गुरुवार, 30 जुलाई 2020

आज हमें अपने आप पर गर्व है


मित्रों, अगर आप मुझे नियमित रूप से पढ़ते हैं तो आपको याद होगा कि ऐसी ही कुछ पंक्तियाँ मैंने तब भी लिखी थीं जब २०१४ में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे. तब मैंने लिखा था कि छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी इसी तरह साल के अंत में हमने लिखा था कि भारतीय इतिहास का प्रस्थान विन्दु था 2014

मित्रों, तब मैंने वर्ष २०१४ के सत्ता परिवर्तन को १९४७ और १९७७ से भी बड़ी क्रान्तिकारी घटना बताया था. उससे भी पहले १५ अगस्त १९१३ को जब मोदी जी ने लालन कॉलेज, भुज से अपना ऐतिहासिक भाषण दिया था तभी मैंने भविष्यवाणी कर दी थी कि मोदी भारत के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं. और यह भी कहा था कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारत फिर से गुलाम हो जाएगा. उसी साल २ अक्तूबर को मैंने मोदी चालीसा लिखी थी और कहा था कि मोदी भारत के लिए वरदान हैं.

मित्रों, अगर हैं आज यह कहूं कि कल का दिन भी भारत के लिए ऐतिहासिक दिन था तो ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी. कल १८ साल बाद भारत में नए लड़ाकू विमान का आगमन हुआ. राफेल से पहले वर्ष २००२ में भारत ने वाजपेयी के समय रूस से सुखोई ख़रीदा था. बीच के समय में कांग्रेस पार्टी की सरकार सत्ता में थी और उसने भारतीय सेना को कमजोर करने की दिशा में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. अब जबसे मोदी सरकार सत्ता में आई तभी से उसने नई पीढी के लड़ाकू विमान के लिए प्रयास शुरू किया. और तभी से कांग्रेस पार्टी के नेता पगलाए हुए से हैं. शायद उनको इस बात का मलाल है कि रक्षा-खरीद में उनको कमीशन मिलना बंद हो गया है. साथ ही कांग्रेस पार्टी का चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ गुप्त समझौता भी है जिसके चलते कांग्रेस पार्टी नहीं चाहती कि भारत चीन पर हावी हो.

मित्रों, राफेल के आ जाने के बाद अब भारत अपनी ही जमीन से चीन और पाकिस्तान के अंदरूनी ठिकानों पर हवाई हमले बोल पाएगा. इतना ही नहीं वो एक साथ चीन और पाकिस्तान से निबट सकेगा. भारत की इस महँ उपलब्धि से जहाँ कांग्रेस पार्टी को खुश होना चाहिए वहीँ उसका चेहरा कद्दू की तरह लटका हुआ है.

मित्रों, भारत के इतिहास में कल एक और ऐसी घटना घटी है जो आनेवाले समय में भारत को विश्व-गुरु बनाने की दिशा में सहायक सिद्ध होनेवाली है. कल भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति की घोषणा की है. यह शिक्षा-नीति मैकाले की शिक्षा-नीति को उलटकर रख देगी जो अब तक सिर्फ किरानियों का उत्पादन कर रही है. अब भारत की शिक्षा-प्रणाली किरानियों के बदले उद्यमी पैदा करेगी. क्योंकि अब किताबी ज्ञान से ज्यादा हुनर और ज्ञान पर जोर होगा. बच्चे मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करेंगे. साथ ही संस्कृत-शिक्षण पर भी बल दिया जाएगा. कहा भी गया है कि भारत की संस्कृति संस्कृत से है. इतना ही नहीं बीच में पढाई छोड़नेवाले बच्चों को भी प्रमाणपत्र दिया जाएगा. अब बच्चे जब चाहे तब स्ट्रीम भी बदल पाएँगे. कुल मिलाकर सिर्फ परीक्षा लेनेवाली शिक्षा-प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन होने जा रहा है जिसकी आवश्यकता आजादी के बाद से ही महसूस की जा रही थी.

मित्रों, आज सचमुच हमें अपने आप पर गर्व हो रहा है कि हमने दो-दो बार एक ऐसी सरकार को वोट दिया जो पूरी तरह से राष्ट्र पर समर्पित है और जिसका मानना है कि राष्ट्र रक्षासमं पुण्यं, राष्ट्र रक्षासमं व्रतम्, राष्ट्र रक्षासमं यज्ञो, द्रष्टो नैव च नैव च. वेल डन मोदी जी हमें आज आप पर भी गर्व है.

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

भारतीय न्यायपालिका की प्रासंगिकता


मित्रों, बरसों पहले हिंदी फिल्म शिकार में एक गाना था-परदे में रहने दो पर्दा न उठाओ, पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा. दोस्तों, हमारी न्यायपालिका की गंदगी भी अब तक परदे के पीछे थी जिसे विकास दूबे कांड ने अकस्मात् सामने ला दिया है. दरअसल विकास दुबे एंकाउंटर की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को पहली बार न्यायपालिका में खराबी नज़र आई है. सुप्रीम कोर्ट ने यह मान लिया है कि सिस्टम में गंभीर खराबी है। कहते हैं कि कोई बिल्ली अपनी ही गर्दन में कभी घंटी नहीं बांध सकती और कोई कभी अपने गिरेबान में झांकने की कोशिश नहीं करता. ठीक यही बात हमारे देश की न्यायपालिका पर भी लागू होती है.

मित्रों, अभी दो-तीन दिन पहले ही १९८५ में हुए एक बहुचर्चित हत्याकांड का फैसला आया है. जी हाँ, मथुरा जिला एवं सत्र अदालत को भरतपुर के पूर्व महाराजा किशन सिंह के पुत्र मानसिंह और उनके दो साथियों की फर्जी मुठभेड़ जो 11 फरवरी 1985 को हुई थी, में फैंसला सुनाने में 35 साल लग गए। अब तक सभी पुलिस वाले नौकरी से रिटायर हो चुके हैं. उनमें से ४ तो जिंदगी से भी रिटायर हो चुके हैं. अब जाकर कोर्ट ने दोषी पुलिसवालों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है जब उनका जीवन स्वतः समाप्त होनेवाला है. इस बहुचर्चित हत्याकांड की सुनवाई के दौरान 1700 तारीखें पड़ीं और 25 जिला जज बदले गए। वर्ष 1990 में यह केस मथुरा जिला जज की अदालत में स्थानांतरित किया गया था। कुल 78 गवाह पेश हुए, जिनमें से 61 गवाह वादी पक्ष ने तो 17 गवाह बचाव पक्ष ने पेश किए। 8 बार फाइनल बहस हो चुकी थी। इस सुनवाई के दौरान करीब 35 साल में लगभग 1000 से ज्यादा दस्तावेज पेश किए गए। मथुरा जिला कोर्ट ने पूर्व डीएसपी कानसिंह भाटी समेत 11 पुलिसवालों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई। कोर्ट ने तीन आरोपियों को बरी कर दिया। हत्या के 3 आरोपियों नेकीराम, सीताराम और कुलदीप की पहले ही मौत हो चुकी है। सबूतों के अभाव में आरोपी महेंद्र सिंह पहले ही रिहा किया जा चुका है।
 

मित्रों, ये तो हुई एक महाराजा को न्याय मिलने में हुई देरी की बात अब एक गरीब का भी उदहारण देख लीजिए. 13 जुलाई 1984 को कानपुर के एक डाकिये के खिलाफ 57 रुपया 60 पैसा गबन करने का एफआईआर दर्ज किया गया और निलम्बित कर दिया गया. 29 साल बाद 3 दिसम्बर 2013 को उसे निर्दोष पाया गया. मगर अफ़सोस, इतने सालों में पैसे की तंगी और 350 पेशियों पर आये खर्च से उसका गरीब परिवार दाने-दाने को मोहताज हो गया. इसी तरह 23 मई 1987 के चर्चित हाशिमपुरा केस का फैंसला 28 साल बाद मार्च 2015 में आया तथा 2 जनवरी 1975 के ललित नारायण मिश्र हत्याकांड का फैसला 40 साल बाद दिसम्बर 2014 में दोषियों को आजीवन कारावास की सजा के रूप में आया. कितने जिंदा बचे थे अभियुक्तों में से? बेहमई हत्याकांड जनवरी 1981 में हुआ. आज तक केस ट्रायल स्टेज में पड़ा है क्योंकि केस की मूल केस डायरी खो गई है।
 

मित्रों, ये कुछ उदाहरण उस सुप्रीम कोर्ट के लिए हैं जो सरकार से पूछ रही है कि विकास दुबे को उसके ऊपर कई दर्जन संगीन मामले होते हुए जमानत कैसे मिली. क्या सिर्फ पूछ लेने भर से सुप्रीम कोर्ट का कर्तव्य पूरा हो गया? क्या स्थितियां बदल गईं. पूछने की इतनी ही जल्दी थी तो जिन-जिन न्याय-मूर्तियों (?) ने विकास दूबे को जमानत दी थी उनको भी अगली तारीख पर तलब कर लिया होता। अदालत के अदर्ली, पेशकार से लेकर जज सब रोज़ बिकते हैं क्या सुप्रीम कोर्ट को नजर नहीं आता? एसी चैम्बरों में बैठकर पत्थरबाजों पर पैलेट गन न चलाने की हिदायत देना बहुत आसान है लेकिन वही न्याय-मूर्ति गर्दन झुका कर ये नहीं देख सकते कि उनकी अदालतों में क्या चल रहा है? जो जबान हिला कर ये नहीं पूछ सकते कि महाराष्ट्र के जज चश्मे नाक पर पहनते हैं या कहीं और जिससे कि उन्हें पालघर में निर्दोष, निरीह, वयोवृद्ध संतों की पुलिस-पब्लिक द्वारा संयुक्त रूप से की गई नृशंस हत्या नजर नहीं आती? कैसी हालत हो गई है कि एक जज से कुछ फुट की दूरी पर उसका पेशकार रिश्वत लेता है और जज को नहीं दिखता. फिर भी जनता को उम्मीद रहती है कि जज उसे न्याय देगा.

मित्रों, हम पूछते हैं कि सुप्रीम कोर्ट को कब समझ में आएगा कि सिर्फ पुलिसिया सिस्टम नहीं बल्कि पूरा सिस्टम गड़बड़ है. जरुरत इस बात की है कि सर्वोच्च अदालत उसे देखे और सोचे कि हाशिमपुरा, हैदराबाद और कानपुर जैसे मुठभेड़ करने और पैलेट गन चलाने की जरुरत क्यों पड़ती है और क्यों आम आदमी को इन मुठभेड़ों से राहत महसूस होती है? और अगर मेरी बातों से माननीय न्याय-मूर्तियों के अहं को ठेस लगी है तो डाल दें मुझे भी जेल में. मैं समझता हूँ कि ऐसी अंधेर नगरी में जहाँ इन्साफ अमावस्या का चाँद बन गया हो, रहने से अच्छा है जेल में रहना. लेकिन एक बार मेरे इस सवाल पर गौर जरुर करिएगा माई-बाप कि आज के समय में जब एक क्लिक से बड़ा-से-बड़ा काम हो जाता है, क्या भारत में न्यायपालिका की कोई प्रासंगिकता या उपयोगिता रह गयी है?

सोमवार, 20 जुलाई 2020

पेटा ने सिर्फ हिन्दुओं को क्यों लपेटा


मित्रों, क्या आपने कभी रक्षाबंधन पर पशुबलि दी है? क्या आपने उस दिन मांस खाया है? अच्छा आप यह बताईए कि उस दिन आपने कभी चमड़े से बनी राखी बाँधी है? आप कहेंगे कि मैं पागल हो गया हूँ नहीं तो ऐसे अनर्गल सवाल नहीं पूछता क्योंकि रक्षाबंधन पूरी तरह से शाकाहारी त्योहार है. उस दिन न तो हम हिन्दू पशुबलि देते हैं, न ही मांस खाते हैं और न ही चमड़े से बनी राखी ही बांधते हैं. तो फिर ये पेटा वालों को क्या हो गया है जो वे रक्षाबंधन पर हम हिन्दुओं से पशुओं की रक्षा करने की अपील कर रहे हैं. जी हाँ आपने सही समझा पेटा यानि People for the Ethical Treatment of Animals जिसका मुख्यालय अमेरिका के वर्जिनिया में है ने इस बार हिन्दुओं के पावन पर्व राखी पर जो पूरी तरह से शाकाहारी त्योहार है भारत के सात महानगरों में होर्डिंग लगाकर हिन्दुओं से पशुओं की रक्षा करने की अपील की है.
मित्रों, आप कहेंगे कि राखी से चार दिन पहले बकरीद है जिस दिन दुनियाभर के अरबों मुसलमान एकसाथ अरबों पशुओं की बलि देते हैं जिसमें गाएँ, ऊंट, भेंड और बकरे शामिल होते हैं तो पेटा ने जरुर बकरीद पर निर्दोष पशुओं की बलि नहीं देने की अपील मुसलमानों से की होगी. यही तो कमाल है इस महान विश्वव्यापी संगठन पेटा का कि इसे कदाचित बकरीद के बारे में कुछ भी पता नहीं है. शायद पेटा वाले भी आमिर खान की तरह इस गोले के निवासी नहीं हैं बल्कि दूसरे गोले से आए हैं.
मित्रों, इन सारे ढोंगी, पाखंडी, हिंदुविरोधी और छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी संगठनों की शुरुआत से ही यही हालत है.जब भी जहाँ भी मुसलमानों की बात आती है इनकी जीभ इनके हलक में घुस जाती है. कई बार तो ऐसे संगठन हिन्दुओं के  पीड़ित होने पर भी उन्हें दोषी बता देते हैं जैसे कि इन दिनों दिल्ली की केजरीवाल सरकार के अंतर्गत काम करनेवाले अल्पसंख्यक आयोग की जाँच समिति बता रही है. समिति का मानना है कि दिल्ली का इस साल फरवरी का दंगा एकतरफा तौर पर हिन्दुओं ने किया. अंकित शर्मा ने खुद अपने ही हाथों अपने शरीर पर कई सारे चाकुओं से ४०० बार प्रहार किया, रतनलाल ने खुद अपने ऊपर पत्थरों की बरसात कर ली और दिलबर सिंह नेगी ने खुद अपने दोनों पैर काट डाले और उसके बाद खुद ही जलती हुई आग में कूद गया. साथ ही शाहरुख़ खान ने पुलिसवाले पर रिवाल्वर नहीं तानी बल्कि पुलिसवाले ने उस पर रिवाल्वर तान रखी थी. वो बेचारा तो नमाज पढ़ रहा था। इतना ही नहीं ताहिर हुसैन हिन्दुओं और हिन्दुओं के घरों पर पेट्रोल बम फेककर उनकी रक्षा कर रहा था. हिन्दुओं ने अपने स्कूल, गाड़ियाँ और दुकानें खुद ही जलाई डालीं मुसलमान तो उस आग को पेट्रोल से बुझा रहे थे.
मित्रों, हिन्दुओं के साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. पालघर में हिन्दू संतों को मार दिया जाता है और फिर कह दिया जाता है कि वे चोर थे. इसी तरह गोधरा में मुसलमान ट्रेन में आग लगा कर ५५ हिन्दुओं को जिन्दा जला देते हैं लेकिन बनर्जी आयोग कहता है कि आग बोगी के भीतर से लगी थी बाहर से लगी ही नहीं. और अब पेटा वाले मुसलमानों को यह समझाने के बदले कि बकरीद पर पशु-हत्या नहीं करो हिन्दुओं को राखी पर गायों को नहीं मारने की सलाह दे रहे हैं जबकि वे जानते हैं कि हिन्दुओ के लिए गाएँ माता के समान है. साथ ही रक्षा बंधन पूरी तरह से शाकाहारी त्योहार भी है। उधर, ५ अगस्त को प्रधानमंत्री के अयोध्या जाने से शरद पवार सहित सारे मुस्लिम नेता परेशान हैं और वे निकट भविष्य में ५ अगस्त को कैलेंडर से हटाने की मांग करनेवाले हैं।

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

गुना का सच


मित्रों, जब भी अपने देश में कोई महत्वपूर्ण चुनाव होनेवाले होते हैं विपक्षी दल जैसे पगला जाते हैं. आपको याद होगा कि जब २०१५ में बिहार विधानसभा के चुनाव होनेवाले थे तब विपक्ष दलों का रवैया क्या था? सारे वामपंथी और छद्मधर्मनिरपेक्षतावादी एक जुट हो गए थे और देश में असहिष्णुता का कथित वातावरण कायम हो जाने के नाम पर अवार्ड वापसी का जबरदस्त आन्दोलन चलाया गया था. रवीश कुमार जनता से उनकी जाति पूछते चल रहे थे और दावा कर रहे थे कि बिहार में बहार है तो वही अभिसार शर्मा जहानाबाद की स्थिति को कश्मीर से भी ज्यादा भयावह बता रहे थे.

मित्रों, जैसे ही चुनाव समाप्त हुआ अवार्ड वापसी आन्दोलन भी रूक गया. सारे छद्मधर्मनिरपेक्षतावादियों ने नीतीश कुमार की जीत पर अपनी-अपनी पीठ थपथपाई लेकिन जैसे ही २०१७ में नीतीश फिर से भाजपा के साथ आ गए बिहार में उनको बहार की जगह कुशासन और बर्बादी दिखने लगी. तात्पर्य यह कि ये लोग ऐसे लोग हैं जो किसी भी तरह मोदी को नीचा दिखाना चाहते हैं. इन लोगों की कोई कार्ययोजना नहीं है बस यही एकसूत्री एजेंडा है.

मित्रों, मैं यह नहीं कहता कि मध्य प्रदेश के गुना में पिछले दिनों एक गरीब अनुसूचित जाति से आनेवाले हिन्दू किसान परिवार के साथ जो हुआ वह उचित था. लेकिन ऐसे हुआ क्यों अगर हम इसकी जड़ में जाएँ तो पता चलता है कि इसके पीछे एक स्थानीय कांग्रेस नेता गब्बू पारदी का हाथ है जिसके धंधा सरकारी जमीनों पर कब्ज़ा करके उस पर एससी जाति के लोगों से बंटाई करवाना है. उसने पिछले कई दशकों से ५० एकड़ से ज्यादा बेशकीमती सरकारी जमीनों पर कब्ज़ा कर रखा है. आश्चर्य की बात है कि जिस पुलिस का डंडा राजकुमार अहिरवार पर जमकर चलता है उसी पुलिस का डंडा गब्बू पर क्यों नहीं चलता जबकि उसके ऊपर ४७ मुकदमें दर्ज हैं. क्या पुलिस का डंडा सिर्फ गरीब और लाचार लोगों के लिए है.

मित्रों, राजकुमार की बहन ने बताया कि एक साल तक भूमि खाली पड़ी रही, किसी ने काम शुरू नहीं किया। हमें गप्पू पारदी ने जमीन बटाई पर दी थी। उधर सरकारी कागजात बता रहे हैं कि इस भूमि से राजस्व विभाग ने वर्ष 2019 में ही कब्जा हटा दिया था। गप्पू पारदी को बेदखल कर दिया गया था। फिर उसने यह भूमि बंटाई पर कैसे दे दी? राजस्व विभाग का दावा है कि एक साल पहले ही उच्च शिक्षा विभाग को जमीन दी जा चुकी है तो अब तक काम क्यों शुरू नहीं किया गया। वहीं ठेकेदार राधेश्याम अग्रवाल का कहना है कि हमें अब तक काम करने के लिए जमीन ही नहीं मिली तो कैसे निर्माण होता? इसलिए फिर से जमीन खाली कराने के लिए पत्र लिखा था। सवाल यह भी उठता है कि पुलिस या प्रशासन या शिक्षा-विभाग ने तब जमीन पर कब्ज़ा क्यों नहीं करवाया जब मार्च-अप्रैल में खेत खाली था?

मित्रों, हम इससे पहले भी विकास दूबे मामले में पुलिस और अपराधियों का गठजोड़ देख चुके हैं. समस्या यह है कि गलत काम पुलिस करती है और उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है सरकार को. निचले स्तर पर हो क्या रहा है इससे राज्य सरकारें पूरी तरह अनभिज्ञ होती है और जब घटना के घटित हो जाने के बाद उसे पता चलता है तब काफी देर हो चुकी होती है. फिर तबादले, निलंबन वगैरह करके मामले की खानापूर्ति कर दी जाती है जबकि वास्तविकता यह है कि न तो तबादला और न ही निलंबन भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों का सही ईलाज है बल्कि उनको बर्खास्त कर देना ही सही ईलाज है. जब तक सरकारें ऐसा नहीं करतीं कुछ भी नहीं बदलनेवाला. ऐसे ही गब्बू पारदी पैदा होते रहेंगे और ऐसे ही राजकुमार अहिरवार पिटते रहेंगे. और तब तक कांग्रेस जैसे भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुके दल जो गब्बू पारदी जैसे लोगों को खुलकर संरक्षण देती है ऐसी घटनाओं से चुनावों में लाभ उठाते रहेंगे.

मित्रों, मैं नहीं समझता कि इस दुखद घटना के लिए किसी भी तरह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दोषी है. उनके संज्ञान में जैसे ही मामला आया उन्होंने तत्काल जरूरी कदम उठाए. वैसे भी वे अपनी संवेदनशीलता के लिए जाने जाते हैं. हाँ, इतना जरुर है कि पुलिस सुधार को अब और टाला नहीं जा सकता क्योंकि वर्तमान भारत की पुलिस अंग्रेजों की पुलिस से भी ज्यादा दमनकारी हो गई है. रक्षक से भक्षक तो वो कई दशक पहले ही हो चुकी थी. साथ ही राज्यों की ख़ुफ़िया एजेंसियों को फिर से मजबूत बनाना होगा जिससे राज्य के मुखिया को राजधानी में बैठे-बैठे सबकुछ मालूम होता रहे.साथ ही तत्काल राजकुमार के परिवार को फसल की क्षति के लिए क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिएऔरउसके परिवार पर से मुकदमा वापस लिया जाना चाहिए. हाँ,गब्बू पारदी को जरूर जेल भेजना चाहिए.

मित्रों, इस बीच खबर आ रही है कि उसी मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले के ग्राम गढ़ी में रेत माफिया ने असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर (एएसआइ) को धमकाते हुए चांटा मारा और धक्का देकर जमीन पर पटक दिया। घटना का वीडियो वायरल होने के बाद मामला उजागर हुआ। वीडियो में दिख रहा है कि घटना के वक्त एक कांस्टेबल रेत माफिया के आगे गिड़गिड़ा दिखा रहा है। पिट रहे एएसआइ ने भी किसी तरह का प्रतिकार नहीं किया, बल्कि हाथ बांधकर और सिर झुकाकर रेत माफिया की धमकी व अपशब्द सुनते रहे। इसके बाद रेत माफिया ट्रैक्टर-ट्रॉलियों को ले गए। कितनी बड़ी विडंबना है कि पुलिस जिनके ऊपर कार्रवाई के लिए बनी है उनके आगे तो बेबस रहतीं हैं और गरीबों पर अत्याचार करती है।

बुधवार, 15 जुलाई 2020

हिन्दू भी धारण करें कृपाण

 
मित्रों, महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं की पीट-पीटकर हत्या के मामले ने पूरे देश में हलचल मचा दी थी। अब ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के मेरठ में आया है। यहां शिव मंदिर के साधु की पीट-पीटकर बेरहमी से हत्या कर दी गई है। हत्या का आरोप फिर से मुसलमानों पर लगा है। इधर साधु की हत्या के मामले ने तूल पकड़ा और उधर शव को सड़क पर रखकर प्रदर्शन शुरू हो गया। पुलिस ने कहा है कि आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है। घटना मेरठ के भावनपुर की है। अब्दुलापुर बाजार में एक शिव मंदिर हैं। बताया जा रहा है कि मंदिर में ही गांव के कांति प्रसाद की दुकान थी और वह मंदिर कमिटी के उपाध्यक्ष भी थे। वह मंदिर की साफ-सफाई के साथ पुजारी का काम भी देखते थे। बताया जा रहा है कि कांति गले में भगवा रंग का गमछा डालते थे और पीले रंग के कपड़े पहनते थे।
मित्रों, सोमवार को कांति गंगानगर में बिजली का बिल जमा करने गए थे। आरोप है कि लौटते समय ग्लोबल सिटी के पास गांव के ही अनस कुरैशी उर्फ जानलेवा ने कांति के भगवा गमछे को लेकर कथित धार्मिक टिप्पणी की और मजाक बनाया। अनस के मजाक करने का कांति ने विरोध किया, जिसके बाद दोनों के बीच बहस हो गई। आरोप है कि अनस ने कांति की सड़क पर ही जमकर पिटाई की और भाग गया। वहां से कांति किसी तरह गांव पहुंचे और अनस के घर जाकर उसकी हरकत की शिकायत की। कांति अनस के घर पर थे तभी पीछे से वह आ गया। आरोप है कि अनस ने एक बार फिर से अपने घरवालों के साथ मिलकर कांति की फिर से जमकर पिटाई की और वहां से बाइक लेकर भाग गया। कांति के परिजनों को जब उनकी पिटाई की सूचना मिली तो वे लोग उन्हें लेकर थाने पहुंचे। यहां उनकी हालत बिगड़ गई। घरवाले कांति को लेकर अस्पताल पहुंचे जहां मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान कांति की मौत हो गई। कांति प्रसाद की तहरीर पर पुलिस ने अनस के खिलाफ धार्मिक टिप्पणी करने, मारपीट और जान से मारने की धमकी देने के मामले में एफआईआर दर्ज कर ली। मंगलवार को इलाज के दौरान कांति की मौत हो गई। साधु की मौत की सूचना पर कई हिंदू संगठन थाने पर पहुंचे और हंगामा करने लगे। मामला बढ़ने पर पुलिस ने अनस को गिरफ्तार कर लिया। एसओ संजय कुमार ने कहा कि अनस को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया है, अन्य आरोपियों की तलाश की जा रही है। तनाव को देखते हुए गांव में फोर्स तैनात कर दी गई है।
मित्रों, मैं पूछता हूँ कि आखिर कब तक यह सिलसिला चलता रहेगा? आखिर कब तक हम हिन्दू एकतरफ़ा तौर पर पिटते, कटते और मरते रहेंगे? पहले खबर आई कि हिन्दू मेवात से भाग रहे हैं या भाग चुके हैं फिर अलवर से खबर आने लगी. फिर बंगाल से खबर आई कि भाजपा विधायक को मार कर टांग दिया गया है. केरल की दशा भी किसी से छिपी हुई नहीं है. दिल्ली में डॉ. नारंग की घर में घुसकर हत्या कर दी जाती है. कहीं हिन्दू लड़की को एकतरफा प्यार में मार दिया जाता है तो कहीं उनके साथ एकल या सामूहिक बलात्कार होता है. कभी-कभी बलात्कार के बाद उनको मार भी दिया जाता है. लव जिहाद की शिकार लड़कियों की तो बात ही छोडिए. बलात्कार के अधिकतर मामलों में बलात्कारी मुसलमान और पीड़ित लड़कियां हिन्दू होती हैं. ऐसा लगता है जैसे हिंदुस्तान के हिन्दू पाकिस्तान के हिन्दुओं की तरह ही इंसान न होकर भेड़-बकरियां हैं. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? मैं समझता हूँ कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हिन्दू हर घडी निहत्था रहता है और मुसलमान हमेशा हथियारों से लैस होते हैं. ऐसा देखा गया है कि अधिकतर हिन्दुओं को मुसलमान चाकुओं से गोदकर मारते हैं. ऐसे में अगर हिन्दू भी सिखों की तरह कृपाण धारण करने लगें तो उनके ऊपर होनेवाले ज्यादातर हमले अपने आप रूक जाएँगे. इस दिशा में हिन्दू धर्म के धार्मिक नेताओं को आगे आना चाहिए, पहल करनी चाहिए और हिन्दू धर्म में इस नई परंपरा की शुरुआत करनी चाहिए. लद्दाख की पहाड़ियों से भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी घोषणा कर चुके हैं कि वीर भोग्या वसुंधरा इसलिए मुझे नहीं लगता कि केंद्र सरकार इस नई परंपरा में किसी तरह की बाधा डालेगी.
मित्रों, भारत में हिन्दू बनकर जीना है तो और कोई उपाय नहीं है. हमें अपने धर्म को एक लड़ाकू कौम में बदलना होगा अन्यथा हम कहाँ-कहाँ से भागेंगे और क्यों भागेंगे? हिंदुस्तान पर पहला अधिकार हिन्दुओं का है न कि अरब देश से आए धर्म का. हिन्दू इस पुण्यभूमि में सनातन काल से रहते आ रहे हैं. हम मुसलमानों को १९४७ में अलग देश भी दे चुके हैं जहाँ हिन्दू एक मंदिर तक नहीं बना सकता. फिर हिन्दुओं को अगर हिंदुस्तान से भागना पड़ा तो जाएँगे कहाँ? हिन्दुओं का कोई दूसरा देश तो है नहीं. इसलिए जैसे भारतीय सेना सीमाओं पर एक-एक ईंच जमीन के लिए लडती है हिन्दुओं को भी अपनी एक-एक ईंच जमीन की रक्षा करनी पड़ेगी और पलायन करना और डरकर जीना बंद करना पड़ेगा.

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

कब होगा अपराध के विकास का अंत?


मित्रों, यह बड़े ही हर्ष का विषय है कि यूपी पुलिस के ८ जवानों की हत्या करनेवाले विकास दूबे पुलिस मुठभेड़ में मारा गया है. कल जबसे विकास दूबे ने उज्जैन के महाकाल मंदिर में आत्मसमर्पण किया था तभी से ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही थी उसको मुठभेड़ में मार दिया जाएगा और हुआ भी वही. यहाँ हम बता दें कि १९९० से ही विकास दूबे की कानपुर ईलाके में तूती बोलती थी. कानपुर में विकास दूबे ही अदालत भी था, पुलिस भी था और सरकार भी था.

मित्रों, दरअसल जो राजनेता किसी अपराधी को संरक्षण देकर बढ़ावा देते हैं जब वो उनके लिए ही खतरनाक बनने लगता है तो राजनेता खुद को बचाने के लिए उसको मरवा देते हैं. कदाचित विकास दूबे के साथ भी यही हुआ. १९९० में जब वो छुटभैया हुआ करता था तभी से लगभग सारे दलों ने उसको हाथोहाथ लिया. उसकी हनक फिर इतनी बढ़ गई कि जब १९९१ में यूपी पुलिस के तेज़ तर्रार इंस्पेक्टर त्रिपुरारी पांडे ने उसे गिरफ्तार किया तब स्वयं तत्कालीन विधान सभा अध्यक्ष हरि किशन श्रीवास्तव ने एसएसपी को फोन करके उसे छुडवा लिया था. फिर तो विकास दूबे का मनोबल इस कदर बढ़ा कि साल 2001 में उसने एक पुलिस थाने में घुसकर हरिकिशन श्रीवास्तव के खिलाफ १९९६ में चौबेपुर से भाजपा उम्मीदवार रह चुके भाजपा जिलाध्यक्ष और दर्जा प्राप्त मंत्री संतोष शुक्ला की गोली मारकर हत्या कर दी लेकिन कोर्ट में सुनवाई के दौरान घटना के गवाह 25 पुलिसकर्मी बयानों से पलट गए। इससे उसे सजा नहीं हो सकी थी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उस समय वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. बाद में सरकार भी बदली व मायावती और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने लेकिन विकास दूबे के खिलाफ किसी भी सरकार ने कोर्ट में अपील नहीं की.

मित्रों, विदित हो कि विकास दुबे और उसके साथियों ने संतोष शुक्ला को बीच रास्ते में रोक लिया था और उसके काफिले पर हमला कर दिया था। उस दौरान संतोष शुक्ला ने दुबे और उसके साथियों से मुकाबला करने का प्रयास किया, लेकिन दूबे ने उस पर रॉड से हमला कर दिया। हमले में घायल होने के बाद शुक्ला कानपुर देहात के शिवली पुलिस थाने में घुस गए, लेकिन किसी भी पुलिसकर्मी ने उन्हें नहीं बचाया। इस दौरान विकास दूबे ने यह दिखाते हुए कि उसे पुलिस का कोई डर नहीं है, वह भी थाने में घुस गया और पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। इसके बाद भी पुलिस उसे नहीं पकड़ पाई और उसने चार महीने बाद आत्मसमर्पण कर दिया और बाद में बरी भी हो गया जैसा कि हम ऊपर बता चुके हैं. दूबे के "आत्मसमर्पण" को याद करते हुए स्वर्गीय संतोष शुक्ला के भाई मनोज ने बताया कि दूबे ने राजनेताओं के साथ कोर्ट में प्रवेश किया था। इससे वह भौचक्के रह गए, लेकिन उन्हें सबसे बड़ा झटका उस समय लगा, जब मामले के जांच अधिकारी सहित 25 पुलिसकर्मियों ने कोर्ट में अपने बयान बदल दिए। इसके बाद उन्होंने तत्कालीन कानपुर देहात के जिला मजिस्ट्रेट और विशेष अभियोजन अधिकारी (SPO) से भी मुलाकात की, लेकिन किसी ने मदद नहीं की।
मित्रों, मैं अपने पिछले आलेख में भी कह चुका हूँ कि विकास दूबे कांड ने तंत्र के अपराधीकरण को पूरी तरह से उजागर करके रख दिया है. सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे भारत की पुलिस भ्रष्ट है और रक्षक के स्थान पर भक्षक बन गई है. खाकी और खादी ने मिलकर ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि जनता का तंत्र से विश्वास ही उठता जा रहा है. बार-बार भीड़ द्वारा अपराधियों की हत्या के पीछे भी यह अविश्वास ही है. ऐसे में सवाल उठता है कि विकास दूबे के फलने-फूलने के पीछे किन लोगों का हाथ है? उत्तर प्रदेश सहित देश के लगभग सभी राज्यों के सभी जिलों में ऐसे बाहुबली हैं जो या तो खुद ही राजनीति में हैं या फिर अपराधियों को संरक्षण देते हैं. विकास दूबे के मामले में हमने देखा कि पुलिस में भी ऐसे बिके हुए लोग हैं जो नौकरी तो सरकार की करते हैं लेकिन काम अपराधियों के लिए करते हैं. यही कारण है कि शरीफ लोग आज थानों में जाने तक से डरते हैं. इसके साथ ही हमारी न्यायपालिका और अधिवक्ता भी विकास दूबे के विकास के लिए जिम्मेदार हैं. इन सबके अलावे अगर कोई और दोषी है तो वो है हमारा समाज जो विकास दूबे जैसे घिनौने लोगों को अपना आदर्श मानता है जाति और धर्म के नाम पर. क्या कारण है कि शहीद देवेन्द्र मिश्र की विकास दूबे द्वारा हत्या पर आज कोई भी ब्राह्मण आवाज नहीं उठा रहा जबकि विकास दूबे गिरोह पर कार्रवाई को ब्राह्मण ब्राह्मण विरोधी कृत्य बता रहे हैं? क्या कारण है कि शहीद देवेन्द्र मिश्र हमारे लिए आदर्श न होकर दुर्दांत विकास दूबे हमारा आदर्श बन गया है?
मित्रों, इसके साथ ही उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार पर भी अब बड़ी जिम्मेदारी आन पड़ी है. सरकार को चाहिए कि बिना जाति, धर्म और वोट बैंक की परवा किए पूरे उत्तर प्रदेश में जितने भी विकास दूबे हैं उन सबका चुन-चुनकर खात्मा करे. साथ ही नौकरशाही और राजनीति में छिपे उन सभी लोगों को भी उनके उचित स्थानों तक पहुँचाया जाए जो ऐसे अपराधियों को संरक्षण देते हैं. अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो ऐसे ही उत्तर प्रदेश में अपराध का विकास होता रहेगा, ऐसे ही अपराधी आते रहेंगे जिनके हाथ न केवल ईमानदार पुलिसवालों की गिरेबानों तक पहुंचेंगे बल्कि जो बेधड़क थाने में घुसकर हत्याएं करेंगे.

गुरुवार, 9 जुलाई 2020

कोरोना के प्रति लापरवाही खतरनाक



मित्रों, आजादी के बाद से ही हम भारतियों में एक अजीबोगरीब प्रवृत्ति ने जन्म लिया है. हम हर काम के लिए सरकार की तरफ देखते हैं. मानो हमारा कोई कर्त्तव्य ही नहीं है. नाली गन्दी है तो सरकार साथ कराए, बांध टूट रहा है तो सरकार मरम्मत करवाए, सड़क में छोटा सा गड्ढा है तो सरकार भरवाए. यहाँ तक कि हम घर में एक डंडा तक नहीं रखते और जब हमारे साथ कोई अपराधिक घटना घट जाती है तो सरकार को कोसते हैं.

मित्रों, हमारी केंद्र सरकार ने कोरोना को लेकर तभी से कदम उठाने शुरू कर दिए  थे जब यह हमारे देश में आया भी नहीं था. फिर भी अहतियातन कदम उठाते हुए सरकार ने लॉक डाउन की घोषणा की जो चार चरणों में २४ मार्च से पूरे मई तक चला. इस दौरान उत्पादन और विक्रय पूरी तरह से बंद होने के कारण अर्थव्यवस्था की हालत ख़राब होने लगी. साथ ही मजदूरों को घर पहुँचाने की समस्या भी खडी हो गयी. बहुत-से मजदूरों को तो हजारों किलो मीटर पैदल भी चलना पड़ा. अंततः सरकार को मजबूरन १ जून से अनलॉक को प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी और धीरे-धीरे शिक्षण संस्थानों, मॉल और सिनेमा घरों को छोड़कर सबकुछ खोल दिया गया लेकिन सरकार की इस अपील के साथ कि लॉक डाउन ख़त्म हुआ है कोरोना ख़त्म नहीं हुआ इसलिए पहले की तरह ही सावधानियां बरती जाए जिसमें बेवजह घर से नहीं निकलना, दो गज की दूरी बनाए रखना, मास्क का प्रयोग करना और बार-बार साबुन से हाथ धोना शामिल है. लेकिन ऐसा देखा गया कि अन लॉक की प्रक्रिया शुरू होते ही लोग कोरोना को लेकर लापरवाह हो गए. यहाँ तक कि पुलिसकर्मी भी दो गज की दूरी को लेकर लापरवाही बरतने लगे जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि जिन ईलाकों में अभी तक इस वैश्विक बीमारी का प्रकोप कम था वहां भी यह बम की तरह फूटने लगा.

मित्रों, बिहार में तो स्थिति इतनी ख़राब हो गई कि आज से बिहार के पांच जिलों में आज से फिर से लॉक डाउन लगाना पड़ रहा है. देश के बांकी राज्यों में भी कमोबेश यही हालात है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कब हम अपनी जिम्मेदारियों को समझेंगे? क्या सरकार आकर हमें बसों और ऑटो में बिठाएगी? क्या प्रधानमंत्री अपने हाथों से हमें आकर मास्क पहनाएंगे? क्या सरकार आकर हमारे हाथ साबुन से धुलवाएगी? क्या हम खुद से इतना भी नहीं कर सकते? क्या हम गोद के बच्चे हैं? अगर हाँ, तो हम कब बड़े होंगे?

बुधवार, 8 जुलाई 2020

विकास दूबे कांड तंत्र में फैले भ्रष्टाचार का परिचायक


मित्रों, जबसे उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार आई है तभी से उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपराध और अपराधियों के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई हुई है। पहले रोमियो स्क्वायड और फिर मुठभेड़ों की झड़ी. कहा जाता है कि स्थिति ऐसी हो गई है कि अपराधी कोर्ट में जमानत रद्द करने की अर्जी देने लगे। मीडिया ऐसा प्रदर्शित करने लगी मानो उत्तर प्रदेश में रातों रात राम राज्य आ गया.

मित्रों, जय-जयकार करने में जुटी मीडिया कदाचित यह भूल गयी थी कि जिस तरह देश के बांकी राज्यों की पुलिस भारत की सबसे भ्रष्ट संगठन है उसी तरह उत्तर प्रदेश की पुलिस भी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। सारी सख्तियाँ और कार्रवाई तो ऊपरी दिखावा मात्र है भीतर तो उसी तरह भ्रष्टाचार की गंगा बह रही है जैसे पहले बह रही थी. माना कि गंगोत्री साफ है लेकिन आगे जो गंदे नाले गंगा में मिल रहे हैं उनका क्या.

मित्रों, अचानक घटी कानपुर की एकतरफा मुठभेड़ की घटना ने मखमली कालीन के नीचे छिपी उसी गंदगी को उजागर करके रख दिया है। यह कितना दुखद है कि शहीद डीएसपी देवेंद्र मिश्र लगातार दारोगा विनय तिवारी  के खिलाफ विकास दूबे का सहायक होने के आरोप लगाते हुए एस एस पी को पत्र लिखते रहे लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। यहाँ तक कि पत्र को गायब भी कर दिया गया. विकास दूबे की गिरफ्तारी के लिए जाते समय भी डीएसपी ने एसएसपी से अतिरिक्त पुलिस बल की मांग की जो उन्हें उपलब्ध नहीं करवाई गई। पुलिस जब तक विकास दूबे के घर पहुंचती उससे कई घंटे पहले दारोगा और कई अन्य उसके दरबारी पुलिसकर्मियों ने फोन कर दूबे को सचेत कर दिया था। जाहिर है कानपुर पुलिस में कई ऐसे अधिकारी और सिपाही हैं जो वेतन तो सरकार से पाते हैं लेकिन ड्यूटी विकास दूबे की करते हैं।

मित्रों, अब जबकि यूपी पुलिस के आठ जवान शहीद हो चुके हैं शासन-प्रशासन लाठी पीट रहा है। लेकिन उससे होगा क्या? क्या यूपी पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा? क्या सारे भ्रष्ट अधिकारी अचानक सुधर जाएँगे? नहीं, कदापि नहीं. इसके लिए पूरे तंत्र की पूरी ओवरहौलिंग करनी पड़ेगी. इस देश में जबकि हर पद पर भ्रष्टाचारी बैठे हैं ऐसे में क्या योगी इस दिशा में सफल हो पाएँगे? इन तमाम सवालों के बावजूद आशा की जानी चाहिए कि उत्तर प्रदेश सरकार इस बार पुलिस-अपराधी गठजोड़ और पुलिसिया भ्रष्टाचार को तोड़ने और समाप्त करने की दिशा में निर्णायक कदम उठायेगी। साथ ही उन राजनीतिज्ञों के खिलाफ भी दंडात्मक कार्रवाई करेगी जो अपराधियों को संरक्षण देते हैं भले ही वह नेता भाजपा का हो और कितना भी शक्तिशाली हो। अन्यथा आगे भी इसी तरह ईमानदार अधिकारी और सिपाही शहीद होते रहेंगे और भ्रष्ट अधिकारियों की मौज रहेगी।

मंगलवार, 7 जुलाई 2020

चीन से सावधानी आगे भी जरूरी


मित्रों, इस समय भारत-चीन सीमा से जो  समाचार प्राप्त हो रहे हैं उससे पूरे भारत में खुशी की लहर दौड़ रही है। भारत के दृढ़ रूख के चलते चीन को यह समझ में आ गया है कि युद्ध से उसे कहीं ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा। भारत-चीन तनाव के समय न सिर्फ भारत सरकार ने चीन को स्पष्ट संकेत दिया बल्कि भारत की सामान्य जनता ने भी चट्टानी एकता का प्रदर्शन किया। हालांकि चीन ने अपनी स्थिति से पीछे हटना शुरू कर दिया है लेकिन भारत को आगे भी सचेत रहना चाहिए क्योंकि धोखा चीन के चरित्र में है। १९६२ की गर्मियों में भी चीन भारतीय सीमा से पीछे हटा था। तब भी सरकार के पक्ष में मीडिया कसीदे गढ़ रही थी लेकिन जैसे ही ठंड शुरू हुई चीन ने हमला कर दिया और भारत सरकार सन्न रह गई।
मित्रों, हम जानते हैं कि तब भारत के पास सीमापार की स्थिति बताने वाले उपकरण नहीं थे लेकिन आज भारत के पास खुद के ऐसे उपग्रह हैं। साथ ही उसकी सहायता के लिए अमेरिका, इजरायल, जापान, फ्रांस आदि देश भी हैं। जहां सवाल राष्ट्रीय सुरक्षा का हो वहां किसी भी तरह की कोताही खतरनाक हो सकती है। फिर चीन का तो उसके सारे पड़ोसियों के साथ सीमा-विवाद है। १९७९ में वियतनाम जैसे छोटे देश के हाथों करारी हार झेलने वाला चीन खुद को एशिया का चौधरी समझने लगा है और वह यह अच्छी तरह जानता है कि उसके मार्ग का सबसे बड़ा कांटा भारत है इसलिए भी भारत को ज्यादा सचेत रहने की जरूरत है न सिर्फ सीमा पर बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी। भारत को जल्द से जल्द चीन पर अपनी निर्भरता समाप्त करनी होगी क्योंकि भारत और चीन के बीच व्यापार में व्यापार संतुलन एकतरफा तरीके से चीन के पक्ष में है। अगर एक रूपए का व्यापार दोनों देशों के बीच होता है तो चीन हमारे हाथों बारह आने का सामान बेचता है और हम उसको मात्र चार आने का सामान बेच पाते हैं।
मित्रों, इतके साथ ही भारत ने इस समय जो रक्षा समझौते रूस,फ़्रांस और अमेरिका से किए हैंउनको निर्धारित समय पर पूरा करने की दिशा में कोई भी शिथिलता नहीं बरती जानी चाहिए. कोशिश यही होनी चाहिए कि शीघ्रातिशीघ्र हमें वो विमान और मिसाइलें प्राप्त हो जाएँ जो हमारी सुरक्षा और चीन को टक्कर देने के लिए जरूरी हैं. साथ ही भारतीय सैनिकों को अब चीन की सीमा पर भी सालोंभर पूरी तैयारी के साथ जमा रहना पड़ेगा अन्यथा चीन कभी भी भारत के साथ कारगिल जैसे खेल कर सकता है और तब भारत को काफी परेशानी होगी. इसके अलावे भारत-चीन सीमा पर चल रहे सड़क और हवाई अड्डों के निर्माण में भी तेजी लानी होगी.

शनिवार, 4 जुलाई 2020

प्रधानमंत्री की लेह यात्रा के बाद गेंद चीन के पाले में


मित्रों, ७० साल की उम्र में भी भारत केप्रधानमंत्री कब क्या कर जाएँ कोई नहीं जानता. कल पूरी दुनिया को हतप्रभ करते हुए पीएम अचानक लद्दाख की राजधानी लेह पहुँच गए और चीन के खिलाफ अग्रिम मोर्चों पर तैनात सैनिकों का मनोबल बढ़ानेवाला जबरदस्त भाषण दिया. प्रधानमंत्री ने चीन को स्पष्ट कर दिया कि भारत अब एक ईंच भी जमीन उसे नहीं देनेवाला भले ही उसे मानव इतिहास का भीषणतम युद्ध ही क्यों न लड़ना पड़े. प्रधानमंत्री ने चीन का नाम लिए बिना कहा कि आज का युग विस्तारवाद का युग नहीं है बल्कि विकासवाद का युग है. प्रधानमंत्री ने अपने परम ओजस्वी भाषण में कहा कि फिर भी अगर कोई देश इस सच्चाई को नहीं समझता है तो उसका विनाश निश्चित है.
मित्रों, भारत के ७० साल के जवान प्रधानमंत्री ने अपने २६ मिनट लम्बे भाषण में कहा कि भारत की शांतिपूर्ण नीति को भारत की कमजोरी नहीं समझना चाहिए क्योंकि भारत के जो श्रीकृष्ण शांतिकाल में बांसुरी की मनमोहक धुन से पूरी दुनिया को मोहित करने की क्षमता रखते हैं युद्ध काल में वही श्रीकृष्ण अपने चक्र सुदर्शन से शत्रुओं का सम्पूर्ण विनाश करना भी जानते हैं. प्रधानमंत्री ने कहा कि कमजोर देश शांति की स्थापना नहीं कर सकते क्योंकि धरती वीरों के भोगने के लिए बनी है. प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत आज जल, थल, नभ और अन्तरिक्ष में अपनी ताकत अगर बढा रहा है तो इसके पीछे लक्ष्य शांति ही है. इतिहास गवाह है कि भारत ने कभी किसी भी देश पर आक्रमण नहीं किया भले ही वो कितना छोटा देश हो. इस अवसर पर सीमा पर महिला सैनिकों की तैनाती को देखकर रोमांचित प्रधानमत्री ने कहा कि मैं अपने सामने महिला सैनिक भी देख रहा हूं। सीमा पर जंग के हालात में यह देखना प्रेरणादायक है।
मित्रों, भारत के प्रधानमंत्री ने वंदेमातरम् और भारतमाता की जय के नारों के बीच कहा कि आज जिस कठिन परिस्थिति में आप सैनिक जिस तरह देश की हिफाजत कर रहे हैं, उसका मुकाबला पूरे विश्व में कोई नहीं कर सकता। आपका साहस उस ऊंचाई से भी ऊंचा है, जहां आप तैनात हैं। उन्होंने कहा कि लेह-लद्दाख से लेकर कारगिल और सियाचिन तक, रेंजागला की बर्फीली चोटियों से लेकर गलवान घाटी के ठन्डे पानी की धारा तक, हर छोटी, हर पहाड़, हर कंकड़-पत्थर, हर जर्रा-जर्रा भारतीय सैनिकों के अद्भुत पराक्रम की गवाही दे रहे हैं. इसके बाद प्रधानमंत्री निमू गए जहाँ उन्होंने १५ जून को चीन द्वारा धोखे से किए गए हमले में घायल जवानों से मुलाकात की. इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने सैनिकों से कहा कि आप जो सेवा करते हैं उसका मुकाबला पूरे विश्व में कोई नहीं कर सकता है।आपका साहस उस ऊंचाई से भी ऊंचा जहां आप तैनात हैं। आपकी भुजाएं उन चट्टानों से भी मज़बूत है,आज आपके बीच आकर मैं इसे महसूस कर रहा हूं.
मित्रों, इस तरह भारत के यशस्वी और परम तेजस्वी प्रधानमंत्री ने आक्रान्ता चीन और शेष दुनिया को भारत की मंशा बता दी है. उन्होंने बता दिया है कि यह १९६२ के नहीं २०२० का भारत है और आज के भारत ने भारत ने कुत्तों के आगे रोटी फेंकना बंद कर दिया है. अब यह फैसला चीन को करना है कि वो विकास चाहता है या अपना सम्पूर्ण विनाश. भारत के वीरों का समर्पण और अतुल्य पराक्रम वह १५ जून को देख चुका है जब भारत के निहत्थे सैनिकों ने चीन के हथियारबंद सैनिकों की धोखेबाजी का करारा जवाब देते हुए चीन के चार दर्जन से भी ज्यादा सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था. यह पूरी दुनिया प्रथम विश्वयुद्ध के समय से ही जानती है कि जमीनी लडाई में भारतीय सैनिक लाजवाब हैं. बस रणभेरी बजने की देरी है. युद्ध का बिगुल बजते ही भारत के वीर चीन में ऐसी तबाही मचाएँगे कि चीन का महाशक्ति होने का अहंकार उसकी खुद की मिटटी में मिलकर चकनाचूर हो जाएगा.

शनिवार, 27 जून 2020

तय है चीन की शर्मनाक पराजय

मित्रों, दुनिया और भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि इन दिनों भारत चीन की आँखों में ऑंखें डालकर बात कर रहा है. उस चीन की जो अपने आपको वैश्विक महाशक्ति मानता है और अमेरिका तक को आँखें दिखा रहा है. उस चीन में भारत का राजदूत इन दिनों सिंह गर्जना करते हुए कह रहा है कि चीन अपनी सेना को वास्तविक नियंत्रण रेखा के भारतीय पाले से वापस बुला ले अन्यथा उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. इतना ही नहीं जिस भारतीय सीमा पर कभी पैदल भारतीय सैनिकों का पहुंचना भी लोहे के चने चबाने के समान था उसी सीमा पर इस समय भारतीय टैंक निर्भय होकर विचरण कर रहे हैं और भारत के लड़ाकू विमान गर्जना करते हुए ताल ठोक रहे हैं.
मित्रों, सवाल उठता है कि पिछले ६ सालों में ऐसा क्या हो गया कि भारत के सामने चीन की बोलती बंद हो गई है. कुछ भी तो नहीं बदला. बदली है तो बस भारत सरकार और भारत सरकार की नीयत. पहले की सरकार की अघोषित मुखिया सोनिया गाँधी जहाँ चीन से रिश्वत खा रही थी वर्तमान सरकार के घोषित मुखिया को ख़रीदा ही नहीं जा सकता क्योंकि वो बिकाऊ ही नहीं है. अब जब सरकार की नीयत ठीक है तो नीति को तो ठीक होना ही था. तभी तो नरों में सिंह के समान नरेन्द्र मोदी ने सत्ता सँभालते ही कह दिया था कि अबसे कोई भारत को आँख दिखाने या डराने की हिमाकत करने की सोंचे भी नहीं. उनके इस कथन में यह चेतावनी छिपी हुई थी कि अबसे ऐसा करनेवालों की ऑंखें निकाल ली जाएगी.
मित्रों, वो कहते हैं न कि अहंकार व्यक्ति को अँधा कर देता है और चीन की आँखों पर उसी तरह अहंकार की पट्टी बंधी हुई है जैसे कि कभी रावण, कंस और दुर्योधन की आँखों पर बंधी थी. चीन भूल गया कि अब परिस्थितियां उसके अनुकूल नहीं रही. उलटे वो भारत को कमजोर समझकर डराने की कोशिश करने लगा. उस भारत को जिसने विश्वविजेता सिकंदर को उलटे पांव लौटने के लिए विवश कर दिया था, उस भारत को विश्वयुद्धों के दौरान जिसके वीरों की वीरता की गाथाओं को आज भी पूरा यूरोप गाता और पूजता है, उस भारत को जिसके एक डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनीस ने पिछली शताब्दी के तीसरे दशक में चीन जाकर वहां की पददलित दुखी जनता की सेवा में अपना जीवन खपा दिया.चीन यह भूल गया किभारत की ताक़त उसकी जनता में निहित है जो देश की संप्रभुता के लिए हँसते-हँसते अपना सबकुछ न्योछावर कर देने को सदैव तत्पर रहती है.
मित्रों, अब इसमें कोई शक नहीं कि अगर चीन ने जल्द-से-जल्द अपने कदम वापस नहीं खींचे तो उसकी शर्मनाक पराजय तय है. इस बार भारत अकेला नहीं है पूरी दुनिया उसके साथ है वैसे भारत अकेले ही एक नहीं कई-कई चीनों से निबटने में सक्षम है इसमें कोई शक नहीं. चीन की तरह भारत की सेना कोई फ़िल्मी सेना नहीं है बल्कि सर पर कफ़न बाँधकर रणभूमि में उतरे ऐसे वीरों की सेना है जो रोजाना अपने ही रक्त में स्नान करने को अपना सौभाग्य मानते हैं। भारत के वीरों की वीरता का नमूना चीन गलवान में अपनी छोटी-छोटी खुली और फटी हुई आँखों से देख भी चुका है फिर भी उसके विवेक पर अहंकार का मोटा पर्दा पड़ा हुआ है.
मित्रों, वो कहते हैं न कि घमंडी का सिर नीचा. इसमें कोई संदेह नहीं कि बहुत जल्द चीन का सर भारत के पैरों पर होगा. इस बार भारत की बागडोर न तो कायर और डरपोक नेहरु के हाथों में है और न ही रिश्वतखोर सोनिया के घिनौने हाथों में बल्कि इस बार भारत की सत्ता एक नरसिंह के हाथों में है. आदेश मिलते ही भारत की सेना चीन की सेना को उसी प्रकार से चीरफाड़ कर रख देगी जैसे जहाज महासागर के जल को चीर डालता है. फिर तो चीन के इतने टुकड़े होंगे कि वो उनको गिन भी नहीं पाएगा. स्वयं चीन की जनता भी एकदलीय तानाशाही शासन से उब चुकी है और लोकतंत्र चाहती है. चीन की सेना अपने ही नागरिकों को डराने-धमकाने के लिए तो ठीक है लेकिन भारत जैसी विकट सेना से लड़ पाना उसके लिए सपने में भी संभव नहीं. फैसला चीन के हाथों में है कि वो मिलजुलकर रहना चाहता है या आत्महत्या करना चाहता है. भारत को चुनौती देकर उसने निश्चित रूप से अक्साई चिन और अरुणाचल के खोए हुए भाग को फिर से प्राप्त करने का स्वर्णिम अवसर भारत को दे दिया है. चीन यह भूल गया है कि युद्ध हथियारों से नहीं हौसले से लड़ा जाता है जिसे आदमी अपनी माता के गर्भ से लेकर पैदा होता है फिर भारत तो दुनिया का सबसे युवा राष्ट्र ठहरा. हम ऐसे ही थोड़े अपने सैनिकों को जवान कहते हैं. हमारे जवानों की जवानी के आगे क्या आग और क्या पानी और क्या चीन जैसे बूढ़े देश के जबरदस्ती जमा किए गए थके-हारे सेनानी.अपने इस आलेख को मैं महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की इन महान पंक्तियों के साथ समाप्त करना चाहूँगा-
जागो फिर एक बार!
समर अमर कर प्राण
गान गाये महासिन्धु से सिन्धु-नद-तीरवासी!
सैन्धव तुरंगों पर चतुरंग चमू संग;
”सवा-सवा लाख पर एक को चढ़ाऊंगा
गोविन्द सिंह निज नाम तब कहाऊंगा”
किसने सुनाया यह
वीर-जन-मोहन अति दुर्जय संग्राम राग
फाग का खेला रण बारहों महीने में
शेरों की मांद में आया है आज स्यार
जागो फिर एक बार!
सिंहों की गोद से छीनता रे शिशु कौन
मौन भी क्या रहती वह रहते प्राण?
रे अनजान
एक मेषमाता ही रहती है निर्मिमेष
दुर्बल वह
छिनती सन्तान जब
जन्म पर अपने अभिशप्त
तप्त आँसू बहाती है;
किन्तु क्या
योग्य जन जीता है
पश्चिम की उक्ति नहीं
गीता है गीता है
स्मरण करो बार-बार
जागो फिर एक बार

बुधवार, 17 जून 2020

नमन गलवान के अमर शहीदों को


मित्रों, आपको याद होगा कि १ नवम्बर २०१६ को ही हमने एक आलेख चिनमा से करबई लड़ईया हो भैया के माध्यम से देश को सचेत किया था कि चीन भारत पर कभी भी हमला कर सकता है. तब मेरे बहुत से सोशल मीडिया के मित्रों ने मेरा इस आलेख के लिए मजाक उड़ाया था लेकिन आज जब मैं यह आलेख लिख रहा हूँ तो मैं मेरी कलम की स्याही से नहीं लिख रहा हूँ बल्कि इस स्याही में उन २० शहीदों के खून मिले हुए हैं जो चीन के साथ कल रात हुई झड़प में मारे गए हैं.
मित्रों, दरअसल चीन १९४९ में अपनी आजादी के समय से ही नहीं चाहता है कि एशिया और पड़ोस में उसका कोई प्रतिद्वंद्वी भी हो. १९६२ में भारत पर उसके हमले के पीछे भी उसकी यही घृणित सोंच थी लेकिन तब का भारतीय नेतृत्व यह समझ नहीं पाया था कि धोखा चीन के खून में है.
मित्रों, बदली हुई परिस्थिति में जबसे कोरोना को लेकर चीन बदनाम हुआ है वह बुरी तरह बौखलाया हुआ है क्योंकि पूरी दुनिया में उसकी साख मर गई है. और जैसा कि आप भी जानते हैं कि बिना साख के कोई व्यवसायी व्यापार कर ही नहीं सकता. चीन आज अपने कुकर्मों की वजह से पूरी दुनिया में घृणा का पात्र बन चुका है. बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ चीन छोड़कर भारत आने लगी हैं. अमेरिका ने तो सीधे इस बाबत संसद से प्रस्ताव ही पारित करवा दिया है.
मित्रों, अब अगर निवेशक चीन छोड़कर भारत का रूख कर रहे हैं तो इसके लिए किसी भी तरह भारत दोषी नहीं है लेकिन चीन तो खिसियानी बिल्ली की तरह नोचने के लिए खम्भा खोजता फिर रहा है. चीन को आज भी सबसे सॉफ्ट टारगेट भारत ही दिख रहा है. वह यह भूल गया है कि यह २०२० का भारत है १९६२ का नहीं और न ही इस समय भारत में नेहरु या उनके वंशज सत्ता में हैं. बल्कि इस समय भारत में राष्ट्रवादी सत्ता में हैं जिनके लिए राष्ट्र और राष्ट्र का गौरव प्राणों से भी बढ़कर है. 
मित्रों, यही कारण है कि जबसे मोदी सरकार सत्ता में आई है तभी से सीमावर्ती ईलाकों में सड़कों के निर्माण और सेना के आधुनिकीकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है.
मित्रों, १९६२ में भी भारत की सेना कमजोर नहीं थी और न ही हमें सेना की कायरता के कारण शर्मनाक और कभी न भुला सकनेवाली हार का मुंह देखना पड़ा था बल्कि तब कायर और कमजोर था हमारा नेतृत्व. उस समय का प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री खुद चीन का एजेंट था या चीन के एजेंट की तरह काम कर रहा था और उन्होंने काफी मेहनत करकेजानबूझकर भारतीय सेना को काफी कमजोर कर दिया था. कहना न होगा भारत की उसी सेना ने मात्र ३ साल बाद ही शास्त्री जी के नेतृत्व में पाकिस्तान को धोबिया पछाड़ लगाते हुए लाहौर तक पर कब्ज़ा कर लिया था. अभी कल की शहादत को ही देखें तो भले ही यह १६ बिहार रेजिमेंट की अगुवाई में दी गई हो और वीर शहीदों में ज्यादातर बिहार के हों लेकिन इसमें तमिलनाडु के भी जवान शामिल हैं और सबसे बढ़कर यह कि उनका नेतृत्व जो कर्नल संतोष बाबू कर रहे थे वे भी सुदूर दक्षिण तेलंगाना के थे. उनकी माँ ने अपने बेटे की शहादत पर जो शब्द कहे वे न सिर्फ हमारा मस्तक ऊंचा करनेवाले हैं बल्कि चीन को दहला देनेवाले हैं. उस माँ ने जिसने अपना इकलौता जवान बेटा खोया है कहा है कि उसे अपने बेटे की मौत का दुःख तो है लेकिन उससे ज्यादा इस बात पर गर्व है कि उसके बेटे ने देश के लिए अपना बलिदान दिया है.
मित्रों, मैं जानता हूँ कि इस समय पूरे भारत का खून उबल रहा है. उबले भी क्यों नहीं भारत दुनिया का सबसे युवा देश जो ठहरा. कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरे भारत में इस समय चीन के प्रति गुस्सा चरम सीमा पर है. प्रत्येक भारतीय को अपने जवानों की शहादत का बदला चाहिए. सेना और मोदी सरकार को जो करना है वो कर रही है लेकिन हम अगर चाहें तो चीन को घर बैठे काफी कमजोर कर सकते है, यहाँ तक कि बर्बाद कर सकते हैं. बस हमें प्रतिज्ञा लेनी पड़ेगी कि आगे से हम चीन में निर्मित सामानों की बिलकुल भी खरीद नहीं करेंगे. व्यापारियों को भी प्रण लेना पड़ेगा कि वे चीन को कोई भी आर्डर नहीं देंगे. इतना ही नहीं जरुरत पड़ेगी तो हम अधेड़, बच्चे और वृद्ध भी चीन के खिलाफ बन्दूक उठाने को तैयार हैं. हमें इस बात का दृढनिश्चय लेना होगा कि जब तक भारत का अंतिम बच्चा, आखिरी व्यक्ति सांस ले रहा है तब तक भारत अपने बिगडैल पडोसी के साथ युद्ध में अपने कदम एक ईंच भी पीछे नहीं लेगा. जय हिन्द, जय हिन्द की सेना.

गुरुवार, 28 मई 2020

माफ़ी वीर वीर सावरकर को नमन

मित्रों, आज भारतमाता के महान पुत्र विनायक दामोदर सावरकर का जन्म दिन है जिनको हम वीर सावरकर के नाम से ज्यादा जानते हैं. सावरकर जिन्होंने भारत को सबसे पहले हिंदुत्व का दर्शन दिया. सावरकर जिन्होंने एक ऐसे समरस हिन्दू समाज की कल्पना की जिसमें कोई जाति-भेद नहीं हो. सावरकर जिन पर भारत के तथाकथित राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गाँधी के अलावा कर्जन वाईली और जनरल डायर की हत्या करवाने का आरोप है.
मित्रों, वह सावरकर ही थे जिन्होंने अंग्रेजों की राजधानी लन्दन में रहकर स्वतंत्रता की अलख जगाई. वह सावरकर ही थे जिन्होंने १८५७ के विद्रोह को सबसे पहले भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम कहने का साहस किया. लेकिन जो लोग हिन्दू और हिंदुत्व विरोधी राजनीति करते हैं और भारत के समस्त हिन्दुओं के धर्मान्तरण अथवा भारत में इस्लामिक शासन की पुनर्स्थापना के सपने देखते हैं उनको सावरकर में त्याग, साहस, वीरता, देशभक्ति आदि गुण दिखाई ही नहीं देते दिखता है तो बस उनकी एक ही करनी कि सावरकर ने अंग्रेजों से माफ़ी मांगी थी.
मित्रों, आपने भी शायद प्रकाश झा की अपहरण फिल्म देखी होगी. आपने देखा होगा कि फिल्म में हीरो विलेन के पास काम मांगने जाता है. तब विलेन उससे पूछता है कि वो उसके लिए क्या कर सकता है. हीरो कहता है कि वो उसके लिए अपनी जान दे सकता है. तब विलेन कहता है कि मैं क्या करूंगा तेरी जान लेकर? क्या कीमत है तुमरी जान की? तब हीरो जवाब में कहता है कि मैं आपके लिए जान ले भी सकता हूँ.
मित्रों, मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि हमेशा जान दे देने को उद्धत रहना सही ही नहीं होता कभी-कभी अपनी जान बचाकर शत्रु को ज्यादा नुकसान पहुँचाना ज्यादा श्रेयस्कर होता है. चाणक्य नीति को देख लीजिए. पाकिस्तान की कूटनीति को देख लीजिए. चीन की १९६२ की कूटनीति को देख लीजिए. प्रत्यक्ष में युद्ध के समय भी वो हिंदी-चीनी भाई-२ कर रहा था जबकि उसकी सेना भारत के भीतर धंसी आ रही थी. सीमा पर लगभग रोजाना जवान शहीद होते हैं. उनमें से जो जवान आसानी से मारे जाते हैं क्या आपने उनको कभी कोई पदक मिलते देखा है? बल्कि पदक उनको ही मिलता है जो शत्रु को भारी नुकसान पहुंचाते हैं भले ही वे शहीद न भी हुए हों. 
मित्रों, सावरकर भी शहीद हो सकते थे. बहुत पहले २०वीं शताब्दी की शुरुआत में ही शहीद हो सकते थे. लेकिन अगर वे मर जाते तो इससे देश को क्या मिलता? आपने भगत सिंह अ लिजेंड फिल्म में देखा होगा कि चंद्रशेखर आजाद चाहते थे कि भगत सिंह बम फेंककर भाग जाएँ. लेकिन भगत सिंह नहीं माने. मैं आज आपसे पूछता हूँ कि भगत सिंह की फांसी से देश को क्या मिला? आज़ादी के बाद कांग्रेस की सरकार बनी. उसी कांग्रेस की जो भगत सिंह को आतंकवादी मानती थी और जिसके सबसे बड़े नेता मोहन दास करमचंद गाँधी ने भगत सिंह को बचाने की रंच मात्र भी कोशिश नहीं की. नेहरु ने खुद ही खुद को भारत रत्न दे दिया जो भगत सिंह को आज तक नहीं मिला. जिस विचारधारा के प्रचार के लिए भगत सिंह ने गिरफ़्तारी दी थी आज भगत सिंह की वो विचारधारा कहाँ है? कहीं नहीं. 
मित्रों, क्या आपने कभी सोंचा है कि सावरकर अगर जेल से जीवित नहीं लौटते तो क्या होता? क्या आपने इतिहास की किताबों में पढ़ा है कि गाँधी और कांग्रेस ने आजादी दिलाने के नाम पर भारत के हिन्दुओं के साथ कितना बड़ा धोखा किया? कहने को तो मजबूरी में देश का बंटवारा किया लेकिन क्या वो बंटवारा भी देश खासकर हिन्दुओं के साथ धोखा नहीं थ? मुसलमानों  को अलग देश दे दिया लेकिन भविष्य में नासूर बनने के लिए पाकिस्तान से भी कहीं ज्यादा मुसलमानों को जो कुछ महीने पहले तक अलग देश मांग रहे थे भारत में ही रोक लिया. इस मामले में अम्बेदकर की आपत्तियों को भी गाँधी ने दरकिनार कर दिया जो कह रहे थे कि भारत से सारे मुसलमानों को पाकिस्तान भेज दिया जाए और पाकिस्तान से सारे हिन्दुओं को भारत बुला लिया जाए. 
मित्रों, आज भारत में मुसलमान क्या कर रहे हैं? भारत की राजधानी दिल्ली में शाहीन बाग़ और हिन्दुओं का नरसंहार. हिन्दुओं के स्कूल, कारें, दुकान और घर सब जला दिया उन्होंने इसी फरवरी में. पुलिस की तो कोई क़द्र ही नहीं रही उनकी नज़रों में. पुलिस को देखते ही वे पत्थर फेंकने लगते हैं. वे राष्ट्र गान और राष्ट्र गीत के अपमान को अपना गौरव मानते हैं. वे न तो भारत के कानून को मानने को तैयार हैं और न ही भारत की सरकार को. उनके लिए उनका मजहब भारत के संविधान से भी ऊपर है. सावरकर दूरदर्शी थे और समझ गए थे कि भविष्य में भारत में क्या होनेवाला है. मैं नहीं जानता कि गाँधी की हत्या में सावरकर कहाँ तक शामिल थे लेकिन यह मानता हूँ कि गाँधी महाभारत के भीष्म की तरह अधर्म के पक्ष में थे और अगर उनका वध नहीं होता तो छद्म मुसलमान मोहम्मद गाँधी देश और हिन्दू समाज को और भी ज्यादा नुकसान पहुंचाते. 
मित्रों, अभी-अभी पृथ्वीराज चौहान की १९ मई को जयंती मनाई गई. लोगों ने श्रद्धा सुमन के ढेर लगा दिए लेकिन मैं पृथ्वीराज को एक महान व्यक्ति नहीं मानता हूँ. आदर्श अपनी जगह है और राष्ट्र अपनी जगह. उस एक व्यक्ति की एक मूर्खता के कारण भारत को सात सौ साल से भी ज्यादा की गुलामी झेलनी पड़ी. न जाने इन सात सौ सालों में कितने मंदिर तोड़ दिए गए, कितनी बार हिन्दुओं का नरसंहार हुआ और कितनी हिन्दू महिलाओं को नंगी करके बगदाद के बाजारों में बेच दिया गया और उसके बाद उनका क्या हुआ होगा आप इसकी सिर्फ कल्पना कर सकते हैं. हिन्दू धर्म के गर्भ से सिख धर्म का जन्म हुआ. गुरु गोविन्द सिंह के बेटों को जीवित दीवार में चुनवा दिया गया. गुरु तेगबहादुर, बाबा बन्दा सिंह बहादुर और संभाजी को असीम यातनाएं देकर मौत के घाट उतार दिया गया.......
मित्रों, इन सबके लिए अगर कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार है तो वो पृथ्वीराज चौहान है जिसने पकड़ में आए शत्रु को बार-बार माफ़ी मांगने पर छोड़ दिया. शहीद तो पृथ्वीराज भी हुआ लेकिन उसकी शहादत, वीरता और आदर्श से भारत को क्या मिला? हाँ बार-बार क्षमा मांगनेवाला मोहम्मद गोरी एक बार जीता और उसने कोई गलती या मूर्खता नहीं की. इसलिए मैं कहता हूँ कि सावरकर ने अगर माफ़ी मांगी भी तो वह अपराध नहीं था एक रणनीति थी ठीक उसी तरह जैसे आगरा के किले में कैद कर दिए जाने के बाद छत्रपति शिवाजी ने औरंगजेब से लिखित में माफ़ी मांगी थी क्योंकि उनको लग रहा था कि ऐसा नहीं करने पर क्रूर औरंगजेब उनकी हत्या करवा देगा.  

रविवार, 24 मई 2020

मोदी नहीं कोरोना और चीन से लड़े कांग्रेस


मित्रों, इन दिनों जब पूरा देश और पूरी दुनिया कोरोना से लड़ने में मशगूल है और कमर कसकर लड़ रही है ऐसे में हमारे देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस अपनी पूरी ताकत से इस लडाई को कमजोर करने में जुटी हुई है. एक तरफ तो वो कह रही है कि यह समय गन्दी और तुच्छ राजनीति करने का नहीं है वहीं दूसरी तरफ वो खुद ऐसा ही करने में पूरे प्राणपन से लगी हुई है. कांग्रेस शासित महाराष्ट्र और पंजाब में कोरोना को लेकर पूरी तरह से अराजकता का वातावरण है. कांग्रेस को उसे ठीक करने की कोशिश करनी चाहिए लेकिन कांग्रेस का पूरा ध्यान इस समय उत्तर प्रदेश का माहौल बिगाड़ने पर है जहाँ की स्थिति बांकी राज्यों के मुकाबले काफी अच्छी है.
मित्रों, हम काफी समय से सोनिया, प्रियंका और राहुल नामक तीन व्यक्तियों की पार्टी रह गई कांग्रेस से यह कहते आ रहे हैं कि उसको अपना हिंदूविरोधी रवैया त्यागना चाहिए नहीं तो वो एक समय भारत का बंटवारा करने वाली मुस्लिम लीग का भारतीय संस्करण मात्र बनकर रह जाएगी लेकिन कांग्रेस न तो अपना हिन्दूविरोधी रवैया छोड़ रही है और न ही मोदी विरोधी रवैया. इतना ही नहीं वो बार-बार लगातार मोदी का विरोध करते-करते भारत के हितों के खिलाफ बात करने लगती है. जिससे शक होने लगता है कि वो कहीं भारत विरोधी शक्तियों की एजेंट तो नहीं है.
मित्रों, यहाँ हम एक उदाहरण लेना चाहेंगे. हरियाणा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पंकज पूनिया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गरियाने के चक्कर में पिछले दिनों हिन्दुओं के लिए परम पूज्य मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को गालियाँ दे बैठे. दूसरी तरफ रायबरेली से कांग्रेस विधायक अदिति सिंह प्रियंका वाड्रा की आलोचना करती हैं. कांग्रेस अदिति सिंह पर तो अनुशासन का डंडा चलाती है लेकिन पंकज पूनिया की आलोचना तक नहीं करती कार्रवाई तो दूर रही. शायद ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस के लिए भगवान राम का कोई मूल्य नहीं है जबकि प्रियंका उसके लिए बहुत कुछ ही नहीं सबकुछ है.
मित्रों, पिछले दिनों एक और अनपेक्षित घटना देखने को मिलती है. दिल्ली के महाबदमाश मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल एक विज्ञापन में सिक्किम को स्वतंत्र राष्ट्र बताता है. जाहिर है कि उनके जैसा बहुत ज्यादा पढ़ा-लिखा आदमी अनजाने में तो ऐसी गलती नहीं ही करेगा. खैर, चूंकि हम उनको दिल्ली चुनावों से पहले ही काला नाग बता चुके हैं इसलिए उनके बारे में हमें ज्यादा बोलने की जरुरत नहीं है. मगर कांग्रेस भी इस मुद्दे पर चुप रह जाती है जबकि जब सिक्किम का भारत में १९७५ में विलय हुआ था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इसे अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि बताया था. तो क्या कांग्रेस पार्टी को इंदिरा गाँधी द्वारा किए गए महान कार्यों से भी कोई मतलब नहीं रह गया है? या फिर कांग्रेस और केजरीवाल दोनों इस समय चीन के एजेंट हैं जो आज भी सिक्किम को भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं मानता?
मित्रों, भारत के कम्युनिस्टों का तो कहना ही क्या? अगर आज भारत पर चीन का हमला हो जाए जो कभी भी और किसी भी दिन हो सकता है तो ये गरीबों और सर्वहारा वर्ग के कथित मसीहा निश्चित रूप से एक बार फिर से चीन के समर्थन में दिखाई देंगे. इससे पहले १९६२ में भी वे चीन के समर्थन में और अपने ही देश भारत के खिलाफ खड़े हो चुके हैं. लेकिन क्या कांग्रेस को भी भविष्य में चीन या पाकिस्तान से चुनाव लड़ना है? अगर हां तब तो कोई बात नहीं, हमारी शुभकामनाएँ उसके साथ है लेकिन अगर उसे भारत से ही चुनाव लड़ना है तो उसे सर्वप्रथम अपना हिन्दूविरोधी रवैया त्यागना होगा अन्यथा जिस प्रकार मुस्लिम लीग को भारत में कभी १ और कभी २ सीटें लोकसभा चुनावों में आती हैं वैसे ही आया करेगी और राहुल गाँधी कभी भी दोबारा अमेठी से चुनाव नहीं जीत पाएंगे. दूसरी बात उसे मोदी विरोध और भारत विरोध के बीच के फर्क को समझना होगा. तीसरी बात अगर सोनिया समझती हैं कि उनके नेतृत्व में पूरे भारत को ईसाई धर्म में धर्मान्तरित किया जा सकता है तो उनको शीघ्रातिशीघ्र इस भ्रम को त्याग देना चाहिए क्योंकि यह नितांत असंभव है. ऐसा करने के प्रयास वास्को डी गामा के समय से ही जारी है और न जाने कितने ईसाई धर्मप्रचारक इस भारत की पवित्र मिटटी में मरखप गए और यहीं उनकी कब्रें बन गईं लेकिन हिंदुत्व का परचम लहराता रहा और लहराता रहेगा.
मित्रों, अंत में मैं अपने इस आलेख का अंत एक दुखद संयोग के साथ करना चाहूँगा कि इस समय भारत के चार प्रमुख दुश्मन हैं और उन चारों के नाम अंग्रेजी के सी अक्षर से शुरू होते हैं-सी फॉर कोरोना, सी फॉर कांग्रेस, सी फॉर चाइना और सी फॉर कम्युनिस्ट. साथ ही मैं बहन मायावती द्वारा इस समय दिखाई जा रही गंभीरता और दूरदर्शिता की प्रशंसा भी करना चाहूँगा जिनसे क से कांग्रेस, केजरीवाल और कम्युनिस्ट चाहें तो बहुत कुछ सीख सकते हैं.

गुरुवार, 14 मई 2020

मोदी, विपक्ष और मुसलमान


मित्रों, जबसे केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार सत्ता में आई है तभी से विपक्ष उसके खिलाफ मुद्दे तलाश रहा है और अपनी कोशिशों के लगातार असफल होते जाने से दिन-ब-दिन पागल भी होती जा रही है. कभी-कभी तो उसका पागलपन इतना बढ़ जाता है कि उसके नेता सीधे पाकिस्तान पहुँच जाते हैं और उससे मोदी जी को अपदस्थ करने में सहायता मांगने लगते हैं तो कभी कांग्रेस पार्टी के युवराज गुप्त यात्रा पर चीनी दूतावास पहुँच जाते हैं. कहने का तात्पर्य यह कि विपक्ष बार-बार मोदी विरोध और भारत विरोध का फर्क भूल जाता है.
मित्रों, सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि विपक्ष, पाकिस्तान और चीन द्वारा रचे गए इस गंदे खेल में मुसलमान पासे बन गए हैं. बहकावे में आकर वे बेवजह सीएए को लेकर आसमान सर पे उठा लेते हैं. जगह-जगह धरना और हिंसक प्रदर्शन. यहाँ तक कि जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत की और दिल्ली की यात्रा पर होते हैं तभी वे हिन्दुओं के नरसंहार की योजना बना डालते हैं और पूरी पूर्वोत्तर दिल्ली को जला डालते हैं. इस दुर्भाग्यपूर्ण हिंसा में जैसा कि आप भी जानते हैं कि ५० से भी ज्यादा बेगुनाह लोग मारे जाते हैं. मुसीबत तो यह थी कि इतने के बावजूद भी शाहीन बाग़ का धरना समाप्त नहीं किया जाता.
मित्रों, इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर कोरोना वायरस का भारत में आगमन नहीं हुआ होता तो देश इस समय शायद गृह युद्ध का सामना कर रहा होता. इसके लिए मैं कोरोना का धन्यवाद करना चाहूँगा. कोरोना के आने बाद तबलीगी जमात का भंडाफोड़ होता है और तबलीगी स्वास्थ्यकर्मियों और सुरक्षा बलों के साथ पागल कुत्तों की तरह व्यवहार करने लगते हैं. जो पुलिस और स्वास्थ्यकर्मी उनकी जान बचाने का प्रयास कर रहे हैं वे उनकी ही जान लेना चाहते हैं शायद इसलिए क्योंकि वे हिन्दू हैं और इसलिए बतौर कुरान काफ़िर हैं. पुलिस न तो तबलीग के पीछे की साजिश का पता लगा पाती है और न ही उनके मुखिया मौलाना शाद को पकड़ पाती है लेकिन तबलीगियों के कुत्तेपन की आलोचना करने के अपराध में कई लोग जेल भेज दिए जाते हैं मानों हम भारत में नहीं पाकिस्तान में हैं जहाँ कुरान और इस्लाम की आलोचना करना अक्षम्य अपराध है.
मित्रों, अब आगे अपने देश में क्या होनेवाला है ये तो भगवान और अल्लाह जाने. इस समय मेरे हिसाब से सबसे बड़ी समस्या कोरोना नहीं है बल्कि देश की सबसे बड़ी समस्या भारतीय मुसलमानों के मन से भारत के प्रति पैदा हो रही नफरत है. मुट्ठीभर कट्टरपंथी मुसलमान तो हमेशा से भारत को मुस्लिम देश बनाना चाहते हैं लेकिन जिस तरह कथित उदारवादी भी पिछले कुछ समय से पहले मोदी विरोधी फिर हिन्दू विरोधी और अंततः भारतविरोधी होते जा रहे हैं वह देश के लिए काफी खतरनाक है. समझ में नहीं आता कि मोदी और हिन्दुओं ने उनका क्या बिगाड़ा है? पहले आमिर खान, नसीरुद्दीन शाह, प्रतापगढ़ी, गुलाम नबी आज़ाद, शाह फैसल, जफरुल इस्लाम और अब मुन्नवर राणा. जफरुल इस्लाम जो दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष हैं ने जहाँ भारत के हिन्दुओं को अरब देशों की धमकी दे डाली वहीँ मुन्नवर राणा के मतानुसार भारत के ३५ करोड़ मुसलमान इन्सान हैं और भारत के १०० करोड़ हिन्दू जानवर जो सिर्फ वोट देना जानते हैं. राणा का बयान खुद ही इस बात को बयां कर रहा है कि ये साहिबान जो अभी तक दुनिया को मुहब्बत का पैगाम सुनाते फिर रहे हैं वो सारा सिर्फ-और-सिर्फ फरेब है. इस आदमी के दिमाग में हिन्दुओं के प्रति सिर्फ जहर भरा हुआ है. जिस तरह इतने बड़े शायर फरेबी निकले हैं उससे कहना न होगा भारत के सारे मुसलमान संदेह के घेरे में आ गए हैं कि क्या उनका देशप्रेम भी फरेब है और समय आने पर वे भी पल्टी मार जाएंगे?
मित्रों, वैसे एक बात तो निश्चित है कि अब न १९४७ का साल है और न ही भारत पर अंग्रेजों की हुकूमत है इसलिए भारत और एक बार टूटने से तो रहा. फिर अभी भी भारत के बहुत सारे मुसलमान भारत पर अपनी जान छिड़कते हैं. कम-से-कम कश्मीर में शहीद हो रहे जवानों के नाम तो इसकी तस्दीक करते हैं और उम्मीद बंधाते हैं.

सोमवार, 4 मई 2020

मजदूरों के साथ सरकारी अन्याय





मित्रों, अगर आपने हमारे भारतीय संविधान की प्रस्तावना पढ़ी होगी तो आपको भी यह पता होगा कि भारत एक लोककल्याणकारी राज्य है. राजनीति विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते हमें ज्ञात है कि एक लोककल्याणकारी राज्य की क्या-क्या विशेषताएँ होती हैं. किसी भी लोककल्याणकारी राज्य में सरकार का यह प्रथम कर्त्तव्य होता है कि वहां के जनसामान्य को आर्थिक सुरक्षा मिले क्योंकि इसके बिना लोककल्याणकारी राज्य का कोई महत्त्व नहीं है. ऐसे राज्य में सबके लिए रोजगार, न्यूनतम जीवन की गारण्टी, अधिकतम आर्थिक समानता होनी चाहिए। यदि शासन तन्त्र में राजसत्ता आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न लोगों के हाथों में होगी तो वह लोककल्याणकारी राज्य की श्रेणी में नहीं आयेगा। किसी भी लोककल्याणकारी लोकतंत्र की दूसरी विशेषता होती है राजनीतिक, सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था. लोककल्याणकारी राज्य को चाहिए कि वह ऐसी व्यवस्था करे कि राजनैतिक शक्ति सम्पूर्ण रूप से जनता के हाथ में हो। शासन व्यवस्था लोकहित में हो। इसके साथ ही लोककल्याणकारी राज्य का प्रमुख लक्षण यह होना चाहिए कि वह सामाजिक सुरक्षा से साथ-साथ समाज में रंग, जाति, धर्म, सम्प्रदाय, वंश, लिंग के आधार पर भेदभाव न करे और न होने दे। राज्य को लोककल्याण सम्बन्धी वे सभी कार्य करने चाहिए, जिससे नागरिकों की स्वतन्त्रता प्रभावित न हो और वे अपने कार्यक्षेत्र में पूर्ण क्षमता एवं स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य कर सकें। राज्य में शान्ति एवं सुव्यवस्था कायम करना तथा नागरिकों को कानून के तहत सुशासन प्रदान करना भी राज्य के कर्तव्यों में सम्मिलित है। लोककल्याणकारी राज्य को शान्ति और व्यवस्था बनाये रखने के लिए स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष न्याय की भी व्यवस्था करनी चाहिए। लोककल्याणकारी राज्य को स्त्री-पुरुष, बच्चों तथा उनके पारस्परिक सम्बन्धों का इस प्रकार नियमन करना चाहिए कि उनके बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न न हो. साथ ही सभी को शिक्षा के समान अवसर प्रदान करना और नागरिकों के स्वास्थ्य रक्षा हेतु समुचित उपाय करना भी एक लोककल्याणकारी राज्य में राज्य का कर्त्तव्य है.
मित्रों, इसके साथ ही कृषि की उन्नति हेतु राज्य को उत्तम बीज, खाद एवं सिंचाई के समुचित साधनों की व्यवस्था करना, कृषकों को कम ब्याज पर ऋण देना, यातायात एवं संचार के लिए सड़कों, रेलों, जल तथा वायुमार्गो, डाक, तार, टेलीफोन, रेडियो, दूरदर्शन आदि की व्यवस्था करना, श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए श्रमहितकारी कानून बनाना, शारीरिक रूप से अपंग एवं वृद्ध व्यक्तियों के लिए इस प्रकार के शिक्षण और प्रशिक्षण की व्यवस्था करना कि वह अपना जीविकोपार्जन स्वयं कर सकें, राज्य में कला, साहित्य, विज्ञान को प्रोत्साहन देना, नागरिकों के लिए आमोद-प्रमोद व मनोरंजन की व्यवस्था करना, प्राकृतिक सम्पदा के अधिकाधिक उपयोग के उपाय करने के साथ ही प्राकृतिक आपदा के समय जनसामान्य के लिए राहत और प्राणरक्षा के उपाय करना भी राज्य का कर्त्तव्य है.
मित्रों, दुर्भाग्यवश इस समय भी हमारे देश में आपदा आई हुई है और जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि किसी देश ने जानबूझकर कोरोना वायरस को फैलाया है तब तक इसे प्राकृतिक आपदा ही माना जाना चाहिए. जैसा कि हमें ज्ञात है कि पूरे भारत में २४ मार्च से ही सबकुछ बंद है यानि पूर्ण लॉक डाउन है. प्रधानमंत्री ने इस दौरान राष्ट्र को अपने पहले संबोधन में देश के सभी नियोक्ताओं और मकानमालिकों से निवेदन किया था कि वे श्रमिकों को काम और घर से नहीं निकालें बल्कि उनकी मदद करें. कितना आदर्श दिवास्वप्न था यह! अद्भुत! लेकिन चाहे आदर्श हो या स्वप्न उनका सत्य के धरातल पर उतरना हमेशा असंभव होता है, ऐसा हो न सका. अचानक पूरे भारत में और खासकर बड़े-बड़े महानगरों में हजारों लोग अपना रोजगार और निवास खोकर सडकों पर आ चुके हैं. कुछ दिनों तक तो भोजन और आवास का प्रबंध भी राज्य सरकारों और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा किया गया लेकिन धीरे-धीरे राहत कार्यों में शिथिलता आने लगी. दुनिया के सबसे बड़े लोककल्याणकारी गणराज्य की राजधानी में दिल्ली में हजारों श्रमवीरों को पुलों के नीचे खुले में सोना पड़ रहा है. इतना ही नहीं उन्हें भोजन भी दिनभर में एक ही बार दिया जा रहा है. कुछ ऐसी ही स्थिति मुम्बई और अन्य महानगरों में फंसे मजदूरों की है. जिन मजदूरों के साथ उनका परिवार भी है उनकी स्थिति तो और भी ख़राब है.
मित्रों, कुल मिलाकर पूरे भारत में इस समय श्रमिकों की हालत भिखारियों से भी बदतर है. कई मजदूर तो परेशान होकर आत्महत्या भी कर चुके हैं. लेकिन सरकारें उनके लिए कर क्या रही हैं? लोग सपरिवार भूखे-प्यासे हजारों किलोमीटर की यात्रा करके घर पहुँच रहे हैं. उनमें से कईयों ने तो रास्ते में ही दम भी तोड़ दिया है. इसी बीच दिल्ली सरकार ने अफवाह फैला दी कि आनंद विहार बस अड्डे से बसें खुलनेवाली हैं और मजदूरों को आनंद विहार ले जाकर छोड़ दिया ताकि मजदूर उत्तर प्रदेश में प्रवेश कर जाएँ और दिल्ली सरकार का उनसे पिंड छूटे. उधर महाराष्ट्र सरकार भी लगातार कह रही है कि प्रवासी मजदूरों को राहत पहुँचाना उसका काम नहीं है. इतना ही नहीं जब केंद्र सरकार ने प्रवासी मजदूरों को घर जाने की अनुमति दे दी तब कई राज्य सरकारें ऐसा कहने लगी कि प्रवासी मजदूरों को घर तक पहुँचाना उनका काम नहीं है. समझ में ही नहीं आता कि मजदूर किसकी जिम्मेदारी हैं? इतना ही नहीं आज सुबह से है आकाशवाणी पर प्रसारित समाचारों में कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार द्वारा जारी नए निर्देशों के अनुसार सिर्फ उन्हीं लोगों को घर लौटने की अनुमति होगी जो लॉक डाउन से तत्काल पहले यात्रा पर गए होंगे और लॉक डाउन घोषित हो जाने के चलते फंस गए होंगे. उन लोगों को घर जाने की अनुमति नहीं है जो पहले से ही मजदूरी या व्यापार के लिए बाहर रहते आ रहे हैं. क्या मजाक है? तो क्या रोजगार और आवास खो चुके सारे श्रमिक सामूहिक आत्महत्या कर लें? क्या इसी को लोककल्याणकारी शासन कहते हैं? कोरोनावीरों को सम्मान और श्रमवीरों को मृत्युदंड? फिर क्या जरुरत है दुनिया के सबसे बड़े रेल तंत्र की?
मित्रों, बिहार जहाँ के सबसे ज्यादा मजदूर दूसरे राज्यों में फंसे हुए हैं वहां की सरकार की करतूत तो और भी शर्मनाक है. पहले बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी ने कहा कि बिहार में किसी को घुसने ही नहीं दिया जाएगा जैसे बिहार उनकी पैतृक और निजी संपत्ति हो. जब कुछ दिनों पहले केंद्र सरकार ने प्रवासी मजदूरों को घर जाने की अनुमति दे दी तब भी बिहार सरकार का रवैया निराशाजनक था. बिहार सरकार कहने लगी कि उसके पास मजदूरों को वापस लाने के लायक साधन ही नहीं है इसलिए केंद्र सरकार ट्रेनों की व्यवस्था करे. अब जब केंद्र सरकार इसके लिए भी तैयार हो गई तो उसने कुछ नंबर जारी किए और कहा कि ये नंबर उन नोडल अधिकारियों के हैं जिनसे प्रवासी मजदूरों को संपर्क करना है लेकिन उनमें से ज्यादातर नंबर बंद हैं. ऐसा संयोग है या सायास किया जा रहा है पता नहीं लेकिन सवाल उठता है कि कोई सरकार अपनी जनता के साथ ऐसा क्रूर और भद्दा मजाक कैसे कर सकती है और वह भी ऐसे लोगों के साथ जो मजदूर से मजबूर बन चुके हैं. ऐसा हमें वर्षों से ज्ञात है कि बिहार में सरकार नाम की चीज नहीं है लेकिन केंद्र सरकार गरीबों के साथ ऐसा कैसे कर सकती है? तो क्या केंद्र में भी सरकार नहीं है? और अगर सरकार है भी तो क्या वो गरीबों की सरकार नहीं है? समाचार तो इस तरह के भी प्राप्त हो रहे हैं कि जो मजदूर ट्रेनों से घर आ रहे हैं उनसे किराया वसूल रही है कांग्रेस और वामपंथियों की सरकारें. यहाँ तक कि राजस्थान से यूपी आनेवाले यात्रियों से भी ट्रेनों में चढ़ने से पहले ही राजस्थान की सरकार द्वारा किराया का पैसा ले लिया गया. हद हो गयी जिनका सबकुछ पहले ही लुट गया है वो बेचारे किराया कहाँ से देंगे? क्या भारत में अभी भी अंग्रेजों की सरकार है?

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद

मित्रों, जब इस समय पूरी दुनिया को कोरोना से लड़ना पड़ रहा है हम भारतीयों को दुर्भाग्यवश कोरोना के साथ-साथ धर्मांध जेहादियों से भी लड़ना पड़ रहा है. जगह-जगह पूरे भारत में स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों पर हमले हो रहे हैं. जो लोग बिना किसी धार्मिक भेदभाव के अपनी जान दांव पर लगाकर सबकी जान बचाने में लगे हैं उनके ऊपर पुष्पवृष्टि करने के बदले पथराव किया जा रहा है.
मित्रों, अभी-अभी दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष श्री जफरुल इस्लाम खान का एक ट्विट काफी वायरल हो रहा है जिसमें उन्होंने जाकिर नाईक नामक घृणास्पद व्यक्ति को महान बताते हुए आरोप लगाया है कि तबलीगी जमातियों को छोड़ा नहीं जा रहा है अर्थात कैदी बना लिया गया है. मैं पूछता हूँ कि जब जमाती पागल कुत्ते की तरह व्यवहार कर रहे थे तब श्री खान कहाँ थे? क्या श्री खान की नज़रों में सिर्फ मुसलमान ही मानव हैं और क्या सिर्फ उनका ही मानवाधिकार होता है? क्या दिन-रात मानवता की सेवा में लगे पुलिसकर्मी और स्वास्थ्यकर्मी उनकी नज़र में मानव नहीं हैं? मैं श्री खान से पूछना चाहता हूँ कि उनके कृत्यों को देखते हुए क्या उनको खुला छोड़ना देश और समाज के लिए खतरनाक नहीं होगा? क्या इन जमातियों की मानसिक हालत ठीक है?
मित्रों, इतना ही नहीं श्री खान भारतवर्ष को अरब देशों का नाम लेकर धमकी दे रहे हैं कि जब अरब देशों तक यह समाचार पहुंचेगा कि जमातियों को कैद कर लिया गया है तब भारत में सैलाब आ जाएगा. वाह खान साहब रहना-खाना भारत में और भक्ति अरब देशों की. अरब देशों ने तो खुद ही तब्लिगियों पर पाबन्दी लगा रखी है फिर वे क्यों भारत से उलझेंगे? और अगर उलझ भी गए तो भारत का क्या बिगाड़ लेंगे? इस समय तो तेल के गिरते दाम ने खुद उनका ही दम निकाला हुआ है.
मित्रों, सवाल उठता है कि श्री खान जैसे पढ़े-लिखे लोग कैसे धर्मांध और जेहादी हो सकते हैं? सांप के तो सिर्फ एक या दो दांतों में जहर होता है इनके तो दिमाग में ही जहर है. उस पर भारत के धर्मनिरपेक्षतावादी नेता इनको लगातार तुष्टीकरण का दूध पिला रहे हैं. जबकि सच्चाई तो यह है कि पयःपानं हि भुजन्गानाम केवलं विषवर्द्धनम. तुष्टीकरण से याद आया कि जर्मनी में हिटलर ने आज से ठीक सौ साल पहले राजनीति में प्रवेश किया था. आरम्भ में हिटलर ने साम्यवादियों को कुचलना शुरू किया और तब इंग्लैण्ड और फ़्रांस ने उसकी खूब मदद की और तभी इस तुष्टीकरण का अत्यंत घृणित स्वरुप देखने को मिला. लेकिन जब हिटलर ने इंग्लैंड और फ़्रांस के मित्र देशों पर भी हमला करना और उनको अधिकृत करना शुरू कर दिया तब तुष्टीकरण करनेवाले मित्र राष्ट्रों के होश उड़ गए और अंततः द्वितीय विश्वयुद्ध के चलते दुनिया और मानवता को भारी नुकसान उठाना पड़ा.
मित्रों, कहने का तात्पर्य यह है कि तुष्टिकरण किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकता अलबत्ता उसे बढ़ा जरूर सकता है. हम दिन-रात ऊं द्यौ शांति, अंतरिक्ष शांति पढ़ रहे हैं. पढना भी चाहिए लेकिन क्या सामनेवाले के मन में भी यही भाव हैं?  हमने तो नफरत करना सीखा ही नहीं और सिर्फ प्रेम के ढाई अक्षर जानते हैं लेकिन क्या सामनेवाले ने भी प्रेम का ढाई आखर पढ़ा है या उसके मन में सिर्फ नफरत का जहर है. नफरत एकतरफा हो सकती है प्रेम तो एकतरफ़ा हो ही नहीं सकता. ऐसा नहीं है कि उनमें प्रेम करनेवाले बिलकुल हुए ही न हों-दरिया साहब, रहीम, रसखान, यारी साहब, खुसरो, ताज, नज़ीर, कारे खान, करीम बख्श, इन्शा, बाजिंद, बुल्लेशाह, आदिल, मक़सूद, मौजदीन, वाहिद, दीन दरवेश, अफ़सोस, काजिम, खालस, वहजन, लतीफ़ हुसैन, मंसूर, यकरंग, कायम, फरहत, काजी अशरफ महमूद, आलम, तालिबशाह, महबूब, नफीस खलीली, सैयद कासिम अली और निजामुद्दीन औलिया जैसे अनगिनत ऐसे प्रेमी हुए हैं जो कबीर की तरह दिन-रात गाते फिरते थे
हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या? 
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या? 
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते, 
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या? 
इन मुस्लिम राम-कृष्ण के भक्तों के लिए एक समय श्री भारतेंदु हरिशचंद्र जी ने कहा था कि- ‘इन मुसलमान हरिजनन पै कोटिन हिन्दुन वारिये.’
मित्रों, सवाल उठता है कि जिस निजामुद्दीन औलिया ने पूरी दुनिया को खालिस इश्क का सन्देश दिया आज उनकी ही दरगाह पर तबलीग का आयोजन कर नफरत की शिक्षा दी जाती है? इश्क यानि प्रेम भगवान द्वारा प्राणिमात्र को प्रदत्त सबसे अमूल्य धन है फिर हम शैतान के सबसे बड़े अवगुण नफरत को क्यों गले लगा रहे हैं? आखिर क्या मिल जाएगा खाद्य पदार्थों में थूकने से, पेशाब करने से या लैट्रिन मिला देने से? ऐसा करने वालों को लगता है कि वे ऐसा करके दूसरों का धर्म भ्रष्ट कर देंगे लेकिन धर्म तो खुद इनका भ्रष्ट हो रहा है और बदनाम भी हो रहा है। हम जानते हैं कि मुसलमान हिटलर से नफ़रत करते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि जो भी समाज सर्वधर्मसमभाव, सहअस्तित्व और सहिष्णुता की नीति पर नहीं चलता वो समाज हिटलरों का समाज है। क्या भारत के मुसलमान सुंदर-सुभूमि भारत को पाकिस्तान बनाना चाहते हैं जहां कोरोना जैसी विषम परिस्थिति में भी हिंदुओं के साथ भेदभाव किया जा रहा है? क्या यही इस्लाम है? क्या यह धर्म है? फिर अधर्म क्या है? दूर सीरिया और पाकिस्तान को छोड़िए हमारे बगल के शहर पटना में सन्नी गुप्ता की सिर्फ इसलिए एक मुसलमान ने हत्या कर दी क्योंकि उसने कोरोनावीरों के साथ उनके द्वारा किए जा रहे दुर्व्यवहार का विरोध किया था. इतना ही नहीं उसकी शवयात्रा पर मुस्लिमों की भीड़ द्वारा पत्थरबाजी भी की गई जबकि शवयात्रा में शामिल महिलाएँ तक हाथ जोड़कर उनसे ऐसा न करने का निवेदन कर रही थीं. बाद में सन्नी गुप्ता के परिजनों ने मुस्लिमबहुल इलाके में स्थित अपने घर पर यह मकान बिकाऊ है का बोर्ड लगा दिया. क्या यही धर्म है? विश्वास नहीं होता कि यही मुसलमान साल में पूरे एक महीने तक हज़रत इमाम हुसैन और उनके परिजनों के साथ हुई क्रूरता और अत्याचार की याद में शोक मनाते हैं. तुलसी कहते हैं-परहित सरिस धरम नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई. फिर किसी पंथ या मजहब में परोपकार के स्थान पर परपीड़ा कैसे महान पुण्य का करणीय कार्य हो सकता है.
मित्रों, इस आलेख का अंत हम महान शायर व भारतमाता के महान बेटे मिर्ज़ा असदुल्लाह खान ग़ालिब की इन पंक्तियों से करना चाहेंगे-
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है.

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

भारत को चाहिए विकास का नया मॉडल


मित्रों, भारत जब आजाद हुआ तब देश के समक्ष बड़ी महती समस्याएँ थीं. सबसे बड़ा सवाल जो भारत के नीति निर्माताओं के लिए परेशानी का सबब बना हुआ था वो यह था कि भारत को कौन-सा विकास मॉडल चुनना चाहिए. उस समय दुनिया में दो तरह की अर्थव्यवस्था थी-अमेरिका वाली पूंजीवादी और सोवियत संघ वाली समाजवादी. चूंकि नेहरु भारत को गुटनिरपेक्ष दिखाना चाहते थे इसलिए उन्होंने दोनों में से थोड़े-थोड़े गुणों को समाहित करते हुए मिश्रित अर्थव्यवस्था का चयन किया. देखते-देखते गाँव और शहर दोनों बदलने लगे. पशुधन आधारित कृषि का तीव्र यंत्रीकरण कर दिया गया और उसको हरित क्रांति का नाम दिया गया.

मित्रों, उधर शहरों में बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना भी की जा रही थी जिनमें बड़े पैमाने पर श्रम की आवश्यकता थी. अब गाँव के मजदूरों के पास एक विकल्प उपलब्ध था जिससे गांवों से देश के पश्चिमी, उत्तरी और दक्षिणी भागों की तरफ पलायन शुरू हुआ. कांग्रेस की किराया समानीकरण की नीति के चलते खनिज उत्पादक राज्य मुंह देखते रह गए और कालांतर में मजदूरों के आपूर्तिकर्ता मात्र बनकर रह गए. उधर गांवों में सिर्फ गेंहू और धान के उत्पादन को बढ़ावा देने से कृषि से विविधता समाप्त हो गयी और मोटे अनाजों की खेती लगभग बंद हो गयी.

मित्रों, सदियों से हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था एक बंद अर्थव्यवस्था थी. ग्रामीणों की जरुरत की सामग्री गांवों में ही उत्पादित की जाती थी जिससे प्रत्येक गाँव अपने-आपमें आत्मनिर्भर था. तब लोगों की जरूरतें भी कम थीं. लेकिन १९४७ के बाद गांवों की अर्थव्यवस्था को बंद से खुली अर्थव्यवस्था में बदल दिया गया और वो भी जबर्दस्ती. अब गाँव के लोगों को कृषि के लिए रासायनिक खाद और कीटनाशकों की जरुरत पड़ने लगी जिनका उत्पादन बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ बड़े-बड़े शहरों में करती थीं. प्रमाणित व संकर किस्म के बीजों का प्रचालन बढाया गया जिससे भोजन से स्वाद गायब हो गया साथ ही पौष्टिकता पर भी असर पड़ा.

मित्रों, १९९० में सोवियत संघ के विघटन के बाद अचानक पूरी दुनिया में पूंजीवाद और निजीकरण ने जोर पकड़ा साथ ही उपभोक्तावाद ने भी. भारत भी इससे अछूता नहीं रहा और शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकारी व्यय में समय के साथ कमी आती गयी. इसका असर यह हुआ कि सरकारी स्कूलों में पढाई का स्तर गिरने लगा जिससे गाँव के लोग मजबूरी में आस-पास के शहरों में बसने लगे और शहरीकरण काफी तेज हो गया.

मित्रों, इन सभी कारणों से गांवों में एक तरफ मजदूरों तो दूसरी तरफ किसानों की संख्या घटती गयी और गांवों के घरों में ताले लटकने लगे. मगर जैसे ही कोरोना महामारी के चलते देश में लॉक डाउन करना पड़ा पूरा विकास मॉडल चरमरा गया. भारी संख्या में मजदूर अपने घरों से हजारों किमी दूर फंस गए. उनकी हालत ऐसी हो गई है कि वे अपने कार्यस्थलों पर न तो रह सकते हैं और न ही अपने घर ही जा सकते हैं. अगर इन मजदूरों को अपने घरों के आस-पास ही काम मिल गया होता तो इनको अपने गांवों से बाहर निकलना ही नहीं पड़ता. कहने का तात्पर्य यह है कि भारत सरकार को अब उद्योगों का भी विकेंद्रीकरण करना होगा जिससे सिर्फ क्षेत्र विशेष में उद्योगों का जमघट न हो और कोरोना महामारी जैसी परिस्थितियों में मजदूर घर से बहुत दूर फंस न जाएँ. हालाँकि अब कृषि में सौ-पचास साल पहले वाला समय नहीं लौटाया जा सकता है क्योंकि मनुष्य मूलतः सुविधाभोगी होता है लेकिन कृषि आधारित लघु और माध्यम उद्योगों को स्थापित कर गांवों को आत्मनिर्भर जरूर बनाया जा सकता है इसके लिए उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर जिले का अनुकरण किया जा सकता है. साथ ही बढती जनसंख्या को भी रोकना होगा.

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

पालघर जहां पर खून गिरे संतन के

मित्रों, प्रसंग महाभारत से है. पांडव अज्ञातवास में थे. विराट युद्ध के पश्चात् राजा विराट के महल में सूचना आती है कि राजकुमार उत्तर ने अकेले ही देवताओं के लिए भी अपराजेय कौरव सेना को परास्त कर दिया है और राजमहल वापस आ रहे हैं. ख़ुशी के मारे राजा विराट पूरे राज्य में दिवाली मनाने का आदेश देते हैं और अंपने दरबारी कंक जो वास्तव में महाराज युधिष्ठिर हैं के साथ जुआ खेलने बैठ जाते हैं. इस दौरान एक तरफ राजा विराट बार-बार अपने पुत्र की बडाई करते हैं वहीँ दूसरी ओर कंक बार-बार बृहन्नला जो वास्तव में महारथी अर्जुन हैं की तारीफ करते हैं. जब ऐसा बार-बार होता है तब राजा विराट खीज में आकर कंक के मुंह पर जुए का पासा दे मारते हैं जिससे युधिष्ठिर के होठों से रक्तस्राव होने लगता है. यह देखकर सैरेन्ध्री अर्थात महारानी द्रौपदी स्वर्णपात्र में टपकते हुए खून को जमा करने लगती है. फिर तो राजा विराट सैरेन्ध्री पर भी नाराज हो उठते हैं और कहते हैं कि वो यह क्या कर रही है. तब सैरेन्ध्री उत्तर में कहती है कि यह खून ऐसे संत का है कि इसकी जितनी बूँदें आपके राज्य की धरती पर गिरेंगी उतने वर्षों तक राज्य में अकाल रहेगा.
मित्रों, फिर पालघर, महाराष्ट्र में तो निर्दोष संतों की हत्या हुई है. जिस इन्सान ने भी उनकी हत्या के वीडियो को देखा है मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि उनका ह्रदय इस समय रो रहा होगा. क्षमा करें मैं यहां केवल इंसानों की बात कर रहा हूं। वे निरीह बार-बार भीड़ के समक्ष हाथ जोड़ रहे थे लेकिन भीड़ उन पर ताबड़तोड़ लाठियां बरसा रही थीं जैसे वह भीड़ इंसानों की नहीं रक्तपिपासु भेड़ियों की हो. सबसे बड़ा अपराध तो उन पुलिसवालों का था जिन्होंने उनको ले जाकर स्वयं अपने हाथों से खूनी भीड़ के हवाले कर दिया. ७० साल का लाचार वृद्ध बार-बार पुलिसवाले की कमीज और हाथ पकड़ रहा था इस उम्मीद में कि वो उनको बचा लेगा लेकिन पुलिसवाला बार-बार उसके हाथों को झटक दे रहा था. क्या यही है क़ानून के लम्बे हाथ? हत्या के बाद जब पुलिसवालों ने अपने उच्चाधिकारियों को घटना के बारे में बताया तो उन्होंने इसे सड़क दुर्घटना बताकर मामले को रफा-दफा करने की पूरी तैयारी कर ली. लेकिन भीड़ मे से किसी व्यक्ति ने इस भयानक हत्याकांड का वीडियो बना लिया था जिसे उसने कल घटना के चार दिनों के बाद वायरल कर दिया. इसके बाद भी वहां की सरकार मीडिया पर ही डंडा चलाती हुई दिखी और गिरफ्तार हत्यारों के नाम तक नहीं बताए. शायद इससे उन महामानवों का मानवाधिकार संकट में आ जाता. फिर भी जो ख़बरें छन कर आ रही हैं उनके अनुसार शैतानों की भीड़ में सत्तारूढ़ एनसीपी और सीपीएम के नेता मौजूद थे और उनके ही निर्देशन में इस पूरे घटनाक्रम को अंजाम दिया गया.
मित्रों, सूचना आ रही है हत्यारों को गिरफ्तार कर लिया गया है और पुलिसवालों को निलंबित कर दिया गया है. लेकिन क्या इतनी कार्रवाई काफी है अपराध की जघन्यता को देखते हुए? फिर पुलिस ने ९ हत्यारों को नाबालिग बताते हुए सुधार गृह में भेज दिया है. सवाल उठता है कि जो हत्या जैसा
नृशंस अपराध कर सकता है वो बच्चा कैसे हो सकता है? इस घटना में शामिल सभी लोगों और पुलिसवालों को सीधे फांसी होनी चाहिए और वो भी त्वरित गति न्यायालय में मुकदमा चलाकर हफ्ते-दो-हफ्ते के भीतर.
मित्रों, आपको क्या लगता है यह किसकी हत्या है? क्या यह इंसानियत की हत्या नहीं है? क्या यह जनता के पुलिस-प्रशासन पर कायम विश्वास की हत्या नहीं है? क्या उन संतों की कार से कोई बच्चा बरामद हुआ था? फिर क्यों उनको पीट-पीट कर मार दिया गया? महाराष्ट्र की सरकार का बंटाधार होना तो तय है क्योंकि उसके शासन में संतों की हत्या हुई है लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार हत्यारों के नाम क्यों उजागर नहीं कर रही? माना कि ९ नाबालिग हैं लेकिन सबके-सब नाबालिग तो नहीं हैं? फिर यह पर्देदारी क्यों? आखिर क्या छुपाना चाह रही है सोनियासेना सरकार?
मित्रों, अंत में मैं आप सबसे विनती करना चाहूंगा कि इन संतों की हत्या की तुलना किसी गो तस्करी या गो हत्या जैसे अक्षम्य अपराध में संलिप्त राक्षस के वध से न करें। जैव वैज्ञानिक दृष्टि से मानव तो निर्भया के अपराधी भी थे।

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

नित नूतन सतीश नूतन की कविता


मित्रों, कभी-कभी किसी-किसी को जीवन में वो सब मिल जाता है जिसका वो हक़दार नहीं होता और कभी-कभी किसी-किसी को इसके उलट वो सब नहीं मिल पाता जिसका वो हक़दार होता है. हाजीपुर के महाकवि स्वर्गीय हरिहर प्रसाद चौधरी नूतन के सुपुत्र सतीश नूतन इसी दूसरी श्रेणी में आते हैं. सम्प्रति हाजीपुर के टाउन हाई स्कूल में क्लर्क सतीश जी उन कोमल भावनाओं के कवि हैं जो बढती प्रच्छन्नताओं के कारण हमारे जीवन से लुप्तप्राय हो चुकी हैं. उनकी कविताओं में आप बच्चों के निश्छल बचपन को महसूस करेंगे, गरीबों की मजबूरी भी देखने को मिलेगी, देशभक्ति के स्वर भी देखने को मिलेंगे और गंगा जल जैसी पवित्रता के साथ श्रृंगार रस भी. नूतन जी की कविताओं में आपको अक्सर हाजीपुर की स्थानीय भाषा बज्जिका के शब्दों का सौन्दर्य देखने को मिलेगा जैसे फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यासों में पूर्णिया की मिटटी की पहली बरसात की सोंधी-सोंधी खुशबू मिलती थी. तो आप मित्रगण भी आनंद लीजिए नूतन जी की सबसे नई कविता का जिसमें उन्होंने कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि में परदेश से बिहार लौटे मजदूर की व्यथा का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है-
क्वारंटाइन केन्द्र के एक मजदूर की व्यथा 

आया था ई सोच के दिल्ली
खूब कमाऊंगा
कम ही खाऊंगा
ज्यादा से ज्यादा बच पाए
जुगत लगाऊंगा
ठेकेदार, सेठ कहे तो
छुट्टी पाऊंगा
देगा जो सौगात उसे ढो
घर ले जाऊंगा
चमक-दमक दिखलाकर दिल्ली
हिरदय बीच बिठाया
रोटी, चावल, घुघनी परसा
लगा की सुख की हो गई वर्षा
आठ बजे तो
भोंपू लेकर
पहुंचे पंथ प्रधान!
किया बड़ा ऐलान-
इधर-उधर क रो ना
अपने बिल में घुस
कुछ ही दिनों में
ईहो विपदा
हो जायेगा फुस्स
सुबह हाथ में लट्ठ लिए
आया मेरा रखवाला
होकर बिल्कुल मतवाला
बोला-
जाओ अपने देस पूरबिये
जाओ अपने देस
तुम्हारा कुछ भी यहाँ न शेष
तथाकथित दिलवालों का
ई बोल सूनते भइया
याद आ गई मइया
खूंटे पे रंभाती गइया
गोर पकड़ कर
विनत भाव से पूछा-
साहब!
रुका हुआ है पहिया,
पैदल पहुँचेंगे कहिया?
ऊ स हम न जानें
अब तू हो बेगाने
भाग
भाग मजूरे भाग
आया है बड़ा व्याधि
मरोगे
आधाआधी
जिस दिल्ली को चिक्कन कीया
आफत में ऊ छीना ठीया
चकाचौंध की लाठी खाकर
दिखा गाँव का लुकझुक दीआ
खुद से ठोका नाल पांव में
उट्ठक बइठक
सोंटा खाते
पहुँचा तब जा अपन गाँव में
टाट लगाए
मुख्य सड़क सरपंच खड़ा था
पगडंडी पर कांट बिछा कर पंच खड़ा था
क्वारंनटाइन के लिए कटा चालान बाप रे!
बाबा ने समझाया
ढाढस खूब बंधाया
जब कह देंगे डागदर बाबू
तुम हो पूरे टंच
तो घर आना भगवंत
सही समय पर जांच करा ले
इस छुतहर को दूर हटा ले