शनिवार, 21 अगस्त 2010

फील गुड की बीमारी अब यूपीए सरकार की बारी


कहते हैं कि जब चींटी की मौत आती है तब उसके पंख लग जाते हैं और जब सरकार को जाना होता है तब क्या होता है?जहाँ तक भारत का सवाल है तो यहाँ किसी भी सरकार  के पतन का सबसे बड़ा लक्षण है उसका फील गुड का शिकार हो जाना.यह बीमारी ज्यादातर सरकारों को शासन के छठे वर्ष में होती है.वाजपेयी सरकार को भी हुई थी और अब शासन के छठे वर्ष में ही यू.पी.ए. सरकार को हुई है.इन दिनों सरकारी भोंपू आकाशवाणी पर एक गीत बार-बार गाया जा रहा है-
अब दुनिया में यही बस सुनात है कि देश हमार आगे जात है;
अब दुश्मन की भी क्या बिसात है कि देश हमार आगे जात है.
न जाने किस सूचकांक के आधार पर ऐसा दावा किया जा रहा है.तमाम विकास सूचकांकों में हम नीचे से प्रथम आनेवालों में से और ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की भ्रष्ट देशों की सूची में हम सबसे ऊपर से प्रथम आनेवालों में से हैं.कहीं यह फील गुड न्यूज़ वीक द्वारा हमारे सबसे अकर्मण्य और अक्षम लेकिन विद्वान प्रधानमंत्री को दुनिया का सबसे सम्मानित नेता बताने से तो नहीं उपजी है.पैसे की जरूरत सबको है,मीडिया कर्मियों और मीडिया संस्थानों को भी.हो सकता है कि मनमोहन जी के लिए यह सम्मान ख़रीदा गया हो.जहाँ तक इस गीत की दूसरी पंक्ति में दुश्मनों की बिसात की खिल्ली उडाई गई है तो इसे सरकार का बडबोलापन ही कहा जाना चाहिए क्योंकि इस सरकार से तो आतंरिक दुश्मन माओवादी ही नहीं संभल रहे और लगभग आधे भारत पर उनकी सत्ता चलती है.बाह्य शत्रु चीन लगातार घुसपैठ करता रहता है उसके आगे तो हमारी सरकार का मुंह तक नहीं खुलता,आँख मिलाने की बात तो दूर रही.लेकिन हमारी सरकार अपने से कई गुना मजबूत देश को शत्रु कैसे मान सकती है वो तो शायद नन्हे-मुन्ने पाकिस्तान की बात कर रही है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान सालों से जो हमें आँखें दिखा रह है वह चीन के बल पर ही दिखा रहा है वरना पाकिस्तान तो कभी भारत के पासंग में था ही नहीं.जब अमेरिका ने पाकिस्तान को परमाणु समझौते से मना कर दिया तब भारत को चिढाने के लिए ही चीन ने उससे ऐसा समझौता किया.इसलिए इन दिनों आकाशवाणी से प्रसारित किया जा रहा यह गाना झूठ की नींव पर खड़े हवामहल के समान है और चुनाव तक अगर यही हाल रहा तो यह खुशफहमी चुनाव के बाद सरकार को कहीं की नहीं छोड़ेगी.इन दिनों फील गुड का गुण धारण करनेवाला एक और गाना सरकारी भोंपू यानी आकाशवाणी पर बज रहा है.गाने के बोल कुछ इस प्रकार हैं-
भारत निर्माण का सपना बुना,तरक्की हुई कई गुना.
कैसी तरक्की और किसकी तरक्की और कैसा सपना और किसका सपना.वाजपेयी सरकार ने जो आधारभूत संरचना विकसित करने का कार्य शुरू किया था उसे तो इस सरकार ने सत्ता में आते ही रद्दी की टोकरी में डाल दिया.हमारा पड़ोसी चीन इस मामले में हमसे मीलों ही नहीं कई हजार मील आगे जा चुका है.देश में आज भी बिजली की भारी कमी है और हम लगातार पंचवर्षीय योजनाओं में बिजली और कृषि सहित सभी क्षेत्रों में लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो रहे हैं.तरक्की हुई है तो कांग्रेस पार्टी के फंड में हुई है और इस मामले में वह बांकी दलों से काफी आगे है.सभी कांग्रेसियों के बीच गाड़ियों और पैसों की रेवड़ी बांटी जा रही है.हमारे उपनिषदों में एक कथा है जिसमें देवासुर संग्राम में विजयी होने के बाद देवता फीलगुड के शिकार हो गए और आमोद-प्रमोद में लिप्त हो गए.तब उन्हें जागृत करने के लिए ब्रह्म प्रकट हुए और देवताओं को उनके कर्तव्यों का भान कराया.आज कलियुग में सरकार का दिमाग ठिकाने लगाने के लिए ब्रह्म तो स्वयं आने से रहे लेकिन जनता सरकार को उसकी इस खुशफहमी के लिए जरूर दण्डित करेगी अगर हमारी सरकार तब तक फील गुड की खुमारी से बाहर नहीं आई तो.राजस्थान से  इसकी शुरुआत हो भी चुकी है.

भारत पर मंडराता जलवायु परिवर्तन का खतरा.

 २१ वीं शताब्दी में भी बिहार के नेता लकीर के फकीरों जैसी बातें कर रहें हैं.बकौल लालू राज्य में बरसात में कमी आने के लिए सूर्य ग्रहण के समय राज्य के मुखिया नीतीश कुमार का बिस्कुट खाना जिम्मेदार है.वास्तव में समस्या इतनी छोटी नहीं है कि उसे मजाक में उड़ा दिया जाए.भारतीय उपमहाद्वीप में जिस तरह का जलवायु परिवर्तन हो रहा है उससे बहुत जल्दी भारत की खेती पर बहुत ही बुरा असर पड़ने की आशंका है.पुरातत्वविदों के अनुसार कुछ इसी तरह की स्थिति में ४००० वर्ष पहले सिन्धु घाटी सभ्यता का पतन हो गया था.पुरातत्वविद कुलदीप सिंह ने घघ्घर नदी घाटी में परागकणों का परीक्षण करने पर पाया है कि ई.पू. २००० के बाद सिन्धु घाटी में वर्षा की मात्रा में अकल्पनीय कमी आ गई थी जिससे इस क्षेत्र का मरुस्थलीकरण शुरू हो गया और देखते-देखते दुनिया की सबसे पहली और अपने समय की सबसे उन्नत नगरीए सभ्यता का अंत हो गया.पिछले दो सालों से लगातार पूर्वोत्तर भारत में बरसात में जो भारी कमी आई है वह निश्चित रूप से चिंता का विषय है.पिछले साल भी इस क्षेत्र में सिर्फ रबी की खेती संभव हो पाई थी जबकि प्राक ऐतिहासिक काल से ही खरीफ की सबसे प्रमुख फसल धान की खेती का मुख्य केंद्र यही क्षेत्र रहा है.भगवान न करे अगर भविष्य में हालात नहीं सुधरे तो खेती के लिए पानी की उपलब्धता तो दूर की कौड़ी होगी पीने के पानी के भी लाले पड़ जाएँगे.लेकिन ऐसा भी नहीं है जलवायु में आ रहा यह परिवर्तन सिर्फ पूर्वोत्तर भारत को ही बर्बाद कर रहा है इसने पश्चिमी भारत में अतिवृष्टि से बाढ़ की अनपेक्षित स्थिति पैदा कर दी है.कहना न होगा कि भारत में उद्योगों का सबसे ज्यादा घनत्व इसी इलाके में है जिससे हजारों जिंदगियों की रोजी-रोटी चल रही है.राजस्थान जहाँ साल में १० सेमी वर्षा भी नहीं होती थी पिछले वर्षों में बाढ़ का सामना कर रहा है.इस साल तो दिल्ली से लेकर पाकिस्तान तक में जल प्रलय की स्थिति है.उत्तर में चीन में भी कमोबेश यही हालत है.पर्यावरण विज्ञानी वर्षों पहले से ही वैश्विक तापमान से सबसे ज्यादा भारत और चीन के प्रभावित होने की चेतावनी देते रहे हैं.लेकिन हमने अपनी आदत के अनुसार पहले से किसी प्रकार की तैयारी नहीं की.किन्तु अब जबकि संकट एकदम सिर पर आ गया है हम जलवायु परिवर्तन की सच्चाई से भाग नहीं सकते.हमें शीघ्रातिशीघ्र खरीफ फसलों के ऐसे प्रभेदों की खोज करनी होगी जो कम पानी में भी अच्छी फसल दे.साथ ही वर्षाजल संरक्षण के कार्य को युद्ध स्तर पर चलाना होगा.अन्यथा पूर्वोत्तर भारत जिसे मैं अपने लेख में पूर्वी उत्तर प्रदेश तक मान रहा हूँ से जो जनसंख्या का पलायन होगा वह पूरे देश में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा कर देगा जिस तरह का पलायन ४००० साल पहले सिन्धु क्षेत्र से गंगा घाटी में हुआ था.अगर ऐसा न भी हुआ तो भी इस क्षेत्र में जो भुखमरी की समस्या खड़ी होगी उससे निबट पाना किसी भी सरकार के बस में नहीं होगी और बंगाल के १९४३ के अकाल समेत सारी कहानियां फीकी पड़ जाएँगी.

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

हम सत्ता के सत्ता हमारी


भारतीय लोकतंत्र में समस्त राजनीतिक क्रियाकलापों के केंद्र में क्या है?जनता तो बिलकुल भी नहीं.वास्तव में सत्ता ही वह धुरी है जिसके चारों ओर हमारी राजनीति घूमती है और घूमते हैं हमारे राजनीतिज्ञ.लेकिन सत्ता सुंदरी को साध पाना हमेशा से बड़े-बड़े साधकों के लिए भी आसान नहीं रहा है.बहुत-से राजनेता तो आजीवन विपक्ष की राजनीति ही करते रह जाते हैं.लेकिन हमारे लिए यह गौरव की बात है कि हमने यानी हाजीपुर की जनता ने एक ऐसे व्यक्ति को राजनीतिक जीवन दिया है जिनके लिए सत्ता को साधना बाएँ हाथ का खेल रहा है.पहले श्रीमान भी हमेशा विपक्ष में नजर आते थे.१९८९ में उनकी समझ में आया कि असली मजा तो सत्ता के साथ रहकर मलाई चाभने में है.इसलिए चार दिन की अँधेरी रात में जिसे जी भरकर गालियाँ देते थे चांदनी रात वाले दिन के उजाले में उसी से गले मिलते देखे गए.जब तक साथ में सत्ता सुख भोगते रहे वही दल उनके लिए राष्ट्रवादी बन गया जिसे वे दिन-रात बोतलबंद पानी पी-पी कर सांप्रदायिक करार देते थे.सत्ता सबको शुद्ध बना देती है एकदम गंगाजल के माफिक.वे केंद्र में जिस विभाग के भी मंत्री रहे खूब बहाली की लेकिन सशुल्क.वर्ष १९९८ में सी.बी.आई. ने अजमेर रेलवे भर्ती बोर्ड के अध्यक्ष कैलाश प्रसाद को उम्मीदवार से पैसे लेते रंगे हाथों गिरफ्तार भी किया.लेकिन नेताजी ने अपने रसूख के बल पर न सिर्फ मामले को रफा-दफा करवा लिया बल्कि अटल सरकार की दूसरी पारी में संचार मंत्री भी न गए.राजग भी दलित चेहरे को पाकर धन्य हुई जा रही थी.लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें भाजपा फ़िर से सांप्रदायिक नज़र आने लगी.वर्ष २००४ का लोकसभा चुनाव उन्होंने उस लालू प्रसाद के साथ मिलकर लड़ा जिनको सत्ता से हटाने के लिए लाभी वे शैतान से हाथ मिलाने को भी तैयार थे.लेकिन लालू जी ने उन्हें धोखा दे दिया.वादा करके भी रेलमंत्री का पद खुद ले लिया.बेचारे के हाथ आया इस्पात एवं रसायन मंत्रालय.लेकिन नेताजी ठहरे उर्वर मस्तिष्क के स्वामी.इस्पात मंत्रालय में भी बहाली की गई.प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है.महनार में कहीं स्टील फक्ट्री का अता-पता नहीं लेकिन बहाली कर ली गई.बहाल हुए लोग क्या परती खेत में काम करेंगे?.वर्ष २००५ में उनके हाथों में सत्ता की चाबी भी आ गई जबकि उन्होंने अकेले चुनाव लड़ा था.कोई भी गठबंधन बिना उनकी सहायता के सरकार बनाने की स्थिति में नहीं था.दोनों पक्षों लालू और नीतीश उनके पास चाबी मांगने गए लेकिन वे टस-से-मस नहीं हुए.हाँ यह जरूर कहते रहे कि राजद को सत्ता से हटाने के लिए वे शैतान से भी हाथ मिलाने को तैयार हैं.यह उनकी जिद का ही परिणाम था कि मात्र ८ महीने बाद ही बिहार को फ़िर से विधानसभा चुनाव में जाना पड़ा.इस बार उनके हाथ से सत्ता की चाबी निकल गई.बिहार में राजग की सरकार बनते ही उन्हें फ़िर से लालू अच्छे लगने लगे.उन्होंने २००९ का लोकसभा का चुनाव लालू के साथ मिलकर लड़ा लेकिन बिहार की जनता उनके बार-बार पाला बदलने से परेशान हो गई थी.परिणाम यह हुआ कि उनकी पार्टी का सूपड़ा ही साफ हो गया और वे खुद भी हाजीपुर से हार गए.चुनाव हारने के बाद हाजीपुर के दौरे पर आए और जनता से पूछा कि उनसे कहाँ गलती हुई?श्रीमान जनता के फोन करने पर फोन पर आने की जहमत तक नहीं उठाते और अपनी गलती पूछ रहे हैं.मैंने कहा न कि नेताजी सत्ता के लिए ही बने हैं सो लालू जी के सौजन्य से राज्यसभा में पहुँच गए हैं.देखना है कि कब तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने का जुगाड़ होता है.फ़िर से बिहार विधानसभा के लिए रणभेरी बज चुकी है और नेताजी एक बार फ़िर लालू जी के साथ खड़े हैं.नेताजी की पार्टी भी अलबेली है.सारे महत्वपूर्ण पदों पर नेताजी और इनके भाई जमे हुए हैं.जो निर्णय नेताजी ने ले लिया सबके लिए वही आदेश है.विरोध का स्वर सुनाई देते ही विरोधी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है.यानी नेताजी की पार्टी तो भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा है लेकिन उनकी पार्टी में लोकतंत्र नहीं है.नेताजी खुद को अब भी दलित मानते हैं लेकिन उनके पास अकूत संपत्ति है.पहले फकीर जरूर थे अब राजाओं के लिए भी दुर्लभ ज़िन्दगी जीते हैं.फ़िर से सत्ता के लिए दांव लगा दिया है.बिहार में सत्ता हाथ लगी तो सबसे अच्छा वरना सोनिया जी का कृपापात्र होने का फायदा उठाते हुए केंद्र में शामिल हो लेंगे.सत्ता और उनमें अन्योनाश्रय सम्बन्ध जो ठहरा.वे सत्ता के लिए और सत्ता उनके लिए बने हैं और सत्ता दुनिया का सबसे बड़ा सत्य तो है ही.

ॐ जय बिजली माता

हम हिन्दीभाषी लोग भाषिक तौर पर बड़े उदारवादी हैं.किसी भी नए शब्द को तुरंत अपनी बोलचाल की भाषा में शामिल कर लेते हैं.अब बिजली को ही लें जो पिछली सदी की देन है, पर भी कई मुहावरे बन गए हैं.इनमें से कुछ को आपकी नजर करना चाहूँगा-जिस्म में बिजली दौड़ जाना,बात का बिजली की तरह फ़ैल जाना,बिजली का तार छू जाना आदि.मैं यहाँ यह स्पष्ट कर दूं मैं आसमानी बिजली की बात नहीं कर रहा हूँ यह बिजली तार में दौड़नेवाली बिजली है.बिहार में हमेशा से बिजली चुनावी मुद्दा रही है.अब भी है तभी तो नीतीश जी अगली पारी में बिहार में ३ बिजली संयंत्र बिठाने और राज्य से बिजली का रोना समाप्त करने का वादा कर रहे हैं.राम जाने हमारी सरकारों की नींद चुनाव के पहले ही क्यों टूटती है?पॉँच सालों में उनकों इंतजाम करने से किसने रोक रखा था?पिछले पॉँच सालों में तो शहरों में बिजली की स्थिति और भी ख़राब हो गई है.फिल्म मुगले आज़म में अकबर अनारकली को धमकी के स्वर में कहता है कि अनारकली सलीम तुम्हें मरने नहीं देगा और मैं तुम्हें जीने नहीं दूंगा.इन दिनों बिहार की जनता की भी यही हालत है.बिजली न तो उन्हें जीने नहीं देती और न ही मरने देती है.दिन में एकाध बार औपचारिकतावश आ ही जाती है.सरकार यह कह सकती है हमने गांवों में भी बिजली पहुंचाई.लेकिन मैं पूछता हूँ कि जब आपके पास अपने रिश्तेदारों को खिलाने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं हो तब पूरे गाँव को भोज पर आमंत्रित कर लेना कहाँ की बुद्धिमानी है?गांवों में सिंचाई के नाम पर भी अतिरिक्त बिजली दी जा रही है लेकिन गांवों में कितने लोगों ने विद्युत मोटर लगा रखा है.नगण्य.सरकारी नलकूपों में से तो अगरचे ज्यादातर बंद हैं और जिन्हें सरकार चालू बता रही है उनमें से भी शायद ही कोई चालू हो.जब आपके पास किसी चीज की कमी होती है तब आप किसी से मांग कर काम चला सकते हैं लेकिन कब तक?एक सीमा के बाद बनिया भी आपको उधार नहीं देगा.लेकिन हमारी सुशासन बाबू की सरकार ने पूरे पॉँच साल का समय यूं ही केंद्र से बिजली मांगे हुए गुजार दिए.जब केंद्र के पास खुद ही बिजली की कमी है तो वो क्यों बिहार को बिजली देने लगी.वैसे भी कोई भी व्यक्ति या सरकार पहले अपनी जरूरत का ध्यान रखेगा न कि दूसरों की जरूरत का.फ़िलहाल तो पूरे बिहार में बिजली को लेकर धरना-प्रदर्शन का दौर जारी है जब पर्याप्त बिजली आएगी तब आएगी.ये तो हुई बिहार में बिजली की कथा लेकिन बिना आरती के कोई भी कथा पूर्ण नहीं मानी जाती इसलिए आइये सारी मानवीय गतिविधियों के लिए आवश्यक बिजली माता की आरती कर लें-
ॐ जय बिजली माता,ॐ जय बिजली माता;
तुमको निशिदिन बुलावत,
हाजीपुर की जनता;
ॐ जय बिजली माता.
कई-कई दिन पर तुम आती,
शीघ्र चली जाती;
दिन में तुम तडपाती,
रातों में जगाती;
ॐ जय बिजली माता.
तुम बिन टी.वी. नहीं चलती,
कम्प्यूटर नहीं चलता;
वाशिंग मशीन,फ्रीज और मिक्स़र,
सब बेकार हो जाता;
ॐ जय बिजली माता.

शनिवार, 14 अगस्त 2010

हर तरफ रूदन बर्बादी है

हर तरफ रूदन बर्बादी है,
क्या इसी का नाम आज़ादी है?
देश कर रहा तीव्र विकास,
गरीबों का हो रहा विनाश;
उद्योगपति हैं मालामाल,
आम आदमी हुआ बेहाल;
नेता-पुलिस लूट रहे देश को
बदनाम खाकी-खादी है;
हर तरफ रूदन-बर्बादी है,
क्या इसी का नाम आज़ादी है?
सूचना मांगो गोली मिलती,
न्याय मांगो तो तारीख मिलती;
ग्राम-प्रधान शोषण कर रहा,
भाई-भतीजों का पोषण कर रहा;
राशन-किरासन ब्लैक हो रहा,
गोदामों में अनाज सड़ रहा;
सुरसा के मुंह की तरह तेजी से,
बढ़ रही आबादी है;
हर तरफ रूदन बर्बादी है,
क्या इसी का नाम आज़ादी है?
नक्सली आतंक फैला रहे,
आम जनता को डरा रहे;

जाति और धर्म का झगड़ा लगाकर,
नेता जनता को बरगला रहे;
महंगा हुआ जीना भारत में,
महंगी बेटी की शादी है;
हर तरफ रूदन बर्बादी है,
क्या इसी का नाम आज़ादी है?
देश को लूटने की आज़ादी,
कानून तोड़ने की आज़ादी;
कानून बनाने की आज़ादी,
घूस खाने की आज़ादी;
जनता को बाँटने की आज़ादी,
योजना बनाने की आज़ादी;
डंडा लहराने की आज़ादी;
हर तरफ माहौल-ए- आज़ादी,
हर किसी को हके आज़ादी है;
हर तरफ रूदन बर्बादी है,
क्या इसी का नाम आज़ादी है?

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

भारत नाम जहाज चढ़े सों कभी न उतरे पार


कवि सदियों से भारत का मानवीकरण करते रहे हैं पर हमें तो लीक से हटकर चलने की आदत है.हम भारतमाता के सपूत जो ठहरे और वो कहते हैं न कि लीके लीक गाड़ी चले लीके चले कपूत,लीक छाड़ी के तीन चले सिंह,शायर,सपूत.सो भारतमाता का सच्चा सपूत होने का काफी दमदार परिचय देते हुए हमने उनका जहाजीकरण कर दिया है.नहीं समझे?मेरे भाइयों और उन भाइयों की बहनों मैंने बीजगणित के प्रश्न की तरह मान लिया है कि भारतमाता एक जहाज हैं और दुनिया के समंदर में विचरण कर रही हैं.जहाज के कप्तान जनमोहन सिंह अपने सख्त सुरक्षावाले वातानुकूलित कक्ष में सोए हुए हैं.वह क्यों सोये हुए हैं यह भी बता दूंगा,धीरज तो रखिए.क्या कहा?नहीं रख सकते तो फ़िर इस देश में जन्म लेने की क्या जरूरत थी यहाँ तो १०० रूपये के लिए हुए मुकदमे का फैसला भी ५० सालों में आता है?जहाज घूम रहा है,घूम रहा है,गोल-गोल.एक विदेशी पत्रकार जो अभी-अभी जहाज पर आया था सारे परिदृश्य को देखकर हैरान-परेशान हो गया.सीधे जा धमका कप्तान को जगा ही तो दिया.कई बार जम्हाई लेने के बाद माननीय जनमोहन सिंह जी ने अपने लबे मुबारक खोलते हुए पूछा-क्यूं जगाया भाई?अगला चुनाव जीतने का कितना अच्छा सपना देख रहा था.पत्रकार ने पूछा-श्रीमान जहाज किसी किनारे की ओर क्यों नहीं बढ़ाते?जनता को गोल-गोल क्यों घुमा रहे हैं?कप्तान जी कमर के बगल में तकिया दबाते हुए कहा-क्यों ले जाऊं किनारे पर जब जनता गोल-गोल घूमकर ही मस्त है?मीनारे का मतलब है मंजिल और जब हम मंजिल पर पहुँच जाएँगे तब करने को क्या बचेगा और जब मेरे पास करने को कुछ नहीं बच तो जनता कप्तान नहीं बदल देगी?और अगर नहीं भी बदले तो रिस्क क्यों लें जब बिना रिस्क लिए ही सबकुछ गें हो जा रहा हो.पत्रकार महोदय ने दूसरा सवाल ठोंका-श्रीमान जहाज के अलग-अलग हिस्सों पर अलग-अलग लोग समानांतर सत्ता चला रहे हैं और आप सो रहे हैं.कप्तान जी ने चतुर सुजन की तरह मुस्कुराते हुए कहा-आपने कभी सत्ता के विकेंद्रीकरण का नाम सुना है तो भैया सत्ता का विकेंद्रीकरण और क्या है यही तो है.सबको थोड़ी-थोड़ी सत्ता दे दीजिये और निश्चिन्त रहिये.जितने अधिक क्षेत्र पर अपनी सत्ता नहीं रही चिंता उतनी ही कम होती गई.पत्रकार विस्मित था विद्वान कप्तान जी की मौलिक सोंच पर.उसने देखा कि माननीय की आँखें फ़िर से उनींदी हो रही हैं सो जल्दी बाजी में तीसरा सवाल पूछ लिए-महाशय जहाज की पेंदी को चूहे कुतर रहे हैं.आपको जहाज के डूबने का डर नहीं है?जनमोहन जी ने एक आँख को खोलते हुए जवाब दिया-भाई मेरे चूहे हैं तो उनका जो स्वाभाव है वही काम करेंगे न.यह देशरूपी जहाज बहुत मोटी तहवाला है डूबने में समय लगेगा.डूब भी जाए तो अपना क्या दूसरे कई जहाजों पाकर अपने रहने का उत्तम प्रबंध है.हेलीकाप्टर को भी डेक पर तैयार रखा है,निकल लेंगे. और कुछ पूछना है तुमको तो जल्दी पूछो मुझे बड़ी नींद आ रही है.पत्रकार ने एक क्षण की भी देरी नहीं करते हुए अंतिम सवाल पूछा-श्रीमान नीचे के तले पर लोग धर्म और जाति के नाम पर लड़ रहे हैं.क्या यह सब आपको अच्छा लग रहा है?कप्तान ने स्वर को धीमे करते हुए कहा-क्यों नहीं अच्छा लगेगा?हमने ही तो उन्हें लड़ाया है.आपस में ही उलझे नहीं रहेंगे तो जहाज की चिंता करने लगेंगे तब फ़िर हमें कौन कप्तान की कुर्सी पर रहने देगा?इस प्रश्न का उत्तर देते-देते धीरे-धीरे जनमोहन जी का स्वर पंचम से ऋषभ पर आ पहुंचा और नाक और गले से राग खर्राटा बजने लगा.पत्रकार ने भी डूबते जहाज से खिसक लेने में ही अपनी भलाई समझी और अपने देशवाले जहाज की ओर रवाना हो गया.

सोमवार, 9 अगस्त 2010

श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम,१९५५ और पत्रकार

मैंने दुनिया के आंसू पोछे,
मैंने हरी सबकी पीड़ा;
लेकिन रहा स्वयं उपेक्षित,
भूखा,नंगा,प्यासा कीड़ा.
ये पंक्तियाँ स्वयं मेरी हैं और मैंने इसे पत्रकारों की स्थिति को बयाँ करने के लिए लिखा है.कितने आश्चर्य की बात है,कितनी बड़ी बिडम्बना है कि समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए रहनुमा का काम करनेवाले पत्रकार खुद इतने उपेक्षित हैं कि उनकी ज़िन्दगी कीड़े-मकोड़े से भी गई-बीती है.ऐसा भी नहीं है कि सारे पत्रकारों की आर्थिक स्थिति ख़राब ही हो.ऊपर वाले पत्रकार मजे में हैं लेकिन उनकी ईज्जत मालिकों के सामने चपरासी जितनी ही है और अपने पदों पर बने रहने के लिए उन्हें लगातार मालिकों और प्रबंधन की चाटुकारिता करनी पड़ती है.ऐसा भी नहीं है कि पत्रकारों को शोषण से बचाने के लिए सरकार ने किसी तरह की व्यवस्था नहीं की है.१९५५ में संसद ने पत्रकारों की चिरकालीन मांग को मूर्त रूप देते हुए श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचार पत्र  कर्मचारी और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम,१९५५ पारित किया.इसका उद्देश्य समाचारपत्रों और संवाद समितियों में काम करनेवाले श्रमजीवी पत्रकारों तथा अन्य व्यक्तियों के लिए कतिपय सेवा-शर्तें निर्धारित व विनियमित करना था.इससे पहले अखबारी कर्मचारियों को श्रेणीबद्ध करने,कार्य के अधिकतम निर्धारित घंटों, छुट्टी,मजदूरी की दरों के निर्धारण और पुनरीक्षण करने,भविष्य-निधि और ग्रेच्युटी आदि के बारे में कोई निश्चित व्यवस्था नहीं थी.पत्रकारों को कानूनी तौर पर कोई आर्थिक व सेवारत सुरक्षा प्राप्त नहीं थी.इस कानून में समाज में पत्रकार के विशिष्ट कार्य और स्थान तथा उसकी गरिमा को मान्यता देते हुए संपादक और अन्य श्रमजीवी पत्रकारों के हित में कुछ विशेष प्रावधान किए गए हैं.इनके आधार पर उन्हें सामान्य श्रमिकों से,जो औद्योगिक सम्बन्ध अधिनियम,१९४७ से विनियमित होते हैं,कुछ अधिक लाभ मिलते हैं.पहले यह अधिनियम जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू नहीं था पर १९७० में इसका विस्तार वहां भी कर दिया गया.अतः अब यह सारे देश के पत्रकारों व अन्य समाचारपत्र-कर्मियों के सिलसिले में लागू है.श्रमजीवी पत्रकार की कानूनी परिभाषा पहली बार इस अधिनियम से ही की गई.इसके अनुसार श्रमजीवी पत्रकार वह है जिसका मुख्य व्यवसाय पत्रकारिता हो और वह किसी समाचारपत्र स्थापन में या उसके सम्बन्ध में पत्रकार की हैसियत से नौकरी करता हो.इसके अन्तर्गत संपादक,अग्रलेख-लेखक,समाचार-संपादक,उप-संपादक,फीचर लेखक,प्रकाशन-विवेचक (कॉपी टेस्टर),रिपोर्टर,संवाददाता (कौरेसपोंडेंट),व्यंग्य-चित्रकार (कार्टूनिस्ट),संचार फोटोग्राफर और प्रूफरीडर आते हैं.अदालतों के निर्णयों के अनुसार पत्रों में काल करनेवाले उर्दू-फारसी के कातिब,रेखा-चित्रकार और सन्दर्भ-सहायक भी श्रमजीवी पत्रकार हैं.कई पत्रों के लिए तथा अंशकालिक कार्य करनेवाला पत्रकार भी श्रमजीवी पत्रकार है यदि उसकी आजीविका का मुख्य साधन अर्थात उसका मुख्य व्यवसाय पत्रकारिता है.किन्तु,ऐसा कोई व्यक्ति जो मुख्य रूप से प्रबंध या प्रशासन का कार्य करता है या पर्यवेक्षकीय हैसियत से नियोजित होते हुए या तो अपने पद से जुड़े कार्यों की प्रकृति के कारण या अपने में निहित शक्तियों के कारण ऐसे कृत्यों का पालन करता है जो मुख्यतः प्रशासकीय प्रकृति के हैं,तो वह श्रमजीवी पत्रकार की परिभाषा में नहीं आता है.इस तरह एक संपादक श्रमजीवी पत्रकार है यदि वह मुख्यतः सम्पादकीय कार्य करता है और संपादक के रूप में नियोजित है.पर यदि वह सम्पादकीय कार्य कम और मुख्य रूप से प्रबंधकीय या प्रशासकीय कार्य करता है तो वह श्रमजीवी पत्रकार नहीं रह जाता है.लेकिन तृणमूल स्तर के अधिकतर पत्रकारों को नियोजक पत्रकार मानते ही नहीं वे नियुक्ति के समय ही कर्मी से लिखवा लेते हैं कि पत्रकारिता उनका मुख्य व्यवसाय नहीं है और उनका मुख्य व्यवसाय कोई दूसरा है.जब मैं पटना,हिंदुस्तान में काम करने गया था तब मुझे भी एक कागज हस्ताक्षर के लिए दिया गया जिस पर लिखा गया था कि पत्रकारिता मेरा मुख्य कार्य नहीं है.साथ ही उसमें यह भी भरना था कि मेरा मुख्य व्यवसाय क्या है.मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि इस कॉलम में क्या भरूँ.मैंने इस बारे में समाचार समन्वयक देवेन्द्र मिश्र जी से सलाह मांगी क्योंकि मेरा मुख्य पेशा पत्रकारिता ही था.उनके कहने पर मैंने इस कॉलम में टीचिंग भर दिया.हालांकि मैं जानता था कि मेरे साथ अन्याय किया जा रहा है लेकिन मैं मजबूर था जैसे सारे पत्रकार मजबूर होते हैं.मैं अपने कैरिअर की शुरुआत कर रहा था और इस स्थिति में नहीं था कि विरोध कर सकूं.श्रमजीवी पत्रकार होते हुए भी मैं जबरन इसकी परिभाषा से बाहर कर दिया गया और खून के घूँट पीकर रह गया.यहाँ मैं यह भी बताता चलूँ कि अधिनियम की धारा ३ (१) से श्रमजीवी पत्रकारों के सम्बन्ध में वे सब उपबंध लागू किये गए हैं जो औद्योगिक विकास अधिनियम,१९४७ में कर्मकारों (वर्कमैन)पर लागू होते हैं.किन्तु,धारा ३ (२) के जरिये पत्रकारों की छंटनी के विषय में यह सुधार कर दिया गया है कि छंटनी के लिए संपादक को छह मास की और अन्य श्रमजीवी पत्रकारों को तीन मास की सूचना देनी होगी.संपादकों और अन्य श्रमजीवी पत्रकारों को इस सुधार के साथ-साथ वह सभी अधिकार और विशेषाधिकार प्राप्त है जो औद्योगिक विकास कानून के अन्तर्गत अन्य कर्मकारों को सुलभ है.इतना ही नहीं पत्रकारों को ग्रेच्युटी की अदायगी के बारे में भी श्रमजीवी पत्रकार कानून में विशेष उपबंध किये गए हैं.धारा 5 में यह प्रावधान है कि किसी समाचारपत्र में लगातार तीन वर्ष तक कार्य करनेवाले श्रमजीवी पत्रकारों को,अनुशासन की कार्रवाई के तौर पर दिए गए दंड को छोड़कर,किसी कारण से की गई छंटनी पर या सेवानिवृत्ति की आयु  हो जाने पर उसके सेवानिवृत्त होने पर,या सेवाकाल के दौरान मृत्यु हो जाने पर,या दस वर्ष तक नौकरी के बाद किसी कारणवश स्वेच्छा से इस्तीफा देने पर,उसे मालिक द्वारा सेवाकाल के हर पूरे किए वर्ष या उसके छह मास से अधिक के किसी भाग पर,१५ दिन के औसत वेतन के बराबर धनराशि दी जाएगी.स्वेच्छा से इस्तीफा देने वाले श्रमजीवी पत्रकार को अधिकाधिक साढ़े १२ मास के औसत वेतन के बराबर ग्रेच्युटी मिलेगी.यदि कोई श्रमजीवी पत्रकार कम-से-कम तीन वर्ष की सेवा के बाद अंतःकरण की आवाज के आधार पर इस्तीफा देता है तो उसे भी इसी हिसाब से ग्रेच्युटी दी जाएगी.जहाँ तक काम और विश्राम का सवाल है तो इस अधिनियम के अन्तर्गत बनाए गए नियमों के अध्याधीन रहते हुए लगातार चार सप्ताहों की किसी अवधि के दौरान,भोजन के समयों को छोड़कर, १४४ घंटों से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता है,न ही उसे इससे अधिक समय तक काम करने की अनुमति दी जा सकती है.हर श्रमजीवी पत्रकार को लगातार सात दिन की अवधि के दौरान कम-से-कम लगातार २४ घंटों का विश्राम दिया जाना चाहिए.सप्ताह को शनिवार की मध्य रात्रि से आरम्भ समझा जाता है (धारा ६).श्रमजीवी पत्रकारों के लिए २ प्रकारों की छुट्टियों-उपार्जित छुट्टी और चिकित्सा छुट्टी-का स्पष्ट प्रावधान किया गया है.शेष छुट्टियों के सम्बन्ध में नियम बनाने का उपबंध है.उपार्जित छुट्टी काम पर व्यतीत अवधि की १/११ से कम नहीं होगी और यह पूरी तनख्वाह पर मिलेगी.चिकित्सा प्रमाण-पत्र पर चिकित्सा छुट्टियाँ कार्य पर व्यतीत अवधि की १/१८ से कम नहीं होंगी.यह आधी तनख्वाह पर दी जाएगी.इसका अर्थ मोटे तौर पर यह है कि श्रमजीवी पत्रकार को वर्ष में एक मास की उपार्जित छुट्टी और चिकित्सा प्रमाणपत्र के आधार पर आधी तनख्वाह पर चार सप्ताह की छुट्टी दी जानी चाहिए (धारा ७).काम के घंटों का प्रावधान संपादकों पर लागू नहीं होता.संवाददाताओं,रिपोर्टरों और फोटोग्राफरों को किसी दिन काम शुरू करने के बाद उस समय तक समझा जाएगा जब तक वह उसे पूरा नहीं कर लेते.किन्तु,यदि उनसे पूरे सप्ताह में एक या अधिक बार हीं घन्टे या उससे अधिक का विश्राम देकर इसकी क्षति-पूर्ति करनी होगी.अन्य श्रमजीवी पत्रकारों के लिए सामान्य कार्य-दिवस में दिन की पारी में छह घन्टे और रात की पारी में साढ़े पॉँच घन्टे से ज्यादा समय का नहीं होगा.रात को ११ बजे से सुबह ५ बजे के समय को रात्रि की पारी में माना जाएगा.दिन की पारी में लगातार चार घन्टे के काम के बाद एक घन्टे का और रात्रि की पारी में लगातार तीन घन्टे के कार्य के उपरांत आधे घन्टे विश्राम दिया जाना चाहिए.श्रमजीवी पत्रकार को लगातार दूसरे सप्ताह में रात्रि पारी में काम करने को नहीं कहा जा सकता है.उसे १४ दिनों में एक सप्ताह से ज्यादा रात्रि की पारी में नहीं लगाया जा सकता है.साथ ही एक रात्रि पारी से दूसरी रात्रि पारी में बदले जाने के बीच चौबीस घन्टे का अन्तराल होना चाहिए.दिन की एक पारी से दूसरी पारी में बदले जाने के समय यह अन्तराल १२ घन्टे का होना चाहिए.श्रमजीवी पत्रकार वर्ष में १० सामान्य छुट्टियों का अधिकारी है.यदि वह छुट्टी के दिन काम करता है तो उसे इसकी पूर्ति किसी ऐसे दिन छुट्टी देकर करनी होगी जिस पर नियोजक और पत्रकार दोनों सहमत हों.छुट्टियों और साप्ताहिक अवकाश की मजदूरी श्रमजीवी पत्रकारों को दी जाएगी.काम पर गुजरे ११ मास पर एक मास उपार्जित छुट्टी दी जाएगी.किन्तु,९० उपार्जित छुट्टियाँ एकत्र हो जाने के बाद और छुट्टियाँ उपार्जित नहीं मानी जाएगी.सामान्य छुट्टियों,आकस्मिक छुट्टियों और टीका छुट्टी की अवधि को काम पर व्यतीत अवधि माना जाएगा.प्रत्येक १८ मास की अवधि में एक मास की छुट्टी चिकित्सक के प्रमाण-पत्र पर दी जाएगी.यह छुट्टी आधे वेतन पर होगी.ऐसी महिला श्रमजीवी पत्रकारों को,जिनको सेवा एक वर्ष से अधिक का हो,तीन मास तक की प्रसूति छुट्टी दी जाएगी.यह छुट्टी गर्भपात होने पर भी सुलभ की जाएगी.इसके अलावा नियोजक की ईच्छा पर वर्ष में १५ दिन की आकस्मिक छुट्टी दी जाएगी.नियम ३८ में यह व्यवस्था की गई है कि यदि किसी अन्य नियम,समझौते या अनुबंध का कोई भाग श्रमजीवी पत्रकारों के लिए इन नियमों से अधिक लाभकारी हो तो उन पर वह लागू होगा.ऐसा कोई नियम श्रमजीवी पत्रकारों पर लागू नहीं किया जाएगा जो इन नियमों से कम फायदेमंद हो.लेकिन असलियत एकदम अलग है.खुद मुझे हिंदुस्तान,पटना में नौकरी के आरंभिक ३ महीने तक एक भी दिन छुट्टी नहीं दी गई और कहा जाता रहा कि अभी छुट्टी के दिन का निर्धारण नहीं हो पाया है.हालांकि बाद में इसके बदले मुझे अलग से छुट्टी दे दी गई.इतना ही नहीं मुझे एक दिन की भी उपार्जित या चिकित्सकीय छुट्टी नहीं दी गई.हमें चाहे हमारी ड्यूटी रात की शिफ्ट में हो या दिन की शिफ्ट में हो प्रतिदिन कम-से-कम ८ घन्टे काम करना पड़ता था.कई जगहों पर पत्रकारों से लगातार महीनों तक रात की शिफ्ट में काम कराया जाता है चाहे इसका उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर ही क्यों न पड़े.इस अधिनियम का एक महत्वपूर्ण उपबंध श्रमजीवी पत्रकारों के लिए मजदूरी की दरें नीयत करने की शक्ति केंद्रीय सरकार में निहित करने के विषय में है.धारा ८ (१) में उपबंधित किया गया है कि केंद्रीय सरकार एक निर्धारित रीति से श्रमजीवी पत्रकारों और अन्य समाचारपत्र-कर्मचारियों के लिए मजदूरी की दरें नियत कर सकेगी और धारा ८ (२) में कहा गया है कि मजदूरी कि दरों को वह ऐसे अंतरालों पर,जैसा वह ठीक समझे,समय-समय पर पुनरीक्षित कर सकेगी.दरों का निर्धारण और पुनरीक्षण कालानुपाती (टाइम वर्क) और मात्रानुपाती (पीस वर्क) दोनों प्रकार के कामों के लिए किया जा सकेगा.पर,यह व्यवस्था भी की गई है कि सरकार वेतन दरों का निर्धारण मनमाने तौर पर न करे.इसलिए धारा ९ में एक मजदूरी बोर्ड के गठन का प्रावधान किया गया है.बोर्ड की सिफफिशों पर विचार करके ही मजदूरी की दरें नियत की जा सकती है.बोर्ड में अध्यक्ष समेत ७ सदस्य नियुक्त किये जाते हैं.किसी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय का विद्यमान या भूतपूर्व न्यायधीश ही इसका अध्यक्ष हो सकता है.अन्य सदस्यों में समाचारपत्रों के नियोजकों और श्रमजीवी पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करनेवाले २-२ व्यक्ति और २ स्वतंत्र व्यक्ति होते हैं.मजदूरी बोर्ड समाचारपत्रों-स्थापनों,श्रमजीवी पत्रकारों,गैर-पत्रकार समाचारपत्र-कर्मचारियों तथा इस विषय में हितबद्ध अन्य व्यक्तियों से अभ्यावेदन आमंत्रित करता है.बोर्ड अभ्यावेदनों पर विचार करके तथा अपने समक्ष रखी गई सारी सामग्री की परीक्षा करके अपनी सिफारिशें केंद्रीय सरकार से करता है.इसके बाद केंद्रीय सरकार का काम है कि वह सिफारिशें प्राप्त होने के उपरांत,जहाँ तक हो सके,शीघ्र मजदूरी की दरें नीयत या पुनरीक्षित करने सम्बन्धी आदेश जारी करे.यह आदेश बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार या उसमें ऐसे किसी फेरबदल के साथ,जिसे वह उचित समझे,जारी किया जा सकता है.किन्तु,फेरबदल ऐसा नहीं होना चाहिए जो बोर्ड की सिफारिशों के स्वरुप में महत्वपूर्ण परिवर्तन कर दे.सिफारिशों को लागू करनवाला केन्द्रीय सरकार का प्रत्येक आदेश राजपत्र में प्रकाशित होने की तारीख़ या आदेश में विनिर्दिष्ट किसी अन्य तारीख से अमल में आता है.केंद्रीय सरकार के आदेश के प्रभाव में आ जाने पर,प्रत्येक श्रमजीवी पत्रकार और गैर-पत्रकार समाचारपत्र-कर्मचारी इस बात का हकदार हो जाता है कि उसे उसके नियोजन द्वारा उस दर पर मजदूरी दी जाए जो आदेश विनिर्दिष्ट मजदूरी की  दर से किसी दशा में कम न हो (धारा १३).इस अधिनियम का उल्लंघन करनेवाले नियोजक को अधिकतम ५०० रूपये के जुर्माने का प्रावधान है जो एकदम मामूली है.लेकिन वास्तव में होता क्या है पहले ही प्रत्येक कर्मी से नियुक्ति के समय एग्रीमेंट भरवाया जाता है जिससे वह नियोजक रहमो-करम पर काम करने के लिए बाध्य हो जाता है जिस तरह खुद मेरे साथ किया गया.उसे कभी भी बिना नोटिस के निकाल-बाहर कर दिया जाता है.अगरचे तो वह कोर्ट का रूख करता ही नहीं और अगर करता भी है तो कानून के दांव-पेंच में उलझकर रह जाता है.इस प्रकार हमने देखा कि दुनियाभर दुखी-दीनों का ख्याल रखनेवाले पत्रकारों की खुद  की दशा ही दयनीय है और उनकी कोई सुध लेनेवाला नहीं है.ग्रामीण क्षेत्रों के रिपोर्टरों को तो पंक्ति के आधार पर पैसे दिए जाते हैं.उनकी रक्षा के लिए कानून बना दिए गए हैं लेकिन उनका पालन नहीं किया जाता.हालांकि इनके कई संगठन भी हैं लेकिन उनके नेता भी सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं.जाने कब स्थितियां बदलेंगी और पत्रकार भी सम्मान के साथ ज़िन्दगी जी सकेंगे,जाने कब??

शनिवार, 7 अगस्त 2010

अन्धविश्वास बढाती इलेक्ट्रौनिक मीडिया

जब १९२० के दशक में टेलीविजन का अविष्कार हुआ तब पूरी दुनिया आश्चर्यचकित रह गई.हजारों साल पहले महाभारत में वेद व्यास ने संजय के माध्यम से जो कल्पना की थी वह यथार्थ में बदल गया था.पूरी दुनिया विज्ञान के इस कौतुक पर मुग्ध हो उठी.माना गया कि टेलीविजन के माध्यम से साक्षरता और वैज्ञानिकता का प्रसार होगा और अन्धविश्वास दूर होगा.जब तक भारत में सिर्फ सरकारी इलेक्ट्रौनिक माध्यम मौजूद थी तब तक तो संचार का यह सबके शक्तिशाली माध्यम सचमुच अंधविश्वासों से जूझता हुआ देखा गया लेकिन जैसे ही निजी प्रसारकों को अनुमति दी गई धीरे-धीरे स्थितियां बदलने लगीं.उन्हें लगा बाजारीकरण के इस दौर में लोगों के मन में घुसे अंधविश्वासों को बेचकर भी पैसा कमाया जा सकता है और वे भूल गए कि उनके कन्धों पर कुछ सामाजिक जिम्मेदारियां भी हैं.वे बजाये अंधविश्वासों को कम करने वाले कार्यक्रमों को प्रसारित करने के इसे बढ़ावा देनेवाले कार्यक्रम दिखाने लगे.धीरे-धीरे इन कार्यक्रमों की रेटिंग बढ़ने के साथ-साथ ऐसे कार्यक्रमों की संख्या भी बढती गई.आज लगभग सारे निजी चैनलों पर अन्धविश्वास को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम प्रसारित किये जा रहे हैं.कुछ चैनलों ने इसके लिए विशेष रूप से तांत्रिक टाइप लोगों को नियुक्त कर रखा है.उदाहरण के लिए इंडिया टी.वी. पर राशिफल बताने का जिम्मा एक डरावने दिखने वाले बाबा का है जो राशिफल कम बताते हैं,डराते ज्यादा हैं.उनका बस चले तो वे पूरे भारत को शनि निवारक जंतर धारण करा दें.अन्य कई चैनलों ने भी इस तरह के बाबाओं को जनता को डराने का जिम्मा दे रखा है.किसी चैनल पर गणेशजी के नाम पर गणेश उवाच कह कर भविष्यवाणी की जा रही है तो किसी पर शनि देवता के नाम पर.हम सभी जानते हैं कि किसी मानव के भविष्य में क्या होनेवाला है बता पाना पूरी तरह से असंभव है,फ़िर क्यों टी.वी. चैनल घंटों तक राशिफल दिखा रहे हैं?लगभग सभी चैनलों पर ज्योतिषियों को दर्शकों की समस्याओं का निवारण करने के लिए बुलाया जाता है.लोग अपनी जन्मतिथि और समय बताते हैं और बाबाजी ग्रहदशा दोषपूर्ण बता कर कई तरह के रत्न धारण करने की सलाह देते हैं.क्या कनेक्शन है धरती पर बैठे-बैठे दूर अन्तरिक्ष में स्थित ग्रहों की स्थिति बदली जा रही है.इतना ही नहीं लगभग सभी निजी चैनलों पर दर्शकों को बुरी नज़रों के संभावित दुष्परिणाम दिखा कर नज़र रक्षा कवच खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.कितनी अवैज्ञानिक और वेबकूफाना बात है ये!बुरी नज़रों से आपका स्वास्थ्य और व्यवसाय प्रभावित हो सकता है.अभिमंत्रित नज़र रक्षा कवच पहनते ही आप सुरक्षित हो जायेंगे.इसके साथ-साथ भगवान शिव और हनुमान जी के वीडियो दिखाकर शिवरक्षा कवच और हनुमत रक्षा कवच खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.इस तरह के कवचों का कोई वैज्ञानिक और तार्किक आधार नहीं है और इन्हें बेचने की कोशिशों को सिर्फ ठगी का नाम ही दिया जा सकता है.लेकिन लालच में आपादमस्तक डूबे इन निजी चैनल वालों को न तो समाज से ही कुछ लेना-देना है और न ही दर्शकों की भलाई से.उन्हें तो बस ऊंची टी.आर.पी. रेटिंग चाहिए और पैसा चाहिए चाहे इसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े.लेकिन सरकार तो जनहित से तटस्थ नहीं रह सकती उसे तो इस तरह के जनविरोधी कार्यक्रमों पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने ही चाहिए.

बुधवार, 4 अगस्त 2010

अधिकार चाहिए तो कर्त्तव्य पालन करना सीखिए


पश्चिमी देशों और भारत में सबसे बड़ा अंतर क्या है?रहन-सहन के स्तर में या आधरभूत संरचना के क्षेत्र में तो अंतर है ही लेकिन यह सबसे बड़ा अंतर हरगिज़ नहीं है.इन दोनों सभ्यताओं में सबसे बड़ा अंतर यह है कि पश्चिम के लोग समाज या राष्ट्र से अपना अधिकार मांगने से पहले कर्त्तव्यपालन सुनिश्चित करते हैं और हम भारतीयों के शब्दकोष में कर्तव्यपालन शब्द है ही नहीं.जबकि बिना कर्त्तव्य पालन के अधिकारों की बातें करना ही अनैतिक है.जीवन के किसी भी क्षेत्र में आप रोजाना देखते होंगे कि लोग बात-बेबात पर अपने अधिकारों की बात करते हैं लेकिन जब त्याग करने या कष्ट सहने की बात आती है तब दुम दबा लेते हैं.अभी चार दिन पहले की बात है मैं अपनी माँ के साथ पटना जा रहा था.बस में चढ़ने गया तो पाया कि महिलाओं के लिए आरक्षित सभी सीटों पर पुरुष काबिज हैं.कई तो युवा भी थे.मैनें जब देखा कि उनमें से कोई खुद से सीट छोड़ने की जहमत  नहीं उठा रहा है तो मैंने उनसे ऐसा करने का अनुरोध किया.उन सभी ने एक ही जवाब दिया कि चूंकि वे पहले से सीट पर बैठे हुए हैं इसलिए बैठकर यात्रा करने का पहला अधिकार उनका बनता है.मैंने कन्डक्टर से बात की तो उसने भी यही जवाब दिया.मैंने उससे कहा भी कि सरकारी कानून के अनुसार आरक्षित सीटों पर बैठने और महिलाओं के लिए नहीं छोड़ने पर सजा भी हो सकती है लेकिन उनलोगों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी.अंत में हम बस से उतर गए और ऑटो से पटना गए.कई बार मैंने पाया है कि लोग रेलगाड़ी में बेटिकट यात्रा करते हैं और सीट के लिए मार-पीट तक पर उतारू हो जाते हैं.लोग सड़कों पर कूड़ा फेंक देते हैं और सफाई नहीं होने के लिए सरकार को दोषी ठहराते हैं.संविधान के भाग ४ क में बजाप्ता नागरिकों के मूल कर्तव्यों का वर्णन किया गया है.इसमें संविधान और स्वतंत्रता आन्दोलन के उच्चादर्शों के पालन की बात की गई है.साथ ही भारत की एकता और अखंडता की रक्षा, भ्रातृत्व की भावना का प्रसार करने,पर्यावरण की रक्षा,वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने,सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करने को भी मूल कर्तव्यों में शामिल किया गया है.हमें क्या करना है सब शीशे की साफ़ कर दिया गया है.लेकिन हम करते क्या हैं?दिल्ली में रहनेवाले नेताओं से लेकर दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों में रहनेवाले किसानों तक कोई इन कर्तव्यों पर ध्यान नहीं देता.सड़कों को गन्दा करना,बिना टिकट रेलयात्रा करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.सरकार से जब भी हमें विरोध जाताना होता है तब हमारा पहला निशाना बनाती है सार्वजनिक संपत्ति.वैज्ञानिक दृष्टिकोण की जो हालत है वो खाप पंचायतों के फैसलों और मुस्लिम धर्माधिकारियों के फतवों से खुद ही जाहिर है.संविधान अब एक पवित्र संहिता नहीं बेकार की कानूनी किताब मात्र रह गई है.पैसा हमारा भगवान है और हम सब भ्रष्टाचार में लीन हैं इसलिए स्वतंत्रता आन्दोलन के आदर्शों की तो चर्चा करना ही बेकार है.जाहिर है कि संविधान का भाग ४क जनता के लिए सबसे बेकार भाग है वहीँ भाग ३ जिसमें मूल अधिकारों की बात की गई है सबसे महत्वपूर्ण.यहाँ तक कि संविधान विशेषज्ञों ने भी संविधान के इस अध्याय को उपेक्षा के लायक ही समझा है.विश्वास नहीं तो इनकी लिखी किताबें देखिये.अब आप ही बताईये कि हम खुद तो कर्तव्यों का पालन नहीं करें और साथ ही यह उम्मीद रखें कि देश की हालत भी अच्छी हो जाए कहाँ तक नैतिक है.ट्रेन में बोगियां कम क्यों हैं और भीड़ क्यों हैं को लेकर हम भले ही चिंतित हों लेकिन टैक्स चोरी तो करेंगे ही.हम सभी भारतीयों की यह आदत है कि हम अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी दूसरों पर डाल देते हैं.सरकारी कार्यालयों में सर्वत्र काहिली का वातावरण है.जब हर कोई ऐसा ही करेगा तो देश में व्यवस्था आएगी कहाँ से?वह आयात करने की वस्तु तो है नहीं. कहना न होगा अगर हम सिर्फ संविधान में वर्णित मूल कर्तव्यों का पालन करना शुरू कर दें तो भारत का तत्क्षण कायाकल्प हो जाए और तब हमें विश्व के सबसे विकसित और शक्तिशाली राष्ट्र बनाने से कोई नहीं रोक सकेगा.

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रहने की विवशता


वे शरणार्थी हैं वो भी अपने ही देश में.ऐसा नहीं है कि वे शौक से शरणार्थी बने हुए हैं लेकिन वे कुछ कर भी नहीं सकते;वे निरुपाय हैं.१९९० में उन्हें कश्मीर घाटी के मुसलमान पड़ोसी ग्रामीणों ने बन्दूक के बल पर खदेड़ दिया.रातों-रात उनकी दुनिया उजाड़ गई.आँखों में आंसू भरे गोद में अबोध बच्चे-बच्चियों को उठाये वे अपने घरों से कदम-दर-कदम दूर होते गए.फासला बढ़ता गया और इतना बढ़ गया कि आज दो दशक बीत जाने के बाद भी वे इस दूरी को पाट नहीं पाए हैं.अचानक उनके सदियों से पड़ोसी रहे मुसलमान उनकी जान के दुश्मन हो गए,क्यों???जब यह सब हो रहा था तब भी वक़्त के कतरों ने उन मनहूस लम्हों से यह प्रश्न पूछा था लेकिन इसका जवाब न तो उन लम्हों के पास था और न ही २० साल के युग समान लम्बे कालखंड के पास.सरकार ने उनके रहने की अस्थाई व्यवस्था करके अपने कर्त्तव्य पूरे कर लिए.उन्ही छोटे कमरों में १०-१० लोगों का परिवार सोता है पिछले २० साल से.उन्हें सरकार से इससे ज्यादा की उम्मीद भी नहीं थी क्योंकि वे बहुसंख्यक हिन्दू वर्ग से आते थे और उनका कोई बड़ा वोटबैंक भी नहीं था जो सियासतदानों का तख्ता पलट सकता.वोट बैंक तो उनका था जो कथित रूप से अल्पसंख्यक थे.इसलिए सरकार पीडकों के पीछे खड़ी रही,पीड़ित चीखते-चिल्लाते गला बैठाते रहे.सन २००२ तक मैं इन कश्मीरी पंडितों की कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में पढता रहा.मैं जब आई.ए.एस. की तैयारी के लिए दिल्ली गया तब मेरे लॉज में बगल के कमरे में एक कश्मीरी पंडित युवक रहता था.बला का खूबसूरत.नाम था अश्विनी कॉल.बड़ा ही हंसमुख और मस्त.कश्मीर उसके खून में था.जब हम जाड़े में कांपते रहते वो घंटों ठन्डे पानी से नहाता.दिल्ली में रहकर भी वो कश्मीर में रहता.१९९० में वह दस साल का था जब सपरिवार उसे घर छोड़कर स्याह अँधेरी रात में पुलिस संगीनों के साये में भागना पड़ा था.उनलोगों ने जम्मू में पड़ाव डाला जहाँ उसके पिता पहले से ही कॉलेज में काम करते थे.वह कभी उदास नहीं होता सिवाय तब के जब मैं उससे कश्मीर के उसके घर और गाँव के बारे में पूछ लेता.वह डबडबाई आँखों से उन हालातों को बयाँ करता जिन हालातों में उन्हें घर छोड़ना पड़ा था.उसे और उसके परिवार को घर छोड़ते समय उम्मीद थी कि साल-दो-साल में ही स्थितियां सुधार जाएंगी और वे लोग फ़िर से अपनी धरती-अपने गाँव में रहने लगेंगे.लेकिन ऐसा नहीं हुआ.नहीं हो सका या जानबूझकर नहीं होने दिया गया अश्विनी नहीं जानता था.लेकिन उन्हीं कश्मीरी पंडितों में से कुछ ऐसे परिवार भी थे जिनके पास अश्विनी की तरह कमाई का कोई जरिया नहीं था.दो कश्मीरी लड़कियां,दो छोटे-छोटे लड़कों को लेकर हर महीने मेरे घंटाघर वाले निवास पर दस्तक देतीं.तब तक अश्विनी दिल्ली छोड़ चुका था और मैं भी डेरा बदल चुका था.फूल जैसे चेहरे लेकिन मुरझाये हुए.कभी कहतीं दो दिनों से तो कभी कहतीं चार दिनों से घर में चूल्हा नहीं जला है.मैं तब विद्यार्थी था और अन्य विद्यार्थियों की तरह पूरी तरह से माता-पिता पर निर्भर था.फ़िर भी अपने खर्च में से १०० रूपये निकलकर दे देता.मन आक्रोशित हो उठाता और मन खुद से ही सवाल करने लगता क्या ये लोग अब कभी अपने घर नहीं लौट पाएंगे?क्या दोष है इनका??इन्होंने कौन-सी गलती की है जिसकी उन्हें सजा मिल रही है???क्या इनकी यही गलती नहीं है कि इन्होंने एक हिन्दूबहुल देश में हिन्दू धर्मं में जन्म लिया????

कभी नाव पे गाड़ी कभी गाड़ी पे नाव

हमारे बिहार में एक कहावत खूब प्रचलित है कभी नाव पे गाड़ी कभी गाड़ी पे नाव.दुनिया में सारे रिश्ते समय से बंधे हुए हैं और समय कब किस ओर करवट ले उसके सिवा कोई नहीं जानता.अभी ६३ साल ही तो बीते हैं जब भारत इंग्लैंड का गुलाम था.हमारे लाखों जवानों ने शहादत दी तब जाकर अंग्रेज भारत छोड़कर भागे.तब भारत अंग्रेजों के लिए असभ्यों का देश था और इसे सभ्य बनाने को वे व्हाइट मेंस बर्डेन मानते थे.जब अँगरेज़ भारत को छोड़कर गए तो हमारे यहाँ उद्योग के नाम पर चंद सूती कपडा,जूट और चीनी बनाने की फैक्ट्रियों के सिवा कुछ भी नहीं था.सूई से लेकर हवाई जहाज तक इंग्लैंड से आता था.हमने कठिन परिश्रम किया और आज हम दुनिया की दूसरी सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था हैं.इंग्लैंड सहित सारे पूंजीवादी देश आज आर्थिक दिवालियेपन के कगार पर खड़े है और उनके लिए उम्मीद की बस दो ही किरणें दुनिया में बची हैं जो उन्हें इस अभूतपूर्व संकट से उबार सकती है और उनमें से एक तो चीन है और दूसरा है अपना प्यारा देश भारत.अभी भारत पर दो सौ सालों तक शासन करने वाले इंग्लैंड के कंजर्वेटिव प्रधानमंत्री डेविड कैमरून भारत की यात्रा पर हैं.उनकी यात्रा का मुख्य उद्देश्य है भारत के साठ हॉक प्रशिक्षण विमान खरीद सहित ऐसे व्यापारिक समझौते करना जिससे इंग्लैंड की दम तोड़ती अर्थव्यवस्था को ताकत मिले.शायद इसलिए इस बार उनकी भाषा बदली हुई है.उन्होंने पाकिस्तान को स्पष्ट शब्दों में आतंकवाद के मोर्चे पर दोहरी नीति रखने से बाज़ आने को कहा है.बड़े ही आश्चर्य की बात है कि इंग्लैंड का प्रधानमंत्री वो भी कंजर्वेटिव भारत के पक्ष में बातें करें.वो भी इतने स्पष्ट रूप से जितनी स्पष्टता से शायद लेबर प्रधानमंत्री भी नहीं करता.गांधी जी अंग्रेजों की मानसिकता को तभी समझ गए थे.तभी तो उन्होंने कहा था कि इंग्लैंड बनियों का देश है कमोबेश आज भी उसका वही हाल है.अभी भारत से फायदा लेना है तो भारत के पक्ष में बोल रहा है.कल किसी और के पक्ष में बोलेगा.लोकतंत्र का प्रसार वगैरह सिर्फ किताबी बातें हैं असली चीज तो है आर्थिक लाभ.इसलिए भारत को इन पश्चिमी देशों को लेकर किसी मुगालते में नहीं रहना चाहिए.वैसे भी चाहे वो घरेलू राजनीति हो या वैश्विक राजनीति,राजनीति में न तो कोई किसी का स्थाई मित्र होता है और न ही स्थाई शत्रु.अतः भारत को अपनी मजबूत स्थिति का लाभ उठाने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए और दुनिया के किसी भी देश के साथ किसी भी तरह का समझौता अपनी शर्तों पर करना चाहिए.दुनिया में जिस तरह के हालात हैं उससे अब इस मामले में कोई संदेह नहीं रह गया है कि दुनिया की अगली महाशक्ति चीन बनाने वाला है और चीन पहले से ही हमसे शत्रुता पाले हुए है इसलिए भी हमें प्रत्येक कदम सोंच-समझकर उठाना चाहिए.

सोमवार, 26 जुलाई 2010

गांधी तेरे देश में

गांधी तेरे देश में,
घूम रहे आज हर जगह
डाकू संत के वेश में;
गांधी तेरे देश में.
खुल रही नई दुकानें
शराब की हर रोज यहाँ,
बढती है आमदनी इससे
बनी सरकारी सोंच यहाँ;
दौड़ रहा मानव
बेतहाशा पैसे की रेस में;
गांधी तेरे देश में.
हो रहा है रोज घोटाला,
भूमिचोरी,फर्जीवाड़े से केवाला;
मुश्किल हुआ निकलना घर से,
छोड़ रही पढाई ललनाएं
बलात्कारियों के डर से;
रो रही हैं भारतमाता
टूटे गृह अवशेष में;
गांधी तेरे देश में.
थाना बना बथाना
मंदिर बना दुकान,
दफ्तर दक्जनी का अड्डा
अस्पताल श्मशान;
लूट रहे लुटेरे जनता को
अफसर-डाक्टर के वेश में;
गांधी तेरे देश में.
लड़ रही जनता आपस में
हुआ विखंडित आज समाज,
रो रही अहिंसा उपेक्षित
कहाँ है तुम्हारा रामराज;
धनलोलुप बैठे हैं कुंडली मारे
पत्रिकाओं और प्रेस में;
गांधी तेरे देश में.
न्याय का मंदिर
दुकान बन गया,
भ्रष्टाचार इसकी पहचान बन गया;
खून करना शान बन गया
अपशब्द पुलिसिया जबान बन गया;
जाने क्या ईन्सान बन गया;
ले-देकर हो रहा है निर्णय
हर मुकदमा हर केस में;
गांधी तेरे देश में.

रविवार, 25 जुलाई 2010

पतन की ओर अग्रसर भारतीय कृषि

कृषि खेती और वानिकी के माध्यम से खाद्य पदार्थों के उत्पादन से सम्बंधित है.मानव सभ्यता के इतिहास में कृषि की खोज को इतना महत्वपूर्ण माना जाता है कि इसे नवपाषाणकालीन क्रांति भी कहा जाता है.यह कृषि ही थी जो पूरी दुनिया में विभिन्न सभ्यताओं के जन्म लेने का कारण बनी.यह शुरू से ही पशुपालन से कुछ इस तरह जुड़ी रही है कि दोनों को एक-दूसरे का पूरक भी कहा जा सकता है.कृषि ने ही घनी आबादी वाली बस्तियों और स्तरीकृत समाज को संभव बनाया.कृषि योग्य भूमि पर फसलों को उगाना और चरागाहों में पशुओं को चराना कृषि के प्रमुख क्षेत्र रहे हैं.कृषि के विभिन्न रूपों की पहचान करना और उत्पादन में मात्रात्मक वृद्धि शुरुआत से ही किसानों के बीच विचार के प्रमुख मुद्दे रहे हैं.२००७ में दुनिया के लगभग एक-तिहाई श्रमिक कृषि क्षेत्र में कार्यरत थे.हालांकि औद्योगिकीकरण के प्रारंभ के बाद से ही कृषि का अर्थव्यवस्था में कम होता गया है और २००३ में दुनिया के इतिहास में पहली बार रोजगार उपलब्धता की दृष्टि से सेवा क्षेत्र ने कृषि को पीछे छोड़ दिया.इसके बावजूद यह दुनिया के एक-तिहाई श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराता है हालांकि सकल विश्व उत्पाद में इसकी हिस्सेदारी घटकर ५ प्रतिशत से भी कम रह गई है.भारत पर कब्ज़ा करने के बाद से ही अंग्रेजों ने भारतीय कृषि का उपयोग अपने लाभ के लिए करना शुरू कर दिया.अब भारतीय किसान अपनी मर्जी से खेतों में फसलें नहीं लगा सकते थे और उन्हें उसी चीज की खेती करनी पड़ती थी जिसका व्यापार कर अंग्रेज अच्छा मुनाफा कमा सकें.इतना ही नहीं अंग्रेजों की गलत आर्थिक नीति के चलते भारी पैमाने पर शहरों से गांवों की तरफ लोगों का पलायन होने से कृषि पर बोझ भी बढ़ गया.ऊपर से अंग्रेजों ने किसानों पर इतना लगान लाद दिया कि किसान कर्ज के दुष्चक्र में फंसकर रह गए थे.आजादी से पहले तक खेती पशु और मानव श्रम की सहायता से की जाती थी.तब कृषि कार्य सालोंभर चलते रहते थे.खेती के साथ पशुपालन अनिवार्य शर्त थी.पशुओं के लिए चारा खेती से ही निकल आता था.पशु सिर्फ खेतों को तैयार करने और समान ढोने में ही मदद नहीं करते थे बल्कि दूध भी देते थे जो काफी पौष्टिक होता था.इतना ही नहीं उनके द्वारा त्यागे गए मल-मूत्र उच्च कोटि के प्राकृतिक खाद का काम करते थे और मिट्टी की सेहत बनाये रखते थे.भारत की आज़ादी अपने साथ विभाजन का दर्द भी लेकर आई.बंटवारे में मुख्य खाद्य क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में चले गए जिससे भारत में खाद्य संकट उत्पन्न हो गया.इसलिए स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद निर्वाचित सरकार ने कृषि के विकास के लिए प्रयास शुरू कर दिए.सरकार की नीयत अच्छी थी लेकिन नीतियाँ गलत थीं.पूरे देश में जैसे-तैसे नहरें बनाई गई जिनमें से अधिकतर कुछ ही सालों बाद बेकार हो गईं.ठेकेदार जरूर मालामाल हो गए.पश्चिमी उत्तर प्रदेश,पंजाब-हरियाणा और राजस्थान के कुछ किसानों को विशेष सुविधाएँ और सहायता देकर हरित क्रांति की योजना बनाई गई.जिससे इस क्षेत्र के किसान अमीर हो गए जबकि देश के बांकी भागों में किसानों की हालत दिन-ब-दिन ख़राब होती गई.देश के बांकी भागों में भी हालांकि कृषि का यंत्रीकरण हुआ लेकिन ठीक वैसे ही जबरन जैसे अंग्रेजों के समय व्यवसायीकरण हुआ था.पशुपालन और कृषि की पारस्परिकता समाप्त हो गई और खेतों में रासायनिक खाद डाले जाने लगे.साथ ही कीटनाशकों के प्रयोग को भी वैज्ञानिक कृषि के नाम पर बढ़ावा दिया गया.सरकार ने सिंचाई के परंपरागत साधनों की उपेक्षा की और जगह-जगह नलकूप गाड़े जाने लगे.इसका परिणाम यह हुआ कि पिछले पचास-साठ सालों में सारे तालाब और कुँए रख-रखाव के अभाव में भर गए.ज्यादातर नहरें गाद भर जाने के कारण बहुत जल्दी बेकार हो गईं.खाद के अनियंत्रित उपयोग ने मिट्टी की सेहत बिगाड़ कर रख दी.कीटनाशकों ने भूमिगत जल को जहरीला किया ही नलकूपों द्वारा इनके एकतरफा दोहन ने भूमिगल जल के स्तर को खतरनाक बिंदु तक पहुंचा दिया.दूसरी ओर सरकार ने भी ९० के दशक से सब्सिडी में कटौती करनी शुरू कर दी.कुल मिलाकर आज भारतीय कृषि संकट में है.कृषि अब घाटे का सौदा है.किसान खेती करना नहीं चाहते लेकिन खेती करना उनकी मजबूरी है.सरकार की गलत नीतियों के कारण देश के स.घ.उ. में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी मात्र १५.७ फीसदी रह गई है जबकि आज भी देश की आधी से ज्यादा जनसंख्या खेती पर निर्भर है.किसानों की माली हालात इतनी ख़राब हो चुकी है कि हर दिन कई किसान आत्महत्या कर रहे हैं.पिछले कई सालों से कृषि उत्पादन लगभग स्थिर है जबकि हर साल देश की जनसंख्या में लगभग २ करोड़ नए लोग जुड़ जाते हैं.प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री तक इन्द्र देवता के आह्वान में लगे हैं.पिछले ६३ सालों में चलाई गई खरबों की लागत से चलाई गईं लगभग सारी सिचाई योजनायें बेकार साबित हो रही हैं.दूसरी ओर भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में टनों अनाज सड़ गए हैं और किसी की जिम्मेदारी तय करने में सरकार विफल साबित हो रही है.सरकार द्वारा बिना सोंचे-समझे नरेगा योजना चलाने के कारण कृषि के लिए मजदूरों की कृत्रिम कमी पैदा हो रही है जिसका दुष्प्रभाव अब भारतीय कृषि पर दिखने भी लगा है.फिलहाल कृषि उत्पादन में कमी आने से महंगाई आठवें आसमान पर है और सरकार किंकर्त्तव्यविमूढ़ बनी हुई है.यहाँ तक कि उसके पास कृषि उत्पादन बढ़ाने की कोई योजना तक नहीं है.ऐसे में किसानों की हालत निश्चित रूप से और भी बिगड़ने वाली है और उनका जीवन और भी कठिन होने जा रहा है.

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

बिहार में एक बार फ़िर घोटालों की राजनीति

 बिहार में इन दिनों चार साल के अवकाश के बाद फ़िर से घोटालों की राजनीति चल पड़ी है.समय ने पलटी खाई है और कभी चारा घोटाला में उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता रहे लोग खुद को ही कटघरे में पा रहे हैं.ठीक इसी तरह बहुचर्चित पशुपालन घोटाले के समय भी तब की राज्य सरकार पशुपालन विभाग में हुए खर्च का उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं दे पाई थी और बाद में सनसनीखेज घोटाले का पर्दाफाश हुआ था.विकास की बात करनेवाले नीतीश कुमार को पहली बार सुरक्षात्मक रवैय्या अपनाना पड़ा है और इसके लिए वे खुद ही जिम्मेदार हैं.विकास के नाम पर पैसों की व्यापक पैमाने पर बर्बादी हुई है.मनरेगा के तहत होनेवाले कामों के लिए उप विकास आयुक्त खुलेआम ग्राम प्रधानों से ५ से १० प्रतिशत तक का कमीशन खा रहे हैं.सरकार को अगर इससे इनकार है तो सभी उप विकास आयुक्तों की संपत्ति की जाँच करा कर देख ले.मैंने अपने जिले के जिला परिषद् कार्यालय में पाया कि मनरेगा मजदूरों की भुगतान पंजी पर कदाचित ९९.९९ प्रतिशत से भी ज्यादा मजदूरों के अंगूठों के निशान लगे हुए थे.ठीक वैसे ही जैसे मतदान के समय बूथ कब्ज़ा होने पर सारे वोटर अचानक अनपढ़ हो जाते हैं.गांवों में १० प्रतिशत राशि भी वास्तव में खर्च नहीं की जा रही,कहीं कोई काम नहीं हो रहा और ९० प्रतिशत से भी ज्यादा राशि स्थानीय निकायों के जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की जेबों में चली जाती है.ऐसा संभव नहीं है कि पंचायती राज में क्या हो रहा है से सरकार पूरी तरह नावाकिफ हो लेकिन शायद उसका सोंचना है कि ग्राम प्रधान और अधिकारी ही उनकी चुनावी नैया पार लगाने में काफी साबित होंगे.लालू प्रसाद जो एक लम्बे समय से चारा घोटाले में लगे गंभीर आरोपों को झेलने के लिए अभिशप्त हैं, को अचानक बहुत बड़ा मुद्दा हाथ लग गया है और वे मेरा घोटाला-तेरा घोटाला का खेल खेलने लगे हैं.लेकिन दोनों मामलों में भारी अंतर है जहाँ चारा घोटाले में कुछ लोग ही सारी राशि चट कर गए थे वहीँ इस घोटाले में मामला धन देकर खर्च की निगरानी नहीं कर पाने का है.वास्तव में जिस तरह से भ्रष्टाचार हमारी संस्कृति में शामिल हो चुका है.इस तरह के माहौल में जब तक सरकार दृढ ईच्छाशक्ति नहीं दिखाती इस तरह के गबन होते रहेंगे.सरकार ने नौकरशाही को अनियंत्रित छूट दे रखी है.यहाँ तक कि मंत्री भी खुद को लाल फीताशाही के आगे लाचार महसूस कर रहे हैं.नौकरशाही की जनता के प्रति कोई सीधी जिम्मेदारी नहीं होती.जनता के बीच जाकर हाथ पसारना पड़ता है नेताओं को.इस सरकार में नौकरशाही और लोकशाही के बीच का संतुलन कायम नहीं रह पाया इसलिए भी सरकार वित्तीय अनियमितता को समय रहते नहीं रोक पाई.वास्तव में मुख्यमंत्री नीतीश को खादी पर बिलकुल भी भरोसा नहीं था.मुख्यमंत्री की देखा-देखी जिलाधिकारी भी जनता दरबार लगाने लगे,लेकिन वे जनता की समस्याओं का समाधान नहीं कर पाए और मुख्यमंत्री के जनता दरबार की तरह उनका दरबार भी महज दिखावा बनकर रह गया.भ्रष्टाचार के खिलाफ निगरानी विभाग ने सक्रियता जरूर दिखाई लेकिन बाद के समय में निगरानी के अधिकारी भी घूस खाने लगे.अब इन पर कौन निगरानी रखे.पिछले दो दिनों से विधान सभा में विपक्ष जिस तरह का व्यवहार कर रहा है उसे संसदीय तो नहीं ही कहा जा सकता है,गुंडागर्दी की श्रेणी में भी शामिल किया जा सकता है.विधायिका शांतिपूर्वक बहस करने और कानून बनाने का मंच है न कि गुंडागर्दी और पशुबल के प्रदर्शन का.बिहार में चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं बचा है ऐसे में पूरा विपक्ष अगर विधायिका से इस्तीफा दे भी देता है तो वो त्याग की श्रेणी में नहीं आएगा बल्कि उसे राजनीतिक बढ़त प्राप्त करने का हथकंडा ही माना जायेगा.

बुधवार, 21 जुलाई 2010

बिना सुविधा-शुल्क के काम न होई

जवाहरलाल नेहरु ने १९५२ में २ अक्तूबर के दिन देश में सामुदायिक विकास केंद्र खोलने की योजना का शुभारम्भ किया.इसके तहत पूरे देश में कुछेक गांवों को मिलाकर प्रखंड बनाये गए और निकटवर्ती शहरों में प्रखंड कार्यालय खोले गए.उद्देश्य था विकास की रौशनी को गांवों तक आसानी से पहुँचाना.लेकिन योजना के ६ठे साल में ही नेहरु समझ गए थे कि उनसे इस मामले में गलती हो गई है और ये कार्यालय विकास की जगह भ्रष्टाचार के केंद्र बन गए हैं.इन्हीं प्रखंड कार्यालयों के हाथों में होता है जमीन का ब्यौरा.कोई भी व्यक्ति जब जमीन खरीदता है तो उसके लिए जरूरी होता है कि रसीद उसके नाम पर कटे.यह रसीद कई स्थानों पर काम आती हैं.बिना रसीद के आप न तो आय प्रमाण पत्र बनवा सकते हैं और न ही आवासीय प्रमाण पत्र.लेकिन रसीद तभी आपके नाम पर कट सकती है जब आपके नाम दाखिल ख़ारिज हो जाए और दाखिल ख़ारिज तभी हो सकता है जब आप सुविधा-शुल्क दें.अगर सुविधा-शुल्क नहीं देंगे तो अंचलाधिकारी किसी-न-किसी बहाने आपकी अर्जी को अटका देगा.वह बहाना रजिस्ट्री में उचित कर नहीं देने से लेकर जमीन पर आपका कब्ज़ा नहीं होना कुछ भी हो सकता है.और अगर एक बार अर्जी अटक गई तो न जाने फ़िर कब मंजूरी मिले.कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि कर्मचारी उधार पर काम करवा देते हैं,ज्यादातर मामलों में पैसा मिल भी जाता है.लेकिन अगर पार्टी ने किसी कारण से पैसा नहीं दिया तो उनको अपनी जेब से अधिकारी को पैसा देना पड़ता है.उनकों अधिकारी की नज़र में अपनी साख ख़राब होने का खतरा जो होता है.अभी मेरे ही जिले वैशाली के पातेपुर प्रखंड में एक दिलचस्प वाकया सामने आया.अंचलाधिकारी पहले किरानी थे हाल ही में नीतीश सरकार के तुगलकी फरमान द्वारा किरानियों को मिली सामूहिक प्रोन्नति ने उन्हें अचानक अधिकारी बना दिया.सो उनकी आदत बिगड़ी हुई है.पहले बिना पैसा लिए वे कोई काम करते ही नहीं थे.अब हर किसी को जल्दीबाजी तो होती नहीं और कुछ लोग हमारी तरह लड़ाकू प्रवृत्ति के भी होते हैं मन में ठान लिया कि चाहे काम में जितना समय लग जाए घूस तो नहीं ही देंगे.अधिकारी ने आवेदनों की गिनती की तो पाया कि पैसे कम हैं.बिना पैसे वाले सारे आवेदनों को आलमारी में बंद कर ताला लगा दिया.लड़ाकू पहुँच गए डी.एम. के दरबार में.डी.एम. ने अंचलाधिकारी को आवश्यक निर्देश भी दिए लेकिन अधिकारी नहीं माना.आज भी लोग अंचल कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं.दाखिल ख़ारिज में घूस की दर भी अलग-अलग होती है जैसा मुवक्किल वैसा पैसा लेकिन देना सबको पड़ता है नहीं तो फ़िर आवेदन के आलमारी में बंद हो जाने का खतरा तो सर पर मंडराता ही रहता है.मुसीबत दाखिल ख़ारिज तक आकर ही समाप्त हो जाए ऐसा भी नहीं है इसके बाद रसीद कटवाने के लिए भी आपको महीनों कर्मचारी की परिक्रमा करनी पड़ सकती है.कभी फ़ुरसत नहीं होने का बहाना तो कभी रसीद समाप्त रहने का.५-१० रूपये के लिए कर्मचारी क्यों अपना समय जाया करे उतनी देर में तो वो कई दाखिल ख़ारिज आवेदनों को तैयार कर सकता है.अब तक तो आप समझ गए होंगे कि दो मिनट में सिर्फ मैगी ही नहीं पकती बल्कि १०००-५०० रूपये भी कमाए जा सकते है बशर्ते आप बिहार में अंचल में कर्मचारी हों और दाखिल ख़ारिज का फॉर्म भर रहे हों..

सोमवार, 19 जुलाई 2010

मानवाधिकारों की कब्रगाह पाकिस्तान

१४ अगस्त १९४७ को पाकिस्तान बनते समय उम्मीद की गई थी कि वो मुसलमानों के लिए एक आदर्श देश साबित होगा और मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा भी था कि पाकिस्तान एक मुस्लिम देश ज़रूर होगा मगर सभी आस्थाओं वाले लोगों को पूरी धार्मिक आज़ादी होगी।पाकिस्तान के संविधान में ग़ैर मुसलमानों की धार्मिक आज़ादी के बारे में कहा भी गया है, “देश के हर नागरिक को यह आज़ादी होगी कि वह अपने धर्म की आस्थाओं में विश्वास करते हुए उसका पालन और प्रचार कर सके और इसके साथ ही हर धार्मिक आस्था वाले समुदाय को अपनी धार्मिक संस्थाएँ बनाने और उनका रखरखाव और प्रबंधन करने की इजाज़त होगी।” मगर आज के हालात पर ग़ौर करें तो पाकिस्तान में परिस्थितियाँ ख़ासी चिंताजनक हैं।सिर्फ अल्पसंख्यकों को ही नहीं बल्कि बहुसंख्यकों को भी शरियत के आधार पर जीवन जीने को बाध्य किया जा रहा है. पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम प्रान्त के लाखों निवासियों के मानवाधिकारों के प्रति अंतर्राष्ट्रीय संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने गंभीर चिंता व्यक्त की है.उसने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पाकिस्तान के इस प्रान्त के लोगों को किसी भी तरह का कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है और वे तालिबान के जुल्म को सहने को विवश हैं.स्कूलों पर तालिबान कब्ज़ा कर रहे हैं और बच्चों को सिखाया जा रहा है कि अफगानिस्तान में कैसे लड़ाई लड़ी जाए.लड़कियों को स्कूलों से निकाला जा रहा है और पुरुषों को दाढ़ी रखने पर मजबूर किया जा रहा है और प्रत्येक उस आदमी को धमकी दी जा रही है जिन्हें तालिबान पसंद नहीं करते.वास्तव में इस क्षेत्र की जनता तालिबानियों और सरकारी सुरक्षा बलों के बीच पिस रही है और निरुपाय है.ऊपर से अमेरिकी विमान आसमान से आँख मूँद कर बम गिरा रहे हैं जिससे भारी संख्या में महिलाओं और बच्चों सहित निर्दोष लोग मारे जा रहे है. संस्था की वर्ष २०१० की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सरकार विरोधी संगठन देशभर में लोगों को अपना निशाना बना रहे हैं.दूसरी ओर,सुरक्षा बल भी लोगों को फर्जी मुठभेड़ों में मार रहे हैं.देश भर में अल्पसंख्यकों की हत्या और उत्पीडन के मामले बढ़ रहे है और सरकार इन्हें सुरक्षा प्रदान करने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है.तालिबान हिन्दू,सिख और ईसाइयों से जजिया कर वसूल रहे हैं या फ़िर उन्हें संपत्ति से बेदखल कर रहे हैं.उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबन्ध है.भारत के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन के पूर्व मौजूदा पाकिस्तान में रहनेवाले हिन्दुओं में से ज्यादातर पढ़े-लिखे और खाते-पीते परिवारों से थे.लेकिन बंटवारे के बाद सबकुछ बदल गया.विभाजन के दौरान मानव इतिहास के सबसे हिंसक सांप्रदायिक दंगे हुए और संपन्न हिन्दू भागकर भारत चले गए.पाकिस्तान में बच गए गरीब और लाचार हिन्दू.उनके पूर्वज सदियों से पाकिस्तान में रह रहे थे और उनका वहां की जमीन से गहरा लगाव था.इन हिन्दुओं में ज्यादातर सिंध प्रान्त में रहते थे और अब भी वहीँ रहते हैं.१९४१ की जनगणना के अनुसार सिंध में १६ लाख हिन्दू थे.बंटवारे के बाद जब हिंसा का ज्वार उतरा तब वहां ८ लाख हिन्दू बच गए थे.वर्तमान में सरकारी आंकड़ों के अनुसार उनकी संख्या करीब ४० लाख है लेकिन गैरसरकारी सूत्रों के अनुसार उनकी संख्या कम-से-कम ८० लाख है.समय-समय पर हिन्दुओं पर अत्याचार की घटनाएँ सामने आती रही हैं.१९९२ बाबरी-ढांचा के विध्वंस के जवाब में पाकिस्तान में कई हिन्दू मंदिरों को तोड़ डाला गया.इसी तरह का वाकया बलूचिस्तान के दिलबदीन में तब सामने आया जब एक हिन्दू औरत पर इल्जाम लगाया गया कि वह कुरआन के पन्नों पर मिठाइयां बँट रही है.इसी बात पर दंगे शुरू हो गए और एक मंदिर और चार घर जलाकर राख कर दिए गए.इन दंगों ने कम-से-कम तीन हिन्दुओं की जान ले ली.मानवाधिकार संगठनों के अनुसार पकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सबसे बड़ी समस्या धर्मपरिवर्तन की है.खास तौर पर लड़कियों को इस्लाम कबूल करने के लिए जबरदस्ती मजबूर किया जा रहा है.कई बार जब परिवारवाले विरोध करते हैं तब ऐसी स्थितियां उत्पन्न कर दी जाती हैं जिसके चलते उन्हें गाँव ही छोड़ना पड़ जाता है.इतना ही नहीं पाकिस्तान के स्कूलों में हिन्दू अध्यापक नहीं रखे जाते और हिन्दू छात्र-छात्राओं को न चाहते हुए भी इस्लामिक शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती है अन्यथा उनके अंक कम कर दिए जाते हैं.पाकिस्तान में सिर्फ अल्पसंख्यक ही बढती धार्मिक कट्टरता से परेशान नहीं हैं अपितु उदारवादी मुसलमान भी अपने को प्रताड़ित महसूस करते हैं क्योंकि ऐसे माहौल में कट्टरवाद के विरुद्ध आवाज उठाने का मतलब है जान-माल के लिए जोखिम मोल लेना.पाकिस्तान को उदारवादी इस्लामिक गणतंत्र बनाने का मोहम्मद अली जिन्ना सपना तो उनके जीते-जी ही चकनाचूर हो गया था, उनकी मौत के बाद पाकिस्तान में समय का चक्र उल्टा चलने लगा और पाकिस्तान २१वीं सदी में १६वीं-१७वीं का देश बन चुका है.आगे जो भी होने की आशंका है वह और भी भयावह होगा.अगर पूरे देश पर तालिबान का कब्ज़ा हो जाता है तब १९४७ से पहले भारत का हिस्सा रह चुका यह देश कबायली-युग में ही पहुँच जायेगा और मानवाधिकार जैसी बातें पूरी तरह से बेमानी हो जाएगी.

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

प्रभाष जोशी : कलम वाला योद्धा


कल दिवंगत पत्रकार प्रभाष जी की जयंती थी लेकिन मेरा फोन डेड होने के कारण मैं उन्हें अपनी शब्दांजलि अर्पित नहीं कर पाया.सामाजिक से लेकर खेल तक हर क्षेत्र पर,हरेक मुद्दे पर प्रभाष जी की गहरी पकड़ थी.लेकिन ऐसी पकड़ रखनेवाले पत्रकारों की तो हिंदी जगत में कोई कमी है नहीं.वास्तव में जो चीज उन्हें भीड़ से अलग करती थी वह थी अपने मूल्यों और सिद्धांतों के प्रति उनकी पक्की प्रतिबद्धता.उन्होंने सरकारी विभागों द्वारा दी गई सूचनाओं पर विश्वास नहीं कर पत्रकारों को वास्तविकता का पता लगाकर खबर निकालने की प्रेरणा दी और हिंदी में खोजी पत्रकारिता की शुरुआत की.बाजारवाद और उपभोक्तावाद से वे पूरी तरह अप्रभावित रहे.पेड न्यूज़ (पैसे लेकर ख़बरें छापना) के बढ़ते प्रचलन से वे क्षुब्ध थे और इसके खिलाफ उन्होंने प्राणांत तक संघर्ष किया.पत्रकारिता के क्षेत्र में बढ़ते नैतिक स्खलन से भी वे चिंतित थे और इसके खिलाफ आवाज भी उठाई.लेकिन जगाया तो उन्हें जाता है जो सोये हों जो जानबूझकर नहीं जागना चाहते हों उन पर तो न तो प्रेरक शब्दों का ही प्रभाव होता है और न ही उत्तम कर्मों का.इसलिए प्रभाष जी द्वारा पत्रकारिता रूपी महासागर में उत्पन्न किया गया विक्षोभ भी जल्दी ही शांत हो गया और सबकुछ पहले की तरह सामान्य हो गया.धरती अभी भी घूम रही है और पत्रकारिता-क्षेत्र के नैतिक पतन की गति और भी तेज हो गई है.

बी.एस.एन.एल. कनेक्शन बना गले का फंदा


इससे पहले मैंने दो सालों तक नोएडा में एयरटेल की ब्रॉडबैंड सेवा का उपयोग किया था.क्या मजाल कि कभी एक मिनट के लिए भी कोई खराबी आई हो.यहाँ हाजीपुर में मेरे पास जुलाई २००९ से बीएसएनएल का ब्रॉडबैंड का कनेक्शन है.लगभग आधे समय तक सर्वर ख़राब रहता है.खैर किसी तरह मैनेज कर लेता हूँ.लेकिन जब फोन ही डेड हो जाए तब मैं निरुपाय हो जाता हूँ.अभी १२ जुलाई से मेरा फोन ख़राब है.मैं रोज-रोज ऑफिस में फोन करता हूँ और रोज-रोज मुझसे मेरा नंबर पूछा जाता है लेकिन फोन ठीक नहीं होता.मैंने परेशान होकर सीधे टी.डी.एम. से बात की लेकिन सब बेकार.१४ तारीख को जब मिस्त्री से उसके मोबाईल पर बात की तो उसने बताया की ऑफिस से उसे मेरा फोन ख़राब होने के बारे में बताया ही नहीं गया है.१५ को जब शिकायत दर्ज करनेवाले से फोन पर इस सम्बन्ध में बातचीत की तो उसने बताया कि उसने तो कल ही मिस्त्री को मेरा नंबर दे दिया था.संयोग से मिस्त्री भी वहां मौजूद था लेकिन लाईन पर नहीं आया.मैं ७५० रूपया ब्रॉडबैंड का फिक्स सहित कम-से-कम १००० रूपया मासिक का बिल भरता हूँ लेकिन फ़िर भी प्रताड़ित हूँ.मेरी समझ में नहीं आ रहा कि क्या करुँ?मैं बी.एस.एन.एल. कनेक्शन कटवा कर दूसरी कम्पनी की सेवा ले लूं या फ़िर बी.एस.एन.एल. कनेक्शन रखकर इस भ्रष्ट विभाग से संघर्ष करुँ.आज मेरा फोन ठीक कर दिया गया है. वैसे मैं दृढप्रतिज्ञ था कि चाहे मुझे फोन कटवाना ही क्यों न पड़े सुविधा शुल्क तो हरगिज नहीं दूंगा.

सोमवार, 12 जुलाई 2010

कुर्सी के लिए नीतीश कुछ भी करेंगा


जो लोग बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को विकास की राजनीति करनेवाला मानते हैं वे अपनी ग़लतफ़हमी दूर कर लें.नीतीश विकास की राजनीति नहीं करते सिर्फ जाहिर तौर पर जनता को बरगलाने के लिए विकास की बातें करते रहते हैं.करते तो वे भी कुर्सी और वोट बैंक की राजनीति ही हैं.जब से बिहार में विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हुई है तभी से नीतीश कुमार बेचैन हैं वोटबैंक वाले अच्छे-बुरे नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करने के लिए चाहे वे नामी-गिरामी अपराधी ही क्यों न हों.अभी ५ जुलाई को उनके दल में शामिल हुए हैं सीमांचल का आतंक कहे जानेवाले तस्लीमुद्दीन.हद तो यह है कि स्वयं नीतीश ने माला पहना कर उनका पार्टी में स्वागत किया.उसके बाद से ही जदयू के सभी नेता इस कुख्यात अपराधी का गुणगान करने में लगे हैं.हालांकि उनकी याददाश्त बहुत तेज़ हैं लेकिन फ़िर भी न जाने कैसे नीतीश भूल गए कि ८० के दशक में वे विधान सभा की उस समिति के सदस्य थे जिसने अपनी रिपोर्ट में तस्लीमुद्दीन के कई जघन्य आपराधिक घटनाओं में संलिप्त रहने की पुष्टि की थी.इस समिति के अध्यक्ष थे राम लखन सिंह यादव.इस रिपोर्ट के अनुसार अपहरण की एक  घटना के बाद जब पुलिस जाँच के लिए कुत्ता लेकर आई तो कुत्ता सीधे तस्लीमुद्दीन के घर जाकर रुका.इसी रिपोर्ट में कहा गया है तस्लीमुद्दीन और उनके गुर्गों के आतंक के चलते किशनगंज में लड़कियों का सड़कों पर निकलना भी दूभर था.चुनाव निकर देखकर विकास की राजनीति छोड़ वोट बैंक की राजनीति में जुट जानेवाले नीतीश उस रिपोर्ट को कैसे भूल गए जिसे तैयार करने में कभी उनका भी महत्वपूर्ण योगदान था.तस्लीमुद्दीन अल्पसंख्यक नेता बाद में है उससे पहले वह कुख्यात अपराधी है.अभी ८ जुलाई को भी किशनगंज की एक अदालत ने उसके नाम गैरजमानती वारंट जारी किया है.यह एक खुला रहस्य है कि किसी भी अपराधी का कारोबार उसके आतंक के बल पर चलता है और जब तक शासन-प्रशासन उसका साथ न दे वह आतंक कायम रखने में कामयाब नहीं हो सकता.इसलिए ज्यादातर अपराधी नेता सत्ता बदलते ही सत्ताधारी दल में शामिल होने की फ़िराक में लगे रहते हैं.तस्लीमुद्दीन भी अपवाद नहीं है और इसलिए अगस्त में ही उन्होंने राजद से इस्तीफा दे दिया और जदयू से हरी झंडी मिलने का इंतज़ार करते रहे.करीब एक साल तक लम्बा इंतज़ार किया.राजद में रहकर अब कोई फायदा नहीं था.तस्लीमुद्दीन जदयू में शामिल होते ही संत नहीं हो गए और न ही होनेवाले हैं,वे अपराधी हैं और अपराधी ही रहेंगे.यह कुछ ही दिन पहले उनपर दर्ज कराये गए रंगदारी के मामले से साबित भी हो जाता है.लेकिन नीतीश जी को इससे क्या लेना-देना उन्हें तो हर कीमत पर चुनाव जीतना है चाहे इसके लिए उन्हें कितने भी और कैसे भी पतित लोगों से मदद का लेन-देन क्यों न करना पड़े.

शनिवार, 10 जुलाई 2010

एक गाँव ऐसा भी


मैं जैसा कि आप जानते हैं कि एक शहर में रहता हूँ जिसका नाम है हाजीपुर.१८ साल पहले बड़े ही भारी मन से हमने गाँव को टाटा-बाई-बाई कर दिया था लेकिन मैं आज भी मन से ग्रामीण ही हूँ,शहर की आवोहवा मुझे रास नहीं आती,घुटन-सी महसूस होती है,हर जगह कृत्रिमता का आभास होता है.इसलिए जब मेरे मित्र ने मुझे अपने तिलक के अवसर पर गाँव चलने के लिए कहा तो मैं सहर्ष तैयार हो गया हालांकि २ सप्ताह बाद ही मेरी यू.जी.सी. की परीक्षा थी.मेरे मित्र का गाँव सारण जिले में मढ़ौरा के पास स्थित है.पूरे तीन घन्टे की यात्रा के बाद हमें अपनी कार को उसके घर से कुछ फर्लांग पहले ही रोक देनी पड़ी क्योंकि वहां पुल बनाने के दौरान सड़क काट दी गई थी.दूर से ही उसका घर टेंट-शामियाना लगा होने के कारण पहचाना जा सकता था.बारी-बारी से मैं उसके पिताजी और चाचाजी से मिला.पहली नज़र में गाँव पिछड़ा लगा मुझे.उसके दरवाजे पर कई मुसलमानों को जब काम करते देखा तब मुझे आश्चर्यमिश्रित ख़ुशी हुई,सांप्रदायिक सहयोग का साकार प्रतिरूप.मन को इत्मिनान भी हुआ कि हमारे देश को सांप्रदायिक आधार पर तोड़ पाना कभी संभव नहीं हो पायेगा क्योंकि इस देश में इस तरह के अनगिनत गाँव जो हैं. मैंने हाथ-मुंह धोने के बाद बाद भोजन किया.बड़े ही अनुराग के साथ मुझे भोजन कराया गया.सादा भोजन जो प्रेम के रस में पकाया गया था.शायद कृष्ण को विदुर के घर की साग में इतना स्वाद नहीं मिला होगा. जब भोजनोपरांत विश्राम करने के लिए गया तब मंझले चाचा से लम्बी बातचीत हुई.वे भूतपूर्व सैनिक थे इसलिए जाहिर था कि बातचीत उनके सैनिक जीवन पर केन्द्रित रही.मित्र के घर के पूरे इतिहास-भूगोल से मैं अब परिचित था. रिटायरमेंट के वर्षों बाद भी वे सेना के अन्य रिटायर्ड जवानों की तरह काफी परिश्रमी थे.पूरी घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी उन्होंने अपने बूढ़े मगर मजबूत कन्धों पर उठा रखी थी.बातचीत में व्यवधान तब आया जब मुझे नींद आ गई.शाम को नींद खुलने के बाद हम गाँव देखने को निकले.खुद मेरा मित्र मेरा गाईड बना.बड़े लम्बे अंतराल के बाद गाँव की हवा तन-मन को स्पर्श कर रही थी,मन रोमांचित हो रहा था.ठंडक पैदा करने के कृत्रिम साधनों में यह बात कहाँ?.करीब दो घन्टे लगे उन स्थानों का दर्शन करने में जहाँ मेरे मित्र ने बाल-लीला की थी.मेरा मन लगातार अपने गाँव से इस गाँव की तुलना कर रहा था.लौटते समय मित्र के एक चाचा के यहाँ पहले तो शुद्ध दूध से बनी चाय पी फ़िर ताज़ा भुट्टों का आनंद लिया.याद आया मेरा बचपन जब मैं १०-१५ तक भुट्टे एक ही बार में खा जाया करता था बिना इस बात की चिंता किये कि बेचारे पेट पर क्या गुजरेगी.खैर यहाँ मैंने ज्यादा नहीं बस तीन भुट्टे खाए.न जाने क्यों शहर में ठेलों पर बिकनेवाले भुट्टों में यह रसानंद क्यों नहीं आता.शायद उनमें ग्रामीण सहृदयता की जगह बाजारवाद का रस होता है.घर के सामने बहुत लम्बा-चौड़ा खाली मैदान था.इसलिए दरवाजे पर हरसमय ठंडी-ठंडी हवा आती रहती पंखा-कूलर या ए.सी. कोई जरुरत ही नहीं.सबसे कमाल की बात थी चापाकल के पानी में.उसका पानी काफी ठंडा था.जहाँ अपने घर के बाथरूम में मैं दो मिनट में ही नहा लेता था वहां १०-१५ बाल्टी पानी से नहाता.न तो ठंडा तेल लगाने का झंझट  और सिरदर्द की दवा निगलने की जरुरत,नहाते ही सारी थकान उड़नछू.गाँव में सिर्फ एक ही कमी थी कि बिजली नहीं थी.हुआ यह था कि गाँव के लोग जब बिजली के खम्भे गाड़े जा रहे थे तब आपस में ही लड़ पड़े.हर कोई अपने-अपने दरवाजे पर खम्भे गड़वाना चाहता था.नतीजा यह हुआ कि गाँव में बिजली आते-आते रह गई.बिजली नहीं होने के चलते मेरा मोबाईल चार्ज नहीं हो पाया और दो दिनों के संघर्ष के बाद वह मूर्छावस्था में चला गया.तिलक की शाम भोज में कई सौ लोग शामिल हुए.मुझे आश्चर्य हुआ कि भोजन परोसने में मित्र के जो ग्रामीण रिश्तेदार बिलकुल पीछे थे खाने में काफी आगे निकले.देखकर दुःख हुआ कि गांवों में भी अब वो बात नहीं रह गई जिसके बल पर पहले एक छप्पर उठाने के लिए पूरा गाँव मदद के लिए जमा हो जाता था.ईर्ष्या और जलन ने यहाँ के लोगों के मन में भी पैठ बना ली है.पहले गाँव सूधो मन,सूधो वचन,सुधों सब व्यवहार के लिए जाने जाते थे.आज का यह गाँव कई जातीय समूहों में बँटा हुआ था लेकिन जातीय तनाव नहीं था.अन्य जातियों के लोग और मुसलमान भी पंचायत को हरिजनों के लिए आरक्षित कर देने से दुखी लगे. यहाँ मैं पूरी तरह भोजपुरी बोल रहा था हालांकि मेरी मातृभाषा वज्जिका है.मेरा मानना है कि ग्रामीण जीवन का वास्तविक मजा आप तभी ले सकते हैं जब आप वहां के लोगों से उनकी ही भाषा में बात करें.दो दिनों में ही कई लोग मेरे अच्छे मित्र बन गए थे जैसे बरसों की पहचान हो.मित्र की माँ में मुझे अपने माँ का अक्स दिखता था और बहनों में अपनी बहन का.सीधेपन और ईमानदारी में मित्र के पिता मेरे पिता के काफी निकट थे.दो दिनों के लिए मुझे लगा कि मैं फ़िर से अपने गाँव में रहने लगा हूँ जहाँ तब स्नेह की गंगा बहती थी.मेरी दिली ईच्छा थी कि मैं शादी तक रुकूं लेकिन इसमें दो बाधाएं थीं एक तो यह कि मैं अपने साथ कपडे नहीं ले गया था और दूसरी यह कि कुछ ही दिनों बाद मेरी यू.जी.सी. की परीक्षा थी.मैंने तिलक की सुबह ही घर का रास्ता पकड़ लिया.लेकिन उस गाँव की यादें अपने साथ लेता आया.उस गाँव की यादें जहाँ मैला आँचल के मेरीगंज की तरह धूल भी है और फूल भी,कांटें भी हैं और चन्दन भी, राम का भी निवास है और रावण का भी और इन दोनों विपरीत ध्रुवों के बीच पेंडुलम की तरह झूलते रहनेवाले लोगों का भी.

सोमवार, 5 जुलाई 2010

विरोध प्रकट करने के अहिंसक तरीके

आज केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य-वृद्धि के खिलाफ विपक्ष ने भारत बंद का आयोजन किया.एकबारगी पूरे देश का जनजीवन ठप्प पड़ गया.महाराष्ट्र से सरकारी बसों के साथ तोड़-फोड़ की खबरें भी आईं.कुछ लोगों ने बंद से देश को हुए आर्थिक नुकसान का अनुमान भी लगाया कि देश को इससे लगभग १३ हजार करोड़ का नुकसान हुआ.कई जगहों पर बंद में एम्बुलेंस के फंसे होने की भी ख़बरें भी टेलीविजन पर देखी गईं.बंद से सबसे ज्यादा नुकसान होता है दिहाड़ी मजदूरों को और एक दिन के लिए उनका चूल्हा ठंडा पड़ जाने का खतरा पैदा हो जाता है.गांधी ने भी स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान कई बार भारत बंद का आह्वान किया था.लेकिन तब बंद स्वतःस्फूर्त होता था,जनता के साथ कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की जाती थी.लेकिन आज स्थितियां अलग हैं.बंद के दौरान हिंसा साधारण बात है. ऐसे में प्रश्न उठता है कि विपक्ष के पास सरकारी नीतियों के प्रति विरोध प्रकट करने के बंद के अलावा और क्या-क्या विकल्प हैं?धरना-प्रदर्शन में लोगों की भागीदारी प्राप्त करना आज की भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में कठिन है.साथ-ही हमारे नेता इतने आरामतलब हो गए हैं कि गर्मी-सर्दी को सहन करना उनके वश की बात ही नहीं है.यही बात गांधीजी के सबसे मारक सत्याग्रही हथियार अनशन के साथ भी लागू होती है.कौन जान का जोखिम ले?हो सकता है सरकार झुके ही नहीं.घेराव में पुलिस के डंडे खाने पड़ सकते हैं.गांधी जब भी यात्रा पर निकले पैदल निकले और जनता के बीच रुकते हुए यात्रा पूरी करते थे.लेकिन हमारे वर्तमान नेता जब भी यात्रा पर निकलते हैं तो वातानुकूलित वाहन में और जनता के बीच नहीं ठहर कर वातानुकूलित कमरे में ठहरते हैं,फ़िर कैसे उनकी यात्रा का असर हो? सबसे बड़ी बात तो यह है कि नेताओं के साथ-साथ जनता की वरीयता-सूची में भी देश और देशहित का स्थान नीचे से पहले नंबर पर आता है.किसी भी मुद्दे पर नेतृत्व प्रदान करना नेताओं का काम है और नेताजी ठहरे आरामतलब.विरोध प्रकट करने के बांकी शांतिपूर्ण तरीकों में नेताजी के कोमल शरीर को कष्ट होगा जबकि उनका काम खुद कष्ट सहना नहीं बल्कि दूसरों को कष्ट देना है.और बंद के दौरान भी कष्ट सिर्फ दूसरों को होता है नेताओं को नहीं.वे या तो घर में बंद रहते हैं यह फ़िर थाने में कूलर और पंखे की हवा खा रहे होते हैं.

बुधवार, 30 जून 2010

भारत एक विफल राष्ट्र

कवि प्रदीप ने १९५४ में ही भारत के भविष्य के कर्णधारों को सचेत किया था जागृति फिल्म के एक गाने के माध्यम से.गीत के बोल थे हम लायें हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के.परन्तु बच्चों ने देश का साज-संभाल कुछ इस तरह से किया कि गांधी समेत सभी जीवित और मृत स्वतंत्रता सेनानियों की आत्माएं पछता रही होंगी कि उन्होंने क्यों देश को आजाद कराया.संविधान में वर्णित सारे मौलिक अधिकार और आदर्श धरे-के-धरे रह गए.बगुलों ने श्वेत वस्त्र धारण कर हंसों का रूप ग्रहण कर लिया और देश की राजनीति को अपने कब्जे में कर लिया.राजनीति ही देश की समस्त शक्तियों का नियंत्रण करनेवाला यन्त्र है ऐसे में ऊपर-से-नीचे तक ज्यादातर शक्तिशाली पदों पर बगुलों की ही जाति से आनेवाले कौओं ने कब्ज़ा जमा लिया और देश को ही नोंच-नोंच कर खाने लगे.देश की वर्तमान स्थिति पर अगर निष्पक्षता से एक निगाह डालें तो सर्वत्र अराजकता-ही-अराजकता नजर आएगी.पहले शुरू करते हैं देश की आतंरिक शांति-व्यवस्था की स्थिति से.उत्तर में जम्मू और कश्मीर पिछले दो दशकों से सीमापार से संपोषित आतंकवाद की आग में झुलस रहा है.पूर्वोत्तर कभी मुख्यधारा में शामिल ही नहीं हो सका और असम से लेकर मणिपुर तक कहीं भी स्थिति शांतिपूर्ण नहीं है.अभी कुछ ही दिन पहले नगाओं ने मणिपुर जानेवाली सड़कों से होकर आवागमन को रोक दिया था और मणिपुर में भुखमरी जैसी विस्फोटक स्थिति पैदा हो गई थी.लेकिन विगत एक-दो सालों में देश के समक्ष सबसे बड़ी समस्या बनाकर उभरी है माओवाद की समस्या.इसने तो भारतीय लोकतंत्र के भविष्य पर ही सवालिया निशान लगा दिया है.देश का लगभग आधा हिस्सा माओवादियों के कब्जे में जा चुका है और वहां उनकी समानांतर सत्ता चलती है.इसी तरह पाकिस्तान संपोषित आतंकवाद अब सिर्फ जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि दिल्ली से लेकर बंगलोर तक के पूरे क्षेत्र में अपना प्रभाव जमा चुका है.इधर कुछ समय से पाकिस्तान ने आतंकवाद से भी ज्यादा गन्दा खेल-खेलना शुरू किया है और वह खेल है भारतीय अर्थव्यवस्था में नकली नोटों की घुसपैठ कराने का खेल.दुखद तो यह है कि हमारे ही भाई-बन्धु कुछ बैंककर्मी/अधिकारी धन के लालच में उनका साथ दे रहे हैं.लोकतंत्र के चारों स्तंभों में भ्रष्टाचार का घुन लग गया है और लोकतंत्र का महल कभी भी धराशायी हो सकता है.न्यायपालिका अपनी लेटलतीफी और भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात हो चुका है.कानून गरीबों का दुश्मन और अमीरों की रखैल बनकर रह गया.व्यवस्थापिका में सदस्यों की एक बड़ी संख्या आपराधिक तबके से आती है.कार्यपालिका पूरी तरह अक्षम और भ्रष्ट है.यहाँ तक कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मानी जानेवाली पत्रकारिता भी कार्यपालिका के दबाव और बाजारीकरण व मुनाफाखोरी के प्रभाव में आकर अपने कर्त्तव्य से विमुख हो चुकी है.सरकार इन दिनों अर्थव्यवस्था की तेज वृद्धि-दर पर न्योछावर हुई जा रही है.लेकिन यह विकास किसका हो रहा है?अम्बानियों और मित्तलों का पैसा एक-दो सालों में ही डेढ़ गुना और दो गुना हो जा रहा है.सिर्फ इन दो परिवारों के पास आज लगभग ३ लाख करोड़ रूपये से भी ज्यादा की पूँजी है.क्या गाँव के नुक्कड़ पर पान की छोटी-सी दुकान चलाने वाले राम नारायण या अब्दुल अंसारी का पैसा भी इसी तरह से बढ़ पा रहा है? नहीं, बिलकुल नहीं.उल्टे तेज मुद्रास्फीति के कारण उसकी पूँजी क्षरित हो रही है.किसानों की हालत तो इतनी ख़राब है कि कर्ज के मकडजाल से छुटकारा पाने के लिए प्रत्येक ३ घन्टे में १ किसान मौत को गले लगा रहा है.आजादी के बाद खेतों तक पानी पहुँचाने के लिए हमने जो भी इंतजाम किये सब लाभ की जगह नुकसानदायक ही सिद्ध हुए हैं.हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि जाति और धर्म की राजनीति करनेवाली सरकारों ने परिवार नियोजन जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है और भारत जैसे गरीब देश की जनसंख्या में प्रत्येक वर्ष २ करोड़ से भी ज्यादा नए लोग जुड़ जा रहे हैं.परिणाम यह है कि जितनी तेज गति से हमारी जी.डी.पी. बढती है देश में गरीबों की कुल जनसंख्या भी उसी रफ़्तार में बढ़ जाती है. कुल मिलाकर देश की आतंरिक स्थिति खतरनाक हो चुकी है और दिल्ली के प्रभाववाला शासित क्षेत्र क्रमशः छोटा होता जा रहा है.ईमानदारी सबसे अच्छी की जगह सबसे बुरी नीति बन गई है.लोगों का सरकार,संविधान,कानून और पत्रकारिता पर से विश्वास उठता जा रहा है.हमारे पुलिस और अर्द्धसैनिक बल पैसों के लालच में आकर अपने हथियार और गोलियां माओवादियों और अन्य अपराधियों के हाथों बेच रहे हैं.आतंरिक स्थिति नाजुक होने के साथ ही विदेश नीति के मोर्चे पर भी भारत एक विफल राष्ट्र है.हमारी विदेश नीति अब अमेरिका से संचालित होती है मानों भारत अमेरिका का ५१वाँ राज्य हो.अब कवि प्रदीप इस दुनिया में नहीं हैं.कहाँ तो उन्होंने १९५४ में देश के बच्चों को इस बात को लेकर सचेत किया था कि दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी है इसलिए प्रत्येक कदम सोंच-समझकर उठाना और कहाँ देश के शासन-प्रशासन के संचालकों ने देश को ही बारूद के ढेर पर बिठा दिया है.सरदार पटेल ने ५०० से भी अधिक टुकड़ों में बंटे देश को एक बनाया था लेकिन हमारे नीति निर्माता और नीति संचालक अपने-अपने हिस्से के हिंदुस्तान को बेचने में लगे हैं.

मंगलवार, 29 जून 2010

सपनों का पेटेंट

कल का दिन हिमाचल प्रदेश के लोगों के लिए खास दिन था.अवसर था लेह-मनाली मार्ग पर रोहतांग सुरंग के शिलान्यास का.गांधी-नेहरु परिवार की वर्तमान मुखिया सोनिया गांधी ने अपने कर-कमलों द्वारा इस महत्वपूर्ण परियोजना की नींव डालने के बाद अपनी ख़ुशी जाहिर करते हुए कहा कि यह परियोजना उनके पति स्वर्गीय राजीव गांधी का एक सपना था जिसे उन्होंने पूरा किया.शायद इस सुरंग का नाम भी भविष्य में राजीव गांधी के नाम पर राजीव गांधी सुरंग हो जाए.जब भी कांग्रेस सत्ता में आती है उसे गांधी-नेहरु परिवार के मर चुके लोगों के सपने याद आने लगते हैं और फ़िर उस सड़क,भवन या फ़िर सुरंग आदि का नाम परिवार के किसी मृत व्यक्ति के नाम पर रख दिया जाता है.जवाहर सुरंग, इंदिरा गांधी स्टेडियम वगैरह-वगैरह लाखों उदाहरण हैं.क्या रोहतांग सुरंग सिर्फ राजीव गांधी का ही सपना था?उस इलाके की हरेक आँखों ने यह सपना कभी खुली तो कभी बंद आँखों से नहीं देखा था.कांग्रेस का मानना है कि राजीव जी ने बेशुमार सपने देखे.शायद वे दिन-रात सिर्फ सपने ही देखते रहते थे वरना इतने छोटे से राजनीतिक जीवन वे इतने सारे सपने कैसे देख गए?वैसे भी सपने देखने में कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ता.राजीव ने जो सपने देखे हो सकता है वही सपना भैंस चरानेवाले राम खेलावन ने भी देखा हो.लेकिन वे छोटे लोग हैं और छोटे लोगों के पास सिर्फ सपने होते हैं सामर्थ्य नहीं कि जिससे वे अपने सपनों को हकीकत में बदल सकें और उन सपनों को अपना नाम दे सकें जैसा कि कांग्रेस कर रही है.इतिहास के साथ-साथ शिलान्यास और उद्घाटन पट्ट भी इस बात के गवाह हैं कि कांग्रेस के राज में जब भी कोई अच्छा काम होता है तो उसे वे गांधी-नेहरु परिवार के किसी नेता का सपना कहकर उनका नाम दे देती है.वर्तमान सरकार अपने प्रत्येक काम को राजीव गांधी का सपना बताती है यानी यह राजीव गांधी के सपनों के साकार होने का युग है.जब राजीव सत्ता में थे तो वह इंदिरा और जवाहर के सपनों के सच होने का काल था.ऐसा भी नहीं है कि राजीव जी ने सिर्फ अच्छे सपने ही देखे हों लेकिन कांग्रेस उनके बुरे सपनों को बखूबी छिपा लेती है.क्या बोफोर्स घोटाला या एंडरसन को अमेरिका भेजना उनका सपना नहीं था?या फ़िर सिखों का कभी न भुलाया जा सकनेवाला नरसंहार उनका सपना नहीं था या श्रीलंका में शांति सेना भेजना भी तो उन्हीं का सपना था.लेकिन कांग्रेस इन्हें उनका सपना मानने को तैयार नहीं है.यानी चित्त भी उसका और पट्ट भी उसका.वर्तमान काल में कांग्रेस जिस तरह हरेक निर्माण पर राजीव गांधी के नाम का ठप्पा लगाती जा रही है उससे तो ऐसा लगता है मानों भारतीयों की आँखों में तैरने वाले सारे अच्छे सपने सिर्फ राजीव गांधी के सपने हैं.मानों उन सपनों का उन्होंने जैसे पेटेंट करवा लिया था.लोकतंत्र में तानाशाही शासन की तरह की व्यक्ति पूजा को बढ़ावा देना अच्छा नहीं माना जा सकता.लेकिन कांग्रेस को तो आदर-सम्मान और पूजा के लायक एक ही परिवार सूझता है और वो है गांधी-नेहरु परिवार.देश में आज भी ईमानदारों की कमी नहीं है लेकिन किसी निर्माण कार्य को उनका नाम नहीं मिलेगा.फ़िर राजीव गांधी के नाम जितने अच्छे काम दर्ज हैं उससे कहीं ज्यादा उनके नाम बुरे कामों से जुड़े हुए हैं.उनके कई काम तो ऐसे रहे जिनसे देश को भारी क्षति उठानी पड़ी आर्थिक भी और कूटनीतिक या सामरिक भी.फ़िर कैसे इस तरह के व्यक्ति को कांग्रेस जबरन आदरणीय बनाने का प्रयास कर रही है?उनके किस काम से हमारे बच्चे प्रेरणा लें?जनता को धोखा देने और सिखों का कत्लेआम कराने से!

शुक्रवार, 25 जून 2010

लोकतंत्र से राजतन्त्र की ओर जाता भारत

कहने को भारत में प्रजातंत्र है और यहाँ सत्ता वोटिंग मशीनों के द्वारा बदलती है न कि धनबल और बाहुबल के माध्यम से लेकिन स्थितियां वास्तविकता से कोसों दूर हैं.वास्तव में चुनावों में धनबल और बाहुबल का प्रयोग इतना बढ़ गया है कि साधारण आदमी चुनाव जीतने की बात तो दूर चुनाव लड़ने की भी नहीं सोंच सकता.राज्यसभा चुनावों में तो धनबल इतना हावी हो गया है कि यह बुद्धिजीवियों के बदले पूंजीपतियों का सदन बनता जा रहा है.व्यापक सन्दर्भ में अगर देखें तो सच्चाई तो यह है कि देश लोकतंत्र से ही दूर होता जा रहा है और राजतन्त्र की ओर अग्रसर है.कभी तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने चाटुकारिता की सारी हदों को तोड़ते हुए कहा था कि इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया.दुर्भाग्य की बात है कि ३५ साल बाद भी हालात नहीं बदले हैं और केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के लगभग सभी नेता मानते हैं कि सोनिया इज इंडिया एंड इंडिया इज सोनिया.तब कांग्रेसी लम्पट संजय गांधी में देश का भविष्य देख रहे थे आज अनुभवहीन और अक्षम राहुल उनकी नज़र में देश का भविष्य हैं.क्या इसी को लोकतंत्र कहते हैं?जनता खुद ही परिवारवाद को बढ़ावा दे रही है.देश में एक-से-एक नेता भरे पड़े हैं फ़िर भी जनता गांधी-नेहरु परिवार को वोट देती है.राजतन्त्र भी इसलिए बुरा था क्योंकि उसमें वंशानुगतता का गुण था.राजतन्त्र में राजा रानी के गर्भ से पैदा होता था अब भी पैदा हो रहा है.राजतन्त्र में राजा सिर्फ एक ही परिवार यानी राजपरिवार से आता था भारतीय लोकतंत्र में भी प्रधानमंत्री सिर्फ एक ही परिवार यानी नेहरु-गांधी परिवार से ही आता है.राजतंत्र में राजा को चाटुकार सामंत घेरे रहते थे फ़िर उन सामंतों के भी छोटे सामंत होते थे.आज भी नेहरु-गांधी परिवार को चाटुकार यानी रीढ़विहीन कांग्रेसी नेता घेरे रहते हैं और दिन-रात राज-काज की चिंता छोड़कर चापलूसी में लगे रहते हैं.वंशानुगतता का यह गुण सिर्फ नेहरु-गांधी परिवार पर ही लागू नहीं होता छोटे कांग्रेसी सामंतों के यहाँ भी उनके बाद उनकी राजनीतिक विरासत को उनके ही घर-परिवार के लोग सँभालते हैं.नवीन जिंदल,जतिन प्रसाद,अभिषेक मनु सिंघवी आदि बहुत से लोग इसके उदाहरण हैं.वंशानुगतता के इस गुण या अवगुण से सिर्फ कांग्रेस ही ग्रस्त हो ऐसा भी नहीं है उत्तर में लालू-मुलायम-रामविलास और दक्षिण में करूणानिधि परिवार अपने-अपने दलों में सर्वेसर्वा हैं.इनकी पार्टी वास्तव में इनके परिवारों की निजी संपत्ति है जिसे इन्होंने जनता को धोखा देने के लिए छद्म लोकतान्त्रिक स्वरुप दे दिया है.सबसे निचले स्तर के सामंतों में राजतंत्रीय गुण अपेक्षाकृत कम होता है क्योंकि निचले स्तर के चुनाव में स्थानीयता की प्रधानता होती है और जनता को भावनाओं के डंडे से हांक ले जाना आसान नहीं होता फ़िर भी कुछ-न-कुछ वंशानुगतता का गुण वहां भी पाया जाता है.एक विश्लेषण के अनुसार देश की पूरी राजनीति का संचालन सिर्फ ५००० परिवार और उससे जुड़े लोग कर रहे हैं.क्या सामंतवाद अथवा राजतन्त्र इससे अलग होता था?इतना ही नहीं तब भी अधिकतर राजाओं और सामंतों का देश और देश की जनता से कोई लेना-देना नहीं होता था और वे भोग-विलास में लगे रहते थे.आज भी कमोबेश वही स्थिति है नेता सुख भोगने और धन अर्जित करने में लगे हैं.यह किस तरह सामंतवाद से अलग है और अगर प्रजातंत्र है तो कैसे है?अंत में मैं कहना चाहूँगा कि इन परिस्थितियों के लिए सिर्फ नेता ही दोषी नहीं हैं उनसे ज्यादा दोषी जनता है.जहाँ राजतन्त्र में यथा राजा तथा प्रजा का नियम लागू होता था प्रजातंत्र में यथा प्रजा तथा राजा का नियम लागू होता है.अंततः नेताओं को चुनते तो हम मतदाता ही हैं.हम क्यों लालच में आकर अयोग्य उम्मीदवारों को वोट देते हैं और फ़िर पॉँच सालों तक रोते रहते हैं?पॉँच साल बाद फ़िर से वही गलती दोहराते हैं और फ़िर से पॉँच साल तक अरण्य-रोदन.यह हमारे ही हाथों में है कि देश में वास्तविक प्रजातंत्र कैसे आये और देश पर से चंद परिवारों और धनबलियों व बाहुबलियों का  राज कैसे समाप्त हो.फ़िर हम क्यों नहीं अपने स्वार्थ में मतदान करने के बदले देशहित को ध्यान में  रखते हुए मतदान करते हैं?

रविवार, 20 जून 2010

चलो एक बार फ़िर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों


६० का दशक हिंदी फिल्मों के इतिहास में अपने खूबसूरत गानों और कर्णप्रिय संगीत के लिए जाना जाता है.इसी दशक में एक फिल्म आई थी गुमराह.इस फिल्म में एक इज्ज़तदार घराने की बहू की ज़िन्दगी में उसका पुराना प्रेमी दोबारा आ धमकता है.संयोग से उसकी अपनी पूर्व प्रेमिका के पति से मित्रता हो जाती है और वह पूर्व प्रेमिका के घर पर भोजन के लिए निमंत्रित किया जाता है .जहाँ जिद किये जाने पर वह यह गाना सुनाता है.फिल्म में तो गाने की सिचुएशन एक ही बार की बन पाई लेकिन हमारे देश की राजनीति में इस गाने की सिचुएशन बार-बार बन रही है.कारण है राजनीतिक दलों और नेताओं का अवसरवादी रवैय्या.कुर्सी के लिए बेमेल गठबंधन किये जा रहे हैं.आश्चर्य की बात है कि इस गाने की सिचुएशन सबसे ज्यादा उस पार्टी के साथ बन रही है जो अपने को पार्टी विथ डिफ़रेंस कहती है.जी,हाँ मैं बात कर रहा हूँ भाजपा की.सबसे पहले उसने कई साल पहले उत्तर प्रदेश में मायावती से हाथ मिलाया.एकदम बेमेल गठबंधन.एक दल दलितवादी और एक हिंदूवादी.गठबंधन कुछ महीने से ज्यादा नहीं चल पाया और दोनों दल एक बार फ़िर अजनबी बन गए.अभी कुछ दिन पहले झारखण्ड में भी इस दल की गठबंधन सरकार टूटी है.शिबू सोरेन ने लोकसभा में यू.पी.ए. के पक्ष में वोट दल दिया.ऐसे में यह स्वाभाविक था कि भाजपा नाराज होती.नाराज भाजपा ने झारखण्ड सरकार से समर्थन वापस ले लिया.लेकिन इसी बीच सोरेन ने उसके सामने मुख्यमंत्री की कुर्सी का टुकड़ा फेंक दिया.भाजपा एक महीने तक एक बहुत ही सम्मानित जानवर जिसका नाम लेकर उसके अध्यक्ष कुछ ही महीने पहले विवादों में फंस गए थे की तरह टुकड़े के पीछे लार टपकती दौड़ती रही.अंततः एक महीने बाद थक कर बैठ गई और फ़िर शिबू के लिए यही गाना गाने लगी.अब बिहार और झारखण्ड ठहरे जुड़वाँ भाई भले ही दोनों भाइयों के बीच ज़माने के चलन के अनुसार बंटवारा हो गया हो सो झारखण्ड को जैसे ही अस्थिरता की बीमारी लगी बिहार भी इस रोग से प्रभावित होने लगा.बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश को पहले से ही ग़लतफ़हमी की बीमारी है.बीमारी क्या है कि लालू-राबड़ी जब इस आवास में रहते थे तो उन्होंने गाय-भैंस पाल रखी थी.नीतीश जी को जानवर पालना पसंद नहीं था सो ग़लतफ़हमी पाल ली. वे समझते हैं कि बिहार की सरकार सिर्फ उनकी बदौलत काम कर रही है.बांकी कोई कुछ नहीं कर रहा.सो जीवन-साथी भाजपा से लड़ बैठे.जाने आगे बिहार की राजनीति क्या करवट ले.लेकिन लक्षण अच्छे नहीं हैं और यहाँ भी यह गाना गाया जा सकता है.अब दो का झगड़ा होगा तो फायदा तो तीसरे ही उठाएंगे सो लालू और पासवान ताक लगाये बैठे हैं कब उनके कानों में यह गाना गूंजना शुरू होता है.कुछ लोग बीच-बचाव में भी लगे हैं तो शिवानन्द तिवारी जैसे घरतोड़क आग में किरासन डालने में भी लगे हैं.तिवारीजी का रिकार्ड रहा है कि इन्होंने जिसकी पीठ पर भी हाथ फेरी वो बर्बाद हो गया है.पहले ये लालू की पीठ पर हाथ फेर चुके हैं.देखना है कि बिहार में एन.डी.ए. का सफलतापूर्वक चल रहा गठबंधन आगे चल पता है कि नहीं और कब हमें यह गाना सुनने को मिलता है.नीतीश ने तो गाना शुरू भी कर दिया है भाजपा कब तक गाना गाने से बचेगी?शायद इसी बात पर बिहार का भविष्य भी निर्भर करेगा.