मंगलवार, 25 जून 2019

मोदी, राष्ट्रवाद और दम तोड़ते बच्चे


मित्रों, आपको याद होगा कि मोदी जी ने २०१४ के लोकसभा चुनावों के भाषण में कहा था कि उनके समय में चलता है नहीं चलेगा और वे हर क्षेत्र में ऐसे इंतजाम करेंगे जिससे वही हो जो होना चाहिए. परन्तु हम देखते हैं कि मोदी जी के शासन के दूसरे कार्यकाल में भी वही सब हो रहा है जो मनमोहन सिंह के समय में हो रहा था. शासकों का वही ऐश-मौज और जनता के दुखों के प्रति वही अक्षम्य संवेदनहीनता.
मित्रों, बचपन में मैंने केनोपनिषद में एक बोध कथा पढ़ी थी कि एक बार लम्बे युद्ध के बाद देवताओं ने दानवों पर विजय प्राप्त की.  उस विजय से देवताओं को अहंकार हो गया । वे समझने लगे कि यह उनकी ही विजय है। उनकी ही महिमा है और वे अपने कर्तव्यों को भूलकर मौज-मस्ती में डूब गए. यह देखकर वह (ब्रह्म) उनके सामने प्रादुर्भूत हुआ और वे (देवता) उसको न जान सके कि ‘यह यक्ष कौन है’
तब उन्होंने (देवों ने) अग्नि से कहा कि, ‘हे जातवेद ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । अग्नि ने कहा – ‘बहुत अच्छा’. अग्नि यक्ष के समीप गया । उसने अग्नि से पूछा – ‘तू कौन है’ ? अग्नि ने कहा – ‘मैं अग्नि हूँ, मैं ही जातवेदा हूँ’. ‘ऐसे तुझ अग्नि में क्या सामर्थ्य है ?’ अग्नि ने कहा – ‘इस पृथ्वी में जो कुछ भी है उसे जलाकर भस्म कर सकता हूँ’. तब यक्ष ने एक तिनका रखकर कहा कि ‘इसे जला’ । अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को जलाने में समर्थ न होकर वह लौट गया । वह उस यक्ष को जानने में समर्थ न हो सका.  तब उन्होंने ( देवताओं ने) वायु से कहा – ‘हे वायु ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । वायु ने कहा – ‘बहुत अच्छा’. वायु यक्ष के समीप गया । उसने वायु से पूछा – ‘तू कौन है’ । वायु ने कहा – ‘मैं वायु हूँ, मैं ही मातरिश्वा हूँ’. ‘ऐसे तुझ वायु में क्या सामर्थ्य है’ ? वायु ने कहा – ‘इस पृथ्वी में जो कुछ भी है उसे उड़ा सकता हूँ’.
तब यक्ष ने एक तिनका रखकर कहा कि ‘इसे उड़ा’। अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को उड़ाने में समर्थ न होकर वह लौट गया। इस प्रकार वह उस यक्ष को जानने में समर्थ न हो सका. 
तब उन्होंने (देवताओं ने) इन्द्र से कहा – ‘हे मघवन् ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । इन्द्र ने कहा – ‘बहुत अच्छा’ । वह यक्ष के समीप गया । उसके सामने यक्ष अन्तर्धान हो गया.
वह इन्द्र उसी आकाश में अतिशय शोभायुक्त स्त्री, हेमवती उमा के पास आ पहुँचा, और उनसे पूछा कि ‘यह यक्ष कौन था’. उसने स्पष्ट कहा – ‘ब्रह्म है’ । ‘उस ब्रह्म की ही विजय में तुम इस प्रकार महिमान्वित हुए हो’ । तब से ही इन्द्र ने यह जाना कि ‘यह ब्रह्म ही है जो सारी शक्तियों का मूल है.'
मित्रों, मुझे लगता है कि कुछ ऐसी ही स्थिति इन दिनों मोदी सरकार की है. मोदी और उनके साथी यह भूल गए हैं कि लोकतंत्र में जनता ही ब्रह्म है और जनता ने उनकी जीत में अपनी जीत को देखा तभी उनको यह प्रचंड जीत मिली है. एक तरह बिहार में बच्चे मर रहे हैं और दूसरी तरफ मोदी पांच सितारा होटल में पार्टी कर रहे हैं. क्या इससे भी बड़ी कोई संवेदनहीनता हो सकती है? क्या सभी चौक-चौराहों और रेलवे स्टेशनों पर १००-१०० फीट ऊंचा तिरंगा फहरा देने मात्र से देश की सारी समस्याएँ दूर हो जाएंगी. मैंने बचपन में देखा है कि जब श्रीमती इन्दिरा गाँधी का शासन था तब सरकारी स्कूल में पढाई का स्तर गजब का था. इसी तरह सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था भी बहुत अच्छी थी. आज सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत क्या है और क्यों है  और इसमें सुधार लाना किसकी जिम्मेदारी है? क्या सबकुछ निजी क्षेत्र के हाथों सौंप देने से देश की जनता का भला हो जाएगा? मैंने खुद भी अनुभव किया है कि निजी क्षेत्र को सिर्फ लाभ से मतलब होता है नैतिकता के लिए उसके पास कोई जगह नहीं होती. कार्ल मार्क्स ने जो कहा था कि पूँजी हृदयहीन होती है कोई गलत नहीं कहा था. ऐसी स्थिति में मोदी कैसे देश को पूँजी यानि निजी क्षेत्र के कदमों में डालकर कह सकते हैं कि अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों.
मित्रों, सबसे दुखद स्थिति तो यह है कि जिस बिहार ने मोदी के एक आह्वान पर ४० में से ३९ सीटें उनके झोले में डाल दिया उसी बिहार के बच्चे समुचित व्यवस्था के बिना दम तोड़ते रहे और मोदी जी के मुंह से सहानुभूति के एक शब्द तक न फूटे. मोदी जी होंगे आप दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति लेकिन शक्तिशाली तो बगदादी भी है और लादेन भी था. हमने तो आपको राम समझ के वोट किया था. वही राम जिसके लिए प्रजा का सुख ही अपना सुख था और प्रजा का हित ही अपना हित था. जिसका सबकुछ प्रजा का था जिसका सबकुछ प्रजा थी. आप खुद ही निर्णय लीजिए मोदी जी कि आपको क्या बनना है राम या बगदादी. भूलिएगा नहीं कि देव जनता आपके पतंग को एक चुनाव में आसमान दिखा सकती है तो दूसरे चुनाव में जमीन भी सूंघा सकती है.

मंगलवार, 18 जून 2019

साहेब, मौसम और गुलाम


मित्रों, आप सोंच रहे होंगे कि क्या उटपटांग शीर्षक लगाया है मैंने. साहेब हैं तो बीवी भी होनी चाहिए. लेकिन इसमें मेरा कोई दोष नहीं. साहेब की बीवी है मगर नहीं है तो इसमें मैं क्या कर सकता हूँ? साहेब, बीवी और गुलाम में बीवी साहेब के घर में रहती थी लेकिन यहाँ बीवी उनके साथ नहीं रहती. दोनों में दशकों से भेंट तक नहीं हुई. साहेब बीवी के बदले मौसम से काम चला रहे हैं.
मित्रों, ७०-८० के दशक में ही जब हम विज्ञान प्रगति पढ़कर विज्ञान की प्रगति करवा रहे थे तब पढने को मिलता था कि भविष्य बड़ा भयावह होनेवाला है. जलवायु परिवर्तन के कारण उन स्थानों पर सूखा पड़ेगा जहाँ बाढ़ आती है और उन स्थानों पर बाढ़ आएगी जहाँ मौसम सूखा रहता है. नदियों के ग्लेशियर सूख जाएँगे और गंगा-यमुना समेत सारी नदियाँ खुद पानी के लिए तरसेंगी. जब जल पुरुष राजेंद्र सिंह राजस्थान में हरियाली ला रहे थे तब देश के नेता वोटों की फसल काट रहे थे. अब जबकि भविष्यवाणी किसी तोतेवाले पंडित के बदले वैज्ञानिकों ने की थी तो मौसम ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है. पूरा बिहार जो एक समय अप्रैल के महीने से ही बरसात से सराबोर रहता था इन दिनों भयंकर लू की चपेट में है और दर्जनों लोग रोजाना सिर्फ लू से मर रहे हैं. हैण्ड पम्प सूख गए हैं. तालाबों और कुँओं को तो हमने वर्षों पहले ही सुखा दिया. हैण्ड पम्प और नलकूप के आगे उनकी क्या बिसात मगर सरकार यह भूल गयी कि हैण्ड पम्प जमीन से सिर्फ पानी निकालना जानते हैं रिचार्ज नहीं कर सकते.
मित्रों, अब जबकि लगभग पूरे देश में त्राहिमाम की स्थिति है तब साहेब ने एक वक्तव्य जारी करके पूरे भारत के ग्राम प्रधानों को निर्देश दिया है कि बरसात के पानी को जमा करने का इंतजाम किया जाए. इधर साहेब ने वक्तव्य दिया और उधर पानी जमा हो गया. उन सारे तालाबों का क्षण भर में पुनरूद्धार हो गया जिनमें जलकुम्भी ने अड्डा जमा लिया है और उन सारे तालाबों का अतिक्रमण भी समाप्त हो गया जिनमें मिटटी भर-भर के सरकारी दफ्तर और घर बना दिए गए हैं. साहेब इसी तरह से काम करते हैं और कहते भी हैं कि मोदी है तो मुमकिन है. पता नहीं यहाँ मुमकिन से उनका तात्पर्य है क्या आबादी या बर्बादी?
मित्रों, आबादी से याद आया कि भारत के लिए आबादी भी बहुत सारी बरबादियों का कारण है. ऐसा नहीं है साहेब को यह पता नहीं है लेकिन साहेब इस तरफ से आँखें पूरी तरह से बंद किए हुए हैं और उनलोगों को अपनी तरफ करने में लगे हुए हैं जो आबादी बढाने में सबसे ज्यादा योगदान कर रहे हैं. लगता है कि साहेब को मौसम की नहीं सिर्फ चुनावी मौसम की चिंता है.
मित्रों, हमारा क्या है हम तो ठहरे गुलाम और हमारा काम तो सिर्फ सिर हिलाना है और वो भी हाँ के स्वर में. नहीं में हिलाना भी चाहें तो नहीं हिला सकते क्योंकि साहेब को सम्मोहिनी विद्या आती है. तथापि मुझे पर्यावरणविदों की भविष्यवाणियों से चिंता हो रही है जो कहते हैं कि भविष्य में गरीब लोग जलवायु-परिवर्तन से उत्पन्न अकाल की स्थिति में अनाज और पानी नहीं खरीद पाएँगे और मर जाएँगे. इसी तरह अभी बिहार में जिनके पास कूलर और एसी है उनका लू क्या बिगड़ ले रही है लेकिन जो गरीब हैं वे मर रहे हैं और लू और मस्तिष्क ज्वर से केवल वही मर रहे हैं. ऐसे में अगर गुलामों को अपनी जान बचानी है तो जल-संरक्षण को जनांदोलन का रूप देना होगा और इसके लिए एक नहीं लाखों राजेंद्र सिंह की जरुरत होगी. क्योंकि पानी नहीं होगा तो पीयोगे क्या और खेती कैसे करोगे और खेती नहीं होगी तो खाओगे क्या? साहेब का क्या है अभी ग्राम-प्रधानों से आह्वान किया है और मानसून के आते ही भूल जाएंगे. फिर तो वे विमान और हेलीकाप्टर से बाढ़ग्रस्त ईलाकों का हवाई-सर्वेक्षण करेंगे. हर साल यही तो होता है.

रविवार, 16 जून 2019

बर्बाद बिहार है नीतीशे कुमार हैं-२


मित्रों, यकीन मानिए मैं कभी भी नहीं चाहता कि बिहार की कुव्यवस्था पर कुछ लिखूं. जब भी मैंने ऐसा किया है बड़े ही भारी मन से किया है और आज मैं जिन हालातों में लिखने बैठा हूँ मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरा दिल जार-जार रो रहा है. और सिर्फ मेरा दिल ही नहीं रो रहा बल्कि मेरे साथ पूरा भारत रो रहा है.
मित्रों, आप समझ गए होंगे कि मैं बात कर रहा हूँ बिहार में रोजाना समुचित चिकित्सा के अभाव में दम तोड़ रहे छोटे-मासूम बच्चों की. पिछले कई सालों से इस मौसम में बिहार के मुजफ्फरपुर और उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक अनजान बीमारी से सैकड़ों की संख्या में छोटे-छोटे बच्चों की अकाल मृत्यु होती रही है. पिछले साल तक गोरखपुर में भी इस बीमारी का प्रकोप देखा गया लेकिन इस साल जागरूकता और सघन टीकाकरण अभियान के कारण उत्तर प्रदेश की स्थिति बेहतर है जबकि बिहार की हालत आपलोगों के सामने है. मैं कई बार कह चुका हूँ कि बिहार में अंधों और बहरों का शासन है जो गजब के बडबोले हैं.
मित्रों, मुझे ऐसा भी लगता है कि मंगल पांडे जी जो बिहार के स्वास्थ्य मंत्री हैं पिछले हफ़्तों में पार्टी का काम कन्धों पर होने के चलते विभाग के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं. इन दिनों वे झारखण्ड के पार्टी प्रभारी थे और स्वाभाविक है कि लोकसभा चुनावों के चलते उनके ऊपर झारखण्ड में ज्यादा-से-ज्यादा सीते जीतने का दबाव रहा होगा. लेकिन चुनाव संपन्न हुए भी अब एक महीना बीतने पर है और उनको चुनावी मोड से अब तक बाहर आ जाना चाहिए था और अपने विभाग के काम-काज पर भी ध्यान देना चाहिए था. सरकार चाहती तो जैसे ही इस रहस्यमय बीमारी का प्रकोप शुरू हुआ एम्स के टॉप चिकित्सकों को बच्चों के ईलाज में लगा देती. अगर सरकार उन माँ-बाप के बच्चों की जीवन-रक्षा के प्रति थोड़ी-सी भी गंभीर होती तो बच्चों को एयर एम्बुलेंस से दिल्ली और अन्य महानगरों में स्थित बड़े अस्पतालों में स्थानांतरित कर देती. अगर मंगल पांडे जी थोड़े-से भी संवेदनशील होते तो उनके काफिले को बच्चे का एम्बुलेंस रोककर पास न कराया गया होता.
मित्रों, मैं नहीं बता सकता कि उन माता-पिताओं पर इस समय क्या गुजर रही होगी जिन्होंने अपने नौनिहाल खोए हैं. भगवान न करें कि किसी के साथ भी ऐसा हो. मैं सरकार से सवाल पूछना चाहता हूँ कि अगर मंत्रियों के बच्चों को यही बीमारी हुई होती तब भी क्या सरकार का व्यवहार वही होता जो अभी है? क्या सरकार इसी प्रकार से उदासीन होती?
मित्रों, मुझे याद है कि जब यूपीए सरकार में इस्पात मंत्री रहते हुए रामविलास पासवान जी पटना में बीमार हो गए थे तब दो-दो एयर एम्बुलेंस उनको लेने पहुंचे थे. तो क्या राजा की जान बहुत कीमती होती है और प्रजा की जान की कीमत जानवरों की जान से भी कम कीमत की होती है? साथ ही मैं नरेन्द्र मोदी जी से सवाल पूछना चाहता हूँ कि बिहार की जनता ने आपको ४० की ४० सीटों पर सीधा उम्मीदवार मानते हुए ३९ सीटें दे दीं क्या यही दिन देखने के लिए? अगर यही मौतें गुजरात में होती तो भी क्या आप चुप्पी साधे रहते और ११वें दिन केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को भेजते?
मित्रों, अब मैं रवीश कुमार जी पर व्यंग्य नहीं करूंगा. बहुत व्यंग्य कर लिया उन पर अब तो परिस्थितियां हम पर व्यंग्य कर रही हैं, अट्टहास कर रही हैं कि देख तू जिनका समर्थक है वे राजनेता क्या कर रहे हैं? वे हमसे जैसे पूछ रही है कि बता क्या इस तरह की अक्षम्य संवेदनहीनता को ही राष्ट्रवाद कहते हैं. अंत में मैं नीतीश कुमार जी को कुछ नहीं कहना चाहूँगा क्योंकि उनको न तो बिहार से और न ही बिहार की जनता से कोई मतलब रह गया है उनको तो बस धारा ३७० और ३ तलाक से मतलब है लेकिन मैं मंगल पांडे जी से जरूर यह कहना चाहूँगा कि कम-से-कम आपने इस बात का तो ख्याल रखा होता कि आपके नाम का एक महापुरुष भारत के इतिहास में पहले भी हुआ है. मंगल भैया कम-से-कम अपने नाम की तो ईज्जत कर लिए होते.

बुधवार, 12 जून 2019

बर्बाद बिहार है नीतिशे कुमार हैं-१


मित्रों, साल २०१५ के बिहार विधान-सभा चुनाव का प्रचार चल रहा था. नीतीश जी लालू जी की गोद में बैठे थे और एनडीटीवी के रवीश कुमार जी पूरे बिहार में घूम-घूम कर जनता से पूछ रहे थे और उसके आधार पर दावा कर रहे थे कि बिहार में बारहमासी बहार है जो नीतीश कुमार के कारण है.
मित्रों, वक़्त बदला, हालात बदले यहाँ तक कि नीतीश जी ने पार्टनर भी बदल लिया मतलब सबकुछ बदला बस नहीं बदला तो बिहार की फूटी तक़दीर. इस आलेख में जो इस शृंखला की पहली कड़ी है हम सिर्फ नीतीश जी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का विश्लेषण करेंगे.
मित्रों, आपको भी पता होगा कि अपने नीतीश जी घनघोर ईमानदार हैं इतने कि हम उनको इस मामले में चरम आदरणीय अरविन्द केजरीवाल जी का गुरु भी कह सकते हैं. नीतीश ने मुख्यमंत्री बनते ही निगरानी विभाग का पुनर्गठन किया और आदेश दिया कि ताबड़तोड़ छापे मारो. फिर तो जैसे रिश्वतखोरों की शामत ही आ गयी. सबसे ज्यादा चपेट में आए पुलिसवाले, भू राजस्व और शिक्षा विभाग वाले क्योंकि हमेशा से इनमें ही ज्यादा भ्रष्टाचार है. पहले लोगों में को सिर्फ निलंबित करके छोड़ दिया जाता था लेकिन देखा गया कि वही आदमी दोबारा और कई बार तो तिबारा घूस लेते हुए पकड़ा गया. इसी बीच बक्सर के किसी जिलाधिकारी ने रिश्वतखोरों को सीधे बर्खास्त करने की परंपरा को जन्म दिया और इसके बाद जो भी घूस लेता हुआ पकड़ा गया उसे सीधे बर्खास्त कर दिया जाने लगा.
मित्रों, इसी बीच वर्ष २००६-०७ में मेरे चचेरे मामा राजेश्वर प्रसाद सिंह जो उस समय वैशाली जिले के जन्दाहा प्रखंड के नाडी गाँव के मध्य विद्यालय के प्रधानाध्यापक थे भी रिश्वत लेते रंगे हाथों पकडे गए. मुझे लगा अब राम राज्य आकर रहेगा क्योंकि मैं जानता था कि मेरे मामा दशकों से बहुत बड़े रिश्वतखोर थे. मामा पहले निलंबित और बाद में बर्खास्त भी किये गए. लेकिन इस बार जब मैं ननिहाल गया तो पाया कि मामा जी काफी खुश हैं. पता लगा कि वे पटना उच्च न्यायालय से मुकदमा जीत गए हैं और उनका पेंशन तो बहाल हो ही गया है साथ ही सेवानिवृत्ति लाभ की राशि भी सूद सहित मिली है वो भी ८० लाख. मैं सुनकर स्तब्ध था. जो व्यक्ति रंगे हाथों घूस लेता हुआ पकड़ा गया हो वो बरी कैसे हो सकता है. तो क्या नीतीश जी की सरकार में जितने भी लोग रंगे हाथों घूस लेते हुए पकडे गए हैं वे सब बारी-बारी से चुपके-चुपके कोर्ट से बरी होते जा रहे हैं? प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या? मेरे मामा खुद ही प्रमाण हैं.
मित्रों, नीतीश जी के बारे में कभी लालू जी ने कहा था कि इसके पेट में भी दांत है. मुझे लगता है कि पेट के अतिरिक्त नीतीश जी के हाथी की तरह दो और भी दांत हैं जो सिर्फ दिखाने के काम आते हैं. अब मैं मुखतिब होना चाहूँगा रवीश जी की तरफ और उनको बताना चाहूँगा कि बिहार में सचमुच बहार है. जैसा कि आपने देखा कि बिहार में भ्रष्टाचारियों की बहार है. आगे और भी प्रकार के बहारों की हम आपको सैर करवाएंगे. आओ हुजुर तुमको बहारों में ले चलूँ दिल झूम जाए ऐसे नजारों में ले चलूँ....

रविवार, 9 जून 2019

खतरे में उच्च शिक्षा का भविष्य


मित्रों, सर्वप्रथम मैं भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को दोबारा भारत का प्रधानमंत्री चुने जाने पर बधाई देता हूँ. मैं उनका बहुत पुराना भक्त हूँ और इसलिए उनके प्रधानमंत्री रहते हुए जब देखता हूँ कि कई सारे क्षेत्रों में स्थिति चिंतनीय और दयनीय है तो मन गहरी व्यथा से भर जाता है. उदाहरण के लिए अभी-अभी एनएसएसओ की रिपोर्ट आई है कि देश में नौकरीपेशा लोगों की स्थिति दैनिक मजदूरों से भी ज्यादा खस्ता है. जहाँ दैनिक मजदूर रोजाना १००० रूपये कमा रहे हैं और फिर भी आसानी से उपलब्ध नहीं होते वहीँ शिक्षित बेरोजगारों की स्थिति पिछले पांच सालों में काफी ख़राब हो गयी है. आज पीएचडी धारक युवाओं को भी १०००० मासिक की नौकरी आसानी से नहीं मिल रही. और ऐसा आरोप सिर्फ विपक्ष लगा रहा होता तो गनीमत थी खुद एनएसएसओ जैसी प्रतिष्ठित सरकारी सर्वेक्षण एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में ऐसा कहा है.
मित्रों, सवाल उठता है कि इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है? सरकार अगर अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगी तो कौन समझेगा? अब उच्च शिक्षा से सम्बंधित सरकारी आदेश को ही लें. पिछले साल मानव संसाधन मंत्रालय भारत सरकार ने राजपत्र जारी कर घोषणा की कि अब से कॉलेज प्राध्यापकों की नियुक्ति में यूजीसी नेट को मात्र ५ अंक का वजन मिलेगा जबकि पीएचडी को ३० अंक का वजन मिलेगा. सवाल उठता है कि फिर नेट का मतलब ही क्या रह गया? सरकार क्या समझती है कि नेट करना आसान है या पीएचडी करना? भारत में हर साल इतने सारे लोग शोध करते हैं फिर किसी को नोबेल क्यों नहीं मिलता? क्या भारत में शोध का मतलब कॉपी, कट, पेस्ट नहीं है? क्या भारत की डीम्ड यूनिवर्सिटीज पैसे लेकर पीएचडी की डिग्री नहीं बेच रही? क्या सरकारी यूनिवर्सिटीज में पीएचडी करने के लिए विभिन्न तरह की घूसखोरी नहीं चल रही जिसमें यौन-शोषण भी शामिल है?
मित्रों, मुझे याद आता है कि लालू जी के समय बिहार में व्याख्याताओं की बहाली हुई थी. कुल ३०० अंक की परीक्षा थी. मगर बेहद हास्यास्पद तरीके से इनमें से १०० अंक लिखित के और २०० अंक साक्षात्कार के रखे गए थे. फिर तो लालू के लगभग सारे विधायक और मंत्री यहाँ तक कि विधायक-मंत्रियों के साले-सालियाँ भी कॉलेज प्राध्यापक बन गए. मुझे लगता है कि पिछली मोदी सरकार के मानव संसाधन मंत्री श्री प्रकाश जावड़ेकर जी ने भी अपने किसी साला-साली को फायदा पहुँचाने के लिए ही यह मनमाना कदम उठाया था.
मित्रों, अब श्री जावड़ेकर मानव संसाधन विकास मंत्री नहीं रह गए हैं और नई सरकार में उनका स्थान हिंदी के जाने-माने साहित्यकार रमेश पोखरियाल निश्शंक जी ने ले लिया है. इसलिए मैं समझता हूँ कि अब उनसे निवेदन करना ही समीचीन होगा. मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि नेट उत्तीर्ण व्यक्ति अध्यापन के लिए ज्यादा उपयुक्त होगा या पीएचडी किया हुआ व्यक्ति. माना कि शोध भी पाठ्यक्रम का हिस्सा होता है लेकिन बहुत छोटा जबकि नेट किये हुए व्यक्ति के पास पूरे विषय का ज्ञान होता है अन्यथा वो नेट उत्तीर्ण ही नहीं कर पाएगा.
मित्रों, सरकार यदि उच्च शिक्षा का स्तर वास्तव में ऊँचा उठाना चाहती है तो आज के समय की मांग है कि पीएचडी और नेट दोनों को अनिवार्य करते हुए नेट की वैल्यू को पीएचडी से ज्यादा कर देना चाहिए क्योंकि नेट उत्तीर्ण व्यक्ति को पूरे विषय का ज्ञान होता है जबकि पीएचडी वाले व्यक्ति को केवल शोध का ज्ञान होता है और जब शिक्षक कक्षा में पढ़ाने जाता है तो उसे ९० प्रतिशत विषय और १० प्रतिशत शोध के बारे में ज्ञान देना होता है. भारत के युवाओं की दूसरी मांग यह है कि इसी राजपत्र में सरकार ने कहा है कि २०२१ से नेट उत्तीर्ण लोग सिर्फ कॉलेजों में नियुक्त हो पाएँगे विश्वविद्यालयों में नहीं. ऐसा करने का आधार क्या है? किसी भी सरकारी कदम का कोई तार्किक आधार तो होना चाहिए? क्या विश्वविद्यालयों में सिर्फ शोध की पढाई होती है विषय की पढाई नहीं होती?
मित्रों, अभी-अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने कहा है कि मुझ पर इतना दबाव डालो कि मैं खुद अपने खिलाफ भी छापा मरवाने के लिए बाध्य हो जाऊं. सवाल उठता है कि क्या सरकार दबाव में आती भी है या फिर मोदी जी का ऐसा कहना सिर्फ जुमलेबाजी है? मैं समझता हूँ कि मेरे इस आलेख के बाद जो भारत के सारे युवाओं की मांग को धारण करता है मोदी जी के इस बयान की सच्चाई की परीक्षा भी हो जाएगी. हालाँकि मेरा आज भी विश्वास है कि मोदी है तो कुछ भी मुमकिन है.

रविवार, 26 मई 2019

जीत की बधाई मगर .........


मित्रों, मैं सर्वप्रथम भारतवर्ष की समस्त जनता को लोकसभा चुनाव-परिणामों के लिए बधाई देता हूँ. साथ भारत के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी को भी बधाई और शुभकामनाएँ देता हूँ. जिन लोगों ने मोदी जी की हार के बारे में कल्पना कर रखी थी उन लोगों के लिए यह चुनाव-परिणाम अवश्य आश्चर्यजनक है परन्तु मेरे लिए तो अवश्यम्भावी है क्योंकि मुझे कभी इस बात को लेकर कोई संदेह रहा ही नहीं कि श्री नरेन्द्र मोदी दोबारा पहले से भी प्रचंड बहुमत से चुनाव जीतने जा रहे हैं.
मित्रों, ऐसा मेरा भी मानना रहा है कि जो जीता वही सिकंदर तथापि अपने भारतवर्ष में ऐसे-ऐसे नेता लगातार चुनाव जीतते रहे हैं जिससे यह साबित होता है कि कोई सिर्फ चुनाव जीत जाने से ही महान नहीं हो जाता बल्कि इसके लिए उसको महान कार्य भी करने होते हैं. उदाहरण के लिए बिहार को पिछले गियर में चला देनेवाले लालू प्रसाद यादव और उनकी अनपढ़ पत्नी ने मिलकर बिहार पर १५ साल तक एकछत्र राज किया. इसी तरह बंगाल को देश के सबसे अमीर राज्य से सबसे कंगाल राज्य में बदल देनेवाले ज्योति बसु ने भी पश्चिम बंगाल पर लगातार ३० सालों तक शासन किया. इसी तरह दुनिया के कई देशों में कई-कई दशकों तक तानाशाहों का शासन रहा है. कहने का मतलब यह है कि मोदी जी को अपनी जीत पर इतराना नहीं चाहिए बल्कि उन सारे कार्यों को पूरा करना होगा जो पहले कार्यकाल में अधूरे रह गए थे.
मित्रों, मैं एक बार भारत के परम प्रतापी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को याद दिलाना चाहूँगा कि उनको कौन-कौन से कामों को प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखना है. मैं जहाँ तक समझता हूँ कि प्रधानमंत्री जी को अपनी प्राथमिकता सूची में जनसँख्या-नियन्त्रण को सबसे ऊपर रखना चाहिए. मैं मानता हूँ कि यह अकेले समस्त समस्याओं की जननी है. प्रत्येक साल हमारी जनसँख्या २ करोड़ बढ़ जाती है. दुनिया की कोई भी सरकार हर साल दो करोड़ अतिरिक्त लोगों के लिए सुविधाएँ और रोजगार उपलब्ध नहीं करवा सकती भले ही वो कितनी भी अमीर क्यों न हो फिर भारत तो एक गरीब देश है. इसके साथ-साथ पिछली जनगणनाओं में हम देख रहे हैं कि हिन्दुओं की देश की जनसँख्या में भागीदारी लगातार घट रही है और मुसलमानों की लगातार बढ़ रही है. हम जानते और मानते हैं कि जब तक देश में हिन्दू ज्यादा हैं तभी तक देश और इसकी संस्कृति सुरक्षित है नहीं तो फिर तलवार के बल पर देश का इस्लामीकरण कर दिया जाएगा. दुनिया का इतिहास भी इस बात की तस्दीक करता है. इसलिए मोदी सरकार को कड़े कानून बनाकर जनसँख्या-वृद्धि पर लगाम लगानी चाहिए. और मैं समझता हूँ कि ऐसा अन्य कोई नेता या पार्टी नहीं कर सकती थी बल्कि ऐसा सिर्फ और सिर्फ मोदी जी ही कर सकते थे और कर सकते हैं क्योंकि मोदी है तो मुमकिन है.
मित्रों, इसके बाद मोदी जी को अनुच्छेद ३७० की समाप्ति पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए. न जाने पंडित नेहरु ने क्या खाकर या पीकर इस अनुच्छेद को संविधान का हिस्सा बनाया था. क्या विडंबना है कि रोहिंग्या या पाकिस्तानी तो जम्मू-कश्मीर में मजे में बस सकते हैं लेकिन एक गैर कश्मीरी भारतीय वहां नहीं बस सकता क्योंकि अनुच्छेद ३७० ऐसा करने नहीं देता. जबकि जम्मू-कश्मीर के जमीनी हालात इस बात की मांग करते हैं कि जम्मू-कश्मीर में गैर मुसलमानों को बसाकर वहां की जनसांख्यिकी को बदला जाए. जिस दिन वहां हिन्दू मतदाता ज्यादा हो जाएँगे आतंकवाद खुद-ब-खुद रूक जाएगा. वैसे इस बार के चुनाव प्रचार में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अनुच्छेद ३७० को समाप्त करने का वादा भी काफी जोर-शोर के साथ किया है और जनता ने भी उनको ऑफर किया था कि ३७० हटाओ ३७० सीटें पाओ.
मित्रों, इसके साथ ही मोदी जी को रोजगार उत्पन्न करने और व्यवसाय के लिए आसान ऋण देने पर भी ध्यान देना चाहिए. मैं नहीं जानता कि मुद्रा-ऋण के आंकडे कहाँ तक सही हैं लेकिन मैंने खुद अनुभव किया है कि हाजीपुर में यह योजना तेल के माथा तेल की नीति का अनुशरण करते हुए चलाई जा रही है. कहने का तात्पर्य यह है कि नए लोगों को बिलकुल भी ऋण नहीं दिया जा रहा बल्कि उन लोगों को मुद्रा-ऋण दिया जा रहा है जिनका पहले से ही रोजगार है. मोदी सरकार को इस स्थिति को बदलना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि उन लोगों को इसका लाभ मिले जिनके लिए वास्तव में यह योजना लाई गई थी.
मित्रों, मोदी सरकार को जलवायु-परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निबटने की विस्तृत योजना बनानी होगी. पिछले सालों में हमने देखा है कि भारत का पूर्वी हिस्सा जो अतिवृष्टि के लिए जाना जाता था जल संकट और सूखे जैसी स्थितियों का सामना कर रहा है जबकि राजस्थान जहाँ दशकों में कभी एकाध बार बरसात होती थी वहां प्रत्येक साल बाढ़ आ रही है. अभी कल-परसों मुझे बिहार के वैशाली जिले के जन्दाहा प्रखंड में जाने का सुअवसर मिला और मैंने पाया कि स्थिति बड़ी भयावह है. सारे हैण्डपम्प सूख चुके हैं और लोग एक-एक बूँद पानी के लिए तरस रहे हैं. सरकार चाहे तो चेक डैम और नए तालाबों का निर्माण करवाकर और पुराने कुओं और तालाबों का जीर्णोद्धार कर इस स्थिति को बदल सकती है. अगर अविलम्ब ऐसा नहीं किया गया तो देश में बहुत जल्द खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो जाएगा क्योंकि जब पीने को ही पानी नहीं होगा तो खेती के लिए कहाँ से आएगा.
मित्रों, इसके अलावा समान नागरिक संहिता को लागू करना भी समय की मांग है. एक देश में दो समुदायों के लिए दो कानून बेहद मूर्खतापूर्ण तो है ही इससे भविष्य में देश के टुकड़े-टुकड़े होने का मार्ग भी प्रशस्त होता है. जब तक समाज के एक वर्ग को बहुविवाह की अनुमति होगी तब तक जनसँख्या-नियंत्रण के सारे उपाय विफल होंगे इसमें कोई शक नहीं. इसके साथ ही देश में लगातार हिन्दुओं की जनसँख्या-प्रतिशत में कमी होने के पीछे एक कारण समान नागरिक संहिता का नहीं होना भी है.
मित्रों, राम मंदिर हिन्दुओं के लिए सिर्फ एक स्वप्न नहीं है बल्कि स्वाभिमान का प्रतीक भी है. कोई और देश होता तो कब का राम मंदिर बन चुका होता लेकिन अपने देश की तो बात ही निराली है. यहाँ वर्षों तक हिन्दुओं को झूठी धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ा कर बेवकूफ बनाया गया और एक प्रधानमंत्री ने तो यहाँ तक कह दिया कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार देश के अल्पसंख्यकों का है. बाबरी मस्जिद हिन्दुओं की हार का प्रतीक थी और उसे आज नहीं तो कल टूटना ही था लेकिन आज उससे भी ज्यादा जरूरी है राम मंदिर का बनना. राम भारत और भारतवासियों के रोम-रोम में बसते हैं. राम अत्याचारी नहीं हैं बल्कि अत्याचार के खिलाफ लड़ते हैं, राम सबके सुख-समृद्धि और सबको न्याय के प्रतीक हैं फिर चाहे वो हिन्दू हो या मुसलमान या अन्य.
मित्रों, मैं समझता हूँ कि यह आलेख पर्याप्त रूप से लम्बाई को प्राप्त हो चुका है. अभी तो मोदी सरकार का दोबारा गठन भी नहीं हुआ है और हम भी कहीं जा तो रहे नहीं. इसलिए आगे भी हम मोदी जी को मुफ्त की सलाह देते रहेंगे. वैसे यह मुफ्त की सलाह पूरी तरह से मुफ्त है भी नहीं आखिर मेरा समय और श्रम तो लगता ही है जिसे मैं देशहित को ध्यान में रखते हुए व्यय करता हूँ अपने कई बेहद जरूरी कामों और अपने हितों की कीमत पर.

शुक्रवार, 17 मई 2019

क्या गाँधी भगवान थे और गोडसे दानव?


मित्रों, हम भारतीयों में एक अजीब आदत है. वो यह कि हम भयंकर अतिवादी हैं. हम या तो किसी भी भगवान बना देते हैं या फिर दानव. इतिहास गवाह है कि महात्मा बुद्ध के समय से ही बहुत सारे ऐसे महापुरुष भारत में पैदा हुए जिन्होंने अपने अनुयायियों को सख्ती से ताकीद किया कि मुझे इन्सान ही रहने देना भगवान नहीं बना देना परन्तु उनके मरने के बाद भारतीयों ने उन्हें भगवान बना दिया. आश्चर्य की बात तो यह है कि बुद्ध और कबीर ने आजीवन मूर्ति पूजा का विरोध किया और आज हर जगह उनकी मूर्तियाँ नजर आती हैं. यहाँ तक कि गाँधी और अंबेडकर को भी हमने नहीं छोड़ा.
मित्रों, गाँधी जी की आत्मकथा तो मैंने पढ़ी ही हैसाथ ही गाँधी दर्शन का भी अध्ययन किया है. मैंने जहाँ तक अनुभव किया है गाँधी में भी वो सारी कमजोरियां थीं जो एक इन्सान में होती हैं. गाँधी ने लिखा है कि जब उनके पिता अंतिम सांसें ले रहे थे तब वे अपनी पत्नी के साथ रतिक्रिया में लीन थे. इसी तरह गाँधी जी ने अपने ब्रम्हचर्य के साथ प्रयोग के बारे में लिखकर विस्तार से बताया है कि वे किस तरह ६०-७० साल की उम्र में नंगी लड़कियों के साथ सोते थे. इतना ही नहीं भारत के बंटवारा के लिए भी काफी हद तक गाँधी जी भी जिम्मेदार थे. दरअसल उन्होंने १९१६ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता करके मुस्लिम लीग को मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था के रूप में न केवल मान्यता दे दी बल्कि इस रूप में उसे स्थापित होने का सुअवसर भी दे दिया.
मित्रों, बाद में भी जिन्ना और नेहरु के प्रति उनके झुकाव का नुकसान भारत को उठाना पड़ा. वास्तव में उम्र ढलने के साथ गाँधी जिद्दी हो गए थे. उनकी इसी जिद के चलते सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने का बावजूद इस्तीफा देना पड़ा था और उन्होंने जिद करके न केवल उस पाकिस्तान को ५५ करोड़ रूपये दिलवाए जो तब तक कश्मीर पर कब्ज़ा कर चुका था बल्कि नेहरु को जबरन प्रधानमंत्री भी बनवा दिया जबकि कांग्रेस कार्यसमिति सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाना चाहती थी. क्या विडंबना है कि मो. अली जिन्ना गाँधी को हिन्दुओं का नेता मानते थे मगर गाँधी खुद को सर्वधर्मसमभाव का पुजारी मानते थे. सवाल उठता है कि अगर गाँधी सबके नेता थे तो फिर वे हिन्दू-मुस्लिम दंगों को क्यों नहीं रोक पाए? जब मुस्लिम लीग ने १६ अगस्त १९४६ को प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस की घोषणा की तब मुसलमानों ने गाँधी की क्यों नहीं सुनी? मैं समझता हूँ कि मेरे साथ-साथ आपने भी पढ़ा होगा कि आइन्स्टीन ने गाँधी की मृत्यु के बाद क्या कहा था यही कि आनेवाली पीढियां आसानी से यह विश्वास नहीं करेगी कि कोई इस तरह का हाड़-मांस का आदमी भी कभी धरती पर हुआ करता था. माना कि आइन्स्टीन गाँधी के अनन्य प्रशंसक थे लेकिन वे गाँधी को इन्सान ही मानते थे भगवान नहीं.
मित्रों, मैंने गोडसे को भी पढ़ा है. उनकी पुस्तक मैंने गाँधी वध क्यों किया शायद आपलोगों ने भी पढ़ी होगी. उसमें गोडसे कहते हैं कि वे गाँधी के आलोचक नहीं प्रशंसक हैं लेकिन गाँधी के कारण देश को जो क्षति हो रही थी उससे वे परेशान थे. यहाँ तक कि गाँधी पर गोली चलाने के दिन भी उसने पहले गाँधी का चरणस्पर्श किया था और बाद में उनपर गोली चला दी थी. गाँधी की हत्या तो गलत थी लेकिन उसके बदले में महाराष्ट्र में सैंकड़ों चितपावन ब्राम्हणों की जो सामूहिक हत्या कर दी गई वो कैसे सही थी? गलत तो वो भी था. जिस गाँधी की जिंदगी अहिंसा का पाठ पढ़ाते हुए बीती उसी की मौत का बदला हिंसा से लिया गया.
मित्रों, तात्पर्य यह कि न तो गाँधी जी भगवान थे और न ही नाथूराम राक्षस था बल्कि हमने एक को भगवान और दूसरे को राक्षस बना दिया. यहाँ तक कि हमने अपने आँख और कान बंद कर लिए और नाथूराम की आवाज को दबा दिया जबकि नाथूराम न तो पेशेवर हत्यारा था और न ही उसकी गाँधी जी के साथ कोई निजी दुश्मनी थी और न ही गाँधी को मारने में उसका कोई निजी स्वार्थ था. मैं यह नहीं कहता कि गाँधी की हत्या करके उसने कोई महान कार्य किया लेकिन महात्मा गाँधी और इंदिरा गाँधी की मौत का बदला हमने जिस तरह नरसंहार के द्वारा लिया मैं समझता हूँ वो भी सही नहीं था. न जाने हम कब यह समझेंगे कि दुनिया न तो पूरी तरह से ब्लैक है और न ही वाइट बल्कि दुनिया ग्रे है अर्थात वो थोड़ी काली भी है और थोड़ी उजली भी. श्रीलंका में जिस तरह प्रभाकरन के बेटे को बिस्कुट खिलाने के बाद गोली मार दी गई वो भी तो गलत था न, उसका बाप आतंकवादी था इसमें उस अबोध बच्चे का क्या दोष था?

गुरुवार, 16 मई 2019

ध्रुव त्यागी की हत्या पर इतना सन्नाटा क्यों है भाई?


मित्रों, आपको शोले फिल्म का एक दृश्य जरूर याद होगा.उसमें मौलाना के बेटे की डाकू हत्या कर देते हैं और तब मौलाना चुपचाप खड़े गांववालों से पूछते हैं कि इतना सन्नाटा क्यों है भाई?
मित्रों, परसों रात में भारत की राजधानी दिल्ली में एक हिन्दू बाप स्कूटी पर अपनी बेटी को लिए घर जा रहा था. तभी कुछ मुसलमानों से उसकी बेटी के साथ छेडछाड की. वो बेचारा उसकी शिकायत लेकर उसके बाप के पास पहुंचा तो उसका बाप अपने बेटे का पक्ष लेकर उसी से लड़ने लगा और अपनी बुढिया माँ को जानवरों को काटने में काम आनेवाला चाकू ले आने को कहा. बुढिया बड़े ही उत्साह में हथियार ले आई और फिर ध्रुव त्यागी को डरे हुए लोगों ने मिलकर मार डाला. इतना ही नहीं बाप को बचाने गए बेटे को भी चाकुओं के वार से छलनी कर उनलोगों ने अच्छे पडोसी होने धर्म बखूबी निभाया.सवाल उठता है कि उस महान मुस्लिम परिवार में किसी ने हत्या का विरोध क्यों नहीं किया बल्कि सभी इस कुकर्म में शामिल क्यों हो गए? क्या इस्लाम यही शिक्षा देता है? क्या इस्लाम में हत्या करना पवित्र और महान कार्य है? क्या ध्रुव त्यागी को इसलिए पूरे परिवार ने रमजान के महीने में घेर कर मार डाला क्योंकि वो उनकी नज़रों में काफ़िर था?
मित्रों, आपको अखलाख तो याद होगा. वही जिसने अपने हिन्दू पडोसी की गाय चुराकर उसे मार डालने का महान कार्य किया था और हिन्दुओं ने चौरकर्म और गोहत्या जैसे महान कार्य में बाधा डाली थी और वो भी उस कालखंड में जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी सरकार थी. इसी क्रम में मारपीट में उसकी मौत हो गई थी और तब पूरे भारत में अवार्डवापसी का क्रम शुरू हो गया था. लोग कहने लगे थे कि मुसलमान भारत में डरे हुए हैं. आज उन्हीं डरे हुए लोगों ने भारत की राजधानी दिल्ली में हत्या की है तो मानों वही शोले वाला सन्नाटा पसर गया है. कोई कुछ नहीं बोल रहा. सारे धर्मनिरपेक्षतावादी मानों कछुए की तरह अपने खोल में समा गए हैं. अब कोई नहीं बोल रहा कि भारत के मुसलमान डरे हुए हैं.
मित्रों, मैं पूछता हूँ कि ध्रुव त्यागी का अपराध क्या था? क्या भारत में हिन्दू होना सबसे बड़ा अपराध है या मुसलमानों के पड़ोस में बसना सबसे बड़ा अपराध है? या फिर अपनी बेटियों की ईज्जत बचाना हिन्दुओं के लिए अपराध है? जब भारत में हिन्दुओं के साथ ऐसा हो रहा है तो पाकिस्तान में तो क्या नहीं होता होगा?
मित्रों, सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि न तो राहुल गाँधी, न ही अरविन्द केजरीवाल ने अभी तक इस घटना पर कुछ बोला है पीड़ित परिवार से मिलने की बात तो दूर रही. जबकि अखलाख की हत्या के समय इन्होने आसमान सर पे उठा लिया था. ऐसा भेदभाव क्यों है भाई? क्या इसलिए नहीं है क्योंकि हम हिन्दू एकजुट नहीं हैं और जाति-पाति और स्वार्थ में बंटे हुए हैं? बंगाल में जो लोग ममता के पीछे पागल हैं वो भी हिन्दू हैं, बिहार में जो घोटालाशिरोमणि लालू को वोट कर रहे हैं वो भी हिन्दू ही हैं. इसी तरह पूरे भारत में हिन्दू खेमों में बंटे हुए हैं जबकि मुसलमान एकजुट थे और एकजुट हैं. उनके सामने बस एक ही लक्ष्य है कि हिंदुत्ववादी सरकार को हराओ.
मित्रों, अब आते हैं मूल सन्दर्भ पर. श्रीलंका में ईस्टर के दिन जो भयंकर हत्याकांड हुआ उस पर भी भारत के धर्मनिरपेक्षता वादी चुप ही रहे. क्यों? न्यूज़ीलैंड पर शोर और श्रीलंका पर सन्नाटा. यह कैसी धर्मनिरपेक्षता है? तथापि हमें यह देखकर आश्चर्यमिश्रित ख़ुशी हो रही है कि श्रीलंका में इस तरह की कोई प्रजाति नहीं पाई जाती है. श्रीलंका बम विस्फोटों में पकडे गए लोगों को वहां वकील नहीं मिल रहे जबकि भारत में तो वकीलों की लाईन लग जाती. लोग लड़ पड़ते कि हम इनका मुकदमा लड़ेंगे.भारत की वर्तमान स्थिति को देखते हुए हम आसानी से समझ सकते हैं कि भारत १००० सालों तक गुलाम क्यों रहा.

मंगलवार, 14 मई 2019

लोकसभा चुनाव:गए माघ २९ दिन बांकी


मित्रों, हुआ यह कि उस साल बिहार में काफी ठण्ड थी,कंपकंपानेवाली. आपलोग भी जानते हैं कि माघ की ठण्ड हाड़ गलानेवाली ठण्ड होती है. साथ ही यह ठण्ड का आखिरी महीना भी होता है. ऐसे में माघ के पहले दिन एक बार एक बुढिया से जब यह पूछा गया कि तू इस ठण्ड में जिंदा तो बच जाएगी न तो उसने यही जवाब दिया था कि अब क्या, गए माघ २९ दिन बांकी. ठीक उसी तरह लोकसभा चुनावों के बारे में अगर हम यह कहें कि सूई तो निकल ही चुकी है धागे का भी सिर्फ अंतिम सिरा ही बचा हुआ है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. 2019 का महासमर अब समाप्ति की ओर अग्रसर है. कुल 543 सीटों में से अब मात्र 59 सीटें ऐसी बची हैं जिन पर मतदान होना शेष है. 23 मई को किसको कितनी सींटें मिलनेवाली है यह अभी तो काल भी नहीं बता सकता जो हमारा पल-पल का हिसाब रखता है लेकिन पूरा भारत एकमत होकर इस समय यही कह रहा है कि आएगा तो मोदी ही.
मित्रों, जहाँ तक हमारा सवाल है तो हमने तो चुनाव से बहुत पहले ही कहा था कि आएगा तो मोदी ही. इतना ही नहीं हमारा यह भी मानना है कि एक बार फिर से भाजपा को अकेले ही बहुमत आएगा. कहीं कोई संदेह और खरीद-फरोख्त की गुंजाईश इस बार भी जनता छोड़ने नहीं जा रही. इस बीच खबर यह भी आ रही है कि उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने प्रधानमंत्री के पद पर अपना दावा ठोंक दिया है. अब ऐसी गैरजिम्मेदाराना हरकत को क्या नाम दिया जाए? पानी में मछली और बंटवारे के लिए लठ्ठम लठ्ठा. अरे बहन जी अभी तो एक चरण का मतदान भी शेष है कुछ सब्र कर लिया होता. वैसे भी कांग्रेस के सुपरस्टार नेता मणिशंकर अय्यर ने फिर से एक बार शानदार वापसी की है और इस बार वे कदाचित इस प्रण के साथ वापस आए हैं कि अबकी बार ४०० पार, कौन कांग्रेस? नहीं भाई भाजपा. दरअसल मणिशंकर चाचा हैं तो कांग्रेस में लेकिन अंदरखाने वे भाजपा से मिले हुए हैं. इसलिए आते ही उन्होंने उस कांग्रेस पार्टी को अपने पुराने नीच वाले बयान को दोहराकर फिर से संकट में डाल दिया है जिसने अभी-अभी बड़ी मुश्किल से सैम पित्रोदा के हुआ तो हुआ वाले बयान से पीछा छुड़ाया था.
मित्रों, इन दिनों इन बुड्ढों ने जिस तरह से कांग्रेस का बेडा गर्क कर रखा है उसे देखते हुए मुझे तो लगता है कि कांग्रेस को भी अविलम्ब से मार्गदर्शक मंडल बना ही देना चाहिए वरना ये बुड्ढे अपने श्राद्ध से पहले पार्टी का ही श्राद्ध करवा डालेंगे. खैर अब तो जो नुकसान कांग्रेस को होना था हो चुका. देखना यह है कि २३ मई के बाद राहुल थाईलैंड जाते हैं या जेल. वैसे हमने तो कानों कान सुना है कि प्रियंका अपने पूरे परिवार सहित १९ मई को
ही स्विट्जर्लैंड के लिए निकल लेनेवाली है. खैर हमारा क्या हम तो कहीं नहीं जानेवाले जी. वो बिहार में कहते हैं न कि झोली में दाम न सराय में डेरा. हम तो पहले भी लूट लाते थे और कूट खाते थे और आगे भी इसी परंपरा का निर्वाह करते रहेंगे. बस कभी हमारे देश का सिर दुनिया में कहीं भी न झुके हमारा तो बस इतना-सा ख्वाब है.

शुक्रवार, 3 मई 2019

विपक्ष का एक सूत्री एजेंडा


मित्रों, हमें तो पहले दिन से ही शक था कि कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष चाहता क्या है. अब जब कांग्रेस के ताश की गड्डी के दूसरे कथित तुरुप के पत्ते प्रियंका गाँधी ने यह स्वीकार कर लिया है कि कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार जीतने के लिए नहीं उतारे हैं बल्कि भाजपा के वोट काटकर भाजपा को हराने के लिए उतारे हैं तो जैसे एकबारगी सच का सूरज सामने आ गया. तात्पर्य यह कि कांग्रेस और पूरे-के-पूरे विपक्ष के पास देश के विकास को लेकर कोई कार्ययोजना नहीं है क्योंकि यह कभी न तो उनके एजेंडे में था और न ही अब है.
मित्रों, सवाल उठता है कि पूरा का पूरा विपक्ष बस इसी एक एजेंडे को लेकर क्यों चल रहा कि मोदी हटाओ, मोदी हराओ? मैं आपको बताता हूँ कि ऐसा क्यों है. दरअसल मोदी ने पहले से चले आ रहे इस समझौते को भंग कर दिया है कि जब मैं जीतूँ तो तुम्हें बचाऊंगा और जब तुम जीतो तो मुझे बचा लेना. इस तरह दोनों पक्ष बारी-बारी से जीतते रहेंगे और घोटाले करते रहेंगे. मोदी की सरकार के समय पहली बार भ्रष्ट नेता जेल जा रहे हैं जबकि पहले जांच का नाटक चलता था इसलिए उन सभी नेताओं में हडकंप है जिन्होंने घोटाले कर रखे हैं. कुछ लोग कह सकते हैं कि विपक्ष भी जिन राज्यों में सत्ता में है अगर पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के घोटालों की जाँच करवाने लगे तो? अगर विपक्षी पार्टी की सरकारें ऐसा करती हैं तो हम उनका स्वागत करेंगे क्योंकि हम मानते हैं कि देश सर्वोपरि है न कि कोई नेता. हमारा स्पष्ट रूप से मानना है कि किसी नेता ने अगर कभी गड़बड़ी की है तो उसे सार्वजानिक जीवन में नहीं होना चाहिए बल्कि उसकी सही जगह जेल है.
मित्रों, विपक्ष के मोदी हटाओ एजेंडे का दूसरा कारण है मोदी का मूल-मंत्र सबका साथ सबका विकास. भारत के इतिहास में पहली बार गरीबों को भेजा गया पैसा सीधे गरीबों तक पहुँच रहा है और वो भी बिना किसी भेदभाव के. विपक्ष डर रहा है कि इस तरह अगर मोदी गरीबों के दिलों में जगह बना लेगा तो उनकी गन्दी सांप्रदायिक और जातीय राजनीति का क्या होगा? प. बंगाल में उनके तानाशाहीपूर्ण शासन का क्या होगा जहाँ भाजपा को वोट देने का मतलब मृत्यु को आमन्त्रण देना है.
मित्रों, इन दिनों पूरे देश में अगर लोकतंत्र कहीं खतरे में है तो तीन इलाकों में है-एक प. बंगाल, दूसरे छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र-तेलंगाना-उड़ीसा के माओवादी इलाकों में और तीसरे केरल में. एक में कहा जा रहा है कि ख़बरदार जो भाजपा को वोट दिया, दूसरे इलाके में वोट गिराने पर ही रोक है और तीसरे इलाके में भी वही स्थिति है जो बंगाल में है यानि भाजपा को वोट दिया तो जान से गए. मगर आश्चर्य है कि न तो मीडिया और न ही विपक्षी नेता इन दानवों के खिलाफ कोई आवाज उठा रहे. बल्कि वे उस व्यक्ति का समर्थन कर रहे हैं जो नायक नहीं खलनायक है और बीएसएफ द्वारा भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता के चलते बर्खास्त किया गया है, जिसने शराबखोरी के चलते अपने पूरे परिवार का सत्यानाश कर लिया. जी हाँ मैं बात कर रहा तेजबहादुर यादव की. आम तौर पर फौज या पुलिस दल में भगोड़े, अनुशासनहीन और बर्खास्त किए जाने वाले आदमी की कोई पूछ नहीं होती. लेकिन चुनाव का मौसम है और अगर ऐसे में तेज बहादुर के सहारे बंदूक दागी जा सकती है तो फिर भला इससे विरोधी दलों को इनकार कैसे हो सकता है. वो भी तब जब निशाने पर नरेंद्र मोदी हों. लेकिन तेज बहादुर में नायक या अपना प्रतिनिधि तलाशने में लगी पार्टियों ने राजनीति को उस स्तर पर पहुंचा दिया है, जहां यह फर्क करना मुश्किल है कि आखिर किस तरह के फौजी को आप अपना हीरो मानेंगे. तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों में देश की सेवा और सुरक्षा करने वाले जवान को या फिर उस शख्स को, जिसने अपनी पूरी नौकरी के दौरान लगातार अनुशासनहीनता का परिचय दिया हो. तेज बहादुर के बारे में देश का लोगों का तब ध्यान गया, जब उसने 2017 के जनवरी महीने में अपने फेसबुक अकाउंट पर एक वीडियो पोस्ट किया, वो भी बीएसएफ की वर्दी पहने हुए. तेज बहादुर ये बयान कर रहा था कि बीएसएफ में कितना खराब खाना परोसा जा रहा है, जली हुई रोटी और पतली दाल का हवाला देकर. उस वीडियो ने सनसनी मचा दी और सोशल मीडिया में वायरल हो गया. ये पहला मौका था, जब फौज या किसी अर्द्धसैनिक बल में काम करने वाले किसी जवान ने इस तरह की हरकत की हो. ध्यान जाना स्वाभाविक था. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस मामले में जांच के आदेश भी दिए. इस वाकये से आलोचना के घेरे में आई बीएसएफ ने एक स्वतंत्र संस्था से अपने यहां परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता की जांच करवाई. डीआरडीओ से जुड़े संगठन डीआईपीएएस ने यह जांच की. इस संगठन ने जो अपनी रिपोर्ट सौंपी, उसमें साफ तौर पर ये बताया गया कि बीएसएफ के मेस या चौकियों में परोसे जाने वाले भोजन में कोई खराबी नहीं है और उसकी गुणवत्ता बेहतर है.
मित्रों, सवाल ये उठता है कि आखिर तेज बहादुर यादव ने ऐसा क्यों किया. इसके लिए ये आवश्यक है कि बीएसएफ से फरवरी 2018 में बर्खास्त हो चुके इस शख्स के करियर की पड़ताल की जाए. रिकॉर्ड के तौर पर तेज बहादुर का संबंध हरियाणा के महेंद्रगढ़ से है और उसके पिता का नाम शेर सिंह है. शेर सिंह के पांच बेटों में तेज बहादुर सबसे छोटा है. तेज बहादुर ने 20 जनवरी 1996 को बीएसएफ ट्रेनी रिक्रूट के तौर पर ज्वाइन की. शुरुआती ट्रेनिंग के बाद उसे 30 अक्टूबर 1996 को बीएसएफ की 29वीं बटालियन में बतौर कांस्टेबल शामिल किया गया. बटालियन में शामिल होने के पहले और ट्रेनिंग के दौरान ही तेज बहादुर के लक्षण दिखने शुरू हो गए थे. ट्रेनिंग के दौरान नए जवानों को सबसे पहले अनुशासित होना सिखाया जाता है. ट्रेनिंग के दौरान ही तेज बहादुर बिना अनुमति के गायब हो गया था, जिसे फौज की भाषा में भगोड़ा होना कहा जाता है. इस वजह से बीएसएफ एक्ट के सेक्शन 19ए के तहत तेज बहादुर को 25 सितंबर 1996 को 14 दिनों की सख्त कैद की सजा सुनाई गई. लेकिन ये तो बस शुरुआत थी.
मित्रों, इसके बाद भी तेज बहादुर की अनुशासंहिना का सिलसिला रुका नहीं. नियमित अंतराल पर वो एक के बाद एक गंभीर किस्म की अनुशासनहीनता करता रहा और उसकी सजा भी पाता रहा. मसलन 28 सितंबर 2003 को उसे 7 दिन की सख्त कैद की सजा सुनाई गई. ये सजा बीएसएफ एक्ट के सेक्शन 40 के तहत सुनाई गई यानी दिशा-निर्देशों को न मानना और इस तरह अनुशासन तोड़ना. इसके 4 साल बाद फिर से तेज बहादुर ने अनुशासनहीनता बरती और इस बार बीएसएफ एक्ट के सेक्शन 26 और 40 के तहत उसे 27 सितंबर 2007 को 28 दिनों की सख्त कैद की सजा सुनाई गई. अमूमन 3 ऐसी गंभीर हरकतों के बाद फौज या बीएसएफ जैसे संगठन से बर्खास्त कर दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन अपने परिवार का अकेला पालनहार होने की बात कर तेज बहादुर ने दया की भीख मांगी और इस तरह वो बर्खास्तगी से बचा. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. तेज बहादुर ने 3 साल बाद फिर से एक बड़ा बखेड़ा किया. जब उसकी बटालियन मार्च 2010 में भारत-बांग्लादेश सीमा पर किशनगंज के पास तैनात थी, उस वक्त उसने अपने कंपनी कमांडर को न सिर्फ मां-बहन की गालियां दीं, बल्कि आगे जाकर गश्त करने के आदेश को मानने से भी मना कर दिया. हद तो ये हुई कि उसने अपने कंपनी कमांडर इंस्पेक्टर मोहन सिंह को गोली मारने की धमकी तक दे डाली. इस मामले में एक बार फिर से तेज बहादुर का कोर्ट मार्शल हुआ और बीएसएफ एक्ट के सेक्शन 20ए और सी के तहत उसे न सिर्फ 89 दिन की सख्त कैद की सजा सुनाई गई, बल्कि उसकी सेवा अवधि में भी 3 साल की कटौती कर दी गई.

मित्रों, ये किस्सा ये बताने के लिए काफी है कि जिस तेज बहादुर को देशभक्त वीर जवान के आदर्श मॉडल के तौर पर पेश किया जा रहा है, उसका अपना व्यक्तित्व कितना दागदार रहा है. जहां तक फेसबुक पर खाने की शिकायत वाला वीडियो पोस्ट कर सनसनी मचाने वाली तेज बहादुर की हरकत का सवाल है, उसके पीछे की कहानी भी रोचक है. बीएसएफ के उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि तेज बहादुर की सीमा की कठिन परिस्थितियों में ड्यूटी करने की इच्छा नहीं होती थी. ऐसे में जब उसे जनवरी 2017 में जम्मू सेक्टर के तहत नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पास बटालियन के एडमिन बेस पर रखा गया, तो वो नाराज हो गया और उसने अपनी पोस्टिंग कहीं कम दबाव वाली जगह पर करने की मांग अपने अधिकारियों के सामने रखी. जब उसकी ये मांग नहीं मानी गई, तो आदत से मजबूर उसने एक बार फिर से ड्रामा किया और घटिया भोजन की कहानी सोशल मीडिया पर वायरल की. तेज बहादुर के इस ड्रामे के बाद जब बीएसएफ ने इस मामले में जांच-पड़ताल शुरू की, तो घबराये तेज बहादुर ने भूख हड़ताल कर डाली और कह दिया कि अगर उसको स्वैच्छिक सेवानिवृति नहीं दी गई, तो वो आमरण अनशन करेगा. जाहिर है उसे साफ पता था कि जांच-पड़ताल के बाद उसे एक बार फिर सजा होगी और भविष्य अंधकारमय रहने वाला है, ऐसे में अगर बर्खास्तगी की जगह वीआरएस मिल जाता, तो पेंशन और बाकी सुविधाएं नौकरी छोड़ने के बाद उसे मिलती, जिसका हकदार वो बर्खास्तगी के बाद नहीं होता. बीएसएफ अधिकारियों ने तेज बहादुर की इस ब्लैकमेलिंग पर ध्यान नहीं दिया और मार्च से अप्रैल 2017 के दौरान उसका कोर्ट मार्शल हुआ समरी सिक्योरिटी फोर्स कोर्ट यानी एसएसएफसी में. इस कानूनी प्रक्रिया के बाद उसे कुल 6 आधार पर अनुशासनहीनता और कर्तव्य में लापरवाही का दोषी पाया गया. इसी के बाद आखिरकार फरवरी 2018 में उसकी बीएसएफ से विदाई हो गई, लेकिन शान-शौकत से नहीं, बल्कि बर्खास्तगी के साथ, जिसकी भूमिका वो खुद नौकरी ज्वाइन करने के साथ ही बनाने में लगा हुआ था.

मित्रों, सवाल ये उठता है कि आखिर तेज बहादुर का ये करियर जो किसी भी आदर्श जवान के लिए प्रेरणा नहीं, बल्कि शर्मिंदगी का सबब हो सकता है. उसको इस तरह से महिमामंडित किया जाना क्या सही है. राजनीति में सब कुछ जायज है, शायद यही इसका एकमात्र जवाब हो सकता है. जब देश की सीमा की सुरक्षा करने वाले बल से बर्खास्त सिपाही को यूपी की सियासत में तेज बहादुर यादव के तौर पर पेश कर नायक तलाशने की असफल ही सही, लेकिन सनसनीखेज कोशिश की जाए. अब तो कांग्रेस पार्टी एक और झूठ बोलने पर उतारू है कि मनमोहन सरकार में सर्जिकल स्ट्राइक रोजाना की बात थी और उनकी सरकार में यह अनगिनत बार हुआ था. सवाल उठता है कि फिर जाकिर नायक उनकी सरकार में हीरो कैसे था और उसकी पहुँच १० जनपथ तक कैसे थी, सवाल उठता है कि कश्मीर के अलगाववादी नेता उस समय बार-बार कांग्रेस पार्टी के नेताओं की निजी पार्टियों की शोभा क्यों बढा रहे थे? चीन ने तब क्यों मसूद अजहर पर प्रस्ताव को पारित नहीं होने दिया? कांग्रेस के नेता तब क्यों एक आतंकवादी को फांसी से बचाने के लिए रात के दो बजे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे थे? तब क्यों एक बार भी जैशे मोहम्मद के कमांडर का पद खाली नहीं हुआ? तब क्यों पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भारत के प्रधानमंत्री को रोती रहनेवाली देहाती महिला कहकर संबोधित कर रहे थे? तब क्यों पाकिस्तान कंगाल नहीं हुआ और चीन ने भारत के नक़्शे में तब क्यों अरुणाचल और जम्मू और कश्मीर को नहीं दर्शाया?
मित्रों, वास्तव में यह २०१९ का पूरा चुनाव राम और रावण के बीच का चुनाव है. राम तब भी अकेले थे और अब भी अकेले हैं. दूसरी तरफ उस रावण के तो महज दस सर थे इस रावण के कई दर्जन हैं क्योंकि मोदी हराओ, मोदी हटाओ अभियान में सैकड़ों दल एक साथ लगे हुए हैं. सवाल उठता है कि भारत की जनता किसको चुनेगी राम को जिसका लक्ष्य है-दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज काहू नहीं व्यापा. या फिर उस रावण को जो सीरिया से लेकर,भारत और श्रीलंका तक अटूट अट्टहास करता हुआ घोषणा कर रहा है कि दानव हूँ भगवान नहीं हूँ, रावण हूँ मैं राम नहीं हूँ, इंसानी खून की नदियों में स्नान करना जिसका जूनून है, जिसके शब्दकोश में इंसानियत शब्द है ही नहीं सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार है. अवरोध ही अवरोध है हिन्दू विरोध है.  जिसका सपना भारत का विकास नहीं विनाश है, सर्वनाश है. रावण की तो २० भुजाएँ थी इसकी अनगिनत हैं इतनी जितनी हमारी गिनती में समा ही नहीं सकती. सवाल उठता है कि इस रावण का विनाश कैसे होगा? दोस्तों इस रावण का विनाश कठिन भी है और आसान भी. कठिन है रावण के लालच से खुद को बचाना और आसान है मतदान केंद्र तक जाना और कमल का बटन दबाना. और यह बात प. बंगाल, केरल और माओवाद प्रभावित इलाकों पर भी लागू होती है. बस आज थोड़ी-सी हिम्मत करनी पड़ेगी,वक़्त को बदले के लिए थोडा-सा वक़्त निकलना होगा फिर राम के बदले रावण को वनवास पर जाना होगा, राम का राज होगा, राम-राज्य होगा.

बुधवार, 1 मई 2019

आतंक के खिलाफ भारत की ऐतिहासिक जीत


मित्रों, आज हर भारतीय के लिए गर्व करने का दिन है, गौरव करने की बेला है. आज संयुक्त राष्ट्र संघ ने पाकिस्तान के सबसे बड़े आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित कर दिया है. इससे पहले भी कई बार भारत और भारत के मित्रों द्वारा इस दिशा में प्रयास किए गए लेकिन हर बार पाकिस्तान के परम मित्र और हमारे चिर शत्रु चीन ने वीटो लगाकर ऐसा होने नहीं दिया. जिस चीन को झुकाना आज से ५ साल पहले हिमालय को झुकाने से भी ज्यादा दुष्कर कार्य माना जाता था उसे आज अंततः भारत ने झुका दिया है. निश्चित रूप से इस परिघटना को हम न केवल भारत की ऐतिहासिक जीत और चीन-पाकिस्तान की करारी कूटनैतिक हार मान सकते हैं बल्कि गर्व के साथ कह भी सकते हैं.
मित्रों, यह बात दुनिया में किसी से भी छिपी हुई नहीं है कि पाकिस्तान १९८० के दशक से ही भारत के खिलाफ अपने जेहादी आतंकवादियों के माध्यम से छद्म युद्ध छेड़े हुए है. भारत को पाकिस्तानी आतंकवादियों ने जितनी क्षति पहुंचाई है उतनी क्षति अन्य किसी भी देश को आतंकवादियों ने नहीं पहुंचाई है. उस पर हमारी हालत ५ साल पहले यह थी कि २००८ के २६/११ के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री को रुदन करनेवाली देहाती महिला कह रहा था. मतलब हालत चोरी और सीनाजोरी का था. आरोप तो यह भी लगा था कि मुम्बई हमले को स्वयं तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने प्रायोजित किया था ताकि हमले का आरोप हिन्दुओं पर मढ़कर भगवा आतंकवाद की काल्पनिक परिकथा को वास्तविक ठहराया जा सके.
मित्रों, आज मात्र पांच सालों के बाद हालात बिलकुल उलट है क्योंकि आज केंद्र में भारत के हितों के साथ किसी भी परिस्थिति में समझौता न करनेवाली सरकार सत्ता में है. जो लोग यह आरोप लगा रहे थे कि मोदी इतनी ज्यादा विदेश यात्रा क्यों कर रहे हैं आज की सफलता उनके लिए करारे तमाचे की तरह है. आज चीन वीटो शक्ति होते हुए भी भारत के सामने वेबस है तो इसके लिए साधुवाद की पात्र हमारी केंद्र सरकार है. यह जीत न केवल आतंकवाद के खिलाफ मानवता की बड़ी जीत है बल्कि इस बात की उद्घोषणा भी है कि दुनिया के क्षितिज पर एक नई महाशक्ति का उदय हो रहा है और दुनिया को यह नहीं भूलना चाहिए कि सूरज हमेशा पूरब से उगता है पश्चिम से नहीं.
मित्रों, इस समय भारत में लोकसभा का चुनाव प्रगति पर है और हम आशा करते हैं कि पूरा भारत एकजुट होकर फिर से उद्दाम देशभक्त और माँ भारती के अनन्य सेवक नरेन्द्र मोदी का राज्याभिषेक करेगा ताकि अन्दर-बाहर दोनों ही दिशाओं से भारत को सुरक्षित बनाया जा सके और १९८० के दशक का अंतर्राष्ट्रीय भिखारी भारत एक बार फिर से दुनिया का सबसे समृद्ध देश बने जैसा कि वो इतिहासकारों के अनुसार १८१३ ई. तक था. जय भारत, जय माँ भारती. तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें ना रहें.

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

प्रियंका ने क्यों छोड़ा वाराणसी का मैदान?


मित्रों, जहाँ पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की नैया डूब गई थी इस बार लगता है कि जैसे उसकी नब्ज भी डूब रही है. राहुल गाँधी की अपार असफलता के बाद बड़े ही धूमधाम से प्रियंका को पार्टी महासचिव बनाकर मैदान में उतारा गया. फिर तो कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने अपने सर पर आसमान ही उठा लिया. बड़े ही जोरदार नारे बनाए-जैसे प्रियंका गाँधी नहीं आंधी है इत्यादि. लेकिन अब जबकि चुनाव अंतिम चरण में पहुँचने को है ऐसा प्रतीत हो रहा है कि प्रियंका गाँधी आयी तो आंधी की तरह थी लेकिन जा रही है बगुले की तरह.
मित्रों, प्रियंका ने न जाने क्या सोंचकर बार-बार जनता से पूछा था कि मैं वाराणसी से लडूं क्या? निस्संदेह वो पूरी मीडिया में ऐसा करके छा भी गई. एक बार तो उसने यहाँ तक कहा कि अगर राहुल कहेंगे तो वो सहर्ष वाराणसी से चुनाव लड़ने को तैयार है लेकिन जब कल मोदी का विमान वाराणसी में लैंड कर रहा था तभी कांग्रेस ने उस गुब्बारे की जैसे हवा ही निकाल दी अजय राय को वाराणसी से पार्टी का उम्मीदवार बनाकर. यह वही अजय राय है जिसे पिछली बार मात्र ७० हजार वोट मिले थे. इस तरह कांग्रेस ने मोदी के आगे पूरी तरह से हथियार डालते हुए अपनी हार स्वीकार कर ली है.  वैसे मेरा मानना यह है कि प्रियंका इसलिए भी चुनाव लड़ने से भाग गई क्योंकि ऐसा करने पर उसे अपने पति की संपत्ति घोषित करनी पड़ती. साथ ही कांग्रेस को शुरू से ही पता था कि इस समय वाराणसी में मोदी के खिलाफ लड़ने का सीधा मतलब होगा करारी और शर्मनाक हार.
मित्रों, कारण चाहे जो भी हो अब इसे हम कांग्रेस की महामूर्खता न कहें तो क्या कहें कि कांग्रेस ने ब्लोअर की नकली हवा उत्पन्न करने की कोशिश की? अगर प्रियंका को वहां से चुनाव नहीं लड़ना था तो उसने इस बात की झूठी अफवाह क्यों उडाई? अब जबकि उसके झूठ की पोल खुल चुकी है तो कांग्रेस क्या करेगी? अब वो किस बालू के ढेर में जाकर अपना सिर छुपाएगी? उसके जख्मों पर नमक पड़ने जैसी एक और घटना कल घटी. वो यह कि मोदी के रोड शो में धर्म और जाति के सारे भेदों को त्यागकर पूरा-का-पूरा वाराणसी सड़कों पर आ गया और इतना भव्य स्वागत किया कि न भूतो न भविष्यति.
मित्रों, मैं तो पहले दिन से ही कह रहा था कि कहाँ पड़े हो चक्कर में कोई नहीं है टक्कर में लेकिन तब कांग्रेसी मेरी सुनने को तैयार नहीं थे. आज जब कांग्रेस कहीं भी टक्कर में नहीं दिख रही तब कांग्रेसियों की जैसे बोलती ही बंद हो गई है. वैसे मुझे तो पहले दिन से ही यह भी पता था कि इस बार कांग्रेस अपनी जीत के लिए नहीं लड़ रही है बल्कि मोदी को हराने के लिए लड़ रही है. वहीँ दूसरी तरफ मोदी अपनी, अपनी पार्टी और अपने देश की जीत के लिए लड़ रहे हैं. जहाँ कांग्रेस को सिर्फ-और-सिर्फ कुर्सी दिखाई दे रही है मोदी का उद्देश्य स्पष्ट है और वो है पूरी दुनिया में भारत को नंबर एक पर लाना.
मित्रों, आज जब मोदी जी ने वाराणसी से अपना नामांकन दाखिल किया है उनके और हमारे देश के लिए चीन से एक बहुत बड़ी खुशखबरी आई है. और वो खबर ऐसी है जिसे जानकर हर भारतीय को गर्व होगा और वो खबर यह है कि चीन ने पहली बार भारत के मानचित्र में अरुणाचल प्रदेश और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को दर्शाया है. आज से पांच साल पहले हम चीन के भारत के आगे झुकने की कल्पना तक नहीं कर सकते थे. मैं भारत की उस जनता का आभारी हूँ जिसने राष्ट्र सर्वोपरि को सच साबित करते हुए प्रियंका को वाराणसी छोड़कर भाग जाने को मजबूर कर दिया साथ ही उनका आह्वान करना चाहता हूँ कि क्या वो चाहती है कि भारत में भी फिर से वही सब हो जो पिछले दिनों श्रीलंका में हुआ या चीन-पाकिस्तान समेत पूरी दुनिया को भारत के क़दमों में देखना चाहती है जैसा कि इन दिनों देखने को मिल रहा है. अगर वो अपने हाथों अपने और देश के भविष्य का गला दबा देना चाहती है तो उसे जरूर विपक्ष का या नोटा का बटन दबाना चाहिए.

मंगलवार, 23 अप्रैल 2019

क्या दुनिया फिर से धर्मयुद्ध की ओर बढ़ रही है?

मित्रों, इतिहास गवाह है कि जब इस्लाम अस्तित्व में आया तो लगभग 500 सालों तक ईसाईयों और मुसलमानों के बीच रक्तरंजित युद्ध हुआ जिसको ईसाई क्रूसेड और मुसलमान जिहाद के नाम से जानते हैं. हालाँकि 1453 में यह कथित धर्मयुद्ध समाप्त हो गया लेकिन कहीं-न-कहीं दोनों धर्मों के लोगों के बीच तनाव लगातार बना रहा और छिट-पुट झडपें भी होती रहीं. हालांकि आज वैश्विक कूटनीति की स्थिति काफी जटिल है और कई मुस्लिम देश एक तरफ अमेरिका के समर्थन में हैं तो वहीँ कई मुस्लिम देशों के बीच घनघोर दुश्मनी भी है. फिर भी पिछले दिनों घटी दो घटनाओं ने दुनिया के समक्ष एक बार फिर से यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या ईसाईयों और मुसलमानों के बीच फिर से धर्मयुद्ध छिड़ गया है.
मित्रों, इस श्रृंखला में पहली घटना में पिछले महीने की १५ तारीख को न्यूजीलैंड की दो मस्जिदों में घटी जब एक स्थानीय ईसाई गोरे व्यक्ति ने शुक्रवार की नमाज पढ़ रहे लोगों पर अचानक और बेवजह गोलीबारी कर दी जिसमें ५० लोग मारे गए. पूरी दुनिया में शोक और गुस्से की लहर दौड़ पड़ी. न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री ने अपने व्यवहार और संबोधन के माध्यम से शोक में डूबे लोगों के घावों पर मरहम लगाया और तब ऐसा समझा गया कि मामला यही समाप्त हो गया. लेकिन ऐसा था नहीं.
मित्रों, दूसरे पक्ष में भी कई लोग ऐसे थे जिनका मानना था कि मुसलमानों को बदला लेना चाहिए और इसके लिए उन्होंने कदाचित हमारे पडोसी देश श्रीलंका का चुनाव किया. हालाँकि १० दिन पहले ही श्रीलंका पुलिस ने इस बात का अलर्ट जारी किया था कि श्रीलंका के गिरिजाघरों और भारतीय दूतावास पर चरमपंथी मुस्लिम संगठन हमला कर सकते हैं फिर भी हमले को रोका नहीं जा सका जिसके लिए शायद वहां के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच चल रहा सत्ता संघर्ष भी जिम्मेदार है. इस घटना में अब तक ३०० लोग मारे जा चुके हैं. श्रीलंका इस समय सन्निपात की स्थिति में है तथापि यह हमारे लिए प्रसन्नता का विषय है कि भारत के दूतावास पर हमला नहीं किया गया इसके लिए हमारी केंद्र सरकार बधाई की पात्र है जो सत्ता में आने के बाद से ही आतंकवादियों के प्रति पूरी तरह से सचेत है.
मित्रों, श्रीलंका की सरकार ने पिछले दिनों मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का अनुशरण भी किया था यह हमला शायद उसका भी दुष्परिणाम है क्योंकि इतिहास गवाह है कि मुस्लिम चरमपंथी भस्मासुर हैं और ये जिस डाल पर बैठते हैं पहले न केवल उसे काट डालते हैं बल्कि पूरे पेड़ को ही जला देते हैं. अब श्रीलंका की सरकार जो कुछ भी कार्रवाई इनके खिलाफ कर रही है उसकी तुलना हम सांप के बिल में चले जाने के बाद लाठी पटकने से कर सकते हैं.
मित्रों, अब सवाल उठता है कि श्रीलंका की घटना के तार क्या न्यूजीलैंड के हमलों से जुड़े हैं? जिस तरह से गिरिजाघरों में बम विस्फोट ठीक ईस्टर के दिन किए गए उससे तो ऐसा ही लगता है कि ये हमले न्यूजीलैंड हमलों के जवाब में किए गए. कितनी बड़ी विडंबना है कि इस कथित धर्मयुद्ध की चक्की में एक ऐसा देश पिस गया जो न तो मुस्लिम देश है और न ही ईसाई.
मित्रों, अब सवाल उठता है कि इस बारे में क्या किया जा सकता है? मेरी समझ से संयुक्त राष्ट्र संघ को अविलम्ब स्थिति के बिगड़ने और बेकाबू होने से पहले विश्व-समुदाय की बैठक बुलानी चाहिए और इस मसले पर विचार करना चाहिए जिससे दोनों पक्षों से हमलों की एक श्रृंखला न बने. साथ ही श्रीलंका के राजनैतिक दलों को अपने मतभेदों को भुलाकर देश को इस संकट से कैसे उबारा जाए पर विचार करना चाहिए और तदनुसार अपेक्षित कदम उठाने चाहिए.

शनिवार, 20 अप्रैल 2019

साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की उम्मीदवारी पर बवाल क्यों?


मित्रों, जबसे भोपाल लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी ने अपने उम्मीदवार की घोषणा की है पूरा विपक्ष जैसे सर के बल खड़े होकर विधवा-विलाप कर रहा है. कारण आप भी जानते हैं, दरअसल भाजपा ने वहां से प्रखर राष्ट्रवादी और देशभक्त साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को टिकट दिया है. यह वही प्रज्ञा सिंह ठाकुर हैं जिसे सोनिया-मनमोहन की सरकार ने भगवा आतंकवाद की झूठी व पूर्णतया परिकल्पित थ्योरी के लिए बलि का बकरा बनाने का असफल किन्तु वीभत्स प्रयास किया था.
मित्रों, हुआ यह था कि मालेगांव की मक्का मस्जिद में आठ सितंबर, 2006 को हुए विस्फोटों में 37 लोग मारे गए तथा 125 घायल हुए। मालेगांव में 29 सितंबर, 2008 को भी विस्फोट हुआ जिसमें सात लोगों की मौत हो गई। विस्फोटों की जाँच के लिए गठित एटीएस ने नौ लोगों को प्रतिबंधित संगठन सिमी का सदस्य बताते हुए गिरफ्तारी की। उसका कहना था कि इन सभी ने पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की मदद से संवेदनशील कस्बे मालेगांव में विस्फोट करवाए। गिरफ्तार लोगों के नाम थे-नूरुल हुदा, रईस अहमद, सलमान फारसी, फारुख मकदूमी, शेख मोहम्मद अली, आसिफ खान, मोहम्मद जाहिद, अबरार अहमद और शब्बीर अहमद। बाद में जांच सीबीआइ को सौंप दी गई और उसने भी एटीएस की जांच पर ही मुहर लगा दी। उधर, महाराष्ट्र एटीएस ने मुंबई पुलिस कमिश्नर हेमंत करकरे के नेतृत्व में भी इसकी समानान्तर जांच की और इस नतीजे पर पहुँची कि विस्फोटों के तार प्रज्ञा ठाकुर से जुड़े थे. साध्वी प्रज्ञा को गिरफ्तार कर लिया गया और उसे उस अपराध में शामिल होने के लिए अपनी संलिप्तता स्वीकार को बाध्य करने के लिए अंतहीन और अकल्पनीय यातना की हरेक सीमा पार कर ली गई. उसे नंगा करके उल्टा टांग कर पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा इतना पीटा गया कि उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गयी और कैंसर भी हो गया. न सिर्फ पीटा बल्कि जबरन अंडा खिलाया गया और अश्लील पोर्न विडियो दिखाया गया. मुम्बई के पुलिस कमिश्नर हेमंत करकरे पर तो जैसे धुन सवार थी कि कैसे मालेगांव कांड में उसकी संलिप्तता को किसी भी तरह और किसी भी कीमत पर यहाँ तक कि मानवता की कीमत पर भी साबित कर दे और कांग्रेस नेतृत्व की भगवा आतंकवाद की परिकल्पना को जबरन सच साबित कर दे जिससे कांग्रेस नेतृत्व खुश हो जाए.
मित्रों, बाद में हमने और आपने जब दिल्ली में सरकार बदली और जांच में हिन्दू आतंकवाद का कोई सबूत नहीं मिला तब १३ अप्रैल २०१६ को अदालत ने क्लीन चिट देकर साध्वी को रिहा करने का आदेश दिया. इसी बीच हेमंत करकरे २६/११ के मुम्बई हमले में मारा गया.
मित्रों, साध्वी को क्लीनचिट देने का अर्थ है कि बमकांड में उनके ख़िलाफ़ जांच एजेंसियों के पास ऐसे सबूत नहीं थे, जिससे उन्हें दोषी साबित किया जा सकता। इसका यह भी मतलब होता है कि साध्वी और अन्य दूसरे पांच आरोपियों को बिना ठोस सबूत के ही गिरफ़्तार कर लिया गया था। यानी जिस अपराध ने उनकी ज़िंदगी के आठ कीमती साल छीन लिए, उस अपराध को उन्होंने किया ही नहीं था।
मित्रों, अब आप ही बताईए कि भाजपा ने भोपाल से साध्वी को टिकट देकर क्या गलत किया? हमारे देश की पुलिस कैसे काम करती है इसके बारे में मैं आपको अपनी एक आपबीती सुनाना चाहूँगा. हुआ यह कि मैं अपना घर बनवा रहा था और वो भी हाजीपुर में वैशाली महिला थाने के पीछे. थानेदार थी पूनम कुमारी. अब उसका प्रोन्नति देकर तबादला हो चुका है. मैंने घर बनाने के दौरान ईटें मंगवाई. काम कुछ कारणों से रूका हुआ था. एक दिन सुबह जब मैं निर्माण-स्थल पर पहुंचा तो पाया कि मेरी ईटें गायब है. मैंने थाने में पूछा तो कोई बताने को तैयार नहीं. फिर मैंने देखा कि थाने में फूलों के नए पौधे लगाए गए हैं और उनकी घेराबंदी के लिए मेरी ईटें लगा दी गई हैं. फिर मैंने मजदूर बुलवाए ईंटें उठवाने के लिए. मजदूरों को देखते ही महिला थानेदार मुझे गालियाँ देने लगीं और धमकी दी कि बलात्कार के झूठे में मुकदमे में फंसा देगी. फिर मैंने पहले बिहार के डीजीपी को और फिर वैशाली एसपी गौरव कुमार को फोन किया. पत्रकार होने के कारण दोनों मुझसे परिचित थे. गौरव जी ने फोन उठाया और फोन करने का कारण पूछा. फिर उन्होंने थानेदारनी को फोन पर वो डांट लगाई कि वो कमरे की सिटकनी अन्दर से बंद करके कैद हो गयी.
मित्रों, अब आप ही बताईए कि अगर मैं पत्रकार नहीं होता तो मेरा क्या होता और मैं आज कहाँ होता? एक बार हाजीपुर, हिंदुस्तान के तत्कालीन ब्यूरो चीफ मानपुरी जी ने मुझे बताया था कि उनके पास ऐसी सैंकड़ों सच्ची कहानियां हैं जिनमें पुलिस ने ऐसे लोगों को हत्या-डाका आदि मामलों में गिरफ्तार किया और सजा दिलवाई जिनका उन मामलों से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध ही नहीं था. अगर हमारी न्यायपालिका, सीबीआई, पुलिस आदि सही होती तो सरेआम राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कनाट प्लेस में हत्या कर दी गई जेसिका लाल मामले में कोर्ट यह नहीं कहती कि जेसिका की हत्या तो हुई मगर उसकी किसी ने हत्या नहीं की. इसी तरह न जाने पुलिस द्वारा रिश्वत लेकर हमारे देश में कितनी हत्याओं को आत्महत्या में बदल जा चुका है.
मित्रों, अब बात करते हैं कांग्रेस की. कांग्रेस के बारे में जितना कहा जाए उतना ही कम है. कांग्रेस पूरी तरह से हिन्दू-विरोधी पार्टी है और भारत को हिन्दू-विहीन बनाना चाहती है. कांग्रेस को पता ही नहीं था कि भाजपा आधुनिक जयचंद दिग्विजय सिंह के खिलाफ उसी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को चुनाव में खड़ा कर देगी जिस पर अपने हिन्दू-विरोधी एजेंडे को पूरा करने के लिए उसने अनगिनत जुल्म करवाए थे. ऐसा भी नहीं है कि मैंने कभी कांग्रेस को आदतन मुफ्त की सलाह नहीं दी लेकिन हम करें तो क्या करें-
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम. लोचनाभ्याम विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति.
अब कांग्रेस की प्रज्ञा यानि बुद्धि को बहन प्रज्ञा सिंह ठाकुर ही ठिकाने पर लाएगी और ठिकाने पर लाएगी भारत की सवा अरब जनता.

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

श्रद्धा, भक्ति और मोदी


मित्रों, एक बार फिर से भारत में लोकसभा चुनाव प्रगति पर है और एक बार फिर से नरेन्द्र मोदी भारत का प्रधानमंत्री बनने को ओर अग्रसर हैं.  ऐसा मैं ही नहीं बल्कि सारे सर्वे भी कह रहे हैं और इसका कारण यह है कि मोदी जी ने पिछले ५ सालों में जितने दुश्मन बनाए हैं उससे कहीं अधिक संख्या में उनसे श्रद्धा करने वाले लोग उनके प्रशंसक बन गए हैं.
मित्रों, कुछ लोग कहते हैं कि मोदी जी ने प्रयत्नपूर्वक अपने श्रद्धालु बनाये हैं जबकि हिंदी के सार्वकालिक सबसे बड़े आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ऐसा मानते हैं कि श्रद्धा स्वतःस्फूर्त होती हैं. वे कहते हैं कि किसी मनुष्य में जनसाधारण से विशेष गुण या शक्ति का विकास देख उसके सम्बन्ध में जो एक स्थायी आनंद-पद्धति ह्रदय में स्थापित हो जाती है उसे श्रद्धा कहते हैं. श्रद्धा महत्व की आनंदपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य-बुद्धि का संचार है. यदि हमें निश्चय हो जाएगा कि कोई मनुष्य बड़ा वीर, बड़ा सज्जन, बड़ा गुणी, बड़ा दानी, बड़ा विद्वान, बड़ा परोपकारी व बड़ा धर्मात्मा है तो वह बड़े आनंद का एक विषय हो जाएगा. हम उसका नाम आने पर प्रशंसा करने लगेंगे, उसे सामने देख आदर से सिर नवाएंगे, किसी प्रकार का स्वार्थ न रहने पर भी हम सदा उसका भला चाहेंगे, उसकी बढती से प्रसन्न होंगे और अपनी पोषित आनंद-पद्धति में व्याघात पहुँचने के कारण उसकी निंदा न सह सकेंगे. इससे सिद्ध होता है कि जिन कर्मों के प्रति श्रद्धा होती है उनका होना संसार को वांछित है. यही विश्व-कामना श्रद्धा की प्रेरणा का मूल है.
मित्रों, आप कहेंगे कि लोग मोदी जी से प्रेम करने लगे हैं और प्रेम तो अँधा होता है तो इस बारे में आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि प्रेम और श्रद्धा में अंतर यह है कि प्रेम प्रिय के स्वाधीन कार्यों पर उतना निर्भर नहीं-कभी-कभी किसी का रूप मात्र,जिसमें उसका कुछ हाथ भी नहीं, उसके प्रति प्रेम उत्पन्न होने का कारण होता है. पर श्रद्धा ऐसी नहीं है. किसी की सुन्दर आँख या नाक देखकर उसके प्रति श्रद्धा नहीं उत्पन्न होगी, प्रीति उत्पन्न हो सकती है. प्रेम के लिए इतना ही बस है कि कोई मनुष्य हमें अच्छा लगे; पर श्रद्धा के लिए आवश्यक यह है कि कोई मनुष्य किसी बात में बढ़ा हुआ होने के कारण हमारे लिए सम्मान का पात्र हो. श्रद्धा का व्यापार-स्थल विस्तृत है, प्रेम का एकांत. प्रेम में घनत्व अधिक है और श्रद्धा में विस्तार.
मित्रों, जहाँ तक भक्ति का सवाल है तो आचार्य शुक्ल के अनुसार श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है. जब पूज्यभाव की वृद्धि के साथ श्रद्धा-भाजन के सामीप्य-लाभ की प्रवृत्ति हो, उसकी सत्ता के कई रूपों के साक्षात्कार की वासना हो, तब ह्रदय में भक्ति का प्रादुर्भाव समझना चाहिए.
मित्रों, अब आप ही बताईए कि अगर कोई मोदी जी के प्रति श्रद्धा रखता है तो क्या ऐसा वो अपनी मर्जी से करता है या फिर मोदी जी के कर्म ही ऐसे हैं जो उसे ऐसा करने के लिए उसे बाध्य करते हैं? जहाँ तक मोदी जी की भक्ति करने का सवाल है तो जैसा कि हमने देखा कि जब श्रद्धा में प्रेम भी मिश्रित हो जाता है तो उसे भक्ति कहते हैं. अब अगर देश की जनता ऐसा कर रही है तो इसके लिए मोदी जी कहाँ से और कैसे दोषी हो गए? भारत एक आजाद मुल्क है, प्रत्येक नेता जनता के मन-मंदिर में अपना स्थान बनाने को स्वतंत्र है. अब कोई निरंतर गर्हित कार्यों में लगा रहे और फिर भी ऐसी उम्मीद करे कि जनता मोदी जी को छोड़ कर उसकी भक्ति करे और ऐसा न होने पर मोदी जी के प्रति ईर्ष्या रखने लगे तो रखे उसकी मर्जी लेकिन ऐसा करके वो खुद अपने ही स्वास्थ्य की हानि करेगा और बदले में कुछ सार्थकता प्राप्त भी नहीं कर पाएगा. चोर-चोर चिल्लाने से कोई चोर साध नहीं हो जाता बल्कि इसके लिए उसे सन्मार्ग पर और त्याग के मार्ग पर चलना भी होगा. सबकुछ छोड़ कर ही सबकुछ पाया जा सकता है.

गुरुवार, 11 अप्रैल 2019

इमरान के बयान के पीछे की चाल


मित्रों, मैं हमेशा से मानता रहा हूँ कि कूटनीति में पाकिस्तान का जवाब नहीं. वो ६५ की लडाई मैदान में हार जाता है लेकिन बातचीत की मेज पर मजे से जीत जाता है. साथ ही हमारे प्रधानमंत्री बेहद संदेहास्पद परिस्थितियों में मृत पाए जाते हैं. इसी तरह से ७१ की लडाई हार जाता है, उसके दो टुकड़े हो जाते हैं लेकिन एक बार फिर से बातचीत की मेज पर जीत उसी की होती है. १९९९ में विमान का अपहरण होता है. पाकिस्तानी ही अपहरण करते हैं. बातचीत में मध्यस्थ भी पाकिस्तान ही होता है. छोड़ा भी पाकिस्तानी आतंकवादियों को जाता है. है न गजब. मुझे याद है कि कारगिल की लडाई के समय वाजपेयी जी की सरकार ने एक ऑडियो जारी किया था. जिसमें चीन की यात्रा पर गए पाकिस्तान के तत्कालीन सेनाध्यक्ष पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री से फोन पर बात करते हैं. नवाज शरीफ कहते हैं कि भारत आरोप लगा रहा है कि हमने घुसपैठ की है और उसकी चोटियों पर कब्ज़ा जमा लिया है. तब मुशर्रफ कहता है कि आप ऐसे क्यों नहीं कहते कि वे पाकिस्तानी सैनिक नहीं हैं बल्कि मुजाहिदीन हैं.
मित्रों, इन दिनों जब भारत में लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं तब उसी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने बयान दिया है कि भारत में अगर नरेन्द्र मोदी चुनाव जीत जाते हैं तो सबसे ज्यादा ख़ुशी उन्हें होगी. हद तो यह है कि हमारे कुछ राजनेता जो इमरान खान को महापवित्र और सत्यवादी मानते हैं काफी उछल रहे हैं. जबकि मैंने समझता हूँ कि पाकिस्तान का कोई भी नेता या अधिकारी जब भी बोलता है उल्टा ही बोलता है और झूठ ही बोलता है. क्यांकि पाकिस्तान कभी भारत का भला चाह ही नहीं सकता,भारत के भले के बारे में सोंच ही नहीं सकता फिर इमरान खान को तो वहां का प्रधानमंत्री बनाया ही वहां की सेना ने है. ऐसे में उनके बयान को सीधे-सीधे लेना हमारे लिए न केवल मूर्खता होगी बल्कि खतरनाक भी होगा.
मित्रों, इस बीच बालाकोट एयर स्ट्राइक के ४३ दिनों के बाद पश्चिमी पत्रकारों को उस मदरसे की यात्रा करवाई गई है जिस पर भारतीय वायुवीरों ने २६ फरवरी को हमला किया था.मगर पत्रकारों को चुनिन्दा स्थानों तक ही ले जाया गया और किसी से बात नहीं करने दी गई जबकि पाकिस्तान ने हमले के कल होकर ही कहा था कि वो पत्रकारों को उसी दिन वहां ले जाएगा. इस बीच जब रायटर के संवाददाता कई हफ्ते बाद वहां पहुंचे तो उनको भगा दिया गया. सवाल उठता है कि अगर हमला हुआ ही नहीं तो पाकिस्तान को पत्रकारों को वहां ले जाने में ४३ दिन क्यों लगे और मीडिया को वहां पढ़ रहे बच्चों से बात क्यों नहीं करने दिया गया? क्या इमरान के पास इन सवालों का जवाब है?
मित्रों, इमरान कहता है कि मोदी अगर जीतते हैं तो कश्मीर-समस्या हल करने में सहूलियत होगी. कितना शरारती बयान है ये? जबकि सच्चाई तो यह है कि जहाँ एक तरफ पाकिस्तान मोदी से बातचीत करने को बेहाल है वहीँ मोदी तो कश्मीर के मामले में पाकिस्तान को पार्टी या फरीक मानते ही नहीं बल्कि कश्मीर मुद्दे को वो भारत का आंतरिक मामला मानते हैं. हाँ, मोदी की वापसी के बाद कश्मीर-समस्या जरूर हल होगी और वो इस तरह कि आतंकवाद का अंत हो जाएगा-कश्मीर से भी और पाकिस्तान से भी. ज्यादा से भी ज्यादा लगभग पूरी सम्भावना तो यह है कि मोदी की वापसी के बाद शायद पाकिस्तान ही नक्शे से गायब हो जाए.जहाँ तक मुझे लगता है कि चूंकि पीएम मोदी पिछले दिनों चुनाव प्रचारों में यह कहते रहे हैं कि अगर वे हार जाते हैं तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे इसलिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से कांग्रेस और भाजपा विरोधी अन्य दलों ने संपर्क करके इमरान खान से ऐसा बयान दिलवाया है जिससे विपक्ष को यह कहने का मौका मिल सके कि देखो पाकिस्तान क्या चाहता है अर्थात पाकिस्तान के हित में किसकी जीत है.
मित्रों, मैं इस लोकसभा चुनाव में जिस व्यक्ति की सबसे ज्यादा कमी महसूस कर रहा हूँ वो है कांग्रेस नेता मणिशंकरअय्यर. बंदा न जाने कहाँ चला गया? क्या अब वो पाकिस्तान से मदद नहीं मांगेगा मोदी को हटाने में? हो सकता है उसी के कहने पर इमरान ने यह शरारतपूर्ण बयान दिया हो और बंदा पाकिस्तान में ही अड्डा जमाए बैठा हो.
मित्रों, मैं कांग्रेस पार्टी से पूछना चाहता हूँ कि जिस प्रशांत भूषण को आगे करके वो राफेल का खेल खेल रही है क्या वो नहीं जानती कि कश्मीर के बारे में उसके ख्याल कितने खतरनाक हैं? वैसे खतरनाक ख्याल तो कांग्रेस के भी हैं न सिर्फ कश्मीर के बारे में बल्कि पूरे भारतवर्ष के बारे में.
मित्रों, अंत में मैंने मुज़फ्फरनगर में जो देखा उसका जिक्र करना चाहूँगा. लगभग सारे सजीव चुनाव प्रसारण हमारे कॉलेज श्रीराम कॉलेज से ही प्रसारित हुए. एक दो को छोड़कर किसी में भी रालोद उम्मीदवार अजित सिंह ने अपना प्रतिनिधि नहीं भेजा. लेकिन कांग्रेस के प्रतिनिधि सारे कार्यक्रमों में आए जबकि अजीत सिंह जिस गठबंधन का हिस्सा हैं कांग्रेस उसमें है ही नहीं. इतना ही नहीं कांग्रेस प्रतिनिधि लगातार बिन बुलाए मेहमान की तरह आकर भाजपा के खिलाफ बोलते रहे. सवाल उठता है कि कांग्रेस ने जब यहाँ से अपना उम्मीदवार ही नहीं दिया और वो गठबंधन में भी नहीं है तो फिर वो कूद-फांद क्यों कर रही है? सच्चाई तो यह है कि हिन्दुकूश पर्वत से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक और जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारतविरोधी तत्व एकजुट हो गए हैं और चाहते हैं कि किस तरह से मोदी को हराकर भारत को विकसित और मजबूत होने से रोका जाए और पापिस्तान की रक्षा की जाए. जाहिर है पापिस्तान का नापाक प्रधानमंत्री इमरान खान भी इस खेल में शामिल हैं.

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

जीतेगा मोदी जीतेगा भारत


मित्रों,आप जानते हैं कि भविष्यवाणी करना काफी कठिन काम है और फिर जब बात भारत के चुनावों की हो तब तो बड़े-बड़े विश्लेषक भी भविष्यवाणी करने से डरते हैं.  फिर भी पिछले दिनों जो सर्वेक्षण सामने आ रहे हैं और मैं खुद भी जितने लोगों से मिला हूँ उसके आधार भी यह बिना किसी लाग-लपेट के कहा जा सकता है कि इस बार के लोकसभा चुनावों में निश्चित रूप से वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शानदार वापसी करने जा रहे हैं.
मित्रों, कांग्रेस और भाजपा सहित सभी प्रमुख दलों का घोषणापत्र सामने आ चुका है और अगर हम दोनों दलों के घोषणापत्रों की तुलना करें तो स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ भाजपा के पास दूरदृष्टि और भारत के तीव्र व सर्वांगीण विकास का पूरा खाका है वहीँ कांग्रेस के पास सिर्फ झूठ, लालच और फरेब है. कांग्रेस कितनी झूठी पार्टी है और कितनी वादाखिलाफ है यह उन तीनों राज्यों में उसकी सरकार के कामकाज से भी जनता जनार्दन के सामने प्रकट हो चुका है जिन तीन राज्यों में हाल में उसने चुनाव जीते थे. उन तीनों राज्यों में जनता के साथ जबरदस्त धोखा हुआ है.
मित्रों, यह कांग्रेस देशद्रोह को अपराध नहीं मानती और इसकी धारा को ही समाप्त कर देने का वादा उसने अपने घोषणापत्र में किया है जबकि देशद्रोह से बड़ा कोई अपराध हो ही नहीं सकता. इसी तरह कांग्रेस ने धारा ३७० की रक्षा करने का वादा भी किया है जबकि भाजपा ने इसे समाप्त करने का और कश्मीर की रक्षा करने का वादा किया है और पिछले दिनों मोदी सरकार ने इस धारा में कुछ बदलाव किए भी हैं.
मित्रों, सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस भारतीयों को कुत्ता समझती है कि वो ७२००० के लालच में उसके पीछे भाग लेंगे और देश को एक बार फिर से बहुरूपिये लुटेरों के हवाले कर देंगे? सवाल यह भी उठता है कि भारतीय भारत की जय चाहते हैं या चीन और पाकिस्तान की जो इस समय कांग्रेस की ही तरह मोदी सरकार की हार की मन्नतें मांग रहे हैं और कांग्रेस जिनकी गोद में बैठी है? मैं नहीं समझता कि वर्तमान भारत की जनता इतनी मूर्ख है कि वो कांग्रेस पार्टी के फरेब को समझ नहीं सके. वो यह अच्छी तरह से जानती है कि कांग्रेस को गरीबों से नहीं बल्कि उनकी गरीबी से प्यार है. कांग्रेस को कालाधन और भ्रष्टाचार से भी बेईन्तिहाँ मुहब्बत है और वो खुद तो भ्रष्ट है ही उसके सारे सहयोगी भी जाने-माने भ्रष्ट हैं और एक-से-बढ़कर-एक भ्रष्ट हैं. साथ ही तीसरे मोर्चे में भी सिर्फ-और-सिर्फ भ्रष्टाचारियों का जमावड़ा है. इन दलों का उद्देश्य कहीं से भी जनहित और देशहित नहीं है बल्कि इनका सिर्फ एक ही एजेंडा है कि कैसे मोदी को हराया और हटाया जाए और खुद को जेल जाने से बचाया जाए. जो दल मोदी सरकार पर कालाधन के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने के आरोप लगा रहे थे वही दल मध्य प्रदेश में बदले की भावना से कमलनाथ के निकटतम सहयोगियों पर आयकर का छापा पड़वाने के आरोप लगा रहे हैं. अभी कल ही कांग्रेस के दत्तक पुत्र माओवादियों ने कांग्रेसशासित दंतेवाडा में भाजपा विधायक की हत्या कर दी है और उनके साथ हमारे ५ सीआरपीएफ जवान भी शहीद हो गए हैं. साथ ही कल जम्मू-कश्मीर में प्रखर राष्ट्रवादी चंद्रकांत शर्मा जी की भी जेहादियों ने हत्या कर दी है. ऐसे में अगर कांग्रेस की सरकार बनती है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि वो पूरे देश को माओवादियों और जेहादियों के हवाले कर देगी. साथ ही दोनों हाथों से लूटेगी सो अलग. और तब शायद आपके पास पछताने तक का भी समय न रहे.
मित्रों, पिछले दिनों घटे घटनाक्रम से यह स्वतः स्पष्ट है कि चौकीदार चोर नहीं है बल्कि चौकस है न सिर्फ सीमा पर बल्कि देश के भीतर सत्ता में रहकर देश को लूटनेवालों पर भी उनकी पैनी नजर है. उसने न सिर्फ सैनिकों के साजो-सामान पर ध्यान दिया है बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में परिवहन के साधन भी विकसित किए हैं जिससे चीन के किसी भी संभावित हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके. इसके साथ ही किसानों को वेतन,मजदूरों को पेंशन, उज्ज्वला, आयुष्मान, सीधे खाते में सब्सिडी, रेलवे की रफ़्तार बढाने, नई रेल लाईनें बिछाने और पुरानी लाईनों के दोहरीकरण, तीव्र गति से सड़क-निर्माण, बिजली की कमी को पूरी तरह से दूर करने की दिशा में भी इस सरकार ने काफी सराहनीय काम किया है इसमें कोई संदेह नहीं. मैं मानता हूँ कि रोजगार-सृजन कम हुआ है लेकिन मैं पहले भी कह चूका हूँ कि आज भारत दुनिया में सबसे ज्यादा विदेशी प्रत्यक्ष निवेश प्राप्त करनेवाला देश बन चुका है और पूँजी आ रही है तो रोजगार भी आ रहा है बस थोड़े दिनों तक धैर्य रखने की आवश्यकता है.
मित्रों, परसों से मतदान का महापर्व शुरू होनेवाला है. आप सभी देशवासियों से मैं अपील करता हूँ कि आपलोग इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लें और भारत की पूरी दुनिया पर जीत और भारत के विश्वगुरु बनने के मार्ग को फिर से प्रशस्त करें. फिर से कमल खिलाएँ और खूनी पंजे से देश को बचाएँ. मेरे इस आह्वान में मेरा कोई स्वार्थ नहीं है बल्कि सबका सवा सौ करोड़ भारतियों का स्वार्थ है. मैं आज तक किसी भी पार्टी का सदस्य नहीं रहा हूँ और न ही किसी दल से कभी एक पैसे का लाभ ही प्राप्त किया है. मेरे लिए मेरा देश सर्वोपरि और सर्वस्व था, है और हमेश रहेगा. वन्दे मातरम, भारतमाता की जय.

रविवार, 31 मार्च 2019

यह आचार संहिता है या लाचार संहिता


मित्रों, जब संविधान निर्माण का महान कार्य संपन्न हो रहा था तब हमारे संविधान-निर्माताओं ने सपने में भी सोंचा नहीं होगा कि एक दिन ऐसा आएगा जब गरीबों के लिए चुनाव लड़ना चाँद को छूने के समान नामुमकिन हो जाएगा.
मित्रों, जब हम बच्चे थे तो सुनते थे कि यह नेता पहले बकरी चराता था और पैदल ही बिना एक पैसा खर्च किये न सिर्फ चुनाव लड़ा थे बल्कि जीत भी हासिल की थी. बड़े ही खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि वर्तमान समय में कोई गरीब व्यक्ति लोकसभा तो दूर की बात रही ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत वार्ड सदस्य का चुनाव लड़ना भी पहुँच से बाहर हो चुकी है. आज पंचायत चुनावों में भी एक-एक ग्राम प्रधान उम्मीदवार एक-एक करोड़ रूपये खर्च कर रहे हैं. अब आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं कि जब पंचायत चुनावों में ऐसी हालत है तो विधानसभा और लोकसभा चुनावों में क्या हालत रहती होगी और किस स्तर पर धनबल का प्रयोग होता होगा आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं.
मित्रों, ऐसा भी नहीं है कि चुनाव आयोग इस समस्या से अनभिज्ञ है. उसने प्रत्येक स्तर के चुनाव के लिए खर्च की सीमा तय कर रखी है. उम्मीदवारों से खर्च का लिखित हिसाब भी लिया जाता है लेकिन वास्तविकता तो यह है कि सबकुछ दिखावा होता है, औपचारिकता होती है. चुनावों के दौरान पैसे जब्त भी होते हैं लेकिन वो बहुत कम होते हैं.
मित्रों, कहने को तो चुनावों की घोषणा के साथ ही आचार-संहिता लागू हो जाती है लेकिन उनका पालन नहीं होता. कई बार उद्दण्ड उम्मीदवारों के खिलाफ आचार-संहिता उल्लंघन के मुकदमे भी दर्ज होते हैं लेकिन आज तक किसी नेता को इन मामलों में सजा मिली हो देखा नहीं गया. मैं पूछता हूँ कि आखिर क्या आवश्यकता है ऐसी आचार-संहिता की जो वास्तव में लाचार-संहिता हो? कहना न होगा कि जैसे हमारे देश में कानून बनते ही टूटने के लिए हैं.
मित्रों, भारतीय लोकतंत्र में विकसित हो चुकी एक और प्रवृत्ति भी काफी चिंता का विषय है. पिछले कुछ सालों में पार्टियाँ पैसे लेकर टिकट बेचने लगी हैं. बोली लगती है और जो जितना ज्यादा पैसा देता है उसे टिकट दे दिया जाता है. फिर जीतनेवाला एक तो टिकट खरीदने का दाम और दूसरा चुनाव लड़ने का खर्च भ्रष्टाचार द्वारा जनता से वसूलता है. टूटी सड़कें,सुख-सुविधाओं का अभाव,सांसद-निधि की लूट सबके पीछे यही कारण है. 
मित्रों, ऐसा नहीं है कि इस तरह की स्थिति के लिए हमलोग यानि आम जनता बिलकुल ही जिम्मेदार नहीं हैं. हम भी तो चुनावों के आते ही इन्तजार में होते हैं कि उम्मीदवार आएँ और हमें पैसे या कोई अन्य सामान दें. चूंकि हमारे पूर्वज हमारी तरह लालची नहीं थे इसलिए उनके ज़माने में बकरी चरानेवाले लोग भी चुनाव जीत जाते थे. हमने अपने लालच द्वारा खुद ही खुद के लिए ऐसी स्थिति पैदा कर ली है कि अब खुद हम ही चाहकर भी चुनाव लड़ नहीं सकते क्योंकि बिना पैसा खर्च किए जो चुनाव लडेगा वो आज के हालात में निश्चित रूप से हारेगा क्योंकि उसे निर्दलीय लड़ना पड़ेगा क्योंकि उसके पास टिकट खरीदने के लिए पैसे नहीं होंगे. 

गुरुवार, 28 मार्च 2019

साँपों और कांग्रेसियों से सावधान


मित्रों, आप सोंच रहे होंगे कि लोग तो कुत्ते से सावधान का बोर्ड लगवाते हैं फिर साँपों से सावधान क्यों? वो इसलिए क्योंकि कुत्ता वफ़ादारी का प्रतीक होता है. मर भले ही जाता है कभी मालिक के प्रति धोखेबाजी नहीं करता. मतलब कि कुत्ता जिसकी रोटी खाता है जीता भी उसी के लिए है और मरता भी उसी के लिए है लेकिन यह जो कांग्रेस पार्टी है खाती तो भारत की है गाती पाकिस्तान और चीन की है. इसने तो रिकार्डतोड़ घोटालों के द्वारा न केवल भारत का खाया है वरन भारत को भी खाया है. कांग्रेस पार्टी जब सत्ता में थी तब भी पाकिस्तान और चीन के लिए जीती-मरती थी और आज जब विपक्ष में है तब भी भारत के दुश्मनों के ही लिए जी-मर रही है. इसे न तो भारत की मजबूत सेना चाहिए और न ही सेना का पराक्रम.
मित्रों, इसलिए मैंने शीर्षक में कुत्ते का नाम नहीं लिया. नाम तो मैं साँपों का भी नहीं लेना चाहता था क्योंकि वो बेचारा भी तब तक किसी को नहीं काटता जब तक उसे छेडा न जाए लेकिन एक बात में कांग्रेस और साँपों में जबरदस्त समानता है कि जहरीले दोनों ही हैं. एक सीधे-सीधे काटता है तो दूसरा लोगों में अपने जाल में उलझाकर मारता है.
मित्रों, अभी कुछ दिन पहले मैं एक चूहेदानी खरीदकर लाया और उसमें रोटी लगा दी. फिर तो चूहों का फंसना रोजाना की बात हो गई. कदाचित कांग्रेस भी हमें चूहा समझती है. नेहरु के समय से ही यह देश से गरीबी को मिटाने का वादा कर रही है लेकिन अमीर हो रहे हैं खुद कांग्रेस पार्टी के नेता. अभी कुछ ही महीने पहले कांग्रेस ने राजस्थान और मध्य प्रदेश में किसानों की कर्जमाफ़ी का वादा किया था. मगर किया क्या? प्रत्येक किसान के दो-दो लाख माफ़ करने के बदले किसी के ५० रूपये माफ़ किए गए तो किसी के १०० रूपये. ऊपर से बिजली का बिल न्यूनतम ५०० रूपया महीना बढ़ा दिया गया. बेटा मांगने गई थी और पति को भी गँवा आई. मध्य प्रदेश की सरकार बेरोजगारों को रोजगार अथवा १०००० रूपये का बेरोजगारी भत्ता देने के बदले भैंस चराने और बैंड बजाने का प्रशिक्षण दे रही है. कहना न होगा इसी तरह हम उनके दांव में पिछले ७० सालों से फंसते आ रहे हैं और वे इसी तरह हमें चराते आ रहे हैं और हमारी बैंड बजाते आ रहे हैं. अब दोनों ही राज्यों के लोग पछता रहे हैं लेकिन अब पछताए होत क्या.
मित्रों, अगर आपको भी भविष्य में पछताना है तो बेशक आप भी कांग्रेस को वोट करिए. मगर उससे पहले मैं आपको कुछ और भी याद दिलाना चाहूँगा. मैं आपको याद दिलाना चाहूँगा कि २००४ के चुनावों के समय किस तरह कांग्रेस ने ताबूत घोटाले की कहानी रचकर आपको बेवकूफ बनाया था और देशभक्त और ईमानदार अटल बिहारी वाजपेई के स्थान पर एक कठपुतली को प्रधानमंत्री बनाकर जल,थल, नभ और अंतरिक्ष सर्वत्र कैसे जमकर घोटाले किए थे. घोटालों की पूरी-की-पूरी वर्णमाला बनाकर देश को दोनों हाथों से लूटा था. मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि क्या आप फिर से २००४ को दोहराना पसंद करेंगे? जिस तरह वाजपेई की हार के कारण भारत कई साल पीछे चला गया क्या आप चाहेंगे कि देश फिर भी रिवर्स गियर में चला जाए?
मित्रों, भारत मेहनतकशों का देश है, कर्मवीरों, श्रमवीरों का देश है लेकिन यह कांग्रेस पार्टी हमें हमेशा से भिखारी समझती है. यह हमें काम देने की बात नहीं कर रही बल्कि भीख देने के वादे कर रही जबकि हम भारतीय तो आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाते. क्या आपने कभी पढ़ा-सुना है कि पैसे बांटकर किसी देश का विकास हुआ है,चाहे तो अमेरिका हो, जापान हो या चीन या जर्मनी हो? माना कि गाँव में किसी किसान की ५ एकड़ जमीन है. अगर वो सारी जमीन बेचकर अपने ५ बेटों के बीच पैसे बाँट देता है और पाँचों बेटे उस पैसे को उड़ा देते हैं तो क्या आप इसे उस किसान और उसके बेटों की बुद्धिमानी कहेंगे? 
मित्रों, असल में कांग्रेस को लगता है कि हम उसकी गन्दी सोंच से वाकिफ ही नहीं हैं. जैसे हमें पता ही नहीं कि कांग्रेस राजस्थान और मध्य प्रदेश में क्या कर रही. जबकि सच यह है कि हम समझ रहे कि कांग्रेस सिर्फ-और-सिर्फ झूठ बोल रही है. कांग्रेस जब देश की नहीं हुई और पाकिस्तान की टीवी पर अपनी जय-जयकार करवा कर खुश हो रही है तो वो देशवासियों का क्या होगी? चूंकि कांग्रेस के सारे जहरीले सांप जल्दी ही पिंजरे में जानेवाले हैं और जमानत पर हैं इसलिए फ़िलहाल तो वे किसी भी तरह, कोई भी संभव-असंभव वादा करके जेल जाने से बचना चाहते हैं. इसलिए आप ७२००० के लालच को लालच नहीं सीधे चूहेदानी में रखा चारा समझिए जिसके लालच में आए तो हम उनका ग्रास बन जाएँगे क्योंकि वे नकली हिन्दू सह गोभक्षी हमें भी बिना पकाए जिन्दा खा जाएँगे और हमारे देश को भी.

गुरुवार, 14 मार्च 2019

कांग्रेस के तुरुप का आखिरी पत्ता प्रियंका वाड्रा

मित्रों, पिछले कई सालों से भारत की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस अजीब संक्रमण और संकट की स्थिति से गुजर रही है. राजीव गाँधी की हत्या के बाद पार्टी को जब लगा कि फिर से पार्टी की बागडोर नकली गाँधी परिवार के हाथों में सौंपे बिना पार्टी का पुनरुत्थान नहीं हो सकता तब १९९८ में वयोवृद्ध अध्यक्ष सीताराम केसरी को जबरदस्ती हटाकर सोनिया गाँधी को पार्टी अध्यक्ष बना दिया गया. इसी बीच जैसे बिल्ली के भाग्य से छींका टूटता है वैसे ही २००४ के लोकसभा चुनावों के समय भारतीय जनता पार्टी द्वारा की गई अक्षम्य गलतियों के चलते कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई. इसी बीच सोनिया गाँधी ने सही अवसर को भांपते हुए २००७ में अपने बेटे राहुल गाँधी को पार्टी महासचिव बना दिया. इससे पहले कई बार राहुल गाँधी की लौन्चिंग के कयास लगे लेकिन हर बार वह टालती रही. हर बार यह कहा गया कि अभी राहुल राजनीति का ककहरा सीख रहे हैं. २००७ में राहुल गाँधी के आगमन के कुछ सालों के भीतर ही ऐसा प्रतीत होने लगा कि राहुल गाँधी कतई तुरुप का पत्ता नहीं हैं बल्कि जोकर हैं और उनमें वो दम नहीं है जिसके दम पर वे कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व संभाल सकें. बाद में जब इंतज़ार की हद हो गई तब थक हार कर राहुल गाँधी को २०१७ में यानि पिछले साल पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया. इस बीच २००९ में पार्टी की जीत का श्रेय बेवजह इन्हीं राहुल गाँधी को दिया गया जबकि पार्टी जीती थी मनमोहन सरकार के कामकाज से.
मित्रों, इसी बीच मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में अभूतपूर्व घोटालों के चलते कांग्रेस बदनाम हो गयी और देश की जनता ने उसे ४४ पर समेट दिया. पार्टी इतनी बुरी तरह से हारी कि भारत के इतिहास में पहली बार उसे प्रतिपक्षी पार्टी तक का दर्जा नहीं मिला. तभी से जब भी पार्टी जीतती है तो पार्टी के लोग कहते हैं कि जीत का श्रेय सिर्फ राहुल जी को जाता है और जब भी पार्टी हारती है तो कहा जाता है कि पार्टी अपनी गलतियों या इवीएम के कारण हारी है न कि राहुल गाँधी के चलते.
मित्रों, अभी कुछ दिन पहले जब कांग्रेस यह समझने लगी कि पार्टी की नैया लोकसभा चुनावों में पार लगाना अकेले राहुल गाँधी के वश की बात नहीं है तब उनकी छोटी बहन प्रियंका गाँधी को तुरुप के आखिरी पत्ते के रूप में ७ फरवरी २०१९ को पार्टी का महासचिव बना दिया गया. एक लम्बे इंतजार और गैरहाजिरी के बाद अभी कुछ दिन पहले से प्रियंका ने पार्टी के प्रचार करना शुरू किया है. इस बीच यह दावा भी किया गया कि उनकी नाक की लन्दन में प्लास्टिक सर्जरी करवाई गई है ताकि उनकी नाक देखने में उनकी दादी इंदिरा गाँधी की तरह लगे. उनकी पुरानी तस्वीर को देखकर ऐसा लगता भी है कि शायद ऐसा करवाया गया है. लेकिन पिछले कुछ दिनों में उनके द्वारा दिए गए भाषण को देखकर ऐसा लगता नहीं है कि प्रियंका अपनी दादी की छाया मात्र भी है दादी जैसी होना तो बहुत दूर की बात रही. मुझे लगता है कि वो कदाचित राजनीति में आती भी नहीं अगर उसके पति पर संकट नहीं आता क्योंकि उसे अपनी सीमाएं पता है. वो शायद इसलिए मजबूरन राजनीति में आई है क्योंकि उसे अपने पति को जेल जाने से बचाना है वर्ना कहाँ इंदिरा गाँधी और कहाँ प्रियंका. इसमें न तो दादी वाली सूक्ष्म बुद्धि है और न ही ज्ञान. साथ ही उसमें दादी वाली सम्प्रेषण क्षमता, साहस और दृढ़ता भी नहीं है. पिछले दो-तीन दिनों में किए गए विश्लेषण के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि प्रियंका राहुल गाँधी से ज्यादा योग्य नहीं है बल्कि अगर उसे हम लेडी राहुल कहें तो किसी भी दृष्टिकोण से ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा. वैसे यह तुरुप का पत्ता नहला, दहला, दुग्गी, तिग्गी या क्या निकलती है यह तो समय बताएगा लेकिन यह पत्ता राजा या रानी नहीं है इतना तो निश्चित है क्योंकि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते है. पता नहीं अब आगे कांग्रेस क्या करेगी? वैसे हो सकता है कि वो भविष्य में रोबर्ट वाड्रा में अपने भविष्य की तलाश करे, वैसे भी वाड्रा ने राजनीति में प्रवेश की अपनी ईच्छा जता भी दी है. मुझे पता है कि कांग्रेस मेरी सलाह को मानेगी नहीं लेकिन मैं उसे सलाह देना चाहूँगा कि परिवार के बाहर भी तो देखो. पार्टी में ऐसे कई नेता हैं जो काफी योग्य हैं उनमें नेतृत्व-क्षमता कूट-कूटकर भरी है.

मंगलवार, 12 मार्च 2019

राहुल जी के मसूद अजहर जी


मित्रों, आजकल कांग्रेस की जो छवि जनता के बीच बन रही है वह कोई अच्छी छवि नहीं है. पिछले कुछ सालों में भारत की जनता ऐसा मानने लगी है कि कांग्रेस किसी-न-किसी तरह पाकिस्तान और पाकिस्तान के बल पर पलने और आतंकी हमले करनेवाले संगठनों का समर्थन करती है. वैसे विश्वास तो नहीं होता कि यह वही कांग्रेस है जो एक समय कट्टर राष्ट्रवादी पार्टी थी और उसने देश की आजादी के लिए चलनेवाले आन्दोलन को नेतृत्व दिया था. मगर क्या करें साहब इतिहास को तो हम बदल नहीं सकते.
मित्रों, जरा कल्पना कीजिए कि आज से ठीक १०० साल पहले कांग्रेस क्या कर रही थी. तब वह रौलेट एक्ट के खिलाफ पूरे देश में आन्दोलन चला रही थी. चारों तरफ आसमान वन्दे मातरम और भारत माता की जय के नारों से गूँज रहा था. गाँधी तब कांग्रेस के सर्वमान्य नेता नहीं बने थे बल्कि बनने की प्रक्रिया में थे. और ठीक १०० साल बाद वही कांग्रेस जैसे राष्ट्रवाद से नफरत करने लगी है. जो सैनिक देश पर अपने प्राण न्योछावर कर देने में जरा-सी भी झिझक नहीं दिखाते कांग्रेस को उन पर भी भरोसा नहीं है. वो कभी सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगती है तो कभी एयर स्ट्राइक के. आखिर ऐसा क्या कारण है कि कांग्रेस को आज भारतीय सेना से ज्यादा यकीन शत्रु देश पाकिस्तान के नेताओं पर है जो एक ही दिन में कई बार अपने बयानों से पलट जाते हैं? कभी-कभी तो ऐसा लगता ही नहीं कि कांग्रेस भारत की पार्टी है बल्कि उसका रवैया देश के प्रति इतना गैरजिम्मेदाराना होता है कि वो पाकिस्तान की राजनैतिक पार्टी लगती है और ऐसा लगता है कि जैसे उसे भारत में नहीं पाकिस्तान में चुनाव लड़ना है.
मित्रों, पुलवामा हमले के बाद मुझे जब मीडिया में पढने को मिला कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी जी ने अपने बकवादी नेताओं को बयान देने से पूरी तरह से मना कर दिया है तो मुझे काफी ख़ुशी हुई. लेकिन यह क्या? एक बार जो भारत और भारतीय सेना के खिलाफ कांग्रेस के नेताओं ने बोलना शुरू किया तो जैसे उनके बीच होड़-सी मच गई. लगा जैसे इस तरह की कोई प्रतियोगिता चल रही है कि कौन भारत और भारतीय सेना के खिलाफ कितनी संख्या में और कितने घटिया बयान देता है. कोई सिद्धू नामक कथित सरदार कहने लगा कि आतंकी हमले के लिए पाकिस्तान जिम्मेदार ही नहीं है. भारत को उसके ऊपर कार्रवाई करने के बदले उसके साथ बातचीत करनी चाहिए. तो वहीँ राहुल गाँधी जी के राजनैतिक गुरु दिग्विजय सिंह ने पुलवामा हमले को सीधे-सीधे दुर्घटना बता दिया मानों वहां पर सीआरपीएफ के जवान बस के पलट जाने से मारे गए.
मित्रों, अब जब होड़ लगी ही है तो कांग्रेस के अध्यक्ष महोदय कैसे पीछे रहने वाले थे तो कल उन्होंने भी जैश सरगना मौलाना मसूद अजहर को मसूद अजहर जी कहकर अपना पेट का दर्द मिटा लिया. मौलाना मसूद अजहर जी? वो भी ऐसे जैसे मसूद अजहर जो जीता जगता दरिंदा है के लिए उनके मन में कितनी ईज्ज़त है, कितनी श्रद्धा है. आज शर्म आती है मुझे भी यह कहते हुए कि मेरे दादा जी कांग्रेसी थे और १९४२ में जेल गए थे ठीक उसी तरह जैसे बिहार कांग्रेस के प्रवक्ता विनोद शर्मा को शर्म आई और उन्होंने यह कहने हुए अपनी पार्टी और पद से इस्तीफा दे दिया कि लोग कांग्रेस को आतंकवादियों की पार्टी मानने लगे हैं.
मित्रों, आपने गौर किया होगा कि मैंने अपने पूरे आलेख में सिर्फ राहुल गाँधी जी के नाम के बाद जी लगाया है. मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि ऐसा मैंने इसलिए कतई नहीं किया है क्योंकि मैं उनका आदर करता हूँ बल्कि मैंने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि क्या करें मौसी अपना तो दिल ही कुछ ऐसा है.