गुरुवार, 4 मार्च 2010

व्यक्तिवाद की हद-समलैंगिक विवाह

मानव समाज शुरू से ही लैंगिक आधार पर दो भागों में बँटा हुआ है-स्त्री और पुरुष.इन दो लिंगों के मिलन से ही दुनिया का कारोबार चलता है अर्थात संतान का जन्म होता है.प्रारंभिक मानवों के समय न तो परिवार का अस्तित्व था और न ही समाज का.धीरे-धीरे परिवार का विकास हुआ क्योंकि स्त्रियों की गर्भावस्था और बच्चों के लालन-पालन के दौरान सुरक्षा की जरूरत होती थी.जब एक पुरुष और एक स्त्री के बीच ही यौन सम्बन्ध सीमित होने लगा तब परिवार का उदय हुआ और यह भी निश्चित होने लगा कि होनेवाले बच्चे का पिता कौन है.फ़िर जनसंख्या वृद्धि और स्थायी बस्तियों की संख्या बढ़ने के साथ ही संबंधों और संपत्ति के अधिकारों के नियमन के लिए समाज और शासक की जरूरत महसूस हुई.पहले परिवार के वृद्धजन मिलकर समाज के समक्ष उभरने वाले विवादों का समाधान करते थे बाद में राजतन्त्र और गणतंत्र का उदय हुआ.पराभौतिक शक्तियों के प्रति आस्था ने धर्म और संप्रदाय को जन्म दिया.धीरे-धीरे समाज शक्तिशाली होता गया और इतना शक्तिशाली हो गया कि लोगों को घुटन महसूस होने लगी.तर्कवाद की हवा चली और रूसो जैसे दार्शनिकों ने यह कहकर स्थिति के प्रति क्षोभ व्यक्त किया कि मनुष्य का जन्म स्वतंत्र मानव के रूप में होता है लेकिन वह दुनिया में आते ही विभिन्न तरह की जंजीरों में जकड़ जाता है.धर्म अब व्यक्तिगत आस्था का विषय हो गया और सर्वत्र प्रजातंत्र का विस्तार होने लगा.यहाँ तक तो स्थिति ठीक थी.२०वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में दुनिया को दो-दो विश्वयुद्धों का सामना करना पड़ा.सबसे ज्यादा नुकसान यूरोप और अमेरिका को हुआ.करोड़ों लोग असमय काल-कवलित हो गए.इन दोनों महाद्वीपों के लोगों की सोंच को इन युद्धों ने पूरी तरह बदल कर रख दिया.अब लोग सोंचने लगे कि जब ज़िन्दगी का कोई ठिकाना ही नहीं है तो क्यों न दुनिया का पूरा मजा लिया जाए.फलस्वरूप भोगवाद और उपभोक्तावाद का उदय हुआ.इन चीजों का प्रभाव लोगों के यौन व्यवहार पर भी पड़ा और यौन संबंधों में स्वच्छंदता को लोकप्रियता मिलने लगी.पश्चिम में तो स्थितियां इतनी विकट हो गई कि बच्चों के लालन-पालन की जिम्मेदारी भी राज्य को उठानी पड़ी.लोग सुख की तलाश में आँख बंद कर दौड़ते रहे.यानी मानव विकास की यात्रा में फ़िर वहीँ आ पहुंचा है जहाँ से उसने यात्रा आरम्भ की थी.लेकिन मानव इस अंधी दौड़ में रूका नहीं और उसने प्राकृतिक नियमों की भी अवहेलना करनी शुरू कर दी.पुरुषों के पुरुष से और स्त्रियों के स्त्रियों से खुलेआम यौन सम्बन्ध स्थापित होने लगे.स्थितियां इतनी विकराल होने लगी है कि कई पश्चिमी देशों ने इस तरह के संबंधों पर विवाह की मुहर भी लगानी शुरू कर दी है.लेकिन इस तरह के विवाहों से समाज को क्या मिलेगा?संतान तो मिलने से रही.भगवान ने मानव को दो लिंगों में बांटा है.प्रकृति ने उसे केंचुए की तरह उभयलिंगी नहीं बनाया है.सिर्फ व्यक्तिवाद के नाम पर ऐसे संबंधों को स्वीकृति देने से तो मानवों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा.दूसरी दृष्टि से देखें तो प्रत्येक मानव अंग का अपना अलग-अलग काम प्रकृति द्वारा निर्धारित किया गया है.गुदा का काम मलत्याग है न कि मैथुन.माना कि समाज का मानव पर बहुत ज्यादा नियंत्रण नहीं होना चाहिए.लेकिन मानव और समाज के अधिकारों के बीच एक संतुलन तो होना ही चाहिए.व्यक्तिवाद अगर समलैंगिकता की हद तक पहुँच जायेगा तो हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा और पृथ्वी अपने सबसे बुद्धिमान निवासी से रहित हो जाएगी.

बुधवार, 3 मार्च 2010

सच्चे दिल से माफ़ी तो मांगकर देखते हुसैन साहब

कभी खाली पांव घूमने तो कभी माँ सरस्वती की नग्न तस्वीर बनाकर हमेशा चर्चा में रहनेवाले तथाकथित महान चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन फ़िर से चर्चा में हैं.उन्होंने भारत की नागरिकता छोड़ क़तर में बसने का फैसला कर लिया है.पिछले कई दिनों से जबरदस्त आलोचना झेलने के बाद उन्होंने पहली बार प्रतिक्रिया दी है.उन्होंने कहा है भारत ने उन्हें ख़ारिज कर दिया है और अब भारत को उनकी जरूरत नहीं है.साथ ही उन्होंने कहा है कि वे भारत आते-जाते रहेंगे क्योंकि आख़िरकार यह उनकी मातृभूमि है.हुसैन को मालूम होना चाहिए कि भारत एक बहुसंस्कृति वाला देश है जहाँ लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था है.भारत का यह इतिहास रहा है कि यहाँ  कभी किसी के साथ धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं किया गया.खुद उनको भी पद्म पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया.लेकिन उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बेजा लाभ उठाया और हिन्दूबहुल देश में हिन्दू देवी-देवताओं के अपमानजनक चित्र बनाने शुरू कर दिए.यहीं काम अगर उन्होंने उस देश वहां की जनता के साथ किया होता जहाँ वे अब बसने जा रहे हैं तो शायद जीवित भी नहीं होते.उन्हें अपने देश के दूसरे धर्माम्बलंबियों  की भावनाओं का भी आदर करना चाहिए था.एक बहुत पुरानी कहावत है कि अगर आदर पाना है तो पहले आदर करना सीखिए.यह आश्चर्य की बात है कि जिस देश में यूनानी से लेकर तुर्किस्तानी तक सब रच-बस गए और वो भी इस तरह कि उनका पता लगाना भी आसान नहीं उस देश के साथ हुसैन अपने-आपको आत्मसात नहीं कर पाए.अपनी जन्मभूमि का भारतीयों के लिए क्या महत्व है शायद हुसैन साहब नहीं जानते हैं.इसी धरती पर अब्दुल हामिद और हनिफुद्दीन जैसे मुस्लमान भी हुए हैं जिन्होंने देश के लिए अपनी जान तक न्योछावर कर दी.कभी राम ने सोने की लंका को छोड़ कर अयोध्या में बसना स्वीकार किया था और लक्ष्मण से कहा था अपि स्वर्णमयी लंका लक्ष्मण मम न रोच्यते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी.लगता है कि हुसैन ने कभी भारत को प्यार ही नहीं किया अन्यथा वे अपनी माँ भारत माता को छोड़कर नहीं जाते.शहनाई सम्राट बिस्मिल्लाह खान को जब अमेरिका में बसने का लालच दिया गया था तब उन्होंने कहा था कि उन्हें रोज गंगा में नहाने की आदत है और वे बनारस से बाहर लगातार एक सप्ताह से ज्यादा रह ही नहीं सकते.इसे कहते है मातृभूमि से लगाव.हुसैन साहब तो अपने को देश से भी बड़ा और ऊँचा समझते हैं.उनके भारत में नहीं होने से भारत को कोई ज्यादा नुकसान नहीं होने वाला है.भारत में न तो कभी कलाकारों की कमी रही है और न ही इस पर जान न्योछावर करने वालों की.पाकिस्तान में इतिहास के नाम पर अरब देशों का इतिहास पढाया जाता है क्योंकि उनका मानना है कि भारत कभी उनका देश रहा ही नहीं है और वे सिर्फ मुसलमान हैं भारतीय या पाकिस्तानी या ईरानी नहीं.लगता है हुसैन साहब भी ऐसी ही सोंच रखते हैं.हुसैन साहब के प्रशंसक आज भी भारत में बहुत हैं आप एक बार सच्चे मन से देशवासियों से अपनी गलतियों के लिए माफ़ी मांग कर तो देखते.भारत में तो क्षमा को भगवन का ही रूप माना जाता है.

मंगलवार, 2 मार्च 2010

ईर्ष्या और प्रेम

जब सूरज की किरणें सभी मानवों
पर पड़ती हैं एकसमान,
चांद की चांदनी और
सितारों की टिमटिमाती रौशनी,
नहीं करती कभी भेदभाव;
फ़िर कैसे देवदत्त के ह्रदय में भड़कने लगी ईर्ष्या की आग
और बुद्ध के मन में लहराने लगा
प्रेम का अथाह सागर.
दोनों का पालन-पोषण एक साथ
एक ही राजमहल में हुआ था,
एक ही गुरु से पाई थी शिक्षा
एक ही अन्न खाया
और एक साथ पिया पानी कपिलवस्तु में.
फ़िर ऐसा क्यों हुआ कि बुद्ध बन गए
दया और करूणा के अवतार
और देवव्रत बन गया ईर्ष्या का पुतला
शैतानियत का जीता-जागता प्रतीक.
नहीं पता मुझे और न ही विज्ञान को
शायद मालूम हो ईश्वर को
लेकिन वह जबकि है अनुपलब्ध
बताने के लिए 
तो क्या किया जा सकता है
सब कुछ भाग्य का खेल
मान लेने के सिवाय.

सोमवार, 1 मार्च 2010

हॉकी में नस्लभेद

भले ही राजनीतिक रूप से दुनिया से नस्लभेद और रंगभेद विदा हो चुके हैं.लेकिन अब भी जहाँ भी मौका मिलता है हम भारतीयों को नीचा दिखाने में पश्चिम के देश पीछे नहीं रहते.इसलिए तो इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन के आस्ट्रेलियाई डाईरेक्टर ने बेवजह भारत के स्टार स्ट्राइकर शिवेंद्र सिंह को तीन मैचों के लिए निलंबित कर दिया है.कल भारत को आस्ट्रेलिया के साथ विश्व कप में भिड़ना है और डाईरेक्टर नहीं चाहता कि भारत जीते.इसलिए उसने शिवेंद्र को निलंबित कर दिया जबकि पाकिस्तान ने शिवेंद्र के खिलाफ अपील भी नहीं की थी.इतना ही नहीं रेफरी ने इसके लिए उन्हें ग्रीन कार्ड तक नहीं दिखाया था.न ही शिवेंद्र पर उनके पूरे कैरियर में कभी इस तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई ही की गई.दूसरी तरफ इंग्लैण्ड-आस्ट्रेलिया मैच के दौरान इंग्लैण्ड के एक खिलाड़ी ने आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी को जानबूझकर धक्का देकर गिरा दिया था फ़िर भी उसके खिलाफ किसी तरह के दंडात्मक कदम नहीं उठाये गए.अभी कुछ महीनों से आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर लगातार हमले हो रहे हैं और आस्ट्रेलिया की सरकार लगातार यह कहती रही है कि ये हमले नस्ली नहीं हैं.लेकिन भारतीय हॉकी टीम के मनोबल पर विश्व कप पर के दौरान हमला तो सीधे तौर पर नस्लीय है.कम-से-कम आस्ट्रेलियाई डाईरेक्टर के इस अप्रत्याशित एकतरफा निर्णय ने उन्हें शक के घेरे में तो ला ही दिया है.शिवेंद्र से उन्होंने सफाई मांगने की भी जरूरत नहीं समझी.जबकि नियमानुसार ऐसा किया जाना चाहिए था.ऐसा भी नहीं है कि इस तरह की साजिश का भारतीय हॉकी को पहली बार सामना करना पड़ रहा हो.पश्चिमी देशों ने ही षड्यंत्र रचकर ८० के दशक में हॉकी के नियमों इस तरह के बदलाव कर दिए जिससे हॉकी के खेल में कलात्मकता की जगह दम-ख़म की प्रमुखता हो गई.हॉकी इंडिया को डाईरेक्टर के निर्णय का प्रत्येक मंच पर सख्ती से विरोध करना चाहिए और अगर वे लोग न माने तो विश्व कप के बांकी मैचों का बहिष्कार करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.नहीं तो हमें और भी मनमानी का सामना करना पड़ेगा साथ ही हमारी टीम के मनोबल पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा.

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

अपने गाँव में न होने की कसक देती होली

यूं तो मैं साल के तीन-चार दिनों को छोड़कर सालों भर हाजीपुर शहर में रहता हूँ और रोजाना मेरे दिल में अपने गाँव में न रह पाने की टीस उठती रहती है.लेकिन अपने गाँव में नहीं होने का सबसे ज्यादा दर्द मैं महसूस करता हूँ होली के दिन.आखिर होली मेरा सबसे पसंदीदा त्योहार जो ठहरा.शहर की होली गाँव की होली से बिलकुल अलग होती है.न तो नाच-गान और न ही मिलना-जुलना.पूरा दिन यहाँ टीवी का रिमोट दबाते बीतता है.गाँव में हमारी होली वास्तव में होली से एक महीना पहले ही शुरू हो जाती थी.फुटबॉल खेलकर जब हम दिन ढले घर लौट रहे होते तो पूरे रास्ते एक-दूसरे पर मुफ्त का पाउडर यानी धूल डालते आते.होली की सुबह मुंह अँधेरे ही हम नित्य क्रिया से निपट लेते.सुबह धूप भी नहीं निकली होती और हमारी हुडदंग शुरू हो जाती.कई सालों तक तो इसकी शुरुआत मैंने ही अपने मित्रों पर कीचड़ डालकर की थी.फ़िर उसके बाद जो भी हमउम्र नज़र आ जाए उसको हम गोबर, मिट्टी और कीचड़ से सराबोर कर देते.ज्यों-ज्यों लोग हमारी चपेट में आते जाते हमारी टोली के सदस्यों की संख्या बढती जाती.उस छोटे-से कालखंड में अगर कोई रिश्ते में हमारा बहनोई या साला लगनेवाला अतिथि हमारे हत्थे चढ़ जाता तो सबसे बुरी गत उसी की होती.कभी-कभी तो हमें उन्हें पकड़ने के लिए सैंकड़ों मीटर की दौड़ भी लगानी पड़ती.जो पकड़ाने में जितनी ज्यादा परेशानियाँ खड़ी करता उसका अंजाम उतना ही बुरा होता.दोपहर १२-१ बजे हम स्नान करने चले जाते और हुडदंग समाप्त हो जाती.शाम में हम प्रत्येक दरवाजे पर जाकर होली गाते.जब गायन टोली हमारे दरवाजे पर होती तब हमसे ज्यादा खुश शायद इस धरती पर कोई नहीं होता था.आंगन से मेरी मामियां गायकों पर रंगों की बौछार करती रहती.हम टोली के सदस्यों को रंग-अबीर लगाते और सूखे मेवे खाने को देते.अगर किसी की साली इस सुअवसर पर गाँव में मौजूद होती तो उनके नाम को भी होली के गीतों में शामिल कर लिया जाता था.शाम तक जब हल्की ठण्ड पड़नी शुरू हो जाती थी हम रंग अबीर से इतने सराबोर हो जाते थे कि खुद अपनी ही सूरत अजनबी लगने लगी थी.तब हम घर वापस आते और खाना खाकर सो जाते.प्रत्येक वर्ष कोई न कोई मेरा ममेरा भाई या मामा शराब पीकर अनर्गल प्रलाप करते जिसका अपना ही मजा होता था.बाद में होली की हुडदंग में मोबिल का भी जमकर प्रयोग होने लगा.सब चेहरे से मोबिल छुड़ाने का असफल प्रयास करते लेकिन मैं मार्गो साबुन लगा कर उसे चुटकियों में उतार लेता था.आज मैं अपने गाँव यानी ननिहाल जगन्नाथपुर जहाँ मेरा बचपन बीता से मात्र तीस किलोमीटर दूर हूँ लेकिन लगता है जैसे मैं सदियों दूर हो गया हूँ.ऐसा भी नहीं है कि मैं शौकिया तौर पर शहर में रह रहा हूँ.मैं ऐसा करने को मजबूर हूँ.शायद भविष्य में परिस्थितियां अनुकूल हो जाए और मैं प्रत्येक साल कम-से-कम होली के दिन गाँव में रह सकूं.

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

आम आदमी को ठेंगा

दीदी के दिशाहीन रेल बजट के बाद देशवासियों को इंतजार था दादा के आम बजट का.लेकिन दादा ने तो आम आदमी को सीधे ठेंगा दिखा दिया.कुल मिलाकर बजट को देखकर अंधे द्वारा रेवड़ी बाँटने वाली कहावत चरितार्थ होती दिख रही है.जहाँ देश की जनता उनसे महंगाई कम करने के उपाय की उम्मीद कर रही थी वहीँ मंत्री ने २०००० करोड़ रूपये के नए कर लगा उनकी मुश्किलों को और भी बढा दिया.पेट्रोल और डीजल तो रात १२ बजे से ही महंगे हो गए हैं.यह कमाल हुआ है पेट्रोलियम पदार्थों पर सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क बढा देने से.अब इसे जले पर नमक छिड़कना न कहें तो क्या कहें? वित्त मंत्री से उम्मीद थी कि वे महंगाई घटाने के लिए कोई कदम उठाएंगे लेकिन उन्होंने महंगाई बढ़ाने की दिशा में कदम उठाना ज्यादा उचित समझा.बजट में महंगाई को कम करने के लिए दूसरी हरित क्रांति की कल्पना की गई है और इसके लिए मात्र ४०० करोड़ रूपये आवंटित किये गए हैं.मात्र ४०० करोड़ रूपये में हरित क्रांति का दिवास्वप्न देखा गया है.यानी फूंक मारकर पहाड़ उड़ाने की गंभीर कोशिश की है प्रणव मुखर्जी ने.सीमेंट और स्टील को महंगा कर गरीबों और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए अपना घर का सपना देखना भी महंगा कर दिया गया है.सामाजिक क्षेत्र के लिए जहाँ आवंटन बढा दिया गया है वहीँ खर्च पर निगरानी रखनेवाली एजेंसियों के बजट में कटौती कर दी गई है.यानी सरकार की नजर में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं है.आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी मनरेगा के लिए आवंटन में १०००० करोड़ की भारी-भरकम बढ़ोतरी की गई है.आयकर ढांचे में तो इस तरह बदलाव किये गए हैं कि जिसकी जितनी ज्यादा आमदनी उसको उतना ही ज्यादा लाभ.अब ५,००,००० तक की आय वाले को १० प्रतिशत और ८ लाख की आय वाले को सिर्फ २० प्रतिशत कर देना पड़ेगा.यहाँ भी अमीरों को ही लाभ पहुँचाने का प्रयास किया गया है.आयकर की ऊपरी सीमा बढ़ाने के बजाये यदि निचली सीमा को बढाया जाता तो निम्न आयवर्ग को भी राहत महसूस होती.खेती-किसानी की लागत पहले खाद और अब डीजल के मूल्य बढ़ने से और बढ़ने वाली है.यानी तेल के माथा तेल.चीन और पाकिस्तान से कभी नरम तो कभी गरम चलते रिश्तों के मद्देनजर भारी मात्रा में रक्षा खरीद की जरूरत थी लेकिन सरकार ने इसकी पूरी तरह उपेक्षा कर दी है.शिक्षा को भी उचित तरजीह नहीं मिल सकी है.बिजली और अधोसंरचना क्षेत्र को ज्यादा पैसे दिए गए हैं लेकिन पिछले कई वर्षों से ये क्षेत्र लक्ष्य प्राप्ति न होने के लिए अभिशप्त हैं.कुल मिलाकर यह बजट अजीबोगरीब बजट है और सरकार किस ओर जाना चाहती है इसे देखने से इसका पता नहीं चलता.यह बजट सिर्फ पेश करने के लिए पेश कर दिया गया है न तो इसकी कोई दिशा है और न ही उद्देश्य.

पैसा सुख की गारंटी नहीं

कल पूरा बिहार जमुई के विधायक अभय सिंह द्वारा पत्नी और बच्ची की हत्या के बाद खुद को गोली मार लेने की घटना से उद्वेलित था.अभय जी एक अच्छे इन्सान थे.भुखमरी के शिकार माता-पिता द्वारा परिवार सहित जान देने की घटनाएँ बराबर बिहार में होती रहती हैं.लेकिन एक अतिसंपन्न राजनेता के घर इस तरह की घटना पहली बार देखने में आई.उनके पास तो धन-दौलत का अम्बार था फ़िर भी वे सुखी नहीं थे.वर्तमान युग अर्थयुग है.पूरी दुनिया नैतिकता को ताक पर रखकर पैसों के पीछे भाग रही है.सबकी यही सोंच है कि पैसों से वे सुख खरीद लेंगे.जबकि सुख एक मानसिक अवस्था है.अगर पैसों से सुख खरीदना संभव होता तो विधायक अभय जी परिवार सहित ख़ुदकुशी नहीं करते.वर्षों पहले इंग्लैंड में भी एक इसी तरह की घटना घटी थी.एक करोड़पति व्यवसायी को व्यापार में घाटा हुआ और उसके पास १० लाख पौंड की जमा पूँजी बच गई.इससे उसे इतना बड़ा मानसिक आघात लगा कि उसने आत्महत्या कर ली.हालांकि १०० साल पहले १० लाख पौंड भी कोई कम नहीं होता था.कहने का तात्पर्य यह कि अगर मन में हौंसला है तो कम भौतिक साधन पर भी जिंदगी मजे में जी जा सकती है वरना रोने-धोने के लिए बहानों की भी कोई कमी नहीं है.हमारे यहाँ तो संतोष को ही सबसे बड़ा धन माना जाता रहा है.कहा भी गया है-गो धन गज धन बाजी धन और रतन धन खान, जब आये संतोष धन सब धन धुरी समान.फ़िर हम भारतीयों को क्या हो गया है कि उपभोक्तावाद की हवा में बहकर भौतिक साधनों को इकठ्ठा करने के लिए प्रत्येक सही-गलत कार्यों में लिप्त हैं?सुख एक मानसिक अवस्था है और इसे पैसों से नहीं ख़रीदा जा सकता.इसे तो साहस और हिम्मत से ही पाया जा सकता.हर स्थिति में खुश रहकर प्राप्त किया जा सकता है.सत्कर्मों द्वारा ख़रीदा जा सकता है.बिना संतोष के सुख का प्राप्त होना पूरी तरह असंभव है.संस्कृत में एक श्लोक है जो सदियों से हमारा मार्गदर्शन कर रहा है-संतोषं परम सुखं.

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

अद्वितीय, अविश्वसनीय, अविस्मरणीय

१७८९ में हुई फ़्रांस की क्रांति के बारे में कभी अंग्रेजी के कवि विलियम वर्ड्सवर्थ ने कहा था कि इस काल में जीवित होना एक अविस्मरणीय अनुभव था और युवा होना तो स्वर्गिक.कुछ ऐसा ही महसूस किया आज २४ फरवरी २०१० को दुनियाभर में फैले क्रिकेटप्रेमियों ने.युवाओं के उत्साह का तो कहना ही क्या!आज दुनिया के सबसे महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने अपनी सबसे महान पारी खेली.सचिन ने ग्वालियर की ऐतिहासिक धरती पर एकदिवसीय क्रिकेट में सबसे पहला दोहरा शतक जमाया और सिद्ध कर दिया कि उन्हें यूं ही क्रिकेट का भगवान नहीं कहा जाता.उन्होंने मात्र १४७ गेंदों में २०० रन बनाये.इस दौरान उन्होंने मैदान के चारों ओर २५ चौके और ३ छक्के लगाये.ये रन किसी ऐरे-गैरे देश के खिलाफ नहीं बने बल्कि दक्षिण अफ्रीका जैसी मजबूत टीम के खिलाफ बने.आज स्थिति ऐसी थी कि दक्षिण अफ़्रीकी गेंदबाजों की समझ में ही नहीं आ रहा था कि बल्लेबाजी के तमाम रिकार्डों को धारण करनेवाले नाटे कद के इस खिलाड़ी के सामने गेंद को कहाँ पटकें.अभी हाल ही में सचिन ने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में अपने बीस साल पूरे किये हैं.लगता है जैसे ३६ वर्षीय इस खिलाड़ी की रनों की भूख उम्र बढ़ने के साथ-साथ बढती जा रही है.ऐसा भी नहीं है कि अपने कैरियर में सचिन की आलोचना नहीं की गई हो लेकिन सचिन खामोश तपस्वी की तरह शब्दों द्वारा नहीं वरन अपने प्रदर्शन द्वारा समस्त आलोचनाओं का जवाब देते रहे. आज जैसे ही सचिन ने अपने २०० रन पूरे किये पूरा स्टेडियम पूरा भारत ख़ुशी से झूम उठा.वैसे तो सचिन के नाम रिकार्डों का अम्बार है लेकिन यह रिकार्ड निश्चित रूप से हीरे में नगीने, सोने पर सुहागा की तरह है.आज जिन लोगों ने भी सचिन का खेल देखा होगा वे अपने को निश्चित रूप से भाग्यशाली मानेंगे.क्रिकेट की दुनिया में सचिन के चलते पहले से ही भारत का मस्तक गौरव से तना हुआ था अब उसके मुकुट में सचिन ने  कोहिनूर जड़ दिया है.आज ममता बनर्जी ने रेल बजट पेश किया है जो भारत में एक बड़ी घटना मानी जाती है लेकिन आज की  सारी सुर्खियाँ सचिन बटोर ले गए; रेल बजट का स्थान चर्चित घटनाओं की रेटिंग में सचिन के इस अद्वितीय, अविस्मरणीय और अविश्वसनीय प्रदर्शन के बाद ही नहीं बहुत नीचे आता है.

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

कबीर के नाम पर पाखंड का साम्राज्य

इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि आजीवन पाखंडवाद का विरोध करनेवाले मध्यकालीन संत कबीर के नाम पर उनके कथित अनुनायियों ने पाखंड का साम्राज्य चला रखा है.कल मैं एक कबीरपंथी परिवार के श्राद्ध कार्यक्रम में निमंत्रित था.कार्यक्रम में मेरे मोहल्ले में रहनेवाले कबीर मठ के महंथ जी को भी जाना था.वे इसमें मुख्य पुरोहित की भूमिका निभानेवाले थे.हमने सोंचा कि क्यों न उनके ही साथ हो लिया जाए.लेकिन उन्होंने कहा उन्हें अभी कुछ देर होगी.अंत में हमने बस पकड़ ली.जब हम मेजबान के दरवाजे पर पहुंचे तब वहां बीजक पाठ के साथ अग्नि में आहुति दी जा रही थी.बीजक पाठ के दौरान संस्कृत के मन्त्र सुनकर मुझे घोर आश्चर्य हुआ.कम-से-कम इसका संस्कृतवाला अंश तो कबीर का लिखा हुआ नहीं ही हो सकता है क्योकि कबीर अनपढ़ थे और संस्कृत के विरोधी भी.उन्होंने तो स्पष्ट घोषणा की थी कि संस्कीरत है कूप जल भाखा बहता नीर.करीब दो घन्टे तक कबीर ज्योति स्वाहा किया जाता रहा.क्या कभी कबीर ने कहा था कि उनके मरने के बाद उन्हें भगवान मानकर उनकी पूजा की जाए?वे तो घोर मानवतावादी थे और खुद को भी मानव ही मानते थे.कबीर को मन्त्रों में राम से भी बड़ा बताया जा रहा था.उस कबीर को जो अपने को राम का कुत्ता मानते थे मैं तो कुता राम का मोतिया मेरा नाऊँ, गले राम की जेवड़ी जित खींचे तित जाऊं.क्या यह स्वयं कबीर की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं था? उसके बाद कबीर जी की आरती हुई.उन्हीं कबीर की जिन्होंने भगवान राम की आरती लिखी थी.उस आरती के अंत में उन्होंने खुद रचयिता के रूप में अपने नाम का उल्लेख किया है.पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार हैं तुलसी के पत्र कंठ मल हीरा, हरखि निरखि गावे दस कबीरा.यह आरती हमारे वैशाली जिले में सत्यनारायण की पूजा के बाद गायी जाती है.इस आरती में भी राम कबीर की सेवा में चंवर डुला रहे थे.हवन के बाद निर्गुण भजन गाये गए लेकिन बीच-बीच में फ़िल्मी धुनों के साथ.उसके बाद भोजन का कार्यक्रम शुरू हुआ.महंथजी इस बीच पधार चुके थे.मुझे यह देखकर अचरज हो रहा था कि बूढ़े और बुजुर्ग लोग भी उनका चरण-स्पर्श कर रहे थे.क्या इससे बड़ा भी कोई पाखंड हो सकता है?कबीर ने कभी ब्राह्मणों की चरणवंदना और उन्हें ऊंचा मानने का विरोध किया था-जो तू बामन बामनी का जाया आन बाट मंह क्यूं नहीं आया.क्या एक पाखंड का जवाब दूसरे पाखंड से दिया जाता है?विदाई के समय महंथ जी और उनके शिष्य दोनों को कपड़ों के साथ-साथ क्रमशः १००० और ५०० रूपये दिए गए चरणस्पर्श के साथ और उन्होंने बिना किसी नानुकुर के उन पैसों को अपनी-अपनी जेबों के हवाले कर दिया.यानी उन्होंने इसे अपना अधिकार समझा.तो क्या उन्होंने संन्यास का यह मार्ग पैसा कमाने के लिए अपनाया है?क्या ये संन्यासी वास्तविक संन्यासी हैं और इन पैसों का क्या करते होंगे?इनकी मासिक आमदनी तो ६०-७० हजार रूपये तक हो सकती है.क्या ये अपने घरवालों की आर्थिक मदद नहीं करते होंगे? क्या संन्यास भी व्यवसाय है और क्या कबीर इस व्यवसाय का समर्थन करते?कदापि नहीं.मैं जिस कबीर को जनता हूँ वे इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करते.मैंने शिष्य महाराज से पूछा कि आप शादी करेंगे या नहीं.आपके गुरु ने तो की नहीं.उन्होंने कहा वे भी शादी नहीं करेंगे.मैंने पूछा क्यों.उनका जवाब था यही परंपरा है.मैंने कहा आप जिन कबीर जी को राम से भी बड़ा बता रहे थे उन्होंने तो दो-दो शादियाँ की थी.उन्होंने फ़िर परंपरा वाली बात दोहराई.मैंने पूछा कि आपके कबीर तो परंपरा विरोधी थे तो आप क्यों नहीं हो सकते?इस बात का उनके पास कोई जवाब नहीं था.मैंने फ़िर पूछा कि कबीर तो मूर्ति पूजा के विरोधी थे फ़िर आपलोग क्यों उनकी मूर्ति बिठाकर पूजा करते हैं? उन्होंने कहा कि उन लोगों के लिए मूर्ति केवल एक माध्यम है भगवान नहीं.मैंने कहा लेकिन कबीर तो निर्गुण थे और मानते थे कि भगवान का कोई रंग-रूप नहीं होता.अब फ़िर से उन्होंने चुप्पी साध ली.कहने का मतलब यह कि कबीरपंथी कबीर के नाम पर जो पाखंडवाद फैला रहे हैं वह तर्क की कसौटी पर किसी भी तरह टिक ही नहीं सकता.आखिर कबीर भी तो तर्कवादी थे परम्परावादी नहीं. तभी तो वे कहते थे-मैं कहता हूँ आंखन देखी तू कहता कागद की लेखी,तेरा मेरा मनुआ कैसे एक होई रे.

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

भारतीय संस्कृति का अंग क्रिकेट

अभी कल की ही तो बात है जब करोड़ों भारतीयों की नजरें टीवी स्क्रीन से हटाये नहीं हट रही थीं.अंततः भारत ने कशमकश भरे इस मैच को एक रन से जीत लिया.करोड़ों भारतीयों ने चैन की साँस ली.चारों तरफ खुशियाँ-ही-खुशियाँ छा गईं.ऐसा पहली बार हुआ हो ऐसा भी नहीं है.यह तो अब रोज की बात है. क्रिकेट दुनिया के लिए भले ही एक खेल हो भारत की तो संस्कृति में ही यह शामिल हो चुका है.हम भारतीयों के लिए क्रिकेट खिलाड़ी भगवान से कम का दर्जा नहीं रखते.तभी तो शेन वार्ने ने सचिन के बारे में कभी कहा था कि सचिन भारत में एक खिलाड़ी नहीं है वहां तो वह क्रिकेट का भगवान है.जिस दिन भारतीय टीम कोई अंतर्राष्ट्रीय मैच खेल रही होती है वह दिन त्योहारों के देश भारत में एक ऐसा त्योहार बन जाता है जिसका पंचांगों में कोई जिक्र नहीं होता.सुबह से ही लोग मैच शुरू होने का इंतजार करने लगते हैं.मैच शुरू होते ही रिमोट पर ऊंगलियों की थिरकन बंद हो जाती है.मजबूरन समाचार चैनल वाले भी मैच अपडेट दिखाना शुरू कर देते हैं.उस दिन सबसे ज्यादा टीआरपी किस चैनल और किस कार्यक्रम का रहता होगा यह किसी से पूछने की जरूरत नहीं है.क्रिकेट भारतीयों की दिनचर्या में अचानक आकर रच-बस गया हो ऐसा भी नहीं है.आज भारतीय टीम टेस्ट रैंकिंग में नंबर १ पर है.ऐसा रातों-रात नहीं हुआ है.वर्षों की मेहनत और सुधार के बाद ऐसा संभव हुआ है.लाला अमरनाथ, राघवन, गुप्ते से लेकर रवीन्द्र जडेजा और धोनी तक हर किसी ने इसमें अपना महती योगदान दिया है.क्रिकेट इस भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी के दौर में भी अगर लोकप्रिय बना हुआ है तो इसके पीछे है समय के साथ फ़ॉरमेट में बदलाव करते जाना.पहले यह खेल पॉँचदिनी हुआ करता था.मैदान के बाहर और भीतर दोनों तरफ सुस्ती छाई रहती थी.फ़िर इसे एक दिन के मैच में बदल दिया गया.इससे क्रिकेट का रोमांच सातवें आसमान पर पहुँच गया.अब २०-२० ने एक बार फ़िर इसके घटते रोमांच को बढा दिया है.कुछ लोग यह आरोप लगाते रहते हैं कि क्रिकेट के चलते भारत बांकी खेलों में पिछड़ रहा है.इस आरोप में तनिक भी दम नहीं है.बांकी के खेलों से भी जो खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं भारतीय जनता उन्हें भी सिर आँखों पर बिठाने में तनिक भी कोताही नहीं करती.धनराज पिल्लई, लिएंडर पेस, महेश भूपति, सायना नेहवाल, अभिनव बिंद्रा, राज्यवर्धन राठौर, जसपाल राणा, विजेंदर, अखिल, मैरिकोम, सुशील कुमार आदि को भी भारतीयों ने अपने मन-मंदिर में उतना ही ऊंचा स्थान दिया है.सानिया मिर्जा की नथुनी तो करोड़ों भारतीयों के लिए जानलेवा बन चुकी है.असलियत तो यह है कि दूसरे खेलों में हम अगरचे तो विश्वस्तरीय प्रदर्शन कर ही नहीं पा रहे हैं और अगर कभी ऐसा संभव हो भी जाता है तो वह या तो व्यक्तिगत प्रदर्शन के कारण होता है या फ़िर उसमें सततता नहीं रह पाती.क्या किसी दूसरे खेल में हम दुनिया में नंबर वन हैं? नहीं!फ़िर कैसे क्रिकेट ने दूसरे खेलों को  नुकसान पहुंचा दिया? पहले प्रदर्शन करके बताईये फ़िर अगर सम्मान न मिले तब शिकायत करिए.क्रिकेट ने तो भारतीय जनमानस में वही स्थान प्राप्त किया है जिसका वह हक़दार है.

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

अब बाजार के हवाले वतन साथियों

मुंशी प्रेमचंद के ज़माने में पंच परमेश्वर हुआ करते थे.बाद में जमाना बदला और जातिवाद की हवा बहने लगी तब एक जुमला काफी लोकप्रिय हुआ करता था और वह था जाति नाम परमेश्वर.फ़िर समय बदला और जाति की जगह अब बाज़ार भगवान हो गया.केंद्र में उस समय नरसिंह राव की सरकार थी और वित्त मंत्री थे डा. मनमोहन सिंह जो वर्तमान में भारत के प्रधानमंत्री हैं.धीरे-धीरे सब कुछ सब कुछ यानी बाज़ार के हाथों सौंपा जाने लगा.बहुत-से सरकारी निगमों और कंपनियों का औने-पौने दामों में विनिवेश कर दिया गया.कुछ को तो साफ बेच दिया गया.फ़िर बारी आई खेती की.पहले गाज गिरी गन्ना किसानों पर.सरकार ने चीनी के बढ़ते मूल्य के साथ गन्ने का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं बढाया और कहा कि अगर मिलवाले ऊपर से किसानों को पैसा देना चाहे तो उसे कोई आपत्ति नहीं होगी.लेकिन मिल मालिक क्यों चीनी के धंधे में बढ़ते मुनाफे को किसानों के साथ बाँटने लगे?नतीजा यह है कि जहाँ महाराष्ट्र के मिल मालिक किसानों को अच्छी कीमत दे रहे हैं वहीं उत्तर प्रदेश के मिल मालिक ऐसा नहीं कर रहे हैं.किसानों ने ईंख की खेती में आग लगाना शुरू कर दिया.जंतर-मंतर, दिल्ली जाकर उन्होंने अपनी बात जनप्रतिनिधियों तक पहुँचाने की भी कोशिश की.लेकिन आज तक कुछ हुआ नहीं.अब केंद्र ने बांकी के किसानों के भविष्य को भी बाज़ार की आग में झोंक देने का फैसला कर लिया है.एक तरफ तो उसने प्रति बोरी यूरिया का मूल्य २५ रूपया बढा दिया गया वहीँ दूसरी ओर यूरिया को छोड़कर बांकी सभी उर्वरकों के मूल्य निर्धारण का अधिकार उत्पादकों को दे दिया गया.इसका सीधा मतलब है कि अब तक इन उर्वरकों पर जो सब्सिडी दी जा रही थी उसे अब पूरी तरह वापस ले लिया जायेगा.जाहिर है इनकी कीमतें अब आकाश को छूने जा रही हैं.खेती पहले से ही किसानों के लिए घाटे का सौदा है.अब खेती की लागत और भी बढ़ने जा रही है.महंगाई के मोर्चे पर भी अगर हम देखें तो पूरा देश पहले से ही महंगाई की ताप से झुलस रहा है.सरकार के इस कदम से निश्चित रूप से महंगाई कम नहीं होगी बल्कि बढ़ेगी.सरकार चलानेवालों पर भले ही प्रतिवर्ष अरबों रूपये खर्च हो जाएँ परन्तु खेती जिसका सीधा ताल्लुक पेट से है पर खर्च नहीं होना चाहिए क्योंकि यह सरकार की नज़र में अपव्यय की श्रेणी में आता है.खेती को कार्पोरेट के हाथों में सौंपने के सरकारी प्रयास पहले ही विफल हो चुके हैं क्योंकि हम भारतीयों का अपनी धरती अपनी जमीन के साथ भावनात्मक सम्बन्ध होता है और हम किसी कीमत पर अपनी जमीन इन अविश्वसनीय व्यापारियों के हाथों नहीं दे सकते.अब देखना है कि खेती के साथ बाज़ार का क्या व्यवहार रहता है क्योंकि पूरी खेती न सही इसे प्रभावित करने का एक बड़ा हथियार तो उनके हाथ लग ही गया है.

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

बिहार का कायाकल्प नहीं कर पाए नीतीश

बिहार में नीतीश सरकार का कार्यकाल समाप्त होने में अब कुछ ही महीने बचे हैं.पॉँच साल पहले जनता ने जिस उम्मीद के साथ उनके गठबंधन को ताज सौंपा था उस पर नीतीश कुमार की सरकार खरी उतरती नहीं दिख रही.राबड़ी के समय पूरा राज्य राजद नेताओं के प्रशासन में हस्तक्षेप से परेशान था.इस राजनीतिक अतिवाद को कम करना बेशक जरूरी था.लेकिन नई सरकार ने विषम विषस्य औषधम की नीति पर चलते हुए एक दूसरे अतिवाद को बढ़ावा दे दिया.वह अतिवाद था नौकरशाही के हाथों में राज्य को सौंप देना.इस अतिवाद ने सिर्फ जनता को ही नहीं परेशान किया है बल्कि मंत्री तक इससे पीड़ित हैं.अगर ऐसा नहीं होता तो शायद उत्पाद विभाग में वह घोटाला भी नहीं होता जिसकी इन दिनों जोर-शोर से चर्चा है.उत्पाद विभाग के अधिकारी लगातार मंत्री और मंत्री के आदेशों की अनदेखी करते रहे.परिणाम यह हुआ कि जहाँ विभाग को मात्र ९०० करोड़ रूपये का लाभ हुआ वहीँ शराब माफियाओं का अवैध कारोबार २५०० करोड़ तक जा पहुंचा.अफसरों ने बार-बार कहने पर भी जब मंत्री की नहीं सुनी तब मजबूरन उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा. उन्हें आज मंत्रिमंडल से हटा दिया गया क्योंकि उन्होंने खुद अपने ही विभाग में घोटाले का आरोप लगाते हुए जाँच की भी मांग की थी.उनका यह भी आरोप था कि इस घोटाले में मुख्यमंत्री सचिवालय से जुड़े अधिकारी भी शामिल हैं. वहीँ २००८ में सरकार की लापरवाही से हुई कोसी की विनाशलीला को झेल चुके वीरपुर के ग्रामीणों ने आज राहत में घोटाले का आरोप लगाते हुए स्थानीय एसडीओ के कार्यालय पर हमला कर दिया जिससे पुलिस को लाठी चार्ज भी करना पड़ा. नीतीश जी ने लगता है सिर्फ दिखावे के लिए इतना बड़ा मंत्रिमंडल बना रखा है.अच्छा तो होता कि वे सीधे तौर पर सचिवों को ही मंत्री बना देते या फ़िर मंत्री किसी को बनाते ही नहीं और सचिवों को ही सीधे तौर पर काम करने देते.इस सरकार के समय अपराध निश्चित रूप से काम हुआ है लेकिन नक्सली हिंसा और प्रभाव में वृद्धि हुई है.इससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि कहीं यह शांति जबरन तो नहीं पैदा की गई है और सतही है.सतह के नीचे अब भी लावा पिघल रहा है जो मौका मिलते ही ज्वालामुखी का रूप ले सकता है.जमुई जिले में कल हुई नक्सली हिंसा के बारे में पूर्व से ही पुलिस को आशंका थी फ़िर क्यों अधिकारियों ने एहतियाती कदम नहीं उठाया?नक्सलियों से सीमित साधनों के बल पर घने जंगल के बीच टक्कर लेनेवाले आदिवासियों को अगर इस तरह मौत के मुंह में धकेल दिया जायेगा तो कोई किस तरह इनके विरुद्ध प्रशासन का साथ देने की हिमाकत करेगा?अब तो उस इलाके से लोगों का पलायन भी शुरू हो गया है.सुशासन एक आदमी के बस की बात नहीं है इसके लिए एक अच्छी टीम भी चाहिए.साथ ही उस टीम से काम लेने के लिए उस पर विश्वास भी करना पड़ेगा.भारत लोकतान्त्रिक देश है और यहाँ तानाशाही सफल नहीं हो सकती चाहे तानाशाह लालू प्रसाद हों या नीतीश कुमार.नीतीशजी दोबारा मुख्यमंत्री बन गए तो एक मौका और मिल जायेगा बिहार को विकसित राज्य बनाने का लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो निश्चित रूप से उन्हें इस बात का अफ़सोस रहेगा कि वे मौके का लाभ नहीं उठा पाए और पॉँच साल यूं ही गुजार दिया.

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

क्यों नहीं फैले नक्सली आन्दोलन ?

किसी शायर ने कभी कहा था बर्बादे गुलिस्तां के लिए बस एक ही उल्लू काफी है, हर डाल पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?तब शायद शायर को इस सवाल का जवाब मालूम नहीं था.आज अगर वह जिन्दा होता तो शेर में प्रश्नवाचक चिन्ह लगाता ही नहीं.लोग कहते हैं कि भारत में नक्सलवाद क्यों पनप रहा है? मैं पूछता हूँ कि वर्तमान भारत में नक्सलवाद क्यों नहीं पनपे?क्या देश से गरीबी समाप्त हो गई है? क्या भारत के हर हाथ को काम मिल गया है?अगर नहीं और स्थितियां पहले से भी बदतर हो रही हैं तो बेशक नक्सलवाद के न पनपने की जगह पनपने के कारण ज्यादा हैं और ज्यादा शक्तिशाली भी.भारतीय लोकतंत्र के चारों स्तंभों में घुन लग गया है.संसद के एक तिहाई सदस्य दागी हैं और जो दागी नहीं हैं उनकी संपत्तियों की केवल जाँच करा दी जाए तो उन मिस्टर क्लीनों में से अधिकतर आय से ज्यादा संपत्ति रखने के दोषी पाए जायेंगे.पंचायत से लेकर संसद तक लगभग सभी जनप्रतिनिधि भ्रष्टाचार में लिप्त है और गलत तरीके से धन कमाने में लगे हुए हैं.जनता अब तक चुप है लेकिन कब तक वह धैर्य रख पायेगी?लोकतंत्र के इस्पाती ढांचे यानी कार्यपालिका की दशा भी कोई अच्छी नहीं है.मंत्री से लेकर चपरासी तक का वेतन से ज्यादा ऊपरी कमाई पर ज्यादा ध्यान रहता है.बिना सुविधाशुल्क दिए कुछ अपवादों को छोड़कर कोई काम नहीं होता.यहाँ तक कि तंत्र भूमिहीनों पर भी दया नहीं करता और इंदिरा आवास के रूपयों में से भी कमीशन ले लेता है.निराश लोगों की आखिरी उम्मीद न्यायपालिका खुद ही भ्रष्टाचार में आपादमस्तक डूबी हुई है.बदली से लेकर प्रोन्नति तक में दिनरात करोड़ों का खेल चलता रहता है.जनता 20-20 सालों से अपने मुकदमे के फैसले का इंतजार कर रही  है लेकिन उसे सिवाय तारीख के कुछ नहीं मिल रहा.वकीलों और पेशकारों की जेबें गर्म होती रहती हैं और साथ ही आम जनता का दिमाग भी.ज्यादातर मामलों में माननीय न्यायाधीश भी अपनी जेब गर्म करने से परहेज नहीं करते.लोकतंत्र के आखिरी स्तम्भ यानी मीडिया की हालत तो और भी ख़राब है और वहां भी सभी काम चांदी की खनक से ही होते हैं.ऊपर से नीचे तक चापलूसी और घूस.अधिकतर समाचार पैसे लेकर छापे जाते हैं.अब आप ही बताईये कि जनता अपनी समस्याओं के समाधान के लिए नक्सलवादियों के पास नहीं जाए तो कहाँ जाए?मैं हर तरह की हिंसा के खिलाफ हूँ.लेकिन भारत का प्रत्येक आदमी ऐसा तो नहीं सोंचता.

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

आओ लाशों के ढेर पर बैठकर बातचीत करें

हमारा इंतजार समाप्त हुआ.मुंबई हमले के बाद पहला हमला हो गया.इस बार निशाना बना है मुंबई के बगल का शहर पुणे.हम भारतीय हर हमले के बाद हाथ-पर-हाथ धरे बैठ जाते हैं इंतजार में कि अगला हमला कब होता है?मुंबई हमले से भी हमने कोई सबक नहीं लिया और पुणे से भी नहीं लेनेवाले.हमने मुंबई हमले के बाद घोषणा की थी कि पाकिस्तान जब तक आतंकी ढांचा नष्ट नहीं करता हम उससे वार्ता नहीं करेंगे.लेकिन हम अंतर्राष्ट्रीय दबाव में आकर वार्ता करने जा रहे हैं २५ और २६ फरवरी को.कितनी स्वतंत्र और कारगर है हमारी विदेश नीति!इतने लाचार तो हम तब भी नहीं थे जब हमें संपेरों और तांत्रिकों का देश कहा जाता था.लेकिन हम वार्ता तो करेंगे चाहे अपने  लोगों  की  लाशों  पर  बैठकर  ही  क्यों  न  करनी  पड़े  क्योंकि इससे हमारे आका अमेरिका को तो ख़ुशी होगी ही साथ-ही-साथ अपने देश के मुसलमान भी खुश हो जायेंगे और हमारी  सरकार की चुनावी नैया पर लग जाएगी.

शर्म बाज़ार में नहीं बिकती

कनाडा के वैंकूवर में इन दिनों शीतकालीन ओलंपिक चल रहा है.इसमें भारत के भी कुछ खिलाड़ी भाग ले रहे हैं.लेकिन जब वे प्रतियोगिता में भाग लेने पहुंचे तो उनके पास खेल में भाग लेने के लिए कपड़े तक नहीं थे.भारतीय प्रवासियों ने चंदा कर कपड़े जुटाए.कितने आश्चर्य की बात है एक तरफ क्रिकेट खिलाड़ियों पर धन की बरसात हो रही है तो दूसरी तरफ खिलाड़ियों के पास कपड़े तक नहीं हैं.अभी कुछ ही दिन पहले की बात है कि भारत के सबसे बड़े राज्य में जनप्रतिनिधियों ने खुद अपना वेतन बढाया है.इनके लिए तो सरकार के पास पैसा है लेकिन खेल के लिए नहीं है.खेल का भी अपना महत्व है.खिलाड़ी जब पदक जीतते हैं तब पूरी दुनिया में हमारा सिर गर्व से ऊँचा उठ जाता है.आर्थिक विकास सिर्फ जीडीपी में वृद्धि से ही परिलक्षित नहीं होता उसे अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं की पदक तालिका से भी जाहिर होना चाहिए.आज का भारत १९२८ का भारत नहीं है जब एम्स्तर्दम ओलंपिक में हमारे हॉकी खिलाड़ियों खाली पांव खेलना पड़ा था.आज का भारत आर्थिक महाशक्ति है.लेकिन खेल के मोर्चे पर कम-से-कम स्थितियां नहीं बदली हैं और खिलाड़ियों के साथ-साथ भारत को भी कहीं-न-कहीं शर्मिंदा होना पड़ता है.लेकिन इससे हमारे नीति-निर्माताओं और नीति-संचालकों को क्या फर्क पड़ता?उन्होंने तो वर्षों पहले शर्मिंदा होना छोड़ दिया है और शर्म बाज़ार में तो बिकती नहीं जहाँ से खरीदकर हम इनमें थोड़ा-थोड़ा बाँट दें.

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

चर्चा में रहने की बीमारी

मेडिकल साइंस जितनी तेजी से तरक्की कर रहा है उससे कहीं अधिक तेजी से नई-नई बीमारियाँ सामने आ रही हैं.इनमें से कुछ रोग शारीरिक हैं तो कुछ मानसिक.एक नई और लाईलाज बीमारी महामारी की तरह अपने पांव पसार रही है.बीमारी मानसिक है और वैज्ञानिक अभी तक उसके कारणों का पता भी नहीं लगा पाए हैं.मैं उसका जैववैज्ञानिक नाम तो नहीं जानता लेकिन साधारण बोलचाल की भाषा में उसे चर्चा में रहने की बीमारी कहा जाता है.यह बीमारी होते ही रोगी अजीबोगरीब हरकतें करने लगता है.कोई नाखून बढाने लगता है तो कोई दाढ़ी.इस बीमारी का सबसे प्रचलित और सामान्य लक्षण है किसी मृत या जीवित व्यक्ति के खिलाफ अनाप-शनाप बकने लगना.कुछ साल पहले यही बीमारी धर्मवीर नाम के एक गुमनाम साहित्यकार को हो गई थी.लगे उपन्यास सम्राट प्रेमचंद को गालियाँ देने.सामंतों का मुंशी तक कह दिया.कहने की देर थी कि हिंदी के सभी मठाधीशों की प्यालियों में तूफ़ान आ गया.हमारे कुछ पत्रकार बंधुओं को भी यह बीमारी है. जब-जब उन्हें इस बीमारी का दौरा पड़ता है तब-तब वे कभी प्रभाष जोशी को तो कभी मृणाल पाण्डे को थोक के भाव में गालियाँ देने लगते हैं.लेकिन इस रोग से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं बाल ठाकरे.उनको किसी-न-किसी तरह चर्चा में रहने की गंभीर बीमारी है.जब भी उनके ऊपर यह बीमारी हावी होती है उनके कार्यकर्ताओं को भी सड़क पर उतरकर हाथ साफ करने का मौका मिल जाता है.अभी फ़िर से उन पर इसका दौरा पड़ा हुआ है और वे हाथ धोकर शाहरूख खान के पीछे पड़े हैं.देखिये कब दौरे का असर कम होता है.वैसे भी जब तक वैज्ञानिक इसका इलाज नहीं ढूढ़ लेते हैं तब तक सिवाय इंतज़ार करने के हम कर भी क्या सकते है?

बेहाल प्रजातंत्र

अंधों में काना चुनना मजबूरी बन गई,
अंधे चुन रहे अंधों को, क्या यही प्रजातंत्र है;
सालों से चल रहा करोड़ों का खेल, नंगा नाच धनबल और बाहुबल का;
रावणों का काफिला आकर धमका रहा है वोटरों को,
नेता करा रहे स्नान मतदाताओं को शराब से,
कुर्सी के पीछे भाग रहा गरीबों का मसीहा;
चुनाव बनकर रह गए हैं प्रहसन,
चुन-चुनकर बिठा दिया गया है कानों को कुर्सियों पर,
एक भ्रष्टाचारी लड़ रहा है दूसरे भ्रष्टाचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार मिटाने का संग्राम;
नैतिकता के गालों पर रहे झन्नाटेदार तमाचे,
द्रौपदी के दामन को धर्मराज ने सौंप दिया है खुद दुश्शासन के हाथों में;
प्रजातंत्र से उठ रहा करोड़ों मतदाताओं का विश्वास,
विकृत चित्तवाले लिख रहे हैं भारत में प्रजातंत्र का नया इतिहास;
गांधी रह गए हैं सिर्फ हरे-पीले नोटों पर शेष,
ईमानदारी हो रही लुप्त लोगों के चरित्र से;
कुर्सी की छत्रछाया में खून-तून सब माफ़ हो गया,
रो रही न्याय की देवी पट्टी बांधे आँखों पर,
अपवित्र हो गया न्याय का मंदिर सपना अब इंसाफ हो गया.

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

मृत्यु एक मार्गदर्शक

मृत्यु क्या है और मौत के बाद मानव और अन्य प्राणियों का क्या होता है इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है?एक वृद्ध पड़ोसी की मृत्यु के बाद आज मैंने जब उनकी लाश देखी तो सोंचने लगा कि अब इस लाश की क्या जाति है और क्या पहचान है?कुछ भी तो नहीं.जाति, पहचान सब समाप्त.क्या शून्य शून्य में नहीं मिल गया?कुम्भ में जल जल में कुम्भ है बाहर-भीतर पानी.क्या हम दुनिया में अपनी मर्जी से आये हैं और अपनी मर्जी से जायेंगे?नहीं!इन दोनों बातों पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है.न ही जीवन में घटनेवाली अधिकतर घटनाओं पर ही हमारा कोई नियंत्रण होता है फ़िर हम क्यों अपने-आपको कर्ता मान लेते हैं और मिथ्याभिमान से भर जाते हैं.क्यों होता है ऐसा?लेकिन दुनिया को भ्रम मानकर इससे पूरी तरह विरक्त भी तो नहीं हुआ जा सकता.जो भी जितना भी हमारे हाथ में है उसे ही पूरी शक्ति और पूरी ईमानदारी से क्यों न पूरा किया जाए.हाँ लेकिन अगर हम जीवन के पथ पर चलते समय अटल सत्य मृत्यु को ध्यान में रखे तो हमारे हाथों कभी कोई गलत काम हो ही नहीं.इस तरह तो मृत्यु पथ प्रदर्शक भी है.

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

नागरिक समझ का अभाव है भारतीयों में

हमारे देश को आजाद हुए ६३ साल होने को हैं.किसी भी देश के नागरिकों को सिविक सेन्स यानी नागरिक समझ का प्रशिक्षण देने के लिए इतना समय कम नहीं होता.लेकिन यह बड़े ही दुःख की बात है कि हम भारतीयों में आज भी नागरिक समझ का अभाव है.हम चाहे किसी भी सरकारी कार्यालय में जाएँ सीढियों से लेकर ऑफिस की दीवारों तक पर पान की पीक के दाग देखे जा सकते हैं मानों मानचित्र बनाने की कोई प्रतियोगिता चल रही हो.हम आज भी लाइन तोड़कर टिकट लेने में अपना बड़प्पन समझते हैं और लाल बत्ती क्रॉस करने में हमें अपूर्व और अपार ख़ुशी मिलती है.जहाँ-तहां मल-मूत्र त्याग करने का तो जैसे हमें जन्मसिद्ध अधिकार ही प्राप्त है.यहाँ तक कि महापुरुषों की मूर्तियों को भी हम नहीं बक्शते.लोगों को पटना के गांधी मैदान के पास स्थित सुभाष पार्क की चहारदीवारी का इस काम के लिए उपयोग करते आप कभी भी देख सकते हैं.ये तो हुई कुछ छोटी-छोटी मगर मोटी बातें.अब एक बड़ी बात भी हो जाए यानी आर्थिक लाभ की बात.क्या आपने कभी निर्माणाधीन सड़क से ईंटों की चोरी की है?नहीं!फ़िर तो आप बेबकूफ हैं.शायद आपको ईंट के दाम पता नहीं है.५००० का हजार.कम-से-कम बिहार में तो यही दाम चल रहा है.अभी परसों जब मैं मुजफ्फरपुर में था तो मैंने बच्चों को दिन-दहाड़े सड़क से ईंटें उखड़ कर घर ले जाते हुए देखा.जब मैंने उन्हें मना किया तो एक किशोर लड़की उग्र हो उठी और कहा क्या ये सड़क आपकी है?जनता जब खुद ऐसे घटिया कामों में लगी रहेगी तब फ़िर सरकार के विकास कार्यों की तो ऐसी-की-तैसी होनी ही है.जहाँ तक भाषिक व्यवहार का प्रश्न है तो आज वही व्यक्ति समाज में पूजा जाता है जो जितनी ज्यादा गालियाँ देना जानता है.अभद्रता अब योग्यता की निशानी बन गई है.तभी तो राज और बाल ठाकरे पानी पी-पी कर पूरे मनोयोग से बस इसी एक काम में सालोभर लगे रहते हैं.हमारी पुलिस का तो इस मामले में कहना ही क्या?उनको तो जैसे इसी काम के लिए वेतन मिलता है.क्या आपने कभी आरक्षित टिकट पर बिहार या उत्तर प्रदेश से होकर रेलयात्रा की है?फ़िर तो आप को न चाहते हुए भी कई बार परोपकार का अवसर मिला होगा और जगह बांटनी पड़ी होगी.वो भी उनलोगों के साथ जो कभी टिकट कटाते ही नहीं हैं.कुछ लोगों को बसों और ट्रेनों में बीड़ी-सिगरेट पीना बहुत पसंद है.भले ही यात्रियों को इससे कितनी ही परेशानी क्यों न हो!आजकल एक और काम भी लोग बसों-ट्रेनों में करने लगे हैं.वो है गुटखा खाकर इधर-उधर थूकते रहने का.अगर आप इनमें से कोई भी काम करते हों और मुझ पर आपको गुस्सा आ रहा हो तो कृपया उसे भी थूक दीजिये और विचार कीजिये कि हम आखिर कैसा भारत बनाना चाहते हैं?

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

संघ की घोषणा स्वागत योग्य

कथित धर्मनिरपेक्षवादियों के बीच राष्ट्र विरोधी संगठन के रूप में बदनाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अब मुंबई में उत्तर भारतीयों की रक्षा का बीड़ा उठाया है.अभी तक कांग्रेस सहित सभी धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देनेवाले दल रहस्यमय तरीके से चुप्पी साधे हुए थे.ऐसे में संघ की घोषणा का हम सभी राष्ट्रवादियों की तरफ से स्वागत किया जाना चाहिए.इससे निश्चित रूप से शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का मनोबल गिरेगा और वे अपनी करनी से बाज आयेगे.संघ अखिल भारतीय संगठन है और महाराष्ट्र तो इसका केंद्र ही है.इसलिए हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि अब महाराष्ट्र में पिछले कुछ समय से चल रहे सारे उपद्रव और उत्पात शांत हो जायेंगे.चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जो भी इतिहास रहा हो वो देश की एकता और अखंडता की कट्टर समर्थक है. उसने अपने इस कदम द्वारा यह साबित भी कर दिया है.संघ प्रमुख के बयान देने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री ने मरता क्या न करता की तर्ज पर कहा कि भारतीय संविधान किसी भी भारतीय को कहीं भी बसने और काम करने की स्वतंत्रता देता है और केंद्र सरकार इसे सुनिश्चित करेगी.क्या पिछले दो सालों  से भारत  का संविधान लागू नहीं था या फ़िर मंत्रीजी की नैतिकता घास चरने चली गई थी .अब जब  उन्हें लगा कि संघ कहीं वाक ओवर ले ले तब उन्हें संविधान और अपने कर्त्तव्य की याद आ गई!

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

एनजीओ का गोरखधंधा

कभी संत विनोबा भावे ने किसी एनजीओ के कामकाज से खुश होकर कहा था कि अब सरकारी तंत्र में असर नहीं रहा अगर कहीं असर है तो असरकारी संगठनों में.लेकिन मैंने वर्तमान में बिहार में संचालित कई एनजीओ के कामकाज को गहराई से देखने के बाद पाया कि यहाँ तो सबकुछ गड़बड़ घोटाला है.आजकल कई सारे काम जो पहले बिहार सरकार खुद करती थी उसने एनजीओ के हवाले कर दिया है.कई पूंजीपति रूपयों की थैली लेकर घूम रहे हैं और संपर्क कर रहे हैं एनजीओ संचालकों से.मतलब किसी की पूँजी किसी का नाम.एनजीओ संचालक कुल कार्य पूँजी का ३ प्रतिशत तक पाकर भी खुश.हर्रे लगे न फिटकिरी रंग भी चोखा होए.जहाँ तक इस मामले में सरकारी भ्रष्टाचार का प्रश्न है तो तंत्र कुल रकम का लगभग ४५ से ५५ प्रतिशत तक गटक जा रहा है.एनजीओ के बैनर तले चाहे एनजीओ खुद काम करे या किसी और को काम करने की अनुमति दे वे खर्च करते हैं लगभग २५ प्रतिशत और इस तरह बचत है लगभग २० प्रतिशत तक.अब अगर १ रूपया में से सिर्फ २५ पैसा ही कार्य स्थल पर खर्च हो तो विकास कितना होगा यह कोई भी समझ सकता है?कहने का तात्पर्य यह कि सरकारी तंत्र जब तक भ्रष्ट रहेगा असरकारी संगठनों के कामकाज में असर नहीं आनेवाला चाहे सरकार कोई भी इंतजाम क्यों न कर ले.कोई भी एनजीओ वाला घूस देना नहीं चाहता लेकिन बिना दिए काम ही न चले तो कोई करे भी तो क्या करे?आखिर एनजीओ की तरफ से गतिविधि भी तो चलनी चाहिए.

शनिवार, 30 जनवरी 2010

क्या मैं आपकी सहायता कर सकता हूँ?

बिहार के कई जिलों में इन दिनों आम जनता को एक दिन का दारोगा बनाने की बिहार पुलिस ने मुहिम चला रखी है.उद्देश्य है पुलिस को पीपुल फ्रेंडली बनाना.क्या वास्तव में बिहार पुलिस पीपुल फ्रेंडली बनाने की दिशा में अग्रसर है?कल मैं जब हाजीपुर शहर में था मैंने पुलिस का जो रूप देखा उससे तो ऐसा नहीं लगता.पहली घटना तब की है जब मैं गांधी चौक पर स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के ए.टी.एम. में पैसा निकालने के लिए पंक्ति में खड़ा था.चूंकि मशीन में बिहार बंद के चलते पैसा डालना संभव नहीं हो सका था इसलिए मशीन १०० रूपये का नोट दे रही थी और पैसा निकालने में काफी समय लग रहा था.सामने आधी सड़क निर्माणाधीन होने के चलते जाम लग रहा था.तभी एक पुलिस के जवान आया और जाम समाप्त करने की कोशिश करने लगा लेकिन अपने तरीके से.साईकिल और रिक्शावालों पर डंडा चलाकर और कार-मोटरसाइकिल वालों से अनुनय-विनय करते हुए.उसका व्यवहार इतना भद्दा था कि मैं खुद भी उसे डांटे बिना रह न सका.वह बूढ़े रिक्शावालों को भी धड़ल्ले से गालियाँ दे रहा था और पहिये से हवा निकाल दे रहा था.खैर मैंने पैसा निकाला और आगे बढ़ गया.करीब दो घन्टे बाद जब मैं गुदरी बाजार से एम. चौक की ओर जा रहा था.अब आप कहेंगे कि किसी चौक का नाम शॉर्ट फॉर्म में क्यों.तो आपको बता दूं कि मस्जिद के ठीक सामने हनुमानजी का मंदिर है.इसलिए मुसलमान इसे मस्जिद चौक और हिन्दू महावीर चौक कहते हैं और इस तरह एक अघोषित समझौते के तहत इसका नाम एम. चौक हो गया है.तो मैं जब एम. चौक के पास था तो वहां जलापूर्ति विभाग की कृपा से सड़क पर पानी लगा हुआ था.जब मैं जलजमाव क्षेत्र के मध्य में था तभी नगर थाने की एक गाड़ी विपरीत दिशा से आती दिखाई पड़ी.इससे पहले भी कई बोलेरो आदि निजी वाहन गुजर चुके थे लेकिन इस ख्याल से कि हम जैसे निरीह पैदलयात्रियों को कीचड़ के छीटे नहीं पड़े ड्राइवरों ने गति धीमी कर दी थी.लेकिन जब पुलिस की गाड़ी गुजरी तो गति घटने के बजाये तेज हो गई.परिणामस्वरूप मेरे कपड़े कीचड़ से सन गए.मैं चिल्लाया भी कि पागल हो गए हो क्या? लेकिन गति कम नहीं हुई.फलस्वरूप अन्य कई पैदलयात्रियों को भी बिन मौसम की होली को अपने कपड़ों पर झेलना पड़ा.भारत के हर पुलिस थाने और चौकी में लिखा रहता है कि क्या मैं आपकी सहायता कर सकता हूँ?क्या यह तरीका होता है सहायता करने का?बिहार में जनता दरबारों में जितने मामले पुलिस के खिलाफ आते हैं सिर्फ उन सब पर सख्ती से कार्रवाई कर दी जाए तो पुलिस काफी हद तक पीपुल फ्रेंडली हो जाएगी.इस तरह जनता को एक दिन का दरोगा बनाने से कुछ नहीं होनेवाला.भय बिनु होहिं न प्रीति.

बुधवार, 27 जनवरी 2010

गीदड़ का शासन बेहतर!


लोकतंत्र निस्संदेह वर्तमान काल की सबसे अच्छी शासन प्रणाली है.लेकिन यह पूरी तरह निर्दोष हो ऐसा भी नहीं है.कम-से-कम भारतीय लोकतंत्र में समय-समय पर कई बुराइयाँ देखने में आई हैं और समय बीतने के साथ मुखर होती चली गई हैं.सबसे बड़ी समस्या जो पिछले दिनों ज्यादा परेशान करने लगी है वो है शासन का गैर जिम्मेदाराना व्यवहार और अयोग्य लोगों का मंत्रिमंडल में आ जाना.हमारे यहाँ सबसे ज्यादा मत पानेवाले को विजयी घोषित कर दिया जाता है.कभी-कभी तो १० प्रतिशत या इससे भी कम मत पाकर भी लोग चुनाव जीत जाते हैं.सबसे ज्यादा परेशानी तो तब आती है जब विधान सभा या लोकसभा में किसी भी एक दल को बहुमत प्राप्त नहीं हो.तब शुरू होता है मोलभाव का सिलसिला.सत्ता-प्राप्ति के लिए अयोग्य और भ्रष्ट लोगों से भी हाथ मिला लिया जाता है.इस तरह मोलभाव के बाद जो लोग मंत्री बनते हैं उनमें जिम्मेदारी का भाव बिलकुल भी नहीं होता.वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल को ही लें जिसके कई मंत्री अपनी जिम्मेदारी से भागते देखे जा सकते हैं.महंगाई मंत्री शरद पवार कह रहे हैं कि महंगाई के लिए सिर्फ वही जिम्मेदार नहीं हैं वहीं एक और मंत्री कृष्णा तीरथ एक गंभीर गलती होने के बाद कह रही हैं कि ऐसा तो आडवाणी के समय भी हुआ था.अरे बहनजी आडवाणीजी के समय जो हुआ वह अब इतिहास का विषय है और आपने उससे कोई सीख नहीं ली यह शर्म का विषय है.उस काल खंड से आप क्यों तुलना कर रही हैं!जब मंत्रियों में जिम्मेदारी का भाव ही नहीं रहेगा तब फ़िर अच्छा शासन कैसे देखने को मिलेगा.यहीं कारण है कि विदेश नीति से लेकर अर्थ नीति तक प्रत्येक मोर्चे पर सरकार विफल है और देश में अराजकता का माहौल उत्पन्न हो रहा है.हमने सामान्य ज्ञान की किताबों में पढ़ा था कि मध्यकाल में १२ साल तक भारत के ही किसी राज्य में एक गीदड़ ने शासन किया था.शायद उसका शासन भी वर्तमान शासन से बेहतर रहा होगा.

आधे मन से उठाया गया अधूरा कदम


महंगाई ने भले ही आम भारतीयों का जीना मुहाल कर दिया हो केंद्र सरकार के लिए यह सियासत से ज्यादा कुछ भी नहीं है.तभी तो वो इससे निपटने के लिए मूर्खतापूर्ण कदम उठा रही है जिसका निष्फल होना पहले से ही तय है.केंद्र सरकार ने अजीबोगरीब कदम उठाते हुए जनवरी और फरवरी महीने में भारत के प्रत्येक कार्डधारी को जन वितरण प्रणाली के माध्यम से १० किलोग्राम अनाज देने का निर्णय लिया है.इस योजना के द्वारा गेहूं १०.८० रूपये प्रति किलो और चावल १५.३७ रूपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराया जायेगा.अन्त्योदय और बीपीएल परिवारों को भी इसी दर पर अनाज उन्हें प्रत्येक महीने मिलनेवाले अनाज के अतिरिक्त दिया जायेगा.मनमोहन सिंहजी जिन गरीबों को पहले से २-३ रूपये किलो गेहूं-चावल मिल रहा हो वे क्यों इतने ऊंचे दामों पर अनाज उठाएंगे?दूसरी बात जो भी गेहूं उत्पादक क्षेत्र हैं वहां यह इससे भी कम मूल्य पर मंडी में यूं ही मिल रहा है, फ़िर क्यों उन इलाकों में रहनेवाले लोग यह अनाज लेने को तैयार होंगे?ठीक यही बात चावल उत्पादक इलाकों के लोगों के साथ भी लागू होती है.प्रधानमंत्रीजी यह योजना तो पहले से ही असफल है और इस योजना का ज्यादातर अनाज कालाबाजार में पहुँच जानेवाला है.प्रधानमंत्रीजी आप और आपके सहयोगी या तो मूर्ख हैं या फ़िर अपने को बहुत चालाक और जनता को महामूर्ख समझते हैं.

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

नीरो की बंशी और मनमोहन सरकार



किताबों में लिखा है कि जब रोम जल रहा था तब नीरो चैन की बंशी बजा रहा था.नीरो बंशी बजाना जानता था इसलिए बंशी बजाता था अब हमारे प्रधानमंत्री तो बंशी बजाना जानते नहीं इसलिए जब भारत के गरीब महंगाई की आग में जल रहे हैं तब वे ऊँघने और सोने में लगे हैं.कुछ मिनट की फ़ुरसत मिली नहीं कि लगे ऊँघने और सोने.कहा तो यह भी जाता है कि घोड़ा बेचने के बाद गहरी  नींद  आती  है .लेकिन  मनमोहन  जी  का  तो  दूर-दूर  तक  घोड़ों  से  कुछ  भी  लेना  देना  नहीं  है .कल  जब  विपक्षी  दल  भाजपा  के  नेताओं  ने  उन्हें  जगाया  तो  वे  बोले  यार  हमें  भी  मालूम  है  कि  देश  में  महंगाई  बढ़  रही  है  और शाम होते-होते एक सरकारी कमेटी बनाने की घोषणा  भी कर दी गई जो महंगाई से निपटने में सरकार की सहायता करेगी. इस सरकार की सबसे बड़ी विशेषता भी तो यही है कि ये कमेटी बहुत जल्दी बनाती है और फ़िर सारी जिम्मेदारी उसके हवाले करके प्रधानमंत्रीजी निद्रालीन हो जाते हैं.इसी सरकार में एक मंत्री हैं शरद पवार.उनकी ही जिम्मेदारी है महंगाई पर नियंत्रण रखने की.लेकिन वे अपनी इस जिम्मेदारी को भूलकर भविष्यवाणियाँ करने में लगे हैं.और उनकी भविष्यवाणी हमेशा किसी खाद्य वस्तु के दाम बढ़ने के बारे में होती है.लेकिन जब उनसे पूछा जाता  है कि दाम घटेंगे कब तब वे कहते हैं मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूँ जो बता दूं.सरकार चाहे तो मौद्रिक उपाय भी कर सकती है.लेकिन उसे ऐसा करने से उद्योगपति-पूंजीपति रोक रहे हैं.इससे ऋणों पर ब्याज दर जो बढ़ जाएगी और उनके लिए व्यापार करना ज्यादा महंगा हो जायेगा.सरकार जब कुछ कर ही नहीं सकती सिवाय कमेटी बनाने के तो कह दे कि हे जनता-जनार्दन यह रोग मेरे बस का नहीं है आपही इससे निपटिये.प्रधानमंत्री जी का यह भी दावा है कि किसानों को ज्यादा अच्छा मूल्य मिलने के कारण दाम बढ़ रहे हैं.कितना बड़ा झूठ है ये!असली लाभ तो बिचौलिए ले जाते है.हरी मिर्च जो हमारे हाजीपुर में २० रूपये किलो बिकती है किसानों को आढ़ती इसके बदले सिर्फ सात रूपये किलो का दाम देते हैं.हरी मिर्च का दाम किसने बढाया किसानों ने या इन बिचौलियों ने?कल फ़िर महंगाई विभाग के मंत्री ने अपना छोटा मुंह खोला और बड़ी बात कही कि चूंकि उत्तर भारत में दूध का उत्पादन कम हो गया है इसलिए उसका दाम बढ़ाने के लिए सरकार पर दबाव पड़ रहा है. ठण्ड में मवेशी दूध देना कम कर देते हैं, यह जानी हुई बात है.माना कि सरकार पर दबाव है दाम बढ़ाने का. क्या उस पर दाम घटाने का दबाव नहीं है?क्यों वह मुट्ठीभर पूंजीपतियों के हित में ब्याज दर बढा नहीं रही है?ऐसा नहीं कि गरीबों के बारे में यह मनमोहिनी-जनमोहिनी सरकार नहीं सोंचती है.उसने नरेगा योजना चलाई है लेकिन इसके अन्तर्गत काम हो रहा है कि नहीं देखना किसकी जिम्मेदारी है.गरीबी हटाने की योजनायें पैसे के अभाव में फेल नहीं होती, वो फेल होती है निगरानी के अभाव में.अगर ऐसा नहीं होता तो आज आजादी के इतने वर्षों बाद भी भारत में इतनी गरीबी नहीं होती.तेंदुलकर कमेटी की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत की ७७ % आबादी २० रूपये प्रतिदिन से भी कम में गुजारा कर रही  है.पिछले डेढ़ साल में  जिस रफ़्तार में महंगाई बढ़ी है उसने इस ७७ % जनसंख्या की थाली में जीने लायक भोजन भी नहीं छोड़ी है.उदाहरण के लिए दिल्ली में  पिछले साल जनवरी में जो टमाटर १० रूपये किलो था इस साल २० से भी ऊपर है.एक साल में दोगुना.चीनी सहित अन्य सभी खाद्य पदार्थों के दाम भी इसी रफ़्तार से बढे हैं.जब मानसून सामान्य नहीं रहा तभी चीनी सहित सभी खाद्य पदार्थों का आयात कर लेना चाहिए था.लापरवाही की हद तक देरी क्यों की गई?पिछले दो सालों में ४८ लाख टन चीनी के सस्ते दामों पर निर्यात की अनुमति सरकार ने क्यों दी जबकि गन्ने और खाद्यान्नों-दलहनों-तिलहनों की उपज में कमी आने की पूरी आशंका थी? मैं जानता हूँ कि पवार और मनमोहन के पास इन प्रश्नों का कोई जवाब नहीं है.लेकिन कथित रूप से आम आदमी की इस सरकार को पॉँच साल बाद आम आदमी के पास जाना भी पड़ेगा और तब इन सवालों के जवाब देने ही होंगे. तब वह इन प्रश्नों से भाग नहीं पायेगी.


बुधवार, 20 जनवरी 2010

महाराष्ट्र सरकार का देशविरोधी कदम


देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि कांग्रेस ने देश को आजाद कराया.इसके पीछे कांग्रेस पार्टी का क्या उद्देश्य था?आजादी या सत्ता प्राप्ति.वर्तमान काल में उसकी सरकारें जो करती हुई दिखाई देती हैं उससे तो लगता है कि तब के कांग्रेस नेताओं का चाहे जो भी उद्देश्य रहा हो अब के कांग्रेसियों का एकमात्र उद्देश्य कुर्सी प्राप्त करना और उसे बरक़रार रखना है चाहे देश टूट ही क्यों न जाए.उस महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार ने जहाँ की मिट्टी ने देश को तिलक जैसा राष्ट्रवादी दिया आज देश को तोड़ने वाला घातक कदम उठाया है.उसने फैसला लिया है कि महाराष्ट्र की राजनीतिक और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में अब उसी टैक्सी ड्राईवर को गाड़ी चलाने का परमिट दिया जायेगा जो १५ साल से महाराष्ट्र में रह रहा हो.इतना ही नहीं अब उसे ही परमिट दिया जायेगा जो मराठी लिखना और पढना जानता हो.मुंबई में हर साल लगभग ४००० नए परमिट जारी किये जाते हैं.महाराष्ट्र सरकार चाहे जो भी दलील दे उसने हिंदीभाषियों के प्रति दुर्भावना के कारण ही ऐसा कदम उठाया है.यह बात किसी से छिपी नहीं है कि मुंबई के अधिकांश टैक्सी ड्राईवर गैर मराठी यानी हिंदीभाषी हैं.ये वे लोग हैं जिनके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता और मजबूरी में जीवन रक्षा के लिए अपने घर को छोड़कर दूसरे राज्यों का रूख करते हैं.वे कोई शौक से मुंबई नहीं जाते हैं और न ही इतना पैसा कमाते हैं जिससे मराठियों के जीवन और जीवन स्तर पर खतरा उत्पन्न हो जाए.वैसे भी उसके द्वारा उठाया गया यह कदम भारतीय संविधान के अनुच्छेद १६ (२), १९ (d), (e) और (f) का खुला उल्लंघन तो है ही उच्चतम न्यायालय द्वारा गोलकनाथ-केशवानंद भारती एवं दूसरे मामलों में दिया गए संविधान के मौलिक ढांचें में बदलाव पर लगाये रोक सम्बन्धी निर्णय का भी उल्लंघन है.भारतीय संविधान भारत के प्रत्येक नागरिक को उपरलिखित अनुच्छेदों के द्वारा भारत में कहीं भी जाने, रहने-बसने और नौकरी-व्यवसाय करने का मौलिक अधिकार देता है. अब अगर केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार में थोड़ी सी भी नैतिकता बची है तो महाराष्ट्र की अपनी ही पार्टी की सरकार को यह आदेश वापस लेने को बाध्य करे.अगर राज्य सरकार न माने तो धारा ३५५ और ३५६ का प्रयोग कर राष्ट्रपति शासन लगाये.वैसे भी प्रधानमंत्री सहित पूरे मंत्रिमंडल राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुरक्षित रखने की शपथ भी पदभार ग्रहण करते समय दिलाई जाती है.देश बचेगा तभी हम बचेंगे और देश तभी बचेगा जब एक रहेगा.पहले भी जब भारत बँटा हुआ था तब हमलावरों के लिए सबसे आसान और असहाय लक्ष्य था और सैंकड़ों साल तक गुलाम भी रहा.वर्तमान घटनाक्रम को देखते हुए सबसे अच्छा होता कि मुंबई को केंद्रशासित प्रदेश बना दिया जाता और महाराष्ट्र की राजधानी किसी और शहर में स्थानांतरित कर दी जाती.

विकास यात्रा या पर्यटन


लोकतंत्र की जन्मभूमि वैशाली में चार दिन बिताकर बिहार के मुख्यमंत्री वापस पाटलिपुत्र चले गए और फ़िर से सबकुछ पहले जैसा हो गया.ठीक उसी तरह जैसे पानी में ढेला फेंकने पर उत्पन्न विक्षोभ थोड़ी देर में ही शांत हो जाया करते हैं.इस बीच उन्होंने वाल्मीकि रामायण में श्वेतपुर नाम से उल्लेखित चेचर के ऐतिहासिक मंदिर में पूजा-अर्चना की, बरेला चौर में (जिसे वे लोग झील भी कह लेते हैं जिन्हें यह मालूम नहीं है कि कमोबेश पूरा उत्तर बिहार ही कुछ महीने के लिए झील बन जाता है.) नौका विहार किया और जाने से पहले अनुशासित होकर पंक्तिबद्ध होकर विकास की राह में उपेक्षित, ठगी-सी खड़ी जनता-जनार्दन की समस्याओं को सुना वो भी अपने तरीके से यानि जनता दरबार लगाकर.अब वैशाली की जनता की कितनी समस्याओं को नीतीश दूर कर पाते हैं यह तो उनकी गंभीरता पर निर्भर करता है.अगर नेताओं के सिर्फ दौरा-यात्रा करने से विकास हो जाता तो बिहार की सड़कें कोलतार और सीमेंट की नहीं बल्कि चांदी की होती.पिछले साल बिहार की जिन-जिन जगहों पर नीतीशजी का विकास दौरा हुआ था और एक साथ दर्जनों शिलान्यास किये गए थे कहीं भी काम शुरू तक नहीं हुआ है न ही जनता दरबार में उठी किसी समस्या को ही दूर किया जा सका है.अगर वैशाली के साथ भी ऐसा ही हुआ है जिसकी पूरी सम्भावना भी है तब जनता की गाढ़ी कमाई में से करोड़ों रूपये विकास यात्रा के नाम पर बर्बाद करने के लिए जनता उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगी और जनता अगर उनके झांसे में आ भी जाए तो इतिहास तो उन्हें माफ़ नहीं ही करेगा.वैसे भी राजनीति की दुनिया में कथनी और करनी के बीच का सम्बन्ध कभी का टूट चुका है.

रविवार, 17 जनवरी 2010

नीतीश सरकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता


बिहार में इन दिनों रामराज्य है.यह कहना है बिहार की मीडिया का.भले ही नीतीश कुमार पर हत्या के मामले में सम्मन जारी हो या फ़िर दवा घोटाले में मुकदमा दर्ज कराया जाए क्या मजाल कि बिहार से प्रकाशित किसी भी प्रमुख समाचार पत्र में इस बारे में एक भी पंक्ति छप जाए.ऐसा नहीं है कि यहाँ के सभी पत्रकारों को सरकार ने खरीद लिया हो.कुव्यवस्था सम्बन्धी समाचार वे बराबर भेजते हैं.हाँ यह अलग बात है कि उन्हें छापा नहीं जाता.संविधान के अनुच्छेद १९ क के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है.प्रेस की स्वतंत्रता भी इसी में निहित है.संविधान के अनुसार भले ही प्रेस स्वतंत्र हो बिहार में वह हरगिज स्वतंत्र नहीं है.इसके लिए नीतीश सरकार की नीतियां तो जिम्मेदार है ही कहीं-न-कहीं प्रेस संस्था भी जिम्मेदार हैं.बिहार सरकार ने अपने पास अनियंत्रित अधिकार रखें हैं कि वह जब चाहे तब किसी भी मीडिया संस्थान का विज्ञापन बिना कारण बताये रोक सकती है.इस तथ्य से सभी वाकिफ हैं कि अखबारों की आमदनी में मुख्य हिस्सा सरकारी विज्ञापन का ही होता है.ऐसे में कोई भी अख़बार तब तक सरकार के खिलाफ समाचार छापने का दुस्साहस नहीं कर सकता जब तक उसमें आर्थिक हानि उठाने का साहस न हो.वैसे भी अख़बार अब मिशन की जगह प्रोफेशन बन चुके हैं यानी धंधा मात्र.ऊपर से नीतीश सरकार उन्हें फांसने के लिए दोनों हाथों से जनता का धन विज्ञापन में लुटा रही है.उदाहरण के लिए सरकार के चार साल पूरा होने के अवसर पर बिहार के सबसे बड़े अख़बार हिंदुस्तान में १० पृष्ठों का सरकारी विज्ञापन प्रकाशित किया गया.दैनिक जागरण के पटना संस्करण को 9 पृष्ठों और दिल्ली संस्करण को ८ पृष्ठों का विज्ञापन प्राप्त हुआ.राष्ट्रीय सहारा भी इस मौके पर खासे लाभ में रहा और उसे पांच फुल और तीन हाफ पृष्ठों का विज्ञापन मिला.इतना ही नहीं बिहार से प्रकाशित होने वाले प्रमुख अंग्रेजी अख़बारों को भी डेढ़-डेढ़ पेज का विज्ञापन दिया गया.और इस प्रकार बिहार सरकार ने जनता का करोड़ों रूपया अपना चेहरा चमकाने में बर्बाद कर दिया.यह दास्ताँ है उस कालखंड की जब मीडिया सरकारी बीन पर नाच रही होती है.लेकिन जब-जब मीडिया ने सरकार के खिलाफ कुछ भी लिखने की जुर्रत की है तब-तब उसका विज्ञापन रोक दिया गया है.उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के बटाईदारों को केसीसी देने सम्बन्धी बयान को छापने पर हिंदुस्तान का सरकारी विज्ञापन एक-डेढ़ महीने तक रोक दिया गया जिससे उसे करोड़ों रूपये का नुकसान हुआ.इसी तरह ममता बनर्जी के श्वेत पत्र प्रकाशन के समय लालू का बचाव करने को लेकर दैनिक जागरण को सुशासनी सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा और उसे भी एक महीने से ज्यादा समय के लिए सरकारी विज्ञापन से वंचित होना पड़ा.कहने का मतलब यह कि बिहार में कलम फिसलने का सीधा अर्थ है सरकारी विज्ञापन पर रोक.पहले जहाँ रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव, रसायन मंत्री रामविलास पासवान द्वारा भी समाचार पत्रों को सरकारी विज्ञापन प्राप्त होता था अब सिर्फ नीतीश जी ही बचे हैं जो सरकारी विज्ञापन दे सकते हैं.दूसरी ओर अख़बारों के मालिकों में वह नैतिक बल भी नहीं है कि वे सरकार को नाराज कर आर्थिक क्षति उठा सकें.उनको तो बैलेंस शीट में बढ़ते लाभ को देखकर ही ख़ुशी होती है. चाहे इसके लिए सरकारी बीन पर नाचना ही क्यों न पड़े और नौकरशाही की लालफीताशाही का निर्मम शिकार बन रहे इस गरीब राज्य के बारे में सबकुछ हरा-हरा क्यों न छापना पड़े.

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

चार दिन की चांदनी फ़िर.....................


कल से बिहार के मुख्यमंत्री वैशाली पधार रहे हैं.यहाँ वे तीन दिन रुकेंगे.इससे राज्य को क्या और कितना लाभ मिलेगा यह तो भगवान जाने.हाँ वैशाली जिले का मुख्यालय होने के कारण हाजीपुर के निवासियों को एक लाभ जरूर मिल रहा है.वो भी कल यानि १३ जनवरी से.आप अगर बिहारी होंगे तो समझ भी गए होंगे.फ़िर भी आपको बता देना सही रहेगा.हो सकता है कि आपका अनुमान गलत भी हो.कल से हाजीपुर में बिजली रहने लगी है.ऐसा भी नहीं है कि हमारे शहर में पहले बिजली नहीं आती थी.पर रहती नहीं थी आते ही चली भी जाती थी.अब जब तक मुख्यमंत्री वैशाली में हैं बिजली रहेगी और निश्चित रूप से रहेगी.साथ-साथ इस बात की भी गारंटी मैं दे सकता हूँ कि १८ तारीख से बिजली आएगी रहेगी नहीं.जो लोग इस मामले में गलतफहमी पाल रहे हैं हरगिज ग़लतफ़हमी न पालें.पालने के लिए पालतू और फालतू जानवरों की न तो कल ही कमी थी न तो आज ही कमी है.मैंने लालूजी के समय भी देखा है कि जब भी उनका महनार दौरा होता था बिजली आ जाया करती थी.उधर लालूजी ने पीठ की और इधर बिजली भी उनके अगले दौरे तक के लिए गायब.वहां बिजली आज भी रहने की बात तो दूर आती भी नहीं है सो जाती भी नहीं है.तब मैं महनार में ही रहता था.अब नीतीशजी भी तो लालूजी के ही छोटे भाई ठहरे.सो इस मामले में उनका फ़ॉर्मूला भी लालूजी वाला ही हो तो आश्चर्य कैसा?

जलवायु परिवर्तन और भारतीय कृषि


मेरे इस आलेख का उद्देश्य आप पाठकों को डराना नहीं बल्कि हमारी खेती के सिर पर उमड़ रहे खतरे के बादलों के प्रति आपको आगाह करना है, सचेत करना है.कृषि मानव का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक कार्य है क्योंकि इसका सीधा सम्बन्ध मानव के अस्तित्व है.भारत जैसे देश के लिए जहाँ की आबादी कृषि कार्यों में लगी है इसका महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है.लेकिन मानव निर्मित प्राकृतिक परिवर्तनों की वजह से कृषि खतरे में है और सबसे ज्यादा खतरा है भारत जैसे विकासशील देशों को क्योंकि इनकी अधिकांश खेती आज भी बरसात पर निर्भर है.भारतीय कृषि वैश्विक ताप वृद्धि से बुरी तरह प्रभावित भी होने लगी है.वर्ष २००८-०९ में भारत में कृषि विकास दर घटकर १.६ प्रतिशत रह गई जबकि वर्ष २००७-०८ में यह ४.९ प्रतिशत थी.वर्तमान वित्तीय वर्ष में भी स्थितियां अनुकूल नहीं हैं और लगभग आधा भारतवर्ष सूखे की चपेट में है.जबकि एक ओर जहाँ भारत को आबादी प्रतिवर्ष २ प्रतिशत की दर से बढ़ रही है वहीँ दूसरी ओर कृषि वृद्धि दर में लगातार कमी आ रही है.१९५५ से २००० के बीच २-३ लाख हेक्टेयर कृषि भूमि आवासीय उपयोग में आ चुकी है.
भारतीय कृषि पर जलवायु परिवर्तन का तात्कालिक प्रभाव-जुलाई-अगस्त तक चलने वाले दक्षिण-पश्चिमी या बारिश का मौसम दरअसल भारतीय कृषि के लिए जीवन रेखा है.व्यापक सन्दर्भ में कहें तो यह बारिश देश की अर्थव्यवस्था की भी जीवन रेखा है क्योंकि भारतीय कृषि पर करीब ६० फीसदी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर है.भारत में कुल १४ करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में से ६५ फीसदी मानव सिंचित (जैसे ट्यूब वेळ या नहरी सिंचाई की सुविधा) नहीं है.यह भूक्षेत्र वास्तव में ड्राई लैंड है जो विशुद्ध रूप से वर्षा पर निर्भर है.अगर बारिश नहीं होती है या देरी होती है तो भारत में आधे से ज्यादा खेतिहर जमीन ऊसर रह जाती है.ऐसी स्थिति में सरकार को सूखा घोषित करना पड़ता है जो अकाल से पहले की स्थिति है.भारत हर वक़्त अकाल के कगार पर रहता है.इतिहास में ऐसे कई अकाल दर्ज हैं.विश्लेषकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण भारत को बराबर मानसून की अनियमितता को झेलना पड़ सकता है.इस साल भी देश के कुछ इलाकों में बाढ़ आई और कुछ इलाके सूखे रह गए.आईसीएआर के अनुसार मात्र १ डिग्री सेंटीग्रेड तापमान में वृद्धि से भारत में ४० प्रतिशत से ५० लाख टन गेहूं की उपज कम हो जाएगी.जिस तरह धरती के गर्माने का सिलसिला जारी है विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष २०१० से २०३९ के बीच आज के मुकाबले कृषि उत्पादन ४.५ प्रतिशत तक कम हो जाएगी.वहीँ २०७० और २०९९ ई. के बीच तो यह वर्तमान उपज से २५ प्रतिशत तक कम तो जाएगी.इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ डेवेलपमेंट रिसर्च के वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर जलवायु परिवर्तन पर बने अंतरसरकारी पैनल द्वारा जारी कि गई चेतावनी सही साबित होती है तो भारतीय अर्थव्यवस्थ को जीडीपी पर ९ प्रतिशत की गिरावट झेलनी पड़ेगी.क्योंकि इससे चावल और गेहूं की उपज में ४० प्रतिशत तक की गंभीर गिरावट आने की आशंका है.इससे प्रति व्यक्ति खाद्य उपलब्धता कम होगी जिससे खाद्य असुरक्षा और कुपोषण बढेगा.
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के उपाय-भारत में मौसम में बदलाव के एक प्रमुख प्रभाव के रूप में बाढ़ व सूखे को देखा जा सकता है.तापमान वृद्धि एवं वाष्पीकरण की दर तेज होने के परिणामस्वरुप सूखाग्रस्त क्षेत्र बढ़ते जा रहे हैं.मौसमी बदलाव के चलते वर्षा समय पर नहीं हो रही है और उसकी मात्रा में भी कमी आई है.आनेवाले १५ वर्षों में भारत के खाद्यान्न का कटोरा यानि पंजाब और हरियाणा सूखाग्रस्त हो जायेंगे.वहां की धरती में सिंचाई के लिए पानी ही नहीं रह जायेगा.केद्रीय भूमिगत जल बोर्ड की २००७ में जरिएक रिपोर्ट के अनुसार २०२५ में सिंचाई के लिए भूमिगत जल उपलब्धता ऋणात्मक हो जाएगी.उदाहरण के पंजाब में जितना जल जमीन में समता है उससे ४५ प्रतिशत अधिक खींच लिया जाता है.वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार २० से २५ प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए वनों का कटाव उत्तरदायी है.इसलिए वनों के संरक्षण पर विशेष बल दिया जाना चाहिए.जलवायु परिवर्तन के चलते सूखे एवं बढ़ में वृद्धि से पानी की उपलब्धता प्रभावित होगी.भारत वातावरणीय परिवर्तनों से होनेवाली स्थितियों पर नियंत्रण से सम्बंधित योजनाओं पर सकल घरेलू उत्पाद का करीब ढाई प्रतिशत खर्च करता है जो कि एक विकासशील देश के लिए काफी बड़ी राशि है.भारत में गैर परंपरागत स्रोतों जैसे सूर्य, जल एवं पवन ऊर्जा कि काफी बड़ी सम्भावना है.पवन ऊर्जा पैदा करने की क्षमता में भारत विश्व में चौथे स्थान पर है. इन साधनों के प्रयोग हेतु प्रोत्साहन से भी वातावरण से कार्बन डाई आक्साइड को सोखने एवं जलवायु-परिवर्तन को कम करने में काफी सहायता मिलेगी.चूंकि पुराने वृक्षों में सीओटू को अवशोषित करने की क्षमता कम हो जाती है इसलिए जलवायु-परिवर्तनों के नियंत्रण के लिए प्रत्येक स्तर पर अधिकाधिक वृक्षारोपण को बढ़ावा देने की आवश्यकता है.जलवायु परिवर्तन के कृषि पर तात्कालिक और दूरगामी प्रभावों के अध्ययन की जरूरत है.एक यह कि जलवायु-परिवर्तन से कृषि चक्र पर क्या फर्क पड़ रहा है.दूसरा क्या इस परिवर्तन की भरपाई कुछ वैकल्पिक फसलें लगाकर पूरी की जा सकती है.साथ ही हमें ऐसी फसलें विकसित करनी चाहिए जो जलवायु-परिवर्तन के खतरों से निपटने में सक्षम हों-मसलन ऐसी फसलें जो ज्यादा गर्मी, कम या ज्यादा बारिश सहन करने में सक्षम हों.

बुधवार, 13 जनवरी 2010

चीनी से परेशान मनमोहन सरकार



आजकल केंद्र की मनमोहिनी-जनमोहिनी सरकार चीनी से परेशान है वो भी दोतरफा.एक तरफ चीनी के मूल्य में बेतहाशा वृद्धि ने उसकी हालत पतली कर दी है वहीँ चीन ईंच-ईंच कर भारतीय भूमि पर कब्ज़ा जमाये जा रहा है.थक हार कर चीनी के आयात का फैसला लिया गया.कितनी विचित्र स्थिति है सरकार चीनी के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयास नहीं कर रही है बल्कि महंगे दामों पर चीनी आयात करना उसे सुविधाजनक लग रहा है.कुछ महीने पहले जब उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान दिल्ली जा पहुंचे थे तब केंद्र ने उनकी कई मांगें मान ली थी और कई वादे भी किये थे.लेकिन उनमें से न तो कोई मांग अब तक पूरी हुई है और न ही कोई वादा पूरा किया गया है.कृषि मंत्री तो यहाँ तक कह रहे हैं कि मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूँ जो बता दूं कि चीनी के दाम कब कम होंगे?क्या कृषि मंत्री इस तथ्य से भी अपरिचित हैं कि भारत में गन्ने की खेती में लगातार गिरावट आ रही है क्योंकि वर्तमान समर्थन मूल्य पर किसानों के लिए यह लाभकारी नहीं रह गई है.अब जब उत्पादन ही कम होता जा रहा है तो फ़िर चीनी के दाम बढ़ेंगे या घटेंगे जानने के लिए न तो किसी ऊंची डिग्री की ही जरूरत है और न ही ज्योतिष सीखने की.
जहाँ तक हमारे पड़ोसी देश चीन का प्रश्न है तो मैं पहले ही कह चुका हूँ कि भारत और चीन दो समानांतर रेखाओं के समान हैं.चीन न तो भारत का मित्र हो सकता है और न है.बरसों पहले भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नाडिस ने कहा था और बिलकुल ठीक कहा था कि भारत का सबसे बड़ा दुश्मन चीन है न कि पाकिस्तान.बल्कि पाकिस्तान चीन के ही इशारों पर चलता रहा है.अब जब चीन ने विस्तृत भारतीय क्षेत्र पर कब्ज़ा जमा ही लिया है तो भारत के समक्ष विकल्प ही क्या है सिवाय चुप रह जाने के.वर्तमान केंद्र सरकार में वो नैतिक बल नहीं है कि वह चीन से आँखों में आँखें डालकर बात कर सके.यही कारण है कि वो चीनी अतिक्रमण से साफ तौर पर इनकार कर रही है.हाँ अगर दबाव जनता की तरफ से आये तो बात बन सकती है.लेकिन जनता भी तो सांस्कृतिक रीतिकाल का आनंद लेने में लगी है.उसे न तो बढती महंगाई से मतलब है और न ही देश की एकता और संप्रभुता से.

रविवार, 10 जनवरी 2010

ये तो होना ही था


कहते हैं कि जो जैसा करता है वैसा पाता है. साथ ही हर किसी की जिंदगी में अच्छे और बुरे दिन आते हैं.लगता है इन दिनों प्रबंध शिरोमणि अमर सिंह के ग्रह-नक्षत्र ठीक-ठाक नहीं चल रहे हैं.वैसे भी वे जिस रास्ते पर चल रहे थे उसकी कोई मंजिल तो थी नहीं.अमर सिंह जिस पीढ़ी के नेता हैं उस पीढ़ी ने राजनीति से नैतिकता को समाप्त होते अपनी आँखों से देखा है और कहीं-न-कहीं इसके लिए वह जिम्मेवार भी है.अब राजनीतिक मूल्यों में ह्रास में अमर सिंह की हिस्सेदारी कितनी है यह तो वृहद् विश्लेषण का विषय है लेकिन बोये पेड़ बबूल का आम कहाँ से होए  कहावत तो शाश्वत है और रहेगी भी.अमर सबसे पहले उत्तर प्रदेश के स्वर्गीय मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह से जुड़े और अपनी प्रबंधन कला से उन्हें खासा प्रभावित कर लिया.श्री सिंह की कृपा से देखते-ही-देखते काल तक फूटपाथ पर सोनेवाला यह आदमी कई फैक्टरियों का मालिक बन बैठा.इसी दौरान उनका परिचय समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव से हुआ और जल्दी ही उन्होंने उन्हें भी मैनेज कर लिया और उनके चहेते बन गए.एक बार तो उन्होंने मुलायम को जोड़-तोड़ के माध्यम से सत्ता में लाने में भी सफलता पा ली.लेकिन अमर के समाजवादी पार्टी में आने और छा जाने का साइड इफेक्ट भी कम नहीं हुआ.बेनी प्रसाद वर्मा, जनेश्वर मिश्र और राजबब्बर जैसे दिग्गज और समर्पित साथी बारी-बारी से मुलायम से किनारा करते गए.तब अमर के सितारे बुलंद थे वे मिट्टी भी छूते तो वह सोना हो जाती.लेकिन सब दिन कहाँ एकसमान होते हैं.जनता का मोहभंग होने लगा.परिदृश्य बदला और मुलायम का राजनीतिक भविष्य ही खतरे में नजर आने लगा.मुलायम को लगने लगा कि अमर का साथ लाभ की जगह नुकसान पहुँचाने लगा है और शुरुआत हुई पार्टी में उन्हें किनारे लगाने की जिसकी परिणति उनके इस्तीफे से हुई.अमर ने समय-समय पर अपनी राजनीतिक पहुँच से अमिताभ बच्चन, अनिल अम्बानी और सुब्रत राय सहारा को लाभ पहुँचाया और राजनीति में धनबल के प्रयोग को बढ़ावा दिया.आगे उनके भाग्य में क्या बदा है यह तो विधाता ही जाने फिलहाल तो यही कहा जा सकता है की जो भी हो रहा है वो तो होना ही था.

साधुवाद के पात्र हैं शशि थरूर


शशि थरूर ने कल जवाहरलाल नेहरु की विदेश नीति को लेकर जो कुछ भी कहा है उसके लिए वे निश्चित रूप से शाबासी के पात्र हैं.व्यक्ति महान नहीं होता उसकी करनी के आधार पर ही उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए.नेहरू कल्पनाजीवी व्यक्तित्व थे और उनकी विदेशनीति भी यथार्थवादी कम आदर्शवादी ज्यादा थी जिसका कुपरिणाम आज भी देश भोग रहा है.यहाँ हमें यह नहीं देखना चाहिए कि बयान किसने दिया है बल्कि यह देखा जाना चाहिए कि उसने क्या कहा है?कांग्रेस सरकार में मंत्री रहते हुए थरूर द्वारा दिया गया बयान निश्चित रूप से साहसिक कहा जायेगा.नेहरु भी इंसान थे और गलतियाँ इंसान ही करता है.जरूरत किसी व्यक्ति की गलतियों पर पर्दा डालने की नहीं बल्कि सच्चे मन से उनका विश्लेषण कर सीख लेने की है.

सोमवार, 4 जनवरी 2010

दलाल संस्कृति

आपने कई संस्कृतियों के नाम सुने होंगे.हड़प्पा संस्कृति,चीनी संस्कृति,मिस्री संस्कृति आदि.अब मैं कितने समाप्त हो चूँकि संस्कृतियों के नाम गिनाऊँ, सर्वकालिक और सार्वभौमिक तो बस एक ही संस्कृति है और वह है दलाल संस्कृति.
                               कुछ साल पहले तक अपने देश में किसी को दलाल या दल्लाल कह देने पर मार का नहीं तो कम-से-कम गालियाँ सुनने का तो इंतजाम हो ही जाता था.पर वर्तमान भारत में यह शब्द गौरव और अभिमान का परिचायक ही नहीं अपितु पर्याय भी बन चुका है.गाँव में आप बिना दलाल के जमीन-जायदाद, मवेशी यहाँ तक कि फसल भी नहीं बेच सकते.यह पुरानों में ही अच्छा लगता है कि विश्व के संचालक भगवान विष्णु हैं और सर्वकष्टनिवारक श्रीगणेश हैं.आज तो एक ही कष्टनिवारक है और वह है दलाल.पहले जब यह व्यवसाय-मात्र था तब दलाल कहने से बुरा मानने का खतरा हो भी सकता था, आज बुरा मानने का प्रश्न ही नहीं! इस शब्द का अर्थ पूरी तरह से बदल चुका है.अब यह निंदा का नहीं प्रशस्ति का गुण धारण करता है.
                   'हरि के हजार नाम' की तरह दलालों के भी हजारों नाम हैं.किराये पर मकान चाहिए या जमीन खरीदनी है तो प्रोपर्टी डीलर, कम्पनियों के शेयर खरीदने हैं तो शेयर ब्रोकर.यहाँ तक की मंदिर जाएँ तो वहां भी ईश्वर और अपने बीच एक मध्यस्थ को पाएंगे यानि पुजारी.अब अगर आप पूछे की मंदिर में मध्यस्थ की क्या जरुरत?अरे भी भगवान आपकी भाषा थोड़े ही समझते हैं.वे भी उनकी भाषा समझते हैं.
                अब इन छुटभैये नेताओं की नादानी देखिये बोफोर्स-बोफोर्स चिल्लाते-चिल्लाते इनका गला बैठ रहा है.अरे नादानों, जब बिना दलाल के कोई अपनी भैंस तक नहीं बेच सकता तो फ़िर रक्षा-उपकरण निर्माता कम्पनियों की कोई ईज्जत है भी कि नहीं, आखिर दलाल नहीं रखने से उनकी ईज्जत नहीं चाटेगी क्या?वो तो भला तो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का जिन्होंने सिंह गर्जना करते हुए संसद में कहा कि स्वतंत्रता के बाद कोई भी रक्षा बिना दलालों की कृपा के संपन्न हुआ ही नहीं है.
                       अब हरेक राजनेता दलालों की महिमा थोड़े ही समझता है.हर कोई मुलायम सिंह यादव की तरह समझदार हो भी तो नहीं सकता.उनके पार्श्वभाग में अमर कृतिवाले प्रबंध शिरोमणि श्री अमर सिंह अनुज की तरह सदैव उपस्थित रहते हैं.
                       सरकार चलाना भी इतना आसान थोड़े ही होता है कि बिना दलाल के चल जाए.नहीं विश्वास होता है तो फ़िर चले जाइये किसी भी मंत्रालय में.आपको ढेर-सारे बड़े-बड़े संपर्कोंवाले पूर्व बेरोजगार,दलाली में शोधकार्य में पूरे मनोयोग से रत दलाल मिल जायेंगे.स्थानांतरण से लेकर पेंशन तक हर टेंशन की दवा है उनके पास.रेलवे ने तो ट्रेवल एजेंट नाम और पदवी देकर इस विधा को सम्मानित भी किया है.भारत का सबसे पुराना शेयर बाज़ार बम्बई स्टॉक एक्सचेंज जिस सड़क पर स्थित है वह तो पूरी तरह दलालों को ही समर्पित है.नाम है-दलाल स्ट्रीट.इस महान गली में रहनेवालों के नाम के साथ भी यह महान शब्द लगा होता है जैसे हितेन दलाल,जितेन दलाल आदि.
                 अब मैं आपको अपने ऊंचे घराने के बारे में भी बता दूं.मेरे एक दूर के नाना थे वे बैल-भैस की दलाली करते थे.अन्य दलालों की तरह उनके पास भी एक ही जमापूंजी थी दिमाग.जिसका वे जमकर प्रयोग करते थे.क्या मजाल कि कोई ठेकेदार उनसे बिना पूछे स्कूल या कुएं में एक भी ईंट जोड़ दे.इतनी ईज्जत थी उनकी गावों में कि लोग उन्हें दलाल नहीं 'दलाल साहेब' कहकर पुकारते थे.
                       कुल मिलाकर मित्रों भारत में इस समय कलियुग है.अर्थ प्रधान युग.इस महान युग का और ज्यादा समय व्यर्थ न गंवाते हुए मित्रों अगर अर्थ कमाना है तो जाइए दलाली करना सीखिए.अगर आपके पास एमबीए की डिग्री है तो आप इस काम तो पूरे प्रोफेशनल तरीके से कर सकते हैं.यहाँ भी तो मैनेज ही करना होता है.मैं इस रोजगार में आपके साथ फिफ्टी-फिफ्टी का पार्टनर बनाने को तैयार हूँ.

शनिवार, 2 जनवरी 2010

रेलगाड़ी या यातना शिविर

क्या आपने कभी भारतीय रेल से सफ़र करने का सौभाग्य पाया है?यदि नहीं तो आप बहुत भाग्यशाली हैं.लेकिन मैं इतना भाग्यशाली नहीं हूँ.इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं हवाई जहाज से यात्रा का खर्च उठा सकूं.मजबूरन मुझे बार-बार रेलगाड़ी से सफ़र करना पड़ता है.वैसे मैं हजारों बार रेलगाड़ी से यात्रा कर चुका हूँ, लेकिन इस बार का मेरा अनुभव इतना भयावह रहा कि मुझे रेलयात्रा करने की अपनी मजबूरी पर काफी क्षोभ हुआ.यह भी कह सकते हैं कि मुझे अपनी स्थिति पर पूरी यात्रा के दौरान खुद ही तरस आती रही.हुआ यूं कि मुझे एम.फिल की फाइनल परीक्षा देने के लिए नोएडा जाना पड़ा.लौटते समय मुझे अपने साथ दीदी और अपनी दो भांजियों को लेकर बिहार आना था.मैंने जाने के समय ही मगध एक्सप्रेस में लौटने का भी आरक्षण करवा लिया था.निर्धारित तिथि यानि २५ दिसम्बर २००९ को शाम के समय रेलवे पूछताछ नंबर १३९ पर पूछने पर पता चला कि हमारी ट्रेन शाम के ८.१० के बजाये देर रात ११.५० में खुलेगी.इसलिए हमलोग रात ११ बजे नई दिल्ली स्टेशन पर पहुंचे.वहां भी डिस्प्ले बोर्ड पर गाड़ी खुलने का समय ११.५० अंकित था.रात साढ़े ११ बजे अचानक स्टेशन के लाउडस्पीकर पर घोषणा की गई कि यात्रियों को सूचना दी जाती है कि २४०२ डाउन मगध एक्सप्रेस अब रात ११.५० के बदले सुबह ४.५० पर रवाना होगी.हमें लगा जैसे हम पर वज्रपात हो गया हो.पूस की यह ठंडी रात अब हमें प्लेटफ़ॉर्म पर गुजारनी थी.मेरी छोटी बहन का घर जहाँ हम रुके हुए थे गाज़ियाबाद में था और हम वापस भी नहीं जा सकते थे.एक घंटे तक तो हम बातचीत में लगे रहे फिर दीदी और दोनों बच्चियों को नींद आने लगी.हमारे पास दो कम्बल थे दोनों निकाल लिए गए लेकिन ठण्ड इतनी ज्यादा थी कि कम्बल बेअसर साबित हो रहे थे.पटना से आनेवाली अप ट्रेन शाम साढ़े छः बजे ही आ चुकी थी फिर ट्रेन के प्रस्थान के समय को सुबह ४.५० क्यों कर दिया गया यह हमलोगों की समझ में नहीं आ रहा था.सर्द हवाओं के झोंके गोलियों की तरह प्रहार करते लग रहे थे.ऐसा अनुभव हो रहा था कि हम अभी के अभी ठन्डे हो जायेंगे.मैं मन में कल्पना कर रहा था कि क्या हिटलर का यातना शिविर कुछ ऐसा ही नहीं होता होगा?ठण्ड के मारे हमें नींद आ भी रही थी और नहीं भी.किसी तरह रात बीती और ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर आई परन्तु खुली अपने पुनर्निर्धारित समय से चालीस मिनट की देरी से यानि साढ़े पांच बजे.भारतीय रेल में मैंने जबसे होश संभाला है देख रहा हूँ कि एक बड़ा ही भद्दा रिवाज प्रचलित है यानि देर से चलनेवाली ट्रेनों को और भी लेट करते जाने का.इसी रिवाज का अनुपालन करते हुए रेल प्रशासन ने हमारी ट्रेन को और भी लेट करते हुए इतना लेट कर दिया कि मगध एक्सप्रेस रात २ बजे पटना जंक्शन पर पहुंची.किसी तरह हम हाजीपुर घर तक जीवित पहुँच सके.आज मैं एक आम भारतीय के रूप में रेल मंत्रालय से पूछता हूँ कि वह क्यों चला रहा है ट्रेनों को?क्या वह इसके माध्यम से हम गरीबों की गरीबी का मजाक उड़ाना चाहता है या हमें अपनी जानवरों से भी बदतर हालत का अहसास दिलाने के लिए वह ट्रेनों का परिचालन कर रहा है?अमीरों की गाड़ियों राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेसों के साथ तो ऐसा व्यवहार नहीं किया जाता.आज २ जनवरी को एक ही दिन में तीन रेल दुर्घटनाओं से तो यहीं परिलक्षित होता है कि रेलवे को यात्रियों की जान माल के नुकसान से कोई मतलब ही नहीं रह गया है.उसका काम तो बस दुर्घटनाओं के बाद मुआवजे की घोषणा भर करना शेष रह गया लगता है.