे वे सत्ता में आए हैं तब से बिहार मुद्रास्फीति के मामले में पूरे भारत में अग्रणी क्यों बना हुआ है?क्या इसके लिए उनकी सरकार की अकर्मण्यता भी जिम्मेदार नहीं है?उन्हें जनवितरण प्रणाली को दुरुस्त करने से किसने रोक रखा है?यदि मुद्रास्फीति नियंत्रण में राज्यों की कोई भूमिका नहीं होती हैं तो फिर क्यों अलग-अलग राज्यों में इसकी दरें अलग-अलग हैं?
        मित्रों,घोषणावीर बाबू बड़े जोशोखरोश के साथ घोषणा करते हैं कि उनकी सरकार ने सभी मंत्रियों और अधिकारियों-कर्मचारियों के लिए संपत्ति की वार्षिक घोषणा करना अनिवार्य कर दिया है.सही है गुरु,स्वागत है आपकी सरकार के इस कदम का;लेकिन इन बाघरबिल्लों से यह कौन पूछेगा कि इतना माल आपने बनाया कैसे?अगर सरकार ऐसा नहीं करती है तो फिर संपत्ति की वार्षिक घोषणा करवाने का कुछ मतलब भी रह जाता है क्या?मित्रों,अपने घोषणावीर जी नियम से साप्ताहिक जनता-दरबार लगते हैं.यहाँ वे कथित रूप से जनता की शिकायतें सुनते हैं और उन्हें दूर करने के लिए तत्काल अधिकारियों को आवश्यक निर्देश देते हैं.उसके बाद जनता सम्बद्ध कार्यालयों के चक्कर लगाते-लगाते थक-हार कर घर बैठ जाती है;होईहें वोही जो राम रची राखा.मैं खुद ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जो जनता-दरबार गए लेकिन कई साल बीत जाने पर भी उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ.
        मित्रों,अपने घोषणावीर जी नालन्दा में अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय खोलने पर पूरी ताकत झोंके हुए हैं लेकिन उन्होंने पूरी स्कूली शिक्षा का किस तरह सत्यानाश कर दिया है;नहीं देख रहे और न ही मीडिया दिखा रही है.माना कि बिहार के स्कूलों की बिल्डिंगें अच्छी हो गयी हैं.बच्चों की चमचमाती साईकिलों से स्कूल-परिसरों की शोभा में चार नहीं दस-बीस चाँद लग गए हैं लेकिन शिक्षकों की बहाली में तो सिर्फ और सिर्फ धांधली ही हुई है न.अब कोई घोषणावीर जी से पूछे कि श्रीमान स्कूलों में बच्चों को पढ़ाएगा कौन;ये सोलह दूनी आठ वाले शिक्षक?बच्चे स्कूलों में क्या करने जाते हैं?सरकारी साईकिलें खड़ी करने,बिल्डिंग देखने या पढाई करने?कुछ अच्छे शिक्षक जो एकाध प्रतिशत हैं अपने को फंसा हुआ पा रहे हैं और लंका में विभीषण की तरह दिन गुजार रहे हैं.वैसे भी ५-७ हजार रूपये में सिर्फ दिन को काटा जा सकता है,मक्खन-मलाई को नहीं.
              मित्रों,बिहार में पिछले दो सालों से बरसात नहीं हुई है.पूरा बिहार दीर्घकालीन सूखे की चपेट में हैं लेकिन घोषणावीर बाबू की सैंकड़ों घोषणाओं के बावजूद राज्य के ९९% सरकारी नलकूप किसी-न-किसी वजह से बंद पड़े हैं.छह साल में थोक में की गयी सैंकड़ों घोषणाएं भी इन्हें चालू नहीं करवा पाईं.सरकार ने बड़ी कृपा करके सूखापीड़ित किसानों को डीजल अनुदान देने की घोषणा की लेकिन सारा डीजल मुखिया और उसके समर्थक पी गए,जरूरतमंद किसान कल भी आसमान के भरोसे था;आज भी उसे सिर्फ और सिर्फ उसी का भरोसा है.अब तो स्थिति इतनी बिगड़ गयी है कि बिहार के कई जिलों में बड़े-बड़े पेड़ भी सूखने लगे हैं.इसी तरह बिहार में परीक्षाओं में कदाचार रोकने की अनगिनत घोषणाएं पिछले ६ सालों में की गईं लेकिन घोषणाओं का क्या वे तो की ही जाती हैं कभी पूरा नहीं होने के लिए.
               मित्रों,बिहार में जनवितरण प्रणाली या भ्रष्टाचार वितरण प्रणाली वैसे कुत्ते की दुम है जिसने कभी सीधे रास्ते पर चलना ही नहीं सीखा.सारे प्रयोग-अनुप्रयोग इसे सीधा करने में जंग खा जाते हैं.जाहिर है अपनी आदतानुसार घोषणावीर जी ने इसे सीधा करने की भी घोषणा कई-कई बार की है देखिए वे कहाँ तक इसका बाल बांका कर पाते हैं.दोस्तों,बिहार में बिजली कनेक्शन और मीटर लगवाना पैदल कटिहार जाने से भी ज्यादा मुश्किल है.अगरचे आज अगर आप आवेदन देते हैं और साथ में घूस नहीं देते तो अगर आप भाग्यशाली हुए तो शायद आपके बेटे के जीते-जी कनेक्शन और मीटर लग जाए.हाँ एक और छोटी-सी मगर मोटी बात,जब भी आप कनेक्शन लेने जाएँ तो अच्छी तरह से देख-परख लें कि कनेक्शन उसी उपयोग श्रेणी में मिला भी है या नहीं जिसके लिए आपने आवेदन दिया था.अन्यथा घरेलू कनेक्शन की जगह कहीं व्यावसायिक कनेक्शन दे दिया गया तो नुक्ता के फेर से खुदा का जुदा हो जाना तय है.फिर या तो हजारों रूपये का बिल बिन बात का भरिये या फिर श्रेणी बदलवाने के लिए अधिकारियों की जेबें.
           मित्रों,अपना बिहार घोषणावीर बाबू के शासन में इतना ईमानदार हो गया है कि कोई भी नौकरीशुदा व्यक्ति यहाँ रिटायर होने में भी डरता है.इसलिए लोग बराबर सेवानिवृत्ति की उम्र-सीमा बढ़ाने की मांग करते रहते हैं.अगर फिर भी रिटायर होना ही पड़े तो पहले तो पेंशन चालू करवाने,फिर उसे सही करवाने और बाद में बकाया भुगतान के लिए आपको इतनी बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ेंगे कि आप सोंचेंगे कि बेकार में बिहार में रिटायर हो गया.इसलिए कुछ लोग रिटायर होने के बाद सीधे पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पहुँच जाते हैं.
              मित्रों,जनवरी महीने में हुए एक हत्याकांड ने पूरे बिहार के माननीयों को दहला दिया था.रूपम पाठक नाम की एक स्कूल अध्यापिका ने पूर्णिया के भाजपा विधायक राजकिशोर केसरी की सरेआम हत्या कर दी.इसके कई महीने पहले उसने विधायक पर बलात्कार का आरोप भी लगाया था,मुकदमा भी दर्ज कराया था;लेकिन उसकी फरियाद अनसुनी रही.सुनता भी कौन?सुननेवाले तो घोषणाएं करने में लगे हुए थे.इसलिए उसने सुनाने के बजाए दिखाने की ठान ली और फिर जो कुछ भी हुआ उसे पूरे भारत ने देखा.उसे गिरफ्तार किया गया और लगातार उस पर दबाव बनाया गया कि किसी तरह वह घरेलू महिला बलात्कार का आरोप वापस ले ले और कह दे कि मैं एक सुपारी किलर हूँ और मैंने यह हत्या सिर्फ पैसों के लिए की.बाद में सी.बी.आई. भी जाँच करने आई लेकिन उसे भी इस सुशासन-पीडिता पर दया नहीं आई.मानसिक प्रताड़ना का सिलसिला जारी है.साथ ही जाँच का नाटक भी मंचित हो रहा है.न्याय बलात्कार होने से खुद को बचा पाता है या नहीं वक़्त बताएगा लेकिन हालात जनता की अदालत में जो कुछ भी बयान कर रहे हैं;अच्छे नहीं हैं.अब आते हैं सरकारी अस्पतालों पर.इनके स्वास्थ्य के बारे में तो पूछिए ही नहीं.सरकार ने उन्हें उपकरण दे दिए,दवाएं भी दे दीं लेकिन चिकित्सकों को मानव-सेवा का जज्बा नहीं दे पाई.वो कहते हैं न कि रास्ता बताओ तो आगे चलो.इसलिए स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आ सका.आज भी वे मरघट के समान है जहाँ मरीज ईलाज करवाने नहीं कफ़न ओढने जाते हैं.यही स्थिति प्राईवेट नर्सिंग होमों और डॉक्टरों की भी है.वे मरीजों को ए.टी.एम. मशीन से अधिक कुछ नहीं समझते.आदम जात तो बिलकुल भी नहीं.
          मित्रों,पटना उच्च न्यायालय ने सरकारी व्यय के हजारों करोड़ रूपयों के उपयोगिता प्रमाण पत्रों को झूठा बता दिया है लेकिन घोषणावीर बाबू को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.ईधर पैसों की उत्तरोत्तर आक्रामक होती लूट जारी है हर दफ्तर में और उधर उनकी जिह्वा पर विराजमान होकर सरस्वती नित-नई घोषणाएं करने में जुटी है.न तो लूटनेवाले थकने की जहमत उठा रहे हैं और न ही घोषणावीर बाबू की जिह्वा ही रूकने का नाम ले रही लेकिन मीडिया में यह सब नहीं दिख रहा.उसके अनुसार तो बिहार में हरियाली ही हरियाली है.दुर्भाग्यवश मीडिया नामक शिकारी यहाँ खुद ही सरकारी विज्ञापन के लालच के चक्कर में शिकार हो गयी है.बिहार में इन दिनों इन आईनों के मायने बदल गए हैं.झूठे हो गए हैं वे.ऐसे में सुशासन के चेहरे का सच जनता को कौन बताएगा?हम ब्लौगरों की पहुँच ही कितनी है?

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

लागा आन्दोलन में दाग

shanti
मित्रों,कुछ ही दिनों पहले वर्तमान में विवादास्पद और पूर्व में कारपोरेट ईमानदारी का प्रतीक माने जानेवाले प्रसिद्द उद्योगपति रतन टाटा ने कहा था कि वर्तमान भारत में वक़्त जिस तरह करवटें ले रहा है उन्हें इस बात का अफ़सोस है कि वे बूढ़े हो जाने के कारण शायद उसकी परिणति के प्रत्यक्ष गवाह नहीं बन पाएँगे.क्या सचमुच यह कालखंड भारतीय इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण और युगप्रवर्तक कालखंड है?हो भी क्यों नहीं,पहली बार भारतीय भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट जो हुए.एक अन्ना हजारे नाम के दरम्याने कद के वृद्ध ने पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जागृति की सुनामी पैदा कर दी.ऐसी सुनामी जिसकी उम्मीद न तो स्वयं हजारे को थी और न ही केंद्र में सत्तारूढ़ भ्रष्ट राजनीतिक दलों को ही.सरकार अप्रत्याशित रूप से बहुत जल्दी झुक गयी और दे गयी अन्ना और उनके मित्रों को जीत की खुशफहमी.अन्ना और सरकार के बीच एक तरफ बातचीत चल रही थी तो दूसरी ओर सियासी शतरंज की बिसातें भी बिछाई जा रही थीं.चूंकि दूसरा पक्ष सियासतदान थे इसलिए सियासत तो होनी ही थी.हम सभी जानते हैं कि शतरंज के खेल में आरंभिक बढ़त का मतलब ही जीत नहीं हो जाती वरन अंत तक अपने राजा को बचाते हुए शत्रु पक्ष के राजा को घेरना और मारना पड़ता हैं.
         मित्रों,इस घोषित रूप से गैर सियासी लेकिन अनिवार्य रूप से सियासी बन चुके शह-मात के इस खेल में अन्ना और उनके मित्रों पर आरंभिक जीत की खुमारी कुछ इस तरह छाई कि वे चाल चलने में शुरुआत में ही भारी गफलत कर बैठे.उन्होंने अपनी तरफ से जिन लोगों को जनलोकपाल निर्मात्री समिति में शामिल किया उनमें से दो एक ही परिवार के थे;बल्कि बाप-बेटे ही थे और दागी भी थे.इस ज़माने में जबकि ईमानदारी से दो जून रोटी का जुगाड़ करना भी आसान नहीं है उनके पास अरबों की स्व-अर्जित संपत्ति थी.जाहिर है कांग्रेस और अन्य भ्रष्ट दलों के भ्रष्ट नेताओं के हाथों भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई लड़नेवालों की नेकनीयती पर प्रश्नचिन्ह लगाने का स्वर्णिम अवसर घर बैठे ही हाथ लग गया.रोज-रोज प्रख्यात वकील शांतिभूषण और प्रशांत भूषण के दामन पर कालिख उछाली जा रही है और असर पड़ रहा है भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही लडाई पर.भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई दिन-ब-दिन कमजोर पड़ती जा रही है.
              मित्रों,अन्ना ने अभी तक इन दोनों बाप-बेटों पर लग रहे आरोपों की सत्यता के या उनके संदिग्ध चरित्र के बारे में कुछ भी नहीं कहा है.बल्कि वे आश्चर्यजनक रूप से यह कुतर्क दे रहे हैं कि जिन लोगों ने जनलोकपाल बिल को तैयार किया है उन्हें तो समिति में रखना ही पड़ेगा,चाहे वे भ्रष्ट ही क्यों न हों.अन्ना जी मानें या नहीं मानें उनसे गलती तो हो ही चुकी है जो उन्होंने भ्रष्टाचार के शीश महलों पर उछालने के लिए पत्थर ऐसे हाथों में पकड़ा दिया जिनके खुद के ही घर शीशे के बने हुए थे.मैं समझता हूँ कि अन्ना जी ने ऐसा जानबूझकर नहीं किया होगा.वे सीधे-सादे व्यक्ति हैं और शायद उनकी राजनीतिक समझ कमजोर है.राजनीति जंतर मंतर पर बैठकर नहीं सीखी जा सकती बल्कि यह तो ऐसा खेल है जो दिमाग में और दिमाग से खेली जाती है.साथ ही यह वह शह है जिसके प्रभाव में आने से चाहे-अनचाहे कोई भी व्यक्ति नहीं बच सकता.
         मित्रों,इस लडाई को जो क्षति पहुंचनी थी;पहुँच चुकी है.अब आगे क्षति नहीं हो इसके लिए क्षतिपूर्ति में लग जाने का समय आ गया है.अन्ना जी को अविलम्ब शांतिभूषण और प्रशांत भूषण से इस्तीफा दिलवाना चाहिए और उनकी जगह एक तो किरण बेदी को और दूसरे किसी ईमानदार व विद्वान न्यायविद को लेना चाहिए.मित्रों,कोई भी आन्दोलन जनता का विश्वास खोकर न तो खड़ा ही किया जा सकता है और न तो आगे चलाया ही जा सकता है.हालाँकि भारत सरकार तो सुप्रीम कोर्ट में सार्वजानिक तौर पर मान चुकी है कि भारत में ईमानदार व्यक्ति नहीं बचे लेकिन मुझे उम्मीद है कि अगर अन्ना तलाशेंगे तो ऐसे कानूनविद मिल ही जाएँगे.मेरी दृष्टि में सुप्रीम कोर्ट में एक वरिष्ठ महिला वकील हैं जो अविवाहित हैं और ताउम्र गरीबों और कमजोरों के पक्ष में लडती रही हैं.साथ ही सारे वादों-विवादों से परे भी हैं.अगर अन्ना जी को आवश्यकता महसूस हो तो संपर्क करने पर मैं उनका नाम,पता और मोबाईल नंबर सहर्ष देने को तैयार हूँ.             

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

अन्ना तुम गद्दार तो नहीं हो

anna hajare
मित्रों,अपने बिंदास अंदाजे बयां के लिए मशहूर ओसेदुल्ला खान ग़ालिब ने क्या खूब कहा है-दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है,आखिर इस मर्ज की दवा क्या है;हमें उनसे वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है.मैं समझता हूँ कि अगर आज ग़ालिब होते तो यहाँ मर्ज की जगह भ्रष्टाचार होता.चाहे मुद्दा विकास का हो या भ्रष्टाचारमुक्त समाज की स्थापना का;आजादी के बाद से ही हम भारतवासियों के साथ सिर्फ धोखा-ही-धोखा हो रहा है.हम अपने जिन नुमाईन्दों को अपने प्रति वफादार समझ लेते हैं बाद में वे सिर्फ पैसों और कुर्सी के प्रति वफ़ादारी निभाने में लिप्त हो जाते हैं.
             मित्रों,जब अन्ना हजारे नाम से लोकप्रिय एक बूढा,अविवाहित,मंदिर में सोनेवाला आदमी भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जनलोकपाल के विकल्प के साथ देश के सामने आया और बिल के लागू होने तक आमरण अनशन करने की घोषणा की तो पूरे देश में उसके प्रति उम्मीद और समर्थन की लहर चल पड़ी.लेकिन हमने देखा कि सरकार ने प्रस्तावित समिति में उसे शामिल करने की घोषणा क्या कर दी,उसने अपना अनशन ही तोड़ दिया.खैर हमने यह सोंचकर कि हमें अनशन के चलने या टूट जाने से क्या लेना देना;असल मुद्दा तो है कि किसी तरह जनलोकपाल बिल संसद में पेश हो और अपने मूलस्वरूप में पारित हो.हमने यही सोंचकर अन्ना और उनके साथियों पर लग रहे विभिन्न प्रकार के आरोपों को नजरंदाज कर दिया और चट्टान की तरह उनके पीछे खड़े रहे.
          मित्रों,हमें अभी तक अन्ना के तेवरों को देखते हुए इस बात का आभास तक नहीं था कि हमारे साथ धोखा भी हो सकता है.लेकिन आज का अख़बार देखने के बाद मालूम हुआ कि अचानक अन्ना के राग बदल गए हैं.अब अन्ना जिस तरह बदले हुए सुर में बोलने लगे हैं हमें संदेह होने लगा है कि कहीं हमारे साथ एक बार फिर से धोखा तो नहीं हुआ है?कहीं एक बार फिर से हमने पत्थर को हीरा तो नहीं समझ लिया?कहीं अन्ना एंड कंपनी केंद्र की महाभ्रष्ट सरकार से मिली हुई तो नहीं है?
         मित्रों,भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई में टूट जाने लेकिन नहीं झुकने का दंभ भरनेवाले अन्ना अब यानि संघर्ष के प्रथम चरण में ही झुकते हुए से प्रतीत हो रहे हैं.उन्होंने हमारी उम्मीदों पर चैत के महीने में तुषारापात करते हुए कहा है कि सभी उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को प्रस्तावित लोकपाल के दायरे से बाहर रखा जाएगा.अन्ना ने ऐसा क्या सोंचकर और किस तरह की मजबूरी में आकर कहा है ये तो वही जानें.लेकिन मैं उनसे पूछता हूँ कि क्या उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय से रातोंरात भ्रष्टाचार समाप्त हो गया है?इलाहाबाद उच्च न्यायालय में व्याप्त भ्रष्टाचार को तो स्वयं सर्वोच्च न्यायालय स्वीकार कर चुका है.उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बालाकृष्णन पर पद का दुरुपयोग कर अकूत धन जमा करने के जो आरोप हैं क्या वे समाप्त हो गए हैं?क्या अब बालाकृष्णन और दिनकरण सरीखे भ्रष्ट न्यायाधीशों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की आवश्यकता समाप्त हो गयी है?क्या उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में व्याप्त भ्रष्टाचार अन्य क्षेत्रों यहाँ तक कि अधीनस्थ न्यायालयों में कायम भ्रष्टाचार से किसी मायने में अलग है?क्या उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में भ्रष्ट तत्वों के होने से अधीनस्थ न्यायालयों या देश से भ्रष्टाचार के समाप्त होने में किसी तरह की मदद मिलेगी?
       मित्रों,ऐसा हरगिज नहीं है.फिर अन्ना क्यों और कैसे समझौतावादी हो गए?मित्रों,मैं जहाँ तक समझता हूँ कि कोई भी समझौता झुकने की प्रक्रिया का अंत नहीं होता बल्कि केवल और केवल एक शुरुआतभर होता है.एक बार समझौता कर लेने के बाद आदमी समझौते पर समझौते करने लगता है.तो क्या अन्ना आगे और भी ज्यादा झुकनेवाले हैं और धीरे-धीरे भ्रष्टाचार से रसासिक्त सभी क्षेत्रों के अपराधी प्रस्तावित लोकपाल के दायरे से बाहर तो नहीं हो जानेवाले हैं?
               मित्रों,जाहिर है कि अभी यह एक परिकल्पनात्मक प्रश्न है.मैं यहाँ अन्ना और उनके सहयोगियों को स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि भारत की जनता को केवल और केवल जन लोकपाल चाहिए और अपने मूल स्वरुप में चाहिए.हम इसमें इसे कमजोर करनेवाला छोटा-से-छोटा संशोधन भी स्वीकार नहीं करेंगे.अन्ना जी अगर आप ऐसा करने को तैयार होते हैं चाहे कारण जो भी हो,तो देश की जनता आँख मूंदकर यही समझेगी कि आपलोगों ने उनके साथ धोखा किया है और आपलोग भी कतिपय नेताओं की तरह बिक गए हैं,गद्दार हैं. 

कैसी है तेरी दुनिया कैसा ये बसेरा है


fam

कैसी है तेरी दुनिया कैसा ये बसेरा है,
कहीं पे रौशनी है कहीं पे अँधेरा है;
कैसी है तेरी दुनिया कैसा ये बसेरा है.

अपने पास भी कुछ जमीन थी,
अपने भी कुछ काम थे;
अब तक जमीन के कागजातों पर पूर्वजों के नाम थे;
नामांतरण हेतु मैं गया अंचल कार्यालय में,
पैसे की मांग हुई उस सरकारी देवालय में;
लिखी हुई थी ईबारत,
शायद किसी ने की थी शरारत;
ईमानदारी की हर जगह क़द्र होती है,
झूठ है यह बेचारी तो हर जगह बेपर्द होती है;
रूक जाता है काम,बिन पैसों के मेरे राम;
किससे जाकर सुनें फरियादें अपने मन की,
हर तरफ घूसखोरी हर पद पे लुटेरा है,
कैसी है तेरी दुनिया कैसा ये बसेरा है.

मिलता है वृद्धावस्था पेंशन,हर लम्हा नया टेंशन;
आधी रकम दलाली में,आधी मुट्ठी खाली में;
थोड़ी-सी रकम में भला कैसे हो गुजारा,
लूटते थे फिरंगी पहले अब तो अपनों ने ही मारा;
बिना रजाई-कम्बल के कटता है जाड़ा,
ऐसे काटते हैं वक़्त लोग जैसे टूटा हुआ तारा;
उनके लिए हर लम्हा है परेशानी का सबब,
चाहे ढल रही शाम है या फिर चाहे सबेरा है;
कैसी है तेरी दुनिया कैसा ये बसेरा है.

अब पूछो उनकी जो हमको लूटते हैं,
अपनी सारी कमाई वो किस तरह फूंकते है;
पढ़ते हैं उनके बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में,
पढ़ते हैं हमारे बच्चे घुटने-भर धूलों में;
हमारे ही पैसों से बनाते हैं हमें नौकर,
खाते हैं रसगुल्ला रोज खोलते हैं लॉकर;
लुटेरे हैं लूटते हैं करते हैं पाप,
कहते हैं फिर भी हुजूर माई-बाप;
इनके बच्चे करते हैं सड़कों पर छेड़खानी,
लगाती है जब पिटाई होती है मानहानि;
ले आते हैं खरीदकर ये कोई भी चीज,
चाहे हो कारें या चाहे हो फ्रिज;
लगता है मानो पैसे नहीं बुलबुले हों,
सड़क चलते उठाए गए माटी के ढेले हों;
क्या यही गाँधी के सपनों का लोकतंत्र है,
जहाँ हर कोई अपनी मनमानी को स्वतंत्र है;
मूर्खों के राज में ढाई से अनाज के पीछे भागते हैं लोग,
राहत के नाम पर लूटते हैं घूस देकर छूटते हैं लोग;
लगता है डूबकर ही रहेगी मुल्क की कश्ती,
हर तरफ से इसको तूफानों ने घेरा है;
कैसी है तेरी दुनिया कैसा ये बसेरा है.

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

हाथी चले बाजार तो कुत्ता भूंके हजार

ds1

मित्रों,हुआ यूं कि एक बार कुछ हाथी किसी गाँव से होकर गुजर रहे थे.उनके साथ एक बच्चा हाथी भी था.जैसे ही झुंड गाँव में पहुंचा गाँव के कुत्तों ने भौंकना शुरू कर दिया.लेकिन इसका हाथियों पर कोई असर नहीं हुआ.वे अपनी मदमस्त चाल में चलते चले जा रहे थे.यह देखकर शिशु हाथी को घोर आश्चर्य हुआ.उसने अपनी माँ से पूछा कि बड़े हाथी कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे रहे?तब माँ ने समझाया कि हम इन्हें जब भी चुनौती देते है ये भाग खड़े होते हैं और जैसे ही हम आगे बढ़ने लगते हैं ये फिर से पीछे-पीछे भौंकना शुरू कर देते हैं.इसलिए हमारे लिए उचित यही है कि हम चुपचाप बिना कोई प्रतिक्रिया प्रकट किए अपने मार्ग पर चलते चलें.
                        मित्रों,इस तरह की एक और कहानी स्वामी विवेकानंद बड़े ही चाव से सुनाया करते थे.एक बार कोई लकडहारा जंगल में डाकुओं के हाथ लग गया.डाकुओं को जब उससे कुछ भी हाथ नहीं लगा तो उन्होंने गुस्से में आकर उसकी नाक काट ली.अब बेचारा कटी नाक लेकर अपने गाँव कैसे जाता सो जंगल में ही उसने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया और कुटिया बनाकर रहने लगा.धीरे-धीरे आसपास के लोगों को खबर हुई और वे उसे सिद्ध पुरुष समझकर खाने-पीने का सामान लाने लगे.जब भी कोई उससे कटी नाक का रहस्य पूछता तो वह बताता कि कुछ विशेष सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए उसे अपनी नाक का बलिदान देना पड़ा.कई लोग सिद्धि प्राप्त करने के लिए व्यग्र हो उठे.वह उन्हें रात के अँधेरे में बुलाता और उनकी नाक काट लेता.फिर जिनकी नाक कट गई वे भी उसी प्रकार का ढोंग करने लगे और दूसरों की नाक काटने लगे जिसका परिणाम यह हुआ कि कटी नाक वालों की एक बड़ी जमात खड़ी हो गयी.
         मित्रों,जबसे अन्ना हजारे के आगे भ्रष्ट कांग्रेस पार्टी को झुकना पड़ा है उसके नेता बुरी तरह बौखला गए हैं.वे अन्ना और उनकी टीम के पीछे कुत्ते की तरह पिल गए हैं.वे लगातार भौंक रहे हैं लेकिन जैसे ही अन्ना जवाब में कुछ बोलते हैं वे सीधे यूं टार्न ले ले रहे हैं.पहले सिब्बल ने भौंकना शुरू किया और अब कुतर्क शिरोमणि दिग्विजय अन्ना को भी नककटा सिद्ध करने में लग गए हैं.दिग्विजय इन दिनों पूरी तरह बेरोजगार हैं.उनका काम रह गया है सिर्फ देशविरोधी बयान देना जिससे वे राजमाता को खुश कर सकें.
           मित्रों,हमें इन कुत्ता सदृश व्यवहार करनेवाले तत्वों से सचेत रहना होगा.हमें इस नककटा गिरोह से अपनी नाक तो बचानी है ही साथ ही उन्हें भौंकने से रोकने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास कर अपनी ऊर्जा को नष्ट होने से भी बचाना है.हम लाख प्रयास कर लें इन्हें इनके कुकुरोचित व्यवहार से रोक नहीं सकते.इनका स्वाभाव ही ऐसा है.ये गोब्यल्स के सच्चे अनुयायी हैं,मक्कारी इनके रग-रग में है.
        मित्रों,अन्ना ने तो सिर्फ नरेन्द्र मोदी की प्रशासनिक क्षमता की प्रशंसा की थी.उन्होंने यह नहीं कहा कि मोदी पूरी तरह दूध के धुले हैं.फिर उन्होंने अकेले मोदी की ही बडाई नहीं की है.उन्होंने तो धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक नीतीश कुमार की भी प्रशंसा की थी.फिर कांग्रेसी सिर्फ मोदी को लेकर ही हंगामा क्यों कर रहे हैं?कारण स्पष्ट है कि वे डरे हुए हैं कि अन्ना के आन्दोलन का असर कहीं चारों राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों पर न पड़ जाए.इसलिए वे अन्ना पर बेतुका प्रहार करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे.साथ ही अन्ना को मोदी की श्रेणी में खड़ा कर देने से उन्हें उम्मीद है कि मुसलमान भाइयों का वोट तो मिल ही जाएगा.
           मित्रों,समझ में नहीं आता कि कांग्रेसी कौन-सा खेल खेल रहे हैं?खेल चाहे जो भी हो वे इसे स्वच्छ तरीके से तो नहीं ही खेल रहे.एक तरफ तो अनशन तुडवाने का श्रेय राजमाता सोनिया को देकर वे उन्हें ईमानदारी की प्रतिमूर्ति बना देने पर तुले हैं वहीं दूसरी और वे अन्ना को बेईमान सिद्ध कर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही लडाई को कमजोर भी कर रहे हैं.इस तरह का दोहरा खेल कांग्रेसी इंदिरा गाँधी के समय से ही खेल रहे हैं.आपातकाल के समय प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रधान सचिव रहे पी.एन.धर ने अपनी पुस्तक इंदिरा गाँधी,आपातकाल और लोकतंत्र में बताया भी है कि किस तरह श्रीमती गाँधी अपने मंत्रियों को पहले से ही सिखा देती थीं कि वे प्रस्ताव का विरोध करेंगी और आपलोग मेरा विरोध करना.इस तरह मनोवांछित प्रस्ताव भी पारित हो जाएगा और दुनिया यह समझेगी कि कांग्रेस पार्टी में खूब आतंरिक लोकतंत्र है.
                मित्रों,हमें गाँधी परिवार के इस खानदानी दोहरे चरित्र को समझना होगा और उनसे सावधान भी रहना होगा.ये लोग ऐसे जीव नहीं हैं जो आसानी से भ्रष्टाचार को समाप्त हो जाने दें.इसलिए वे हमारे साथ तरह-तरह के खेल खेलेंगे;तरह-तरह के व्यूहों की रचना करेंगे.हमें न केवल अभिमन्यु की तरह उनके बनाए चक्रव्यूहों में घुसना होगा बल्कि अर्जुन की तरह उनकी हर रणनीति पर विजय भी पानी होगी.अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम यह लडाई आरंभिक चरण में ही हार जाएँगे और प्रभावी लोकपाल की स्थापना और भ्रष्टाचारमुक्त भारत की नींव पड़ते-पड़ते रह जाएगी.

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

चुनाव उम्मीदवारों का या पैसों का


imagesec
मित्रों,अपने प्रतिनिधि को चुनने का अधिकार किसी भी लोकतंत्र में जनता का सबसे मूलभूत अधिकार होता है.भारत की जनता पिछले ५८ वर्षों से अपने इस अधिकार का प्रयोग करती आ रही है.आजादी के बाद कुछ वर्षों तक तो जनता उम्मीदवारों की योग्यता के आधार पर वोट डालती रही लेकिन इसी बीच उम्मीदवार पैसों के बल पर जनमत को प्रभावित करने का प्रयास करने लगे.शुरुआत में ऐसा करनेवाले लोग ईक्का-दुक्का थे लेकिन अब इस प्रवृत्ति ने संस्थागत स्वरुप ग्रहण कर लिया है.हालाँकि इसी बीच बंदूक के बल पर चुनाव जीतनेवाले चुनाव आयोग की सख्ती के कारण हाशिये पर चले गए हैं.
        मित्रों,सैद्धांतिक तौर पर तो चुनाव उम्मीदवारों की योग्यता और राजनीतिक दलों की नीतियों के आधार पर लड़े जाते हैं लेकिन व्यवहार में होता ऐसा नहीं है.होता यह है कि चुनावों में पैसा उम्मीदवार होता है,पैसा ही प्रचार करता है,पैसा ही वोट डालता है,पैसा ही चुनाव जीतता और फिर पैसा ही शासन (शोषण) करता है.अच्छे गुण मुंह ताकते रह जाते हैं और पैसा बाजी मार ले जाता है.इस समय तमिलनाडु,केरल,पश्चिम बंगाल और असम से और इनमें भी विशेषकर तमिलनाडु से जिस तरह उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं के बीच करोड़ों रूपये बाँटने की खबरें आ रही हैं वह किसी भी तरह भारतीय लोकतंत्र के शुभचिंतकों की तंदरुस्ती को बढ़ानेवाली नहीं हैं.अकेले तमिलनाडु में ही चुनाव आयोग पक्ष और विपक्ष द्वारा जनता के बीच बाँटने के लिए ले जाए जा रहे ४० करोड़ से भी अधिक रूपये जब्त कर चुकी है.उधर बंगाल में भी ममता बनर्जी जनता से अपील करती फिर रही हैं कि चाहे पैसे किसी भी राजनीतिक दल से ले लो;वोट मुझे ही देना.
     मित्रों,बिहार में भी इस दिनों पंचायत चुनाव की प्रक्रिया चल रही है.पिछले चुनावों में मेरी सबसे बड़ी दीदी श्रीमती सुनीता देवी डुमरांव से जिला परिषद् सदस्य पद के लिए चुनाव लड़ रही थीं.माहौल पक्ष में लग रहा था.तभी चुनाव के ठीक पहले वाली रात प्रतिद्वंद्वी के परिजनों ने मतदाताओं के बीच जमकर रूपये बांटे और देखते-ही-देखते हवा ही बदल गयी.इस बार भी गांववालों ने दीदी से खड़े होने का अनुरोध किया था लेकिन जीजाजी का तर्क था,जो सही भी था कि पिछली बार पैसा बांटकर विजयी होनेवाले उम्मीदवार ने अपने पद और अधिकार का दुरुपयोग करके खूब पैसा बनाया है इसलिए इस बार तो उसे सामने टिक पाना और भी मुश्किल होगा.
      मित्रों,यह बात किसी से भी छिपी हुई नहीं है कि पंचायत से संसद तक हमारे देश में चुनाव जीतनेवाला प्रायः प्रत्येक व्यक्ति काम करने की फ़िक्र में नहीं रहता बल्कि सही-गलत तरीके से पैसा बनाने के चक्कर में लगा रहता है.उसे पता होता है कि चुनावों के समय पैसे ही काम देंगे कोई काम काम नहीं देगा.इन तथ्यों से पूरी तरह अवगत होते हुए भी हमारी केंद्र सरकार ने सांसद क्षेत्रीय विकास निधि को २ करोड़ से बढाकर ५ करोड़ रूपये कर दिया है.इसका सीधा मतलब होगा कि अगले चुनावों में और उसके बाद भी विजयी होनेवाले उम्मीदवारों के पास जनता के बीच बाँटने के लिए काफी ज्यादा धन होगा जिससे अन्य उम्मीदवारों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी.
               मित्रों,कुल मिलाकर अभी चुनावों के मोर्चे पर गंभीर व प्रभावी सुधारों की गुंजाईश बनी हुई है.शीघ्रातिशीघ्र चुनाव सुधारों को प्राथमिकता के आधार पर लेते हुए कानून में केंद्र सरकार को ऐसे संशोधन करने चाहिए और ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे चुनावों में पैसों का खुल्लम खेल दरबारी बंद हो और विजयी होनेवाले उम्मीदवार अपने कर्तव्यों के प्रति गंभीर होने को बाध्य  हो जाएँ.इसमें कोई शक नहीं कि चुनावों में पैसों का जोर होने से कहीं-न-कहीं देश का विकास भी प्रभावित होता है.मैं मानता हूँ कि ऐसा होने के लिए खुद जनता भी दोषी है लेकिन सरकार सिर्फ जनता के कन्धों पर दोषों का बोझ डालकर अपने कर्तव्यों से मुंह नहीं मोड़ सकती.अगर वह ऐसा करती है तो फिर उसके होने का मतलब ही क्या है?क्या देश को सही दिशा में ले जाना,अग्रसर करना सरकार का प्रथम और अंतिम कर्तव्य नहीं है?

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

गर्व से कहो मैं भी अन्ना हूँ.

anna

मित्रों,जनलोकपाल विधेयक को लागू करवाने की दिशा में हमने आरंभिक सफलता प्राप्त कर ली है.हम नॉक आउट दौर में पहुँच गए हैं.अभी हमें फाइनल जीतने तक का लम्बा सफ़र तय करना है.सरकार ने प्रखर गांधीवादी अन्ना हजारे की लगभग सारी मांगें मान ली है.अन्ना ने सर्कार के सामने विधेयक को पारित करने के लिए १५ अगस्त तक का समय दिया है.अन्ना तो चाहते थे कि सरकार सीधे विधेयक को संसद का विशेष सत्र बुलाकर पारित कराये लेकिन ऐसा हो नहीं सका.फिर भी हमने सरकार को जहाँ तक झुकने के लिए बाध्य कर दिया है वह भी कोइ कम बड़ी उपलब्धि नहीं कही जा सकती.
                     मित्रों,कभी राष्ट्रपिता गाँधी भी इसी तरह सत्याग्रह किया करते थे और जनता की संघर्ष-क्षमता की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए आन्दोलन को बीच-बीच में वापस भी ले लेते थे.हमें उम्मीद है कि हमारा संघर्ष व्यर्थ नहीं जाएगा और अंततः सरकार को प्रभावी लोकपाल की व्यवस्था करनी ही पड़ेगी.जब अन्ना ने ५ अप्रैल को अनशन शुरू किया था तब सरकार ने उन्हें बिलकुल भी गंभीरता से नहीं लिया था.लेकिन जैसे-जैसे आन्दोलन जोर पकड़ने लगा और समर्थन बढ़ने लगा और सरकार के होश फाख्ता होने लगे.जल्दी ही देश दो भागों में बँट गया.पहला बड़ा भाग उन लोगों का था जो अन्ना के साथ थे और दूसरा अल्पसंख्यक भाग उन लोगों का था जो अन्ना के साथ नहीं थे.
             मित्रों,सफलता भले ही मिल गयी हो लेकिन मैं आन्दोलन को मिले जनसमर्थन से कतई प्रसन्न नहीं हूँ.२ करोड़ की दिल्ली और सवा अरब के भारत में सिर्फ कुछ हजार लोग ही खुलकर सामने आए.मेरे कुछ पत्रकार मित्र तो उल्टे मुझसे ही उलझ पड़े.उनका कहना था कि अन्ना की मांग तो सही है लेकिन उनका तरीका सही नहीं है.उन्हें उनका अनशन ब्लैक मेलिंग जैसा लगता है.मित्र,इस तरह तो भारत का पूरा स्वतंत्रता-संग्राम ही गलत साबित हो जाएगा.मैं अर्ज करना चाहता हूँ कि अन्ना की या हमारी लडाई किसी व्यक्ति-विशेष के विरुद्ध नहीं है.अन्ना ने तो इस अराजनैतिक आन्दोलन में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी आमंत्रित किया था जो पिछले कई वर्षों से भ्रष्टाचार के खिलाफ सिर्फ जुबानी खर्च करने में लगे हुए है.
             मित्रों,अन्ना ने कोई हिंसा का मार्ग नहीं अपनाया है,यह आन्दोलन पूरी तरह से सत्य और अहिंसा पर आधारित था,है और रहेगा.इससे किसी को भी किसी तरह का व्यक्तिगत नुकसान होने की आशंका भी नहीं है.साधन भी पवित्र,साध्य तो पवित्र है ही.फिर यह आन्दोलन कैसे अपवित्र हो गया?मेरे कुछ मित्र इस आन्दोलन के पीछे कुछ अदृश्य राजनैतिक हाथों को देख रहे हैं.यह आन्दोलन पूरी तरह से अराजनैतिक था फिर उन्हें कैसे अदृश्य राजनैतिक हाथ नजर आ रहा है,राम जाने.मुझे ऐसे लोगों की बुद्धि और दृष्टि पर तरस आता है.खुद तो परिवर्तन के लिए कोशिश करो नहीं और अगर कोई प्रयास करता भी है तो उसमें जबरन छिद्रान्वेषण करो.
              मित्रों,आन्दोलन की आरंभिक सफलता से यह पूरी तरह से साफ़ हो गया है कि  गांधीवाद आज भी पूरी तरह से प्रासंगिक है बशर्ते कोई सच्चा गांधीवादी इसका प्रयोग करे.इस आन्दोलन ने यह भी साबित कर दिया है कि जैसे हर धोती पहनने वाला गाँधी नहीं होता वैसे ही कोई व्यक्ति या परिवार नाम के आगे गाँधी शब्द जोड़ लेने मात्र से ही गाँधी नहीं हो जाता बल्कि गाँधी बनने के लिए गाँधी का सच्चा अनुयायी बनाना पड़ता है.इस संघर्ष में यूं तो कोई भी विपक्षी नहीं था लेकिन चूंकि अन्ना की मांग गाँधी परिवार नियंत्रित मनमोहन सरकार से थी इसलिए हम यह कह सकते हैं कि जहाँ आन्दोलनकारी एक विशुद्ध गांधीवादी था वहीं विपक्षी आजादी के बाद देश का सबसे ज्यादा समय तक शोषण करनेवाला गाँधी नाम धारी छद्म गांधीवादी परिवार था.
               मित्रों,इस समय के विपक्ष की भी अपनी अलग पीड़ा है.वह बार-बार सरकार से सर्वदलीय बैठक की मांग कर रहा है.वह चिंतित है कि समिति में उसे क्यों नहीं लिया गया.हे विपक्ष के नाकारा नेताओं!तुम्हें किसने रोका था भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सत्याग्रह करने से?लेकिन तुम सत्याग्रह करते भी कैसे?सत्ता पक्ष की तरह तुम भी तो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हो.
                  मित्रों,अंत में मैं आपसे कुछ निवेदन करना चाहूँगा.अन्ना ने कोई अमृतपान नहीं किया हुआ है जो वे हम भारतवासियों को हर युग में नेतृत्व प्रदान कर बचाते रहेंगे.भारतमाता को आज एक नहीं हजारों अन्ना चाहिए.भारत के प्रत्येक निवासी को अन्ना की तरह त्यागी,ईमानदार और साहसी बनाना पड़ेगा तभी भारत बचेगा.भगवान बुद्ध ने तो हमसे २५०० वर्ष पहले ही अप्पो दीपो भव का आह्वान किया था.लेकिन हम ढाई हजार साल बाद भी अपनी छोटी-से-छोटी समस्या के समाधान के लिए किसी मसीहा का इंतजार करते रहते हैं.मैं पूछता हूँ कि हममें और अन्ना में क्या अंतर है?हमारे भी दो हाथ,दो पैर,दो आँखें और एक दिमाग है फिर हम क्यों नहीं वही सब कर रहे जो अन्ना कर पा रहे हैं?क्या हमारा जीवन उनके जीवन से ज्यादा मूल्यवान है?नहीं न!तो फिर मैं यह उम्मीद क्यों न रखूँ कि जब भी देश को आपके त्याग व बलिदान की आवश्यकता होगी,आप बिलकुल भी पीछे नहीं हटेंगे.मित्रों,गर्व से कहो मैं भी अन्ना हूँ.

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

निराधारा मुजफ्फरपुर नगरी निरालम्बा सरस्वती

imagesjb

भक्त प्रवर रामकृष्ण परमहंस अक्सर कहा करते थे कोई स्थल तीर्थस्थल नहीं होता,तीर्थस्थान तो वहीं बन जाता है जहाँ महान आत्माएं निवास करती हैं.बिहार की सांस्कृतिक राजधानी कहलाने का गौरव धारण करनेवाला मुजफ्फरपुर अब तक आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री का निवास होने से तीर्थ बना हुआ था.चाहे साहित्यकार हो या साहित्यिक अभिरुचिवाला नेता-अभिनेता हो,उनकी बिहार यात्रा बिना निराला निकेतन की चौखट लांघे बिना पूरी ही नहीं होती थी.अब छायावाद का अंतिम छायादर वृक्ष हमसे छिन चुका है.मुजफ्फरपुर नगरी निराधार हो चुकी हैं और सरस्वती असहाय.सरस्वती का मानसपुत्र उम्रभर सरस्वती की निस्स्वार्थ सेवा करने के बाद मृत्यु अटल है की उक्ति को कटु सत्य साबित करता हुआ मृत्यु की गोद में सो गया,हमेशा-हमेशा के लिए.
          आचार्य श्री एक व्यक्ति नहीं थे बल्कि जीवंत इतिहास थे.उन्होंने कई महाकवियों के रचना-कर्म को ही नहीं देखा-परखा था बल्कि उनकी रचना-प्रक्रिया के भी एकमात्र जीवित साक्षी थे.निराला ने अपनी महान छंदोबद्ध कविता राम की शक्ति पूजा आचार्य श्री के साथ वाराणसी में रहते हुए ही लिखी थी और मेहनताने से मिले पैसे से दोनों ने छककर जलेबियाँ उडाई थी.आचार्य श्री को यह महान कविता पूर्णतः कंठस्थ थी और वे इसका कुछ इस अंदाज में पाठ करते थे कि स्वयं निराला ने भी माना था कि वे इस कविता का उतनी अच्छी तरह पाठ नहीं कर सकते जितनी अच्छी तरह से आचार्य श्री करते हैं.निराला के कहने पर ही आचार्य श्री ने संस्कृत छोड़कर हिंदी में कविता लिखनी शुरू की थी और इस प्रकार हिंदी को अपना हिंदी-कोकिल मिला,बिना वसंत के भी निरंतर मीठे गीत गाते रहनेवाला.
         आचार्य श्री पर निराला का इतना गहरा प्रभाव था कि उन्होंने जब मुजफ्फरपुर को अपना स्थायी निवास बनाया तो घर का नाम रखा निराला निकेतन.यह निराला निकेतन सिर्फ नाम से ही निराला नहीं था बल्कि काम से भी निराला था.इस घर में रहनेवाले बिल्ली,कुत्ता,गाय,खरगोश सभी आचार्य परिवार के सदस्य थे.इनकी जब मृत्यु हुई तो मानव की ही भांति इनका का भी अंतिम संस्कार किया गया वह भी परिसर के भीतर ही और उनकी समाधि भी बनाई गयी.हिंदी के अन्य कवियों ने तो अपनी रचनाओं में सिर्फ अमानवों का मानवीकरण ही किया था मानवीकरण अलंकार का प्रयोग करके;आचार्यश्री ने इन्हें सचमुच मानवों जैसा आदर और प्यार दिया;मानव बना दिया.आचार्य श्री सच्चे प्रकृति-प्रेमी थे पन्त की तरह और मानवता से ओत-प्रोत थे निराला की तरह.वे एकसाथ इन दोनों महान साहित्यिक व्यक्तित्वों को धारण करते थे.
             आचार्य श्री के अहसास की जद में सारा जमाना था.उन्होंने मुजफ्फरपुर के जिस भाग में घर बनाया उसे लोग चतुर्भुज स्थान के नाम से जानते हैं.यूं तो इस मोहल्ले का नाम भगवान विष्णु के ऐतिहासिक मंदिर के नाम पर रखा गया है लेकिन यह जगह ज्यादा प्रसिद्ध है रेड लाईट  एरिया यानि देह-व्यापार की मंडी के रूप में.शायद इसलिए भद्र लोग इस इलाके का नाम लेने में भी हिचकते हैं.लेकिन आचार्य श्री तो ठहरे मानवता के अनन्य पुजारी.चन्दन वृक्ष के समान पवित्र और शीतल.उन्हें तो सबसे प्यार था,पूरी दुनिया उनका परिवार थी;कोई उनका शत्रु नहीं था और न ही उनके लिए कोई पराया ही था.हालाँकि हिंदी के ठेकेदार आलोचकों ने उनकी घोर उपेक्षा की लेकिन आचार्य श्री सारी उपेक्षाओं और आलोचनाओं को नजरंदाज करते हुए निर्विकार होकर अपने रचना-कर्म के लगे रहे.
           सूरज आज भी पूरे ताव में चमक रहा है;उसे क्या लेना-देना इस बात से कि हिंदी साहित्याकाश का सूरज कल ही अस्त हो चुका है.अब मुजफ्फरपुर और मुजफ्फरपुरवासी कभी इस बात पर गर्व नहीं कर पाएँगे कि उनके शहर को छायावाद का अंतिम छायादार वृक्ष छाया दे रहा है.वर्तमान भूत बन चुका है.अपने पदचिन्हों को पीछे छोड़ते हुए अपनी यात्रा पूरी कर चुका है.एक युग का अंत हो चुका है लेकिन अभी दूसरे युग की शुरुआत नहीं हुई.हिंदी-भाषिक संसार जैसे ठिठक गया है,किंकर्तव्यविमूढ़-सा और विदाई दे रहा है अपने अंतिम महायात्री को उसकी महायात्रा के मौके पर.हे महामना!तुम्हें इस अकिंचन की और से भी शत-शत नमन;अलविदा.

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

कैसे बांधे बिल्ली खुद अपने ही गले में घंटी


cat
मित्रों,यह हमारे लिए बड़े ही हर्ष की बात है कि अन्ना के साथ अनशन पर बैठने वालों की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है.शुरू में जहाँ ३५ लोग उनके साथ जंतर-मंतर पर बैठे थे अब २०० लोग साथ दे रहे हैं.उम्मीद करता हूँ कि आगे इसी तरह लोग बढ़ते जाएँगे और कारवां लम्बा होता जाएगा.मैंने लाखों अन्य लोगों की तरह घर में ही ५ अप्रैल को एक दिन का अनशन रखा और आगे भी जब सुविधा होगी रखूंगा.
          मित्रों,इस बीच कई राजनैतिक दलों के नेता अनशनस्थल पर पहुंचे और इससे लाभ उठाने की कोशिश की.इनमें से कई तो ऐसे लोग भी थे जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप समय-समय पर लगते रहे हैं.जाहिर है कि ऐसे लोग कम-से-कम भ्रष्टाचार के खात्मे का सच्चा संकल्प लेकर तो नहीं ही आए होंगे.कुछ राजनीतिक दलों ने शुरूआती फायदे के लिए आन्दोलन का समर्थन तो कर दिया लेकिन अब नानूकुर पर उतर आए हैं दुर्भाग्यवश इसमें प्रमुख विपक्षी दल भाजपा भी शामिल है.
           मित्रों,कभी इसी तरह की सफल कोशिश गाँधी के उत्तराधिकारियों ने भी की थी.उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए गाँधी को तो अपना लिया लेकिन गाँधी की विचारधारा को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया.कुछ इसी तरह के प्रयासों में इस समय हमारे नेतागण लगे हुए हैं लेकिन अन्ना उन लोगों में से नहीं हैं जो इतिहास से सबक नहीं ले.इसलिए अन्ना और उनके समर्थकों ने गाँधी और गांधीवाद के हश्र से सीख लेते हुए किसी भी राजनीतिज्ञ को अनशनस्थल पर भाषण नहीं करने दिया.
      मित्रों,हमने बचपन में एक बड़ी ही साधारण-सी लगनेवाली असाधारण कहानी पढ़ी थी.जमीन के अन्दर की दुनिया के किसी भाग में रहनेवाले चूहे किसी बिल्ली के आतंक से परेशान थे.उन्होंने समस्या पर विचार करने के लिए एक सभा का आयोजन किया.जिसमें एक स्वर से यह निर्णय लिया गया कि बिल्ली के गले में एक घंटी बांध दी जाए.लेकिन समस्या यह थी कि घंटी बांधेगा कौन?कौन लेगा जान का जोखिम?इस समय अपने देश में भी पूरी तरह से समान तो नहीं लेकिन कुछ इसी तरह की समस्या है.जहाँ इस कहानी में चूहों को बिल्ली के गले में घंटी बांधनी थी यहाँ बिल्लियों यानि धूर्त नेताओं को आगे आकर खुद के गले में खुद अपने ही हाथों घंटी बांधनी है.आज अनशन का सिर्फ तीसरा दिन है और इसे मिल रहे व्यापक समर्थन से राजनीतिक दलों की पेशानी पर चिंता की लकीरें उभरने लगी हैं.देखिए ये बिल्लियाँ कब तक अपने गले में घंटी बांधती हैं?
    मित्रों,हमारे कुछ देशवासी इस समय क्रिकेट की खुमारी में खोये हुए हैं.मैं उन मित्रों से जल्द-से-जल्द इस खुमारी से बाहर आने का अनुरोध करता हूँ और उनसे भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़े गए महासमर के जुटने की अपेक्षा करता हूँ.आखिर यह लडाई सिर्फ अन्ना की नहीं है या हमारी नहीं है.यह हम सबकी लडाई है,हम सबसे सम्बंधित है इसलिए इसके साथ हम सभी को सम्बंधित होना चाहिए.याद रखिए,क्रिकेट जहाँ हमारे जीवन के एक बहुत-छोटे से पक्ष को प्रभावित करता है वहीं भ्रष्टाचार की जद से कुछ भी बाहर नहीं है,क्रिकेट भी नहीं.

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें भ्रष्टाचार मुक्त भारत दूंगा


3

मित्रों,भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध शुरू होने में अब कुछ ही घंटे शेष बचे हैं.यह युद्ध इस दिशा में प्रथम संग्राम होगा या आखिरी;भविष्य में पता चलेगा.लेकिन हमें एक साथ दोनों तरह के भावों को धारण करना होगा.हमें इस युद्ध को इतनी गंभीरता और इतनी ताकत से लड़ना होगा जैसे कि यह हमारी अंतिम लडाई हो.साथ ही हमें इसके लम्बा खींचने की स्थिति के लिए कमर कसकर रखनी होगी.
               मित्रों,अभी कुछ ही घंटे हुए हैं जब हमारे प्यारे देश को एशिया-प्रशांत क्षेत्र का चौथा सबसे भ्रष्ट देश घोषित किया गया है.हमारा तंत्र ऊपर से नीचे तक भ्रष्ट है.बिना घूस दिए हमारा कोई काम नहीं होता फिर भी हम मुर्दे की तरह मूकदर्शक बने हुए हैं.क्या हमारे जिस्म का खून पानी में बदल गया है?कहाँ गया वह महाराणा प्रताप,छत्रपति शिवाजी,भगत सिंह,आजाद जैसे सूरमाओं के जिस्म में बहनेवाला गरम खून?मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा कि हमारे पूर्वज ऐसे जियाले थे;लेकिन यही सच है.
              मित्रों,हमें नहीं चाहिए युधिष्ठिर जैसा यथास्थितिवादी और समझौतावादी.हमें तो भीम और अर्जुन जैसे उष्म रक्तपायी चाहिए.दोस्तों,बगावत जवानी का दूसरा नाम है.जब ८० साल की अवस्था में बाबू कुंवर सिंह का खून देश की दुर्दशा को देखकर खौल सकता है,७३ साल की आयु में अन्ना हजारे युद्ध का ऐलान कर सकते हैं तो हम तो नौजवान हैं.फिर हमारा खून देश की दशा को देखकर क्यों नहीं उबाल खा रहा?
              मित्रों,गुलामी सिर्फ भौतिक अवस्था का नाम नहीं है बल्कि उससे कहीं ज्यादा यह एक मानसिक दशा है.भौतिक रूप से हम भले ही १५ अगस्त,१९४७ को आजाद हो गए हों मानसिक रूप से हम आज भी गुलाम हैं,लालच के,स्वार्थ के और कायरता के.इस गुलामी से बाहर आना असंभव नहीं है क्योंकि यह ओढ़ी हुई गुलामी है.परन्तु इसके लिए हमें अपने भीतर भगत और आजाद जैसा देशभक्ति का उन्माद पैदा करना होगा.
                    मित्रों,अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के सर्वनाश के लिए युद्ध का शंखनाद कर दिया है.जब अन्ना की बूढी-सूखी धमनियां भारतमाता के लिए रक्त बहाने को कसमसा रही हैं तो क्या हम उनसे भी ज्यादा बूढ़े हैं?हम जिस दमघोंटू भ्रष्टतंत्र में जी रहे हैं उसे अगर जड़मूल से समाप्त करना है तो आईये हाथ से हाथ मिलाएं.कल्पना कीजिए अगर एकसाथ करोड़ों युवा हाथ धक्का देंगे तो कौन-सी दीवार नहीं ढहेगी?कहना न होगा इन्हीं युवा हाथों ने तो कभी दुनियाभर में फैले अतिशक्तिशाली अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिलाकर रख दी थी.मित्रों,अगर आपको शोषण की जगह शासन चाहिए,भ्रष्टपालिका की जगह न्यायपालिका चाहिए तो उतर आईये सडकों पर,गलियों में और रोक दीजिए भ्रष्टसत्ता और व्यवस्था के फेफड़ों की और जानेवाली हवा और खून का रास्ता.मैं जानता हूँ और मानता हूँ कि चूंकि इस बार लड़ाई अपनों से है इसलिए आसान नहीं है.लेकिन मैं आपसे यह वादा करता हूँ कि हे भारत के युवाओं,तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें भ्रष्टाचार मुक्त भारत दूंगा.इस समय मेरे पास भी आपको और देश को देने के लिए सिवाय खून और पसीने के कुछ भी नहीं है.   

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

यह रेडियो मूर्खिस्तान है

imagesयह रेडियो मूर्खिस्तान है.अब आप दन्त खिसोर सिंह से समाचार सुनिए.प्रधानमंत्री मगन मोहन सिंह ने कहा है कि वह अर्द्धरात्रि बाद इस्तीफा देने जा रहे हैं.उन्होंने कहा कि लगातार ६ सालों तक कठपुतली डांस करने के चलते उनकी कमर में खिंचाव आ गया है और डॉक्टरों की राय है कि उन्हें अब आराम करना चाहिए. 
               सरकार जन लोकपाल बिल संसद में लाने को तैयार हो गयी है.उसका मानना है कि उसके सभी मंत्री भ्रष्ट हैं और उनकी असली जगह मंत्रालय नहीं जेल है.इस आशय की जानकारी सूचना एवं प्रसारण मंत्री लम्बिका सोनी ने हमारे संतापदाता को अर्द्धरात्रि के बाद मंत्रिमंडल की बैठक की समाप्ति के बाद नॉर्थ ब्लाक के पिछवाड़े से बाहर निकलते हुए दी.
                अभी-अभी प्राप्त सूचना के अनुसार हमारे कृषिमंत्री निर्धन पवार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और घोषणा की है कि वे भी ५ अप्रैल से महान गांधीवादी अन्ना हजारे के साथ जंतर-मंतर पर अनशन करेंगे.उन्होंने हमारे संतापदाता को जानकारी दी कि वे युवावस्था से ही अनगिनत घपले-घोटालों में लिप्त रहे हैं.रूपया गिनते-गिनते उनकी ऊंगलियों में स्थाई रूप से सूजन आ गयी है और जनता के साथ झूठ बोलते-बोलते मुंह टेढ़ा हो गया है.अब वे देशहित में कुछ अच्छा काम भी करना चाहते हैं इसलिए उन्होंने इस्तीफा दिया है.
              कल रात पश्चिम बंगाल के मूर्खिदाबाद के पास दो मालगाड़ियों की टक्कर में सैंकड़ों यात्री हताहत हुए.गर्मियों में धूलभरी हवा से होने वाली रेल दुर्घटना के डर से रेल मंत्री सुश्री रमता बनर्जी ने रेलवे को माल गाड़ियों में यात्रियों को ढोने के निर्देश दिए थे.दुर्घटनास्थल पर सुश्री बनर्जी ने प्रत्येक मृतक से १ लाख रूपये और प्रत्येक घायल से २ लाख रूपये लेने की घोषणा की.
                वर्ष २०११ की जनगणना के आंकड़े अंतिम रूप से घोषित कर दिए गए हैं.आंकड़ों के अनुसार सरकारी अन्यमनस्कता के चलते भारत में स्त्री जन्म दर में उल्लेखनीय प्रगति हुई है.अब प्रति १००० पुरुष शिशु के जन्म पर ९१४ स्त्री शिशु जन्म ले रहे हैं.वित्त मंत्री ढनढन मुखर्जी ने आंकड़ों पर ख़ुशी जाहिर करते हुए कहा है कि इस तरह करोड़ों युवा अविवाहित रह जाएँगे जिससे जनसँख्या में भारी कमी आएगी.
                आज काबुल ओलंपिक के अंतिम दिन भारतीय खिलाडियों का दबदबा रहा.भारतीयों ने भ्रष्टाचार की सभी स्पर्धाओं में स्वर्ण जीतते हुए नए कीर्तिमान स्थापित किए.उधर जनता की छोटी-छोटी खरीदारी पर भी भारी करारोपण करनेवाली केंद्र सरकार ने क्रिकेट विश्व कप से आई.सी.सी. को होनेवाली अरबों रूपये की आय को करमुक्त घोषित कर दिया है.सरकार का मानना है कि इससे सरकारी खजाने को कोई क्षति नहीं होगी,उल्टे लाभ होगा जिस तरह का लाभ २-जी स्पेक्ट्रम घोटाले से हुआ था.
               और अंत में मौसम का हाल.असफल हो गए उपग्रह डिनर सेट से आए चित्रों से पता चलता है कि इस साल भी जलवायु परिवर्तन के बुरे असर के कारण पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में सूखे की स्थिति रहेगी जबकि राजस्थान और गुजरात के रेगिस्तानी इलाकों में भारी वर्षा होगी.इस विकट स्थिति से निपटने के लिए राजस्थान व गुजरात के लोगों को बिहार,बंगाल,असम,मेघालय व पूर्वी उत्तर प्रदेश में व इन क्षेत्रों के लोगों को जबरन गुजरात और राजस्थान में बसाया जाएगा.सरकार की इस घोषणा से पूरे देश में हर्ष का माहौल है.
                  इसके साथ ही रेडियो मूर्खिस्तान से यह समाचार बुलेटिन समाप्त हुआ.अगला बुलेटिन अगले मूर्ख दिवस पर प्रसारित किया जाएगा.इंतजार करने की कोई जरुरत नहीं है.