रविवार, 19 अगस्त 2018

सिर्फ नारों से नहीं होगी भारत की जय

मित्रों, जब भी स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस आता है हमारे भीतर देशभक्ति का सोडा वाटर जैसा जोश उमड़ने लगता है. इधर दिन गुजरा और उधर जोश गायब. इन दो दिन हम खूब नारे लगाते हैं भारत माता की जय. मानों हमारे नारे लगाने से ही भारत माता की जय हो जाएगी और हमारा देश दुनिया का सिरमौर बन जाएगा. अगर ऐसा होता तो आज हमारा देश शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, प्रति व्यक्ति आय, परिवहन आदि प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ा हुआ नहीं होता. चीन और भारत की एक समय एक बराबर जीडीपी थी आज उनकी हमारी से चार गुना से भी ज्यादा है. क्योंकि चीन के लोग सिर्फ नारे नहीं लगाते बल्कि राष्ट्र और राष्ट्र निर्माण के प्रति सच्ची निष्ठा रखते हैं. हमारी तरह सिर्फ अधिकारों की बात नहीं करते बल्कि उससे कहीं ज्यादा निष्ठा के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं.
मित्रों, सिर्फ नारों से अगर देश का विकास होना होता तो बेशक हमारा देश सबसे आगे होता. हमारे-आपके घर के पास सड़क बनती है, स्कूल बनते हैं, शौचालय बनते है हम कभी यह देखने नहीं जाते कि निर्माण की गुणवत्ता कैसी है, इंजिनियर, ठेकेदार कोई अपने कर्तव्यों पर ध्यान नहीं देता, अस्पतालों में मरीज जमीन पर पड़े-पड़े कराहते रहते हैं डॉक्टर और नर्स गायब रहते हैं, बैंकों में बिना कमिशन दिए लोन नहीं मिलता, जज घूस लेकर फैसला सुनाते हैं, शिक्षक पढ़ाते नहीं है, ट्रेनों में बेटिकट यात्रा करना वीरता मानी जाती है, अधिकारी दरिद्र को नारायण तो क्या इन्सान तक नहीं मानते. शोचनीय है कि जब हममें से कोई अपने कर्तव्यों का पालन करेगा ही नहीं तो देश चीन से कैसे टक्कर लेगा? उस पर तुर्रा यह कि हमें देश में हर चीज दुरुस्त चाहिए और मुफ्त में चाहिए. सडकों पर दुर्घटनाओं के शिकार तड़पते रहते हैं हम ध्यान तक नहीं देतेऔर लोग आते-जाते रहते हैं क्योंकि मरनेवाला हमारा सगा नहीं होता, छेड़खानी होती रहती है लेकिन हम चुप रहते हैं क्योंकि लड़की हमारी कोई नहीं होती है. तथापि अगर हमारा कोई अपना इस तरह की परिस्थितियों में फंस जाता है तो हम इंसानियत की दुहाई देने लगते हैं कि लोगों ने अस्पताल क्यों नहीं पहुँचाया, छेड़खानी का विरोध क्यों नहीं किया?
मित्रों, कहने का तात्पर्य यह है कि हम निहायत स्वार्थी थे, हैं और रहेंगे. संकट जब तक हमारे अपनों पर नहीं आता, जब तक हम सीधे-सीधे प्रभावित न हों हम आखें मूंदे रहते है. हम बोलेंगे नहीं मौका मिलने पर जमकर भ्रष्टाचार भी करेंगे लेकिन हमें सरकारी सेवाएँ दुरुस्त और भ्रष्टाचारमुक्त चाहिए. आज सरकार सबकुछ निजी क्षेत्र के हवाले करती जा रही है, कल शायद हमारे पास स्वच्छ पानी पीने और स्वच्छ हवा में साँस लेने की भी आजादी नहीं रहेगी, सबकुछ बड़ी-बड़ी कंपनियों के हाथों में होगा लेकिन हम बेफिक्र है और इन्टरनेट पर व्यस्त हैं. अभी ही देश की ८० फीसदी से भी ज्यादा संपत्ति १० प्रतिशत सबसे धनी लोगों के पास है और सरकार की कृपा से अमीरी-गरीबी के बीच की खाई रोजाना बढती ही जा रही है. जैसे-जैसे सरकार विभिन्न क्षेत्रों से अपना हाथ खीचेगी, सरकारी प्रतिष्ठानों के साथ spoil and sell अर्थात पहले बर्बाद करो फिर बेच दो की नीति पर चलती रहेगी हमारे जीवन से जुड़े हर पहलू पर निजी क्षेत्र का कब्ज़ा बढ़ता जाएगा. हमारी आजादी खतरे में है और हम बेखबर हैं इन्टरनेट पर पर व्यस्त हैं. हमारे पास
रात के २ बजे तक कुछ भी सोचने का समय नहीं है.
मित्रों, जब तक हम इस तरह की सोंच रखेंगे हो ली भारतमाता की जय. तब तक तो भारत नीचे से ही नंबर एक आता रहेगा, तब तक चीन और पाकिस्तान हमें आंख दिखाते रहेंगे चाहे हम कितनी भी बड़ी सेना क्यों न खडी कर लें क्योंकि देश का बल सेना नहीं होती जनता होती है जनसामान्य की देश के प्रति निष्ठा होती है. तो मित्रों, संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों के साथ मौलिक कर्तव्यों को भी जानिए, उनका पालन करिए, सरकारी नीतियों के प्रति सजग रहिए और फिर लगाईए नारा-भारत माता की जय!

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

अच्छा हुआ कि अटल तुम चले गए

मित्रों, गीता कहती है जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। अर्थात पैदा हुए की जरूर मृत्यु होती है और मरे हुए का जरूर जन्म होता है. अटल जी भी हमारी तरह जीव थे, मानव थे इसलिए उनका मरना भी तय था. यह सही है कि आज देश में शोक की जबरदस्त लहर है लेकिन मैं समझता हूँ कि वे पिछले कई सालों से जिस तरह का कष्ट भोग रहे थे और जिस तरह की बीमारी से ग्रस्त थे उनका चले जाना ही ठीक था. हमारे देहात में कहा जाता है कि चलते-फिरते मौत आ जाए तो सबसे अच्छा. फिर हमें कैसे अच्छा लगता कि हमारा प्रिय, हमारा आदर्श शारीरिक यातना भोगे. वैसे मैं समझता हूँ अटल जी की बीमारी उनके लिए वरदान भी थी क्योंकि अगर वे आज स्वस्थ होते तो आज के राजनैतिक हालात और राजनैतिक संस्कृति से उनको अपार मानसिक पीड़ा होती जिससे वे रोजाना मर रहे होते. कम-से-कम अपने शव पर फूल चढाने आए स्वामी अग्निवेश की पिटाई से उनतको मरणान्तक पीड़ा जरूर होती.
मित्रों, वैसे मेरा मानना है कि अटल फिर आएँगे, फिर से जन्म लेंगे वादा जो किया है मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?  और भारत में ही जन्म लेंगे क्योंकि यही वह धरती है जहाँ जन्म लेने को देवता भी लालायित रहते हैं इसलिए उदास नहीं होईए. वैसे सच पूछिए तो उदास तो मैं भी हूँ, मेरी ऑंखें बार-बार भर आ रही हैं, मेरी लेखनी भी रो रही है हाथ बार-बार रूक जा रहे हैं लिखते-लिखते लेकिन नियति के आगे आप-हम सब बेबस हैं. कुछ कर नहीं सकते. कोई कुछ नहीं कर सकता. विश्वास नहीं होता कि जिनका भाषण सुनने के लिए हमने कई बार मीलों रेल और बस यात्रा की. जिनका प्रत्यक्ष भाषण सुनते हुए मन कभी नहीं थका और लगातार-उत्तरोत्तर लालची होता गया कि कुछ मिनट और यह स्वर कानों में पड़ता रहे, कुछ देर और, कुछ देर और, जिनको सामने देखकर सर गर्वोन्नत हो जाता था कि हमने उनको अपनी नंगी आँखों से देखा है वह मधुर छवि वही मधुर छवि हास्यम मधुरम, वाक्यम मधुरम, दृश्यम मधुरम अब हमारे आगे से जा चुकी है, दूर बहुत दूर.
मित्रों, मेरे पास उनके साथ निकाली गयी कोई तस्वीर नहीं है. मेरी उनसे कभी मुलाकात भी नहीं हुई लेकिन फिर भी हमेशा बालपन से ही मेरे मन में उनके प्रति स्वतःस्फूर्त श्रद्धा रही, प्रेम रहा, वो भी अनंत. मैं कल्पना करता कि क्या मैं उनकी शैली में भाषण कर सकता हूँ यद्यपि मैं जानता था कि उनके जैसा कोई दूसरा नहीं हो सकता और न ही उनकी तरह वक्तृता कर सकता है. उनके भाषणों को सुनना मेरी दीवानगी थी. हम कई दिन पहले से इंतजार करते कि आज वो बोलनेवाले हैं. उनको जुमले नहीं आते थे न ही उनको अपने ऊपर कोई अभिमान था. वे सवालों से डरते नहीं थे बल्कि उनका मजा लेते. कोई काम उनसे नहीं होता तो जनता से सीधे माफ़ी मांग लेते कि हमने नहीं हुआ, कभी बहाना नहीं बनाया, उनका शरीर क्रमशः जवान और बूढा जरूर हुआ लेकिन उनका दिल हमेशा एक बच्चे का रहा, सीधा और सच्चा. किसी की बडाई करनी है तो करनी है और किसी की आलोचना करनी है तो करनी है लेकिन मर्यादा का बिना उल्लंघन किए, मीठे शब्दों में.
मित्रों, मुझे याद है कि जब वे २००४ में चुनाव हारे थे तब हमने दो दिनों तक खाना नहीं खाया था लेकिन आज मैं खाना खाऊंगा क्योंकि वो मरा नहीं है मुक्त हुआ है एक ऐसी लाईलाज बीमारी की यातना से जिसमें आदमी जिंदा लाश बनकर रह जाता है. अभी कुछ दिन पहले महनार में जब मैं प्रसिद्ध साहित्यकार प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन से मिलने गया था जो इसी बीमारी से ग्रस्त थे और अपनी सुध-बुध खो बैठे थे तब मैंने उनके लिए भी ईश्वर से यही प्रार्थना की थी कि हे प्रभु इस महामानव को मुक्त कर दे. यद्यपि मुझे लगता है कि ईश्वर तो अटल जी को वर्षों पहले ही अपने पास बुला लेना चाहता था लेकिन यह करोड़ों देशवासियों का अटल प्यार ही था जो भगवान को भी बार-बार सोंचने पर मजबूर कर देता था और हाथ रोक लेने को बाध्य कर देता था. अटल तुम अपनी तरह के अकेले थे न कोई तेरे जैसा हुआ है न होगा, अलविदा मेरे बालकृष्ण....
मित्रों, अंत में मैं जयपुर निवासी शिव कुमार पारिक का आभार प्रकट करना चाहूँगा जिन्होंने १९५७ से अंतिम साँस तक हमारे प्रिय नेता की छाया की तरह साथ रहकर पूर्ण निस्स्वार्थ भाव से सेवा की.

सोमवार, 13 अगस्त 2018

क्या भारत में अघोषित आपातकाल है

मित्रों, इस साल न जाने क्यों भाजपा व संघ परिवार से जुड़े लोगों ने आपातकाल पर खूब चर्चा की। चर्चा करने में कोई हर्ज भी नहीं है। चर्चा होनी चाहिए। जब चुनाव नजदीक हो तो कांग्रेस शासन की ज्यादतियों पर और भी जोर-शोर से चर्चा होनी चाहिए। तथापि विचारणीय यह भी है कि इस चर्चा का उद्देश्य क्या है.
मित्रों, वर्तमान भारत में अभिव्यक्ति की आजादी की जो स्थिति है और जिस तरह से मोदी सरकार ने विरोधी स्वरों को दबाना शुरू कर दिया है उससे तो मुझे ऐसा लगता है और ऐसा लगने में मैं कोई बुराई भी नहीं मानता कि इस सारी कवायद का उद्देश्य मानो यह दिखाना है कि हमने अब तक वैसा कुछ नहीं किया है या उस हद तक मीडिया को जलील नहीं किया है जैसा कि इंदिरा जी ने किया था. मोदी सरकार शायद कलमवीरों को यह दिलासा देना चाहती है कि हमने  आपको सिर्फ बाधित किया है जेल तो नहीं भेजा. हमने अघोषित रूप से आपातकाल लगाया है उसकी घोषणा तो नहीं की.
मित्रों, २३ अप्रैल २०१४ को एबीपी न्यूज़ को दिए इंटरव्यू  क्या आपने देखा मोदी का अब तक का सबसे कठिन ईंटरव्यू? में मोदीजी से पूछा था कि क्या आप भविष्य में हमारे साथ भी सख्ती बरतेंगे तो मोदी जी ने हँसते हुए कहा था कि यह आपके व्यवहार पर निर्भर करेगा. कदाचित मुझे लगता है कि मीडिया को दबाने की कोशिश १९७५ से पहले और १९७७ के बाद कभी बंद ही नहीं हुई. हाँ, बांकी की सरकारों ने जो परदे के पीछे से किया और कर रही है इंदिरा जी ने खुलेआम किया. हम इतिहास की किताबों में पढ़ते हैं कि वर्नाकुलर प्रेस एक्ट,१९७८ अमृत बाज़ार पत्रिका को दबाने के उद्देश्य से लाया गया था लेकिन आपको किसी ने नहीं बताया होगा कि मोदी सरकार न्यूज़ पोर्टल्स को नियमित करने के लिए जो एक्ट लाने जा रही है वो वायर न्यूज़ पोर्टल को नियंत्रण में लाने के लिए लाने जा रही है.
मित्रों, अभी पुण्य प्रसून वाजपेयी को जिस तरह से पहले मास्टर स्ट्रोक का प्रसारण बाधित करके तंग किया गया और बाद में चैनल से ही चलता कर दिया गया और वे चैनल पर जिस तरह के आरोप लगा रहे है उनको देखते हुए आप कैसे इस बात की कल्पना भी कर सकते हैं कि देश में मीडिया आजाद है? कार्यक्रम मोदी सरकार के खिलाफ भले ही हो आप उनमें न तो मोदी का नाम ही लेंगे और न ही मोदी के फूटेज ही दिखाएंगे. हद हो गयी यार. यद्यपि मैं वाजपेयी जी का कटु आलोचक रहा हूँ लेकिन फिर भी यह गौर करने वाली बात है कि जब इतने बड़े पत्रकार के साथ चैनल ऐसा कर सकता है कि नाचो मगर पांव में रस्सी बांधकर तो फिर सरकार विरोधियों का अंतिम ठिकाना न्यूज़ पोर्टल ही तो बचता है.
मित्रों, जहाँ तक हमारा और हमारे जैसे उद्दाम-निष्काम देशभक्तों का सवाल है तो हमें तो हर सरकार में दबाया गया है. एक समय हम भड़ास के दिग्गज लेखकों में से थे लेकिन २०१५ के चुनावों में नीतीश सरकार ने यशवंत जी को विज्ञापन की बोटी देकर वहां से हमें निष्कासित ही करवा दिया. आज भी विचारधारा और नीति के नाम पर मुझे कभी यहाँ तो कभी वहां लिखने से रोका जाता है. मुझे याद आता है कि प्रसिद्ध इतिहासकार लेनपुल ने दीने इलाही को अकबर की मूर्खता का स्मारक बताया था। कारण अकबर से इसके कारण एक साथ हिंदू और मुसलमान दोनों नाराज हो गए थे। हिंदू सशंकित थे कि अकबर उनका धर्म बदल रहा है तो वहीं मुसलमान इसलिए नाराज हो गए क्योंकि इस धर्म के प्रावधान इस्लाम और कुरान को नहीं मानते थे. लेकिन हम भी जिद के पक्के हैं हमें अकबर बनना तो मंजूर है लेकिन जाकिर नायक या प्रवीण तोगड़िया बनना कदापि मंजूर नहीं. अपना तो बस जिंदगी जीने का एक ही उसूल है कि चाहे कोई खुश हो चाहे गालियाँ हजार दे मस्तराम बन के जिंदगी के दिन गुजार दे. हमारे लिए कथनी और करनी दोनों में ही देश सर्वोपरि है और रहेगा. भारत माता की जय.

रविवार, 29 जुलाई 2018

सुशासन की सड़ांध मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड

मित्रों, मैंने काफी पहले ६ मार्च,२०१४ को ही अपने एक आलेख मेरी सरकार खो गई है हुजूर के द्वारा घोषणा कर दी थी कि बिहार में सरकार नाम की चीज नहीं रह गई है.
मित्रों, जब किसी राज्य में सरकार नाम की चीज ही नहीं रहे और राजदंड का किसी को भय ही नहीं रहे तो फिर उस राज्य में क्या-क्या हो सकता है आप दूर बैठे लोग इसका अंदाजा नहीं लगा सकते। हमने तो बिहार में इसे प्रत्यक्ष भोगा है और भोग रहे हैं. अगर हम नीतीश कुमार के २००५ से २०१० तक के शासन को निकाल दें तो पिछले २३ सालों से बिहार में सरकार है ही नहीं. जिसको जो मन में आए करे, खून-तून-बलात्कार सब माफ़. बस आपके पास पैसा और रसूख होना चाहिए.
मित्रों, कहने का मतलब यह कि बिहार में बहुत पहले से मेड़ खेत को खाने में लगा है, बहुत पहले से नैतिकता सिर्फ एक शब्द बनकर मृत्युशैय्या पर है, बहुत पहले से सीएम के लेकर चपरासी तक हर शाख पे उल्लू बैठा है लेकिन अब तो सुशासन के गड्ढे में गंदगी इतनी बढ़ गई है कि सड़ांध के मारे साँस तक लेना मुश्किल है.
मित्रों, अभी कुछ महीने पहले ही बिहार में अपनी तरह के एक अनोखे घोटाले का सृजन हुआ था नाम था सृजन घोटाला. आपने ऐसा कहीं नहीं देखा होगा कि सरकारी पैसे को किसी के निजी खाते में डाल दिया जाए और ऐसा दशकों तक होता रहे. जब मुख्यमंत्री-मंत्री-अधिकारी सबके-सब ऐय्याश और भ्रष्ट होंगे और दिन-रात ऐय्याशी में डूबे होंगे तो कुछ भी देखने को मिल सकता है, आश्चर्य कैसा?
मित्रों, तथापि अभी सुशासनी कालीन के नीचे छिपी जो गंदगी मुजफ्फरपुर में अनावृत हुई है उसने पूरी दुनिया के जनमानस को जैसे हिलाकर रख दिया है.  नाबालिग व अनाथ बच्चियों के लिए सरकारी अनुदान पर एनजीओ द्वारा संचालित बालिका गृह को कोठे में बदल दिया गया. न केवल एनजीओ सेवा संकल्प समिति के संचालक ब्रजेश ठाकुर ने बल्कि बिहार की समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के पति चंदेश्वर वर्मा ने बच्चियों के मुँह में कपड़े ठूँसकर जब चाहा बलात्कार किया. अब तक मेडिकल जाँच में बालिका गृह में रह रहीं ४२ में से ३४ बच्चियों के साथ लगातार बलात्कार होने की पुष्टि हो चुकी है। इतना ही नहीं बाहर के लोग भी आकर यहाँ अपनी काम-पिपासा शांत करते थे और बच्चियों को इसके लिए बाहर भी भेजा जाता था।
मित्रों, मामला तो फिर भी दब जाता जैसे आज तक सुशासन बाबू दबाते आ रहे हैं लेकिन भला हो बिहार महिला आयोग की अध्यक्षा दिलमणि मिश्र का जिन्होंने बिना किसी दबाव में आए अपने कर्तव्यों को अंजाम दिया और दे रही हैं।
मित्रों, जब नीतीश ने दोबारा भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई तो मुझे लगा था कि दो-दो ईंजनों के चलते बिहार का तीव्र विकास होगा लेकिन ऐसा कुछ होता अब तक तो दिख नहीं रहा अलबत्ता बिहार दोगुनी गति से जरूर घनघोर अराजकता की ओर अग्रसर हो गया है. पता नहीं कब तक दिलमणि मिश्र को महिला आयोग में बनाए रखा जाता है. फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि वो जब तक इस कुर्सी पर हैं अबलाओं को न्याय मिलने की उम्मीद जिंदा है जिस दिन उनको हटा दिया जाएगा मामले का पटाक्षेप हो जाएगा. वैसे मेरा मानना तो यह है कि इन बच्चियों को व्यवस्था किसी भी तरह न्याय दे ही नहीं सकती. उन्होंने जो भोगा है उसे अब उनके मानसपटल से मिटाया ही नहीं जा सकता. सोंचने वाली बात तो यह भी है कि जब बिहार में बालिका गृह की ऐसी दशा है तो वहाँ की जेलों और थानों की हाजतों में बंद महिलाओं के साथ अधिकारी-कर्मचारी और नेता क्या कुछ नहीं करते होंगे? वैसे उन दरिंदों को जिनका नाम अभी तक इस मामले में आया है क्या सजा दी जाए? अगर मुझसे पूछा जाए तो मैं तो यही कहूंगा कि बीच चोराहे पर इनको फांसी दी जाए। साथ ही बिहार का मुख्यमंत्री बदला जाए और किसी योग्य व्यक्ति को यह पद दिया जाए क्योंकि नीतीश कुमार अब न केवल महाबेकार हो चुके हैं बल्कि बिहार के लिए अतिशय हानिकारक भी साबित होने लगे हैं।

सोमवार, 23 जुलाई 2018

गोतस्करी के लिए दोषी कौन?

मित्रों, हम सभी जानते हैं कि हिन्दुओं के जीवन में गायों का क्या स्थान है? हमारे जनजीवन के बहुत सारे महत्वपूर्ण शब्द गौ से बने हैं यथा-गोत्र, ग्राम या गाँव, ग्वाला, गोस्वामी, गंवार, गोष्ठी, गोधुली, गौरी, गोरस, गोधूम, गौना, गोप, गोपिका, गोपाल आदि. गायों की रक्षा की जानी चाहिए और निश्चित रूप से की जानी चाहिए लेकिन कैसे? क्या हमें तलवार लेकर सडकों पर उतर आना चाहिए?
मित्रों, आपमें से बहुतों के पास गायें होंगी. मैं आपसे पूछता हूँ कि आप गायों को किस रूप में देखते हैं. क्या आप उनको माता मानते हैं या फिर धनार्जन का स्रोत मात्र समझते हैं? गायों के प्रति हमारी सोंच में पिछले कुछ दशकों में निश्चित रूप से फर्क आया है. अब हम गायों को माता नहीं मानते बल्कि धनोपार्जन के साधनों में से एक मानते हैं. गायों के बच्चे मर जाएँ तो जबरन सूई चुभोकर दूध दूहते हैं भले ही इससे गायों को कितना ही दर्द क्यों न हो या गायों के स्वास्थ्य पर दूरगामी प्रभाव ही क्यों न पड़े. गायें अगर दूध देना बंद कर दें तो मुझे नहीं लगता कि हम एक दिन भी उसे अपने खूंटे पर रखेंगे और हम उनको छोड़ देंगे भटकने के लिए, तिल-तिल कर मरने के लिए. भला ये कैसी गोभक्ति है? कई पशुपालक पटना जैसे शहरों में प्रत्येक दोपहर में दुधारू गायों को भी सड़कों पर छोड़ देते हैं जूठन और अपशिष्ट खाने के लिए. उनसे पूछिए कि यह कैसी गोसेवा है? इनमें से कई गायें तो पोलीथिन खाकर मर भी जाती हैं.
मित्रों, जब गाय बच्चा देती है तो हम भगवान से मनाते रहते हैं कि बाछी हो बछड़ा नहीं हो क्योंकि अब खेती ट्रैक्टर से होती है बैलों से नहीं. फिर भी अगर बछड़ा हो ही गया तो एक-दो साल अपने पास रखकर हांक देते हैं. क्या हम फिर पता लगाते हैं कि उनका क्या हुआ? वे कसाइयों के हाथों पड़ गए या किसी ने उनको जहर तो नहीं दे दिया? देश के बहुत सारे ईलाकों में किसान इन छुट्टा सांडों से बेहद परेशान हैं क्योंकि वे उनकी सारी फसलें चट कर जाते हैं. पालना है तो इन नर शिशुओं को भी पालिए अन्यथा गौपालन ही छोड़ दीजिए. हमने अपने बचपन में देखा है कि जब तक बैलों से खेती होती थी यही बैल महादेव के रूप में पूजित थे और आज यही बैल नोएडा-गाजियाबाद-दिल्ली के चौक-चौराहों पर जमा रहते हैं और अक्सर इनके पैरों से होकर कोई-न-कोई वाहन गुजर जाता है और फिर ये बेचारे रिसते घावों और सड़ते अंगों की अंतहीन पीड़ा झेलने को विवश होते हैं. कभी आपने इनकी आँखों से लगातार बहते हुए आंसुओं को देखा है,समझा है?
मित्रों, यह कैसा पुण्य है? आज के अर्थप्रधान युग में गोपालन पुण्य नहीं पाप है और इसे हमने और हमारे लालच ने पापकर्म बना दिया है.
मित्रों, कई बार तो इन छुट्टा बछड़ों को हिन्दू ही पकड़ लेते हैं और कसाइयों के हाथों बेच देते हैं. कई बार ग्रामीण पशु हाटों पर हम देखते हैं कि यादव जी, सिंह जी या महतो जी गाय खरीदने आते है ट्रक लेकर. परन्तु उनमें से कई वास्तव में कसाइयों के एजेंट होते हैं और आगे जाकर ट्रक और जानवर कसाइयों को सौंप देते हैं. अब आप ही बताईए कि क्या गोतस्करी के लिए अकेले मुसलमान जिम्मेदार हैं? क्या इसके लिए हम हिन्दू भी दोषी नहीं हैं?
मित्रों, मौका मिलते ही हम गोतस्करों पर हाथ साफ़ करने लगते हैं. कई बार तो उनको जान से भी मार देते हैं लेकिन क्या इससे तस्करी रूक जाएगी? जब तक हम अपनी सोंच नहीं बदलेंगे, गायों को वास्तव में गौमाता नहीं मानेंगे और बछड़ों को अपने हाल पर मरने के लिए छोड़ना नहीं बंद करेंगे, फिर से बैलों से खेती करना शुरू नहीं करेंगे गौतस्करों को मारने-मात्र से तस्करी रूकनेवाली नहीं है. सोंचिएगा.
मित्रों, हमें एक और बात भेजे में उतार लेनी होगी कि हर मुसलमान गौ तस्कर नहीं होता कुछ गौपालक भी होते हैं. जब मेरे पिताजी पटना कॉलेज में पढ़ते थे तो साठ के दशक में पटना कॉलेज में इतिहास के प्रोफ़ेसर थे सैयद हसन अस्करी. आप चाहें तो गूगल पर भी उनको सर्च कर सकते हैं. मध्यकालीन भारत के जाने-माने विद्वान. वे विशुद्ध शाकाहारी थे और उन्होंने कई दर्जन गाय पाल रखी थी और पूरा वेतन गायों पर ही खर्च कर डालते थे. गायों से उन्हें बेहद प्यार था. साइकिल से कॉलेज आते भी करियर पर कटहल के पत्ते लेकर आते और रास्ते में जहाँ भी गाय दिख जाए खिलाने लगते. मुझे तो लगता है कि आज के माहौल में वे बेचारे भी कहीं भीड़ का शिकार हो जाते.

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

कांग्रेस के सेल्फ गोल

मित्रों, अभी-२ फुटबाल का महाकुम्भ समाप्त हुआ है. आप तो जानते हैं कि फुटबाल में कभी-२ खिलाडी गलती से अपने ही पाले में गोल मार बैठता है. इन दिनों भारत की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस के नेताओं में भी न जाने किस कारण से सेल्फ गोल यानि आत्मघाती गोल मारने की होड़-सी लगी हुई है. को बड छोट कहत अपराधू. यह प्रवृत्ति सिर्फ छुटभैय्ये नेताओं तक सीमित होती तो फिर भी गनीमत थी लेकिन जब पार्टी का अध्यक्ष भी इस कुकृत्य में सहयोग देने लगे तो न केवल आश्चर्य होता है बल्कि हँसी भी आती है.
मित्रों, सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस ने युद्ध के पूर्व ही हार मार ली है? या फिर भाजपा से कोई गुप्त समझौता कर लिया है कि तुम २०१९ जीत जाओ सिर्फ हमारे राजपरिवार को जेल मत भेजो? वर्ना क्या कारण थे कि ४ सालों में रोबर्ट वाड्रा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई या फिर नेशनल हेराल्ड मामला कछुए की गति से रेंगता रहा? क्यों कांग्रेस के सारे नेता आज भी राम मंदिर की खिलाफ लड़नेवाले पक्षकारों की तरफ से अदालत में पैरवी करते दिख रहे हैं जबकि उनको पता है कि इससे बहुसंख्यक जनता में पार्टी के प्रति नाराजगी बढेगी? मैं नहीं समझता कि चाहे कपिल सिब्बल हों या राजीव धवन बिना पार्टी आलाकमान की अनुमति के ऐसा कर रहे हैं? अगर इसके लिए पार्टी की अनुमति है तो इसका सीधा मतलब है कि आलाकमान ने २०१४ की हार के बाद आई एंटोनी रिपोर्ट को रद्दी की टोकरी में डाल दिया है और अगर नहीं है तो फिर धवन और सिब्बल पार्टी में बने हुए क्यों हैं?
मित्रों, पूर्व रक्षा मंत्री एंटोनी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि कांग्रेस की हार के लिए जनता के बीच कांग्रेस की हिन्दूविरोधी छवि बन जाना जिम्मेदार था. यह नितांत दुर्भाग्यपूर्ण है कि मणिशंकर, दिग्विजय, थरूर, सोज, नदीम जैसे नेताओं के अनर्गल प्रलापों के चलते तो पार्टी की वही छवि आज भी बनी हुई है और उस आग में घी देने का काम किया है स्वयं पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी ने यह कहकर कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है और वे मंदिरों में जाने के लिए क्षमा मांगते हैं.
मित्रों, सवाल उठता है कि कांग्रेस पर तो १९४७ से पहले जिन्ना की मुस्लिम लीग हिन्दुओं की पार्टी होने का आरोप लगाती थी फिर कांग्रेस स्वयं मुस्लिम लीग बन सकती है? किसी पार्टी की विचारधारा में इतना विरोधाभासी परिवर्तन भला कैसे संभव है? क्या कांग्रेस को पता नहीं है उसकी मुस्लिम-तुष्टिकरण की नीतियाँ उसे २-४ सीटें भी नहीं दिला सकतीं और वो ४४ से ४ पर पहुँच जाएगी? सवाल तो यह भी है कि क्या राहुल गाँधी सचमुच ड्रग्स लेते हैं? अगर नहीं तो इसका अभी तक खंडन क्यों नहीं आया और सुब्रह्मण्यम स्वामी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा क्यों नहीं किया गया? अगर हाँ तो फिर उनको कोई सुझाव देना ही बेकार है. लगे रहो राहुल बबुआ फिर तो लगे रहो अफीम खाकर कांग्रेस के अंतिम संस्कार में. पप्पूजी फिर तो असली गाँधी तुम्ही हो और महात्मा गाँधी के इस अधूरे काम को पूरा करोगे.

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

मोदी जी को गुमशुदा आंकड़ों की तलाश

मित्रों, पिछले दिनों हमारे माननीय प्रधानसेवक जी ने दो महत्वपूर्ण बयान दिए हैं वैसे भी बेचारे शोले की बसंती की तरह बहुत कम बोलते हैं. पहले में उन्होंने कहा है कि किसी को दिखे या न दिखे देश बदल रहा है. तो पिछले दिनों हुआ ये कि एक स्कूल में परीक्षा में एक बच्चे ने सादी कॉपी जमा कर दी. जब उसे शून्य अंक प्राप्त हुए तो जा पहुंचा शिक्षक के पास तमतमाया हुआ और बोला कि किसी को दिखे या न दिखे मैंने तो कॉपी में न केवल सारे प्रश्नों के उत्तर दिए हैं बल्कि सही उत्तर दिए हैं. टीचर ने कहा वो कैसे तो उसने कहा कि पीएम भी तो यही कह और कर रहे हैं.
मित्रों, पिछले दिनों हमारे माननीय प्रधानसेवक जी ने अपना दूसरा बयान एक साक्षात्कार के दौरान दिया और कहा कि देश में पिछले ४ सालों में भारी संख्या में रोजगार गठन हुआ है लेकिन दुर्भाग्यवश उनके पास आंकड़े नहीं हैं. कदाचित उनका आशय इस बात से था कि वे खो गए हैं और मिल नहीं रहे हैं. गजब! हम तो समझे थे कि यह सरकार ही आंकड़ों और आंकड़ेबाजों की सरकार है और यह सरकार खुद ही आंकड़ों की तलाश में है. हमने वर्षों पहले तेजाब फिल्म में एक गाना देखा था-खो गया ये जहाँ, खो गया आसमाँ, खो गई हैं सारी मंजिलें, खो गया है रस्ता. लेकिन मैं ठहरा भावुक व्यक्ति. यूं तो मैं कॉलेज से छुट्टी नहीं लेता आखिर मोदीसमर्थक जो हूँ. जब मोदी जी छुट्टी नहीं ले रहे तो मैं कैसे ले सकता हूँ लेकिन लेने जा रहा हूँ क्योंकि मुझसे मोदी जी दुःख देखा नहीं जा रहा इसलिए मैं अगले हफ्ते बिहार जा रहा हूँ रोजगार के गुमशुदा आंकड़ों को तलाशने. वैसे मैं सुशासन बाबू को लाख-लाख धन्यवाद देना चाहूँगा कि उन्होंने भयंकर बेरोजगारी के दौर में बिहार के युवाओं को शराब की तस्करी के रूप में अच्छा रोजगार दे दिया है.
मित्रों, अभी-अभी सरकार ने फसलों के कथित न्यूनतम समर्थन मूल्य को ड्योढ़ा कर दिया है. कथित इसलिए क्योंकि वो वास्तव में अधिकतम विक्रय मूल्य है न्यूनतम नहीं. क्योंकि किसानों से उस दाम पर कोई फसल खरीदेगा ही नहीं तो वो दाम तो उनको मिलने से रहे.
मित्रों, इस सम्बन्ध में मुझे अपने बचपन का एक खेल याद आ रहा है. जिसमें दो बच्चे दोनों हाथों को ऊपर उठाए और पकडे खड़े हो जाते थे और हम ट्रेन की तरह आगे-पीछे खड़े होकर उनके दरवाजानुमा हाथों के बीच से गुजरते. तब हम उनसे कहते कि सिमरिया (बेगुसराय में है) पुल जाने दो. वो कहते दाम कौन देगा तो आगेवाला यह कहते हुए आगे निकल जाता कि पीछेवाला लड़का और इस तरह जो सबसे पीछे होता वो फंस जाता. तो मोदी जी से पहले भी कितनी सरकारें आईं और चली गईं और हम हैं कि उस पीछे आनेवाली सरकार का इंतजार ही कर रहे हैं जो न्यूनतम समर्थन मूल्य को वास्तव में धरातल पर न्यूनतम समर्थन मूल्य साबित करके दिखाए. मैं समझता हूँ कि ऐसा वही प्रधानमंत्री कर पाएगा जिसके पास वास्तव में ५६ ईंच का सीना होगा न कि ५६ ईंच की जुबान.

बुधवार, 27 जून 2018

लोकतंत्र अमर रहे

मित्रों, यह हमारे लिए अतिशय गौरव का विषय है कि हम २१वीं में जी रहे हैं. मानवता चाँद पर तो पिछली सदी में ही पहुँच गया था अब वो मंगल पर जाने की तैयारी में है. लेकिन यह हमारे लिए अतिशय शर्म का विषय है कि हमारा समाज आज भी जातिभेद के दुष्चक्र से निकला नहीं है. हमें आए दिन ऐसी ख़बरें पढ़ने को मिलती हैं जिनमें इस तरह की घोर निंदनीय घटनाओं का जिक्र होता है-जैसे, बड़ी जाति के लोगों ने दलित दूल्हे को घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया, दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार इत्यादि.
मित्रों, यह गंभीरतापूर्वक सोंचने का समय है कि हम अपने समाज को कहाँ ले जाना चाहते हैं? अस्पृश्यता या जातिभेद न केवल क़ानूनन अपराध है वरन मानवता के प्रति भी अक्षम्य अपराध है फिर जबकि साक्षरता का स्तर ७५ प्रतिशत को पार कर चुका है हमारा मानसिक स्तर इतना निम्न क्यों है?
मित्रों, हद तो तब हो गई जब जगन्नाथपुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में भारत के राष्ट्रपति के साथ बदतमीजी की गई. धक्का मारा गया और कोहनी मारी गयी. मैं सच्चाई नहीं जानता कि ऐसा करने के पीछे पंडे की क्या मंशा थी लेकिन अगर ऐसा इस कारण से किया गया क्योंकि वे दलित हैं तो फिर इस घटना की जितनी भी निंदा की जाए कम है. वैसे इस बात की सम्भावना कम ही दिखती है क्योंकि मेरे कई दलित मित्र पुरी जा चुके हैं और उनसे उनकी जाति नहीं पूछी गई. हालाँकिपंडों की रंगदारी मैं स्वयं अपनी आँखों से काशी और देवघर में देख चुका हूँ.
मित्रों, राष्ट्रपति का पद देश का सर्वोच्च पद होता है और पूरे देश का प्रतिनिधि होता है इसलिए उनका अपमान भारत का अपमान है, भारत की सवा सौ करोड़ जनता का अपमान है. सवाल यह भी उठता है कि क्या राष्ट्रपति की सुरक्षा-व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त है? अगर हाँ तो फिर यह घटना कैसे घट गई? अगर नहीं तो नहीं क्यों?
मित्रों, मेरा हमेशा से ऐसा मानना रहा है कि न तो कोई नीच है और न हो कोई महान है क्योंकि सब एक ही तरीके से जन्म लेते हैं. फिर अगर कोई ठाकुर यानि मेरी जाति का व्यक्ति घोड़ी पर चढ़ सकता है तो दलित क्यों नहीं चढ़ सकता? कई बार दलित महिलाओं को गरीबी के कारण दूसरों के खेतों में काम करना पड़ता है जिसका मालिक लोग नाजायज फायदा उठाते हैं जबकि ऐसा कदापि नहीं होना चाहिए और उनको सोंचना चाहिए कि अगर ऐसा कुकर्म उनकी बहू-बेटियों के साथ हो तो उन पर क्या बीतेगी? इस दुनिया में मेरी नज़र में अगर कोई सबसे बड़ा पाप है तो वो है दूसरों की मजबूरियों का फायदा उठाना. वैसे मैं चाहता हूँ कि बलात्कारियों को जितनी क्रूर सजा दी जा सकती है दी जानी चाहिए और अच्छा हो कि उनको बीच चौराहे पर मृत्युदंड दिया जाए.
मित्रों, आज मुझे एक और खबर ने व्यथित कर दिया है. वो है भारत के प्रधानमंत्री द्वारा लोकतंत्र अमर रहे का नारा लगाना और लगवाना. क्या प्रधानमंत्री मोदी मानते हैं कि भारत में लोकतंत्र मर चुका है क्योंकि अमर रहे का नारा तो दिवंगत के लिए लगाया जाता है? या फिर हमारे प्रधानमंत्री को इतनी छोटी-सी बात का भी ज्ञान नहीं है? जब प्रधानमंत्री इस तरह की गलतियाँ करते हैं तो हमें खुद पर शर्म आती है कि हमने किसे चुन लिया. हमें नहीं चाहिए चौबीसों घंटे जागने वाला प्रधानमंत्री बल्कि हमें ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए जो ज्ञानी,समझदार,ईमानदार और वास्तव में देश को अपना सबकुछ माननेवाला देशभक्त हो. जो मदारी की तरह लच्छेदार बातें भले ही न करे वादे पूरे करे. जो अपने मन की बात भी भले ही न सुनाए बल्कि जनता के मन की बात सुने. और प्रत्येक कदम पूरी तैयारी करने के बाद, पूरी तरह से सोंच-समझकर उठाए. जो अपनी उपलब्धियां गिनाए न कि विपक्ष की कमजोरियाँ, यानि वास्तव में सकारात्मक सोंच वाला हो. जो जितना पढ़ा हो उतने का ही दावा करे और ताल ठोंक कर करे. जो हवाई यात्रा पर जाते समय सबके साथ सीढियों पर चढ़ता हुआ नजर आए न कि अकेले जैसे पूरी विदेश नीति वो बिना सचिवों, उच्चायुक्तों और मंत्री के खुद अकेले ही चलाता हो.
मित्रों, एक समय हमने २०१४ के चुनाव परिणामों की तुलना फ़्रांस की राज्यक्रांति से की थी लेकिन यह नहीं बताया था कि फ़्रांस में क्रांति के नाम पर लाखों लोगों को सूली पर चढ़ा दिया गया था और भयंकर अत्याचार किए गए थे. एक तरह का भयानक आतंकराज रॉबस्पियर के नेतृत्व में स्थापित कर दिया गया था. खैर वर्तमान भारत तो क्या फ़्रांस में भी ऐसा संभव नहीं है तथापि समझ में नहीं आता कि हमसे गलती हुई तो कहाँ हुई? समझ में तो आज भी नहीं आता कि हमारे समक्ष सबसे अच्छा विकल्प क्या है. तमाम निराशाओं के बीच हमारे लिए सबसे बड़े सौभाग्य की बात तो यह है कि प्रधानमंत्री द्वारा लोकतंत्र अमर रहे का नारा लगाने के बावजूद भारत में लोकतंत्र जिंदा है भले ही हमारे देश में वो मूर्खों का, मूर्खों द्वारा, मूर्खों के लिए शासन बनकर रह गया हो.

रविवार, 24 जून 2018

चमकते बिहार को टूटा हुआ तारा बना डाला

मित्रों, लगभग हर चुनाव में हम इस नारे को सुनते हैं-तख़्त बदल दो ताज बदल दो बेईमानों का राज बदल दो. एक समय था जब समाजवादी होना ईमानदारी का प्रमाणपत्र माना जाता था लेकिन आज अखिलेश टोंटी चोर के नाम से जाने जाते हैं. यूपी की ही तरह बिहार में भी पिछले २८ सालों से समाजवादियों का शासन है जिन्होंने बिहार को क्या से क्या बनाकर रख दिया है.
मित्रों, कई बार जब हम समय के पन्ने को पलटकर देखते हैं तो पाते हैं कि हमने जिस सत्ता परिवर्तन को क्रांति समझा था वो दरअसल भ्रान्ति थी और कदाचित पहलेवाला शासन ही अच्छा था. हमें याद है कि १९९० के विधानसभा चुनावों के समय बिहार में कांग्रेसविरोधी लहर चल रही थी. वीपी सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे और यूं लगता था कि समाजवादी बिहार का भाग्य बदल कर रख देंगे. उन्होंने ऐसा किया भी और बिहार के सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदल दिया. कुछ ही सालों में समाजवादी राज यादव राज में बदल गया. लालू के साले और पार्टी वालों ने दरोगा तो क्या डीएम तक को कार्यालय में घुसकर पीटा. आईएएस की पत्नियों के साथ बलात्कार तक हुआ. अब जब अधिकारी ही लाचार थे तो जनता की कौन सुनता. बिहार से व्यवसायी भागने लगे. देखते ही देखते बिहार के ३० चीनी मिलों में से २५ बंद हो गए. कहना न होगा लालू राज से पहले बिहार चीनी उत्पादन में देश में दूसरे स्थान पर था. मतलब कि लालू ने वादा तो किया था बिहार को औद्योगिक राज्य बनाने का लेकिन किया उल्टा. जो उद्योग पहले से चालू थे उनको भी बंद करवा दिया और बिहार को पूरी तरह से मजदूरों की आपूर्ति करनेवाला राज्य बना दिया. यहाँ मैं आपलोगों को याद दिला दूं कि बिहार प्रतिव्यक्ति आय के मामले में १९४७ में देश में दूसरा स्थान रखता था.
मित्रों, इसी बीच बिहार में नीतीश कुमार का अवतरण हुआ. उनको भी शासन करते आज १३ साल हो चुके हैं लेकिन बिहार की दशा सुधरने के बदले बिगड़ी ही ज्यादा है. अंतर बस इतना है कि लालू ताल ठोंककर भ्रष्टाचार करता था और ये चुपचाप करते हैं लेकिन आज बिहार में भ्रष्टाचार लालू के ज़माने से भी ज्यादा है. लालू के ज़माने में जिला प्रशासन ने विकास निधि की राशि को निजी खाते में नहीं डाला था लेकिन नीतीश के समय सृजन घोटाला हो चुका है. लालू के समय बिहार की शिक्षा व्यवस्था इतनी बुरी नहीं थी जितनी नीतीश ने ग्राम प्रधानों से शिक्षकों की बहाली करवा कर कर दी है. लालू के ज़माने में प्रत्येक बहाली में कम से कम आधे लोग प्रतिभा के आधार पर चुने जाते थे नीतीश के ज़माने में पूरी सीट पहले ही बिक जाती है. लालू के ज़माने में बिहार बोर्ड इतना बदनाम नहीं था लेकिन आज बिहार बोर्ड अराजकता और भ्रष्टाचार का इतना बड़ा अड्डा बन चुका है कि लोग इसके द्वारा परीक्षा देने में डरने लगे हैं.
मित्रों, पिछले कुछ दिनों से बिहार बोर्ड के अध्यक्ष आनंद किशोर पर ऊँगलियाँ उठ रही हैं. लेकिन सवाल उठता है कि थाने-प्रखंड से लेकर सचिवालय तक बिहार में ऐसा कौन-सा कार्यालय है जहाँ पैसे लेकर अधिकारियों को तैनात नहीं किया गया है? काफी समय पहले शायर शौक बहराईची ने कहा था-
बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था
हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा 
सो इस स्थिति में बिहार का जो अंजाम होना था या होना चाहिए हो रहा है. नीतीश एक भी बंद चीनी मिल चालू नहीं करवा पाए और न ही कोई नया उद्योग ही बिहार में स्थापित करवा पाए. आज बिहार में फिर से लूट-मार-बलात्कार-अपहरण का बोलबाला है. आज फिर से भाजपा नीतीश के साथ आ चुकी है लेकिन अब तक इससे सेहत समेत बिहार के किसी भी महकमे की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा है. 
मित्रों, मोदी जी ने तो कहा था कि वो भारतमाता के वामांग को भी शक्तिशाली बनाएंगे लेकिन बिहार में तो ऐसा कुछ दिख नहीं रहा बल्कि बिहार दिन-ब-दिन और भी बर्बाद होता जा रहा है. अलबत्ता बिहार भाजपा के अध्यक्ष नित्यानन्द राय जरूर इन दिनों राष्ट्रपति के साथ विदेश दौरे का लुत्फ़ उठा रहे हैं. भले ही वो बिहार में भाजपा को एक भी यादव का वोट नहीं दिलवा पाएँ.
मित्रों, आगे बिहार का क्या होगा पता नहीं. लालू के बेटों को हमने अब तक जितना देखा है उससे तो यही लगता है कि ये लालू से भी बड़े यादववादी हैं फिर बिहार की जनता के सामने विकल्प क्या है? यूपी को तो योगी मिल गया है. वैसे भी माया-मुलायम या अखिलेश के समय यूपी की दशा उतनी नहीं बिगड़ी थी जितनी बड़े भाई लालू और छोटे भाई नीतीश के समय बिहार की बिगड़ी है. इन दिनों मैं यूपी के मुज़फ्फरनगर में रह रहा हूँ और देखता हूँ कि किस तरह चीनी मीलों ने जिले के किसानों की दशा को बदलकर रख दिया है. क्या बिहार में ऐसा कभी देखने को मिलेगा? आखिर कब तक बिहार के किसान हानिकारक खेती करने को अभिशप्त रहेंगे? आखिर कब तक बिहार के युवा श्रमिक दूसरे राज्यों को पलायन करते रहेंगे,कब तक?

शनिवार, 16 जून 2018

गजब किया मोदी तेरे वादे पे ऐतबार किया

मित्रों, दुष्यंत कुमार ने क्या खूब कहा है कि

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये.

मित्रों, याद करिए मोदी जी ने २०१४ में क्या-क्या वादे किए थे? उनमें से एक वादा यह भी था कि वे भारत को एक बार फिर से विश्वगुरु बनाएँगे और इसके लिए देश की शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करेंगे. मगर हुआ क्या? न तो देश की प्राथमिक शिक्षा के लिए ही और न ही उच्च शिक्षा की स्थिति में ही कोई परिवर्तन आया और न ही इस दिशा में कोई ऐसी योजना ही आई जिससे पता चले कि ऐसा करने की सरकार की कोई मंशा भी है. अलबत्ता जो शेष है उसे भी बर्बाद करने की मंशा जरूर झलक रही है.
मित्रों, यह किसी से छिपी हुई नहीं है कि देश की शिक्षा प्रणाली मर चुकी है और अब परीक्षा प्रणाली में परिणत हो चुकी है. उस पर कहर यह कि बोर्ड और विश्वविद्यालय समय पर और समुचित तरीके से परीक्षा भी नहीं ले पा रहे हैं. हर शाख पे उल्लू बैठा हो तो फिर भी गनीमत यहाँ तो हर पत्ते पर उल्लू बैठा है और गजब यह कि मीर साहब के शब्दों में
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने जाने गुल ही जाने बाग़ तो सारा जाने है.
मित्रों,मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसा लगता नहीं कि मोदी सरकार जो आंकड़ों की सरकार है और कहती है कि दिखे या न दिखे देश बदल रहा है शिक्षा को लेकर कतई गंभीर है. तभी तो वो बार-बार अयोग्य व्यक्तियों को शिक्षा मंत्री बना रही है. पहले उसने एक ऐसी महिला को शिक्षा मंत्री बनाया जिसकी खुद की डिग्री सवालों के घेरे में है. वैसे सवालों के घेरे में तो खुद माननीय प्रधानमंत्री की डिग्री भी है. उसके बाद उसने एक ऐसे व्यक्ति को शिक्षा मंत्री बनाया जो आईए गधा,बीए बैल, सबसे अच्छा मैट्रिक फेल को बखूबी चरितार्थ करता है अर्थात् जिसके पास व्यावहारिक ज्ञान है ही नहीं. जो सिर्फ नाम से ही प्रकाश है और जिसे शैम्पेन की बोतल खोलने के अलावा और कुछ आता ही नहीं. 
मित्रों, आप कहेंगे कि आपने उनकी महिमा का जो बखान किया है उसके बारे में आपके पास प्रमाण क्या है. तो प्रमाण है प्रोफेसर की नौकरी के लिए नेट की अनिवार्यता को समाप्त करना. 
मित्रों, सवाल उठता है कि एक तरफ तो सरकार उच्च न्यायपालिका से कॉलेजियम प्रणाली को समाप्त करना चाहती है तो वहीँ विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में कॉलेजियम लाना चाहती है? योग्यता की परीक्षा नहीं ली जाएगी और शोध के आधार पर प्राध्यापक बहाल किए जाएंगे? वाह क्या योजना है जैसे सरकार को पता ही नहीं कि देश में शोध कैसे किए जाते हैं? कॉपी, कट-पेस्ट और शोध पूरा. सरकार की योजना अगर सफलीभूत हो गई तो निश्चित रूप से उच्च शिक्षा की स्थिति और भी निम्न हो जाएगी. सिर्फ प्रोफेसरों के बेटे और रिश्तेदार ही प्रोफ़ेसर बन पाएँगे. 
मित्रों, पता नहीं यह योजना किस नायाब दिमाग की उपज है? हमें तो शक ही नहीं पूरा यकीन है कि महान शिक्षा मंत्री ने ही इसे सुझाया होगा. वर्षों पहले बिहार में प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति भी बिना प्रतियोगिता परीक्षा लिए की गई थी और इस तरह बिहार की प्राथमिक शिक्षा की शांतिपूर्ण मृत्यु का मार्ग धूम-धड़ाके से प्रशस्त किया गया था. हमें तो डर है कि अभी इस सरकार ने बिना सिविल सेवा पास किए अधिकारियों की नियुक्ति का जो रास्ता खोला है वो भी भविष्य में इस सरकार सबसे बड़ा छलावा न साबित हो और सिर्फ अपने लोगों को आईएएस न बना दिया जाए. क्योंकि यह सरकार भले ही किसी को ५ रूपये खाने न दे लेकिन १००० रूपये का गिलास जरूर तोडती है.

मित्रों, अब विश्वास किया है तो चाहे यह सरकार हर क्षेत्र में कॉलेजियम ला दे बर्दाश्त तो करना ही पड़ेगा.
दाग देहलवी साहब ने तो काफी पहले कहा था कि 

ग़ज़ब किया, तेरे वादे पे ऐतबार किया तमाम रात क़यामत का इन्तज़ार किया.
हंसा हंसा के शब-ए-वस्ल अश्क-बार किया तसल्लिया मुझे दे-दे के बेकरार किया.

बुधवार, 6 जून 2018

मनमोहन, मोदी और वर्तमान भारत

मित्रों,ब्रह्म के बारे में वर्णन व विश्लेषण करते समय कभी हमारे वैदिक ऋषियों ने कहा था नेति, नेति अर्थात ब्रह्म यह भी नहीं है, वह भी नहीं है. विडंबना यह है कि पिछले कुछ सालों में मैं भी ब्रह्मर्षियों जैसा महसूस करने लगा हूँ और वो भी नेताओं के मामले में. पहले मैंने किशोरावस्था में जब मैं अपने नामानुरुप किशोर हुआ करता था विश्वनाथ प्रताप सिंह का समर्थन किया था. बाद में उनके नाममात्र से भी घृणा हो गयी. फिर अटल जी पर अटल श्रद्धा हो गई मगर वे पहले चुनाव हारे और बाद में स्वास्थ्य भी. फिर अन्ना और केजरीवाल से उम्मीद जगी लेकिन उनके ४५ दिनों के नाटकीय शासन के बाद वो भी ह्रदय की गहराईयों में कहीं दफ़न हो गई. फिर बाबा रामदेव और अंत में नरेंद्र मोदी. बाबा ने जब गोपिका वेश बनाया तभी उनसे मोहभंग हो गया. अलबत्ता कांग्रेस या उसके किसी नेता से मैंने कभी उम्मीद नहीं पाली क्योंकि मैं दिल से सोंचनेवाला इंसान हूँ. सच्चाई तो यह है कि मैं वर्तमान कांग्रेस को उत्तरवर्ती मुग़ल शासकों के समान मानता हूँ.
मित्रों, यह सच है और सोलह आने सच है कि मैंने मोदी का तब समर्थन किया था और खुलकर समर्थन किया था जब मीडिया उनको पूरी तरह से अछूत मानती थी. मैं आज भी  मानता हूँ कि गोधरा में ट्रेन नहीं जलाई होती तो दंगे भी नहीं हुए होते. मोदी ने जिस तरह गुजरात को संवारा था मुझे लगा था कि वाकई इस आदमी का सीना ५६ ईंच का है. तब हमने हर्षातिरेक में मोदी चालीसा तक लिख डाली थी और वो भी २ अक्टूबर के दिन २०१३ में. लेकिन जब मोदी जी ने मंत्रिमंडल गठित की तब मेरे मन में पहली बार उनके प्रति सन्देह का बीज पड़ा. तब मुझे लगा एक साथ इतने नाकारे लोगों को लेकर कोई कप्तान कैसे अच्छा प्रदर्शन कर सकता है? फिर भी आशा थी कि बाद में कदाचित मोदी जी मंत्रिमंडल में अपेक्षित परिवर्तन करेंगे लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. फिर वे एक-के-बाद-एक ऐसे कदम उठाते रहे कि बहुत जल्द लगने लगा कि मोदी का नेशन फर्स्ट का नारा महज एक जुमला था और उनके लिए कुर्सी, नाम और महिमामंडनादि ही सर्वोपरि है जो किसी भी सामान्य तानाशाह के मौलिक गुण होते हैं. कोई भी तानाशाह सिर्फ बोलता है सुनता नहीं, कोई भी तानाशाह चाहे वो कितना भी अयोग्य क्यों न हो येन केन प्रकारेण यही चाहता है कि लोग उसकी बड़ाई करते रहें, स्तुति करते रहें, वो किसी भी सवाल का जवाब देना नहीं चाहता, वो चाहता है कि सारी संस्थाएँ चाहे वो संवैधानिक ही क्यों न हों उसकी मुट्ठी में हों.
मित्रों, बड़े ही दुःख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि मुझे वर्तमान मोदी में ये सारे गुण दृष्टिगोचर हो रहे हैं. जब-जब मोदी सरकार ने यू-टर्न लिया मेरा उसके प्रति विश्वास कम होता गया. जब उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी का निर्णय लिया तो वास्तविकता यह थी कि मेरी समझ में कुछ नहीं आया फिर भी मैंने उनका समर्थन किया यह सोंचकर कि क्या पता इनके परिणाम अच्छे आएँ. लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि मोदी अँधेरे में तीर चला रहे थे.
मित्रों, यह हम सभी जानते हैं कि मोदी कम पढ़े-लिखे हैं. कदाचित इसलिए उनकी नीतियाँ अक्सर गलत सिद्ध होती हैं फिर वे झेंप मिटाने के लिए कहते हैं कि मेरी नीयत में तो खोट नहीं थी. इन दिनों वे उत्तरवर्ती मनमोहन की ही तरह आँकड़ेबाजी पर उतर आए हैं. नौजवान नौकरी मांगते हैं तो वो मुद्रा योजना के आँकड़े दिखाते हैं, हम पेट्रोल की कीमत का मुद्दा उठाते हैं तो वो दूसरे देशों के मूल्यों के आँकड़े दिखाते हैं, हम स्वास्थ्य सेवा मांगते हैं तो वो मोदी केयर थमा देते हैं, हम न्यायिक और पुलिसिया सुधार मांगते हैं तो वो संवैधानिक मजबूरियों का रोना रोने लगते हैं, हम शिक्षा में सुधार मांगते हैं तो वो कौशल प्रशिक्षण प्रमाण-पत्र थमा देते हैं  मगर यह नहीं बताते रोजगार कहाँ है, हम विकास मांगते हैं तो वो बताते हैं कि हमने विश्व बैंक से कर्ज नहीं लिया मगर यह नहीं बताते कि विश्व बैंक से कर्ज वीपी सिंह ने भी नहीं लिया था मगर उसके बाद चंद्रशेखर को सोना गिरवी रखना पड़ा था, हम सैनिक साजो-सामान की कमी का मुद्दा उठाते हैं तो वो कश्मीरी आतंकियों को मारने और सर्जिकल स्ट्राइक की बात करते हैं मगर यह नहीं बताते कि पत्थरबाजों पर से मुकदमे क्यों हटाए गए और युद्ध विराम क्यों किया गया, हम चीन का मुद्दा उठाते हैं तो वो चुप्पी लगा जाते हैं और अचानक पर्यटक की तरह बाहें फैलाए चीन पहुँच जाते हैं, जब हम कहते हैं कि महंगाई के अनुपात में वेतन वृद्धि पर्याप्त नहीं है तो वो कहते हैं कि पैसे नहीं हैं लेकिन अचानक राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और तमाम माननीयों के वेतन में कई गुना की बढ़ोतरी कर डालते हैं. वे यह भी नहीं बताते जब १ अप्रैल २००४ और उसके बाद नियुक्त असैनिक कर्मियों और अधिकारियों के पेंशन बंद कर दिए गए तो माननीयों को क्यों दिए जा रहे हैं?
मित्रों, कुल मिलाकर हालात निहायत अफसोसनाक हैं. रोते-२ बड़ी मुश्किल से हँसना सीखा था मगर अब फिर से रोना आ रहा है. मनमोहन के पास किताबी ज्ञान था तो व्यावहारिक ज्ञान और पावर नहीं था, मोदी के पास व्यावहारिक ज्ञान और पावर है तो गूढ़ विषयगत ज्ञान का अभाव है. जनता करे तो क्या करे क्योंकि मोदी के खिलाफ जो गठबंधन बन रहा है उसमें सिर्फ चोरों, डकैतों और ठगों का जमावड़ा है. मतलब यह कि अगर मोदी को हम हटा भी दें तो उनकी जगह आएगा कौन? तथापि मुझे वो कहानी याद आ रही है जिसमें किसी सेठ ने बन्दर को नौकर रखा था और बन्दर ने सेठ के सर से मक्खी उड़ाने के लिए तलवार ही चला दी थी तथापि उसकी नीयत और मेहनत तमाम संदेहों से परे थी. आज फिर से मुझे कहना पड़ रहा है और बड़े ही उदास स्वर में कहना पड़ रहा है कि भारत के लिए संसदीय शासन प्रणाली सर्वथा अनुपयुक्त है और आज नहीं तो कल हमें अध्यक्षीय प्रणाली अपनानी ही पड़ेगी यद्यपि दुश्वारियाँ तब भी आएंगी.

रविवार, 20 मई 2018

साई बाबा पर विवाद क्यों?

मित्रों, पिछले कई सालों से मैं देख रहा हूँ कि हमारे देश में दशकों पहले स्वर्ग सिधार चुके महापुरुषों के चरित्रहनन का अभियान-सा चल पड़ा है. कभी गाँधी, कभी नेहरू, कभी अकबर तो कभी चिश्ती हद तो यह है कि छिद्रान्वेषियों ने साई बाबा तक को नहीं छोड़ा है.
मित्रों, मैं दिन-रात सिर्फ विषवमन करनेवाले नितांत नकारात्मक सोंच रखनेवाले लोगों से पूछना चाहता हूँ कि साई बाबा की पूजा हो रही है तो इससे हिंदुत्व और मानवता को क्या नुकसान हो रहा है? क्या साई भक्त देश में कहीं भी किसी अनैतिक गतिविधि में संलिप्त पाए गए हैं? क्या वे जेहादियों की तरह आतंक फैला रहे हैं?
मित्रों, इसके उलट मैं देखता हूँ कि साई भक्त हर जगह मानवता की सेवा में लगे हैं. कहीं भंडारा हो रहा है तो कहीं अस्पताल चल रहा है कहीं रक्तदान शिविर का आयोजन हो रहा है फिर साई का विरोध क्यों?
मित्रों, मैं नहीं जानता और जानना भी नहीं चाहता कि साई जन्मना हिन्दू थे या मुसलमान। मैं तो बस यह जानना चाहता हूँ और इसे ही पर्याप्त समझता हूँ कि साई के उपदेश क्या थे और सबसे बढ़कर कि साई के कर्म क्या थे?
मित्रों, सदियों पहले तुलसी बाबा कह गए हैं कि कर्म प्रधान विश्व करि राखा फिर जन्म की बात कहाँ से उठने लगी और वो भी २१वीं सदी में. मैं समझता हूँ कि इस तरह के सवाल हमारे विवेक पर सवाल उठाते हैं. और सवाल उठाते हैं हमारी आधुनिकता पर.
मित्रों, जहाँ तक मेरा मानना है और मैं मानता हूँ कि आपका भी यही मानना होगा कि जन्म और जाति का आज के ज़माने में कोई महत्व नहीं होना चाहिए। हजारों सालों से रावण ब्राह्मण होकर भी निंदनीय है और हनुमान बन्दर होकर भी परम पूज्य। आखिर क्यों? मैं यह भी मानता हूँ कि हमें अकबर, गाँधी या नेहरू की सिर्फ कमियों को नहीं देखना चाहिए बल्कि उनकी अच्छाइयों को भी मद्देनजर रखना चाहिए. इसी तरह से जो लोग वीर सावरकर और आरएसएस को दिन-रात गालियाँ देते रहते हैं और यही जिनका पुश्तैनी धंधा बन चुका है मैं उनसे भी अपेक्षा रखता हूँ कि सावरकर के योगदान की भी कभी चर्चा कर लें. इसी तरह मैंने देखा है कि कहीं भी कोई दुर्घटना हो जाए या प्राकृतिक आपदा आ जाए तो आपदा विभाग के सक्रिय होने से काफी पहले और सबसे पहले आरएसएस वाले ही वहाँ पहुँचते हैं. क्यों कांग्रेस सेवा दल वाले उन स्थलों पर दिखाई नहीं देते?
मित्रों, बहुत से महापुरुषों में कुछ मानवोचित कमियाँ थीं लेकिन साई में तो कोई कमी थी ही नहीं इसलिए मैं समझता हूँ कि इस तरह के प्रयास तत्काल बंद होने चाहिए. इस तरह के प्रयासों की जितनी भी निंदा की जाए कम है. वैसे सूरज पर थूकने से जिन लोगों को संतोष मिलता है उनको मैं दूर से ही नमस्कार करना चाहूंगा क्योंकि
उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये, पयःपानः हि भुजङ्गानाम केवलं विषवर्द्धनं। 

कर्नाटक का नाटक

मित्रों, पता नहीं आज हमारे तपोधर्मी संविधाननिर्माताओं की आत्माएँ हमसे कितनी शर्मिंदा होगी! हमने उनके बनाए संविधान को पूरी तरह से बेमानी जो साबित कर दिया है. यह हमारा दुर्भाग्य है कि शासन के तीनों ही भाग व्यवस्थापिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका अपनी-अपनी मनमानी पर इस बेशर्मी से उतारू हैं कि नैतिकता, गरिमा और मर्यादा जैसे महान शब्द अर्थहीन हो चुके हैं. द्रौपदी का चीरहरण तो एक बार हुआ था संविधान का तो रोजाना हो रहा है और सबसे घृणास्पद तो यह है कि इसमें न सिर्फ पांडव बल्कि भीष्म और विदुर भी शामिल हो गए हैं. मोदी सरकार को लगता है कि चूंकि कांग्रेस ने गलत किया था इसलिए उसकी गलती सही मान ली जाएगी। अगर ऐसा होता तो कांग्रेस आज ४०४ से ४४ पर नहीं आ गयी होती. जनता ने उसे गलत माना और दण्डित किया. भाजपा गलत करेगी तो उसके साथ भी निश्चित रूप से वही होगा।
मित्रों, यह सर्वविदित है कि सत्ता का गन्दा खेल भारत में कॉंग्रेस ने ही शुरू किया था. जिस तरह बिना पानी के मछली जीवित नहीं रह सकती उसी तरह कांग्रेस को भी विपक्ष की राजनीति रास नहीं आती है. क्योंकि विपक्ष की राजनीति संघर्ष और त्याग का मार्ग है और चूँकि कांग्रेस देश की आजादी के भी पहले से ही लगातार सत्ता में रही इसलिए संघर्ष उसके स्वाभाव में ही नहीं है. कदाचित इसलिए अपनी सरकार के खिलाफ जनादेश होने के बावजूद वो उसी दल के साथ मिलकर सरकार बनाने जा रही है जिसके विरुद्ध उसने चुनाव के दौरान जमकर विषवमन किया था. कांग्रेस की इसी तरह की धोखेबाजी की राजनीति हमने लालू के दौर में बिहार में न सिर्फ देखा है बल्कि भोगा भी है. हर चुनाव से पहले कांग्रेस लालू से अलग हो जाती थी. जमकर आरोप-प्रत्यारोप चलते। चुनाव को हर बार बहुकोणीय बनाकर लालू की जीत सुनिश्चित करती और चुनावों के बाद सरकार में शामिल हो जाती. हालाँकि इस तरह कांग्रेस लम्बे समय तक भाजपा को सत्ता से दूर रहने में कामयाब भी हुई लेकिन धीरे-धीरे उसका जनाधार घटता रहा और आज कांग्रेस बिहार में लगभग समाप्त हो चुकी है.
मित्रों, जो लोग आज कर्नाटक में साझा सरकार के गठन को कांग्रेस की जीत मान रहे हैं वे मेरी इस बात को गाँठ बांधकर रख लें कि कांग्रेस का यह कदम भविष्य में आत्मघाती सिद्ध होगा और उसकी हालत वहां भी बिहार जैसी हो जाएगी.
मित्रों,जहाँ तक कर्नाटक में भाजपा की रणनीति का सवाल है  तो  मैं यह मानता हूँ कि उसने सरकार गठित करके ठीक किया. वो सबसे बड़ी पार्टी थी इसलिए उसके लिए जनता में यह सन्देश देना आवश्यक था कि हम तो आपकी सेवा करना चाहते थे लेकिन कमी आपकी तरफ से ही रह गई. पता नहीं उन अफवाहों में कितनी सच्चाई थी कि भाजपा विधायकों की खरीद-फरोख्त में लगी है. क्योंकि कल जो कुछ हुआ उससे तो ऐसा लगता है कि उन अफवाहों में कोई सच्चाई थी ही नहीं.
मित्रों, हम यह नहीं कहते कि वाजपेयी के नक्शेकदम पर चलने से येदुरप्पा अचानक वाजपेयी हो गए हैं क्योंकि वाजपेयी आदर्श थे जैसे रामराज्य आदर्श है. यद्यपि किसी भी आदर्श को पूरी तरह से प्राप्त करना असंभव होता है तथापि उस दिशा में प्रयासरत होना ही बड़ी बात है वो भी चौतरफा पतन के इस विडंबनाओं, संत्रास और प्रच्छन्नताओं के युग में. भले ही वो आदर्श महज दिखावा हो और ज़माने को दिखाने के लिए हो. 

रविवार, 8 अप्रैल 2018

मेरा देश जल रहा है

मित्रों, बात पुरानी है. यही कोई ११ साल पुरानी. तब हम माखनलाल के नोएडा परिसर में पढ़ते थे. जनमत चैनल के एक कार्यक्रम में तेलंगाना राष्ट्र समिति के चंद्रशेखर राव जी आए हुए थे. तब हमने उनसे पूछा था कि आपकी पार्टी के नाम में राष्ट्र क्यों लगा हुआ है? क्या आपलोग भी भविष्य में अलग राष्ट्र की मांग करनेवाले हैं? तब उन्होंने कहा था कि तेलुगु में राज्य को ही राष्ट्र कहा जाता है इसलिए यहाँ पर राष्ट्र शब्द है.
मित्रों, अभी हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता से मिलने का अवसर मिला तो उनसे भी हमने यही सवाल किया कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब क्या है. मैं हैरान था कि उनके लिए राष्ट्र का अर्थ हिन्दू राष्ट्र था और देश का मतलब सरकार था. देश अलग और राष्ट्र अलग. साम्यवादियों और कांग्रेसियों ने भी इसी तरह से राष्ट्र की अलग-अलग परिभाषा बना रखी है. हद हो गई! राष्ट्र न हुआ ब्रह्म हो गया. जितने संगठन उतनी व्याख्याएँ।
मित्रों, मैं राष्ट्रवादी नहीं राष्ट्रप्रेमी हूँ. इसलिए मेरे लिए मेरा राष्ट्र किसी भी तरह से संकुचित अर्थ नहीं रखता. जाहिर है कि मेरे लिए राष्ट्रवाद का अर्थ काफी व्यापक है. मेरा राष्ट्रवाद धर्मवाद नहीं है. यह भगत सिंह, तिलक, लाला लाजपत राय, गाँधी का राष्ट्रवाद है तो अशफाकुल्ला खान, अजीमुल्ला खान, मज़हरुल हक़ का राष्ट्रवाद भी है. इसमें अगर तुलसी,सूर के लिए जगह है तो खुसरो, जायसी, रहीम और रसखान के लिए भी है, अटल जी के लिए है तो नेहरू जी के लिए भी है, मैथिलीशरण गुप्त के लिए स्थान है तो ग़ालिब के लिए भी है, प्रताप के लिए है तो इब्राहिम गार्दी के लिए भी है, प्रेमचंद के लिए है तो मंटो के लिए भी है. मेरे लिए राष्ट्रवाद भारतमाता से निःस्वार्थ भाव से प्रेम करने का नाम  है.
मित्रों, इन दिनों देश की हालत देखकर मेरा राष्ट्रवाद बुरी तरह से आहत है. चार साल पहले भाजपा द्वारा नारा दिया गया था कि मेरा देश बदल रहा है, आगे चल रहा है. आजकल यह नारा पूरे परिदृश्य से गायब है. शायद इसलिए क्योंकि न तो देश बदल रहा है और न ही किसी मामले में आगे ही नहीं चल रहा है. हाँ, मेरा देश जल जरूर रहा है.  सबसे दुःखद तथ्य तो यह है कि दंगे हो नहीं रहे करवाए जा रहे हैं. इसी आश्विन महीने की बात है. महानवमी की रात हाजीपुर के मड़ई चौक पर दुर्गा पूजा पंडाल में दो हिन्दू युवकों के बीच झगड़ा हो गया. मुझे आश्चर्य तो तब हुआ जब हिन्दू युवा वाहिनी ने यह अफवाह उड़ाकर कि मुसलमानों ने हिन्दू युवक को पंडाल में घुसकर मारा हिन्दू-मुसलमान का मुद्दा बना दिया. कल होकर मुहर्रम था. जाहिर है कि हिन्दू उबल उठे और शहर में मुहर्रम का जुलूस नहीं निकल पाया. मैं हतप्रभ था कि क्या हो रहा है. अभी कुछ दिनों पहले ही बिहार के नवादा में रात में किसी ने हनुमान जी की मूर्ती तोड़ दी. तोड़नेवाला कौन था किसी ने भी नहीं देखा लेकिन मुसलमानों  पर हमला शुरू हो गया. भागलपुर के दंगों में तो केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे का बेटा जेल में है. इसी तरह से पश्चिम बंगाल के आसनसोल में भी दंगे तब शुरू हुए जब स्थानीय मौलवी के बेटे की अपहरण के बाद बेरहमी से हत्या कर दी गई. रही-सही कसर मायावती ने २ अप्रैल को बंद आयोजित करके पूरी कर दी और पहले से जल रहे देश को एक बार फिर से धधकती हुई आग में झोंक दिया. मेरा दिल-दिमाग यह देखकर जल रहा कि कोई दल सद्भावना की बात नहीं कर रहा. सारे नेता देश को जलाकर जलती हुई आग में राजनीति की रोटी सेंकने की फ़िराक में हैं. क्या इस तरह से मेरा देश आगे बढ़ेगा? इस तरह से तो मेरा देश आगे बढ़ने से रहा जल जरूर जाएगा.
मित्रों, मेरा राष्ट्रवाद इन दिनों एक शोध से सामने आई सच्चाई से भी आहत है. यह शोध किया है किंग्स कॉलेज लंदन के विद्यार्थियों ने और पता लगाया है कि भारत की जनता किस आधार पर मतदान करती है. आश्चर्य की बात है कि शराब और पैसे लेकर तो वोट दिए ही जा रहे हैं एक किलोग्राम सब्जी लेकर भी मतदान किया जा रहा है. जब तक राष्ट्र और राष्ट्रहित मतदाताओं की पहली प्राथमिकता नहीं बनेगा मैं डंके की चोट पर कहता हूँ कि भारत कदापि विश्वगुरु नहीं बन सकता. वास्तविकता तो यह है कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा के हाथों हम इसलिए ठगे जाते हैं क्योंकि हम निहायत स्वार्थी और लालची हैं. और याद रखिए मित्रों लोकतंत्र में राजतन्त्र की तरह यथा राजा तथा प्रजा नहीं चलता बल्कि यथा प्रजा तथा राजा चलता है. चर्चिल आई सैल्यूट यू टुडे, तुम ही सही थे, आजादी के ७५ साल बाद भी हम लोकतंत्र के लायक नहीं हुए हैं!!!

रविवार, 25 मार्च 2018

न मैं सोऊंगा और न सोने दूंगा

मित्रों, यकीन मानिए मैं भी बाबा नागार्जुन की तरह एक कविता ही लिखना चाहता था मोदी जी सच-सच बताना........................। लेकिन क्या करूँ घंटों बीत गए शीर्षक से आगे नहीं बढ़ पाया. हाँ मेरी मेहनत में कोई कमी नहीं थी. ठीक उसी तरह से जैसे हमारे प्रधानमंत्री जी की मेहनत में कोई कमी नहीं है. बेचारे पता नहीं रात में सोते भी हैं या नहीं? पहरेदार का काम होता ही बड़ा कठिन है. दिन-रात जगे रहिए भले ही चोरी को नहीं रोकिए लेकिन इससे मेहनत तो कम नहीं हो जाती!
मित्रों, नाराज न होईए क्योंकि मैं तबसे मित्रों लिख रहा हूँ जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. तो मैं कह रहा था कि मित्रों, अभी देश में हो क्या रहा है. अब कोई नहीं कह रहा कि मैं विकास हूँ, मैं मोदी हूँ या मैं भारत हूँ. बल्कि भावनात्मक मुद्दे उछाले जा रहे हैं. एक बार फिर से हमें मुसलमानों के नाम पर डराया जा रहा है कि मुसलमान ज्यादा हो गए तो ये होगा और वो होगा. मैं मोदी और योगी सरकार से पूछना चाहता हूँ कि क्या वो एक भी मुसलमान को भारत से बाहर भेज सकती है? भारतीय मुसलमानों की तो छोड़िए क्या वो एक भी बांग्लादेशी या हाल में भारत में घुस आए रोहिंग्या घुसपैठियों को अब तक भारत से निकाल-बाहर कर सकी है? अगर नहीं, तो फिर फालतू का शोर-शराबा क्यों? अरे भाई आप जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून बनाईए किसने रोका है? आप मदरसों पर नियंत्रण करिए किसने रोका है? लेकिन आप ये सब नहीं कर रहे. कोशिश तक नहीं कर रहे. इससे सम्बद्ध कोई विधेयक आपने पेश नहीं किया.
मित्रों, फिर आपने किया क्या? आपने देश को क्रॉनिक कैपिटलिज्म के और गरीबों को मौत के मुंह में धकेल दिया. सरकारी बैंकों की क्या दशा कर दी है आपने? बैंक नए खाते नहीं खोल रहे और कहते हैं कि सरकार ने रोक दिया है. फिर लोग पैसे रखेंगे कहाँ? मैंने नई नौकरी पकड़ी है मुझे कैसे वेतन मिलेगा? अगर आधार से लिंक्ड सिर्फ एक ही खाता होगा तब तो हजारों खाते बंद हो जाएंगे और सरकारी बैंकों का भट्ठा बैठ जाएगा. फिर आप उसका निजीकरण कर देंगे. इसी तरह से आपकी सरकार में पीएसयूज की हालत ख़राब है और जानबूझकर हालत ख़राब की गई है. बाँकी एयरलाइन्स मजे में हैं लेकिन एयर इंडिया क्रैश लैंडिंग की स्थिति में है क्यों? जिओ जी रहा है लेकिन बीएसएनएल मर रहा है क्यों?
मित्रों, क्या इसी को कहते हैं देश का बदलना? सचमुच बदल ही तो रहा है मेरा देश. क्रॉनिक कैपिटलिज्म की बदौलत अमेरिका बन रहा है मेरा देश. गरीब और गरीब और अमीर और अमीर हो रहे हैं. अब कुछ भी सरकारी नहीं रहेगा और हमारा जीवन अमीरों की रहमो करम पर होगा. हर चीज रेल, डाक, फोन, सड़क, बिजली, पानी, जंगल, हवा, बैंक, जमीन सब पर अमीरों का अधिकार होगा. तो फिर हम क्या करेंगे? पकौड़े तलेंगे और क्या? खैर, खुदा खैर करे. तो मैं कह रहा था कि मैं इस बार तो यह कविता नहीं लिख पाया लेकिन लिखूंगा जरूर. यकीन मानिए हमारे बैंक खातों में १५ लाख आने से पहले लिख लूँगा. चाहे इसके लिए मुझे मोदी जी की तरह २४ घंटे जागना क्यों न पड़े. तब तक आप भी जागते रहो और लोगों को भी जगाते रहो. ख़बरदार जो किसी ने सोने की हिम्मत की. न मैं सोऊंगा और न सोने दूंगा.

रविवार, 11 मार्च 2018

मोदी की कथनी और करनी

मित्रों,पिछले ४ सालों से भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार है. सत्ता संभालने से पहले और संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने खूब बोला है-हम यह करेंगे और वह करेंगे. मोदी जी से ज्यादा शायद ही कोई इंसान ने इस दौरान बोला हो रेडियो ने बोला हो तो बोला हो. मगर सवाल उठता है कि क्या मोदी ने इस दौरान वही किया है जो उन्होंने बोला है? पहले कुछ मुद्दों पर उनकी कथनी और करनी का विश्लेषण कर लेते हैं.

१. मित्रों,मोदीजी ने कहा था कि उनकी सरकार हर साल २ करोड़ रोजगार पैदा करेगी। लेकिन हुआ इसका उल्टा। आज रोजगार-निर्माण की हालत पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार से भी ख़राब है और मोदी लोगों से पकौड़ा तलने को बोल रहे हैं.
२. मोदी जी कहते हैं कि वे कोई भी काम चुनाव को ध्यान में रखकर नहीं करते लेकिन वास्तविकता तो यह है कि उनका प्रत्येक काम सिर्फ और सिर्फ चुनाव को ध्यान में रखकर किया जा रहा है. आज उन्होंने महिला दिवस राजस्थान में मनाया क्योंकि वहां चुनाव होना है.
३. मोदी जी ने नारा दिया था नेशन फर्स्ट। आश्चर्य है कि आजकल वे इस नारे का जिक्र तक नहीं करते। असलियत तो यह है कि अब उनके लिए चुनाव फर्स्ट और लास्ट हो गया है. सरकार ने जानबूझकर एयर इंडिया को बर्बाद करके रख दिया है और शायद अगली बारी बीएसएनएल की है. इसके साथ ही सरकारी बैंकों को बर्बाद किया जा रहा है. आज रेलवे की साख भी रसातल में है. यह सरकार ट्रेनों को चला काम रही है रद्द ज्यादा कर रही है.
४. मोदी जी ने २०१४ में कहा था कि उनकी पार्टी अपने गठबंधन सहयोगियों के प्रति अच्छा व्यवहार करेगी लेकिन उनका रवैया यूज एंड थ्रो का है.
५. मोदी सरकार ने पत्रकारों की पीएमओ में नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाला था जिसको अब कई साल बीत गए हैं लेकिन आज तक हुआ कुछ नहीं है.
६. मोदी जी ने भ्रष्टाचार के ऊपर मरणांतक प्रहार करने का वादा किया था लेकिन आज तक उसने लोकपाल की नियुक्ति नहीं की और रोज इससे बचने के लिए नए-नए बहाने बना रही है. यह सरकार भी सीबीआई का इस्तेमाल अपने लोगों को बचाने और विपक्षियों को डराने के लिए कर रही है.
७. मोदी जी ने कहा था कि गरीबों का पैसा सीधे उसके खाते में जाएगा लेकिन आज वही खाता उनके लिए गले की फ़ांस बन चुका है क्योंकि बैंक न्यूनतम शेष राशि के नाम पर उनके सारे पैसे चट कर जा रहा है.
८. मोदी जी ने कहा था कि वे १०० दिनों में विदेशों से कालाधन वापस लाएंगे लेकिन एक पैसा वापस नहीं आया. हाँ, कोशिश करने का नाटक जरूर किया गया.
९. मोदी जी ने कहा था कि वे पाकिस्तान से बातचीत नहीं करेंगे और चीन से भी उसी की भाषा में बात करेंगे लेकिन इस समय गुपचुप तरीके से पाकिस्तान से एनएसए स्तर की बातचीत चल रही है और चीन को खुश करने के लिए दलाई लामा पर प्रतिबन्ध लगाना शुरू कर दिया है.
१०. मोदी जी को कभी गंगा माँ ने बुलाया था लेकिन गंगा आज भी उतनी ही मैली है जितनी २०१४ में थी.
११. मोदी जी ने वादा किया था कि वो सालभर में दागी सांसदों और विधायकों पर मुकदमा चलाकर सजा दिलवाएंगे लेकिन किया इसका उल्टा। दूसरे दलों से दागियों को धड़ल्ले से भाजपा में आयातित किया गया और किया जा रहा है.
१२. मोदी जी कहते हैं कि उनकी सरकार ने पद्म पुरस्कारों की गरिमा पुनस्थापित की लेकिन सवाल उठता है कि शरद पवार को पुरस्कार क्यों किया? इसी तरह से सारे सरकारी पद ठीक मंत्री पद की तरह अयोग्य लोगों के बीच बाँट दिया गया. इनके राज्यपाल भी पिछली सरकार की तरह यौनापराधों में संलिप्त पाए जा रहे हैं.
१३. मोदी जी ने कहा था कि वे भारत से वीआईपी संस्कृति को समाप्त कर देंगे लेकिन हालत यह है कि बीएसएफ के एक जवान का वेतन सिर्फ इसलिए काट लिया गया क्योंकि उसने मोदी के नाम में श्री नहीं लगाया था.
१४. चुनावों के समय मोदी हर राज्य को या तो विशेष दर्जा या विशेष पैकेज देने का वादा कर देते हैं और बाद में भूल जाते हैं. अभी ऐसे ही वादे के लिए उनका चंद्रबाबू नायडू से विवाद चल रह है.
कहने का तात्पर्य यह है कि जहाँ राउडी राठौर फिल्म में अक्षय कुमार ने कहा था कि मैं जो बोलता हूँ वो मैं करता हूँ और मैं जो नहीं बोलता, वो मैं डेफिनेटली करता हूँ वहीँ मोदी के बारे यह कहा जा सकता है कि वे जो बोलते हैं डेफिनेटली उसका उल्टा करते हैं.

नरेंद्र मोदी की कृत्रिम बुद्धि


मित्रों,आपको याद होगा कि पिछले साल राहुल गाँधी जी ने अमेरिका जाकर अपना पहले भाषण दिया था. यह उनका अमेरिका में पहला भाषण था. तब मुझे बड़ी हंसी आई थी क्योंकि उनकी वक्तृता का विषय था कृत्रिम बुद्धि. लेकिन आज २५ फरवरी, २०१८ को मैं फिर से हँसते-२ रोने को विवश हूँ. आज हमारे कथित प्रधान सेवक जी ने अपने मन की बात में कृत्रिम बुद्धि के महत्व पर बोला है. इससे पहले भी वे कुछ दिन पहले किसी कार्यक्रम में कृत्रिम बुद्धि का महिमामंडन कर चुके हैं.

मित्रों,यह विडंबना है कि हमारे लगभग सारे राजनेता भारत को अमेरिका बनाने की बात करते हैं. क्यों करते हैं पता नहीं जबकि अमेरिका और भारत के हालात में कोई तुलना ही नहीं है. जहाँ अमेरिका में बेरोजगारों की कमी है वहीँ भारत में रोजगारों की कमी है. अमेरिका में इंसानों की कमी को कृत्रिम बुद्धि से युक्त मशीनों से पूरी करना मजबूरी है लेकिन जिस भारत में जहाँ आज भी एक किलोग्राम चावल चुराने पर एक भूखे को पीट-२ कर मार डाला जाता हो उस भारत में कृत्रिम बुद्धि के प्रति प्रधानमंत्री के प्रेम को सिर्फ दीवानगी ही कहा जा सकता है.


मित्रों,क्या योजना बनाई है भारत प्राइवेट लिमिटेड के वर्तमान सीईओ नरेन्द्र मोदी जी ने? जबरदस्त, मुंहतोड़. इन्सान पकौड़े तलेंगे और देश चलाएंगी मशीनें. स्टेशनों पर टिकट मशीन काटेगी मशीन, मशीन बुलेट ट्रेन चलाएगी और मशीन ही उसमें यात्रा करेगी, मशीन ही हवाई जहाज उड़ाएगी और मशीन ही हवाई चप्पल पहन कर उनमें उड़ान भरेंगी, होटलों में खाना मशीन पहुंचाएगी, खेती करेगी और कराएगी मशीनें, सीमा पर गोली मशीन चलाएगी, इंडियन रेलवे और मेट्रो निगमों की ट्रेनें मशीन चलाएगी, मशीन बताएगी कि मंदी कैसे दूर होगी, मशीन बताएगी कि नीरव मोदी कैसे भारत वापस आएगा और मशीन ही उसे वापस भी लाएगी. भविष्य में मोदी मंत्रिमंडल में सिर्फ प्रधानमंत्री इन्सान होंगे बांकी सारे विभाग मशीनें संभालेंगी आखिर वे खुद में स्वतः सुधार करना जो सीख गई हैं, सेल्फ इंटेलिजेंस का गुण आ गया है उनमें.


मित्रों,इस तरह भारत सरकार जो पैसे बचाएगी उसको बराबर-बराबर जनता के खाते में डाल दिया जाएगा. पहले १५ पैसा से शुरू करके अंत में १५ लाख. जैसे कि अभी-अभी सिंगापुर की सरकार ने अपने देशवासियों के खातों में डाला है. लेकिन तब तक हमको-आपको पकौड़े बेचकर, खाकर, खरीदकर जिंदा रहना पड़ेगा.


मित्रों,अच्छा हुआ कि नेहरु-शास्त्री ने भारत को अमेरिका बनाने का सपना नहीं देखा और भारत की भुखमरी-गरीबी और बेरोजगारी को ध्यान में रखा नहीं तो हम भारतवासी नहीं होते भारत की नागरिक होती सिर्फ मशीनें. सऊदी अरब ने तो एक रोबोट को अपने देश की नागरिकता दे भी दी है. वैसे हमें इस बात की ख़ुशी है कि कम-से-कम इस एक मुद्दे पर तो भारत के पक्ष-विपक्ष के बीच आम सहमति है. अंत में हम आपको बता दें कि बोला तो पीएम ने गोबर पर भी है लेकिन उस पर आम सहमति नहीं है गोबर विशेषतया गाय का गोबर सांप्रदायिक पदार्थ जो है.

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

कर्नाटक का अलग झंडा और मूर्तिभंजन की घटनाएं

मित्रों, यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि हमारे देश की राजनीतिक पार्टियां सत्ता के लिए क्या कुछ नहीं कर सकती. दुर्भाग्यवश इस मामले में हमारे देश में कोई भी पार्टी विथ डिफरेंस नहीं है. चूँकि कुछ ही दिन बाद कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होनेवाला है इसलिए वहां के दल एक से एक गन्दा खेल खेलने में लगे हुए हैं.
मित्रों, सारी हदों को तोड़ते हुए कल कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने राज्य के लिए एक अलग झंडे की घोषणा कर दी है. यहाँ हम आपको बता दें पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने भी अपने समय में राज्य के लिए एक अलग झंडे की घोषणा की थी लेकिन आलोचना होने के बाद उसे वापस ले लिया था.
मित्रों, सवाल उठता है कि जब देश एक है, एक संविधान है और राष्ट्रीय ध्वज भी एक है फिर कर्नाटक को अलग क्षेत्रीय झंडा क्यों चाहिए? सवाल यह भी उठता है कि यदि राज्य का झंडा अलग होगा तो क्या यह हमारे राष्ट्रिय ध्वज के महत्त्व को कम नहीं करेगा?  क्या ऐसा होने पर लोगों में प्रांतवाद की भावना नहीं बढ़ेगी?  प्रश्न यह भी उठता है कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित कैसे करेगी कि अलग क्षेत्रीय झंडे के बावजूद वहां के नागरिकों की आस्था राष्ट्रीय ध्वज के प्रति पूर्ववत बनी रहे?
मित्रों, हालाँकि इन सवालों का जवाब जानना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह समझना है कि क्षेत्रीय झंडे को महत्त्व देने का मतलब राष्ट्रीय झंडे को अस्वीकृति देना कतई नहीं होता. अमेरिका, जर्मनी तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे संघीय व्यवस्था वाले अनेक देशों में राष्ट्रीय अस्मिता के साथ राज्यों को अलग क्षेत्रीय पहचान बनाए रखने की छूट दी गई है. म्यांमार में तो हर क्षेत्र के अलग झंडे हैं.
मित्रों, इस आधार पर है देखते हैं तो कर्नाटक मांग जायज लगती है लेकिन दूसरी तरफ प्रश्न यह भी उठेंगे कि एक राष्ट्रीय झंडे से राज्य सरकार को परेशानी क्या है? झंडे के प्रति प्रेम और आदर का भाव होना जरूरी है जब, तिरंगे के प्रति सम्मान की भावना नहीं रह पा रही है तो, उस लाल-पीले झंडे के प्रति कैसे रहेगी, जिसे अपनाने के लिए कर्नाटक सरकार संविधान का हवाला तक दे रही है. कर्नाटक के बाद अन्य राज्य भी ऐसी मांग करेंगे. इस तरह देश में क्षेत्रीयता की भावना हावी होती जाएगी और राष्ट्र के तौर पर हम भीतर से खोखले होते जाएंगे.
कहना न होगा इस तरह की विभाजनकारी राजनीति राष्ट्रीय एकता और प्रगति में बाधक साबित होगी.
मित्रों, प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का अपना एक चिन्ह या प्रतीक होता है,जिससे उसकी पहचान बनती है.  राष्ट्रीय ध्वज हर राष्ट्र के गौरव तथा देश की एकता, अखंडता और सम्प्रभुता का प्रतीक भी होता है. राष्ट्रीय ध्वज एक ही तो और उनके प्रति आस्था बनी रहनी चाहिए. वैसे हमें यह भी देखना होगा कि भारत के एकमात्र राज्य जम्मू और कश्मीर जिसका अलग झंडा है में तिरंगे के प्रति प्रेम और आस्था का क्या हाल है.
मित्रों, अंत में मैं भाजपा को पूर्वोत्तर में मिली ऐतिहासिक जीत के लिए बधाई देते हुए देशभर में महापुरुषों के मूर्तिभंजन की घटनाओं की घोर निंदा करता हूँ चाहे वो लेलिन ही क्यों न हो हालाँकि सत्य यह भी है उसके नेतृत्व में रूस में बड़े पैमाने पर नरसंहार की घटनाओं को अंजाम दिया गया था. 

सोमवार, 5 मार्च 2018

भाजपा में कौन ला रहा है कांग्रेस संस्कृति?

मित्रों, यह बहुत अच्छी बात है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भाजपा के कांग्रेसीकरण की चिंता है. अब बिना आग के धुआँ तो उठता नहीं है इसलिए प्रधानमंत्री जी को कुछ तो जरूर ऐसा दिखा होगा जिसने उनको चिंतित कर दिया.
मित्रों, आपने भी इतिहास पढ़ा है और जानते हैं कि पृथ्वीराज ने मोहम्मद गोरी को हराने के बाद उच्चादर्शों का पालन करते हुए जीवनदान दे दिया था लेकिन जब गोरी ने पृथ्वीराज को हराया तब उसने आदर्शवाद का प्रदर्शन नहीं किया बल्कि कमीनापंथी की. पृथ्वीराज को अँधा कर दिया और उसके अन्तःपुर की स्त्रियों के साथ घनघोर अमानुषिक अत्याचार किया जैसा कि पिछले दिनों आईएसआईएस ने यजीदी महिलाओं के साथ किया है.
मित्रों, इसके बाद भी हिन्दू राजे-महाराजे लम्बे समय तक आदर्शवादी बने रहे जिसका लाभ मुस्लिम हमलावरों ने जमकर उठाया. पहली बार महाराणा प्रताप ने इस सच्चाई को समझा और गोरिल्ला या छापामार विधि से युद्ध की शुरुआत की. बाद में शिवाजी, छत्रसाल और गुरु गोविन्द सिंह ने भी इसे अपनाया और मुग़ल साम्राज्य की जड़ें हिला दीं.
मित्रों, कहने का तात्पर्य यह है कि जब आपका सामना निहायत कमीनों से हो तब आप आदर्शवादी नहीं बने रह सकते. कहना न होगा युद्धिष्ठिर को भी धर्म की जीत के लिए छल का सहारा लेना पड़ा था. लेकिन इसके बावजूद वे युद्धिष्ठिर ही बने रहे थे दुर्योधन नहीं बने थे.
मित्रों, हम जानते हैं कि भाजपा का सामना भी दुष्टों से है जिसकी अगुवाई कांग्रेस कर रही है. आज कांग्रेस भ्रष्टाचार, अहंकार, वंशवाद, तुष्टिकरण, चापलूसी का पर्याय बनकर रह गयी है. बहुत-से कांग्रेसी इनदिनों स्वाभाविक तौर पर भाजपा में आ रहे हैं. जाहिर है कि उनके साथ कांग्रेस संस्कृति जिसके लक्षणों का वर्णन हमने पिछली पंक्ति में किया है भी भाजपा में आ रही है. इसके अलावा सत्ता में रहने पर हर दल में स्वतः कई तरह के दोष उत्पन्न हो जाते हैं.
मित्रों, सवाल उठता है कि भाजपा को कांग्रेसीकरण से बचाने की जिम्मेदारी किसके ऊपर है? जाहिर है कि खुद मोदी और शाह पर. बनाना-बिगाड़ना सबकुछ तो उनके हाथों में ही है फिर मोदी जी किससे इस बीमारी से बचने की अपील कर रहे हैं और क्यों?
मित्रों, अभी भारी संख्या में केंद्र सरकार ने रिक्तियों की घोषणा की है. उनमें से लगभग हर विभाग के बारे में पैसे लेकर सीट बेचने की शिकायतें आ रही हैं. एसएससी के खिलाफ तो बच्चों को अनशन तक करना पड़ा है. यही तो है कांग्रेस संस्कृति जिसको समाप्त करने का वादा मोदी जी ने किया था. मोदी जी को यह देखना होगा कि इस तरह के और हर तरह से भ्रष्टाचार का अंत कैसे हो. उनको ऐसा होना चाहिए की भाषा बंद करनी होगी और ऐसा ही होगा की भाषा अपनानी होगी. ऐसी भाषा तो मनमोहन सिंह बोला करते थे और उनको शोभा भी देती थी क्योंकि उनके पास सीमित शक्ति थी और वे कठपुतली मात्र थे लेकिन मोदी जी के साथ तो ऐसा नहीं है फिर वही भाषा क्यों?

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

एक किलो चावल के लिए हत्या

मित्रों, रामचरितमानस में एक प्रसंग है. भक्तराज हनुमान माता सीता की खोज में लंका जाते है. माता सीता से भेंट होने के बाद हनुमान भूख मिटाने के लिए पास के बगीचे से फल तोड़कर खाने लगते हैं. लेकिन उनका ऐसा करना राक्षसों को नागवार गुजरता है. फिर युद्ध होता है और अंततः हनुमान को बंदी बनाकर राक्षसराज रावण के दरबार में पेश किया जाता है. तब हनुमान रावण से पूछते हैं कि उनको किस अपराध में बंदी बनाया गया है. क्योंकि भूख लगने पर भूख मिटाने के लिए की गई चोरी अपराध नहीं होता क्योंकि अपनी जान की रक्षा करना हर प्राणी का कर्त्तव्य होता है.
मित्रों, इसी तरह का एक प्रसंग महाभारत में भी है जब रंतिदेव नामक एक ब्राह्मण का परिवार जो कई दिनों से भूखा होता है एक भिक्षुक की जठराग्नि को बुझाने के लिए अपना भोजन दान कर देता है और खुद दम तोड़ देता है. इसी प्रकार राजा शिवि द्वारा एक कबूतर की प्राणरक्षा के लिए अपना मांस अपने हाथों से काट-काटकर बाज को खिला देने का इसी महाकाव्य का प्रसंग भी हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं.
मित्रों, फिर उसी भारत में अगर किसी भूखे, लाचार गरीब को एक किलो चावल चुराने के चलते बेरहमी से पीट-पीट मनोरंजन के तौर पर मार दिया जाए तो इससे बुरा और क्या होगा. क्या आज के भारत में रामायण काल के राक्षसों का राज है? हाँ, हुज़ूर मैं बात कर रहा हूँ सर्वहारा पार्टी द्वारा शासित केरल में घटी घटना की जहाँ मधु नाम के एक गरीब आदिवासी की हत्या कर उनकी गरीबी और अभाव से भरे जीवन का भी अंत कर दिया गया है. शायद सर्वहारा के पैरोकार दल ने गरीबी मिटाने का यह नया तरीका ढूंढ निकाला है. क्या तरीका है! गजब!! अनोखा!!! जब गरीब ही नहीं रहेंगे तो गरीबी कहाँ से रहेगी, जब भूखे ही नहीं रहेंगे तो भूख कहाँ रहेगी? वैसे आश्चर्य है कि मार्क्स इस तरीके की खोज क्यों और कैसे खोज नहीं पाए?
मित्रों, आश्चर्य तो इस बात को लेकर भी है कि अभी तक किसी भी अतिसंवेदनशील ने अपने पुरस्कार वापस नहीं किए? करेंगे भी कैसे मधु ने कोई गाय की हत्या थोड़े ही की थी? चावल चुरानेवाले तो इन्सान होते ही नहीं हैं इन्सान तो गोहत्या करनेवाले होते हैं, मुम्बई में बम फोड़नेवाले होते हैं. यह बात अलग है कि मुझे आज तक कोई पुरस्कार दिया नहीं गया है वर्ना मैं कब का वापस कर चुका होता शायद तभी जब केरल में पहले आरएसएस प्रचारक की बेवजह नृशंस हत्या हुई थी.
मित्रों, इसी तरह से बंगाल में हिन्दू विद्यालयों पर रोक लगा दी गई है लेकिन फिर भी कोई असहिष्णुता नहीं फैली क्योंकि हिन्दू तो आदमी होते ही नहीं. हद तो यह है कि केंद्र की मोदी सरकार चुपचाप इस तरह की घटनाओं को मूकदर्शक बनी आँखें फाडे देखे जा रही है. क्या यही है उसका रामराज्य? उनके आदर्श राम ने तो सत्ता सँभालते ही घोषणा की थी कि निशिचरहीन करौं महि हथ उठाए पण कीन्ह. राम ने तो हर अन्याय का प्रतिकार किया. जब सत्ता में नहीं थे तब भी रावण जैसे सर्वशक्तिशाली से युद्ध किया. तो क्या आज की भाजपा के लिए राम भी सिर्फ एक वोटबैंक हैं? उनके आदर्शों का उसके लिए कोई महत्त्व नहीं है? तो क्या इसी तरह मधु रोटी के लिए मारे जाते रहेंगे? अगर यही सब होना था तो क्या लाभ है भाजपा के केंद्र और १८ राज्यों में सत्ता में होने से? क्या लाभ है???

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

बच्चों के खून की कीमत लगाईए सुशासन बाबू

मित्रों, होली को अभी कई दिन बांकी हैं लेकिन बिहार में तो कई हफ्ते पहले से होली शुरू है. मुजफ्फरपुर के धरमपुर गाँव के बच्चों के साथ तो गजब की होली खेली गई है,खून की होली. पूरी तरह से सर्वधर्मसमभाव जो भाजपा का मूल मंत्र है का पालन करते हुए यह होली खेली गई है. हिन्दू-मुसलमान दोनों ही समुदाय के ९ बच्चों के जिस्म को लाल टेसू रंग में दलित भाजपा नेता मनोज बैठा ने इस कदर सराबोर कर दिया कि बेचारे हमेशा के लिए नींद की आगोश में सो गए. उनकी माँ-उनके पापा रो-रो कर उनको जगा रहे हैं, दुहाई दे रहे हैं कि अब वे किसके लिए जीएंगे लेकिन बच्चे इतने ढीठ हैं कि सुन ही नहीं रहे. कई बच्चे अस्पताल में हैं और राम जाने कि उनमें से कितने वहां से वापस घर आएंगे.
मित्रों, मैं सुशासन बाबू से जिनकी बिहार में बड़ी हनक है से विनती करता हूँ कि हुज़ूर आप कोशिश करिए न जगाने की. आपकी बात बिहार में कौन काट सकता है फिर ये तो बच्चे ठहरे सरकार. सरकार विपक्ष के कई नेता आकर जा चुके हैं मगर बच्चों ने उनकी तो मानी नहीं. आप इस बार भी नहीं आएँगे क्या सरकार? पिछली बार जब गोपालगंज में बच्चे मिड डे मिल खाकर सो गए थे तब भी तो आप नहीं आए थे?सरकार कसम से आप आते तो बच्चे उठ बैठते और आपसे सवाल पूछते कि सरकार ने तो छोटे पौधों के काटने पर भी रोक लगा रखी है फिर कोई हमको चीटियों की तरह मसलकर कैसे मार सकता है?  सरकार आप तो जानते होंगे कि बच्चे अब सरकारी स्कूलों में पढने नहीं जाते क्योंकि वो तो होती ही नहीं है वे बेचारे तो खाना खाने के लालच में जाते हैं मगर उनको कहाँ पता होता है कि स्कूल का खाना उनके लिए बलि के बकरे के आगे रखा अक्षत साबित हो सकता है. सरकार सुना था कि आपने बिहार में शराबबंदी कर रखी है, फिर उस नेताजी ने कहाँ से पी ली? सरकार क्या आपने सत्ता पक्ष के नेताओं को इस बंदी से छूट दे दी है?
सरकार आपने अभी तक हमारी जान की और हमारे माँ-बाप के अरमानों की कोई कीमत नहीं लगाई? सरकार लगाईये न कीमत. हमें भी तो पता चले कि हमारे खून की कीमत क्या है. सरकार अभी तक आपने जाँच की घोषणा भी नहीं की है. सरकार जाँच का नाटक भी तो होना चाहिए. ऐसा रस्म रहा है दस्तूर रहा है जनाब. सीबीआई कैसी रहेगी? सृजन घोटाले की तरह पूरा लीपा-पोती कर देगी जनाब. विशेषज्ञता है इसको इसमें. सालों साल बीत जाएंगे मगर नतीजा नहीं आएगा. फिर आप न्यायिक जाँच करवा लीजिएगा, फिर एसआईटी और फिर फिर से सीबीआई और अंत में नो वन किल्ड जेसिका.

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

मोदी सरकार का मूर्ख बनाओ कार्यक्रम

मित्रों, मोदी सरकार के ५ साल पूरे होनेवाले हैं. अगर आपसे सरकार के काम-काज का निष्पक्ष होकर आकलन करने के लिए कहा जाए तो आपका निष्कर्ष क्या होगा राम जाने लेकिन हमारा तो वही आकलन होगा जो एक सच्चे राष्ट्रवादी का होना चाहिए.
मित्रों, क्या आपको याद है कि २०१४ में श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी ने क्या-क्या वादे किए थे? चलिए मैं याद दिला देता हूँ-१. मोदी जी ने वादा किया था कि वे १०० दिनों में विदेशों से कालाधन वापस लाएंगे.
२. एक साल में सारे दागी सांसदों-विधायकों पर मुकदमा चलवाकर फैसला करवाएंगे.
३. देश के पूर्वी हिस्से के तीव्र विकास के लिए प्रयास करेंगे.
४. भ्रष्टाचारियों को सजा दिलवाएँगे और उनके द्वारा लूटे गए धन-सम्पत्ति को बिना भेदभाव के जब्त करेंगे.
५. गंगा को फिर से प्रदूषण-मुक्त बनाया जाएगा.
६. महंगाई कम की जाएगी.
७. हर साल २ करोड़ रोजगार पैदा किए जाएँगे.
८. सरकारी अस्पतालों की स्थिति में सुधार किया जाएगा.
९. कृषकों की आमदनी की दोगुना किया जाएगा.
१०. पुलिस में सुधार किया जाएगा.
११. न्यायिक प्रक्रिया को सरल और तीव्र किया जाएगा.
१२. पाक समर्थित आतंकवाद का स्थायी ईलाज किया जाएगा.
१३. भारत न तो किसी को आँख दिखाएगा न ही किसी से आँखें चुराएगा बल्कि हर किसी से आँखों में ऑंखें डालकर बात करेगा.
१४. सबको अपना आवास उपलब्ध करवाया जाएगा.
१५. भारत की शिक्षा को वैश्विक स्तर का बनाया जाएगा.
१६. गरीबों का पैसा सीधे उनके खाते में डाला जाएगा.
१७. भारत से गरीबी का नामोनिशान मिटा दिया जाएगा. सबको अमीर बनाया जाएगा.
१८. देश के खजाने को सुरक्षित किया जाएगा और कोई खूनी पंजा इस पर हाथ नहीं डाल पाएगा.
१९. सारे बंगलादेशी घुसपैठियों को चिन्हित कर वापस भेजा जाएगा.
२०. भारत को वैज्ञानिक और तकनीकी अनुसन्धान में अग्रणी बनाया जाएगा.
२१. वे प्रधानमंत्री की तरह नहीं बल्कि प्रधान सेवक की तरह व्यवहार करेंगे.
२२. रुचि और प्रतिभा के आधार पर नामांकन को सुनिश्चित किया जाएगा.
२३. स्वायल हेल्थ कार्ड बनाया जाएगा और कृषि ऋण और फसल बीमा को सस्ता और सरल बनाया जाएगा.
२४. आधारभूत संरचना में सुधार किया जाएगा.
२५. २४ घंटे बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी.
आदि आदि.
मित्रों, चुनाव जीतने के बाद देश की प्रगति को समर्पित कई गीत मोदी सरकार ने बनाए-जैसे कि मेरा देश बदल रहा है, आगे चल रहा है. दुर्भाग्यवश आज यह गीत एक नारा भर बनकर रह गया है. देश तो नहीं बदला लेकिन भाजपा बदल गई, उसका कार्यालय बदल गया. भाजपा आज पापी नेताओं के पापों का नाश करनेवाली गंगा बन गई है. उसका कार्यालय दुनिया का सबसे बड़ा कार्यालय है और वो खुद दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी.
मित्रों, बांकी किस क्षेत्र में क्या काम हुआ है आप ऊपर वर्णित वायदों को सरसरी निगाह से देखकर भी आसानी से मूल्यांकन कर सकते हैं. बर्बादे गुलिस्ताँ के लिए बस एक ही उल्लू काफी है, हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामें गुलिस्तान क्या होगा. यानि देश को बर्बाद करना है तो वित्त मंत्री किसी मूर्ख को बना दीजिए. बस वो अर्थव्यवस्था का नाश कर देगा और बांकी विभाग खुद ही बर्बाद हो जाएँगे, पूरा देश तबाह हो जाएगा. नोटबंदी से क्या लाभ हुआ राम जाने लेकिन जीएसटी से व्यापक नुकसान जरूर हुआ है. राज्यों की कर वसूली तो घटी ही है केंद्र की भी घट गयी है. राज्य सरकार व विश्वविद्यालयों  के कर्मियों को ६-६ महीने से वेतन नहीं मिला है. बिहार और दिल्ली का तो मैं प्रत्यक्ष गवाह हूँ बांकी राज्यों का आपलोगों को बेहतर पता होगा. और उस पर तुर्रा यह है कि ऐसी हालत तब है जब अभी नए वेतनमान को लागू करना बांकी है उसके बाद वेतन चालू रहेगा या बिलकुल ही बंद हो जाएगा अरुण जेटली जाने या हमारी पॉकेटमार सरकार जाने जो इन दिनों टेलकॉम कंपनियों की तरह ग्राहकों के बैंक खातों से चुपके से पैसा खिसकाने में लगी हुई है. १५ लाख तो आए नहीं १५०० भी गए.
मित्रों, आपने ध्यान दिया होगा कि मोदी सरकार २०१९ की बात ही नहीं कर रही बल्कि २०२२ की बात कर रही है. ५ साल में कुछ अच्छा होता दिख नहीं रहा तो ३ सालों में क्या हो जाएगा और भारत को क्या बना दिया जाएगा? मुझे तो लगता है कि सिवाय मूर्ख के और कुछ नहीं. आपको क्या लगता है?
मित्रों, कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि मैंने पार्टी बदल ली है लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है. मैंने आज भी घनघोर राष्ट्रवादी हूँ. मेरे लिए मोदिभक्ति कभी देशभक्ति नहीं थी, नहीं है और न ही होगी.

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

वित्तीय आपातकाल की ओर अग्रसर भारत

मित्रों,  भारतीय संविधान में तीन आपातकाल वर्णित हैं- 1. राष्ट्रीय आपात - अनुच्छेद 352) राष्ट्रीय आपात की घोषणा काफ़ी विकट स्थिति में होती है. इसकी घोषणा युद्ध, बाह्य आक्रमण और राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर की जाती है.

2. राष्ट्रपति शासन अथवा राज्य में आपात स्थिति- अनुच्छेद 356) इस अनुच्छेद के अधीन राज्य में राजनीतिक संकट के मद्देनज़र, राष्ट्रपति महोदय संबंधित राज्य में आपात स्थिति की घोषणा कर सकते हैं. जब किसी राज्य की राजनैतिक और संवैधानिक व्यवस्था विफल हो जाती है अथवा राज्य, केंद्र की कार्यपालिका के किन्हीं निर्देशों का अनुपालन करने में असमर्थ हो जाता है, तो इस स्थिति में ही राष्ट्रपति शासन लागू होता है. इस स्थिति में राज्य के सिर्फ़ न्यायिक कार्यों को छोड़कर केंद्र सारे राज्य प्रशासन अधिकार अपने हाथों में ले लेती है.

3. वित्तीय आपात - अनुच्छेद 360) वित्तीय आपातकाल भारत में अब तक लागू नहीं हुआ है. लेकिन संविधान में इसको अच्छी तरह से परिभाषित किया गया है. अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपात की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा तब की जाती है, जब राष्ट्रपति को पूर्ण रूप से विश्वास हो जाए कि देश में ऐसा आर्थिक संकट बना हुआ है, जिसके कारण भारत के वित्तीय स्थायित्व या साख को खतरा है. अगर देश में कभी आर्थिक संकट जैसे विषम हालात पैदा होते हैं, सरकार दिवालिया होने के कगार पर आ जाती है, भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त होने की कगार पर आ जाए, तब इस वित्तीय आपात के अनुच्छेद का प्रयोग किया जा सकता है. इस आपात में आम नागरिकों के पैसों एवं संपत्ति पर भी देश का अधिकार हो जाएगा. राष्ट्रपति किसी कर्मचारी के वेतन को भी कम कर सकता है. गौरतलब है कि संविधान में वर्णित तीनों आपात उपबंधों में से वित्तीय आपात को छोड़ कर भारत में बाकी दोनों को आजमाया जा चुका है. भारत में कभी वित्तीय आपात लागू न हो, इसकी हमें प्रार्थना करनी चाहिए.

मित्रों, क्या इस समय भारत सरकार की साख और वित्तीय स्थायित्व को खतरा नहीं है? चार दिन पहले तक तो सरकार दावा कर रही थी कि उसके समय एक पैसे का भी गलत लोन नहीं दिया गया है और आज देश के सारे-के-सारे बैंक गलत लोन के चलते दिवालिया होने की स्थिति में हैं. कल अगर बैंक नकदी के अभाव में बंद हो जाते हैं या लोगों की जमाराशि को लौटाने से मना कर देती है तो सरकार ने सोंचा है कि तब वो क्या करेगी? जनता ने बैंकों पर अपने जमा धन की निकासी के लिए अगर धावा बोल दिया और बैंकों को आग के हवाले करना शुरू कर दिया तो क्या होगा क्या सरकार सोंचा है?

मित्रों, सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या सरकार पूरे मामले को गंभीरता से ले भी रही है? वो इन दिनों जिस तरह का व्यवहार कर रही है उससे तो ऐसा लगता नहीं। मोदी जी को तत्काल सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए और विपक्ष से भी न केवल परामर्श करना चाहिए बल्कि उसको विश्वास में भी लेना चाहिए. यह संकट कोई सरकार मात्र का संकट नहीं है बल्कि राष्ट्रीय संकट है. लेकिन सरकार कर क्या रही है? वित्त मंत्री घोटाला सामने आने के बाद भी २ दिनों तक देश में थे लेकिन वे मीडिया के सामने नहीं आए और विदेश चले गए. प्रधानमंत्री कभी बच्चों से परीक्षा कैसे देनी चाहिए पर बात करते हैं तो कभी कृत्रिम बुद्धि पर व्याख्यान दे रहे हैं. अर्थात उनको जो करना चाहिए और प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए वे नहीं कर रहे हैं. इसी को बिहार में कहते हैं हंसिया के लगन में खुरपी का गीत. आप ही बताईए अगर कोई श्राद्ध में शामिल होने जाए और विवाह के गीत गाने लगे तो आपको ख़ुशी होगी या गम, गायक पर प्यार आएगा या क्रोध?

मित्रों, इसलिए मैं कहता हूँ कि स्थिति की गंभीरता को समझते हुए सरकार तुरंत सर्वदलीय बैठक बुलाए और उसके बाद प्रेस वार्ता करके देशवासियों के समक्ष स्थिति को स्पष्ट करना चाहिए और विश्वास दिलाना चाहिए कि स्थिति नियंत्रण में है इसलिए भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है. विदेशों में तो ऐसी स्थिति में सर्वदलीय राष्ट्रीय सरकारों का भी गठन हो चुका है फिर सरकार को यशवंत सिन्हा, सुब्रमण्यम स्वामी और अरुण शौरी जैसे अपने लोगों से सलाह लेने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. कुछ लोग फिर से बैंकों के निजीकरण की मांग भी कर सकते हैं लेकिन मैं नहीं मानता कि यह कोई समाधान है क्योंकि दिवालिएपन के कगार पर तो निजी बैंक भी हैं.

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

क्या यह मोदी के अंत का आरम्भ है?

मित्रों, अगर आपने मेरे आलेखों को लगातार पढ़ा होगा तो देखा होगा कि जब भी केंद्र की मोदी सरकार ने अच्छा काम किया है मैंने पूरे मन से उसका समर्थन किया है और जब भी उसका काम मुझे देशहित में नहीं लगा है मैंने पूरी ताक़त से उसका प्रतिकार किया है. चाहे कश्मीर में गठबंधन का मामला हो या फिर भूमि-अधिग्रहण कानून पर आगे बढ़कर पीछे हट जाने का सवाल हो या फिर पापियों-प्रलापियों को मंत्रिमंडल में स्थान देने का प्रश्न हो या फिर सैनिकों की शहादत मेरी कलम ने कभी मोदी सरकार पर प्रहार करने में देर ने नहीं की.
मित्रों, मैं मानता हूँ कि अर्थशास्त्र का अच्छा ज्ञान होने के बावजूद मैं न सिर्फ नोटबंदी के पीछे मोदी सरकार की छिपी हुई मंशा को नहीं समझ पाया बल्कि जीएसटी को अब तलक भी नहीं समझ पाया हूँ. फिर भी ऐसा मानकर कि इस सरकार की नीति तो गलत हो सकती है लेकिन नीयत गलत नहीं होगी इन दोनों मुद्दों पर सरकार के कहे को सच मानकर उसकी पैरोकारी की यह जानते हुए भी कि नीतिगत गलती भी अक्षम्य होती है. लेकिन जैसे गर्म शीशे के टुकड़े पर ठंडा पानी पड़ने से शीशा टूटकर बिखर जाता है वैसे ही पीएनबी घोटाला के सामने आने बाद हमारा भोला-भाला भक्त-ह्रदय पूरी तरह से भग्न-ह्रदय में परिवर्तित हो गया है.
मित्रों, मोदी खुद को खजाने का पहरेदार कहते हैं अन्ना चौबीस घंटे चौकन्ना फिर कैसे कोई खूनी पंजा खजाने को लूट गया.  और सबसे दुखद समाचार तो यह है कि वो खूनी पंजा कोई और नहीं है बल्कि प्रधान सेवक सह चौकीदार जी का मेहुल भाई और उन मेहुल भाई का भांजा है. हो सकता है कि जनता के पैसे की खुली लूट का यह मामला २०११ तक जाता हो लेकिन तथ्य तो यही बताते हैं कि ९० प्रतिशत से ज्यादा लूट २०१६ और उसके बाद हुई. हमने यह भी माना कि पहले की सरकारों के समय भी बैंकों में जमा जनता की मेहनत की कमाई को लूटा और लुटाया गया लेकिन मैं मोदी जी से पूछना चाहता हूँ कि अगर आपकी सरकार में भी चलता है चलता रहा तो फिर आपकी और पहले की सरकार में क्या अंतर रहा?  तो क्या जनता ने आपको मन की बात के जरिये कोरे प्रवचन करने के लिए ही चुना था?
मित्रों, स्वर्गीय संजय गाँधी जिनका पूरा परिवार अभी भाजपा में शरणार्थी है कहते थे कि बातें कम काम ज्यादा। लगता है कि मोदी जी का मूल मंत्र है बातें ही बातें और काम शून्य. बिहार में इस सन्दर्भ में एक बहुत ही खूबसूरत कहावत प्रचलन में है कि बात हमसे लीजिए और काम हमारे दादाजी से. दरअसल बिहार में कुछ ऐसे महारथी भी हैं जो बातों से न सिर्फ मन भर देते हैं बल्कि पेट भी भर देते हैं और होशियार-से-होशियार लोग भी उनके झांसे में आ जाते हैं.
मित्रों, अब जब अगला लोकसभा चुनाव दरवाजे से कुछेक फर्लांग ही दूर रह गया है तब मुझे एक किस्सा याद आ रहा है. किसी गांव में एक डॉक्टर था जो था तो डिग्री के अनुसार सर्जन लेकिन अल्पज्ञ और बातूनी था. शुरुआत में जो भी उसके संपर्क में आता उससे बिना ईलाज कराए रह नहीं पाता. कभी वो किसी का पेट खोल देता तो कभी किसी का फेफड़ा तो किसी का ब्रेन लेकिन आतंरिक अंगों की जटिलता को समझ नहीं पाता और मरीज मरघट पहुँच जाता. धीरे-२ लोग उसकी परछाई से भी डरने लगे और डॉक्टर शहर छोड़कर चला गया.
मित्रों, आज मोदी सरकार हर मोर्चे पर असफल है लेकिन यह उसकी असफलता नहीं है बल्कि भारत की असफलता है. समझ में नहीं आता कि अगले चुनाव में हम किसे वोट डालेंगे? आपकी समझ में कुछ आ रहा है क्या? यह सरकार या आनेवाले चुनाव में उपस्थित विकल्प? कुछ भी?

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

मोदी सरकार की टच एंड रन की नीति

मित्रों, हमारे बिहार में एक कहावत है कि मंत्र तो बिच्छू का भी नहीं पता और चले हैं सांप के बिल में हाथ डालने. पता नहीं आपके यहाँ इसके बदले कौन-सी कहावत प्रचलन में है. इसी तरह एक और कहावत भी बिहार में चलती है कि झोली में दाम नहीं और सराय में डेरा अर्थात अपने बारे में ओवरस्टीमेट होना.
मित्रों, दुर्भाग्यवश ये दोनों कहावतें इन दिनों केंद्र में सत्ता संभाल रही मोदी सरकार पर लागू हो रही है. चाहे वो नोटबंदी हो या जीएसटी, गंगा-सफाई हो या मेक इन इंडिया, हरित क्रांति हो या स्वास्थ्य क्रांति हो या पुलिस और न्यायपालिका में सुधार हो या सबके लिए आवास उपलब्ध करवाना या भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई हो या कालाधन या रोजगार-सृजन या कश्मीर हर मामले में मोदी सरकार पूरी तरह से असफल है या फिर आंशिक रूप से सफल है. उसने हर मामले को छेड़ जरूर दिया है लेकिन सच्चाई यह भी है कि किसी भी मामले को अंत तक नहीं ले जा पाई है और अधूरा छोड़ दिया है या छोड़ना पड़ा है.
मित्रों, पता नहीं सरकार के दिमाग में कैसा केमिकल लोचा चल रहा है? बेवजह सुरेश प्रभु का मंत्रालय बदल दिया, स्मृति ईरानी को लगातार महत्वपूर्ण मंत्रालय दिया जा रहा है, राफेल पर पर्दादारी की जा रही है, रोजगार की नई परिभाषा ही गढ़ दी गई है. कदाचित मोदी जी अपने बारे में ओवरस्टीमेटेड थे और हैं या फिर देश की जनता ने ही उनकी क्षमताओं के बारे में जरुरत से ज्यादा अनुमान लगा लिया. आज भी मोदी जी के पास सिवाय जन-धन खातों और उज्ज्वला के कुछ भी नहीं है और अगर कुछ है भी तो अभी परिणति से कोसों दूर है. सबसे हद तो कश्मीर में की जा रही है. भाजपा और महबूबा दोनों निहायत विपरीत ध्रुवों की राजनीति करते हैं और और अभी भी कर रहे हैं जिससे वहां विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई है.
मित्रों, गांवों में एक और कहावत है कि नीम हकीम खतरे जान. अब अपने देश की अर्थव्यवस्था को ही लीजिए जो आगे जाने के बदले पीछे जा रही है. जैसे कोई झोला छाप डॉक्टर किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त मरीज का ईलाज करता है और बार-बार दवा बदलकर प्रयोग करता है वैसे ही जेटली जी भी अंदाजन दवा-पर-दवा बदलते जा रहे हैं. मरीज ठीक हो गया तो श्रेय लूट लेंगे और ठीक नहीं हुआ तो वैश्विक स्थिति पर सारा ठीकरा फोड़ देंगे.
मित्रों, जो गलती बिहार में नीतीश ने नौकरशाही के बल पर शासन सुधारने की कोशिश करके की वही गलती इन दिनों मोदी सरकार कर रही है. सरकार तो वाजपेयी जी ने भी चलाई थी और हर मंत्रालय में उसके विशेषज्ञों को बैठाया था तो क्या वाजपेयी पागल थे? बल्कि मेरा तो यहाँ तक मानना है कि अगर जरूरी हो तो विपक्षी खेमे में शामिल योग्य लोगों से भी सलाह लेनी चाहिए. मुझे एक दृष्टान्त याद आ रहा है. १८६१ में लिंकन जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने दास प्रथा को समाप्त कर दिया. दक्षिणी राज्यों ने विद्रोह कर दिया और भयंकर युद्ध छिड़ गया. उस समय पूरे अमेरिका में सबसे बड़े सैन्य जनरल थे ग्रांट लेकिन समस्या यह थी कि वे लिंकन के विरोधी थे. इसके बावजूद लिंकन ने उनको ही सेनाध्यक्ष बनाया. जब लिंकन के दोस्तों ने इस पर आपत्ति की तो उनका जवाब था कि भले ही वो मेरा विरोधी है लेकिन पूरे अमेरिका में उससे ज्यादा योग्य सेनानायक नहीं है इसलिए मैंने अहम पर देशहित को अहमियत दी. चूंकि लिंकन यह मानते थे कि वे सर्वज्ञ नहीं थे इसलिए उनका नाम विश्व इतिहास में गर्व से लिया जाता है.
मित्रों, आज भारत को भी लिंकन सरीखे व्यक्तित्व की आवश्यकता है लेकिन क्या मोदी जी उनके समकक्ष भी हैं? यह अद्बभुत संयोग है कि लिंकन 16वें राष्ट्रपति थे तो मोदी 16वें प्रधानमंत्री हैं। तो मुझे यह भी लगता है कि मोदी जी ने मार्गदर्शक मंडल की स्थापना करके ठीक नहीं किया. बल्कि देशहित में यही ठीक रहता कि आडवाणी जी और जोशी जी को भी मंत्रिमंडल में लिया जाता. वे कम-से-कम गिरिराज और स्मृति ईरानी से तो बेहतर ही सिद्ध होते. क्योंकि मुझे लगता है कि मोदी जी के इर्द-गिर्द जो लोग हैं और जिनकी सलाह पर वे चलते हैं वे सही नहीं हैं और मुझे यह भी लगता है कि मोदी जी को पता नहीं है कि टीम वर्क करते समय खुद १६-१८ घंटे काम करने से ज्यादा जरूरी होता है दूसरों से काम करवाना.

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

बढ़ते भारत का प्रतीक पकौड़ा साहित्य

मित्रों, मैं वर्तमान पकौड़ा-विमर्श को देखते हुए झूठ नहीं बोलूंगा कि मैं पकौड़ों से प्रेम नहीं करता हूँ लेकिन सच यह भी है कि जबसे मेरे शरीर के भीतर डाईबीटिज का बसेरा हुआ है प्रेम में कमी आ गई है. अगर पकौड़ा जरूरी है तो उससे ज्यादा जीना जरूरी है. धीरे-धीरे हालात इतने ख़राब हो गए हैं कि मैं पकौड़ों की तरफ देखना तो दूर, जुबाँ पर उसका नाम लेना तो दूर, उसका नाम भी नहीं सुनना चाहता.
मित्रों, मगर मुझे क्या पता था कि देश में कई दशकों से चल रहे दलित-विमर्श के स्थान पर पकौड़ा-विमर्श आरम्भ हो जाएगा और मुझे भी मजबूरन पकौड़ावादी बनना पड़ेगा. जो साहित्य किसी वाद का हिस्सा न हो अर्थात निर्विवाद हो वो कम-से-कम हिंदी वांग्मय में तो साहित्य कहला ही नहीं सकता. पहले राष्ट्रवाद आया, फिर छायावाद, फिर प्रगतिवाद, फिर नव प्रयोगवाद, फिर नई कहानी नई कविता, फिर उत्तरवाद और नव उत्तरवाद, फिर समकालीन साहित्य, फिर दलित साहित्य और अब पकौड़ावाद.
मित्रों, मैं अपने देश के प्रधानमंत्री जी का इस बात के लिए आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्होंने सबका साथ सबका विकास के अपने मूलमंत्र पर चलते हुए निहायत उपेक्षित पकौड़े को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया. साथ ही उम्मीद करता हूँ कि वे भविष्य में भिक्षा और कटोरे का जिक्र करके कटोरावादी साहित्यिक आंदोलन की शुरुआत का मार्ग भी प्रशस्त करेंगे. अगर वे ऐसा करते हैं तो हिंदी साहित्य उनका हमेशा ऋणी रहेगा.
मित्रों, लेकिन हम अपने विमर्श को फ़िलहाल पकौड़ा साहित्य तक ही सीमित रखना चाहेंगे क्योंकि मैं वर्तमान में जीता हूँ. तो मैं कह रहा था कि मैं चाहता हूँ कि भविष्य में पकौड़े पर कविता, कहानी ही नहीं वरन महाकाव्य और उपन्यास भी लिखे जाएं. बल्कि मैं तो चाहता हूँ कि पकौड़ा साहित्य साहित्यिक आंदोलन का रूप ले और देश के निमुछिए से लेकर कब्र में पाँव डाल चुके साहित्यकार तक फिर चाहे वो किसी भी लिंग, वर्ग, प्रदेश या संप्रदाय का हो दशकों तक पकौड़ा साहित्य रचे. पकौड़ों पर थीसिस लिखे जाएं और पकौड़ों पर पीएचडी हो. जब रसगुल्ले को लेकर दो राज्य सरकारों में मुकदमेबाजी हो सकती है तो फिर ऐसा क्यों नहीं हो सकता? अभी दो दिन पहले मैंने प्रधानमंत्री निवास के निकटवर्ती लोक कल्याण मार्ग मेट्रो स्टेशन पर एक विचित्र मशीन को देखा. वो मशीन न केवल इच्छित स्टेशन के टोकन ही दे रही थी बल्कि पैसे काटकर वापस भी कर रही थी. अगर इसी तरह सरकारी सेवाओं का मशीनीकरण होता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब कटोरावाद पकौड़ावाद का स्थान लेकर हिंदी साहित्य के कारवां को आगे बढ़ाएगा।
मित्रों, अंत में मैं एक भविष्यवाणी करना चाहूंगा. वो यह कि जिस तरह से आधार को ऑक्सफ़ोर्ड ने २०१७ का शब्द घोषित किया है मैं इस बात की अभी से ही मोदी जी की तरह जापानी ढोल पीटकर भविष्यवाणी कर सकता हूँ कि ऑक्सफ़ोर्ड इस चलंत साल यानि २०१८ का शब्द पकौड़ा को ही घोषित करेगा, करना पड़ेगा. अंत में मैं चाहूंगा कि आप भी दोनों मुट्ठी बंद कर जोरदार नारा लगाएं-जय पकौड़ा, जय पकौड़ावाद. इतनी जोर से कि हमारी आवाज पश्चिमी देशों तक पहुंचे और वहां भी पकौड़ावादी साहित्यिक आंदोलन शुरू हो जाए. कब तक हम साहित्यिक आंदोलनों के मामले में पश्चिम के पीछे चलेंगे? गाना तो बजाओ भाई मेरा देश बदल रहा है, पकौड़े तल रहा है. 

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

बजट:दुरुस्त आयद मगर देर से आयद

मित्रों, एक जमाना था जब हम क्रिकेट के दीवाने हुआ करते थे और भारत की हार हमारे लिए नाकाबिले बर्दाश्त हुआ करती थी. कई बार तो ऐसा भी होता कि भारतीय टीम को अंतिम ओवर में जीत के लिए ४०-५० रन बनाने होते थे लेकिन हमें तब भी पूरी उम्मीद होती थी कि जीत भारत की ही होगी. जाहिर है असंभव तो असंभव ही होता है इसलिए हार के बाद हम टूट-से जाते थे.
मित्रों, हमारी कुछ ऐसी ही मनःस्थिति इन दिनों केंद्र में काबिज नरेंद्र मोदी की सरकार को लेकर हो रही थी. सरकार के चार साल बीत चुके हैं. काम कुछ खास हो नहीं पाया है लेकिन लगता था जैसे एक साल में ही क्रांति हो जाएगी, चमत्कार हो जाएगा. जैसे दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बॉलर अंतिम ओवर में लगातार कई दर्जन नोबॉल फेंकेगा और भारत का दसवां बल्लेबाज उन हरेक नोबॉल पर सिर्फ छक्के ही जड़ेगा।
मित्रों, अब इस साल के बजट को ही लें. बेहतरीन दस्तावेज है, जबरदस्त, सुपर. लेकिन सवाल उठता है कि ऐसा बजट तो पहले साल आना चाहिए था. बजट में जो प्रावधान किए गए हैं एक साल में उनपर काम होगा कैसे? माना कि सरकार ने उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा दिया लेकिन वो किसानों को मिलेगा कैसे? माना कि सरकार ने उद्योंगों को करों में छूट दे दी लेकिन एक साल में करोड़ों रोजगार कहाँ से आ जाएंगे? इसी तरह आदिवासियों की शिक्षा के लिए, शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए भी जो कुछ किया गया है वो भी स्वागत योग्य है लेकिन इनके परिणाम आने में कई साल लग जाएंगे फिर इस काम में देरी क्यों की गई?
मित्रों, कई मामलों में यह बजट सरकार की लाचारी और नाकामी को भी दर्शाता है. जैसे सरकार ने जो न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की जो घोषणा की है उससे साबित होता है सरकार कृषि के क्षेत्र में कुछ नया नहीं कर पाई. बल्कि वही सब कर रही है जो पिछली सरकारें कर रही थीं. कहाँ है पर ड्राप मोर क्रॉप और मृदा स्वास्थ्य कार्ड? कहाँ हैं नदियों को जोड़नेवाली नहरें?
मित्रों, इसी तरह सरकार ने जो स्वास्थ्य बीमा की राशि बढ़ाने की घोषणा की है उसको भी सरकार की नाकामी का प्रतीक मानता हूँ. आखिर कोई क्यों जाए निजी अस्पतालों में? फिर इसकी क्या गारंटी है कि निजी अस्पताल उन पैसों को बेईमानी कर हजम नहीं कर जाएंगे? बिहार में तो अविवाहित लड़कियों के गर्भाशय तक उनकी बिना जानकारी के लापता कर दिए गए.
मित्रों, इसी तरह इस बजट में रक्षा क्षेत्र को ज्यादा राशि दी गयी है जो स्वागतयोग्य है लेकिन रोजाना पाकिस्तानी सीमा पर जो कैप्टेन कपिल कुंडू मारे जा रहे हैं उनकी मौतों को रोकने के लिए सरकार के पास कोई योजना है क्या? युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं हौसलों से जीते जाते हैं. क्या है इस सरकार के पास हौसला? अगर है तो फिर कश्मीर में सेना पर एफआईआर क्यों हो रहे हैं और क्यों सेना पर पत्थर फेंकनेवालों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लिए जा रहे हैं? सरकार का गठन देश की सुरक्षा के लिए हुआ था या वोटों की सुरक्षा के लिए?
मित्रों, तमाम सवालों के बावजूद इस सरकार ने आधारभूत संरचना के क्षेत्र में अद्भुत काम किया है. रेलवे की सिग्नल प्रणाली बदलने से, नई पटरियों के बिछने से आनेवाले वर्षों में उम्मीद की जानी चाहिए कि पटना से दिल्ली आने में जाड़े में भी १२ से १४ घंटे ही लगेंगे न कि दो-दो दिन. इसी तरह भारत भविष्य में अपनी बेहतरीन ६ लेन सडकों, पुलों, और फ्लाईओवरों के लिए जाना जाएगा.
मित्रों, बड़े ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि सरकार त्वरित न्याय की दिशा में कार्यकाल के चार साल बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं कर पाई है. इस बजट में भी इस बारे में शून्य बटा सन्नाटा ही है. बड़े ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि देश में अभी भी हर कदम पर भ्रष्टाचार है, अराजकता है जबकि १८ राज्यों में भाजपा की सरकार है. पुराने पापी मजे में हैं. बड़े ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है मोदी सरकार भी जातिवादी राजनीति में आकंठ डूब गई है. ये दलित, वो पटेल तो यहाँ आरक्षण, वहां आरक्षण. पता नहीं देश समझ पाया या नहीं कि मध्यम वर्ग को आयकर में छूट नहीं दी जा सकती क्योंकि देश को पैसा चाहिए लेकिन मैं यह नहीं समझ पाया कि बजट द्वारा आखिर राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति और सांसदों के वेतन को बढ़ाने की जरुरत क्या थी? क्या ये लोग भूखों मर रहे थे? क्या इनका वेतन बढ़ाने से खजाने पर कोई बोझ नहीं पड़ेगा? प्रधानमंत्री के आग्रह पर करोड़ों लोगों ने गैस की सब्सिडी छोड़ दी लेकिन अमीर सांसद कब वेतन और सुविधा लेना बंद करेंगे?
मित्रों,  राजस्थान तो पहली झांकी है पूरा भारत बांकी है. पता नहीं सरकार कैसे एक साल में सरकार जनता का दिल जीत पाएगी? कैसे साबित कर पाएगी कि मोदी सिर्फ जुमलावीर नहीं हैं?

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

विराट कोहली और नरेंद्र मोदी

मित्रों, इन दिनों भारतीय क्रिकेट टीम द. अफ्रीका के दौरे पर है. तीन टेस्ट मैचों की श्रृंखला में भारत पहले दोनों मैच हारकर बाहर हो चुका है लेकिन भारतीय कप्तान को इसका जरा भी मलाल नहीं है और वे अपने आलोचकों के ऊपर ही भड़क रहे हैं.
मित्रों, ठीक यही हालत इस समय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की है. नाच न जाने आँगन टेढ़ा और अगर कोई नाचने पर टिपण्णी कर दे तो बंटाधार. पहले टेस्ट मैच में भुवनेश्वर कुमार ने शानदार प्रदर्शन किया तो कोहली ने उन्हें अगले मैच में बाहर ही बैठा दिया. न तो मोदी और न ही कोहली को ही पता है कि उनको करना क्या है और उनको चाहिए क्या. अपनी जिद में दोनों ने अच्छे खिलाडियों और नेताओं को बाहर बिठा रखा है मगर चाहते हैं कि टीम हर मैच को जीते. टीम मोदी में शामिल जो लोग ख़ामोशी से अपना काम रहे हैं वे हाशिए पर हैं और जो मोदी की ठकुरसुहाती छोड़ और कुछ नहीं कर रहे या नहीं कर सकते वे मजे में हैं. कोहली तो रेफरी तक से होटल के कमरे में जाकर झगड़ने लगते हैं. वैसे यह काम अभी टीम मोदी नहीं बल्कि विपक्ष कर रहा है जो बार-बार चुनाव आयोग और ईवीएम पर आरोप लगाता रहता है.
मित्रों, भारतीय क्रिकेट टीम और मोदी टीम दोनों में ही आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जो सिर्फ इस कारण से टीम में हैं क्योंकि वे मोदी और कोहली को पसंद हैं भले ही उनका प्रदर्शन कितना भी ख़राब क्यों न हो. कोहली और मोदी दोनों ही कदाचित चाहते हैं कि सिर्फ उनको ही वाहवाही मिले और कोई उनसे अच्छा खेलने या प्रदर्शन करने की हिमाकत न करे जबकि क्रिकेट मैच खेलना हो या देश को चलाना दोनों टीम वर्क होता है और इसके लिए अच्छी टीम की आवश्यकता होती है.
मित्रों, इस समय शेयर बाजार पूरे उफान पर है लेकिन मेरा हमेशा से मानना रहा है कि शेयर बाजार अर्थव्यवस्था का आईना नहीं हो सकता। ऐसा हमने तब भी कहा था जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे. एक बार फिर से कर्णाटक में भाजपा दूसरे दलों से नेताओं का आयात करने में जुट गई है जैसा कि वो हर राज्य के चुनाव से पहले करती है. मोदी जी और भाजपा को समझना पड़ेगा कि येन-केन-प्रकारेण सिर्फ चुनाव-दर-चुनाव जीत लेने से देश न तो बदल जाएगा और न ही आगे हो जाएगा. यह घनघोर निराशाजनक है कि मोदी भी वोट बैंक की गन्दी राजनीति के कीचड़ में कूद गए हैं. काम बहुत कम हो रहा है और दिखावा बहुत ज्यादा. शोर मचाकर और आक्रामकता दिखाकर मोदी कोहली की तरह यह साबित करने में लगे हैं कि सब कुछ शानदार है जबकि परिणाम बता रहे हैं कि हालात चिंताजनक है.
मित्रों, वैसे प्रदर्शन के मामले में दोनों टीमों की हालत बिलकुल उलट है. जहाँ मोदी की विदेश नीति शानदार है वहीँ टीम कोहली का विदेशों में प्रदर्शन शून्य रहा है वहीँ टीम कोहली का घरेलू मैदानों पर प्रदर्शन अच्छा है लेकिन टीम मोदी का आतंरिक क्षेत्रों में प्रदर्शन चिंताजनक है. गंगा माँ आज भी मोदी जी को बुला रही हैं किन्तु भाजपा स्वयं गंगा बन गई है डुबकी लगाई नहीं कि भ्रष्टाचारी से परम पवित्र हो गए देश तो बदला नहीं भाजपा जरूर बदल गयी. मंदी और बेरोजगारी पहले से भी ज्यादा है, सरकारी कर्मियों तक को कई-कई महीनों तक वेतन नहीं मिल रहा, बैंक ब्याज देने के बदले खाता खाली कर रहे हैं, चारों तरफ भुखमरी है लेकिन मोदी सरकार कह रही है आप खुश होईए क्योंकि आप मोदी राज में रह रहे हैं. जैसे कोहली कहते हैं कि आप खुश होईए क्योंकि आपके देश की क्रिकेट टीम का कप्तान मेरे जैसा महान खिलाडी है भले ही टीम शर्मनाक तरीके से मैच हारती रहे. 

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

बहरीन में राहुल गाँधी का बेहया भाषण

मित्रों, हमारे बुजुर्गों ने फ़रमाया है कि किसी भी संगठन का चेहरा बदल जाने से कोई जरुरी नहीं है कि उसका चाल और चरित्र भी बदल जाए. उदाहरण के लिए अलकायदा या लश्कर का कमांडर कोई भी रहे करेगा तो वही जो उनका संगठन करता आया है. कुत्ता जब भी पेशाब करेगा तो खम्भे पर ही चाहे वो विलायती ही क्यों न हो. ठीक यही बात कांग्रेस के ऊपर भी लागू होती है. जब माँ अध्यक्ष थी तब पार्टी देशविरोधी गतिविधियों में लीन थी और आज जब बेटा अध्यक्ष बन गया है तब भी पार्टी वही कर रही है.
मित्रों, क्या आपको याद है कि इससे पहले किसी विपक्षी नेता ने विदेश जाकर देश के खिलाफ कोई बयान दिया है या देश के खिलाफ कोई अभियान छेड़ा है? दरअसल कांग्रेस मोदी विरोध और भारत विरोध का अंतर पूरी तरह से भूल गई है. नहीं तो क्या कारण था कि राहुल गाँधी विदेशी धरती पर जाकर यह कहते कि इस समय भारत में संकट की स्थिति है और प्रवासी भारतीय देश की मदद कर सकते हैं. पता नहीं राहुल जी को बहरीन से कैसी मदद चाहिए. कहीं उनको वैसी मदद तो नहीं चाहिए जैसी मदद मांगने मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान गए थे?
मित्रों, राहुल जी का कहना है कि वे ऐसे भारत की कल्पना भी नहीं कर सकते, जहां देश का हर नागरिक खुद को देश का हिस्सा न समझे. राहुल जी कल्पना तो हम भी नहीं करना चाहते लेकिन यही सच है कि एक खास विचारधारा और एक खास मजहब में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो खुद को भारत का नागरिक नहीं समझते. उनको कल तक राष्ट्र गीत से परेशानी थी, आज राष्ट्र गान से है और कल भारत राष्ट्र से होगी. लेकिन सवाल उठता है कि क्या इसके लिए राष्ट्रवादी दोषी हैं? अगर कोई वानी सरकारी सुविधाओं से लाभ उठाकर अलीगढ मुस्लिम विवि में पीएचडी की पढाई करने के बावजूद हिजबुल में शामिल हो जाता है या कोई उमर खालिद वर्षों सरकारी सब्सिडी पर जेएनयू में गुलछर्रे उड़ाने के बाद भी भारत तेरे टुकड़े होंगे हजार का नारा लगाता है तो इसके लिए कौन दोषी है? राहुल जी क्या किसी के ह्रदय में जबरदस्ती देशप्रेम पैदा किया जा सकता है? क्या आपके ह्रदय में ही पैदा किया जा सकता है? कदापि नहीं. इसी तरह से किसी के ह्रदय में जबरदस्ती देश के प्रति नफरत भी नहीं भरी जा सकती बल्कि प्रेम हो या नफरत ये तो उधो मन माने की बात होती है. अब कोई अगर अपने को देश का हिस्सा नहीं समझता है तो हमारी पहली कोशिश होती है समझाने की, सुविधा देकर मुख्य धारा में लाने की और अगर फिर भी वो नहीं मानता तो न माने अपनी बला से. और अगर फिर वो एक कदम आगे बढ़कर किसी देशविरोधी गतिविधि में संलिप्त पाया जाता है तो फिर हम देश की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकते हैं. 
मित्रों, राहुल जी फरमाते हैं कि भारत में रोजगार सृजन पिछले आठ सालों के निम्नतम स्तर पर है. सही है लेकिन इस साल ऐसी स्थिति नहीं रहेगी और रोजगार के इतने अवसर पैदा होंगे जितने पहले कभी किसी खास वर्ष में पैदा नहीं हुए. दरअसल राहुल जी अधूरा सच बोल रहे हैं. उनको सिर्फ खाली गिलास दिख रहा है या फिर वे जानबूझकर सिर्फ खाली गिलास को ही देखना और दिखाना चाहते हैं.
मित्रों, सच्चाई तो यह है कि आज तक भारत में जितना भी विदेशी पूँजी निवेश हुआ है उसका आधा सिर्फ पिछले ३ सालों में हुआ है. जाहिर है कि पैसा आ रहा है तो रोजगार भी आएगा ही. यह जानते हुए कि फैक्ट्रियों को स्थापित करने में समय लगता है राहुल गाँधी धूर्तता का प्रदर्शन करते हुए सरकार को बिलकुल भी समय नहीं देना चाहते.
मित्रों, राहुल जी को यह तो दिख रहा है कि देश में बैंक क्रेडिट ग्रोथ पिछले 63 सालों के निम्नतम स्तर पर है लेकिन यह नहीं दिख रहा कि इस समय नई रेल लाईनों के निर्माण, रेल लाईनों के दोहरीकरण, राष्ट्रीय उच्च पथ के निर्माण, शिपिंग क्षमता वृद्धि, नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन की गति पिछली सरकार के मुकाबले दोगुनी है. वे इतनी हारों के बाद भी जिद पर अड़े हैं कि नोटबंदी से देश की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा है. झटका तो लगा जरुर है लेकिन कालेधन की अर्थव्यस्था को लगा है न कि देश की अर्थव्यवस्था को.
मित्रों, राहुल जी फरमाते हैं कि सड़कों पर लोग गुस्से में दिखाई दे रहे हैं. विभाजनकारी ताकतें तय कर रही हैं कि लोगों को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं. चारों ओर नफरत फैलाई जा रही है. कैसी नफरत भाई? जातीय विभाजन तो कांग्रेस ही कर रही है. गोहत्या पर तो रोक लगाने की बात स्वयं गाँधी जी करते थे और यही कारण था कि संविधान के अनुच्छेद ४८ में इसकी व्यवस्था भी की गई है. तो क्या राहुल अब हिन्दू नहीं रहे? गाँधी तो वो कभी नहीं थे. उनका जनेऊ कहाँ गया? कहीं उन्होंने उसका पाजामे का नाडा तो नहीं बना लिया? आखिर कोई भी सच्चा हिन्दू और उसमें भी ब्राह्मण गोहत्या का समर्थन कैसे कर सकता है?
मित्रों, राहुल जी का कहना है कि दलितों को पीटा जा रहा है, पत्रकारों को धमकाया जा रहा है और जजों की रहस्यमयी हालतों में मौत हो रही है. इक्का-दुक्का घटनाओं को चलन कैसे माना जा सकता है? लड़ाई-झगडे में कभी एक पक्ष भारी पड़ता है तो कभी दूसरा. कौन-सा जज मर गया पता नहीं. क्या पहले जज नहीं मरते थे,अमर होते थे? पत्रकार अगर कानून तोड़ेंगे तो फिर कानून उनको तोड़ेगा क्योंकि वे कानून से ऊपर तो होते नहीं हैं.
मित्रों, जब भी कोई किसी को धमकाता है कानून अपना काम करता है. कई बार तो प्रधानमंत्री ने बडबोले नेताओं को चुप रहने की हिदायत दी है. क्या राहुल बताएँगे कि जब इमरान मसूद ने पीएम को बोटी-बोटी करके काटने की धमकी दी थी तब उन्होंने उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की और उसको कांग्रेस का टिकट क्यों दे दिया?
मित्रों, क्या इमरान मसूद जैसे बयानों से देश में फिर से भाईचारा आएगा और अहिंसा फैलेगी? अगर राहुल ऐसा समझते हैं तो हमें उनकी समझ पर तरस आता है. क्या गुजरात में पटेल हिंसा और महाराष्ट्र में दलित हिंसा को बढ़ावा देकर राहुल जी ने देश में सहिष्णुता को बढ़ावा दिया है?
मित्रों, मेरा मानना है कि राहुल जी को अगर अपने देश की सरकार से कोई शिकायत थी तो उनको संसद में सरकार को घेरना चाहिए था न कि विदेश में जाकर अपने ही देश के खिलाफ माहौल बनाना चाहिए था. लेकिन उनकी पार्टी संसद को तो चलने ही नहीं देती फिर चर्चा कैसे होगी. घर के झगडे को घर में ही निपटाया जाता है दूसरा देश इसमें क्या कर लेगा सिवाय दो के झगडे से लाभ उठाने के? बड़े ही दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि कांग्रेस बेवफा तो पहले से ही थी लेकिन अब लगता है कि वो बेहया भी हो गई है और अपने-पराए का अंतर भूल गई है.