बुधवार, 26 नवंबर 2014

मांझी सरकार के रिपोर्ट कार्ड में उपलब्धियाँ कम वादे ज्यादा

26 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जैसा कि नाम से ही जाहिर होता है कि रिपोर्ट कार्ड में सरकार की उपलब्धियाँ होनी चाहिए,सरकार द्वारा किए गए कार्यों का जिक्र होना चाहिए लेकिन बिहार की मांझी सरकार की वार्षिक रिपोर्ट को देखकर यह दुःखद आश्चर्य हुआ कि रिपोर्ट कार्ड में रिपोर्ट थी ही नहीं बल्कि थी तो सिर्फ वादों की भरमाऱ। नौ साल से बिहार पर राज कर रही जदयू सरकार ने एक बार फिर से राज्य के लोगों के साथ प्रति वर्ष एक के हिसाब से 9 वादे कर दिए कि हम सभी किसानों को छह माह में बिजली कनेक्शन देंगे, धान के क्रय पर प्रति क्विंटल 300 रुपये बोनस देंगे, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक व दिल्ली की तर्ज पर 70 हजार सिपाही-हवलदारों को 13 महीने का वेतन देंगे, एससी-एसटी आवासीय विद्यालयों में आवासन क्षमता 20 हजार से बढ़ाकर अब एक लाख करेंगे, एक लाख से अधिक आबादी के शहरों में एक यातायात थाना खोलेंगे, दो लाख से अधिक की आबादी के लिए डीएसपी कार्यालय की स्थापना करेंगे, बिहार उर्दू अकादमी को एक करोड़ के अनुदान को बढ़ाकर तीन करोड़ करेंगे, पर्यावरण की चिंता करेंगे व मुंगेर में वानिकी महाविद्यालय खोलेंगे, अफसरों और कर्मचारियों के प्रशिक्षण की नयी व्यवस्था शुरू करेंगे। वहीं सरकार ने अपनी उपलब्धियों में जाति,आय एवं आवास प्रमाण-पत्र के लिए तत्काल सेवा आरंभ करने के काम को सबसे ऊपर रखा है। बिहार लोक सेवाओं के अधिकार के तहत प्राप्त 8 करोड़ 39 लाख 77 हजार 695 आवेदनों में से 8 करोड़ 26 लाख 76 हजार 474 के निष्पादन को भी सरकार बड़ी उपलब्धि बता रही है। मगर सवाल उठता है कि क्या सारे आवेदनों का निष्पादन निर्धारित समय-सीमा के भीतर कर दिया गया? अगर नहीं तो फिर पहले और वर्तमान की स्थिति में क्या अंतर रह गया? इसी तरह सरकार 411 भ्रष्ट लोक सेवकों की बर्खास्तगी को भी अपनी उपलब्धि बता रही है परंतु सवाल उठता है कि क्या इससे राज्य में भ्रष्टाचार में और घूस के रेट में किसी तरह की कमी आई है? नहीं भ्रष्टाचार तो पहले से और भी बढ़ा है फिर यह कैसा जीरो टॉलरेंस है? फिर ये जो 411 भ्रष्ट लोकसेवक हैं उनको तो जनता ने पहल करके पकड़वाया है सरकार अपनी तरफ से कब भ्रष्टाचारियों के खिलाफ स्वतः कार्रवाई करेगी? जब मुख्यमंत्री ही अपने दामाद को पीए बनाकर नियमों को तोड़ेगा,जब मुख्यमंत्री का बेटा ही शराब पीकर होटल में रंगदारी करेगा,महिला दारोगा का यौन-शोषण करेगा तो फिर कैसे भ्रष्टाचार कमेगा?
मित्रों,इसी तरह से सरकार कह रही है कि वर्ष 2015 तक राज्य के लिए 5000 मेगावाट बिजली उपलब्ध होगी मगर सरकार ने यह नहीं बताया है कि वह बिजली आएगी कहाँ से। सच्चाई तो यह है कि इसमें से ज्यादातर बिजली केंद्र द्वारा बिहार को प्राप्त हो रही है और बिहार में बिजली का उत्पादन आज भी काफी कम है। सरकार ने रिपोर्ट कार्ड में खुलेआम जाति-पाँति का खेल खेला है। सरकार जहाँ एक ओर सवर्ण आयोग को जल्दी रिपोर्ट देने के लिए कह रही है वहीं वह यह भी बता रही है कि फलां-फलां जाति को अनुसूचित जाति और अत्यंत पिछड़े वर्ग में शामिल किया गया है। मतलब अभी भी आरक्षण को सरकार ने वोट पाने का हथियार बनाया हुआ है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सीएम मांझी अभी कुछ ही दिन पहले सवर्णों को विदेशी बता रहे थे और अब अचानक सवर्णों पर मेहरबान हो रहे हैं। मुझे तो इस बात की आशंका लग रही हैं कि कहीं मुख्यमंत्री इस मामले में भी ऐसा न कह दें कि मैंने तो मजाक किया था। मुख्यमंत्री मजाक बहुत करते हैं। काम कुछ नहीं करते राज्य की जनता के साथ सिर्फ मजाक ही करते हैं। न जाने कब किस मुद्दे पर पलट जाएँ और कह दें कि मैंने तो जनता के साथ मजाक किया था। साथ ही सरकार बता रही है कि राज्य में एक आतंकवाद निरोधी दस्ते का गठन किया गया है मगर यह नहीं बताया है कि इस दस्ते ने अबतक किया क्या है? कितने आतंकियों को पकड़ा है और कितने माड्युलों को ध्वस्त किया है? राज्य में 85 नए थाने भी खोले गए हैं। आश्चर्य है कि नए थानों का खुलना उपलब्धि कैसे हो गई बल्कि यह तो शर्मनाक स्थिति है कि अपराध बढ़े हैं तभी तो नए थाने खोलने की आवश्यकता पड़ी? सरकार कहती है कि उसने इतने आर्सेनिक और लौह-शोधक पेयजल संयंत्र स्थापित किए मगर जहाँ तक हमारी जानकारी है वैशाली जिले में स्थापित किया गया ऐसा कोई भी संयंत्र इस समय काम नहीं कर रहा है और सफेद हाथी बना हुआ है और मैं समझता हूँ कि राज्य के बाँकी जिलों के संयंत्रों का भी यही हाल है।
मित्रों,रिपोर्ट कार्ड में किए गए जिस वादे पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है वो यह है कि सरकार राज्य की छात्राओं को मुफ्त में उच्च शिक्षा देगी। अच्छा होता कि सरकार उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने के उपाय करती बजाए मुफ्त शिक्षा देने के। सच्चाई तो यह है कि राज्य के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में अब पढ़ाई होती ही नहीं है बल्कि डिग्री बाँटी जाती है। राज्य में शोध के नाम पर सिर्फ कट,कॉपी,पेस्ट चल रहा है। मैट्रिक से लेकर एमए तक की परीक्षाओं में कुछेक अपवादों को छोड़कर छात्र-छात्राओं को जमकर नकल की सुविधा उपलब्ध करवाई जाती है जिससे एमए पास विद्यार्थी भी एक आवेदन-पत्र तक लिख पाने में असमर्थ होते हैं।
मित्रों,आश्चर्यजनक तरीके से वादों की लिस्ट से भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस नदारद है जबकि 2010 के चुनावों में यह सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर था। तो क्या यह मान लिया जाए कि सरकार ने भ्रष्टाचार के आगे आत्मसमर्पण कर दिया है? कहने का तात्पर्य यह है कि राज्य सरकार के पास उपलब्धियों के नाम पर जब कुछ था ही नहीं तो वो बताती क्या? वास्तविकता तो यह है वर्ष 2005 से 2013 की उस अवधि में जब भाजपा भी सरकार में शामिल थी तब सरकार ने जो भी अच्छे काम किए उनमें से ज्यादातर या लगभग सारे भाजपा मंत्रियों द्वारा किये गए थे। वास्तविकता यह भी है कि भाजपा को सरकार से हटाने के बाद से उन मंत्रालयों व विभागों की स्थिति को बिगाड़ा ही गया है जिसमें स्वास्थ्य विभाग सबसे ऊपर है जिसका सर्वोत्तम उदाहरण आईजीआईएमएस में जज से थर्मामीटर खरीदवाना है। जनता ने नीतीश कुमार को इसलिए जनमत नहीं दिया था कि वे 9 साल सरकार चलाने के बाद भी उपलब्धियाँ गिनवाने के बदले वादे ही करें। यह तो वही बात हो गई कि परीक्षार्थी परीक्षा में प्रश्नों के उत्तर देने के बजाए अपनी आगे की पढ़ाई की योजना प्रस्तुत करे कि हम अगली कक्षा में इस तरह से कड़ी मेहनत से पढ़ेंगे और हम यह सब पढ़ेंगे इसलिए हमें उत्तीर्ण घोषित कर दिया जाए।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

कबीरपंथियों के पाखंड की पराकाष्ठा हैं रामपाल

20 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,साहेब बंदगी!
कबीर कहते हैं कि
कबीरा जब हम पैदा हुए जग हँसे हम रोये।
ऐसी करनी कर चलो हम हँसें जग रोये।
मगर कबीर के अनुयायी अब जो कर रहे हैं उसको देखकर दुनिया हँस भी रही है और रो भी रही है। हँस रही है यह देखकर कि कबीर ने क्या कहा था और अनुयायी क्या कर रहे हैं और रो रही है उनके नैतिक पतन को देखकर। यह देखकर कि जो कबीर आजीवन पाखंड और पाखंडवाद से लड़ते रहे उनके ही नाम पर उनके कथित भक्तों ने यह कैसा पाखंड का साम्राज्य खड़ा कर दिया!
मित्रों,मैं वर्षों पहले अपने एक आलेख कबीर के नाम पर पाखंड का साम्राज्य में कबीर के नाम पर फैले पाखंड के साम्राज्य पर काफी विस्तार से लिख चुका हूँ लेकिन मैं जहाँ तक समझता था कबीर के नाम पर धंधा करनेवाले उससे कहीं ज्यादा ठग,चोर,फरेबी,पाखंडी और मानवशत्रु निकले। अगर ऐसा नहीं है तो फिर यह बाबा रामपाल कैसा कबीरपंथी है और किस तरह से कबीरपंथी है। कबीर ने तो अपने प्रशंसकों को इंसान बनने और इंसानों के साथ इंसानों की तरह पेश आने की शिक्षा दी थी फिर यह रामपाल भगवान कैसे बन गया? पूरे आश्रम में जमीन के भीतर बने सुरंगों के माध्यम से कहीं भी प्रकट हो जाना,विज्ञान के चमत्कारों के माध्यम से हवा में चलना,लेजर की सहायता से अपने चारों ओर आभामंडल बनाना और सिंहासन सहित आसमान से उतरना आदि के माध्यम से रामपाल तो क्या कोई भी भगवान बन सकता है।
मित्रों,हमें इस बात को भी ध्यान में रखना पड़ेगा कि कबीरपंथ के अधिकतर अनुयायी गरीब और दलित-पिछड़ी जातियों से आते हैं जिनके खाने के भी लाले पड़े होते हैं। स्वाभाविक रूप से उनमें से ज्यादातर अनपढ़ होते हैं और उनमें इतनी बुद्धि नहीं होती कि वे रामपाल के चमत्कारों को तर्क और विज्ञान की कसौटी पर कस सकें। रामपाल ने गिरफ्तारी से बचने के लिए जो मानव-शील्ड बनाई उनमें से अधिकतर लोग इसी तरह के थे।
मित्रों,विज्ञान और संचार-क्रांति का उपयोग जहाँ इस तरह की ठगविद्या के भंडाभोड़ के लिए होना चाहिए वहीं दुर्भाग्यवश उसका उपयोग ठगने के लिए किया जा रहा है। दिनभर टीवी चैनलों पर ऐसे बाबाओं से संबंधित कार्यक्रम आते रहते हैं जिनमें से कोई जन्तर बेच रहा होता है तो कोई भविष्य बतानेवाली किताब और कोई तो अपनी कृपा भी। और आश्चर्य की बात तो यह है कि 21वीं सदी में भी इन बाबाओं की दुकानें धड़ल्ले से चल रही हैं।
मित्रों,रहा बाबा रामपाल का सवाल तो यह आदमी संत या अवतार तो क्या आदमी कहलाने के लायक भी नहीं है। जो व्यक्ति आदमी की जान का इस्तेमाल अपने को जेल से जाने से बचने के लिए करे उसको भला अवतार (भले ही संत कबीर का ही) कहा जा सकता है क्या? संत या अवतार तो वो है जो एक आदमी की प्राण-रक्षा के लिए अपने प्राण को न्योछावर कर दे। कबीर संत थे जिन्होंने अंधविश्वास,भेदभाव,छुआछूत और पाखंड के खिलाफ आवाज उठाई। भले ही तत्कालीन शासक सिकंदर लोदी ने तीन-तीन बार उनपर जानलेवा हमला क्यों न करवाया कबीर न तो डरे और न ही जान की परवाह ही की। कबीर ने तो भगवान से बस इतना ही मांगा था-
साईँ इतना दीजिए जामें कुटुम्ब समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय।।
अर्थात् हे ईश्वर,हमको बस इतना बड़ा घर दे दो जिसमें मेरा पूरा परिवार समा जाए और इतना धन दे दो कि न तो मेरा परिवार ही भूखा रहे और न हीं अतिथि को मेरे द्वार से भूखा लौटना पड़े। फिर कबीर के रामपाल जैसे अनुयायियों को क्यों राजाओं जैसे ऐश्वर्यपूर्ण ठाठ-बाट की आवश्यकता पड़ गई? वे क्यों उस महाठगनी माया के चक्कर में पड़ गए जिसे बारे में कबीर ने कहा था कि-
माया महा ठगनी हम जानी।
तिरगुन फांस लिए कर डोले बोले मधुरी बानी।।
केसव के कमला भय बैठी शिव के भवन भवानी।
पंडा के मूरत भय बैठीं तीरथ में भई पानी।।
योगी के योगन भय बैठी राजा के घर रानी।
काहू के हीरा भय बैठी काहू के कौड़ी कानी।।
माया महा ठगनी हम जानी।।
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि अगर कहीं पर संत कबीर की आत्मा होगी तो आज जरूर रो रही होगी। कबीर ने अपने जीते-जी ऐसा कभी नहीं कहा कि उनको उनकी मृत्यु के बाद कथित भूदेव ब्राह्मणों की तरह देवता या भगवान का दर्जा दे दिया जाए बल्कि वे तो लोगों की ज्ञान-चक्षु खोलना चाहते थे जिससे कोई बाबा या ढोंगी उनको बरगला न सके। वे तो चाहते थे कि लोग किताबों में लिखी बातों से ज्यादा अपनी तर्कशक्ति,बुद्धि और विवेक पर विश्वास करें। वे तो चाहते थे कि लोग जब उनकी बातों पर अमल करें और उनकी शिक्षाओं का पालन करें तब भी आँख मूंदकर न करें बल्कि भले-बुरे पर विचार करके करें फिर कबीर को किसने और क्यों साधारण इंसान से साक्षात् परब्रह्म बना दिया? क्या ऐसा रामपाल जैसे ढोंगियों ने इसलिए नहीं किया क्योंकि उनको खुद को भगवान घोषित करना था और लोगों के विश्वास का नाजायज फायदा उठाना था?
मित्रों,अंत में दुनिया के तमाम कबीरपंथियों और सारे अन्य पंथियों से मेरा यह विनम्र निवेदन है कि वे सारे महामानवों को इंसान ही रहने दें भगवान न बनाएँ क्योंकि जैसे ही हम उनको भगवान मान लेंगे उसी क्षण हम यह भी मान लेंगे कि इनके जैसा हो पाना किसी भी मानव के लिए संभव ही नहीं है। चाहे वे राम हों,कृष्ण हों,बुद्ध,ईसा,महावीर या कबीर हों ये सभी इंसान थे और इस धरती पर विचरण करते थे। इन्होंने भी उसी प्रक्रिया से जन्म लिया था जिस प्रक्रिया से हम सभी ने लिया है। इनके भीतर जरूर ऐसे गुण थे जिसके चलते इन लोगों को महामानव की श्रेणी में रखा जा सकता है और ऐसे गुण हमारे भीतर भी हो सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर इन महामानवों के महान गुणों का विकास करें,उनके आदर्शों पर चलें और पूरी दुनिया को महामानवों की दुनिया बनाएँ न कि दिन-रात इनका नाम रटें। जिस दिन ऐसा हो जाएगा उसी दिन धरती पर सतयुग आ जाएगा न कि किसी मकान या महल का नाम सतलोक आश्रम रख देने से आएगा।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 19 नवंबर 2014

मेला सोनपुर का आता है हर साल,आके चला जाता है

19 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,भारत त्योहारों और मेलों का देश है। यहाँ रोजाना कोई न कोई-न-कोई पर्व-त्योहार होता है और रोज कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी हिस्से में मेला लगता है मगर सोनपुर के हरिहर क्षेत्र मेले की तो साहब बात ही कुछ और है। हाँ भई यह मेला उसी हरिहरनाथ के पूजन के सिलसिले में लगता है जिसके गीत हर साल बिहार और पूर्वांचल के कोने-कोने में होली में गाए जाते हैं-बाबा हरिहरनाथ,बाबा हरिहरनाथ सोनपुर में रंग लूटे,होरी राम हो हो हो,बाबा हरिहरनाथ बाबा हरिहरनाथ.....।
मित्रों,कोई नहीं कह सकता कि यह विश्वप्रसिद्ध मेला कितने सालों से लग रहा है। पहले बिहार के लोग सालभर इस मेले का इंतजार करते। कार्तिक पूर्णिमा के दिन बैलगाड़ी जुतती और लोग दाल-चावल बर्तन लेकर मेले में आते। गंगा-नारायणी के पवित्र संगम पर गंगा-स्नान करते और मेला घूमते। तब यहाँ कई वर्ग किलोमीटर में हाथी,घोड़े,गाय,बैल,बकरी और भैंसों के बाजार लगते। लोग जानवरों को बेचते और खरीदते। रात में किसी पेड़ के नीचे दरी बिछाकर या बैलगाड़ी पर ही सो जाते। लौटने लगते तो ग्रामीण सामुदायिक व व्यक्तिगत उपयोग के लिए दरी,कंबल,बर्तन,चादर,साड़ियाँ-कपड़े,खिलौने,मिठाई आदि लेकर लौटते। गांव में बच्चों को भी अपने पिता-चाचा-दादा-मामा के मेले से लौटने का बेसब्री से इंतजार रहता। अगर किसी बच्चे को मेले में स्वयं जाने का अवसर मिल जाता तो समझिए कि उसकी तो लौटरी ही लग गई। फिर वो कई महीनों तक अपने ग्रामीण मित्रों को मेले की कहानियाँ सुनाता रहता।
मित्रों,बदलते जमाने के साथ दुनिया बदली है,लोग बदले हैं सो सोनपुर मेला भी बदला है। अब ज्यादातर लोग मोटरसाईकिल से आते हैं। स्टैंडवाले को 5 के बदले 15 रुपया देकर गाड़ी खड़ी करते हैं और घूम-फिरकर घर चल देते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सुबह की ट्रेन से आते हैं और शाम की ट्रेन से वापस लौट जाते हैं। अभी भी मेले के लिए पूरे एक महीने तक ट्रेन मेले में रूकती है। जानवर के नाम पर अब दस-बीस घोड़ों और कुछ दर्जन गाय-भैसों,कुछेक बैलों के अलावा और कुछ होता नहीं होता। अब गांव में भी ज्यादातर लोगों ने गाय-बैलों को पालना छोड़ दिया है क्योंकि अब खेती बैलों से नहीं मशीनों से होती है नहीं तो एक जमाना वह था जब 1856 में बाबू कुंवर सिंह ने इसी मेले से अपनी सेना के लिए एकसाथ 5000 घोड़े खरीदे थे। फिर भी मेले में भीड़ कम नहीं होती। बिहार सरकार की प्रदर्शनियाँ हर साल की तरह इस साल भी लगी हैं लेकिन देखने से लगता है कि जैसे पिछले साल से कोई बदलाव नहीं किया गया है। वहीं जानकारियाँ,वहीं तस्वीरें।
मित्रों,लोगों की भगवान के प्रति आस्था में कमी आई है जिसके चलते जहाँ मेले में अपार भीड़ होती है वहीं बाबा हरिहरनाथ के मंदिर में इक्के-दुक्के लोग ही दिखते हैं। मेले में हर मजहब के लोग देखे जा सकते है। हिन्दू,मुसलमान और कुछेक विदेशी सैलानी भी। मेला घूमते-घूमते अगर थक गए हों तो बिहार सरकार के जन संपर्क विभाग के पंडाल में आ जाईए। सैंकड़ों कुर्सियाँ लगी हुई हैं और लगातार लोकगीतों का गायन चलता रहता है जिस पर नर्तक-नर्तकियाँ नृत्य भी करते रहते हैं। मेले में ही मुझे एक मित्र से कई साल बाद भेंट भी हो गई। जनाब कभी माखनलाल के नोएडा परिसर में हमारे साथ पढ़ते थे और आजकल बिहार पुलिस में सब इंस्पेक्टर हैं। नाम है-रंजय कुमार। पहले तो जनाब ने पहचाना ही नहीं लेकिन बाद में जब मैंने अपना प्रेस कार्ड दिया तब पहचान लिया।
मित्रों,कुछ लोगों का मानना है कि एक दिन यह मेला समाप्त हो जाएगा लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता और ऐसा होना भी नहीं चाहिए। सोनपुर मेला हमारी शान है हमारी आन है। एक स्थान पर यहाँ मनोरंजन के जितने साधन हैं,जितने खिलौने,खाद्य-सामग्री और रोजाना उपयोग में आनेवाली चीजें बिक रहीं हैं शायद दुनियाँ में ऐसा नजारा कहीं और शायद ही देखने को मिले। पिछले कई सालों से कुछ कमी प्रशासन की तरफ से भी रही है। किसी समय सोनपुर के काली घाट और हाजीपुर के कोनहारा घाट के बीच नावों का लचका पुल बनता था जो अब नहीं बनाया जाता। अगर बनता तो मेले की शोभा में चार चांद लग जाते। कल मेरी भी ईच्छा हो रही थी कि मैं पैदल ही इस पार से उस पार कोनहारा घाट चला जाऊँ लेकिन ऐसा हो न सका। एक और कमी मुझे शिद्दत से महसूस हुई और वह है शौचालय की कमी। कहने को तो प्रशासन ने बँसवारी में टाट से घेर कर शौचालय बनवा दिए हैं लेकिन वे इतने गंदे हैं कि कोई उनमें नहीं जाता और लोग यत्र-तत्र मल-त्याग करते रहते हैं जिससे घोड़ा बाजार की तरफ तो जाना भी मुश्किल हो जाता है। हमने कई महिलाओं को खुले में ही शौच करते देखा और हम नहीं समझते कि यह सब देखकर देश-विदेश से आनेवाले सैलानियों के मन में बिहार की कोई अच्छी छवि बनेगी।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 16 नवंबर 2014

दुनिया के सबसे बड़े हवाबाज और वादावीर नेता हैं नीतीश

16 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बिहार के पीएम इऩ वेटिंग नीतीश कुमार के भाषणों को सुनकर उनपर दया भी आती है और हँसी भी। आश्चर्य होता है कि नीतीश कुमार कितने झूठे और बेशर्म हैं! मैं एक बिहारी होने और पिछले सात सालों से बिहार में ही रहने के कारण यह  दावे के साथ कह सकता हूँ कि न सिर्फ भारत बल्कि पूरी वसुंधरा पर नीतीश कुमार से बड़ा दूसरा कोई वादावीर इस समय नहीं है और गजब यह कि अपने 9 सालों के काफी लंबे शासन में अपना एक भी वादा पूरा नहीं करनेवाले नीतीश भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके छठे महीने में ही उनके द्वारा किए गए वादों का हिसाब मांग रहे हैं।
मित्रों,जब 2005 का विधानसभा चुनाव चल रहा था तब नीतीश कुमार ने बिहार को सुशासन देने का वादा किया। बिहार में सुशासन तो आया नहीं मगर नौकरशाहों का शासन जरूर आ गया। मतलब कि एक अति के बदले नीतीश ने दूसरी अति को स्थापित कर दिया। इसी प्रकार जब वर्ष 2010 का विधानसभा चुनाव चल रहा था तब नीतीश कुमार ने बिहार की जनता से वादा किया कि पहली पारी में हमने कानून-व्यवस्था में सुधार किया अब अगली पारी में भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे। हालाँकि रोज-रोज बिहार में औसतन तीन-चार घूसखोरों को रंगे हाथों पकड़ा गया लेकिन इससे राज्य में भ्रष्टाचार की सेहत पर कोई खास असर नहीं पड़ा बल्कि बढ़े हुए जोखिम के मद्देनजर रेट में कई गुना की बढ़ोतरी हो गई।
मित्रों,फिर भी बिहार की जनता नीतीश सरकार से काफी हद तक संतुष्ट थी मगर इसी बीच नीतीश जी पर भारत का प्रधानमंत्री बनने का फितूर सवार हो गया और उन्होंने भारतीय जनता पार्टी से सांप्रदायिकता के नाम पर गठबंधन तोड़ दिया। बिहार की जनता हतप्रभ थी कि जो पार्टी पिछले 18 सालों से धर्मनिरपेक्ष थी 2014 के लोकसभा चुनावों के समय कैसे सांप्रदायिक हो गई। जनता ने नीतीश के इस घोर अवसरवादी कदम और सहयोगी दल के साथ की गई धोखेबाजी को बिल्कुल भी पसंद नहीं किया और उनकी पार्टी आज बिहार में तीसरे नंबर की पार्टी बन चुकी है।
मित्रों,इसी तरह नीतीश जी ने कहा था कि अगर 2015 तक बिहार के हर गांव और घर में बिजली नहीं पहुँची तो वे वोट मांगने नहीं आएंगे मगर नीतीश जी अपने इस वचन पर भी कायम नहीं रहे और विधानसभा चुनावों से एक साल पहले से ही जनता के द्वार पर जा पहुँचे हैं। नीतीश जी ने अपनी धन्यवाद यात्रा और विकास यात्रा के दौरान बिहार के कई गांवों में रात बिताई और जमकर थोक में शिलान्यास किया। बेगूसराय और मोतीहारी की जनता ने जब कई महीनों के इंतजार के बाद भी पाया कि काम शुरू नहीं हो रहा है तब उन्होंने शिलापट्ट को उखाड़कर फेंक दिया। इधर नीतीश जी भी यकीनन शिलान्यासों को भूल चुके थे। मेरे क्षेत्र राघोपुर (वैशाली) की जनता भी इन दिनों काफी निराश है क्योंकि उनकी सड़क-पुल की उम्मीद धूमिल होने लगी है और इस दिशा में कहीं कोई काम होता हुआ नहीं दिख रहा है। बिहार के भूमिहीनों के साथ नीतीश कुमार ने वादा किया था कि उनको तीन-तीन डिसमिल जमीन दी जाएगी मगर हुआ कुछ नहीं। इसी तरह नीतीश जी ने बिहार के हर जिले में पॉलिटेक्निक और हर गांव में उच्च विद्यालय खोलने का वादा किया था जो शायद अब उनको याद भी नहीं है। नीतीश जी यह भी भूल गए हैं कि उन्होंने मार्क्सवादी नेता स्व. वासुदेव सिंह के इस आरोप कि बिहार सरकार प्राईवेट कंपनी बन गई है के जवाब में कहा था कि अबसे बिहार सरकार कांट्रैक्ट के आधार पर नहीं बल्कि स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति करेगी। इसी प्रकार नीतीश कुमार महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं कर पाए जो आज तक भी नहीं हो पाई है। नीतीश कुमार ने वादा किया था कि बीपीएससी की परीक्षा अब प्रत्येक साल हुआ करेगी लेकिन वे यह वादा भी पूरा नहीं कर सके। नीतीश कुमार ने वादा किया था कि वे बिहार में कानून का राज कायम करेंगे मगर नीतीश की पहली पारी के विपरीत आज के बिहार में फिर से जंगलराज की स्थिति बन गई है। इसी तरह नीतीश कुमार ने वादा किया था कि वे कभी जाति-धर्म की राजनीति नहीं करेंगे बल्कि हमेशा विकास की राजनीति करेंगे। नीतीश जी ने कहा था कि मंदिरों-मस्जिदों और स्कूलों के पास शराब की सरकारी दुकानें नहीं खोली जाएंगी और जो दुकानें खुल गई हैं उनको बंद कर दिया जाएगा मगर अफसोस ऐसा हो न सका। नीतीश कुमार ने पटना को जलजमाव से मुक्त करने का वादा भी किया था लेकिन राजधानी पटना इस साल भी बरसात में झील में बदल गई और हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद भी बनी रही। नीतीश कुमार ने वादा किया था कि वे बिहार की शिक्षा-व्यवस्था का कायाकल्प कर देंगे मगर उन्होंने उल्टे शिक्षा को बर्बाद कर दिया। इस साल इंटर के परीक्षार्थियों के साथ कैसा मजाक हुआ यह पूरी दुनिया ने देखा है। स्क्रूटनी में कॉपियाँ जाँची नहीं गईं और कॉपियों को खोले बिना ही एक-दो नंबर बढ़ा दिए गए जिससे मेधावी छात्र-छात्राओं का एक साल बर्बाद हो गया।
मित्रों,हम कहाँ तक गिनवाएँ कि नीतीश कुमार ने कितने वादे किए थे शायद शेषनाग भी नहीं गिना पाएंगे। हाँ,हम इतना दावे के साथ कह सकते हैं कि नीतीश कुमार ने उनमें से किसी भी एक भी वादा को पूरा नहीं किया। इस प्रकार हम उनको भारत का सबसे बड़ा वादावीर के रूप में विभूषित कर सकते हैं। जहाँ तक नरेंद्र मोदी का सवाल है तो कालाधन से लेकर प्रत्येक मुद्दे और वादे पर केंद्र सरकार कायम है और संजीदगी व शीघ्रता से उस दिशा में कदम भी उठा रही है। यहाँ तक कि जी20 की बैठकों में भी मोदी का सबसे ज्यादा जोर भ्रष्टाचार और कालेधन की वापसी पर ही है। ये बात और है कि नीतीश जी की रणनीति चूँकि केंद्र सरकार की कथित विफलताओं को मुद्दा बनाकर बिहार में विधानसभा चुनाव लड़ना है इसलिए उनको केंद्र सरकार काम करती हुई दिख ही नहीं रही जबकि होना तो यह चाहिए उनको केंद्र की वर्तमान सरकार की विफलताओं के मुद्दे पर नहीं बल्कि अपनी सरकार की सफलताओं के मुद्दे पर चुनावों में जाना चाहिए।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

नीतीश की भई गति साँप छछूंदर केरी

16 नवंबर,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,रामचरितमानस में एक प्रसंग है कि कैकयी द्वारा वर मांगने के बाद राम वनवास जाने को उद्धत होते हैं। जाने से पहले जब वे अपनी जननी कौशल्या से अनुमति लेने जाते हैं तब उनकी माँ असमंजस में पड़ जाती है कि करूँ तो क्या करूँ? अगर अपने पुत्र को वन जाने से रोकती है तो पति पर वचनभंग का कलंक लगता है और अगर वनवास पर जाने को कहती है पति के प्राण चले जाएंगे। ऐसे में माता कौशल्या की स्थिति वही हो गई थी जैसी कि छुछुंदर को निगल लेने के बाद साँप की हो जाती है। साँप अगर छुछुंदर को निगल जाता है तो मर जाएगा और अगर उगल देता है तो लोकमान्यताओं के अनुसार अंधा हो जाएगा।

मित्रों,लगभग वही स्थिति इन दिनों बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी की भी है। नीतीश जी ने भाजपा से गठबंधन तोड़ तो दिया मगर लोकसभा चुनावों में बिहार की जनता ने उनके इस कदम को पसंद नहीं किया। घबराहट के मारे उन्होंने अपने चिरशत्रु लालू प्रसाद यादव के साथ नया गठबंधन बनाया और साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा मगर फिर से जनता ने उनकी पार्टी को लालू प्रसाद की पार्टी से आधी ही सीट दी। कहने का तात्पर्य यह कि एक नहीं दो-दो बार दो-दो चुनावों में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू को राजद के मुकाबले आधी ताकतवाला दल साबित हो चुका है ऐसे में स्वाभाविक तौर पर अगले साल होनेवाले विधानसभा आम चुनावों में राजद उनको अपने बराबर सीट नहीं देनेवाला है। कल डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह ने सीटों के बँटवारे के लिए लोकसभा चुनाव,2014 में प्राप्त मत-प्रतिशत को आधार बनाने की मांग करके इस बात का संकेत भी दे दिया है।

मित्रों,ऐसे में नीतीश कुमार चाहते ही नहीं हैं कि महागठबंधन के तहत चुनाव लड़ा जाए और इसलिए वे जनसमर्थन जुटाने के लिए संपर्क-यात्रा पर निकले हुए हैं। एक और मोर्चे पर नीतीश जी हालत न घर के घाट वाली हो रही है। नीतीश जी ने जीतनराम मांझी को कठपुतली समझकर अपने स्थान पर मुख्यमंत्री तो बना दिया लेकिन मांझी अब सिर का दर्द बन गए हैं। वे लगातार अपने बेतुके बयानों से विवाद खड़ा कर रहे हैं और बाँकी जातियों को दरकिनार कर केवल दलितों-महादलितों के नेता बनने का प्रयास कर रहे हैं जिससे पार्टी के प्रति अन्य जातियों में गुस्सा पैदा हो रहा है। इस प्रकार नीतीश कुमार न तो मांझी को मुख्यमंत्री बनाए रख सकते हैं और न ही हटा ही पा रहे हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 12 नवंबर 2014

कांग्रेस का इतिहास है इसलिए कांग्रेस अब इतिहास है

12 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बात उस समय की है जब फ्रांस का शासक नेपोलियन महान फ्रांस के सैनिक स्कूल में पढ़ता था। उसके साथ फ्रांस के बड़े-बड़े कुलीन सामंतों के लड़के पढ़ते थे। चूँकि नेपोलियन कुलीन नहीं था इसलिए वे उससे जलते थे। एक दिन उन्होंने नेपोलियन को नीचा दिखाने के लिए उससे पूछा कि तुम किस वंश के हो। नेपोलियन ने पूरी दृढ़ता के साथ उत्तर दिया कि मेरा वंश मुझसे शुरू होता है।
मित्रों,इन दिनों भारत की ऐतिहासिक राजनैतिक पार्टी कांग्रेस का भी वही हाल है जो फ्रांसीसी क्रांति के समय कुलीनों की या उनके बच्चों की थी। कांग्रेस ने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती पर पार्टी द्वारा आयोजित होनेवाले समारोह में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आमंत्रित नहीं करने की धृष्टता की है और उल्टे वो भाजपा पर अपने नेताओं को छीनने के आरोप लगा रही है। उसका यह भी कहना है कि कांग्रेस का गौरवशाली इतिहास रहा है जबकि भाजपा या मोदी को ऐसा सौभाग्य प्राप्त नहीं है।
मित्रों,कांग्रेस अभूतपूर्व पतन के बावजूद  निश्चित रूप से यह नहीं समझ पा रही है भले ही कांग्रेस के पास अतीत में एक-से-एक तेजस्वी और तपःपूत नेता थे लेकिन आज उसके पास ऐसा एक भी नेता नहीं है जो योजना बनाने,वक्तृता,प्रशासनिक योगयता और त्याग में भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पासंग में भी ठहरता हो। जनता को इतिहास नहीं वर्तमान चाहिए। आज नेहरू,आजाद,प्रसाद,पटेल,गांधी या इंदिरा नहीं आनेवाले हैं देश और कांग्रेस को चलाने बल्कि देश को वही लोग चलायेंगे जो इस समय जीवित हैं और जो कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व है वह परवर्ती मुगलों की तरह पूरी तरह से अक्षम है।
मित्रों,हमारे गांव में एक जमींदार था जिसके दरवाजे पर कभी कई-कई हाथी झूमते रहते थे। आज उसके वंशज भिखारी हो चुके हैं मगर उनके पास आज भी वह लोहे का सिक्कड़ है जिससे कि हाथियों को अतीत में बांधा जाता था। क्या आज कांग्रेस की हालत भी ऐसी ही नहीं हो गई है? कांग्रेस के दरवाजे से जनसमर्थन बटोरने वाले नेता (हाथी) तो गायब हो चुके हैं लेकिन सोनिया और राहुल आज भी उनका सिक्कड़ लेकर घूम रहे हैं मगर भारत की जनता है कि अपनी नाक पर मक्खी तक को नहीं बैठने दे रही है क्योंकि जनता को ऐसा हाथी चाहिए जो भारत को फिर से विश्वगुरू बनाए न कि कोरा सिक्कड़।
मित्रों,इसलिए कांग्रेस को अपने अतीत पर इतराने के बदले मोदी सरकार के सकारात्मक कार्यों का समर्थन और नकारात्मक कार्यों (अगर वो करे) का विरोध करना चाहिए। अगर कांग्रेस नरेंद्र मोदी को आज भी एक चायवाला समझ रही है तो निश्चित रूप से उसको और भी बुरे दिन देखने हैं क्योंकि आज नरेंद्र मोदी न सिर्फ भारत के बल्कि विश्व के सबके लोकप्रिय नेता बनकर उभरे हैं और उनकी अकुलीनता को लेकर किसी भी तरह के अपमानजनक व्यवहार को भारत की जनता किसी भी तरह बर्दाश्त नहीं करेगी और करारी प्रतिक्रिया देगी। मोदी को किसी गांधी-नेहरू के वंश से खुद को जोड़ने की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि मोदी का वंश नेपोलियन की तरह मोदी से ही शुरू होता है और निश्चित रूप से इस कारण से मोदी पर ही समाप्त नहीं होगा क्योंकि उनका कोई परिवार नहीं है बल्कि देश के करोड़ों राष्ट्रवादी नरेंद्र मोदी के भाई-बंधु हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

बिहार के लोगों को कैसे मिले इंसाफ,अदालत खाली है!

11 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैं पहले भी आपसे अर्ज कर चुका हूँ कि बिहार में पिछले कई महीनों से सरकार नाम की चीज ही नहीं रह गई है। अब जब सरकार ही लापता हो जाएगी तो जाहिर है कि उसका असर शासन के प्रत्येक अंग पर पड़ेगा सो बिहार की न्यायपालिका पर भी पड़ने लगा है। बिहार की अदालतों में इन दिनों मुकदमों की सुनवाई,उन पर निर्णय और निर्णय का क्रियान्वयन तो दूर की कौड़ी रही केस एडमिट तक नहीं हो रहे सिर्फ फाईल हो रहे हैं। कारण यह है अदालतों में जज हैं ही नहीं। पहले से जो सब जज थे उनको एडिशनल जज में प्रोन्नति दे दी गई और उनकी जगह किसी को भेजा ही नहीं।

मित्रों,हम हाजीपुर का ही उदाहरण लें तो यहाँ के जिला व्यवहार न्यायालय में कुल 9 सब जज हैं जिनमें से सिर्फ सब जज संख्या 8 और 9 में जज हैं बाँकी 1 से 7 तक की सब जज अदालतों में पिछले 3 महीने से कोई जज नहीं है जिससे सारा-का-सारा काम ठप्प पड़ा हुआ है। वकील और मुवक्किल अदालत आते हैं और नई तारीख लेकर वापस चले जाते हैं। चूँकि केस के एडमिशन का काम सब जज 1 के यहाँ होता है इसलिए इन दिनों नए मुकदमे भी एडमिट नहीं हो रहे सिर्फ फाईल हो रहे हैं। आप ऐसा समझने की भूल कदापि न करें कि ऐसी स्थिति सिर्फ हाजीपुर में है बल्कि ऐसी स्थिति पूरे बिहार की अदालतों में है। करीब 15-20 दिन पहले पटना हाईकोर्ट के महानिबंधक वीरेंद्र कुमार स्थिति का जायजा लेने हाजीपुर आए भी थे लेकिन उनके जाने के बाद से भी स्थिति जस-की-तस बनी हुई है।

सूत्रों के अनुसार,बिहार सरकार ने 183 मजिस्ट्रेटों को सब जज में प्रोन्नति देने का निर्णय किया है लेकिन संभावना यही है कि वे लोग अब नए साल में ही अपना नया पदभार संभालेंगे। ऐसे में वर्षों से इंसाफ के लिए अदालतों के चक्कर काट रही जनता करे भी तो क्या करें सिवाय नए जजों के इंतजार करने के? सूत्र यह भी बता रहे हैं कि मजिस्ट्रेटों को सब जज बना देने से तत्काल अदालतों में कामकाज तो शुरू हो जाएगा लेकिन मजिस्ट्रेटी में फिर मजिस्ट्रेटों की किल्लत हो जाएगी और उधर कामकाज ठप्प हो जाएगा। अगर बिहार सरकार ने हर साल न्यायाधीशों की बहाली के लिए परीक्षा का आयोजन किया होता तो निश्चित रूप से बिहार की जनता को ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता लेकिन बिहार सरकार न तो सिविल सेवा और न ही न्यायिक सेवा की ही परीक्षा हर साल ले रही है।

मित्रों,जहाँ भारत के प्रधानमंत्री मिनिमन गवर्ननेंट एंड मैक्सिमम गवर्ननेंस की बात कर रहे हैं वहीं लगता है कि बिहार की वर्तमान सरकार का उद्देश्य नो गवर्ननेंस है तभी तो बिहार के सभी महकमों में अराजकता और लापतातंत्र जैसी स्थिति बनी हुई है। नो गवर्ननेंस से उपजी जिसकी लाठी उसकी भैंस की स्थिति से पीड़ित जनता जब थाने में जाती है तो पुलिस पहले तो केस ही दर्ज नहीं करती और अगर केस दर्ज हो भी जाए तो अदालतों में जज साहब हैं ही नहीं। ऐसे में कोई आत्मदाह कर रहा है,तो कोई अपना घर छोड़कर होटल में ठहर जाता है,तो कोई अपने पुरखों के गांव-शहर को सदा के लिए अलविदा कह जाता है तो कोई सीधे नक्सली बन जा रहा है। जब तंत्र न्याय नहीं देगा तो लोगों के समक्ष और विकल्प बचता भी क्या है,बचता है क्या?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 9 नवंबर 2014

जिसकी लाठी उसकी भैंस को चरितार्थ होते प्रत्यक्ष देखिए,कुछ दिन तो गुजारिए बिहार में

9 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हमलोग जानते हैं कि इन दिनों हमलोगों की हथेली पर बाल इसलिए नहीं उग पा रहे हैं क्योंकि हम अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अच्छे कामकाज पर दिनरात तालियाँ पीटते रहते हैं लेकिन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथों में निश्चित रूप से इसलिए बाल जड़ नहीं जमा पा रहे क्योंकि बेचारे अपने दोनों हाथों को इन दिनों लगातार एक-दूसरे पर पूरी ताकत और मनोयोग से मले जा रहे हैं। बड़बोले नीतीश कुमार ने खुद को खुद ही भारत के प्रधानमंत्री पद का सर्वोत्तम उम्मीदवार घोषित कर दिया था मगर जनता ने उनके इस स्वमूल्यांकन को स्वीकार नहीं किया और उनके दावे को न केवल पूरी तरह से अस्वीकृत कर दिया बल्कि इस हालत में भी नहीं छोड़ा कि वे यह कह सकें कि हम चुनाव हारे हैं लेकिन सम्मानजनक तरीके से हारे हैं।
मित्रों,फिर हमारे अभूतपूर्व सुशासन पुरूष नीतीश जी ने बिहार की जनता से अपनी हार का बदला लेने के लिए एक ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया जो वास्तव में किसी गांव का मुखिया होने की योग्यता भी नहीं रखता। परिणामस्वरूप आज बिहार फिर से जंगलराज में पहुँच गया है। पूरे बिहार में इस समय पूरी तरह से अराजकता का साम्राज्य है। जिसके हाथ में लाठी है वह खुलकर अपनी मनमानी कर रहा है और शासन-प्रशासन भी उसकी ही मदद कर रहा है। बिहार के लोगों का सीधा मानना है कि प्रशासन सिर्फ और सिर्फ सज्जनों को दंडित करने और दुर्जनों को सम्मानित करने के लिए है। बिहार सरकार इन दिनों बस इतना ही काम करती हुई दिखाई दे रही है कि नीतीश कुमार के शासनकाल के एक-के-बाद-एक घोटाले इन दिनों सामने आ रहे हैं और पूरी बिहार सरकार उनको बचाने में जुटी हुई है।
मित्रों,फिर भी हमारे भूतपूर्व सुशासन बाबू पूरी बेशर्मी दिखाते हुए गुजरात की सरकार और गुजरात के विकास मॉडल को गरिया रहे हैं वो भी इसलिए क्योंकि कुछ दिन पहले एक भैंस किसी तरह से सूरत हवाई अड्डा परिसर में घुस गई थी और हवाई जहाज के आगे आ गई थी। निश्चित रूप से यह एक दुर्घटना थी और इसको एक दुर्घटना के रूप में ही लेना चाहिए लेकिन नीतीश जी ठहरे घोर सिद्धान्तवादी राजनीतिज्ञ सो वे इस पर भी राजनीति करने लगे जबकि उनके बड़े भाई लालू जी के आतंक राज (नीतीश कुमार जी के ही शब्दों में) में पटना हवाई अड्डे के परिसर में अक्सर नीलगायें घुस जाती थीं और इसके चलते घंटों वहाँ विमान का उड़ना और उतरना रूका रहता था। वैसे नीतीश जी के समय शायद ऐसा नहीं हुआ लेकिन अब बिहार के हर खेत में वही नीलगाय घुस चुकी हैं और उनके चलते बिहार में खेती करना घाटे का सौदा बन गया है। माफ करिएगा मैं एक आम बिहारी का रोना लेकर आपके पास बैठ गया। तो मैं कह रहा था कि अगर आप एक पर्यटक के तौर पर ऐतिहासिक बिहार का दौरा करना चाहते हैं तो एक बार जरूर आपको अपने दुस्साहस पर पुनर्विचार कर लेना चाहिए क्योंकि हवाई अड्डे से बाहर आने के बाद आपके साथ कुछ भी कुछ भी हो सकता है क्योंकि बिहार में इन दिनों फिर से जंगल राज कायम हो चुका है। अगर आप अकेले आ रहे हैं तब तो फिर भी आपका अपराध क्षम्य है लेकिन अपनी पत्नी और बेटी के साथ आ रहे हैं तो जरूर आपको अपने निर्णय पर पुनर्विचार कर लेना चाहिए क्योंकि इन दिनों हमारी बिहार पुलिस का मूल मंत्र यह है कि बिहार में रहने और आनेवाले लोग अपनी,अपने परिजनों और अपने सामान की रक्षा स्वयं करें। कोई न्यायालयकर्मी न्याय नहीं मिलने पर एसपी कार्यालय गेट के समक्ष आत्मदाह कर रहा है तो किसी लड़की को इस बात की चिंता है कि उसके दबंग पट्टीदार कहीं उसका तीसरी बार अपहरण न कर लें और इस डर से वो पूरे परिवारसहित घर-बार छोड़कर होटल में रूकी हुई है।
मित्रों,सबसे पहले तो आपसे टेंपो या टैक्सीवाला मनमाना पैसा मांगेगा। फिर होटलवाला आपको लूटेगा। उस पर गजब यह कि आपकी कहीं शिकायत भी नहीं सुनी जाएगी। थाने में जाएंगे तो आपको पुलिसवाला ही लूट लेगा फिर हो सकता है कि आपके पास घर वापस लौटने के लिए भी पैसे नहीं बचें। पटना के सड़क-छाप होटलों में तो आप महिलाओं के साथ रूकने की सोंचिए भी नहीं,नहीं तो जान से भी जाएंगे और ईज्जत से भी। हाँ,अकेला होने पर रूक सकते हैं लेकिन ऐसा तभी करें जब आपने फिरौती में देने के लिए लाखों-करोड़ों रूपये अलग करके रख छोड़ा हो। और अगर आप किसी भी कारण से गांधी मैदान जा रहे हैं तो एम्बुलेंस लेकर ही जाईए तो अच्छा क्योंकि हो सकता है कि आप वहाँ जाएँ टैक्सी से और वापस जिंदा या मुर्दा आएँ एम्बुलेंस में। तो यह है संक्षेप में नीतीश कुमार जी के विकास मॉडल वाले बिहार और बिहार सरकार की हालत लेकिन नीतीश जी को देखिए कि वे छलनी हँसे सूप पर जिसमें खुद ही एक हजार छेद वाली महान थेथरई वाली कहावत को चरितार्थ करने में लगे हैं। नीतीश जी माना कि गुजरात के विकास की तस्वीरें फोटोशॉप से संपादित करके बनाई गई थीं लेकिन बिहार के जो लाखों लोग गुजरात की फैक्ट्रियों में मजदूरी करके पेट पाल रहे हैं क्या वे अपने घर पर पैसा भी फोटोशॉप से ही भेजते हैं? और अभी हाल में ही सूरत के एक हीरा व्यवसायी ने अपने कर्मियों को जो कारें दिवाली-उपहार में दे दीं क्या वह खबर और उससे संबंधित तस्वीरें भी फोटोशॉप का ही कमाल थीं? नीतीश जी गुजरात मॉडल अगर फेल हो चुका है तो फिर टीवी कैमरों पर वहाँ के विकास की जो तस्वीरें दिखाई जाती हैं वो क्या बिहार में ली गई तस्वीरें होती हैं? अगर गुजरात में रोजगार नहीं है,नैनो,रिलायंस,सूती-कपड़ा उद्योग,हीरा-पॉलिशिंग उद्योग,24 घंटे बिजली कुछ भी नहीं है तो फिर वहाँ रहनेवाले लाखों बिहारियों को रोजगार क्या नीतीश कुमार जी दे रहे हैं? आपके मॉडल ने बिहार की शिक्षा और प्रशासन को चौपट कर दिया,पूरे बिहार को शराबी बना दिया,पंचायत से लेकर सचिवालय तक भाई-भतीजावाद,भ्रष्टाचार और रिश्वत को सरकारी रस्म बना दिया,बिना पैसे दिए नौकरी पाना असंभव बना दिया,बरसात में रोज आपके राज में बनाए गए पुल कभी यहाँ तो कभी वहाँ गिरते रहे,लाख छिपाने और दबाने का बावजूद रोज ही आपके शासन-काल के घोटाले सामने आ रहे हैं,कोसी के बाढ़-पीड़ित जलप्रलय के 6 साल बाद भी राहत का इंतजार कर रहे हैं और आपको फिर भी अपना मॉडल गुजरात के मॉडल से भी बेहतर नजर आ रहा है? आप गुजरात में दिन गुजारने के विज्ञापन का मजाक उड़ाने के बदले यह क्यों नहीं कहते कि जिसकी लाठी उसकी भैंस को चरितार्थ होते प्रत्यक्ष देखिए,कुछ दिन तो गुजारिए बिहार में? शायद आपके इन शब्दों में निवेदन करने से बिहार में एडवेंचर को पसंद करनेवाले पर्यटकों की आमद अचानक बढ़ जाए और आपके हाथों बिहार का कुछ भला हो ही जाए ।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 8 नवंबर 2014

बनने लगीं हाजीपुर की गलियों की सड़कें मगर किसके लिए?

8 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,वर्ष 2002 में जब दिल्ली गया तो मैंने पाया कि दिल्ली की सड़कों में हमेशा,सालोंभर काम लगा रहता है। सड़कों और डिवाईडरों को बार-बार तोड़ा जाता और बनाया जाता। तब मेरी समझ में यह नहीं आ रहा था कि ऐसा करके दिल्ली का विकास किया जा रहा है या फिर पैसों की बर्बादी? कहने को तो वह निर्माण दिल्ली की जनता की सुविधा के लिए हो रहा था लेकिन वास्तविकता तो यह थी कि सारा-का-सारा निर्माण कार्य केवल और केवल ठेकेदारों,इंजीनियरों,अफसरों और नेताओं के फायदे या सुविधा के लिए किया जा रहा था।

मित्रों,इन दिनों हाजीपुर की गलियों में भी कुछ ऐसा ही गंदा खेल चल रहा है और जनता जैसे दिल्ली में मूकदर्शक थी वैसे ही हाजीपुर में भी मूकदर्शक है। हमने अपनी खबरों में (नालियाँ बनीं मगर सड़कें गायब) 17 दिसंबर,2013 को बताया था कि हाजीपुर की गलियों में जिस तरह से नालियों का निर्माण हो रहा है उससे नहीं लगता कि इन पतली-पतली नाजुक पाइपों से होकर कभी एक बूंद भी गंदा पानी हमारे दुनिया से गुजर जाने तक गुजर सकेगा। इतना ही नहीं हमने यह भी लिखा था कि नाली निर्माण का ठेका लेनेवाली कंपनी ट्राईटेक ने शहर की सारी गलियों की सड़कों तोड़कर नाली के लिए षोडसी युवती की पतली टांगों सरीखी पाईप तो बिछा दिया लेकिन सड़कों को टूटी हुई ही छोड़ दिया जिससे हल्की बरसात होने बाद तो घर से निकलना तक मुश्किल हो जाता है।

मित्रों,हमारी खबर ने असर दिखाया और हाजीपुर की मेयर की कुर्सी चली गई। नए मेयर हैदर अली ने तत्परता दिखाई और कुर्सी संभालते ही कंपनी के परियोजना पदाधिकारी को निर्देश दिया कि कंपनी पहले नाली के काम में हो रही त्रुटियों को दूर करे और फिर सारी गलियों की सड़कों को दुरूस्त करे। (हाजीपुर टाईम्स का असर,नगर पार्षदों ने लगाई नाली बनाने वाली कंपनी को जमकर फटकार) कंपनी एक बार फिर से कोताही बरत रही है। नालियों को जस-का-तस छोड़ दिया गया है और सड़कों को बनाने का काम आरंभ कर दिया गया है। सवाल उठता है कि भविष्य में अगर नालियों ने काम नहीं किया तो इसकी जिम्मेदारी किस पर आएगी? तब क्या हाजीपुर नगर परिषद् ट्राईटेक कंपनी के खिलाफ किसी तरह कार्रवाई न करते हुए नालियों के लिए फिर से निविदा आमंत्रित करेगी और एक बार फिर से सड़कों को तोड़कर नालियाँ बनाई जाएंगी और दिल्ली की तरह ऐसा बार-बार किया जाता रहेगा जनसुविधा के नाम पर और दिल्ली की ही तरह हाजीपुर की जनता भी अपने ही पैसों की खुली लूट को मूकदर्शक बनकर देखती रहेगी? क्या इसी के लिए 1993 में भारत के संविधान में 73वाँ और 74वाँ संशोधन किया गया था? वह शक्तियों का विकेंद्रीकरण था या भ्रष्टाचार का? मॉनिटर तो सरकार को भी करना चाहिए लेकिन बिहार में सरकार है ही कहाँ? (मेरी सरकार खो गई है हुजूर)।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 3 नवंबर 2014

तो क्या अब भारत के हिन्दू-मुस्लिम अलग-अलग मनाएंगे त्योहार?

3 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हमने बचपन में अपनी पाठ्य-पुस्तक में कलम के जादूगर रामवृक्ष बेनीपुरी की एक कहानी जो सच्ची घटना पर आधारित थी पढ़ी थी। कहानी का नाम था सुभान खाँ। इस कहानी के सुभान खाँ धर्मनिष्ठ मुसलमान हैं और हज भी कर आए हैं। जब गांव के बहुसंख्यक मुसलमान सांप्रदायिक तनाव कायम होने के बाद मंदिर पर हमला करने और प्रतिमा-भंग करने की योजना बनाते हैं तो सुभान खाँ मंदिर के द्वार पर पाँव रोपकर खड़े हो जाते हैं और मुसलमानों को चुनौती देते हैं कि परवरदिगार के पाक घर में वे लोग तभी घुस पाएंगे जब अपनी तलवार से उनके सिर को धड़ से अलग कर देंगे। अंत में मुसलमान अपने कृत्य पर शर्मिंदा होकर वापस लौट जाते हैं।
मित्रों,इन दिनों भारत के सांस्कृतिक क्षेत्र में जो कुछ भी हो रहा है उसे देश के भविष्य के लिए किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता। सुभान खाँ कहानी की कथानक के विपरीत उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से उठी सांप्रदायिकता की आग अब दिल्ली को भी झुलसाने लगी है और जिसका ताजा परिणाम यह हुआ है कि इस बार दिल्ली के बवाना इलाके में मुहर्रम के जुलूस को हिन्दुओं के मुहल्लों से होकर नहीं गुजरने दिया जाएगा।
मित्रों,हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के विसर्जन के समय हम देखते हैं विसर्जकों पर अक्सर पथराव कर दिया जाता है तो कभी हिन्दू मंदिर से लाउडस्पीकर उतरवा दिया जाता है। निश्चित रूप से मुसलमानों को कतई ऐसा नहीं करना चाहिए लेकिन बवाना के हिन्दुओं ने जिस तरह से मुहर्रम के जुलूस को अपने मुहल्लों में आने से रोकने का निर्णय लिया है उसे भी किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता। भारत में सदियों से हिन्दू और मुसलमान एकसाथ रहते आ रहे हैं और एकसाथ पर्व-त्योहार भी मनाते आ रहे हैं। मुझे तो पहले महनार और अब हाजीपुर में रहते हुए कभी ऐसा लगा ही नहीं कि मुहर्रम सिर्फ मुसलमानों का त्योहार है फिर आज क्यों माँ के दूध में जहर घोला जा रहा है या घुलता जा रहा है? हमने तो बचपन से ही होली और मुहर्रम एकसाथ मनाए हैं और हमने तो कभी यह सोंचा भी नहीं था कि भारत में एक समय ऐसा भी आएगा जब होली पूरे भारत का त्योहार न होकर सिर्फ हिंदुओं का और मुहर्रम सिर्फ मुसलमानों का त्योहार बनकर रह जाएगा। चाहे वो हमारे पिताजी के मित्र जलाल साहब हों या अंसारी जी हमें तो कभी इस बात की भनक तक नहीं लगी कि वे लोग मुसलमान हैं और हमसे अलग हैं। महनार स्टेशन पर जब जलाल साहब रहते थे तो न जाने कितनी ही रातों को देर से ट्रेन से उतरने के बाद हमने चाची के हाथों का बना खाना खाया और वहीं पर ओसारे पर सो गया। होली में भी हमने अपने बाँकी बड़े-बुजुर्गों की ही तरह उनके पाँव पर भी अबीर रखे और आशीर्वाद लिया। ये लोग भी जब भी पिताजी से मिलते तो वालेकुमअस्सलाम नहीं कहते बल्कि हाथ जोड़कर प्रणाम करते। महनार में तो कई मुसलमान आज भी धोती पहनते हैं और मुरौवतपुर के मुसलमान जो पहले चकेयाज के उज्जैन राजपूत थे आज भी चकेयाज के राजपूतों से बेटियों की शादियों में न्योता चलाते हैं।
मित्रों,हमने माना कि मुजफ्फरनगर,मेरठ और मुरादाबाद में जो कुछ भी हुआ या सपा सरकार की शह पर किया-कराया गया वह गलत था लेकिन क्या हमें तनाव को कम करने के प्रयास नहीं करने चाहिए? क्या मुजफ्फरनगर की घटनाओं के पीछे बवाना के मुसलमानों का हाथ था? अगर नहीं तो फिर उनका बहिष्कार क्यों? मुजफ्फरनगर के पीड़ितों को निष्पक्ष रूप से न्याय मिलना ही चाहिए इससे भला कौन इंकार कर सकता है लेकिन क्या हमारे विभाजनकारी कदमों से हमें इंसाफ मिल जाएगा? बल्कि पूरे भारत के देशभक्त हिन्दुओं और मुसलमानों को आवश्यक तौर पर ऐसे कदम उठाने चाहिए जिससे भारत की एकता और अखंडता को मजबूती मिले। इस दिशा में हमें उत्तराखंड के राज्यपाल अजीज कुरैशी के गोवध संबंधी बयान का स्वागत करना चाहिए और भारत के सभी मुसलमानों से हाथ जोड़कर विनती करते हैं कि खाने के लिए बहुत सारी स्वादिष्ट और पौष्टिक खाद्य-सामग्री जब देश में मौजूद है तो फिर गो-मांस को लेकर जिद क्यों जबकि यह आपको भी पता है कि न केवल भारत के बहुसंख्यक समाज के गाय पूज्य है बल्कि खुद मोहम्मद साहब ने गो-मांस के सेवन को वर्जित बताया है।
मित्रों,भारत सदियों तक विश्वगुरू रहा है और उसने दुनिया को शून्य के अलावे भी बहुत-कुछ दिया है,मिलजुलकर शांति और प्रेम से जीने का सलीका सिखाया है। भारत को अगर सिर्फ स्वामी श्रद्धानंद जैसे हिन्दू चाहिए जो दिल्ली में हिन्दू-मुस्लिम दंगों को रोकने के लिए शहीद हो जाए तो भारत को एक भी लादेन या बगदादी जैसा मुसलमान भी नहीं चाहिए बल्कि 20 के बीस करोड़ सुभान खाँ चाहिए।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शनिवार, 1 नवंबर 2014

बुरी नजर वाले तू नेत्रदान कर दे

1 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,जबसे केंद्र में मोदी सरकार ने सत्ता संभाली है कुछ लोगों की बर्दाश्त करने की शक्ति एकाएक जवाब दे गई है। बेचारे यह स्वीकारने को तैयार ही नहीं हैं कि अब देश में एक काम करनेवाली सरकार है। इन दिनों ऐसे शरारती तत्त्व इस बात के इंतजार में रहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के खिलाफ कुछ बोले और जैसे ही कौलेजियम प्रणाली में बदलाव से नाराज सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश केंद्र सरकार के खिलाफ कोई तल्ख टिप्पणी करते हैं कांग्रेस,आप और साम्यवादी दलों के चुके हुए राजनेता हुआँ-हुआँ करने लगते हैं। उनको लगता है कि ऐसा करके वे सरकार को जनता के बीच इतना अधिक बदनाम कर देंगे कि मोदी नाम का प्रचंड जनमतवाला चक्रवात कमजोर पड़ जाएगा। इन दिनों कांग्रेस अपने लकवाग्रस्त पंजे को थप्पड़ की तरह हवा में बेतहाशा भाँजने में लग गई है और दनादन अपने ही गाल पर थप्पड़ ठोके जा रही है,आपिये आपे से बाहर हो गए हैं और साम्यवादी दल जो पहले लाल थे अब लाल की जगह पीले पड़ने लगे हैं।
मित्रों,ऐसे तत्त्व यह भूल गए हैं कि अब वह जमाना नहीं रहा जब सौ गीदड़ मिलकर एक शेर का शिकार कर डालते थे और बाँकी जानवर या तो तटस्थ हो जाते थे या फिर भुलावे में आकर तालियाँ पीटने लगते थे। इस बार देश की जनता न तो भुलावे में आने जा रही है और न ही तटस्थ रहनेवाली है बल्कि सबके-सब शेर के समर्थन में शेर ही बन गए हैं। इन लोगों ने काले धन के मुद्दे पर राम जेठमलानी नामक एक ऐसे देशविरोध महावकील की सहायता ली जो पिछले तीन दशक से देश की विभिन्न अदालतों में आतंकवादियों की वकालत करता आ रहा है। इस थाली के बैगन की न तो कोई विचारधारा है और न ही कोई दृष्टिकोण।
मित्रों,संस्कृत में एक श्लोक है-पुस्तकेषु तु या विद्या परहस्तगतं धनं,कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनमं अर्थात् पुस्तकों में स्थित विद्या और दूसरों के हाथों में गया धन कभी बुरे वक्त में काम नहीं आता। हमारी गीदड़ मंडली ने भी अपने लंबे सार्थक जीवन में इस बात का अनुभव किया होगा कि किसी से अपना धन वापस ले पाना ही कठिन होता है और धन छीन लेना तो कतई आसान नहीं होता। फिर उन्होंने विदेशों में जमा काले धन के मामले में कैसे सोंच लिया कि मोदी सरकार 100 दिनों में ही उसको वापस ले आएगी? लोकसभा चुनावों के दौरान नमो के लगभग सारे भाषणों के अपनी खबरों में स्थान देने के नाते हम दावे से कह सकते हैं कि नरेंद्र मोदी ने किसी भी मुद्दे पर यह नहीं कहा था कि वह इनको अपनी जादुई ताकत से 100 दिनों में हल कर देंगे। बल्कि उन्होंने चुनाव-प्रचार के दौरान हमेशा कहा कि वे जनता से 60 महीने मांग रहे हैं और इसलिए उनसे कामकाज का हिसाब भी पाँच साल के बाद ही लिया जाए।
मित्रों,लगता है कि हमारी हुआँ-हुआँ पार्टियाँ को मोदी सरकार के काम करने का नया तरीका पसंद नहीं आ रहा है। मोदी तमाम पुरानी परंपराओं को लगातार भंग करते जा रहे हैं और देश में एक नितांत नवीन स्वतःस्फूर्त वातावरण तैयार कर रहे हैं। देश में चलता है वाली संस्कृति दम तोड़ने लगी है और देश के क्षितिज पर ऐसा होगा और केवल ऐसा ही होगा की नई संस्कृति की लाली फूटने लगी है ऐसे में लगता है जैसे हमारे विपक्षी दलों को भय लगने लगा है कि अब उनके भविष्य का क्या होगा और उनकी राजनैतिक विचारधारा-सड़ी-गली सोंच का क्या होगा? मगर गोबयल्स के अनुयायी भूल से यह भूल जाते हैं कि आज देश की 65 प्रतिशत आबादी युवा है जिसको कोरी विचारधारा नहीं वरन् धरातल पर विकास चाहिए। उनके बेवजह शोर मचाने से सरकार को कतई प्रभावित नहीं होना चाहिए और चुपचाप अपने तरीके से अपना काम करना चाहिए। सरकार को देश की समझदार जनता की समझदारी पर पूरा भरोसा करना चाहिए क्योंकि भारत की सवा करोड़ जनता अब उन लोगों के बहकावे में बिल्कुल भी नहीं आनेवाली है जिन्होंने भारत को एक असफल राष्ट्र और एशिया का मरीज बना डाला था। साथ ही हम वैशाख के अंधों को मुफ्त में यह सलाह भी देना चाहेंगे कि या तो वे मोदी सरकार के राष्ट्रनिर्माण में सक्रिय भागेदारी करें और अगर उनको मोदी सरकार के अच्छे काम रास नहीं आ रहे हैं,उनकी आँखों को नयनसुख प्रदान नहीं कर पा रहे हैं तो कृपया मानसिक अवसाद से बचने के लिए अपने नेत्रों का दान कर दें। उनकी आँखें उनके खुद के काम आने से तो रहीं तो फिर किसी नेत्रहीन को ही क्यों न उनका लाभ मिले?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

दुर्घटना ने मिटाया हिन्दू-मुसलमान का फर्क

24 अक्तूबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आपके शहर में भी बहुत सारे ऐसे विक्षिप्त और अर्द्धविक्षिप्त लोग होंगे जिनको अपना होश ही नहीं है। कोई नहीं जानता कि वे हिन्दू हैं या मुसलमान। इनके लिए न तो कोई सुख है और न ही कोई दुःख। कहीं भी कुछ भी खा लिया और कहीं भी धरती को बिछावन और ईंटों को सिरहाना बनाकर टांग पसारकर सो गए।
मित्रों,अभी-अभी शाम ढलने से पहले एक टेम्पोवाले ने एक ऐसे ही स्थिरबुद्धि वृद्ध विक्षिप्त के पैरों को रगड़ दिया। बेचारा अपनी मस्ती में हाजीपुर के चौहट्टा चौक स्थित चबूतरे पर पांव लटकाए किसी दुकानदार के दिए सिगरेट को मजे ले-लेकर पी रहा था कि एक टेम्पोवाला उसके पैर को घायल करता हुआ निकल गया। पैर फट गया था इसलिए काफी तेजी से रक्तस्राव होने लगा। लेकिन बेचारा न तो चीखा और न ही नाराज हुआ बस अंदर-ही-अंदर दर्द को पीता हुआ लेट गया। कई लोग दौड़े सड़क के दक्षिण से मैं गया तो उत्तर से पान दुकानदार मुमताज और साईकिल मिस्त्री मकसूद भी दौड़ा। हमने चौक पर स्थित सिन्हा मेडिकल हॉल के सुनील कुमार से विनती की कि रोजगार तो रोज ही होता है आज परोपकार का काम कर लो और बेचारे की मरहम-पट्टी कर दो। सुनील ने पट्टी तो कर दी लेकिन सूई देने से हिचक रहा था।
मित्रों,मुमताज तो जैसे पागल ही हुआ जा रहा था। बार-बार जख्मी वृद्ध के पास आता और फिर सुनील के पास कहने को जाता। फिर मैंने सुनील की दुकान के मालिक प्रमोद कुमार सिन्हा से निवेदन किया तो उन्होंने सुनील को इसकी अनुमति दे दी। मुमताज ने न केवल सूई देने के लिए वृद्ध का आस्तीन ऊपर किया और सूई देने के समय हाथ पकड़ा बल्कि सुनील के सूई देने के बाद काफी देर तक सूई के स्थान को सहलाता भी रहा। इसके बाद सुनील ने पानी डालकर जमीन पर गिरे खून को साफ कर दिया। फिर वृद्ध की जान-में-जान आई और वो उठकर बैठ गया। लेकिन सवाल उठता है कि आगे उसकी पट्टी को बदलेगा कौन? क्या यह घाव उस वृद्ध की जान ले लेगा?
मित्रों,यह सच्चाई है कि हर आदमी मूल रूप से न तो हिन्दू है और न ही मुसलमान। मैंने या मुमताज या मकसूद ने इस बात की चिन्ता नहीं की कि वह वृद्ध हिन्दू है मुसलमान या कुछ और। उसके बहते खून ने हम सबकी करुणा को जगा दिया। लेकिन सच्चाई यह भी है कि हमारे करने या करवाने की भी एक सीमा थी और है। कोई ऐसी व्यवस्था तो होनी चाहिए जिससे कि ऐसे बेसहारा लोगों की समुचित देखभाल हो सके। चाहे वह व्यवस्था सरकार द्वारा हो या कुकुरमुत्ते की तरह पूरे हाजीपुर में उग आए घपलेबाज गैर सरकारी संगठनों द्वारा। अपनों के लिए तो हर कोई करता है कोई परायों के लिए भी तो करे।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

अपने खिलाफ कब धरना पर बैठेंगे नीतीश?


21 अक्तूबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अपने केजरीवाल जी बड़े भाग्यशाली हैं। पहले उनको पाकिस्तान में बड़ा भाई मिला और अब भारत में भी हमारे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी केजरिया गए हैं। दोनों की शैली में फर्क बस इतना है कि केजरीवाल जी ने पहले धरना दिया फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी को यानि अपनी किस्मत को लात मारी और नीतीश जी ने इसके उलट पहले इस्तीफा दिया और अब धरने पर बैठ रहे हैं। श्री कुमार को शिकायत है कि पिछले 4 महीने में केंद्र सरकार ने बिहार की घनघोर उपेक्षा की है जैसी कि दस सालों में कांग्रेस पार्टी की सरकार ने भी नहीं की थी। तब तो सुशासन बाबू यह आरोप कांग्रेस पर लगा रहे थे और अब उसी के हाथ से उन्होंने हाथ मिला लिया है। अब इसे अवसरवाद न कहा जाए तो क्या कहा जाए?

मित्रों,पाकिस्तानी शायर मोहसिन नकवी ने क्या खूब कहा है कि बस एक ही गलती हम सारी ज़िन्दगी करते रहे मोहसिन, धूल चेहरे पर थी और हम आईना साफ़ करते रहे। बस नीतीश कुमार जी की भी इतनी-ही इतनी-सी ही समस्या है। जनता बार-बार उनको आईना दिखा रही है लेकिन श्री कुमार अपने चेहरे के बदले आईना को ही साफ करने में लगे हैं। पहले एक हवाई-परिकल्पित मुद्दे को लेकर 18 साल पुराना सुख-दुःख में जाँचा-परखा गठबंधन तोड़ा,फिर उसी लालू की गोद में छोटा भाई बनकर बैठ गए जिनके खिलाफ लड़ते हुए तमाम उम्र गुजरी थी। बिहार के शासन को जब 18 मंत्रालयों को एकसाथ देखते हुए संभाल नहीं सके और जनता ने जब गठबंधन तोड़ने और फिर से कुशासन और अराजकता फैलाने की सजा दी तो बजाए स्थिति को संभालने के रूठकर और मैदान छोड़कर ही भाग गए। जनाब चले थे प्रधानमंत्री बनने और त्यागपत्र दे दिया मुख्यमंत्री से भी। अभी हरियाणा विधानसभा चुनावों में दस जनविहीन जनसभाएँ करने के बाद भी पार्टी के एक उम्मीदवार को 114 और दूसरे को 38 वोट मिलते हैं लेकिन जनाब फिर भी अभी भी खुद को राष्ट्रीय नेता और प्रधानमंत्री पद का सबसे सुयोग्य उम्मीदवार मानते हैं। लोकसभा चुनावों में तो नीतीश जी के भाग्य ने उनका साथ दिया वरना तमाम विश्लेषक तो यह मान रहे थे कि जदयू भी बसपा की तरह ही शून्य पर आउट होने जा रही है।

मित्रों,वैसे सच्चाई यह भी है कि जब भाजपा सरकार में शामिल थी तब भी सरकार ने कई नीतिगत गलतियाँ कीं। एक के बाद एक पागलपन भरे कदमों से सरकारी शिक्षा का सर्वनाश कर दिया,गांव-गांव में शराब के ठेके खोल दिये और पूरे शासन-प्रशासन को अफसरों के हवाले कर दिया मगर ये विभाग शुरू से ही जदयू कोटे के मंत्रियों के पास थे। बाद में गठबंधन टूटने के बाद नीतीश जी को मंत्रिमंडल का विस्तार करना चाहिए था जो उन्होंने नहीं किया और 8-नौ महीनों तक एकसाथ वे 18 विभागों के मंत्री बने रहे जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि राज्य में सरकार नाम की चीज ही नहीं रही। बहुचर्चित दवा घोटाला भी उसी कालखंड की देन है।

मित्रों,मान लिया कि नीतीश जी को मुख्यमंत्री की कुर्सी के खटमल बहुत परेशान करने लगे थे लेकिन यह क्या कि उन्होंने एक बेदिमागी को अपने स्थान पर बैठा दिया जो मांझी नाम को निरर्थक साबित करते हुए पार्टी के साथ-साथ प्रदेश की नैया को भी डुबाने पर लगा हुआ है। कहने का तात्पर्य यह है कि अपनी हालत के लिए नीतीश कुमार जी खुद ही जिम्मेदार हैं लेकिन लगातार जबर्दस्ती यह साबित करने में लगे हैं कि इन्हीं लोगों ने छीना दुपट्टा मेरा (मुख्यमंत्री की कुर्सी)। जबतक जनता को उनका शासन अच्छा लगा,विकासवादी लगा जनता ने उनको सिर-आँखों पर बिठाया और जब जनता को लगने लगा कि नीतीश कुमार जी रावण की तरह अभिमानी और स्वेच्छाचारी होने लगे हैं तो बिहार की जनता ने उनको अपने सिर से आहिस्ते से उतारा नहीं बल्कि सीधे जमीन पर पटक दिया। इसलिए नीतीश जी को अगर धरना देना ही है तो उनको खुद के खिलाफ,अपनी भूतकाल की नीतिगत और अवसरवादी गलतियों के खिलाफ धरना देना चाहिए। वे कहेंगे तो हम भी उस धरने में उनका दिलो-जान से साथ देंगे।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 19 अक्टूबर 2014

नहीं टूटा है अभी भी जनता का भरोसा,मोदी लहर चालू आहे

19 अक्तूबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणामों ने एक बार फिर से साबित कर दिया है कि भारत की जनता न सिर्फ राज्यों में बल्कि केंद्र में भी मजबूत सरकार चाहती है। इतना ही नहीं इन परिणामों से यह भी सिद्ध हो गया है कि भारत की जनता का विश्वास अभी भी भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में बना हुआ है। इन सुखद चुनाव-परिणामों से दो अन्य राज्यों में भी राष्ट्रवादी सरकारें बन जाएंगी इसके साथ ही राज्यसभा में भी भाजपा के सदस्यों की संख्या बढ़ेगी जिससे मोदी सरकार के कदम और भी मजबूत होंगे। चुनाव-परिणामों से यह भी स्पष्ट हो गया है देश की जनता का बहुमत राष्ट्रवादी है और उसके लिए नेशन ही फर्स्ट एंड लास्ट है। यह जीत न तो भाजपा की जीत है और न ही नरेंद्र मोदी की बल्कि जातिवाद,संप्रदायवाद और परिवारवाद पर राष्ट्रवाद की जीत है। थोड़ी-सी चिंता का सबब अगर है तो वह है महासांप्रदायिक ओबैसी की पार्टी को महाराष्ट्र के मुस्लिमबहुल क्षेत्रों में मिली भारी सफलता।

मित्रों,हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि केंद्र में नई सरकार के गठन के बाद यह पहला बड़ा चुनाव था। शायद इसलिए अधिकतर आलोचक और विश्लेषक इन चुनावों को मोदी सरकार के प्रति जनता का लोकमत सर्वेक्षण मान रहे थे। जाहिर है कि परिणामों के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि जनता नरेन्द्र मोदी सरकार के प्रदर्शन से फिलहाल खुश है लेकिन इसका यह मतलब हरगिज नहीं लगाया जाना चाहिए कि सबकुछ सही हो गया है। अभी तो भारत के असली निर्माण का सफर शुरू ही हुआ है। अभी तो भारत को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना है और इसके लिए मोदी सरकार को लगातार कई सालों तक त्वरित गति से सुधार करने होंगे,अनथक प्रयास करने होंगे। भारत को अभी चीन को प्रत्येक मोर्चे पर पछाड़ना है और ऐसा करना कतई आसान नहीं होनेवाला है। नरेंद्र मोदी ने भारत की जनता से अपील भी की है कि जनता को दिवाली में भारत में बनी चीजों को व्यवहार में लाना चाहिए जिसका पूरे भारत में निश्चित रूप से स्वागत करना चाहिए और न सिर्फ इसका मौखिक स्वागत हो बल्कि इसको व्यवहार में भी लाया जाए। मोदी जानते हैं कि चीन तभी झुकेगा और नरम पड़ेगा जब भारत में उसके सामानों की बिक्री को झटका लगे और भारत तभी वैश्विक महाशक्ति बनेगा जब दुनिया के सबसे बड़े दूसरे बाजार भारत के लोग भारत में बने सामानों का उपयोग करें।

मित्रों,यह हमारा और हमारे देश का सौभाग्य है कि हमें नरेंद्र मोदी जैसा नेता मिला है। जनता ने अपने निर्णय द्वारा मोदी जी को आश्वस्त किया है कि मोदी जी इसी तरह से अच्छा काम करते रहिए हम आपके हाथों को और भी मजबूत करते जाएंगे। यहाँ मैं मोदी जी और भाजपा को चेताना चाहूंगा कि वो सोंच-समझकर महाराष्ट्र में सरकार बनाए। अगर भाजपा एनसीपी के समर्थन से सरकार बनाती है तो फिर इस सरकार का जन्म ही देश की सबसे भ्रष्ट पार्टी के समर्थन से होगा जिसका प्रादेशिक के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी जनता के बीच अच्छा संदेश नहीं जाएगा।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

एक बार फिर से वोट फॉर मोदी,वोट फॉर इंडिया

14 अक्तूबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। महाराष्ट्र और हरियाणा के मित्रों,एक बार फिर से गेंद आपके पाले में है,बाजी आपके हाथों में है। लोकसभा चुनावों के समय जिस तरह आपलोगों ने बाँकी देश के साथ मिलकर कदमताल किया उसके लिए हम आजीवन आपके आभारी रहेंगे। यह आपकी बुद्धिमानी का ही प्रतिफल है कि आज केंद्र में देश के लिए कुछ भी कर गुजरनेवाले व्यक्ति के नेतृत्व में सरकार सत्ता में है। केंद्र में आज मजबूर नहीं मजबूत सरकार है लेकिन यह सरकार अभी भी पूरी तरह से मजबूत नहीं है। वह इसलिए क्योंकि राज्यसभा में इसको बहुमत प्राप्त नहीं है और यह तो आप भी जानते हैं कि कोई भी विधेयक तभी कानून बनता है जब उसको राज्यसभा भी पारित कर दे।
मित्रों,हमारे संविधान में ऐसी व्यवस्था की गई है कि विधानसभा सदस्य ही राज्यसभा सदस्यों का चुनाव करते हैं। जाहिर है कि एनडीए को तभी राज्यसभा में बहुमत मिल सकेगा जब देश की सारी विधानसभाओं में उसका बहुमत हो। यह आप दो राज्यों के निवासियों का सौभाग्य है कि इस दिशा में पहला कदम उठाने का सुअवसर आपलोगों को मिला है। आपने लोकसभा में तो एऩडीए को मजबूत कर दिया आईए राज्यसभा में भी उसको मजबूती प्रदान करें जिससे कि वह सचमुच में मजबूत सरकार सिद्ध हो सके और उसको राज्यसभा में जया,ममता,माया और मुलायम जैसे भ्रष्टों और देशविरोधियों का मुँहतका न बनना पड़े। देश का भविष्य आपके हाथों में है। देश का भविष्य आपको पुकार रहा है। तो आईए दोस्तों,घर से निकलिए भारी-से-भारी संख्या में मतदान करिए-एक बार फिर से वोट फॉर मोदी,वोट फॉर इंडिया।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

कैसे कहूँ हैप्पी बर्थ डे वैशाली जिला?

13-10-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,एक जमाना था जब वर्तमान वैशाली जिला क्षेत्र में रहनेवाले लोगों को किसी भी काम के लिए हाजीपुर से 55 किलोमीटर दूर मुजफ्फरपुर जाना पड़ता था। लोग सत्तू-चूड़ा-ठेकुआ लेकर निकलते और 15-15 दिन के बाद घर आते। कई लोग तो पैदल ही मुजफ्फरपुर का रास्ता नाप देते थे। रास्ते में अगर रिश्तेदारों का घर स्थित हो तो सोने पर सुहागा। दो दिन बुआ के घर ठहर लिया तो दो दिन दीदी के घर। इसी तरह कभी गोविन्दपुर सिंघाड़ा से मुकदमा लड़ने मुजफ्फरपुर का बार-बार चक्कर लगानेवाला एक युवक बार-बार के आने-जाने से इतना परेशान हो गया कि उसने मुजफ्फरपुर में अपना घर ही बसा लिया और उसका वही घर आज एक गांव बन गया है-कन्हौली का राजपूत टोला।
मित्रों,लोग लंबे समय तक मांग करते रहे कि उनको अलग जिला बना दिया जाए। आंदोलन हुए,धरना-प्रदर्शन हुआ और अंततः वह दिन आया 1972 में 12 अक्तूबर के दिन जब वैशाली को मुजफ्फरपुर जिला से अलग कर दिया गया और हाजीपुर को बनाया गया जिला मुख्यालय। अब लोगों को बार-बार मुजफ्फरपुर नहीं जाना पड़ता था। एक ट्रेन से आए अपना काम किया और फिर शाम की दूसरी ट्रेन से घर वापस हो गए। जिस इलाके में ट्रेन नहीं जाती वहाँ के लिए भी उसी कालखंड में बसें चलनी शुरू हो गईं। तब हाजीपुर एक कस्बा था आज महानगर बनने की ओर अग्रसर है। आज हाजीपुर में क्या नहीं है? आईआईएमएच है,नाईपर है,सीपेट है,कई उद्योग-धंधे हैं,महाविद्यालय हैं,कोचिंग हैं,आईटीआई हैं,ट्रेनिंग कॉलेज हैं और सबसे बढ़कर है पूर्व मध्य रेल का मुख्यालय। इनमें से अधिकतर हाजीपुर के हमारे सांसद रामविलास पासवान के प्रयासों का नतीजा हैं।
मित्रों,फिर भी कुछ तो ऐसा है जिसकी हमें कमी लग रही है और लगता है कि जैसे वही समय अच्छा था जब मुजफ्फरपुर हमारा भी जिला मुख्यालय हुआ करता था। हमारा आज का प्रशासन बेहद संवेदनहीन हो गया है। हाजीपुर में कई तरह के प्रशासनिक कार्यालय तो खुल गए हैं लेकिन वहाँ अब आम और निरीह जनता की सुनी नहीं जाती। वहाँ शरीफों को जलील किया जाता और चोरों की आरती उतारी जाती है। जो सड़कें पहले निर्माण के 10-10 साल बाद तक जस-की-तस रहती थीं आज साल-दो-साल में ही इतनी जर्जर हो जा रही हैं कि उन पर पैदल तक नहीं चला जा सकता। स्कूलों की बिल्डिंगों में अब पाँच साल में ही दरार पड़ने लगती है। पूरे जिले में कहीं भी पेय जलापूर्ति की समुचित व्यवस्था नहीं है,लगभग सारे-के-सारे सरकारी नलकूप बंद हैं,संत परेशान हैं और हर जगह चोरों का राज है। पुलिस का तो हाल ही नहीं पूछिए आज चोरी-डकैती होती है तो एक महीने बाद भी थानेदार आपका हाल पूछने आ जाएँ तो इसको उसकी मेहरबानी ही समझिए। पुलिसिया अनुसंधान का हाल ऐसा है कि ठीक नए साल के दिन थानेदार की थाने में घुसकर अपराधी हत्या कर देता है और पुलिस न तो हत्या में प्रयुक्त हथियार ही बरामद कर पाती है और न ही सहअभियुक्तों को गिरफ्तार ही कर पाती है और अंत में होता वही है जो इस अवस्था में होना चाहिए। मुख्य अभियुक्त शान से हाईकोर्ट से जमानत लेकर गांव लौटता है हाथी पर सवार होकर।
मित्रों,आज हमारे जिले की जो हालत है उसमें निश्चित रूप से दिन-ब-दिन भ्रष्ट से भ्रष्टतर और भ्रष्टतम होते जा रहे प्रशासन का भी काफी अहम योगदान है। आज पूरे वैशाली जिले में जिधर देखिए उधर अपराधियों का बोलबाला है। कभी हम गर्व करते थे कि हमारा जिला बहुत शांत जिला है। तब हमारे जिले में न तो लूट-मार थी और नक्सलवाद का तो कहीं नामोनिशान भी नहीं था। लेकिन क्या इस हालत के लिए सचमुच सिर्फ प्रशासन ही दोषी हैं? क्या हमारा अंतर्मन उतना ही शुद्ध है जितना कि हमारे उन पूर्वजों का था जिन्होंने इस जिले में एक-एक कर एक-एक गांव और एक-एक कस्बे को बसाया? कदापि नहीं। फिर जबकि सामाजिक,मानवीय और प्रशासनिक हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते ही जा रहे हों तो आप ही बताईए कि मैं किस मुँह से कहूँ कि हैप्पी बर्थ डे माई डियर वैशाली डिस्ट्रिक्ट,मुझे तुम पर गर्व है?


(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

क्या बिहार नीतीश कुमार की निजी जमींदारी है?

6-10-14,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,पिछले कुछ समय में बिहार की राजनीति ने जिस तरह से यू-टर्न लिया है आज से दो साल पहले कोई उसकी कल्पना तक नहीं कर सकता था। जो व्यक्ति कभी हमेशा दिन-रात मूल्यों और सिद्धांतों का राग अलापा करता था वही सबसे बड़ा अवसरवादी निकला। राम निकला तो था रावण से लड़ने के लिए लेकिन युद्धभूमि में जाकर उसने पाला बदल लिया और सीता (बिहार) अपने उद्धार की बाट ही जोहती रह गई। पहले उसने अपने उस गठबंधन सहयोगी को सरकार से निकाल बाहर कर दिया जिसके साथ मिलकर उसने 2010 का विधानसभा चुनाव लड़ा था। उसकी पार्टी को जो भी मत मिले थे वे अकेले उसकी पार्टी के नहीं थे बल्कि जनता ने दोनों पार्टियों को एक मानकर उसकी गठबंधन सरकार को बंपर बहुमत दिया था। फिर उस नीतीश कुमार को किसने यह अधिकार दे दिया कि वे अकेले की सरकार चलाएँ? जनता ने तो उनको गठबंधन सरकार चलाने के लिए मत दिया था। क्या बिहार नीतीश कुमार जी की निजी जमींदारी थी और है? अगर नहीं तो नैतिकता का तकाजा तो यह था कि वे गठबंधन तोड़ने के तत्काल बाद ही विधानसभा को भंग करके आम चुनाव करवाते।
मित्रों,नीतीश कुमार जी की बिहार और बिहार की जनता के साथ खिलवाड़ यहीं पर नहीं रुका। भाजपा को सरकार और गठबंधन से निकालबाहर करने के बाद नीतीश जी ने लगभग एक साल तक मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं किया और एक साथ उन सभी  विभागों सहित जो भाजपा के पास थे 18 विभागों के मंत्री बने रहे जिसका परिणाम यह हुआ कि पूरे बिहार में अराजकता व्याप्त हो गई। सारे नियम-कानून की माँ-बहन होने लगी जिसका परिणाम यह हुआ कि नीतीश जी की पार्टी को बिहार में जीत के लाले पड़ गए। अगर नीतीश जी में थोड़ी-सी भी नैतिकता होती उनको लोकसभा चुनावों के तत्काल बाद ही विधानसभा चुनाव करवाने चाहिए थे। लेकिन नीतीश जी ने एक बार फिर से बिहार को अपनी निजी जमींदारी समझते हुए मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया और खुलकर जातीयता का गंदा खेल खेलते हुए एक निहायत अयोग्य महादलित को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया। इस तरह बिहार के साथ जानलेवा प्रयोग-पर-प्रयोग करने का अधिकार नीतीश कुमार जी को किसने दिया है? चिड़िया की जान जाए बच्चों का खिलौना?
मित्रों,जबसे बिहार में जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया गया है तबसे बिहार के शासन-प्रशासन ने जो थोड़ी चुस्ती थी वह भी जाती रही। अब आप बिहार पुलिस को घटना के समय या घटना के बाद लाख फोन करते रहें वह तत्काल घटनास्थल पर नहीं आती है जबकि वर्ष 2005 में जब जदयू-भाजपा गठबंधन की सरकार नई-नई आई थी तब पुलिस सूचना मिलते ही घटनास्थल पर हाजिर हो जाती थी और समुचित कार्रवाई भी करती थी। अब अगर आप बिहार में रहते हैं तो अपने जान व माल सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी-पूरी आपकी है। बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी में वह योग्यता है ही नहीं कि वे प्रशासनिक अराजकता को दूर कर सकें। वे तो बस विवादित बयान देते रहते हैं और इस बात का रोना रोते रहते हैं कि उनका जन्म छोटी जाति में हुआ है इसलिए लोग उनका मजाक उड़ाते हैं। पिछले कुछ समय में श्री मांझी ने इतने मूर्खतापूर्ण बयान दिए हैं कि इस मामले में उनके आगे बेनी प्रसाद वर्मा का कद भी बौना हो गया है।
मित्रों,यह तो आप भी मानेंगे कि इस प्रकार के अतिमूर्खतापूर्ण बयान वही व्यक्ति दे सकता है जो महामूर्ख हो। पुत्र-विवाहेतर संबंध विवाद,विद्यालय उपस्थिति विवाद,...... और अब पटना गांधी मैदान भगदड़ पर उटपटांग बयान कि इसमें गलती भीड़ की भी हो सकती है,.....। श्री मांझी किस तरह के मुख्यमंत्री हैं कि इतनी हृदयविदारक घटना के घंटों बाद तक घटना से पूरी तरह से बेखबर रहते हैं? और जब मुँह खोलते भी हैं तो मृतकों के परिजनों के जख्मों पर मरहम लगाने के बदले यह बोलकर कि गलती भीड़ की भी हो सकती है नमक छिड़कने का काम करते हैं। क्या श्री मांझी बताएंगे कि गलती किसकी थी उन दो दर्जन मासूम बच्चों की जिनके जीवन को खिलने से पहले ही पैरों तले कुचल दिया गया? उन बेचारों को तो अभी पता भी नहीं होगा कि गलती की कैसे जाती है या गलती शब्द का मतलब क्या होता है। क्या सिर्फ महादलित होने से ही किसी व्यक्ति में मुख्यमंत्री बनने की पात्रता आ जाती है?
मित्रों,बिहार की जनता ने नीतीश कुमार के प्रयोगवादी पागलपन जीतनराम मांझी को बहुत बर्दाश्त किया मगर अब पानी सिर के ऊपर से बहने लगा है। जो व्यक्ति एक ट्राफिक हवलदार तक बनने के काबिल नहीं था उसको नीतीश कुमार ने बिहार को दिशा देने का काम सौंप दिया? जब 1 ग्राम भी बुद्धि है ही नहीं तो श्री मांझी शासन कैसे चलाएंगे और इतनी बड़ी जिम्मेदारी कैसे उठाएंगे? जाहिर है कि ऐसा कर पाना उनके बूते की बात नहीं है। हाजीपुर टाईम्स ने तब भी जब मांझी को बिहार के सीएम की कुर्सी दी गई थी अपनी सामाजिक व राजनैतिक जिम्मेदारी को निभाते हुए नीतीश जी को चेताया था लेकिन तब नीतीश जी ने जो कि एक वैद्य के बेटे हैं एक मरणासन्न रोगी की तरह हमारे रामवाण नुस्खे को नहीं माना था।
मित्रों,हमारा स्पष्ट रूप से यह मानना है कि नीतीश कुमार जी को देर आए मगर दुरुस्त आए पर संजीदगी से अमल करते हुए तत्काल बिहार में विधानसभा चुनाव करवा कर फिर से जनादेश प्राप्त करना चाहिए। बिहार की जनता को अगर उनके महाअवसरवादी महागठबंधन में विश्वास होगा तो वे दोबारा मुख्यमंत्री बन जाएंगे और अगर नहीं होगा तो विपक्ष की शोभा बढ़ाएंगे लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में बिहार को एक पागल,बुद्धिहीन के शासन से तो मुक्ति मिलेगी। इसके विपरीत अगर नीतीश जी श्री मांझी को हटाकर किसी दूसरे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाते हैं तो यह एक बार फिर से उनकी अनाधिकार चेष्टा होगी। जनता ने 2010 में उनको इसलिए बहुमत नहीं दिया था कि वे बिहार को चूँ-चूँ का मुरब्बा बनाकर रख दें बल्कि उनको बिहार के समग्र विकास के लिए वोट दिया था। वैसे भी लोकसभा चुनावों के बाद मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देकर वे बिहार के विकासपुरुष की अपनी जिम्मेदारियों से भाग चुके हैं लेकिन वे एक बिहारी होने की जिम्मेदारियों से नहीं भाग सकते हैं। इसलिए बिहार का एक शुभचिंतक होने के नाते,एक बिहारी होने के नाते उनको अपने सारे प्रयोगों को विराम देते हुए बिहार में तत्काल विधानसभा चुनाव करवाना चाहिए वरना उनके 8 साल के सुशासन से पहले बिहार जहाँ से चला था अगले एक साल में उससे भी पीछे चला जाएगा।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

सोमवार, 22 सितंबर 2014

बिहार की उच्च शिक्षा के श्राद्ध-कर्म में आप सादर आमंत्रित हैं

22 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों, मैं आपसे पहले भी अर्ज कर चुका हूं कि हमारे बिहार का कबाड़ा करने में जवाब नहीं। जब नेपाल की सरकार ने बिहार में बाढ़ लाने से मना कर दिया तो बिहार सरकार ने राजधानी पटना को ही जलमग्न करवा दिया। आखिर राहत के लिए तैयार सामग्री को कहीं-न-कहीं तो खपाना ही था। वो तो भला हो कश्मीर का वरना बिहार के कई अन्य ईलाकों को भी जलमग्न करना पड़ता।
मित्रों,अब बिहार की शिक्षा को ही लीजिए। बिहार की प्राथमिक शिक्षा का तो पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही गला घोंट चुके थे लेकिन बिहार की उच्च शिक्षा अभी तक साँस लिए जा रही थी। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अब बहुत कम शिक्षक बच गए थे लेकिन दुर्भाग्यवश जो शिक्षक अभी तक रिटायर होने से बचे हुए थे उनमें से कई वास्तव में ज्ञानी थे। अब बिहार सरकार कोई नरेंद्र मोदी तो है नहीं कि वो कहे कि डिग्री के लिए नहीं ज्ञान के लिए पढ़ो। बल्कि उसका तो साफ तौर पर मानना है कि पढ़ो ही नहीं। हम साईकिल दे रहे हैं उसकी सवारी गांठो,हम पैसे दे रहे हैं उससे सिनेमा देखो या इंटरनेट पैकेज भरवाओ,हम पोशाक राशि दे रहे हैं उससे अच्छी-अच्छी पोशाक बनवाओ लेकिन पढ़ो मत। परीक्षाओं में हमने कदाचार की पूरी छूट दे रखी है इसलिए ज्ञान के पीछे,पढ़ाई के पीछे नहीं भागो डिग्री के पीछे भागो। नौकरी झक मारकर तुम्हारे पीछे आएगी। दूसरे राज्यों में अगर प्रतियोगिता परीक्षा के कारण नौकरी नहीं मिली तो हम हैं न। हाँ,इंटर और मैट्रिक की परीक्षा में खूब कागज काले करो और हमारे दिए पैसों में से कुछ बचाकर भी रखो क्योंकि जो शिक्षक तुम्हारी कॉपियाँ देखेंगे उनको भी कहाँ कुछ अता-पता है। वे तो तराजू पर तुम्हारी कॉपियाँ तौल कर ही या फिर तुमसे पैसे लेकर ही तुमको नंबर देंगे। चाहे तुम आईआईटी और मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं में पास भी कर जाओ मगर हमारे परीक्षक तो तुमको केमिस्ट्री में 8 और गणित में 5 नंबर ही देंगे। देखा नहीं इसलिए तो हमने मुहम्मद बिन तुगलक से प्रेरित होकर पहले प्राथमिक विद्यालयों में नंबर के आधार पर शिक्षकों को बहाल किया और अब महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की बहाली भी नंबर के आधार पर करने जा रहे हैं।
मित्रों,हमारे मुख्यमंत्री मांझी जी जो कुछ भी बोलते रहते हैं यह भी कह सकते हैं कि गुजरात में भी तो मोदी ने स्कूल टीचर इसी तरह से बहाल किए थे। मगर गुजरात में इस तरह से मस्ती की पाठशाला तो नहीं चलती,परीक्षाएँ ओपेन बुक सिस्टम के आधार पर तो नहीं ली जातीं? बल्कि वहाँ तो वास्तव में ज्ञान के लिए शिक्षा दी जाती है डिग्री के लिए नहीं। अब आप हमारे बैच को ही लीजिए। मैं अपने बैच में प्रतिभा खोज परीक्षा में पूरे जिले में प्रथम आया था। हमेशा ज्ञान के पीछे भागा। जबतक किसी प्रश्न का उत्तर नहीं पा जाता बेचैन रहा करता लेकिन जब मैट्रिक का रिजल्ट आया तो हमारी कक्षा का सबसे भोंदू विद्यार्थी जिसने वाकई विद्या की अर्थी ही निकाल दी थी और जिसको ए,बी,सी,डी और पहाड़ा तक का पता नहीं था उस रंजीत झा को सबसे ज्यादा अंक प्राप्त हुए थे क्योंकि उसकी बोर्ड में पैरवी थी। अब आप ही बताईए कि अगर मुझे और रंजीत को शिक्षक बना दिया जाए तो कौन अच्छा पढ़ाएगा? आप कहेंगे कि आप लेकिन बिहार सरकार तो कह रही है कि रंजीत झा छात्रों के उज्ज्वल भविष्य के लिए ज्यादा बेहतर साबित होगा भले ही रंजीत झा कभी कक्षा में जाए ही नहीं।  जिसने मैट्रिक,इंटर,बीए और पीजी की परीक्षाओं में जितना ज्यादा कदाचार किया उसके बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर बनने की संभावना उतनी ही ज्यादा है।
मित्रों,मेरे ममेरे भाई संतोष को भले ही कुछ नहीं आता हो,थीटा और बीटा के चिन्हों को भी वो पहचान नहीं पाए लेकिन हमारी बिहार सरकार को तो महाविद्यालय में गणित शिक्षक के तौर पर वही चाहिए भले ही सिर्फ कॉलेजों के स्टाफ रूम की शोभा बढ़ाने के लिए। लगता है कि बिहार सरकार इसलिए खुली प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली नहीं करना चाहती क्योंकि उसको लगता है कि अगर आईए,बीए में ज्यादा-से-ज्यादा नंबर पानेवाले परीक्षा में असफल हो गए तो वह असफलता बिहार की शिक्षा,परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली की असफलता होगी। इससे बिहार की शिक्षा और परीक्षा-प्रणाली की पोल भी खुल जाने का खतरा है। फिर हमलोगों के जैसे ज्ञानी मानव अगर प्रोफेसर बन गए तो विद्यार्थियों में विद्रोह और सरकार के विरोध की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा और हमारे महाविद्यालय और विश्वविद्यालय वास्तव में मस्ती की पाठशाला बन पाने से वंचित रह जाएंगे। विद्यार्थियों को पढ़ना पड़ेगा जिससे उनकी दिमागी हालत पर बुरा असर भी पड़ सकता है।
मित्रों,कहने का मतलब यह है कि बिहार लोक सेवा आयोग के माध्यम से बिहार सरकार ने बिहार में महाविद्यालय और विश्वविद्यालय शिक्षकों की बहाली के लिए जो अधिसूचना जारी की है और जो कार्यक्रम तय किए हैं वास्तव में वह बिहार की उच्च शिक्षा का श्राद्ध-कर्म कार्यक्रम है जिसमें आप सभी सादर आमंत्रित हैं।-मान्यवर,बड़े ही हर्ष के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि बिहार की उच्च शिक्षा का डिग्री का दौरा पड़ने से दिनांक 13 सितंबर,2014 को आकस्मिक निधन हो गया है। श्राद्ध-कर्म के लिए कार्यक्रम इस प्रकार निर्धारित किए गए हैं जिसमें आप सभी येन-केन-प्रकारेण उच्च प्राप्तांकधारी आमंत्रित हैं-
क्षौर-कर्म-              दिनांक 20-11-2014 के पाँच बजे शाम तक
बाँकी के एकादशा,द्वादशा को पिंडदान और महाभोज के बारे में आपको जानकारी भविष्य में दी जाएगी।
दर्शनाभिलाषी-महाठगबंधन के सभी सदस्य,
आकांक्षी-जीतनराम मांझी,मुख्यमंत्री,बिहार।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

रविवार, 21 सितंबर 2014

एक था पप्पू!

20 सितंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,मैं वैसे तो कई पप्पुओं को जानता हूँ लेकिन इनमें से एक पप्पू ऐसा है जो इन दिनों पूरे बिहार को पप्पू बनाने की कोशिश कर रहा है। मैं बात कर रहा हूं श्रीमान राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव जी की। मैंने पहले पहल इन श्रीमान का नाम तब सुना जब पप्पू यादव जी निर्दलीय विधायक हुआ करते थे और किसी दारोगा जी की मूँछें इनको इतनी पसंद आ गई थीं कि इन्होंने उनको जड़ से उखाड़ ही लिया था। बाद में पप्पू जी लालू जी के द्वारा स्थापित यादव राज के प्रतीक बनकर उभरे और इस दौरान इनकी अदावत हुई एक और बाहुबली निर्दलीय विधायक आनंद मोहन के साथ। तब इन दोनों की मुठभेड़ की खबरों से बिहार के अखबार पटे रहते थे। यह वही समय था जब पूरा बिहार आरक्षण की जातीय आग में जल रहा था। यात्रियों को बसों से उतार-उतारकर उनकी जातियाँ पूछकर पीटा जा रहा था। एक बार फिर से पप्पू जी तब चर्चित हुए जेल में होते हुए भी सैर-सपाटा करते हुए पाए गए। इस बीच पप्पू यादव पूर्णिया से निर्दलीय सांसद बन बैठे और पूरा पूर्णिया जिला उनकी कृपा से राजपूत और यादव जातियों के बीच वर्चस्व का अखाड़ा बन गया। पूर्णिया के मरंगा गांव में एक धक्का सिंह नामक व्यक्ति का लाईन होटल था। एक दिन पप्पू जी के आदमी वहाँ चाय-पानी के लिए पहुँचे और उसका नाम पूछा। नाम सुनकर उनको लगा वो राजपूत होगा और बिना किसी दुश्मनी या बकझक के उन्होंने उसको राजपूत समझकर गोली मार दी। बाद में जब पता चला कि वह धक्का सिंह तो यादव है तब उसे लेकर पटना भागे और इस तरह बेचारे धक्का सिंह जी जान बच गई। उन दिनों इस जातीय झगड़े का मुख्य अखाड़ा था पूर्णिया बस स्टैंड।
मित्रों,तब तक एक बार मैं पप्पू यादव जी का 15 अगस्त,1993 के दिन पटना के सब्जीबाग में भाषण भी सुन चुका था। बड़ा बेकार-सा भाषण देते थे वे लेकिन तब तक मैं उनसे सीधे-सीधे प्रभावित नहीं था। वह गुंडा या अपराधी है तो मुझे क्या तब तक मेरे मन में पप्पू यादव को लेकर यही भाव रहता था लेकिन तब मैं यह नहीं जानता था कि इस व्यक्ति के कारण मेरी जिन्दगी तबाह हो जानेवाली है। हुआ यह कि वर्ष 1993 में पॉलिटेक्निक की प्रवेश परीक्षा में बैठा और पास हो गया लेकिन रैंक अच्छा नहीं आया। सो मेरा नामांकन दरभंगा पॉलिटेक्निक में सिविल इंजीनियरिंग में हो गया। दरभंगा पॉलिटेक्निक में जातीय तनाव जैसा कुछ नहीं था इसलिए वहाँ मेरा समय शांति से गुजरा। इसके कुछ महीने बाद ही इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में सीटें खाली हुईँ और तब मैं दरभंगा छोड़कर पूर्णिया पॉलिटेक्निक में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने पहुँचा लेकिन वहाँ का तो माहौल ही अलग था। वहाँ के अधिकतर विद्यार्थी यादव जाति से आते थे और वे सारे यादव विद्यार्थी कथित रूप से पप्पू यादव के आदमी थे। पहले दिन ही मुझसे वहाँ के छात्रसंघ के अध्यक्ष जयराम यादव ने मेरी जाति पूछी और राजपूत सुनते ही नाराज होकर गालियाँ देने लगा। मैं भौंचक्का था कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। हॉस्टल में रहना है तो ठीक वरना 500 रुपया वार्षिक रंगदारी टैक्स देना होगा।
मित्रों,मेरे साथ यादव जाति से आनेवाले विद्यार्थी लगातार काफी बुरा सलूक करते थे जो मेरे लिए नाकाबिले बर्दाश्त था। मैंने भी विरोध किया और अपने स्थानीय मित्र राजकुमार पासवान को साथ लेकर कॉलेज जाने लगा। कक्षा के दौरान ही जाति के आधार पर बंटे छात्रों के बीच अक्सर मारपीट होने लगती। यादव जाति के छात्र बहुधा प्रोफेसरों को भी अपमानित कर डालते थे। इस बीच पूर्णिया में रोजाना हत्याएँ होती थीं। उस समय पूर्णिया में दो आपराधिक गिरोह थे  जिनमें से एक का नेतृत्त्व पप्पू यादव कर रहे थे और दूसरे का नेतृत्त्व था वर्तमान बिहार सरकार में समाज कल्याण मंत्री लेशी सिंह के पति स्व. बूटन सिंह के हाथों में। कभी पप्पू यादव के लोग बूटन सिंह के लोगों को मार देते तो कभी बूटन सिंह के लोग पप्पू यादव के लोगों को। ज्यादातर हत्याएँ पूर्णिया कोर्ट के आसपास होती थीं। पूर्णिया पॉलिटेक्निक के पास ही मरंगा गांव था जो यादवों का गढ़ था इसलिए भी पूर्णिया पॉलिटेक्निक में यादवों का वर्चस्व था। एक बार तो मैंने खुद कचहरी के सामने से पप्पू यादव को अपने आदमी वीरो यादव की लाश के साथ जुलूस निकालते भी देखा था। धड़ाधड़ पूरे शहर की दुकानों के शटर बंद हो गए थे।
मित्रों,धीरे-धीरे स्थिति ऐसी बन गई कि या तो मैं हत्या करता या फिर पूर्णिया पॉलिटेक्निक में ही मेरी हत्या हो जाती। मैं सीधा-सच्चा आदमी था इसलिए मैंने पॉलिटेक्निक में दो सालों की पढ़ाई कर लेने के बाद भी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और इस तरह मेरी जिन्दगी तबाह हो गई। अगर मेरी पढ़ाई पूरी हो गई होती तो मैं आज इंजीनियर होता और आराम की जिन्दगी जी रहा होता लेकिन पप्पू यादव के रंगदारी राज के चलते मेरा कैरियर चौपट हो गया। बाद मेें पप्पू यादव के लोगों ने बूटन सिंह और पूर्णिया के विधायक अजीत सरकार की हत्या कर दी। बाद में पप्पू यादव विभिन्न जेलों में भी रहे मगर फिर कानून की कमजोरियों का लाभ उठाकर बरी भी हो गए।
मित्रों,वही पप्पू यादव आज फिर से सहरसा-मधेपुरा में गरीबों के मसीहा होने का ढोंग कर रहे हैं। मेरा सीधे-सीधे मानना है कि यह व्यक्ति कल भी एक रंगदार था,आज भी है और कल भी रहेगा। यह सिर्फ गरीबों के नाम पर उनको उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा कर सकता है उनका भला नहीं कर सकता। यह आदमी जातीय वैमनस्यता फैलाकर समाज को पथभ्रष्ट कर सकता है समाज को सही दिशा नहीं दिखा सकता। यह हमारे बिहार की त्रासदी है कि इस तरह का गिरा हुआ आदमी बार-बार चुनाव जीत जा रहा है। चाहे अपराधी को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ही क्यों न बना दिया जाए वह मूलतः अपराधी ही रहेगा, देश और समाज को त्रास ही देगा। आपने इस छुटभैय्ये अपराधी को पहले विधायक बनाया फिर एमपी। आपने इस दौरान इसमें क्या परिवर्तन देखा? यह पहले छोटा अपराधी था बाद में बड़ा अपराधी बन गया। अब यह मंत्री-मुख्यमंत्री बनना चाहता है। अगर यह पप्पू यादव जनता को धोखे में रखने में कामयाब हो गया तो निश्चित रूप से इस बार एक-दो नहीं बल्कि सैंकड़ों-हजारों ब्रजकिशोर सिंह को अपनी पढ़ाई अधूरी ही छोड़नी पड़ेगी। इसलिए आपलोगों से मैें हाथ जोड़कर अनुरोध करता हूँ कि इस रंगे सियार की बातों में,झाँसे में आने की भूल कदापि नहीं कीजिएगा। क्या विडंबना है कि जिसको मरते दम तक जेल में होना चाहिए वह व्यक्ति संसद की शोभा बढ़ा रहा है? जिसके हाथ सैंकड़ों अपराधी-निरपराध लोगों के खून से रंगे हुए हैं वह देश के लिए कानून बना रहा है और गंभीर-से-गंभीर मुद्दों पर विचारों की नफासत दिखा रहा है?? यह प्रश्न-चिन्ह वास्तव में हमारे मतदाताओं के विवेक पर लगा प्रश्न-चिन्ह है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

क्या फलदायी होगी बिहार के सीएम की लंदन-यात्रा?

21-09-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,किसी शायर ने क्या खूब कहा है कि तीर खाने की हवस है तो जिगर पैदा कर! सरफरोशी की गर तमन्ना है तो सर पैदा कर!! यहाँ कौन सी जगह है जहाँ जलवा-ए-माशूक नही! शौके दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर!!
मित्रों,अब हम बोलेंगे तो बिहार के मुख्यमंत्री कहेंगे कि बोलता है। मगर करें क्या इनका रवैया ही कुछ ऐसा है कि हमको बार-बार बोलना ही पड़ जाता है। अब जब देसी व्यवसायी बिहार में फूटी कौड़ी भी लगाने को तैयार नहीं हैं तब बिहार के मुख्यमंत्री आज लंदन जा रहे हैं विदेशी निवेशकों से प्रत्यक्ष बातचीत करके उनको प्रत्यक्ष पूंजी निवेश के लिए तैयार करने के लिए। बिहार का दुर्भाग्य है कि यहाँ के नेता-मंत्री बहुत बार विदेशी दौरे कर चुके हैं लेकिन उसका लाभ अभी तक बिहार को चवन्नी का भी नहीं हुआ है। कोई जापान जाकर खेती करना सीखता है तो कोई अमेरिका जाकर जलापूर्ति के तरीके।
मित्रों,अभी पिछले महीने ही बिहार के नगर विकास मंत्री सम्राट चौधरी सीवेज सिस्टम देखने और सीखने के लिए लंदन जाना चाहते थे लेकिन तब इन्हीं जीतनराम मांझी ने उनको जाने नहीं दिया था क्योंकि उस समय पूरा पटना पानी में डूबा हुआ था। आज जबकि पटना में बरसात के पानी का जल-स्तर उस समय से और भी ज्यादा हो गया है तब मुख्यमंत्री खुद लंदन के लिए रवाना हो गए हैं पूँजी निवेश को आकर्षित करने।
मित्रों,जबसे बिहार में सुशासन की सरकार आई है तभी से नीतीश जी भी बिहार में पूंजी आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं और लगातार कर रहे हैं लेकिन बिहार में चंद चवन्नी-अठन्नी के अलावा कुछ आया नहीं। अब हम आते हैं उस शेर पर जिसको हमने आलेख की शुरुआत में ही लिखा था। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर बिहार में पूंजी निवेश चाहिए तो बिहार को ऐसा बनाईए कि लोग खुद ही चुंबक की तरह खिंचें चले आएँ। बिजली दीजिए,सड़कें दीजिए,जमीन दीजिए और सबसे जरूरी है कि अच्छी कानून-व्यवस्था दीजिए। जहाँ के अधिवासी अपने घरों तक में असुरक्षित हों,जहाँ की पुलिस डाका के दौरान फोन करने पर भी घटनास्थल पर हफ्तों तक नहीं पहुँचे और जहाँ अपने जान और माल की सुरक्षा स्वयं करें का नियम चलता हो वहाँ कोई होशमंद तो क्या कोई पागल भी अपनी पूंजी नहीं लगाएगा।
मित्रों,हमारे बिहार में बिजली का जाना नहीं बल्कि आना खबर बनती है। कई-कई दिनों तक लोगों को बिजली के दर्शन तक नहीं होते,सड़कों की हालत तो ऐसी है कि कई बार कुछ सड़कों से गुजरते हुए ऐसा महसूस होता है कि हम बाधा दौड़ में भाग ले रहे हैं। बरसात में अगर सड़कों पर पड़े गड्ढ़ों की गहराई का अंदाजा नहीं हो तो यकीनन आप अगले ही पल में छोटे-छोटे तालाब में मछली पकड़ते नजर आएंगे। उद्योग लगवाना है तो जमीन भी चाहिए और बिहार में कहाँ मिलेगी हजार-500 एकड़ जमीन ईकट्ठे? सड़क-रेल लाईन बनाने के लिए तो कोई किसान जमीन देना नहीं चाहता फिर बिहार सरकार उद्योगों के लिए जमीन कहाँ से लाएगी। कानून-व्यवस्था के बारे में हम थोड़ा-सा संकेत पहले भी दे चुके हैं। बिहार में आप दो-चार करोड़ के सड़क-निर्माण या दस-बीस लाख के स्कूल-भवन-निर्माण का भी ठेका अगर लेते हैं तो आपको दर्जनों छुटभैये रंगदारों का सामना करना पड़ेगा। कभी-कभी तो नक्सली भी पहुँच जाते हैं लेवी मांगने और नहीं देने पर जेसीबी-ट्रैक्टर आदि को फूँक डालते हैं और पुलिस उनकी कोई सहायता नहीं करती बल्कि उल्टे सलाह देती है कि साब! काहे को झंझट में पड़ रहे हो? दे दो न दो-चार लाख रुपया।
मित्रों,जाहिर है कि बिहार के पास अभी ऐसी नजर नहीं है कि उसको शौके दीदार का सौभाग्य मिले। हमारे बिहार में एक कहावत है कि बिन मांगे मोती मिले,मांगे मिले न भीख। मतलब कि किसी राज्य में पूंजी निवेश होगा या नहीं यह उस राज्य की परिस्थिति और योग्यता पर निर्भर करता है। अगर आपने वह योग्यता पैदा कर ली है तो आपको पैसों के लिए गिड़गिड़ाना नहीं पड़ेगा लोग खुद ही पैसे लेकर आपके पीछे भागेंगे वरना आप लंदन-न्यूयार्क घूमते रहिए कोई आपके ईलाके में फूटी कौड़ी भी नहीं लगाएगा। पता नहीं हमारे मुख्यमंत्री इस हकीकत से वाकिफ हैं भी या नहीं। वैसे सरकारी खर्च पर विदेश-यात्रा पर जाने के लिए कोई-न-कोई बहाना तो चाहिए ही था। राज्य की जनता के दिल को बहलाने के लिए मांझी यह ख्याल अच्छा है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

बुधवार, 17 सितंबर 2014

नए भारत के विश्वकर्मा को जन्म दिन की शुभकामनाएँ

17 सिंतबंर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,यह कितना बड़ा संयोग है कि आज एक तरफ तो देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा के पूजन का दिन है तो वहीं दूसरी ओर आज भारत के प्रधानमंत्री जिन्होंने नवीन और ऊर्जावान भारत के निर्माण का बीड़ा उठाया है उन नरेंद्र मोदी का जन्म दिन भी है। यह सही है कि लोकतंत्र की अपनी मजबूरियाँ होती हैं लेकिन फिर भी नरेंद्र मोदी अबतक जिस तरह से सरकार का संचालन किया है वह भारत के उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करने के लिए पर्याप्त है।
मित्रों,मैंने भी मोदी मंत्रिमंडल के गठन के समय कुछ मंत्रियों को मंत्री बनाए जाने को लेकर आपत्ति की थी लेकिन कल यूपी के लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों के जो परिणाम आए हैं उनसे पता चलता है कि कहीं-न-कहीं मोदी जी को भी वोटबैंक का ख्याल रखना पड़ता है। जब तक हमारे देश की जनता मूर्ख है तबतक मोदी जी जैसा देश का भला चाहनेवाला,सिर्फ देश के लिए जीने और मरनेवाला व्यक्ति भी लाचार रहेगा।
मित्रों,क्या कारण है कि कोई राजपूत दलितों का लाख हितैषी होने पर भी उनका नेता,उनके वोटों का ठेकेदार नहीं बन पाता? क्या कारण है कि कोई यादव राजपूत मतों पर अपना दावा नहीं कर पाता? क्या कारण है कि कोई ब्राह्मण बनियों को नेतृत्व नहीं दे पाता? कारण बस एक ही है और वह हमारे मतदाताओं की अपरिपक्वता जो आज भी अपनी जाति के लोगों को अपना नेता मानते हैं भले ही वह दशकों से उनको धोखा देता आ रहा हो। मैंने लोकसभा चुनावों के समय भाजपा के लोजपा के साथ जाने का विरोध किया था लेकिन भाजपा नहीं मानी क्योंकि उसके समक्ष और कोई चारा ही नहीं था। बिहार के दुसाधों के लिए रामविलास पासवान ही एकमात्र नेता हैं और दुसाधों का वोट चाहिए तो रामविलास पासवान को साथ में रखना ही होगा चाहे उनपर भ्रष्टाचार के कितने भी आरोप क्यों न हों।
मित्रों,इसलिए नरेंद्र मोदी को भी कई दागियों को मंत्रिमंडल में रखना पड़ा। लेकिन वाहवाही की बात तो यह है कि नरेंद्र मोदी ने उनलोगों को मनमानी करने की छूट नहीं दी है बल्कि पूरी तरह से शिकंजे में करके रखा है। वास्तविकता तो यह है यह सरकार पूरी तरह से एक ही व्यक्ति पर केंद्रित है और वह हैं नरेंद्र मोदी। मोदी जानते हैं कि अगर सरकार की वाहवाही होगी तो वह भी उनकी ही होगी और अगर बदनामी होगी तो वह भी केवल उनकी ही होगी।
मित्रों,इसलिए शपथ-ग्रहण से पहले कामकाज शुरू कर देनेवाले भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं नरेंद्र मोदी। यह उनकी अच्छी नीतियों का ही परिणाम है कि इस समय महंगाई दर पाँच साल के न्यूनतम स्तर पर पहुँच गई है,विकास-दर ने कुलांचे भरना शुरू कर दिया है,बिजली के उत्पादन में 22 प्रतिशत की तेज वृद्धि हुई है,पूँजी-निवेश के क्षेत्र में धन-वर्षा के आसार बनने लगे हैं,भारत के भिखारियों तक के अच्छे दिन आते हुए दिखाई देने लगे हैं,सरकार में गति आई है,कुशलता आई है और 5 सालों तक सरकारविहीन रहे भारत में एक काम करती हुई सरकार नजर आने लगी है।
मित्रों,वैश्विक स्तर पर भी पिछले 100 दिनों में भारत का सिर ऊँचा हुआ है। आज चीन के राष्ट्रपति भारत आ रहे हैं और 100 अरब डॉलर के निवेश के प्रस्ताव ला रहे हैं वहीं दूसरी तरफ हमारे देश के राष्ट्रपति इस समय वियतनाम में हैं और उन्होंने तेल खोज से संबंधित ऐसे प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं जो निश्चित रूप से चीन को नागवार गुजरेगा लेकिन नरेंद्र मोदी की तो पॉलिसी ही है कि न हम सिर झुकाकर बात करेंगे और न ही सिर पर चढ़कर बल्कि हम आँखों में आँखें डालकर बराबरी के स्तर पर बातचीत करेंगे फिर चाहे सामने रूस हो,अमेरिका हो या चीन हो।
मित्रों,हमारे प्रधानमंत्री पुराने पिट चुके ढर्रे पर काम करने के बिल्कुल भी पक्षधर नहीं हैं तभी तो उन्होंने योजना आयोग नामक बेकार हो चुकी संस्था को समाप्त कर दिया,कई कैबिनेट समितियों का अंत कर दिया और कई ऐसे मंत्रालयों को मिलाकर एक-एक मंत्री ऱख दिया जिनके कामकाज एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। फाइलों को अब पैसे देकर चलवाना नहीं पड़ता बल्कि फाइलें खुद ही चलती हैं स्वचालित मोड में। हमारे प्रधानमंत्री चाहते हैं कि चाहे रक्षा-क्षेत्र हो या इलेक्ट्रॉनिक्स या फिर उपभोक्ता वस्तुएँ सबका उत्पादन भारत में हो और भारत में न केवल इनका निर्माण हो बल्कि पूरी दुनिया में भारत के बने सामान छा जाएँ। उनकी मेक इन इंडिया योजना अगर सफल रहती है तो इससे हमारी अर्थव्यवस्था को तो पर लगेंगे ही साथ ही बेरोजगारी की समस्या का भी स्वतः समाधान हो जाएगा।
मित्रों,कृषि,शिक्षा,पुलिसिंग,न्यायपालिका,खेल,शासन-प्रशासन,आधारभूत संरचना आदि हरेक क्षेत्र में देश में आमूल-चूल परिवर्तन करने की जरुरत है और हमारे प्रधानमंत्री भी यही चाहते हैं कि अब देश सही मायनों में बदले। हमारे बिहार में एक कहावत है कि रास्ता बताओ तो आगे चलो। उनका अभी तक का काम तो यही बताता है कि वे न केवल देश को रास्ता दिखा रहे हैं बल्कि खुद उस रास्ते पर चल भी रहे हैं। जब गांधीनगर से नई दिल्ली आने लगे तो मुख्यमंत्री के रूप में प्राप्त वेतन को अपने चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों के बीच बाँट दिया और आज जब माँ ने जन्मदिन के आशीर्वाद के तौर पर 5001 रु. दिया तो उसे भी वतन पर न्योछावर कर दिया। वे सचमुच सबका साथ लेकर सबके विकास पर चल रहे हैं। उनकी संवेदनाओं के दायरे में भारत के युवा,किसान,हस्तशिल्पी,इंजीनियर,डॉक्टर यहां तक कि भिखारी भी हैं,जीव-जंतु भी हैं। न तो रोम एक दिन में बना था और न तो सौ दिनों में एक बर्बाद देश दुनिया का सबसे समृद्ध राष्ट्र बन सकता है। शीघ्रता तो की जा रही है लेकिन शीघ्रता को भी तो समय चाहिए। न तो हमारे चाहने से समय से पहले वृक्ष फल देने लगेगा और न ही रातों-रात हजारों फैक्ट्रियाँ खुल जाएंगी,चुटकियों में हजारों किमी सड़कें बन जाएंगी और न तो भारत में सरप्लस बिजली का उत्पादन होने लगेगा। इसलिए आईए हम सभी प्रार्थना करें परमपिता परमेश्वर से कि भगवान करें कि नए भारत के स्वप्नद्रष्टा को इतनी शक्ति मिले,इतनी लंबी आयु मिले कि वह अपने सपनों को अपने हाथों अपनी आँखों से साकार होता हुआ देख सके। आमीन!!!!

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)