शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

दिल्ली के दंगे भारत के खिलाफ युद्ध

मित्रों, भारत की राजधानी में दंगे हुए हैं. उस दिल्ली में जिसे हिंदुस्तान का दिल कहा जाता है. लेकिन सवाल उठता है कि क्या सचमुच ये सिर्फ दंगे ही हैं? या कुछ और हैं. शुरुआत में हमें भी लगा था कि ये सांप्रदायिक दंगे ही हैं लेकिन अब जबकि इसकी भयावहता सामने आने लगी है तब यह स्पष्ट हो चुका है कि ये दंगे दंगे हैं ही नहीं बल्कि बड़े ही नियोजित तरीके से हिन्दुओं और तदनुसार भारत के खिलाफ छेड़ा गया युद्ध है. एक ऐसा युद्ध जिसे निहायत गन्दी मानसिकता वाले लोगों द्वारा भारत को बदनाम करने की साजिश के तहत संचालित किया गया. ये दंगे वास्तव में भारत पर घात लगाकर किया गया हमला है.
मित्रों, इन दंगों में जानबूझकर दलितों के तथाकथित नेता चंद्रशेखर रावण को शामिल किया गया जिससे लोग यह नहीं कह सकें कि मुसलमानों ने भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है जबकि इस आदमी के पीछे एक भी दलित नहीं है. जानबूझकर इस कलियुगी रावण द्वारा उस समय भारत बंद का आह्वान करवाया गया जब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प भारत की यात्रा पर थे. भारत के आतंरिक शत्रुओं को यह अच्छी तरह से पता था कि इस समय दिल्ली पुलिस ट्रम्प की सुरक्षा में लगी हुई है इसलिए हिन्दुओं को बचाने नहीं आ सकती.
मित्रों, सीसीटीवी फुटेज से भी यह बात सामने आ चुकी है कि पहले पथराव की शुरुआत मुसलमानों ने की थी. उन्हीं स्वघोषित घनघोर राष्ट्रवादी मुसलमानों ने उसके बाद हिन्दुओं को मारने की शुरुआत की और २४ तारीख की रात को ताहिर हुसैन नामक नगर पार्षद जो आम आदमी पार्टी का नेता है और केजरीवाल का स्नेहिल है के घर को अपना किला बनाकर कोहराम मचा दिया. ताहिर के घर में उस रात ३००० मुसलमान जमा थे. उस रात इनके हाथ जो भी हिन्दू लगा उसकी हत्या कर दी गई. ऐसा करते समय इन जेहादी आपियों ने यह भी नहीं सोंचा कि इनमें से अधिकतर हिन्दुओं ने कुछ ही दिन पहले उनके साथ हाथ-में-हाथ डालकर आम आदमी पार्टी को मतदान किया था. इंटेलिजेंस ब्यूरो का जवान अंकित शर्मा दुर्भाग्यवश उस ताहिर हुसैन का पड़ोसी था की हत्या तो इतनी बेरहमी से की गई कि देखकर पोस्ट मार्टम करनेवाले चिकित्सकों का भी कलेजा काँप गया. ६ घंटे में छह-सात लोगों ने बारी-बारी से उस पर चाकू से ४०० बार वार किए. सबकुछ उसके परिवार की आँखों के आगे हुआ लेकिन वे कुछ भी नहीं कर सके. इसी तरह एक लड़की प्रीति के साथ ताहिर हुसैन के घर में संभवतः ४०-५० जेहादियों ने पहले भीषण बलात्कार किया फिर उसे जलाकर मार डाला. उस लड़की के वस्त्र अभी भी ताहिर हुसैन के घर में पड़े हुए हैं जो इस भीषण यातना की रो-रो कर गाथा कह रहे हैं. इतना ही नहीं किसी हिन्दू के सर में ड्रिल मशीन से छेद कर दिया गया तो किसी का हाथ-पाँव काट कर जलती हुई आग में झोंक दिया गया. नितिन नामक एक बच्चा पड़ोस की दुकान जाने के लिए जैसे ही घर से निकला उसके सर में गोली मार दी गई. वह मासूम बच्चा जो किसी के घर का चिराग था को बेवजह बुझा दिया गया क्योंकि वो काफ़िर था.
मित्रों, इतना ही नहीं जेहादियों ने उसके अलावा पूरे ईलाके में हिन्दुओं की सारी गाड़ियों, घरों, होटलों, दुकानों यहाँ तक कि स्कूलों तक को नहीं बक्शा बल्कि जलाकर राख कर दिया. चूँकि पुलिस राष्ट्रपति ट्रम्प की सुरक्षा में लगी थी इसलिए समय पर पर्याप्त संख्या में नहीं आ सकी. जो पुलिसवाले दंगों को रोकने आए भी तो उनके हाथों में डंडे थे जबकि जेहादियों के पास तमंचे थे परिणामस्वरूप वे सारे घायल होकर अस्पताल पहुँच गए उनमें से भी कई मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं.
मित्रों, जिस तरह युद्ध में छोटी-छोटी चीजों का भी इस्तेमाल किया जाता है उसी तरह से इन दंगों में भी पेट्रोल, कोल्ड ड्रिंक की बोतलों, ट्यूब, रस्सी, लोहे की छड, चाकू और तमंचों का बखूबी इस्तेमाल किया गया जिससे इलाके के हिन्दुओं को जान और माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा. अब तक मौत का आंकड़ा 50 के करीब पहुँच चुका है. प्रतिक्रिया में हिन्दुओं ने भी गुस्से में आकर कुछ मुसलमानों को मार डाला. लेकिन सवाल उठता है कि उस इलाके से जो हिन्दुओं का पलायन शुरू हो चुका है उसे रोका कैसे जाए? कैसे उनके मन में अपने मुसलमान पड़ोसियों के प्रति विश्वास उत्पन्न किया जाए? जहाँ हिन्दू घोर नैतिकतावादी हैं वहीँ इस्लाम में सब जायज है नाजायज कुछ है ही नहीं. महिलाओं को हम दया और करुणा की प्रतिमूर्ति मानते हैं लेकिन जब महिलाएं भी पत्थर चलाकर गजवा-ए-हिन्द में अपना योगदान देने लगें तो फिर पुरूषों को हैवान बनने से रोकेगा कौन?
मित्रों, एसआईटी की प्रारंभिक जांच में भी यह सामने आ रहा है कि इस युद्ध रुपी दंगे के तार केरल के मुस्लिम संगठन पीएफआई और पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई से जुड़े हैं. जांच से ऐसे संकेत भी मिले हैं कि अगर मुसलमान उस दिन उत्तर पूर्वी दिल्ली की सडकों को बंद करने में सफल हो जाते और रात के बदले दिन में ही हिंसा नहीं करने लगते तो शायद उस इलाके में हिन्दुओं का अभूतपूर्व नरसंहार देखने को मिलता. ऐसे में समझ में नहीं आता कि अपने देश में भविष्य में क्या होनेवाला है? शायद भयंकर गृहयुद्ध जैसे कि अमेरिका में १८६१ से १८६५ तक हुआ था. लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई. बंटवारे के समय अम्बेदकर को अनसुना कर मुसलमानों को भारत में रोकने की जो खता नेहरु-गाँधी ने की थी उसकी सजा अब भारत के हिन्दू पाएंगे और हमारी राजधानी दिल्ली से इसका आरंभ भी हो चुका है.

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

२०२० में कलाम साहब के सपनों का भारत


मित्रों, जबसे भारत आजाद हुआ है तभी से हमारे स्वप्नदर्शी नेताओं ने देश के विकास को लेकर सपने देखे हैं. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने १९४७ में भारत को सुखी और खुशहाल बनाने का सपना देखा था. उनका मानना था कि यह तब तक मुमकिन नहीं होगा जब तक देश में फैली निरक्षरता, गरीबी, बीमारियाँ, अज्ञानता समाप्त नहीं होगी और देश के प्रत्येक नागरिक को आगे बढ़ने के समान अवसर नहीं मिलेंगे.
मित्रों, फिर देखते-देखते भारत की आजादी के ५० साल बीत गए लेकिन देश की हालत में कोई बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हुआ जिसे देखकर राजर्षि डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम काफी चिंतित रहते थे. बल्कि कलाम साहब को देश में उस पुरानी उमंग, तमन्ना और ललक का अभाव दिखा जो आजादी के तत्काल बाद के समय में देशवासियों के मन में हिलोरे मार रही थी. उद्दाम देशभक्त कलाम साहब यह देख निराश थे कि शताब्दी और सहस्राब्दी की समाप्ति के समय जब भारत को विकसित देशों की कतार में खड़े हुए देखने की बात आती है तो किसी भी भारतीय के चेहरे पर उम्मीद की चमक नहीं दिखाई देती, दिखाई देती है निराशा और मानवद्वेष.
मित्रों, कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में भारतमाता के इस लाल ने विकसित भारत का सपना देखा और देशवासियों के सामने लक्ष्य रखा कि भारत को २०२० तक विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में ला खड़ा करना है. इसके लिए उनके पास जो भी कार्ययोजना थी उसको उन्होंने भारत की जनता के समक्ष एक पुस्तक के रूप में रखा जिसका नाम था-भारत २०२०.
मित्रों, कलाम साहब ने १९९८ में लिखित अपनी इस पुस्तक में एक ऐसे भारत की परिकल्पना की थी जिसमें साल २०२० में कोई गरीब नहीं होगा. उनके अनुसार वर्ष २०२० में भारत जीडीपी की दृष्टि से दुनिया में चौथे स्थान पर होगा और उसे विकसित देश का दर्जा मिल जाएगा. कलाम साहब के अनुसार एक विकसित भारत का अर्थ होगा कि भारत विश्व की ५ महानतम शक्तियों में से एक होगा. वह राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से आत्मनिर्भर होगा और विश्व के आर्थिक और राजनैतिक रंगमंच पर उसकी निर्णायक व अहम् भूमिका होगी.
मित्रों, आज हम २०२० में पहुंचकर इस बात की भली-भांति समीक्षा कर सकते हैं कि भारत कलाम साहब के स्वप्नों को कहाँ तक साकार कर पाया है. निश्चित रूप से जीडीपी के मोर्चे पर हम काफी हद तक सफल रहे हैं और कुल जीडीपी के मामले में भारत आज दुनिया में चौथे न सही लेकिन पांचवें स्थान पर पहुँच चुका है लेकिन भारत के लिए विकसित देश का दर्जा आज भी पहुँच से काफी दूर है क्योंकि प्रति व्यक्ति आय २३६१ डॉलर के साथ भारत प्रति व्यक्ति आय में बेहद नीचे दुनिया में १२५वें स्थान पर है. जबकि विश्व बैंक ने उच्च आय वाले देश या विकसित देशों की परिभाषा के लिए 12,055 अमेरिकी डॉलर प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI)  का पैमाना तय कर रखा है. यह प्रति व्यक्ति आय भी दुर्भाग्यवश भारत में सबके बीच समान रूप से वितरित नहीं है. अर्थव्यवस्था में ऊपर के १० प्रतिशत लोगों की आय काफी ज्यादा है तो नीचे के १० प्रतिशत लोग लगभग भिखारी हैं और दिन-ब-दिन यह खाई घटने के बजाए बढती ही जा रही है. इसी तरह मानव विकास सूचकांक में भारत का स्थान दुनिया में १२९वां है जो काफी शर्मनाक स्थिति है. जहाँ कलाम साहब की परिकल्पना के अनुसार भारत में गरीबी २००८ में ही समाप्त हो जानी चाहिए थी दुर्भाग्यवश आज भी भारत के करीब ३२ प्रतिशत लोग यानि ३७ करोड़ लोग गरीब हैं जो दुनिया में सबसे बड़ी संख्या है और पूरी दुनिया के गरीबों की संख्या का एक तिहाई है. इसी तरह रोजगार के मोर्चे पर भी देश की हालत आज पहले से भी ख़राब है. औद्योगिक उत्पादन की स्थिति भी चिंतनीय है. जहाँ तक दुनिया के रंगमंच पर भारत के महत्व का सवाल है तो पीछे २० सालों में निश्चित रूप से भारत का महत्व बढ़ा है लेकिन आज भी न तो भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य बन पाया है और न ही हिंदी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बन पायी है.
मित्रों, इस तरह चाहे आर्थिक विकास हो या औद्योगिक विकास या फिर आर्थिक समानता आज भी भारत की स्थिति कमोबेश वैसी ही है जैसी २० साल पहले तब थी जब कलाम साहब ने विकसित भारत का सपना देखा था. इसके लिए हम किसी एक व्यक्ति या सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते क्योंकि कलाम साहब ने भी अपनी पुस्तक में सबके सम्मिलित योगदान का आह्वान किया था. उन्होंने शिक्षकों, बैंकरों, डॉक्टरों, प्रशासकों और अन्य सारे पेशेवरों, सरकारी मंत्रालयों और विभागों, केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, राज्यों के सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों, शोध और विकास प्रयोगशालाओं, उच्च अध्ययन की संस्थाओं, निजी क्षेत्र के बड़े उद्योगों, लघु-उद्योगों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, गैर-सरकारी संस्थाओं और मीडिया सबसे आह्वान किया था कि वे पूरे मनोयोग से इस दिशा में कार्य करें जिससे भारत २०२० तक विकसित राष्ट्र का दर्जा पा सके. परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं सका और आज भी कलाम साहब का सपना अधूरा है जिसके लिए हम उनके समक्ष क्षमाप्रार्थी है. हम समझते हैं कि आज देश के लिए चिंता करने वाले कलाम साहब जैसे लोग २० साल पहले के समय से और भी कम हो गए हैं. लोगों में मन में निजी स्वार्थ ने कहीं ज्यादा स्थान घेर लिया है और लोग जल्दीबाजी में धनवान बनने के लिए गर्हित से गर्हित कर्मों में पहले से कहीं ज्यादा संख्या में संलिप्त हो रहे हैं.

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

पुलवामा के अभागे शहीद



मित्रों, पुलवामा आतंकवादी घटना को एक साल बीत चुके हैं मगर वो वीभत्स दृश्य जैसे आँखों के आगे से हटने का नाम ही नहीं ले रहा है. चारों तरफ मांस के लोथड़े और खून. कौन-सा टुकड़ा किसका है पहचानना असम्भव. गाँव में लाशें तो आई लेकिन मांस के चंद टुकड़ों के रूप में. पूरे देश में क्रोध और देशभक्ति का तूफ़ान उठ खड़ा हुआ. लोग चाहते थे कि इसका बदला लिया जाए. आसमान से बम गिराकर बदले की कार्यवाही भी पूरी की गई. मोदी सरकार ने देश में पैदा हुए गुस्से से पूरा लाभ उठाया और दोबारा चुनाव जीत लिया.
मित्रों, फिर सबकुछ सामान्य हो गया और लगा जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो. धरती घूमती रही और देखते-देखते आज एक साल पूरा हो गया. देश के बांकी लोगों के लिए सबकुछ भले ही सामान्य हो लेकिन जिन परिवारों ने अपने बेटे खोए उनकी तो जैसे दुनिया ही उजड गई.
मित्रों, हमारे देश में सब बराबर हैं ऐसा आप और हम रोज पढ़ते हैं सुनते हैं लेकिन यह सिर्फ पढने और सुनने के लिए है. वास्तविकता तो यह है कि हमारे देश में न तो जीवित लोग बराबर हैं और न ही देश के लिए अपनी जान लुटानेवाले ही. अगर देश में सब बराबर होते तो देश के लिए अपनी जान न्योछावर करनेवाले अर्द्धसैनिकों को भी जल, थल और वायु सैनिकों की तरह शहीद का दर्जा मिलता. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सैनिक तो युद्ध होने पर ही मरते हैं जबकि अर्द्धसैनिक शांतिकाल में भी रोज अपनी जान देते हैं, पुलवामा में भी दी लेकिन उनको शहीद का दर्जा नहीं मिलता, पुलवामा के शहीदों को भी नहीं मिला. उनके परिजनों को पेंशन भी नहीं मिलेगा क्योंकि अब महान भारतवर्ष में पेंशन तो सिर्फ जल, थल, वायु सैनिकों के अलावे सिर्फ विधायकों और सांसदों को ही मिलती है. सालभर से पुलवामा के शहीद मुआवजे और पेंशन के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं. हर टेबल पर उनको दुत्कारा जाता है, मजाक उड़ाया जाता है, गालियाँ दी जाती हैं और रिश्वत माँगा जाता है. और सरकार कहती है कि मेरा देश बदल रहा है. कैसा बदलाव? काहे का बदलाव? जब पिछले ९० सालों में कुछ नहीं बदला तो अब एक साल में क्या बदलेगा?
मित्रों, किसी शायर ने अंग्रेजों के समय में कहा था कि शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले. लेकिन विडम्बना यह है कि न तो अंग्रेजों के समय शहीदों को शहीदों का दर्जा मिला और न ही अब मिल रहा है. तब भगत सिंह को नहीं मिला था और अब अर्द्धसैनिकों को नहीं मिल रहा. तब विदेशी सरकार थी अब देशी है. आजादी के बाद भी कुछ नहीं बदला. तब नेहरु ने सुभाष चन्द्र बोस को युद्ध अपराधी कहा था. फिर देशभक्तों की सरकार आई और २००५ में नेताओं और सैनिकों को छोड़कर सबको बिना पेंशन का कर दिया. जो सबसे ज्यादा जान देते हैं उन अर्द्धसैनिकों को भी उन्होंने बिना पेंशन का कर दिया. देशभक्तों की सरकार थी कोई कुछ बोलता भी तो कैसे? फिर नेताओं को तो पेंशन दे ही दिया था तो नेता भला क्यों विरोध करते? फिर उनके बच्चे शहीद तो होते नहीं. शहीद तो होते हैं गरीब किसानों और मजदूरों के बेटे. जो पहले अपनी जान देते हैं और बाद में उनके परिजन नेताओं के वादों का पुलिंदा लिए दफ्तरों में भटकते रहते हैं. यह सिलसिला चलता ही रहता है. फिर आतंकी घटना फिर शहादत और फिर दफ्तरों के चक्कर और रिश्वत. अभी तो २०१३ के शहीद हेमराज के परिजन ही भटक रहे हैं फिर पुलवामा को तो एक साल ही हुआ है. देश तो नहीं बदला रहा लेकिन देश में रिश्वत का स्वरुप जरूर बदल रहा है. अभी यूपी में रिश्वत खाकर ३० नेताओं और अधिकारियों को एचआईवी-एड्स हो गया. मेरा देश बदल रहा है, आगे चल रहा है. मेरा भारत महान.

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

दिल्ली के स्मार्ट वोटर


मित्रों, हिंदुस्तान के दिल दिल्ली का फैसला आ चुका है. हालाँकि आम आदमी पार्टी फिर से जीत गई है लेकिन उसके और भाजपा के बीच वोटों का फासला कम हुआ है. जो लोग इस समय दिल्ली के मतदाताओं को गालियां देने में लगे हैं वो नादान है. ऐसे लोगों के बारे में बस इतना ही कहा जा सकता है कि नाच न जाने आँगन टेढ़ा. जो नेता और दल जनता को बन्दर और खुद को मदारी समझते हैं उनको समझ लेना चाहिए कि २१वीं सदी में जनता बन्दर नहीं है मदारी है और बन्दर नेता हैं. दिल्ली का सबक अगर कुछ है तो पहला सबक यह है कि अब जनता नाचेगी नहीं नचाएगी. 
मित्रों, दूसरी बात केजरीवाल इस बात को समझ गये कि किसको क्या चाहिए. उदहारण के लिए महिलाओं को क्या चाहिए, जनता को क्या चाहिए, मुसलमानों को क्या चाहिए और हिन्दुओं को क्या चाहिए. जिसको जो चाहिए था उसको केजरीवाल ने वो सब दे दिया. जो लोग दिल्लीवालों को मुफ्तखोर बता रहे हैं उनको भी यह समझ लेना चाहिए कि बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ देना सरकार का कर्त्तव्य है.
मित्रों,भाजपा ने यह नहीं समझा कि पूर्वांचली सिर्फ गीत सुनकर वोट नहीं दे देंगे. फिर मनोज तिवारी को भाजपा ने कुछ ज्यादा ही काबिल समझ लिया जबकि वे काबिल नहीं हैं बल्कि कबिलफचाक हैं. मतलब कि वे खुद को बहुत ज्यादा काबिल समझते हैं.
मित्रों, इसके साथ ही केजरीवाल ने अपने कोर मतदाताओं को हमेशा परवाह की जबकि भाजपा ने कभी अपने कोर वोटर्स की परवा नहीं की और फ्लोटिंग वोटर्स के पीछे भागती रही.  बिहार के एक बहुत बड़े नेता शिवानन्द तिवारी ने वर्षों पहले भाजपा के सबसे पक्के समर्थक बड़ी जाति के मतदाताओं के बारे कहा था कि उनके लिए कुछ भी करने की जरुरत नहीं है सिर्फ देश और राज्य विकास को देखकर ही वोट दे देंगे. इस दिल्ली चुनाव में भी भाजपा को ज्यादातर वोट उनके ही मिले लेकिन भाजपा दलितों और मुसलमानों के पीछे भागती रही. तीन तलाक का असर दिल्ली में नहीं दिखा. उल्टे मुस्लिम महिलाएं भाजपा के खिलाफ ज्यादा उग्रता थीं. दलितों ने भी भाजपा को वोट नहीं दिया. 
मित्रों, भाजपा की एक और आदत काफी बुरी है और वो आदत है यूज एंड थ्रो. शाहीन बाग़ के साथ आप पार्टी शुरू से अंत तक खड़ी थी लेकिन दूसरी तरफ भाजपा कभी अपने समर्थकों का साथ नहीं देती. क्या कभी भाजपा ने कहा है कि वो गोरक्षकों के साथ है? मोदी की जान बचाने में कोई बंजारा जेल चला जाता है और भाजपा उसे उसके हाल पर मरने छोड़ देती है. साथ ही भाजपा ने अपने साईबर योद्धाओं के लिए कभी कुछ नहीं किया है? अभी-अभी मोदीजी ने लोकसभा में एक शेर पढ़ा था कि खूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं, साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं. जाहिर है कि यह शेर अगर किसी पर सबसे ज्यादा लागू होती है तो तो खुद भाजपा है.
मित्रों, आजादी के बाद कांग्रेस की सबसे बड़ी गलती थी कि उसने सामाजिक कार्यक्रम बंद कर दिया. भाजपा इस मामले में भाग्यशाली रही कि उसके लिए वही काम आरएसएस करता रहा लेकिन अब भाजपा को समझ लेना होगा कि सिर्फ आरएसएस के सामाजिक कार्यक्रमों से काम नहीं चलने वाला. बल्कि भाजपाइयों को भी एसी से बाहर आकर सडकों पर पसीना बहाना पड़ेगा. सिर्फ फोटो खिंचवाने के स्थान पर वास्तव में स्वच्छता कार्यक्रम चलाना पड़ेगा. झुग्गी-झोपड़ियों में जाकर, दलितों की बस्तियों में जाकर लोगों की समस्याओं को दूर करना पड़ेगा. साथ ही पूरे देश में जहाँ-जहाँ उसकी सरकार हैं पुलिस, स्वास्थ्य और शिक्षा को भ्रष्टाचारमुक्त बनाना पड़ेगा. दिल्ली में भी भाजपा के हाथों में अभी भी बहुत कुछ है. केंद्र की सरकार उसकी है और दिल्ली नगरपालिका पर भी दशकों से उसका कब्ज़ा है. भाजपा को चाहिए कि वो नगरपालिका के काम-काज में फैली भ्रष्टाचाररुपी गंदगी को साफ़ करे.
मित्रों, अंत में एक छोटी मगर मोती बात. दरअसल दिल्ली के मतदाता भारत के सबसे स्मार्ट मतदाता हैं. वे भाजपा को लोकसभा और नगरपालिका के लायक तो समझते हैं लेकिन विधानसभा के लायक नहीं समझते. वहीँ दूसरी तरफ वे आप को विधानसभा के लायक तो समझती है लेकिन लोकसभा और विधानसभा के लायक नहीं समझती. पता नहीं आगे आनेवाले चुनावों में दिल्ली की जनता का क्या निर्णय हो. हो सकता है कि वो आप को लोकसभा और नगरपालिका के लायक समझ ले या फिर भाजपा को विधानसभा के लायक. लेकिन इसके लिए दोनों को दिल्ली की जनता के मानदंडों पर खरा उतरना पड़ेगा.

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

उफ्फ ये बिहार के बदमाश चूहे


मित्रों, लड़कपन में शिक्षक की पिटाई से बचने के लिए आपने भी बहाने बनाए होंगे. हमने भी बनाए थे. कई बार जब हम गृह कार्य पूरा नहीं कर पाते थे तो जानबूझकर कॉपी घर पर ही छोड़ आते थे और फिर विद्यालय में कह देते थे कि गृह कार्य तो कर लिया था मगर कॉपी घर पर छूट गयी. लेकिन आजकल के बच्चे तो २१वीं सदी के बच्चे ठहरे इसलिए उनके बहाने ज्यादा प्रोन्नत होते हैं. हमने पिछले दिनों एक बच्ची को देखा कि उसने अपनी ऊंगली में बेवजह पट्टी बंधवा ली. पूछताछ पर पता चला कि उसने गृहकार्य नहीं किया था.
मित्रों, ये तो बात ठहरी लड़कपन की लेकिन बिहार में तो प्रशासन अपनी गलतियां और भ्रष्टाचार छिपाने के लिए अजीबोगरीब बहाने बना रही है. कुछ महीने पहले प्रशासन ने आरोप लगाया था कि जब्त की गई लाखों बोतल शराब पुलिस के मालखाने में चूहे पी गए. जिसने भी सुना सन्न रह गया. घोड़ों, वनमानुषों के बारे में तो हमने भी सुना है कि वे शराब पीते हैं लेकिन चूहों के बारे में कभी नहीं सुना. मैं समझता हूँ कि चूहों पर इस तरह के आरोप लगानेवाले निश्चित रूप से गणेश जी के महान भक्त रहे होंगे.  तभी तो उन्होंने इस तरह अधिकारपूर्वक उनकी सवारी को कागजों में ही सही शराबी बना दिया.
मित्रों, कागजों से याद आया कि अभी दो दिन पहले भी बिहार में एक बार फिर से चूहों पर गंभीर और संगीन आरोप लगाया गया है. आरोप एक बार फिर से प्रशासन ने ही लगाया है. आरोप है कि बिहार में नौकरी करनेवाले १ लाख शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े कागजात चूहों ने चट कर लिए हैं. दरअसल बिहार में शिक्षकों की बहाली में जमकर धांधली करने के आरोप हैं. आरोप है कि बिहार में लाखों ऐसे शिक्षक कार्यरत हैं जिनके प्रमाणपत्र नकली हैं. अब प्रशासन किस पर आरोप लगाता? जब बचने का कोई उपाय नहीं सूझा तो उनको मूषकराज की याद आई और उन्होंने सीधे-सीधे चूहों को न्याय के कटघरे में खड़ा कर दिया.
मित्रों, कहने का मल्लब यह कि जब कोई रिकॉर्ड ही नहीं है तो कोई गड़बड़ी भी नहीं हुई और सबकुछ पाकसाफ़ था. इसी तरह आपने देखा होगा कि जब चुनाव आते हैं तो विभिन्न मंत्रालयों में अचानक शार्ट-सर्किट होने लगती है और सारी भ्रष्ट फाईलें जलकर राख हो जाती हैं. समर्थ व्यक्ति तो भ्रष्ट हो नहीं सकता इसलिए मैंने यहाँ फाईलों को भ्रष्ट कहा. एक बार फाईलें जल गईं तो भ्रष्टाचार भी समाप्त हो गया और सबकुछ पवित्र हो गया. तात्पर्य यह कि कई बार भ्रष्टाचार मुक्त शासन-प्रशासन कायम करने के लिए अग्नि देवता की सहायता ली जाती है तो कई बार छायावादी कवियों को मीलों पीछे छोड़ते हुए चूहों का मानवीकरण कर दिया जाता है. कई बार वरुण देवता की कृपा से भी भ्रष्टाचार दूर किया जाता है. कह दिया जाता है कि बाढ़ आई थी और सारी फाईलों को अपने साथ बहा ले गई.
मित्रों, लड़कपन में मैं समझ नहीं पाता था कि हम गणेश जी के साथ चूहों की पूजा क्यों करते हैं? जब बिहार सरकार ने पटना उच्च न्यायालय में अपने जवाब में लिखा कि चूहे शराब पी गए और फाईलें खा गए तब समझा कि चूहे तो सचमुच अतिपूजनीय हैं. इसी तरह अग्नि और वरुण देवता को भी शत-शत नमन है जो सुशासन को सचमुच का सुशासन बनाने में भ्रष्ट फाईलों को नष्ट कर अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. सचमुच अपना बिहार लाजवाब है! इसका कुछ भी नहीं हो सकता. यह अलग बात है कि लालू जी समय रहते चूहों, अग्नि देव और वरुण देव की मदद नहीं ले पाए इसलिए बेचारे रांची के रिम्स में जेल में रहते हुए स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं. लेकिन नीतीश जी ठहरे दिमागवाले इसलिए वे तो पकड़ में आने से रहे भले ही जनता को लग रहा हो कि इनके समय में भ्रष्टाचार लालू जी के समय से कहीं ज्यादा है और कहीं ज्यादा बड़े-बड़े घोटाले हो चुके हैं. तो इंतजार करिए कि आगे बिहार के चूहों पर यहाँ की सरकार कौन-सा नया आरोप लगानेवाली है. समझ में नहीं आता कि जबकि आर्थिक सर्वेक्षण और बजट कह रहे हैं कि बिहार में भोजन पूरे भारत में सबसे सस्ता है तो बिहार के चूहों तो फाईलें खाकर भूख मिटाने की आवश्कता क्यों आन पड़ी?

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

भारतीय राजनीति का काला नाग अरविन्द केजरीवाल


मित्रों, दुर्भाग्यवश आजादी के बाद से ही भारत में फर्जी हिन्दू नेताओं की कोई कमी नहीं रही है. पंडित जवाहरलाल नेहरु से शुरू हुई यह परंपरा समय के साथ पल्लवित और पुष्पित होती रही है. कांग्रेस में ऐसे नेताओं की लम्बी सूची है जो वास्तव में ईसाई धर्म में दीक्षित हो चुके हैं लेकिन अपना नाम हिन्दुओं वाला ही रखा है. इन नेताओं के पास बस दो ही काम हैं-एक कैसे हिन्दू धर्म के मूलोच्छेदन का मार्ग प्रशस्त किया जाए और दूसरा कैसे मुसलमानों को खुश करते हुए भारत में इसाई धर्म की पताका लहराई जाए.
मित्रों, ऐसे ही रंगे सियारों में से एक हैं दिल्ली के निवर्तमान मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल जिन्होंने भारत की राजधानी दिल्ली को पाकिस्तान बनाकर रख दिया है. मस्जिदों के मौलवियों को वेतन और मंदिरों के पुजारियों को चवन्नी तक नहीं ऐसा शायद पाकिस्तान में भी न होता होगा. क्या केजरीवाल दिल्ली को शरिया कानून के माध्यम से चलाना चाहता है? कहना न होगा कि इस नराधम ने भी अपना नाम हिन्दुओं वाला ही रख रखा है लेकिन इसका पूरा जीवन हिन्दूविरोधियों के सानिध्य में गुजरा है. इसने एक लम्बे समय तक इसाई संस्था मिशनरिज ऑफ़ चैरिटी में काम किया है. मुझे पक्का विश्वास है कि ये उसी समय इसाई बन गया था. भौतिक रूप से नहीं तो मानसिक रूप से तो जरूर.
मित्रों, फिर इसने भी एक एनजीओ बनाया और उसके जरिए अपने हिन्दूविरोधी और भारतविरोधी एजेंडे को आगे बढाया. इसने अपने इर्द-गिर्द तमाम साम्यवादी-माओवादी और इसाई एनजीओ को जमा किया और तत्पश्चात सुदूर महाराष्ट्र के एक बूढ़े गांधीवादी अन्ना हजारे को आगे करके भ्रष्टाचार के खिलाफ एक लिफाफा आन्दोलन छेड़ दिया. उस दौरान इसने अपने बच्चों के सर पर हाथ रखकर कसम खाई कि ये कभी भी राजनीति में नहीं आएगा लेकिन ये राजनीति में भी आया और दिल्ली की जनता को बरगलाकर वहां का मुख्यमंत्री भी बन गया. इस बीमार मानसिकतावाले व्यक्ति का पिछले ५ वर्षों में दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में बस एक ही एजेंडा रहा कि फ्री बिजली-पानी देकर हिन्दुओं को लोल्ली-पॉप पकड़ा दो और दिल्ली को मिनी पाकिस्तान बना दो. जब-जब भी कोई निर्दोष हिन्दू मुसलमानों की बर्बरता का शिकार हुआ तो यह उनसे मिलने तक नहीं गया और जब एक मुसलमान ने हिन्दू लड़की के साथ बलात्कार किया और लोहे की छड उसके गुप्तांग में डालकर उसकी अंतड़ियाँ बाहर निकाल डालीं तब इसने उसे सिलाई मशीन और पैसे देकर पुरस्कृत किया मानों उसने बहुत ही प्रशंसनीय कृत्य किया हो. जब भी कोई मुसलमान हिन्दुओं द्वारा की गई जवाबी कार्रवाई में मारा गया इसने वहां पहुँचने में क्षण-मात्र की भी देर नहीं लगाई और उनके परिजनों को नौकरी और धन देने की तत्काल घोषणा कर डाली. यहाँ तक कि इसने कुर्सी के लिए दिल्ली के मुसलमानों के हाथों में पत्थर थमा दिया और पूरी दिल्ली को दंगों की आग में झोंक डाला. उस पर अति यह कि इसने पुलिस फायरिंग में या आपसी फायरिंग में मारे गए मुसलमानों के परिजनों को भी नौकरी और पैसे दे डाले जैसे दिल्ली भारत में नहीं पाकिस्तान में हो.
मित्रों, सवाल उठता है कि क्या दिल्ली की हिन्दू जनता ऐसे काले नाग को फिर से दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाएगी जो दिल्ली को कश्मीर बना देना चाहता है? आखिर फ्री बिजली-पानी के अलावा केजरीवाल ने दिल्ली में किया ही क्या है और कौन-से वादे को पूरा किया है? दूसरी तरफ इसकी सरकार में किए गए घोटालों की लिस्ट काफी लम्बी है. अब तो इसने मंत्रालयों में आग लगाकर घोटालों के सबूतों को जलाना भी शुरू कर दिया है. इसलिए समय आ गया है जब भारतीय राजनीति के इस काले नाग के फन को समय रहते कुचल दिया जाए अन्यथा ऐसा न हो कि दिल्ली में हिन्दुओं का जीना और हिन्दू लड़कियों का घर से बाहर निकलना दूभर हो जाए. यकीन न हो तो शाहीन बाग़ की स्थिति को देख लीजिए.
 

बुधवार, 15 जनवरी 2020

बिहार में भी लागू हो एनआरसी

मित्रों, बात पुरानी है. १९९४-९५ की. उन दिनों मैं कटिहार जिले के कोढ़ा प्रखंड के फुलवरिया में रहता था और अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती करवाता था. उन दिनों मेरे चचेरे नाना जी कैलाश बाबू की जमीन एक पास के ही गाँव का मुसलमान जोता करता था. नाम था मोहम्मद इस्राईल. अक्सर वो मेरे पास भी बैठ जाया करता था. बातचीत के दौरान ही उसने बताया था कि वो बंगलादेशी मुसलमान है और हाल ही में वहां आया है. उसने यह भी बताया कि धीरे-धीरे उसने अपने पूरे खानदान सारे चाचा, मामा, मौसा, बहनों और बहनोईयों को भी कोढ़ा बुला लिया है. उन दिनों वहां के एनएच ३१ के किनारे के गड्ढों में बहुत सारी झोपड़ियाँ बन रही थीं और वे सारी बंगलादेशी घुसपैठियों की थीं. उस समय मैं कई बार कोढ़ा से बस द्वारा कटिहार गया था और देखा था कि सड़क किनारे बहुत-सी मस्जिदें बन चुकी थीं और बन रही थीं.
मित्रों, उस समय भाजपा और उसके आनुषंगिक संगठन बंगादेशी घुसपैठ को लेकर काफी मुखर और उग्र हुआ करते थे. लेकिन इसे राजनीति की माया कहें या सत्ता का लालच आजकल भाजपा के बिहारी नेताओं की जुबान ही नहीं खुलती. बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार बार-बार कह रहे हैं कि बिहार में एनआरसी यानि नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजनशिप को लागू नहीं किया जाएगा लेकिन बिहार भाजपा जो उनकी सरकार में शामिल है के लोगों की तो जैसे जुबान ही सिल गई है मानों मो. इस्राईल समेत सारे बांग्लादेशी घुसपैठी बिहार छोड़कर चले गए हों.
मित्रों, विभिन्न संस्थाओं एवं मीडिया के मोटे अनुमान के मुताबिक़, भारत में दस करोड़ से भी ज्यादा बंगलादेशी घुसपैठिए बस गए हैं और इनमें से ८० प्रतिशत सिर्फ बिहार,बंगाल,असम और झारखण्ड में हैं. एक अनुमान के अनुसार सिर्फ बिहार में १ करोड़ से ज्यादा बंगलादेशी हैं. 2006 में चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में ऑपरेशन क्लीन भी चलाया था. 23 फरवरी 2006 तक अभियान चला और 13 लाख नाम काटे गए. हालांकि चुनाव आयोग फिर भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं था और उसने केजे राव की अगुवाई में मतदाता सूची की समीक्षा के लिए अपनी टीम भेजी. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन राज्य सचिव अनिल विश्वास ने कहा था, उन्हें सैकड़ों पर्यवेक्षक भेजने दीजिए, अब कोई भी क़दम हमें जीतने से नहीं रोक सकता. इस बयान से अंदाज़ा लगाया गया कि माकपा को अपने समर्पित वोट बैंक पर कितना भरोसा रहा है. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि वाममोर्चा के सत्ता में आने के समय से ही मुस्लिम घुसपैठियों को वोटर बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई. उस समय ममता बनर्जी इस मुद्दे पर काफी मुखर थी और उन्होंने कहा था कि राज्य में दो करोड़ बोगस वोटर हैं. पर अब ममता मुख्यमंत्री बनने के बाद एनआरसी विरोधी हो गई हैं क्योंकि उन्हें भी सिर्फ बंगाल की कुर्सी दिख रही है देश दिखाई नहीं दे रहा.
मित्रों, 1991 की जनगणना में सा़फ दिखा कि असम एवं पूर्वोत्तर के राज्यों के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती ज़िलों की जनसंख्या भी कितनी तेज़ी से बढ़ी. एक मोटे अनुमान के मुताबिक़, प. बंगाल के सीमावर्ती ज़िलों के क़रीब 17 प्रतिशत वोटर घुसपैठिए हैं, जो कम से कम 56 विधानसभा सीटों पर हार-जीत का निर्णय करते हैं, जबकि असम की 32 प्रतिशत विधानसभा सीटों पर वे निर्णायक हालत में हैं. असम में भी मुसलमानों की आबादी 1951 में 24.68 प्रतिशत से 2001 में 30.91 प्रतिशत हो गई, जबकि इस अवधि में भारत के मुसलमानों की आबादी 9.91 से बढ़कर 13.42 प्रतिशत हो गई. 1991 की जनगणना के मुताबिक़, इसी दौरान बंगाल के पश्चिम दिनाजपुर, मालदा, वीरभूम और मुर्शिदाबाद की आबादी क्रमशः 36.75, 47.49, 33.06 और 61.39 प्रतिशत की दर से बढ़ी. सीमावर्ती ज़िलों में हिंदुओं एवं मुसलमानों की आबादी में वृद्धि का बेहिसाब अनुपात घुसपैठ की ख़तरनाक समस्या की ओर इशारा करता है. 1993 में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री ने भी लोकसभा में स्वीकार था कि 1981 से लेकर 1991 तक यानी 10 सालों में ही बंगाल में हिंदुओं की आबादी 20 प्रतिशत की दर से बढ़ी, तो मुसलमानों की आबादी में 38.8 फीसदी का इज़ा़फा हुआ. 1947 में बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी 29.17 प्रतिशत थी, जो 2001 में घटकर 2.5 प्रतिशत रह गई. सबूत तमाम तरह के हैं. 4 अगस्त, 1991 को बांग्लादेश के मॉर्निंग सन अख़बार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, एक करोड़ बांग्लादेशी देश से लापता हैं. छह मई 1997 में संसद में दिए बयान में तत्कालीन गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्ता ने भी स्वीकार किया था कि देश में एक करोड़ बांग्लादेशी हैं।
मित्रों, 2001 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या 1.5 करोड़ थी. सीमा प्रबंधन पर बने टास्क फोर्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, हर महीने तीन लाख बांग्लादेशियों के भारत में घुसने का अनुमान है. केवल दिल्ली में 13 लाख बांग्लादेशियों के होने की बात कही जाती है, हालांकि अधिकृत आंकड़ा चार लाख से कम ही बताता है. भारत-बांग्लादेश सीमा का गहन दौरा करने वाले लेखक वी के शशिकुमार ने इंडियन डिफेंस रिव्यू (4 अगस्त, 2009) में छपे अपने लेख में बताया कि किस तरह दलालों का गिरोह घुसपैठ कराने से लेकर भारतीय राशनकार्ड और वोटर पहचानपत्र बनवाने तक में मदद करता है. दक्षिण दिनाजपुर के हिली गांव में भारत-बांग्लादेश सीमा पर कुछ दीवारें बनाई गई हैं, कोई नहीं जानता कि इन्हें किसने बनाया है, पर यह समझने में मुश्किल नहीं है कि यह तस्करों के गिरोह की करतूत है. वहां सुबह से शाम तक तस्करी और घुसपैठ जारी रहती है. घुसपैठिए ज़्यादा से ज़्यादा गर्भवती महिलाओं को सीमा पार कराते हैं और उन्हें किसी भारतीय अस्पताल में प्रसव कराकर उसे जन्मजात भारतीय नागरिकता दिलवा देते हैं. इस काम में दलाल और उनके भारतीय रिश्तेदार भी मदद करते हैं. मालूम हो कि सीमा के क़रीब रहने वाले लोगों में परंपरागत रूप से अब भी शादी-ब्याह का रिश्ता चलता है. यही नहीं, कुंआरी लड़कियों को बिहार, उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में दुल्हनों के तौर पर बेच दिया जाता है. कई दलाल तो शादी कर उन्हें कोठे पर पहुंचा देते हैं. सीमा से लगी ज़मीन की ऊंची क़ीमतों से भी साबित होता है कि घुसपैठ एवं तस्करी को स्व-रोज़गार का कितना बड़ा साधन बना लिया गया है. इतना ही नहीं,14 जुलाई, 2002 को संसद में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने एक सवाल के जवाब में बताया था कि भारत में 10 करोड़ 20 लाख 53 हज़ार 950 अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं. इनमें से केवल बंगाल में ही ३ करोड़ हैं. इलीगल इमिग्रेशन फॉम बांग्लादेश टू इंडिया : द इमर्जिंग कन्फिल्क्ट के लेखक चंदन मित्रा ने पुस्तक में पश्चिम बंगाल के साथ असम में भी बांग्लादेशी घुसपैठियों से जुड़ी गतिविधियों एवं कार्रवाइयों का पूरा ब्यौरा दिया है. वह लिखते हैं, सच कहें तो पश्चिम बंगाल बांग्लादेशी घुसपैठियों का पसंदीदा राज्य बन गया है. 2003 में मुर्शिदाबाद ज़िले के मुर्शिदाबाद-जियागंज इलाक़े के नागरिकों को बहुउद्देशीय राष्ट्रीय पहचानपत्र देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा पायलट प्रोजेक्ट के लिए चुना गया. इसमें भारतीय नागरिकों और ग़ैर-नागरिकों की पहचान तय करनी थी. हालांकि अंतिम रिपोर्ट अभी सौंपी जानी है, पर अंतरिम रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ. इस प्रोजेक्ट के दायरे में आने वाले 2,55,000 लोगों में से केवल 24,000 यानी 9.4 प्रतिशत लोगों के पास भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कम से कम एक दस्तावेज़ था. 90.6 प्रतिशत या 2,31,000 लोग निर्धारित 13 दस्तावेज़ों में से एक भी नहीं पेश कर पाए. आख़िर में इन्हें संदिग्ध नागरिकता की श्रेणी में डालकर छोड़ दिया गया.
मित्रों, यहाँ हम आपको बता दें कि असम के मंगलदोई संसदीय क्षेत्र में 1979 में हुए उपचुनाव में महज दो साल के दरम्यान 70 हजार मुस्लिम मतदाता बढऩे के बाद पहली बार देश में बांग्लादेशी घुसपैठ का मामला प्रकाश में आया था, लेकिन बिहार के लिए भी यह कोई नया मुद्दा नहीं है। 1980 में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक बालाजी देवरस बिहार दौरे पर आए थे। तब समस्तीपुर की सभा में पूर्णिया एवं  किशनगंज के स्वयंसेवकों ने उन्हें इसकी जानकारी दी थी. इसके बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के महामंत्री की हैसियत से सुशील कुमार मोदी ने सीमांचल के जिलों का सघन दौरा किया था। उन्होंने 1983 में गुवाहाटी हाईकोर्ट के सामने जजेज फील्ड और इसके कुछ दिनों बाद पूर्णिया में बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ प्रदर्शन का नेतृत्व भी किया था। तब मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने इस पर-'क्या बिहार भी असम बनेगा' पुस्तक भी लिखी थी। इसके बाद पूर्व विधान पार्षद और भाजपा नेता हरेंद्र प्रताप ने भी सीमांचल के इलाके में 1961 से लेकर 1991 की जनगणना के आंकड़ों के आधार बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या को लेकर 'बिहार पर मंडराता खतरा' नाम से  किताब लिखी, जिसका 2006 में विमोचन करने भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह पटना आए थे। 1985 के बाद हर चुनाव बिहार में भाजपा के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों का मामला एक मुद्दा रहा है। इसी के बल पर पार्टी को इस इलाके में हर चुनाव में सफलता भी मिलती रही है। कटिहार लोकसभा सीट से भाजपा के निखिल चौधरी के 1999, 2004 और 2009 में लगातार चुनाव जीतने, पूर्णियां 1998 में भाजपा के जयकृष्ण मंडल और 2004 और 2009 में उदय सिंह की जीत तथा अररिया में 98 में रामजी ऋषिदेव, 2004 में सुखदेव पासवान और 2009 में भाजपा के प्रदीप सिंह की जीत के पीछे कहीं न कहीं यह मुद्दा भी कारण रहा है। पार्टी नेताओं की राय है कि इस इलाके में मुस्लिम जनसंख्या में तेजी से हो रही वृद्धि का प्रमुख कारण बांग्लादेशी घुसपैठ है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का अभी भी कहना है कि बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या केवल असम तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल और बिहार भी इससे अछूते नहीं हैं। इसे जाति और धर्म से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
मित्रों, अगर हम 1991 की बिहार की जनगणना पर एक नजर डालें तो उस समय बिहार में हिन्दू आबादी 82.77 प्रतिशत थी और मुस्लिम आबादी 11.02 प्रतिशत. परन्तु 2011 की जनगणना के अनुसार हिन्दू आबादी 79.79 प्रतिशत रह गई और मुस्लिम आबादी 14.22 प्रतिशत हो गई. मतलब कि मुस्लिम आबादी 3.02 प्रतिशत बढ़ गई और हिन्दू आबादी उसी अनुपात में घट गई.  बिहार के सीमावर्ती जिलों में अररिया में 1971 में मुस्लिम आबादी 36.52 प्रतिशत थी जो 2011 में मुस्लिम आबादी 42.94 प्रतिशत हो गई अर्थात मुस्लिम आबादी में 6.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई. इसी तरह कटिहार में 1971 में मुस्लिम आबादी 36.58 प्रतिशत थी जो 2011 में बढ़कर 44.46 प्रतिशत हो गई अर्थात मुस्लिम आबादी में वृद्धि 7.88 प्रतिशत की रही.  इसी प्रकार पूर्णिया जिले में 1971 में मुस्लिम आबादी 31.93 प्रतिशत थी जो 2011 में बढ़कर 38.46 प्रतिशत हो गई यानि मुस्लिम आबादी में वृद्धि 6.53 प्रतिशत रही जो किसी भी तरह से सामान्य नहीं कही जा सकती।
मित्रों, स्वयं संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछली जनगणना में बांग्लादेश से एक करोड़ लोग गायब हैं। सवाल उठता है कि आखिर ये लोग गए कहाँ? इनको धरती निगल गई या आसमान खा गया. अगर मुसलमानों ने १९४७ में अपने लिए अलग देश नहीं लिया होता तब तो कोई बात नहीं थी लेकिन जब उनको धार्मिक आधार पर अलग देश दे दिया गया है तब भारत क्यों घुसपैठ की समस्या को झेले? इस समस्या का सबसे दुखद पहलू तो यह है कि बिहार और बंगाल के जो नेता विपक्ष में होते हुए कभी बांग्लादेशी घुसपैठियों को तत्काल निकाल-बाहर करने की मांग कर रहे थे इन दिनों वही सत्ता के लालच में एनआरसी का मुखर विरोध कर हिन्दू मतदाताओं और देशहित के साथ धोखा कर रहे हैं जिन्होंने उनको पहली बार जब से सत्ता में आए थे तब वोट दिया था. यह कितनी बड़ी विडंबना है कि अब जब वे नेता सत्ता में काबिज हो गए हैं तब उनको हिन्दुओं की भावनाओं से कुछ भी लेना-देना नहीं है और उनके लिए मुस्लिम वोट ही सबकुछ हो गया? यहाँ तक कि बिहार में भाजपा भी नीतीश कुमार के मिथ्या प्रलापों के आगे मूकदर्शक बनी बैठी है जो हिन्दुओं की एकमात्र पार्टी है. बिहार के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि बिहार में एनआरसी लागू नहीं होना चाहिए? मैं उनसे पूछता हूँ क्यों नहीं होना चाहिए? क्या वे ऐसा दावे के साथ कह सकते हैं कि बिहार में कोई बांग्लादेशी घुसपैठी नहीं है? अगर उनको अपने ऊपर और अपने महाभ्रष्ट तंत्र के ऊपर इतना ही भरोसा है तो क्यों नहीं वे बिहार में एनआरसी लागू करके दूध का दूध और पानी का पानी हो जाने देते हैं (हालाँकि अभी एनआरसी अभी आई नहीं है)? आखिर इस समस्या पर किताब लिखनेवाले सुशील कुमार मोदी कुछ बोल क्यों नहीं रहे? क्या इस ठण्ड में उनको भी पाला मार गया है?

गुरुवार, 9 जनवरी 2020

राजनीति की बिसात पर दलित

मित्रों, जबसे अपना देश आजाद हुआ है तभी से विभिन्न राज्यों में तरह-तरह के राजनैतिक समीकरण बनते-बिगड़ते रहे हैं और देश की चुनावी राजनीति में दलितों की भूमिका महत्वपूर्ण होती गई है. खासकर उत्तर भारत में काशीराम और मायावती के पदार्पण के बाद से दलित जिसकी तरफ होते हैं विजयश्री उसी को मिलती है. ऐसे में स्वाभाविक है कि विभिन्न दल लगातार दलितों को अपने पक्ष में करने के प्रयास करते रहते हैं.
मित्रों, कुछ विघ्नसंतोषियों का शुरू से ही यह प्रयास रहा है कि दलितों को बांकी हिन्दुओं से किस प्रकार अलग-थलग करके उसका राजनैतिक लाभ उठाया जाए. प्रारंभ में वामपंथियों ने साहित्य में एक अलग धारा दलित साहित्य के नाम से बनाने और बहाने का प्रयास किया. इस धारा के लोग लगातार यह साबित करने में लगे रहते थे कि सवर्णों ने दलितों पर बेईन्तहा जुल्म ढाहे हैं. पता नहीं इस धारा के लोग कौन-सा इतिहास पढ़कर आए थे. उन लेखकों में कई सारे मुसलमान भी थे जो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बने हुए थे. मैं पूछता हूँ कि ११९२ ई. के बाद से जब देश की बागडोर मुसलमानों के हाथों में चली गयी तो न जाने सवर्णों ने कब जुल्म किया? वो बेचारे तो खुद ही जुल्म के शिकार थे. वर्तमान में पाकिस्तान में जो दलितों के साथ हो रहा है क्या उसके लिए भी सवर्ण ही जिम्मेदार हैं? समाज में छुआछुत का प्रचलन जरूर था लेकिन वह उस युग की सीमा थी,युगधर्म था. जैसे-जैसे आधुनिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ यह कम होता गया और अब कहीं पर भी इसका नामोनिशान नहीं है.
मित्रों, मध्य प्रदेश,पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान से जरूर अभी भी ऐसी इक्का-दुक्का घटनाओं की खबरें आती रहती हैं जिन्हें दुर्भाग्यपूर्ण कहा जा सकता है. जैसे दलित को घोड़े पर चढ़ने से रोकना, बारात को रोक देना आदि. लेकिन इसके साथ ही ऐसी ख़बरें भी आती हैं जिनमें किसी राजपूत या जाट ने अपनी घोड़ी पर बिठा कर गाँव के दलित की बेटी के बारात निकलवाई तथापि मीडिया में ऐसी ख़बरों को दबा दिया जाता है. जहाँ तक मंदिरों में पूजा करने का सवाल है तो अब किसी भी मंदिर में दलितों को पूजा करने से रोका नहीं जाता बल्कि बिहार में तो बड़े-बड़े मंदिरों में दलितों को ही मुख्य पुजारी बना दिया गया है.
मित्रों, दुर्भाग्यवश आपसी रंजिश में घटित हिंसक घटनाओं को भी मीडिया और नेताओं द्वारा जातीय बना दिया जाता है. मीडिया में इन दिनों यह ट्रेंड भी देखने को मिलता है कि जब भी दलितों का झगडा पिछड़ों या सवर्णों से होता है तो मीडिया और कथित दलित राजनेता उसे तुरंत लपक लेते हैं लेकिन जब मुसलमान दलितों के खिलाफ हिंसा करते हैं तब मामले को दबाने की कोशिश की जाती है. कुछ ऐसा ही प्रयास अभी पाकिस्तान और बांग्लादेश से भारत आए हिन्दुओं को लेकर भी किया जा रहा है.
मित्रों, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि जब हमारे देश का बंटवारा हुआ तब जो हिन्दू पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में रह गए लगभग वे सारे-के-सारे दलित थे. उन पर १९४७ से ही वहां के मुसलमान भयंकर अत्याचार कर रहे हैं. वहां उनको कोई कानूनी या राजनैतिक संरक्षण प्राप्त नहीं है. उल्टे मुसलमानों ने जब जी चाहा उनकी बालिग-नाबालिग लड़कियों को उठा लिया और जबरन उनका धर्म बदलकर शादी कर दी. वहां की पुलिस और अदालत भी अपहर्ताओं का ही साथ देती है इसलिए बेचारे दलित हिन्दू के पास मन मसोसकर रह जाने और अंत में भारत आने के सिवा और कोई उपाय शेष नहीं रह जाता. और जब भारत सरकार ने इन हिन्दुओं को भारत की नागरिकता देने की ठानी है तो कई दलित नेता भी बेवजह इसका विरोध करते हैं. आश्चर्य होता है कि मायावती और चंद्रशेखर रावण जैसे राजनेता जिनकी पूरी राजनीति दलितों पर आधारित है वे लोग कैसे इस कानून का विरोध कर सकते हैं? तो क्या उनका दलित प्रेम ढोंग मात्र नहीं है? आखिर क्यों रामविलास पासवान को टिकट बांटते समय अपने परिवार से बाहर का कोई दलित दिखाई नहीं देता?
मित्रों, पिछले कुछ सालों से मैं देख रहा हूँ कि ओवैसी भी दलित-दलित की रट लगाए हुए है और डीएम समीकरण यहाँ दलित-मुसलमान समीकरण की बात कर रहा है लेकिन वो भी सीएए का विरोध कर रहा है. तो क्या दलित इतने मूर्ख हैं या अन्धे हैं कि उनको यह सब नहीं दिख रहा? क्या दलित देख नहीं रहे कि किस तरह दलितों की देवी से मायवती दौलत की देवी बन बैठी जबकि दलित वहीँ के वहीँ खड़े रह गए? दलितों और गरीबों की राजनीति करनेवाले लालू, रामविलास पासवान आज किस तरह पैसों के ढेर पर बैठे हैं क्या दलितों को दिख नहीं रहा? भारत के दलितों को देखना चाहिए और समझना चाहिए कि हिन्दू समाज से अलग होकर पाकिस्तान में ही रूक जाने का क्या दुष्परिणाम वहां के दलितों को झेलना पड़ा जैसे पानी से अलग हो जाने पर मछली को झेलना पड़ता है? उनका हित खुद को हिन्दू समाज से अलग समझने में नहीं है बल्कि उसके साथ चलने में है. एकता में ही बल है और जब भी हिन्दू बंटेगा तो कटेगा और फिर घटेगा चाहे वो पाकिस्तान हो या भारत या बांग्लादेश. दलित हमारे हिन्दू समाज के सम्मानित और आवश्यक अंग हैं और हमें ख़ुशी है कि आजादी के बाद से उन्होंने काफी प्रगति भी की है. बिहार में ऐसे हजारों गाँव हैं जिनके मुखिया आज दलित हैं. आज दलितों के पास कार, बाईक क्या नहीं है? आज बहुत सारे हमारे दलित भाई तो बड़े-बड़े उद्योगपति भी हैं.

सोमवार, 6 जनवरी 2020

ननकाना साहिब के सबक

मित्रों, यह वह समय था जब पूरे उत्तर भारत पर लगातार मुस्लिम आक्रान्ताओं के हमले हो रहे थे और हताश हिन्दू मन के पास आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में सिवाय भगवान की शरण में जाने के और कोई विकल्प ही नहीं था. इन्हीं परिस्थितियों में भारत में भक्ति आन्दोलन ने जन्म लिया जिसने हिन्दू धर्म को पुनर्जीवन तो दिया ही हिंदी साहित्य को भी समृद्ध किया.
मित्रों, भक्ति आन्दोलन की गंगा को विद्वानों ने दो भागों में विभाजित किया है-निर्गुण और सगुण. इसी पहले वाले निर्गुण पंथ के प्रवर्तकों में से एक थे गुरु नानक. गुरु नानक ने सरल और सहज जीवन का उपदेश दिया. उन्होंने कहा कि ईश्वर एक है। सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो। ईश्वर सब जगह और प्राणी मात्र में मौजूद है. ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता। ईमानदारी से और मेहनत कर के उदरपूर्ति करनी चाहिए।
बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएं. सदैव प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा मांगनी चाहिए। मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए। सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं। भोजन शरीर को जि़ंदा रखने के लिए ज़रूरी है पर लोभ−लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है।
मित्रों, बाद के समय में जब मुग़ल शासन में भारत में हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया जाने लगा और मना करने पर उनकी हत्या होने लगी और उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किए जाने लगे तब सिख पंथ के छठे गुरु हरगोविंद सिंह ने कहा कि जरुरत पड़ने पर धर्म रक्षा के लिए तलवार उठाना भी हमारे धर्म का भाग है. इसके लिए पंजाब के प्रत्येक हिन्दू परिवार से एक व्यक्ति बलिदानी सैनिक बनने लगा. यह परंपरा पंजाब में आज भी कायम है. बाद में औरंगजेब ने जब कश्मीर में हिन्दुओं के धर्म-परिवर्तन का हिंसक अभियान चलाया तब कश्मीरी हिन्दू नवम गुरु गुरु तेगबहादुर के पास अपनी शिकायत लेकर पहुँचने लगे. उस समय गुरूजी बिहार की राजधानी पटना में रह रहे थे. गुरूजी ने अपने परिवार के समक्ष सनातन धर्म पर छाए संकट का जिक्र करते हुए कहा कि किसी महान आत्मा को बलिदान देना पड़ेगा अन्यथा धर्म-रक्षा नहीं हो पाएगी. तब बालक गोविन्द ने कहा था कि पिताजी किसी और का इंतजार क्यों, आप खुद बलिदान क्यों नहीं देते? तब सनातन धर्म के प्रतिनिधि बनकर गुरु तेगबहादुर दिल्ली गए और औरंगजेब से धर्म के नाम पर अत्याचार बंद करने को कहा. तब अत्यंत अत्याचारी औरंगजेब ने शर्त रखी कि अगर आपने इस्लाम स्वीकार कर लिया तो सारे कश्मीरियों को भी इस्लाम स्वीकार करना पड़ेगा. उसके बाद औरंगजेब ने गुरूजी पर बेइंतहा जुल्म किए मगर गुरूजी सबको सह गए. अंत में उसने गुरूजी का सिर कटवा दिया. यह घटना जहाँ घटी वहां आज गर्व से खड़ा शीशगंज गुरुद्वारा शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले की कहावत को चरितार्थ कर रहा है.
मित्रों, इसके बाद तो औरंगजेब जैसे पागल ही हो गया और उसने हिन्दुओं के ऊपर और भी ज्यादा अत्याचार ढाहना शुरू कर दिया. तब बलिदानी गुरु तेगबहादुर जी के बेटे और सिखों के दशम और अंतिम गुरु गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज ने धर्म रक्षा के लिए तलवार उठाई और सर्वस्व बलिदान का आह्वान किया. वर्ष १७०४ ई. के उत्तरार्द्ध में सरसा नदी पर गुरु गोबिंद सिंह जी का परिवार हमेशा के लिए जुदा हो गया. एक ओर जहां बड़े साहिबजादे अजित सिंह और जुझार सिंह गुरु जी के साथ चले गए, वहीं दूसरी ओर छोटे साहिबजादे जोरावर सिंह और फतेह सिंह, माता गुजरी जी के साथ रह गए थे। उनके साथ ना कोई सैनिक था और ना ही कोई उम्मीद थी जिसके सहारे वे परिवार से वापस मिल सकते। अचानक रास्ते में उन्हें अपना ब्राह्मण नौकर गंगू मिल गया, जो किसी समय पर गुरु महल में उनकी सेवा करता था। गंगू ने उन्हें यह आश्वासन दिलाया कि वह उन्हें उनके परिवार से फिर से मिलाएगा और तब तक के लिए वे लोग उसके घर में रुक जाएं। माता गुजरी जी और साहिबजादे गंगू के घर चले तो गए लेकिन वे गंगू की असलियत से वाकिफ नहीं थे। गंगू ने लालच में आकर तुरंत वजीर खां को गोबिंद सिंह की माता और छोटे साहिबजादों के उसके यहां होने की खबर दे दी जिसके बदले में वजीर खां ने उसे सोने की मोहरें भेंट की। खबर मिलते ही वजीर खां के सैनिक माता गुजरी और 7 वर्ष की आयु के साहिबजादा जोरावर सिंह और 5 वर्ष की आयु के साहिबजादा फतेह सिंह को गिरफ्तार करने गंगू के घर पहुंच गए। उन्हें लाकर ठंडे बुर्ज में रखा गया और उस ठिठुरती ठंड से बचने के लिए कपड़े का एक टुकड़ा तक ना दिया गया। दिसंबर १७०४ में रात भर ठंड में ठिठुरने के बाद सुबह होते ही दोनों साहिबजादों को वजीर खां के सामने पेश किया गया, जहां भरी सभा में उन्हें इस्लाम धर्म कबूल करने को कहा गया। कहते हैं सभा में पहुंचते ही बिना किसी हिचकिचाहट के दोनों साहिबजादों ने ज़ोर से जयकारा लगा “जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल”। यह देख सब दंग रह गए, वजीर खां की मौजूदगी में कोई ऐसा करने की हिम्मत भी नहीं कर सकता लेकिन गुरु जी की नन्हीं जिंदगियां ऐसा करते समय एक पल के लिए भी ना डरीं। सभा में मौजूद मुलाजिम ने साहिबजादों को वजीर खां के सामने सिर झुकाकर सलामी देने को कहा. तब दोनों ने सिर ऊंचा करके जवाब दिया कि ‘हम अकाल पुरख और अपने गुरु पिता के अलावा किसी के भी सामने सिर नहीं झुकाते। ऐसा करके हम अपने दादा की कुर्बानी को बर्बाद नहीं होने देंगे, यदि हमने किसी के सामने सिर झुकाया तो हम अपने दादा को क्या जवाब देंगे जिन्होंने धर्म के नाम पर सिर कलम करवाना सही समझा, लेकिन झुकना नहीं’। वजीर खां ने दोनों साहिबजादों को काफी डराया, धमकाया और प्यार से भी इस्लाम कबूल करने के लिए राज़ी करना चाहा, लेकिन दोनों अपने निर्णय पर अटल थे। आखिर में दोनों साहिबजादों को जिंदा दीवारों में चुनवाने का ऐलान किया गया। कहते हैं दोनों साहिबजादों को २७ दिसंबर १७०४ को जब दीवार में चुनना आरंभ किया गया तब उन्होंने ‘जपुजी साहिब’ का पाठ करना शुरू कर दिया और दीवार पूरी होने के बाद अंदर से जयकारा लगाने की आवाज़ भी आई। ऐसा कहा जाता है कि वजीर खां के कहने पर दीवार को कुछ समय के बाद तोड़ा गया, यह देखने के लिए कि साहिबजादे अभी जिंदा हैं या नहीं। तब दोनों साहिबजादे जीवित थे, लेकिन मुगल मुलाजिमों का कहर अभी भी जिंदा था। उन्होंने दोनों साहिबजादों को जबर्दस्ती मौत के गले लगा दिया। उधर दूसरी ओर साहिबदाजों की शहीदी की खबर सुनकर माता गुजरी जी ने अकाल पुरख को इस गर्वमयी शहादत के लिए शुक्रिया किया और अपने प्राण त्याग दिए।
मित्रों, लगभग उसी समय दिसंबर १७०४ के अंतिम सप्ताह में बड़े साहबजादे अजीत सिंह और जुझार सिंह चमकौर के युद्ध में  अतुलनीय वीरता का प्रदर्शन करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। गुरु जी द्वारा नियुक्त किए गए पांच प्यारों ने अजीत सिंह को समझाने की कोशिश की कि वे ना जाएं, क्योंकि वे ही सिख धर्म को आगे बढ़ाने वाली अगली शख्सियत हो सकते हैं लेकिन पुत्र की वीरता को देखते हुए गुरु जी ने अजीत सिंह को निराश ना किया। ‌ उन्होंने स्वयं अपने हाथों से अजीत सिंह को युद्ध लड़ने के लिए तैयार किया, अपने हाथों से उन्हें शस्त्र दिए थमाए और पांच सिखों के साथ उन्हें किले से बाहर रवाना किया। कहते हैं रणभूमि में जाते ही अजीत सिंह ने मुगल फौज को थर-थर कांपने पर मजबूर कर दिया। अजीत सिंह कुछ यूं युद्ध कर रहे थे मानो स्वयं भगवन शिव शस्त्र धारण कर असुरों से लड़ने के लिए आ गए हों. अजीत सिंह एक के बाद एक वार कर रहे थे, उनकी वीरता और साहस को देखते हुए मुगल फौज पीछे भाग रही थी लेकिन वह समय आ गया था जब अजीत सिंह के तीर खत्म हो रहे थे। जैसे ही दुश्मनों को यह अंदाज़ा हुआ कि अजीत सिंह के तीर खत्म हो रहे हैं, उन्होंने साहिबजादे को घेरना आरंभ कर दिया। लेकिन तभी अजीत सिंह ने म्यान से तलवार निकाली और बहादुरी से मुगल फौज का सामना करना आरंभ कर दिया। कहते हैं तलवार बाजी में पूरी सिख फौज में भी अजीत सिंह को कोई चुनौती नहीं दे सकता था तो फिर ये मुगल फौज उन्हें कैसे रोक सकती थी। अजीत सिंह ने एक-एक करके मुगल सैनिकों का संहार किया, लेकिन तभी लड़ते-लड़ते उनकी तलवार भी टूट गई। 17 वर्ष की आयु में शहीद हुए अजित ने फिर अपनी म्यान से ही लड़ना शुरू कर दिया, वे आखिरी सांस तक लड़ते रहे और फिर आखिरकार वह समय आया जब उन्होंने शहादत को अपनाया और महज़ 17 वर्ष की उम्र में शहीद हो गए। इसके बाद गुरु जी के मंझले बेटे जुझार सिंह जिनकी आयु मात्र १५ वर्ष थी, भी तलवार लेकर मैदान में आ गए और अतुलनीय वीरता प्रदर्शित करते हुए शहादत दी.
मित्रों, बाद के समय में भी जब आवश्यकता महसूस हुई सिखों ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए बढ़-चढ़ कर बलिदान दिया. इतिहास गवाह है कि १७०८ ई. में गुरूजी की कायरपूर्ण हत्या के बाद डोगरा राजपूत परिवार में जन्मे माधो दास उर्फ़ लक्ष्मण दास उर्फ़ बंदा बहादुर सिंह ने सिखों को एकजुट किया और पूरे पंजाब में मुगलों के खिलाफ जंग छेड़ दी. बन्दा सिंह बहादुर उर्फ़ बंदा बैरागी एक सिख सेनानायक थे। वे पहले ऐसे सिख राजपूत सेनापति हुए, जिन्होंने मुग़लों के अजेय होने के भ्रम को तोड़ा; छोटे साहबज़ादों की शहादत का बदला लिया और गुरु गोबिन्द सिंह द्वारा संकल्पित प्रभुसत्तासम्पन्न लोक राज्य की राजधानी लोहगढ़ में ख़ालसा राज की नींव रखी। यही नहीं, उन्होंने गुरु नानक देव और गुरू गोविन्द सिंह के नाम से सिक्का और मोहरे जारी करके निम्न वर्ग के लोगों को उच्च पद दिलाया और हल वाहक किसान-मज़दूरों को ज़मीन का मालिक बनाया। उनको भी मुगलों ने अपने सैन्यबल के बल पर बंदी बना लिया और अपार अमानुषिक यातनाएं दीं. यहाँ तक कि उनके मुंह में उनके बेटे का मांस तक ठूंसा गया, गर्म चिमटे से उनके शरीर से मांस नोचा गया और गर्म तवे पर बिठाया गया. लेकिन वे बंदा बैरागी को मुसलमान नहीं बना सके.अन्ततः १६ जून, १७१६ को मुग़ल बादशाह फर्रुख्सियर के आदेश पर बंदा के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए.
मित्रों, इसी तरह पूरा सनातन परिवार रामसिंह कूका का हमेशा ऋणी रहेगा जिन्होंने १८६०-७० के दशक में गोहत्या के खिलाफ अपने समस्त नामधारी शिष्यों के साथ संघर्ष किया और अनंत यातनाएं झेलीं. अयोध्या के राम मंदिर में भी सबसे पहले पूजन और हवन करने का श्रेय निहंग सिखों को जाता है जिन्होंने नवम्बर-दिसंबर १८५८ में वहां बाबरी ढांचे में रातों-रात चबूतरा बनाकर भगवान राम की प्रतिमा स्थापित की थी.इस घटना का वर्णन माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने निर्णय किया है.
मित्रों,आश्चर्य है कि ऐसे सिखों को कैसे सियासत और कुर्सी के लिए हिन्दुओं से अलग बताया जाता है? क्या बंटवारे के समय हिन्दुओं और सिखों को एक साथ जेहादी हिंसा का शिकार नहीं होना पड़ा था? आश्चर्य तो इस बात पर भी होता है कि कैसे झारखण्ड में अभी हाल ही में आदिवासियों को भी हेमंत सोरेन ने अहिंदू बता दिया? इससे पहले बौद्धों और जैनियों को भी सनातन धर्म से अलग कर देने की कुचेष्टा हो चुकी है जबकि हिन्दू भगवन बुद्ध और महावीर दोनों की पूजा करते हैं. दलितों को लेकर भी इस तरह के गंदे प्रयास किए जा रहे हैं. हद हो गयी. कुर्सी का खेल खेलो खूब खेलो लेकिन सनातन धर्म को बांटकर कमजोर नहीं करो अन्यथा देश कमजोर होगा.
मित्रों, तो हम बात कर रहे थे सिखों की. उन्हीं सिखों के पहले गुरु गुरु नानकदेव जी के जन्मस्थान ननकाना साहिब पर अभी कुछ दिन पहले वहां के स्थानीय मुसलमानों ने हमला किया है और गुरूद्वारे के दरवाजे को तोड़ दिया है. इससे पहले वहां के ग्रंथि भगवान सिंह जी की पुत्री का भी अपहरण कर अगस्त महीने में जबरन मुस्लिम लड़के के साथ विवाह कर दिया गया था. हम समझ सकते हैं कि पूरी दुनिया में प्रसिद्ध ननकाना साहिब पर जब हमला और पथराव हो सकता है तो पाकिस्तान में आम सनातन धर्मियों की क्या स्थिति होगी? एक तरफ जहाँ पूरी कथित धर्मनिरपेक्ष लॉबी सीएए के खिलाफ सड़क पर है जो भारत के मुस्लिम पडोसी देशों में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करनेवाला कानून है वहीँ पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार लगातार बढ़ता ही जा रहा है. जो लोग समझते हैं कि मुस्लिमों के बहुसंख्यक होने के बाद भी भारत में कुछ भी नहीं बदलेगा उनके लिए ननकाना साहिब पर हुआ हमला एक सबक है. भारत सरकार को चाहिए कि ननकाना साहिब की त्रासद घटना से सबक लेते हुए जल्द-से-जल्द जनसंख्या नियंत्रण बिल लाए जिससे देश का जनसँख्या अनुपात स्थिर हो जाए और भारत को भविष्य में शरियत का शासन न देखना पड़े.
मित्रों, इसके साथ ही समान नागरिक संहिता को भी अविलम्ब लागू किया जाना चाहिए जो संविधान के निर्माण के समय से ही भारतीय संविधान के भाग चार के अनुच्छेद ४४ में कैद अपने उद्धार की प्रतीक्षा कर रहा है. हमारे शास्त्र कहते हैं शठं शाठ्यम समाचरेत. अर्थात सरल शब्दों में लात के देवता बातों से नहीं मानते. जिस तरह से मोदी सरकार ने देश की ऐतिहासिक भूलों में सुधार करने का अभी अभियान चला रखा है हमें पूर्ण विश्वास है कि वो अविलम्ब इन दोनों कानूनों का निर्माण कर भारत को पाकिस्तान बनने से बचा लेगी क्योंकि पता नहीं कब फिर से भाजपा की सरकार केंद्र में बने या न बने.

शनिवार, 28 दिसंबर 2019

बिहार सचमुच एक नजीर है नीतीश जी


मित्रों, एक समय था जब बिहार सचमुच दुनिया के लिए एक नजीर या उदाहरण था. देश की आजादी के समय और तत्काल बाद बिहार प्रतिव्यक्ति आय में देश में दूसरे स्थान पर था. जबकि प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के समय सुशासन में बिहार देश में अव्वल था. कमोबेश बिहार की स्थिति १९९० तक ठीक-ठाक थी जब तक यहाँ कांग्रेस का शासन था. फिर लालू जी बिहार की मुख्यमंत्री बने और बिहार की बर्बादी शुरू हो गयी. सबसे पहले तो कानून-व्यवस्था की स्थिति ख़राब हो गयी और फिर पूरे बिहार की हर चीज ख़राब हो गयी लेकिन लालू जी फिर भी सामाजिक समीकरण के बल पर चुनाव जीतते रहे. फिर आया छोटे भाई नीतीश कुमार जी का शासन. शुरू के ५ साल कुछेक गलतियों को छोड़कर अच्छे रहे. हालाँकि बिहार की शिक्षा-व्यवस्था की हत्या की प्रक्रिया नीतीश जी के पहले कार्यकाल में ही शुरू हो गई थी. नीतीश जी ने नौकरशाही और लोकशाही में संतुलन साधने के स्थान पर सबकुछ नौकरशाही को सौंप दिया. बाद में शराबबंदी के बाद नौकरशाही और भी निरंकुश हो गयी. अब स्थिति इतनी ख़राब है कि बिहार में शासन-प्रशासन नाम की कोई चीज ही नहीं है.

मित्रों, पहले नीतीश जी जनता दरबार भी लगाते थे लेकिन आज के बिहार में ऐसी कोई व्यवस्था है ही नहीं जहाँ जाकर कोई शिकायत करे. अभी कल ही नीतीश जी लखीसराय के सूर्यगढ़ा में एक सभा को संबोधित करने गए थे. लोगों ने नारे लगाना शुरू कर दिया कि डीलर बहाली में घोटाला हुआ है तो भड़क गए और मंच से कोई आश्वासन देने के बजाए नारे लगानेवालों को जेल भेजने की धमकी देने लगे. इससे पहले भी नीतीश जी कभी पत्रकारों के सवाल पर तो कभी जनता की मांग पर भड़कते रहे हैं. ईधर तीन-चार सालों में तो उन्होंने जनता की बातों पर कान देना ही बंद कर दिया है. उल्टे सवाल उठने पर भड़क जाते हैं.

मित्रों, कुछ ऐसे ही घमंड के पहाड़ पर कुछ दिन पहले तक झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुबर दास भी चढ़े हुए थे. फिर उनकी क्या गति हुई आप सभी जानते हैं. अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हुए नीतीश जी ने कल-परसों में यह भी कह डाला है कि विकास में मामले में बिहार दुनिया के लिए एक नजीर है. पता नहीं नीतीश जी किस विकास की बात कर रहे हैं? बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति इतनी ख़राब है कि लोगों का घर से निकलना मुश्किल है. रोज कई-कई डाके-चोरी और हत्या के समाचार तो सिर्फ हाजीपुर से आ जाते हैं. आज सुबह ही कांग्रेस नेता राकेश यादव की हत्या हुई है। इतनी ख़राब हालत तो लालू-राबड़ी के जंगलराज के समय भी बिहार की कानून-व्यवस्था की नहीं थी. भ्रष्टाचार का बिहार में वो आलम है कि क्या मजाल किसी कार्यालय में बिना रिश्वत दिए कोई काम हो जाए. यहाँ तक कि बैंक जो केंद्र सरकार के हाथों की चीज हैं भी बिहार में बिना १० प्रतिशत रिश्वत लिए मुद्रा लोन तक नहीं देते. उद्योगों का तो कहना ही क्या? जब ख़राब कानून-व्यवस्था के चलते बिहार के व्यवसायी ही राज्य छोड़कर अपनी जान बचाकर भाग रहे हैं तो बाहर से कोई क्यों आने लगा? शिक्षा-व्यवस्था सिर्फ परीक्षा-व्यवस्था बनकर रह गयी है. सरकारी अस्पताल खुद ही बीमार हैं. प्रशासनिक तत्परता की हालत ऐसी है कि राजधानी पटना में कुछ दिन पहले हुई बरसात के समय राहत कार्य नहीं चलाया जा सका दूर-दराज के इलाकों की तो बात करना ही बेमानी है.

मित्रों, ऐसी हालत में नीतीश कुमार जी कैसे कह सकते हैं कि बिहार का विकास दुनिया के लिए एक नजीर या उदाहरण है. हाँ, अगर वे ऐसा कहते कि बिहार का विनाश दुनिया के लिए एक नजीर है तो जरूर वह सच होता. कुछ इसी तरह के सब्जबाग कुछ दिन पहले तक झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास भी अपनी पार्टी नेतृत्व को दिखा रहे थे लेकिन चुनाव-परिणामों ने खुद ही उनकी पोल खोलकर रख दी है. तो क्या नीतीश जी का भी यही हश्र होनेवाला है?  घमंड तो रावण का भी टूटा था. आज नीतीश जी मंच से जनता को धमकी दे रहे हैं कल वे शायद मंचासीन होने की स्थिति में भी नहीं रह जाएंगे.

गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

मुसलमानों के कन्धों पर कांग्रेस की बन्दूक

मित्रों, जैसा कि हम जानते हैं कि कांग्रेस भारत की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी है. जाहिर है कि उसे राजनीति के सारे दांव-पेंच भी आते हैं. इसके साथ ही उसके लिए अनैतिक भी कुछ भी नहीं है. कन्धा किसी का भी हो वो उसके ऊपर अपना बन्दूक रखकर गोलियां दागने से हिचकती नहीं है. फिर चाहे वह कन्धा दलितों का हो या फिर पाकिस्तान-चीन का ही क्यों न हो. इन दिनों कांग्रेस ने एक और कंधे का जुगाड़ कर लिया है और वो कन्धा है मुसलमानों का. चूंकि यह पंथ पहले से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर पूर्वाग्रह और दुराग्रह से ग्रस्त है इसलिए बारूद को बस एक चिंगारी दिखाने की आवश्यकता थी जो इन दिनों कांग्रेस दिखा रही है.
मित्रों, इससे पहले भी कांग्रेस पार्टी के नेता कई बार नरेन्द्र मोदी जी का पुतला जलाने के प्रयास में अपने हाथ जला चुके हैं. लेकिन अब कांग्रेस ने कुछ बड़ा करने की सोंची है. पुतले फूंकते-फूंकते अब वो उब चुकी है और अब वो देश को जलाना चाहती है. कुछ ऐसा ही १९४६ में भी मुसलमानों ने किया था. तब मुस्लिम लीग उनकी सरपरस्ती कर रही थी और कांग्रेस उसके खिलाफ थी लेकिन अब कांग्रेस ही मुस्लिम लीग बन गयी है और मुसलमानों के मन में भय और अलगाव के बीज डालकर ठीक उसी तरह अपना उल्लू सीधा करना चाहती है जैसे १९४६ में मुस्लिम लीग ने किया था.
मित्रों, ऐसा करते समय कांग्रेस यह भूल गयी है कि यह १९४६ वाला भारत नहीं है. आज भारत गुलाम नहीं है और न ही यहाँ के बहुसंख्यक हिन्दू सोये हुए हैं कि कांग्रेस उनको १९४६-४७ की तरह बरगला लेगी. कितने आश्चर्य की बात है कि जिस एनआरसी को राजीव गाँधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए असम समझौते के द्वारा १९८५  में मंजूरी दी थी आज वो बदले हुए परिप्रेक्ष्य में उसी की मुखालफत कर रही है. वो समझती है कि मुसलमानों के पूरे वोट बैंक पर कब्ज़ा करने बाद हिन्दुओं को ख़राब अर्थव्यवस्था के नाम पर भड़काकर वो आसानी से चुनाव जीत जाएगी. दरअसल उसे पता है कि जबकि हिन्दुओं को भावनात्मक मुद्दों पर एकजुट नहीं किया जा सकता लेकिन मुसलमानों को आसानी से किया जा सकता है. उसे पता है कि दोनों कौम के सोंचने का तरीका अलग-अलग है इसलिए वो एक साथ दोनों दांव चल रही है और सफल भी हो रही है. ऐसा करके ही उसने अभी झारखण्ड का चुनाव जीता है.
मित्रों, लगता है कि इतनी-सी बात भाजपा समझने को तैयार नहीं है कि मुसलमान उसको कभी वोट नहीं देंगे चाहे वो कितने भी हज हाउस क्यों न बनवा दे. आचार्य चाणक्य का एक श्लोक है-*यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते।* *ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवाणि नष्टमेव हि॥* अर्थात जो निश्चित को छोड़कर अनिश्चित का अनुसरण करते हैं, उनका निश्चित भी नष्ट हो जाता है और अनिश्चित तो नष्ट के समान ही है। इसलिए भाजपा को चाहिए कि वो पहले अपने वर्तमान वोट बैंक को सुदृढ़ करे. ऐसा न कर सकने के कारण ही उसे झारखण्ड से पहले राजस्थान और मध्य प्रदेश में हार का सामना करना पड़ा. दूसरी तरफ मैं मुसलमानों को सचेत करना चाहूँगा कि वो कांग्रेस की बन्दूक का कन्धा न बनें. क्योंकि जब उनकी क्रिया की प्रतिक्रिया आनी शुरू होगी तब कांग्रेस का कुछ नहीं बिगड़ेगा और उनके सारे नेता मजे में विदेश-भ्रमण पर होंगे. इसलिए वे ऐसा कोई भी काम न करें जो देश के बहुसंख्यक वर्ग को उकसाने वाला हो. अगर वे वास्तव में ऐसा समझते हैं कि यह देश उनका भी उतना ही है जितना हिन्दुओं का है तो वे भी इस देश से उतना ही प्यार करना शुरू कर दें जितना हिन्दू करते हैं और जब भी राष्ट्र गान बजे तो सम्मान में खड़े हो जाएँ क्योंकि राष्ट्रगान और राष्ट्रीय झंडे का सम्मान राष्ट्र का सम्मान होता है और इनका अपमान राष्ट्र का अपमान होता है. जब देशवासी ही अपने देश के राष्ट्रगान और राष्ट्रीय झंडे का सम्मान नहीं करेंगे तो हम विदेशियों से इनके सम्मान और अपने सम्मान की उम्मीद कैसे कर सकते हैं. कांग्रेस को समझाना तो बेकार है क्योंकि वो अगर विलेन की भूमिका में है तो सब कुछ जानते-बूझते हुए है. भाजपा को अवश्य समझाया जा सकता है कि वो सुब्रमण्यम स्वामी की अर्थव्यवस्था से सम्बंधित चेतावनियों को हल्के में कतई न ले क्योंकि वे फालतू में कुछ भी नहीं बोलते. अन्यथा राम मंदिर बनवाने से जो राजनैतिक लाभ मिल सकता था नहीं मिल पाएगा और ऐसा झारखण्ड में हो भी चुका है. साथ ही भाजपा हिन्दुओं और मुसलमानों को एक ही तराजू पर तौलने की कोशिश कतई न करे क्योंकि हिन्दू पढ़े-लिखे और समझदार हैं जाहिल नहीं हैं.

मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

मोदी जी कृपया जमीन पर आ जाईए


मित्रों, भारत के प्रखर और यशस्वी संन्यासी स्वामी विवेकानंद कहा करते थे पहले भूखे के पेट में खाना डालो फिर उसे धर्म समझाओ क्योंकि भूख और प्यास से बढ़कर कोई अन्य धर्म नहीं है. दुर्भाग्यवश इतनी-सी बात हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को समझ नहीं आ रही है. वे इस बात को समझकर भी समझने को तैयार नहीं हैं कि देश के लोगों को रोजगार चाहिए, निजीकरण नहीं. वे बस एक ही बात की रट लगाए बैठे हैं कि व्यवसाय करना सरकार का काम नहीं है इसलिए रेलवे, एयर इंडिया, डाक विभाग, बीएसएनएल सबको बेच दो और जो पहले से इनमें नौकरी में हैं उनको घर बिठा दो. इसी तरह से झारखण्ड में घमंड के चने के झाड़ पर बैठे मुख्यमंत्री रघुबर दास कहा करते थे कि वे रोजगार देने के लिए मुख्यमंत्री नहीं बने हैं. बेचारे कल रात से खुद बेरोजगार हो गए.
मित्रों, वर्ष २०१५ की बात है. हम मुकदमा जीत चुके थे. हमें जमीन पर दखल कब्ज़ा करवाना था. हम एसपी दफ्तर के चक्कर काट रहे थे लेकिन तत्कालीन एसपी फ़ोर्स भेजने सम्बन्धी कागजात पर हस्ताक्षर नहीं कर रहे थे. हमने जब उनको तकादा किया तो नाराज हो गए और कहा कि वे हस्ताक्षर नहीं करेंगे तो हम उनका क्या बिगाड़ लेंगे. हमें भी ताव आ गया और हमने भी उनको कह दिया कि एसपी हैं तो आसमान में नहीं उड़िए हम तुरंत आपको जमीन पर ला देंगे. दरअसल कोर्ट ने हमें दखलदहानी की जो तारीख दे रखी थी उसमें अब मात्र दो दिन बचे थे. अगर हम उस दिन यह काम नहीं करवा पाते तो पता नहीं कोर्ट फिर से कब तारीख देती. शायद कई साल बाद. थक-हारकर हमने डीजीपी साहब को फोन लगाया और उनसे सारी व्यथा कह सुनाई. तभी उन्होंने एसपी को फोन किया और दो घंटे बाद एसपी साहब का फोन आया कि कागज ले जाईए आर्डर कर दिया है.
मित्रों, ठीक इसी तरह रघुबर दास भी आसमान में उड़ने लगे थे. वे यह भी भूल गए थे कि तीनों भुवन के स्वामी होकर असली रघुबर भगवान राम ने कभी अभिमान नहीं किया तो वे क्यों कर रहे हैं? परिणाम आपलोगों के सामने है. जिस जनता ने उनको आसमान पर बिठाया उसी जनता ने उनको जमीन पर ला पटका. इसी तरह मोदी जी और अमित शाह जी को समझ जाना चाहिए कि लोकतंत्र में सबकुछ जनता के हाथों में होता है. वो आप पर रीझ सकती है तो खीझ भी सकती है. उनको यह भी समझ लेना चाहिए कि सिर्फ भावनात्मक मुद्दों पर लगातार चुनाव नहीं जीते जा सकते जमीन पर लोगों को काम नजर भी आना चाहिए. आप लोगों से पिछले साढे ५ सालों में एक विशेषज्ञ वित्त मंत्री तक नहीं ढूँढा गया आप क्या खाक अच्छे दिन लाएंगे? आखिर कब तक आप कामचलाऊ वित्त मंत्री से काम चलाएंगे? अगर यही आपकी जिद है तो करिए. आज झारखण्ड में अपनी जिद के कारण हारे हैं कि हम तो रघुबर को भी सेनापति रखेंगे कल पूरे भारत से जाएंगे. हम पिछले कई सालों से कहते आ रहे हैं कि वित्त मंत्रालय भारत का उदर है अगर यह ख़राब हो गया तो पूरे देश की दशा ख़राब हो जाएगी लेकिन आपलोग तो सुनते नहीं. उड़िए और खूब उड़िए आसमान में लेकिन यह न भूलिए कि हर पांच साल बाद लौट कर फिर से जमीन पर ही आना है इसलिए कुछ काम भी कर लीजिए. मोदी जी आपके मंत्री नितिन गडकरी जी जो अनुभव में आपसे कहीं आगे हैं कह रहे हैं कि देश में लिक्विडिटी की कमी है. कम-से-कम उनकी तो सुन लीजिए. एक अकेले अम्बानी या अडानी पूरे परिवारसहित भी आपको एकतरफा वोट कर देते हैं तो क्या आप जीत जाएंगे? याद रखिए राम मंदिर, हिंदुत्व आदि मुद्दे जनता को तभी भावेंगे जब उनके पेट में अनाज और जेब में पैसा होगा. अन्यथा भूखी होने पर जनता आपके सारे विधेयकों और कानूनों को खा जाएगी. और हाँ, भूख का कोई धर्म नहीं होता. हमारी नहीं तो कम-से-कम उस नरेन्द्र की तो सुन लीजिए जिसे दुनिया विवेकानंद के नाम से जानती है.

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

दुष्प्रचार की शिकार है नागरिकता संशोधन कानून

 
मित्रों, यकीन मानिए वर्ष १९९१ तक मुझे पता ही नहीं था कि शुक्रवार को जुमा भी कहा जाता है. जब अमिताभ बच्चन साहब ने १९९१ में हम फिल्म में किमी काटकर से यह याद दिलाते हुए चुम्मा माँगा कि पिछले जुमे को उसने चुम्मे का वादा किया था तब हमने जाना कि शुक्रवार को जुमा भी कहा जाता है. बाद में जब जगन्नाथपुर से महनार आया तब यह भी जाना कि हर शुक्रवार को मुसलमान मस्जिद में जमा होते हैं. साथ में नमाज पढ़ते हैं और मौलाना की तकरीर सुनते हैं. तब मेरा अड्डा महनार चौक के पास स्थित मस्जिद के ठीक सामने मोहन सिंह की किताब की दुकान हुआ करती थी. मुझे तब बहुत अच्छा लगता था कि लोग इकठ्ठे होकर भगवान की इबादत कर रहे हैं.
मित्रों, लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब जब भी शुक्रवार का दिन आता है मैं डर जाता हूँ कि न जाने कहाँ से दंगों, लूटपाट और आगजनी की खबर आ जाए. दरअसल इन दिनों मस्जिदों में नफरत भरी तकरीर सुनने के बाद मुसलमान अलग ही मूड में होते हैं खासकर मुस्लिमबहुल इलाकों में. उस पर अगर उनकी पीठ पर विपक्षी दलों का हाथ हो तब तो कहना ही क्या. अब आज की तारीख को ही ले लीजिए. हाँ, भई आज भी जुमा है और मोदी विरोधियों के कुप्रचार के चलते इन दिनों नागरिकता संशोधन कानून का मुद्दा भी गरमाया हुआ है. पिछले कई दिनों से इसको लेकर न जाने क्यों चिल्ल-पों मचा हुआ है जबकि सच्चाई तो यह है कि यह कानून भारत के किसी नागरिक के बारे में है ही नहीं. लेकिन विरोध करना है तो करना है और मुसलमान ठहरे मोदी और भाजपा के स्वाभाविक विरोधी इसलिए बिना बात के भी विरोध करते रहते हैं. ऐसे माहौल में माहौल को और भी ख़राब करने के ख्याल से विपक्षी दलों और मुस्लिम नेताओं ने देशभर के मुसलमानों से आह्वान किया है कि आज जुमे की नमाज के बाद सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करें. अब अगर प्रदर्शन होगा तो पुलिस पर पत्थर भी फेंके जाएंगे और जवाब में पुलिस गोली भी चलाएगी. तब मरेगा कौन? जैसे अगलगी में कुत्ता नहीं जलता वैसे ही नेता तो कभी नहीं मरेगा और न ही नेता के बच्चे मरेंगे क्योंकि वे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया में पढ़ रहे होंगे. इसलिए कृपया सोंच-समझकर ही प्रदर्शनों में भाग लें. क्योंकि नेता आपको गुमराह कर रहे हैं, आपको अपने हाथों की कठपुतली समझ रहे हैं. आप ही बताईए जब नागरिकता संशोधन कानून भारत के नागरिकों के लिए है ही नहीं तो फिर इससे आपकी नागरिकता को कैसे खतरा हो सकता है? आपको डराया जा रहा है कि CAA ही NRC है जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है. दोनों दो चीजें हैं. NRC आई है मगर सिर्फ असम में और उसमें भी इतनी त्रुटियाँ हैं कि वहां की सरकार ने भी इसे लागू करने से मना कर दिया है.
मित्रों, हर चीज का दो तरह से इस्तेमाल हो सकता है, अच्छा और बुरा और जनसमर्थन भी इसका अपवाद नहीं है. जनता को नेता भेड-बकरी समझते हैं, जिधर हांक दिया चल देंगे. लेकिन क्या हम सिर्फ भीड़ का हिस्सा हैं? क्या हमारे पास खुद का विवेक नहीं है? अगर है तो हमें पहले नागरिकता संशोधन विधेयक का विस्तृत अध्ययन करना चाहिए फिर सोंचना चाहिए कि क्या हमें इसका विरोध करना चाहिए. लेकिन ऐसा हम तभी कर पाएँगे जब हम सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त होंगे और अपने जेहन को नेताओं के पास बंधक नहीं छोड़ा होगा, जब हमारी एक अदद इन्सान के तौर पर पहचान होगी. अगर ऐसा नहीं होगा तो हममें और एक रोबोट में कोई अंतर नहीं है. हमने बेकार में एक इन्सान के तौर पर जन्म लिया.
मित्रों, करुनायतन भगवान बुद्ध ने कहा था कि अप्पो दीपो भव अर्थात खुद ही दीपक बनो और खुद ही अपना गुरु बनो. वास्तविकता भी यही है कि इन्सान के खुद के जेहन से बड़ा कोई गुरु हो ही नहीं सकता. कोई दूसरा व्यक्ति या कोई किताब जो कहेगी उसे कोई इन्सान अगर बिना अपने विवेक की कसौटी पर कसे आँखें मूँदकर मान लेता है तो फिर वो इन्सान हो ही नहीं सकता, जानवर है. लेकिन आज के भारत में हो क्या रहा है? एक तरफ अंधसमर्थक हैं तो दूसरी तरफ अंधविरोधी. यह पूरा युग ही जैसे अंधयुग है. इसलिए जरूरत इस बात की है कि हम जागें और दूसरों को भी जगाएँ अन्यथा कोई भी आपका इस्तेमाल कर सकता है और मतलब निकल जाने पर दूध में पड़ी मक्खी की तरह फेंक सकता है. इस बीच केंद्र सरकार की ओर से कुल 13 सवालों के जवाब दिया गया है, जो आम लोगों को CAA के बारे में मुकम्मल जानकारी देते हैं. इन सवालों के अलावा मोदी सरकार की ओर से सभी अखबारों में CAA से जुड़ी जानकारी का विज्ञापन दिया गया है.





सोमवार, 16 दिसंबर 2019

मेरे देश को मत जलाओ

मित्रों, हमारे देश में कुछ वर्ग के लोग अपने अधिकारों को लेकर काफी जागरूक हैं. जरा-सा मौका मिला नहीं कि सड़कों पर उतर आते हैं. फिर शुरू होती है तोड़-फोड़ और आगजनी. ज्यादातर मामलों में राष्ट्रीय संपत्ति को भी जमकर नुकसान पहुँचाया जाता है. कभी आरक्षण के नाम पर तो कभी धर्म के नाम पर लोग मेरे देश को जलाते रहते हैं.
मित्रों, चाहे जाटों को आरक्षण मांगना हो या गुर्जरों को जब भी ऐसा होता है ये रेलवे लाईन पर खाट-हुक्का लेकर पूरे कुनबे के साथ आ धमकते हैं. जैसे रेलवे लाईन रेलवे लाईन न होकर हड़ताली मोड़ या जंतर-मंतर हो. लेकिन राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का जहाँ तक सवाल है इस मामले में सबसे आगे होते हैं मुसलमान. हर शुक्रवार को इनका इस्लाम खतरे में होता है और ये अलग ही मूड में होते हैं. खुद तो भोर में अजान देकर अपने पडोसी गैर मुसलमानों की नींद रोज ख़राब कर देते हैं लेकिन क्या मजाल कि इनके मोहल्ले में कोई हिन्दू दिन-दोपहर को मंदिर में आरती करे. ये तुरंत तोड़-फोड़ शुरू कर देते हैं जैसे इनके मजहब के पास और कोई काम ही नहीं हो सिवाय तोड़-फोड़ करने के.
मित्रों, अभी-अभी केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन विधेयक पारित किया है जिसका भारतीय मुसलमानों से कुछ भी लेना-देना नहीं है लेकिन भारतीय मुसलमान इतनी-सी बात को समझने को तैयार नहीं है और असम से लेकर दिल्ली तक बस-ट्रेन जला रहे हैं. इनको इस बात से कोई मतलब नहीं है कि ट्रेनों-बसों-सडको के बंद होने से यात्रियों को कितनी परेशानी होगी इनको तो बस इस्लाम की कथित रक्षा करनी है जबकि वास्तविकता यह है कि इस्लाम को किसी दूसरे से कोई खतरा नहीं है बल्कि खुद इनसे ही खतरा है. कई ट्रेनों-बसों यहाँ तक कि रेलवे स्टेशनों तक को इनलोगों ने फूंक डाला है जैसे ये राष्ट्रीय संपत्ति को शत्रु-राष्ट्र की संपत्ति समझते हों. इसके साथ ही हिन्दुओं के घरों, गाड़ियों और मंदिरों पर भी हमले किए गए हैं. हाँ, एक मामले में ये लोग जरूर बहुत जागरूक हैं-अपने अधिकारों के मामले में. लेकिन इनको कौन समझाए कि भारत के संविधान में सिर्फ मौलिक अधिकार ही नहीं दिए गए हैं बल्कि अनुच्छेद ५१ (क) में मौलिक कर्त्तव्य भी बताए गए हैं और उनमें राष्ट्रीय संपत्ति की रक्षा करना भी शामिल है.
मित्रों, अंत में मैं भारत की समस्त डेढ़ अरब जनसँख्या से करबद्ध प्रार्थना करना चाहूँगा कि कृपया मेरे देश को मत जलाईए. आप जिस ट्रेन को खेल-खेल में जला डालते हैं अगर उसको आपको अपने पैसों से बनवाना पड़े तो आपको इसके लिए कई जन्म लेने पड़ेंगे. साथ ही आप तोड़-फोड़ करके जो दूसरे इंसानों को परेशान करते हैं उससे सिवाय इंसानियत के और कुछ आहत नहीं होती. साथ ही ऐसा करके आप खुद अपने ही इन्सान होने पर प्रश्न-चिन्ह लगाते हैं. मुझे नहीं इस बात से कुछ भी लेना-देना कि आपका नाम क्या है या आपका धर्म-जाति क्या है मुझे तो बस अपने प्यारे राष्ट्र से मलतब है जिसका कण-कण मेरे लिए काशी-काबा से कहीं बढ़कर पवित्र है.

गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

आरक्षण सही तो CAB गलत कैसे?

मित्रों, मेरा हमेशा से ऐसा मानना रहा है कि किसी भी सरकार के किसी भी कदम का विरोध औचित्यपूर्ण और तार्किक होना चाहिए. सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना न केवल मूर्खतापूर्ण हो सकता है बल्कि कई बार सारी सीमाओं को पार कर सीमापार बैठे हमारे दुश्मनों को लाभ पहुँचानेवाला भी साबित होता है.
मित्रों, अगर हम CAB अर्थात CITIZENSHIP AMENDMENT BILL यानि नागरिकता संशोधन विधेयक को ही लें तो इसका विरोध करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं लगता. बल्कि इसका स्वागत होना चाहिए. यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि इस्लाम दुनिया का सबसे असहिष्णु मजहब है अपितु अगर हम ऐसा कहें कि यह आतंकवादियों का मजहब बनकर ज्यादा प्रसिद्धि पा रहा है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. मैं यहाँ धर्म शब्द का प्रयोग इसलिए नहीं कर रहा है क्योंकि तब दुनिया में अधर्म कुछ भी नहीं रह जाएगा. धर्म शब्द एक बहुत पवित्र शब्द है और इसकी अपनी गरिमा है.
मित्रों, यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि १९४६ के १६ अगस्त को प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस के माध्यम से दंगों की शुरुआत मुसलमानों ने की थी. बाद में भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों का जीना दुश्वार कर दिया गया जिसके चलते उनकी आबादी विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गई. दूसरी तरफ भारत में स्थितियां इसके उलट रही. कांग्रेस और अन्य छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी दलों ने हिन्दू विवाह अधिनियम और अन्य समान कानूनों के माध्यम से हिंदुस्तान में हिन्दुओं को ही दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया. हालात कुछ ऐसे बने कि हिंदुस्तान में हिन्दू होना जैसे अपराध हो गया और निर्भया के साथ जानलेवा बलात्कार करनेवाले मुसलमान को सरकारें ईनाम देने लगी. पूरी दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जिसमें पिछले ७५ सालों में अल्पसंख्यकों की आबादी बढ़ी है और बहुसंख्यकों की घटी है.
मित्रों, ऐसे माहौल में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भारत आनेवाले हिन्दुओं और अन्य धर्मों के शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देता भी तो कौन देता? इनमें से कुछ तो पिछले ३० सालों से दिल्ली से जयपुर तक दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं. निश्चित रूप से CAB ऐसे दबे-कुचले सताए गए लोगों की जिंदगी में बहार बनकर आया है. सवाल यह भी है कि हिन्दू अपना धर्म बचाने के लिए भारत नहीं आएँगे तो जाएंगे कहाँ? क्या उनको भारत के १ अरब से भी ज्यादा हिन्दू उनके हाल पर छोड़कर तमाशा देखते रहेंगे? क्या ऐसा करना उचित होगा? मैं समझता हूँ कि ऐसा करना न तो १९४७ या १९७१ में उचित था और न अब उचित है.
मित्रों, जहाँ तक इस अधिनियम से मुसलमानों को बाहर रखने का प्रश्न है तो निस्संदेह उनकी स्थिति हिन्दुओं और अन्य शरणार्थियों से अलग है. वे पीड़ित नहीं है और न ही धर्म के आधार पर सताए गए हैं बल्कि वे भारत आए हैं और आते हैं रोजगार की अच्छी संभावनाओं के कारण. जबकि भारत खुद ही दुनिया के सबसे गरीब और बेरोजगार देशों में से एक है, भारत सरकार का यह कर्त्तव्य बनता है कि वो पहले अपने नागरिकों का ख्याल रखे. अगर मुसलमानों ने १९४७ में देश का बंटवारा नहीं करवाया होता तब स्थितियां निश्चित रूप से अलग होती लेकिन जो घटित हो चुका है उसे बदला तो नहीं जा सकता. इसलिए अच्छा होगा कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमान अपने देश में ही अपना भविष्य तलाशें.
मित्रों, कुछ लोग इस अधिनियम को भारतीय संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन मानते हैं. लेकिन ऐसा बताते हुए वे यह भूल जाते हैं कि पूरी दुनिया में सिर्फ भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ कदम-कदम पर जाति आधारित आरक्षण है. अगर हम समानता केअधिकार की दृष्टि से देखें तो आरक्षण भी इसका सरासर उल्लंघन है लेकिन वह लागू है और लगातार उसकी मात्रा भी बढती जा रही है. कहने का तात्पर्य यह है कि भारत के संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार में ही ऐसा प्रावधान किया गया है कि औचित्यपूर्ण आधार पर इस अधिकार का उल्लंघन किया जा सकता है. दूसरी बात यह कि CAB का उन मुसलमानों से कुछ भी लेना -देना नहीं है जो १९४७ में देश के बंटवारे के समय पाकिस्तान या बांग्लादेश नहीं गए अथवा १९ जुलाई १९४८ से पहले पाकिस्तान से भारत आ गए थे.
मित्रों, दूसरी तरफ बेवजह इस कानून को लेकर पूर्वोत्तर में उबाल आया हुआ है जबकि यह कानून पूर्वोत्तर में लागू ही नहीं होने जा रहा. ये कौन लोग हैं जो पूर्वोत्तर के लोगों को उकसा कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं? ठीक ऐसी ही स्थिति तब हुई थी जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एससी-एसटी एक्ट के तहत केस प्रारंभिक जांच के बाद ही दर्ज हो. तब इन जातियों के लोगों में यह अफवाह फैला दी गयी थी कि सरकार आरक्षण समाप्त करना चाहती है. आज जो लोग असम में आग लगा रहे हैं उनको यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि देश उनकी गतिविधियों पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं और आज नहीं तो कल उनको इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा.

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

हर हर मोदी हर जगह मोदी

मित्रों, अडोल्फ हिटलर का जन्म आस्ट्रिया के वॉन नामक स्थान पर 20 अप्रैल 1889 को हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा लिंज नामक स्थान पर हुई। पिता की मृत्यु के पश्चात् 17 वर्ष की अवस्था में वे वियना चले गए। कला विद्यालय में प्रविष्ट होने में असफल होकर वे पोस्टकार्डों पर चित्र बनाकर अपना निर्वाह करने लगे। इसी समय से वे साम्यवादियों और यहूदियों से घृणा करने लगे। जब प्रथम विश्वयुद्ध प्रारंभ हुआ तो वे सेना में भर्ती हो गए और फ्रांस में कई लड़ाइयों में उन्होंने भाग लिया। 1918 ई. में युद्ध में घायल होने के कारण वे अस्पताल में रहे। जर्मनी की पराजय का उनको बहुत दु:ख हुआ। 1918 ई. में उन्होंने नाजी दल की स्थापना की। इसका उद्देश्य साम्यवादियों और यहूदियों से सब अधिकार छीनना था। इसके सदस्यों में देशप्रेम कूट-कूटकर भरा था। इस दल ने यहूदियों को प्रथम विश्वयुद्ध की हार के लिए दोषी ठहराया। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण जब नाजी दल के नेता हिटलर ने अपने ओजस्वी भाषणों में उसे ठीक करने का आश्वासन दिया तो अनेक जर्मन इस दल के सदस्य हो गए। हिटलर ने भूमिसुधार करने, वर्साय संधि को समाप्त करने और एक विशाल जर्मन साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य जनता के सामने रखा जिससे जर्मन लोग सुख से रह सकें। इस प्रकार १९२२ ई. में हिटलर एक प्रभावशाली व्यक्ति हो गए। उन्होंने स्वास्तिक को अपने दल का चिह्र बनाया जो कि हिन्दुओं का शुभ चिह्र है. समाचारपत्रों के द्वारा हिटलर ने अपने दल के सिद्धांतों का प्रचार जनता में किया। भूरे रंग की पोशाक पहने सैनिकों की टुकड़ी तैयार की गई। 1923 ई. में हिटलर ने जर्मन सरकार को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न किया। इसमें वे असफल रहे और जेलखाने में डाल दिए गए। वहीं उन्होंने मीन कैम्फ ("मेरा संघर्ष") नामक अपनी आत्मकथा लिखी। इसमें नाजी दल के सिद्धांतों का विवेचन किया। उन्होंने लिखा कि आर्य जाति सभी जातियों से श्रेष्ठ है और जर्मन आर्य हैं। उन्हें विश्व का नेतृत्व करना चाहिए। यहूदी सदा से संस्कृति में रोड़ा अटकाते आए हैं। जर्मन लोगों को साम्राज्यविस्तार का पूर्ण अधिकार है। फ्रांस और रूस से लड़कर उन्हें जीवित रहने के लिए भूमि प्राप्ति करनी चाहिए। १९३०-३२ में जर्मनी में बेरोज़गारी बहुत बढ़ गई। संसद में नाजी दल के सदस्यों की संख्या २३० हो गई। १९३२ के चुनाव में हिटलर को राष्ट्रपति के चुनाव में सफलता नहीं मिली। जर्मनी की आर्थिक दशा बिगड़ती गई और विजयी देशों ने उसे सैनिक शक्ति बढ़ाने की अनुमति दी। १९३३ में हिटलर चांसलर बना और चांसलर बनते ही हिटलर ने जर्मन संसद को भंग कर दिया, साम्यवादी दल को गैरकानूनी घोषित कर दिया और राष्ट्र को स्वावलंबी बनाने के लिए ललकारा। हिटलर ने डॉ॰ जोज़ेफ गोयबल्स को अपना प्रचारमंत्री नियुक्त किया। नाज़ी दल के विरोधी व्यक्तियों को जेलखानों में डाल दिया गया। कार्यकारिणी और कानून बनाने की सारी शक्तियाँ हिटलर ने अपने हाथों में ले ली। १९३४ में उन्होंने अपने को सर्वोच्च न्यायाधीश घोषित कर दिया। उसी वर्ष हिंडनबर्ग की मृत्यु के पश्चात् वे राष्ट्रपति भी बन बैठे। नाजी दल का आतंक जनजीवन के प्रत्येक क्षेत्र में छा गया। १९३३ से १९३८ तक लाखों यहूदियों की हत्या कर दी गई। नवयुवकों में राष्ट्रपति के आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करने की भावना भर दी गई और जर्मन जाति का भाग्य सुधारने के लिए सारी शक्ति हिटलर ने अपने हाथ में ले ली। हिटलर ने १९३३ में राष्ट्रसंघ को छोड़ दिया और भावी युद्ध को ध्यान में रखकर जर्मनी की सैन्य शक्ति बढ़ाना प्रारंभ कर दिया। प्राय: सारी जर्मन जाति को सैनिक प्रशिक्षण दिया गया।
मित्रों, आप सोंच रहे होंगे कि मुझे हो क्या गया है? शीर्षक में तो हिटलर नहीं था फिर आलेख की शुरुआत हिटलर के जिक्र से क्यों. दरअसल कभी-कभी वर्तमान की जड़ें काफी गहरे तक भूतकाल तक गई हुई होती हैं इसलिए इतिहास के आईने में झांकना जरूरी हो जाता है. मैं नहीं जानता कि आपको याद है या नहीं लेकिन मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब मोदी जी २०१४ में प्रधानमंत्री बने थे तब उनका व्यवहार कैसा था. उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री की जगह प्रधानसेवक और चौकीदार बताया था. जब वे पहली बार संसद पहुंचे तो संसद को मंदिर का दर्जा देते हुए उसकी सीढियों पर मत्था टेका था. भाजपा के नवनिर्वाचित सांसदों की बैठक में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के चरण छुए थे और गले लगकर रोने लगे थे. लगा जैसे भारत की सत्ता एक संत के हाथों में आ गयी है. लेकिन धीरे-धीरे मोदी ने हिटलर की तरह वन मैन शो की तरफ बढ़ना शुरू किया. उम्र सीमा का बहाना बनाकर किसी भी बुजुर्ग को मंत्री नहीं बनाया. हर महीने के आखिरी रविवार को खुद ही देश के साथ सीधा संवाद करना शुरू कर दिया मानों उन्हें मीडिया की जरुरत ही नहीं. इसके साथ-साथ मीडिया पर अपना विरोधी होने का जमकर प्रचार भी किया. जब-जब चुनाव आया पाकिस्तान पर हमला करके देश में सैन्य राष्ट्रवाद की लहर पैदा कर दी. सारे आर्थिक-सामाजिक आंकड़ों को दबाने का प्रयास किया जिससे जनता को वास्तविकता का पता न चले. २०१९ के चुनाव में सारे बुजुर्गों के टिकट काट दिए गए. २०१९ के चुनावों के समय अपना टीवी चैनल नमो टीवी संचालित किया. जबसे प्रधानमंत्री बने कोई प्रेस वार्ता आयोजित नहीं की क्योंकि उनको बोलना और आदेश देना अच्छा लगता है सुनना और सवालों का उत्तर देना पसंद नहीं है. जब भी विदेश यात्रा पर गए अकेले हवाई जहाज में चढ़ते और उतरते हुए दिखे जैसे कि हवाई जहाज में वे अकेले थे और हवाई जहाज को स्वयं ही उड़ा रहे थे और जैसे कि भारत की विदेश नीति का सञ्चालन वे अकेले ही करते हैं. जब भी कोई मंत्री अच्छा काम करता हुआ दिखा या तो उसके पर क़तर दिए गए या फिर बाहर कर दिया गया. सर्वोच्च न्यायालय को अपने पक्ष में करने का भरसक प्रयास किया गया. राष्ट्रपति एक ऐसे व्यक्ति को बनाया जो कभी उनकी बात को टाल नहीं सके. सारे राज्यपाल आज मोदी के आदेशपाल बनकर रह गए हैं. देश में मोदी विरोध को देशद्रोह का पर्याय बना दिया गया मानों मोदी ही भारत हैं. एक ऐसी महिला को वित्त मंत्री बनाया जिसे इस विषय का कोई ज्ञान ही नहीं है. इस प्रकार देश की उडान भर रही अर्थव्यवस्था आज क्रैश लैंडिंग की स्थिति में पहुँच गयी है. पूरे मंत्रीमंडल में लगता है जैसे कोई मंत्री है ही नहीं सिर्फ मोदी हैं. सारे सरकारी निगमों, विश्वविद्यालयों को अपने भजनकर्ताओं से भर दिया. सारे पेट्रोलपम्पों और सार्वजनिक स्थानों पर सिर्फ अपनी तस्वीर लगवाई मानों एक अकेला व्यक्ति पूरे देश को चला रहा है और बांकी के लोग झक मार रहे हैं. हिन्दुओं के मन में श्रेष्ठता-भाव को उग्रता की हद तक ले जाने की कोशिश की गयी. देश में मुस्लिम-विरोधी माहौल उत्पन्न करने का यथासंभव प्रयास किया. यहाँ तक कि गाँधी-नेहरू का भी जमकर चरित्र-हनन किया गया. विपरीत और मध्यमार्गी विचारधाराओं के खिलाफ जमकर प्रचार किया गया. बार-बार देश में पहली बार वाक्य का प्रयोग किया गया जैसे २०१४ से पहले भारत था ही नहीं. अपनी और अपनी सरकार की सारी विफलताओं के लिए पिछली सरकार और पंडित नेहरु को दोषी ठहराया गया मानों इनको जनता ने बस इसी काम के लिए चुना था. मीडिया को अपने गुणगान करने के लिए येन-केन-प्रकारेन प्रभावित किया गया भले ही सरकार के कदम कितने ही मूर्खतापूर्ण क्यों न हों जैसे कि देश का अति तीव्र गति से निजीकरण, जीएसटी और पागलपन भरा नोटबंदी. अपने गठबंधन के सहयोगियों को समान मानने के बदले पिछलग्गू बनाकर रखने का प्रयास किया गया. वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह को गृह मंत्री से हटाकर अपने चहेते अमित शाह को गृह मंत्री बनाया. आज आकाशवाणी समाचार में सिर्फ नरेन्द्र मोदी के नाम के साथ भाजपा के वरिष्ठ नेता संबोधन बोला जाता है मानों वे भाजपा में अकेले वरिष्ठ नेता हैं. आज जिस भी पद पर नियुक्ति का अधिकार भारत सरकार को है हर जगह सिर्फ और सिर्फ मोदी की भजन मंडली के लोग बिठा दिए गए हैं और चूंकि साहेब को आलोचना से सख्त नफरत है इसलिए वे दिन-रात उनकी झूठी प्रशंसा करते रहते हैं.
मित्रों, कुल मिलाकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे इतिहास अपने को दोहरा रहा है. जो कुछ भी सौ साल पहले जर्मनी में हुआ था वैसा ही भारत में करने की कोशिश की जा रही है. मैं यह तो नहीं जानता कि इस दिशा में मोदी किस हद तक जाएंगे लेकिन इतना अवश्य जानता हूँ भारत जर्मनी नहीं है इसलिए बहुत जल्द उनका पराभव निश्चित है और कदाचित प्रारंभ हो भी चुका है. वैसे सत्ता आने पर अभिमान तो हर किसी में आ जाता है. गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के बाल काण्ड में दक्ष प्रजापति प्रसंग में कहा है कि- नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥4॥ तथापि सत्य तो यह भी है कि अहंकार भगवान का भोजन है.
भगवान किसी का अहंकार रहने नहीं देते। उसे नष्ट कर देते हैं जब उनकी इच्छा हो जाती है। जग छूट जाता है, बड़े-बड़ों का घमंड टूट जाता है। एक समय हिटलर का अहंकार भी टूटा था.

सोमवार, 25 नवंबर 2019

लोकतंत्र का चीरहरण करते उसके बेटे


मित्रों, हम भारत की जनता बहुत बड़े वाले अभागे हैं. हम चाहे जिस भी नेता पर दांव लगाएं आगे चलकर वो धोखेबाज ही निकलता है. अब नरेन्द्र मोदी को ही ले लें. हमने देखा था और गौरवान्वित हुए थे कि यह आदमी पहली बार जब संसद पहुंचा तो इसने उसकी सीढियों पर मत्था टेका जैसे वो संसद नहीं सचमुच का मंदिर हो. लेकिन आदमी जैसा दिखता है वैसा होता कहाँ है. बहुत जल्द परिदृश्य बदल गया और वही व्यक्ति लोकतंत्र का चीरहरण करता हुआ दिखने लगा. लगा जैसे लोकतंत्र द्रौपदी बन गई है और भरी सभा में विलाप कर रही है कि मुझे मेरे बेटों से बचाओ अन्यथा ये मेरी ईज्जत तार-तार कर देंगे. वह आर्तनाद कर रही है, बार-बार उनको याद दिला रही है कि तुमने मेरे ही गर्भ से जन्म लिया है लेकिन सत्ता के मद में चूर उनके बेटे उसकी एक नहीं सुन रहे. द्वापर होता तो योगेश्वर कृष्ण जरुर आते उसकी ईज्जत बचाने लेकिन कलियुग का भगवान तो कोई और है और वो है पैसा और पैसा सत्ता से आता है. अगर कलियुग में भगवान भगवान होते तो हमारे अख़बार रोजाना रंगे नहीं होते बलात्कार की खबरों से. भगवान ने चमत्कार करके बलात्कारियों के सर के सौ टुकड़े नहीं कर दिए होते? इसलिए वही प्रश्न शेष है कि ऐसे में कौन बचाएगा इस अबला नारी की ईज्जत? कैसे शेष बचेगा भारत में लोकतंत्र का अस्तित्व? हमने तो सोंचा था, इस देश की बहुसंख्य जनता ने सोंचा था, निराश-हताश मन में उम्मीद बाँधी थी कि ये लोग भारत को सचमुच विश्वगुरु बनाने के लिए आए हैं लेकिन इनके मन में कुछ और था और जुबान पर कुछ और. हम भारतीय इतने भोले और भावुक हैं कि हम एकल चेहरा नहीं पढ़ पाते फिर लोकतंत्र के इन बेटों के तो अनगिनत चेहरे थे और उनका अभिनय इतना उच्चस्तरीय था कि उनके समक्ष शायद भगवान भी होते तो धोखा खा जाते फिर आदम जात की क्या बिसात!

मित्रों, एक वो नारायण थे जिन्होंने धर्म की स्थापना के लिए बार-बार अवतार लिया और एक यह नारायण राणे है जो कहता है कि उसने लोकतंत्र को मंडी में, बाज़ार में बदल दिया है और इस बाज़ार में बिकने के लिए बहुत-सारे विधायक सज-धज कर तैयार बैठे हैं. ऐसे में आप ही बताईये कि कैसे बचेगी लोकतंत्र की जान और अगर जान बच भी गई तो ईज्जत खो चुकी यह आधुनिक द्रौपदी कैसे कर पाएगी दुनिया के प्रश्नवाचक-शरारत भरी नज़रों का सामना? इस बेचारी का जो अपमान बूथ लूट से शुरू हुआ था अब वो चरम पर पहुँच चुका है. अब सीधे सांसदों-विधायकों की लूट होने लगी है, सरकार की लूट होने लगी है. खुद बहुत-सारे सांसद-विधायक बिकने को तैयार बैठे हैं. नीलामी शुरू है,लोग बोलियाँ लगा रहे हैं, २० करोड़-३० करोड़-५० करोड़. जैसे दुनिया को शून्य देनेवाले देश में १ के बाद शून्य का कोई महत्त्व ही नहीं रह गया हो. पार्टियाँ विधायकों को जानवरों के बाड़े की तरह होटल में बंद करके रख रही हैं ताकि उनको बिकने से बचाया जा सके. संविधान और विधान बेमतलब हो गए हैं. लोकतंत्र का आधुनिक मंदिर संसद के स्थान पर होटल बन गए हैं और यह सब उनके इशारों पर हो रहा है जिन्होंने कभी संसद की सीढियों पर मत्था टेका था. इतना बड़ा धोखा! इस इंसान को क्या समझा था और क्या निकला! हा दैव, अब हम किसे पुकारें, कौन करेगा हमारी रक्षा जब सारे रक्षक ही भक्षक बन गए हैं. उल्लू तो फिर भी ठीक थे तुमने तो हर डाल पे गिद्ध बैठा दिए हैं प्रभु.

शनिवार, 23 नवंबर 2019

शून्य पर सवार भारतीय राजनीति


मित्रों, जबकि इस घनघोर कलियुग में भगवान की भक्ति तक को गंदा धंधा बना दिया गया है राजनीति के गन्दा हो जाने को बिलकुल भी अनपेक्षित नहीं कहा जा सकता. एक समय था जब दिल्ली में सोनिया माता का शासन था और उनका स्पष्ट रूप से मानना था कि दाग बुरे नहीं बल्कि अच्छे हैं. शायद इसलिए उनदिनों कांग्रेस में जो जितना ज्यादा बदनाम था वो सरकार में उतने ही बड़े पद पर था. फिर अन्ना हजारे केजरीवाल नामक स्वघोषित महासत्यवादी को साथ लेकर आए जिन्होंने अपने बच्चों की कसम खाकर अन्ना के मंच से घोषणा की कि वे कभी राजनीति में नहीं जाएंगे. लेकिन सारे कसमों को तोड़ते हुए केजरीवाल राजनीति में आ गए और यह कहते हुए आए कि उन्होंने ऐसा मजबूरी में किया है क्योंकि वे राजनीति से गंदगी को साफ़ करने आए हैं. बहुत जल्द उनकी बार-बार की बन्दरगुलाटी से जनता उब गयी और जो केजरीवाल केंद्र में सरकार गठन के सपने देख रहे थे सिर्फ दिल्ली में सिमट कर रह गए.
मित्रों, इस बीच जो शून्य भारतीय राजनीति में पैदा हुआ उससे जमकर लाभ उठाया भारतीय जनता पार्टी ने और मोदी ने २०१४ के लोकसभा चुनावों के समय वादों की झड़ी लगा दी. लगा जैसे अब भारत और भारतीय राजनीति में राम राज्य आकर रहेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं और भारत में रामराज्य के बदले अम्बानी-अडानी राज आ गया. जो सरकारी कंपनियां कभी नवरत्न थी आज नौ-नौ पैसे में बेची जा रही हैं. मोदी ने चुनावों के समय कांग्रेस पर देश में भ्रष्टाचार फ़ैलाने का आरोप लगाते हुए देश को कांग्रेसमुक्त करने का वादा किया था लेकिन चुनावों के बाद उन्होंने भाजपा को जैसे गंगा बना दिया. कांग्रेस के लोग झुण्ड-के-झुण्ड भाजपा के घाट पर आने लगे और डुबकी लगाकर पवित्र होने लगे.
मित्रों, आज की तारीख आते-आते देश की राजनीति में ऐसी स्थिति हो गयी है कि भाजपा विधायकों को खरीद कर हारा हुआ चुनाव भी जीत जा रही है. जैसे हमारे देश के राजनीतिज्ञों के शब्दकोश में नैतिकता शब्द है ही नहीं. बस येन-केन-प्रकारेण भाजपा को कुर्सी चाहिए. वैसे आज सुबह महाराष्ट्र में जो कुछ भी हुआ उसके लिए सिर्फ भाजपा ही दोषी हो ऐसा भी नहीं है. जब शिवसेना ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा तो उसे चुनावों के बाद भी भाजपा के साथ ही रहना चाहिए था लेकिन उसने जनादेश का अपमान करते हुए एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिला लिया.
मित्रों, आज सुबह जो खेल महाराष्ट्र में हुआ उसमें अगर सबसे ज्यादा नुकसान किसी को हुआ है वो है कांग्रेस पार्टी. शिवसेना को तो नुकसान हुआ ही है मगर कांग्रेस ने यह दिखा दिया कि सत्ता के लिए वो अपनी विचारधारा से भी समझौता कर सकती है. पवार फिर से महाराष्ट्र की राजनीति के सिकंदर बनकर उभरे हैं और सबसे ज्यादा फायदा उनको ही हुआ है. भाजपा के खेमे आ जाने से उनका पूरा परिवार अनगिनत घोटालों के आरोपों से रातोंरात मुक्त हो गया है. जहाँ तक भाजपा का सवाल है तो भाजपा के लिए महाराष्ट्र में सरकार का गठन भले ही तात्कालिक लाभ देनेवाला हो दीर्घकालिक रूप से उसके लिए नुकसानदेह ही साबित होगा क्योंकि अब उसका असली चेहरा भारत की जनता के समक्ष उजागर हो गया है और वो यह है कि भाजपा कहीं से भी पार्टी विथ डिफरेंस नहीं है बल्कि वो बांकी पार्टियों के मुकाबले कहीं ज्यादा लालची, अनैतिक और राजनैतिक शुचिता और मूल्यों से विहीन है. आज की भाजपा अटल-आडवाणी वाली भाजपा नहीं है बल्कि देश को बेच डालनेवाली महाभ्रष्ट पार्टी है और देश और देश की गरीब जनता के लिए हानिकारक हो चुकी है. निस्संदेह देश की राजनीति में फिर से बहुत बड़ा शून्य पैदा हो गया है.