मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

संघ की घोषणा स्वागत योग्य

कथित धर्मनिरपेक्षवादियों के बीच राष्ट्र विरोधी संगठन के रूप में बदनाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अब मुंबई में उत्तर भारतीयों की रक्षा का बीड़ा उठाया है.अभी तक कांग्रेस सहित सभी धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देनेवाले दल रहस्यमय तरीके से चुप्पी साधे हुए थे.ऐसे में संघ की घोषणा का हम सभी राष्ट्रवादियों की तरफ से स्वागत किया जाना चाहिए.इससे निश्चित रूप से शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का मनोबल गिरेगा और वे अपनी करनी से बाज आयेगे.संघ अखिल भारतीय संगठन है और महाराष्ट्र तो इसका केंद्र ही है.इसलिए हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि अब महाराष्ट्र में पिछले कुछ समय से चल रहे सारे उपद्रव और उत्पात शांत हो जायेंगे.चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जो भी इतिहास रहा हो वो देश की एकता और अखंडता की कट्टर समर्थक है. उसने अपने इस कदम द्वारा यह साबित भी कर दिया है.संघ प्रमुख के बयान देने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री ने मरता क्या न करता की तर्ज पर कहा कि भारतीय संविधान किसी भी भारतीय को कहीं भी बसने और काम करने की स्वतंत्रता देता है और केंद्र सरकार इसे सुनिश्चित करेगी.क्या पिछले दो सालों  से भारत  का संविधान लागू नहीं था या फ़िर मंत्रीजी की नैतिकता घास चरने चली गई थी .अब जब  उन्हें लगा कि संघ कहीं वाक ओवर न ले ले तब उन्हें संविधान और अपने कर्त्तव्य की याद आ गई!

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

एनजीओ का गोरखधंधा

कभी संत विनोबा भावे ने किसी एनजीओ के कामकाज से खुश होकर कहा था कि अब सरकारी तंत्र में असर नहीं रहा अगर कहीं असर है तो असरकारी संगठनों में.लेकिन मैंने वर्तमान में बिहार में संचालित कई एनजीओ के कामकाज को गहराई से देखने के बाद पाया कि यहाँ तो सबकुछ गड़बड़ घोटाला है.आजकल कई सारे काम जो पहले बिहार सरकार खुद करती थी उसने एनजीओ के हवाले कर दिया है.कई पूंजीपति रूपयों की थैली लेकर घूम रहे हैं और संपर्क कर रहे हैं एनजीओ संचालकों से.मतलब किसी की पूँजी किसी का नाम.एनजीओ संचालक कुल कार्य पूँजी का ३ प्रतिशत तक पाकर भी खुश.हर्रे लगे न फिटकिरी रंग भी चोखा होए.जहाँ तक इस मामले में सरकारी भ्रष्टाचार का प्रश्न है तो तंत्र कुल रकम का लगभग ४५ से ५५ प्रतिशत तक गटक जा रहा है.एनजीओ के बैनर तले चाहे एनजीओ खुद काम करे या किसी और को काम करने की अनुमति दे वे खर्च करते हैं लगभग २५ प्रतिशत और इस तरह बचत है लगभग २० प्रतिशत तक.अब अगर १ रूपया में से सिर्फ २५ पैसा ही कार्य स्थल पर खर्च हो तो विकास कितना होगा यह कोई भी समझ सकता है?कहने का तात्पर्य यह कि सरकारी तंत्र जब तक भ्रष्ट रहेगा असरकारी संगठनों के कामकाज में असर नहीं आनेवाला चाहे सरकार कोई भी इंतजाम क्यों न कर ले.कोई भी एनजीओ वाला घूस देना नहीं चाहता लेकिन बिना दिए काम ही न चले तो कोई करे भी तो क्या करे?आखिर एनजीओ की तरफ से गतिविधि भी तो चलनी चाहिए.

शनिवार, 30 जनवरी 2010

क्या मैं आपकी सहायता कर सकता हूँ?

बिहार के कई जिलों में इन दिनों आम जनता को एक दिन का दारोगा बनाने की बिहार पुलिस ने मुहिम चला रखी है.उद्देश्य है पुलिस को पीपुल फ्रेंडली बनाना.क्या वास्तव में बिहार पुलिस पीपुल फ्रेंडली बनाने की दिशा में अग्रसर है?कल मैं जब हाजीपुर शहर में था मैंने पुलिस का जो रूप देखा उससे तो ऐसा नहीं लगता.पहली घटना तब की है जब मैं गांधी चौक पर स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के ए.टी.एम. में पैसा निकालने के लिए पंक्ति में खड़ा था.चूंकि मशीन में बिहार बंद के चलते पैसा डालना संभव नहीं हो सका था इसलिए मशीन १०० रूपये का नोट दे रही थी और पैसा निकालने में काफी समय लग रहा था.सामने आधी सड़क निर्माणाधीन होने के चलते जाम लग रहा था.तभी एक पुलिस के जवान आया और जाम समाप्त करने की कोशिश करने लगा लेकिन अपने तरीके से.साईकिल और रिक्शावालों पर डंडा चलाकर और कार-मोटरसाइकिल वालों से अनुनय-विनय करते हुए.उसका व्यवहार इतना भद्दा था कि मैं खुद भी उसे डांटे बिना रह न सका.वह बूढ़े रिक्शावालों को भी धड़ल्ले से गालियाँ दे रहा था और पहिये से हवा निकाल दे रहा था.खैर मैंने पैसा निकाला और आगे बढ़ गया.करीब दो घन्टे बाद जब मैं गुदरी बाजार से एम. चौक की ओर जा रहा था.अब आप कहेंगे कि किसी चौक का नाम शॉर्ट फॉर्म में क्यों.तो आपको बता दूं कि मस्जिद के ठीक सामने हनुमानजी का मंदिर है.इसलिए मुसलमान इसे मस्जिद चौक और हिन्दू महावीर चौक कहते हैं और इस तरह एक अघोषित समझौते के तहत इसका नाम एम. चौक हो गया है.तो मैं जब एम. चौक के पास था तो वहां जलापूर्ति विभाग की कृपा से सड़क पर पानी लगा हुआ था.जब मैं जलजमाव क्षेत्र के मध्य में था तभी नगर थाने की एक गाड़ी विपरीत दिशा से आती दिखाई पड़ी.इससे पहले भी कई बोलेरो आदि निजी वाहन गुजर चुके थे लेकिन इस ख्याल से कि हम जैसे निरीह पैदलयात्रियों को कीचड़ के छीटे नहीं पड़े ड्राइवरों ने गति धीमी कर दी थी.लेकिन जब पुलिस की गाड़ी गुजरी तो गति घटने के बजाये तेज हो गई.परिणामस्वरूप मेरे कपड़े कीचड़ से सन गए.मैं चिल्लाया भी कि पागल हो गए हो क्या? लेकिन गति कम नहीं हुई.फलस्वरूप अन्य कई पैदलयात्रियों को भी बिन मौसम की होली को अपने कपड़ों पर झेलना पड़ा.भारत के हर पुलिस थाने और चौकी में लिखा रहता है कि क्या मैं आपकी सहायता कर सकता हूँ?क्या यह तरीका होता है सहायता करने का?बिहार में जनता दरबारों में जितने मामले पुलिस के खिलाफ आते हैं सिर्फ उन सब पर सख्ती से कार्रवाई कर दी जाए तो पुलिस काफी हद तक पीपुल फ्रेंडली हो जाएगी.इस तरह जनता को एक दिन का दरोगा बनाने से कुछ नहीं होनेवाला.भय बिनु होहिं न प्रीति.

बुधवार, 27 जनवरी 2010

गीदड़ का शासन बेहतर!


लोकतंत्र निस्संदेह वर्तमान काल की सबसे अच्छी शासन प्रणाली है.लेकिन यह पूरी तरह निर्दोष हो ऐसा भी नहीं है.कम-से-कम भारतीय लोकतंत्र में समय-समय पर कई बुराइयाँ देखने में आई हैं और समय बीतने के साथ मुखर होती चली गई हैं.सबसे बड़ी समस्या जो पिछले दिनों ज्यादा परेशान करने लगी है वो है शासन का गैर जिम्मेदाराना व्यवहार और अयोग्य लोगों का मंत्रिमंडल में आ जाना.हमारे यहाँ सबसे ज्यादा मत पानेवाले को विजयी घोषित कर दिया जाता है.कभी-कभी तो १० प्रतिशत या इससे भी कम मत पाकर भी लोग चुनाव जीत जाते हैं.सबसे ज्यादा परेशानी तो तब आती है जब विधान सभा या लोकसभा में किसी भी एक दल को बहुमत प्राप्त नहीं हो.तब शुरू होता है मोलभाव का सिलसिला.सत्ता-प्राप्ति के लिए अयोग्य और भ्रष्ट लोगों से भी हाथ मिला लिया जाता है.इस तरह मोलभाव के बाद जो लोग मंत्री बनते हैं उनमें जिम्मेदारी का भाव बिलकुल भी नहीं होता.वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल को ही लें जिसके कई मंत्री अपनी जिम्मेदारी से भागते देखे जा सकते हैं.महंगाई मंत्री शरद पवार कह रहे हैं कि महंगाई के लिए सिर्फ वही जिम्मेदार नहीं हैं वहीं एक और मंत्री कृष्णा तीरथ एक गंभीर गलती होने के बाद कह रही हैं कि ऐसा तो आडवाणी के समय भी हुआ था.अरे बहनजी आडवाणीजी के समय जो हुआ वह अब इतिहास का विषय है और आपने उससे कोई सीख नहीं ली यह शर्म का विषय है.उस काल खंड से आप क्यों तुलना कर रही हैं!जब मंत्रियों में जिम्मेदारी का भाव ही नहीं रहेगा तब फ़िर अच्छा शासन कैसे देखने को मिलेगा.यहीं कारण है कि विदेश नीति से लेकर अर्थ नीति तक प्रत्येक मोर्चे पर सरकार विफल है और देश में अराजकता का माहौल उत्पन्न हो रहा है.हमने सामान्य ज्ञान की किताबों में पढ़ा था कि मध्यकाल में १२ साल तक भारत के ही किसी राज्य में एक गीदड़ ने शासन किया था.शायद उसका शासन भी वर्तमान शासन से बेहतर रहा होगा.

आधे मन से उठाया गया अधूरा कदम


महंगाई ने भले ही आम भारतीयों का जीना मुहाल कर दिया हो केंद्र सरकार के लिए यह सियासत से ज्यादा कुछ भी नहीं है.तभी तो वो इससे निपटने के लिए मूर्खतापूर्ण कदम उठा रही है जिसका निष्फल होना पहले से ही तय है.केंद्र सरकार ने अजीबोगरीब कदम उठाते हुए जनवरी और फरवरी महीने में भारत के प्रत्येक कार्डधारी को जन वितरण प्रणाली के माध्यम से १० किलोग्राम अनाज देने का निर्णय लिया है.इस योजना के द्वारा गेहूं १०.८० रूपये प्रति किलो और चावल १५.३७ रूपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराया जायेगा.अन्त्योदय और बीपीएल परिवारों को भी इसी दर पर अनाज उन्हें प्रत्येक महीने मिलनेवाले अनाज के अतिरिक्त दिया जायेगा.मनमोहन सिंहजी जिन गरीबों को पहले से २-३ रूपये किलो गेहूं-चावल मिल रहा हो वे क्यों इतने ऊंचे दामों पर अनाज उठाएंगे?दूसरी बात जो भी गेहूं उत्पादक क्षेत्र हैं वहां यह इससे भी कम मूल्य पर मंडी में यूं ही मिल रहा है, फ़िर क्यों उन इलाकों में रहनेवाले लोग यह अनाज लेने को तैयार होंगे?ठीक यही बात चावल उत्पादक इलाकों के लोगों के साथ भी लागू होती है.प्रधानमंत्रीजी यह योजना तो पहले से ही असफल है और इस योजना का ज्यादातर अनाज कालाबाजार में पहुँच जानेवाला है.प्रधानमंत्रीजी आप और आपके सहयोगी या तो मूर्ख हैं या फ़िर अपने को बहुत चालाक और जनता को महामूर्ख समझते हैं.

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

नीरो की बंशी और मनमोहन सरकार



किताबों में लिखा है कि जब रोम जल रहा था तब नीरो चैन की बंशी बजा रहा था.नीरो बंशी बजाना जानता था इसलिए बंशी बजाता था अब हमारे प्रधानमंत्री तो बंशी बजाना जानते नहीं इसलिए जब भारत के गरीब महंगाई की आग में जल रहे हैं तब वे ऊँघने और सोने में लगे हैं.कुछ मिनट की फ़ुरसत मिली नहीं कि लगे ऊँघने और सोने.कहा तो यह भी जाता है कि घोड़ा बेचने के बाद गहरी  नींद  आती  है .लेकिन  मनमोहन  जी  का  तो  दूर-दूर  तक  घोड़ों  से  कुछ  भी  लेना  देना  नहीं  है .कल  जब  विपक्षी  दल  भाजपा  के  नेताओं  ने  उन्हें  जगाया  तो  वे  बोले  यार  हमें  भी  मालूम  है  कि  देश  में  महंगाई  बढ़  रही  है  और शाम होते-होते एक सरकारी कमेटी बनाने की घोषणा  भी कर दी गई जो महंगाई से निपटने में सरकार की सहायता करेगी. इस सरकार की सबसे बड़ी विशेषता भी तो यही है कि ये कमेटी बहुत जल्दी बनाती है और फ़िर सारी जिम्मेदारी उसके हवाले करके प्रधानमंत्रीजी निद्रालीन हो जाते हैं.इसी सरकार में एक मंत्री हैं शरद पवार.उनकी ही जिम्मेदारी है महंगाई पर नियंत्रण रखने की.लेकिन वे अपनी इस जिम्मेदारी को भूलकर भविष्यवाणियाँ करने में लगे हैं.और उनकी भविष्यवाणी हमेशा किसी खाद्य वस्तु के दाम बढ़ने के बारे में होती है.लेकिन जब उनसे पूछा जाता  है कि दाम घटेंगे कब तब वे कहते हैं मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूँ जो बता दूं.सरकार चाहे तो मौद्रिक उपाय भी कर सकती है.लेकिन उसे ऐसा करने से उद्योगपति-पूंजीपति रोक रहे हैं.इससे ऋणों पर ब्याज दर जो बढ़ जाएगी और उनके लिए व्यापार करना ज्यादा महंगा हो जायेगा.सरकार जब कुछ कर ही नहीं सकती सिवाय कमेटी बनाने के तो कह दे कि हे जनता-जनार्दन यह रोग मेरे बस का नहीं है आपही इससे निपटिये.प्रधानमंत्री जी का यह भी दावा है कि किसानों को ज्यादा अच्छा मूल्य मिलने के कारण दाम बढ़ रहे हैं.कितना बड़ा झूठ है ये!असली लाभ तो बिचौलिए ले जाते है.हरी मिर्च जो हमारे हाजीपुर में २० रूपये किलो बिकती है किसानों को आढ़ती इसके बदले सिर्फ सात रूपये किलो का दाम देते हैं.हरी मिर्च का दाम किसने बढाया किसानों ने या इन बिचौलियों ने?कल फ़िर महंगाई विभाग के मंत्री ने अपना छोटा मुंह खोला और बड़ी बात कही कि चूंकि उत्तर भारत में दूध का उत्पादन कम हो गया है इसलिए उसका दाम बढ़ाने के लिए सरकार पर दबाव पड़ रहा है. ठण्ड में मवेशी दूध देना कम कर देते हैं, यह जानी हुई बात है.माना कि सरकार पर दबाव है दाम बढ़ाने का. क्या उस पर दाम घटाने का दबाव नहीं है?क्यों वह मुट्ठीभर पूंजीपतियों के हित में ब्याज दर बढा नहीं रही है?ऐसा नहीं कि गरीबों के बारे में यह मनमोहिनी-जनमोहिनी सरकार नहीं सोंचती है.उसने नरेगा योजना चलाई है लेकिन इसके अन्तर्गत काम हो रहा है कि नहीं देखना किसकी जिम्मेदारी है.गरीबी हटाने की योजनायें पैसे के अभाव में फेल नहीं होती, वो फेल होती है निगरानी के अभाव में.अगर ऐसा नहीं होता तो आज आजादी के इतने वर्षों बाद भी भारत में इतनी गरीबी नहीं होती.तेंदुलकर कमेटी की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत की ७७ % आबादी २० रूपये प्रतिदिन से भी कम में गुजारा कर रही  है.पिछले डेढ़ साल में  जिस रफ़्तार में महंगाई बढ़ी है उसने इस ७७ % जनसंख्या की थाली में जीने लायक भोजन भी नहीं छोड़ी है.उदाहरण के लिए दिल्ली में  पिछले साल जनवरी में जो टमाटर १० रूपये किलो था इस साल २० से भी ऊपर है.एक साल में दोगुना.चीनी सहित अन्य सभी खाद्य पदार्थों के दाम भी इसी रफ़्तार से बढे हैं.जब मानसून सामान्य नहीं रहा तभी चीनी सहित सभी खाद्य पदार्थों का आयात कर लेना चाहिए था.लापरवाही की हद तक देरी क्यों की गई?पिछले दो सालों में ४८ लाख टन चीनी के सस्ते दामों पर निर्यात की अनुमति सरकार ने क्यों दी जबकि गन्ने और खाद्यान्नों-दलहनों-तिलहनों की उपज में कमी आने की पूरी आशंका थी? मैं जानता हूँ कि पवार और मनमोहन के पास इन प्रश्नों का कोई जवाब नहीं है.लेकिन कथित रूप से आम आदमी की इस सरकार को पॉँच साल बाद आम आदमी के पास जाना भी पड़ेगा और तब इन सवालों के जवाब देने ही होंगे. तब वह इन प्रश्नों से भाग नहीं पायेगी.


बुधवार, 20 जनवरी 2010

महाराष्ट्र सरकार का देशविरोधी कदम


देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि कांग्रेस ने देश को आजाद कराया.इसके पीछे कांग्रेस पार्टी का क्या उद्देश्य था?आजादी या सत्ता प्राप्ति.वर्तमान काल में उसकी सरकारें जो करती हुई दिखाई देती हैं उससे तो लगता है कि तब के कांग्रेस नेताओं का चाहे जो भी उद्देश्य रहा हो अब के कांग्रेसियों का एकमात्र उद्देश्य कुर्सी प्राप्त करना और उसे बरक़रार रखना है चाहे देश टूट ही क्यों न जाए.उस महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार ने जहाँ की मिट्टी ने देश को तिलक जैसा राष्ट्रवादी दिया आज देश को तोड़ने वाला घातक कदम उठाया है.उसने फैसला लिया है कि महाराष्ट्र की राजनीतिक और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में अब उसी टैक्सी ड्राईवर को गाड़ी चलाने का परमिट दिया जायेगा जो १५ साल से महाराष्ट्र में रह रहा हो.इतना ही नहीं अब उसे ही परमिट दिया जायेगा जो मराठी लिखना और पढना जानता हो.मुंबई में हर साल लगभग ४००० नए परमिट जारी किये जाते हैं.महाराष्ट्र सरकार चाहे जो भी दलील दे उसने हिंदीभाषियों के प्रति दुर्भावना के कारण ही ऐसा कदम उठाया है.यह बात किसी से छिपी नहीं है कि मुंबई के अधिकांश टैक्सी ड्राईवर गैर मराठी यानी हिंदीभाषी हैं.ये वे लोग हैं जिनके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता और मजबूरी में जीवन रक्षा के लिए अपने घर को छोड़कर दूसरे राज्यों का रूख करते हैं.वे कोई शौक से मुंबई नहीं जाते हैं और न ही इतना पैसा कमाते हैं जिससे मराठियों के जीवन और जीवन स्तर पर खतरा उत्पन्न हो जाए.वैसे भी उसके द्वारा उठाया गया यह कदम भारतीय संविधान के अनुच्छेद १६ (२), १९ (d), (e) और (f) का खुला उल्लंघन तो है ही उच्चतम न्यायालय द्वारा गोलकनाथ-केशवानंद भारती एवं दूसरे मामलों में दिया गए संविधान के मौलिक ढांचें में बदलाव पर लगाये रोक सम्बन्धी निर्णय का भी उल्लंघन है.भारतीय संविधान भारत के प्रत्येक नागरिक को उपरलिखित अनुच्छेदों के द्वारा भारत में कहीं भी जाने, रहने-बसने और नौकरी-व्यवसाय करने का मौलिक अधिकार देता है. अब अगर केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार में थोड़ी सी भी नैतिकता बची है तो महाराष्ट्र की अपनी ही पार्टी की सरकार को यह आदेश वापस लेने को बाध्य करे.अगर राज्य सरकार न माने तो धारा ३५५ और ३५६ का प्रयोग कर राष्ट्रपति शासन लगाये.वैसे भी प्रधानमंत्री सहित पूरे मंत्रिमंडल राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुरक्षित रखने की शपथ भी पदभार ग्रहण करते समय दिलाई जाती है.देश बचेगा तभी हम बचेंगे और देश तभी बचेगा जब एक रहेगा.पहले भी जब भारत बँटा हुआ था तब हमलावरों के लिए सबसे आसान और असहाय लक्ष्य था और सैंकड़ों साल तक गुलाम भी रहा.वर्तमान घटनाक्रम को देखते हुए सबसे अच्छा होता कि मुंबई को केंद्रशासित प्रदेश बना दिया जाता और महाराष्ट्र की राजधानी किसी और शहर में स्थानांतरित कर दी जाती.

विकास यात्रा या पर्यटन


लोकतंत्र की जन्मभूमि वैशाली में चार दिन बिताकर बिहार के मुख्यमंत्री वापस पाटलिपुत्र चले गए और फ़िर से सबकुछ पहले जैसा हो गया.ठीक उसी तरह जैसे पानी में ढेला फेंकने पर उत्पन्न विक्षोभ थोड़ी देर में ही शांत हो जाया करते हैं.इस बीच उन्होंने वाल्मीकि रामायण में श्वेतपुर नाम से उल्लेखित चेचर के ऐतिहासिक मंदिर में पूजा-अर्चना की, बरेला चौर में (जिसे वे लोग झील भी कह लेते हैं जिन्हें यह मालूम नहीं है कि कमोबेश पूरा उत्तर बिहार ही कुछ महीने के लिए झील बन जाता है.) नौका विहार किया और जाने से पहले अनुशासित होकर पंक्तिबद्ध होकर विकास की राह में उपेक्षित, ठगी-सी खड़ी जनता-जनार्दन की समस्याओं को सुना वो भी अपने तरीके से यानि जनता दरबार लगाकर.अब वैशाली की जनता की कितनी समस्याओं को नीतीश दूर कर पाते हैं यह तो उनकी गंभीरता पर निर्भर करता है.अगर नेताओं के सिर्फ दौरा-यात्रा करने से विकास हो जाता तो बिहार की सड़कें कोलतार और सीमेंट की नहीं बल्कि चांदी की होती.पिछले साल बिहार की जिन-जिन जगहों पर नीतीशजी का विकास दौरा हुआ था और एक साथ दर्जनों शिलान्यास किये गए थे कहीं भी काम शुरू तक नहीं हुआ है न ही जनता दरबार में उठी किसी समस्या को ही दूर किया जा सका है.अगर वैशाली के साथ भी ऐसा ही हुआ है जिसकी पूरी सम्भावना भी है तब जनता की गाढ़ी कमाई में से करोड़ों रूपये विकास यात्रा के नाम पर बर्बाद करने के लिए जनता उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगी और जनता अगर उनके झांसे में आ भी जाए तो इतिहास तो उन्हें माफ़ नहीं ही करेगा.वैसे भी राजनीति की दुनिया में कथनी और करनी के बीच का सम्बन्ध कभी का टूट चुका है.

रविवार, 17 जनवरी 2010

नीतीश सरकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता


बिहार में इन दिनों रामराज्य है.यह कहना है बिहार की मीडिया का.भले ही नीतीश कुमार पर हत्या के मामले में सम्मन जारी हो या फ़िर दवा घोटाले में मुकदमा दर्ज कराया जाए क्या मजाल कि बिहार से प्रकाशित किसी भी प्रमुख समाचार पत्र में इस बारे में एक भी पंक्ति छप जाए.ऐसा नहीं है कि यहाँ के सभी पत्रकारों को सरकार ने खरीद लिया हो.कुव्यवस्था सम्बन्धी समाचार वे बराबर भेजते हैं.हाँ यह अलग बात है कि उन्हें छापा नहीं जाता.संविधान के अनुच्छेद १९ क के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है.प्रेस की स्वतंत्रता भी इसी में निहित है.संविधान के अनुसार भले ही प्रेस स्वतंत्र हो बिहार में वह हरगिज स्वतंत्र नहीं है.इसके लिए नीतीश सरकार की नीतियां तो जिम्मेदार है ही कहीं-न-कहीं प्रेस संस्था भी जिम्मेदार हैं.बिहार सरकार ने अपने पास अनियंत्रित अधिकार रखें हैं कि वह जब चाहे तब किसी भी मीडिया संस्थान का विज्ञापन बिना कारण बताये रोक सकती है.इस तथ्य से सभी वाकिफ हैं कि अखबारों की आमदनी में मुख्य हिस्सा सरकारी विज्ञापन का ही होता है.ऐसे में कोई भी अख़बार तब तक सरकार के खिलाफ समाचार छापने का दुस्साहस नहीं कर सकता जब तक उसमें आर्थिक हानि उठाने का साहस न हो.वैसे भी अख़बार अब मिशन की जगह प्रोफेशन बन चुके हैं यानी धंधा मात्र.ऊपर से नीतीश सरकार उन्हें फांसने के लिए दोनों हाथों से जनता का धन विज्ञापन में लुटा रही है.उदाहरण के लिए सरकार के चार साल पूरा होने के अवसर पर बिहार के सबसे बड़े अख़बार हिंदुस्तान में १० पृष्ठों का सरकारी विज्ञापन प्रकाशित किया गया.दैनिक जागरण के पटना संस्करण को 9 पृष्ठों और दिल्ली संस्करण को ८ पृष्ठों का विज्ञापन प्राप्त हुआ.राष्ट्रीय सहारा भी इस मौके पर खासे लाभ में रहा और उसे पांच फुल और तीन हाफ पृष्ठों का विज्ञापन मिला.इतना ही नहीं बिहार से प्रकाशित होने वाले प्रमुख अंग्रेजी अख़बारों को भी डेढ़-डेढ़ पेज का विज्ञापन दिया गया.और इस प्रकार बिहार सरकार ने जनता का करोड़ों रूपया अपना चेहरा चमकाने में बर्बाद कर दिया.यह दास्ताँ है उस कालखंड की जब मीडिया सरकारी बीन पर नाच रही होती है.लेकिन जब-जब मीडिया ने सरकार के खिलाफ कुछ भी लिखने की जुर्रत की है तब-तब उसका विज्ञापन रोक दिया गया है.उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के बटाईदारों को केसीसी देने सम्बन्धी बयान को छापने पर हिंदुस्तान का सरकारी विज्ञापन एक-डेढ़ महीने तक रोक दिया गया जिससे उसे करोड़ों रूपये का नुकसान हुआ.इसी तरह ममता बनर्जी के श्वेत पत्र प्रकाशन के समय लालू का बचाव करने को लेकर दैनिक जागरण को सुशासनी सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा और उसे भी एक महीने से ज्यादा समय के लिए सरकारी विज्ञापन से वंचित होना पड़ा.कहने का मतलब यह कि बिहार में कलम फिसलने का सीधा अर्थ है सरकारी विज्ञापन पर रोक.पहले जहाँ रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव, रसायन मंत्री रामविलास पासवान द्वारा भी समाचार पत्रों को सरकारी विज्ञापन प्राप्त होता था अब सिर्फ नीतीश जी ही बचे हैं जो सरकारी विज्ञापन दे सकते हैं.दूसरी ओर अख़बारों के मालिकों में वह नैतिक बल भी नहीं है कि वे सरकार को नाराज कर आर्थिक क्षति उठा सकें.उनको तो बैलेंस शीट में बढ़ते लाभ को देखकर ही ख़ुशी होती है. चाहे इसके लिए सरकारी बीन पर नाचना ही क्यों न पड़े और नौकरशाही की लालफीताशाही का निर्मम शिकार बन रहे इस गरीब राज्य के बारे में सबकुछ हरा-हरा क्यों न छापना पड़े.

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

चार दिन की चांदनी फ़िर.....................


कल से बिहार के मुख्यमंत्री वैशाली पधार रहे हैं.यहाँ वे तीन दिन रुकेंगे.इससे राज्य को क्या और कितना लाभ मिलेगा यह तो भगवान जाने.हाँ वैशाली जिले का मुख्यालय होने के कारण हाजीपुर के निवासियों को एक लाभ जरूर मिल रहा है.वो भी कल यानि १३ जनवरी से.आप अगर बिहारी होंगे तो समझ भी गए होंगे.फ़िर भी आपको बता देना सही रहेगा.हो सकता है कि आपका अनुमान गलत भी हो.कल से हाजीपुर में बिजली रहने लगी है.ऐसा भी नहीं है कि हमारे शहर में पहले बिजली नहीं आती थी.पर रहती नहीं थी आते ही चली भी जाती थी.अब जब तक मुख्यमंत्री वैशाली में हैं बिजली रहेगी और निश्चित रूप से रहेगी.साथ-साथ इस बात की भी गारंटी मैं दे सकता हूँ कि १८ तारीख से बिजली आएगी रहेगी नहीं.जो लोग इस मामले में गलतफहमी पाल रहे हैं हरगिज ग़लतफ़हमी न पालें.पालने के लिए पालतू और फालतू जानवरों की न तो कल ही कमी थी न तो आज ही कमी है.मैंने लालूजी के समय भी देखा है कि जब भी उनका महनार दौरा होता था बिजली आ जाया करती थी.उधर लालूजी ने पीठ की और इधर बिजली भी उनके अगले दौरे तक के लिए गायब.वहां बिजली आज भी रहने की बात तो दूर आती भी नहीं है सो जाती भी नहीं है.तब मैं महनार में ही रहता था.अब नीतीशजी भी तो लालूजी के ही छोटे भाई ठहरे.सो इस मामले में उनका फ़ॉर्मूला भी लालूजी वाला ही हो तो आश्चर्य कैसा?

जलवायु परिवर्तन और भारतीय कृषि


मेरे इस आलेख का उद्देश्य आप पाठकों को डराना नहीं बल्कि हमारी खेती के सिर पर उमड़ रहे खतरे के बादलों के प्रति आपको आगाह करना है, सचेत करना है.कृषि मानव का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक कार्य है क्योंकि इसका सीधा सम्बन्ध मानव के अस्तित्व है.भारत जैसे देश के लिए जहाँ की आबादी कृषि कार्यों में लगी है इसका महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है.लेकिन मानव निर्मित प्राकृतिक परिवर्तनों की वजह से कृषि खतरे में है और सबसे ज्यादा खतरा है भारत जैसे विकासशील देशों को क्योंकि इनकी अधिकांश खेती आज भी बरसात पर निर्भर है.भारतीय कृषि वैश्विक ताप वृद्धि से बुरी तरह प्रभावित भी होने लगी है.वर्ष २००८-०९ में भारत में कृषि विकास दर घटकर १.६ प्रतिशत रह गई जबकि वर्ष २००७-०८ में यह ४.९ प्रतिशत थी.वर्तमान वित्तीय वर्ष में भी स्थितियां अनुकूल नहीं हैं और लगभग आधा भारतवर्ष सूखे की चपेट में है.जबकि एक ओर जहाँ भारत को आबादी प्रतिवर्ष २ प्रतिशत की दर से बढ़ रही है वहीँ दूसरी ओर कृषि वृद्धि दर में लगातार कमी आ रही है.१९५५ से २००० के बीच २-३ लाख हेक्टेयर कृषि भूमि आवासीय उपयोग में आ चुकी है.
भारतीय कृषि पर जलवायु परिवर्तन का तात्कालिक प्रभाव-जुलाई-अगस्त तक चलने वाले दक्षिण-पश्चिमी या बारिश का मौसम दरअसल भारतीय कृषि के लिए जीवन रेखा है.व्यापक सन्दर्भ में कहें तो यह बारिश देश की अर्थव्यवस्था की भी जीवन रेखा है क्योंकि भारतीय कृषि पर करीब ६० फीसदी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर है.भारत में कुल १४ करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में से ६५ फीसदी मानव सिंचित (जैसे ट्यूब वेळ या नहरी सिंचाई की सुविधा) नहीं है.यह भूक्षेत्र वास्तव में ड्राई लैंड है जो विशुद्ध रूप से वर्षा पर निर्भर है.अगर बारिश नहीं होती है या देरी होती है तो भारत में आधे से ज्यादा खेतिहर जमीन ऊसर रह जाती है.ऐसी स्थिति में सरकार को सूखा घोषित करना पड़ता है जो अकाल से पहले की स्थिति है.भारत हर वक़्त अकाल के कगार पर रहता है.इतिहास में ऐसे कई अकाल दर्ज हैं.विश्लेषकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण भारत को बराबर मानसून की अनियमितता को झेलना पड़ सकता है.इस साल भी देश के कुछ इलाकों में बाढ़ आई और कुछ इलाके सूखे रह गए.आईसीएआर के अनुसार मात्र १ डिग्री सेंटीग्रेड तापमान में वृद्धि से भारत में ४० प्रतिशत से ५० लाख टन गेहूं की उपज कम हो जाएगी.जिस तरह धरती के गर्माने का सिलसिला जारी है विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष २०१० से २०३९ के बीच आज के मुकाबले कृषि उत्पादन ४.५ प्रतिशत तक कम हो जाएगी.वहीँ २०७० और २०९९ ई. के बीच तो यह वर्तमान उपज से २५ प्रतिशत तक कम तो जाएगी.इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ डेवेलपमेंट रिसर्च के वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर जलवायु परिवर्तन पर बने अंतरसरकारी पैनल द्वारा जारी कि गई चेतावनी सही साबित होती है तो भारतीय अर्थव्यवस्थ को जीडीपी पर ९ प्रतिशत की गिरावट झेलनी पड़ेगी.क्योंकि इससे चावल और गेहूं की उपज में ४० प्रतिशत तक की गंभीर गिरावट आने की आशंका है.इससे प्रति व्यक्ति खाद्य उपलब्धता कम होगी जिससे खाद्य असुरक्षा और कुपोषण बढेगा.
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के उपाय-भारत में मौसम में बदलाव के एक प्रमुख प्रभाव के रूप में बाढ़ व सूखे को देखा जा सकता है.तापमान वृद्धि एवं वाष्पीकरण की दर तेज होने के परिणामस्वरुप सूखाग्रस्त क्षेत्र बढ़ते जा रहे हैं.मौसमी बदलाव के चलते वर्षा समय पर नहीं हो रही है और उसकी मात्रा में भी कमी आई है.आनेवाले १५ वर्षों में भारत के खाद्यान्न का कटोरा यानि पंजाब और हरियाणा सूखाग्रस्त हो जायेंगे.वहां की धरती में सिंचाई के लिए पानी ही नहीं रह जायेगा.केद्रीय भूमिगत जल बोर्ड की २००७ में जरिएक रिपोर्ट के अनुसार २०२५ में सिंचाई के लिए भूमिगत जल उपलब्धता ऋणात्मक हो जाएगी.उदाहरण के पंजाब में जितना जल जमीन में समता है उससे ४५ प्रतिशत अधिक खींच लिया जाता है.वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार २० से २५ प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए वनों का कटाव उत्तरदायी है.इसलिए वनों के संरक्षण पर विशेष बल दिया जाना चाहिए.जलवायु परिवर्तन के चलते सूखे एवं बढ़ में वृद्धि से पानी की उपलब्धता प्रभावित होगी.भारत वातावरणीय परिवर्तनों से होनेवाली स्थितियों पर नियंत्रण से सम्बंधित योजनाओं पर सकल घरेलू उत्पाद का करीब ढाई प्रतिशत खर्च करता है जो कि एक विकासशील देश के लिए काफी बड़ी राशि है.भारत में गैर परंपरागत स्रोतों जैसे सूर्य, जल एवं पवन ऊर्जा कि काफी बड़ी सम्भावना है.पवन ऊर्जा पैदा करने की क्षमता में भारत विश्व में चौथे स्थान पर है. इन साधनों के प्रयोग हेतु प्रोत्साहन से भी वातावरण से कार्बन डाई आक्साइड को सोखने एवं जलवायु-परिवर्तन को कम करने में काफी सहायता मिलेगी.चूंकि पुराने वृक्षों में सीओटू को अवशोषित करने की क्षमता कम हो जाती है इसलिए जलवायु-परिवर्तनों के नियंत्रण के लिए प्रत्येक स्तर पर अधिकाधिक वृक्षारोपण को बढ़ावा देने की आवश्यकता है.जलवायु परिवर्तन के कृषि पर तात्कालिक और दूरगामी प्रभावों के अध्ययन की जरूरत है.एक यह कि जलवायु-परिवर्तन से कृषि चक्र पर क्या फर्क पड़ रहा है.दूसरा क्या इस परिवर्तन की भरपाई कुछ वैकल्पिक फसलें लगाकर पूरी की जा सकती है.साथ ही हमें ऐसी फसलें विकसित करनी चाहिए जो जलवायु-परिवर्तन के खतरों से निपटने में सक्षम हों-मसलन ऐसी फसलें जो ज्यादा गर्मी, कम या ज्यादा बारिश सहन करने में सक्षम हों.

बुधवार, 13 जनवरी 2010

चीनी से परेशान मनमोहन सरकार



आजकल केंद्र की मनमोहिनी-जनमोहिनी सरकार चीनी से परेशान है वो भी दोतरफा.एक तरफ चीनी के मूल्य में बेतहाशा वृद्धि ने उसकी हालत पतली कर दी है वहीँ चीन ईंच-ईंच कर भारतीय भूमि पर कब्ज़ा जमाये जा रहा है.थक हार कर चीनी के आयात का फैसला लिया गया.कितनी विचित्र स्थिति है सरकार चीनी के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयास नहीं कर रही है बल्कि महंगे दामों पर चीनी आयात करना उसे सुविधाजनक लग रहा है.कुछ महीने पहले जब उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान दिल्ली जा पहुंचे थे तब केंद्र ने उनकी कई मांगें मान ली थी और कई वादे भी किये थे.लेकिन उनमें से न तो कोई मांग अब तक पूरी हुई है और न ही कोई वादा पूरा किया गया है.कृषि मंत्री तो यहाँ तक कह रहे हैं कि मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूँ जो बता दूं कि चीनी के दाम कब कम होंगे?क्या कृषि मंत्री इस तथ्य से भी अपरिचित हैं कि भारत में गन्ने की खेती में लगातार गिरावट आ रही है क्योंकि वर्तमान समर्थन मूल्य पर किसानों के लिए यह लाभकारी नहीं रह गई है.अब जब उत्पादन ही कम होता जा रहा है तो फ़िर चीनी के दाम बढ़ेंगे या घटेंगे जानने के लिए न तो किसी ऊंची डिग्री की ही जरूरत है और न ही ज्योतिष सीखने की.
जहाँ तक हमारे पड़ोसी देश चीन का प्रश्न है तो मैं पहले ही कह चुका हूँ कि भारत और चीन दो समानांतर रेखाओं के समान हैं.चीन न तो भारत का मित्र हो सकता है और न है.बरसों पहले भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नाडिस ने कहा था और बिलकुल ठीक कहा था कि भारत का सबसे बड़ा दुश्मन चीन है न कि पाकिस्तान.बल्कि पाकिस्तान चीन के ही इशारों पर चलता रहा है.अब जब चीन ने विस्तृत भारतीय क्षेत्र पर कब्ज़ा जमा ही लिया है तो भारत के समक्ष विकल्प ही क्या है सिवाय चुप रह जाने के.वर्तमान केंद्र सरकार में वो नैतिक बल नहीं है कि वह चीन से आँखों में आँखें डालकर बात कर सके.यही कारण है कि वो चीनी अतिक्रमण से साफ तौर पर इनकार कर रही है.हाँ अगर दबाव जनता की तरफ से आये तो बात बन सकती है.लेकिन जनता भी तो सांस्कृतिक रीतिकाल का आनंद लेने में लगी है.उसे न तो बढती महंगाई से मतलब है और न ही देश की एकता और संप्रभुता से.

रविवार, 10 जनवरी 2010

ये तो होना ही था


कहते हैं कि जो जैसा करता है वैसा पाता है. साथ ही हर किसी की जिंदगी में अच्छे और बुरे दिन आते हैं.लगता है इन दिनों प्रबंध शिरोमणि अमर सिंह के ग्रह-नक्षत्र ठीक-ठाक नहीं चल रहे हैं.वैसे भी वे जिस रास्ते पर चल रहे थे उसकी कोई मंजिल तो थी नहीं.अमर सिंह जिस पीढ़ी के नेता हैं उस पीढ़ी ने राजनीति से नैतिकता को समाप्त होते अपनी आँखों से देखा है और कहीं-न-कहीं इसके लिए वह जिम्मेवार भी है.अब राजनीतिक मूल्यों में ह्रास में अमर सिंह की हिस्सेदारी कितनी है यह तो वृहद् विश्लेषण का विषय है लेकिन बोये पेड़ बबूल का आम कहाँ से होए  कहावत तो शाश्वत है और रहेगी भी.अमर सबसे पहले उत्तर प्रदेश के स्वर्गीय मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह से जुड़े और अपनी प्रबंधन कला से उन्हें खासा प्रभावित कर लिया.श्री सिंह की कृपा से देखते-ही-देखते काल तक फूटपाथ पर सोनेवाला यह आदमी कई फैक्टरियों का मालिक बन बैठा.इसी दौरान उनका परिचय समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव से हुआ और जल्दी ही उन्होंने उन्हें भी मैनेज कर लिया और उनके चहेते बन गए.एक बार तो उन्होंने मुलायम को जोड़-तोड़ के माध्यम से सत्ता में लाने में भी सफलता पा ली.लेकिन अमर के समाजवादी पार्टी में आने और छा जाने का साइड इफेक्ट भी कम नहीं हुआ.बेनी प्रसाद वर्मा, जनेश्वर मिश्र और राजबब्बर जैसे दिग्गज और समर्पित साथी बारी-बारी से मुलायम से किनारा करते गए.तब अमर के सितारे बुलंद थे वे मिट्टी भी छूते तो वह सोना हो जाती.लेकिन सब दिन कहाँ एकसमान होते हैं.जनता का मोहभंग होने लगा.परिदृश्य बदला और मुलायम का राजनीतिक भविष्य ही खतरे में नजर आने लगा.मुलायम को लगने लगा कि अमर का साथ लाभ की जगह नुकसान पहुँचाने लगा है और शुरुआत हुई पार्टी में उन्हें किनारे लगाने की जिसकी परिणति उनके इस्तीफे से हुई.अमर ने समय-समय पर अपनी राजनीतिक पहुँच से अमिताभ बच्चन, अनिल अम्बानी और सुब्रत राय सहारा को लाभ पहुँचाया और राजनीति में धनबल के प्रयोग को बढ़ावा दिया.आगे उनके भाग्य में क्या बदा है यह तो विधाता ही जाने फिलहाल तो यही कहा जा सकता है की जो भी हो रहा है वो तो होना ही था.

साधुवाद के पात्र हैं शशि थरूर


शशि थरूर ने कल जवाहरलाल नेहरु की विदेश नीति को लेकर जो कुछ भी कहा है उसके लिए वे निश्चित रूप से शाबासी के पात्र हैं.व्यक्ति महान नहीं होता उसकी करनी के आधार पर ही उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए.नेहरू कल्पनाजीवी व्यक्तित्व थे और उनकी विदेशनीति भी यथार्थवादी कम आदर्शवादी ज्यादा थी जिसका कुपरिणाम आज भी देश भोग रहा है.यहाँ हमें यह नहीं देखना चाहिए कि बयान किसने दिया है बल्कि यह देखा जाना चाहिए कि उसने क्या कहा है?कांग्रेस सरकार में मंत्री रहते हुए थरूर द्वारा दिया गया बयान निश्चित रूप से साहसिक कहा जायेगा.नेहरु भी इंसान थे और गलतियाँ इंसान ही करता है.जरूरत किसी व्यक्ति की गलतियों पर पर्दा डालने की नहीं बल्कि सच्चे मन से उनका विश्लेषण कर सीख लेने की है.

सोमवार, 4 जनवरी 2010

दलाल संस्कृति

आपने कई संस्कृतियों के नाम सुने होंगे.हड़प्पा संस्कृति,चीनी संस्कृति,मिस्री संस्कृति आदि.अब मैं कितने समाप्त हो चूँकि संस्कृतियों के नाम गिनाऊँ, सर्वकालिक और सार्वभौमिक तो बस एक ही संस्कृति है और वह है दलाल संस्कृति.
                               कुछ साल पहले तक अपने देश में किसी को दलाल या दल्लाल कह देने पर मार का नहीं तो कम-से-कम गालियाँ सुनने का तो इंतजाम हो ही जाता था.पर वर्तमान भारत में यह शब्द गौरव और अभिमान का परिचायक ही नहीं अपितु पर्याय भी बन चुका है.गाँव में आप बिना दलाल के जमीन-जायदाद, मवेशी यहाँ तक कि फसल भी नहीं बेच सकते.यह पुरानों में ही अच्छा लगता है कि विश्व के संचालक भगवान विष्णु हैं और सर्वकष्टनिवारक श्रीगणेश हैं.आज तो एक ही कष्टनिवारक है और वह है दलाल.पहले जब यह व्यवसाय-मात्र था तब दलाल कहने से बुरा मानने का खतरा हो भी सकता था, आज बुरा मानने का प्रश्न ही नहीं! इस शब्द का अर्थ पूरी तरह से बदल चुका है.अब यह निंदा का नहीं प्रशस्ति का गुण धारण करता है.
                   'हरि के हजार नाम' की तरह दलालों के भी हजारों नाम हैं.किराये पर मकान चाहिए या जमीन खरीदनी है तो प्रोपर्टी डीलर, कम्पनियों के शेयर खरीदने हैं तो शेयर ब्रोकर.यहाँ तक की मंदिर जाएँ तो वहां भी ईश्वर और अपने बीच एक मध्यस्थ को पाएंगे यानि पुजारी.अब अगर आप पूछे की मंदिर में मध्यस्थ की क्या जरुरत?अरे भी भगवान आपकी भाषा थोड़े ही समझते हैं.वे भी उनकी भाषा समझते हैं.
                अब इन छुटभैये नेताओं की नादानी देखिये बोफोर्स-बोफोर्स चिल्लाते-चिल्लाते इनका गला बैठ रहा है.अरे नादानों, जब बिना दलाल के कोई अपनी भैंस तक नहीं बेच सकता तो फ़िर रक्षा-उपकरण निर्माता कम्पनियों की कोई ईज्जत है भी कि नहीं, आखिर दलाल नहीं रखने से उनकी ईज्जत नहीं चाटेगी क्या?वो तो भला तो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का जिन्होंने सिंह गर्जना करते हुए संसद में कहा कि स्वतंत्रता के बाद कोई भी रक्षा बिना दलालों की कृपा के संपन्न हुआ ही नहीं है.
                       अब हरेक राजनेता दलालों की महिमा थोड़े ही समझता है.हर कोई मुलायम सिंह यादव की तरह समझदार हो भी तो नहीं सकता.उनके पार्श्वभाग में अमर कृतिवाले प्रबंध शिरोमणि श्री अमर सिंह अनुज की तरह सदैव उपस्थित रहते हैं.
                       सरकार चलाना भी इतना आसान थोड़े ही होता है कि बिना दलाल के चल जाए.नहीं विश्वास होता है तो फ़िर चले जाइये किसी भी मंत्रालय में.आपको ढेर-सारे बड़े-बड़े संपर्कोंवाले पूर्व बेरोजगार,दलाली में शोधकार्य में पूरे मनोयोग से रत दलाल मिल जायेंगे.स्थानांतरण से लेकर पेंशन तक हर टेंशन की दवा है उनके पास.रेलवे ने तो ट्रेवल एजेंट नाम और पदवी देकर इस विधा को सम्मानित भी किया है.भारत का सबसे पुराना शेयर बाज़ार बम्बई स्टॉक एक्सचेंज जिस सड़क पर स्थित है वह तो पूरी तरह दलालों को ही समर्पित है.नाम है-दलाल स्ट्रीट.इस महान गली में रहनेवालों के नाम के साथ भी यह महान शब्द लगा होता है जैसे हितेन दलाल,जितेन दलाल आदि.
                 अब मैं आपको अपने ऊंचे घराने के बारे में भी बता दूं.मेरे एक दूर के नाना थे वे बैल-भैस की दलाली करते थे.अन्य दलालों की तरह उनके पास भी एक ही जमापूंजी थी दिमाग.जिसका वे जमकर प्रयोग करते थे.क्या मजाल कि कोई ठेकेदार उनसे बिना पूछे स्कूल या कुएं में एक भी ईंट जोड़ दे.इतनी ईज्जत थी उनकी गावों में कि लोग उन्हें दलाल नहीं 'दलाल साहेब' कहकर पुकारते थे.
                       कुल मिलाकर मित्रों भारत में इस समय कलियुग है.अर्थ प्रधान युग.इस महान युग का और ज्यादा समय व्यर्थ न गंवाते हुए मित्रों अगर अर्थ कमाना है तो जाइए दलाली करना सीखिए.अगर आपके पास एमबीए की डिग्री है तो आप इस काम तो पूरे प्रोफेशनल तरीके से कर सकते हैं.यहाँ भी तो मैनेज ही करना होता है.मैं इस रोजगार में आपके साथ फिफ्टी-फिफ्टी का पार्टनर बनाने को तैयार हूँ.

शनिवार, 2 जनवरी 2010

रेलगाड़ी या यातना शिविर

क्या आपने कभी भारतीय रेल से सफ़र करने का सौभाग्य पाया है?यदि नहीं तो आप बहुत भाग्यशाली हैं.लेकिन मैं इतना भाग्यशाली नहीं हूँ.इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं हवाई जहाज से यात्रा का खर्च उठा सकूं.मजबूरन मुझे बार-बार रेलगाड़ी से सफ़र करना पड़ता है.वैसे मैं हजारों बार रेलगाड़ी से यात्रा कर चुका हूँ, लेकिन इस बार का मेरा अनुभव इतना भयावह रहा कि मुझे रेलयात्रा करने की अपनी मजबूरी पर काफी क्षोभ हुआ.यह भी कह सकते हैं कि मुझे अपनी स्थिति पर पूरी यात्रा के दौरान खुद ही तरस आती रही.हुआ यूं कि मुझे एम.फिल की फाइनल परीक्षा देने के लिए नोएडा जाना पड़ा.लौटते समय मुझे अपने साथ दीदी और अपनी दो भांजियों को लेकर बिहार आना था.मैंने जाने के समय ही मगध एक्सप्रेस में लौटने का भी आरक्षण करवा लिया था.निर्धारित तिथि यानि २५ दिसम्बर २००९ को शाम के समय रेलवे पूछताछ नंबर १३९ पर पूछने पर पता चला कि हमारी ट्रेन शाम के ८.१० के बजाये देर रात ११.५० में खुलेगी.इसलिए हमलोग रात ११ बजे नई दिल्ली स्टेशन पर पहुंचे.वहां भी डिस्प्ले बोर्ड पर गाड़ी खुलने का समय ११.५० अंकित था.रात साढ़े ११ बजे अचानक स्टेशन के लाउडस्पीकर पर घोषणा की गई कि यात्रियों को सूचना दी जाती है कि २४०२ डाउन मगध एक्सप्रेस अब रात ११.५० के बदले सुबह ४.५० पर रवाना होगी.हमें लगा जैसे हम पर वज्रपात हो गया हो.पूस की यह ठंडी रात अब हमें प्लेटफ़ॉर्म पर गुजारनी थी.मेरी छोटी बहन का घर जहाँ हम रुके हुए थे गाज़ियाबाद में था और हम वापस भी नहीं जा सकते थे.एक घंटे तक तो हम बातचीत में लगे रहे फिर दीदी और दोनों बच्चियों को नींद आने लगी.हमारे पास दो कम्बल थे दोनों निकाल लिए गए लेकिन ठण्ड इतनी ज्यादा थी कि कम्बल बेअसर साबित हो रहे थे.पटना से आनेवाली अप ट्रेन शाम साढ़े छः बजे ही आ चुकी थी फिर ट्रेन के प्रस्थान के समय को सुबह ४.५० क्यों कर दिया गया यह हमलोगों की समझ में नहीं आ रहा था.सर्द हवाओं के झोंके गोलियों की तरह प्रहार करते लग रहे थे.ऐसा अनुभव हो रहा था कि हम अभी के अभी ठन्डे हो जायेंगे.मैं मन में कल्पना कर रहा था कि क्या हिटलर का यातना शिविर कुछ ऐसा ही नहीं होता होगा?ठण्ड के मारे हमें नींद आ भी रही थी और नहीं भी.किसी तरह रात बीती और ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर आई परन्तु खुली अपने पुनर्निर्धारित समय से चालीस मिनट की देरी से यानि साढ़े पांच बजे.भारतीय रेल में मैंने जबसे होश संभाला है देख रहा हूँ कि एक बड़ा ही भद्दा रिवाज प्रचलित है यानि देर से चलनेवाली ट्रेनों को और भी लेट करते जाने का.इसी रिवाज का अनुपालन करते हुए रेल प्रशासन ने हमारी ट्रेन को और भी लेट करते हुए इतना लेट कर दिया कि मगध एक्सप्रेस रात २ बजे पटना जंक्शन पर पहुंची.किसी तरह हम हाजीपुर घर तक जीवित पहुँच सके.आज मैं एक आम भारतीय के रूप में रेल मंत्रालय से पूछता हूँ कि वह क्यों चला रहा है ट्रेनों को?क्या वह इसके माध्यम से हम गरीबों की गरीबी का मजाक उड़ाना चाहता है या हमें अपनी जानवरों से भी बदतर हालत का अहसास दिलाने के लिए वह ट्रेनों का परिचालन कर रहा है?अमीरों की गाड़ियों राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेसों के साथ तो ऐसा व्यवहार नहीं किया जाता.आज २ जनवरी को एक ही दिन में तीन रेल दुर्घटनाओं से तो यहीं परिलक्षित होता है कि रेलवे को यात्रियों की जान माल के नुकसान से कोई मतलब ही नहीं रह गया है.उसका काम तो बस दुर्घटनाओं के बाद मुआवजे की घोषणा भर करना शेष रह गया लगता है.

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

सरकारी का विकल्प निजीकरण नहीं



जबसे भारत में उदारवाद की हवा चली है अधिकतर अर्थशास्त्री सार्वजनिक क्षेत्र की जगह निजी क्षेत्र को प्राथमिकता देने का समर्थन कर रहे हैं.लगातार सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों का विनिवेश किया जा रहा है.निजीकरण के समर्थकों का मानना है कि इससे कम्पनियों की व्यवस्था और प्रदर्शन में सुधार होगा और उपभोक्ताओं को भी अच्छी सेवा प्राप्त होगी.लेकिन यह सोंच एकपक्षीय है.निजी क्षेत्र अपने कर्मियों को सामाजिक सुरक्षा नहीं देते.जरूरत हुई तो रख लिया नहीं तो निकाल-बाहर कर दिया.साथ ही उनका देशहित से भी कुछ लेना-देना नहीं होता उनका एकमात्र लक्ष्य होता है मुनाफाखोरी.अब मोबाइल सेवा प्रदाता कम्पनियों को ही लें.एयरटेल और रिलायंस जैसी कम्पनियां ग्राहकों की अनुमति के बिना उनके नंबर पर नई-नई योजनाओं को लागू कर देते हैं और पैसे भी काट लेते हैं.यह कोई सुनी-सुनाई बात नहीं है.मैं यह निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ.क्या इस तरह का व्यवहार उचित है?ग्राहक कहाँ-कहाँ और किन-किन के खिलाफ उपभोक्ता अदालतों में मुकदमा लड़ता फिरे?और फ़िर उपभोक्ता अदालतों की स्थिति भी तो अच्छी नहीं है.बिहार के अधिकतर जिलों में तो पूरी संख्या में न्यायाधीश हैं भी नहीं.अभी मंदी का शोर थमा नहीं है.पूरे भारत में मंदी के नाम पर निजी क्षेत्र ने लाखों लोगों को नौकरी से निकल दिया.सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में अभूतपूर्व संख्या में कर्मियों ने पीएफ से पैसे निकले हैं.लाभ हो तो मालिकों का और घाटा हो तो कर्मियों का.इसे और कुछ भले ही कहा जाए न्याय तो नहीं ही कहा जा सकता है.

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

अभागा राज्य झारखण्ड



छोटे राज्यों के पक्षधरों को उम्मीद थी कि भारत का रूर कहलानेवाला झारखण्ड अस्तित्व में आते ही विकास के मामले में देश के उन्नत राज्यों से टक्कर लेता दिखाई देगा.लेकिन एक कहावत है कि गेली नेपाल त साथे गेल कपार.आज इसी राज्य का पूर्व मुखिया भारतीय राजनीति का सबसे बदनुमा दाग बन गया है.उस मुखिया के राज्य के विकास की नीति का खाका भले ही नहीं रहा हो अपने आर्थिक विकास के लिए उसक पास योजना भी थी और इच्छाशक्ति भी.राज्य का खान मंत्री रहते हुए उसने अकूत धन-सम्पदा को जमकर लूटा.बिहार में जंगल राज कायम करनेवालों ने भी उनके इस काम में भरपूर सहयोग दिया.सत्ता में साझेदारी के लिए कांग्रेसी हाथ ने भी भ्रष्टाचारियों से हाथ मिला लिया और कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाकर इस गरीब राज्य को लूटा.एक बार फ़िर हमारे राजनेता गरीब बढाओ की नीति पर चलते दिखे.अब जब संविधान की शपथ लेनेवालों का ही यह हाल है तो फ़िर संविधान को मानने से ही इनकार करनेवालों की भूमिका तो राज्य की बर्बादी में गंभीर होनी ही है.

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

चीन और भारत : दो समानांतर रेखाएं


चीन और भारत दुनिया की दो सबसे प्राचीन सभ्यताएं हैं.दोनों सभ्यताओं के बीच भले ही कभी-कभी कोई तिर्यक रेखा आ गई हो परन्तु दोनों का व्यवहार दो सामानांतर रेखाओं की तरह रहा है जो आपस में कहीं नहीं मिलतीं.चीन सदियों तक दुनिया से कटा रहा और रहस्यमय बना रहा.उसने हमेशा अपने को दुनिया की महानतम सभ्यता माना.भारत के लिए चीन पूरी तरह नहीं तो कूटनीतिक तौर पर जरूर आज भी रहस्यमय है.१९६२ के युद्ध के पूर्व एक तरफ तो चीन हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा लगा रहा था तो दूसरी ओर भारत पर हमले पर भी आमादा था.वर्तमान चीन सामाजिक अथवा आर्थिक दृष्टि से भले ही बदल गया हो भारत को लेकर उसका मिला-जुला रवैया अभी भी बदला नहीं है.जहाँ एक ओर वह भारत से विश्व व्यापार संगठन और अन्य अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मंचों पर समर्थन की अपेक्षा रखता है वहीँ अरुणाचल प्रदेश को लेकर शत्रुतापूर्ण रूख रखता है.हाल ही में जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को अन्य भारतीय नागरिकों से भिन्न वीजा जारी कर उसने जाहिर कर दिया है कि भारत को लेकर उसकी सोंच में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है.ज्यादा शक्तिशाली होने के कारण उसे संबंधों के निर्धारण का निर्बाध अधिकार भी प्राप्त है.
विचारधारात्मक अंतर-४० के दशक में चीन में माओत्से तुंग को वही स्थान प्राप्त था जो भारत में महात्मा गांधी को.दोनों ने अपने-अपने तरीके से अपने-अपने देशों का उद्धार किया.एक ने हिंसा का रास्ता अपना तो दूसरे ने अहिंसा का.एक का मानना था कि शक्ति बन्दूक की नली निकलती है वहीँ दूसरा शत्रुओं से भी प्यार करना सीखता था.माओ के बाद भी चीन की विदेश नीति में कोई ज्यादा परिवर्तन नहीं आया है.कभी ओलम्पिक तो कभी स्थापना दिवस के बहाने अस्त्र-शास्त्र प्रदर्शन कम-से-कम यह तो नहीं ही दर्शाता कि वह दुनिया में अमन-चैन चाहता है.
चीन और भारत में शक्ति असंतुलन-जैसा कि सभी जानते हैं कि चीन आज दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है.वह जहाँ तीन ट्रिलियन डालर तक पहुँच चुका है वहीँ भारत का ट्रिलियन क्लब में अभी प्रवेश ही हुआ है (एक ट्रिलियन=१००० अरब).सीधे तौर पर अगर कहें तो चीन की अर्थव्यवस्था हमसे लगभग तीन गुना बड़ी है जबकि हमारी जनसंख्या में कोई ज्यादा अंतर नहीं है.चीन की अर्थव्यस्था के ज्यादा तेज गति से विकसित होने से दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय असंतुलन पैदा हो गया है.अब धन ज्यादा होगा तो सैन्य शक्ति भी ज्यादा होगी है.सामरिक दृष्टि से भी अगर हम देखें तो भारत उसके आगे कहीं नहीं ठहरता है.हमारे वायुसेना अध्यक्ष यह स्वीकार भी कर चुके हैं.चीन के पास १३००० किमी तक आक्रमण करनेवाली मिसाइलें हैं जिनका हमारे पास कोई जवाब नहीं है.वह भारत के किसी भी हिस्से पर अपने अंतरमहाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्रों द्वारा हमला कर सकता है.चीन ने भारत-चीन सीमा के समानांतर सड़कों का भी निर्माण कर लिया है और हमें इस मामले में अभी शुरुआत करनी है.थल और वायु सेना के मामले में चीन हमसे कोसों आगे है ही नौसेना की दृष्टि से भी हिंद महासागर में उसकी बढती सक्रियता शुभ संकेत नहीं दे रहे.
तिब्बत का मुद्दा-तिब्बत को लेकर भारत का रवैया हमेशा से ढुलमुल रहा है.एक तरफ तो वह तिब्बत को चीन का हिस्सा मानता है वहीँ दलाई लामा को अपने यहाँ शरण भी दी है.दलाई लामा और तिब्बती शरणार्थी बार-बार कुछ ऐसा करते रहते हैं जिससे चीन का नाराज होना स्वाभाविक है.यह तो तय है कि तिब्बत को अब चीन आजादी नहीं देगा.भारत को तिब्बती मेहमानों को साफ तौर पर बता देना चाहिए कि अगर भारत में रहना है तो हमारी शर्तों पर रहना होगा.
शासन व्यवस्था में अंतर-शासन व्यवस्था के मामले में भी चीन और भारत समानांतरता की स्थिति में हैं.चीन में जहाँ तानाशाही एकदलीय शासन व्यवस्था है वहीँ भारत के लोग लोकतंत्र का आनंद उठा रहे हैं.दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं.फायदे भी हैं और नुकसान भी. चीन में कानून नहीं है पर व्यवस्था है और भारत में कहने को तो कानून का शासन है पर व्यवस्था नहीं है.भारत में लोकतंत्र मजबूत स्थिति में तो है मगर मजबूर भी है.ईमानदार नेतृत्व अब पुस्तकों में मिलनेवाली बातों में शुमार हो गया है.१९४९ के पहले चीन में भी लोकतंत्र था और स्थितियां भी कुछ ऐसी ही थीं जैसी आज के भारत में है.
भारत के सामने विकल्प-चीन घुसपैठ में बढ़ोतरी कर लगातार भारत को उकसा रहा है.अब प्रश्न उठता है कि भारत के सामने कौन-से विकल्प उपलब्ध हैं!विकल्प ज्यादा हैं भी नहीं.कोई भी देश अपने से कई गुना शक्तिशाली पड़ोसी से दुश्मनी तो नहीं कर सकता. चीन की नीति भी भारत से सीधी लड़ाई की नहीं है.बल्कि वह भारत के विकास की मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करना चाहता है.भारत को भी अपनी आर्थिक शक्ति बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए और ऐसा तब तक संभव नहीं है जब तक न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में व्यापक रूप से व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त न कर दिया जाए.साथ ही तब तक चीन से सावधान भी रहने की जरूरत है जब तक भारत उसकी बराबरी में न आ जाए और एक बराबर में बैठकर बातचीत करने लायक न हो जाए.तब तक तो हम चीन के बारे में यही कह सकते हैं-तौबा तेरा जलवा, तौबा तेरा प्यार, तेरा इमोशनल अत्याचार.

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

मुंबई को केन्द्रशासित प्रदेश बनाया जाए


मुंबई को आप किस रूप में जानते हैं?भारतवर्ष के सबसे बड़े शहर के रूप में या भारत की आर्थिक राजधानी के रूप में या सपनों के शहर के रूप में.या फ़िर उस शहर के रूप में जहाँ मनसे या शिवसेना के गुर्गों के शासन चलता है.या उस शहर के रूप में जहाँ आप बेधड़क होकर अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी का प्रयोग भी न कर सकें या जहाँ क्षेत्रीय आधार पर गरीब श्रमिकों पर अक्सर हमले होते रहते हैं.मुंबई में भारत के कुल औद्योगिक श्रमिकों का १०% रोजगार पाता है.मुबई भारत के आयकर में ४०% का,कस्टम ड्यूटी में ६०% का,केंद्रीय उत्पाद कर में २०% का,विदेश व्यापार में ४०% का और कॉरपोरेट कर में ४० हजार करोड़ रूपये यानि १० अरब डॉलर का भारी-भरकम योगदान करता है.जाहिर है हम मुंबई को भले ही सपनों के शहर के बदले डरावने सपनोंवाले शहर के रूप में याद करें मुंबई आज के भारत का दिल है.१६६८ में मात्र १० पौंड की लीज पर ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा लिया गया यह शहर आज जिस मुकाम पर है उसके पीछे है मुंबईकरों का खुला दिल, विभिन्न विचारों को तहेदिल से ग्रहण करने का हौसला.लेकिन आज मुंबई की कानून-व्यवस्था का भारी-भरकम बोझ उठाने में महाराष्ट्र की सरकार अपने को अक्षम पा रही है.२६/११ के हमले के समय पाया गया कि महाराष्ट्र पुलिस के पास न तो आतंकवादियों से निबटने लायक हथियार थे न ही सही गुणवत्ता का बुल्लेटप्रूफ जैकेट.इसलिए एनएसजी कमांडो को बुलाना पड़ा परन्तु इससे पहले ही मुंबई पुलिस के कई दर्जन जवान शहीद हो चुके थे.जबकि बृहन मुंबई नगरपालिका का बजट  भारत के ९ राज्यों के बजट से ज्यादा का होता है.इतना ही नहीं आज मुंबई महाराष्ट्र के अतिमहत्वकांक्षी कुत्सित विचारों वाले राजनेताओं की गन्दी राजनीति का अखाडा बन गया है.ऐसे में मेरी समझ में भारत की जीडीपी में अकेले ५% की हिस्सेदारी रखनेवाले इस शहर को आतंकी हमलों और गन्दी राजनीति से बचाने का अब एक ही रास्ता बचा है और वो यह कि इसे दिल्ली की तरह केन्द्रशासित प्रदेश बना दिया जाए.यह विचार कोई नया भी नहीं है स्वयं जवाहरलाल नेहरु की भी यही दिलीख्वाहिश थी.आज मुंबई को निश्चित रूप से मनसे और शिवसेना की गुंडागर्दी और कांग्रेस की गन्दी राजनीति से बचाने की जरूरत है.आंकड़ों के अनुसार १९९४-९८ में मुंबई की आर्थिक वृद्धि दर जहाँ ७% थी १९९८-२००० के दौरान वह २.४% रह गई.जबकि इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था ५.६% की दर से आगे बढ़ रही थी.चूँकि बीएसई सहित सभी आर्थिक केंद्र मुंबई में स्थित हैं इसलिए जब भी मुंबई में अव्यवस्था उत्पन्न होती है तो नुकसान पूरे भारत की अर्थव्यवस्था को उठाना पड़ता है.केन्द्रशासित प्रदेश मुंबई में न तो कानून की कोई समस्या होगी न ही व्यवस्था की.तब भारत के सभी प्रान्तों से आये मजदूर, दुकानदार, उद्यमी, ड्राईवर या अधिकारी निर्भय होकर अपना काम करेंगे और भारत के विकास का यह ईंजन और भी तेज रफ़्तार में सरपट दौड़ेगा.

सोमवार, 30 नवंबर 2009

मांगना एक कला


आपने भी शायद गौर किया होगा आजकल हमारे राज्य बिहार की सरकार जो काम सबसे ज्यादा संजीदगी से करने में लगी है वह है मांगना.कभी वह केंद्र सरकार से बाढ़ का मुआवजा मांगती है तो कभी वह सूखा राहत चलाने के लिए रकम मांगती है.इतना ही नहीं पिछले चार सालों से राज्य सरकार केंद्र से बिजली मांग रही है और केंद्र है कि कुछ सुन ही नहीं रहा.शायद पहली बार सत्ता में आये सुशासन बाबू को अब तक मांगना नहीं आया.सत्ता में रहते हुए किसी से कुछ मांगना कोई साधारण काम भी नहीं है.वैसे भी मांगना अपने-आपमें एक कला है.भिखारी तो आपने बहुत सारे देखे होंगे.सब-के-सब एक-दूसरे से अलग होते हैं.सबके मांगने का तरीका भी अलग-अलग होता है.जो इस कला में जितना पारंगत होता है उसकी भीख के बाज़ार में उतनी ही ज्यादा की हिस्सेदारी होती है.यह तो हुई भीख मांगने की बात लेकिन जब बात भीख की जगह अधिकारों की हो तब.तब स्वर के साथ-साथ शब्दों का चयन भी बदल जाना चाहिए.अगर भीख की तरह अधिकार मांगे जायेंगे तो निश्चित रूप से मांग पूरी होने में शक की गुंजाईश रहेगी.नीतीशजी को सीखना चाहिए हाजीपुर के छटनीग्रस्त सफाई कर्मचारियों से जो अपने अधिकारों के लिए पिछले कई दिनों से अनशन पर बैठे हैं.नीतीशजी कह रहे हैं कि केंद्र उनकी मांगों पर कान नहीं दे रही है.नीतीशजी क्यों अनशन पर नहीं बैठते?क्यों नहीं उतरते सड़क पर चंद्रशेखर राव की तरह? क्या वे सचमुच अपनी मांगों के प्रति गंभीर हैं?अगर वे गंभीर होते तो निरीह अकिंचन की तरह याचना नहीं कर रहे होते बल्कि अहिंसक तरीके से ही सही रण कर रहे होते.लगता है वे सिर्फ मांगने के लिए मांग रहे हैं.उन्होंने इस महान कला के महत्व को अभी समझा नहीं है.

६ दिसंबर आ रहा है


हर साल ६ दिसम्बर आता है और बांकी तिथियों की तरह ही गुजर जाता है.१९९२ से पहले भी यह दिन साल में एक बार आता था लेकिन तब यह ख़ामोशी से गुजर जाता था.अब ऐसा नहीं होता.अब तो नवम्बर से ही आरोपों-प्रत्यारोपों का सिलसिला शुरू हो जाता है.यह साल तो फ़िर भी विशेष है.बाबरी-ढांचे के टूटने पर लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट अभी-अभी आई है.रिपोर्ट क्या आई है चूं-चूं का मुरब्बा कह लीजिये.खोदा पहाड़ निकली चुहिया.और पहाड़ को खोदा भी १७ सालों में.सारी-की-सारी बकवास है इसमें नहीं है तो सिर्फ यह कि ढांचे को तोड़ने का षड्यंत्र किसने रचा.जब यही पता नहीं लग पाया तो फ़िर क्या हासिल हुआ आयोग के गठन से. राजनीति के शिखर पर बैठे लोग चाहते ही नहीं थे कि किसी को भी इस मामले में सजा मिले.अंदरखाने ये सब मिले हुए हैं.मिली हुई नहीं है तो जनता.आखिर क्या कारण है कि आज तक किसी भी बड़े राजनेता को किसी भी मामले में सजा नहीं मिली?इनके आपस में मिले होने का इससे बड़ा क्या प्रमाण होगा? ६ दिसंबर जैसे-जैसे निकट आएगा राजनीति तेज होती जाएगी और ६ दिसंबर को चरम पर होगी.एक तरफ बहुसंख्यकवादी होंगे तो दूसरी तरफ अल्पसंख्यकवादी और इन दो पाटों के बीच पिस रही होगी भारत की भोली-भाली जनता.

रविवार, 29 नवंबर 2009

गरीब बढाओ परियोजना



नीतीश कुमारजी की आदरणीय सुशासनी सरकार ८०० महादलितों का चयन कर उनके बीच ४००० एकड़ भूमि का वितरण करेगी.इसके लिए सरकार जमीन का अधिग्रहण करने जा रही है.क्या योजना है एक गरीब से जमीन लेकर दूसरे गरीब लोगों में बाँटी जाएगी.१९७० के दशक से ही केंद्र सरकार कथित रूप से गरीबी को मिटाने का प्रयास कर रही है.बिडम्बना तो यह है कि भारत में सबसे ज्यादा गरीबी इसी दौरान बढ़ी जब इंदिराजी जी-जान से इसे मिटाने की कोशिश में लगी थी, भले ही कांग्रेस कुतर्कों के आधार पर इससे इंकार करें.चाहे इंदिराजी की सरकार रही हों या कोई अन्य केंद्र या राज्य की सरकार तब से किसी ने भी गरीबी मिटाने का सही मायने में प्रयास नहीं किया.असलियत तो यह है कि गरीबी घटाने के बदले सरकारें जो लोग ठीक-ठाक स्थिति में हैं उन्हें गरीबी रेखा से नीचे लाने में लगी हुई हैं.यही कारण है कि गरीबी नहीं मिटी गरीबों की तादाद जरूर बढ़ गई.जहाँ आजादी के समय लगभग ५०% आबादी गरीब थी आज ८०% आबादी २० रूपया प्रतिदिन से भी कम में गुजारा कर रही है. स्वयं केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार आज भी दुनिया में सबसे ज्यादा गरीब भारत में ही निवास करते हैं.हालांकि अधिकतर अर्थशास्त्री सरकार के गरीबी मापने के पैमाने को सही नहीं मानते और मानते हैं कि भारत के कम-से-कम आधे लोग गरीब हैं.जहाँ तक सुशासन बाबू का सवाल है तो उनका मानना है कि सीधे पैसा दे देने से गरीबी समाप्त हो जाएगी. लेकिन वह पैसा कितने दिन तक चलेगा?हाँ अगर वे गरीबी मिटाने के बदले सिर्फ चुनाव जीतना चाहते हैं तो हो सकता है कि उन्हें बांकी नेताओं की तरह यह लक्ष्य प्राप्त हो भी जाये.अच्छा हो कि निवेश आमंत्रित कर या सरकारी संसाधन से ही रोजगार के अवसर पैदा किये जाएँ.वैसे भी भारत के गरीब १९५० से ही नगद पाते रहे हैं.इसमें से कुछ रकम प्रशासनिक तंत्र सोख ले रहा है तो कुछ गरीबी मिटाने में सूख जा रही है.

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

मर्यादा और युगधर्म


मुहब्बत के बारे में किसी शायर ने क्या खूब कहा है-इस लफ्ज मुहब्बत का इतना-सा फ़साना है, सिमटे तो दिले आशिक फैले तो जमाना है.कुछ  ऐसी  ही  बातें  मर्यादा  के  बारे  में  भी  कही  जा  सकती  हैं. मर्यादा का प्रत्येक युग में महत्व रहा है  भले ही उसकी सीमाएं युगधर्मानुसार बदलती रही हैं .रामायण काल में विष्णु का अवतार माने जानेवाले राम मर्यादा के प्रतीक भी  थे, मर्यादा पुरुषोत्तम. वहीं महाभारत काल में श्रीकृष्ण का व्यवहार तत्कालीन युगधर्म के अनुरूप परिवर्तित हो गया है. हालांकि  यहाँ भी महात्मा भीष्म मर्यादामूर्ति हैं .समय के साथ उस समय में जीनेवाले लोग भी बदल जाते हैं. रावण हालांकि राक्षस था फ़िर भी उसने कभी सीता के साथ अभद्र व्यवहार नहीं किया जबकि महाभारत काल में मानव होते हुए भी दुर्योधन अपनी ही भाभी का भरी सभा में चीरहरण करवाता है. दोनों कालों के युगधर्म में कितना अंतर है. एक काल में राक्षस भी मर्यादित और दूसरे में मानव भी अमर्यादित. अब गाँधी और लालू-नीतीश को लें. गाँधी का युग १०० साल पहले का था. आज के समय में हम गांधी को सफलता मिलने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. आज जो नेता उपलब्ध हैं जनता को उनमें से ही चुनना पड़ेगा. हाँ आज महात्मा भीष्म नहीं हो सकते ऐसा भी नहीं है लेकिन अगर वे आज होते भी तो जितने असहाय वे महाभारत काल में थे उससे भी ज्यादा असहाय होते, क्योंकि आज एक दुर्योधन से उन्हें नहीं निबटना पड़ता बल्कि आज तो दुर्योधनों और शकुनियों का ही बहुमत है. आज दिखावे का जमाना है. गेरुआधारी लोग भी आज दिखावा करने में लगे हैं. उनकी कथनी और करनी में भी एकरूपता नहीं है. दिखावा का तो मतलब ही होता है होने और दिखने में अंतर का होना. खूब बेईमानी करो और मंदिर में घंटा डोलाकर धर्मात्मा भी दिखो. यह है हमारा आज का युग धर्मं. आगे तो यह संकोच भी समाप्त हो जानेवाला है. फ़िर आप देखेंगे वासना का अनावृत नंगा रूप. आखिर यही सबकुछ तो आनेवाले युग का युगधर्म होने जा रहा है. फ़िर भी मर्यादा का हर युग में महत्व रहेगा; हाँ उसकी परिभाषाएं बदलती रहेंगी. तो क्या कर्मफल के सिद्धांतानुसार विधाता भी अपनी कसौटी बदलता रहेगा? नहीं श्रीमान जैसा करियेगा वैसा ही भरियेगा. हाँ, फलप्राप्ति का स्वरुप भले ही बदल जाये. नोबेल विजेता क्विस्त की कहानी नरक की ओर जानेवाली लिफ्ट के कथानक की तरह हो सकता है की शारीरिक के बजाये दंडस्वरूप मानसिक कष्ट हम ज्यादा मिलता हुआ देखें. यह सिर्फ कई संभावनाओं में से एक सम्भावना मात्र है. विधाता क्या सोंच रहा है कोई नहीं जानता-तेरे मन कछु और है कर्त्ता के कछु और.

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

अधम खेती भीख निदान


यही कोई पच्चीस-तीस साल पहले की बात है.अगर आप भारत के किसी किसान से कहते कि मैं तुम्हे नौकरी दिलवा दूंगा तो वह खेती छोड़कर नौकरी करने को तैयार ही नहीं होता.तब तो हमारे किसान बड़ी शान से कहा करते थे उत्तम खेती मध्यम वान, अधम चाकरी भीख निदान.लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि किसानों की खेती में अभिरुचि ही नहीं रह गई है.अभी कुछ ही दिन पहले की तो बात है जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान अपनी गन्ने की फसल को खेत में ही जलाने को उतारू हो रहे थे.आखिर ऐसा क्या हुआ कि कोई भी खेती करना नहीं चाहता.भले ही जब विकल्प न हो तब करने को तैयार हो जाएँ.आज प्रत्येक आधे घन्टे में एक किसान आत्महत्या कर रहा है.आजादी के समय भले ही अंग्रेजों ने लगान की दरें काफी ज्यादा रखी हो पर खेती घाटे का सौदा नहीं था.उस समय देश की ८० प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर थी.१९५०-५१ से ७०-७१ तक कृषि भारत की जी.डी.पी. में ५९ से ४८ प्रतिशत तक का योगदान कर रही थी.तब पूरे देश में नदियों पर बांध बनाकर सिंचित भूमि के क्षेत्रफल को बढ़ाने की कोशिशें की जा रही थी.लेकिन यह अजीबोगरीब तथ्य है कि जैसे ही देश में हरित क्रांति और आर्थिक विकास ने गति पकड़ी अर्थव्यवस्था में कृषि कि हिस्सेदारी घटने लगी और अब जी.डी.पी.में कृषि क्षेत्र का योगदान मात्र १७.२ प्रतिशत का रह गया है.हालाँकि कृषि की कम हिस्सेदारी को विकसित अर्थव्यवस्था का लक्षण माना जाता है.उदाहरण के लिए इंग्लैंड की जी.डी.पी. में २०%,अमेरिका में ३%,कनाडा में ४% और ऑस्ट्रेलिया में मात्र ५% योगदान कृषि का है.साथ ही कहीं इससे भी कम प्रतिशत लोग कृषि कार्य से जुड़े हैं यह भी उतना ही सच है. लेकिन भारत में स्थिति उल्टी है.हमारे यहाँ आज भी ७०% प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं.जाहिर-सी बात है की १७.२% आय में ७०% लोग हिस्सेदार.जैसे-जैसे समय बीत रहा है किसानों की माली हालत ख़राब होती जा रही है.वह किसी नौकरीवाले के यहाँ अपनी बेटी की शादी नहीं कर सकता.दोनों की आर्थिक स्थिति में भारी अंतर जो पैदा हो गया है.फ़िर समाज के दूसरे पेशे में लगे लोगों के आगे खड़ा होने में भी उसे क्यों न शर्म आये?बिहार में कृषि की स्थिति तो और भी ख़राब है.जहाँ पंजाब के किसान १९९६-९७ में मात्र ५६.९ लाख हेक्टेयर जमीन से जो देश के कुल कृषि-क्षेत्र का मात्र ४.६ प्रतिशत था से देश के कुल कृषि उत्पादन का १०.८ प्रतिशत उपजा ले रहे थे वहीं बिहार ९०.६ लाख हेक्टेयर कृषि भूमि से यानि देश के ७.३ प्रतिशत कृषि-भूमि से मात्र ७.१% कृषि-उत्पादन पैदा कर पा रहा था.१९५१ और २००१ के बीच खाद्यान्नों के उत्पादन में ३१४% की वृद्धि हुई, तिलहनों में ३२०% की, गन्ने में ४१२% और रुई के उत्पादन में ३००% की वृद्धि हुई.अकेले गेहूं के उत्पादन में ही १०८३% की आश्चर्यजनक वृद्धि देखी गई.वृद्धि नहीं देखी गई तो खेती पर आश्रित लोगों की संख्या में कमी में.जबकि इस बीच सेवा क्षेत्र का जी.डी.पी. में योगदान ५३.२% और उद्योग का २९.६% हो गया.आंकड़ों से जाहिर है कि हिस्सेदारी में कृषि की हिस्सेदारी को जो क्षति पहुंची उससे वास्तविक लाभ हुआ सेवा क्षेत्र को.जबकि उद्योग क्षेत्र कमोबेश वहीं-का-वहीं बना रहा.सेवा क्षेत्र ऐसा क्षेत्र है जिसमें रोजगार की गुंजाइश  बहुत कम होती है.२००२ में जब कृषि उत्पादन सरप्लस पर था हम ९० डालर प्रति टन की दर से गेंहूं का निर्यात कर खुश हो रहे थे.अपनी गलत नीतियों के चलते मात्र सात सालों में हमारी आत्मनिर्भरता समाप्त हो गयी और आज हम २५० डालर प्रति टन की दर से गेहूं आयातित करने को बाध्य हैं.जरूरत है एक बार फ़िर से कृषि को प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर लाने की.एक लम्बे समय से सिंचित क्षेत्र को बढ़ाने में बड़ा निवेश नहीं किया गया है.सरकार को समझना चाहिए कि किसानों को सड़क तो चाहिए लेकिन उससे ज्यादा महत्वपूर्ण उसके लिए पानी है.साथ ही पशुधन आधारित जैविक कृषि की ओर हमें वापस लौटना पड़ेगा.मोटे अनाज जो कम पानी में भी उपजते थे उनकी खेती को भी प्रोत्साहित करना पड़ेगा.और सबसे जरूरी बात यह कि बाजार और किसान के बीच से बिचौलियों की मौजूदगी को समाप्त करना पड़ेगा.कहना न होगा कि पिछले पचास सालों में हम ऐसा करने में पूरी तरह विफल रहे हैं.

आज भी कायम है भारत में द्वैध शासन

१९१९ ई. में अंग्रेजों ने भारत में द्वैध शासन लागू किया था.इसके जरिये प्रांतीय शासन को दो भागों में बाँट दिया गया था.इसके जरिये सरकारी विभागों को दो भागों में विभाजित का दिया गया-आरक्षित और हस्तांतरित विषय.आमदनी वाले विभागों  राजस्व और वित्त को तो सीधे तौर पर गवर्नर के अन्तर्गत रखा गया वहीँ खर्च वाले सभी विषय जनप्रतिनिधियों को दे दिए गए.इससे देश में काफी हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो गयी.जनता द्वारा सीधे तौर पर चुने गए प्रतिनिधि जनकल्याण और विकास सम्बन्धी काम तो करना चाहते थे लेकिन गवर्नर पैसा ही नहीं देता था.आजादी के बाद भी उस कांग्रेस ने इस द्वैध शासन को बनाये रखा जो १९१९ से ही इसका विरोध करती आ रही थी.आज भी आमदनी यानि राजस्व का ज्यादातर हिस्सा तो केंद्र के पास चला जाता है और राज्य सरकार के पास जो आय के साधन संविधान द्वारा दिए गए हैं वे उनके व्यय को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.ऐसे में सबसे जटिल स्थिति तब उत्पन्न होती है जब राज्य और केंद्र में अलग-अलग दलों की सरकार हो.राज्य धन मांगते रहते हैं और केंद्र कान पर ढेला देकर सोया रहता है.पिछले ६० सालों में योजना आयोग संविधानेतर संस्था होते हुए भी इतना शक्तिशाली होकर उभरा है कि इसके उपाध्यक्ष के पद को वित्त मंत्री से भी ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाने लगा है.मैं इसका विरोध नहीं करता कि केंद्र के पास ज्यादा अधिकार रहे  लेकिन राज्यों के बीच कर-राजस्व का अथवा योजना आयोग द्वारा योजना मद में राशि का बंटवारा जरूरत के और राज्य सरकार के काम-काज के आधार पर होना चाहिए न कि इस आधार पर कि वहां पर अपनी पार्टी की सरकार है या दूसरी पार्टी की.बिहार सरकार बार-बार केंद्र से प्रत्येक वर्ष आनेवाली प्राकृतिक आपदाओं से निबटने के लिए पैसे मांग रही है और केंद्र सरकार बड़ी बेशर्मी से उसकी मांग को अनसुनी कर दे रही है.बिहार में लगभग चालीस साल तक कांग्रेस की सत्ता रही है.उस समय केंद्र में भी कांग्रेस ही सत्ता पर काबिज थी.फ़िर भी बिहार को योजना आयोग द्वारा राष्ट्रीय औसत से काफी कम प्रति व्यक्ति योजना राशि दी गयी.परिणाम यह हुआ कि आजादी के समय प्रति व्यक्ति आय में सबसे अगली पंक्ति में खड़ा बिहार १९६१ आते-आते नीचे से दूसरे और १९७१ तक सबसे आखिरी स्थान पर पहुँच गया.बीच में बिहार में वर्षों तक जंगल राज कायम रहा.आज जब बिहार की सरकार कुछ अच्छा करना चाहती है तब केंद्र पैसा ही नहीं दे रहा है.इथेनोल आधारित उद्योग अगर बिहार में स्थापित होता है तो इससे बिहार के साथ-साथ पूरे देश, पूरी दुनिया को फायदा होगा.फ़िर भी केंद्र सरकार बिहार को परेशान करने के उद्देश्य से बिहार में इथेनोल आधारित उद्योगों की अनुमति नहीं दे रही है.जबकि इससे बिहार का कायाकल्प हो सकता है.लगता है सरकार भी लाठी की ही भाषा समझती है.किसान जब दिल्ली पहुँच कर डेरा डाल देते हैं तब केंद्र सरकार नींद से जागती है.बिहार को भी शायद कुछ ऐसा ही करना पड़ेगा तभी देश को १९१९ से कायम द्वैध शासन से मुक्ति मिलेगी.पहले भी बिहार चाहे असहयोग आन्दोलन रहा हो या भारत छोडो आन्दोलन या फ़िर सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन देश का मार्गदर्शन करता रहा है.

शनिवार, 21 नवंबर 2009

सुशासन के नाम पर


कभी फ्रांस की राज्यक्रांति के बाद हुए भीषण रक्तपात से विचलित होकर वहां के लेखकों-दार्शनिकों ने भींगे स्वर में कहा था कि हे माता प्रजातंत्र हमें माफ़ करना क्योंकि तेरे नाम पर न जाने क्या-क्या पाप किये जा रहे हैं.आजकल बिहार में भी सुशासन के नाम पर क्या नहीं हो रहा है.कभी कुसहा में कोसी तटबंध को सुशासन के नाम पर टूटने दिया जाता है तो कभी थाने में नशे में धुत्त दरोगा पत्रकार को ही पीट डालता है.कभी उसी सरकार को हम ५० पत्रकारों को सरकारी आवास देने की घोषणा करते देख सकते हैं.कभी मुखियों को शिक्षक बहाली में मुख्य भूमिका दे दी जाती है तो कभी उन्ही शिक्षकों को मेधा परीक्षा देने के लिए बाध्य कर दिया जाता है.कभी तो कहा जाता है कि परीक्षा में फेल होनेवाले शिक्षकों को नौकरी से निकाल दिया जायेगा तो कभी कहा जाता है कि निश्चिन्त होकर परीक्षा दीजिये आपकी नौकरी सुरक्षित है.दुनिया में परीक्षाओं के इतिहास में पहली बार ९९.५ प्रतिशत परीक्षार्थी उत्तीर्ण घोषित किये जाते हैं. सब कुछ सुशासन के नाम पर.सुशासन के नाम पर अति अयोग्य शिक्षकों को योग्यता का प्रमाणपत्र दिया जाता है. कभी सूचना के अधिकार के पालन में कथित सफलता के नाम पर जमकर ढोल पीटा जाता है तो अगले ही पल सूचना के अधिकार अधिनियम में बदलाव कर इसकी हत्या ही कर दी जाती है.शायद आर.टी.आई. आवेदनकर्ताओं को प्रताड़ित करने में मिली अपार सफलता को सरकार पचा नहीं पाई. कभी कोशी की बाढ़ में अपना परिजन खो देनेवालों को मुआवजे की घोषणा की जाती है तो कभी कहा जाता है कि डूबने-बह जानेवालों की लाश दिखाओ तभी मुआवजा मिलेगा.सब कुछ सुशासन के नाम पर.कभी सरकार के कल्याण मंत्रालय का प्रधान सचिव लोगों को चूहे खाने के लिए प्रोत्साहित करता है तो कभी किन्नरों को प्रसूति गृह की सुरक्षा के लिए नियुक्त करने का प्रस्ताव रखता है.यूं बहुत पहले पितामह मार्क्स ने सत्ता की परिभाषा करते हुए कहा था कि जिस दिन राज्य समाप्त हो जाएगा, वही असली सत्ता होगी। मार्क्स का यह सपना बिहार न जाने कब से पूरा कर रहा है। बिहार में राज्य समाप्त हो चुका है–सिर्फ राजा नीतीश कुमार बचे हैं।सुशासन के राष्ट्रीय प्रतीक बिहार के बारे में पटना हाईकोर्ट ने कहा है कि बिहार में सत्ता नाम की कोई चीज ही नहीं है। अब यहां पर नीतीश कुमार की सुशासनी सरकार एक समिति बना सकती है कि सत्ता की परिभाषा क्या है।भ्रष्टाचार बिहार में अंतरराष्ट्रीय उद्योग भी है। अच्छा कदाचारी वही माना जाता है जो नकल कर ले और किसी को पता भी न चले। अच्छे भ्रष्टाचारी की भी यही पहचान होती है।यह भी खबर आई है कि बिहार के भिखारी बिहार सरकार से ज्यादा बेहतर ढंग से अपना काम काज करते हैं। सुशासन सरकार के बनने के बाद ही बिहार के भिखारियों ने 2006 में ही भिखमंगा समाज बना लिया था।इनकी कमाई बिहार के दैनिक वेतन भोगी मजदूरों से भी ज्यादा है। बिहार में दैनिक वेतन भोगी को 81 रूपए रोज मिलता है। जबकि भिखारी डेढ़–दो सौ रुपए रोज कमाता है। आशा की जा रही है कि बिहार सरकार को जब केंद्र सरकार से बिजली और धन की भीख मांगने से फुरसत मिल जाएगी तो वह भिखारी कल्याण आयोग का गठन कर ही लेगी।कभी सुशासन कहता है कि जे.पी. आन्दोलन में भाग लेनेवालों को पेंशन दी जाएगी तो कभी कहा जाता है कि पेंशन सिर्फ उन्हें ही दी जायेगी जिन्होंने कम-से-कम एक महीना जेल में बिताया हो.खुद को भ्रष्टाचार का जानी-दुश्मन कहनेवाली सरकार राहत घोटाले के आरोपी गौतम गोस्वामी के इलाज का खर्च उठाती पाई जाती है.मुख्यमंत्री अपने श्रीमुख से निर्भीक पत्रकारिता का गुणगान करते हैं तो दूसरी ओर बिहार सरकार का जन संपर्क विभाग अपने वेबसाइट पर चेतावनी देता है कि कोई भी समाचार पत्र-पत्रिका, जो कि स्वीकृत सूची में शामिल होने की अनिवार्य पात्रता रखते हैं, को स्वीकृत सूची में शामिल किया जाना समिति के लिए बाध्यकारी नहीं होगा.साथ ही कहता है कि किसी मीडिया संस्थान का काम अगर राज्य हित में नहीं है तो उसे दिए जा रहे विज्ञापन रोके जा सकते हैं.उसे स्वीकृत सूची से किसी भी वक्त बाहर किया जा सकता है. अब सवाल उठता है कि मीडिया संस्थान का काम राज्य हित में है या नहीं ये कौन तय करेगा? जन संपर्क विभाग में तैनात सरकारी बाबू या भ्रष्टाचार में लिप्त नेता?कभी सरकार कहती है कि नवनियुक्त शिक्षकों को पेंशन और अनुकम्पा लाभ नहीं मिलेंगे तो कभी आनन-फानन में सरकार घोषणा करती है कि ये दोनों सुविधाएँ शिक्षकों को दी जाएँगी.बंटाईदारी कानून पर तो सुशासन की स्थिति अजीबोगरीब है. कभी सरकार कहती है कानून लागू होगा तो कभी कहती है नहीं होगा.सरकार के मुखिया जब-तब विकास यात्रा पर निकलते हैं.गेहूं कटवाकर गाँव में शिविर लगवाते हैं. गाँव में रूकते हैं. कैबिनेट की मीटिंग करते हैं.थोक के भाव में शिलान्यास करते हैं.लाखों रूपये इन सब ताम-झाम में खर्च किये जाते हैं.पर काम शिलान्यास से आगे नहीं बढ़ता.क्षुब्ध होकर जनता शिलान्यास का शिला-पट्ट ही उखाड़ फेंकती है.सुशासन केंद्र से सूखा के नाम पर १०१५२ करोड़ रूपए की मांग करता है और एक सप्ताह बीतते-बीतते इसे संशोधित कर २३ हजार करोड़ माँगा जाता है.और यह सब होता है सुशासन के नाम पर.दस साल पहले साइकिल पर चलनेवाला मुखिया अब बोलेरो और स्कॉर्पियो पर चल रहा है लेकिन सरकार कान में तेल डाले सोई रहती है.पैसा दे दिया न भाई अब सुशासन कहाँ तक देखें कि पैसा किस तरह खर्च किया जा रहा है. मार्च से पहले सब खर्च हो जाना चाहिए.फंड लैप्स हुआ तो खैर नहीं चाहे पूरा पैसा सरकार के खाते से निकलकर मुखियाजी के खाते में ही क्यों न पहुँच जाए.

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

जनसरोकार से कटती राजनीति


कहते हैं कि जब अवध के नवाब वाजिद अली शाह को गिरफ्तार किया गया था तो लखनऊ में एक कुत्ता तक नहीं भूंका था.कुछ ऐसा ही हुआ जब बिहार में सरकार ने जनता से सूचना के अधिकार को लगभग छीन लिया.बेवजह के मुद्दों पर गला फाड़ कर चिल्लानेवाले राजनेताओं ने आर.टी.आई. जैसे जनता से जुड़े मुद्दे पर एक बयान तक देना भी उचित नहीं समझा.लगता तो ऐसा है जैसे हमारे राजनेता चाहे वे किसी भी दल से सम्बद्ध हों उनका जनसरोकार से कुछ लेना-देना रह ही नहीं गया है.कोई भी राजनीतिक दल जनता को इस तरह का कोई अधिकार देना नहीं चाहता इससे तो यही लगता है.कुछ दिन पहले जब कानून में बदलाव की चर्चा शुरू हुई थी तब राजद नेता रामकृपाल यादव ने विरोध जरूर किया था परन्तु अब जबकि कानून बदलने को कैबिनेट की मंजूरी मिल चुकी है न जाने क्यों वे भी पूरी तरह खामोश हैं.

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

सोनपुर मेले का बदलता स्वरुप

दुनिया परिवर्तनशील है.सबकुछ पल-पल बदलता रहता है.समाज बदल रहा है और साथ-साथ बदल रहा है सांस्कृतिक परिदृश्य.दुनिया की सबसे पुरानी भारतीय संस्कृति अगर आज भी कायम है तो इसके पीछे जो शक्ति है वह है इसकी नमनीयता.लेकिन पहले जहाँ सांस्कृतिक परिवर्तन की गति धीमी थी अब वह काफी तेज हो गई है.कल मैं विश्वप्रसिद्ध सोनपुर पशु मेले में घूमने गया था.हाजीपुर और सोनपुर जुड़वाँ शहर हैं और दोनों के बीच में हजारों साल से अनवरत प्रवाहित है सदानीरा नारायणी गंडक.बचपन में जब १९८४-८५ में मैं माँ-पिताजी के साथ मेले में जाता था तब एक चाकू जरूर खरीदता था जिससे अपने ननिहाल जगन्नाथपुर में जहाँ मैं रहता था में कभी बांस का तीर-धनुष बनाता तो कभी शीशम का डंडा तो कभी ताड़ का बैट.इतना ही नहीं तब हथिसार से लेकर घुडसाल और मवेशी बाजार तक में भारी भीड़ रहती थी. लेकिन आज मेला घूमते हुए मुझे भारी निराशा हुई.हाथी और घोड़े तो मेला से गायब थे ही और मवेशी भी नाममात्र के थे.वैसे भी कृषि कार्यों में पशुओं की जरुरत समाप्त हो जाने के चलते कोई भी अब मवेशी पालना नहीं चाहता.हाँ, चाकू सहित लोहे के सामान और मिट्टी की सीटी जरूर जहाँ-तहां बिकते हुए नजर आये. स्थिति देखकर मेरे मन में यह बात आई कि क्या इस मेले के अब भी पशु मेला कहा जा सकता है? अब जबकि यह पशुमेला रहा ही नहीं तब फ़िर इसका एशिया या दुनिया का सबसे बड़ा पशुमेला होने का तो प्रश्न ही नहीं.हाँ, गर्म कपड़ों की दुकानों और गलियों में जिस तरह की भीड़ थी वह शायद इसे दुनिया का सबसे बड़ा मेला साबित करने के लिए काफी हो.विधान-सभा चुनाव के लिए एक साल से भी कम समय शेष रह जाने के कारण हाजीपुर से लेकर सोनपुर तक पूरे मेले में जगह-जगह राजनैतिक दलों के बैनर लगाये गए थे.मेले में ज्यादातर दुकानें कपड़ों की थी.पहले जहाँ एक-दो थियेटर वाले ही मेला में आते थे इस बार आधा दर्जन से भी ज्यादा थियेटर आये हुए थे.अगर मैं कहूं कि सोनपुर मेला का मतलब अब थियेटरों का मेला हो गया है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी. 

बुधवार, 18 नवंबर 2009

बिहार में शांतिपूर्ण मौत को प्राप्त हुआ सूचना का अधिकार


मैंने कई दिन पहले ही आशंका व्यक्त की थी कि बिहार सरकार इस गरीब प्रदेश में सूचना के अधिकार को शांतिपूर्ण मौत देने की साजिश रच रही है. बड़े ही दुःख की बात है कि कैबिनेट ने भी इस पर अपनी मुहर लगा दी है.अब एक आवेदन पर एक ही सूचना प्राप्त की जा सकेगी यानि पूर्णता में अगर सूचना चाहिए तो १००-२०० रूपये जेब से निकालने पड़ेंगे. क्या सरकार है? गरीब राज्य की सरकार!दूसरी ओर राजस्व संग्रह के दृष्टिकोण से देंखें तो इससे केवल कुछ करोड़ सालाना से ज्यादा राशि इकट्ठी नहीं होगी. तो फ़िर सरकार के इस कदम का क्या उद्देश्य है? उद्देश्य है अकर्मण्य प्रशासनिक अधिकारियों को इसकी चपेट में आने से बचाना.लेकिन जनता तो अब निरुपाय हो ही गई न. एक सवाल तो सिर्फ अपीलीय प्राधिकार का पता पूछने में ही समाप्त हो जायेगा फ़िर वांछित प्रश्न कैसे पूछे जा सकेंगे?दूसरे शब्दों में कहें तो अब उस बिहार में सूचना का अधिकार नख-दन्त विहीन हो गया है जहाँ की जनता पूरे देश में नौकरशाही से सबसे ज्यादा परेशान है.अब बिहार में एक तरह से यह अधिकार समाप्त हो गया है. कौमा में चला गया है यह अधिकार. अच्छा होता यदि इस कानून को समाप्त ही कर दिया जाता. वैसे भी किसी को हमेशा के लिए पंगु बनाकर जीवित रखने से तो मौत दे देना ही अच्छा होता है. चाहे मामला व्यक्ति का हो या कानून का. केंद्र ने २००५ में आर.टी.आई. के माध्यम से जो तोहफा दिया था बिहार की सुशासनबाबू की सरकार ने समाप्त कर दिया है.अब जनता न तो अधिकारियों के क्रियाकलापों को नियंत्रित कर पायेगी न ही पंचायत और नगर निकाय के प्रतिनिधियों से सवाल ही कर पायेगी.जनता के अधिकार के इस शांतिपूर्ण अपहरण में शामिल इन षड्यंत्रकर्ताओं को ईश्वर सद्बुद्धि दें.

ओबामा ने दिखाया भारत को ठेंगा


जब ओबामा को नोबेल पुरस्कार दिया गया था तभी यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि अब ओबामा को दोहरे व्यक्तित्व से लड़ना पड़ेगा.एक तरफ होगा नोबेल-विजेता ओबामा तो दूसरी ओर राष्ट्रपति ओबामा.ओबामा की चीन यात्रा में निस्संदेह नोबेल विजेता ओबामा का पलड़ा भारी रहा. ओबामा की एशिया यात्रा से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि ओबामा यथास्थितिवादी नीतियाँ अपना रहे हैं. वे नहीं चाहते कि चीन से तत्काल तनाव बढे भले ही उनकी यह नीति अमेरिका के लिए दीर्घकालीन रूप से नुकसानदेह हो.जिस तरह उन्होंने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया है उससे इस समय तो ऐसा लग रहा है कि अमेरिकी विदेश नीति पूरी तरह चीन-केन्द्रित हो गई है. क्लिंटन के समय से ही जो एशिया में भारत को महत्व देकर संतुलन साधने का प्रयास किया जा रहा था लगता है उसे तिलांजली देने का ओबामा प्रशासन ने पूरी तरह से मन बना लिया है.जाहिर है कि इस बदलाव का सबसे ज्यादा प्रभाव भारत पर पड़ेगा जिसके सम्बन्ध पहले से ही चीन के साथ तनावपूर्ण चल रहे हैं.तो क्या यह मान लिया जाये कि भारत के साथ धोखा हुआ है? हुआ तो है लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जब भी एक कमजोर और एक शक्तिशाली के बीच संबंधों का निर्धारण होता है तो निर्णायक हमेशा मजबूत पक्ष ही होता है, कमजोर को तो सिर्फ अमल करना पड़ता है.अब भारतीय कूटनीतिकों को देखना चाहिए कि हमारे पास क्या विकल्प शेष हैं?

सोमवार, 16 नवंबर 2009

संवेदनहीनता की हद


हमारे प्रदेश बिहार सहित हमारे देश में डॉक्टर को भगवान माना जाता है जो अपने हुनर द्वारा मरीजों को एक नया जीवन देता है.लेकिन जब उन्हीं डॉक्टरों की संवेदनहीनता के चलते उस राज्य के हजारों मरीजों का जीवन खतरे में पड़ जाये जो अपनी गरीबी के लिए जाना जाता है तब कई सवाल खड़े हो जाते हैं.हड़ताल के अधिकार का गाँधी ने भी इस्तेमाल किया था. लेकिन डॉक्टरी का पेशा अन्य पेशों से इस मामले में अलग है कि इसका सीधा सम्बन्ध मानव-जीवन से है. मैं ये नहीं कहता कि डॉक्टरों को सम्मानित जीवन जीने का अधिकार नहीं है. लेकिन अपनी मांग रखने के लिए बिहार के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल पी.एम.सी.एच. के जूनियर डॉक्टर दूसरा रास्ता भी चुन सकते थे.हड़ताल के दौरान पिछले ७ दिनों में कम-से-कम ८० लोगों की अनमोल जिंदगियों का अंत हो चुका है. जिसे हम दे नहीं सकते हमें उसे छीनने का कोई हक़ नहीं है. हड़ताली डॉक्टरों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वे अपनी मेडिकल की पढाई पर जितना खर्च करते हैं सरकार का, समाज का उन पर उससे दस गुना ज्यादा पैसा खर्च होता है जो उन पर समाज का कर्ज होता है.इसी बिहार में और पी.एम.सी.एच. के ही मेडिसिन विभाग में शिवनारायण सिंह जैसे डॉक्टर भी हुए हैं जिन्हें उनकी निःस्वार्थ सेवा भावना के चलते गरीबों ने भगवान का दर्जा दिया.उनको गुजरे अभी २० साल भी नहीं हुए और हमारे डॉक्टर-मित्रों के आदर्श इस हद तक बदल गए कि इन्हें मरीजों की जिंदगी तक की परवा नहीं है.

दो महानों में महान समानताएं


आज जब सचिन अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में अपना २० साल पूरा होने के एक दिन बाद खेलने को उतरे तो दर्शकों/श्रोताओं को उम्मीद थी कि वे एक बार फ़िर यादगार पारी खेलेंगे. लेकिन जैसा कि ब्रेडमैन ने उनके बारे कहा था कि वे उन्ही की तरह खेलते हैं, सचिन भी उसी तरह ४ रन बनाकर आउट हो गए जैसे ब्रेडमैन अपनी अंतिम पारी शून्य पर आउट हो गए थे. निराशा तो हुई लेकिन यह हमारा सौभाग्य है कि यह सचिन की अंतिम पारी नहीं थी हालाँकि यह क्रिकेट के इन दो भगवानों के खेल में अद्भुत समानताओं को तो दर्शाता ही है. किन्ही दो व्यक्तियों की उपलब्धियों की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि हर व्यक्ति के जीवन की स्थितियां एक जैसी नहीं होती.हाँ, खेलों में हम कुछ हद तक ऐसा करने की छूट पा लेते हैं क्योंकि वहां तुलना के लिए हमारे पास उनका खेल-रिकार्ड उपलब्ध होता है.क्रिकेट भारी और अद्भुत अनिश्चितताओं का खेल माना जाता है और सचिन की आज की पारी का मात्र ४ रन पर सिमट जाना इसे सत्य साबित भी करता है. क्रिकेट के भगवान को हमारी ओर से अपना २० साल का कैरिअर पूरा करने के लिए बहुत-बहुत बधाई. साथ ही हम उम्मीद करते हैं वे आगे कई सालों तक इसी तरह खेलते रहेंगे और बैट रुपी सारंगी पर नई-नई धुनें छेड़ते रहेंगे. मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मैं बहुत भाग्यशाली हूँ क्योंकि मैंने उन्हें टी.वी पर अनगिनत बार खेलते हुए लाइव देखा है.भले ही प्रत्यक्षतः उन्हें खेलता देखने का अवसर नहीं मिला हो. शायद भविष्य में मेरी यह ख्वाहिश भी पूरी हो जाये.