शुक्रवार, 22 जुलाई 2022
बाप रे बाप रुपया गिर रहा है
मित्रों, एक जंगल में एक खरगोश रहता था। वह बहुत ही डरपोक था। कहीं जरा-सी भी आवाज सुनाई पड़ती तो वह डरकर भागने लगता। डर के मारे वह हर वक्त अपने कान खड़े रखता। इसलिए वह कभी सुख से सो नहीं पाता था। एक दिन खरगोश एक आम के पेड़ के नीचे सो रहा था। तभी पेड़ से एक आम उसके पास आकर गिरा। आम गिरने की अवाज सुनकर वह हड़बड़ा कर उठा और उछलकर दूर जा खडा हुआ। "भागो! भागो! आसमान गिर रहा है।" चिल्लाता हुआ सरपट भागने लगा। रास्ते में उसे एक हिरन मिला। हिरन ने उससे पूछा, "अरे भाई तुम इस तरह भाग क्यों रहे हो? आखिर मामला क्या है? खरगोश ने कहा, अरे भाग, भाग! जल्दी भाग! आसमान गिर रहा है। हिरन भी डरपोक था। इसलिए वह भी भयभीत होकर उसके साथ भागने लगा। भागते-भागते दोनो जोर-जोर से चिल्ला रहे थे, "भागो! भागो! आसमान गिर रहा है।" उनकी देखादेखी डर के मारे जिराफ, भेडि़या, लोमडी, गीदड़, तथा अन्य जानवरों का झुंड भी उनके साथ भागने लगा। सभी भागते-भागते एक साथ चिल्लाते जा रहे थे, भागो! भागो! आसमान गिर रहा है। उस समय सिंह अपनी गुफा में सो रहा था। जानवरो का शोर सुनकर वह हडबड़ाकर जाग उठा। गुफा से बाहर आया, तो उसे बहुत क्रोध आया। उसने दहाड़ते हुए कहा, रूको! रूको! आखिर क्या बात है? सिंह के डर से सभी जानवर रूक गए। सबने एक स्वर मे कहा, "आसमान नीचे गिर रहा है। यह सुनकर सिंह को बड़ी हँसी आई। हँसते-हँसते उसकी आँखो में आँसू आ गए। उसने अपनी हँसी रोककर कहा, "आसमान को गिरते हुए किसने देखा है?" सब एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। अंत में सभी की निगाह खरगोश की ओर मुड़ गई तभी उसके मुँह से निकला, "आसमान का एक टुकड़ा तो उस आम के पेड़ के नीचे ही गिरा है।" "अच्छा चलो, हम वहाँ चलकर देखते हैं।" सिंह ने कहा। सिंह के साथ जानवरों की पूरी पलटन आम के पेड़ के पास पहुँची सबने इधर-उधर तलाश की। किसी को आसमान का कोई टुकड़ा कहीं नजर नही आया। हाँ, एक आम जरूर उन्हे जमीन पर गिरा हुआ दिखाई दिया। सिंह ने आम की ओर इशारा करते हुए खरगोश से पूछा, "यही है, आसमान का टुकड़ा, जिसके लिए तुमने सबको भयभीत कर दिया?" अब खरगोश को अपनी भूल समझ में आई। उसका सिर शर्म से झुक गया। वह डर के मारे थर-थर काँपने लगा. दूसरे जानवर भी इस घटना से बहुत शार्मिंदा हुए। वे अपनी गलती पर पछता रहे थे कि सुनी-सुनाई बात से डरकर वे बेकार ही भाग रहे थे।
मित्रों, साल २०१४ से ही भारत में भी खरगोशों का एक समूह ऐसा रहा है जिसके पास छाती पीटने के अलावा कोई काम नहीं है. यह गैंग इन्तजार करता रहता है कि कब भारत में कुछ बुरा हो जिससे उनको मोदी सरकार को बुरा-भला कहने का मौका मिले. इस गैंग में बड़े-बड़े नेता, अर्थशास्त्री, वामपंथी विद्वान, छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी और यहाँ तक कि न्यायमूर्ति तक शामिल हैं. जुबेर को पकड़ा तो क्यों पकड़ा और नुपुर को क्यों नहीं पकड़ा अभी रुदाली गैंग का इस मुद्दे को लेकर विलाप चल ही रहा था कि रूपए ने थोडा-सा कमजोर होकर इन हिन्दुविरोधियों व तदनुसार भारतविरोधियों को आँखों में थूक लगा-लगाकर रोने का एक और सुनहरा मौका दे दिया.
मित्रों, जुबेर को पकड़ा तो नुपुर शर्मा को भी क्यों पकड़ना चाहिए? क्या दोनों ने एक ही तरह का अपराध किया था? मेरी नज़र में देशद्रोह से बड़ा कोई अपराध नहीं है और जो कोई भी मेरे देश को कमजोर करता है उसको सीधे मृत्युदंड दे देना चाहिए.
मित्रों, अभी जब श्रीलंका कंगाल हुआ तो यह रूदाली गैंग यह मनाने लगी कि भारत भी कंगाल हो जाए. जब हम राष्ट्रवादियों ने तथ्यों और आंकड़ों के साथ जवाब दिया कि भारत बहुत मजबूत स्थिति में है और अमेरिका से भी ज्यादा मजबूत स्थिति में है तो इन लोगों की घिन्दघी बंध गई. अब अगर हम मान भी लें कि रुपया गिरा है. मतलब गिरा है लेकिन अब नहीं गिर रहा है तो क्या सिर्फ रुपया गिरा है? दिसंबर 2021 में एक डॉलर 74.50 रुपये के बराबर था. अब 15 जुलाई के आंकड़ों को देखें तो ये 79.74 रुपये का हो गया है. इस तरह डॉलर के मुकाबले रुपया पिछले साढ़े छह महीने में गिरा है और इसका मूल्य 7% तक नीचे आ गया है. लेकिन क्या सिर्फ रुपया डॉलर के मुकाबले गिरा है? नहीं! बांकी मुद्राओं की स्थिति तो और भी बुरी है.
मित्रों, साल 2022 की शुरुआत से अब तक दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले डॉलर तेजी से मजबूत हुआ है. यूरोपीय देशों की मुद्रा यूरो, ब्रिटेन की पौंड, जापान की येन, स्विट्जरलैंड की फ्रैंक, कनाडा के डॉलर और स्वीडन की क्रोना के मुकाबले डॉलर इस साल अब तक 13% तक मजबूती हासिल कर चुका है. ऐसे में रुपये की इस कमजोरी को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता है. लेकिन रूदाली गैंग को इससे क्या? उसे परेशानी रुपए के गिरने से नहीं है बल्कि मोदी के प्रधानमंत्री होने से है और २०१४ से है.
मित्रों, यह सही है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय दोहरे संकट से जूझ रही है. कोविड महामारी का असर कम होने के बाद, बुरी तरह लड़खड़ाई देश की अर्थव्यवस्था के संभलने की उम्मीद थी. लेकिन महंगाई और तेजी से गिरते रुपये ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का काम और मुश्किल कर दिया है. देश में जून में खुदरा महंगाई दर 7.01 फीसदी थी. हालांकि ये मई की 7.04 फीसदी से कम है लेकिन अभी भी यह आरबीआई की अधिकतम सीमा यानी छह फीसदी से अधिक है. फिर भी यह महंगाई मौसमी है क्योंकि बरसात में सब्जियों के दाम बढ़ जाते हैं. दूसरी ओर डॉलर की तुलना में रुपए में गिरावट हुई है. मंगलवार को डॉलर की तुलना में रुपया गिर कर 80 के स्तर के पार कर गया. डॉलर महंगा होने से भारत का आयात और महंगा होता जा रहा है और इससे घरेलू बाजार में चीजों के दाम भी बढ़ रहे हैं. लेकिन यह महंगाई भी वैश्विक है और दुनिया भर में हाल के दिनों में महंगाई बढ़ी है. इसकी अहम वजह कोविड की वजह से सप्लाई के मोर्चे पर दिक्कत से लेकर हाल में रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से तेल और खाद्य वस्तुओं के दाम में इजाफा है. फिर चीन में कोविड का प्रकोप बढ़ने से उत्पादन गिरा और पूरी दुनिया में जरूरी सामानों की कमी हो गई. रॉयटर्स के मुताबिक, स्वयं अमेरिका में महंगाई दर बढ़कर 6.2 फीसदी हो गई है. यह साल 1990 के बाद की सबसे बड़ी तेजी है. अमेरिका में महंगाई 30 साल की ऊंचाई पर है।
मित्रों, भारत सरकार की नीतियों की वजह से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने नवंबर से फरवरी तक पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए थे लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म हुए पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए गए. इससे अचानक महंगाई बढ़ गई. ऐसे में अगर आरबीआई रेपो रेट नहीं बढ़ाता यानी निवेश करने वालों को ज्यादा ब्याज नहीं देता तो निवेशक यहां से पैसा निकाल कर अमेरिका ले जाते. चूंकि महंगाई से परेशान अमेरिका में अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ब्याज दर बढ़ा रहा है इसलिए हमारे यहां से डॉलर का निकलना शुरू हो चुका है. यानी निवेशक वहां अपना निवेश कर रहे हैं, जहां उन्हें ज्यादा ब्याज मिल रहा है. इसलिए हम ब्याज दर बढ़ा कर निवेशकों को न रोकें तो यहां से डॉलर निकलना शुरू हो जाएगा. इससे हमारा रुपया और कमजोर हो जाएगा. रुपया कमजोर होने से हमारा आयात और ज्यादा महंगा हो जाएगा और महंगाई इससे भी ज्यादा बढ़ जाएगी.
मित्रों, कुछ लोग कह रहे हैं कि ऐसे दौर में जब महंगाई लगातार बढ़ती जा रही तो सरकार ने क्या सोच कर कई जरूरी चीजों पर जीएसटी बढ़ाने का फैसला कैसे लिया? क्या ये लोगों पर दोहरी मार नहीं है? तो इसका जवाब यह है कि जब जीएसटी की शुरुआत की गई थी तब एवरेज न्यूट्रल रेट 12 फीसदी रखने की बात हुई थी. लेकिन राजनीतिक कारणों से कई राज्यों ने यह मांग रखी कि यह रेट कम होना चाहिए. इसलिए कुछ जरूरी चीजों पर कोई जीएसटी नहीं लगाया गया और कुछ चीजों पर पांच-दस फीसदी टैक्स लगाया गया. लेकिन इससे सरकारी का राजस्व घटने लगा. पहले ही रियल एस्टेट, पेट्रोल जैसे उत्पाद जीएसटी के दायरे से बाहर हैं. इसलिए जीएसटी के जरिये जितने राजस्व का लक्ष्य था वह नहीं आ रहा है. यही वजह है कि सरकार ने जीएसटी दर बढ़ाया है. अगर जीएसटी के जरिये टैक्स नहीं आएगा देश का खर्चा कैसे चलेगा?
मित्रों, भारत के कुछ घनघोर शुभचिंतक यह प्रश्न भी पूछ रहे हैं कि क्या भारत महंगाई की बढ़ी हुई दर न्यू नॉर्मल हो जाएगी? क्या अब यहां महंगाई हमेशा सात-आठ फीसदी या इससे भी ज्यादा बनी रह सकती है? तो हम कहते हैं कि न्यू-नॉर्मल की बात विदेश के संदर्भ में हो रही है. चूंकि वहां महंगाई दो फीसदी के लगभग बनी रहती है इसलिए वहां बढ़ी हुई महंगाई दर को न्यू नॉर्मल के तौर पर देखा जा रहा है. चूंकि चीन से सस्ता सामान आने की वजह से उनके यहां महंगाई कम थी. लेकिन अभी चीन से सप्लाई में दिक्कत आने की वजह से उनके यहां मैन्युफैक्चर्ड सामान महंगा हो गया है. दरअसल आरबीआई ने कोविड के वक्त काफी ज्यादा नोट छाप दिए थे ताकि सरकार को कर्ज लेने में दिक्कत न हो. महंगाई बढ़ाने में इसका भी हाथ था. अब सरकार इस लिक्विडिटी को सोखने की कोशिश कर रही है. इसलिए आगे जाकर महंगाई काबू हो सकती है. ठीक ऐसा ही अमेरिका ने भी कोविड इस समय किया था और अब अमेरिका भी बाजार से डॉलर को सोखने का प्रयास कर रहा है इसलिए वहां भी ब्याज दर बढ़ रहा है और दुनियाभर से लोग डॉलर लेकर अमेरिका की तरफ दौड़ रहे हैं. लेकिन इससे अमेरिका को भी घाटा है क्योंकि उसका भी निर्यात महंगा होता जा रहा है.
मित्रों, हमारे लिए डॉलर की मजबूती और रुपये की कमजोरी नुकसानदेह भी है और फायदेमंद भी है क्योंकि इससे हमारा सामान दुनिया में सस्ता होगा और हमारे निर्यात को फायदा मिलेगा. चीन, बांग्लादेश जैसे देशों ने अपनी मुद्रा का अवमूल्यन कर दुनिया के बाजार में अपना माल सस्ता रखा और इसका उन्हें फायदा हुआ है. हमें डॉलर की जरुरत है इसलिए हम दुनिया के बाजार में सस्ता माल बेचकर ज्यादा डॉलर कमा सकते हैं. क्योंकि हमें ज्यादा आयात करना पड़ता है और इसके लिए हमें डॉलर की जरूरत पड़ती है. रही बात भारत की स्थिति पाकिस्तान या श्रीलंका जैसी होने की तो भारत की इन देशों से तुलना सरासर बेमानी ही नहीं बेईमानी है. भारत में ऐसी स्थिति कभी नहीं आएगी क्योंकि भारत का घरेलू बाजार काफी मजबूत है और इसकी अर्थव्यवस्था का आकार भी काफी बड़ा है. इसलिए भारत में पाकिस्तान और श्रीलंका जैसी स्थिति की कल्पना करना नासमझी है.
मंगलवार, 12 जुलाई 2022
भारत श्रीलंका नहीं है विघ्नसंतोषियों
मित्रों, भारत के भारत विरोधी इन दिनों श्रीलंका की परिस्थितियों की तुलना भारत से कर रहे हैं और कह रहे हैं कि वो दिन दूर नहीं जब भारत में भी श्रीलंका जैसे हालात हो जाएँगे? इस संदर्भ में मुझे एक प्रंसंग याद आ रहा है. मैंने कहीं पढ़ा था कि सोलोमन द्वीप के आदिवासियों के बीच एक विचित्र परंपरा प्रचलित है. जब भी उन्हें किसी वृक्ष को काटना होता है तो वे वृक्ष को घेरकर खड़े हो जाते हैं. उसे घंटों तक शाप देते हैं, बुरा-भला कहते हैं, कोसते रहते हैं. नकारात्मक बातें करते हैं और उसकी असमय मृत्यु की कामना करते हैं. माना जाता है कि इससे वृक्ष की सकारात्मक ऊर्जा पर नकारात्मक ऊर्जा हावी होने लगती है. जो 30 दिन के अंदर-अंदर अपना प्रभाव दिखाती है. हरे-भरे वृक्ष की टहनियां सूखने लगती हैं और वृक्ष की असमय मृत्यु भी हो जाती है, जिसके बाद आदिवासी समाज उस वृक्ष को काट देता है. इस परंपरा का वैज्ञानिक आधार क्या है, ये पता नहीं है लेकिन ये परंपरा अच्छी नहीं हो सकती.
मित्रों, देश के नामी चेहरों इतिहासकार रामचंद्र गुहा, सीनियर वकील प्रशांत भूषण और बैंकर उदय कोटक जैसे लोगों को इस परंपरा में शामिल होने से बचना चाहिए.दिल्ली, मुंबई से भी कम जनसँख्या वाले श्रीलंका (Sri Lanka Crisis) में जारी संकट के बीच गुहा जैसे लोगों ने भारत जैसे विशालकाय देश के दुर्दिन की भविष्यवाणी तो शुरू कर दी है, लेकिन इस भविष्यवाणी का आधार क्या है, ये किसी भी विद्वान ने नहीं बताया है. पोथी और बहीखाता लिखने वाले विद्वानों ने ट्वीट करके या बयान देकर इतनी संक्षिप्त बातें की है कि उनकी चेतावनी भी उनकी चाह लगने लगी है. देखने से ऐसा लगता है कि देश को कोसने वाले गुट का विस्तार हो रहा है, जिसमें आदर्श चेहरे भी शामिल हो रहे हैं. मित्रों, गुहा-भूषण-कोटक ने भारत के दुर्दिन के विश्लेषण की जगह भविष्यवाणी ही क्यों की? श्रीलंका घोर आर्थिक संकट में फंसा है, जिसकी वजह से पूरी सरकार को सत्ता छोड़कर भागना पड़ा है. जो कुर्सी से चिपके रहने का हठ करके बैठे थे, उन्हें भी जनविद्रोह के आगे झुकना पड़ा है. इन्हीं परिस्थितियों में भारत के तीन विद्वानों की ओर से चेतावनी आई है कि भारत भी श्रीलंका की ही राह पर आगे बढ़ रहा है. यानी बहुत जल्द भारत की अर्थव्यवस्था ढह जाएगी, देश बर्बाद हो जाएगा, जनता सड़कों पर आ जाएगी. इतिहासकार रामचंद्र गुहा, सीनियर वकील प्रशांत भूषण और बैंकर उदय कोटक ने भारत सरकार को श्रीलंका संकट से सबक लेने की नसीहत क्यों दी है, अब ये भी समझ लेते हैं.
मित्रों, बैंकर उदय कोटक ने ट्वीट करके कहा है कि- रूस यूक्रेन के बीच जंग चल रही है और ये मुश्किल ही होता जा रहा है. देशों की असल परीक्षा अब है. न्यायपालिका, रेग्युलेटरी अथॉरिटीज, पुलिस, सरकार, संसद जैसी संस्थाओं की ताकत मायने रखेगी. वो ही करना होगा जो सही है. लोकलुभावन नहीं. एक जलता लंका हम सबको बताता है कि क्या नहीं करना चाहिए. एक दौर में बैंकर उदय कोटक केंद्र की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के समर्थक रहे हैं. उन्होंने अपने ट्वीट में सरकार का कहीं नाम भी नहीं लिया है, लेकिन भावनाएं पढ़ने वाले मान रहे हैं कि बैंकर ने परोक्ष रूप से मोदी सरकार को नसीहत दी है, जिसके भविष्य का आकलन करने पर वो सहज परिस्थितियां नहीं पा रहे हैं.
मित्रों, इसी तरह के एक कार्यक्रम में मीडिया से बात करते हुए इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने श्रीलंका के हालातों को भारत के लिए चेतावनी करार दिया और कहा कि- ‘श्रीलंका एशिया का सबसे समृद्ध देश हो सकता था. उनके यहां साक्षरता, स्वास्थ्य सेवाएं, लिंगानुपात की दरें ऊंची थीं. लेकिन सिंहला और बौद्ध बहुसंख्यकों की वजह ये देश बर्बाद हो गया.’ उन्होंने ये भी कहा कि अगर एक धर्म और एक भाषा को महत्व दिया गया तो भारत का हाल भी श्रीलंका जैसा होगा. दरअसल रामचंद्र गुहा ने देश के इतिहास पर अनेक मोटे-मोटे ग्रंथ लिखे हैं, लेकिन उनकी ये वन लाइनर एक पहेली है. किसी से भी पूछा जाए तो वो श्रीलंका में संकट के कई स्पष्ट कारण गिना सकता है, लेकिन धर्म और भाषा का श्रीलंका के मौजूदा संकट पर क्या प्रभाव है, ये समझने के लिए इतिहास के विद्वान का विस्तृत विचार समझना होगा, जो फिलहाल अनुपलब्ध है.
मित्रों, वकील प्रशांत भूषण ने तो हद कर दी है. उन्होंने कुछ अखबारों की कटिंग्स को ट्विटर पर शेयर कर भारत और श्रीलंका के हालातों की तुलना की है. उन्होंने लिखा है कि- श्रीलंका के सत्ताधारियों ने बीते कुछ सालों में जो किया और भारत के सत्ताधारी जो आज कर रहे हैं, उनमें आपको कुछ समानता दिख रही है? क्या भारत में इसके परिणाम भी वैसे ही होंगे? जैसे आज श्रीलंका के हालात हैं? उन्होंने आगे लिखा है कि- गौरतलब है कि श्रीलंका में हालात लगातार बदतर होते जा रहे हैं और अर्थव्यवस्था इतनी कमजोर हो चली है कि विदेशी मुद्रा भंडार घटकर केवल 50 अरब डॉलर तक आ गया है. वहीं, श्रीलंका का दूसरे देशों से लिया कर्ज़ भी बढ़कर 51 अरब डॉलर तक जा पहुंचा है. दरअसल प्रशांत भूषण एक वरिष्ठ वकील हैं और उन्होंने कई बड़े केस लड़े हैं, केस की फाइलें तैयार की हैं. अन्ना आंदोलन से उनकी छवि और निखरी. परंतु ऐसे विद्वान ने भी विदेशी मुद्रा भंडार के संकट पर आधी अधूरी बात कही है. अपने ट्वीट में वजन डालने के लिए बेसिरपैर के तथ्यों को घुसाया है, तर्क से परहेज किया है.
मित्रों, अब हम विचार करते हैं कि आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी भारत को कोसने वालों की लिस्ट के ही क्यों माने जाते हैं? रघुराम राजन का नाम भारतीय ब्यूरोक्रेसी में रॉकी रॉकस्टार की तरह लिया जाता है. वो 4 सितंबर, 2013 को भारतीय रिजर्व बैंक के 23वें गवर्नर बने. उनका गांधी जी की फोटो वाले नोटों पर नाम छपता रहा है. तमाम उठापटक के बीच 4 सितंबर, 2016 को उन्होंने गवर्नर का पद छोड़ दिया. इसके बाद से रघुराम राजन ने एक अलग ही इकॉनमिस्ट की छवि बनाई. पद छोड़ने के बाद वो एक नए इंडिकेटर पर व्याख्यान देने लगे हैं. भारत की अर्थव्यवस्था पर धार्मिक भेदभाव, नस्लीय भेदभाव (जिसका अर्थशास्त्री ने कोई आधार नहीं दिया है) के प्रभावों का वर्णन किया है. हाल ही में शिकागो को बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में प्रोफेसर रघुनाथ राजन ने एक व्याख्यान दिया और कहा कि- अगर भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि अल्पसंख्यक विरोधी बनती है, तो भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इंडियन प्रोडक्ट के मामले में कई तरह के नुकसानों का सामना कर सकता है. इसके साथ ही भारत में निवेश करने वाले विदेशी निवेशक भी इस बात को लेकर प्रतिक्रिया दे सकते हैं. मित्रों, इतने बड़े अनर्थशास्त्री विद्वान के ऐसे तर्क सुनकर देश की सवा अरब आबादी के दिमाग की नसें फट जानी चाहिए. दरअसल सरकार को चलाने के लिए कई सलाहकार होते हैं. लेकिन क्या कोई सलाहकार ऐसा भी होगा? जिसने सरकार को सलाह दी होगी कि चीन से सामान खरीदने के लिए अपने देश के उद्योगों पर ताला लगा दो, अन्यथा वो लद्दाख और अरुणाचल में देश की जमीन हड़प लेगा. क्या कोई ऐसा सलाहकार भी होगा, जो सरकारों को सलाह देता होगा कि दंगे होते रहने दो. सिर फूटते रहने दो. क्योंकि शासन-प्रशासन की सख्ती से देश बर्बाद हो जाता है. यहां तक कि अगर कश्मीर में पंडितों की हत्या हो रही हो, उनकी बहू-बेटियों से बलात्कार हो रहा हो, उन्हें घाटी से निकाला जा रहा हो, तो भी सरकार को मौन साध लेना चाहिए. ताकि इंडियन प्रोडक्ट दुनिया में बिकता रहे, दुनिया का भारत में पूंजी निवेश होता रहे. अगर ये सच है तो ऐसे सलाहकारों या अर्थशास्त्रियों के विचारों का एक्सरे होना चाहिए. अगर किसी ने आरबीआई गवर्नर जैसे महत्वपूर्ण पद की कुर्सी छोड़ दी हो, तो अपना ज्ञान और ध्यान भी भारत की समस्याओं से हटा लेना चाहिए. वैसे विद्वानों का कांटा कहां पर अटका हुआ है, ये कभी सार्वजनिक नहीं हो पाता. कई अर्थशास्त्रियों के IMF, WB से लेकर जाने कहां-कहां तक तार जुड़े होते हैं. न जाने उनका क्या एजेंडा होता है या फिर स्वार्थ हो सकता है?
मित्रों, कुल मिलाकर बात अर्थव्यवस्था तक पहुंचती है. जिसका मतलब होता है रूपया. जिस रुपये से देश चलता है और दुनिया चलती है. IMF या WB जैसी संस्थाएं लोन देने के लिए घात लगाए बैठी रहती हैं और जिस देश को लोन देती हैं, उसकी अर्थव्यवस्था को निचोड़ लेती हैं. चीन इस मामले में सर्वाधिक कुख्यात है. जिसने श्रीलंका को मौजूदा संकट में धकेला है. बाकी संस्थाओं ने श्रीलंका को पहले ही निचोड़ लिया था. सिंधुजा सिंह ने अपने लेख में भारत और श्रीलंका की स्थितियों का विस्तृत विश्लेषण किया है. उन्होंने याद दिलाया है कि साल 2008 में द ग्रेट रेसेसन आया था. जिसमें यूरोजोन के चार देश PIGS बर्बाद हो गए. पूर्तगाल, आयरलैंड, मिस्र (ग्रीस) और स्पेन. इसकी वजह थी यहां की सरकारों के पॉपुलिस्ट फैसले. इन चारों देशों के शासकों की कोशिश थी कि वो किसी भी तरह से सत्ता में बने रहें. इसके लिए उन्होंने लोकलुभावन फैसले किए, जनता तक सामान और सेवाएं पहुंचाना जारी रखने के लिए भारी भरकम कर्ज लिए. उन्हें उम्मीद थी कि सबकुछ सामान्य हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हालत ये हो गई कि 2011 तक चारों देशों को बैंकरप्ट घोषित करना पड़ा. जिसने यूरोजोन डेट क्राइसिस (Eurozone debt crisis) को जन्म दिया. कुछ यही हाल श्रीलंका का हुआ. श्रीलंका की सरकार ने खर्च में किस तरह दरियादिली दिखाई, ये भी समझिए. 1- चीन से कर्ज लेकर मताला राजपक्षा इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाया, जो दुनिया का अब तक का सबसे वीरान एयरपोर्ट है. 2- चीन से हंबनटोटा पोर्ट के लिए 1.1 बिलियन डॉलर की डील की, लेकिन ये कर्ज श्रीलंका नहीं चुका सका और चीन को हंबनटोटा पोर्ट को 99 साल की लीज पर सौंप देना पड़ा. 3- 2014 में महिंदा राजपक्षे ने चीन के साथ मिलकर कोलंबो पोर्ट सिटी प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसे 2017 तक पूरा होना था, लेकिन 2015 में नई सरकार बनने के बाद ये प्रोजेक्ट रद्द कर दिया गया. इससे श्रीलंका की जनता को खुशी हुई और ये ही त्रासदी की वजह भी बनी. चीन कर्ज में फंसाने के लिए कुख्यात है. उसने हिंद महासागर में अपनी उपस्थिती दर्ज कराने के लिए एक चाल चली थी, जिस चाल के कामयाब होने के बाद श्रीलंका के हालात से उसने विरक्ति दिखानी शुरू कर दी है.
मित्रों,अंतरराष्ट्रीय या घरेलू संबंधों में कोई भी स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, सिर्फ स्वार्थ ही स्थायी होता है. श्रीलंका ने इसे ना समझने की भूल की, जबकि भारत ने चीन से उचित दूरी बनाकर रखी. चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की साजिश को भारत ने भांप लिया था और इस प्रोजेक्ट से दूरी बना ली. इसके बाद भारत ने चीन को डोकलाम से लेकर गलवान तक आंखें नीची कर लेने को मजबूर कर दिया. नतीजा ये है कि अब बदलते वर्ल्ड ऑर्डर में दुनिया को चीन का विकल्प भारत में दिख रहा है. यह भी भारत सरकार की सफलता है. इसे कार्यकालों से नहीं तौला जा सकता. लेकिन ये स्वीकार करना चाहिए कि खुद से ज्यादा ताकतवर देश से टकराकर भारत ने एक परिपाटी तोड़ी है. सीमा की तथाकथित सुरक्षा के लिए चीन को असीमित व्यापार की छूट देने और एक तरह से धनादोहन की लिबर्टी देने से रोका गया है. श्रीलंका से उलट 2008 की क्राइसिस में भारत ने IMF से लोन न लेने का सही फैसला किया था. क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष किसी देश को मुफ्त में कर्ज नहीं देता, बल्कि इसका भारी ब्याज वसूलता है, नीतियों में परिवर्तन कराता है. यहां तक कि कर्ज लेने वाले देश की इकॉनमी भी तबाह कर देता है. श्रीलंका ने हर संभव जगह से कर्ज लिया. लेकिन पहले कोरोना और बाद में रूस-यूक्रेन युद्ध ने श्रीलंका की इकॉनमी चौपट कर दी, चाय, मसाले का कारोबार चौपट हो गया. टूरिज्म ठप पड़ गया. तो उसके लिए कर्ज चुकाना भी मुश्किल हो गया. श्रीलंका का महात्वाकांक्षी होना गलत नहीं था, लेकिन एक परिवार के लिए देश और जनता को दांव पर लगा देना गलत था, जो दो दशक तक लगातार किया गया. सबसे आश्चर्य की बात तो यह थी कि तात्कालिक लाभ के लिए २०१८ में करों में भारी कटौती की गई और उसकी भरपाई कर्ज लेकर की गई. जो लोग कह रहे थे कि तेल के अंतर्राष्ट्रीय मूल्य में कमी होने पर भारत सरकार क्यों पेट्रोल के दाम कम नहीं कर रही है उनको श्रीलंका की हालत देखकर भारत सरकार के निर्णयों की प्रशंसा कर चाहिए. साथ ही अगर हम २००६ से २०१३ के मध्य मनमोहन सरकार के समय से भारत की अर्थव्यवस्था की तुलना करें तो स्थिति बेहतर है ख़राब नहीं. उस कालखंड में भारत ने कुल २७० अरब डॉलर का विदेशी कर्ज लिया जबकि मोदी के समय सिर्फ १६० अरब डॉलर लिया गया, उस समय भारत सरकार के कर्ज और जीडीपी का अनुपात ६४ प्रतिशत था मोदी के समय ६२ रहा, उस समय विदेशी कर्ज जीडीपी अनुपात २४ प्रतिशत था मोदी के समय १९ प्रतिशत रहा, उस समय मुद्रास्फीति १०.४ थी मोदी के सात साल में ७.०४ रही. साथ ही 2013 में 270 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था जो अब 604 अरब डॉलर है. मतलब यह कि आंकड़े तो बता रहे हैं कि हालात मनमोहन सिंह के समय से अच्छे हैं. फिर जब मनमोहन सिंह के समय भारत श्रीलंका नहीं बना तो अब कैसे बन जाएगा?
मित्रों, कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में लिखा है- किसी भी देश को अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए उद्योग खोलने चाहिए. भारत ने भी आत्मनिर्भर भारत का मिशन शुरू किया है. देखने से लगता है कि ये सही दिशा में उठाया गया कदम है. अगर भारत का आत्मनिर्भर होना सही ना हो तो हमें कंप्यूटर क्रांति लाने वालों से पूछना चाहिए कि आज तक देश अपने लैपटॉप, मोबाइल पर भरोसा क्यों नहीं कर सका? जय जवान-जय किसान का नारा देने वालों से पूछना चाहिए कि अगर वो किसानों के पांव पूजते रहे तो देश में किसान हाशिये पर क्यों चलते चले गए? अगर जवानों की जयकार करते रहे तो एक हथगोला तक विदेशों से ही क्यों आता रहा? प्रश्न कई हैं? लेकिन यहां मूल बात गुहा-कोटक-भूषण की टिप्पणियों की है, जिन्हें भारत का भविष्य श्रीलंका जैसा दिख रहा है. इन तीनों के अलावा रघुराम राजन भी जाने-माने विद्वान हैं. ये देश की थाती हैं, जिनकी बातें सुनी जानी चाहिए, उन्हें नीतियों में शामिल किया जाना चाहिए. लेकिन मोटे-मोटे ग्रंथ लिखने वाले इतिहासकार जब वन लाइनर टिप्पणी कर रहे हों, लंबा-चौड़ा बहीखाता तैयार करने वाले बैंकर जब ट्वीट कर रहे हों, कोर्ट के लिए हजारों पन्नों का केस तैयार करने वाले वकील ने चंद लाइनों में एक ट्वीट पर विचार व्यक्त किया हो, तो उनका मंतव्य समझना मुश्किल ही नहीं असंभव हैं. इन्हें एक तार्किक थ्योरी देनी चाहिए, जो देश को पच सके, जिससे देश को लाभ हो सके. अन्यथा अपनी नीयत को संदिग्ध बनाने से कोई लाभ नहीं है. ऐसी टिप्पणियां अपने ही वृक्ष को कोसने, शाप देने से ज्यादा कुछ साबित नहीं होंगी.
बुधवार, 29 जून 2022
सर तन से जुदा
मित्रों, सिर्फ जम्मू और कश्मीर में ही नहीं पूरे भारत में इस समय इस्लामिक आतंकवादी टारगेट किलिंग कर रहे हैं. वो दस-बीस दिन, महीनों पहले ही ऐलान कर देते हैं कि हम इस हिन्दू को मार डालेंगे क्योंकि इसने मोहम्मद या कुरान के खिलाफ बोला है. मोहम्मद के जीवन और चरित्र की आलोचना की है जो वास्तव में आलोचना के हायक है.
मित्रों, सवाल उठता है कि क्या हम पाकिस्तान में हैं? क्या कारण है कि राक्षस धर्म और संस्कृति को मानने वाले बेकाबू हो रहे हैं और खासकर उन राज्यों में जहाँ कांग्रेस या विपक्ष की सरकार है? अभी जो राजस्थान में कन्हैया के साथ हुआ क्या गारंटी है कल किसी और हिन्दू के साथ नहीं हो सकता? इतिहास गवाह है कि मुसलमानों ने हमेशा हिन्दुओं के साथ छल किया, छल करके लड़ाई जीती, छल करके मारा. कन्हैया की दुकान में जब राक्षस धर्म वाले पहुंचे तो उसने समझा कि वे कपड़ा सिलवाने आए हैं और इसी विश्वास ने उसकी जान ले ली. ऐसे माहौल में सबको साथ में लेकर, सबका विकास कर सबका विश्वास प्राप्त करने की बेहूदा चाह रखने वाले मोदी जी बताएँगे कि हिन्दू कैसे मुसलमानों पर विश्वास कर सकता है?
मित्रों, हम जानते हैं मोदी जी न तो सख्त कानून बनाएँगे जिससे राक्षस धर्म वालों पर नियंत्रण किया जा सके और न ही किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन ही लगाएंगे चाहे वहां मुसलमानों के हाथों कितने ही हिन्दू क्यों न मारे जाएँ. मोदी जी यह समझने को तैयार ही नहीं हैं कि साँपों को दूध पिलाने से उनका विष कम नहीं होता बढ़ता है. मोदी सरकार को खुलकर हिन्दुओं का साथ देना होगा. नहीं दे सकते तो संविधान से वो सारे प्रावधान समाप्त करने होंगे जिनमें मुसलमानों को हिन्दुओं पर वरीयता दी गई है.
मित्रों, एक बात और मुसलमान शर्म नहीं करते हम हिन्दू करते हैं. जिन लोगों ने भी कन्हैया को मारा है देख लेना उलेमाओं का संगठन, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, वक्फ बोर्ड, पीएफआई आदि सारे मुस्लिम संगठन उनका मुकदमा लड़ेंगे. भारत के बड़े-बड़े हिन्दू वकील उनका मुकदमा लड़ेंगे और हो सकता है कि पूरी दुनिया में रोजाना मानवता की हत्या करने वाले मजहब माननेवाले दोनों हत्यारे कल सुप्रीम कोर्ट से बाईज्जत बरी भी हो जाएं. इस बीच भारत के हिन्दुओं को असहिष्णु और मुसलमानों को पीड़ित बताया जाता रहेगा.
मित्रों, ऐसे माहौल में आखिर हम हिन्दू कब तक एकतरफा कटते रहेंगे. हमें याचना छोड़कर रण करना होगा. हमें अपने आय का एक हिस्सा हथियार खरीदने पर व्यय करना होगा चाहे वो हथियार पारंपरिक ही क्यों न हो. साथ ही देश को अब मोदी नहीं योगी चाहिए. साथ ही हमें समझना होगा कि एक भाजपा को छोड़कर कोई भी दल हिन्दुओं की रक्षा नहीं करनेवाले इसलिए अब आगे से किसी भी राज्य में मोदी तुमसे वैर नहीं ... तेरी खैर नहीं नहीं होना चाहिए. ऐसा करना जानलेवा हो सकता है.
शुक्रवार, 10 जून 2022
इस्लाम की अंतर्राष्ट्रीय फजीहत
मित्रों, हमारे गाँव एक व्यक्ति को बड़ा तगड़ा बवासीर था। डॉक्टर के पास दिखाने लेकर गया तो डॉक्टर ने बता दिया की तुम्हें बवासीर ही है। अब वो डॉक्टर को सब जगह घूम घूमकर गाली दे रहा है और कह रहा है की हाँ, ये बात सच है की मुझे बवासीर है, पर डॉक्टर की हिम्मत कैसे हुई मुझे यह बात बताने की?? अब जो बात डॉक्टर और उस व्यक्ति के बीच थी, सारे समाज के सामने है।
मित्रों, कुछ इस तरह की हालत इन दिनों दुनिया के सामने इस्लाम की है. भाजपा प्रवक्ता नुपुर शर्मा ने कथित पैगम्बर हजरत मोहम्मद के बारे में एक कटु सत्य क्या बोल दिया पूरी दुनिया के मुसलमान उछलने लगे कि वो इस तथ्य को कैसे बोल सकती है? कोई यह नहीं कह रहा कि नुपूर शर्मा ने जो कहा वो झूठ है सब यही कह रहे हैं कि उसने ऐसा कैसे कहा? उसकी हिम्मत कैसे हुई? कोई कह भी नहीं सकता क्योंकि यही सच है. मित्रों, जबसे इस्लाम की उत्पत्ति हुई है इस्लाम को मानने वाले मोहम्मद के कुकृत्यों के बारे में कुछ भी सुनना नहीं चाहते जबकि मोहम्मद ने जो कुछ किया सोंच-समझकर किया. उसने जो कुछ किया, जो कुछ नियम बनाए अपने व्यक्तिगत सुख के लिए बनाए और उसे अल्लाह के नाम पर थोप दिया कि यह उसका नहीं अल्लाह का नियम है. मुसलमान एक बार में ४ शादियाँ कर सकते है लेकिन उसने ९ किए. लूट के माल में अपना हिस्सा निर्धारित कर अपने ऐशो आराम को सुनिश्चित कर लिया. साथ ही बोल दिया कि उसका विरोध अल्लाह का विरोध है इसलिए कोई विरोध नहीं करेगा, चाहे वो अपनी पुत्रवधू से विवाह करे या ६ साल की आयशा से जिसे विवाह का मतलब भी पता नहीं था.
मित्रों, मैं इस्लाम पर पहले ही एक आलेख राक्षस धर्म और संस्कृति लिखकर अर्ज कर चुका हूँ कि यह भलेमानसों का धर्म है ही नहीं लुटेरों का धर्म है जो हिंसा और सेक्स के अलावा कुछ भी नहीं जानते. इनके धर्मग्रन्थ इन्हीं बातों से भरे पड़े हैं. वक्त फिल्म में राजकुमार साहब का एक प्रसिद्ध डायलग था कि जिनके घर शीशे के हों वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते लेकिन ये लोग तो हर शुक्रवार को हाथों में पत्थर लेकर ही नमाज पढने जाते हैं. जाने इनका अल्लाह कैसा है जो इनको ये सब सिखाता है?
मित्रों, उस पर गजब यह कि वे हम हिन्दुओं पर हँसते हैं. अरे मूर्खों हम तो सबमें भगवान को देखते हैं. सबको भगवान का प्रतीक मानते हैं. हम तो मानते हैं कि दुनिया में जितने नाम हैं सब भगवान के नाम हैं क्योंकि सबमें भगवान हैं. जिस तरह हमें हमारी तस्वीर से पहचाना जा सकता है लेकिन हम तस्वीर नहीं होते ठीक उसी तरह भगवान की मूर्तियाँ भगवान का प्रतीक मात्र हैं वो भगवान नहीं हैं. अब अगर किसी को इतनी-सी बात समझ में नहीं आ रही तो इसमें हमारी क्या गलती है? अब अगर कोई सूरज को ऊर्जा का स्रोत न माने और हमेशा उसकी तरह घूम कर पेशाब करे तो उससे सूरज का कभी कुछ बिगड़ेगा क्या? ऐसा कोई कुकर्म नहीं जो इस्लाम में हलाल न हो. कोई धर्म क्या ऐसा होता है? मोहम्मद कहते थे हम तो मद्रास की तरफ ही जाएंगे फिर भी दिल्ली पहुंचेंगे और आज दुनियाभर के मुसलमान भी ऐसा ही कह रहे. हम कहते हैं आत्मवत सर्वभूतेषु, अतिथि देवो भव और वो कहते हैं तुम भी मुसलमान हो जाओ नहीं तो मैं तुम्हारा सिर काट दूंगा, तुम्हारे मंदिर तोड़ दूंगा, तुम्हारी बहु-बेटियों के साथ सामूहिक बलात्कार करूंगा, तुम्हारे धन-दौलत छीन लूँगा. हम कहते हैं मुंडे मुंडे मति भिन्नाः, तुम कहते हो सिर्फ तुम सही हो बांकी सारे न केवल गलत हैं बल्कि तुम उनको मिटा डालोगे. हम कहते हैं हम तुम्हें सुख पहुंचाएंगे तो हमारा भगवान खुश होगा तुम कहते हो तुम हमें जितना तडपाओगे तुम्हारा अल्लाह उतना ही खुश होता. हम कहते हैं हमारा भगवान हममें है तुम कहते हो तुम्हारा अल्लाह तुममें नहीं है बल्कि वो तुमसे अलग है और तुम्हारा मालिक है. वो तुम्हें आदेश देता है और तू गुलामों की तरह उसका पालन करता है.
मित्रों, कुल मिलाकर नुपूर शर्मा प्रकरण ने न केवल हजरत मोहम्मद के कुकृत्यों को दुनिया के समक्ष उजागर कर दिया है बल्कि उन अनपढ़ मुसलमानों के सामने भी उनके चरित्र को नंगा कर दिया है जिनको अबतक यह बताया जाता था कि मोहम्मद अत्यंत महान दयालु, त्यागी और उदार थे. इस मामले में अगर किसी से गलती हुई है तो डरपोक भारत सरकार से हुई है जिसने जल्दीबाजी में यह देखे बिना नुपूर शर्मा को असामाजिक बता दिया कि उसने किन परिस्थितियों में हजरत मोहम्मद की करनी पर बोला. साथ ही भाजपा ने भी उससे पल्ला झाड़कर यह बता दिया कि वो हिन्दुओं के लिए नहीं बल्कि सिर्फ सत्ता के लिए राजनीति करती है. उसे समझना चाहिए कि कोई हिन्दू धर्म को दिन-रात गालियाँ देगा तो आखिर कब तक हिन्दू बिना जवाब दिए रह सकेगा? सबसे दुखद बात तो यह है कि भारत के मुसलमान भारत को छोड़कर अरब देशों की जय-जयकार कर रहे हैं.
गुरुवार, 2 जून 2022
नीतीश, तेजस्वी और प्रशांत किशोर
मित्रों, अरस्तू ने कहा था कि लोकतंत्र मूर्खो का शासन है और ठीक कहा था. वर्तमान बिहार और भारत के सन्दर्भ में अगर हम देखें तो. जैसा कि हम सब जानते हैं कि हमारे देश में कलक्टर, डॉक्टर, पुलिस अधीक्षक, न्यायाधीश, सेनाध्यक्ष, वैज्ञानिक परीक्षा के बाद ही चुने जाते हैं. यानि देश का हर कर्मचारी कोई न कोई परीक्षा पास करने के बाद ही अपना पद पा सकता है. मगर देश की बागडोर अनपढ़ों के हाथ में क्यों? गांव वार्ड सदस्य, सरपंच, प्रधान, विधायक, नगर पालिका का पार्षद, नगर पालिका का अध्यक्ष, नगर निगम का मेयर, संसद के सदस्य, लोकसभा के सदस्य, यहां तक कि मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का भी यही हाल है. आखिर इनकी परीक्षा क्यों नहीं ली जाती? क्या इस देश का रक्षा मंत्री सेना में था? देश का स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर क्यों नहीं? देश का शिक्षा मंत्री अध्यापक क्यों नहीं? वक्त है अपनी आंखों से परदा हटाने का.
मित्रों, इसी तरह प्रसिद्ध आइरिश लेखक, पत्रकार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने प्रजातंत्र की व्याख्या कुछ इसी तरह से की है- प्रजातंत्र मूर्खों का, मूर्खों के लिए, मूर्खों द्वारा शासन है. आज हमारे देश में जिस तरीके का है शायद इसी बात की कल्पना कर ही प्रजातंत्र को ऐसे पारिभाषित की गयी है. प्रजातंत्र में प्रत्येक व्यक्ति के वोट की कीमत आँकी जाती है और उसके गणना के हिसाब से ही सरकारें बना करती हैं. वोट देने वालों में अधिकांश लोग राजनीति से बिल्कुल अनजान होते हैं, उन्हें पता हीं नहीं होता कि हम कैसी सरकार बना रहे हैं और ना ही वे जानने का प्रयास ही करते हैं. अधिकांश लोगों के जेहन में तत्कालिक घटनाक्रम ही अंकित होता है और उसी आधार पर ही सरकार बनाने के प्रयास किए जाते हैं, मतलब कि इस मामले में जनता की याददाश्त बहुत ही कमजोर होती है. चुनाव के समय जो मुद्दा सबसे ज़्यादा चर्चित होता है, जो जनता के विचार को झकझोरता है उसी मुद्दे को आधार बना कर ही जनता अपने वोट का निर्धारण करती है. जनभावनाओं के ज्वार पर बनने वाली सरकारें भी अच्छी तरह से जानती हैं कि जिस मुद्दे के आधार पर हमारी सरकारें बनी हैं वो मुद्दा कुछ समय बाद ही जनता के दिमाग़ से निकल जाएगा और फिर वे अपनी मनमानी पर उतर आती हैं और जनता बाद में ठगी सी महसूस करती रह जाती है.
मित्रों, क्या आप जानते हैं कि अपने देश को कौन लोग चला रहे हैं? अपने देश भारत को मात्र १२५० परिवार चला रहे हैं. ५ साल जब एक पार्टी हमें लूट चुकी होती है तब हम उसको सबक सिखाने के लिए फिर से उसी को जिता देते हैं जिसको हमने ५ साल पहले सत्ता से हटाया था और यह सिलसिला लगातार चलता रहता है. फिर वह दल जो पिछले ५ साल से विपक्ष में होता है और भी दोगुनी गति से देश-प्रदेश को लूटता है क्योंकि उसको पिछले ५ साल की भी भरपाई करनी होती है.
मित्रों, कश्मीर की राजतन्त्र में क्या हालत थी और आज क्या हालत है? ऐसा इसलिए है क्योंकि वहां मुसलमान बहुमत में हैं जो सभी गैरमुसलमानों मुसलमान बना देना चाहते हैं या फिर मार डालना चाहते हैं और लोकतंत्र तो बहुमत का शासन है. क्या लोकतंत्र के पास कश्मीर का ईलाज है? लोकतंत्र होने के बावजूद आज श्रीलंका और पाकिस्तान दिवालिया हैं और तानाशाही होने के बावजूद आज चीन दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है. मित्रों, अगर हम आंकड़ों पर नजर डालें तो साल १९६७ तक बिहार भारत के सबसे अग्रणी व सुशासित राज्यों में गिना जाता था लेकिन १९६७ से यानि जबसे बिहार में पिछड़ों की, जिसकी जितनी जनसंख्या में भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी की राजनीति करने वाले दलों का शासन हुआ बिहार पिछड़ता चला गया और पिछले २५-३० सालों से बिहार सबसे निचले पायदान पर शान से विराजमान है.
मित्रों, यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे नेता बड़ी चालाकी से गाल पर पड़े थप्पड़ को भी ट्राफी में बदल देते हैं. सोनू और स्वयं मेरे द्वारा समय-समय पर बिहार की दुरावस्था को लेकर उठाए गए प्रश्नों का जब नीतीश कुमार जी के पास कोई उत्तर नहीं था तब उन्होंने विकास को लात मारकर जाति-पाति की गन्दी राजनीति शुरू कर दी. आज बिहार में सीओ डीएम और एडीएम का और अदना-सा राजस्व कर्मचारी सीओ का पैसे के बल पर तबादला करवा देता है, पैसा नहीं देने पर सीओ आँख मूंदकर दाखिल ख़ारिज के आवेदन को रद्द कर देता है, स्कूलों में पढाई नहीं होती, कॉलेज में शिक्षक ही नहीं हैं, अस्पतालों में सरकार-प्रदत्त मशीनें रखे-रखे ख़राब हो रही हैं, बैंक बिना घूस लिए लोन नहीं देते, मनरेगा सबसे भ्रष्ट योजना बन गयी है, पुलिस परित्राणाय डाकुनाम विनाशाय च साधुनाम हो गई हैं लेकिन इससे नीतीश जी को कोई फर्क नहीं पड़ता उनको बस जातीय जनगणना चाहिए. नीतीश जी हज़ार बार दिल्ली गए लेकिन मोदी जी के सामने कभी विशेष राज्य के दर्जे का मुद्दा नहीं उठाया. उनको तो बस जातीय जनगणना चाहिए फिर चाहे बिहार सारे मानदंडों पर सबसे नीचे बना रहे तो बना रहे. मैं पूछता हूँ कि जातीय जनगणना से सबसे ज्यादा फायदा किसको होगा? निश्चित रूप से सबसे ज्यादा फायदा मुसलमानों को होगा क्योंकि उनके लिए बच्चे अल्लाह की देन हैं. और जिन लोगों ने राष्ट्रहित में हम दो हमारे दो के सरकारी नारे पर अमल किया वो निश्चित रूप से सबसे ज्यादा घाटे में रहेंगे क्योंकि आज नहीं तो कल जातीय जनगणना के आधार पर आरक्षण देने की मांग जरूर उठेगी.
मित्रों, फिर ऐसा कौन-सा उपाय है जिससे बिहार को फिर से देश का अग्रणी राज्य बनाया जा सके? मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि नीतीश जी को हटाकर तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाना कोई समाधान नहीं है क्योंकि दोनों में मौलिक रूप से कोई अंतर नहीं है. बिहार की जनता दोनों को देख चुकी है. दोनों की रुचि सिर्फ सत्ता प्राप्ति में है. एक नागनाथ है तो दूसरा सांपनाथ. इसलिए अगर हमें बिहार को फिर से देश का अग्रणी राज्य बनाना है तो किसी ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपनी होगी जो सिर्फ जातीय हित की बात न करके प्रदेश-हित की बात करता हो. जिसके पास दिन-प्रतिदिन की योजना हो. यह हमारा सौभाग्य है कि प्रशांत किशोर जिनमें ये सारे गुण हैं ने बिहार को बदलने की ठानी है. अगर हमें बिहार को बदलना है तो जाति-धर्म से ऊपर उठकर उनका समर्थन करना होगा अन्यथा बारी-बारी से जदयू और राजद हमें लूटती रहेंगी और हम पर भ्रष्टाचार की मार लगातार बढती जाएगी. पहले भले ही बिहारियों के सामने विकल्पहीनता की स्थिति थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. नीतीश और तेजस्वी से कहीं ज्यादा तेजस्वी और विश्वसनीय विकल्प हमारा दरवाजा खटखटा रहा है.
सोमवार, 23 मई 2022
रंजीत, सोनू और नीतीश
मित्रों, इन दिनों बिहार में मौसम बहारों जैसा भले ही हो नीतीश कुमार जी के लिए बिहार का राजनैतिक मौसम बिलकुल भी मुफीद नहीं है. एक तरफ भाजपा आरसीपी को आगे करके उनको हटाना चाहती है वहीँ दूसरी तरफ मनमोहन सिंह की तरह रेनकोट पहनकर स्नान करनेवाले नीतीश कुमार के दामन पर लगातार दाग-पर-दाग लगते जा रहे हैं. ऐसा नहीं है कि बिहार लोक सेवा आयोग में पहले गड़बड़ी नहीं होती थी. हम तो सुनते आ रहे हैं कि ५० साल पहले भी रिश्वत देने पर रैंक में सुधार कर दिया जाता था. बीपीएससी में भ्रष्टाचार था लेकिन बहुत कम. बहुत सारे युवा जो निहायत गरीब होते थे वो लालू राज में भी पास हो जाते थे लेकिन जबसे नीतीश जी मुख्यमंत्री बने हैं ऐसा होना बंद-सा हो गया है. लोग बताते हैं कि अब पूरी-की-पूरी सीट पहले ही बेच दी जाती है. आश्चर्य तो इस बात का है कि हर साल होनेवाले करोड़ों रूपये के लेनदेन के बारे में न तो ईडी और न ही सीबीआई आज तक कुछ भी पता लगा पाई है. यहाँ तक कि नीतीश जी के एक स्वजातीय नेताजी जिनसे आजकल नीतीश जी का ३६ का आंकड़ा है का नाम भाई लोगों ने वसूली भाई रख दिया था.
मित्रों, इसी क्रम में नीतीश जी के एक और घनघोर नजदीकी है जिनका नाम है रंजीत कुमार सिंह, आईएएस. रंजीत वैशाली जिले की देसरी थाने के फटिकवारा गाँव के हैं. ये गुजरात कैडर के आईएएस हैं लेकिन लगातार बिहार में प्रतिनियुक्ति पर बने हुए हैं. आईएएस बनने के कुछ सालों के भीतर ही हाजीपुर के औद्योगिक क्षेत्र में जमीन के बड़े-बड़े प्लाट की इन्हें खरीदने के लिए तलाश थी. पता नहीं कितनी जमीन खरीदी जब आर्थिक अपराध ईकाई नहीं जाने तो हम कैसे जानें. लेकिन सच तो यह है कि ऊपर-ऊपर महात्मा गाँधी बननेवाले रंजीत जहाँ कहीं भी, जिस विभाग में रहे वहां जमकर गड़बड़ियाँ हुई. फलस्वरूप उनका विभाग लगातार बदलता रहा. अभी कुछ महीने पहले ही जब प्राथमिक शिक्षकों की काउंसिलिंग का भार उनके माथे पर था तब गड़बड़ियों के कारण कई जिलों में पूरी काउंसिलिंग को रद्द करना पड़ा. फिर भी उनको दण्डित करने के बदले एक बार फिर उनका विभाग बदल दिया गया.
मित्रों, उन्हीं नीतीश जी के स्वजातीय रंजीत कुमार सिंह का नाम एक बार फिर से इन दिनों सुर्ख़ियों में है. बीपीएससी के इतिहास में पहली बार परीक्षा से पहले प्रश्न पत्र आउट हो गया है और उसके तार रंजीत कुमार सिंह से भी जुड़े हैं. आउट प्रश्न पत्र अन्य आरोपियों के अलावा रंजीत कुमार सिंह को भी व्हाट्स एप के माध्यम से भेजा गया था. आरोप तो यह भी लग रहा है कि सीतामढ़ी में उन्होंने कुछ प्रतियोगियों से पैसों की वसूली भी की थी. प्रति छात्र १० लाख. लेकिन बिहार पुलिस कह रही है कि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं. ऐसे कई लोग जिनके मोबाइल पर प्रश्न पत्र भेजा गया पुलिस की गिरफ्त में हैं लेकिन रंजीत कुमार सिंह समान सबूत मिलने के बावजूद बिहार सरकार में पंचायत विभाग के निदेशक जैसे महत्वपूर्ण पद पर बने हुए हैं और शायद बने रहकर बिहार की जनता की छाती पर मूंग दलने का काम करते रहेंगे. नीतीश जी के प्रिय जो ठहरे.
मित्रों, अभी बीपीएससी के प्रश्न-पत्र के आउट होने और जनता के बीच मामला आउट हो जाने का मामला गरम ही था कि नीतीश जी की मति मारी गई और वो अपने गाँव कल्याण बिगहा में जनता दरबार लगा बैठे. संयोग से वहां उनके पडोसी गाँव नीमाकौल का सोनू यादव भी आया हुआ था. मध्य विद्यालय नीमकौल में पढनेवाले सोनू ने हिम्मत दिखाकर मुख्यमंत्री जी को अपने पास बुलाया और फिर जो कहा उससे न सिर्फ नीतीश कुमार बल्कि पूरी बिहार सरकार सन्नाटे में आ गई. उनसे कहा कि वो निहायत गरीब परिवार से है. उसके पिता दही बेचते हैं और वो ५वीं तक के बच्चों को ट्यूशन पढाता है लेकिन उनके पिता जमकर शराब पीते हैं और अपने साथ-साथ उसकी कमाई भी पी जाते हैं. स्कूल जहाँ वो पढता है वहाँ पढाई नहीं होती. शिक्षक आते नहीं और जो आते हैं उनको कुछ भी नहीं आता. दीपक सर को बिलकुल नहीं आता. सोनू ने नीतीश जी से मीडिया के सामने कहा कि वो आईएएस बनना चाहता है लेकिन उसमें उसके पिता की पियक्कड़ी और सरकारी स्कूल में पढाई नहीं होना बाधा बन रहा है. बमुश्किल २ मिनट में छठी कक्षा में पढनेवाले ११ वर्षीय सोनू ने नीतीश कुमार के सामने उनकी सरकार की पोल खोलकर रख दी, नंगा करके रख दिया.
मित्रों, उसके बाद डैमेज कण्ट्रोल शुरू हुआ और सरकार ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे विद्यालय का दौरा भी किया करें. लेकिन सवाल उठता है कि जिन एक लाख सत्तर हजार शिक्षकों की बहाली नीतीश जी ने पंचायतों के माध्यम से करवाई उन अयोग्य शिक्षकों का वो क्या करेंगे? सोनू के स्कूल के दीपक सर जिनका सोनू ने मुख्यमंत्री जी से जिक्र किया था उन दीपक सर का क्या करेंगे जिनको एबीसीडी तक नहीं आती.
मित्रों, कुल मिलाकर इन दिनों बिहार सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ की अवस्था में है. राजस्व विभाग में भी लेटलतीफ अंचलाधिकारियों पर मेरे आलेख लिखने के बाद कार्रवाई हुई है लेकिन उन लोगों के खिलाफ कुछ भी नहीं हुआ है जो पैसा नहीं देने पर बेवजह दाखिल ख़ारिज के आवेदन को अस्वीकृत कर देते हैं. होना तो यह चाहिए कि जनता को लूट-लूट कर मोटे हो चुके राजस्व विभाग के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की संपत्ति की समदरका जांच होनी चाहिए और उसके बाद उनको सीधे बर्खास्त किया जाना चाहिए. साथ ही रंजीत कुमार सिंह की संपत्ति की भी न केवल जांच होनी चाहिए बल्कि पद से बर्खास्त कर जेल भेजना चाहिए. साथ ही सारे अयोग्य और ड्यूटी से गायब रहनेवाले शिक्षकों को घर बैठना चाहिए. साथ ही शराबबंदी को लेकर किए जा रहे पाखंड को छोड़कर पूरे मन से कार्रवाई करनी होगी. साथ ही न केवल बिहार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों बल्कि उसमें काम करनेवाले अन्य लोगों की संपत्ति की भी जांच हो और ज्यादा पाए जाने पर उनको भी जेल भेला जाए. मगर ऐसा होगा क्या?
बुधवार, 11 मई 2022
मंत्री जी को शर्म आती है
मित्रों, अभी २ साल भी नहीं हुए जब हम कथित इन्टरनेट आतंकवादियों ने बिहार विधानसभा चुनावों के समय भाजपा को जिताने के लिए अपनी जान लगा दी थी इस आशा में कि इस बार सरकार अच्छा काम करेगी जिससे भ्रष्टाचार घटेगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
मित्रों, आपलोग भी जानते हैं कि बिहार ही नहीं भारत का सबसे भ्रष्ट विभाग राजस्व विभाग है. बिहार में प्रत्येक अंचल में एक अंचलाधिकारी होता है जिसके मातहत कई हल्का कर्मचारी और अंचल निरीक्षक होते हैं. हुआ यह कि मेरी कुछ जमीन वैशाली जिले के महनार अंचल के जगरनाथपुर, हरपुर, भटगामा, गोरिगामा और फटिकवारा में है जिनके दाखिल ख़ारिज के लिए हमने १ जनवरी, 2021 को आवेदन दिया था. इसमें से जगरनाथपुर, हरपुर और भटगामा का दाखिल ख़ारिज जनवरी २०२२ में कर दिया गया. तब अंचलाधिकारी महोदय ने सम्बंधित सभी दस्तावेजों का गहराई से अध्ययन किया था. अभी कल-परसों फटिकवारा का आवेदन (आवेदन संख्या-१७२२, वित्तीय वर्ष-२०२०-२१) उन्होंने इस आधार पर अस्वीकृत कर दिया है कि दस्तावेज अपठनीय है जबकि सारे दस्तावेज वही हैं जो जगरनाथपुर, हरपुर और भटगामा के आवेदन के साथ संलग्न थे. सवाल उठता है कि जो दस्तावेज जनवरी में पठनीय थे अब अपठनीय कैसे हो गए जबकि सीओ साहब वही रमेश प्रसाद सिंह जी हैं? इतना ही नहीं कर्मचारी और सीआई ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि जमीन खतियानी है, जगरानी देवी ने न्यायालय से डिक्री प्राप्त की है और जमीन उनके कब्जे में भी है फिर भी बेवजह आवेदन को मनमाने तरीके से अस्वीकृत कर दिया गया.
मित्रों, जब हमने इस बारे में सीओ से बात की तो उन्होंने यह कहकर फोन काट दिया जो होना था हो गया अब डीसीएलआर के यहाँ अपील करिए, हम कुछ नहीं कर सकते. इस वार्तालाप का ऑडियो भी हमारे पास है. क्या यही वो रामराज्य है जिसके लाने का वादा भाजपा करती है? बिहार के राजस्व मंत्री राम सूरत राय भी भाजपा कोटे से हैं इसलिए यहाँ यह बहाना भी नहीं चलनेवाला कि मंत्री जदयू कोटे से है. मंत्री जी कई बात कह चुके हैं और सार्वजानिक रूप से कह चुके हैं कि उनके विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण उनको शर्म आती है लेकिन स्थिति में बदलाव के लिए कुछ करते नहीं. पूरे विभाग में बिना रिश्वत के पत्ता तक नहीं हिलता. पैसे दो तो दस्तावेज खूब पठनीय हो जाता है और नहीं दो पूरी तरह से अपठनीय हो जाता है. सबकुछ अंधाधुंध तरीके से चलाया जा रहा है. किसी की कोई जवाबदेही नहीं.
मित्रों, पाँचों ऊँगली घी में और सर कढ़ाई में विभागवाले मंत्री जी को क्या सचमुच में शर्म आती है या वो शर्माने का नाटक कर रहे हैं? वैसे स्वयं मोदी जी भी कोरोना टीका लेते समय स्वीकार कर चुके हैं कि नेताओं की चमड़ी मोटी होती है. अगर मंत्री जी को सचमुच शर्म आती है तो महनार के सीओ की संपत्ति की जाँच करवाते हुए पूछा जाना चाहिए कि कर्मचारी और सीआई की रिपोर्ट सकारात्मक होने के बावजूद जगरानी देवी के फटिकवारा का दाखिल ख़ारिज का आवेदन कैसे अस्वीकृत कर दिया गया? इतना ही नहीं सीओ के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करते हुए उक्त दाखिल ख़ारिज को स्वीकृत किया जाना चाहिए. आखिर हम अपील में जाकर सीओ की मनमानी का खामियाजा भुगतते हुए क्यों हजारों रूपये खर्च करें?
मंगलवार, 3 मई 2022
नेहरु बनते मोदी
मित्रों, यह कार्टून सिर्फ एक कार्टून नहीं है बल्कि हिन्दुओं के देश हिंदुस्तान में हिन्दुओं की स्थिति को बयान करती पूरी किताब है. आजादी के बाद से ही यह हालत है, यही हालत है. आप चाहें तो फोटोशोप कर नेहरु को हटाकर मोदी को लगा सकते हैं, मोहन भागवत या इन्द्रेश कुमार को लगा सकते हैं सच्चाई में कोई फर्क नहीं पड़ेगा.
रविवार, 24 अप्रैल 2022
कबीरा आप ठगाईए
मित्रों, मुझे पूरा यकीन है कि आप भी संत कबीर के इस दोहे से परिचित होंगे-
कबीरा आप ठगाईए और न ठगिए कोय,
आप ठगे सुख उपजे और ठगे दुख होय.
सो मैंने बचपन में जबसे इस दोहे को पढ़ा इसे अपना जीवन-मंत्र बना लिया. बार-बार मुझे ठगा गया लेकिन मैंने कभी किसी को नहीं ठगा. लेकिन अब तो स्थिति भयावह हो चली है. अब ठगी एक कला बन गई है, योग्यता का पैमाना बन गई है और इस कला को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया है भारत के सॉफ्टवेयर ईंजिनियरों ने. एक वेबसाइट बना लिया और हफ्ते-दो-हफ्ते तक लोगों को लूटने के बाद बंद कर दिया. झारखण्ड का जामतारा इनकी राजधानी है. वैसे तो मुझे अभिमान था कि मेरे साथ अब तक साईबर ठगी नहीं हो पाई है लेकिन पिछले वर्ष वह अभिमान भी खंड-खंड हो गया.
मित्रों, वैसे तो मेरा पूरा जीवन धूप में छाँव के ठंडे साए खोजते हुए बीता है लेकिन साल २०२१ में तो जैसे मुझ पर गम के इतने पहाड़ एक साथ टूटे कि रोजाना मुझे रिश्तों के नए-नए रूप देखने को मिले. पिताजी इस नाफानी दुनिया से दूर जा चुके थे कुल ८५ हजार की जमा पूँजी यानी अपने एक महीने के पेंशन के बराबर पैसा छोड़कर. माँ के बक्से से मात्र १९ हजार रूपये निकले. किसी तरह से हमने अपने बल पर पिताजी का श्राद्ध किया लेकिन उसके तत्काल बाद मेरे सामने वही सबसे बड़ा सवाल मुंह बाए खड़ा था कि अब आगे दाल-रोटी कैसे चलेगी. मेरी बेचैनी चरम पर थी. पिताजी के पिछले माह के पेंशन में से तीस हजार रूपये मेरे खाते में थे लेकिन हमारा एक महीने का मकान का किराया ही १० हजार था, फिर खाने-पीने, कपड़े, बच्चे की स्कूल फीस. ऐसा लगता था जैसे किसी भी समय मेरे सर के सौ टुकड़े हो जाएंगे.
मित्रों, फिर मैंने सोंचा कि क्यों न टाइम्स जॉब से संपर्क किया जाए सो मैंने टाइम्स जॉब की वेबसाइट पर जाकर नौकरी के लिए आवेदन दिया. अभी चौबीस घंटे भी नहीं बीते थे कि १ फरवरी, २०२१ को मेरे पास 7440268569 नंबर से एक लड़की का फोन आया कि क्या आपने कल टाइम्स जॉब पर नौकरी के लिए आवेदन दिया था? फिर उसने वो सारे विवरण मुझे बताए जो मैंने अपने आवेदन में भरे थे. फिर उसने बताया कि आपके लिए कई सारे ऑफर आए हैं बस आपको हम एक लिंक एसएमएस कर रहे हैं आप उस पर जाकर १०० रूपये का ऑनलाइन पेमेंट कर दीजिए. फिर मुझे इसी नंबर से एक लिंक timejobsservice.com भेजा गया. जब मैंने सौ रूपये का पेमेंट करने के लिए मेरे बैंक आईसीआईसीआई द्वारा भेजा गया ओटीपी डाला तब मेरे खाते से १०० रूपये के बदले १९८५६ रूपये कट गए. सबसे आश्चर्य की बात तो यह थी कि बैंक द्वारा भेजे गए ओटीपी वाले एसएमएस में खाते से कितनी राशि निकलनेवाली है का जिक्र ही नहीं था जबकि सरकारी बैंकों से आनेवाले इस तरह के एसएमएस में राशि का भी जिक्र होता है. जैसे ही आईसीआईसीआई बैंक से १९८५६ रूपये कटने का एसएमएस आया मैं समझ गया कि मेरे साथ साईबर फ्रॉड हुआ है. इसके बाद जब मैंने 7440268569 पर फोन किया तो लड़की जो अपना नाम नेहा बता रही थी मुझे पैसा वापस कर देने का झूठा दिलासा देने लगी. जब मैं उस पर नाराज हो गया तो बोली जाओ नहीं करते पैसे वापस क्या कर लोगे?
मित्रों, फिर मैं भागा-भागा आईसीआईसीआई की हाजीपुर शाखा में गया लेकिन मैनेजर ने किसी भी तरह का आवेदन लेने से मना कर दिया. फिर मैंने बैंक के कस्टमर केयर पर फोन कर मेरे साथ हुई घटना की सूचना दी. कस्टमर केयर ने बताया कि आपकी शिकायत जांच के लिए दर्ज कर ली गई है कुछ दिनों में समाधान भी हो जाएगा. इस बीच मेरे खाते में १९८५६ रूपये भी डाल दिए गए मगर वो पैसा सिर्फ दीखता था मैं उसे निकाल नहीं सकता था.
मित्रों, इसके बाद मैं नगर थाना हाजीपुर गया और मामले की एफआईआर कर जाँच करने के लिए आवेदन दिया. मुंशी बोले कि अभी थानेदार फिल्ड में हैं आवेदन दे दीजिए और कल आकर पता कर लीजिएगा. फिर तो जैसे टहलाने का सिलसिला ही चल पड़ा. पहले तो थानेदार सुबोध सिंह ने कहा कि मामला छोटा है, बीस हजार का ही है, मुंशी से पता कर लीजिए कि एफआईआर हुआ कि नहीं. जब मैं मुंशी के पास गया तो उसने कहा कि उसे कुछ भी पता नहीं है थानेदार से पूछिए. कई दिनों की भागदौड़ के बाद जब मैं थानेदार पर बरस पड़ा तो उसने टका-सा जवाब दिया कि शहर में इतनी हत्या-चोरी-लूटपाट की घटनाएँ हो रही है हम उनको देखें या आपके केस को देखें. फिर मैंने बिहार पुलिस से उम्मीद ही छोड़ दी. मैं कोई प्रधानमंत्री की भतीजी तो था नहीं कि थानेदार मेरे पैसों को वापस दिलाने का जीतोड़ प्रयास करता.
मित्रों, इससे पहले मैं घटना की शाम ही हाजीपुर के हिंदुस्तान कार्यालय का दरवाजा भी खटखटा चुका था. २००००रू की रकम पुलिस की नजर में भले ही बहुत छोटी हो लेकिन मेरे लिए काफी बड़ी थी. मैंने सोंचा कि पहले मैं हिंदुस्तान, पटना में रहा हूँ और हाजीपुर, हिंदुस्तान के कई स्टाफ तब मेरे सहकर्मी थे इसलिए पुलिस न सही मेरे पुराने साथी तो मेरे लिए कुछ-न-कुछ अवश्य करेंगे. लेकिन वहां भी मुझसे सारी सूचनाएँ ले ली गईं मगर मेरे साथ हुई घटना को अख़बार में स्थान नहीं दिया गया. शायद उनको मुझसे भी पैसों की उम्मीद थी.
मित्रों, मेरे भीतर क्रोध का ज्वालामुखी फट रहा था. मैंने तत्काल घर लौटते ही पहले 1 फरवरी को नमो ऐप पर और फिर २ फरवरी को केन्द्रीय गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर जाकर साईबर क्राइम सेल में अपनी शिकायत दर्ज कराई.
मित्रों, इस बीच दिनांक ६ फरवरी को मेरे खाते से बैंक ने १९८५६ रूपये निकाल लिए. फिर मैंने बैंक के नोडल अधिकारी के पास ऑनलाइन शिकायत की. लेकिन दिनांक १९ फरवरी को उन्होंने भी मेरे पैसा वापस करने के आवेदन को रद्द कर दिया. फिर मैंने पटना स्थित रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के बैंकिंग लोकपाल के पास शिकायत की. लेकिन ३१ जुलाई, २०२२ को उन्होंने भी मेरे दावे को नकार दिया. मैंने उससे यह भी निवेदन किया था कि वो बैंक को आदेश दे कि वो ओटीपी के साथ निकलनेवाली राशि को भी एसएमएस में शामिल करे लेकिन उसने ऐसा कोई आदेश भी नहीं दिया.
मित्रों, इस बीच १४ फरवरी को मुझे वैशाली लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी ने फोन करके बुलाया और कहा कि आपने जो केन्द्रीय गृह मंत्रालय के साईबर अपराध सेल में शिकायत की थी उसका निस्तारण कर दिया गया है. उन्होंने मुझे यह भी बताया कि ऐसे मामलों में कुछ नहीं होता है.
मित्रों, मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि इस समय भारत की स्थिति क्या है मेरा मामला इसका लिटमस टेस्ट है? वर्तमान भारत में सबकुछ जैसे माया है, दिखावा है. अगर आप प्रधानमंत्री की भतीजी नहीं हैं तो देश में आपकी कोई सुननेवाला नहीं है. मुझे अपने पैसे खोने का गम तो है लेकिन उससे भी बड़ा गम इस बात का है कि भविष्य में दूसरे लोगों के साथ ऐसा न हो इसके लिए इंतजाम भी नहीं किए जा रहे हैं. क्या कोई टाइम्स जॉब से पूछेगा कि जो सूचना उनके पास थी ठगों के पास कैसे चली गई? क्या कोई भारत के बैंकों को इस बात के निर्देश देगा कि भविष्य में जब ओटीपी भेजी जाए तो उसके साथ खाते से निकलनेवाली राशि का ब्यौरा भी भेजा जाए? या फिर ग्राहकों के साथ ठगों द्वारा फ्रॉड होने के बाद सरकार द्वारा भी फ्रॉड किया जाता रहेगा? सिर्फ औपचरिकता से कुछ नहीं होगा सरकार को अपनी नीयत ठीक करनी पड़ेगी. मोदी जी को यह साबित करना होगा कि अब तक जो चल रहा था वो सचमुच नहीं चलेगा. परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्.
मंगलवार, 12 अप्रैल 2022
मोदी गांधी हैं या सावरकर
मित्रों, हमारे इतिहास में एक काला अध्याय है तुगलक वंश. इस वंश ने दिल्ली पर १३२० से लेकर १४१४ तक शासन किया. इस वंश का सस्थापक गयासुद्दीन तुगलक था जिसका मकबरा आज भी दिल्ली के तुगलकाबाद में है. गयासुद्दीन जब खिलजियों का सेनापति था तब उसने बहुत सारे मंदिर तोड़े, देव प्रतिमाएं खंडित की, हजारों निर्दोष, निरपराध हिन्दुओं को बेवजह मारा, हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार किए और करवाए, हजारों हिन्दू महिलाओं को सरेबाजार बेचा, हजारों हिन्दू बच्चों को हवा में उछाल कर भालों से बींध कर मार डाला और इन सभी अमानवीय क्रूर कर्म के बदले में गाजी तुगलक का ख़िताब पाया. लेकिन जब १३२० में वही गाजी तुगलक अर्थात गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली के तख़्त पर बैठा तो अचानक अजीबोगरीब हरकतें करने लगा. वो सिंहासन पर सर रखकर रोने लगता और बलबन और अलाउद्दीन खिलजी का नाम ले-लेकर छाती पीटने लगता. उसके परिजन और सिपहसलार आश्चर्यचकित और परेशान थे कि जो गाजी तुगलक कभी काफिरों यानि हिन्दुओं के लिए कहर था वो रोंदू कैसे हो गया? हालाँकि इस बात के प्रमाण नहीं मिलते कि गयासुद्दीन कभी हिन्दुओं के प्रति उदार भी हुआ था.
मित्रों, मुझे लगता है कि हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी भी इस समय इसी बीमारी यानि गाजी तुगलक सिंड्रोम से ग्रस्त हैं. मोदी जब तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे तब तक मुंहजबानी ही सही हिन्दुओं के कट्टर पैरोकार रहे और उन मुसलमानों के खिलाफ लगातार बोलते रहे जिनका कुरान हिन्दुओं को लूट लेने, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार करने और हिन्दुओं को जान से मार देने का खुला और स्पष्ट आदेश देता है. जुमलावीर मोदी जब तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे अपने जुमलों में सावरकर के अनन्य प्रशंसक और भक्त रहे. उन सावरकर के जिन्होंने कहा था कि मुस्लिम तुष्टिकरण बंद होना चाहिए और भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए लेकिन वही मोदी जब भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनका एक अलग ही रूप दिखाई देता है. मोदी अचानक सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास का नारा लगाने लगते हैं. ठीक उसी तरह वे विरोधाभासी बातें करने लगते हैं जैसे कभी गाजी तुगलक करता था. लगता है जैसे मोदी के भीतर गाजी तुगलक की आत्मा घुस गई है.
मित्रों, आज तक कांग्रेस पार्टी जिन मुसलमानों को मिठाई दिखाकर लोलीपोप चटा रही थी उन्हीं मुसलमानों को मोदी आईएएस-आईपीएस बनाने लगे, जिन मुसलमानों को पैसों को लाले थे उन्हीं मुसलमानों के लिए भारत सरकार के अल्पसंख्यक मंत्रालय ने पैसों की बरसात कर दी. छात्रवृत्ति, पक्का मकान, सस्ता लोन, मुफ्त का राशन आदि. लेकिन उससे हुआ क्या? मेरे एक छात्र ने जो मुज़फ्फरनगर की मशहूर फ़िल्मी हस्ती का बेटा है ने पिछले दिनों जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव चल रहे थे तब मुझे फोन कर बताया था कि इस बार यूपी में योगी वापसी नहीं करने वाले क्योंकि भाजपा को मुसलमानों का एक भी वोट नहीं मिलनेवाला है. इस दौरान बात करते हुए उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. मैंने उससे पूछा कि फिर तो मुसलमान नमकहराम हैं तो उसने कहा कि आपको जो समझना है समझिए लेकिन योगी-मोदी मुसलमानों को फूटी आँख नहीं सुहाते. मैं सन्नाटे में था क्योंकि एक धनाढ्य परिवार से होते हुए भी उस छात्र को योगी सरकार से हजारों रूपये की छात्रवृत्ति मिली थी. बाद में मैंने पढ़ा कि जिस बूथ पर भारत के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख़्तार अब्बास नकवी ने मतदान किया था वहां भाजपा को मात्र दो मत मिले. इसका मतलब साफ़ था कि स्वयं नकवी के परिजनों ने भी भाजपा को वोट नहीं दिया. इतना ही नहीं भाजपा की जीत का जश्न मनानेवाले कई मुसलमानों की खुद मुसलमान ही हत्या कर चुके हैं. फिर भी मोदी न जाने किन सपनों में खोये हुए हैं सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास. शायद इस तरह के सपनों को ही अंग्रेजी में फूल्स ड्रीम कहते हैं.
मित्रों, मोदी मुसलमानों को एक हाथ में कुरान और दूसरे में लैपटॉप पकडाने वाले हैं और सोंच रहे हैं कि ऐसा कर देने भर से वो पूंछविहीन पशु इन्सान बन जाएँगे जबकि सच्चाई यह है कि जबतक उनके एक हाथ में कुरान है वो न तो सर्वधर्मसमभाव का पालन करेंगे और न ही भारत को अपनी पुण्यभूमि ही मानेंगे बल्कि यही कहते रहेंगे कि करदे फकत इशारा अगर शाहे खुरासान सजदा न करूं हिंद की नापाक जमीन पर. अभी-अभी हमने गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर पर हमला होते हुए देखा है. एक बेहद कुशाग्र बुद्धिवाले आईआईटी से स्नातक मुसलमान ने जन्नत के लालच में आकर यह हमला किया. उसके भी एक हाथ में कुरान था और दूसरे में लैपटॉप लेकिन दिमाग में सिर्फ कुरान था, जहर था. आधुनिकता और उदारता उसे छू तक नहीं गयी थी. असली चीज दिमाग को बदलना है जो कुरान होने नहीं देगा. ये लोग लैपटॉप से अच्छी बातें नहीं सीखेंगे बल्कि बम बनाना सीखेंगे. पूरे देश में जहाँ भी बम बनाते हुए लोग मारे जाते हैं वे सारे-के-सारे मुसलमान होते हैं क्यों? मुसलमान चाहे भारत का उपराष्ट्रपति बना दिया जाए या उच्च पदाधिकारी वो मूलत: जिहादी होता है। एकाध अपवाद भी हैं कलाम साहेब की तरह लेकिन वे एकाध ही हैं।
मित्रों, इतना ही नहीं हम देख रहे हैं कि दिल्ली के क़ुतुब-परिसर से इस बात के सबूत मिटाने के प्रयास हो रहे हैं कि वहां की इमारतें हिन्दू-मंदिरों को तोड़ कर बनाए गए थे. समझ में नहीं आता कि मोदी चाहते क्या हैं? मुसलमानों को खुश करने के लिए जो काम गाँधी नामधारी कान्ग्रेस के नेता नहीं कर पाए वो काम मोदी कर रहे हैं. जबकि वो भी जानते हैं कि उपदेशो हि मूर्खाणां, प्रकोपाय न शान्तये। पयःपानं भुजंगानां केवल विषवर्धनम्।। जो पत्थरबाजी पहले सिर्फ कश्मीर तक सीमित थी अब मोदी राज में पूरे भारत में हो रही है. भारत की राजधानी दिल्ली तक में ऐसा कोई महीना ऐसा कोई हफ्ता नहीं जाता जब मुसलमानों के हाथों किसी हिन्दू की हत्या न हुई हो लेकिन इन्द्रेश कुमार और मोहन भागवत जी मुसलमानों में हिन्दुओं का डीएनए ढूँढने में लगे हैं. जिस तेजी से इस्लाम के बारे में सच बोलने पर यति नरसिंहानन्द सरस्वती को जेल में बंद कर दिया जाता है उससे तो यह लगने लगा है कि मोदी जी ने भारत को पाकिस्तान बना दिया है जहाँ ईश निंदा कानून लागू है. गजब तो यह है कि जब तक एक भारतीय वसीम रिजवी रहता है तब तक कुरान पर सवाल उठाने के बावजूद आजाद रहता है मगर जैसे ही वो जीतेंद्र नारायण त्यागी बन जाता है भाजपा सरकार द्वारा जेल में डाल दिया जाता है.
मित्रों, हमारे देश में न तो गांधियों की कमी रही है और न ही उन गाँधी के अनुयायियों की जिनके तुष्टिकरण के कारण भारत के तीन टुकड़े हुए. फिर मोदी क्यों गाँधी बनना चाहते हैं? हमें न तो और पाकिस्तान चाहिए और न ही गाँधी. हमें तो सावरकर चाहिए जो एक ही हुए हैं. हमें नहीं चाहिए भगवान राम की शोभायात्रा पर पत्थरों की बरसात बल्कि हमें तो पत्थरबाजों के घरों पर बुलडोजर चलानेवाला नेता चाहिए. अब तो गुजरात में भी जेहादी फिर से सर उठाने लगे हैं और कई मुस्लिमबहुल ईलाकों से हिन्दुओं को भगा रहे हैं. मोदी ने २००२ के गोधरा दंगों के बाद गुजरात में बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद् के कार्यकर्ताओं पर जिस तरह की कठोर कार्रवाई की विशेषज्ञों का मानना है कि यह उसी का परिणाम है कि आज गुजरात में हिन्दुओं को क्रूरकर्मा मुसलमानों से बचानेवाला कोई बचा ही नहीं. बंगाल और केरल में हिन्दुओं को मरता देख कर भी जिस तरह मोदी ने अपनी दोनों आँखों और कानों को मूँद रखा है उससे भी यही लगता है कि मोदी सावरकर कम गाँधी ज्यादा हैं और थोडा-थोडा जिन्ना भी.
गुरुवार, 7 अप्रैल 2022
तेजस्वी सो रहे हैं कृपया हॉर्न न बजाएँ
मित्रों, कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता मालिक होती है लेकिन बिहार में लोकतंत्र और जनता की दशा को देखकर तो ऐसा लगता है कि लोकतंत्र में जनता भिखारी होती है. फिर एक समय बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू जी ने मंच से यह कहा था कि अब राजा रानी के पेट से पैदा नहीं होगा लेकिन वास्तविकता यह है कि लालू जी ने खुद अपने बाद पहले अपनी पत्नी को बिहार की महारानी बना दिया और अब अपने बेटे को महाराजा बनाने की फ़िराक में हैं.
मित्रों, यह हमारे विधानसभा क्षेत्र राघोपुर का दुर्भाग्य है कि लालूजी के वही छोटे बेटे जिनको लालू जी बिहार का महाराजा बनाना चाहते हैं हमारे विधायक हैं लेकिन सिर्फ कहने को विधायक हैं. राघोपुर प्रखंड में सरकारी योजनाओं और सुविधाओं की स्थिति पूरे बिहार में सबसे ज्यादा ख़राब है लेकिन तेजस्वी यादव को इससे कोई मतलब नहीं. वो तो न जाने किस दुनिया में खोये हुए हैं. राघोपुर प्रखंड में शिक्षा की स्थिति इतनी ख़राब है कि रोजाना स्कूलों का ताला खुल जाए तो गनीमत समझिए. शिक्षक आते ही नहीं फिर ताला खोलेगा कौन? शिक्षा निजी शिक्षकों और ट्यूटरों के भरोसे किसी तरह अंतिम सांसें ले रही है. एक समय बिहार के तदनुसार राघोपुर प्रखंड के सरकारी विद्यालय पूरे भारत के लिए उदाहरण थे. आज वे बदहाली के प्रतीक बन गए हैं.
मित्रों, इसी तरह से स्वास्थ्य-सुविधाओं के क्षेत्र में भी राघोपुर प्रखंड की हालत काफी पतली है. यहाँ के अस्पतालों को अस्पताल कहना अस्पताल की परिभाषा को गाली देने के समान है. न बेड, न उपकरण और न ही डॉक्टरों का आगमन. जैसे विद्यालय कागज पर चल रहे वैसे ही अस्पताल भी कागज पर न सिर्फ चल रहे हैं बल्कि दौड़ रहे हैं. कई बार अधिकारी भटकते हुए अस्पताल में विशेष रूप से मोहनपुर रेफरल अस्पताल में पहुँच भी जाते हैं. बदहाली पर नाराजगी जताते हैं. सुधार लाने के निर्देश देते हैं और सो जाते हैं. एकाध बार तो तेजस्वी भी ऐसा कर चुके हैं.
मित्रों, इसी तरह राघोपुर प्रखंड में स्थापित ४० सरकारी नलकूपों में से एक भी चालू नहीं है लेकिन इससे तेजस्वी यादव का क्या सरोकार? उनको थोड़े ही राघोपुर में गेंहूँ-धनिया की खेती करनी है. वो तो वोटों की खेती करते हैं और इस नए तरह के राजतन्त्र में बिहार की सबसे बड़ी राजनैतिक रियासत के राजकुमार हैं.
मित्रों, अब हम आते हैं राघोपुर प्रखंड के किसानों की सबसे बड़ी समस्या पर. हुआ यह कि जब आजादी के बाद बिहार में भूमि-सर्वेक्षण चल रहा था तब राघोपुर के बहुत सारे किसानों की जमीन गंगा नदी में थी. सरकार ने उसे गंगशिकस्त घोषित कर अपने नाम कर लिया और किसानों से कहा कि जब जमीन पानी से बाहर निकलेगी तब किसानों को लौटा देंगे. मगर ऐसा हुआ नहीं. वो जमीन आज भी बिहार सरकार के पास है. अब कुछ समय के बाद जब राघोपुर प्रखंड में भूमि-सर्वेक्षण होगा तब अगर ये जमीन किसानों को लौटाई नहीं गई तो राघोपुर के किसानों की लाखों एकड़ जमीन छिन जाएगी, लुट जाएगी. लेकिन इससे भी कदाचित तेजस्वी जी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि न तो वे राघोपुर के निवासी हैं और न ही राघोपुर में उनकी ऐसी कोई जमीन है जो गंगशिकस्त की श्रेणी में आती हो.
मित्रों, कुल मिलाकर राघोपुर की जनता के दोनों ही हाथ खाली हैं. सांसद पशुपति कुमार पारस भी गायब हैं और विधायक तेजस्वी तो गायब हैं ही. यह हमारा दुर्भाग्य है कि दोनों आधुनिक राजपरिवार से हैं. दोनों मानते हैं कि जनता जाति-पांति और विरासत के नाम पर उनको ही जिताएगी. जहाँ तक हम समझते हैं कि लोकतंत्र में नेता नेतृत्वकर्ता होता है इसलिए उसे सबसे आगे होना चाहिए. जनता जो मन ही मन सोंचे नेता को उसकी गर्जना करनी चाहिए, जहाँ जनता के कदम जाकर रूकें नेता को वहां से शुरुआत करनी चाहिए. नेता को जनता के आगे चलना चाहिए लेकिन यहाँ तो नेता सोया हुआ है. दुर्भाग्यवश हमारे विधायक बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता भी हैं. सवाल उठता है कि जो व्यक्ति अपनी विधानसभा तक का यानि कुछेक वर्ग किलोमीटर का ख्याल नहीं रख सकता हो वो भला कैसे पूरे बिहार का ख्याल रखेगा? फिलहाल तो हम आपसे यही कहेंगे कि जब भी आप तेजस्वीजी के आवास के पास से गुजरें तो कृपया हॉर्न न बजाएं क्योंकि तेजस्वी सो रहे हैं.
शनिवार, 2 अप्रैल 2022
नाथ अनाथन की सुध लीजै
मित्रों, मैं कई वर्षों से बराबर बिहार के अख़बारों में यह खबर पढता चला आ रहा था कि पोल पर करंट लगने से फलाने गाँव के फलाने बिजली मिस्त्री की मौत हो गयी. मेरी समझ में नहीं आता था कि ऐसा हो कैसे जाता है. लेकिन जब परसों मेरी ससुराल वैशाली जिले के देसरी थाने के भिखनपुरा में ऐसी ही घटना घट गई तब समझ में आया कि वास्तव में हो क्या रहा है और पोल पर करंट लगने से मरनेवाले हैं कौन.
मित्रों, हुआ यह कि परसों सुबह से ही पूरे भिखनपुरा पंचायत की बिजली गई हुई थी. सुबह से ही लोग बिजली आपूर्ति कंपनी के दफ्तर में फोन पर फोन किए जा रहे थे. दोपहर में जेई और सरकारी लाइन मैन चकमगोला के मुकेश सिंह के घर पहुंचे. मुकेश निजी तौर पर बिजली मिस्त्री का काम करता था. बिहार में बेरोजगारी इतनी ज्यादा है कि प्रत्येक सरकारी बिजली मिस्त्री कई सारे निजी बिजली मिस्त्रियों को अपने साथ रखते हैं और ज्यादातर मामलों में ये निजी मिस्त्री ही पोल पर चढ़कर यांत्रिक त्रुटि को दूर कर बिजली आपूर्ति की पुनर्बहाली को सुनिश्चित करते हैं.
मित्रों, पेट जो न कराए. मुकेश उन दोनों के साथ दौड़ा-दौड़ा भिखनपुरा आया. पोल पर चढ़ने से पहले उसने जेई और लाइन मैन से पूछा कि शट डाउन तो ले लिया है न? उनदोनों के हामी भरने के बाद वो जैसे ही पोल पर चढ़ा उसे करंट लग गया क्योंकि शट डाउन नहीं लिया गया था. बेचारा ऊंचाई से सर के बल पक्की सड़क पर आ गिरा. उसके गिरते ही जेई और लाइन मैन भाग गए. गांववालों ने उसे आनन-फानन में अस्पताल पहुँचाया लेकिन तब तक मुकेश दम तोड़ चुका था.
मित्रों, बिजली कम्पनी का सितम यहीं तक नहीं रूका. कंपनी ने उलटे मुकेश पर पोल पर चढ़कर तार चुराने का मुकदमा थाने में दर्ज करवा दिया. कल जब मुकेश के गाँववालों ने सड़क जाम कर दिया तब प्रशासन ने लाइन मैन कृष्ण कुमार सिंह और जेई के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया और मृतक मिस्त्री के परिजनों को ४ लाख रूपया मुआवजा देने का आश्वासन दिया.
मित्रों, सवाल उठता है कि क्या ४ लाख में मुकेश के परिवार की जिंदगी पार लग जाएगी? चार लाख का मुआवजा तो बिहार में उन आम आदमी के परिजनों को भी दिया जाता है जो करंट लगते से मरते हैं. फिर क्या अंतर है पोल पर चढ़नेवाले बिजली मिस्त्रियों और आम आदमी में? सवाल उठता है कि जिन निजी मिस्त्रियों से बिजली कंपनी काम ले रही है उनका रजिस्ट्रेशन कर उनका बीमा क्यों नहीं करवाती? आखिर कब तक मुकेश जैसे पेट के मारे निजी मिस्त्री बेमौत मरते रहेंगे और कब तक उनको आम आदमी की तरह ४ लाख का मुआवजा दिया जाता रहेगा? मेरा मानना है कि जो समाज के लिए, समाज के हित के लिए, समाज के सुख के लिए अपनी जान पर खेलता है और जान कुर्बान करता है वो शहीद है फिर चाहे वो सीमा पर खड़ा सैनिक हो या पोल पर चढ़नेवाला बिजली मिस्त्री. आखिर कब तक इन गुमनाम शहीदों के साथ, उनके मानवाधिकारों के साथ अन्याय होता रहेगा? क्या बिहार और भारत सरकार इन अनाथों की सुध लेगी या फिर जैसे चलता आ रहा है चलता रहेगा?
रविवार, 20 मार्च 2022
कश्मीरी हिन्दुओं की चीत्कार है द कश्मीर फाइल्स
मित्रों, जब हम बच्चे थे तब हमने पढ़ा था कि जब भारत ने १९७४ में पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण किया था तब पूरी दुनिया में इसका विरोध हुआ था. सबसे ज्यादा विरोध वो देश कर रहे थे जिनके पास परमाणु बमों का जखीरा था. तब भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में एक शेर कहा था कि हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती.
मित्रों, कुछ इसी तरह की स्थिति पिछले ३२ सालों से कश्मीरी हिन्दुओं की है. उनकी आँखों से लगातार आंसू बहते रहे लेकिन आंसू पोछना तो दूर किसी ने उनके दर्द को जानने-समझने की जरुरत ही नहीं समझी. उलटे जिस कौम के लोगों ने उनके साथ अविश्वसनीय अत्याचार किए उसको ही सियासत ने पीड़ित घोषित कर दिया. किसी हिन्दू युवती को सामूहिक बलात्कार के बाद लकड़ी चीरने वाले आरी से जीवित अवस्था में ही बीचों बीच चीर दिया गया तो किसी को चावल के डिब्बे में मारने के बाद उनके परिजनों को अपनों के खून से सना चावल खाने को बाध्य किया गया तो किसी शिक्षक को उसके ही मुसलमान शिष्य ने सिर्फ इसलिए गोली मार दी क्योंकि वो हिन्दू था और मारने के बाद उसके शव पर पेशाब किया.
मित्रों, एक साथ कश्मीर की हजारों मस्जिदों से घोषणाएं होने लगी कि महिलाओं को छोड़कर पुरुष हिंदू तत्काल कश्मीर घाटी से निकल जाएं. कुछ ही दिनों के भीतर पूरी-की-पूरी कश्मीर घाटी हिन्दूविहीन हो चुकी थी. सीआरपीएफ को गांवों से शहरों में भेजने के बाद मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने इस्तीफा दे दिया था और लन्दन में गोल्फ खेलने चले गए थे. कश्मीर घाटी कई दिनों तक पुलिस-प्रशासन विहीन थी. मुस्लिम पड़ोसियों की जैसे ईच्छा हुई उन्होंने हिन्दुओं पर अत्याचार किए. हिन्दू अपना अतीत, अपना सबकुछ छोड़कर कश्मीर घाटी छोड़कर भागा. कोई जम्मू में आ टिका तो कोई दिल्ली में तो कोई इंदौर या किसी अन्य शहर में. सबने फिर से शून्य से जिन्दगी शुरू की. आरम्भ में भीख भी मांगनी पड़ी लेकिन उन्होंने बदले की भावना से बंदूक नहीं उठाई बल्कि कलम को चुना. बड़े ही सुनियोजित तरीके से लाखों साल पुरानी एक संस्कृति को तलवार और अत्याचार के बल पर समाप्त कर दिया गया.
मित्रों, फिर भी साहित्य से लेकिन फिल्म तक दशकों तक जानबूझकर उन लोगों को पीड़ित बताया जाता रहा जिन्होंने जन्नत की चाह में जन्नते कश्मीर को जहन्नुम में बदल दिया था और हिन्दुओं को अपने ही देश में दर-ब-दर भटकने के लिए मजबूर कर दिया था. तब न तो वैश्विक मीडिया और न ही संयुक्त राष्ट्र संघ के माथे पर पसीना आया था जबकि वही मीडिया और वही संयुक्त राष्ट्र संघ सीरिया के एक बच्चे के शव को देखकर दहाड़े मार-मार कर रोने लगे थे. आज भी भारत सहित पूरी दुनिया जेहादी हिंसा और कट्टरपन से परेशान है लेकिन पूरी तरह से अप्रासंगिक हो चुके संयुक्त राष्ट्र संघ को उलटे इस्लाम की बदनामी की चिंता है. इस्लाम अगर बदनाम है तो अपनी करतूतों से और उस बदनामी के कलंक को दूर करने की जिम्मेदारी पूरी-की-पूरी मुसलमानों की है. जब कृत्य राक्षसों जैसे होंगे तो आलोचना ही होगी प्रशंसा नहीं.
मित्रों, हद तो तब हो गई जब एक निर्देशक ने कश्मीरी हिन्दुओं के आंसुओं को अभिव्यक्ति देने की कोशिश की एक फिल्म द कश्मीर फाइल्स बनाकर तब फिल्म को नफरत पैदा करने का प्रयास बता दिया गया. मानो मुसलमान ११९२ से ही हिन्दुओं से एकतरफा प्यार करते आ रहे हैं और हिन्दू हैं कि उनसे नफरत ही करते जा रहे हैं. १९९० में कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार के बाद भी गोधरा में मुसलमानों ने हिन्दुओं को जिन्दा जलाया, दिल्ली में दंगे किए और देशभर में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा की हजारों घटनाओं को अंजाम दिया. कल-परसों भी होली खेल रहे हिन्दुओं के ऊपर कई स्थानों पर मुसलमानों ने पथराव किए हैं, गोलियां चलाई हैं. कई स्थानों पर तो इस फिल्म के दर्शकों पर भी हमले किए गए हैं. आखिर ये कैसा भाईचारा है जो एकतरफा है. अगर यह भाईचारा है तो नहीं चाहिए हमें हिन्दुओं की जान और माल की कीमत पर भाईचारा. अगर हिन्दुओं की चीत्कार और दर्द को सामने लाने से किसी की पोल खुलती है तो जरुर खुलनी चाहिए. बल्कि हिन्दूबहुल हिंदुस्तान की सियासत से यह पूछना चाहिए कि यदि भारत के सारे नागरिक कानून की नजर में समान हैं तो क्यों हिन्दुओं के हत्यारे १९९० के बाद दशकों तक खुलेआम घूमते रहे, कुछ तो प्रधानमंत्री से हाथ मिलाते देखे गए और कुछ तो आज भी आजाद घूम रहे हैं? मैं साधुवाद देना चाहूँगा विवेक रंजन अग्निहोत्री जी को कि उन्होंने हिंदुस्तान में कश्मीरी हिन्दुओं के दर्द को दुनिया के सामने रखा, उन्होंने इस्लाम के खौफनाक चेहरे को बेनकाब करने का साहस किया. हम उम्मीद करते हैं कि वो १९८४ के सिखविरोधी दंगों, गोधरा आगजनी और दिल्ली के दंगों पर भी फिल्म बनाएँगे जिससे भारतविरोधी शक्तियों की पहचान हो सके और तदनुसार भारत सरकार हिन्दुओं और हिंदुस्तान की रक्षा के लिए अपेक्षित कदम उठा सके.
गुरुवार, 10 मार्च 2022
यूपी में सुशासन और हिंदुत्व की जीत
मित्रों, आज १० मार्च है. पांच राज्यों के चुनाव परिणाम का दिन. अब कोई रहस्य नहीं रह गया है कि आज भी, अभी भी देश की जनता के दिल पर भाजपा का कब्ज़ा है. उत्तर प्रदेश में १९८६ के बाद ऐसा पहली बार हुआ है किसी पार्टी की लगातार दूसरी बार सरकार बनी है. उत्तर प्रदेश सहित पाँचों राज्यों में जनता ने नया इतिहास लिखा है. जनता ने बता दिया है कि जो राम पे नाज करेगा वो हिंदुस्तान पे राज करेगा.
मित्रों, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि २०१७ से पहले उत्तर प्रदेश की स्थिति कितनी चिंताजनक थी. पूरे प्रदेश पर दंगाइयों और बलात्कारियों का कब्ज़ा था. पूरा प्रदेश जल रहा था वहीँ अखिलेश सैफई में नाच-गाना देखने में मशगुल थे. चौतरफा भ्रष्टाचार व्याप्त था और जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी. औरतों का दिन में भी घर से निकलना मुहाल था.
मित्रों, योगीजी ने मुख्यमंत्री बनते ही सबसे पहले रोमियो स्कायड बनाकर औरतों को सुरक्षित करते हुए यह सुनिश्चित किया कि प्रदेश में कोई महिला रात के १२ बजे भी बिना डरे बिना हिचकिचाए घर से निकले. अस्पतालों को दुरुस्त किया गया, अपराध पर पूरा नियंत्रण पाया गया, गरीबों को समय पर और पूरा-का-पूरा सस्ता अनाज उपलब्ध करवाया गया और माफियाओं के घरों पर कुछ इस पैमाने पर बुलडोजर चलाया गया कि बुलडोजर योगी आदित्यनाथ जी की सरकार का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया. इसके साथ ही भाजपा ने जिस तरह से राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया उसके चलते उसे राम के साथ-साथ रामभक्त हिन्दुओं का आशीर्वाद मिलना भी तय हो गया.
मित्रों, रही बात चार अन्य राज्यों की तो देवभूमि उत्तराखंड में फिर से भाजपा की सरकार का बनना यह दर्शाता है कि लोग कांग्रेस को किसी भी तरह भाजपा का विकल्प नहीं मानते साथ ही लोगों को पार्टी और काम से मतलब है न कि मुख्यमंत्री से. इसके साथ ही उत्तराखंड की जीत में वहां के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता जिन्होंने अपनी मेहनत और कार्यकुशलता से अत्यल्प समय में एक अवश्यम्भावी हार को जीत में बदल दिया.
मित्रों, रही बात मणिपुर की तो यह देखना काफी सुखद है कि भाजपा और हिंदुत्व का झंडा अब पूर्वोत्तर में भी लहरा रहा है. हम उम्मीद करते हैं कि निकट भविष्य में भाजपा केरल, आंध्रा, तेलंगाना और तमिलनाडु समेत पूरे दक्षिण भारत में भी अपनी स्थिति मजबूत करेगी और एक दिन ऐसा भी आएगा जब वहां भाजपा की सरकार होगी.
मित्रों, बचे हुए राज्यों में जहाँ गोआ की जीत भाजपा के लिए अप्रत्याशित होते हुए भी काफी सुखद है वहीँ पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत के परिणाम भविष्य में सिर्फ पंजाब के लिए ही नहीं पूरे भारत के लिए खतरनाक हो सकते हैं. भविष्य में पंजाब फिर से अलगाववाद और खालिस्तान की आग में जल सकता है.
शनिवार, 19 फ़रवरी 2022
मनमोहन सिंह का राष्ट्रवाद
मित्रों, कभी संत कबीर ने कहा था कि
मैं तो कूता राम का, मुतिया मेरा नाऊँ,
गले राम की जेवड़ी, जित खींचे तित जाऊँ.
लेकिन आज कोई कबीर का युग तो है नहीं सो राम के बदले लोग-बाग़ अपने स्वार्थ के लिए वक्त के अनुसार किसी-न-किसी प्रभावशाली इन्सान या परिवार का कुत्ता बनते रहते हैं. ऐसे ही एक कुत्ते हैं मनमोहन सिंह. नाम तो सुना ही होगा. वही मनमोहन सिंह जिनके बारे में कहा जाता है कि वे भारत के एकमात्र रिमोट संचालित प्रधानमंत्री थे. बल्कि उनको उनकी इसी विशेषता के कारण प्रधानमंत्री बनाया गया था. रिमोट ऑन चालू, रिमोट ऑफ़ बंद.
मित्रों, कल इन्हीं मौनमोहन सिंह ने बोला है शायद नकली गाँधी परिवार ने आदेश दिया होगा. मनमोहन सिंह ने भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी पर नकली राष्ट्रवादी होने के आरोप लगाए हैं. एक समय कांग्रेस के महा राष्ट्रवादी अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने कहा था कि इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा. इस एक वाक्य से आप समझ सकते हैं कि कांग्रेसियों के लिए राष्ट्र क्या होता है और तदनुसार राष्ट्रवाद क्या होता है. अब इंदिरा जी तो रही नहीं सो अब उनके लिए भारत की परिभाषा गाँधी फैमिली इज इंडिया एंड इंडिया इज गाँधी फैमिली हो गया है. इसी फिरोज गाँधी परिवार का लिखा हुआ भाषण पढ़ते हुए मनमोहन सिंह ने लाल किले से अपने पहले भाषण में कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ अल्पसंख्यकों का है अर्थात मुसलमानों का है. शायद गाँधी परिवार के लिए अल्पसंख्यकवाद ही राष्ट्रवाद है इसलिए उसने भाषण में ऐसा लिखकर मनमोहन को पढने को दिया था.
मित्रों, मनमोहन सिंह को दुःख है, इस बात का अपार दुःख है कि आज नेहरु की गलतियों को उनकी गलती कहा जा रहा है. अरे भाई नेहरु ने गलतियाँ की थी इसलिए जो गलतियाँ नेहरु की थी हमेशा नेहरु की रहेंगी. किसी शायर ने क्या खूब कहा है-लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई. कहने का मतलब यह कि जो गलतियाँ नेहरु ने १९४६ से १९६४ के बीच अपने प्रधानमंत्रित्व काल में की थीं उसके दुष्परिणाम अब तक आ रहे हैं फिर क्यों न नेहरु की गलतियों को उनकी गलती कहा जाए? क्या नेहरु पैगम्बर थे जो उनकी गलतियों को गलत कहने पर ईशनिंदा हो जाएगी. फिर भारत में तो ईशनिंदा कानून है भी नहीं.
मित्रों, नेहरु ने सेना को २५ लाख से कम करके ३ लाख कर दिया परिणाम भारत को १९४७ में पीओके और १९६२ में पूरा अक्साई चिन और अरुणांचल व लद्दाख का एक बड़ा हिस्सा खोना पड़ा, तिब्बत तो हाथ से गया सो अलग. नेहरु को आइजनहावर ने परमाणु बम देने की पेशकश इस ताकीद के साथ की थी कि चीन कभी भी भारत पर हमला कर सकता है लेकिन नेहरु नहीं माने. नेहरु को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में स्थायी सीट ऑफर की गई थी और उन्होंने उसे चीन को दिलवा दिया था परिणाम आज चीन एक बार फिर भारत पर हमले की ताक में है. तो ये तो थी महान कूटनीतिज्ञ नेहरु की विदेश नीति.
मित्रों, आतंरिक नीतियों के मोर्चे पर भी नेहरु खासे असफल रहे. नेहरु ने समान नागरिक संहिता को लागू नहीं किया परिणाम आज फिर से इस्लाम भारत में स्वाभाविक तौर पर अलगाववादी हो रहा है. नेहरु को नोबल चाहिए था नहीं मिला तो उन्होंने खुद को ही भारत रत्न दे डाला. नेहरु ने धारा ३७० लागू किया परिणाम १९९० में देखने को मिला जब कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीर से भगा दिया गया और वो अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रहने के लिए विवश हो गए. नेहरु ने अम्बेडकर जी की बातों को अनसुना करके भारत में मुसलमानों को रहने दिया परिणाम आज कश्मीर, केरल और बंगाल सहित देश के कई हिस्सों जिसमें राजधानी दिल्ली भी शामिल है हिन्दुओं का नरसंहार हो रहा है.
मित्रों, कहने का तात्पर्य यह कि जब नेहरु की गलतियों का खामियाजा देश को आज भी भुगतना पड़ रहा है तो फिर नेहरु की आलोचना क्यों न की जाए? मनमोहन के लिए भले ही नेहरु भगवान हों बांकी सबके लिए वो न तो तब भगवान थे और न ही आज हैं. रही बात चीन की तो चीन ने अपने सीमावर्ती ईलाकों में रेल और सड़कों का सबसे ज्यादा विकास मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते किया था तो मनमोहन सिंह ने उसे रोका क्यों नहीं? मान लिया नहीं रोक सकते थे लेकिन उनको भारत-चीन सीमा पर भारत की तरफ से रेल और सड़क का विकास करने के लिए कदम उठाने से किसने रोका था? क्यों देहरादून तक जाने के लिए भी २०१४ तक एक ही सुरंग थी वो भी अंग्रेजों के ज़माने की? क्यों चीन के साथ एक-के-बाद एक आर्थिक समझौते करके मनमोहन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को चीन पर निर्भर कर दिया था बजाए आत्मनिर्भर बनाने के?
मित्रों, मनमोहन सिंह का एक और आरोप है बेरोजगारी बढ़ने और अमीरी-गरीबी के बीच खाई बढ़ने का. तो क्या अमीरी-गरीबी के बीच की खाई पहली बार बढ़ी है? जबसे कथित आर्थिक सुधार शुरू हुए हैं यह खाई और बढ़ गई है. आर्थिक सुधार किसने शुरू किए थे? कभी चंद्रशेखर जी ने नरसिंह राव से मनमोहन सिंह के बारे में कहा था कि मैंने जो चाकू सब्जी काटने के लिए लिया था आप तो उसी से देश के कलेजे का आपरेशन कर रहे हैं. और जब मनमोहन ने आर्थिक सुधार शुरू किए थे उस समय जब कहा गया था कि इससे बेरोजगारी बढ़ेगी तब तो उन्होंने इन आरोपों को अनसुना कर दिया था. जब सबकुछ निजी हाथों में चला जाएगा तो सरकार कहाँ से रोजगार देगी, कहाँ से पैसे लाएगी और निजी क्षेत्र अपना मुनाफा देखेगा या लोगों को रोजगार देगा?
मित्रों, ये वही मनमोहन सिंह हैं जिन्होंने चंद्रशेखर जी से खुद पैरवी करके खुद को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अध्यक्ष बनवाया था वो भी तब जब चंद्रशेखर जी कार्यवाहक प्रधानमंत्री थे. ऐसे सत्तालोलुप व्यक्ति की बात पर हम क्यों विश्वास करें? एक तरफ मनमोहन चीन के भारत में घुस आने का ताना देंते हैं वो वहीँ दूसरी तरफ वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री रहते हुए रक्षा बजट में घातक कटौती करते हैं. यहाँ तक कि कश्मीर में ड्यूटी कर रहे अर्द्धसैनिक बलों को राईफल के बदले डंडा थमा देते हैं.
मित्रों, रही बात पाकिस्तान जाकर मोदी के बिरयानी खाने की तो मनमोहन आज तक मोदी की नीति को समझ ही नहीं पाए हैं. मोदी पहले बात से समझाते है फिर लात का इस्तेमाल करते हैं. यह मोदी की विदेश नीति का ही परिणाम है कि आज पाकिस्तान दिवालिया हो चुका है और दर-दर पर भीख मांगता फिर रहा है फिर भी उसे भीख नहीं मिल रही वर्ना आपके समय तो आपका आवास कश्मीरी आतंकवादियों के कहकहों से गुलजार रहता था.
मित्रों, अंत में मैं माननीय मनमोहन सिंह जी से जिनके कार्यकाल को चुपचाप रहकर घोटालेबाजों का साथ देने और घोटालों के लिए ज्यादा जाना जाता है अनुरोध करूँगा कि वो जहाँ तक हो सके आदतन मौन रहें. काहे बुढ़ापे में अपनी बेईज्जती करवाने को उतारू हैं? नेहरु-गाँधी परिवार एक डूबता जहाज है और डूबकर रहेगा. अब कभी इंडिया में गाँधी फैमिली इज इंडिया एंड इंडिया इज गाँधी फैमिली नहीं होगा क्योंकि भारत के हिन्दू उनकी सच्चाई को जान चुके हैं, समझ चुके हैं और वो भी अच्छी तरह से.
बुधवार, 16 फ़रवरी 2022
अब कैसे छूटे राम रट लागी
मित्रों, आज हिन्दू धर्म के महानतम संतों में से एक संत रैदास जी की जयंती है. यूं तो हिन्दू धर्म में बहुत से महान संत हुए हैं लेकिन रैदास महानतम थे. मैं उनको इसलिए महानतम कह रहा हूँ क्योंकि संत रैदास के जीविकापार्जन के साधन को तत्कालीन समाज में बहुत सम्मान की नजरों से नहीं देखा जाता था. तत्कालीन शासक जो मुसलमान थे की तरफ से उनको काफी लालच दिया गया लेकिन राम के अखंड व अटल भक्त रैदास बस इतना ही कहते रहे कि
अब कैसे छूटे राम रट लागी?
मित्रों, संत रैदास उन रामानंद जी के शिष्य थे जिनके बारे में कहा जाता है कि भक्ति द्राविड़ उपजी लाए रामानंद. रामानंद जी ने बिना जातीय भेदभाव के काशी में अपने शिष्य बनाए. उनके शिष्यों में सुरसुरानंद ब्राह्मण, पीपा राजपूत, सेन नाई, धन्ना जाट, कबीर जुलाहा और रैदास चमार तक शामिल थे. रामानंद जी के शिष्यों के बारे में एक दोहा काफी लोकप्रिय है
अनतानन्द, कबीर, सुखा, सुरसुरा, पद्वावती, नरहरि,
पीपा, भावानन्द, रैदासु, धना, सेन, सुरसरि की धरहरि.
कितने महान थे रामानंद जिन्होंने ईश्वरभक्ति के अनमोल खजाने को सबके लिए खोल दिया था और कहा
जाति-पाति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि के होई.
मध्यकालीन समाज में यह बहुत बड़ी घटना थी, शायद सबसे बड़ी. यहाँ हम आपको बता दें कि रामानंद ब्राह्मण थे. श्री रामानंद ने रामभक्ति के माध्यम से एक सामाजिक क्रांति का सूत्रपात किया। सामाजिक विषमताओं और बाहरी आडम्बरों में जकड़े समाज में पुनरुत्थान की ओर पहला कदम बढ़ाने वाले रामानंद थे। रामभक्ति के माध्यम से उन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों में सामाजिक समरसता तथा समन्वय की भावना पैदा करने का एक सफल प्रयास किया। श्री रामानंद ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ श्री वैष्णवमताज भास्कर में प्रचलित ऊंच-नीच की भावना पर क्रूर प्रहार किया है।
मित्रों, तो रामानंद जी जैसे महान गुरु के महान शिष्य रैदास जी के बारे में जितना भी कहा जाए कम है. रामानंद के अधिकतर शिष्यों की तरह रैदास भी ईश्वर यानि आपने राम के निर्गुण रूप के उपासक थे वे कहते भी हैं
हिंदू पूजइ देहरा मुसलमान मसीति। रैदास पूजइ उस राम कूं, जिह निरंतर प्रीति॥
मित्रों, उनकी भक्ति कितनी अटल थी इसके बारे में एक प्रसंग का बार-बार जिक्र किया जाता है. हुए यह कि गुरु रविदास का नाम बनारस शहर और आसपास के इलाकों में बहुत प्रसिद्ध हो चुका था। एक बार कुछ यात्री पंडित गंगाराम के साथ हरिद्वार में कुंभ के पर्व पर हर की पैड़ी में स्नान करने जा रहे थे। जब वे बनारस पहुँचे तो उनके मन में प्रेम उमड़ आया कि गुरु रविदास से भेंट करके फिर आगे को चलेंगे। वे गुरु रविदास का निवास स्थान पूछकर सीर गोवर्धनपुर में पहुँच गए। सभी यात्री गुरु रविदास के दर्शन करके बहुत प्रसन्न हुए। गुरु रविदास ने पूछा कि कहिए, आप कहाँ जा रहे हैं? पंडित गंगाराम ने बताया कि हम हरिद्वार में कुंभ स्नान के लिए जा रहे हैं। गुरु रविदास ने यात्रियों से कहा कि गंगाजी के लिए मेरी ओर से यह कसीरा ले जाओ और यह भेंट गंगाजी को तब देना जब वे हाथ निकालकर लें, नहीं तो इसे वैसे ही मत देना। गुरु रविदास की भेंट लेकर यात्रीगण हरिद्वार की तरफ रवाना हो गए। कुछ दिनों में यात्रीगण हरिद्वार पहुँच गए। उन्होंने गंगाजी के तट पर यात्रियों की भारी भीड़ देखी। गंगा में स्नान करने के बाद पंडित गंगाराम ने कहा, “हे माता गंगाजी, आपके लिए एक कसीरा भेंट के रूप में रविदास ने भेजी है। माता, अपना हाथ बाहर निकालें और इस भेंट को स्वीकार करें।” यह सुनते ही गंगाजी प्रकट हो गई और हाथ बढ़ाकर उन्होंने कसीरा ले लिया। गंगाजी ने अपने हाथ का एक हीरे जड़ित कंगन गुरु रविदास के लिए भेंट किया और गंगाराम से कहा कि मेरी यह भेंट गुरु रविदास को पहुँचा देना।
ले कंगन अति हर्ष युत, देखत सब विसमाद।
ऐसे न कबहुं भयो, गंगा को प्रसादि॥
गंगाराम सहित सभी यात्री बहुत हैरान हुए कि इस प्रकार आज तक किसी को गंगाजी ने भेंट नहीं दी थी। गंगाजी के दर्शन करके और स्नान करके पंडित गंगाराम वापस अपने घर पहुँच गया। गंगाराम ने अपनी पत्नी को प्रत्यक्ष दर्शन की सारी कथा सुनाई और गंगाजी का दिया हुआ कंगन अपनी पत्नी को रखने के लिए दे दिया। कुछ दिनों के बाद पंडित गंगाराम की पत्नी ने कहा कि इस कंगन को बाजार में बेच दिया जाए। यह बड़ी कीमत में बिक जाएगा। पैसे लेकर अपना जीवन मजे से गुजारेंगे। हमें किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहेगी। जब पंडित गंगाराम वह कंगन बाजार में बेचने के लिए गया तो कंगन की जितनी कीमत थी, उसकी कीमत के बराबर किसी के पास धन नहीं था। जो भी सर्राफ कंगन को देखता था, वह हैरान हो जाता था और कहता था कि ऐसा कंगन हमने पहले कभी नहीं देखा।
तब कुटवारै सुध दई वाकै हाट बिकाए।
भुखन कंगन हाथ को बेचत जन इक आए॥
इस बात की खबर सिपाही के पास पहुँच गई कि एक आदमी बहुमूल्य कंगन बेचने की कोशिश कर रहा है। सिपाही गंगाराम को पकड़कर हाकिम के पास ले गए। हाकिम के पूछने पर गंगाराम ने सारी कथा कह सुनाई कि यह कंगन गंगा माता के हाथ का है, जिसे गंगा माता ने गुरु रविदास को पहुँचाने के लिए दिया था। सारी बातें सुनकर हाकिम चकित रह गया। हाकिम ने कहा कि गुरु रविदास को यहाँ बुलाया जाए और उनकी राय ली जाए, तब गुरु रविदास को सादर सभा में बुलाकर कंगन के बारे में पूछा गया। गुरु रविदास ने कहा कि यह कोई बड़ी बात नहीं है। अभी एक बरतन में गंगा जल डालकर और कंगन उसमें डालकर ऊपर से कपड़ा देकर ढक दें। मन चंगा तो कठौती में गंगा। गंगाजी इस बात का फैसला कर देंगी। जैसा उन्होंने कहा, सारी सामग्री उसी ढंग से तैयार कर दी गई। तब गुरु रविदास ने गंगाजी को निर्णय करने के लिए कहा। जब कपड़ा बरतन से हटाया गया तो दो कंगन नजर आए। हाकिम और बाकी लोग यह देखकर बहुत प्रसन्न हुए। गुरु रविदास ने दोनों कंगन गंगाराम को दे दिए।
मित्रों, ऐसे थे हमारे संत रैदास. रैदास ने आजीवन सहज भक्ति की और सहज भक्ति का उपदेश भी दिया. उनको न तो मंदिर की जरुरत थी न ही देव प्रतिमाओं की क्योंकि उनके लिए तो उनके राम चन्दन थे और वे पानी थे जिसकी सुगंधी उनके अंग-अंग से आती थी. रैदास ऐसा समाज चाहते थे जिसमें कोई भूख से न मरे और सारे लोग मिलजुलकर प्रेमपूर्वक निवास करें.
ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिले सबन को अन्न.
छोट बड़ों सब सम वसै, रविदास रहे प्रसन्न
उनका व्यक्तित्व इतना महान था कि मेवाड़ की महारानी और महाराणा प्रताप की चाची मीराबाई ने उनको गुरु स्वीकार करते हुए उनसे ही भक्ति की दीक्षा ली. मीरा कहती है गुरु मिलिआ संत गुरु रविदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी. ऐसे महान संत को उनकी जयंती पर कोटि-कोटि नमन. अगर वे आज जीवित होते तो मैं अपने रक्त से उनके पांव पखारता.
गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022
राहुल गांधी की ऐतिहासिक बकवास
मित्रों, भारतीय राजनीति में राहुल गाँधी एक ऐसे शख्स हैं जिनको अगर हम भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा विदूषक कहें तो गलत नहीं होगा. कभी यह आदमी आलू को सोना बनाने लगता है तो कभी पिछत्तिस बोलकर नई अंक प्रणाली की स्थापना करता है तो कभी भारत की आबादी को १०० अरब बता देता है. यह आदमी कब क्या बोल जाए कोई नहीं जानता हालांकि इसके बोलने से भारत की जनता का मुफ्त में मनोरंजन जरूर हो जाता है.
मित्रों, कल माननीय राष्ट्रपति के अभिभाषण के जवाब में इसने जो भाषण संसद में किया वो भी किसी बकवास से किसी भी तरह से कम नहीं था. इसने वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी को शहंशाह और अलोकतांत्रिक कहा जबकि सच्चाई यह है कि किसानों पर सैंकड़ों बार गोलीबारी कांग्रेस ने करवाई, सैंकड़ों बार विरोधी दलों की सरकारों को राष्ट्रपति शासन लगाकर बर्खास्त नेहरु और इंदिरा ने किया, यहाँ तक कि साधू-संतों पर भी इंदिरा गाँधी ने संसद के सामने गोलीबारी करवाई, देश में एक मात्र बार आतंरिक आपातकाल भी इंदिरा गाँधी ने लगाया फिर भी शहंशाह मोदी हो गए. मोदी तो इतने लोकतान्त्रिक हैं कि बंगाल और केरल में अपने कार्यकर्ताओं को हत्या तक को मूकदर्शक बने देख रहे हैं राष्ट्रपति शासन नहीं लगा रहे,शाहीन बाग़ और सिंघू बोर्डर भी उनसे खाली नहीं होता.
मित्रों, राहुल जी ने अपने भाषण में एक आरोप यह लगाया है कि भारत सरकार की गलत नीतियों के कारण चीन और पाकिस्तान आज एक हो गए हैं. हद है यार चीन और पाकिस्तान कब एक नहीं थे जो आज हो गए? फिर चीन की 2025 में ताइवान और 2040 में अरुणाचल पर कब्जा करने की योजना है इसे सारी दुनिया जानती है लेकिन राहुल जी नहीं जानते तभी तो उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ २००८ में समझौता किया था.
मित्रों, राहुल जी ने यह आरोप भी लगाया है कि भारत कभी राष्ट्र नहीं था और आज भी नहीं है बल्कि राज्यों का संघ है तो हम राहुल जी बता देना चाहेंगे कि आज से हजारों साल पहले श्रीमद विष्णु पुराण में घोषणा की गई थी कि
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः ।।
मित्रों, अपनी एक अन्य पंक्ति में राहुल जी ने आरोप लगाया कि दलितों का ३००० सालों से शोषण हो रहा है. लगता है राहुल जी ने सिर्फ इटली का इतिहास पढ़ा है भारत का नहीं पढ़ा. जो ८०० सालों तक ख़ुद गुलाम रहे और धर्म और प्रजा की रक्षा के लिए शहादत देते रहे वो भला कैसे दूसरों का शोषण करेंगे? चाहे तैमूर से युद्ध हो या नादिरशाह या अब्दाली से या फिर शिवाजी या महाराणा प्रताप की सेना हो इतिहास गवाह है कि ब्राह्मणों से लेकर दलितों तक ने एकजुट होकर विधर्मियों का सामना किया. १८५७ के विद्रोह में गंगू मेहतर उर्फ़ गंगाराम पहलवान के योगदान को भला कोई कैसे भुला सकता है?
मित्रों, रही बात राहुल जी के परनाना नेहरु की जेलयात्रा की तो नेहरूजी किस तरह जेल में रहे पूरी दुनिया जानती है. इस सम्बन्ध में मेरे मित्र श्री इन्द्रेश उनियाल जी ने अपने एक आलेख नाभा का नाटक में लिखा है कि नेहरु जी को जब सितम्बर 22, 1923 को नाभा की रियासत में अवैध रूप से प्रवेश करने और आंदोलन मे भाग लेने के लिये 2 वर्ष की कैद की सजा सुनाई गई तब मोतीलाल नेहरु खासे परेशान हो गए और गिरफ़्तारी के ३ दिन बाद ही वायसराय से बात कर नेहरु जी के लिए नाभा जेल में पांच सितारा सुविधा उपलब्ध करवाई. कहाँ नेहरू और कहाँ सावरकर की जेल यात्रा!
मित्रों, राहुल जी ने दावा किया है कि उनकी दादी और उनके पिता देश के लिए शहीद हुए जबकि सच्चाई यह है कि उनकी दादी और पिता खुद उनके द्वारा पैदा किए गये आतंकवाद की भेंट चढे. राहुल जी यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आज भी उनकी पार्टी जेहादी और खालिस्तानी आतंकियों का खुलकर समर्थन करती है.
मित्रों, रही बात बढती बेरोजगारी की तो जब तक जनसँख्या को कानून बनाकर कठोरतापूर्वक नियंत्रित नहीं किया जाएगा कोई माई का लाल भारत से बेरोजगारी दूर नहीं कर सकता. फिर कोरोना काल में भारत सरकार लोगों की जान बचाए या नौकरी दे? फिर सरकारी क्षेत्र में नौकरी की गुन्जाईश है ही कितनी?
मित्रों, राहुल जी ने अपने भाषण में भाजपा सांसद कमलेश पासवान के बारे में कहा है कि वो गलत पार्टी में सही व्यक्ति हैं जबकि सच्चाई यह है कि राहुल जी खुल गलत पार्टी में गलत व्यक्ति हैं. वर्षों पहले जब अटल जी के बारे में भी ऐसा ही कहा गया था तब अटल जी ने कहा था कि वे सही पार्टी में सही व्यक्ति हैं क्योंकि बबूल के पेड़ पर आम नहीं फलता.
मित्रों, अंत में मैं एक ऐतिहासिक घटना का जिक्र करना चाहूँगा. नेहरू आइन्सटीन से मिलने गए. मुलाकात के बाद पत्रकारों ने जब पूछा कि दोनों में क्या बातचीत हुई तो नेहरु जी ने कहा कि उन्होंने भी बकवास की और बदले में मैंने भी बकवास की. कहने का तात्पर्य यह है कि राहुल गाँधी खानदानी बकवासी है और अब तक एक-से-एक ऐतिहासिक बकवास कर चुके हैं और निश्चित रूप से आगे भी करते रहेंगे.
रविवार, 30 जनवरी 2022
योगी तेरी खैर नहीं ...
मित्रों, ज्यादा दिन नहीं हुए. यही कोई २०१८-१९ की बात है. राजस्थान में विधानसभा चुनाव चल रहे थे तब एक नारा खूब सुर्ख़ियों में था-मोदी तुझसे वैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं. हुआ भी ऐसा ही. राजस्थान की जनता ने वसुंधरा को मुख्यमंत्री के पद से हटाकर एक निहायत अयोग्य हिंदूविरोधी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया. जनता समझ रही थी कि वो वसुंधरा से बदला ले रही है लेकिन वास्तविकता कुछ और ही थी. जनता खुद कुल्हाड़ी पर पैर मारने जा रही थी.
मित्रों, आज तीन-चार साल बाद राजस्थान की क्या स्थिति है? वसुंधरा तो महारानी थी और है लेकिन जनता का क्या हाल है? अगर हम कहें कि आज राजस्थान बलात्कारियों का प्रदेश बन गया है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. और सिर्फ इसलिए बन गया है क्योंकि कांग्रेस का हाथ बलात्कारियों के साथ है. सरकार न जाने क्यों मूक-बधिर नाबालिग लड़कियों के साथ हुए बलात्कार को भी जबरदस्ती सड़क-दुर्घटना बना दे रही है. आए दिन दलितों के साथ मार-पीट होती है. आदिवासी ललनाओं के साथ सामूहिक बलात्कार होते हैं. पुजारियों की हत्या होती है. जेहादियों के हौंसले इतने बुलंद हैं कि राजधानी जयपुर के शिवमंदिर की छत पर दरगाह बनाने की घिनौनी कोशिश होती है. हिन्दू डरे-सहमें हैं जैसे वो भारत में नहीं पाकिस्तान में हों.
मित्रों, इतना ही नहीं किसानों की ऋण माफ़ी के बदले उनकी जमीनों की नीलामी हो रही है. वास्तव में वहां किसानों की जमीनों की नहीं बल्कि उनके सम्मान और ईज्जत की नीलामी हो रही है. छात्र बेहाल हैं. रीट तक के प्रश्न आउट हो जा रहे हैं.
मित्रों, कहने का तात्पर्य यह है कि राजस्थान में वसुंधरा तो आज भी खैर से हैं अगर खैर से कोई नहीं है तो वो है राजस्थान की जनता जो बदले की भावना में इस कदर अंधी हो गई थी कि खुद अपना ही नुकसान कर बैठी. आज राजस्थान में जंगलराज है. जिसकी लाठी उसकी भैंस है.
मित्रों, मैं देख रहा हूँ कि यूपी में भी कुछ हिन्दू योगी से बदला लेने की बात कर रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि अगर योगी हार गए तो यूपी में हिन्दुओं की हालत राजस्थान से भी ज्यादा बुरी हो जाएगी. राजस्थान में तो फिर भी तोतला मुख्यमंत्री है यूपी में तो अकल लेस मुख्यमंत्री बन जाएगा जो बिना मुख्यमंत्री बने ही पत्रकारों को कूटवा दे रहा है. इस संबंध में एक ताजा वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में हाथ में असलहा लिए सुरक्षाकर्मी पत्रकार खालिद चौधरी को धक्का देकर अखिलेश के पास आने से रोक रहे हैं। पत्रकार का आरोप है कि उसके साथ मारपीट भी की गई। वीडियो में वह मारो मत, मारो मत कहकर खुद को सुरक्षाकर्मियों से बचाने की कोशिश भी कर रहे हैं।
मित्रों, अकल लेस ने जो टिकट बांटे हैं उस सूची को गौर से देखिएगा. उसमें ज्यादातर गुंडे हैं. कुछ तो हिन्दुओं के खिलाफ दंगा करने के आरोपी भी हैं. फिर यह भी फैक्ट है कि विकास शांति की छाँव में होता है. अकल लेस का पुराना रिकॉर्ड कहता है कि उसके मुख्यमंत्री बनते ही प्रदेश में कानून और व्यवस्था चौपट हो जाएगी और गुंडों का राज कायम हो जाएगा. आज जो अपराधी जेल की शोभा बढ़ा रहे हैं तब कैबिनेट की शोभा बढाएंगे. अच्छे पुलिस अधिकारियों को खुलेआम सड़कों पर पीटा जाएगा जिसकी बानगी कुछ दिन पहले सुपर कॉप अनिरुद्ध सिंह को पीट कर समाजवादी नेता दिखा भी चुके हैं.
मित्रों, इतना ही नहीं सारी वैकेंसी यादवों और मुसलमानों से भरी जाएगी. थानों पर जेहादियों का कब्ज़ा हो जाएगा. मंदिरों पर हमले होंगे. पुजारियों जिनमें ज्यादातर ब्राह्मण हैं के दिन-दहाड़े गले रेते जाएंगे. होली मनाने पर रोक लग जाएगी. मंदिरों में जबरन नमाज पढ़ी जाएगी. मंदिरों से लाउडस्पीकर उतार दिए जाएंगे. राम मंदिर का निर्माण संकट में पड़ जाएगा. मंदिरों में घंटी न बजे यह देखने के लिए पुलिसकर्मी तैनात कर दिए जाएँगे. कुकुरमुत्ते की तरह सर्वत्र दरगाह उग आएँगे. राजस्थान को पछाड़ते हुए यूपी एक बार फिर से नंबर वन बलात्कारी स्टेट बन जाएगा. आपकी कहीं कोई सुनवाई नहीं होगी. रोते-रोते आपकी आँखों में आंसू सूख जाएंगे.
मित्रों, कहने का तात्पर्य यह है कि इस बार अगर आप योगी जी से बदला लेने की सोंच कर मतदान करने की सोंच रहे हैं तो निश्चित रूप से आप अपने ही भविष्य का सर्वनाश करने जा रहे हैं. योगी जी का क्या वो तो फिर से मठ में वापस चले जाएंगे जहाँ कोई शत्रु उनकी छाया तक को नहीं छू सकता लेकिन आपका जीवन और आपके प्रदेश का जन-जीवन जरूर बर्बाद हो जाएगा. इसलिए राजस्थान से शिक्षा लीजिए कोई जरूरी नहीं कि ठेंस लगने पर ही बुद्धि खुले दूसरों को लगे ठेस से समय रहते सीख लेना कहीं बेहतर होता है.
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