शनिवार, 30 जनवरी 2021
नाथूराम ने गाँधी को क्यों मारा?
शुक्रवार, 29 जनवरी 2021
पिताजी तुमने मुझे धोखा दिया है
रविवार, 10 जनवरी 2021
बदले-बदले हुए सरकार नजर आते हैं
शनिवार, 2 जनवरी 2021
उद्यमिता का सम्मान करे भारत
गुरुवार, 31 दिसंबर 2020
अलविदा २०२० स्वागत २०२१
रविवार, 27 दिसंबर 2020
मनुस्मृति का मूल्यांकन
रविवार, 20 दिसंबर 2020
सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार का सुप्रीम झूठ
बुधवार, 16 दिसंबर 2020
कुत्ते की पूँछ बिहार का प्रशासन
गुरुवार, 10 दिसंबर 2020
डरपोक और पिलपिली मोदी सरकार
सोमवार, 30 नवंबर 2020
फिर से आग से खेल रही है कांग्रेस
शुक्रवार, 20 नवंबर 2020
अंधेर नगरी मोदी राजा
रविवार, 15 नवंबर 2020
इस्लाम, यूरोप और भारत
गुरुवार, 12 नवंबर 2020
डर के आगे जीत है
बुधवार, 14 अक्टूबर 2020
बिहार में का बा? बिहार में ई बा
सोमवार, 12 अक्टूबर 2020
अपनी जान की सुरक्षा स्वयं करें
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020
बधाई हो बलात्कार हुआ है
गुरुवार, 24 सितंबर 2020
बिचौलियों के पक्ष में लामबंद विपक्ष
सोमवार, 14 सितंबर 2020
रघुवंश प्रसाद सिंह को श्रद्धांजलि
मित्रों, रघुवंश प्रसाद सिंह को मैं तब से जानता हूँ जब मैं चार-पांच साल का रहा होऊंगा. वो मेरे पिताजी से दो बैच पीछे पढ़ते थे. पिताजी महनार हाई स्कूल में थे और रघुवंश बाबू महनार रोड स्टेशन स्थित चमरहरा हाई स्कूल में. मेरे पिताजी से उनकी तब की जान-पहचान थी. मेरे पिताजी की शादी तभी हो गई थी जब वो दसवीं में पढ़ते थे और मेरा ननिहाल रघुवंश बाबू के पडोसी गाँव में था इस नाते भी रघुवंश बाबू हमारे लिए घर के आदमी थे, मामा थे. रघुवंश बाबू को जेपी आन्दोलन के दौरान पिताजी ने कई बार गिरफ़्तारी से बचाया था. थोडा बड़ा हुआ तो १९८५ में पिताजी सैनिक स्कूल की परीक्षा दिलवाने पटना ले गए तब भी हम रघुवंश बाबू के अगस्त क्रांति मार्ग स्थित मंत्री आवास पर रुके थे. उनकी पत्नी शाम में आकर हम लोगों से मिलती और बातें करती. उनका बड़ा बेटा भी मेरे साथ सैनिक स्कूल प्रवेश परीक्षा देने जाता था. तब रघुवंश बाबू अधिकतर अपने विधानसभा क्षेत्र बेलसंड में रहते. मैं सोंचता कि बेलसंड तो काफी विकसित होगा क्योंकि नेताजी हमेशा क्षेत्र में ही रहते हैं.उस मंत्री आवास की भी एक कहानी पिताजी सुनाते हैं जो उनको स्वयं रघुवंश बाबू ने कही थी. हुआ यह कि रघुवंश बाबू जनता पार्टी की सरकार में मंत्री बने और उनको वह आवास रहने को दिया गया. फिर १९८० में कांग्रेस की सरकार बन गई और रघुवंश बाबू मंत्री नहीं रहे. डॉ. जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री बने तो रघुवंश बाबू को आवास खाली करने की नोटिस दे दी गई. तब अद्भभुत प्रतिउत्पन्नमतित्व के धनी रघुवंश बाबू ने विधानसभा में जगन्नाथ मिश्र जी से कहा बाबा मंत्री पद तो ले लिए अब आवास भी ले लेंगे क्या? और वह आवास फिर से रघुवंश बाबू के पास ही रह गया.
मित्रों, फिर लालू जी आए और पूरे बिहार को जंगल में बदल दिया. तब रघुवंश बाबू लालूजी के साथ ही थे. उन्होंने कभी लालूजी का विरोध नहीं किया. मुझे लगता है कि रघुवंश बाबू सुविधावादी नेता थे. लालू के नाम पर उनको चुनाव जीतना था कोई लालू जी को रघुवंश बाबू के नाम पर जीतना तो था नहीं इसलिए जब तक रघुवंश बाबू जीतते रहे चुप रहे. इस बीच लालू जी ने अनगिनत पाप किए, हत्याएं करवाईं, बलात्कार करवाए, अपहरण करवाए, घोटाले किए. यहाँ तक कि अनपढ़ पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया लेकिन रघुवंश बाबू चुप रहे. दरअसल वे पिछलगुआ नेता थे. पहले कर्पूरी ठाकुर के पिछलगुआ रहे जो उनके नाना के गाँव के थे और बाद में लालू और लालू परिवार के. आगे बढ़कर नेतृत्व देने की उनमें न तो क्षमता थी और न ही हिम्मत. मुझे याद है कि १९९५ के विधानसभा चुनाव के बाद जब राजपूत जाति के लोग उनके पास किसी काम से गए तो उन्होंने यह कहकर उनसे मिलने से मना कर दिया था कि इनलोगों ने उनके दल को वोट नहीं दिया है. लगभग उसी कालखंड में एक बार जवाहर बाबू जो एलएस कॉलेज में रघुवंश बाबू और रामचंद्र पूर्वे के सहपाठी रह चुके थे और महनार के आरपीएस कॉलेज में गणित के प्राध्यापक थे रघुवंश बाबू के पास अपने बेटे के लिए नौकरी मांगने गए. तब रघुवंश बाबू ने पास में सड़क पर नंग-धडंग खेल रहे बच्चे को दिखाकर कहा कि जवाहर हम तो चाहते हैं कि इस बच्चे को भी नौकरी दे दूं. बेचारे जवाहर बाबू शर्म से पानी-पानी हो गए. तब पिताजी भी जवाहर बाबू के साथ थे.
मित्रों, इसी बीच मेरी छोटी दीदी की शादी १९९६ में बेलसंड के नोनौरा गाँव में ठीक हुई. जब हम तिलक लेकर गाँव गए तो पता चला कि बेलसंड तो बिहार का सबसे पिछड़ा इलाका है. न तो कहीं पर सड़कें थीं और न ही बिजली. कच्ची सड़कों पर कई फुट मोटी धूल की परत. बागमती पर पुल के होने का तो सवाल ही नहीं था. तब मैंने सोंचा कि नेताजी तो हमेशा क्षेत्र में ही रहते थे फिर करते क्या थे क्षेत्र में रहकर.
मित्रों, बाद में रघुवंश बाबू सांसद और केंद्रीय मंत्री बने. मनरेगा लेकर आए जिसके माध्यम से हर साल हजारों करोड़ों की हेरा-फेरी होती है. गड्ढा खोदो और भरो. इस योजना ने किसानों का जीना मुहाल कर दिया. कृषि मजदूर मनरेगा में चले गए. मजदूरी बेतहाशा बढ़ गई. उधर राजद की लगाम लालू जी के हाथों से निकलकर उनके बेटों के हाथों में चली गई और रघुवंश बाबू जैसे लालू जी से भी सीनियर नेताओं की हालत वही हो गई जो जीजा के आने के बाद फूफा की हो जाती है. इधर पार्टी में पूछ नहीं रही और उधर जनता ने भी रिजेक्ट कर दिया. राजपूत उनके साथ थे नहीं पिछड़े भी मोदी के साथ हो लिए. उससे भी बुरा समय तब आया जब लालू जी के बड़े बेटे ने उनको एक लोटा पानी कह दिया. यहाँ मैं आपको बता दूं कि जिस रामा सिंह को लेकर सारा विवाद हुआ वो भी महनार के ही हैं और रघुवंश बाबू भी. रामा सिंह भी हमारे नजदीकी है और महनार स्टेशन के पास स्थित आरपीएस कॉलेज में पिताजी के विद्यार्थी भी रह चुके हैं. यहाँ हम यह भी बता दे कि रामा सिंह रघुवंश बाबू के चचेरे भाई रघुपति को कई बार महनार विधानसभा क्षेत्र में पटखनी दे चुके हैं. बाद में संयोगवश उनकी रघुवंश बाबू से भी टक्कर हो गयी जिसमें रघुवंश बाबू हार गए.
मित्रों, समय का फेर देखिए कि जिन राजपूतों को लालू और लालू परिवार अपना पक्का शत्रु समझते थे लालू के दोनों बेटों को इस बार विधानसभा पहुँचने के लिए उनका ही वोट चाहिए और वो वोट रामा दिलवा सकते हैं रघुवंश नहीं दिलवा सकते थे. सवाल उठता है कि रघुवंश अभी किस दल में थे. शायद किसी दल में नहीं. लेकिन जीवित रहते तो शायद जदयू में जाते. अंत में मैं कहना चाहूँगा कि उन्होंने जाते-जाते बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी को पत्र लिखकर किसानों का दिल जीत लिया है. उन्होंने पत्र में मांग की थी कि मनरेगा में संशोधन करके प्रावधान किया जाए कि मनरेगा के मजदूर न सिर्फ एससी-एसटी बल्कि सारे किसानों के खेतों में काम करें और भुगतान सरकार करे. अपने एक आलेख मन रे (सुर में) न गा यानी मनरेगा में हमने भी २०१० में इस आशय की मांग की थी. अगर रघुवंश बाबू की इस अंतिम इच्छा को लागू कर दिया जाता है तो निश्चित रूप से कृषि के क्षेत्र में क्रांति आ जाएगी और किसान समाज हमेशा के लिए उनका ऋणी हो जाएगा.
मित्रों, अंत में मैं यह कहकर विराम चाहूँगा कि तमाम कमियों और गलतियों के बावजूद रघुवंश बाबू घनघोर ईमानदार थे इसमें कोई संदेह नहीं. और लालू जो भ्रष्टाचार के पर्याय हैं की पार्टी में रहकर भी ईमानदार थे ये उनके कद को और भी ऊंचा बनाता है. वो दौर राजनीति में गिरावट का था. लालू जी जबरदस्ती तो सत्ता में आए नहीं थे जनता ने उनको बार-बार चुना था. और उस गिरावट के दौर में भी रघुवंश बाबू गिरे नहीं अपने मूल्यों और सिद्धांतों को कम-से-कम व्यक्तिगत तौर पर बनाए रखा. रघुवंश बाबू श्रीकृष्ण तो नहीं लेकिन भीष्म पितामह तो थे. और दुर्योधनों के इस काल में भीष्म होना भी कोई कम बड़ी बात नहीं है. ऐसे महामानव को श्रद्धांजलि.
शुक्रवार, 11 सितंबर 2020
ईसाई मिशनरी हिंदुत्व के लिए खतरा
मित्रों, भारत में जब इसाईयत काआगमन हुआ तब भी उनके इरादे खतरनाक थे. इतिहास साक्षी है कि कालीकट के हिन्दू राजा जमोरिन ने बड़ी ही गर्मजोशी से १४९८ में वास्कोडिगामा का स्वागत किया था लेकिन वास्कोडिगामा जब दोबारा आया तो तोप लेकर आया और सीधे जमोरिन पर हमला बोल दिया. हजारों हिन्दुओं को मार दिया गया, हजारों को जबरन ईसाई बना दिया गया और इस कुत्सित कृत्य में उसका साथ दिया तथाकथित संत जेवियर ने जिसके नाम पर भारत में हजारों स्कूल हैं.
मित्रों, कहने का तात्पर्य यह है कि मुसलमानों की ही तरह हिंदुत्व के प्रति ईसाईयों के मन में भी प्रारंभ से ही वैर था. बाद में जब अंग्रेजों ने पूरे भारत पर कब्ज़ा कर लिया तब भी लार्ड क्लाईव से लेकर लार्ड माउंटबेटन तक जितने भी गवर्नर, गवर्नर जनरल या वायसराय हुए सबके मन में भारत को ईसाई देश बना देने का सपना पल रहा था. भारत को अफ्रीका समझने वाले लार्ड कैनिंग ने तो ब्रिटिश सरकार को भेजे पत्रों में दावा किया था कि पचास साल बाद भारत में कोई हिन्दू नहीं बचेगा. लेकिन हमारे सनातन धर्म की जड़ें इतनी गहरी थीं कि ईसाई मिशनरी शासन में होते हुए भी हिंदुत्व का बाल भी बांका नहीं कर पाए.
मित्रों, फिर हमारा देश आजाद हुआ लेकिन दुर्भाग्यवश देश पर खुद को दुर्घटनावश हिन्दू कहनेवाले हिंदुविरोधी नेहरु और उसके परिवार का शासन कायम हो गया. फिर नेहरु के नाती राजीव गाँधी ने जो सिर्फ नाम का हिन्दू था एक रोमन कैथोलिक महिला से शादी कर ली. कहीं-न-कहीं इस महिला के दिमाग में भी वही सपना पल रहा था जो कभी लार्ड कैनिंग या जेवियर ने देखा था. फिर बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा और सोनिया को २००४ में भारत की बागडोर सँभालने का मौका मिला. सोनिया को सिर्फ ईसाई नेता पसंद थे. उनमें से कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने हिन्दुओं को धोखा देने के लिए नाम हिन्दुओं वाला ही रखा था लेकिन थे ईसाई. उन दस सालों में ईसाई मिशनरियों की मौज रही. पूरे जोर-शोर से धर्म-प्रचार, प्रलोभन और धर्मान्तरण का गन्दा खेल खेला गया. इस गर्हित कुकर्म में वामपंथियों और नक्सलियों ने भी उनका भरपूर साथ दिया. कई स्थानों पर तो ईसाई मिशनरियों और वामपंथियों ने मिलकर उद्योंग-धंधे भी बंद करवा दिए जिससे भारत को बारी आर्थिक क्षति भी हुई.
मित्रों, वो कहते हैं कि हर दिन की एक शाम भी होती है. तो वर्ष २०१४ में सोनिया शासन समाप्त हो गया और हिंदुत्व का शासन शुरू हुआ. फिर शुरू हुई एनजीओ की धड-पकड़. लेकिन अब ईसाई मिशनरियों ने भोले-भाले वनवासी हिन्दुओं को बरगलाने के लिए नए हथकंडे अपना लिए. अब ईसा मसीह भी कृष्णा और राम की वेश-भूषा में आ गए.
मित्रों, यह बड़े ही हर्ष का विषय है कि भारत सरकार ने भारत में धर्मान्तरण करवाने वाले १३ बड़े ईसाई मिशनरी संगठनों की विदेशी फंडिंग रोक दी है. तथापि हवाला से पैसा आने का खतरा अब भी बना रहेगा. ऐसे में यह जरुरी है कि कानून बनाकर हिन्दू धर्म से धर्मान्तरण को अपराध घोषित किया जाए और हमारे जो भाई-बन्धु ईसाई बन गए हैं उनको वापस हिन्दू धर्म में लाया जाए. हमारे लिए एक-एक हिन्दू महत्वपूर्ण है. याद रखिए स्वामी विवेकानंद ने कहा था-एक हिंदू का धर्मान्तरण केवल एक हिंदू का कम होना नहीं, बल्कि एक शत्रु का बढ़ना है। साथ ही हिन्दू-संगठनों को सर्वहारा वर्ग को वो सब उपलब्ध करवाना होगा जो उनको ईसाई मिशनरी उपलब्ध करवाते हैं.
बुधवार, 2 सितंबर 2020
जीडीपी में गिरावट अप्रत्याशित नहीं

मित्रों, केंद्रीय सांख्यिकी मंत्रालय ने सोमवार को जीडीपी के आंकड़े जारी कर दिए हैं जिसमें यह नकारात्मक रूप से 23.9 फ़ीसदी रही है. भारतीय अर्थव्यवस्था में इसे 1996 के बाद ऐतिहासिक गिरावट माना गया है और इसका प्रमुख कारण कोरोना वायरस और उसके कारण लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन को बताया जा रहा है. निश्चित रूप से यह भारत के लिए बड़ा झटका है और इससे 2025 तक अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन (खरब) डॉलर की इकोनॉमी बनाने का सपना अब पूरा होता नहीं दिख रहा है. जीडीपी पिछले चार दशकों में पहली बार इतनी गिरी है और बेरोज़गारी अब तक के चरम पर है. विकास के बड़े इंजन, खपत, निजी निवेश या निर्यात ठप्प पड़े हैं. ऊपर से यह है कि सरकार के पास मंदी से बाहर निकलने और ख़र्च करने की क्षमता नहीं है. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि
भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में सबसे बुरी तरह बिगड़ी है. अमरीका की अर्थव्यवस्था में जहां इसी तिमाही में 9.5 फ़ीसदी की गिरावट है, वहीं जापान की अर्थव्यवस्था में 7.6 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.
मित्रों, अर्थव्यवस्था के आंकड़ों के मामले में भारत की तस्वीर कुछ अलग है क्योंकि यहां अधिकतर लोग ‘अनियमित’ रोज़गार में लगे हैं जिसमें काम के लिए कोई लिखित क़रार नहीं होता और अकसर ये लोग सरकार के दायरे से बाहर होते हैं, इनमें रिक्शावाले, टेलर, दिहाड़ी मज़दूर और किसान शामिल हैं. अर्थशास्त्री मानते हैं कि आधिकारिक आंकड़ों में अर्थव्यवस्था के इस हिस्से को नज़रअंदाज़ करना होता है जबकि पूरा नुक़सान तो और भी अधिक हो सकता है. 130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश की अर्थव्यवस्था कुछ ही सालों पहले 8 फ़ीसदी की विकास दर से बढ़ रही थी जो दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक थी. लेकिन कोरोना वायरस महामारी से पहले ही इसमें गिरावट शुरू हुई. उदाहरण के लिए पिछले साल अगस्त में कार बिक्री में 32 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई जो दो दशकों में सबसे अधिक थी. सोमवार को आए आंकड़ों में उपभोक्ता ख़र्च, निजी निवेश और आयात बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. व्यापार, होटल और ट्रांसपोर्ट जैसे क्षेत्र में 47 फ़ीसदी की गिरावट आई है. एक समय भारत का सबसे मज़बूत रहा निर्माण उद्योग 39 फ़ीसदी तक सिकुड़ गया है. सिर्फ़ कृषि क्षेत्र से ही अच्छी ख़बर आई है जो मानसून की अच्छी बारिश के कारण 3 फ़ीसदी से 3.4 फ़ीसदी के दर से विकसित हुआ है. 2019 में भारत की जीडीपी 2900 करोड़ की थी जो अमरीका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी. हालांकि, कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था 10 फ़ीसदी छोटी हो जाएगी. भारत की अर्थव्यवस्था कोरोना वायरस की मार से पहले ही कमज़ोर हालत में थी लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लॉकडाउन में मैन्युफ़ैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन जैसे उद्योगों पर बड़ा असर डाला और व्यावसायिक गतिविधियां तकरीबन ठप्प पड़ गईं. आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने इंटरव्यू के दौरान बेहद विश्वास से कहा था कि आरबीआई कमज़ोर आर्थिक स्थिरता या बैंकिंग प्रणाली को महामारी के झटके से बचा सकता है, इसमें अगले स्तर का आर्थिक प्रोत्साहन दिए जाने का अनुमान लगाया गया है.
मित्रों, कई लोग अर्थव्यवस्था की बुरी हालत के लिए सीधे तौर पर भारत सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं जबकि वास्तविकता कुछ और ही है. मोटे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट के दो कारण हैं। पहला कोरोना और दूसरा चीन के साथ चल रहा तनाव। हम सभी जानते हैं कि जब कोरोना महामारी का वैश्विक विस्फोट हुआ तब भारत ने अर्थव्यवस्था पर जनता की प्राणरक्षा को तरजीह दी। देहात में कहावत है जिंदा रहेंगे तो बकरी चराकर भी रह लेंगे। भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं की जो स्थिति है उसमें पूर्ण लॉकडाऊन के सिवा सरकार के पास और कोई विकल्प भी नहीं था। जब कोरोना महामारी नियंत्रण में होगी और सबकुछ खुल जाएगा तो जीडीपी खुद ही दौड़ने लगेगी। दूसरी तरफ चीन पर हमारी अर्थव्यवस्था की निर्भरता के चलते भी जीडीपी पर बुरा असर पड़ा है। चीन हमारी इसी मजबूरी का फायदा उठाकर लद्दाख पर कब्जा करना चाहता है। जो चींजे या कच्चा माल भारत में पहले बनता था अब सस्ता होने के कारण चीन से आ रहा है। भारत को इस पर रोक लगानी होगी भले ही इससे तात्कालिक नुकसान हो। भारत सरकार ऐसा ही कर रही है इसलिए भी हमारी अर्थव्यवस्था दबाव में है। लेकिन यह दबाव या गिरावट तात्कालिक है क्योंकि जब सारी आर्थिक गतिविधियां ही रूक जाएगी तो अर्थव्यवस्था तो गिरेगी ही। फिर जब सबकुछ खुल जाएगा तो जीडीपी भी उडान भरने लगेगी. बस अगली तिमाही का इंतजार करिए.
बुधवार, 26 अगस्त 2020
मौत की ओर बढती कांग्रेस
मित्रों, वर्ष २०१४ का वाकया है. तब कांग्रेस जवाहरलाल नेहरु की १२५ जयंती मना रही थी. तब कांग्रेस बार-बार यह कह रही थी कि कांग्रेस का गौरवपूर्ण इतिहास है. तब मैंने कांग्रेस पार्टी को नसीहत देते हुए लिखा था कि कांग्रेस का इतिहास है इसलिए कांग्रेस अब इतिहास है तब मुझे लगा था कि कांग्रेस मेरी सलाह पर कान देगी और खुद को बदलेगी. लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा हुआ नहीं. यह कांग्रेस का दुर्भाग्य है कि उनके शीर्ष नेताओं का अहंकार उन्हें हम जैसे छोटे पत्रकारों की बातों पर ध्यान देने से रोकता है.
मित्रों, यह बड़े ही प्रसन्नता का विषय है कि पहले कांग्रेस के बारे में जो सवाल हम पत्रकार उठाते थे अब वही सवाल उसके भीतर से भी उठने लगे हैं. कांग्रेस पार्टी के २३ बड़े नेताओं ने कांग्रेस नेतृत्व से नेतृत्व छोड़ने की मांग की है जिससे पार्टी के भीतर वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना हो सके. यह अलग बात है कि उनकी मांग को फ़िलहाल कांग्रेस नेतृत्व ने नकार दिया है लेकिन इस तरह की मांग का उठना भी बड़ी बात है.
मित्रों, आज की कांग्रेस पार्टी है क्या? यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की विडंबना है कि आज कांग्रेस पार्टी नेहरु परिवार की पैतृक या पारिवारिक संपत्ति बनकर रह गई है. उसमें वही होता है जो सोनिया गाँधी और उनके बच्चे चाहते हैं. कोई दूसरा प्रधानमंत्री तो बन सकता है लेकिन पार्टी अध्यक्ष नहीं बन सकता है. १९९९ से लेकर अब तक के २१ सालों में कांग्रेस के बस दो ही अध्यक्ष हुए हैं-माता सोनिया और पुत्र राहुल जबकि इस बीच भाजपा में ९ अध्यक्ष हो चुके हैं. कांग्रेस को देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि हम किसी लोकतान्त्रिक देश में रहते हैं. बल्कि ऐसा लगता है जैसे कांग्रेस पार्टी में राजतन्त्र चल रहा है जहाँ सिर्फ रानी और उसके बेटे-बेटियों को ही पार्टी-अध्यक्ष बनने का अधिकार है और वो भी जन्मसिद्ध. बांकी लोग सिर्फ आदेश बजाने के लिए हैं, गुलामी करने के लिए हैं. सोनिया परिवार ऑंखें मूंदे पार्टी के नेताओं के बीच रेवड़ी बाँट रहा है जिसके हाथ जो लग जाए.
मित्रों, वैसे तो खिलाफत आन्दोलन के समय से ही कांग्रेस पार्टी की नीतियाँ हिन्दू विरोधी रही हैं लेकिन जबसे सोनिया गाँधी एंड फैमिली ने कांग्रेस का राजपाट संभाला है तबसे कांग्रेस पार्टी के हिन्दू विरोधी और देशविरोधी रवैये में लगातार आक्रामकता आई है. जब पार्टी सत्ता में थी तब उसने भगवान राम जो भारत के और भारतियों के ह्रदय में बसते हैं को ही उसने काल्पनिक बता दिया था. इतना ही नहीं पार्टी तब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौता कर रही थी और चंदा प्राप्त कर रही थी. कहना न होगा बदले में भारत की पूरी अर्थव्यवस्था को उसने चीन के हवाले कर दिया. अभी जब भारत का चीन के साथ तनाव चल रहा है तब कांग्रेस पार्टी भारत सरकार और भारतीय सेना के खिलाफ ही शाब्दिक युद्ध छेड़े हुए है. इतना ही नहीं कश्मीर में वो फिर से धारा ३७० लागू करने की मांग कर रही है और ऐसे करते हुए वो भारत की नहीं बल्कि पाकिस्तान की राजनैतिक पार्टी दिख रही है.
मित्रों, इसके बावजूद कुछ पत्रकार और बुद्धिजीवी बन्धु भारत सरकार और नरेन्द्र मोदी जी पर आरोप लगा रहे हैं कि वो कांग्रेस को पूरी तरह से समाप्त कर देना चाहते हैं. कांग्रेस अगर अपनी स्वाभाविक मृत्यु की ओर अग्रसर है तो उसके लिए भाजपा या प्रधानमंत्री कैसे जिम्मेदार हो गए? क्या कांग्रेस को मजबूत करना कांग्रेसियों के बदले भाजपा की जिम्मेदारी है? क्या चुनाव लड़नेवाला कोई उम्मीदवार जनता से यह कहेगा कि मुझे नहीं मेरे निकटतम प्रतिद्वंद्वी को वोट दीजिए और क्या उसका ऐसा करना ठीक होगा? नाच न जाने आँगन टेढ़ा. सारी नीतियाँ बहुसंख्यक विरोधी. कोई सलाह दे तो सुनना भी नहीं है और दोष विपक्षी का हो गया. अभी तो फिर भी ५० सीटें लोकसभा में आ रही हैं ऐसा ही चलता रहा और ऐसे ही चलते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब कांग्रेस बसपा और राजद जैसी पारिवारिक पार्टी की तरह शून्य सीटें प्राप्त करेगी और हमें भी उस दिन का बेसब्री से इंतजार होगा. वैसे मेरा बेटा मुझसे पूछ रहा है कि पापा कांग्रेस मरेगी तो भोज भी होगा क्या.
शनिवार, 8 अगस्त 2020
शम्बूक वध और सीता परित्याग की सत्यता
मित्रों, माता काली के महानतम भक्त रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि सारे ग्रन्थ जूठे और झूठे हैं. सबमें मनमाफिक संशोधन किए गए हैं. अब अगर रामकृष्ण कह रहे हैं तो वो सत्य तो होगा ही. वास्तव में हुआ भी यही है. हम जानते हैं कि पहले ग्रंथों को लिखने की सुविधा नहीं थी. तब पीढ़ी-दर-पीढ़ी ग्रंथों को कंठस्थ किया-कराया जाता था. ऐसे में गलतियों और भिन्नताओं की सम्भावना भी पूरी-पूरी रहती थी. बाद में जब ग्रन्थ लिखे जाने लगे तो इस कारण उनकी कई-कई प्रतियाँ हो गईं और विद्वानों के बीच समस्या उत्पन्न हो गई कि किस प्रति को प्रामाणिक माना जाए. यह अब सर्वमान्य तथ्य है कि पूर्व मध्य काल में भारतीय धर्म और राजनीति के इतिहास के साथ छेड़खानी की गई जिसके परिणामस्वरूप काफी भ्रम फैल गया। यह वही समय था जब उत्तर भारत में बौद्ध और जैन धर्म का बोलबाला था. बौद्धों और जैनों ने क्षत्रियों को चारों वर्णों में सबसे ऊपर कर दिया क्योंकि भगवान बुद्ध और महावीर क्षत्रिय थे जबकि हम जानते हैं कि वर्ण-व्यवस्था में क्षत्रिय ब्राह्मणों के बाद दूसरे स्थान पर आते हैं . जिस बुद्ध का पुनर्जन्म में विश्वास नहीं था उनके पूर्व जन्मों को लेकर जातक कथाओं की झड़ी लगा दी गयी. जो बुद्ध और महावीर मूर्ति पूजा के घोर विरोधी थे उनकी जमकर मूर्ति पूजा होने लगी. इस काल में लगभग सारे हिन्दू ग्रंथों में जमकर छेड़छाड़ की गई. यहाँ हम आपको बता दें कि पहले रामायण 6 कांडों का होता था, उसमें उत्तरकांड नहीं होता था। बौद्धकाल में उसमें राम और सीता के बारे में झूठ लिखकर उत्तरकांड जोड़ दिया गया। उस काल में भी इस कांड पर विद्वानों ने घोर विरोध जताया था, लेकिन कालांतर में उत्तरकांड के चलते साहित्यकारों, कवियों और उपन्यासकारों को लिखने के लिए एक नया मसाला मिल गया और इस तरह राम को धीरे-धीरे बदनाम कर दिया गया। इसी बौद्ध काल में रामायण में शम्बूक-वध प्रकरण जोड़कर राम को न्यायी से अन्यायी राजा बना दिया गया.
मित्रों, आज राम को इन्हीं दो बातों के लिए बदनाम किया जाता है. पहला उन्होंने सीता का परित्याग कर दिया था. और दूसरा उन्होंने शम्बूक नामक शूद्र तपस्वी की हत्या कर दी थी. हद हो गई मिथ्यालाप की. राम ने सीता का परित्याग कर दिया था? इससे पहले यह प्रसंग भी जोड़ दिया गया कि राम ने सीता की अग्नि परीक्षा ली थी. डाल दो किसी स्त्री को आग में. क्या वो जीवित बचेगी? फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि सीता जी जीवित बच गईं? तात्पर्य यह कि पूरा प्रसंग ही असत्य और मनगढ़ंत है. वाल्मीकि रामायण, जो निश्चित रूप से बौद्ध धर्म के अभ्युदय के पूर्व लिखी गई थी, समस्त विकृतियों से अछूती है। इसमें सीता परित्याग, शम्बूक वध, अग्नि परीक्षा आदि कुछ भी नहीं था। यह रामायण युद्धकांड (लंकाकांड) में समाप्त होकर केवल 6 कांडों का था। इसमें उत्तरकांड बाद में जोड़ा गया। शोधकर्ता कहते हैं कि हमारे इतिहास की यह सबसे बड़ी भूल थी कि बौद्धकाल में उत्तरकांड लिखा गया और इसे वाल्मीकि रामायण का हिस्सा बना दिया गया। हो सकता है कि यह उस काल की सामाजिक मजबूरियां रही हों लेकिन सच को इस तरह बिगाड़ना कहां तक उचित है? सीता ने न तो अग्निपरीक्षा दी और न ही पुरुषोत्तम राम ने उनका कभी परित्याग किया।
मित्रों, सवाल उठता है कि जिस सीता के बिना राम एक पल भी रह नहीं सकते और जिसके लिए उन्होंने विश्व के सबसे शक्तिशाली राजा से युद्ध लड़ा उसे वे किसी व्यक्ति और समाज के कहने पर छोड़ सकते हैं? राम को महान आदर्श चरित और भगवान माना जाता है। वे किसी ऐसे समाज के लिए सीता को कभी नहीं छोड़ सकते, जो दकियानूसी सोच में जी रहा हो? इसके लिए उन्हें फिर से राजपाट छोड़कर वन में जाना होता तो वे चले जाते। शोधकर्ता मानते हैं कि रामायण का उत्तरकांड कभी वाल्मीकिजी ने लिखा ही नहीं जिसमें सीता परित्याग की बात कही गई है। रामकथा पर सबसे प्रामाणिक शोध करने वाले फादर कामिल बुल्के का स्पष्ट मत है कि 'वाल्मीकि रामायण का 'उत्तरकांड' मूल रामायण के बहुत बाद की पूर्णत: प्रक्षिप्त रचना है।' (रामकथा उत्पत्ति विकास- हिन्दी परिषद, हिन्दी विभाग प्रयाग विश्वविद्यालय, प्रथम संस्करण 1950) लेखक के शोधानुसार 'वाल्मीकि रामायण' ही राम पर लिखा गया पहला ग्रंथ है, जो निश्चित रूप से बौद्ध धर्म के अभ्युदय के पूर्व लिखा गया था अत: यह समस्त विकृतियों से अछूता था। यह रामायण युद्धकांड के बाद समाप्त हो जाती है। इसमें केवल 6 ही कांड थे, लेकिन बाद में मूल रामायण के साथ बौद्ध काल में छेड़खानी की गई और कई श्लोकों के पाठों में भेद किया गया और बाद में रामायण को नए स्वरूप में उत्तरकांड को जोड़कर प्रस्तुत किया गया। बौद्ध और जैन धर्म के अभ्युदय काल में नए धर्मों की प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता को प्रतिपादित करने के लिए हिन्दुओं के कई धर्मग्रंथों के साथ इसी तरह का हेर-फेर किया गया। इसी के चलते रामायण में भी कई विसंगतियां जोड़ दी गईं। बाद में इन विसंगतियों का ही अनुसरण किया गया। कालिदास, भवभूति जैसे कवि सहित अनेक भाषाओं के रचनाकारों सहित 'रामचरित मानस' के रचयिता ने भी भ्रमित होकर उत्तरकांड को लव-कुश कांड के नाम से लिखा। इस तरह राम की बदनामी का विस्तार हुआ।
मित्रों, हिन्दू धर्म के आलोचक खासकर 'राम' की जरूर आलोचना करते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि 'राम' हिन्दू धर्म का सबसे मजबूत आधार स्तंभ है। इस स्तंभ को गिरा दिया गया तो हिन्दुओं को धर्मांतरित करना और आसान हो जाएगा। इसी नीति के चलते तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों के साथ मिलकर वे राम के विरुद्ध असत्य का अभियान चलाते रहते हैं. अब हम बात करेंगे शम्बूक प्रकरण की. यह सर्वविदित है कि चौदह वर्षों के वनवास में अंतिम दो सालों को छोड़कर राम के बारह वर्ष आदिवासियों और दलितों के बीच बीते। शुरुआत होती है बालसखा व विद्यालय के मित्र रहे निषादराज गुह से मिलन से. फिर केवट प्रसंग आता है। इसके बाद चित्रकूट में रहकर उन्होंने धर्म और कर्म की शिक्षा ली। यहीं पर वाल्मीकि आश्रम और मांडव्य आश्रम था। चित्रकूट के पास ही सतना में अत्रि ऋषि का आश्रम था। इनमें से वाल्मीकि के बारे में माना जाता है कि वे मुसहर जाति से थे. राम उनके चरण-स्पर्श करते हैं और उनसे आशीर्वाद लेते हैं. बाद में वही वाल्मीकि रामायण की रचना करते हैं.
मित्रों, फिर सीता-हरण के बाद उनकी शबरी से भेंट होती है जो भील जाति की है. राम शबरी की जूठन भी बड़े ही प्रेम से खाते हैं. राम ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने धार्मिक आधार पर संपूर्ण अखंड भारत के दलित और आदिवासियों को मुख्यधारा में ला दिया था। इस संपूर्ण क्षेत्र के आदिवासियों में जहाँ राम ने अपना वनवास बिताया था, आज भी राम और हनुमान को सबसे ज्यादा पूजनीय माना जाता है। लेकिन अंग्रेज काल में ईसाइयों ने भारत के इसी हिस्से में धर्मांतरण का कुचक्र चलाया और राम को दलितों-आदिवासियों से काटने के लिए सभी तरह की साजिश की, जो आज भी जारी है।
मित्रों, इसी प्रकार तुलसीदासजी ने रामचरित मानस में समुद्र के मुख से कहलवाया है कि- 'ढोल गवार शुद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी।' ऐसा श्रीराम ने अपने मुंह से कभी नहीं कहा। हो सकता है आज कोई लेखक अपनी किसी रचना में ऐसा राम से ही कहलवा दे. तुलसीदास द्वारा लिखे गए इस एक वाक्य के कारण राम की बहुत बदनामी हुई। कोई यह नहीं सोचता कि जब कोई लेखक अपने तरीके से रामायण लिखता है तो उस समय उस पर उस काल की परिस्थिति और अपने विचार ही हावी रहते हैं। फिर ऐसा समुद्र ने विनय भाव से कहा है. ठीक वैसे ही जैसे तुलसी अपने बारे में विनय भाव से कहते है-मो सम कौन कुटिल, खल, कामी? तो क्या तुलसी सचमुच महापतित थे या हो गए?
मित्रों, अब आप ही बताईये कि जो राम वनवास के चौदह में से बारह सालों तक दलितों-आदिवासियों के मध्य रहे और उनकी रक्षा की, जिस राम ने वाल्मीकि के चरण-रज माथे से लगाकर आशीर्वाद लिया, जिस राम ने शबरी के जूठन को भी निज माता का प्रसाद समझकर ग्रहण किया वही राम एक निर्दोष व्यक्ति को सिर्फ इसलिए मार डालेगे कि वो वेद पाठ कर रहा है जबकि वेदों की रचना में भी अनगिनत शूद्रों ने अपना योगदान दिया है. अथर्ववेद के रचनाकार महर्षि अथर्वा कौन थे? शूद्र ही तो थे. हद हो गई झूठ बोलने की और राम को बदनाम करने की.
मित्रों, इसी प्रकार एक राम विरोधी कन्नड़ गायक तम्बूरी दासय्या जो कथा गाते हैं उसमें सीता को रावण की बेटी बताया गया है. हंसिये मत और हंसी को बचाकर रखिए. इस कथा में रावण जोर से छींकता है और उसकी छींक से सीताजी का जन्म होता है. इन्होने तो नया मेडिकल साईंस ही रच दिया. छींकने से बच्चा पैदा हो गया और वो भी एक पुरुष के. आगे से आप भी जब भी छींकें तो सचेत रहें. खासकर पुरुष. इसी प्रकार अगर कोई भर्ता को भ्राता पढ़-सुन ले और यह कहना शुरू कर दे कि राम और सीता तो भाई-बहन थे तो इसमें रामायणकार का क्या दोष?
मित्रों, अंत में मैं यह बताना चाहूँगा कि इतिहास की घटनाओं की सत्यता को प्रमाणित करना लगभग असंभव होता है. क्या हम जानते हैं कि सुभाष बाबू विमान-दुर्घटना में मरे थे या बच गए थे? क्या कोई बता सकता है कि शास्त्री जी की मृत्यु का क्या कारण था? इन घटनाओं की छोडिये इसी साल १४ जून को सुशांत सिंह राजपूत की मौत कैसे हुई क्या कोई बता सकता है? करनेवाले इतिहासकार भारत के बंटवारे की भी मनमानी व्याख्या कर रहे हैं और कह रहे हैं कि हिन्दुओं ने भारत का बंटवारा करवाया। मुसलमानों ने नहीं हिन्दुओं ने अलग देश की मांग की थी. हद हो गई उल्टा इतिहास लिखा जा रहा है. विकीपीडिया कहता है कि २०२० के दिल्ली के दंगे हिन्दुओं की सोंची-समझी रणनीति के तहत हुए. ताहिर हुसैन दंगाई नहीं है पीड़ित है. शिक्षाविद मधु किश्वर विकिपीडिया पर अपनी जीवनी को बदलना चाहती हैं क्योंकि उनके बारे गलत-सलत लिखा हुआ है लेकिन बदल नहीं सकती क्योंकि विकिपीडिया को प्रमाण चाहिए। ये तो वही बात हो गई कि डॉक्टर ने मरीज को मरा हुआ बता दिया. मरीज उठ बैठा और चिल्लाया कि वो जीवित है. तब उसकी पत्नी ने उसे डांट लगाई चुप रहो तुम डॉक्टर से ज्यादा जानते हो क्या? अब आप ही बताईइ किसका सच सच है? पूर्णिमा जी का या विकिपीडिया का? पालघर की अफवाह सही थी या संत सही थे? कल कोई विकिपीडिया पर लिख दे कि बगदादी जैनी था इसलिए अहिंसा का पुजारी था, ओसामा बिन लादेन कृष्ण भगवान का भक्त और परम भगवत था जिसने गौ रक्षा के लिए हथियार उठाया था तो करोड़ों साल बाद लोग कदाचित इसे ही सच मानेंगे.
मित्रों, कहने का मतलब यह कि राम ने सीता परित्याग और शम्बूक-हत्या (मैं
इसे हत्या ही नहीं जघन्य हत्या मानता हूँ बशर्ते यह सत्य हो) सत्य है या
नहीं इसका पता लगाना आज सम्भव नहीं है क्योंकि राम को हुए करोड़ों साल हो
चुके हैं. ऐसे में एक ही रास्ता हमारे समक्ष बचता है कि जो-जो कर्म राम के
स्वाभाव से मेल नहीं खाते उनको असत्य और चरित्र-हनन का निंदनीय प्रयास मान
लिया जाए.











