बुधवार, 28 मई 2014

70 सालों तक विद्वानों के शिक्षा मंत्री रहते हुए भी देश में शिक्षा की स्थिति बुरी क्यों है?

28 मई,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों देश में बेवजह की बहस छिड़ी हुई है। बहस इस बात को लेकर चल रही है कि भारत के प्रधानमंत्री को एक इंटर पास महिला को भारत का शिक्षा मंत्री नहीं बनाना चाहिए था। लगता है जैसे स्मृति ईरानी को पढ़ाई का इंतजाम नहीं करना है बल्कि किसी विश्वविद्यालय में जाकर पढ़ाना है। मेरे चाचा बिल्कुल अनपढ़ हैं लेकिन किसी इंतजाम में लगा दीजिए तो वो ऐसा इंतजाम करते हैं कि जैसा कोई पीएचडी भी नहीं कर सकता। मेरे एक चचेरे दादाजी जो काफी कम पढ़े-लिखे थे शकुंतला देवी से भी ज्यादा तेजी में गणित की बड़ी-बड़ी गणनाओं को संपन्न कर दिया करते थे।
मित्रों,पिछले 70 सालों में भारत में एक-से-एक विद्वान इस पद को सुशोभित कर चुके हैं लेकिन फिर भी भारत में शिक्षा की स्थिति दयनीय है। क्या स्मृति जी की योग्यता पर सवाल उठानेवाले बंधु बता सकते हैं कि ऐसा क्यों है? क्या शिक्षा मंत्री बनने के लिए विदेश से हाई डिग्रीधारी बेईमान या चोर होना जरूरी है?  पिछले 5 सालों में कपिल सिब्बल ने शिक्षा के क्षेत्र को क्या दिया है सिर्फ शिक्षा के अधिकार के नामवाला कागजी अधिकार देने के सिवाय? ऐसे पढ़े-लिखे धूर्त से तो स्मृतिजी बेहतर ही हैं। वे पूरी तरह से अनपढ़ तो हैं नहीं कि हिन्दी और अंग्रेजी फाइलों को समझ ही नहीं पाएं। तीव्र प्रतिउत्पन्नमतित्व से संपन्न हैं,मेहनती हैं,देशभक्त और सबसे बड़ी बात तो यह है कि वे ईमानदार भी हैं। उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा है इसलिए वे हर तरह की चुनौतियों से बेहतर निपट सकती हैं।
मित्रों,अगर हम मुगल काल के इतिहास में झाँके तो हम पाते हैं कि इस काल में दो बड़े बादशाह हुए अकबर और औरंगजेब। अकबर पूरी तरह से अनपढ़ था फिर भी इतना सफल शासक साबित हुआ कि इतिहास ने उसे अकबर महान के विशेषण से विभूषित कर दिया। दूसरी तरफ औरंगजेब महाविद्वान था लेकिन वह उतना ही असफल सिद्ध हुआ। उसकी अव्यावहारिक नीतियों ने मुगल सल्तनत की चूलें हिला दीं। इसी तरह आज जिन कबीर के लिखे दोहों और साखियों को एमए तक में पढ़ा-पढ़ाया जाता है वे पूरी तरह से अनपढ़ थे। इसी तरह सत्य यह भी है कि मानव इतिहास के सबसे बड़े वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन ने कभी स्कूली शिक्षा ली ही नहीं थी और उनका दिमाग आज भी रिसर्च के लिए संभालकर रखा गया है। इसी तरह महाकवि महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जिनकी कविता राम की शक्ति पूजा को विश्व साहित्य में अद्वितीय स्थान प्राप्त है और जिन्होंने विवेकानंद साहित्य का अंग्रेजी से हिन्दी में अभूतपूर्व अनुवाद भी किया है और जिनके ऊपर लाखों बच्चे शोध कर चुके हैं मैट्रिक पास भी नहीं थे। इतना ही नहीं आधुनिक युग के एकमात्र हिन्दी महाकाव्य कामायनी के रचयिता जयशंकर प्रसाद भी नन मैट्रिक थे। इसी तरह हिन्दी सिनेमा के शो-मैन राजकपूर भी नन मैट्रिक थे।
मित्रों,क्या अब भी वे भाई लोग यही कहेंगे कि प्रतिभा डिग्री की मोहताज होती है? फिर अपने देश में तो डिग्रियाँ बिकती भी हैं। कई पीएचडी धारक एक आवेदन तक नहीं लिख पाते। ज्यादा पढ़े-लिखे तो हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी नहीं हैं तो क्या वे मनमोहन सिंह जी से कम योग्य हैं? मनमोहन सिंह विदेश से पीएचडी प्राप्त व्यक्ति थे उन्होंने देश को क्या दिया? अगर डिग्री ही सबकुछ होता है तब तो भारत के तमाम आईआईएम को नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार के इंतजामों का अध्ययन करने के लिए उनके पीछे नहीं भागना चाहिए था। फिर वे भाग क्यों रहे हैं? पिछले दो दिनों में मोदी ने जितना अच्छा काम किया है,एक ही दिन में उन्होंने जिस तरह नौ-नौ राष्ट्राध्यक्षों से वार्ता की क्या उसके लिए जरूरी योग्यता को किताबों को पढ़कर प्राप्त किया जा सकता है? क्या कोई हार्वर्ड का पीएचडी धारी निराला,कबीर,आइंस्टीन,प्रसाद बन सकता है? लाल बहादुर शास्त्री ने तो विदेश में पढ़ाई नहीं की थी फिर उन्होंने अपने दो सालों के छोटे से शासन ने भारत को वह सब कैसे दे दिया जो विदेश में पढ़े नेहरू 17 साल में भी नहीं दे सके।
मित्रों,इसलिए सवा सौ करोड़ भारतीय से विनम्र निवेदन है कि वे कृपया इस तरह का बेवजह का शरारतपूर्ण विवाद खड़ा नहीं करें। हमने कांग्रेस के महायोग्य मंत्रियों की महायोग्यता को पिछले 8 सालों तक देखा है और झेला है। कौन-सा मंत्री योग्य है और कौन-सा अयोग्य इसका निर्णय जनता पर छोड़िए और उनको चैन से 60 महीने तक काम करने दीजिए। जनता 60 महीने बाद खुद ही उनकी योग्यता पर अपना फैसला सुना देगी ठीक वैसे ही जैसे आपलोगों के बारे में सुनाया है और आपलोगों को मुख्य विपक्षी दल का दर्जा पाने के लायक भी नहीं समझा है।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 20 मई 2014

करारी हार के बावजूद जनता के संदेश को नहीं समझ पा रहा विपक्ष

20 मई,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बात चाहे खेल की हो या राजनीति की जब भी कोई टीम या पार्टी हारती है तो उससे यही अपेक्षा की जाती है कि वह हार के कारणों की समीक्षा करेगी और कारणों को समझकर उसे दूर करने के प्रयास करेगी। मगर लगता है कि हमारे देश की विपक्षी पार्टियाँ करारी हार के बावजूद यह समझ नहीं पा रही है या फिर समझना चाहती ही नहीं है कि जनता ने मतदान द्वारा क्या संदेश दिया है। अगर वे इसी तरह से नादानी करते रहे तो हमें कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर निकट-भविष्य में विधानसभा चुनावों में भी उनको सिर्फ पराजय और निराशा ही हाथ लगे।
मित्रों,कांग्रेस पार्टी का कहना है कि उसकी नीतियाँ तो अच्छी थीं लेकिन भाजपा ने दस हजार करोड़ के प्रचार-बजट से उनको मात दे दी। पता नहीं कांग्रेस वो कौन-सी नीति की बात कर रही है जो अच्छी थीं। क्या उनकी कोयला नीति सही थी,स्पेक्ट्रम नीति अच्छी थी,रक्षा खरीद नीति बेहतरीन थी? वे आजादी के 70 साल बाद आधी रोटी और पूरी रोटी की बात करते हैं और फिर भी अपनी नीतियों पर शर्मिंदा नहीं होते जबकि 70 सालों में 60 सालों तक उनका ही शासन रहा है। उन्होंने सूचना का अधिकार तो दे दिया लेकिन सूचनाएँ दी क्या? जब भी किसी ने राबर्ट वाड्रा से संबंधित जानकारी मांगी तो बहाना करके टाल दिया। लोग इस अपीलीय अधिकारी से उस अपीलीय अधिकारी के यहाँ चक्कर काटते रहते हैं लेकिन राज्य सरकारों का तंत्र सूचना नहीं देता। फिर कैसा सूचना का अधिकार,कौन सा सूचना का अधिकार? केंद्र में शिक्षा का अधिकार तो कागज पर दे दिया लेकिन देश के किसी भी गरीब-भुक्खड़ के बच्चों को इससे कोई लाभ हुआ क्या? फिर यह कैसा अधिकार है जो वास्तव में है ही नहीं?! भारत की जनता को केंद्र सरकार द्वारा भिखारी मान लिया जाना क्या अच्छी नीति कही जा सकती है? यह मुफ्त वह मुफ्त लेकिन रोजगार नहीं देंगे। केंद्र सरकार ने महंगाई को नियंत्रित करने के लिए क्या किया? कौन-सी नीति अपनाई? क्या देश को जानलेवा महंगाई की आग में झोंक देना उसकी अच्छी नीति थी? कल जब कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक थी तो उम्मीद की जा रही थी कि उसमें हार के कारणों की गहराई और विस्तार से समीक्षा की जाएगी और जरूरी कदम उठाएंगे। मगर हुआ क्या माँ-बेटे ने इस्तीफा दिया,कार्यसमिति ने पूर्वलिखित नाटक की तरह नामंजूर कर दिया और कर्त्तव्यों की इतिश्री हो गई।
मित्रों,हमारे विपक्षी दल अभी भी एक-दूसरे के सिर पर हार का ठीकरा फोड़ने में लगे हैं और अपने गिरेबान में झाँक नहीं रहे हैं। समाजवादी पार्टी कहती है कि हम कांग्रेस के कारण हारे जबकि जबसे यह पार्टी उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई है तबसे उसने ऐसा कोई भी एक काम नहीं किया है जिससे जनता को अपनी सरकार पर गर्व हो। अभी कल ही उसके मंत्री आजम खान आधी रात में अपने गुर्गों को छुड़वाने के लिए रामपुर जिले के अजीमनगर थाने पर जा धमकते हैं। उनके पूरे गृह जिले रामपुर में किसान नलकूपों को बिजली नहीं मिलने से परेशान हैं मगर उनकी समस्याओं की ओर मंत्रीजी की निगाह नहीं जाती उनका पूरा ध्यान अपने गुंडों को बचाने पर रहता है। पार्टी की बैठक में जनता की समस्याओं और उनके विकास पर चर्चा नहीं होती बल्कि इस बात पर बहस की जाती है कि किस जाति और धर्म के कितने लोगों ने हमें वोट दिया और कितनों ने नहीं दिया मगर लखनऊ में पानी किल्लत पर कोई बात नहीं होती।
मित्रों,अपने को प्रधानमंत्री का सबसे सुटेबल उम्मीदवार माननेवाले नीतीश कुमार की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। उनको लगता है कि प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी से हाथ मिलाने से बेहतर है पद से इस्तीफा दे देना। क्या यह अस्पृश्यता नहीं है? नीतीश जी मानते हैं कि महादलित को मुख्यमंत्री बना देने मात्र से महादलितों की जिन्दगी बदल जाएगी और वे फिर से उनके पाले में आ जाएंगे। क्या महादलितों का विकास सिर्फ एक महादलित ही कर सकता है? क्या उनका दर्द सिर्फ एक महादलित ही समझ सकता है? क्या ईमानदारी और योग्यता की कोई कीमत नहीं होती सबकुछ जाति ही होती है? अगर अभी  भी नीतीश ऐसा ही समझते हैं तो वे निश्चित रूप से फिर से मुँह की खानेवाले हैं। दुनिया के सबसे युवा राष्ट्र को जाति नहीं विकास चाहिए,रोजगार चाहिए। चुनाव परिणामों ने आसमान में एक ईबारत लिख दी है कि जाति और संप्रदाय के नाम पर बाँटकर वोट पाने के दिन अब लद गए। समाप्त हो गया वह युग जब जनता के बीच पैसे और सामान बाँटकर वोट बटोर लिया जाता था। वीत गया वह समय जब जनता नंगी-भूखी रहकर भी किसी खास राजनैतिक परिवार के लिए जान तक देने को तैयार रहती थी। उस कालखंड का भी अंत हो गया जब चुनाव-दर-चुनाव एक ही वादा कर करके पार्टियाँ चुनाव जीत जाया करती थी। अच्छा होगा कि हमारे विपक्षी दल इस नए जमाने की नई तरह की राजनीति को यथाशीघ्र समझ लें और उसके अनुसार अपने आपको ढाल लें नहीं तो जनता तो उनको अप्रासंगिक बना ही देगी।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 18 मई 2014

देवा रे देवा नीतीश कुमार की इतनी हेराफेरी!

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कल न जाने क्यों 3 बजे दोपहर में मेरे मोहल्ले की बिजली चली गई और आई तो साढ़े चार बज रहे थे। इसी बीच मुझे फेसबुकिया दोस्तों से मालूम हुआ कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया है। यकीन ही नहीं हुआ लेकिन जब इंटरनेट पर ढूंढ़ा तो पता चला कि यही सच है। फिर 5 बजे नीतीश कुमार ने संवाददाता सम्मेलन किया और कहा कि हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए वे इस्तीफा देते हैं। उन्होंने जनता के विवेक पर प्रश्न-चिन्ह लगाते हुए कहा कि बिहार में मतदान सांप्रदाय़िक ध्रुवीकरण के आधार पर हुआ है जिससे वे क्षुब्ध हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कल 4 बजे शाम में जदयू विधायक दल की बैठक होगी। मन में कई तरह के कयास जन्म लेने लगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ होगा जिसने बिहार के मुख्यमंत्री को इस्तीफी देने पर मजबूर कर दिया क्योंकि मैं नहीं मानता कि इन कथित नमाजवादियों के पास थोड़ी-सी भी नैतिकता बची हुई है जिसके आधार पर ये इस्तीफा दें। तभी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडे टीवी पर प्रकट हुए और नीतीश के पद-त्याग को कोरा नाटक करार दे दिया। झारखंड भाजपा नेता सीपी सिंह ने तो कह भी दिया कि इनके पास नैतिकता है ही नहीं तो फिर ये कैसे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे सकते हैं।
मित्रों,इसके बाद टीवी पर दिखाई दिए जदयू के ऱाष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और दावा कर गए कि कल उनके फैसलों से सभी चौंक जाएंगे। साथ ही उन्होंने कथित धर्मनिरपेक्षता की प्राण-रक्षा की खातिर अपने चिर शत्रु रहे लालू प्रसाद यादव से हाथ मिलाने का दावा किया। उधर लालू जी ने भी उनकी तरफ बढ़े हुए मजबूरी की दोस्ती के बढ़े हुए इस हाथ को झटका नहीं दिया और थाम लेने के संकेत दिए।
मित्रों,लेकिन इस नाटक पर से पर्दा उठा दिया जदयू के प्रवक्ता केसी त्यागी ने। त्यागी जी से जब पूछा गया कि क्या कल नीतीश जी की जगह किसी दूसरे व्यक्ति को नेता चुना जाएगा तो उन्होंने कहा कि ऐसा संभव ही नहीं है। नीतीश हमारे सर्वमान्य नेता हैं। उन्होंने एनडीए को चुनौती दी कि हम उनको 24 घंटे का समय देते हैं इस बीच अगर उनके पास बहुमत है तो सरकार बना लें। अब कोई रहस्य नहीं रह गया था,सबकुछ सामने था। स्पष्ट हो चुका था कि नीतीश जी यह इस्तीफा उसी तरह से दिया गया इस्तीफा था जिस तरह कि उन्होंने कभी रेल मंत्री के पद से दिया था। तब उन्होंने इस्तीफे को सीधे राष्ट्रपति को नहीं भेजकर प्रधानमंत्री को भेज दिया था जिन्होंने स्वाभाविक तौर पर उनके त्याग-पत्र को नामंजूर कर दिया था। इसलिए नीतीश कुमार के पुराने रिकार्ड को देखते हुए संभावना तो यही है कि आज फिर से विधायक दल की बैठक में नीतीश कुमार जी खुद को नेता चुनवाएंगे और फिर से मुख्यमंत्री के पद की शपथ लेंगे। देवा रे देवा इतनी हेराफेरी! नीतीश जी जितना नाटक करना है करिए लेकिन जनता के विवेक पर सवाल खड़े नहीं करिए। अवसर आपके लिए भी खुले हुए थे। आपने क्यों जनता को अपनी तरफ नहीं कर लिया? नरेंद्र मोदी ने तो कहीं सांप्रदायिकता की बात ही नहीं की फिर जनता ने कैसे सांप्रदायिक बहकावे में आकर मतदान कर दिया? आप हार चुके हैं,हारना भी सीखिए और हार को पचाना भी। जनता आपको भी समझ रही है और आपके नाटकों को भी जो आप पिछले 8 सालों से बिहार के रंगमंच पर खेल रहे हैं। मिला लीजिए जंगलराज के डाइरेक्टर लालू जी से भी हाथ और फिर भी करते रहिए नैतिक होने का ढोंग।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 17 मई 2014

छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी

17-05-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आज का सूर्योदय आपने देखा होगा और पाया होगा कि आज भी सूरज पूरब से निकला है लेकिन वह सूरज झूठा है। आज के भारत का वास्तविक सूरज पूरब से नहीं सुदूर पश्चिम से उदित हुआ है। कल तक हम जब पुराने सूरज की रोशनी में थे तो हमें लालची,नपुंसक,जातिवादी और संप्रदायवादी कहा जाता था लेकिन आज हमने उतार फेंका है इन आरोपों को और पूरी ताकत से उछाल दिया है दुनिया के आसमान में एक पत्थर जो हमें उम्मीद है कि नाकामी और मायूसी के बादलों को तितर-बितर करके रख देगा।

मित्रों,हमें नहीं चाहिए खैरात हमें तो काम चाहिए। आखिर हम दुनिया के सबसे युवा राष्ट्र जो ठहरे। हमें नहीं चाहिए भीख की रोटी हमें तो ईज्जत की रोटी चाहिए। हमें नहीं चाहिए एक अंतहीन इंतजार कि अब हमारे राजनीतिज्ञ देश को बदलनेवाले हैं। कभी नेपोलियन ने अपने एक सेनापति से कहा था कि चेंज योर वाच अदरवाईज आई विल चेंज यू। लीजिए हमने अपना सेनापति बदल दिया क्योंकि हमारे लिए प्रतीक्षा अब असहनीय हो गई थी। जबकि कंप्यूटर के एक क्लिक से पलक झपकते ही बड़े-बड़े काम संपन्न हो जाते हैं हमारे राजनेता चुनाव-दर-चुनाव पुराने वादों पर ही अँटके थे।

मित्रों,हम भी चाहते हैं दुनिया के विकास की दौड़ में रेस लगाना और सबसे आगे निकलना। हमारा युवा रक्त कैसे बर्दाश्त करता कि चीन,पाकिस्तान जैसे पड़ोसी हमें आँखें दिखाए। हमारा युवा जोश कैसे सहता कि चीन की जीडीपी हमारी जी़डीपी की तीन गुना से भी ज्यादा हो गई है। हमारी इस्पाती नसें और हिमालय सरीखी दृढ़ता भला इस सत्य को कैसे स्वीकार करतीं कि भारत सरकार ठगों और भ्रष्टाचारियों का दुनिया में सबसे बड़ा जमावड़ा बन गई है। हमें तो वादे नहीं इरादे चाहिए थे इसलिए हमने इस बार बिल्कुल नए इरादे से मतदान किया और नए सिरे से लिख दिया भारतीय राजनीति की प्रस्तावना को। अब से हमारे जान से भी ज्यादा प्यारे भारत में सिर्फ-और-सिर्फ विकास चलेगा और विकास की ही राजनीति चलेगी। नहीं चलेगा जातिवाद और संप्रदायवाद के नाम पर ठगी सिर्फ सच्चा राष्ट्रवाद चलेगा। अब हमें याद नहीं रहा कि हमने किस जाति और संप्रदाय में जन्म लिया था हमें तो बस इतना ही याद है कि हम प्रथमतः और अंततः एक भारतीय हैं भारतीय आत्मा हैं।

मित्रों,हम न तो बहानेबाज हैं और न ही हमें बहानेबाज सरकार चाहिए। हम युवा हैं बहाने नहीं बनाते देश बनाते हैं,देश का वर्तमान और भविष्य बनाते हैं। हम नहीं जानते कि मजबूरी क्या होती है। हम इतना ही जानते हैं कि हमारे हाथों की गर्मी से मोटी-मोटी जंजीरें पिघल जाएंगी इसलिए हमने केंद्र की सरकार को भी मजबूत जनादेश दिया है। पूरी ताकत दी है कि तुम बनाओ नया भारत,लिखो नए युग की इबारत और हमें भी भागीदार बनाओ वास्तविक अतुल्य भारत के वास्तविक निर्माण में। हमने अपनी ऊंगली के जादू से सरकार को बदला है अब अपने फौलादी इरादे और मांसपेशियों से हम भारत को भय,भूख और भ्रष्टाचार से रहित विकसित राष्ट्र बनाएंगे।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 14 मई 2014

याद रहोगे मनमोहन

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विदाई देने का सिलसिला जारी है। अगले एक-दो दिनों में ही मनमोहन सिंह इतिहास का हिस्सा बन जाएंगे। मनमोहन भले ही कोई इतिहास बना नहीं सके लेकिन फिर भी वे इतिहास का हिस्सा तो बन ही गए हैं। चाहे उनका शासन जैसा भी रहा हो,हमारे लिए वो अच्छी यादें हों या बुरी यादें लेकिन हम चाहकर भी उनको भुला नहीं पाएंगे। वैसे भी बुरी यादों को भुलाना कहीं ज्यादा कठित होता है। जितना भुलाना चाहो वे उतनी ही ज्यादा याद आती हैं। याद तो बहुत आएंगे मनमोहन मगर सवाल उठता है कि किस रूप में और किस-किस रूप में?
मित्रों,संजय बारू की किताब के प्रकाशित होने के बाद अब इस तथ्य में कोई संदेह नहीं रहा कि मनमोहन एक दुर्घटनात्मक प्रधानमंत्री थे। मनमोहन राजनीति में अर्थव्यवस्था के कारीगर मात्र बनकर आए थे लेकिन उनको बनना पड़ा प्रधानमंत्री। पड़ा इसलिए क्योंकि वे उन्होंने बनना चाहा नहीं था मगर बने। हमने शतरंज के खेल में प्यादा को वजीर तक बनते देखा है मगर मनमोहन ऐसे वजीर थे जो शुरू से अंत तक प्यादा ही बने रहे। या तो उनको वजीर बनना ही नहीं था या फिर उनको वजीर बनना आता ही नहीं था।
मित्रों,प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मंत्री तो थे मगर मंत्रियों के प्रधान नहीं थे। उन्होंने अपना हानि-लाभ,जीवन-मरण,यश-अपयश सबकुछ सोनिया परिवार के हाथों में सौंप दिया था। मनमोहन समर्पण की पराकाष्ठा थे। तुभ्यदीयं गोविंदं तुभ्यमेव समर्पयामि। यहाँ तक कि उन्होंने अपने आराध्य को देश भी समर्पित कर दिया। हे माता तुमने ही मुझे प्रधानमंत्री बनाया है। मैं तो एक छोटा-सा बालक हूँ और उस पर निर्बल भी इसलिए तुम्हीं संभालो इस राज-पाठ को। मैं कुछ भी नहीं जानता,न देश को और न ही देशहित को। मैं तो केवल तुमको जानता हूँ। मेरे लिए तो सबकुछ तुम-ही-तुम हो। आरंभ भी,मध्य भी और मेरा अंत भी।
मित्रों,सवाल उठता है कि क्या मनमोहन सिंह निरपराध हैं और भोले हैं? मेरे हिसाब से तो नहीं। वे इन दोनों में से कुछ भी नहीं हैं। वो इसलिए क्योंकि उन्होंने जो कुछ भी किया या होने दिया जानबूझकर किया और होने दिया। मनमोहन सिंह ने जानबूझकर अपार संभावनाओं की भूमि भारत का 10 साल बर्बाद किया। दस साल तक सबकुछ जानते हुए भी भारत में वह सब होने दिया जिसने भारत की गाड़ी को 21वीं सदी के अतिमहत्त्वपूर्ण पहले दशक में रिवर्स गियर में चला दिया। निरपराध और भोले तो वे तब होते जब उनको कुछ भी पता नहीं होता या फिर वे महामूर्ख होते। परंतु दुर्भाग्यवश इन दोनों संभावनाओं के लिए मनमोहन के संदर्भ में कहीं कोई स्थान नहीं है।
मित्रों,मनमोहन जा नहीं रहे,बिल्कुल भी स्वेच्छा से नहीं जा रहे वरन् उनको जनता ने धक्का देकर निकाल दिया है। हमने बहुत प्रतीक्षा की,बहुत इंतजार किया कि अब शायद उनका जमीर जागे और मनमोहन इस्तीफा दे दें। मगर भारत में लगातार दुःखद घटनाएँ घटती रहीं,मनमोहन हर मोर्चे पर विफल होते गए परन्तु स्वेच्छा से पद-त्याग नहीं किया। उनका जमीर या तो मर गया था या फिर उनके पास जमीर नामक कोई चीज थी ही नहीं। वे एक नौकरशाह थे और नौकरी उनके खून में थी इसलिए वे मालिक होकर भी नौकर ही बने रहे और नौकरी ही करते रहे। चूँकि मनमोहन प्रधानमंत्री पद से अपने सुखद और प्रतीष्ठापूर्ण अंत को सुनिश्चित नहीं कर सके और उन्होंने देश को सिवाय बर्बादी के कुछ नहीं दिया इसलिए हम वाहेगुरू से यह कामना करते हैं कि वे आधुनिक युग के इस स्वनिर्मित धृतराष्ट्र को उसके बचे-खुचे बुढ़ापे में उसके गर्हित कर्मों या अकर्मों के लिए दंडित जरूर करे क्योंकि भारत का वर्तमान कानून तो शायद उनको कभी दंडित नहीं कर पाएगा। वैसे आपको बता दूँ कि कल मंगलवार को ही इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री यहूद ओलमर्ट को तेलअवीव की एक अदालत ने भ्रष्टाचार के आरोप में 6 साल की कैद की सजा सुनाई है।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 8 मई 2014

हाजीपुर टाईम्स का असर विवि को वेतन व पेंशन का 279.70 करोड़ जारी

पटना (सं.सू.)। बीते दो माह से वेतन एवं पेंशन की प्रतीक्षा कर रहे विश्वविद्यालय शिक्षकों एवं कर्मियों के लिए यह अच्छी खबर है। राज्य सरकार ने मार्च और अप्रैल के वेतन एवं पेंशन मद की एकमुश्त राशि 279.70 करोड़ जारी किया है। इस संबंध में शिक्षा विभाग के विशेष सचिव सह निदेशक एचआर श्रीनिवास ने एक सप्ताह के अंदर वेतन एवं पेंशन की राशि का वितरण सुनिश्चित करने का आदेश सभी कुलसचिवों को दिया है। राज्य सरकार ने मार्च से मई तक सभी विश्वविद्यालयों और उनके अधीनस्थ अंगीभूत महाविद्यालयों के अलावा अल्पसंख्यक कालेजों के शिक्षकों एवं कर्मचारियों के वेतन मद में 313.27 करोड़ और पेंशन मद में 106.27 करोड़ की स्वीकृति प्रदान की है। यह कुल राशि 419.55 करोड़ है। इनमें से मार्च एवं अप्रैल की राशि जारी की गई है। शिक्षा विभाग की ओर से मई का वेतन एवं पेंशन मद की राशि को भी शीघ्र जारी किए जाने की उम्मीद है।

विदित हो कि हाजीपुर टाईम्स ने 29 अप्रैल को समाचार लिखा था कि भुखमरी के कगार पर पहुँचे बिहार के विश्वविद्यालय शिक्षक। हमारी मेहनत ने रंग दिखाया है और बिहार सरकार को विश्वविद्यालयों के वेतन और पेंशन मद में दो महीने के लिए एकमुश्त राशि जारी करनी पड़ी है। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 7 मई 2014

प्रशासनिक लापरवाही के चलते हजारों लोग नहीं गिरा पाएंगे वोट

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। जिला प्रशासन की लापरवाही या मनमानी के चलते हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र में हजारों मतदाता अपना मतदान नहीं कर पाएंगे और इस प्रकार मतदान करने के अपने मूलभूत अधिकार से वंचित रह जाएंगे। विदित हो कि इसी साल 9 मार्च को पूरे देश में राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया गया था और चुनाव आयोग द्वारा घोषणा की गई थी कि जिन लोगों के नाम अब तक वोटर लिस्ट में नहीं है वे फार्म संख्या 6 भरकर अपना नाम जुड़वा सकते हैं। उस समय भी हमने लिखा था कि वैशाली जिला प्रशासन ने राष्ट्रीय मतदाता दिवस ने इस अभियान को गंभीरता से नहीं लिया। (आधे-अधूरे मन से मनाया गया मतदाता दिवस) परन्तु अहले सुबह जब लोग अपने परिवार के साथ मतदान केंद्र पर पहुँचे तो पता चला कि उनका नाम तो लिस्ट में जुड़ा ही नहीं है। हालाँकि कुछ लोगों के नाम जोड़े गए हैं लेकिन ये लोग वे हैं जिनके किसी-न-किसी परिजन का नाम पहले से लिस्ट में दर्ज है और जिनके किसी भी परिजन का नाम पहले से लिस्ट में नहीं है उनके नाम लिस्ट में जोड़े ही नहीं गए और ऐसे में हजारों लोग मतदान करने से वंचित रह जाएंगे।

जढ़ुआ के महावीर राय ने बताया कि उनका नाम वोटर लिस्ट से उनके वार्ड आयुक्त ने इसलिए हटवा दिया है क्योंकि वे उसके समर्थक नहीं हैं वहीं जढ़ुआ के ही नरेश साह ने बताय कि उन्होंने पिछले 15 सालों में हर बार कम-से-कम 10 बार फार्म 6 भरकर जमा किया लेकिन उनका या उनके परिजनों का नाम आजतक भी वोटर लिस्ट में दर्ज नहीं है। इसी प्रकार सहयोगी उच्च विद्यालय पर भी कई ऐसे लोग जिन्होंने फार्म 6 जमा करवाया था वोटर लिस्ट में अपना नाम न पाकर परेशान दिखे। इस बावत पूछने पर हाजीपुर नगर की भाग संख्या 108 की बीएलओ संगीता कुमारी ने बताया कि उन्होंने तो निर्वाची कार्यालय में सभी प्रपत्र 6 को जमा करा दिया था लेकिन नए नाम क्यों नहीं जुड़ सके उनको पता नहीं है। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

कौन कहता है कि (बूढ़े) दिग्विजय सिंह इश्क नहीं करते?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। एक बड़ा लोकप्रिय शेर है कौन कहता है कि बूढ़े इश्क नहीं करते,यह अलग बात है कि हम उन पर शक नहीं करते। इस शेर को अगर किसी पार्टी के नेताओं ने सचमुच में चरितार्थ करके दिखाया है तो वो पार्टी है कांग्रेस पार्टी। एक-के-बाद-एक कांग्रेस पार्टी के नेता ऐय्याशी में संलिप्त पाए गए हैं और अब बारी है पार्टी के थिंक टैंक दिग्विजय सिंह की।

आयु के मुताबित वयोवृद्ध की श्रेणी में आ चुके दिग्विजय सिंह की पोती की उम्र की लड़की के साथ तस्वीरें और सेक्स क्लिप इस समय सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रहा है। बताया जाता है कि लड़की का नाम अमृता राय है और वो राज्यसभा टीवी में एंकर है। सूत्रों से पता चला है कि यह क्लिप खुद दिग्विजय के मोबाईल से ही शूट किया गया है जिसको उनके ड्राईवर ने चुरा लिया था।

सवाल उठता है कि दूसरों पर जमकर ऊंगली उठानेवाले दिग्विजय अब अपनी पोल खुलने पर क्या प्रतिक्रिया देंगे? क्या उनका यह कृत्य नैतिक दृष्टि से उचित है? दिग्विजय को बुढ़ापे में विधुरावस्था बर्दाश्त नहीं हो रही थी तो उन्होंने उक्त लड़की से शादी क्यों नहीं कर ली? पाठक चाहें तो यहाँ क्लिक करके मामले से संबंधिक जानकारी विस्तार से प्राप्त कर सकते हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बिहार पुलिस के वरीय अधिकारी अमिताभ कुमार दास का अमर्यादित आचरण

पटना,रजनीश कुमार। बिहार के लोगों ने शायद ही कभी पुलिस का मानवीय चेहरा भी देखा हो। शायद यही कारण है कि कोई भी व्यक्ति यह नहीं चाहता कि कोई पुलिस अधिकारी या जवान उसका पड़ोसी हो। लेकिन जब ऐसा हादसा हो ही जाए तो कोई क्या करे। बिहार पुलिस के वरिष्ठतम अधिकारियों में से एक रेल पुलिस अधीक्षक जमालपुर (मुंगेर) श्री अमिताभ कुमार दास के द्वारा न्यू पाटलिपुत्रा कोलोनी, पटना के स्काईज अपार्टमेंट में एक फ्लैट खरीदा गया है, जहाँ उनका स्थायी आवास है। दुर्भाग्यवश उसी अपार्टमेंट में संवाददाता के बहनोई के भी दो फ्लैट हैं। श्री दास जबसे पड़ोसी बने हैं तभी से उन्होंने अपने साथ करीब दस सिपाहियों को स्थायी रूप से रखा हुआ है, जिन्हें वे अपने फ्लैट में न रखकर नीचे पार्किंग एरिया में रखते हैं। सिपाहियों ने अपार्टमेन्ट के पार्किंग एरिया को बाकायदे टेंट लगाकर घेर लिया गया है और गाड़ी लगाने के जगह को अवैध रूप से कब्जे में कर लिया है।
इतना ही नहीं इनके ड्राईवर हरेन्द्र ने अपार्टमेन्ट की सबसे ऊपरी मंजिल पर स्थित लिफ्ट-रूम को अपने कब्जे में कर रखा है तथा उसे अपने कमरे की तरह व्यवहार में लाते हैं। श्री दास के पास दो-दो सूमो गाड़ियाँ हैं, जिन्हें वे दूसरों के पार्किंग में लगाते हैं। अपने पार्किंग एरिया में अपने सिपाहियों को रखते हैं और दूसरों की जगह पर अपनी गाड़ी लगाते हैं। साथ ही गेस्ट के लिए निर्धारित पार्किंग एरिया को भी कब्जाए हुए हैं।
दोनों गाड़ियों से साहब के डेरे में अनजान महिलाओं का आना-जाना अक्सर लगा रहता है जिससे यहाँ का सामाजिक वातावरण दूषित हो रहा है। इसके चलते अन्य फ्लैट मालिकों को यहाँ पारिवारिक डेरा लेने से पहले हजार बार सोचना पड़ रहा है।
आते-जाते रास्ते पर इस अत्यंत छोटे से अपार्टमेन्ट में इतनी अधिक संख्या में अनावश्यक रूप से सिपाहियों के रहने के कारण भी लोगों को असहज लगता है और हालत यह है कि यहाँ अब फ्लैट भी कोई किराए पर लेने को तैयार नहीं।
एक सीनियर आईपीएस अधिकारी के इस प्रकार के अशोभनीय चरित्र और रवैये ने उनके पड़ोसियों का जीना मुहाल कर दिया है। ये अपने पद और मिली सुविधाओं का दुरूपयोग अपने पड़ोसियों को परेशान करने में कर रहे हैं। ऐसे पदाधिकारी जो सुविधाओं का दुरूपयोग करे की पोस्टिंग तो ऐसी जगह होनी चाहिए थी, जहाँ इसके दुरूपयोग की कोई गुजाईश ही न रहे। इनके इस कारनामे से बिहार पुलिस की बदनामी तो हो ही रही है, वे इस अपार्टमेन्ट के फ्लैट-धारकों के लिए स्थायी तनाव का कारण बन गए हैं और ऐसा वे केवल इस कारण कर पा रहे हैं क्योंकि वे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हैं।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

भुखमरी के कगार पर पहुँचे बिहार के विश्वविद्यालय शिक्षक

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। प्रदेश और विशेष रूप से बीआरए बिहार विवि में कार्यरत और अवकाशप्राप्त विश्वविद्यालय शिक्षकों की हालत भिखारियों जैसी हो गई है और वे भुखमरी के कगार पर पहुँच गए हैं। विदित हो कि राज्य के विश्वविद्यालय शिक्षकों को फरवरी तक का ही वेतन-पेंशन दिया गया है। बीच में मार्च महीने में उनलोगों को बीमों की किश्तें और आयकर देना पड़ा जिससे फरवरी का वेतन-पेंशन इन कामों में ही हवा हो गया।

विदित हो कि गत 11 अप्रैल को राज्य सरकार के शिक्षा विभाग के सचिव एचआर श्रीनिवास ने घोषणा की थी कि अगले एक सप्ताह में प्रदेश के कार्यरत और अवकाशप्राप्त विवि शिक्षकों नए वेतनमान के बकाये की पहली किस्त दे दी जाएगी परंतु जबकि अब यह महीना समाप्त होने को है किस्त का कहीं अता-पता नहीं है। पिछले दो महीने से वेतन-पेंशन नहीं मिलने से इन हजारों शिक्षकों की आर्थित हालत इतनी खराब हो चुकी है कि उनके परिवार को शाक-सब्जी जैसे छोटे-मोटे खर्चों में भी कटौती करनी पड़ रही है और परिचितों से कर्ज लेना पड़ रहा है।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मैं चाय भी बेच सकता हूँ मेरी चिंता न करें कांग्रेसी-नमो

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने जी न्यूज को दिए गए साक्षात्कार में कहा है कि अगर हारा तो मैं चाय भी बेच सकता हूँ इसलिए कांग्रेसियों को उनकी चिंता नहीं करना चाहिए।  इसके बजाए उनको खुद की चिंता करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उनको इस बात की चिंता नहीं है कि कोई नेता उनको पसंद करता है या नहीं बल्कि वे तो बस इतना ही जानते हैं कि जनता को उनकी बातें अच्छी लगती हैं। श्री मोदी ने मीडिया के एक वर्ग पर बिना जाँच किये उनके खिलाफ मुहिम चलाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वे खुद भी खुद को पूरी तरह से नहीं जानते हैं परंतु इतना जरूर है कि उनमें अथक परिश्रम करने की क्षमता है और उनके मन में सिर्फ आशा ही आशा है। श्री मोदी ने कहा कि वे कभी अपनी जाति बताना नहीं चाहते थे क्योंकि वे जातिवादी बिल्कुल भी नहीं हैं लेकिन उनको जब पानी पी पीकर उनको ऊँची जाति का और अमीर परिवार का बताकर गालियाँ दी जाने लगीं तो उनको कहना पड़ा कि वे पिछड़ी जाति और गरीब परिवार से आते हैं।

उन्होंने कहा कि देश की सबसे अनुभवी पार्टी कांग्रेस ने अपने वक्तव्यों से पिछले कुछ दिनों में स्पष्ट कर दिया है देश में इस समय परिवर्तन की हवा चल रही है और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो चुकी है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस आदि को लगता है कि मोदी को गालियाँ देने से वोट मिलेगा जबकि वे मानते हैं कि विकास और सुशासन के नाम पर वोट मिलेगा।

उन्होंने कहा कि देश के समक्ष सबसे बड़ा संकट यह है कि कांग्रेस अपने कुकृत्यों से शर्मिंदा नहीं है उल्टे आक्रामक है। मोदी ने कहा कि साथ में परिवार होने से ही कोई भ्रष्ट नहीं हो जाता बल्कि उनकी माँ तो आज भी 20 रुपए की चप्पल पहनती है और मुझे इस बात पर गर्व है। श्री मोदी ने कहा कि वे बदले की भावना से काम नहीं करते हैं बल्कि उनके पास तो काम करने से ही वक्त नहीं बचता। उन्होंने कहा कि प्रत्येक मामले में कानून अपना काम करेगा।

श्री मोदी ने कहा कि उनका एजेंडा सुशासन है और वे सिर्फ इसी पर बात करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि गरीबों की गरीबी हमेशा के लिए समाप्त हो,बेरोजगारों को रोजगार मिले,कृषकों को फसल का सही मूल्य मिले,भ्रष्टाचार और महंगाई कम हो। उन्होंने कहा कि कश्मीर को डुबानेवाले उनके समर्थकों को डुबाने की बात कर रहे हैं। उनकी सुरक्षा पर मंडराते खतरे पर उन्होंने कहा कि मोदी रहे न रहे देश सुरक्षित रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि चुनाव केंद्र में हो रहा है और विपक्ष गुजरात सरकार का विश्लेषण करने में लगे हैं जबकि बात केंद्र की सरकार के कामकाज की होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वे मजदूर हैं और मजदूरों की तरह ही मेहनत करते हैं। वे अन्य नेताओं की तरह आरामतलब नहीं हैं। उनको आराम नहीं काम चाहिए।

मोदी ने कहा कि उनको तब घोर आश्चर्य हुआ था जब आधे भारत को अंधेरे में डुबा देनेवाले व्यक्ति को प्रोन्नति देकर भारत का गृह मंत्री बना दिया गया। क्या इस तरह से अच्छा शासन लाया जा सकता है? उन्होंने भारत के चुनावों में विदेश नीति की चर्चा नहीं होने पर चिेता जताई। उन्होंने कहा कि नैन्सी पावेल की छुट्टी हो जाने के कारणों को अमेरिका की सरकार ही बता सकती है।

उन्होंने कहा कि उनको यह पता है कि गुजरात मॉडेल पूरे देश में लागू नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि वे जनता की नब्ज समझते हैं। उनको पता है कि देश की जनता को पिछले 12 सालों में क्या-क्या भुगतना पड़ा है। उनको यह भी पता है कि पूरे देश को एक ही डंडे से नहीं हाँका जा सकता। उन्होंने कहा कि विकास और सुशासन उनकी प्राथमिकता है वे यह-वह कर देने के दावे नहीं करते। उन्होंने कहा कि कुशासन,महंगाई,बेरोजगारी सहित सारी समस्याएँ कांग्रेस से जुड़ी हुई हैं इसलिए कांग्रेस को समाप्त करना पड़ेगा तभी ये समस्याएँ भी समाप्त होंगी। उन्होंने कहा कि 16 मई को निराशा का अंत हो जाएगा और सवा सौ करोड़ भारतीयों के मन में आशा का संचार हो जाएगा। साक्षात्कार के अंत में उन्होंने 18 से 28 आयुवर्ग के नौजवानों से अपील की कि जीवन के इस सबसे महत्वपूर्ण क्षण में वोट डालकर उनको अपने भविष्य का फैसला खुद ही करना चाहिए।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 26 अप्रैल 2014

क्या दाउद को पकड़ने की योजना बना चुके हैं मोदी?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। पिछले साल जब आईपीएल में मैच फिक्सिंग का मामला सामने आया तो दिल्ली पुलिस को पता चला कि इस पूरे खेल के पीछे किसी और का नहीं बल्कि दाउद इब्राहिम का हाथ था। जाहिर है इतना बड़ा खेल वो भी सरेआम दाउद ऐसे ही नहीं खेल रहा था बल्कि उसकी पीठ पर केंद्र सरकार में शामिल किसी बहुत बड़े आदमी का हाथ था। ऐसे में जब भारत के गृह मंत्री ने इसी साल भरोसा जताया कि भारत एक दिन दाउद को भी पकड़ने में कामयाब हो जाएगा तो शायद ही किसी ने उनके इस भरोसे पर भरोसा जताया।

परंतु जिस तरह से कल भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने अपने साक्षात्कार में अचानक दाउद का जिक्र छेड़ दिया उसने एक बार फिर से इस सवाल को चर्चे में ला दिया है कि क्या दाउद इब्राहिम को सचमुच पकड़ा जा सकता है? मोदी ऐसे ही हवा में कोई बात नहीं करते। उनके पास हर समस्या का हल है,हल के लिए योजनाएँ हैं। तो क्या नरेंद्र मोदी ने पहले से ही दाउद को पकड़ने की योजना पर काम शुरू कर दिया है? आज वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने मोदी से उनकी योजना पूछी है। तो क्या केंद्र सरकार को सचमुच यह पता नहीं है कि दाउद को कैसे पकड़ा जा सकता है? क्या वर्तमान समय में भारतीय सेना और खुफिया एजेंसी में सचमुच ऐसे लोग नहीं हैं जो यह बता सकें?

मोदी के व्यक्तित्व के बारे में भारत के लोग जहाँ तक जानते हैं उससे यह भरोसा तो जनगणमन में जरूर उत्पन्न हो रहा है कि मोदी भारत के इस सबसे बड़े दुश्मन के खिलाफ कार्रवाई जरूर करेंगे। मोदी जो ठान लेते हैं उसे करके छोड़ते हैं चाहे इसके लिए कितना भी नुकसान क्यों न उठाना पड़े? जाहिर है कि जैसा कि मोदी ने साक्षात्कार में कहा भी है कि अमेरिका ने बिन लादेन को मारने से पहले संवाददाता सम्मेलन नहीं किया था,वे केंद्र सरकार के मंत्रियों के लाख छेड़ने पर भी अपनी योजना के बारे में तब तक सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं बोलेंगे जब तक कि काम पूरा नहीं हो जाता। वैसे मोदी के पास चुनावों के बाद जनरल वीके सिंह,पूर्व पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह,मेजर राज्यवर्द्धन राठौर जैसे कई योजनाकार उपलब्ध होंगे जो उनकी इस योजना को पूरा करने में सक्षम होंगे।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

कौन सांप्रदायिक है क्या हमें अब महेश भट्ट बताएंगे?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। भारत का सबसे सांप्रदायिक दल कौन है यह भारत की हिन्दू-मुसलमान जनता बखूबी जान चुकी है। सोनिया गांधी बुखारी से पहले फतवा जारी करवाना और अब मुसलमानों को धर्म के आधार पर आरक्षण का वादा करने से इस बारे में शक की कोई गुंजाईश ही नहीं रह गई है। भाजपा और नरेंद्र मोदी तो लगातार सबको साथ लेकर चलने की बात कर रहे हैं,सीधे-सीधे सवा सौ करोड़ भारतीयों की बातें कर रहे हैं। मोदी तो यहाँ तक कह चुके हैं कि उनको पराजय मंजूर है लेकिन धर्म के आधार पर वे वोट हरगिज नहीं मांगेंगे। देश की जनता को धर्म के आधार पर विभाजित करने के प्रयास तो लगातार कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्षतावादी दल ही कर रहे हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत की जनता को कौन-कौन से दल सांप्रदायिक हैं जानने के लिए महेश भट्ट जैसे परम भोगवादी की सहायता लेनी पड़ेगी? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये वही महेश भट्ट हैं जो कभी अपनी बेटी से भी कम उम्र की शिल्पा शेट्टी की बहन शमिता शेट्टी के साथ कुर्सी पर सरेआम बैठे हुए पाए गए थे और उस समय शमिता ने पैंटी भी नहीं पहन रखी थी। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ये वही महेश भट्ट हैं जो कह चुके हैं कि अगर पूजा भट्ट उनकी बेटी नहीं होती तो वे उसी से शादी कर लेते। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह वही महेश भट्ट है जिसने सन्नी लियोन जैसी पोर्न स्टार को बॉलीवुड में हिरोईन बना दिया और लगातार कागज के चंद टुकड़ों के लालच में युवाओं को अपनी फिल्मों में सेक्स परोसता रहा है। गांधी ने तो कहा था कि पाप से नफरत करो पापी से नहीं फिर मोदी ने तो अपने विचारों में पर्याप्त परिमार्जन कर लिया है फिर मोदी से नफरत क्यों? क्या महेश भट्ट या कांग्रेस सच्चे मायनों में गांधीवादी हैं? क्या गांधी ने गोहत्या रोकने और पूर्ण शराबबंदी का समर्थन नहीं किया था?
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 23 अप्रैल 2014

क्या आपने देखा मोदी का अब तक का सबसे कठिन ईंटरव्यू?

23-04-2014,ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। मित्रों,कल रात जब एबीपी न्यूज पर भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का ईंटरव्यू प्रसारित होनेवाला था तब मैंने नहीं सोंचा था कि यह ईंटरव्यू इतना कठिन साबित होने जा रहा है। एबीपी न्यूज पिछले कई महीनों से मोदीविरोधी रूख अख्तियार किए हुए है फिर भी ईंटरव्यू का नियम होता है कि बीच-बीच में ऐसे सवाल भी पूछे जाएँ जिससे कि माहौल खुशनुमा बना रहे। लेकिन इस ईंटरव्यू में ऐसे प्रयत्न बहुत कम किए गए।
मित्रों,ईंटरव्यू को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कि किसी अपराधी को गिरफ्तार करके थाने में लाया गया है और तीन-तीन पुलिसवाले घेरकर उससे थर्ड डिग्री पूछताछ कर रहे हैं। ईंटरव्यू की शुरुआत में नमो ने बताया कि उनको वोट क्यों मिलना चाहिए? फिर उसके बाद विवादित प्रश्नों की झड़ी लगा दी गई। उदाहरण के लिए क्या आपकी सरकार को अंबानी और अडाणी चलाएंगे,क्या आपकी सरकार अमीरों की सरकार होगी, क्या मुसलमानों को आपसे डरना चाहिए, क्या होगा राम मंदिर और समान नागरिक संहिता पर आपका रूख,क्या पिंक रिव्योलूशन से किसी खास समुदाय की रोजी-रोटी नहीं जुड़ी हुई है,,क्या आप खुद अपना ही मुखौटा हैं,क्या आपके विरोधियों को पाक चला जाना चाहिए,क्या आपने गुजरात दंगों के समय राजधर्म निभाया था,क्या जीजाजी और शहजादा कहना व्यक्तिगत आरोपों की श्रेणी में नहीं आते,क्या आपको बुरा नहीं लगा जब लोगों ने आपकी वैवाहिक स्थिति पर कटाक्ष किया,क्या आपकी सरकार आने पर वाड्रा पर भी मुकदमा चलाया जाएगा,क्या आपने सचमुच गिलानी के पास अपना कोई दूत भेजा था,क्या आपने अडाणी को 1 रुपए में जमीन दी,पाकिस्तान के प्रति आपकी नीति क्या होगी,क्या आप प्रधानमंत्री बनने के बाद अमेरिका जाएंगे,क्या आपकी सरकार पर आरएसएस का प्रभाव होगा,क्या आप इसी तेज-तर्रारी से सरकार चलाएंगे,क्या अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति में बदलाव लाकर उसे बहुसंख्यकों के अनुकूल बना लेना चाहिए,शारदा चिंट फंड घोटाले सहित इस तरह के सभी घोटालों में आपका क्या रूख होगा,क्या आप प. बंगाल को तोड़ना चाहते हैं,शरद पवार और ममता बनर्जी के प्रति आपके रूख में धीरे-धीरे सख्ती क्यों आती गई,क्या आपने कभी दोनों ठाकरे बंधुओं में समझौता करवाने की कोशिश की,क्या आपके मोहन भागवत के साथ व्यक्तिगत संबंध रहे हैं,क्या आपको अपने बेलूर मठ के बीते हुए दिन याद आते हैं,आपकी दिनचर्या क्या है आदि।
मित्रों,लेकिन प्रश्न जितने ही कठित उत्तर उतने ही सरल। नमो ने स्पष्ट किया कि अंबानी और अडाणी को टॉफी के दाम में भूमि भाजपा सरकारों ने नहीं बल्कि स्वयं कांग्रेस की सरकारों ने दी। भाजपा की सरकार ने तो निश्चित नीति बनाकर दलाल संस्कृति का समूल अंत ही कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने गुजरात की कृषि में सुधार किया और 10 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि दी। गुजरात में खेतों का भी स्वायल स्मार्ट कार्ड होता है। उन्होंने पशुओं की दंत-चिकित्सा और शल्य चिकित्सा का इंतजाम करवाया। वाईव्रेंट गुजरात के साथ ही कुसुम महोत्सव का भी आयोजन करवाया। कृषि उत्पादन से लेकर लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन में उनके समय में गुजरात में कई गुना की बढ़ोतरी हुई। मोदी ने दावा कि उन्होंने अपना राजधर्म हमेशा निभाया है चाहे वो शांतिकाल हो या अशांति का समय। लोगों की मौत से उनको दुःख भी हुआ और उन्होंने हमेशा इसकी जिम्मेदारी ली और हमेशा इस प्रयास में लगे रहे कि दोबारा वह सब नहीं देखना पड़े। जीजाजी और शहजादा शब्दों को उन्होंने व्यंग्य और विनोद का हिस्सा बताचा। शरद पवार और सुष्मा स्वराज का उदाहरण देते हुए उन्होंने व्यंग्य और विनोद को आवश्यक बताया। अल्पसंख्यकों की संस्कृति में संशोधन को उन्होंने बहुत बड़ा मुद्दा बताया और चैनल से अनुरोध किया कि चुनावों के बाद इस पर विस्तृत चर्चा करवाई जाए और इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को भी उसमें बुलाया जाए। विदेश नीति के बारे में उन्होंने कहा कि वे न तो किसी को आँखें दिखाएंगे और न ही किसी के आगे आँखें झुकाएंगे बल्कि सबसे आँखों में आँखे डालकर बात करेंगे। सरकार पर आरएसएस के प्रभाव के बारे में उन्होंने कहा कि उनकी सरकार सिर्फ संविधान को ध्यान में रखकर शासन करेगी। उनकी सरकार के लिए एक ही भक्ति होगी देशभक्ति,एक ही धर्म होगा नेशन फर्स्ट,एक ही धर्मग्रंथ होगा भारत का संविधान। काले धन पर उन्होंने कहा कि कालेधन को वापस लाना ही चाहिए। कई टैक्स हेवेन देशों ने अपनी नीतियों में बदलाव किया है जिसका भारत को लाभ उठाना चाहिए। पिंक रिव्योलूशन को उन्होंने आर्थिक समस्या बताया और किसी समुदाय विशेष से इसको जोड़ने का विरोध करते हुए कहा कि उनके कई जैन मित्र भी इस धंधे में हैं। उन्होंने कहा कि सारे मुद्दों और मोर्चों पर वर्तमान सरकार की असफलता से जनता का तंत्र में विश्वास कमजोर हुआ है जिसको फिर से पैदा करना पड़ेगा। वाड्रा पर मुकदमा चलाने के बारे में उन्होंने कहा कि कानून के समक्ष सभी बराबर हैं। अगर प्रधानमंत्री रहते हुए वे कोई भ्रष्टाचार करते हैं तो उनको भी जेल भेजना चाहिए। राजनैतिक विरोधियों पर धीरे-धीरे रूख को कड़ा करने को अपनी रणनीति बताते हुए उन्होंने कहा कि अगर वे शुरू से ही सख्त रवैया अख्तियार कर लेते तो जनता उसे स्वीकार नहीं करती। श्री मोदी ने मीडिया में घुस आए कुछ न्यूज ट्रेडर्स की कटु आलोचना करते हुए कहा कि मीडिया को चंद लोगों द्वारा मिशन से गिराकर व्यापार बना दिया गया है। अंत में नरेंद्र मोदी ने बताया कि वे सिर्फ साढ़े तीन घंटे सोते हैं। खाने और सोने के समय के अतिरिक्त उनकी कोई निश्चित दिनचर्या नहीं होती। वे दिन-रात सिर्फ जनकार्य में ही लगे होते हैं। कुछ दिनों पहले गुजरात में आए तूफान की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि चुनावी दौरे से ही उन्होंने फोन करके स्थिति का जायजा लिया। उन्होंने कहा कि उनके लिए भारत सिर्फ एक भूगोल नहीं है बल्कि माँ से भी बढ़कर है। उन्होंने बार-बार दावा कि क्योंकि राजनीति में रसायन शास्त्र की तरह 1 और 1 ग्यारह होता है इसलिए उनको सरकार बनाने के लिए एनडीए से बाहर किसी का भी सहयोग आवश्यक नहीं होगा लेकिन सरकार को चलाने के लिए सवा सौ करोड़ भारतीयों की मदद चाहिए होगी। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार उसकी भी होगी जो उसे वोट देंगे,उसकी भी होगी जो विरोध में वोट देंगे और उसकी भी होगी जो वोट डालने जाएंगे ही नहीं। श्री मोदी ने काम करने की कोई समय-सीमा नहीं बताई और कहा कि वे 5 सालों में काम करने की योजना लेकर चल रहे हैं। मोहन भागवत से अपने संबंधों का खुलासा करते हुए उन्होंने बताया कि वे तो भागवत जी के पिताजी के ही शिष्य रहे हैं।
मित्रों,एक साथ राज,ज्ञान और कर्मयोग से युक्त नर केसरी नरेंद्र मोदी का यह सबसे कठिन ईंटरव्यू अगर आप नहीं देख पाए हों तो एक बार फिर से आपके पास मौका है। थोड़ी देर बाद ही आज सुबह 8 एबीपी न्यूज इस ईंटरव्यू को दोबारा प्रसारित करने जा रहा है। इस लिंक पर भी जाकर देख सकते हैं-http://abpnews.abplive.in/ind/2014/04/22/article299075.ece/%E0%A4%8F%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%AA%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%9C-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%96%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%AA
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

क्या एशिया का सबसे बड़ा बूचड़खाना कपिल सिब्बल की पत्नी का नहीं है?

16-04-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। क्या कपिल सिब्बल को हिंदू माना जा सकता है? कानून उनको या उनकी पत्नी को भले ही एशिया का सबसे बड़ा कत्लखाना खोलने से नहीं रोकता है लेकिन एक हिन्दू होने के नाते क्या उनको ऐसा करना चाहिए था? वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के समय श्री सिब्बल द्वारा दायर किए गए हलफनामे से पता चलता है साहिबाबाद स्थित एशिया का सबसे बड़ा बूचड़खाना जिसका नाम पहले अरिहंत एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड था की मालकिन कोई और नहीं बल्कि केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल की पत्नी है। हालाँकि इस बार के हलफनामे में श्री सिब्बल ने इसका जिक्र न जाने क्यों नहीं किया है जिसकी शिकायत भाजपा ने चुनाव आयोग से की भी है।
विदित हो कि सबसे पहले यह गोवधशाला तब चर्चा में आया था जब इसका नाम अरिहंत एक्सपोर्ट प्राइवेट रखे जाने के खिलाफ जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज ने ऐलान किया था कि वो २ अक्टूबर.2013 को अहमदाबाद मे लाखों लोगों की बड़ी रैली निकालेंगे और कांग्रेस को वोट न देने की अपील करेंगे। बाद में 16-17 सितंबर को दैनिक भास्कर में एक समाचार प्रकाशित हुआ जिसमें केप इंडिया के संयोजक डॉ.संदीप जैन ने एक बयान जारी कर केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल की पत्नी प्रोमिला सिब्बल द्वारा खोले गए बूचडख़ाने का नाम बदलने को जैन समाज की जीत बताया। डॉ.जैन ने बताया कि यह कारखाना साहिबाबाद में है और इसकी कंपनी अरिहंत एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड का कार्यालय दिल्ली में है। उन्होंने बताया कि 24 जैन तीर्थंकरों को अरिहंत के नाम से जाना जाता है, इसलिए यह शब्द जैन धर्म में पूजनीय है। मांस के व्यापार वाली कम्पनी के नाम से अरिहंत शब्द जुडऩे से जैन समाज की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंच रही थी।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

मेरे कर्जदार हैं सांसद-पत्रकार हरिवंश

15-04-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बात वर्ष 2010 की है। गर्मियों के दिन थे। मैं काफी परेशान था। अपनी छोटी बहन की शादी किए 1 साल से भी ज्यादा समय हो चुका था लेकिन अभी तक मेरी अपनी शादी का कहीं अता-पता नहीं था। अगुआ-वरतुहार (वर की तलाश में भटकनेवाले लड़कीवाले) आते और चले जाते। किसी की लड़की की तस्वीर हमें पसंद नहीं आती तो कोई हमारी बेरोजगारी देखकर खिसक लेता। तभी पिताजी ने सुझाव दिया कि कहीं नौकरी क्यों नहीं कर लेते।
मित्रों,तभी मेरे एक अभिन्न मित्र मीता ने बताया कि इस समय मुजफ्फरपुर में प्रभात खबर की यूनिट खुलने जा रही है। सीधे प्रधान संपादक हरिवंश जी बात करिए,काम हो जाएगा। मैं बात की तो मुझे यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वे मुझे जानते हैं और मेरी ब्रज की दुनिया के प्रशंसक भी हैं। उन्होंने मुझे राँची मिलने के लिए बुलाया। रातभर ट्रेन की सीट पर बैठे जागते-सोते हम सावन की रिमझिम फुहारों का आनंद लेते सहरसा-हटिया ट्रेन से राँची पहुँचे। रूकना मेरे मित्र धर्मेन्द्र कुमार सिंह के यहाँ रातु रोड में था। फ्रेश होकर हम प्रभात खबर कार्यालय के लिए रवाना हुए। वहाँ हमारा टेस्ट लिया गया जो मुझे बुरा भी लगा। फिर एचआर विभाग में पूछा गया कि कितना वेतन चाहिए। मैंने बताया दस हजार कम-से-कम। एचआर प्रधान ने कहा कि पिछले एक साल से आपकी आमदनी शून्य रुपया है तो फिर आपको हम इतना क्यों दें? मैंने छूटते ही कहा आपकी मर्जी। फिलहाल तो मुझे भूख लगी हुई है कोई होटल बताईए। उन्होंने झटपट प्रभात खबर के कैंटिन में फोन किया और कहा कि एक व्यक्ति को भेज रहा हूँ खाना खिला देना। मैंने टोंका जनाब जरा गौर से देखिए हम एक नहीं दो हैं और दूसरे ने भी सुबह से कुछ खाया नहीं है। उन्होंने कृपापूर्वक फिर से फोन किया। जब हम खाना खाने के बाद हरिवंश जी से मिलने गए तो उन्होंने कहा कि कुछ दिन बाद हम फोन करके आपको सूचना देंगे। रास्ते में धर्मेन्द्र ने बताया कि प्रभात खबर कई बार नौकरी के लिए ईच्छुक उम्मीदवारों को यात्रा-भत्ता भी देता है। मैंने कहा नहीं दिया तो नहीं दिया हमें तो नौकरी चाहिए।
मित्रों,कई दिनों तक जब फोन नहीं आया तो मैंने फिर से हरिवंशजी को फोन मिलाया तब उन्होंने एक नंबर दिया और बात करने को कहा। वह नंबर किसी मोहन सिंह का था जिनको अखबार लांच करने के लिए मुजफ्फरपुर भेजा गया था। नौकरी शुरू हुई। तब प्रभात खबर कार्यालय जूरन छपरा,रोड नं.1 मुजफ्फरपुर में था। कार्यालय क्या था कबाड़खाना था। कार्यालय में पर्याप्त संख्या में कुर्सियाँ तक नहीं थीं। लोग कंप्यूटर पाने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते रहते। वहाँ कई पुराने मित्र भी कार्यरत मिले और कई नए मित्र बने भी। हम घंटों फर्श पर पालती मारकर कंप्यूटर और कुर्सी के खाली होने का इंतजार करते। तब अखबार की छपाई शुरू नहीं हुई थी,प्रशिक्षण चल रहा था।
मित्रों,कार्यालय में न तो शुद्ध पेयजल था और न ही शौचालय में बल्ब। गंदा पानी पीने के चलते मेरा स्वास्थ्य लगातार गिरने लगा। फिर भी मैंने दो महीनों तक जमकर काम किया। इस बीच अगस्त या सितंबर में अखबार की छपाई भी शुरू हो गई। पहले दिन मुजफ्फरपुर पर विशेष परिशिष्ट प्रकाशित हुआ जो पूरी तरह से सिर्फ और सिर्फ मेरे द्वारा संपादित था।
मित्रों,तक कार्यलय में न तो किसी की हाजिरी ही बनती थी और न ही किसी को वेतन ही मिलता था। वहाँ के एचआर हेड से बात करता तो वो कहते कि आपके कागजात राँची भेज दिए गए हैं अभी वहाँ से कोई उत्तर नहीं आया है। सहकर्मियों ने बताया कि उनके कागजात के तो 6 महीने से उत्तर नहीं आए हैं। अब मुझे नौकरी करते दो महीने से ज्यादा हो चुके थे मगर वेतन का कहीं अता-पता नहीं था। नौकरी थी भी और नहीं भी। न कहीँ कोई नियुक्ति-पत्र और न ही कोई अन्य प्रूफ। कार्यालय का गंदा पानी पीने से मेरी तबियत भी बिगड़ती चली गई और अंत में मैंने निराशा और खींज में नौकरी छोड़ दी।
मित्रों,मुझे लगा कि पटना,हिन्दुस्तान की तरह प्रभात खबर भी खुद ही पहल करके मेरे दो महीने का वेतन दे देगा। इससे पहले जब मैंने पटना,हिन्दुस्तान की नौकरी छोड़ी थी तब हिन्दुस्तानवालों ने कई महीने बाद फोन करके बुलाकर मुझे मेरा बकाया दे दिया था। मगर यहाँ तो देखते-देखते तीन साल हो गए। न उन्होंने सुध ली न मैंने मांगे। फिर अगस्त,2013 में मुझे पैसों की सख्त जरुरत आन पड़ी। मैंने हरिवंशजी को फोन मिलाया तो पहली बार में तो वे चेन्नई में थे। दो-तीन दिन फिर से फोन मिलाया और अपनी व्यथा सुनाई। मैंने उनको याद दिलाया कि मैंने दो महीने तक मुजफ्फरपुर,प्रभात खबर में काम किया था जिसका मुझे पैसा नहीं मिला और उल्टे घर से ही नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने मुझे पहचान तो लिया मगर इस मामले में कुछ भी कर सकने में अपनी असमर्थता जताई। तब मैंने कहा कि मुझे पटना,प्रभात खबर में नौकरी ही दे दीजिए। उन्होंने सीट खाली नहीं होने की मजबूरी जताते हुए फोन काट दिया।
मित्रों,मैं हतप्रभ था कि हरिवंश जी भी ऐसा कर सकते हैं? महान समाजवादी,चिंतक,पत्रकार हरिवंश एक मजदूर का पैसा रख लेंगे? मगर यही सच था और आज भी यही सच है। वे आज भी मेरे कर्जदार हैं। दरअसल ये लोग छद्म समाजवादी हैं। चिथड़ा ओढ़कर ये लोग न सिर्फ मलाई चाभते हैं बल्कि अपने ही संस्थान के श्रमिकों का खून भी पीते हैं। ये लोग मुक्तिबोध के शब्दों में रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध,नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे लोग हैं। फिलहाल वे जदयू की तरफ से राज्य सभा सदस्य हैं अपनी सत्ता की चाटुकारिता कर सकने की अद्धुत क्षमता के बल पर। उम्मीद करता हूँ कि वे संसद में मजदूरों के पक्ष में लंबे-लंबे विद्वतापूर्ण भाषण देंगे और समाजवादी होने के अपने कर्त्त्वयों की इतिश्री कर लेंगे। धरातल पर पहले की तरह ही उनके अपने संस्थान में श्रमिकों का शोषण अनवरत जारी रहेगा,फिल्मी महाजन की तरह उनके पैसे पचाते रहेंगे और परिणामस्वरूप प्राप्त अधिशेष के बल पर उनकी चल-अचल सम्पत्ति में अभूतपूर्व अभिवृद्धि होती रहेगी। अंत में उनकी लंबी आयु की कामना करता हूँ जिससे आनेवाले समय में देश में समाजवाद दिन दूनी और रात चौगुनी प्रगति कर सके।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

अब कोई कैसे शरण देगा निर्भया को?

8-4-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। बिदुपुर थाना क्षेत्र के खजबत्ती निवासी राजदेव राय की हत्या से पूरा वैशाली जिला सन्न है। उस आदमी की हत्या हो गई जिसने निर्भया को सामूहिक बलात्कार से न केवल बचाया था बल्कि शरण भी दी थी और उसके हिस्से की लड़ाई भी लड़ी थी वह भी अकेले? लड़ाई में उसने राज्य सरकार से मदद भी मांगी थी। सुरक्षा और हथियार का लाइसेंस मांगा था लेकिन मिला कुछ भी नहीं। मिली तो सिर्फ मौत।

मुख्यमंत्री ने उसकी मांग को ध्यान से सुना और डीजीपी को कार्रवाई करने को कहा। पुलिस ने मामले के अनुसंधान पदाधिकारी को निलंबित भर कर दिया और अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर ली। दो बलात्कारियों की गिरफ्तारी हुई तो पूरा गांव थाने पर चढ़ बैठा उनके समर्थन में। क्या यह संकेत नहीं है हमारे गांवों के नैतिक पतन का? पहले तो गांवों में अपराधियों को बहिष्कृत कर देने की प्रथा थी।

स्थानीय विधायक सतीश कुमार कहते हैं कि अपराधी दूसरे क्षेत्रों से आए हुए लोग थे। अगर ऐसा था तो फिर उनको गांववालों का साथ कैसे मिल गया? राजदेव को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी किसकी थी? पुलिस ने समुचित कदम क्यों नहीं उठाया? हथियार का लाइसेंस अगर दे दिया गया होता तो राजदेव अपनी रक्षा स्वयं कर लेते। क्यों उनको लाइसेंस नहीं दिया गया? क्या बिना घूस लिए पुलिस-प्रशासन किसी को भी लाइसेंस नहीं देती है? जब किसी को राज्य का मुख्यमंत्री भी सुरक्षा नहीं दिला सकता तो फिर कोई जरुरतमंद किससे उम्मीद रखेगा? क्या मतलब है मुख्यमंत्री के जनता दरबार का? इन परिस्थितियों में क्या अब कोई राजदेव बनने की हिमाकत करेगा भी? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 6 अप्रैल 2014

अल्पसंख्यकवाद,आरक्षण और छद्म धर्मनिरपेक्षता

07-04-2014,ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। मित्रों,लाल किले के प्राचीर से अपने पहले संबोधन में भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है। भारत में अल्पसंख्यकों में सबसे ज्यादा जनसंख्या मुसलमानों की है फिर सिख,जैन,इसाई और पारसी आते हैं लेकिन मुसलमानों को छोड़कर बाँकी समुदायों की हालत हिन्दुओं से भी अच्छी है। मतलब कि भारत में अल्पसंख्यकों के लिए जो भी इंतजाम सरकार करती है तो वह वास्तव में मुसलमानों के लिए ही करती है।
मित्रों,बाद में सरकार ने मुसलमानों को पहला अधिकार दिया भी। 15 सूत्री कार्यक्रम बनाया जिससे सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों को ही लाभ हुआ कदाचित एकाध सिख,इसाई या पारसी ने भी लाभ उठाया हो। अगर रजिया या अहमद को पढ़ाई के लिए सस्ते ऋण या विशेष छात्रवृत्ति दी जाती है तो इससे बहुसंख्यकों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन यह पहला अधिकार वास्तव में सिर्फ पहला अधिकार ही नहीं रहा बल्कि केंद्र सरकार और उ.प्र. और कर्नाटक जैसी कई राज्य सरकारों ने इसे सिर्फ अल्पसंख्यकों का अधिकार ही बना दिया। वरना क्या कारण है कि रजिया को सुविधा मिले और गरीब हिन्दू की बेटी राधा को साधनों के अभाव में पढ़ाई बीच में ही छोड़कर घर बैठना पड़े? कोई भी कार्यक्रम कैसे सिर्फ एक समुदाय विशेष के लिए ही बनाया जा सकता है? क्या ऐसा करना एक नए तरह के भेदभाव को जन्म नहीं देता है? आजादी से पहले अंग्रेजों ने अपने काम आनेवाले होटलों और स्वीमिंग पुलों में लिखवा दिया था कि डॉग्स एंड इंडियन्स आर नॉट एलाउड और अब बिना बोर्ड लगाए ही केंद्र सरकार योजनाओं के लाभ से वंचित कर बहुसंख्यक हिन्दुओं के साथ डॉग्स एंड हिन्दुज आर नॉट एलाउड जैसा व्यवहार कर रही है।
मित्रों,इतना ही नहीं बाद में जब उ.प्र. के मुजफ्फरनगर में दंगे हुए तो वहाँ की वर्तमान राज्य सरकार ने कहा कि हम तो सिर्फ मुसलमानों को ही दंगा पीड़ित मानते हैं इसलिए हम तो सिर्फ उनको ही मुआवजा देंगे। पीड़ितों के दर्द और आँसुओं को भी अल्पसंख्यकवाद की छद्म धर्मनिरपेक्षता की सियासत ने संप्रदायों में बाँट दिया। बाद में इससे भी एक कदम आगे बढ़कर केंद्र सरकार ने संसद में सांप्रदायिकता विरोधी बिल पेश कर दिया जिसमें इस तरह के प्रावधान रखे गए कि अगर देश में कहीं भी दंगे होते हैं तो चाहे दंगों की शुरुआत कोई भी करे जिम्मेदारी सिर्फ बहुसंख्यकों पर आएगी। वाह,नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का भी सरेआम खून कर दिया गया। जबकि सच्चाई तो यह है कि देश के प्रत्येक हिस्से में साम्प्रदायिक दंगों की शुरुआत हमेशा मुसलमान ही करते हैं।
मित्रों,भारत में नौकरियों में आरक्षण देने का उद्देश्य क्या है? यही न कि जो सदियों से पिछड़े हैं उनको बराबरी में आने का अवसर दिया जाए लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार के लिए इसका बस इतना ही मतलब है कि बाँटो और राज करो। तभी तो उसने देश के सबसे समृद्ध समुदायों में से एक जैनों को आरक्षण का लाभ दे दिया जिनको वास्तव में इसकी जरुरत थी ही नहीं। फिर गरीब सवर्ण मुसलमानों को भी आरक्षण देने की कोशिश की गई केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों के द्वारा भी। क्या गरीब सवर्ण हिन्दुओं ने कोई जघन्य अपराध किया है जो आज तक उनको इस सुविधा से वंचित रखा गया है और वही सुविधा गरीब सवर्ण मुसलमानों को दे दी गई। हालाँकि कोर्ट ने सरकार को ऐसा करने नहीं दिया। बाद में मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद जब केंद्र सरकार ने देखा कि प्रशासनिक भेदभाव से जाट मतदाता नाराज हो गए हैं तो जाटों को बिना जरूरी कानूनी प्रक्रिया को पूरा किए ही,राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग से सिफारिश लिए बिना ही आरक्षण दे दिया। क्या भारत के संविधान में आरक्षण का प्रावधान गंदी सियासत का हथियार बनाने के लिए किया गया था? कई सवर्ण हिन्दू जातियों की आर्थिक स्थिति जाटों से ज्यादा खराब है फिर उनको आरक्षण क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? कुछ लोग कह सकते हैं कि आरक्षण का आधार तो सामाजिक पिछड़ापन है तो फिर जैनों,गरीब सवर्ण मुसलमानों और जाटों को कैसे आरक्षण दे दिया गया?
              मित्रों,हमारे देश की छद्म धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ जिसे धर्मनिरपेक्षता कहती हैं वह वास्तव में धर्मनिरपेक्षता है ही नहीं। वह वास्तव में अल्पसंख्यकवाद है और वोट बैंक की गंदी राजनीति है। इन पार्टियों ने सत्ता प्राप्ति के लिए कुछ हिन्दू जातियों और पूरे मुस्लिम समुदाय को अपने साथ रखकर एक समीकरण बनाया है और उसके अनुपालन को ही ये लोग धर्मनिरपेक्षता कहते हैं। यह आरक्षण भी उसी नीति का एक भाग मात्र है। वास्तव में इन पार्टियों को न तो देशहित से कोई मतलब है और न ही प्रदेशहित से कोई लेना-देना। इनके पास न तो देश-प्रदेश के विकास के लिए कोई योजना है और न ही कोई ईच्छा। कहाँ तो राजग की केंद्र सरकार ने 2020 तक भारत को विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में लाने का लक्ष्य रखा था और कहाँ तो यूपीए की वर्तमान केंद्र सरकार ने भारत की विकास दर को फिर से हिन्दू विकास दर से भी नीचे ला दिया। जिस अब्दुल्ला बुखारी पर दर्जनों आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं,जिस व्यक्ति को जेल में होना चाहिए यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी उसी बुखारी से अनुनय-विनय करके मुसलमानों से अपने पक्ष में मतदान करने की अपील जारी करवाती हैं। क्या इसको धर्मनिरपेक्षता का नाम दिया जाना चाहिए?
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

स्टिंग ऑपरेशन और लोकमंगल

04-04-2014,ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। मित्रों,कभी तुलसी और सूर की कविताओं और उन दोनों के आराध्यों की समीक्षा करते हुए हिन्दी के सबसे बड़े आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा था कि तुलसी लोकमंगल के कवि हैं और उनके राम के लिए भी लोकमंगल में ही अपना मंगल भी है। वहीं सूर के कृष्ण के लिए लोकमंगल प्राथमिकता नहीं है बल्कि आनन्द प्राथमिकता है। तुलसी के अनुसार आदर्श को सुधो मन,सुधो वचन,सुधो सब करतूती होना चाहिए।
मित्रों,आधुनिक युग संचार क्रांति का युग है। रोज-रोज नए-नए आविष्कार हो रहे हैं। विज्ञान और तकनीक का सदुपयोग या दुरुपयोग स्वाभाविक रूप से मानव के स्वविवेक पर निर्भर करता है। आज इतने सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक यंत्र आ चुके हैं कि आपको इस बात का भान तक नहीं होता कि आपको कैमरे में कैद किया जा रहा है। प्रश्न उठता है कि क्या किसी को धोखा देकर बिना उसकी मर्जी के उसका वीडियो बनाना नैतिक रूप से उचित है? क्या यह सूधो मन,सूधो वचन,सूधो सब करतूती के मान्य सिद्धांत पर खरा उतरता है? क्या इस तरह से बनाए गए वीडियो को न्यायालय सबूत के रूप में स्वीकार करेगा? अगर न्यायालय ऐसा करता है तो उसे ऐसा करना चाहिए या नहीं?
मित्रों,सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कुकुरमुत्ते की तरह उग आई स्टिंग करनेवाली कंपनियों का उद्देश्य क्या है? क्या वे सिर्फ लोकमंगल के लिए स्टिंग करवाते हैं या फिर उनके भी निहित स्वार्थ हैं? इतिहास के पृष्ठों को अगर हम उलटें तो हम देखते हैं कि कभी तहलका ने स्टिंग करके तहलका मचा दिया था और बताया था कि एनडीए की सरकार में होनेवाली रक्षा खरीदों में कमीशनखोरी हो रही है। परन्तु उससे हजार गुना ज्यादा कमीशनखोरी परवर्ती कांग्रेस सरकार के समय में होती रही,स्थिति यहाँ तक बिगड़ी कि कोई नहीं कह सकता कि कौन-सी पनडुब्बी या युद्धपोत कब जल समाधि ले लेगा मगर तब तहलका ने कोई स्टिंग नहीं किया और मुंदहूँ आँख कतहुँ कछु नाहि को अपना मूलमंत्र बना लिया। सवाल उठता है कि क्या स्टिंग करनेवाले लोगों को निष्पक्ष नहीं होना चाहिए? अगर एनडीए का भ्रष्टाचार गलत था तो फिर गलत तो कांग्रेस का भ्रष्टाचार भी है। इसी तरह 2009 में 'नोट फॉर वोट' नामक स्टिंग आईबीएन 7 ने करवाया था। दिनभर 'खबर किसी भी कीमत पर' को अपना आदर्श माननेवाले इस चैनल पर घोषणा होती रही कि रात में स्टिंग को प्रसारित करके बताया जाएगा कि किस तरह कांग्रेस सरकार ने पैसे देकर सांसदों के मत खरीदे लेकिन न जाने किस चीज की कीमत पर स्टिंग को दबा दिया गया और प्रसारित नहीं किया गया। इसी प्रकार एक स्टिंग पिछले साल दिल्ली विधानसभा चुनावों के समय आया था जिसमें आप पार्टी के ढोंग की पोल खोली गई थी। हालाँकि इससे आप पार्टी को फायदा हुआ या नुकसान यह आज भी विवाद का विषय है लेकिन इस प्रयास की निश्चित रूप से सराहना की जानी चाहिए क्योंकि इसके पीछे निश्चित रूप से लोकमंगल निहित था।
मित्रों,कई बार देखा गया है कि स्टिंग ऑपरेशन करनेवाले निजी शत्रुता में स्टिंग करते हैं और तथ्यों को तोड़-मरोड़ देते हैं। उदाहरण के लिए वर्ष 2007 में एक स्टिंग में दक्षिण दिल्ली स्थित सर्वोदय कन्या विद्यालय की शिक्षिका उमा खुराना पर छात्राओं की अश्लील वीडियो बनाने का आरोप लगा था जो बाद में पूरी तरह से झूठा भी पाया गया था। लेकिन इस बीच अभिभावकों ने उमा के साथ मारपीट और बदसलूकी की,कपड़े तक फाड़ डाले थे। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को कई बार लाठीचार्ज करना पड़ा था और आँसूगैस के गोले भी छोड़ने पड़े थे।
मित्रों,आज कोबरा पोस्ट ने जो स्टिंग प्रसारित किया है उसमें कोई भी नया तथ्य या खुलासा नहीं है। पूरा भारत जानता है कि घटना पूर्वनियोजित थी। सवाल उठता है क्या कोबरा पोस्ट इस मामले में कांग्रेस के इशारे पर काम कर रहा है। क्या बाबरी के ढहाने की तरह इस स्टिंग का इस समय प्रसारण भी पूर्वनियोजित है? कल-परसों सोनिया ने बुखारी से भेंट की,आज बुखारी कांग्रेस के पक्ष में मुसलमानों से अपील कर सकते हैं ऐसे में अगर हम सारी बिखरी हुई कड़ियों को जोड़कर देखें तो इस समय इस स्टिंग के आने से सबसे ज्यादा लाभ कांग्रेस को होनेवाला है भले ही कोबरा पोस्ट की कांग्रेस से मिलीभगत हो या नहीं।
मित्रों,मैं यह नहीं कहता कि प्रत्येक स्थिति में स्टिंग करना गलत है। अनैतिक लोगों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के लिए कभी-कभी अनैतिक कर्म करने पड़ते हैं लेकिन स्टिंग का एकमात्र उद्देश्य लोकमंगल होना चाहिए,देशोद्धार होना चाहिए। शुद्ध व्यावसायिक हित के लिए इसका दुरुपयोग करना निहायत गैरजिम्मेदाराना और गलत है। उस पर उनलोगों के पक्ष में इसका जाने-अनजाने में इस्तेमाल करना तो और भी गलत है जो देश को लगातार नुकसान पहुँचा रहे हैं और जिन्होंने घोटालों की वर्णमाला ही तैयार कर दी है। तुलसी के राम राज्याभिषेक के बाद प्रतिज्ञा करते हुए कहते हैं कि 'निशिचरहीन करौं महि हथ उठाई पण कीन्ह'। पृथ्वी को निशिचरहीन करते समय किसी तरह का भेदभाव नहीं किया था राम ने। उन्होंने केवल उनके कर्म देखकर उनको सजा दी थी न कि अपना-पराया के आधार पर उनमें भेदभाव किया था। अगर भाजपा का भ्रष्टाचार नुकसानदायक है तो कांग्रेस का भ्रष्टाचार भी नुकसानदेह होगा। अगर बाबरी मस्जिद को तोड़ना सुनियोजित था तो 2009 में वोट के लिए पैसे बाँटना भी सुनियोजित था। अगर भूतकाल में भाजपा की सांप्रदायिकता बुरी थी तो भूत और वर्तमान काल में कांग्रेस की सांप्रदायिकता भी उतनी ही बुरी है।
मित्रों,इसलिए स्टिंग करते समय एक तो स्टिंग करनेवाले लोगों को निष्पक्ष तो होना ही चाहिए और इसके साथ ही देशहित और लोकमंगल का भी ध्यान रखना चाहिए। अगर इस स्टिंग से कांग्रेस को अप्रत्याशित लाभ हो जाता है और वह एक बार फिर से सत्ता में वापस आ जाती है तो निश्चित रूप से वह अपने उसी एजेंडे को आगे बढ़ाएगी जिस पर उसकी सरकार पिछले 10 सालों से काम करती रही है अर्थात् देश को लूटने की गति और तरीका और भी आक्रामक और निर्लज्ज हो जाएगा और इस प्रकार भारत वैश्विक और क्षेत्रीय विकास की दौड़ में क्रमशः काफी पीछे होता जाएगा। और यह तो आप भी जानते हैं कि इससे भारत की एकता,अखंडता और संप्रभुता निश्चित रूप खतरे में पड़ जाएगी क्योंकि निर्बल की पत्नी सबकी लुगाई हो जाती है। क्या स्टिंग करनेवाले कोबरा पोस्ट को सोंचना नहीं चाहिए था कि अगर ऐसा हुआ तो इस पाप में उसे भी हमेशा भागीदार माना जाएगा। 'राम की शक्ति पूजा' में निराला के राम इस बात पर क्षोभ प्रकट करते हैं कि 'जिधर अधर्म है उधर शक्ति'। क्या वर्तमान भारत में भी स्थिति ऐसी ही नहीं है? क्या कांग्रेस 10 साल की उत्तरोत्तर आक्रामक होती सतत लूट के बाद भी शर्मिंदा होने के बदले पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक नहीं हो गई है जैसे कि रावण सीता-हरण के बाद होता गया था? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 31 मार्च 2014

कौन हैं कांग्रेस के समलैंगिक?


31-03-2014,ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। मित्रों, आपने ऩकलची बंदर की कहानी जरूर पढ़ी होगी परंतु हो सकता है कि आपको कहानी को जीने का अवसर नहीं मिला हो। अगर सचमुच में ऐसा है तो भी घबराने की कोई जरुरत नहीं है। बंदर को नकल करते हुए नहीं देखा तो क्या आप जब चाहे एक राजनैतिक दल को ऐसा करते हुए देख सकते हैं। आपने एकदम ठीक समझा है! मैं भारत की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की ही बात कर रहा हूँ। उसी कांग्रेस की जिसकी नीतियों में हमेशा मौलिकता की कमी रही है और जो हमेशा से विदेशी सरकारों की नकल करती रही है। इसकी सरकारों के मंत्री सरकार चलाने के गुर सीखने के लिए अक्सर विदेश जाते रहे हैं और फिर वापस आकर उन विदेशी नीतियों को बिना थोड़ा-सा दिमाग खर्च किए लागू करने लगते हैं जबकि भारत की स्थितियाँ अमेरिका-यूरोप से साफ इतर होती हैं। जाहिर है कि फिर उन आयातित योजनाओं का अंजाम वही होता है जो होना होता है।
मित्रों,नकल की यह कहानी पं. नेहरू के समय से ही कांग्रेसी नेताओं द्वारा बार-बार दोहराई जा रही है। बात सिर्फ आर्थिक नीतियों तक सीमित होती तो फिर भी गनीमत थी लेकिन अब कांग्रेस नेता जबर्दस्ती भारत के समाज को अमेरिकी-यूरोपियन समाज बना देना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि भारत में भी यौन-क्रांति की स्थिति उत्पन्न हो जाए। तभी तो बलात्कार की बाढ़ आने के बाद भी कांग्रेस सरकार ने सनी लियोन को भारत आने और फिल्में बनाने से नहीं रोका। तभी तो दिल्ली के रेप कैपिटल बन जाने के बाद भी भारत में अच्छे-अच्छों के दिमाग खराब कर देनेवाली पोर्न वेबसाईटों पर रोक नहीं लगाई गई। तभी तो समस्या मस्तिष्क-प्रदूषण से है लेकिन ईलाज कानून बनाकर किया जा रहा है। तभी तो जबसे केंद्र में माँ-बेटे का शासन कायम हुआ है बार-बार समलैंगिकता का समर्थन किया जा रहा है। तभी तो अभी कुछ महीने पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को सामाजिक अपराध कहा था तब कांग्रेस के युवराज ने झटपट समलैंगिकता का पक्ष लेते हुए इस पर भाजपा से उसके विचार पूछ लिए थे। तभी तो पार्टी के घोषणा-पत्र में भी समलैंगिकता को वैधानिकता प्रदान करने के नायाब व क्रांतिकारी वादे किए गए हैं।
मित्रों, कांग्रेस के युवराज और महारानी को यह मालूम नहीं है कि भारत भारत है नार्वे या इंग्लैंड नहीं जहाँ की जनसंख्या के 20-30 प्रतिशत लोग घोषित समलैंगिक हो चुके हैं और इस तरह बहुत बड़े वोटबैंक में तब्दील हो चुके हैं। मैं समझता हूँ कि भारत में अभी भी कुछ सौ या कुछ हजार से ज्यादा घोषित समलैंगिक नहीं हैं। फिर राहुल और सोनिया गांधी क्यों समलैंगिकता ही नहीं बल्कि वेश्यावृत्ति को भी वैधानिक मान्यता देने की हड़बड़ी में हैं? कांग्रेस में ऐसे कौन-से समलैंगिक लोग हैं जिनको खुश करने के लिए इस तरह के गंदे प्रयास किए जा रहे हैं? आखिर एक स्त्री एक स्त्री से और एक पुरुष एक पुरुष से विवाह करके समाज के लिए कौन-सा अमूल्य योगदान कर पाएगा? क्या ईश्वर ने हमें जो अंग जिस काम के लिए दिए हैं उसको उसी काम के लिए प्रयोग में नहीं लाया जाना चाहिए? क्या ऐसा नहीं करना प्रकृति के नियमों के साथ मजाक नहीं होगा? क्या कांग्रेसी मुँह से मलत्याग या गुदा से भोजन कर सकते हैं? अगर नहीं तो फिर अप्राकृतिक यौनाचार को मान्यता देने पर वे इतना जोर क्यों दे रहे हैं? क्या इन अश्लील,घोर भोगवादी और विनाशकारी प्रवृत्तियों को कानून बनाकर बढ़ावा देने से भारतीय समाज के ताने-बाने के बिखर जाने का खतरा उत्पन्न नहीं हो जाएगा? क्या कांग्रेस को उस भारतीय संस्कृति की कोई चिंता नहीं है,क्या उसको उस भारतीय संस्कृति पर गर्व नहीं है जिस पर गर्व करते हुए कभी इकबाल ने कहा था कि यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गए जहाँ से, अब तक मगर है बाकी नाम-ओ-निशाँ हमारा, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 30 मार्च 2014

संतोष की जगह खीझ पैदा करती है वैशाली जिले की सरकारी वेबसाईट

30-03-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,कई साल पहले लालू जी बिहार में चीख-चीखकर कहा करते थे कि विकास करने से कहीं वोट मिलता है और यह आईटी-फाईटी क्या है। सत्ता बदली तो बदली हुए सरकार ने जनता को सूचना-क्रांति और इंटरनेट के जरिए सरकारी योजनाओें और जानकारियों तक आसानी से पहुँच बनाने की पहल शुरू की। प्रदेश के सभी जिलों की सरकारी वेबसाइटें बनाई गईं जिससे बहुत से जिलों की जनता को लाभ भी हुआ लेकिन दुनिया के सबसे पुराने गणतंत्र वाला वैशाली जिला इसका अपवाद ही बना रहा।
मित्रों,न जाने क्यों जबसे इस जिले की सरकारी वेबसाईट बनी है तभी से पिछले 8-10 सालों से इस वेबसाईट की सारी महत्त्वपूर्ण लिंक काम नहीं करती हैं। अर्थात् आप क्लिक करते-करते परेशान हो जाईएगा लेकिन वह लिंक नहीं खुलेगा। उदाहरण के लिए वेबसाईट पर District Vaishali welcomes you all,DISTRICT PROFILE,AT A GLANCE,MNREGA Yojna,IMPORTANT CONTACTS,Citizen Services/Online Registration,BPL SURVEY,IAY,SMS MONITERING SYSTEM,DPMC,RTI ACT,ASSET DECLARATION,PUBLIC UTILITY SERVICES,मतदाता जागरुकता अभियान जैसी दर्जनों जनता के काम आनेवाली लिंक हैं जो काम नहीं करतीं। परिणामस्वरुप जो जनता का जो काम घर बैठे हो जाना चाहिए उसके लिए उनको महीनों दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और जो जानकारियाँ उनको इस वेबसाईट से घर बैठे मिल जानी चाहिए उसके लिए उनकों सैंकड़ों आरटीआई डालने पड़ते हैं। कदाचित् उसके बाद भी उनके कई काम नहीं हो पाते और वांछित जानकारी भी नहीं मिल पाती। विडंबना यह है कि इस समय राज्य के सूचना और जनसंपर्क मंत्री इसी जिले के रहनेवाले हैं।
मित्रों,वेबसाईट पर सबसे नीचे एक स्क्रॉल चलती रहती है जिसमें जिले में चल रही विभिन्न सरकारी गतिविधियों से संबंधित करीब एक दर्जन लिंकें हैं पूरी वेबसाईट में सिर्फ यही चंद लिंकें काम कर रही हैं। जाहिर है कि जिन लोगों के मजबूत कंधों पर इस वेबसाईट के चलाने की जिम्मेदारी दी गई है वे घोर लापरवाह और आलसी हैं। उन्होंने लिंकों की जगह कोरे शब्द डाल दिए हैं लिंकों के लिंक नहीं डाले। लिंक काम करेगा तो डाटा को बराबर अपडेट भी करना पड़ेगा न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी। लेकिन इस वेबसाईट के सारे महत्त्वपूर्णों लिंकों के काम नहीं करने के कारण वैशाली जिले के निवासियों की जिन्दगी जरूर बेसुरी हो गई है। जबसे वेबसाईट का निर्माण हुआ है तभी से यही हालत है और आश्चर्य की बात है कि जिले के किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने अबतक इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया। लिंकों के काम नहीं करने से फायदा तो उनको भी है। जाहिर है कि SMS MONITERING और UTILITY SERVICES जैसी सेवाओं के लिंकों के काम करने पर उनकी जिम्मेदारी भी काफी बढ़ जाती जिससे वे फिलहाल बच जा रहे हैं।
मित्रों,बिहार में चाहे सूचना तकनीक से जनता को फायदा पहुँचाने की योजनाएँ हों या फिर कोई भी अन्य योजना यहाँ आकर वे दम तोड़ देती हैं। कारण बस इतना-सा है कि उनके क्रियान्वयन पर ध्यान नहीं दिया जाता। दुर्भाग्यवश इस समय बिहार के जो मुख्यमंत्री हैं वे देश के सबसे बड़े फोकसबाज नेता हैं। कागज पर तो वे सबकुछ कर दे रहे हैं लेकिन धरातल पर कुछ भी नहीं करते। मैं इस आलेख की एक कॉपी उनको भी भेजने जा रहा हूँ शायद वे इस दिशा में पहल कर ही दें और वैशाली जिले की वेबसाईट जिले की जनता को सिर्फ संतोष प्रदान करने लगे और भविष्य में उनके मन में आक्रोश और खींझ उत्पन्न न करे। मैं आपको वैशाली जिले की वेबसाईट का लिंक भी दे रहा हूँ जिससे आप खुद ही अनुभव करके जान जाईएगा कि राज्य में सुशासन कैसे काम कर रहा है-http://vaishali.bih.nic.in/
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 25 मार्च 2014

जागो वतन खतरे में है


25-03-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,किसी शायर ने क्या खूब कहा कि "ले आई जिन्दगी हमें कहाँ पर कहाँ से, ये तो वही जगह है गुजरे थे हम जहाँ से।"  शायर ने कहा तो था यह खुद के बारे में लेकिन दुर्भाग्यवश यह शेर हमारे देश भारत की वर्तमान स्थिति पर भी खूब खरा उतर रहा है। हमारा देश एक बार फिर से सन् 1962 में पहुँच गया। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने देश की सुरक्षा को जानबूझकर खतरे में डाला था। पहले 1948 में पाकिस्तान और बाद में 1962 में चीन से भारत को मुँह की खानी पड़ी।  हाल ही में युद्ध के समय नई दिल्ली मे उस वक्त विदेशी पत्रकार के रूप में तैनात मैक्सवैल द्वारा प्रकाशित की गई पुस्तक "इंडियाज चाइना वार" के अनुसार नेहरू जानते थे कि चीन भारत पर हमला करने वाला है लेकिन उन्होंने जानते हुए भी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। नतीजा यह हुआ कि भारत के सैनिकों को बिना गोली-बारूद के ही जंग के मैदान में उतार दिया गया। खुद मेरे मामा स्व. अरविन्द कुमार सिंह कई महीनों तक बंदूक लिए अरूणाचल के जंगलों में छिपे रहे और पेड़ के पत्ते खाकर जान बचाई।
मित्रों,एक बार फिर से भारतीय सेना के लिए गोला-बारुद की भारी कमी हो गई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस समय हमारी सेना के पास इतना भी गोला-बारुद शेष नहीं बचा है कि हम 20 दिनों तक लड़ सकें। उसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत सरकार ने इस दिशा में जो कदम उठाए हैं उसके अनुसार अपेक्षित परिणाम आने में कम-से-कम 5 साल लगेंगे। भगवान न करे इस बीच अगर चीन और पाकिस्तान ने संयुक्त मोर्चाबंदी करके एकसाथ भारत पर हमला कर दिया तो देश की रक्षा कैसे हो पाएगी? क्या देश की सुरक्षा को खतरे में डालना हमारी वर्तमान केंद्र सरकार का आपराधिक कदम नहीं है और इस देशद्रोह के लिए इसमें शामिल सभी संबद्ध मंत्रियों को सजा नहीं दी जानी चाहिए? अगर कोई सैनिक या सैन्य अधिकारी युद्ध के दौरान गलतियाँ करता है तो उसका कोर्ट मार्शल कर दिया जाता है तो क्या उन लोगों को जिन्होंने जानबूझकर देश की सेना को कमजोर किया है को सजा नहीं मिलनी चाहिए?
मित्रों,मैं पहले भी इस केंद्र सरकार पर अपने आलेखों में आरोप लगा चुका हूँ कि इसने जानबूझकर न केवल देश की अर्थव्यवस्था को बल्कि देश की सुरक्षा को भी कमजोर किया है। यह वैसी ही बात है जैसे कि मेड़ खेत को खाने लगे। मैंने यह आरोप भी लगाए थे कि केंद्र सरकार में शामिल लोग एक साथ चीन,अमेरिका और पाकिस्तान के एजेंट हैं। वास्तव में देश पर इस समय ऐसे लोगों का शासन है जो चाहते हैं कि देश टूट जाए,समाप्त हो जाए। नहीं तो क्या कारण है कि हमारे समुद्रों में खड़े-खड़े ही एक-के-बाद-एक युद्धपोत और पनडुब्बियाँ डूबते जा रहे हैं? मैं नहीं मानता कि रक्षा मंत्री एके एंटनी ईमानदार व्यक्ति हैं। अगर ऐसा है भी तो वे मनमोहन सिंह की तरह के ईमानदार हैं जिनकी नाक के नीचे बेईमान जमकर लूट मचाए हुए हैं और श्रीमान इस्तीफा देने तक की जहमत नहीं उठा रहे हैं जबकि भारत के नौसेना अध्यक्ष कई हफ्ते पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं।
मित्रों,जैसा कि मैंने आलेख की शुरुआत में ही कहा था कि हम फिर से 1962 में पहुँच गए हैं। ऐसा हुआ कैसे? आज हम शत-प्रतिशत साक्षरता के काफी निकट पहुँच चुके हैं फिर हमने ऐसे अयोग्य और देशद्रोहियों के हाथों में देश को सौंप कैसे दिया? तो क्या सिर्फ पढ़ा-लिखा होने से ही कोई कौम समझदार नहीं हो जाती? क्या भारत की जनता आज भी उतनी ही मूर्ख नहीं है जितनी कि वह 1962 में थी? पढ़ी-लिखी तो दिल्ली की जनता भी थी फिर लंपट-देशद्रोही-अराजकतावादी-सीआईए एजेंटों के हाथों में पिछले साल दिल्ली की सत्ता कैसे सौंप दी? क्या एक देशद्रोही पार्टी कांग्रेस को हटाकर दूसरी देशद्रोही पार्टी के हाथों देश को सौंप देना बुद्धिमानी कही जाएगी? भूलिए मत कि तब भी एक मेनन भारत-चीन दोस्ती के तराने गा रहा था और अब भी एक मेनन वैसे ही तराने गा रहा है। मैं नहीं जानता कि इस मेनन और इस मेनन में कोई सीधा रक्त संबंध है या नहीं लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूँ कि उस नेहरू और इस राहुल गांधी के बीच जरूर सीधा रक्त संबंध है। मेनका गांधी ने एकदम सही सवाल उठाया है कि सोनिया अपने मायके से तो कुछ भी लेकर नहीं आई थी फिर वो कैसे दुनिया की सबसे अमीर छठी महिला बन गई? क्या देश की बर्बादी और सोनिया की समृद्धि के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है?
मित्रों,जागिए नहीं तो फिर कभी चैन से सो नहीं पाईएगा। संकट अब सिर पर आ गया है। देश की सुरक्षा खतरे में है,देश खतरे में है। देश के दुश्मनों को पहचानिए और आनेवाले चुनावों में सिर्फ और सिर्फ एनडीए को वोट दीजिए क्योंकि आपने दिल्ली के विधानसभा चुनावों में भी देखा है कि एनडीए गठबंधन को वोट न देने का सीधा मतलब होता है कांग्रेस को वोट देना। क्योंकि चुनावों के बाद बाँकी सारे दल फिर से एकसाथ हो जाते हैं देश को लूटने के लिए। क्योंकि बाँकी किसी भी दल को कोई मतलब नहीं है कि देश बचेगा या देश का नामोनिशान मिट जाएगा। भूल जाईए कि आपके क्षेत्र से एनडीए का उम्मीदवार कौन है क्योंकि अब प्रश्न हमारे आपके लोकसभा क्षेत्र भर के विकास का नहीं है बल्कि अब प्रश्न-चिन्ह लग गया है भारत और भारत के वजूद पर,अस्तित्व पर। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 19 मार्च 2014

मूल स्वरुप से भटक गई है होली

18-03-2014,ब्रजकिशोर सिंह,हाजीपुर। मित्रों,कहते हैं कि परिवर्तन संसार का नियम है लेकिन जब बात पर्वों-त्योहारों या परंपरा की हो तो कभी-कभी परिवर्तन की गति या मात्रा हमें चिंतित भी करने लगती है। होली को ही लें जो भारत का सबसे बड़ा त्योहार है। शहरों में तो पहले से भी होली सांकेतिक ही थी लेकिन अब तो गाँवों में भी शहरी होली मनाई जाने लगी है। इस बार की होली में हाजीपुर शहर में होली के कई दिन पहले से ही विभिन्न व्यवसायी संगठनों द्वारा होली-मिलन समारोहों का आयोजन होने लगा था। मैं उनमें से एक समारोह में निमंत्रित भी था। होलिका-दहन के दिन जाने पर देखा कि सामुदायिक भवन हाजीपुर में जगह-जगह बिजली कंपनियों की होर्डिंग्स लगी हुई थी। स्टेज पर दो-चार लोग बैठे हुए थे और एक स्थान पर डीजे पर भोजपुरी गीत बज रहा था और कई लोग बेसुरा डांस कर रहे थे। सामने कुर्सियाँ लगी हुई थीं जिन पर कई सौ लोग बैठे हुए थे। मैंने दो गिलास दूध पिया,कुछ तस्वीरें लीं और चल दिया। वहाँ मेरा दम घुटने लगा। दरअसल वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा था जिसको कि मैं होली मानता और रुकता।
मित्रों,कल होकर होली के दिन मैं दोपहर दो बजे अपनी ससुराल के लिए रवाना हुआ। रास्ते में जितने भी गाँव मिले लगभग सभी गाँवों में लोग साउंड बॉक्स पर गंदे भोजपुरी होली गीतों की धुन पर थिरकते मिले। आयु यही कोई 8-10 से 30 तक की। उनके लड़खड़ाते पाँव यह बताने को काफी थे कि वे अहले सुबह से ही शराब पी रहे थे। रास्ते में कई स्थानों पर युवक मोटरसाईकिल पर हंगामा करते हुए भी देखे गए। कई स्थानों पर कीचड़ और गोबर से सने युवक हुल्लड़बाजी करते हुए भी देखे गए। मैंने अपनी ससुराल पहुँचते ही सालों से पूछा कि आपके गाँव में तो लोग हर दरवाजे पर घूम-घूमकर होली गाते ही होंगे तो उन्होंने बताया कि यहाँ कई साल पहले तक तो ऐसा होता था लेकिन अक्सर गायन मारपीट में बदल जाता था इसलिए अब इस परंपरा को बंद कर दिया गया। सुनकर मैं सन्नाटे में आ गया। फिर गाँव और शहर की होली में फर्क ही क्या रह गया? मैं तो होली गीतों का आनंद लेने ही ससुराल गया था लेकिन वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी। शाम में कुछ बच्चे जरूर मुझसे मिलने आए लेकिन मेरी होली तो पहले ही फीकी हो चुकी थी। दरअसल,गाँव से लेकर शहर तक होली इतनी बदल चुकी थी और मुझे पता तक नहीं चला। जिस तरह ग्रामीण समाज में नैतिकता का ह्रास हुआ है,लोगों ने अपनी माँ-बहनों और रिश्तों की अहमियत को भुला दिया है उससे एक दिन तो ऐसा होना ही था। शहरी समाज में तो रक्त-संबंध होते ही नहीं इसलिए वहाँ तो परंपरागत होली की सोंचना भी नहीं चाहिए। अब गाँवों में भी लोग घूम-घूमकर ढोलक-झाल की थाप पर होली नहीं गाते और न ही घर-घर जाकर होली ही खेलते हैं। अब गाँवों में भी नववधुओं को रंगों में स्नान नहीं करवाया जाता। अब गाँवों में भी हर घर में प्रणाम करने या अबीर लगाने पर लोग सूखे नारियल,किशमिश आदि मेवों का मिश्रण नहीं खिलाते। अब गाँवों में भी होली के बाद भी आपसी दुश्मनी और रंजिश बनी रहती है और उसमें कमी लाने के बदले होली उसमें बढ़ोतरी ही कर जाती है। जब पूरा समाज ही अपने मूल स्वरुप से भटक गया हो तो होली को तो अपने मूल स्वरुप से दूर हो ही जाना था,सो हुआ। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 15 मार्च 2014

क्या मोदी मिट्टी के शेर हैं?

15-03-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अगर आपने भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार श्री नरेन्द्र मोदी को किसी रैली के मंच पर आते हुए देखा होगा तो यह भी देखा होगा कि जब वे मंच पर आते हैं तो उनके समर्थक नारा लगाते हैं कि शेर आया,शेर आया। मोदी ने गुजरात में अपने काम से और रैलियों में अपने भाषणों से ऐसा दर्शाया भी है कि वे दिलेर मर्द हैं और उनका सीना सचमुच 56 ईंच का है।
मित्रों,फिर ऐसा क्या हो गया है कि वही नरेंद्र मोदी इन दिनों एक-के-बाद-एक आत्मघाती कदम उठाते चले जा रहे हैं। पहले उन्होंने घोर अवसरवादी रामविलास पासवान से बिहार में गठबंधन कर लिया वो भी तब जबकि सीबीआई ने उनके खिलाफ बोकारो कारखाना नियुक्ति घोटाला में तगड़े सबूत जुटा लिए थे। इतना ही नहीं रामविलास पासवान ने जिन उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा है वे या तो उनके परिजन हैं या फिर राज्य के सबसे बड़े अपराधी। आप ही सोंचिए कि क्या समाँ बंधेगा जब स्वच्छ छविवाले वरिष्ठ नेता डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह के खिलाफ अपराधी-शिरोमणि रामा सिंह चुनाव लड़ेंगे?! हमारे कुछ मोदी समर्थक मित्र फेसबुक पर कह रहे हैं कि चाहे कुत्ता खड़ा हो या गदहा हम तो उसे ही जिताएंगे क्योंकि मोदी को प्रधानमंत्री बनाना है। क्या ऐसा करने से ही लोकसभा में अपराधियों का प्रतिशत कम होगा? आज अगर हम चुप रहे तो फिर अगले 5 सालों तक हम किस मुँह से आँकड़ा दिखाकर आरोप लगाएंगे कि देखिए कैसे लोकसभा अपराधियों का जमावड़ा बनती जा रही है?
मित्रों,इतना ही नहीं हरियाणा में विनोद शर्मा,कर्नाटक में श्रीरामुलु को टिकट देने की बेताबी से तो ऐसा ही लग रहा है कि नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनावों में हार के डर से यानि 272 का आँकड़ा प्राप्त नहीं होने के भय से भयभीत हो गए हैं और इसलिए ताबड़तोड़ उल्टे-सीधे गठबंधन करते जा रहे हैं। क्या मोदी नहीं जानते कि लंपट राज ठाकरे से महाराष्ट्र में गठबंधन करने की स्वाभाविक प्रतिक्रिया बिहार में होगी? अगर इसी तरह भयभीत होकर वे उल्टे-सीधे कदम उठाते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब उनके पक्ष में बनी-बनाई हवा हवा हो जाएगी क्योंकि हवा बनाने में जहाँ महीनों लग जाते हैं वहीं हवा के खराब होने के लिए एक रात ही काफी होती है। कितना विडंबनापूर्ण सत्य है कि एक तरफ तो मोदी कांग्रेसी शहजादे की आलोचना करते रहे हैं वहीं दूसरी ओर खुद उनकी ही पार्टी ने इतने शहजादों को टिकट बाँटे हैं कि शहजादों की एक फौज ही खड़ी हो गई है।
मित्रों,युद्ध के मैदान में या तो हार होती या फिर जीत। शेरदिल योद्धा वही होता है जिसके मन में हार का भय एक क्षण के लिए भी घर न करने पाए। अधर्मियों की सेना जमा करके कोई धर्मयुद्ध कैसे लड़ सकता है? जब चुनावों से पहले भाजपा भी वही कर रही है जो कांग्रेस और आप पार्टी कर रही है तो फिर कैसे यकीन किया जाए कि चुनावों के बाद वह वह सब नहीं करेगी जो कांग्रेसनीत केंद्र सरकार पिछले 10 सालों से करती आ रही है? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 11 मार्च 2014

राजीव गांधी के नाम पर स्विस बैंक में 198000 करोड़ रुपया-विकीलिक्स

नई दिल्ली (एजेंसी)। विकीलिक्स ने स्विस बैंक में पैसा रखनेवाले 29 भारतीयों की सूची जारी की है जिसके अनुसार बैंक में राजीव गांधी के नाम पर एक लाख अंठानबे हजार करोड़ रुपया जमा है। विकीलिक्स ने दावा किया है उसके पास इन कालाधन धारकों के खिलाफ ठोस सबूत भी मौजूद हैं। सूची में उल्लिखित मुख्य नाम इस प्रकार हैं-
राजीव गाँधी (198000)
ए राजा (7800)
हर्षद मेहता (135800)
केतन पारीख (8200)
रामदेव पासवान (3500)
एच डी कुमारस्वामी (14500)
लालू प्रसाद यादव (29800)
पवन सिंह घटोवार (3908)
नीरा राडिया (289990)
एम के स्टालिन (10500)
ज्योतिरादित्य सिंधिया (9000)
कलानिधि मारन (15000)
एम् करूणानिधि (35000)
शरद पवार (28000)
सुरेश कलमाड़ी (5900)
पी चिदम्बरम (32000)
राज फाउंडेशन (189008)।
सूची का लिंक इस प्रकार हैः-http://www.hoaxorfact.com/images/jreviews/36_listofblackmoneyholders-1328610253.JPG
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 10 मार्च 2014

क्या सुशासन का मतलब कदाचार भी है?

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इन दिनों पूरे बिहार में मैट्रिक की परीक्षा चल रही है। जैसा कि आप जानते हैं कि परीक्षा का मतलब होता है पराये की ईच्छा लेकिन बिहार ने इस साल सुशासन ने इसकी परिभाषा ही बदल दी है और मैट्रिक की परीक्षा में इस शब्द का मतलब हो गया है स्वेच्छा। चाहे चुनावी मौसम में वोट-बैंक के नाराज हो जाने का खतरा हो या फिर कुछ और इस साल बिहार की मैट्रिक-परीक्षा में कदाचार की गंगा बह रही है।
मित्रों,राज्य के लगभग प्रत्येक केंद्र पर विद्यार्थियों के साथ 5 स्टार मेहमानों जैसा सलूक किया जा रहा है। भीतर में तो किताब खोलकर लिखने की आजादी है ही बाहर से उनके परिजनों को भी चिट-पुर्जे पहुँचाने की पूरी छूट दी जा रही है। अलबत्ता इस प्रक्रिया में होम गार्ड और बिहार पुलिस के जवानों को जरूर कुछ आमदनी हो जा रही है। एक बार फिर से प्रत्येक केंद्र पर परीक्षार्थियों से इस लाजवाब सुविधा के बदले में हजारों रुपए की सुविधा-शुल्क परीक्षा-केंद्र के शिक्षकों व प्राचार्यों ने वसूली है।
मित्रों,सवाल उठता है कि सुशासन की तुगलकी शिक्षा-नीति ने सरकारी स्कूलों में शिक्षा को समाप्त तो पहले ही कर दिया था अब उसने परीक्षा को भी मजाक बनाकर रख दिया है। प्रश्न उठता है कि इस माहौल में कोई विद्यार्थी पढ़ाई करे भी तो क्यों करे? जिन चंद विद्यार्थियों ने पढ़ाई की भी है वे भी मजबूरन किताबों की सहायता से परीक्षा दे रहे हैं क्योंकि उनको लगता है कि किताब में तो सही लिखा होगा ही याद्दाश्त का क्या भरोसा? मैं श्री नीतीश कुमार जी से पूछना चाहता हूँ कि क्या जरुरत है ऐसी परीक्षा लेने की? सीधे क्यों नहीं विद्यार्थियों को डिग्री थमा देते? ऐसा करने से तो वोट-बैंक और भी ज्यादा मजबूत होगा। क्यों परीक्षार्थियों को घर से 30-40 किलोमीटर दूर आकर परीक्षा देने को मजबूर किया? उनके खुद के विद्यालय में ही क्यों नहीं ले ली गई परीक्षा? (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

केजरीवाल के 16 सवालों के 17 जवाब

07-03-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,गुजरात में विकास के दावों की पड़ताल करने पहुंचे आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने 2 दिन प्रदेश में घूमने के बाद नरेंद्र मोदी की तरफ से 16 सवाल उछाल दिए और कहा कि मैं इन सवालों का जवाब मांगने उनसे मिलने जा रहा हूं। हालांकि, पहले से मिलने का समय नहीं लेने की वजह से उनके काफिले को गांधीनगर में सीएम ऑफिस से पहले ही रोक लिया गया। इसके बाद पार्टी नेता मनीष सिसोदिया मुख्यमंत्री के सेक्रेटरी से मिलने पहुंचे और वक्त मांगा, लेकिन फिलहाल मिलने का समय नहीं मिला।
गुजरात में दो दिनों के दौरे के बाद अरविंद केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि गुजरात में विकास के बारे में नरेंद्र मोदी जो दावे करते हैं, वे खोखले हैं। केजरीवाल ने कहा कि मोदी के तमाम दावे झूठ की बुनियाद पर टिके हैं। उन्होंने कहा कि मोदी कहते हैं कि यहां रोजगार के अवसर सबसे ज्यादा हैं, लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। प्रदेश में भारी बेरोजगारी है।
केजरीवाल ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि मोदी को बताना होगा कि उनका मुकेश अंबानी से क्या रिश्ता है? उन्हें बताना होगा कि आखिर करप्शन के आरोपों के बाद भी बाबू भाई बुखेरिया और पुरुषोत्तम सोलंकी जैसे लोगों को अब तक मंत्री क्यों बना रखा है?
साथ ही अरविंद केजरीवाल ने गुजरात में मोदी के 11 फीसदी कृषि विकास दावे को भी बेबुनियाद करार दिया। उन्होंने पूछा कि अगर गुजरात में कृषि क्षेत्र में विकास इतना ज्यादा है तो सैकड़ों की संख्या में किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? उन्होंने कहा कि गुजरात में किसानों को पानी नहीं मिल पा रहा है।
इतना ही नहीं उन्होंने यह पूछा है कि नरेंद्र मोदी बताएं कि उनके पास कितने हवाई जहाज और कितने हेलिकॉप्टर हैं? अगर अपने नहीं हैं तो किनके हैं? क्या वह इसके लिए पैसे देते हैं या फिर मुफ्त में इसका इस्तेमाल करते हैं?
केजरीवाल के मोदी से 16 सवाल
1. क्या आप प्रधानमंत्री बनने के बाद केजी बेसिन से निकली गैस के दाम बढ़ाएंगे?
2.पढ़े-लिखे युवाओं को ठेके पर नौकरी क्‍यों दे रहे हैं और उन्‍हें मात्र 5300 रुपये प्रति महीना दे रहे हैं, इतने में कोई कैसे जिंदगी चलाएगा?
3. गुजरात के सरकारी अस्‍पतालों में इलाज की सुविधा क्‍यों नहीं है?
4. पिछले दस सालों में राज्‍य में लघु उद्योग क्‍यों बंद हुए हैं?
5. किसानों की जमीनें बड़े उद्योगपतियों को कौड़ियों के भाव क्‍यों दिए जा रहे? आपने किसानों की जमीन छीनकर अडानी और अंबानी को दे दी है।
6. आपके पास कितने निजी हेलिकॉप्‍टर या प्लेन हैं? आपने ये खरीदे हैं या बतौर तोहफा मिला है? आपकी हवाई यात्राओं पर कितना खर्च आता है और इसके लिए पैसे कहां से आते हैं?
7.आपने हाल में पंजाब में कहा था कि कच्छ के सिख किसानों की जमीन नहीं छीनी जाएगी, तो इस मामले में गुजरात सरकार सुप्रीम कोर्ट क्यों गई है?
8.गुजरात में विकास के दावे झूठे हैं, मोदी जी आप बताइए कि गुजरात में कहां विकास हुआ है?
9. आपके मंत्रिमंडल में दागी मंत्री क्यों शामिल है, बाबू भाई बुखेरिया और पुरुषोत्तम सोलंकी जैसे दागी मंत्री सरकार का हिस्सा कैसे बने हुए हैं?
10. गुजरात के किसान बेहाल है। किसान खुदकुशी कर रहे हैं। हाल के वर्षों में गुजरात में 800 किसानों ने खुदकुशी की, क्यों?
11. प्रदेश में रोजगार का बुरा हाल क्यों है और बेरोजगारी क्यों बढ़ी है?
12.चार लाख किसानों ने बिजली के लिए कई साल से आवेदन दिया है, उन्हें अब तक बिजली क्यों नहीं मिली है?
13. मुकेश अंबानी से आपके क्या रिश्ते हैं, आपने अंबानी परिवार के दामाद सौरभ पटेल को मंत्रिमंडल में क्यों जगह दी?
14. गुजरात में सरकारी स्कूलों के हालात बदहाल क्यों है?
15. सरकारी दफ्तरों में बहुत ज्यादा करप्शन है, विभागों में भारी भ्रष्टाचार क्यों है?
16. कच्छ के किसानों को पानी नर्मदा बांध के बावजूद आज तक क्यों नहीं मिला? सारा पानी उद्योगपतियों को दे दिया गया।
झूठ-शिरोमणि श्री अरविन्द केजरीवाल ने जो सवाल उछाले हैं उनकी सच्चाई का परीक्षण करते हुए अब हम उनके 16 सवालों का बारी-बारी से जवाब देंगे-
1) उस स्थिति में गैस के दाम बिल्कुल नहीं बढ़ाए जाएंगे बल्कि उनको तर्कसंगत रखा जाएगा जैसे कि अटल जी के समय में था। महंगाई को कम करने के लिए दाम में कमी भी की जा सकती है उसी तरह के उपायों द्वारा जैसे कि केजरीवाल ने दिल्ली में बिजली और पानी के दाम कम किए थे।
2) ठीक उसी तरह चलाएंगे जैसे कि दिल्ली में ठेके और फिक्स वेतन पर बहाल शिक्षक और परिवहन कर्मचारी केजरीवाल जी के 49 दिनों के महान शासन के बाद भी चला रहे हैं।
3) कहाँ देख लिया आपने कि गुजरात के अस्पतालों में इलाज की सुविधा नहीं है? गुजरात के ज्यादातर अस्पतालों में दिल्ली के अस्पतालों से भी ज्यादा अच्छी सुविधा है केजरीवाल के 49 दिनों के शासन के बाद भी।
4) जो लघु उद्योग प्रतिस्पर्धा में नहीं टिकेंगे वे बंद तो होंगे ही। क्या उनके बंद होने के लिए गुजरात सरकार सीधे-सीधे जिम्मेदार है? अभी पूरी दुनिया में मंदी का दौर था ऐसे में मांग कम होने पर लघु उद्योगों की हालत तो खराब होनी ही थी। भारत की विकास दर 5 प्रतिशत से भी कम हो गई है तो गुजरात अछूता कैसे रह सकता है?
5) किसानों की जमीनें बाजार भाव पर खरीदी गई हैं न कि कौड़ियों के भाव में। अगर ऐसा होता तो वहाँ के किसान भी प. बंगाल के किसानों की तरह विरोध जरूर करते।
6) जैसा कि अमित शाह पहले ही बता चुके हैं कि गुजरात सरकार के पास 3 जेट विमान और 8 हेलीकॉप्टर हैं और मोदी गुजरात सरकार के विमानों में उड़ान भरते हैं। जहाँ तक इसमें होनेवाले व्यय का सवाल है तो सारा खर्च पार्टी उठाती है जिसके फंड में पार्टी के करोड़ों कार्यकर्ता प्रति वर्ष 1000,5000 और 10000 रुपए का सदस्यता शुल्क देते हैं। इसके अलावा अभी पार्टी फंड में करोड़ों देशवासी खुलकर अपना योगदान दे रहे हैं।
7) सुप्रीम कोर्ट में तो सरकार पहले ही चली गई थी इसलिए अच्छा होगा कि दूध-का-दूध और पानी-का-पानी कोर्ट में ही हो जाए। जहाँ तक जमीन छीनने का सवाल है तो जमीन कोई कानून का उल्लंघन करके कैसे छीन सकता है गुजरात कोई कश्मीर तो है नहीं?
8) यह भी बताना पड़ेगा कि गुजरात में विकास कहाँ हुआ है? गुजरात की सड़कें और आधारभूत संरचना,वहाँ की विकास-दर खुद ही बताती है कि राज्य का कितना विकास हुआ है? आज भारतभर के मजदूरों की पसंदीदा कार्यस्थली गुजरात क्यों बना हुआ है अगर वहाँ का विकास नहीं हुआ है?
9) क्या सिर्फ आरोप लगने से ही कोई भ्रष्ट हो जाता है? क्या किसी कोर्ट ने उनको इसके लिए दोषी ठहराया है? क्या केजरीवाल के पास उनके पास कोई सबूत है जैसे कि कभी शीला दीक्षित के खिलाफ हुआ करते थे तो वे प्रस्तुत करें? भाजपा के आंतरिक लोकपाल ने अपनी जाँच में पाया है कि ये लोग पाक-साफ हैं।
10) आत्महत्या तो आईएएस भी करते हैं तो क्या वे गरीबी के कारण ऐसा करते हैं? आधुनिक जीवन-शैली ने आदमी के अकेलेपन को बढ़ा दिया है और आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण तनाव है न कि गरीबी। अगर गरीबी इसका कारण होता तो गरीब राज्यों के किसान ज्यादा आत्महत्या करते। क्या केजरीवाल जी बताएंगे कि उनको ये झूठे आँकड़े कहाँ से मिले और कितने सालों में उनके कथनानुसार 800 किसानों ने आत्महत्या की? क्या वे बताएंगे कि विदर्भ में पिछले एक साल में कितने किसानों ने आत्महत्या की है?
11) जब रोजगार-कार्यालय में निबंधित 99 प्रतिशत बेरोजगारों को रोजगार मिल रहा है तो फिर कहाँ बेरोजगारी बढ़ रही है? गुजरात तो दूसरे राज्यों के भी लाखों बेरोजगारों को रोजगार दे रहा है तो वहाँ के लोग कैसे बेरोजगार हो सकते हैं?
12) फिर से झूठ। गुजरात में बिजली के पेंडिंग आवेदनों की संख्या हजारों में है न कि लाखों में और इन सबका निपटारा शायद कुछ महीनों में ही कर दिया जाएगा।
13) क्या अंबानी के दामाद को मंत्री बनने का अधिकार नहीं है? क्या वह अच्छा प्रशासक नहीं हो सकता? केजरीवाल बताएंगे कि सोनिया के दामाद को क्लिनचिट देनेवाले युद्धवीर सिंह को उन्होंने टिकट क्यों दिया? सोनिया के दामाद से उनका क्या रिश्ता है? अंबानी के दामाद पर तो फिर भी भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है।
14) सरकारी स्कूल तो हर जगह बदहाल हैं। गुजरात के स्कूलों की हालत तो फिर भी अच्छी है। जब तक समाज के सम्मानित लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाएंगे इनकी स्थिति नहीं सुधरेगी। क्या केजरीवाल बताएंगे कि उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ने के लिए सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं भेजा?
15) कोई ऐसा दावा नहीं कर सकता कि गुजरात के दफ्तरों में भ्रष्टाचार है ही नहीं लेकिन वहाँ पूरे भारत में सबसे कम भ्रष्टाचार जरूर है। ऐसा हम ऐसे ही नहीं बल्कि वहाँ रहनेवाले अपने रिश्तेदारों की आपबीति के आधार पर दावा कर रहे हैं।
16) कच्छ के किसानों को अगर सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल रहा है तो फिर पंजाब के उन सिख किसानों के खेत में पानी क्या केजरीवाल पटाते हैं जिनका कि जिक्र उन्होंने अपने सवालों में किया है? नहरों में जब पानी आएगा तो उसमें से ही किसानों के साथ-साथ उद्योगपतियों को भी पानी दिया जाएगा। केजरीवाल जी बताएंगे कि क्या उनको उद्योग-धंधों से नफरत है? क्या वे चाहते हैं कि भारत की औद्योगिक विकास-दर ऋणात्मक हो जाए? भारत गुलाम हो जाए और पूरी तरह से बर्बाद हो जाए? क्या सीआईए ने आपको ऐसा ही करने को कहा है?
17) अब हम पूछेंगे और उत्तर देंगे आप केजरीवाल जी। आपका समय हुआ समाप्त और हमारा हुआ शुरू-क्या आप बताएंगे कि क्या आप सचमुच सीआईए के एजेंट हैं? क्या आदेश दिया है आपको अमेरिका में बैठे हुए आपके आकाओं ने? क्या आपका पाकिस्तानी आईएसआई के साथ भी कोई संबंध है? क्या इस खेल में आपके साथ-साथ कांग्रेस पार्टी भी शामिल है? क्या दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी में खटमल है फिर उसने शीला दीक्षित को क्यों नहीं काटा? आपने अपना दिल्लीवाला सरकारी आवास तय समय में क्यों खाली नहीं किया? क्या आप उसको कभी खाली करेंगे भी? क्या आपको पता नहीं कि सामान्य शिष्टाचार कहता है कि किसी से मिलना हो तो पहले से समय ले लेना चाहिए? मोदी तो मोदी आप मुझ जैसे बेरोजगार से भी अगर बिना पहले से समय लिए मिलना चाहेंगे तो मैं भी आपसे नहीं मिलूंगा। यकीन नहीं हो तो प्रयास करके देख लीजिए। परसों आपकी कार का शीशा क्या सचमुच आपने खुद ही फोड़ा था जैसा कि कार के मालिक मनीष ब्रह्मभट्ट दावा कर रहे? आपने सच की तरह झूठ बोलना इसी जन्म में सीखा है या आपने कई जन्मों के परिश्रम के बाद इस काम में प्रवीणता प्राप्त की है?
हमको कोई हड़बड़ी नहीं है आप इत्मीनान से मेरे सवालों के उत्तर दे सकते हैं लेकिन उत्तर देने में झूठ नहीं बोलिएगा क्योंकि हमको झूठ से सख्त नफरत है। चलिए हम आपको एक सप्ताह का समय देते हैं मेरे इन आसान सवालों का उत्तर देने के लिए। हम नहीं मानते कि आपको इस सवालों के जवाब मालूम नहीं हैं बल्कि हम तो मानते हैं कि इन प्रश्नों के सबसे उम्दा जवाब आप ही दे सकते हैं। सवाल और भी हैं लेकिन मैं जानता हूँ कि आपको उत्तर देने की आदत नहीं है और आप मेरे द्वारा पूछे गए इन प्रश्नों के उत्तर नहीं देने जा रहे हैं इसलिए अभी इतना ही। जब आप मेरे इन प्रश्नों के उत्तर दे देंगे तो मैं आपसे निश्चित रूप से और भी सवाल पूछूंगा जो इन्हीं प्रश्नों की तरह अति सरल होंगे। (हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)