शनिवार, 24 अप्रैल 2021

आईसीयू में भारत, भाषण झाड़ते पीएम

ममित्रों, इन दिनों कोविद 19 के कारण देश के हालात काफी खराब हैं। जांच में हर तीसरा व्यक्ति कोरोना पॉजीटिव मिल रहा है। संक्रमितों की मृत्यु दर पिछले साल के मुकाबले तीन गुनी है। आज शनिवार को मिली जानकारी के मुताबिक, देश में पिछले 24 घंटे में 2 624 मौतें हो गईं हैं और 3.46 लाख से ज्‍यादा संक्रमण के नए केस आए हैं. भारत में अब तक मौतों का कुल आंकड़ा 1,89,544 हो गया है और सक्रिय मामलों की कुल संख्या 25 लाख 52 हजार के पार हो गए हैं. उधर कनाडा ने भारत से जानेवाली सभी उड़ानों पर अगले ३० दिनों के लिए रोक लगा दी है. ब्रिटेन ने पहले ही भारत को ‘रेड-लिस्ट’ में जोड़ लिया था, जहां से कोविड -19 मामलों की अधिक संख्या के कारण अधिकांश यात्रा पर प्रतिबंध है. इसके अलावा, फ्रांस ब्राजील, चिली, अर्जेंटीना, दक्षिण अफ्रीका और भारत के यात्रियों के लिए 10-दिन के लिए क्वारंटीन कर रहा है, जबकि संयुक्त अरब अमीरात ने भारत से सभी उड़ानों को रद्द कर दिया है. मित्रों, देश में कोविद की ऐसी भयावह स्थिति तब है जबकि महामारी अभी अपने शबाब पर पहुँची भी नहीं है. इस बीच अमेरिकी के एक विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा किया गया है. इस अध्ययन में दावा किया गया है यही हालत रही तो मध्य मई तक भारत में कोविद से होनेवाली मौतों का आंकड़ा रोजाना ५६०० तक पहुँच जाएगा. मित्रों, इस समय देश में ऑक्सीजन की भारी किल्लत हो गई है. विद्युत् शवदाहगृहों में इतनी ज्यादा संख्या में लाशें पहुँच रही हैं कि उनकी भट्ठियां पिघलने लगीं हैं. सर गंगाराम अस्पताल जैसे राष्ट्रीय राजधानी के प्रतिष्ठित अस्पताल में कल ३० से ज्यादा कोरोना मरीजों की मौत हो गई. स्थिति इतनी ख़राब है कि दिल्ली के सक्षम लोग तीन गुना ज्यादा किराया देकर दुबई भागने लगे हैं जबकि पिछले साल दुबई से लोग भारत आ रहे थे. कई सारे विधायक-अधिकारी भी कोरोना का शिकार हो चुके हैं. कम-से-कम कोरोना बीमारों में कोई भेद-भाव नहीं कर रहा वरना भारत में कानून तो अंग्रेजों के ज़माने से ही अमीरों की रखैल है. मित्रों, आप कहेंगे कि पिछले एक साल से सरकारें इस मामले में क्या कर रही थीं. ऑक्सीजन प्लांट बैठाना कोई राकेट साइंस तो है नहीं. तो जवाब है कि पिछले साल केंद्र सरकार ने ऑक्सीजन प्लांट खोलने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को दी थीं और राज्य सरकारों ने उस पर ध्यान तक नहीं दिया. राज्य सरकारों को पैसे भी दे दिए गए थे। बांकी राज्य सरकारों ने उनका किधर दुरूपयोग किया पता नहीं लेकिन केजरीवाल ने पूरा पैसा टीवी पर थोबड़ा दिखाने में लगा दिया। फिर केंद्र सरकार की जिम्मेदारी थी कि वो राज्य सरकारों को तकादा करके काम पूरा करवाए लेकिन केंद्र ने ऐसा नहीं किया. अब जबकि कोरोना दोबारा कहीं ज्यादा भीषणता के साथ कोहराम मचा रहा है तो अफरातफरी मची हुई है लेकिन भोज शुरू होने के बाद कद्दू रोपने से कब कोई लाभ हुआ है जो अब होगा. मित्रों, इतना ही नहीं जब कोरोना की दूसरी लहर ने कहर ढाना शुरू कर दिया था तब भारत के माननीय प्रधानसेवक जी बंगाल में बड़ी-बड़ी रैलियां कर रहे थे जो कि अपने आपमें खुद एक अपराध था. अब प्रधान सेवक जी ने बेमन से रैलियों में जाना बंद कर दिया है लेकिन रैलियों को बंद नहीं किया है बल्कि अब डिजिटली रैलियों को संबोधित कर रहे हैं. मतलब अब भी रैलियों में लोगों को ईकट्ठा किया जा रहा है जबकि कोरोना से देश की हालत ख़राब हो चुकी है. मतलब कि प्रधानमंत्री जी को सिर्फ कुर्सी से मतलब है जनता के स्वास्थ्य से उनको कुछ भी लेना-देना नहीं है. मित्रों, आप कहेंगे कि प्रधानमंत्री जी लगातार मीटिंग तो कर ही रहे हैं और क्या करें? मीटिंग हो, होनी भी चाहिए लेकिन उसका परिणाम भी तो धरातल पर दिखे. हमने मोदी सरकार के गठन के मात्र २ महीने के बाद अपने गवर्नेंट विथ डिफरेंस कहाँ तक डिफरेंट? शीर्षक आलेख में कहा था कि मोदी जी हमें आपकी कोशिश नहीं परिणाम चाहिए. हमने उस आलेख में एक बन्दर के जंगल का राजा बन जाने की कहानी भी लिखी थी जिसमें बन्दर एक डाल से दूसरे डाल पर कूद-कूद कर जानवरों से अपना व्यवहार सुधारने की अपील करता फिरता है. बाद में जब जानवर क्षुब्ध हो जाते हैं तब कहता है कि मेरी कोशिश में तो कमी नहीं थी. मित्रों, जाहिर है कि मित्रों वाले प्रधानमंत्री जी हर मोर्चे पर विफल साबित हो चुके हैं. उनसे न चीन संभल रहा है, न चीनी बीमारी संभल रही है. अमेरिका जो प्रधानमंत्री का सबसे नजदीकी मित्र है इस संकट में टीका बनाने के लिए कच्चा माल तक नहीं दे रहा. कोरोना की जो हालत है उसमें पता नहीं मेरा कौन-सा आलेख मेरा अंतिम आलेख हो जाए. अंत में यही कहूँगा कि चाय-पकौडेवाले को टिप्स तो दी जा सकती है लेकिन उनके हाथों में देश नहीं दिया जा सकता.

रविवार, 11 अप्रैल 2021

ये कहाँ आ गए हम?

मित्रों, भारत अगले साल अपनी स्वतंत्रता के ७५ साल पूरे करने जा रहा है. इन ७५ सालों में देश ने बहुत सारे संकटों का सामना किया है, बहुत सारे उतार-चढाव देखे हैं. यद्यपि अपनी इस उपलब्धि पर हम गर्व कर सकते हैं कि हमने देश की एकता और अखंडता को बनाए रखा तथापि वर्तमान काल में जो देश की स्थिति है उसे कहीं से भी संतोषजनक नहीं कहा जा सकता. मित्रों, हमारे संविधान निर्माताओं ने यह सपने में भी नहीं सोंचा होगा कि आनेवाले दशकों में हमारे राजनेताओं के लिए सिर्फ कुर्सी और कमाई का महत्व रह जाएगा, देशहित की कोई कीमत नहीं रहेगी. दुर्भाग्यवश राज्य के लिए नीति निर्देशक तत्वों के माध्यम से सम्विधाननिर्माताओं ने जो काम आनेवाली पीढ़ी को सौंपा था उसको पूरा कर पाने में हम पूरी तरह से असफल रहे हैं और आज भी संविधान का २० प्रतिशत भाग लागू होने की प्रतीक्षा कर रहा है. मित्रों, वर्तमान भाजपा सरकार ने भी अपने तीन प्रमुख वादों में से राम मन्दिर बनाने और धारा ३७० हटाने के वादे को तो पूरा कर दिया है लेकिन नीति निर्देशक तत्वों में से एक अनुच्छेद ४४ जिसमें सरकार को समान सिविल संहिता बनाने का निर्देश दिया गया है को लागू करने में अभी भी आना-कानी कर रही है जबकि देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए इस अनुच्छेद को लागू करना सबसे ज्यादा आवश्यक था और है. मित्रों, हमारे महान नेताओं की दूसरी सबसे बड़ी विफलता रही है प्रशासनिक सुधार नहीं कर पाना. न जाने क्या सोंचकर हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने भारतीय सिविल सेवकों को स्टील फ्रेम ऑफ़ इंडिया कहा था. दरअसल यह ब्लड ड्रिंकर ऑफ़ इंडिया हैं. जब प्रशासनिक ढांचा अंग्रेजों वाला है तो तंत्र काम कैसे राम राज्य वाला करे? आज भी प्रशासनिक अधिकारी अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल करके पैसा बना रहे हैं. और सिर्फ अधिकारी ही क्यों कर्मचारी भी जनता को लूटने में इस कदर तत्पर हैं कि उन्होंने देश को गुलाम बनानेवाले अंग्रेजों को भी कोसों पीछे छोड़ दिया है. मित्रों, पिछले दिनों घटी दो घटनाओं ने भारतीय लोकतंत्र में लोक के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. पहली घटना सचिन वाजे वसूली कांड है जिसमें महाराष्ट्र कैडर के आईपीएस अधिकारी सचिन वाजे के बारे में मुंबई के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर परमवीर सिंह ने आरोप लगाया है कि कई दशकों से निलंबित चल रहे उस अधिकारी को महाराष्ट्र के तत्कालीन गृह मंत्री अनिल देशमुख ने २ करोड़ रूपये लेकर फिर से बहाल किया था. इतना ही नहीं सचिन वाजे प्रत्येक महीने १०० करोड़ रूपये जनता से वसूली करके गृह मंत्री को पहुंचाने की ड्यूटी कर रहा था. कितनी शर्मनाक घटना है यह! देश में न जाने कितने अनिल देशमुख और कितने सचिन वाजे पदारूढ हैं? ऐसे तंत्र से जनता क्यों कर उम्मीद करे और कैसे उम्मीद करे. दूसरी घटना बिहार के मधुबनी में घटी है जहाँ कमजोर और ईमानदार पक्ष के संजय सिंह को पुलिस ने झूठे हरिजन एक्ट में फंसाकार जेल भेज दिया ताकि गुंडे उसके पूरे परिवार की हत्या कर दें. आखिर कानून का हाथ किसके साथ है? पीड़ितों के साथ या पीडकों के साथ? सर्वहारा वर्ग के साथ या रिश्वत देने में सक्षम धनिकों के साथ? आखिर लोग पुलिस थानों में जाने से डरते क्यों हैं? मैं खुद कई ऐसे मामलों का चश्मदीद गवाह हूँ जिनमें पीड़ित वर्ग जब थाने में शिकायत दर्ज करवाने पहुंचा तो उलटे उसे ही जेल भेज दिया गया. मित्रों, तंत्र का मुख़्तार अंसारी जैसे दुर्दान्तों के आगे बिछ जाना भी काफी चिंताजनक है. मुख़्तार जब पंजाब की जेल में था तब चिकित्सकों ने उसको नौ बीमारियों से ग्रस्त बता दिया था ताकि वो अस्पताल में रहकर दरबार लगा सके. लेकिन जब मुख़्तार उत्तर प्रदेश पहुंचा तो न सिर्फ व्हील चेयर छोड़ अपने पैरों पर चलने लगा बल्कि सारी बीमारियाँ भी गायब हो गईं. मित्रों, जिस तरह पंजाब की सरकार ने मुख़्तार के बचाव में जी-जान लगा दी, जिस तरह सचिन वाजे कांड हुआ, जिस तरह मधुबनी में संजय सिंह को झूठे मुकदमे में जेल में डाल दिया गया उससे तो यही लगता है कि आजादी के ७५ सालों के बाद हमारा लोकतंत्र अपराधियों का, अपराधियों के लिए और अपराधियों द्वारा संचालित है. मित्रों, इन दिनों बंगाल में चुनाव चल रहा है. अजी चुनाव क्या खून की होली खेली जा रही है. जो सत्ता के खिलाफ जाएगा जान से जाएगा. यह लोकतंत्र है या बन्दूकतंत्र. कल तृणमूल समर्थक कुछ कथित अल्पसंख्यक महिलाओं ने एक हिन्दू महिला से हथियार के बल पर बंधक के तौर पर उसका बच्चा छीन लिया जिससे वो भाजपा को वोट न देकर तृणमूल को वोट दे. यह कैसा चुनाव, कैसी सरकार और कैसा लोकतंत्र है भाई? उधर नक्सलियों ने भी बन्दूक के बल पर अपनी समानांतर सरकार चला रखी है जिसमें हमारे नेता भी सहयोग दे रहे हैं. मित्रों, तथापि एक और स्थान पर हमारा लोकतंत्र अपने मूल मार्ग से भटक रहा है. जैसा कि हमने अपने आलेख की शुरुआत में ही कहा कि भारतीय संविधान आज तक भी पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है. भारतीय संविधान के भाग ४ में नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद ३८ कहता है कि राज्य लोक कल्याण में अभिवृद्धि को सुनिश्चित करेगा. लेकिन वर्तमान सरकार निजीकरण की रट लगाए हुए है. स्वास्थ्य और शिक्षा का निजीकरण पहले ही हो चुका है. न तो सरकारी स्कूल और न ही सरकारी अस्पताल किसी काम के रह गए हैं. रेलवे का भी निजीकरण अब कुछ दिनों की बात रह गई है. फिर गरीब कैसे पढ़ेगा, कैसे ईलाज करवाएगा, कैसे यात्रा करेगा और कैसे जीएगा? उस पर बेरोजगारी पहले से ही आसमान छू रही है. अब कोरोना की दूसरी लहर को देश की गरीब और मध्यमवर्गीय जनता कैसे झेलेगी? केंद्र सरकार का पिछले साल कोरोना की पहली लहर के समय रवैया कमोबेश वही था जो सवा सौ साल पहले पुणे के प्लेग के समय अंग्रेज सरकार का था. मित्रों, कुल मिलाकर आजादी के ७५ साल बाद भी हमारा लोकतंत्र वैसा नहीं है जैसा होने का सपना शहीदों ने देखा था. बल्कि भ्रष्टाचार और न्याय की उपलब्धता के मामले में स्थिति १९४७ के मुकाबले कहीं ज्यादा ख़राब है. देश भले ही कितनी भी तेज जीडीपी दर प्राप्त कर ले देश देश मत्स्य न्याय की दिशा में बढ़ रहा है. किसी शायर ने शायद हमारे लोकतंत्र के बारे में ही ये पंक्तियाँ कही होंगी- ले आई जिंदगी हमें कहाँ पर कहाँ से, ये तो वही जगह है गुजरे थे हम जहाँ से. आखिर कब तक हमारा लोकतंत्र सिर्फ गोल चक्कर लगाता रहेगा?

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

गलती से निर्मला सीतारामण

मित्रों, सियासत भी अजीब चीज है. यहाँ हंस आजीवन दाना चुगते रह जाते हैं और कौवे मोती खाते हैं. देश में एक-से-एक अर्थशास्त्र के उद्भट विद्वान भरे पड़े हैं लेकिन मोदी जी ने वित्त मंत्री बना रखा है एक ऐसी महिला को जिसे अर्थशास्त्र की ए, बी, सी, डी तक पता नहीं है. इसी तरह जब सुरेश प्रभु को रेल मंत्री बनाया गया था और उनके कामकाज की पूरी दुनिया में सराहना हो रही थी तब उनको एक वृद्ध समाजवादी ने कहा था कि सुरेश बहुत जल्द तुमको हटा दिया जाएगा क्योंकि मोदी को योग्य व्यक्ति चाहिए ही नहीं और बाद में हुआ भी वही. खैर सुरेश जी के साथ जो हुआ सो हुआ लेकिन निर्मला सीतारामन जो कर रही हैं वो तो अद्भुत है. मित्रों, दरअसल परसों रात में वित्त मंत्रालय ने छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज में कटौती करने का निर्णय लिया था जो कल १ अप्रैल यानि मूर्ख दिवस को लागू होनेवाला था. लेकिन कल सुबह होते ही भारत की महानतम वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने मंत्रालय द्वारा लिए गए इस आदेश को गलती से जारी हो गया बता कर वापस ले लिया. जिससे काफी समय तक समाचार माध्यमों के समक्ष असमंजस की स्थिति बनी रही. कल मूर्ख दिवस होने के चलते भी लोग सरकार के यू टर्न को लेकर भ्रमित रहे. लोगों को लगता रहा कि सरकार ने कहीं जान-बूझकर उनको मूर्ख तो नहीं बनाया है. वैसे यह सरकार तो झूठ बोलकर देश की जनता को रोजाना मूर्ख बनाती है लेकिन कल दिवस विशेष था. मित्रों, मैं काफी दिनों से कहता आ रहा हूँ कि निर्मला जी वित्त मंत्री के पद के लायक नहीं हैं लेकिन मोदी ठहरे बहरे और मनमौजी. जो सिर्फ अपने मन की करते हैं और सुनते हैं. परन्तु अब तो निर्मला जी हद की भी हद कर चुकी हैं. भारत का वित्त मंत्री आदेश जारी कर रातों-रात उसे वापस ले ले कम-से-कम मैंने तो न कभी ऐसा देखा और न कभी सुना. जैसे कोई नीम हकीम अंदाजे पर तुक्केबाजी करते हुए मरीज का ईलाज करता है ठीक उसी तरह से हमारी नीमहकीम वित्त मंत्री अर्थव्यवस्था का सञ्चालन कर रही हैं. मित्रों, आपको याद होगा एक समय निर्मला जी देश की रक्षा मंत्री थी. हमें उनका उपकार मानना चाहिए कि उन्होंने गलती से कभी किसी पडोसी पर परमाणु बम नहीं गिरवा दिया या सेना को किसी महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र से वापस नहीं बुलवा लिया. अगर उन्होंने तब भी गलती से ऐसा आदेश दे दिया होता तो न जाने उसका परिणाम क्या होता. तथापि उनका वित्त मंत्री होना भी देश के लिए कम हानिकारक नहीं है. ऐसे समय में जब देश की अर्थव्यवस्था संकट में है गलती से ड्राइविंग सीट पर एक गलत शख्स बैठी हुई है. हालाँकि सच तो यह भी है कि जबसे मोदी जी की सरकार सत्ता में आई है तभी से अर्थव्यवस्था को रसातल में पहुँचाने की दिशा में कठिन परिश्रम किया जा रहा है. अंत में मैं निर्मला जी से कहना चाहूँगा कि सिर्फ आप ही नहीं बल्कि आपकी पूरी सरकार हमारी गलती से बनी है और गलती से देश का सञ्चालन कर रही है.

गुरुवार, 25 मार्च 2021

और भी बुरे दिन आनेवाले हैं

मित्रों, प्रबंधक की परीक्षा सुख में नहीं दुःख में होती है. आपको याद होगा जब २००८ की आर्थिक मंदी आई थी तब उससे भारत की तत्कालीन संघ सरकार ने कैसे निबटा था और भारत पूर्वी एशिया से उठी उस आर्थिक सुनामी से बेदाग बच गया था. तब भारत सरकार के आर्थिक इंतजामों की दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी. मित्रों, हमारा देश पिछले कई सालों से आर्थिक मोर्चे पर जूझ रहा है जिसे कोरोना ने और भी चिंताजनक बना दिया है. अब केंद्र सरकार की गलतियों का खामियाजा भुगतने की बारी राज्य सरकारों की है. कोरोना के चलते राज्यों के अपने राजस्व नुकसान तो अलग हैं, ऊपर से उन्हें जीएसटी के हिस्से में इस वित्त वर्ष में केंद्र से करीब तीन लाख करोड़ रूपये कम मिले हैं. इतना ही नहीं अगले साल भी इतनी ही कमी रहनेवाली है. मित्रों, इसके अलावा वित्त आयोग की सिफारिशों से भी राज्यों की कमाई या राजस्व को आनेवाले वर्षों में जोर का झटका लगनेवाला है. केंद्र ने राज्य सरकारों को जीएसटी में नुकसान की भरपाई की जो गारंटी दी है वह २०२३ में समाप्त हो जाएगी क्योंकि १५वें वित्त आयोग ने इसे बढ़ाने की कोई सिफारिश नहीं की है. इस गारंटी के खत्म होने के बाद राज्यों के राजस्व का पूरा संतुलन बिगड़ जाएगा और जीएसटी में नुकसान की भरपाई खुद से करनी होगी. मित्रों, यही नहीं वित्त आयोग ने केद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी का सूत्र भी बदल दिया है. नई व्यवस्था में जनसँख्या नियंत्रण, स्वास्थ्य व शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन के पैमाने भी जोड़े गए हैं. इंडिया रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय करों में ८ राज्यों (आन्ध्र, असम, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, ओडिशा, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश) का हिस्सा २४ से लेकर ११८ (कर्नाटक) प्रतिशत तक घट जाएगा. दूसरी तरफ महाराष्ट्र, गुजरात, अरुणाचल की पौ बारह रहेगी. मित्रों, आप जानते हैं कि केंद्र के करों में सेस और सरचार्ज का हिस्सा बढ़ता जा रहा है जिनमें से राज्यों को कुछ नहीं मिलता. केन्द्रीय कर राजस्व में इनका हिस्सा २०१२ में १०.४ प्रतिशत से बढ़कर २०२१ में १९.९ प्रतिशत हो गया है. मित्रों, बात इतनी भर होती तो फिर भी गनीमत थी. वित्त आयोग ने केंद्र से राज्यों को जानेवाले अनुदानों में बढ़ोतरी की सिफारिश की है लेकिन शिक्षा, बिजली और खेती के लिए केन्द्रीय अनुदान बेहतर प्रदर्शन की शर्तों पर मिलेंगे. जाहिर है कि बेहतर प्रदर्शन के लिए राज्यों को ज्यादा खर्च या निवेश करना होगा जिससे खजाने और भी ज्यादा खाली हो जाएँगे. रही बात कर्ज की तो मौजूदा वित्तीय वर्ष में ७ अप्रैल २०२० से १६ मार्च २०२१ तक भारत के २८ राज्य और २ केंद्रशासित प्रदेश बाजार से रिकॉर्ड ८.२४ लाख करोड़ रूपये का कर्ज उठा चुके हैं जो पिछले वित्त वर्ष से ३१ प्रतिशत ज्यादा है जिसके लिए उनको ७ प्रतिशत की दर से ब्याज देना होगा. अगले साल तक राज्यों के कर्ज १० लाख करोड़ को पार कर जाएँगे ऐसा अनुमान है. अर्थात आगे हमारे लिए जीवन जीना और महंगा और कठिन होनेवाला है और और भी बुरे दिन आनेवाले हैं क्योंकि एक तरफ केंद्र तो दूसरी तरफ राज्यों की सरकारें हम पर करों के बोझ में अति तीव्र असहनीय वृद्धि करनेवाली है.

रविवार, 21 मार्च 2021

मोदी राज में पैसा बचाना मना है

मित्रों, एक जमाना था और क्या जमाना था जब भारत और भारतीयों को बचत करने के लिए जाना जाता था और दुनिया भर के देशों के अर्थशास्त्री भारत से इस बात के लिए ईर्ष्या करते थे कि भारत गरीब भले ही हो लेकिन भारतीय धनी हैं. तब भारत और भारत के बैंकों के आर्थिक विकास में इन घरेलू बचतों का अपना अलग ही महत्व था. मित्रों, फिर आज का जमाना आया जब एक सर्वज्ञानी व्यक्ति प्रधानमंत्री बना और उसने अर्थशास्त्र के सारे नियमों को पलटकर रख दिया. आज मंदी से बाहर निकालने की जद्दोजहद में उसने भारत को दो वर्गों में बाँट दिया है. एक तरफ हैं चुनिन्दा लोग जो कर्ज ले सकते हैं क्योंकि वे उसे चुका सकते हैं और दूसरी तरफ हैं वे बहुसंख्यक करोड़ों लोग जो कर्ज नहीं लेते या नहीं ले सकते लेकिन पेट काटकर भविष्य के लिए बचत करते हैं और सर्वज्ञानी जी हैं कि लगातार ब्याज दर कम करके उन गरीबों को और भी गरीब बना रहे हैं. मित्रों, बीते ३ माह में ६ बार (२०१३ के बाद पहली बार) बांड बाजार ने सरकार को घुड़की दी और सस्ती ब्याज दर पर कर्ज देने से मना कर दिया. अब सरकार ठहरी कर्ज बाज़ार की पहली और सबसे बड़ी ग्राहक. बैंकों में जमा अधिकांश बचत सरकार कर्ज पर उठा लेती है और जिस दर पर पैसा उठती है (अभी ६.१५ प्रतिशत पर दस साल का बांड) आम जनता को उससे कहीं अधिक दर पर कर्ज मिलता है. साथ ही बचत पर ब्याज दर भी सरकारी कर्जे पर ब्याज से कम रहती है. इसके साथ ही सरकार से वसूला जानेवाला ब्याज उसके कर्ज की मांग से तय होता है. यहाँ मैं आपको बता दूं कि केंद्र सरकार अगले दो साल (यह और अगला) में करीब २५ लाख करोड़ रूपये का कर्ज लेगी. राज्यों की सरकारें इसके अलावा कर्ज लेनेवाली हैं जो कुल मिलाकर एक रिकॉर्ड होगा. यानि बैंकों के पास आम जनता को कर्ज देने के लिए पहले से कम पैसा बचनेवाला है. मित्रों, उस पर बैंकों के लिए मुश्किल यह है कि मंदी के दबाव के कारण बैंकों को सरकार के साथ-साथ कंपनियों को यानि अमीरों को भी सस्ता कर्ज देना है. नतीजतन गरीबों के बचत के ब्याज पर छुरी चल रही है. तथापि बैंकों को अपने सबसे बड़े ग्राहक यानि सरकार से कम से कम इतना तो ब्याज चाहिए जो महंगाई से ज्यादा हो इसलिए पेट्रोल-डीजल और सामानों के दाम बढ़ने से महंगाई बढ़ रही है. दूसरी तरफ, अपनी कमाई का ५० प्रतिशत हिस्सा ब्याज चुकाने में खर्च कर रही सरकार को नए कर्ज चुकाने के लिए और नए टैक्स लगाने होंगे यानि अभी तो हमारे बुरे दिनों की बस शुरुआत हुई है. मित्रों, महंगाई तो सिर्फ नेताओं के वादों में रूकती है इसलिए स्थिति यह है कि रिजर्व बैंक कर्ज पर ब्याज दरों को जबरन कम रखे हुए है जिससे बैंक जमा लागत घटाने के लिए बचतों पर ब्याज काट रहा है. यहाँ हम आपको यह बता दें कि भारतीयों की ५१ प्रतिशत बचतें इस समय बैंकों में हैं. बचत पर रिटर्न महंगाई से ज्यादा होनी चाहिए ताकि आम जनता का पैसा छीजे नहीं लेकिन इस पर मिल रहा ब्याज महंगाई से कम है जो अत्यंत दुखद है. जो कर्ज नहीं ले रहे उनकी मुसीबत दोहरी है. एक तो नौकरी गई या पगार घटी और दूसरा जिन बचतों पर उनकी निर्भरता थी वह भी छीज रहा है. लॉकडाउन के कारण खर्च रूकने से बैंकों में बचत जरूर बढ़ी थी लेकिन इस दौरान ब्याज दर के मुद्रास्फीति से कम होने के कारण नुकसान ज्यादा हो गया. भारत का एक बहुत ही छोटा सा जनसमूह जो शेयर बाजार के दांवपेंच से वाकिफ है बस वही फायदे में है बड़ी आबादी का सहारा फिक्स डिपोजिट बुरी तरह पिट चुके हैं. मित्रों, अब बचत और उन पर निर्भर लोगों की जो हालत है सो है. अच्छे दिन तो आए नहीं अलबत्ता बुरे दिन जरूर आ गए. आप कहेंगे विकल्प क्या है? विकल्प भी है बशर्ते सर्वज्ञानी महाशय हमारी सलाह को मानें. इसके लिए सबसे पहले सरकार को जनता के लिए निर्धारित आय वाले नए विकल्प देने होंगे. साथ ही सरकार को अपने कर्ज को कम करना होगा. नहीं तो सरकार और ज्यादा संख्या में नए नोट छापेगी और महंगाई और भी विकराल रूप लेती जाएगी.

गुरुवार, 11 मार्च 2021

कोरोना संकट, वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत

मित्रों, इन दिनों खुद प्रधानमंत्री मोदी और उनके समर्थक इस बात की रट लगाए हुए हैं कि उनकी सरकार ने कोरोना संकट से बड़े ही बेहतरीन तरीके से निबटा लेकिन अगर हम यूरोप और अमेरिका द्वारा उठाए गए कदमों और उनके प्रभावों पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि अमेरिका और यूरोप के देश इस दौरान प्रबंधन में हमसे कहीं आगे, बहुत आगे थे. मित्रों, मैकेंजी की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक २०२० की दूसरी और चौथी तिमाही में यूरोपीय समुदाय के देशों की जीडीपी १८ प्रतिशत सिकुड़ गई तब भी वहां रोजगार केवल ३ प्रतिशत घटी जबकि खर्च योग्य आय अर्थात डिस्पोजेबल इनकम में केवल ५ प्रतिशत की कमी आई. वहीँ अमेरिका में इस दौरान जीडीपी १० प्रतिशत टूटा, रोजगार भी घटा लेकिन लोगों की खर्च योग्य आय ८ प्रतिशत बढ़ गई. इस दौरान यूरोपीय समुदाय के देशों ने प्रतिव्यक्ति २३४२ डॉलर और अमेरिका ने ६७५२ डॉलर प्रतिव्यक्ति व्यय किया जबकि भारत सरकार ने कितना व्यय किया खुद सरकार भी नहीं जानती. साथ ही रोजगार की स्थिति पर भी हमारी सरकार रिपोर्ट को दबाने में ही लगी रहती है इसलिए हम इस मामले में भी आज तक अँधेरे में हैं. मित्रों, जहाँ यूरोप और अमेरिका की सरकारों ने अपना पूरा ध्यान रोजगार बचाने और बेरोजगारों की सहायता पर केन्द्रित रखा वहीँ हमारी सरकार का पूरा ध्यान सरकारी कम्पनियों को बेचने और उद्योग जगत को लाभ पहुँचाने में लगा रहा. इस दौरान उद्योग जगत ने कितने लोगों को बेरोजगार कर दिया और उन बेरोजगारों की स्थिति क्या है से सरकार ने कोई मतलब ही नहीं रखा. यहाँ तक कि सरकार ने अचानक लॉक डाउन घोषित कर दिया और जो लोग जहाँ-तहां फँस गए उनके खाने-पीने-रहने-शौचालय आदि का कोई इंतजाम नहीं किया. लोगों को पैदल भूख-प्यास-थकान से जूझते हुए हजारों किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ी. उनमें से कई लोगों की जीवन यात्रा यात्रा के दौरान ही समाप्त हो गई. मित्रों, दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप की सरकारों ने अचानक लॉक डाउन नहीं किया. साथ ही वहां की सरकारों ने आम लोगों की बचत संरक्षित करने और आवासीय, शिक्षा व चिकित्सा की लागत को कम करने पर खर्च किया. जबकि हमारी सरकार ने फैक्ट्री मालिकों से मजदूरों को घर बिठाकर वेतन देने, स्कूलों से २ महीने की फीस माफ़ करने और मकान मालिकों से बिना किराया लिए लोगों को घर में रहने देने का अनुरोध भर करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली. परिणाम यह हुआ कि अचानक हजारों मजदूर रोजगार और गृहविहीन होकर सडकों पर आ गए और कई महीनों तक अफरातफरी का माहौल रहा. जबकि यूरोप और अमेरिका में मकान और फैक्ट्री मालिकों और स्कूल संचालकों को सरकारी आदेश से जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई सरकार ने की. साथ ही मकान किराया और स्कूल फ़ीस को कम किया और कर्मचारियों को अनिवार्य पेंशन भुगतान में छूट दी गई या सरकार ने खुद नुकसान की भरपाई की. मित्रों, इस कार्य में यूरोप और अमेरिका के निजी क्षेत्र ने भी सरकार का भरपूर साथ दिया. कंपनियों को कारोबार में नुकसान हुआ, कई दिवालिया भी हो गईं लेकिन रोजगारों में कमी को कम-से-कम बनाए रखा और पेंशन व बीमा भुगतानों का बोझ उठाया. इन सारी कवायदों का परिणाम यह हुआ कि अमेरिका में २०२० की तीसरी तिमाही में खर्च योग्य आय दोगुनी बढ़कर १६.१ प्रतिशत हो गई तो वहीँ यूरोप में भी बचत दर २४.६ प्रतिशत तक पहुँच गई. अब जबकि वहां की जनता की आय सुरक्षित है और बचत भी बढ़ चुकी है तो जैसे ही कारोबार अपनी पूरी क्षमता से खुलेगा यह ईंधन अर्थव्यवस्था को सरपट दौड़ा देगा. मित्रों, दूसरी तरफ भारत सरकार एक्ट ऑफ़ गॉड के नाम पर रोजाना नए कर थोप रही है, पहले से तंगहाल हो चुकी जनता को पेट्रोल की आग में जला रही है और निजी कम्पनियाँ रोजगार में कटौती करके मुनाफा कूट रही है. सवाल उठता है कि जब पूंजीवादी मुल्कों में सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर संकट से लड़ सकते हैं तो भारत में ऐसा क्यों नहीं हो पाया? भारत सरकार ऐसे संवेदनहीन निजी क्षेत्र के हाथों में सबकुछ सौंपने के बारे में सोंच भी कैसे सकती है? मित्रों, अयोग्य वित्त मंत्री और सरकारी कुप्रबंधन की कृपा से कोविद पूर्व ही मंदी और अभूतपूर्व बेरोजगारी के चलते लोगों की खर्च योग्य आय में ७.१ प्रतिशत की कमी आ चुकी थी. फिर कोविद और अब अत्यधिक करारोपण से उपजी जानलेवा महंगाई लोगों की आय को खा रही है. आज भारत दुनिया में खपत पर सबसे ज्यादा और दोहरा-तिहरा कर लगानेवाले देशों में है. हम न तो सरकार से टैक्स का हिसाब मांगते हैं और न ही इस बात की फिक्र ही करते हैं कि कॉर्पोरेट मुनाफों में बढ़त से रोजगार और वेतन क्यों नहीं बढ़ते और अगर बढ़ने के स्थान पर घटते हैं तो भारत लोक कल्याणकारी राज्य कैसे है? हम तो बस जय श्रीराम का नारा लगाते हैं रामजी के नाम पर देश और खुद को लुटने देते हैं.

मंगलवार, 9 मार्च 2021

जादूगरों के जादूगर मोदी

मित्रों, कौन क्या है, कैसा दिख रहा है और क्या निकलेगा. कौन क्या बोल रहा है और क्या करेगा इसके लिए हमें वक्त का मुंह ताकना पड़ता है. एक समय था जब नरेन्द्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित किया था. तब मोदी जादूगरोंवाले कपडे पहनकर प्रचार करते थे. जनता को लगा कि यह व्यक्ति जरूर अपने जादू से देश और देश की जनता का कायाकल्प कर देगा. लेकिन अब जबकि मोदी को प्रधानमंत्री बने लम्बा समय बीत चुका है तब ऐसा लग रहा है कि मोदी जादूगर तो हैं लेकिन अच्छे वाले और अच्छे दिन लानेवाले जादूगर नहीं हैं. बल्कि जनता को अपने जादू के तिलिस्म में भरमाकर लगातार मूर्ख बनानेवाले लोककथाओं वाले जादूगर हैं. मित्रों, मुझे याद है कि अटल जी के ज़माने में जब स्वर्गीय अनंत कुमार जी को नागरिक उड्डयन मंत्री बनाया गया था तब उन्होंने मीडिया को दिए गए अपने पहले साक्षात्कार में कहा था कि मैं एयर इंडिया का कायाकल्प कर दूंगा. लेकिन हुआ क्या और आज एयर इंडिया किस स्थिति में है यह आप भी जानते हैं. मित्रों, ऐसा नहीं है कि पहले सरकारी कंपनियों को बेचा नहीं गया. अटल जी के ज़माने में भी बेचा गया लेकिन मेरे एक ग्रामीण जिस तरह भैंसों को बेचते थे उस तरह से बेचा गया. दरअसल वो जमाना बैलों से खेती करने का था. हर दरवाजे पर कई-कई जानवर बंधे रहते थे. तब महनार और पटोरी में जानवरों की हाट लगती थी. मेरे उपरलिखित ग्रामीण जानवरों की दलाली करते थे. कई बार वे मरियल भैंस खरीद लाते. फिर कुछ महीनों तक उनके बेटे-पोते उन भैसों को खूब खिलाते और जब उनकी हालत हाथियों जैसी हो जाती तब दलाल साहब उनको ढेर सारा मुनाफा लेकर बेच देते. मित्रों, अब अगर हम मोदीजी की सरकार को देखें तो इसका काम अटल जी से सीधा उल्टा है. मोदी जी पहले सरकारी कंपनियों को बर्बाद करते हैं फिर अपने अमीर मित्रों के हाथों उनको औने-पौने दामों में बेच देते हैं. कम्पनी नहीं बिकती तो कंपनी की संपत्ति ही सही. जमीन ही बेच दो. और ये सारा काम मोदी जी की राष्ट्रवादी सरकार देशहित के नाम पर कर रही है. मित्रों, महंगाई, बेरोजगारी को ही लें तो दोनों अपने चरम पर है लेकिन मोदी जी निश्चिन्त हैं. उनको पता है कि जनता देशहित के नाम पर कुछ भी सह जाने को मानसिक रूप से तैयार बैठी है. बीजेपी की आईटी सेल ने कुछ इस तरह उनका ब्रेनवाश किया है कि जनता जान देगी लेकिन उफ्फ तक नहीं करेगी. मित्रों, मोदी जी किसी से नहीं डरते. ५६ ईंच का सीना है उनका. बस सवालों और आलोचनाओं से डरते हैं. मीडिया के सवालों से बचने के लिए वे कभी प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते. जो भी बोलते हैं सिर्फ संसद में बोलते हैं या फिर एकतरफा भचर-भचर करते रहते हैं. उनके लिए मीडिया का कोई महत्व नहीं है. क्या मोदी सिर्फ संसद के प्रति जिम्मेदार हैं जनता के प्रति जिम्मेदार नहीं है? क्या मोदी जी को सवालों से डर नहीं लगता है? फिर वे ५६ ईंच सीना वाले कैसे हुए? मित्रों, मोदी जी का लक्ष्य देश को लाभ पहुंचाना है ही नहीं बल्कि खरीदारों को लाभ पहुंचाना है। सरकारी कंपनियों की तरह मोदी जनता को भी पहले कंगाल बना रहे हैं फिर बेच देंगे। सांसों पर भी टैक्स लगेगा और वसूली अंबानी अडानी करेंगे। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम जिसको भी चुनते हैं वो डाकू निकलता है। कोई सीधे घोटाला करके डाका डालता है तो कोई इंद्रजाल फैलाकर। मोदी जी कहते हैं कि निजीकरण से देश का कायाकल्प होगा. लेकिन निजी स्कूलों और अस्पतालों की हालत क्या है? अभी तीर्थराज प्रयाग में एक निजी अस्पताल में डॉक्टर ने इसलिए तीन साल की ख़ुशी का पेट आपरेशन के बाद खुला छोड़ दिया क्योंकि उसके माता-पिता ५ लाख रूपये नहीं जमा करवा पाए. ईश्वर ख़ुशी की दिवंगत आत्मा को देशहित में खुश रखे. जब कुछ भी सरकारी नहीं बचेगा तो पूँजी की हृदयहीनता और मुनाफाखोरी से जनता की रक्षा कौन करेगा? वह पूँजी राम मंदिर में करोड़ों का समर्पण कर देगी लेकिन ख़ुशी और ख़ुशी के परिवार की ख़ुशी के लिए दो-चार लाख रूपये नहीं छोड़ेगी. रही बात सरकारी कामकाज की तो ऐसी कौन-सी कुर्सी है जिसकी नीलामी नहीं हो रही है या ऐसा कौन-सा टेबल है जहाँ बिना सेवा-शुल्क लिए जनता की सेवा की जाती है. देश में आज भी वही पुलिस है, वही न्यायालय है और वही बेबसी व लाचारी है. मोदी जी ने वादा किया था कि उनके राज में चलता है नहीं चलेगा फिर चल कैसे रहा है? भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हुआ बस उसका रूप बदल गया है. पहले घोटालों के आरोप इंसानों पर लगते थे अब दो पैर वाले चूहे चार पैर वाले चूहों पर हजारों लीटर शराब गटक जाने के आरोप लगाने लगे हैं. मित्रों, चाहे बंगाल हो या केरल या कोई अन्य राज्य. चाहे वो लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव मोदी जी के आने से पहले जो सच था, वह आज भी सच है और कल जब मोदी नहीं रहेंगे तब भी सच रहेगा. किसी अनाम कवि ने कहा है- हमारे देश में चुनाव क्या है? एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से बकरे अपने लिए सबसे अच्छे कसाई को चुनते हैं. मित्रों, कभी-कभी हमारे देश के हास्य कवि भी बड़ी गंभीर बातें कर जाते हैं. सुरेन्द्र शर्मा जी अपनी एक कविता में कहते हैं कि जनता तो सीता है रावण राजा बना तो हर ली जाएगी और राम राजा बने तो अग्निपरीक्षा के बाद फिर से वनवास पर भेज दी जाएगी जनता तो द्रौपदी है अगर कौरव राजा बने तो उसका चीर हरण हो जाएगा और अगर पांडव राजा बने तो दांव पर लगा दी जाएगी. जीते कोई हारना तो जनता को ही है. तुलसीदास के समय राम नाम की लूट थी और आज राम के नाम पर लूट मची है.

मंगलवार, 2 मार्च 2021

आदमी, पैसा और भगवान

मित्रों, एक जमाना था, शायद नेहरु जी का जमाना जब लोग भगवान और कर्मफल के सिद्धांत पर विश्वास रखते थे. तब भगवान ही भगवान थे और पैसा साधन मात्र था. लेकिन आज जब मोटी चमड़ीवाले मोदी जी का शासन है हमने पैसे को ही सबकुछ बना दिया है. जैसे भगवान को हमने मृत्युदंड दे दिया है. यथा राजा तथा प्रजा. मित्रों, आज पैसा साधन है पैसा साध्य है, पैसा ईश्वर है पैसा आराध्य है; पैसा स्वर्ग है पैसा मंजिल है, पैसा नाव है पैसा साहिल है; पैसा वात्सल्य है पैसा अनुराग है, पैसा पति है पैसा सुहाग है; पैसा ख़ुशी है पैसा प्रकाश है, पैसा उड़ान है पैसा आकाश है; पैसा दिल है, पैसा पैसा धड़कन है, पैसा महफ़िल है पैसा जीवन है; पैसा शक्ति है पैसा भक्ति है, पैसा आदर है पैसा तृप्ति है; पैसा मंदिर है पैसा तीर्थ है, पैसा सम्बन्धी है पैसा मित्र है; पैसा ही कविता है पैसा ही रस है, पैसे के बिना उत्तम साहित्य भी नीरस है; पैसा अपनापन है पैसा ही प्यार है, पैसा ही डिग्री है पैसा ही पढाई है, पैसा के बिना जीवन ढलान है, पैसा है तो चढ़ाई ही चढ़ाई है; पैसा प्रेम है पैसा इन्साफ है, पैसेवाले को सौ खून माफ़ है.; यहाँ तक कि पैसा इंसानियत है पैसा इन्सान है, फिर इन्सान क्या है? पैसा है तो भगवान है वर्ना कुछ भी नहीं है. मित्रों, सोंचिए-हम क्या थे, क्या है और क्या होंगे अभी? लोग कहते हैं कि एक दिन धरती इंसानों के रहने लायक नहीं रहेगी. मगर क्या आज इन्सान धरती पर रहने लायक रह गया है? पैसों के लिए खुद मेरे रक्तसम्बंधियों ने मेरी पीठ में कई-कई बार छुरा भोंका है और हर बार सिर्फ कबीर के इस दोहे को दोहरा कर अपने दिल को दिलासा देता रहा कि कबीरा आप ठगाईए और न ठगिए कोई, आप ठगे सुख उपजै और ठगे दुःख होई.

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी

जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी, हम केहू से कम बानी का। जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी, लाखों गलती करके भी अप्पन बात पर अड़तानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी। मनमोहन जब निजीकरण कईले देश ऊ बेचत रहलें, हम सरकारी कंपनी बेचके देश के बचावतानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी। चीन चढल बा छाती पर हमर दिमाग बा हाथी पर, जीडीपी के माईनस करके ५ ट्रिलियन के बनाबतानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी। बेरोजगारी आकाश लगल बा गरीब गुरबन के बाट लगल बा, पेट्रोल डीजल के दाम बढा के महंगाई हम घटाबतानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी। देश दुनिया के चिंता नईखे महंग कपडा पेन्हतानी, करनी ले साफे अल्लग दिनभर भाषण पेलतानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी। धरम के अफीम चटाके प्रदेश चुनाव जीततानी, रेल के टिकस बढाके जेबी से पैसा खींचतानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी। दोसर केकरो बात न सुनब अप्पन बात सुनाबतानी, कईसे जईबअ कईसे जीबअ तू जानअ लौकडाऊन लगाबतानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी। नेहरू के हम नाम मेटाईब नया नेहरू हम कहाईब, हर चीज हमरा नाम पे होई भले देश के जनता रोई, अल्पसंख्यक फंड बढाके तुष्टीकरण मेटाबतानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी, लाखों गलती करके भी अप्पन बात पर अड़तानी, जे जे गलती नेहरू कईले उहे गलती करतानी।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

अच्छा दिन आ गईल बा मोदीजी के राज में

सारी जमा पूँजी ख़तम हो गईल नून रोटी प्याज में अच्छा दिन आ गईल बा मोदीजी के राज में. सबसे पहिले भैया नोटबंदी के चोट भईल, तेकरा बादे भैया कई राज्य में वोट भईल, फिर पधारली जीएसटी जैसे कोढ़ खाज में, अच्छा दिन आ गईल बा मोदी जी के राज में. अब होई देश के निजीकरण अईसन हम सुनअतानी, जईसन मनमोहन ओईसन मोदी अईसन हम गुनअतानी, जनता पीट रहल बा माथा बैठल डूबत जहाज में, अच्छा दिन आ गईल बा मोदीजी के राज में.

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

मोदी राज में लगातार कठिन होता जीवन

मित्रों, एक जमाना था जब भारत में २०१४ के लोकसभा चुनाव प्रगति पर थे. तब एक गीत और नारा बार-बार भारत की फिजाओं में गूँज रहा था कि अच्छे दिन आनेवाले हैं. हमें भी लगा कि शायद इस बार ऐसा होकर रहेगा. कारण यह कि लोग कांग्रेस के भ्रष्टाचार से काफी नाराज और परेशान थे. फिर जब चुनाव परिणामों की घोषणा हुई और भाजपा को अकेले बहुमत मिला तब लोगों की उम्मीदों को और भी बल मिला. मित्रों, इसके बाद जब केन्द्रीय मंत्रिमंडल की घोषणा हुई तब थोड़ी-सी निराशा हुई क्योंकि जिन लोगों को मंत्री बनाया गया था उनमें से कई पूरी तरह से अयोग्य थे. साल-दो-साल होते-होते देश की जनता में निराशा घर करने लगी. लेकिन मोदी जनमानस को समझते थे इसलिए एक-के-बाद-एक ऐसे कदम उठाते रहे जिससे जनता की उम्मीदों का गुब्बारा फूलता ही चला गया. पता नहीं यह कब फूटेगा और उसके बाद भाजपा और भारत का क्या होगा? पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी को लागू करना ये दो ऐसे कदम रहे जिनसे देश की अर्थव्यवस्था को लाभ के स्थान पर हानि हुई. जो बेरोजगारी पहले से ही काफी बढ़ी हुई थी में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. लेकिन यहाँ भी कमाल दिखाया भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी ने और देश की जनता को अपने शब्द-जाल में उलझाए रखा. चुनाव-दर-चुनाव जीतते रहे. मित्रों, फिर आया कोरोना और सरकार द्वारा बिना तैयारी के किए गए लौकडाउन का दौर जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर ही तोड़ दी. कहना न होगा कि इस दौरान अगर भारत का वित्त मंत्री किसी अर्थशास्त्री को बनाया गया होता तो भारतीय जीडीपी आज ऋणात्मक नहीं होती. मित्रों, अगर हम देश की आम जनता के जीवन को देखें और पिछली मनमोहन सरकार से तुलना करें तो उनके लिए अच्छे दिन के बदले बुरे दिन आ गए हैं. नोटबंदी, जीएसटी और कोरोना के कारण आमदनी घट गई है. उस पर जले पर नमक का काम कर रही है कमरतोड़ महंगाई. ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड अलग जनता को लूट रहा है जिससे निबटने के लिए भी मोदी सरकार बिलकुल भी तैयार नहीं है. कहने का तात्पर्य यह कि मोदी सरकार में देशवासियों का जीवन पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो गया है. खाने-पीने से लेकर घर बनाने की सामग्री तक सबकुछ भयंकर महंगाई रुपी चक्रवात की तरह जन-जीवन को तहस-नहस करने पर तुली है लेकिन मोदी सरकार का जैसे इस तरफ ध्यान ही नहीं है. पहले के मुकाबले रेलयात्रा भी काफी महँगी की जा चुकी है. पेट्रोलियम पदार्थ जहाँ पहले रुला रहे थे अब झुलसा रहे हैं. अर्थव्यवस्था इस समय आईसीयू में है. हालात इतने ख़राब हैं कि सरकार जमीन, बैंक, रेलवे स्टेशन और एअरपोर्ट बेचने पर मजबूर हो गई है. उस पर गजब यह कि अपनी महारत के अनुसार मोदी सरकार ने देश के लोगों को राम मंदिर में उलझा रखा है जिससे देश के वास्तविक मुद्दे इस समय भी गौण हैं. जाहिर-सी बात है कि इस समय कहीं भी अच्छे दिन आनेवाले हैं गाना या नारा कहीं सुनाई नहीं देता. हाँ, जनता जरूर यह समझ चुकी है कि आगे और भी बुरे दिन आनेवाले हैं.

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

बिहार में रौलेट एक्ट

मित्रों, मैं जानता हूँ कि आप सभी रौलेट एक्ट से वाकिफ हैं. १९१८ में ब्रिटिश सरकार ने यह कानून हम भारतीयों के लिए बनाया था जिसके अंतर्गत प्रावधान किया गया था कि पुलिस किसी भी भारतीय को बिना न्यायालय में मुकदमा चलाए अनिश्चित काल के लिए जेल में रख सकती थी. आप लोग यह भी जानते हैं कि इसी रौलेट एक्ट के खिलाफ जालियांवाला बाग़ में जनसभा हो रही थी जिस पर गोलियां चलाकर हजारों निरपराध और निशस्त्र लोगों को बेमौत मार दिया गया था. मित्रों, इन दिनों बिहार की नीतीश सरकार ने भी कुछ इसी तरह के कानून लागू करने का निर्णय लिया है. इस कानून के द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद १९ (क) में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छीनने का जघन्य पाप किया गया है. बिहार के पुलिस प्रमुख अर्थात डीजीपी द्वारा जारी ३ फरवरी के आदेश के अनुसार अगर कोई व्यक्ति बिहार सरकार के खिलाफ प्रदर्शन या सड़क जाम करता है तो उसे सरकारी नौकरी या टेंडर पाने का अधिकार नहीं रह जाएगा. मित्रों, सवाल उठता है कि बिहार के लोग आजाद हैं या अभी भी गुलाम हैं? लोकतंत्र में लोकतान्त्रिक विधि से चुनी गई सरकार भला कैसे लोगों से विरोध करने का अधिकार छीन सकती है? क्या नीतीश कुमार ने खुद १९७४ के प्रदर्शनों में भाग नहीं लिया था? नीतीश जी भूल गए कि तब देश में आपातकाल था अब नहीं है? मित्रों, अगर किसी सरकार के शासन में ऊपर से नीचे तक घूस की गंगा बह रही हो, बिना रिश्वत दिए कोई काम नहीं होता हो, जनता की कोई सुननेवाला नहीं हो, डीजीपी खुद मुख्यमंत्री का फोन नहीं उठाता हो, एफआईआर दर्ज करने में हफ़्तों लग जाते हों, बिना पैसे दिए एक भी नियुक्ति नहीं होती हो तो जनता खुश होगी या नाराज? ऐसे में असंतोष नहीं पनपेगा तो क्या पनपेगा? जनता सडकों पर नहीं आएगी तो और क्या करेगी? क्या अंग्रेजी राज के खिलाफ स्वातंत्र्यवीरों ने प्रदर्शन नहीं किया था? फिर आज के बिहार की हालत तो अंग्रेजों के समय से भी ज्यादा ख़राब है फिर जनता से विरोध करने का अधिकार क्यों छीना जा रहा है? अगर फिर भी बिहार में लोकतंत्र है तो फिर उत्तर कोरिया और चीन में क्या है? क्या इसलिए बिहार की जनता ने नीतीश कुमार को लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनाया था? नीतीश जी को अपने इस कार्यकाल में अपनी पुरानी गलतियों को सुधारना है या जनता के मुंह को बंद करना है? मैं यह भी जानता हूँ कि यह कानून न्यायालय में एक मिनट भी नहीं टिकेगा और शायद नीतीश जी भी इस तथ्य को जानते हैं फिर उन्होंने यह नई गलती क्यों की? कहीं यह दूसरे आंतरिक राष्ट्रीय आपातकाल की आहट तो नहीं?

बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

साईबर अपराध रोकने में पूरी तरह विफल मोदी सरकार

मित्रों, जबसे केंद्र में मोदी जी की सरकार बनी है डिजिटल इंडिया का शोर है. मोदी सरकार प्रत्येक भारतीय को इन्टरनेट से जोड़ना चाहती है जिसकी तारीफ होनी चाहिए लेकिन जैसे-जैसे भारत के लोग इन्टरनेट से जुड़ते जा रहे हैं वैसे-वैसे इन्टरनेट से जुड़े अपराध भी काफी तेजी से बढ़ रहे हैं. स्थिति ऐसी है कि कब किसकी जमा पूँजी पर डाका पड़ जाए कोई नहीं जानता. मित्रों, सिर्फ २०१९ में भारत के १४ करोड़ लोग साईबर ठगी के शिकार हुए जिनके सवा लाख करोड़ रूपये ख़ामोशी से लूट लिए गए. आप समझ सकते हैं कि १४ करोड़ लोग और सवा लाख करोड़ रूपये का आंकड़ा कोई छोटा नहीं होता बहुत बड़ा होता है. यहाँ हम आपको बता दें कि २०१९ में पूरी दुनिया में जहाँ ३५ करोड़ लोग साईबर ठगी के शिकार हुए वहीँ सिर्फ भारत में १४ करोड़ लोगों से लूट हुई. कभी पुणे के कोसमोस बैंक का ९४ करोड़ रूपया उड़ा लिया जाता है तो कभी झारखण्ड के मेदनीनगर स्थित भारतीय स्टेट बैंक की शाखा से एकमुश्त १० करोड़ रूपये गायब कर दिए जाते हैं. विदित हो भारत में साईबर अपराधों में सालाना ४० प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है. मित्रों, रोजाना होने वाली लाखों की संख्या में आम जनता की दस-बीस हजार की लूट की तो बात ही छोडिये स्टेट बैंक में रखा हुआ पैसा भी आज सुरक्षित नहीं है लेकिन भारत सरकार का इस ओर ध्यान ही नहीं है. timejobsservice.com नामक वेबसाइट जैसे अनेक वेबसाइट खुलेआम रोजगार देने के नाम पर गरीब-बेरोजगार लोगों के बैंक खातों में जमा पैसा उड़ा ले रहे हैं लेकिन इससे मोदी सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता. जैसे उसका मूल-मंत्र यही है कि भाड़ में जाए जनता, अपना काम बनता. मित्रों, अभी हाजीपुर से सटे कंचनापुर में एक्सिस बैंक में ४८ लाख का डाका पड़ा. मेरे घर के पास महिला थाना के सामने पुलिस लोगों की डिक्की चेक करने लगी. क्या अपराधी लूट के बाद जिला मुख्यालय की मुख्य सड़क से होकर गुजरेंगे? मित्रों, इसी तरह मोदी सरकार भी पुराने तरीके से साईबर क्राइम रोकने में लगी है. उसके पास इसको रोकने की कोई स्वदेशी तकनीक नहीं है बल्कि वो इसके लिए पूरी तरह से दूसरे देशों पर निर्भर है. स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि लोग-बाग़ अब बैंकों में पैसा रखने से भी डरने लगे हैं. जब स्टेट बैंक जो भारत सरकार और राज्य सरकारों का समस्त सरकारी लेनदेन करता है ही सुरक्षित नहीं है तो कोई कहाँ पैसा जमा करे? सिर्फ नेशनल साईबर क्राइम पोर्टल बना देने की औपचारिकता मात्र से तो साईबर अपराध रूकने से रहे बल्कि भविष्य में जब ५जी आएगा तो स्थिति और भी भयावह हो जाएगी. इसलिए मोदी जी से अनुरोध है कि सिर्फ भाषण देना बंद कर इस दिशा में प्रभावी कदम उठाएं जिससे इस तरह के अपराध को पूरी तरह से रोका जा सके न कि अपराध हो जाने के बाद लाठी पटकने की औपचारिकता का निर्वहन किया जाए.

शनिवार, 30 जनवरी 2021

नाथूराम ने गाँधी को क्यों मारा?

मित्रों, आज महात्मा गाँधी की पुण्य तिथि है. प्रत्येक वर्ष आज के दिन एक बात की चर्चा जरूर होती है कि सरल, सौम्य नाथूराम गोडसे ने गाँधी को क्यों मारा. आजादी के बाद लम्बे समय तक देश में कांग्रेस की सरकार रही जिसने कभी नाथूराम के बयान को सामने आने ही नहीं दिया कि उसने गाँधी को मारने का कठोर निर्णय क्यों लिया. तब उसके दिमाग में क्या चल रहा था. इसके बारे में नाथूराम में कोर्ट में विस्तृत बयान दिया था. अगर हम विचारधारा से परे जाकर उसके बयान पर विचार करें तो निश्चित रूप से हम नाथूराम से पूरी तरह से असहमत नहीं हो सकते. तो आईए डालते हैं एक नजर गोडसे के उस बयान पर, जिसे सुनने के अदालत में उपस्थित सभी लोगों की आंखें गीली हो गयी थीं और कई तो रोने लगे थे. एक न्यायाधीश महोदय ने तो अपनी टिप्पणी में लिखा था कि यदि उस समय अदालत में उपस्थित लोगों को जूरी बना दिया जाता और उनसे फैसला देने को कहा जाता, तो निस्संदेह वे प्रचंड बहुमत से नाथूराम के निर्दोष होने का निर्णय देते. "एक धार्मिक ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के कारण मैं हिन्दू धर्म, हिन्दू इतिहास और हिन्दू संस्कृति की पूजा करता हूं. इसलिए मैं सम्पूर्ण हिन्दुत्व पर गर्व करता हूं. जब मैं बड़ा हुआ, तो मैंने मुक्त विचार करने की प्रवृत्ति का विकास किया, जो किसी भी राजनैतिक या धार्मिक वाद की असत्य-मूलक भक्ति की बातों से मुक्त हो. यही कारण है कि मैंने अस्पृश्यता और जन्म पर आधारित जातिवाद को मिटाने के लिए सक्रिय कार्य किया. मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जातिवाद-विरोधी आन्दोलन में खुले रूप में शामिल हुआ और यह मानता हूं कि सभी हिन्दुओं के धार्मिक और सामाजिक अधिकार समान हैं. सभी को उनकी योग्यता के अनुसार छोटा या बड़ा माना जाना चाहिए. ना कि किसी विशेष जाति या व्यवसाय में जन्म लेने के कारण. मैं जातिवाद-विरोधी सहभोजों के आयोजन में सक्रिय भाग लिया करता था, जिसमें हजारों हिन्दू ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, चमार और भंगी भाग लेते थे. हमने जाति के बंधनों को तोड़ा और एक-दूसरे के साथ भोजन किया. मैंने रावण, चाणक्य, दादाभाई नौरोजी, विवेकानन्द, गोखले, तिलक के भाषणों और लेखों को पढ़ा है. साथ ही मैंने भारत और कुछ अन्य प्रमुख देशों जैसे इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका और रूस के प्राचीन और आधुनिक इतिहास को भी पढ़ा है. इनके अतिरिक्त मैंने समाजवाद और मार्क्सवाद के सिद्धान्तों का भी अध्ययन किया है. लेकिन इन सबसे ऊपर मैंने वीर सावरकर और गांधीजी के लेखों और भाषणों का भी गहरायी से अध्ययन किया है, क्योंकि मेरे विचार से किसी भी अन्य अकेली विचारधारा की तुलना में इन दो विचारधाराओं ने पिछले लगभग तीस वर्षों में भारतीय जनता के विचारों को मोड़ देने और सक्रिय करने में सबसे अधिक भूमिका निभायी है. इस समस्त अध्ययन और चिन्तन से मेरा यह विश्वास बन गया है कि एक देशभक्त और एक विश्व नागरिक के नाते हिन्दुत्व और हिन्दुओं की सेवा करना मेरा पहला कर्तव्य है. स्वतंत्रता प्राप्त करने और लगभग 30 करोड़ हिन्दुओं के न्यायपूर्ण हितों की रक्षा करने से समस्त भारत, जो समस्त मानव जाति का पांचवा भाग है, को स्वतः ही आजादी प्राप्त होगी और उसका कल्याण होगा. इस निश्चय के साथ ही मैंने अपना सम्पूर्ण जीवन हिन्दू संगठन की विचारधारा और कार्यक्रम में लगा देने का निर्णय किया, क्योंकि मेरा विश्वास है कि केवल इसी विधि से मेरी मातृभूमि हिन्दुस्तान की राष्ट्रीय स्वतंत्रता को प्राप्त किया और सुरक्षित रखा जा सकेगा एवं इसके साथ ही वह मानवता की सच्ची सेवा भी कर सकेगी. सन् 1920 से अर्थात् लोकमान्य तिलक के देहान्त के पश्चात् कांग्रेस में गांधीजी का प्रभाव पहले बढ़ा और फिर सर्वोच्च हो गया. जन जागरण के लिए उनकी गतिविधियां अपने आप में बेजोड़ थीं और फिर सत्य तथा अहिंसा के नारों से वे अधिक मुखर हुईं, जिनको उन्होंने देश के समक्ष आडम्बर के साथ रखा था. कोई भी बुद्धिमान या ज्ञानी व्यक्ति इन नारों पर आपत्ति नहीं उठा सकता. वास्तव में इनमें कुछ भी नया अथवा मौलिक नहीं है. वे प्रत्येक सांवैधानिक जन आन्दोलन में शामिल होते हैं, लेकिन यह केवल दिवा स्वप्न ही है यदि आप यह सोचते हैं कि मानवता का एक बड़ा भाग इन उच्च सिद्धान्तों का अपने सामान्य दैनिक जीवन में अवलम्बन लेने या व्यवहार में लाने में समर्थ है या कभी हो सकता है. वस्तुतः सम्मान, कर्तव्य और अपने देशवासियों के प्रति प्यार कभी-कभी हमें अहिंसा के सिद्धान्त से हटने के लिए और बल का प्रयोग करने के लिए बाध्य कर सकता है. मैं कभी यह नहीं मान सकता कि किसी आक्रमण का सशस्त्र प्रतिरोध कभी गलत या अन्यायपूर्ण भी हो सकता है. प्रतिरोध करने और यदि सम्भव हो तो ऐसे शत्रु को बलपूर्वक वश में करने को मैं एक धार्मिक और नैतिक कर्तव्य मानता हूं. (रामायण में) राम ने विराट युद्ध में रावण को मारा और सीता को मुक्त कराया, (महाभारत में) कृष्ण ने कंस को मारकर उसकी निर्दयता का अन्त किया और अर्जुन को अपने अनेक मित्रों एवं सम्बंधियों, जिनमें पूज्य भीष्म भी शामिल थे, के साथ भी लड़ना और उनको मारना पड़ा, क्योंकि वे आक्रमणकारियों का साथ दे रहे थे. यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि महात्मा गांधी ने राम, कृष्ण और अर्जुन को हिंसा का दोषी ठहराकर मानव की सहज प्रवृत्तियों के साथ विश्वासघात किया था. अधिक आधुनिक इतिहास में छत्रपति शिवाजी ने अपने वीरतापूर्ण संघर्ष के द्वारा ही पहले भारत में मुस्लिमों के अन्याय को रोका और फिर उनको समाप्त किया. शिवाजी द्वारा अफजल खां को काबू करना और उसका वध करना अत्यन्त आवश्यक था, अन्यथा उनके अपने प्राण चले जाते. इतिहास के इन विराट योद्धाओं जैसे शिवाजी, राणा प्रताप और गुरु गोविन्द सिंह की निन्दा 'दिग्भ्रमित देशभक्त' कहकर करने से गांधीजी ने केवल अपनी आत्म-केन्द्रीयता को ही प्रकट किया था. वे एक दृढ़ शान्तिप्रेमी मालूम पड़ सकते हैं, लेकिन वास्तव में वे लोकविरुद्ध थे, क्योंकि वे देश में सत्य और अहिंसा के नाम पर अकथनीय दुर्भाग्य की स्थिति बना रहे थे, जबकि राणा प्रताप, शिवाजी एवं गुरु गोविन्द सिंह स्वतंत्रता दिलाने के लिए अपने देशवासियों के हृदय में सदा पूज्य रहेंगे. उनकी 32 वर्षों तक उकसाने वाली गतिविधियों के बाद पिछले मुस्लिम-परस्त अनशन से मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचने को बाध्य हुआ था कि गांधी के अस्तित्व को अब तत्काल मिटा देना चाहिए. गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में वहां के भारतीय समुदाय के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए अच्छा कार्य किया, लेकिन जब वे अन्त में भारत लौटे, तो उन्होंने एक ऐसी मानसिकता विकसित कर ली जिसके अन्तर्गत अन्तिम रूप से वे अकेले ही किसी बात को सही या गलत तय करने लगे. यदि देश को उनका नेतृत्व चाहिए, तो उसको उनको सर्वदा-सही मानना पड़ेगा और यदि ऐसा न माना जाये, तो वे कांग्रेस से अलग हो जायेंगे और अपनी अलग गतिविधियां चलायेंगे. ऐसी प्रवृत्ति के सामने कोई भी मध्यमार्ग नहीं हो सकता या तो कांग्रेस उनकी इच्छा के सामने आत्मसमर्पण कर दे और उनकी सनक, मनमानी, तत्वज्ञान तथा आदिम दृष्टिकोण में स्वर-में-स्वर मिलाये अथवा उनके बिना काम चलाये. वे अकेले ही प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक वस्तु के लिए निर्णायक थे. नागरिक अवज्ञा आन्दोलन के पीछे प्रमुख मस्तिष्क थे, कोई अन्य उस आन्दोलन की तकनीक नहीं जान सकता था. वे अकेले ही जानते थे कि कोई आन्दोलन कब प्रारम्भ किया जाये और कब उसे वापस लिया जाये. आन्दोलन चाहे सफल हो या असफल, चाहे उससे अकथनीय आपदाएं और राजनैतिक अपघात हों, लेकिन उससे उस महात्मा के कभी-गलत-नहीं होने के गुण पर कोई अन्तर नहीं पड़ सकता. अपने कभी-गलत-न-होने की घोषणा के लिए उनका सूत्र था- 'सत्याग्रही कभी असफल नहीं हो सकता' और उनके अलावा कोई नहीं जानता कि 'सत्याग्रही' होता क्या है. इस प्रकार महात्मा गांधी अपने लिए जूरी और जज दोनों थे. इन बच्चों जैसे पागलपन और स्वेच्छाचारिता के साथ अति कठोर आत्मसंयम, निरन्तर कार्य और उन्नत चरित्र ने मिलकर गांधी को भयंकर रूप से उग्र तथा निर्द्वंद्व बना दिया था. बहुत से लोग सोचते थे कि उनकी राजनीति विवेकहीन थी पर या तो उन्हें कांग्रेस को छोड़ना पड़ा या अपनी प्रतिभा को गांधी के चरणों में डाल देना पड़ा, जिसका वे कोई भी उपयोग कर सकते थे. ऐसी पूर्ण गैरजिम्मेदारी की स्थिति में गांधी भूल पर भूल, असफलता पर असफलता और आपदा पर आपदा पैदा करने के अपराधी थे. भारत की राष्ट्र भाषा के प्रश्न पर गांधी की मुस्लिमपरस्त नीति उनकी हड़बड़ीपूर्ण प्रवृत्ति के अनुसार ही है. यह बिल्कुल स्पष्ट है कि देश की प्रमुख भाषा बनने के लिए हिन्दी का दावा सबसे अधिक मजबूत है. अपने राजनैतिक जीवन के प्रारम्भ में गांधीजी हिन्दी को बहुत प्रोत्साहन देते थे, लेकिन जैसे ही उनको पता चला कि मुसलमान इसे पसन्द नहीं करते, तो वे तथाकथित 'हिन्दुस्तानी' के पुरोधा बन गये. भारत में सभी जानते हैं कि 'हिन्दुस्तानी' नाम की कोई भाषा नहीं है, इसका कोई व्याकरण नहीं है और न इसकी कोई शब्दावली है. यह केवल एक बोली है, जो केवल बोली जाती है, लिखी नहीं जाती. यह हिन्दी और उर्दू की एक संकर या दोगली बोली है और महात्मा गांधी का मिथ्यावाद भी इसे लोकप्रिय नहीं बना सकता. लेकिन केवल मुस्लिमों को प्रसन्न करने की अपनी इच्छा के अनुसार उनका आग्रह था कि केवल 'हिन्दुस्तानी' ही देश की राष्ट्रभाषा होनी चाहिए. हालांकि उनके अन्धभक्तों ने उनका समर्थन किया और वह तथाकथित भाषा उपयोग की जाने लगी. इस प्रकार मुस्लिमों को खुश करने के लिए हिन्दी भाषा के सौन्दर्य और शुद्धता के साथ बलात्कार किया गया. उनके सारे प्रयोग केवल हिन्दुओं की कीमत पर किये जाते थे. अगस्त 1946 के बाद मुस्लिम लीग की निजी सेनाओं ने हिन्दुओं का सामूहिक संहार प्रारम्भ किया. तत्कालीन वायसराय लार्ड वैवेल ने इन घटनाओं से व्यथित होते हुए भी भारत सरकार कानून 1935 के अनुसार प्राप्त अपनी शक्तियों का उपयोग बलात्कार, हत्या और आगजनी को रोकने के लिए नहीं किया. बंगाल से कराची तक हिन्दुओं का खून बहता रहा, जिसका प्रतिरोध हिन्दुओं द्वारा कहीं-कहीं किया गया. सितम्बर में बनी अन्तरिम सरकार के साथ मुस्लिम लीग के सदस्यों द्वारा प्रारम्भ से ही विश्वासघात किया गया, लेकिन सरकार के साथ, जिसके वे अंग थे, जितने अधिक राजद्रोही और विश्वासघाती होते जाते थे, उनके प्रति गांधी का मोह उतना ही बढ़ता चला जाता था. लॉर्ड वैवेल को त्यागपत्र देना पड़ा, क्योंकि वे इस समस्या को हल नहीं कर सके और उनकी जगह लार्ड माउंटबेटन आये, जैसे नागनाथ की जगह सांपनाथ आये हों. कांग्रेस ने, जो अपनी देशभक्ति और समाजवाद का दम्भ किया करती थी, गुप्त रूप से बन्दूक की नोंक पर पाकिस्तान को स्वीकार कर लिया और जिन्ना के सामने नीचता से आत्मसमर्पण कर दिया. भारत के टुकड़े कर दिये गये और 15 अगस्त 1947 के बाद देश का एक-तिहाई भाग हमारे लिए विदेशी भूमि हो गयी. कांग्रेस में लार्ड माउंटबेटन को भारत का सबसे महान वायसराय और गवर्नर-जनरल बताया जाता है. सत्ता के हस्तांतरण की आधिकारिक तिथि 30 जून 1948 तय की गयी थी, परन्तु माउंटबेटन ने अपनी निर्दयतापूर्ण चीरफाड़ के बाद हमें 10 महीने पहले ही विभाजित भारत दे दिया. गांधी को अपने तीस वर्षों की निर्विवाद तानाशाही के बाद यही प्राप्त हुआ और यही है जिसे कांग्रेस 'स्वतंत्रता' और 'सत्ता का शान्तिपूर्ण हस्तांतरण' कहती है. हिन्दू-मुस्लिम एकता का बुलबुला अन्ततः फूट गया और नेहरू तथा उनकी भीड़ की स्वीकृति के साथ ही एक धर्माधारित राज्य बना दिया गया. इसी को वे 'बलिदानों द्वारा जीती गयी स्वतंत्रता' कहते हैं. किसका बलिदान? जब कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने गांधी की सहमति से इस देश को काट डाला, जिसे हम पूजा की वस्तु मानते हैं, तो मेरा मस्तिष्क भयंकर क्रोध से भर गया. गांधी ने अपने आमरण अनशन को तोड़ने के लिए जो शर्तें रखी थीं, उनमें एक दिल्ली में हिन्दू शरणार्थियों द्वारा घेरी गयी मस्जिदों को खाली करने से सम्बंधित थी, परन्तु जब पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हिंसक आक्रमण किये गये, तब उन्होंने उसके विरुद्ध एक शब्द भी नहीं बोला और पाकिस्तान सरकार अथवा सम्बंधित मुसलमानों को इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया. गांधी इतने चतुर तो थे ही कि वे जानते थे कि यदि उन्होंने अपना आमरण अनशन तोड़ने के लिए पाकिस्तान मुसलमानों पर कोई शर्त रखी, तो उनको शायद ही कोई मुसलमान ऐसा मिलेगा जो उनकी जिन्दगी की जरा भी चिन्ता करेगा, भले ही आमरण अनशन में उनके प्राण चले जायें. इसी कारण उन्होंने अनशन तोड़ने के लिए जानबूझकर मुस्लिमों पर कोई शर्त नहीं लगायी. वे अपने अनुभव से अच्छी तरह जानते थे कि जिन्ना उनके अनशन से बिल्कुल भी विचलित या प्रभावित नहीं थे और मुस्लिम लीग गांधी की आत्मा की आवाज का कोई मूल्य नहीं समझती. गांधी को 'राष्ट्र पिता' कहा जा रहा है. यदि ऐसा है तो वे अपने पिता जैसे कर्तव्य को निभाने में पूर्णतः असफल रहे, क्योंकि उन्होंने उसके विभाजन की स्वीकृति देकर उसके साथ विश्वासघात किया. मैं साहसपूर्वक कहता हूं कि गांधी अपने कर्तव्य में असफल हो गये. उन्होंने स्वयं को 'पाकिस्तान का पिता' होना सिद्ध किया. उनकी अन्दर की आवाज, उनकी आत्मिक शक्ति, उनका अहिंसा का सिद्धान्त, जिनसे वे बने थे, सभी जिन्ना की लौह-इच्छा के सामने चरमरा गयी और वे शक्तिहीन सिद्ध हुए. संक्षेप में, मैंने स्वयं विचार किया और समझ गया कि यदि मैं गांधी को मार दूंगा, तो मैं पूरी तरह नष्ट हो जाऊंगा, लोगों से मुझे केवल घृणा ही मिलेगी और मैं अपना सारा सम्मान खो दूंगा, जो कि मेरे लिए जीवन से भी अधिक मूल्यवान है. लेकिन, इसके साथ ही मैंने यह भी अनुभव किया कि गांधीजी के बिना भारत की राजनीति अधिक व्यावहारिक तथा प्रतिरोधक्षम होगी तथा सशस्त्र सेनाएं भी अधिक बलशाली होंगी. निस्संदेह मेरा अपना भविष्य पूरी तरह खण्डहर हो जाएगा, लेकिन राष्ट्र पाकिस्तान के आक्रमणों से बच जाएगा. लोग भले ही मुझे मूर्ख या पागल कहेंगे, लेकिन राष्ट्र उस रास्ते पर बढ़ने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा, जिसको मैं सुदृढ़ राष्ट्र-निर्माण के लिए आवश्यक समझता हूं. इस प्रश्न पर पूरी तरह विचार करने के बाद, मैंने इस सम्बंध में अन्तिम निर्णय कर लिया, लेकिन मैंने इस बारे में किसी से भी कोई बात नहीं की. मैंने अपने दोनों हाथों में साहस भरा और 30 जनवरी 1948 को बिरला हाउस के प्रार्थना स्थल पर गांधीजी के ऊपर गोलियां दाग दीं. मैं कहता हूं कि मेरी गोलियां एक ऐसे व्यक्ति पर चलायी गयी थीं, जिसकी नीतियों और कार्यों से करोड़ों हिन्दुओं को केवल बरबादी और विनाश ही मिला. ऐसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं थी जिसके अन्तर्गत उस अपराधी को सजा दिलायी जा सकती और इसीलिए मैंने वे घातक गोलियां चलायीं. मुझे व्यक्तिगत रूप से किसी भी व्यक्ति से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन मैं कहता हूं कि मेरे मन में इस वर्तमान सरकार के प्रति कोई सम्मान नहीं है, जिसकी नीतियां अन्याय की हद तक मुसलमानों के प्रति अनुकूल हैं, लेकिन इसके साथ ही मैं यह भी स्पष्ट अनुभव करता हूं कि ये नीतियां पूरी तरह गांधीजी की उपस्थिति के कारण बनी थीं. मैं बहुत खेद के साथ कहना चाहता हूं कि प्रधानमंत्री नेहरू भूल जाते हैं कि उनके उपदेश और कार्य कई बार एक-दूसरे के प्रतिकूल होते हैं, जब इधर-उधर वे कहते हैं कि भारत एक पंथनिरपेक्ष राज्य है, क्योंकि यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पाकिस्तान के पंथधारित देश की स्थापना में नेहरू ने प्रमुख भूमिका निभायी थी और उनका कार्य गांधीजी द्वारा लगातार मुस्लिमों का तुष्टीकरण करने की नीति द्वारा सरल बन गया था. मैंने जो भी किया है उसकी पूरी जिम्मेदारी लेते हुए मैं अब अदालत के सामने खड़ा हूं और निश्चय जी न्यायाधीश ऐसा आदेश पारित करेंगे, जो मेरे कार्य के लिए उचित होगा. लेकिन मैं यह अवश्य कहना चाहता हूँ कि मैं अपने ऊपर कोई दया नहीं चाहता और न मैं यह चाहता हूँ कि कोई अन्य मेरे लिए किसी से कोई दया-याचना करे. अपने कार्य के नैतिक पक्ष पर मेरा विश्वास सभी ओर से की गयी मेरी आलोचनाओं से किंचित भी विचलित नहीं हुआ है. मुझे कोई सन्देह नहीं है कि इतिहास के ईमानदार लेखक मेरे कार्य का वजन तौलकर भविष्य में किसी दिन इसका सही मूल्यांकन करेंगे."

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

पिताजी तुमने मुझे धोखा दिया है

पिताजी मैं जानता हूँ कि तुम अब नहीं हो, कहीं नहीं हो. पिताजी मैं जानता हूँ कि तुम अब न तो देख सकते हो, न सुन सकते हो और न ही बोल सकते हो. क्योंकि तुम जा चुके हो, फिर भी मैं तुमसे तुम्हारी एक शिकायत करना चाहता हूँ कि तुमने मुझे धोखा दिया है, ऐसा धोखा किसी भी पिता ने आज तक अपने किसी भी पुत्र को नहीं दिया होगा, तुमने १ जनवरी की अहले सुबह मुझे हैप्पी न्यू ईयर कहा था फिर तुम मुझे अनहैप्पी करके कैसे जा सकते हो? तुम मेरे बिना रह सकते थे, रह भी लेते थे लेकिन मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता यह तुमको भी पता था, फिर तुम मझे छोड़कर कैसे जा सकते हो? तुम इतने निर्मम तो नहीं थे लोग तुमको आज भी महान कहते हैं फिर तुम मेरे प्रति निर्दय कैसे हो सकते हो? पिताजी पिछले २२ दिनों से मेरे कान बऊआ सुनने के लिए तरस रहे हैं, लगता है जैसे तुम अभी मुझे नीचे से आवाज लगाओगे बऊआ...... पिताजी मुझसे ऐसी कौन-सी गलती हुई कि तुम लौटकर न आने के लिए चले गए? मुझे याद है कि बचपन में जब भी तुम कहीं जाते थे मैं बेसब्री से तुम्हारा इंतजार करता था, क्योंकि मुझे पता था कि तुम लौटकर आओगे, इसी तरह जब दिवाली के दिन मेरा मोबाइल खो गया था, और मैं रोने लगा था, तब तुमने मुझे चुप करवाया था, पिताजी अब तुम खो गए हो और एकबार फिर से मैं रो रहा हूं पिताजी अब मुझे कौन चुप करवाएगा? पिताजी तुमने मुझे धोखा दिया है, सचमुच धोखा दिया है।

रविवार, 10 जनवरी 2021

बदले-बदले हुए सरकार नजर आते हैं

मित्रों, अभी ज्यादा दिन नहींं हुए जब बिहार विधानसभा चुनावो के दौरान विपक्ष के नेता बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी को चुका और थका हूआ कह रहे थे। तब मैने अपनी तरफ से कहा था कि नीतीश कुमार न टायर्ड हैं और न ही रिटायर्ड। बस गियर बदलने की देरी है फिर से नीतीश जी भारत के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमन्त्री साबित होगे। मित्रों, यह अतीव प्रसन्नता का विषय है कि नीतीशजी ने मेरे दावे को सही साबित किया है और अपनी कर्मठता को एक बार फिर से साबित किया है। चाहे वह बिहार सरकार का कोई भी विभाग हो सबको चुस्त-दुरूस्त किया जा रहा है।नीतीशजी के साथ-साथ कई सारे मंत्रीगण भी अपने-अपने विभागों से भ्रष्टाचार समाप्त करने की दिशा में लगातार प्रयत्नशील है। मित्रों, जहां तक मुझे लगता है बिहार की सबसे बड़ी समस्या भूमि सुधार की है। इस विभाग के मंत्री रामसूरत राय खुद स्वीकार कर चुके है कि उनके विभाग में सर्वाधिक भ्रष्टाचार है। इसकी रोकथाम के लिए उन्होंने बडे ही प्रभावी कदम भी उठाए है। अब रजिस्ट्री होते ही स्वत: मोटेशन हो जाएगा। इतना ही नहीं हल्का के कागजात भी अबसे अंचल कार्यालय में रहा करेंगे। औनलाईन रसीद तो पहले से ही काटी जा रही है मंत्रीजी ने चकबंदी के लिए भी आदेश दिए हैं जिससेे कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तरह किसानों की जोत भी बडी हो सके। मित्रो, अगर पूरे बिहार में ऑनलाईन एफआईआर की सुविधा हो जाए तो मणिकांचन संयोग हो जाए। जनता दरबार के पुनरारंभ के लिए भी नीतैश जी साधुवाद के पात्र हैं। मित्रों, जैसा कि मैने इस आलेख का शीर्षक लिया है तो वह गीत निगेटिव सेंस में था जो यहां लागू नहींं होता। यहां आसार बर्बादी के नही है बल्कि खुशहाली के हैं।

शनिवार, 2 जनवरी 2021

उद्यमिता का सम्मान करे भारत

मित्रों, वर्षों पहले मैंने हिंदी के सबसे बड़े कहानीकार और उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद की किसी पुस्तक में पढ़ा था कि अपने देश में हर कोई अमीरों को गाली देता फिरता है लेकिन गजब तो यह है कि प्रत्येक व्यक्ति खुद अमीर होना चाहता है. दुर्भाग्यवश भारत की जो स्थिति प्रेमचंद के समय थी आज भी बनी हुई है. हम अम्बानी-अडानी को गालियां भी देते हैं और हम अम्बानी-अडानी बनना भी चाहते हैं. मित्रों, बिहार में एक कहावत है कि हसुआ के लग्न में खुरपी के गीत और यह कहावत दिल्ली और पंजाब में चल रहे किसान आंदोलनों पर बखूबी लागू होती है. आन्दोलन कृषि क्षेत्र के बिचौलियों को बचाने के लिए हो रहा है फिर इसमें अम्बानी-अडानी कहाँ से आ गए? क्या मोबाइल टावरों को तोड़ देने से किसानों से ली गई १० रूपये प्रति किलोग्राम की सब्जी को उपभोक्ताओं के लिए १०० रूपये प्रति किलोग्राम बना देनेवाले बिचौलियों की रक्षा हो जाएगी? मित्रों, दरअसल पंजाब के जो लोग ऐसा कर रहे हैं वे निश्चित रूप से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मार रहे बल्कि कुल्हाड़ी पर पैर मार रहे हैं. उनके ऐसा करने से इस ऑनलाइन के ज़माने में राज्य की पूरी-की-पूरी संचार-व्यवस्था ठप हो जाएगी और ठप हो जाएगा पूरी-की-पूरी अर्थव्यवस्था जिसमें कृषि, विनिर्माण और सेवा तीनों क्षेत्र शामिल हैं. इतना ही नहीं कल अगर चीन-पाकिस्तान से भारत को लड़ना पड़ता है तो पंजाब जैसे सीमावर्ती राज्य में संचार-व्यवस्था का ध्वस्त होना देश को काफी महंगा पड़ सकता है. कितनी विचित्र बात है कि एक तरफ भारत सरकार भारत-चीन नियंत्रण रेखा पर लेह-लद्दाख में मोबाइल टावर स्थापित कर रही है ताकि युद्ध की स्थिति में हमारी सेना को कोई समस्या नहीं हो तो वहीँ पंजाब में देशविरोधी ताकतें मोबाइल टावरों को नुकसान पहुंचा रही है. इस समय जिन-जिन राज्यों में सोनिया कांग्रेस की सरकारें हैं वहां-वहां देशविरोधी गतिविधियों की खुली छूट है. क्या इंदिरा गाँधी ऐसा होने देती? आखिर क्यों पंजाब की अमरिंदर सरकार मोबाइल टावरों को नुकसान पहुँचानेवालों से मुआवजा वसूलने की पहल नहीं कर रही और उलटे उनको मौन समर्थन दे रही है? मित्रों, क्या आप जानते हैं कि अमेरिका क्यों अमीर है और जीडीपी में अग्रणी है? अमेरिकी अर्थशास्त्री और विचारक पीटर जेक ओ रूर्क ने अपनी पुस्तक ईट द रिच (१९९८) में विचार किया है कि क्यों कुछ स्थानों के लोग इतने संपन्न हैं? वह जवाब देते हैं कि इसका कारण बुद्धि तो नहीं हो सकती क्योंकि इस मामले में बेबर्ली हिल्स (कैलिफोर्निया) के लोगों से ज्यादा मूर्ख और कोई नहीं हो सकता. फिर भी वहां के नागरिक धन में लोटते हैं जबकि रूस के लोग शतरंज में सबसे माहिर होते हुए भी सूप बनाने के लिए पत्थर उबाल रहे हैं. तब रूस की आर्थिक स्थिति काफी ख़राब थी. आगे रूर्क कहते हैं कि अगर खनिज-सम्पदा सम्पन्नता तय करती तो अफ्रीका के देश दुनिया में सबसे अमीर होते. इसी तरह अगर साक्षरता से सम्पन्नता आती तो उत्तर कोरिया ९९ प्रतिशत साक्षरता के साथ सबसे सम्पन्न देश होता न कि उनकी जीडीपी मोरक्को जहाँ के मात्र ४४ प्रतिशत लोग साक्षर हैं की एक चौथाई होती. इस तरह कई पहलुओं पर विचार करने के बाद रूर्क इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जो समाज सृजन और उद्यमिता को जितना सम्मान देता है वो उतना ही अधिक सम्पन्न और धनवान होता है. मित्रों, अपने देश में ही लें तो गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्य सम्पन्न हैं जबकि बिहार जिसकी बुद्धि का लोहा पूरा भारत मानता है और जहाँ के नौकरशाह पूरे देश का शासन-प्रशासन चलाते हैं बदहाल है, क्यों? क्योंकि बिहार ने लालू राज में उद्यमियों को भगा दिया और खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली. इसी तरह एक समय बंगाल भारत का सबसे अमीर राज्य था लेकिन साम्यवादियों ने वहां के उद्यमियों को इतना परेशान किया कि वे भाग लिए. तो क्या पंजाब के लोग भी यही चाहते हैं कि पंजाब से उद्यमी पलायन कर जाएँ और जो पंजाब आज नौकरी देने के लिए जाना जाता है वहां के लोग मजदूर बनकर रह जाएँ? मित्रों, नेताओं का क्या है उनको तो गन्दी राजनीति करनी है. राहुल गाँधी हमेशा चार्टर्ड प्लेन से उड़ते रहेंगे, कम्यूनिस्ट भी चिथड़ा ओढ़कर घी पी रहे है, पीते रहेंगे, लालू परिवार भी उड़ रहा है लेकिन आज बिहारियों की क्या दशा है? बंगालियों की स्थिति क्या है? क्या सिंगूर आन्दोलन से उनको कोई लाभ हुआ? टाटा का क्या, बंगाल नहीं तो गुजरात सही. हमें कम-से-कम भारत के सबसे बड़े दुश्मन चीन से सीख लेनी चाहिए जो अपने उद्यमियों को साम्यवादी देश होते हुए भी भगवान की तरह पूजता है.

गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

अलविदा २०२० स्वागत २०२१

मित्रों, मुझे याद आ रहा है जब एक साल पहले २०२० की शुरुआत हो रही थी तब मैंने अपने ज्येष्ठ पुत्र भगत सिंह को मजाकिया लहजे में कहा था कि इसका तो नाम ही २०-२० है सो ये साल तो देखते-देखते चुटकियों में बीत जाएगा. मुझे तो क्या भारत में किसी को पता नहीं था कि यह साल इस तरह भयानक तरीके से बीतनेवाला है. मित्रों, होली तक तो सब ठीक था लेकिन फिर जैसे अचानक सबकुछ बदल गया. गाड़ियों का परिचालन बंद हो गया, फैक्ट्रियां बंद हो गई, स्कूल, दुकानें, मॉल सब बंद. सड़कों पर मजदूरों का सैलाब. हर कोई जहाँ भी था जल्दी-से-जल्दी अपने गाँव और घर पहुँच जाना चाहता था. हजारों लोग तो हजारों किमी पैदल चलकर घर गए. कई सारे मजदूर रेल की पटरी पर सोते हुए ट्रेन से कटकर मर गए. कई जेठ की दोपहरी में पैदल चलते-चलते मौत की गोद में सो गए. मित्रों, जाहिर है कि जब सब कुछ बंद था तो अर्थव्यवस्था की तो बाट लगनी ही थी. सो लगी. इस बीच चीन उसी चीन ने जिसने बड़े ही सोचे-समझे तरीके से दुनिया को कोरोना की आग में झोंक दिया था भारत-चीन सीमा पर घुसपैठ कर दी. मजबूरन भारत को भी अपनी सेना सीमा पर भेजनी पड़ी और कई सारे नए सियाचिन पैदा हो गए जो भविष्य में वर्षों तक भारत की जेब पर भारी पड़नेवाले हैं. मित्रों, बच्चे घर में बैठे-बैठे उब गए, हजारों नौकरीपेशा लोग जिनमें हजारों पत्रकार भी शामिल थे को या तो नौकरी से हाथ धोना पड़ा या फिर वेतन कटौती झेलनी पड़ी. दूसरी तरफ बहुत सारे व्यवसायियों के सामने जीवन-मृत्यु का प्रश्न खड़ा हो गया. एक तरह आमदनी का पूरी तरह बंद या कम हो जाना और दूसरी तरफ कमरतोड़ लगातार बढती महंगाई और बैंक की किश्तें. मित्रों, इन सबके बीच बस एक ही बात भारतीयों के लिए संतोषजनक थी और वो यह थी कि सिर्फ भारत ही नहीं चीन को छोड़कर पूरी दुनिया २०२० में परेशान रही. जर्मनी, इटली, स्पेन आदि देशों में तो शवों के ढेर लग गए जबकि भारत में अपेक्षाकृत कोरोना से मरनेवालों को संख्या कम रही. मित्रों, अब जबकि २०२० समाप्त होनेवाला है तब भी भारत में कई चीजें बंद हैं. बच्चे अभी भी घरों में ही कैद हैं. इस बीच इंग्लैण्ड में कोरोना का नया स्ट्रेन सामने आया है जो भारत में भी प्रवेश कर चुका है. उम्मीद करनी चाहिए कि इसका भारत पर कम-से-कम असर होगा और जल्दी ही भारत में जीवन और अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आएंगे. निराशा का कोई कारण नहीं है क्योंकि मानवता इससे पहले इससे भी बुरा समय और दौर देख चुकी है. हम पहले भी जीते थे और इस बार भी जीतेंगे चीन, पाकिस्तान, तुर्की जैसे देशों, इस्लाम जैसे मजहब और माओवाद जैसी विचारधारा की मौजूदगी के बावजूद जीतेंगे. जरुरत है तो बस धैर्य बनाए रखने की. स्वागत २०२१. नए साल का,नया सबेरा, जब, अम्बर से धरती पर उतरे, तब,शान्ति,प्रेम की पंखुड़ियाँ, धरती के कण-कण पर बिखरे.

रविवार, 27 दिसंबर 2020

मनुस्मृति का मूल्यांकन

मित्रों, हम सभी जानते हैं कि सनातन धर्म किसी एक धर्मग्रन्थ के आधार पर नहीं चलता. साथ ही इसमें हमेशा-से एक लचीलापन रहा है अर्थात इसमें कभी कट्टरता नहीं रही है. फिर भी जब अंग्रेज भारत आए तो उन्होंने मनुस्मृति को उसी प्रकार हिन्दुओं का आधार-ग्रन्थ मान लिया जैसे कि दुनियाभर के मुसलमानों के लिए कुरान एक मात्र आधार-ग्रन्थ है. मित्रों, हमें मनुस्मृति का निष्पक्ष मूल्यांकन करने से पहले यह जान लेना चाहिए कि स्मृति होती क्या है. सनातन धर्म में कई सारी स्मृतियाँ हैं जो तत्कालीन समाज को व्यवस्थित करने के लिए लिखी गईं. तब लगातार विदेशी जातियों का भारत में आगमन हो रहा था. साथ ही वर्णसंकरता को रोकने और उससे उत्पन्न संतानों को जाति व वर्ण व्यवस्था में स्थान देने की चुनौती लगातार बनी हुई थी अतः समय-समय पर कई सारी स्मृतियों की रचना की गई जिनमें मनुस्मृति सबसे पुरानी मानी जाती है. मित्रों, वैसे तो लगभग सारे हिन्दू धर्म-ग्रंथों के साथ छेड़-छाड़ की गई है और मनुस्मृति भी अपवाद नहीं है लेकिन हम यहाँ उन अपवादों को परे रखते हुए उसी मनुस्मृति का मूल्यांकन करेंगे जो हमें आज भी प्राप्त है. खासकर हम यह देखेंगे कि मनुस्मृति में स्त्रियों और शूद्रों के बारे में क्या कहा गया है. मित्रों, भारतीय समाज में ऋग्वैदिक काल के बाद से ही स्त्रियों और शूद्रों को हमेशा हीन की श्रेणी में रखा गया है. तथापि हम पाते हैं कि मनुस्मृति में स्त्रियों को यह कहते हुए उत्तम स्थान दिया गया है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।। मनुस्मृति ३/५६ ।। अन्वय: यत्र तु नार्यः पूज्यन्ते तत्र देवताः रमन्ते, यत्र तु एताः न पूज्यन्ते तत्र सर्वाः क्रियाः अफलाः (भवन्ति) । जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ स्त्रियों की पूजा नही होती है, उनका सम्मान नही होता है वहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं। शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् । न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।। मनुस्मृति ३/५७ ।। अन्वय: यत्र जामयः शोचन्ति तत् कुलम् आशु विनश्यति, यत्र तु एताः न शोचन्ति तत् हि सर्वदा वर्धते । जिस कुल में स्त्रियाँ कष्ट भोगती हैं,वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती है वह कुल सदैव फलता फूलता और समृद्ध रहता है । मित्रों, किन्तु जब वही मनु शूद्रों पर बात करते हैं तो काफी निर्मम प्रतीत होते हैं. मनु कहते हैं कि द्विकं त्रिकं चतुष्कं च पंचकंचशतं समं। मासस्य वृद्धिं गृह्याद्वर्णानामनुपूर्वशः ।। मनुस्मृति ८/१४२ ।। मित्रों, किन्तु जब वही मनु शूद्रों पर बात करते हैं तो काफी निर्मम प्रतीत होते हैं. मनु कहते हैं कि द्विकं त्रिकं चतुष्कं च पंचकंचशतं समं। मासस्य वृद्धिं गृह्याद्वर्णानामनुपूर्वशः ।। मनुस्मृति ८/१४२ ।। अर्थात ऋणदाता को चाहिए कि वह वर्णानुसार ब्राह्मण से दो प्रतिशत, क्षत्रिय से तीन प्रतिशत, वैश्य से चार प्रतिशत और शूद्र से पांच प्रतिशत ब्याज हर माह वसूल करे. इतना ही नहीं मनु कहते हैं कि अगर कोई शूद्र किसी द्विज जो अपशब्द कहे तो उसी जीभ काट लेनी चाहिए. साथ ही अगर कोई शूद्र किसी द्विज के नाम या जाति का उपहास करे तो उसके मुंह में दस अंगुल लम्बी तप्त लौह-शलाका डाल देनी चाहिए. यदि शूद्र दर्प में आकर द्विजों को धर्मोपदेश दे तो उसके मुंह और कान में खौलता हुआ तेल डाल देना चाहिए. शूद्र जिस अंग से द्विजों पर आघात करे उसका वह अंग कटवा देना चाहिए. मनुस्मृति ८/ २६९,२७०, २७१, २७८. मित्रों, इस प्रकार हम पाते हैं कि धर्म की अच्छी परिभाषा देने और वृद्धों, स्त्रियों और शिक्षकों को सम्मान देने सम्बन्धी सुन्दर सुभाषितों के बावजूद मनुस्मृति हिन्दू समाज के एक महत्वपूर्ण अंश शूद्रों के प्रति काफी निर्मम हैं. साथ ही मनुस्मृति से यह भी पता चलता है कि उस समय भी हिन्दू बड़े पैमाने पर मांस खाते थे भले ही खाने से पहले उनकी बलि दी जाए. मैं ऐसा बेहिचक कह सकता हूँ कि अगर मैं बाबा साहब की जगह होता तो मैं भी एक शूद्र होने के नाते मनुस्मृति को पसंद नहीं करता. हालांकि जैसा कि मैंने शुरुआत में ही कहा कि सनातन धर्म शुरू से ही काफी लचीला रहा है और हमेशा इसमें सुधार और विरोध की गुंजाईश रही है. स्वयं भगवान बुद्ध के समय भारत में वैदिक धर्म से ईतर ५ दर्जन के लगभग दर्शन और संप्रदाय प्रचलन में थे और उनके बीच कभी कोई हिंसक संघर्ष नहीं हुआ.

रविवार, 20 दिसंबर 2020

सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार का सुप्रीम झूठ

मित्रों, हम बचपन से ही पढ़ते आ रहे हैं कि भारत में जनसँख्या विस्फोट की स्थिति है जो लगातार भयावह रूप लेती जा रही है. गांवों और शहरों में खेत और बगीचे कंक्रीट के जंगल में बदलते जा रहे हैं. प्रदुषण खतरनाक स्तर तक पहुँच रहा है. बेरोजगारी चरम पर है. अपराध बढ़ रहे हैं लेकिन केंद्र सरकार की मानें तो जनसँख्या-विस्फोट कोई समस्या ही नहीं है इसलिए भारत को जनसँख्या-नियंत्रण कानून नहीं बनाना चाहिए. मित्रों, विचित्र स्थिति तो यह है कि जनसँख्या नियंत्रण कानून बनाने से बचने के लिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में ऐसा झूठ बोला है जिसको पांचवीं कक्षा का बच्चा भी पकड़ लेगा. दरअसल सरकार ने हमारे बड़े भाई अश्विनी उपाध्याय द्वारा जनसँख्या-नियंत्रण पर सुप्रीम कोर्ट दायर जनहित याचिका पर जबरदस्ती अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि चूंकि स्वास्थ्य संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्य सूची का विषय है इसलिए केंद्र सरकार जनसँख्या-नियंत्रण कानून बना ही नहीं सकती. जबरदस्ती इसलिए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उसे इस मुकदमे में पक्ष माना ही नहीं था. वास्तव में भारत के संविधान में जनसँख्या-नियंत्रण और परिवार नियोजन समवर्ती सूची में २० क में दर्ज है और समवर्ती सूची में दर्ज विषयों के ऊपर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं. साथ ही भारत के संविधान के अनुसार अगर संसद और विधानसभा दोनों एक ही विषय पर अलग-अलग कानून बनाती हैं तो संसद द्वारा निर्मित कानून ही मान्य होगा. मित्रों, समझ में नहीं आता कि भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के जिन अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखने के लिए हलफनामा तैयार करवाया उन्होंने कभी भारत का संविधान पढ़ा भी है या नहीं. भारतीय प्रशासनिक सेवा भारत की सर्वोच्च सेवा है और काफी योग्य लोग ही उसमें चयनित हो पाते हैं फिर उस स्तर का कोई अधिकारी ऐसी गलती कैसे कर सकता है? क्या स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्द्धन भी संविधान का क अक्षर नहीं जानते? और अगर जानते हैं तो फिर स्वास्थ्य मंत्रालय ने झूठ क्यों बोला? मित्रों, इतना ही नहीं स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने हलफनामे में कहा है कि चूंकि भारत की प्रति वर्ष जनसँख्या वृद्धि दर अब २ प्रतिशत के लगभग है इसलिए भी जनसँख्या-नियंत्रण कानून की जरुरत नहीं है. क्या स्वास्थ्य मंत्रालय ने कभी हिसाब लगाकर देखा है कि सवा अरब या डेढ़ अरब का २ प्रतिशत कितना होता है? लगभग ढाई या तीन करोड़. क्या यह छोटी संख्या है? क्या भारत जैसा गरीब देश जो दुनिया की १६ प्रतिशत जनसँख्या और मात्र २ प्रतिशत क्षेत्र धारण करता है इतनी बढ़ी जनसँख्या के लिए मूलभूत सुविधाएँ जुटा सकता है? कहाँ से आएँगे इतने स्कूल, घर और नौकरियां? मित्रों, ५६ ईंची मोदी सरकार तो दावे करती है कि वो देशहित में नीतियाँ बनाती है और उसके लिए नेशन फर्स्ट है तो फिर वो जनसँख्या-नियत्रण की अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी से पीछे क्यों भाग रही है? भारत का कोई अनपढ़ भी बता देगा कि भारत की सबसे बड़ी समस्या जनसँख्या-विस्फोट है. क्या इतनी-सी बात भी मोदी सरकार को पता नहीं है? हालाँकि यह सच नहीं है फिर भी अगर जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन राज्य सरकार का विषय होता तो क्या मोदी सरकार ने कभी राज्य-सरकार के विषयों पर कानून बनाया ही नहीं है? फिर कृषि कानून जिनको लेकर दिल्ली की सडकों पर धींगामुश्ती चल रही है वो क्या है? कृषि भी तो राज्य-सूची का विषय है. मित्रों, कुल मिलाकर केंद्र सरकार ने अपने सफ़ेद झूठ से भारत के लोगों को निराश किया है. एक उम्मीद जो मोदी जी और उनकी सरकार से थी कि वे भारत को विश्वगुरु बनाएँगे अब टूटती हुई लग रही है. मोदी सरकार को भी कदाचित सत्ता से मोह हो गया है और शायद वह भविष्य में ऐसा कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगी जिससे वोट-बैंक पर बुरा असर पड़े भले ही उसकी कितनी भी आवश्यकता क्यों न हो?

बुधवार, 16 दिसंबर 2020

कुत्ते की पूँछ बिहार का प्रशासन

मित्रों,कुत्ता जितना वफादार जीव है उतना ही सीधा भी लेकिन उसकी पूँछ कहने की आवश्यकता नहीं बड़ी टेढ़ी होती है. टेढ़ी खीर कैसे टेढ़ी होती है हमने तो नहीं देखा लेकिन आज तक जहाँ भी कुत्ते को देखा है उसे टेढ़ी पूँछ वाला ही पाया है. यद्यपि मैंने कभी किसी को कुत्ते की पूँछ को नली में डालते हुए तो नहीं देखा लेकिन यह कहावत बिहार क्या पूरे भारत में मशहूर है कि चाहे कुत्ते की पूँछ को १२ बरस तक लोहे की नली में कैद कर दो वो सीधी नहीं होगी टेढ़ी ही रहेगी. मित्रों, एक अरसा हुआ तब मैं फुलवरिया कटिहार में रहता था. फुलवरिया चौक पर जब भी पुलिस की गाड़ी आती तो लोग कहते कुत्ते आ रहे हैं. मुझे लगा चूंकि लोगों की रक्षा करना पुलिस का काम है इसलिए कुत्ता कह भी दिया तो क्या हुआ हालांकि लोग पुलिस को कुत्ता हिकारत की दृष्टि से कहते थे. तब बिहार में लालूजी का शासन था. मित्रों, तब बिहार में आज के बंगाल की तरह ही कैडर राज था. राजद का कोई छुटभैया नेता भी थाना पर चला जाए तो पुलिस घबरा जाती थी. पुलिस के पास स्टेशनरी तक नहीं थी, पुलिस गाड़ी में तेल नहीं होता था. मतलब की तब नौकरशाही लोकशाही के सामने पूरी तरह से लाचार थी, विवश थी. मित्रों, फिर बिहार के सिंहासन पर नीतीश कुमार जी विराजमान हुए और इन्होंने नौकरशाही को खुली छूट दे दी. सत्तारूढ़ गठबंधन के नेता भी तब थाने पर जाने से डरने लगे. नौकरशाही और लोकशाही के बीच आवश्यक संतुलन न तो लालू जी के समय थी और न ही नीतीश जी ने इसका ख्याल रखा. एक ने नौकरशाही को शून्य बना दिया तो दूसरे ने सीधे सौ जबकि होना तो यह चाहिए था कि नौकरशाही और लोकशाही को ५०-५० पर रखा जाता. मित्रों, हमने वर्ष २०१२ में अपने एक आलेख बेलगाम नौकरशाही के आगे लाचार नीतीश में कहा था कि नीतीश जी ने नौकरशाही को बेलगाम बनाकर जो गलती की थी उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं. मित्रों, पद पा लेना आसान है लेकिन शासन चलाना काफी कठिन. जब तक शासक की नीतियाँ सही नहीं होंगी कोई अच्छा शासन दे ही नहीं सकता. नीतीश जी की नीतियाँ गलत थीं भले ही उससे उनको और बिहार को अल्पकालिक लाभ हुए हों लेकिन बबूल का पेड़ कब तब काँटा देने से बचेगा? आज बिहार के प्रशासनिक अधिकारी कर्तव्यनिर्वहन नहीं करते सिर्फ कागजी खानापूरी करते हैं. सरकार भी सिर्फ कागज खाती है इसलिए उसे कागज खिलाया जा रहा है. जब लिपि सिंह इतना जघन्य और अक्षम्य अपराध करने के बावजूद निर्भय और सुरक्षित है तो फिर कोई प्रशासनिक अधिकारी क्यों सरकार से डरे? नौकरशाही को उसी तरह लोकशाही के पाँव तले होने चाहिए जैसे सिंह माता दुर्गा के क़दमों के नीचे होता है. राज्य के राजस्व मंत्री राम सूरत राय स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि उनका विभाग सबसे ज्यादा भ्रष्ट है लेकिन क्या स्वीकारोक्ति समाधान है या बन सकती है? मित्रों, रही बात बिहार पुलिस की तो बिहार में पुलिस है ही कहाँ? पुलिस का दो प्रकार का काम होता है-पहले अपराध को होने से पहले ही रोक देना और अपराध होने के बाद अपराधियों को पकड़कर दण्डित करवाना. बिहार पुलिस तो इन दोनों में से कोई भी काम कर ही नहीं रही है फिर काहे ही पुलिस? पुलिस तो बस थाने में बैठी रहकर कागजी काम करती है और रिश्वत खाती है. क्या मजाल कि किसी भी आम आदमी का कोई भी काम सीधे तरीके से हो जाए. ऐसे माहौल में मैं दावा करता हूँ कि आईजी तो क्या डीजीपी भी गश्ती करें तब भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा. मित्रों, बिहार में इन दिनों एक और खतरनाक प्रवृत्ति विकसित हुई है. लोग निगरानी द्वारा रिश्वत लेते हुए पकडे जाते हैं और न्यायालय द्वारा फिर से बहाल कर दिए जाते हैं. इसी तरह से न्यायालय धड़ल्ले से अपराधियों को जमानत देती है. कुछ न्यायाधीश तो जमानत देने के लिए विख्यात हैं. जब तक न्यायालय प्रशासन का साथ नहीं देगा तब तक प्रशासन सबकुछ करके भी कुछ नहीं कर सकता. फिर बिहार में जनशिकायत का जो भी मंच है सही तरीके से काम नहीं कर रहा है ऐसे में जनता जाए तो कहाँ जाए? जब तक नौकरशाही नीतीश की सुनती थी जनता दरबार लगाया फिर फजीहत से बचने के लिए बंद कर दिया क्योंकि समाधान नहींं होता था। कुल मिलाकर जो चलता था वही चल रहा है और शायद चलता रहेगा चाहे नीतीश कुमार कितनी भी बैठकें कर लें. सरकार को चाहिए कि नई तकनीकी से लाभ उठाते हुए सबकुछ ऑटोमैटिक और ऑनलाइन कर दे और कोई उपाय नहीं है कुत्ते की दुम को सीधी करने का. हमने देखा है कि सिर्फ रजिस्ट्रीवाली जमीनों का ही ऑनलाइन नामांतरण हो रहा है कोर्ट के आदेश का नहीं हो पाता सरकार को इन विसंगतियों को भी दूर करना होगा.

गुरुवार, 10 दिसंबर 2020

डरपोक और पिलपिली मोदी सरकार

मित्रों, कहते हैं कि कथनी और करनी में भारी अंतर होता है. चमड़े की जीभ से इन्सान कुछ भी बोल जाता है, किसी भी तरह के दावे कर डालता है लेकिन उसकी हिम्मत की परीक्षा तब होती है जब उसका संकटों और परेशानियों से सामना होता है. मित्रों, आपलोगों को भी याद होगा कि जब २०१४ में लोकसभा चुनावों का प्रचार चल रहा था तब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी लगभग हर जनसभा में दावा करते थे कि उनका सीना ५६ ईंच का है अर्थात उनमें अपार साहस, हिम्मत और निर्णय लेने की क्षमता है. मित्रों, लेकिन भारत का प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही महीने बीते थे कि यह भ्रम टूटने लगा और अब पूरी तरह टूट चुका है. दरअसल हुआ यह था कि मोदी जी की सरकार ने भूमि अधिग्रहण सम्बन्धी कानूनों में बदलाव करने के लिए अध्यादेश जारी किया था. मगर जब उसका विपक्षी दलों ने बड़े पैमाने पर विरोध किया तब ५६ ईंची सरकार के हाथ-पांव फूल गए और उसे यू-टर्न लेना पड़ा. नवम्बर २०१६ में भी जब मोदी सरकार ने नोटबंदी की तब भी सरकार को रोज-रोज अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करना पड़ा. मित्रों, इसी तरह देसी और विदेशी कालेधन पर प्रहार करने में भी मोदी सरकार पूरी तरह से विफल रही है. उल्टे माल्या, चौकसे और नीरव मोदी भारत के बैंकों को हजारों करोड़ का चूना लगाकर इसी मोदी सरकार के समय विदेश भाग गए. रोबर्ट वाड्रा आज भी आजाद है, राहुल-सोनिया भी जेल नहीं गए और प्रियंका गाँधी का हिमाचल में बना अवैध बंगला शान से खड़ा है. यह कैसी ५६ ईंची सरकार है जो सुशांत सिंह और नवरुना के कातिलों को नहीं पकड़ पाती? यह कैसी ५६ ईंची सरकार है जिसकी आँखों के सामने बंगाल और केरल में थोक में भाजपा कार्यकर्ताओं को मारा जा रहा है लेकिन यह अनुच्छेद ३५६ नहीं लगाती न ही अनुच्छेद ३५५ का प्रयोग कर राज्य सरकार को निर्देश देती है? मित्रों, अभी पिछले साल १५ दिसंबर को दिल्ली के शाहीन बाग़ में सीएए के बेवजह किए जा रहे विरोध में धरने की शुरुआत हुई. जल्दी ही विरोधियों ने पूरी सड़क को अपने कब्जे कर लिया. फिर क्या था पूरे भारत के बहुत-सारे मुस्लिम बहुल इलाकों में शाहीन बाग़ जैसे धरने की शुरुआत हो गई. यहाँ तक कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय राजधानी में चल रहे कई सारे शाहीन बागों को भी खाली नहीं करवा पाई. फिर विरोधियों ने दिल्ली में दंगा शुरू कर दिया और इसके दौरान भी सबसे ज्यादा लाचार नजर आ रही थी दिल्ली पुलिस जो केंद्र सरकार के मातहत काम करती थी और करती है. वो तो भला हो कोविड-१९ का जिसके चलते स्वतः धरने समाप्त हो गए वर्ना न जाते क्या होता. मित्रों, इस समय भी दिल्ली में कथित किसान आन्दोलन चल रहा है और केंद्र की ५६ ईंची सरकार की हवा ख़राब हुई जा रही है. सूत्रों से पता चला है कि केंद्र सरकार एक बार फिर यू टर्न लेने के लिए तैयार हो गई है. केन्द्र सरकार की इन हरकतों को देखकर ऐसे लगता है कि यह सरकार भीड़ और सड़क जाम से बहुत डरती है और हर जायज-नाजायज मांग को मानने को तैयार हो जाती है. हमें ऐसे भी लग रहा है कि हमें भी जनसंख्या कानून, समान नागरिक संहिता, अल्पसंख्यक संशोधन कानून, अनुच्छेद ३० में संशोधन, पुलिस और न्यायिक सुधार कानून, नवीन भारतीय सिविल सेवा कानून, भ्रष्टाचार विरोधी सख्त कानून आदि के लिए दिल्ली की सडकों पर भीड़ जमा करके सड़क जाम करना होगा. जब यह सरकार दिल्ली की सडकों को भी खाली नहीं करवा सकती तो क्या खाकर पाकिस्तान और चीन से जमीन खाली करवाएगी? ज्यादा-से-ज्यादा यह नए सियाचिन पैदा कर सकती है. इससे ज्यादा कुछ नहीं.

सोमवार, 30 नवंबर 2020

फिर से आग से खेल रही है कांग्रेस

मित्रों, हमने इतिहास की किताबों में पढ़ा था कि १८५७ का स्वतंत्रता-संग्राम सैनिकों ने नहीं लड़ा था बल्कि वे सैनिक वर्दी पहने हुए किसान थे. १७९३ में जमींदारी और १७९४ में सूर्यास्त कानून के आने के बाद बंगाल, बिहार, उड़ीसा और पूर्वी उत्तर प्रदेश में लगान की दरें दोगुनी कर दी गयी थी जिससे किसान त्राहि-त्राहि कर उठे थे. सैनिक जब भी अपने घर जाते तो वहां की हालत देखकर उनके मन में क्रोध भर जाता जिसकी परिणति सैनिक-विद्रोह के रूप में हुई. मित्रों, आज भी देश के लिए जान न्योछावर करनेवाले लगभग सारे-के-सारे वीर किसानों के बेटे होते हैं. ऐसे में ऐसा कैसे संभव है कि किसान भारत माता की जय बोलने से मना कर दें और उसके बदले पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने लगें. जाहिर है कि इस समय दिल्ली में चल रहा किसान आन्दोलन के पीछे कोई साजिश है जिसके रचयिता देश को जलाना चाहते हैं. जिस तरह से इस आन्दोलन में कांग्रेस सहित पूरा-का-पूरा टुकड़े-टुकड़े गैंग सक्रिय है कथित आन्दोलन के प्रति वह भारत के जन-गण-मन की आशंकाओं को और भी गहरा करता है. मित्रों, हमें भूलना नहीं चाहिए कि १९७० के दशक में इसी कांग्रेस पार्टी ने अकाली दल पर कब्ज़ा ज़माने के लिए जरनैल सिंह भिंडरावाले को प्रोत्साहित किया था. अलगाववादी प्रवृत्ति का भिंडरावाले अवसर का लाभ उठाते हुए पाकिस्तान की गोद में जा बैठा था और भारतीय पंजाब को अलग देश बनाने के सपने देखने लगा. फिर पंजाब दो दशकों तक जलता रहा और उसकी आग में होलिका राक्षसी की तरह श्रीमती इंदिरा गाँधी भी जल गई. साथ ही हजारों की संख्या में निरपराध मारे गए जिनमें हिन्दू सबसे ज्यादा थे. मित्रों, एक बार फिर से कांग्रेस बेवजह आन्दोलन खड़ा करके पंजाब में अलगाववाद की आग भड़का रही है. बेवजह इसलिए क्योंकि पंजाब सरकार अक्टूबर में ही नए कानून बनाकर भारत सरकार द्वारा बनाए गए कृषि कानून को निष्प्रभावी बना चुकी है. फिर समझ में नहीं आता कि पंजाब की किसान क्यों आंदोलन कर रहे हैं. जाहिर है कि दाल में कुछ काला है और कांग्रेस टुकड़े-टुकड़े गैंग का हिस्सा बनकर चीन-पाकिस्तान से मोटी रकम वसूलने के चक्कर में है. मित्रों, तथापि कांग्रेस पार्टी इस बात को समझ नहीं पा रही है अथवा जानबूझकर ऐसे खेल खेल रही है जिससे पंजाब दोबारा जलने लगे और साथ में जल उठे पूरा भारतवर्ष. हाथरस कांड में कांग्रेस ने जिस तरह हिन्दुओं में फूट डालने के पाकिस्तानी और चीनी एजेंडे को पूरा करने की कोशिश की वह किसी से छिपी हुई नहीं है. जिस तरह से दिल्ली की मस्जिदों से आन्दोलनकारियों के भोजन और आवासन की व्यवस्था की जा रही है उससे यह खेल और भी खतरनाक हो जाता है. शायद कांग्रेस भूल गई है कि जिस इंदिरा गाँधी की हत्या को उसने महान शहादत का नाम देकर १९८४ का चुनाव जीता था वह खुद इंदिरा की लगाई आग का परिणाम था. कहने का तात्पर्य यह कि अगर पंजाब फिर से जलता है तो उसकी लपटें फिर से कांग्रेस को भी झुलसाएंगी.

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

अंधेर नगरी मोदी राजा

मित्रों, भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिंदी साहित्य में आधुनिकता का प्रवर्तक माना जाता है. भारतेंदु स्वयं एक बहुत बड़े नाटककार भी थे. उन्होंने अपने नाटक के माध्यम से देश में व्याप्त अनेकों समस्याओं को देश वासियों से समक्ष प्रस्तुत किया. ‘अंधेर नगरी’ उनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यंग्य-नाटक है, जो सत्ता की विवेकहीनता का रूप सामने लाता है. अंधेर नगरी अंग्रेजी राज का दूसरा नाम है. ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ अंग्रेजी राज्य की अंधेरगर्दी की आलोचना ही नहीं, वह इस अंधेरगर्दी को ख़त्म करने के लिए भारतीय जनता की प्रबल इच्छा भी प्रकट करता है. अंधेर नगरी की प्रचलित लोककथा पर आधारित भारतेंदु के इस नाटक में उत्तर औपनिवेशिक चेतना की स्पष्ट झलक है. यह उपनिवेशवाद का प्रतिवाद है. भारतेंदु ने अंधेर नगरी को पश्चिमी साम्राज्य का रूप दिया है. भारतेंदु ने इस व्यंग्य के तौर पर अंग्रेजी साम्राज्य को अंधेर नगरी की संज्ञा दी है. अंधेर नगरी में भारतेंदु ने महंत के माध्यम से कहलाया है, “बच्चा नारायणदास, यह नगर दूर से बड़ा सुंदर दिखाई पड़ता है.” भारतेंदु दिखाना चाहते थे कि पश्चमी साम्राज्यवादी सभ्यता दूर से इतनी सुंदर दिखाई देती है, पर अंदर से क्या है. ये एक सभ्यता पर टिपण्णी करना चाहते थे, सिर्फ अंग्रेजी राज पर नहीं. भारतेंदु द्वारा अंधेर नगरी में चित्रित महंत विवेकशीलता का प्रतिक है. भारतेंदु ने महंत की ये विवेकशीलता एक गुरु के रूप में उद्धरित की है. अपने गुरु की आज्ञा न मानकर गोबरधनदास टके सेर मिठाई खाता है और चौपट राज्य की व्यवस्था में फंस जाता है. फांसी पर जब शिष्य को लटकाया जा रहा था तो उसने गुरू का स्मरण किया उन्होंने जो युक्ति सुझाई वही कारगर हुई यानी आज भी होगी। यानि गुरु के महत्त्व को भारतेंदु प्राथमिकता दी है और इस दृश्य के माध्यम से यह भी दिखाने का प्रयास किया है कि शिक्षा एवं ज्ञान के कारण ही हम बड़े-बड़े संकट से बच सकते हैं. भारतेंदु की वैचारिक दृष्टि सदा आम जनता के उद्धार के प्रति ही रही. अंग्रेजी साम्राज्य से मुक्ति और उनकी अंधेरगर्दी से छुटकारा ही उनकी रचनाओं का प्रमुख विषय रहा. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में, “भारतेंदु का पूर्ववर्ती काव्य साहित्य संतो की कुटिया से निकल कर राजाओं और रईसों के दरबार में पहुँच गया था. उन्होंने एक तरफ तो काव्य को फिर से भक्ति की पवित्र मंदाकिनी में स्नान कराया और दूसरी तरफ़ उसे दरबारीपन से निकल कर लोक-जीवन के आमने-सामने खड़ा कर दिया.” इसके आधार पर भारतेंदु ने अंधेर नगरी में दरबार के उपेक्षा की है और लोक जीवन का समर्थन किया है. मित्रों,भारतेंदु ने अंधेर नगरी के माध्यम से अपनी वैचारिक दृष्टि कानून व्यवस्था पर भी डाली है. क़ानूनी व्यवस्था का प्रतिनिधि राजा को सुनाई नहीं देता, वह ‘पान खाइए’ को ‘सुपरनखा आई’ सुनता है. जब कोई फरियादी उसके पास अपनी फ़रियाद लेकर आता है तो वह उसे अपनी बातो में उलझा कर न्यायिक प्रक्रिया को और लम्बा कर देता है. फरियादी की दिवार गिरने के कारण बकरी मर जाती है. वह न्याय के लिए राजा के पास जाता है लेकिन राजा की न्याययिक प्रक्रिया जाकर गोबर्द्धन दास को फाँसी किस सजा सुनाने पर रूकती है. क्योंकि फाँसी का फंदा उसी के नाप का था. कुछ ऐसा ही दृश्य मन्नू भंडारी द्वारा लिखित नाटक ‘उजली नगरी, चतुर राजा’ में देखने को मिलता जहाँ एक आदमी अपनी समस्या लेकर राजा से पास आता है तो राजा उसे अपनी बातों में उलझा कर बिना न्याय किये वापस भेज देता है. यह कहा जा सकता है कि सवा सौ साल पहले ही भारतेंदु ने वर्तमान की तस्‍वीर खींच दी थी. अंधेर नगरी के अंत में भारतेंदु अपनी बौद्धिकता का प्रमाण देते हुए महंत के माध्यम से चौपट राजा को फाँसी पर चढ़ा कर समाज में परिवर्तन के सुखद संकेत दिए हैं. अंत में भारतेंदु कहते हैं, “ जहाँ न धर्म न बुद्धि नहिं, नीति न सुजन समाज। ते ऐसहि आपुहि नसे, जैसे चौपटराज॥“ मित्रों, सवाल उठता है कि क्या आज भारतेंदु द्वारा यह प्रसिद्ध नाटक लिखने के डेढ़ सौ साल बाद देश अंधेर नगरी नहीं रहा? क्या भारत में राम राज्य आ गया है या स्थिति अंग्रेजों के समय से भी ज्यादा ख़राब हो गई है? क्या स्वतंत्र भारत की सरकारों ने भ्रष्टाचार को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है? क्या हमारी सरकार सचमुच भ्रष्टाचार को समाप्त करना चाहती है या फिर भ्रष्टाचार को समाप्त करने के प्रयास करने का नाटक मात्र कर रही है? मित्रों, वास्तविकता तो यही है कि चाहे तो केंद्र की मोदी सरकार हो या राज्यों की सरकारें किसी की भी प्राथमिकता सूची में देशोद्धार है ही नहीं. सबके सब सिर्फ ज्यादा से ज्यादा वोटबैंक बनाने और सत्ता प्राप्त करके के लिए मरे जा रहे हैं. केंद्र सरकार की सारी योजनाएं सिर्फ इस दृष्टिकोण से बनाई गई हैं कि उससे कितना वोट बढेगा. फिर चाहे वो जन धन खाता हो, उज्ज्वला योजना हो, स्वास्थ्य बीमा योजना हो, किसान सम्मान योजना या बिहार सरकार की नक़ल करके लाई गई हर घर नल का जल योजना. सच्चाई तो यह है कि आज भी बिना रिश्वत दिए जनता का कोई काम नहीं होता. पुलिस आज उससे भी सबसे ज्यादा अंधेरगर्दी करती है जितनी वो अंग्रेजों के ज़माने में करती थी. दिल्ली पुलिस तक महाभ्रष्ट है. पटवारी आज उससे भी ज्यादा रिश्वत खाता है जितनी वो अंग्रेजों के ज़माने में खाता था. हाकिम आज उससे भी ज्यादा भ्रष्ट है जितना वो अंग्रेजों के ज़माने में था. आज भी नेता आपस में मिलकर सुशांत सिंह मामले को रफा-दफा कर देते हैं. इन्साफ आज भी दूर की कौड़ी है जैसे भारतेंदु से समय था. अंग्रेजों के बारे में भारतेंदु ने कहा था कि भीतर भीतर सब रस चूसै बाहर से तन मन धन मूसै जाहिर बातन में अति तेज क्यों सखि साजन? नहीं अंगरेज। क्या हमारे आज के नेता अंग्रेजों से अलग हैं? हमारे प्रधानमंत्री दिन-रात भाषण देते रहते हैं लेकिन उससे क्या फर्क पड़ा है? केंद्र की भाजपा सरकार का कोई ठिकाना नहीं कि कब किस तरह की नीति की घोषणा कर दे भले ही सरकार की तैयारी कुछ भी नहीं हो. सरकार ने सत्ता में आने के १० दिन के भीतर विदेशों से काला धन लाने की बात कही थी आई क्या? भाजपा ने हर साल २ करोड़ लोगों को रोजगार देने की बात कही थी दी क्या? सरकार ने योजना आयोग को समाप्त कर दिया क्या लाभ हुआ? सरकार ने यूजीसी को समाप्त करने की बात कही है लेकिन उसके स्थान पर उच्च शिक्षा को देखेगा कौन और व्यय कौन उठाएगा? सरकार ने नेट की वैल्यू को कम करके पीएचडी की वैल्यू को बढ़ा दिया. फिर नेट की परीक्षा ली क्यों जा रही है? नेट की परीक्षा में तो फिर भी पारदर्शिता है लेकिन पीएचडी में जो मनमानी है और सेटिंग है उसको रोकने के लिए सरकार ने क्या किया है? आज कहने को ऑनलाइन सरकार है लेकिन नमो ऐप सहित किसी भी मंच पर जनता की शिकायतें नहीं सुनी जा रही है. जनता आज अंग्रेजों के ज़माने से भी ज्यादा लाचार है. मित्रों, अंग्रेज तो सात समंदर पार से आए थे इसलिए स्वाभाविक था कि हमारे देश को लूटकर धन सात समंदर पार ले गए लेकिन हमारे नेताओं ने क्या किया? क्या वे धन स्विस बैंक में नहीं ले गए? मोदी सरकार के समय माल्या, मेहुल चौकसे और नीरव मोदी बैंकों से भारी मात्र में ऋण लेकर सात समंदर पार भाग गए और मोदी सरकार मूक दर्शक बनी देखती रही ऐसे में क्यों नहीं यह समझा जाए कि मोदी सरकार ने ही उनको भगाया है? आज भी बैंक आम जनता को ऋण नहीं देती लेकिन अम्बानी-अडानी को हजारों करोड़ के कर्ज झटपट मिल जाते हैं. इतना ही नहीं आज एक-एक करके निजी बैंक बंद हो रहे हैं और उनमें जनता के खून-पसीने से कमाया गया पैसा फंस जा रहा है. किसी-किसी की जीवन भर की कमाई डूब जा रही है. मित्रों, देश के शुभचिंतक लगातार मांग कर रहे हैं कि सरकार जनसँख्या नियंत्रण कानून बनाए साथ ही भ्रष्टाचारियों के खिलाफ अमेरिका की तरह सख्त कानून बनाए, पुलिस को जनता के प्रति जिम्मेदार बनाया जाए, न्यायिक प्रणाली को त्वरित और जिम्मेदार बनाया जाए लेकिन सरकार ऐसा नहीं कर रही बल्कि खुद भाजपा के कार्यकर्ता रोजाना बंगाल और केरल में मारे जा रहे लेकिन केंद्र सरकार उनकी जान बचाने के बदले किनारे पर खड़ी होकर शोर मचा रही है फिर अर्नब को कौन और क्यों बचाए. केंद्र सरकार कड़क सरकार के बदले कड़ी निंदा की सरकार बनकर रह गई है. आज राष्ट्रवाद का सौदा किया जा रहा है. केवल चीन-पाकिस्तान का शोर मचाकर चुनाव जीते जा रहे हैं जबकि देश की अर्थव्यवस्था रसातल में जा रही है. रेलवे, हवाई अड्डे निजी हाथों में सौंपे जा रहे हैं. जनता की आमदनी बढ़ाए बिना महंगाई बढ़ाई जा रही है. सिविल सेवा में नेताओं के भाई-भतीजों को सीधे भरा जा रहा है जबकि योग्य उम्मीदवार खाक छानते फिर रहे हैं. मोदी सरकार द्वारा किसी को भी किसी भी केंद्रीय विवि का कुलपति बना दिया गया है तो किसी को भी ओएनजीसी का स्वतंत्र निदेशक. मित्रों, अब बिहार की नवगठित सरकार को ही लें जिसे मोदी जी डबल ईंजन की सरकार कहते हैं. इसमें एक ऐसे व्यक्ति को शिक्षा मंत्री बना दिया जाता है जिस पहले से ही भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं. मंत्री को कार्यभार सँभालने के मात्र तीन घंटे के भीतर ही इस्तीफा देने को कह दिया जाता है. उधर मुख्यमंत्री के चमचे कहते हैं कि मुख्यमंत्री जी भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टोलरेन्स रखते हैं. फिर सवाल उठता है कि ऐसे भ्रष्ट को मंत्री बनाया ही क्यों? क्या ऐसी ही सरकार को डबल ईंजन की सरकार कहते हैं? अभी भी नीतीश सरकार में आठवीं पास मंत्री हैं. लोगों ने मोदी जी के नाम पर वोट दिया है तो क्या मोदी जी का यह कर्त्तव्य नहीं है कि वे मंत्रिमंडल में दागियों को शामिल करने से रोकें? खैर जब मोदी जी ही सुरेश प्रभु को हटाकर पीयूष गोयल को रेल मंत्री बनाते हैं, नचनिया-गवैया मनोज तिवारी और गिरिराज सिंह जिनको दो पंक्ति हिंदी लिखनी नहीं आती को मंत्री बनाते हैं तो वे क्या बिहार मंत्रिमंडल का गठन करवाएंगे. मित्रों, कुल मिलाकर आज भी भारत में अँधेर नगरी नाटक जैसे हालात हैं बल्कि हालात अंग्रेजी राज से भी ज्यादा ख़राब है. अँधा कानून है, बहरी और बडबोली सरकार है. सबकुछ उल्टा है कुछ भी सीधा नहीं है. भारतेंदु जहाँ नाटककार थे मोदी जी बहुत बड़े नटकिया हैं. कभी फौजी कपडा पहन लिया तो कभी पुजारी बन गए. भारतेंदु से भी पहले मुग़लकाल में ऐसी ही हालत को देखकर कभी तुलसीदास जी ने कहा था कि खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि, बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी। जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस, कहैं एक एकन सों, ‘कहाँ जाई, का करी?’