शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

टूटते-बिखरते परिवार


भारत के दो महाकाव्य सबसे प्रसिद्द रहे हैं-रामायण और महाभारत.कहना न होगा भारतीय संस्कृति पर इन दो महान ग्रंथों का जितना प्रभाव पड़ा है अन्य किसी पुस्तक का नहीं. एक में चारों भाई अपने दूसरे भाइयों के लिए बड़े-से-बड़ा त्याग करने को लालायित रहते हैं तो दूसरे में एक भाई के पुत्र किसी भी कीमत पर दूसरे भाई के पुत्रों को पैत्रिक संपत्ति पर अधिकार देने को तैयार नहीं है.कहने का अर्थ यह कि परिवार में टूटन की बीमारी महाभारत काल में भी मौजूद थी लेकिन आपवादिक रूप में. वर्तमान परिवेश को अगर देखें तो भारतीय समाज संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक तो आ ही चुका है अब व्यक्तिवाद की ओर भी चल पड़ा है. अब प्रत्येक व्यक्ति की अपनी निजी जिंदगी है वो चाहे जैसे जिए. माँ-बाप उसमें हस्तक्षेप करने के अधिकारी नहीं हैं.स्थिति ऐसी हो गई है कि कई-कई पुत्र-पुत्रियों का लालन-पालन करनेवाले माता-पिता ज़िन्दगी की शाम में खुद को ठगा, तनहा और टूटा हुआ महसूस करते हैं.आये दिन दिल्ली में वृद्ध दम्पति की चोरों-डकैतों द्वारा हत्या कर लूट लेने के मामले सामने आ रहे हैं. माता-पिता दिल्ली में और बच्चे यूरोप-अमेरिका में. सर्वथा नई प्रवृत्ति, जो भारतीय वांग्मय के लिए हमेशा अजनबी थी.हम भारतीयों को तो अपनी परिवार संस्था पर बहुत नाज था. फ़िर अचानक ये कौन सी हवा चली कि शमां ही बदल गई.आज हर भारतीय के समक्ष दुविधा है कि परिवार के लिए त्याग किया जाये कि परिवार को ही त्याग दिया जाये.मैं मानता हूँ कि पैसा जरूरी है लेकिन जब अपनों का साथ ही नहीं होगा तो पैसा लेकर हम क्या करेंगे? पैसा भी तभी सुख देगा जब हमारे अपने हमारे साथ हों.

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

मांझी जब नाव डुबोये तो उसे कौन बचाए


मेरा गाँव राघोपुर दियारे में पड़ता है. मुझे अक्सर नाव की सवारी करनी पड़ती है. मुझे तैरना नहीं आता. ऐसी भी बात नहीं है कि मैंने सीखने की कोशिश नहीं की लेकिन सफल नहीं हुआ. शायद मेरे प्रयास में ही कोई कमी रह गयी.तो मैं बात कर रहा था नाव से गंगा पर करने की.क्योंकि मुझे तैरना नहीं आता मैं पूरी तरह नाविक पर निर्भर रहता हूँ और मुझे विश्वास रहता है मांझी पर कि वह दुर्घटना की अवस्था में भी मुझे डूबने नहीं देगा. अब आप कल्पना करें कि किसी नाव को मांझी ही डूबाने पर उतारू हो जाये तब मेरा क्या होगा?कुछ ऐसी ही स्थिति हमारे देश की जनता की है. देश की नाव की पतवार इस समय है कांग्रेस पार्टी के हाथों में. महंगाई से जनता के हाथ-पांव फूल रहे हैं और कांग्रेस महंगाई को कम करने के बजाये बढ़ाने में जुटी है.पहले दिल्ली में बिजली को महंगा किया गया फ़िर बस का किराया बढा दिया गया और अब मेट्रो का किराया भी बढा दिया गया.इसी बीच भारत सरकार नियंत्रित मदर डेयरी ने दूध का दाम बढा दिया. वित्त मंत्री को चिंता है कि बजट घाटा को कैसे सीमा में रखा जाये.जबकि अमेरिका जैसा धनी देश मंदी के चलते घाटे की परवा किये बिना जनहित में लगातार कदम पर कदम उठाता जा रहा है. यही अंतर है अमेरिका और भारत के नेताओं में.हमारे यहाँ एक तरफ मंदी चल रही है तो दूसरी तरफ महंगाई यानि कोढ़ में खाज.क्या बजट घाटा जनता से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है? एक तरफ तो बड़े-बड़े उद्योगों को अरबों रूपये की सहायता दी जा रही है और दूसरी ओर इसके चलते बढ़ते घाटे को गरीब जनता के पैसों से पूरा करने की जुगत भिडाई जा रही है.इसे अगर आम लोगों की सरकार न कहें तो फ़िर किसे कहें! सरकार को अमेरिका से सीख लेने की जरूरत है कि कैसे मंदी से लड़ा जाता है.१९२९ से भी और २००८-०९ से भी. सरकार को सार्वजनिक व्यय बढ़ाना चाहिए, न कि खर्च कम करके बजट घाटे को कम करने की कोशिश.खर्च कम करना ही है तो मंत्री अपना खर्च कम करें आम आदमी की तरह ज़िन्दगी जीकर. गाँधी तो थर्ड क्लास डिब्बे में चलते थे और उन्हीं की विरासत सँभालने का दावा करनेवाली पार्टी के मंत्री १-१ लाख रूपए प्रतिदिन भाड़ावाले कमरों में रहते हैं और एसी वाले महलों में बैठकर योजना बनाते हैं घाटा कम करने की और महंगाई बढ़ाने की.

बुधवार, 11 नवंबर 2009

सूचना के अधिकार को बेअसर करने की बिहार सरकार की साजिश

सूचना का अधिकार,२००५ भारत के इतिहास में ऐसा पहला कानून है जिसके तहत प्रशासन को निर्धारित समयसीमा के भीतर काम पूरा करने के लिए जवाबदेह बनाने की कोशिश की गयी है.इसके द्वारा अफसरों-कर्मचारियों को एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर सूचना देने को बाध्य किया गया है.अब तक बहुत-से अफसर-कर्मचारियों पर जुरमाना भी लगाया गया है. शुरू में तो सबकुछ ठीक रहा लेकिन बहुत जल्दी जब राजनेताओं के प्यारे नजदीकी अफसरों को भी इसने अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया तब वे ढूँढने लगे जनता के हाथ लगे इस बहुमूल्य हथियार को भोथरा बनाने का उपाय. केंद्र सरकार इस दिशा में पहले ही दो बार कोशिश कर चुकी है, लेकिन असफल रही है भारी विरोध के कारण. अब बारी है बिहार सरकार की जो इस मुद्दे पर अपनी सफलता का ढोल पीटती फ़िर रही है.बिहार सरकार अधिनियम में इस तरह से  संशोधन की योजना बना रही है जिससे कि एक आवेदन पर अब एक ही सूचना मांगी जा सके. इसका परिणाम यह होगा कि इस अधिनियम की जान ही निकल जायेगी और यह अधिकार बस नाम का ही रह जायेगा. दूसरे शब्दों में अगर हम कहें कि क्या केंद्र और क्या राज्य सरकार दोनों इस महत्वपूर्ण अधिकार को शांतिपूर्ण मौत देने की फिराक में है. किसी एक मुद्दे पर सम्पूर्ता में सूचना चाहिए तो फ़िर भेजो १०-१५ आवेदन. किसके पास इतना पैसा होगा कि वह १००-१५० रूपये खर्च करेगा? बिहार सरकार ने पहले से ही अपील पर ५० रूपये का शुल्क लगा रखा है और बिडम्बना तो यह है कि अधिकतर बिहारी जनता को पता तक नहीं है कि अपील के आवेदन के साथ ५० रूपये का पोस्टल आर्डर भी भेजना है. परिणाम यह होता है कि लोग आवेदन को बिना शुल्क के भेज देते हैं और अपील ऐसे ही जाया हो जाती है.ऐसा खुद मेरे साथ भी हो चूका है.दूसरी ओर खुद बिहार सरकार भी नहीं चाहती कि जनता को इस बात का पता चले तभी तो आरटीआई सम्बन्धी बिहार सरकार की किसी भी होर्डिंग या विज्ञापन में आज तक इस तथ्य का जिक्र तक नहीं किया गया. कम-से-कम मैंने तो ऐसा ही पाया है.दूसरी ओर बिहार सरकार बार-बार दावे कर रही है कि इतने आवेदनों का निष्पादन किया गया या इतने लोगों ने सूचना प्राप्त की. अब सरकारी दावे का स्रोत क्या है ये तो वही जाने मुझे तो अपने एक दर्जन आरटीआई आवेदनों में से किसी में भी अपेक्षित सूचना प्राप्त  नहीं हुई. दो मामलों में तो सूचना के एवज में मुझसे क्रमशः ३४४४६ और ७२८० रूपये की मांग भी की गई.आरटीआई को लेकर राज्य सरकार कितनी गंभीर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक लम्बे अरसे से बिहार के मुख्य सूचना आयुक्त का पद खाली था और पटना उच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही इस पद को भरा गया. तब तक लंबित आवेदनों का अम्बार लग गया था और सरकार कान में तेल डाल कर पड़ी थी.खुद नवनियुक्त मुख्य सूचना आयुक्त के अनुसार इन १०००० मामलों के निबटने में ही कम-से-कम छह महीने लगनेवाले हैं.

लोकतान्त्रिक सोंच नहीं रखते भारतीय


भारत को आजादी मिले ६२ साल हो गए. एक देश के विकास की हिसाब से यह कालखंड भले ही ज्यादा लगता हो, लोकतंत्र के विकास की लिहाज से यह बहुत कम है.भारत के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े लोकतंत्र अमेरिका को अगर हम लें तो उसका लोकतान्त्रिक इतिहास सवा दो सौ साल से भी ज्यादा का है और इंग्लैंड का तो इससे भी कहीं ज्यादा का.भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि यहाँ सत्ता बल-प्रयोग के द्वारा नहीं मतदान द्वारा बदलती रही है.६२ सालों की इस यात्रा में भारतीय लोकतंत्र की कई कमजोरियां समय-समय पर उजागर होती रहीं हैं और स्वतः जनता द्वारा मत-प्रयोग के माध्यम से दूर भी होती रही हैं.इस दौरान एक कमजोरी बार-बार लोकतंत्र पर हावी होती दिखाई देती है.वह सबसे बड़ी कमजोरी है-हमारे भीतर लोकतान्त्रिक सोंच या मानसिकता का अभाव.हम आज भी राजतान्त्रिक सोंच रखते हैं. राजतन्त्र का सबसे बड़ा गुण है उत्तराधिकार का नियम. हमारे अधिकतर जनप्रतिनिधि ऐसे हैं जिनके माता-पिता कभी-न-कभी राजनीति में थे. एक अध्ययन के अनुसार हमारे देश की राजनीति को मात्र साढ़े पॉँच हजार परिवार संचालित कर रहे है.भारतीय जनता क्यों एक ही परिवार के उत्तराधिकारी को मत देकर जिता रही है? क्या बार-बार ऐसा करना भारतीय जनता की प्रजातान्त्रिक सोंच या मानसिकता को दर्शाता है?एक तरफ उत्तराधिकार की लम्बी परंपरा को धारण करनेवाली कांग्रेस पार्टी सत्ता में है और दिन-ब-दिन मजबूत होती जा रही है तो दूसरी ओर लोकतान्त्रिक गुणों को ज्यादा प्रखरता से धारण करनेवाली भाजपा पतन की ओर अग्रसर है. पूरा भारत राहुल गाँधी को सत्ता सौंपने के लिए क्यों व्याकुल हो रहा है? क्या भारत में योग्य राजनेताओं का अकाल पड़ गया है? राहुल ने अब तक ऐसा कोई भी काम नहीं किया है जिससे उन्हें सबसे योग्य कहा या माना जा सके. लगता है कि भारतीय जनता संभावनाओं के पीछे उसी तरह पागल है जैसे नोबेल पुरस्कार समिति ओबामा के पीछे पागल थी.दलितों के घर एक-दो बार ठहर लेने या भोजन कर लेने मात्र से वे प्रधानमंत्री पद अधिकारी हो गए ऐसा कैसे माना जा सकता है. फ़िर तो ऐसे हजारों सवर्ण नेताओं को खोजा जा सकता है जो बराबर दलितों के यहाँ ठहरते और भोजन करते हैं तो क्या ऐसा करनेवाले वे सभी जनप्रतिनिधि ऐसा करने मात्र से प्रधानमंत्री पद के योग्य हो गए! या फ़िर राहुल जी उस नेहरू-गाँधी परिवार में जन्म लेने के कारण इस पद के अधिकारी हो गए जिनकी गलतियों के कारण भारत को हजारों वर्गकिलोमीटर भूमि से हाथ धोना पड़ा और निकट भविष्य में उसकी वापसी की भी उम्मीद नहीं है.रामचरितमानस में तुलसी ने कहा है-सब सुभ काज भारत के हाथा. लोकतंत्र में जनता ही राम है और जनता ही भरत. करना बस इतना है कि मत डालते समय यह ख्याल रखें कि किसको जिताना देशहित में है. हो सकता है कि हमारे जातीय या सांप्रदायिक स्वार्थ अलग-अलग हों लेकिन देश तो हमारा एक ही है, सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान. इसलिए हमारा देशहित अलग नहीं हो सकता. बस यही हम नहीं कर पाते हैं और तात्कालिक लाभ के चक्कर में पड़ जाते हैं.लेकिन बाद में उससे कई गुना भ्रष्टाचार के माध्यम से हमारी जेबों से खींच लिए जाते हैं. भ्रष्ट लोगों को जिताने का भला और क्या परिणाम हो सकता है?

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

क्या इसे कहते हैं कानून का राज!


भारत में भारतीय संविधान के अनुसार शासन चलता है, कानून का शासन.संविधान के भाग तीन के अनुच्छेद १४, १५ और १६ के अनुसार भारत का हर नागरिक कानून के समक्ष एकसमान है. भारत के नागरिकों में धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी भी तरह का विभेद नहीं किया जायेगा. साथ ही संविधान ने अपने नागरिकों के लिए लोक नियोजन में अवसर के मामले में भी समानता प्रदान की है.लेकिन संविधान निर्माताओं ने इन अनुच्छेदों को तैयार करते समय एक गलती कर दी. उन्हें यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना चाहिए था कि धन के और प्रास्थिति यानि स्टेटस के आधार कर भी संविधान विभेद नहीं करेगा.अब इसे आप न्यायपालिका पर आरोप कहिये या कुछ और मैं पूछता हूँ कि आम आदमी के मामले में सफलतापूर्वक काम करनेवाले न्यायतंत्र को तब क्यों लकवा मर जाता है जब कोई खास आदमी कानून का उल्लंघन करता पाया जाता है? मनु शर्मा को दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के आदेश से पिता के चुनाव से ऐन पहले पैरोल पर रिहा कर दिया गया. बाद में पाया गया कि जेसिकालाल की हत्या का यह आरोपी दिल्ली के क्लबों में गुलछर्रे उड़ा रहा था. क्या दिल्ली की मुख्यमंत्री किसी आम नागरिक को उसकी स्वस्थ मां की देखभाल के लिए या फ़िर डेढ़ साल पहले मर चुकी दादी के संस्कार में शामिल होने के लिए पैरोल पर रिहा करने की अनुमति देतीं? नहीं कदापि नहीं! क्या यही है कानून के समक्ष समानता? क्या इसी तरह कानून का पालन कराया जाता है? हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि मनु शर्मा पर एक नाईट क्लब में हत्या का आरोप है.फ़िर वह नाईट क्लब में कैसे पहुँच गया? पैरोल के दौरान उस पर नज़र रखने की जिम्मेवारी किसकी थी और उसने क्यों और किन परिस्थितियों में अपने कर्तव्यपालन में कोताही बरती?अभी कुछ ही दिन पहले न्यायपालिका ने बोफोर्स मामले में कुँतरोची को बरी करने के खिलाफ की गई अपील पर सुनवाई को पांच महीने के लिया टाल दी.न्यायपालिका कैसे सरकार के आगे लाचार हो गयी और कुँतरोची बरी हो गया सबके सामने है. क्यों आज तक भ्रष्टाचार के किसी भी मामले में किसी भी राजनेता को सजा नहीं हुई? जो खादी कभी सच्चाई का प्रतीक थी वही खादी क्यों भ्रष्टाचारियों के लिए कवच बन गयी है? स्थितियां कब बदलेगी और कैसे? मेरे पास आज सिर्फ सवाल ही सवाल है. जवाब शायद आज किसी के भी पास नहीं हो.लेकिन कुछ तो किया ही जा सकता है.

शनिवार, 7 नवंबर 2009

जो बार-बार गलतियाँ दोहराए उसे कांग्रेस कहते हैं

जब मैं मध्य विद्यालय में पढता था तब मेरे गुरु परमपूज्य श्रीराम सिंह एक कहावत दोहराया करते थे-जो कभी गलती करे ही नहीं उसे भगवान कहते हैं, जो एक गलती को सिर्फ एक बार करे अर्थात उसे दोहराए नहीं उसे इन्सान कहते हैं और जो एक ही गलती को बार-बार करे उसे शैतान कहते हैं. लेकिन यहाँ शैतान से मेरा मतलब किसी आदमी से नहीं है बल्कि एक राजनीतिक पार्टी से है.वह पार्टी है कांग्रेस जो भारत की सबसे पुरानी पार्टी भी है.बहुत पहले १९१६ में इसने मुस्लिम लीग से लखनऊ समझौता किया था और उसे मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था मान लेने की गलती की थी जिसकी परिणति भारत के विभाजन के रूप में हुई. बाद में नेहरु की गलतियों के कारण हमें पहले पाकिस्तान और फ़िर चीन के सामने मुंह की खानी पड़ी और हजारों वर्ग किलोमीटर भूमि से हाथ भी धोना पड़ा. कश्मीर में आज भी अलगाववादी हिंसा जारी है.गलतियाँ करने में उनकी बेटी भी कहाँ पीछे रहनेवाली थी. इंदिराजी ने भी पंजाब में अकाली दल की बुद्धि ठिकाने लगाने के लिए कथित संत जरनैल सिंह भिंडरावाले की हर तरह से सहायता की. कालांतर में इस संत की महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ गई कि वह पंजाब को भारत से अलग करके स्वतंत्र देश खालिस्तान स्थापित करने के सपने देखने लगा. अंततः इंदिरा गाँधी को आपरेशन ब्लू स्टार का निर्णय लेना पड़ा और खुद अपनी जान देकर गलती का प्रायश्चित करना पड़ा. इन्हीं इंदिरा जी के अंहकार के कारण भारत में आतंरिक आपातकाल लगाना पड़ा और २ वर्षों तक लोकतंत्र जेल में कैद रहा. इंदिरा जी यहीं नहीं रूकीं श्रीलंका सातवे दशक के उत्तरार्द्ध में जातीय दंगों की आग में झुलस रहा था. सैकड़ों तमिल अल्पसंख्यकों की हत्या कर दी गई थी.तमिलनाडु के तटीय इलाकों में शिविर लगवाकर इंदिराजी ने तमिलों को सैनिक शिक्षा दी. फलस्वरूप जन्म हुआ खतरनाक आतंकवादी संगठन एलटीटीई का . श्रीलंका गृहयुद्ध की जिस आग में २५ सालों तक झुलसता रहा उसे चिंगारी दी थी कांग्रेस पार्टी की सरकार ने. इंदिराजी के बाद प्रधानमंत्री बने उनके पुत्र राजीव. उन्होंने भी माँ और नाना के नक्शे कदम पर चलते हुए श्रीलंका में भारतीय शांति सेना भेजने की गलती की.दूसरों के मामलों में बेवजह टांग अड़ाने का नतीजा हुआ कि सैकडों भारतीय सैनिकों को जान से हाथ धोना पड़ा.बाद में भारतीय सेना को बेआवरू होकर श्रीलंका से वापस लौटना पड़ा. बदला लेने के लिए एलटीटीई ने राजीव गाँधी की ही हत्या कर दी. वर्तमान मनमोहन सिंह की सरकार भी गलतियाँ करने में पीछे नहीं है. ऐसी गलतियाँ जिसका मूल्य भविष्य में भारत को अवश्य चुकाना पड़ेगा. कांटे से कांटा निकलता है की नीति में लगता है कि इस पार्टी को अटूट विश्वास है तभी तो इंदिराजी के भिंडरावाले प्रयोग की तरह ही महाराष्ट्र में वह बाल ठाकरे के खिलाफ उनसे भी कहीं बुरे राज ठाकरे को बढावा दे रही है.राज के कार्यकर्ता जब चाहे तब पूरे महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों को पीटना शुरू कर देते हैं. इस हिंसा में कई लोगों को तो जान से भी हाथ भी धोना पड़ा है.लेकिन राज के खिलाफ जान-बूझकर कमजोर धाराएँ लगाई जाती हैं और वे जमानत पर फ़िर से बाहर आ जाते हैं. इतना ही नहीं राज को बचाने में कानून की रक्षक पुलिस ही जी-जान से लगी हुई प्रतीत हो रही है. निश्चित रूप से राज के कारण कांग्रेस को लाभ और शिवसेना-भाजपा को हानि हुई है. अभी-अभी संपन्न हुए चुनाव इसकी पुष्टि भी करते हैं. लेकिन राज की भी शक्ति बढ़ी है और उनके एक दर्जन से अधिक विधायक विधानसभा में पहुँच गए हैं. राज अतिवादी और हिंसा में विश्वास करनेवाले नेता हैं और अगर वे कांग्रेस के नियंत्रण से बाहर हो गए तो देश को शायद एक और अलगाववादी हिंसक आन्दोलन से निबटना पड़ सकता है. इसलिए मैं कांग्रेस पार्टी से अनुरोध करता हूँ कि वह अभी से भी इतिहास से सबक ले. आखिर उसके दो नेता भूतकाल में इसी तरह की गलतियों के शिकार हो चुके हैं.

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

बिहार के प्रति ममता की निर्ममता


आजादी के समय से ही रेलवे के मानचित्र पर उपेक्षित रहे बिहार से जब लगातार तीन-तीन लोग रेल मंत्री बने तब पथराई आँखों में ना जाने कितने सपने तैरने लगे. लेकिन २००९ के लोकसभा चुनाव के बाद बिहार के हाथों से यह अहम् माना जानेवाला पद निकल गया और पश्चिम बंगाल की तेजतर्रार नेत्री ममता बनर्जी के हाथों में चला गया.ये वही ममता दीदी हैं जिन्होंने नंदीग्राम में गरीबों के लिए लड़ाई की और जीत पाई. फ़िर बिहार की गरीब जनता ने उनका क्या बिगाड़ा था जो उन्होंने बिहार में चल रही सभी रेल परियोजनाओं के लिए धनावंटन में भारी कटौती कर दी और इस गरीब प्रदेश की आखों में पल रहे सपनों पर गरम पानी डाल दिया.उत्तर बिहार की सात परियोजनाओं के लिए आवंटित धन पर अगर हम नज़र डालें तो आसानी से समझ सकते हैं कि ममता जी का रवैया बिहार के प्रति प्रतिशोधात्मक है ममता से परिपूरित नहीं.न्यू मुजफ्फरपुर जंक्शन के निर्माण के लिए ७० करोड़ की जगह मात्र १ करोड़, मुजफ्फरपुर-दरभंगा रेल निर्माण के लिए २८१ करोड़ की जगह सिर्फ १ लाख, मुजफ्फरपुर-जनकपुर रोड रेल निर्माण के लिए २२८ करोड़ की जगह मात्र १ लाख, सीतामढी-निर्मली रेलखंड के निर्माण के लिए ६७८ करोड़ की जगह मात्र १ लाख, मोतिहारी-सीतामढी रेल निर्माण के लिए २०६ करोड़ के स्थान पर सिर्फ १ करोड़, दरभंगा-कुशेश्वर स्थान रेलखंड के लिए २०२ करोड़ की जगह मात्र १ करोड़ और छपरा-मुजफ्फरपुर रेल दोहरीकरण के लिए ३१४ करोड़ की जगह सिर्फ २ करोड़ का आवंटन हमें यहीं सीख दे रहा है कि जब तक बिहार का कोई सपूत फ़िर से रेलमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठेगा रेलवे के मामले में बिहार पिछड़ा ही रहेगा.हाँ ममता जैसी नकचढ़ी नेता को अगर रास्ते पर लाना है तो उठ खड़ा होना होगा बिहार के सभी १० करोड़ लोगों को प्रतिकार में. वैसे भी कहा गया है कि अधिकार मांगने से नहीं छीनने से मिलता है.

तुम्हीं सो गए दास्ताँ कहते-कहते


मीडिया का एवरेस्ट कहे और माने जानेवाले जनसत्ता के संस्थापक संपादक प्रभाष जोशी नहीं रहे. लेकिन वे इस तरह खामोशी से जा भी कैसे सकते हैं? अभी जो महफ़िल जवान हुई थी, अभी तो उन्हें बहुत कुछ सुनाना था और हमें बहुत कुछ सुनना. लेकिन यह सच है और सबसे कड़वा सच कि वे चुपके से महफ़िल को तनहा छोड़कर खिसक लिए हैं.अब कल का कोई नौसिखिया पत्रकार चाहे उन्हें जितनी भी गालियाँ दे या जो चाहे आरोप लगा ले वह अदम्य इच्छाशक्तिवाला नरमदिल पत्रकार अब कोई जवाब नहीं देगा, नहीं करेगा प्रतिवाद. इतिहास गवाह है कि भारत की इस पुण्यभूमि पर सीता को भी आरोपित होना पड़ा था. फ़िर प्रभाष जी तो हाड़-मांस के बने हमारी ही तरह एक इंसान मात्र थे.प्रभाषजी से पहले भी हिन्दी पत्रकारिता थी. पढने-लिखनेवाले लोग थे. लेकिन हमारे बिहार में एक कहावत खूब कही और सुनी जाती है-लीके-लीक गाड़ी चले, लीके चले कपूत; लीक छाड़ी के तीन चले सिंह, शायर, सपूत.और प्रभाषजी भी सपूत थे, मां-बाप के और भारत माता के भी. फ़िर उन्हें कहाँ पत्रकारिता के क्षेत्र में पहले से चली आ रही परंपरा का पालन भर करना मंजूर होता.१९८३ में उनके संपादन में इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप ने जनसत्ता अख़बार शुरू किया. अब तक सरकार या नेता/अधिकारी जो कहते अखबारवाले आंख मूंदकर उस पर विश्वास कर लेते और जनता भी वही पढने और उसे ही सत्य मानने को बाध्य थी. प्रभाषजी को यह मंजूर नहीं था. फलस्वरूप हिन्दी पत्रकारिता जगत में जन्म हुआ एक नयी प्रवृत्ति का जिसे हम खोजी पत्रकारिता कहते हैं. टीवी की दुनिया में बहुचर्चित स्टिंग ऑपरेशन इसी का विकसित रूप है. प्रभाषजी की पत्रकारिता जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता थी. उन्होंने अपने पूरे कैरिएर में बाजार और बाजारवाद को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया. उनके जैसा कलमकार शायद ही निकट भविष्य में फ़िर से हिन्दी पत्रकारिता जगत में जन्म ले. जो भी उनके संपर्क में आया उसे उनका भरपूर स्नेह मिला, भले ही वह सुपात्र रहे हों या कुपात्र. प्रभाषजी क्रिकेट के अनन्य प्रशंसक थे.दुर्भाग्यवश क्रिकेट से उनका यह लगाव ही उनके लिए जानलेवा बन गया. होनी को भला कौन टाल सकता है? एक पत्रकार और उससे भी ज्यादा एक पाठक होने के नाते हम उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हुए भरी आखों और भरे दिल से बस यही कह सकते हैं-हम तो बेताव थे बहुत-कुछ सुनने के लिए, तुम्हीं सो गए दास्ताँ कहते-कहते.

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

शाहे बेखबर का शासन

कभी परवर्ती मुग़ल बादशाह शाह आलम को शाहे बेखबर कहा जाता था.क्योंकि रियाया की हालत क्या है और राज्य में क्या हो रहा है उन्हें कुछ पता नहीं होता था. एक शेर भी काफी प्रसिद्द हुआ था-शहंशाहे शाह आलम, दिल्ली से पालम. जिस किसी ने भी कहा है कि इतिहास अपने को दोहराता है बिलकुल सही कहा है. हमारे प्रधानमत्री मनमोहन सिंह की सरकार किसी भी मायने में शाह आलम की सल्तनत से कम नहीं हैं.अभी परसों ही की तो बात है गृह मंत्री चिदंबरम देवबंद में दारुण उलूम के एक कार्यक्रम में भाग लेने गए थे. दारम उलूम द्वारा उसी कार्यक्रम में वन्दे मातरम, महिला आरक्षण और टेलिविज़न पर पारित प्रस्ताव पर जब विवाद उत्पन्न हो गया तो उनके सहायक कहते हैं कि मंत्रीजी को ऐसे किसी प्रस्ताव के बारे में जानकारी ही नहीं थी. क्या भोलापन है मौजूदगी में प्रस्ताव पारित हुआ और मंत्रीजी बेखबर हैं. अपने प्रधानमंत्रीजी तो और भी ज्यादा मासूम हैं उन्हें तो लगता है कभी-कभी यह भी खबर नहीं रहती कि भारतीय गणतंत्र का प्रधानमंत्री कौन है? किसी विपक्षी नेता की तरह खुद ही मांग करते रहते है कि ये होना चाहिए, वो होना चाहिए. होना चाहिए इससे भला कौन इंकार कर सकता है लेकिन करना तो आपको ही है, सत्ता पक्ष ही तो सब कुछ करता है. आप अपने मंत्री को आप जैसा करना चाहते हैं आदेश दें और मुझे माफ़ करें क्योंकि मुझे ऐसा कोई नुस्खा मालूम नहीं है जिससे आप जैसे वयोवृद्ध डबल रिटायर्ड की स्मरण शक्ति मजबूत हो सके.

बुधवार, 4 नवंबर 2009

कबीरा खड़ा बाज़ार में

मध्यकाल के प्रसिद्द निर्गुण भक्त दूरदर्शी संत कबीर शायद उसी समय बाज़ार का महत्व समझ गए थे. तभी तो वे बार-बार बाज़ार में खड़े नज़र आते हैं.उनका एक बाज़ार सम्बन्धी दोहा तो काफी प्रसिद्द है- कबीरा खड़ा बाज़ार में सबकी मांगे खैर, ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर. एक और भी दोहा है जिसमें कबीर लुकाठी लेकर बाज़ार में खड़े नज़र आते हैं, पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार है-कबीरा खड़ा बाज़ार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ. इन दोहों से स्पष्ट है कि कबीर फक्कड़ थे इसलिए बार-बार बाज़ार में खड़े होकर किसी को भी चुनौती दे डालते थे.वह दौर ईश्वरीय आस्था का दौर था आज बाजारीकरण का दौर है. प्रेम से लेकर वात्सल्य तक सब कुछ बाज़ार में आकर खड़ा हो गया है और बाज़ार द्वारा, बाज़ार के लिए संचालित हो रहा है.आधुनिक संत/भक्त बाजार नाम परमेश्वरं महामंत्र की महिमा को काफी पहले समझ गए थे. रजनीश ने सबसे पहले इसे समझा लेकिन भारतीय जनता के मन-मिजाज को वे भांप नहीं सके फलस्वरूप अमेरिका भागना पड़ा. बाद में आशाराम बापू ने भी अपनी खूब ब्रांडिंग की लेकिन क्षेत्रीय क्षत्रप बनकर रह गए. अध्यात्म का राष्ट्रीय नायक कैसे बना जा सकता है इसे पहली बार वास्तविक रूप में समझा बाबा रामदेव ने.जैसा कि सभी जानते हैं कि भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक है. रामदेव ने योग द्वारा कैसे मुफ्त में स्वस्थ रहा जा सकता है लोगों को बताना शुरू किया. देखते-देखते अहले सुबह वे लगभग सभी टीवी चैनलों के परदे पर नज़र आने लगे. जब मामला जमने लगा तब निकल पड़े देशाटन पर. जगह-जगह योग-शिविरों का आयोजन होने लगा.लाभार्थियों से ऊंचीं रकम वसूली जाने लगी.साथ-ही-साथ उनके गुरुभाई बालकृष्ण द्वारा निर्मित आयुर्वेदिक दवाओं का भी इन शिविरों में भरपूर प्रचार किया गया और दवाएं बेचीं भी गयीं. देखते-ही-देखते लगभग हरेक शहर में बाबा रामदेव के दिव्य फार्मेसी की दुकानें खुल गईं. इतना धनार्जन हुआ कि रामदेव ने आस्था नामक चैनल को ही खरीद लिया जिससे भक्ति और अध्यात्म के अन्य व्यापारियों को भी अपनी ब्रांडिंग का अवसर प्राप्त हो सके.संन्यासी बनकर उन्होंने जितना धनार्जन किया शायद गृहस्थ बनकर कभी नहीं कर पाते.कम्पनी फिल्म में एक गाना था-गन्दा है पर धंधा है.फ़िर यह धंधा तो सम्मान भी दिला रहा है. जब तक जनता का मोहभंग नहीं होता चलेगा तब तक तो पिछले दरवाजे से दिव्य योग मंदिर में दाखिल हो चुके रामदेव के भाई और बहनोई के वंशजों-उत्तराधिकारियों के कई पुश्तों के बैठकर खाने का इंतजाम हो जायेगा.

सोमवार, 2 नवंबर 2009

किरण बेदी को मुख्य सूचना आयुक्त बनाया जाये

भारत के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि यहाँ कानून तो है पर व्यवस्था नहीं है. सूचना का अधिकार कानून भी इसका अपवाद नहीं है. स्वयं मुख्य सूचना आयुक्त सचिवालय के अनुसार मात्र १७ प्रतिशत मामलों में ही आवेदक को सूचना मिल पा रही है. जाहिर है कि सरकारी तंत्र कानून बन जाने के बाद भी सूचना देने के बजाये छुपाने में ज्यादा विश्वास रखता है.कानून बनाना हमारे देश में जितना आसान रहा है लागू करवाना उतना ही कठिन और जब सरकार ही बाधक का काम करने लगे तब तो उस कानून का भगवान ही मालिक है. सरकार दो-दो बार इस कानून में संशोधन का प्रयास कर चुकी है जिससे उसकी नीयत पर शक होना स्वाभाविक भी है. मुख्य सूचना आयुक्त हबीबुल्ला के इस्तीफे के बाद पद रिक्त हो गया है. अभिनेता आमिर खान ने इस पद पर नियुक्ति के लिए किरण बेदी का नाम सुझाया है. अच्छी बात यह रही है कि श्रीमती बेदी ने जिम्मेवारी ग्रहण करने से इंकार भी नहीं किया है. धीरे-धीरे यह मुहीम जोर पकड़ने लगी है और विभिन्न क्षेत्रों के कई जाने-माने लोगों ने आगे बढ़कर किरण बेदी का समर्थन किया है. किरणजी निश्चित रूप से एक निर्भीक और ईमानदार अधिकारी रही हैं. उनके साहस से डरकर ही केंद्र सरकार ने उन्हें दिल्ली का पुलिस आयुक्त नहीं बनाया था. क्या अब वही सरकार उन्हें इस अतिमहत्त्वपूर्ण पद पर बिठाने का जोखिम उठाएगी? इतना तो निश्चित है कि इस पद के लिए उनसे ज्यादा उपयुक्त उम्मीदवार कोई नहीं हो सकता.

फ्लडलाइट मैच बिजली की बर्बादी

आज फ्लडलाइट में भारत और आस्ट्रेलिया के बीच एकदिवसीय चंडीगढ़ में हो रहा है, दिवा-रात्रि मैच. मोहाली स्टेडियम दुधिया रौशनी में नहाया हुआ है. हजारों वाट के बल्ब जल उठे हैं. दिन-रात के मैच आयोजित करने के पक्ष में क्या तर्क दिए जा सकते हैं मैं नहीं जानना चाहता. लेकिन इन मैचों में बेवजह हजारों वाट बिजली बर्बाद जरूर हो रही है. क्या ये मैच दिन में नहीं कराये जा सकते? पहले होते ही थे. भारत जैसे बिजली की कमी से जूझ रहे देश के लिए जहाँ उद्योगों को देने के लिए ही पर्याप्त बिजली नहीं है खेल-खेल में खेल के लिए बिजली बर्बाद करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता. आखिर दिन में खेलने और खेल देखने में क्या परेशानी है? क्या इसे विलासिता नहीं कहा जाये? मैं भारत सरकार से निवेदन करता हूँ कि संवेदनहीनता का परित्याग करते हुए बीसीसीआई को आदेश दे कि आगे से सभी क्रिकेट मैच दिन में ही आयोजित किये जाएँ. बिजली की बर्बादी कहीं-न-कहीं ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने में भी भूमिका निभाता है यह भी हमें नहीं भूलना चाहिए.

नौकरशाह और आम आदमी

भारत एक प्रजातान्त्रिक देश है और किसी भी प्रजातंत्र में नैतिकता का महत्व सर्वाधिक होता है. ऐसा इसलिए क्योंकि इस शासन व्यवस्था में सभी काफी हद तक स्वतंत्र होते हैं. कहने का अर्थ यह कि सब कुछ चेक एंड बैलेंस के सिद्धांत पर काम करता है. हर कोई किसी-न-किसी के प्रति जवाबदेह होता है. जब तक यह जवाबदेही का भाव लोगों के मन में होता है सबकुछ ठीक-ठाक चलता है. पर जैसे ही चेक करनेवाले भ्रष्ट और बिकाऊ होने लगते हैं बैलेंस भी बिगड़ जाता है. कुछ ऐसे ही दौर से गुजर रहा है सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा. अभी मैं अपने शहर के विश्वप्रसिद्ध कोनहरा घाट पड़ कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर गंगा स्नान करने गया था. लौटते समय एक लालबत्ती की गाड़ी ने भीड़-भाड़वाले उस इलाके में मुझे पीछे से धक्का मारा जो गाड़ियों के लिए प्रतिबंधित था. ऐतराज जताने पर पातेपुर के बीडीओ जिनकी वो गाड़ी थी का ड्राईवर ठसक के साथ बोला होर्न सुनाई नहीं पड़ता है क्या? मैंने कहा प्रतिबंधित क्षेत्र में आप गाड़ी ले कैसे आये? सुनते ही वह खाकीधारी तमककर गाड़ी से उतरने लगा. मेरे मन में उसके इरादों के प्रति कोई संदेह नहीं था. मैं कहा भाई साहब मैं पत्रकार हूँ और आप जो कुछ कर रहे हैं वह ठीक नहीं है. वह फुर्ती से गाड़ी में चढ़ गया. बीडीओ साहब ने मुझसे मामले को रफा-दफा करने का अनुरोध किया. लेकिन जहाँ तक मैं समझता हूँ अगर मैं पत्रकार नहीं होता तो इन्टरनेट पर बैठने के बजाये अस्पताल में होता. तो श्रीमान यह है भारत के एक छोटे नौकरशाह का आम आदमी के प्रति रवैया. मैं उनके मन में तो घुस नहीं सकता लेकिन उनके व्यवहार से यह पता तो चल ही जाता है कि वे अपने को आम-आदमी से अलग मानते है. जो भाव कभी मानवों के प्रति देवताओं के मन में हुआ करता था कुछ वैसा ही ये नौकरशाह आम-आदमी के बारे में सोंचते हैं. शायद हम उनकी नज़रों में इन्सान हैं ही नहीं पशु हैं, जिन्हें हलाल किया जा सकता है, अपने मनमाफिक प्रयुक्त किया जा सकता है. फ़िर इनसे मानवाधिकारों के पालन की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है? मानवाधिकार मानवों के लिए है पशुओं के लिए नहीं.

अब तेरा क्या होगा कोड़ा

मैंने अपने एक लेख में कुछ ही दिनों पहले यह आशंका व्यक्त की थी कि कांग्रेस झारखण्ड में हुए संस्थागत लूटपाट में खुद को पाकसाफ साबित करने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को बलि के बकरे की तरह इस्तेमाल करेगी. आशंका सत्य सिद्ध हुई और कोड़ा और उनके निर्दलीय मंत्रीमंडलीय सहयोगियों के खिलाफ लगातार छापे मारे जा रहे है और जो तथ्य सामने आ रहे है वे निश्चित रूप से चौंकानेवाले हैं.  सिर्फ कोड़ा महोदय ने लगभग ५०० करोड़ का विदेशों में निवेश कर रखे हैं. उनकी कुल संपत्ति का आंकडा तो २००० करोड़ रूपये से भी ऊपर पहुँच चुका है. अगर यह धन हमारे देश में होता तो देश को कुछ तो लाभ होता लेकिन हमारे देश से लूटा गया धन दूसरे देश की अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचा रहा है. इसमें कोई संदेह नहीं की केंद्र सरकार का यह कदम सराहनीय है लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिय कि कोड़ा एक कमजोर राजनेता थे और हैं. इसलिय उन पर कार्रवाई करना कठिन काम नहीं था. केंद्र अगर इसी तरह की जाँच अपनी पार्टी के सुबोधकांत सहाय के विरुद्ध करती तो उसकी सदेच्छा पर कोई भी उंगली उठाने का साहस नहीं करता क्योंकि झारखण्ड का बच्चा-बच्चा जानता है श्री सहाय ही नहीं झामुमो के शिबू शोरेन भी इस लूट में हिस्सेदार रहे हैं और उन्होंने भी करोड़ो की संपत्ति बनाई है. मायावती, लालू प्रसाद यादव, जयललिता के खिलाफ पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं और केंद्र का उनके प्रति उदार रवैया रहा है. मोबाइल स्पेक्ट्रम वितरण मामले में बुरी तरह फंसे दूरसंचार मंत्री को तो सीधे तौर पर केंद्र सरकार बचाने में भी लगी दिखाई दे रही है. कहने का लब्बोलुआब यह ही कि भ्रष्टाचार के सभी मामलों में निष्पक्षतापूर्वक गुण-दोष के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए न कि अपनी सुविधा के आधार पर.

रविवार, 1 नवंबर 2009

रामभरोसे हिन्दू होटल

कई वर्ष पहले की बात है मैं उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा देने जौनपुर गया था. जौनपुर में दो स्टेशन हैं. मैं उत्तरवाले स्टेशन पर उतरा था. स्टेशन के पास एक होटल का बोर्ड लगा था. नाम था रामभरोसे हिन्दू होटल. तफ्तीश करने पर पता चला कि रामभरोसे होटल के मालिक का नाम है. खैर वह तो नाम का ही रामभरोसे था. वहां सारी व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त थी. लेकिन अगर आप कथित रूप से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत पर नज़र डालें तो पूरा-का-पूरा देश ही रामभरोसे चल रहा है. एक शायर ने कभी कहा था-बर्बादे गुलिस्तां के लिए बस एक ही उल्लू काफी है, हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा? एक नज़र केंद्रीय मंत्रिमंडल पर डाल कर देखिये और बताईये कि कितने मंत्री देशभक्त और ईमानदार हैं? आप पाएंगे कि इनमें से अधिकतर मंत्रियों की असली जगह मंत्रिमंडल की बैठकों में नहीं जेलखाने में है. विंस्टन चर्चिल ने भारत की आजादी के समय यह आशंका व्यक्त की थी कि भारत के लोग अपनी स्वतंत्रता की हिफाज़त शायद ही कर पाएंगे. मुझे खुद भी आश्चर्य हो रहा है कि देश अब तक गुलाम क्यों नहीं हुआ? जबकि इसके रग-रग में भ्रष्टाचार का दूषित खून प्रवाहित हो रहा है यह किस तरह एक-एक दिन और एक-एक साल गुजरता जा रहा है? 

शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

जाति न पूछो बुद्धिजीवियों की

जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ यानि कि होश संभाला बराबर एक शब्द से पाला पड़ने लगा. न तो आज तक मैं उसका अर्थ ही समझ पाया हूँ और न ही परिभाषा जान पाया हूँ. भाइयों एवं बहनों वो शब्द था और है-बुद्धिजीवी. जहाँ तक शब्दार्थ की बात है तो इसका मतलब होता है-बुद्धि पर जीनेवाला यानि यानि बुद्धि की कमाई खानेवाला. अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि दुनिया में बुद्धिजीवियों का दायरा काफी बड़ा है. इसके अन्तर्गत वे सभी आ जाते है जो मेहनत का काम नहीं करते फ़िर भी कमा लेते हैं. इसका मतलब यह कतई नहीं है कि शारीरिक मेहनत में लगे लोग बुद्धि से काम नहीं लेते. हाँ उस पर पूरी तरह निर्भर नहीं होते. लेकिन पत्रकारिता जगत में बुद्धिजीवी वे हैं जिनके आलेख या फीचर लगातार अख़बारों में छपते हों या फ़िर रेडियो-टी.वी. पर राय देने के लिए बुलाये जाते हों. बुद्धिजीवियों की कोई जाति नहीं होती उनकी अपनी अलग ही जाति है. शायद यही कारण है कि उन्हें पाला बदलने में कोई कठिनाई नहीं होती. सरकार बदली नहीं कि वे समाजवादी से मध्यमार्गी या हिंदूवादी बन जाते है. ऐसे ही लोगों को कभी महाकवि मुक्तिबोध ने शोषकों के साथ गर्भनालबद्ध कहा था. जिस देश में ऐसे सुविधाभोगी सत्ता से चिपके हुए बुद्धिजीवी मौजूद हों वहां न तो कोई आन्दोलन ही खड़ा करना संभव हो सकता है और न ही परिवर्तन आना या लाना ही आसन है.दुर्भाग्य से भारत में अभी ऐसी ही स्थिति है.मैं युवाओं से निवेदन करता हूँ कि वे इन यथास्थितिवादी बुद्धिजीवियों से सावधान रहें ताकि कालांतर में उन्हें खुद को ठगा हुआ महसूस न करना पड़े.

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

परेशानी का पर्याय भारतीय रेल

अभी कुछ ही समय पहले की बात है जब १३ जनवरी, २००९ को भारत के तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने जापानी बुल्लेट ट्रेन पर सवारी की घोषणा की कि भारत में भी बुल्लेट ट्रेन चलायी जायेगी.एक उम्मीद बनी मन में. लेकिन इस मुंबई-पुणे-अहमदाबाद बुल्लेट ट्रेन परियोजना के लिए अनुमानित ३,५५,३०० करोड़ रूपयों का इंतजाम कहाँ से होगा अब तक एक यक्ष-प्रश्न बना हुआ है. मन इसीलिए यह संदेह भी उत्पन्न होता है कि यह घोषणा कहीं राजनीतिक लफ्फेबाजी भर तो नहीं थी. वैसे भी अब लालू रेल मंत्री नहीं हैं. अटलजी की सरकार ने अधोसंरचना में सुधार को जिस तरह प्राथमिकता के आधार पर लिया था और जोर-शोर से काम शुरू किया था. मनमोहन सरकार में न तो जोर दिखाई दे रहा है और न ही शोर ही सुनाई दे रहा है. वक़्त मानों ठहर गया है और ठहर गया है भारत का विकास (इंडिया का नहीं). मैं अक्सर प्रत्येक भारतवासी की ओर से एक सपना देखा करता हूँ की मैं तीन-चार घन्टे में पटना से दिल्ली पहुँच जाऊँगा और अपना काम निपटाकर शाम में घर लौट भी आऊंगा. किसी भी देश के विकास का पहला कदम अधोसंरचना का विकास ही होता है. बिजली, पानी और यातायात की सुचारू व्यवस्था किये बिना किसी भी देश का विकास संभव नहीं है. जहाँ तक भारत की बात है तो कण-कण में व्याप्त भ्रष्टाचार को मिटाए बिना ऐसा हो नहीं सकता. इलाज है भ्रष्टचार के लिए मृत्युदंड की व्यवस्था की जाये और न्यायपालिका, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में व्यापक पैमाने पर सुधार किया जाये.अंत में मैं आपसे पूछता हूँ कि सिर्फ बुल्लेट ट्रेन चला देने से क्या भारत विकसित देशों की श्रेणी में आ जायेगा? बिलकुल भी नहीं इसके लिए तो बदलना पड़ेगा भारतीयों को अपनी नीति और नीयत को और मिटाना पड़ेगा फर्क कथनी और करनी का.

शर्मनाक हादसा

भारतीय वायु सेना के लिए विमान और हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं कोई नई बात नहीं है. आज ३० अक्टूबर को भी के हेलीकॉप्टर दुर्घटना हुई है. निस्संदेह इस तरह की घटनाएँ सेना के मनोबल के साथ-साथ उन पर देश के भरोसे को भी काम करती है. आखिर क्यों यह सिलसिला रूक नहीं रहा है. जब देश में ऐसा हो तो इसे हम घरेलू मामला मान सकते हैं. लेकिन अभी एकुआडोर में जिस तरह ध्रुव हेलीकॉप्टर ऐन परेड के समय ही मुंह के बल जमीन पर आ गिरा उससे भारत की अंतर्राष्ट्रीय साख निश्चित रूप से प्रभावित होगी. सेना में साजो-सामान की खरीद में व्याप्त भ्रस्ताचार कोई नई बात नहीं है न ही नयी है कुँतरोची सरीखे घपलेबाजों का बाइज्जत रिहा हो जाना. ऐसे में स्थितियों में सुधार की उम्मीद करना ही बेमानी है. हाँ एक बात तो निश्चित है कि इस तरह के हथियारों के बल पर हम चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध नहीं छेड़ सकते. हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अब युद्ध में जीत-हार में सैनिक-संख्या से अधिक तकनीकी कुशलता मायने रखती है.

अंतहीन प्रतीक्षा

ज़िन्दगी मेरे साथ क्रूर जमींदार की तरह व्यवहार करती रही है;
करवाती रही है मुझसे दिन-रात बेगार और जमा-हासिल कुछ भी नहीं.
मैं करता रहा हूँ कड़ी मेहनत,
मैंने कभी मौसमी परेशानियों
सर्दी,गर्मी और बरसात की नहीं की फ़िक्र.

ज़िन्दगी मुझे बार-बार पढाती
रही गीता का श्लोक,
कि कर्म करते रहो मत करो
फल की चिंता;
जो तुम्हारे हाथों में है वही
तुम देखो,
बांकी का हिसाब-किताब
छोड़ दो मुझ पर;
और करते रहो सही वक़्त का इंतजार.

इसी तरह ढलती रहीं शामें,
कटती रही रातें;
निकलता रहा सूरज रोज
गुलाबी चादर ओढे;
लेकिन नहीं हुआ मेरा हिसाब
खाली रहे हाथ भन्नाता रहा दिमाग,
कहते हैं कि प्रतीक्षा की घड़ी
लम्बी होती है;
पर मैंने तो उसे अंतहीन होते देखा है.

बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

क्या फिर से पत्रिकाओं का जमाना वापस आ रहा है?

मैं एक मुकदमे के सिलसिले में अपने वकील से मिलने हाजीपुर कोर्ट की तरफ जा रहा था. आप सोंच रहे होंगे कि क्या मैं ऐसा-वैसा आदमी हूँ? अरे नहीं जमीन-जायदाद का मुकदमा है और दूसरा पक्ष चचेरा मामा है. खैर रास्ते में भेंट हो गई हिंदुस्तान अख़बार के हाजीपुर संवाददाता श्री सुरेन्द्र मानपुरी से. मानपुरीजी मेरे पिता की उम्र के हैं और पत्रकारिता विधा पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं. एक चलता-फिरता पुस्तकालय. मुझे उनका स्नेह-पात्र होने का सौभाग्य प्राप्त है. आरम्भ में कुछ हल्की-फुल्की बातचीत शुरू हुई. धीरे-धीरे वार्तालाप ने गंभीर रूप अख्तियार कर लिया. मैंने  उनका ध्यान बिहार के समाचार-पत्रों के गिरते स्तर की ओर दिलाया, जिसे उन्होंने खुले हृदय से स्वीकार भी किया. साथ-ही उनका मानना था कि समाचार-पत्रों का युग अब समाप्त समाप्ति की ओर है और एक बार फ़िर पत्रिकाओं का जमाना आनेवाला है. मैंने पूछा वो कैसे तो उन्होंने प्रथम प्रवक्ता को इसका श्रेय देते हुए कहा कि इस पत्रिका ने गंभीर पाठकों के बीच अपनी गहरी पैठ बना ली है और स्टालों पर आने के साथ ही गायब हो जाती है. उनकी बातों ने मुझे भी सोंचने पर मजबूर कर दिया कि क्या वास्तव में प्रथम प्रवक्ता में वह स्थान प्राप्त करने की योग्यता है जो कभी धर्मयुग ने अर्जित किया था? प्रथम प्रवक्ता के संपादक रामबहादुर राय जी हैं जो हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकारों में से एक हैं. यही कारण है कि प्रभाष जोशी आदि नामी-गिरामी पत्रकारों का सहयोग उन्हें सहज ही प्राप्त हो जाता है. स्वयं रामबहादुर जी बहुत अच्छे स्तंभकार हैं. लेकिन पत्रिका का झुकाव हिन्दुवाद की ओर आसानी से देखा जा सकता है और इसे हम पत्रिका की कमजोरियों में शुमार कर सकते हैं. साथ ही न ही पत्रिका में वह विषयगत विविधता है जो धर्मयुग में पाई जाती थी न ही सामग्रियों का स्तर ही वैसा है. साथ ही जिस समय मानपुरीजी ने यह टिपण्णी की थी उस समय इसका दाम कम करके ५ रूपया कर दिया गया था. अब जबकि फ़िर से इसका मूल्य १० रूपया कर दिया गया है तो देखना है कि इसकी बिक्री पर क्या असर पड़ता है?

सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

विपक्षहीनता की ओर अग्रसर भारतीय राजनीति

हाल में हुए लोकसभा और फिर विधानसभा चुनावों के परिणामों से ऐसा परिलक्षित हो रहा है कि भारत की मुख्या विपक्षी पार्टी भाजपा के पास कोई ऊर्जा बची ही नहीं है. उसके पास न तो कोई मुद्दा है और न ही मुद्दा बना सकने का मदद ही बचा है. जिससे भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में विपक्षहीनता की स्थिति एक बार फ़िर उत्पन्न होती जा रही है. दुनिया के किसी भी विकसित देश को लें तो उनका तेज गति से विकास तभी संभव हो सका है जब विपक्ष भी मजबूत रहा हो. स्वतंत्रता के बाद तीस सालों तक विपक्ष  लगभग गायब रहा और भारत में एकदलीय लोकतंत्र जैसी स्थिति बनी रही जिसकी परिणति रही आतंरिक आपातकाल और ७४ का जनांदोलन. तो क्या देश फ़िर से उसी ओर बढ़ रहा है? अगर यह सच है तो निश्चित रूप से विकसित हो रही यह प्रवृत्ति देशहित में नहीं है. देश में भी उन्हीं राज्यों का तेज विकास हुआ है जहाँ राजनीति के दो ध्रुव मौजूद हैं और सत्ता उनके बीच लगातार बदलती रही है. तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है. इतिहास गवाह है कि एकदलीय लोकतंत्र जैसी स्थितियां न तो साठ-सत्तर के दशक में राष्ट्रहित में थीं न आगे हीं देश को इससे फायदा होगा. और फ़िर भीषण महंगाई, मंदी और बेरोजगारी के इस और में विपक्ष में सक्रियता की कमी और भी साल रही है. परिस्थितियां जनांदोलन के लिए पूरी तरह से अनुकूल है परन्तु भाजपा उसका नेतृत्व संभाल पाने की स्थिति में है ही नहीं. इससे देश और जनता को जो नुकसान उठाना पड़ रहा है उसके लिए कहीं-न-कहीं भाजपा का वर्तमान नेतृत्व दोषी है. हाल ही में नक्सल कार्रवाई ने जो गति पकड़ी है उसके पीछे भी कहीं-न-कहीं जनता के समक्ष मुंह बाये खड़ी विकल्पहीनता भी जिम्मेदार है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि विकल्पहीनता भटकाव की ओर ले जाती है.

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

एकरूपता लाएं हिंदी अख़बार

हिंदी भारत की राजभाषा की अधिकारिणी होते हुए भी नहीं है जबकि हमें आजाद हुए ६ दशक बीत चुके हैं. हिंदी की इस दुर्गति में तथाकथित हिंदी सेवी अख़बारों का काम योगदान नहीं रहा है. सारे अख़बार स्टाइल शीट के नाम पर अपनी डफली अपना राग बजा रहे हैं. अभी दीपावली में कोई दिवाली लिख रहा था तो कोई दीवाली. इतना ही नहीं सारे अख़बारों के फांटों में भी एकरूपता का घोर आभाव है जिससे इन्टरनेट से सामग्री को सेव या कॉपी करना मुश्किल ही नहीं असंभव बन गया है. अंग्रेजी में इस तरह कि कोई समस्या नहीं है. आनेवाला युग इन्टरनेट का ही है और शब्दरूपों और फौंटों में विविधता से हिंदीभाषियों के लिए जहाँ भ्रम की या असमंजस की स्थिति पैदा होती है वहीँ अहिन्दीभाषी लोगों के लिए हिंदी सीख पाना दुरूह हो जाता है और इसलिए बेवजह हिंदी पर कठिन होने का आरोप लगाया जाता है. हालाँकि इन्टरनेट पर हिंदी में सामग्री उपलब्ध है लेकिन उन्हें भी एसएमएस की तरह रोमन में लिखना पड़ता है इस तरह हिंदी की-बोर्ड का प्रयोग ही हिंदी प्रेमी नहीं कर पाते अगर फौंटों में एकरूपता होती तो यह समस्या नहीं खड़ी होती. जहाँ तक बिहार के अख़बारों का सवाल है तो हम पत्रकार मात्रा डेढ़-दो सौ शब्दों से काम चलाते हैं और उनका भी सही प्रयोग नहीं कर पाते. अधिकांश अख़बारों में आगज़नी और अगलगी में कोई अंतर नहीं होता. शीर्षकों में ही गलतियों की भरमार होती है, वर्तनी सम्बन्धी भी और व्याकरणिक भी; फ़िर मुख्य भाग का तो भगवान ही मालिक है. ऐसा क्यों ही मैं इसका पोस्टमार्टम नहीं करना चाहता लेकिन इतना तो निश्चित है कि बिहार में अख़बार पढने से बच्चों की भाषा के बिगाड़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है. अब आप ही बताईये क्या इसे हिंदी सेवा कहेंगे या हिंदी के विनाश का प्रयत्न. यह हिंदी के प्रति मित्रतापूर्ण नहीं बल्कि शत्रुतापूर्ण व्यवहार है.

आभिजात्यता के पोषक सिब्बल

केंद्र की यूपीए सरकार बात भले ही आम आदमी की करे उसके कई मंत्री आभिजात्यता के अंध समर्थक की तरह व्यवहार करते हैं. अभी विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर द्वारा इकोनोमी क्लास को मवेशियों का बाड़ा कहने का विवाद अभी थमा भी नहीं था कि उसके एक और मंत्री कानूनी दांव-पेंच में माहिर कपिल सिब्बल ने यह कहकर हंगामा खडा कर दिया है कि आईआईटी में फॉर्म भरने के लिए निर्धारित बारहवीं के प्राप्तांक को बढाकर ८०-८५ प्रतिशत किया जायेगा. निहितार्थ यह कि अब भारत के ग्रामीण क्षेत्रों से आनेवाले छात्र-छात्राएं इस परीक्षा से वंचित कर दी जाएँगी. राहुल गाँधी के शब्दों में अगर हम कहें तो अब केवल इंडिया से आनेवाले लोग ही इंजिनियर बनेंगे भारत में रहनेवाले लोगों के लिए इंजीनियरिंग में प्रवेश का यह राजपथ बंद हो जायेगा. अब यह तो कांग्रेस नेतृत्व को ही पता होगा कि आम आदमी की सरकार को आम आदमी के साथ होना चाहिए या आभिजात्य वर्ग के पक्ष में. अगर अब भी यह सरकार अपने को आम आदमी की सरकार कहती है तो इसे परले दर्जे की बेशर्मी ही कही जायेगी.

आलू, लालू और बालू

कभी बिहार के नीति-नियंता रहे लालू प्रसाद ने बिहार के बँटवारे के समय कहा था कि अब बिहार में सिर्फ तीन ही चीजें बचेंगी आलू, लालू और बालू. सत्ता सुख में डूबे लालू के दिमाग में शायद यह बात कहीं भी नहीं थी कि समय इतिहास रचने का अवसर किसी भी व्यक्ति को बार-बार नहीं देता. एक राज्य की तक़दीर बदलने के लिए १५ साल का वक़्त कोई कम नहीं होता.
अब जब भाग्य उनका साथ नहीं दे रहा है तो वे झूठ-सच का सहारा लेने को उतारू हैं. नीतिश जी को भी सत्ता में आये चार साल पूरे हो चुके हैं और चुनाव की आहट धीरे-धीरे निकट आती सुनाई दे रही है. बिहार ने इन चार सालों में बहुत-कुछ देखा है, बहुत कुछ बदला भी है लेकिन दुर्भाग्यवश आज भी बिहार हर मामले में भारत के राज्यों में नीचे से प्रथम है. ऐसा क्यों है? एक होशियार माने जानेवाले नेता के हाथों में नेतृत्व होने के बावजूद स्थितियां बदलने के बाद भी आकडे क्यों नहीं बदले? मेरा मानना है कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि राज्य सरकार की नीयत के बारे में तो मैं कह नहीं सकता लेकिन निश्चित रूप से नीति ठीक नहीं रही. बात वह शिक्षा में सर्वांगीण सुधार की करती रही लेकिन बहाली में निर्धारित प्रक्रिया और मानदंडों का पालन सुनिश्चित नहीं करा पायी. इसी तरह नरेगा, आंगनबाडी आदि योजनायें बिहार में पूरी तरह विफल सिद्ध हुई. अब स्थिति सांप-छछूंदर वाली है. इन कर्मियों को न तो वह हटा ही सकती है और न ही रख ही सकती है. हटाने से भी जनता में नाराज़गी उत्पन्न होगी और न हटाने से भी. एक कालोनी में नालियां बनाने में ही चार साल ख़त्म हो गए और काम अभी भी ६० प्रतिशत के लगभग ही हुआ है. इन बातों से और बार-बार पुलिस द्वारा जुल्म ढाये जाने की खबरों से तो यही जाहिर होता है कि सरकार स्थानीय निकायों और प्रशासनिक अधिकारियों पर नियंत्रण नहीं रख पाई और जनादेश से मिले बहुमूल्य अवसर को गँवा बैठी. अब आनेवाले चुनाव में क्या होगा कोई भी इसका अनुमान नहीं लगा सकता.

रविवार, 18 अक्टूबर 2009

जब कदम ही साथ न दे

कभी फ्रेंच चिन्तक  रूसो ने कहा था कि मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुआ है लेकिन दुनिया में आते ही जंजीरों में जकड़ जाता है. उसने तो ऐसा तत्कालीन फ्रांस के शासकों के शोषण से परेशान नागरिकों के बारे में कहा था. क्या हम परिस्थितियों के गुलाम हैं. अगर हर कोई ऐसा ही सोंचने लगे तो दुनिया का क्या होगा? मन कि यह हमारे हाथों में नहीं होता कि हम अमीर घर में पैदा होंगे या गरीब घर में. लेकिन बाद की स्थितियों का महत्व होता तो है पर इतना ज्यादा भी नहीं कि सबकुछ वही हो जाये और हमारी भूमिका सिर्फ मूकदर्शक की रह जाये. अगर हमारे पूर्वजों ने परिस्थितियों को ही सब कुछ मान लिया होता तो हम आज भी गुलाम होते. या फ़िर मानव आज भी बैलगाड़ी चला रहा होता. फ़िर भी इतना तो निश्चित है कि परिस्थितियां हमारे हाथों में नहीं होती. हमारे तों में होता है उनका सामना करना. साधन हमारे हाथों में होते हैं. शायद इसलिए गाँधी जी (मेरा मतलब महात्मा गाँधी से है न कि गाँधी-नेहरु परिवार के किसी सदस्य से) ने साधन की पवित्रता पर इतना जोर दिया था. बोए पेड़ बाबुल का जैसे हिंदी कहावत भी इसी ओर इशारा करते हैं. शेरदिल इंसान को परिस्थिति रूपी पिंजरा अपने भीतर बंद नहीं कर सकता. कई बार हमारे जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब हमें लगता है कि जैसे हम बंद गली के आखिरी मकान को भी पार कर चुके हैं और जीवन का अंत आ गया है. लेकिन जिन्दगी रूकती नहीं है. परिस्थितियों के निर्माण में कहीं-न-कहीं हमारी सोंच का, हमारे कर्मों का भी हाथ होता है. भगत और गाँधी का बचपन अलग-अलग माहौल में बीता और इसका प्रभाव हम उनकी सोंच और उनके कार्यों में देख सकते हैं. इनमें किसी को भी हम गलत नहीं ठहरा सकते. हाँ इतना निश्चित है कि गाँधी को जिस तरह व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ वैसा भगत को नहीं मिला और उन्हें जनता ने काफी हद तक अपराधी ही माना क्योंकि उनका मार्ग हिंसा का था और इतिहास गवाह है कि भारत में अशोक, अकबर जैसे शासकों को महान कहा गया अलाउद्दीन या गोरी को नहीं. मतलब यह कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी बुरी क्यों न हो विवेक से काम लें. मानव विवेकी जीव है और उसके जीवन में कभी विकल्पों का अकाल नहीं पड़ता. उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ते कार्याणि न मनोरथै. भले ही गली बंद हो कहीं न कहीं से जाने का मार्ग मौजूद अवश्य होता है थोड़ा लम्बा भले ही हो.

शनिवार, 17 अक्टूबर 2009

अंधेरे में डूबा एक शहर

कहने को तो शहर लेकिन शहरी सुविधाएँ नदारद। टूटी-फूटी और पगडण्डी जैसी पतली सड़कें और बिजली उसका तो यहाँ नाम लेना भी खतरे से खाली नहीं है। बिजली नहीं रहने से खफा जनता अगर हत्थे से उखड़ गयी तो आपको अप्रत्याशित रूप से हाजीपुर सदर अस्पताल की यात्रा करनी पड़ सकती है जो अराजकता के मामले में किसी भी सरकारी संस्थान से सहज ही टक्कर से सकता है। त्रेता युग के त्रिशंकु का नाम आपने सुना होगा। वे विश्वामित्र की कृपा से धरती और स्वर्ग के बीच में लटक गए थे। हमारा महान ऐतिहासिक शहर हाजीपुर भी पटना और मुजफ्फरपुर के बीच लटका हुआ है। सारी योजनायें या तो पटना के लिए बनती हैं या फ़िर मुजफ्फरपुर के लिए, हाजीपुर की तरफ़ निगाहें ही नहीं जाती। मानो दो-दो चिरागों के तले पसरे अंधेरे में खो जाना ही इसकी नियति है। कहने को तो राज्य के बिजली मंत्री वयोवृद्ध रामाश्रय बाबू वैशाली जिले जिसका मुख्यालय हाजीपुर है के प्रभारी मंत्री हैं और इस नाते उनका हाजीपुर आगमन बराबर होता रहता है। जब भी वे यहाँ पधारते हैं तो सिधारने के पहले लगभग हर बार जिले का बिजली का कोटा बढ़ाने का आश्वासन अपने मुखचन्द्र से दे जाते हैं लेकिन स्थिति ज्यों कि त्यों है। अब उनके आश्वासन भी अपना असर खोते जा रहे हैं। इस बार की जानलेवा गर्मी में जब मैं बाहर होता तो कड़ी धूप से भागा-भागा घर आता इस उम्मीद में कि कहीं मंत्रीजी के आश्वासन ने अपना रंग दिखा ही दिया हो और भरी दोपहरी में प्यारी-चंचला बिजली रानी से भेंट हो ही जाए। लेकिन घर में आते ही पाता कि बिजली रानी का तो कहीं अता-पता ही नहीं है तब ऐसा लगता कि जैसे किसी ने मेरे तपते जिस्म से बेवफा बिजली रानी का नंगा तार सटा दिया हो। अब जाड़ा आनेवाला है और बिजली बिना जाड़े की कल्पना मात्र से ही मुझे कंपकंपी हो रही है। जब हाजीपुर को पूर्व मध्य रेलवे का मुख्यालय स्थापित हुआ तो एक उम्मीद बंधी थी कि अब हाजीपुर के दिन बहुरेंगे लेकिन हुआ कुछ नहीं। वास्तव में बिहार में इतनी जड़ता आ चुकी है कि परिवर्तन की तमाम कोशिशें दम तोड़ जाती हैं। यह जड़ता यहाँ की सरकार में भी समायी हुई है. वैसे भी लोकतंत्र में अलोकप्रिय निर्णय लेना आसान नहीं होता। आधुनिक आन्ध्र के निर्माता चन्द्रबाबू नायडू का हश्र सबके सामने है। नीतीशजी की सरकार भी खतरा मोल लेना नहीं चाहती। यहाँ तक कि बिजली बोर्ड का विभाजन और निजीकरण करने की भी वह कोशिश नहीं कर पाई। इस तरह के डरपोक लोग न तो अच्छे शासक ही हो सकते हैं और न ही युगपुरुष। मरीज को कभी-कभी कड़वी दवा भी देनी पड़ती है और इस तथ्य से नीतीशजी से ज्यादा अच्छी तरह से शायद ही कोई और परिचित हो, आखिर वैद्यक उनका खानदानी पेशा जो ठहरा।

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

चिराग तले अँधेरा

कभी प्रजापति कहलाने वाले कुम्हार
के घर में अब नहीं जलता आवा,
और आवा की आग के साथ चूल्हे की आग
भी पड़ने लगी है ठंडी;
अब न तो दुर्गा पूजा और न ही दिवाली में
छोटू-छोटी खरीदते हैं मिट्टी के खिलौने,
और वातानुकूलित दुकानों से खरीदने लगे हैं
हाथी-घोड़े के साथ गुल्लक भी,
जो बोलते भी हैं और चलते भी हैं;
कुम्हारों के गरीब खिलौनों की तरह
चुपचाप मुंह नहीं ताकते रहते हैं।
कल का प्रजापति आज भुखमरी
का शिकार है,
उसके बच्चों को स्कूल जाना तो दूर
रोटी के साथ सब्जी तक नसीब
नहीं होती;
वे हाथ जो बनाते हैं दिए दिवाली में दूसरों के
घरों को रौशन करने के लिए,
ख़ुद उनका ही वर्तमान और भविष्य अंधेरे में है;
जो हाथ लक्ष्मी को रास्ता दिखानेवाले दीपक गढ़ते हैं,
उनके घरों से कब गुजरेगी लक्ष्मी की सवारी;
कब वे भरपेट भोजन कर सकेंगे,
और कब उनके बच्चे नए-नवेले
ड्रेस में स्कूल जा सकेंगे;
यह तो वही जाने जो पूरी कायनात को
गढ़ता है अपनी चाक पर।

अपने दामन में क्यों नहीं झांकते राहुल

कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी इन दिनों देशाटन पर निकले हुए हैं और विपक्षी दलों की सरकारों के खिलाफ जिस तरह बयान दे रहे हैं उससे उनकी अनुभवहीनता या बचपना ही झलकती है। पहली बात कि उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार पर नक्सालियों के खिलाफ विफल रहने का आरोप लगाया है। जबकि वहां की सरकार ने जिस तरह नक्सालियों के विरुद्ध आर-पार की लड़ाई छेड़ रखी है वह अनूठी है और इसमें जनता के साथ-साथ विपक्ष कांग्रेस के नेता महेंद्र करमा भी सरकार को सहयोग कर रहे हैं। पड़ोसी आन्ध्र प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और नक्सली आज भी वहां बेलगाम हैं। झारखण्ड जहाँ की पवन धरती पर उन्होंने यह महान बयान दिया है उसकी दुर्गति किसी विपक्षी सरकार ने नहीं दी है। उसके लिए जिम्मेवार है कांग्रेस पार्टी और उसके सहयोगी। भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए झारखण्ड में पहले तो सिद्धान्तहीन उदाहरण पेश करते हुए कांग्रेस ने एक निर्दलीय विधायक को मुख्यमंत्री बना दिया। हद तो यह है कि अब उसी मधु कोडा को जेल भेजने की तैयारी चल रही है। मानो कांग्रेस का इस संस्थागत लूट-पाट में कोई हाथ ही नहीं है। एक निर्दलीय अकेले तो सरकार नहीं बना सकता है ना! अगर कांग्रेस महासचिव चाहते हैं कि कहीं भी विपक्ष की सरकार नहीं रहे चाहे तो उनके सामने लुटे-पुटे झारखण्ड का फार्मूला है ही। लेकिन फ़िर सिद्धांतों की बातें उन्हें नहीं करनी चाहिए यह अनैतिक तो है ही आपराधिक भी है क्योंकि ये पब्लिक है जो सब जानती है।

अति सर्वत्र वर्जयेत

बिहार के मुख्यमंत्री एक वैद्य के बेटे हैं और आयुर्वेद का कहना है कि अति सर्वत्र वर्जयेत। हर चीज की एक सीमा होती है। लालू-राबड़ी शासन में जहाँ प्रशासन को जन प्रतिनिधियों के समक्ष बौना बनाकर रखा गया, वहीं नीतिश ने सूत्र को ही पूरी तरह पलट दिया। कहने का मतलब यह कि अब प्रशासनिक अधिकारियों को पूरी छूट दे दी गयी। जनता के लिए न तो वो ठीक था न यह ठीक है। दोनों ही स्थितियां अतिवाद से प्रेरित हैं। अब स्थिति ऐसी है कि मुख्यमंत्री बोलते रहते हैं और अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। वर्तमान शासन में उनका व्यवहार निरंकुश सामंतों जैसा हो गया है और वे जब-तब मानवाधिकारों का उल्लंघन करने से भी नहीं चूकते।
मैं दो मामले आपके सामने पेश करना चाहूँगा- पहला मामला हाजीपुर से सम्बंधित है। २८ मई २००८ को स्थानीय गाँधी चौक पर सुनयना देवी नाम को एक महिला लीची बेच रही थी तभी ट्रैफिक हवालदार लक्ष्मण यादव ने उससे २०० लीची खरीदी और बिना पैसे दिए ही जाने लगा।इसका सभी फ़ुट पाथी दूकानदारों ने विरोध किया। बाद में उनका एक प्रतिनिधिमंडल एस पी पारसनाथ से मिलने भी गया लेकिन भेट नहीं हो सकी। बाद में सुनयना देवी और उसके एक निकट सम्बन्धी नरेश साह को झूठे मुक़दमे (मुकदमा सं २८९.०८) में फंसा दिया गया और नरेश साह को स्वास्थ्य थी नहीं होने पर भी गिरफ्तार कर लिया गया और जमकर पीटा गया जिससे उसकी मौत हो गयी। पुलिसिया सनक यहीं तक नहीं रुकी लाश को परिजनों को देने के बजाये गंगा में फेंक दिया गया। यहाँ तक कि पीड़िता के राज्य मानवाधिकार आयोग में जाने और मानवाधिकार आयोग से जवाब-तलब किए जाने के बाद भी हवलदार पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी।
दूसरी घटना ताजी है। अभी कल १५ तारिख की ही बात है। छपरा के पुलिस लाईन के पास राकेश नाम का एक युवक ठेले पर अंडा बेचता है। छपरा पुलिस के कुछ जवान उधार में अंडा देने की जिद करने लगे। धनतेरस का वास्ता देकर उसने मना कर दिया। नाराज पुलिस कर्मियों का कहर गरीब राकेश पर टूटा और उन्होंने ठेला उलटकर सारे अंडे फोड़ डाले और जमकर पीटा। नाराज होकर स्थानीय निवासियों ने छपरा-सोनपुर मार्ग एन. एच १९ को जाम कर दिया। बाद में इंसपेक्टर के आश्वासन के बाद जाम हटा लिया गया। अब देखना है कि इस मामले में कोई कार्रवाई होती है कि नहीं या मामला फाइलों में उलझकर रह जाएगा।
दो उदाहरण बिहार की वस्तु स्थिति की बानगी भर हैं। पहले जहाँ खादीवाले अंडे और लीची मुफ्त में उठाकर चल देते थे अब वही काम खाकी वाले कर रहे हैं। नीतिश जनता दरबार लगा रहे हैं लेकिन इन जनता दरबारों (डी एम द्वारा लगायेजानेवाले दरबारों सहित) से जनता को कोई खास लाभ इसलिए मिलता नहीं दीखता क्योंकि अधिकारियों की मानसिकता वही पुरानीवाली बनी हुई है। सरकारी तंत्र सी एम और डी एम के आदेशों को भी फाईलों में उलझाकर रख दे रहा है और जनता मूकदर्शक बनी हुई है। लेकिन चुनाव बहुत नजदीक है और राज्य सरकार को बेलगाम अधिकारियों पर जल्दी ही नियंत्रण पाना होगा अन्यथा जनता तो अपना जनादेश सुना ही देगी।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

बिहार सरकार : प्राइवेट कंपनी लिमिटेड

अगर आप मुझसे पूछें कि वर्तमान बिहार की सबसे बड़ी निजी कंपनी कौन-सी है तो मैं बेखटके कहूँगा बिहार सरकार और इस कंपनी के सीएमडी हैं नीतिश कुमार जी। जबसे इनकी सरकार बनी है कुछ अपवादों को छोड़कर जितनी भी बहालियाँ हुई हैं सब-की-सब संविदा यानि कांट्रेक्ट के आधार पर हुई हैं। अब सरकार क्या सोंचकर ऐसा कर रही है इसका सिर्फ़ अनुमान ही लगाया जा सकता है। शायद बँटवारे के बाद बिहार के पास इतने संसाधन ही नहीं हैं कि सरकार पुरानी सेवाशर्तों पर बहाली कर सके। या फ़िर सरकार समझती है कि इस भुक्खड़ राज्य में कामचलाऊ वेतन और शोषण परक शर्तों पर काम करने के लिए भी बहुत से लोग तैयार हो जायेंगे। अगर इसमें तनिक भी सच्चाई है तो फ़िर पूंजीपति व्यवसायियों और राज्य सरकार में कम से कम इस मामले में तो कोई अन्तर नहीं है। पहले सरकारी नौकरी में सामाजिक सुरक्षा प्राप्त होती थी। बुढापा आराम से कटने की गारंटी होती थी। अब न तो नौकरी स्थाई है न ही पेंशन मिलेगी। उस पर वेतन भी मामूली। न विश्वास हो तो सुनिए पंचायत शिक्षक या शिक्षामित्रों को मात्र चार-पॉँच हजार रुपए मासिक दी जाती है, वो भी कई-कई महीनों के बाद।
इस युग में जब खुदरा मूल्यों पर आधारित मुद्रास्फीति की दर नित-नयी उचाइयां छू रही है इतने पैसे में कैसे कोई परिवार सहित गुजारा कर सकता है। क्या नीतिश सरकार का कोई मंत्री इतने में गुजारा कर सकता है, गाड़ी, फ़ोन कुछ भी अगर फ्री न हो? बाहर से आए व्यवसायी चाहे वे मीडिया से ही जुड़े क्यों न हो अगर शोषण करते और कर भी रहे हैं तो हम राज्य सरकार के पास फरियाद लेकर जाते। अब जब राज्य सरकार ही ऐसा कर रही है तो हम तो यही कह सकते हैं-जायें तो जायें कहाँ समझेगा कौन यहाँ दर्द भरे दिल की दास्ताँ।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2009

गाँधी अगर आज कहीं से आ जायें

गाँधी जयंती के दिन से ही मेरे मन में एक सवाल उठ रहा है कि अगर आज महात्मा गाँधी कहीं से आ जाते तो उनकी क्या स्थिति होती और वे क्या करते? यह तो निश्चित है कि वे आज के भारत को देखकर खुश नहीं होते। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने तो क्षमा करना बापू तुम हमको वचन भंग के हम अपराधी कविता के द्वारा देश के हालत के लिए बापू से पहले ही माफ़ी भी मांग ली है। तो क्या बापू ने आत्महत्या कर ली होती? कदापि नहीं तब फ़िर उनके सामने क्या विकल्प थे? जहाँ तक मेरी कल्पना शक्ति की पहुँच है मुझे लगता है कि गाँधी ने आन्दोलन छेड़ दिया होता। उनकी मुख्य मांगें कुछ इस तरह होती-
इस संविधान में संशोधन कर इसमे जो भी खामियां दिखाई दे रही हैं उन्हें दूर किया जाए। जैसे वक़्त बीतने के साथ स्थापित हुए अभिसमयों को संहिताबद्ध किया जाए, विधान मंडलों के विशेषाधिकारों का संहिताकरण किया जाए, निदेशक तत्वों को क्रियान्वित किया जाए, राज्यों पर केन्द्र के बढ़ते नियंत्रण की प्रवृत्ति को रोका जाए, राज्यों को पर्याप्त वित्तीय अधिकार दिया जाए, न्यायपालिका को जवाबदेह बनाया जाए, अनुच्छेद ३७० को समाप्त किया जाए।
न्यापालिका, विधायिका और कार्यपालिका से भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त किया जाए। जनता द्वारा दिए गए कर
को सही तरीके से, सही जगह पर खर्च होना सुनिश्चित किया जाए।
शराब के उत्पादन और विक्रय को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया जाए।
तम्बाकू की खेती और प्रयोग को रोक दिया जाए।
भंग, गांजा, अफीम आदि मादक पदार्थों की खेती और उपयोग पर रोक लगा दी जाए।
जिन नेताओं पर किसी भी तरह के भ्रष्टाचार अथवा संज्ञेय अपराध का आरोप साबित हो गया हो उसे चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया जाए।
गरीबों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की जाए।
नेताओं, मंत्रियों पर होनेवाले सरकारी व्यय को कम किया जाए और इतना कर दिया जाए कि उनकी जीवन-शैली आम-आदमी के स्तर तक आ जाए।
मिश्रित खेती को बढावा दिया जाए जिसमें कृषि और पशुपालन साथ-साथ किए जायें।
१० श्रम-प्रधान कार्यों में बुद्धि-प्रधान कार्यों के सामान ही मजदूरी दी जाए जिससे श्रम की महत्ता स्थापित हो।
११ अपारंपरिक ऊर्जा पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाए जिससे ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों से मुक्ति मिल सके।
१२ सभी अधिकारियों, नेताओं और न्यायाधीशों के लिए साल में एक बार निर्धारित महीने में संपत्ति की घोषणा करना अनिवार्य बना दिया जाए।
१३ पारंपरिक चिकित्सा विधियों को प्राथमिकता दी जाए।
१४ अयोध्या, काशी और मथुरा में सर्वधर्म मन्दिर बनाया जाए।
१५ सेजों (स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन) को समाप्त कर उद्योगपतियों को दी जा रही छूट समाप्त की जाए।
१६ कुटीर उद्योगों और श्रमप्रधान पारंपरिक उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाए।
सरकार यदि इन मांगों को नहीं मानती तो गाँधी जनता से अनुरोध करते कि वह सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाये और सरकार को टैक्स देना बंद कर दे। लेकिन वर्तमान माहौल को देखते हुए ऐसा लगता है कि गाँधी के साथ सरकार बड़ी बेरहमी से पेश आती और शायद उनकी हत्या करवा दी जाती। जो विदेशी होने पर भी अंग्रेजों ने नहीं किया हमारे वर्तमान नेता उसे करने में तनिक भी नहीं झिझकते और हर तरह के हथकंडे अपनाए जाते।
आज अगर गाँधी जीवित होते हो विजय माल्या राज्यसभा में नहीं बल्कि जेल में होता अथवा किसी और व्यवसाय में लगा होता। अम्बानी, टाटा आदि के पास धन का इस तरह संकेन्द्रण नहीं होता।
किसानों को आत्महत्या नहीं करनी पड़ती और वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई सदस्य मंत्रिमंडल में नहीं होते।

रविवार, 11 अक्टूबर 2009

टीस देती महंगाई

यह महंगाई जब मेरी जेब ढीली कर देती है,
कर देती है विवश मुझे खर्च में कटौती के लिए;
टूट जाते हैं सपने मेरे भी,
बिखर-बिखर जाता हूँ मैं छोटे बच्चे की तरह;
लेकिन यह दुष्टा तब और भी ज्यादा
दुःख देती है जब मैं देखता हूँ ;
कि मेरी थाली में घटने लगी है
दाल-सब्जी की मात्रा,
कहते हैं कि वक़्त सबकुछ सिखा देता है,
तो क्या वक्त के पास किफायत से जीना
सिखाने का और कोई तरीका नहीं है,
और फ़िर वक्त हम आमजनों को ही
क्यों सिखाने पर तुला हुआ है;
क्या वह भी डरता है हमारी तरह
सियासतदानों से;
जो हमें सिर्फ़ ठगने के लिए लेते हैं
आम आदमी का नाम,
और रहते हैं इस महंगाई में भी
लाख रुपए वाले कमरों में;
जो जमीन के बदले आकाशमार्ग से
विचरण करते रहते हैं,
और कहते हैं कि हमारी तरह वे
भी आम आदमी हैं;
क्योकि वे इकोनोमी क्लास
में उड़ते हैं,
मैं पूछना चाहता हूँ इन सियासतदानों से
कि कितने आम भारतीयों के पास लाख रुपए भी हैं
और कितनों ने छूकर भी देखा है कभी वायुयान को।

संभावनाओं को पुरस्कार : एक नया प्रचलन

अमेरिका के राष्ट्रपति को पुरस्कार देकर नोबेल पुरस्कार समिति ने एक नया प्रचलन शुरू किया है और वह है आनेवाले भविष्य में संभावित कार्यों के लिए पुरस्कार देने का प्रचलन। २० जनवरी को ओबामा ने शपथ ग्रहण किया और १ फरवरी पुरस्कार के लिए नामांकन का आखिरी दिन था। इन कुल जमा १२ दिनों में ओबामा ने सिवाय वायदे करने के और कुछ नहीं किया। फ़िर उन्हें उनकी कौन सी उपलब्धि देखकर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया ये तो चयन समिति के सदस्य ही जाने। अब तक तो दुनिया का यह कथित रूप से सबसे बड़ा पुरस्कार किए गए कार्यों के लिए दिया जाता था अब किए जानेवाले कार्यों की संभावनाओं के आधार पर भी दिया जाने लगा है। ओबामा को राष्ट्रपति बने अभी भी नौ महीने ही हुए हैं. पूरी दुनिया हैरान है कि इस दौरान उन्होंने ऐसा क्या कर दिया है कि वे इस पुरस्कार के लायक मान लिए गए? ओबामा को ख़ुद भी हैरानी हुयी है जो जायज भी है। कितनी बड़ी बिडम्बना है कि ओबामा जिस गाँधी को अपना प्रेरणा पुरूष मानते हैं वह गाँधी तो इस पुरस्कार के योग्य नहीं था और ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के १२ वें दिन ही बिना कुछ किए ही पुरस्कार के योग्य हो गए। गाँधी किसी पुरस्कार के मोहताज हों ऐसी बात भी नहीं है। गाँधी ने दुनिया को शान्ति और अहिंसा का जो अमूल्य संदेश दिया वह दुनिया को प्रेरित करता रहे यही उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

सौर ऊर्जा पर खर्च बढाये सरकार

विशेषज्ञों द्वारा देश में सौर ऊर्जा क्षेत्र में अपार संभावनाओं की बातें बार-बार करने के बावजूद न जाने क्यों भारत सरकार आँखें मूंदें बैठी है? जब फारूख अब्दुल्ला को अपारंपरिक ऊर्जा मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया था तब यह उम्मीद जगी थी कि देर से ही सही अब सरकार सौर ऊर्जा पर ज्यादा ध्यान देगी। लेकिन समय बीतने के साथ यह उम्मीद भी दम तोड़ने लगी है। जहाँ तक संभावनाओं का प्रश्न है तो आज ही आया वर्ल्ड इंस्टिट्यूट ऑफ़ सस्तेनाबल एनर्जी यानि वाईज के मुखिया जी एम पिल्लई का बयान काबिलेगौर है। उनका कहना है कि राजस्थान में बेकार पड़ी जमीन के १५ प्रतिशत हिस्से का ही अगर सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोग कर लिया जाए तो सवा चार लाख मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा सकता है। इतना ही नहीं राजस्थान में १६००० मेगावाट तक पवन ऊर्जा का भी उत्पादन किया जा सकता है। हमारे पड़ोसी चीन ने इस दिशा में कदम बढ़ा भी दिया है और २०२० तक ३० गीगा वाट पवन विद्युत और १.८ गीगा वाट सौर विद्युत उत्पादन की योजना बनाई है। (१ गीगा वाट =१ अरब वाट) हम सभी जानते हैं कि चीन और भारत दो सबसे तेज गति से विकसित हो रही अर्थव्यवस्थाएं हैं और जाहिर सी बात है कि विकास की गति बनाये रखने में बिजली की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। फ़िर भी भारत सरकार न जाने किस बात का इंतजार कर रही है? जबकि देश में पहले से ही १२ प्रतिशत बिजली की कमी है। कोई भी ऐसे देश में क्यों निवेश करेगा जहाँ २४ घन्टे में सिर्फ़ १४-१५ घन्टे बिजली रहती हो? दूसरे शब्दों में अगर हम कहें हो विकास-दर की यह दौर बिजली उत्पादन बढ़ाने की दौर भी है सरकार को यह भी ध्यान में रखना चाहिए।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

फिलिपिन्स से सीख लें भारतीय नेता

यह आपको अटपटा भी लग सकता है कि मैं विश्वगुरु रह चुके भारत को एक छोटे से देश से सीख लेने की सलाह दे रहा हूँ। बात ही कुछ ऐसी है। कुछ ही दिनों के अन्तराल में भारत और फिलिपिन्स दोनों ही देशों में बाढ़ आयी है. अभी भी स्थितियां संतोषजनक नहीं हैं। दोनों देशों के नेताओं ने इस बाढ़ के दौरान क्या किया? फिलिपिन्स की राष्ट्रपति ग्लोरिया मकापगल ने जहाँ पीडितों के लिए अपने भव्य महल के द्वार खोल दिए। हजारों लोगों ने राष्ट्रपति भवन में शरण ली। वहीं हमारे देश के नेता जमीन पर आकर सीधे तौर पर पीडितों की पीडा में सहभागी बनने के बजाये बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों के हवाई सर्वेक्षण में लगे रहे। वास्तव में इससे जाहिर होता है कि हमारे नेता पूरी तरह हवा-हवाई बनकर रह गए हैं। न तो उन्हें जनता की वास्तविक स्थिति का ज्ञान है और न ही वे जानना चाहते हैं। जब जनता यूँ हीं हवा में उड़ते रहने पड़ ही वोट दे देती है तो फ़िर क्यूं बेवजह परेशान हुआ जाए। इस तरह हम भी इन हवाई नेताओं को समर्थन देने के दोषी हैं। हम जब अपनी सोंच बदलेंगे तब हमारे ये नेतागण भी आसमान से उतरकर जमीन पर आने को बाध्य हो जायेंगे।

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009

जातिवाद और बिहार

जाति न पूछो साधू की कहावत के बदले बिहार में अब जाति ही पूछो साधू की चरितार्थ हो रही है। अभी कुछ ही दिनों पहले जब खगडिया में नरसंहार की दुखद घटना हुई तो इसमें जातीय हिंसा के भी संकेत पाए गए। इस अवसर पर मुझे वर्षों पहले जब मैंने पूर्णिया पोलिटेक्निक में एडमिशन के लिया था तब पेश आयी दुश्वारियां याद आ गईं।
१९९४ का साल था जब पूरा बिहार आरक्षण समर्थक और विरोधी गुटों में बटा हुआ था। मुझसे मेरे सीनियर छात्रों ने सीधे तौर पर पूछा कि मैं यानि ब्रजकिशोर सिंह किस जाति से आता हूँ। वे जानना चाहते थे कि मैं कोइरी हूँ या राजपूत। बाद में वहां इस तरह की स्थितियां पैदा कर दी गयी कि मुझे पढाई अधूरी छोड़नी पड़ी। मैंने अपनी पूरी ज़िन्दगी में किसी को भी जातीय आधार पर प्रताडित नहीं किया। मेरे दोस्तों में कई हरिजन भी हैं।
यह काफी दुखद है की मीडिया क्षेत्र में भी ऐसे लोग मौजूद हैं जिनकी रुचि लोगों की योग्यता में नहीं बल्कि जाति में ज्यादा है। हमें अगर स्थितियों को बदलना है तो अपने आप को अपने सोंच को बदला होगा। आशा है ब्लॉग के पाठक इस दिशा में आत्मशोधन के लिए अवश्य प्रयास करेंगे।

भ्रष्टाचार का विकेंद्रीकरण

७३ वें संविधान संशोधन द्वारा जब पंचायती राज विधेयक पारित किया गया तब कहा गया कि इससे
सत्ता का विकेंद्रीकरण होगा। परन्तु व्यवहार में ऐसा देखा जा रहा है कि चाहे सत्ता का विकेंद्रीकरण भले ही नहीं हुआ हो भ्रष्टाचार का विकेंद्रीकरण जरूर हो गया है। बिहार के आज ८ अक्टूबर २००९ के सारे अख़बार पंचायतो में हो रहे घपले-घोटालों की खबरों से भरे पड़े हैं। मैं स्वयं देख रहा हूँ कि ९० प्रतिशत तक दी गयी राशि पंचायती राज प्रतिनिधियों कि जेब में चली जा रही है। मैं पंचायती राज का विरोधी नहीं हूँ लेकिन दी गई राशि का सदुपयोग हो रहा है या दुरूपयोग इसकी निगरानी करेगा कौन? बिना समुचित निगरानी की व्यवस्था किए भारी मात्रा में धन थमा देना और तेज विकास की उम्मीद करना दिन में सपना देखना है। अभी भी देर नहीं हुई है संसद को इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए निगरानी की व्यवस्था करनी चाहिए।

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

अकेलापन : वरदान या अभिशाप

यह अकेलापन न जाने मेरे लिए वरदान है या अभिशाप;
आजकल मेरी हालत अजीबोगरीब है,
मैं, सबकुछ समझते हुए भी कुछ भी नहीं समझ पा रहा हूँ,
और सबकुछ करते हुए भी कुछ भी नहीं कर पा रहा हूँ;
सिमटता जा रहा है मेरा दायरा,
मैं ख़ुद को समेटना शुरू कर दिया है कछुए की तरह;
तो क्या मैं ब्लैक होल बनता जा रहा हूँ?
जिसके निकट आने पर नष्ट हो जाएगा सबकुछ;
या फ़िर किसी सुपरनोवा विस्फोट की तैयार हो रही है पूर्वपीठिका,
प्रलय और सृष्टि के दो चरम बिन्दुओं के बीच पेंडुलम की भांति
झूल रहा है मेरा जीवन;
न विजयी, न पराजित, हतप्रभ, आश्चर्यचकित होकर देखता
हुआ वर्तमान को,
जो बनता जा रहा है अतीत;
मेरी ईच्छा-अनिच्छा की परवा किए बिना।

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

बिगडेगी और बिगडेगी दुनिया यही नहीं रहेगी

हिन्दी फ़िल्म मेला के लिए महान गायक मोहम्मद रफी ने कभी यह गाना गाया था कि बिगडेगी और बनेगी दुनियायही रहेगी. पर उस समय वे नहीं जानते थे कि इतनी जल्दी दुनिया में मानवों का अस्तित्व ही खतरे में पर जाएगा।शायद आप समझे नहीं! मेरा मतलब धरती के बढ़ते तापमान से है जिसे लोग आजकल ग्लोबल वार्मिंग के नाम सेजानते हैं.इस साल देश ने जो अकाल देखा वह अप्रत्याशित नहीं था. ऐसा तो होना ही था. धरती की बढती गरमी कोलेकर कई साल पहले ही दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि भारत और चीन में अगले आनेवाले वर्षों मेंभयंकर जलवायु सम्बन्धी बदलाव देखने को मिल सकते हैं. ग्लोबल वार्मिंग के लिए कहीं-न-कहीं हम-आप सभीजिम्मेदार हैं.यह हम सभी के पापों का परिणाम है। चाहे हमने ऐसा कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जित करके किया होया फ़िर बेवजह बिजली बर्बाद करके या फ़िर पैदल जानेलायक जगह पर मोटर से जाकर या फ़िर एयर कन्डीशनका उपयोग करके। अब पाप जो करना था हम कर चुके और परिणाम भी सामने आने लगे हैं. यह सूखा तो बस एकनमूना है. प्रश्न उठता है कि आगे क्या किया जाए? प्रायश्चित! कैसा प्रायश्चित? क्या गंगा-सेवन करते हुए गोबरनिगला जाए. नहीं भइया कम-से-कम इस मामले में तो नहीं. प्रायश्चित के तरीके मैं बताता हूँ जो धरती पर लगेजख्मों पर मरहम का काम करेंगे. बस हमें कुछ सावधानियां बरतनी पड़ेगी.
घर में अगर आप पुराने तरीके वाले बल्ब का उपयोग कर रहे हैं, तो उनकी जगह

सी ऍफ़ एल का उपयोग करें। ७ वाट का सी ऍफ़ एल ४० वाट के बल्ब के बराबर रौशनी देता है। इस तरह आप ८०प्रतिशत तक बिजली बचाकर ग्लोबल वार्मिंग रोकने में सहयोग कर सकते हैं। याद रखिये कि बिजली का लगभग८० प्रतिशत हिस्सा कोयले को जलाकर बनता है, जिससे भारी मात्रा में कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है।
सार्वजानिक स्थानों पर हेलोजन लैम्पों का प्रयोग न करके एल इ डी का प्रयोग किया जाए। एल इ डी यानि लेडलाइट एमिटिंग डायोड। इससे ४० प्रतिशत तक बिजली की बचत होगी।
आने-जाने के लिए जहाँ तक सम्भव हो बसों का प्रयोग करें। एक शोध के अनुसार कुल कार्बन डाई ऑक्साइडउत्सर्जन का ३० प्रतिशत हिस्सा वाहनों से निकलने वाले धुँए का होता है।
जहाँ तक सम्भव हो डेरा कार्यस्थल से पैदल आ-जा सकने वाली दूरी पर ही रखें। अच्छा हो कि नियोक्ता ख़ुद हीकार्यस्थल के पास ही आवासीय कालोनी बसाये
प्लास्टिक के थैलों को बाय-बाय करें। प्लास्टिक के थैलों ने पर्यावरण के लिए बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर दी है।यह १००० साल में विघटित होता है और तब तक हवा में जहरीली गैसें छोड़ता रहेगा।
रिसाईकिल द्वारा उत्पादित कागज़ का उपयोग करें। इस तरह आप ५० प्रतिशत तक ऊर्जा बचा सकते हैं जो कि पूरी तरह से नया कागज़ बनाने में लगती। साथ ही भारी संख्या में पेड़ों को भी कटने से बचा सकते हैं।
७ साल में एक पेड़ जरूर लगायें और उसकी देख-भाल सुनिश्चित करें। एक पेड़ साल में लगभग १ टन कार्बन डाई ऑक्साइड को ओक्सिजन में बदल देता है।
८ लाल बत्ती पर या कहीं भी अगर ३० सेकंड से ज्यादा रूकना हो तो गाड़ी का इंजन बंद कर देन।
९ पैकजिंग में कम-से-कम कागज अथवा पोलीथिन का इस्तेमाल करें। अगर आप साल में इसमें १० प्रतिशत की भी कमी ला पाते हैं तो आप ६ क्विंटल कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन को रूक पाएंगे।

१० सामान को नजदीकी बाजार से खरीदें और उसे लाने में जलने वाले पेट्रोल-डीजल को तो बचाएं ही साथ-ही-साथ इनके जलने से होनेवाले कार्बन डाई ऑक्साइड को भी हवा में जाने से रोकें।

११ एयर कन्डीशन के फिल्टर को हमेश साफ रखें। इस तरह आप साल में लगभग डेढ़ क्विंटल कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन को रोक पाएंगे।
१२ पशुपालक भाई कई कम-कम दूध देनेवाले जानवरों की जगह एक ज्यादा दूध देनेवाले जानवर को पालें, क्योंकि इनके मल-मूत्र से निकलनेवाली मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड गैसें कार्बन डाई ऑक्साइड से क्रमशः २३ और २९६ गुना ज्यादा हरित गृह प्रभाव रखती हैं।





रविवार, 27 सितंबर 2009

न्याय प्रणाली में सुधार जरूरी

हमारे देश की न्याय व्यवस्था इतनी विलंबकारी, खर्चीली और भ्रष्ट हो गई है कि इसे न्याय की जगह अन्याय व्यवस्था कहना ज्यादा ठीक रहेगा। मैं देखता हूँ कि निचली अदालतों में अधिकतर फैसले पैसे लेकर लिए जा रहे हैं। ऊपरी अदालतों का प्रत्यक्ष अनुभव तो मुझे नहीं है पर वहां भी स्थितियां भिन्न नहीं होगी ऐसा मुझे लगता है। अगर इसी को न्याय प्रणाली कहते हैं तो फिर इसकी जरूरत ही क्या है? निश्चित रूप से इसमें व्यापक सुधार की आवश्यकता है। भंग सिर्फ़ लोटे में नहीं है बल्कि पूरे कुएं में ही भंग पड़ी हुयी है। इसमें आमूल-चूल परिवर्तन होने चाहिए और शीघ्रातिशीघ्र होने चाहिए। मुकदमों के निपटारे के लिए एक समय सीमा तय होनी चाहिए। यह बात किसी से छिपी हुयी नहीं है की नक्सालियों के बढ़ते प्रभाव क्षेत्र के पीछे हमारी विलंबकारी न्याय प्रणाली भी है। पहले ही काफी देर हो चुकी है।
जनसेवक होते हुए भी न्यायाधीशों की कोई जिम्मेवारी निश्चित नहीं है। ग़लत फ़ैसला लेने पर उन पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। सारे न्यायाधीशों की संपत्ति की भी समय-समय पर जाँच की व्यवस्था होनी चाहिए। आख़िर वे भी हाड़-मांस के ही बने हैं।

रविवार, 20 सितंबर 2009

सत्य और सत्ता

हमारे देश के राजनेताओं की छवि जनता के बीच कितनी ख़राब हो चुकी है यह इसी बात से प्रमाणित होती है कि वर्तमान पीढी का कोई भी विद्यार्थी नेता बनाना नहीं चाहता। भारतीय वांग्मय में सत्य और धर्म एक-दूसरे के पर्याय माने जाते रहे हैं। हमारे राष्ट्रीय चिन्ह पर भी सत्यमेव जयते को शामिल कर पूरी दुनिया को विश्वगुरु ने यही संदेश दिया है। लेकिन लगता है कि हमारे राजनेताओं ने इस सत्य को पूरी तरह रद्दी की टोकरी में डाल दिया है। उनके लिए तो सत्ता ही सत्य है। विलासिता ही जीवन-शैली है और येन-केन-प्रकारेण असीमित धनार्जन जीवन का लक्ष्य। फ़िर तो हम अमेरिका क्या चीन की भी बराबरी नहीं कर पाएंगे और नेपाल भी आखें दिखाता रहेगा। वर्तमान नेतृत्व इतना निकम्मा और बेहया-बेशर्म हो गया है कि हम किसी भी राजनेता के बारे में निश्चित होकर नहीं कह सकते कि यह नेता ईमानदार और देशभक्त है। घोटाला करना अब योग्यता बन गया है और खुलकर जाति-धर्म का कुत्सित खेल खेला जा रहा है। इकबाल की तरह मैं भी यह सोंच रहा हूँ कि आख़िर यह देश टिका हुआ कैसे है- कुछ बात है कि हस्ती-------------? पर कोई उत्तर नहीं मिल रहा है। जबकि मियां इकबाल के समय तो सिर्फ़ दुनिया हमारी दुश्मन थी, अब हम ख़ुद भी अपना दुश्मन बन गए हैं।

नहीं मेरी राह बदल देना

माँ दुर्गा के चरणों में समर्पित

नहीं मेरी राह बदल देना,
मुझे छोड़ के ना तुम चल देना।
रहे चिर काल तक निवास तेरा मेरे हृदय के गह्वर में,
नहीं जमीं पे तुमसे जुदा रहूँ न अलग रहूँ मैं अम्बर में;
छीन के स्वर्गिक प्राकृतिक छटा
नहीं कंक्रीटों का जंगल देना;
नहीं अपनी राह बदल देना,
मुझे छोड़ के ना तुम चल देना।
बीते जीवन मेरा तेरी ही पूजा में,
नहीं चाहूं इसके सिवा दूजा मैं;
टूट जाए जो सिर्फ़ एक पत्थर से
नहीं ऐसा शीशमहल देना;
नहीं अपनी राह बदल देना,
मुझे छोड़कर ना तुम चल देना।
माता यही है मेरी कामना,
जब-जब हो बुरे वक़्त का सामना;
रख देना हाथ मेरे कंधे पर,
यह दया करना इस अंधे पर;
जब पड़ जाए अकाल मेरे जीवन में
तुम प्यार की नई फसल देना;
नहीं अपनी राह बदल देना,
मुझे छोड़ के ना तुम चल देना।
सौंपकर जीवन तेरे हाथों में,
आ गया मैं तेरी बातों में;
तेरे दर्शन को जो तरसती रहे
एक ह्रदय अति विकल देना;
नहीं अपनी राह बदल देना,
मुझे छोड़ के ना तुम चल देना।
कहीं ऐसा न हो कि कभी मुझे छोड़नी पड़े अपनी राह,
मेरा साहस न चुक जाए और मृत हो जाए जीने की चाह;
जो तूफानों में भी ना विचलित हो
मुझे विश्वास ऐसा अटल देना;
नहीं अपनी राह बदल देना,
मुझे छोड़ के ना तुम चल देना।
मेरे स्वाभाविक जीवन में कभी विघ्न न हो,
मेरा मन उत्तेजनाराहित रहे और अधिक उद्विग्न न हो;
तुम मेरे लिए जरूर ऐसा
कोई इंतजाम कर देना;
नहीं अपनी राह बदल देना,
मुझे छोड़ के ना ख़ुद चल देना।

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

बिहार के उप चुनाव परिणाम : संकेत और निहितार्थ

हममें से कई बुद्धिजीवी राजनीति पर बात करने से भी कतराते हैं और मानते हैं कि राजनीति से दूर रहने में ही भलाई है। लेकिन क्या हम ऐसा करके ख़ुद को ही धोखा नहीं दे रहे होते हैं? एक यूरोपियन राजनीतिज्ञ ने कहा भी है कि हमारी रुचि भले ही राजनीति में नहीं हो राजनीति कि रुचि हममें हमेशा होती है। हमारे रहन- सहन से लेकर हमारे सामाजिक परिवेश तक को राजनीति प्रभावित करती है। इसीलिए अगर हम बिहार में हुए उपचुनाव के परिणामों पर एक नज़र डालें तो यह कोई ग़लत काम नहीं होगा।
बिहार हमेशा से भारत की राजनीति को मार्ग दिखाता रहा है। बिहार निश्चित रूप से परिवर्तन की ओर अग्रसर है। इस परिवर्तन को बिहार की जनता ने लोक सभा चुनाव में रा ज ग को वोट देकर स्वीकार भी किया। फ़िर सवाल उठता है कि मात्र तीन महीने में ऐसा क्या हो गया कि नीतीशजी को चिंतन बैठक बुलाने कि जरूरत आन पड़ी। कारण कई गिनाए जा सकते हैं। सबसे पहली बात कि नीतीशजी ने एकबारगी सबको नाराज़ कर दिया। युवा शिक्षामित्र नियुक्ति के तीन साल बाद हटायेजाने या हटायेजाने का खतरा उत्पन्न हो जाने से नाराज़ हो गए। जबकि लोकसभा के चुनाव में इन्होने काफी बढ़-चढ़कर सरकार का समर्थन किया था।
विश्वविद्यालय के कर्मचारी विश्वविद्यालयों में राज्य सरकार के बढ़ते हस्तक्षेप और अनियमित वेतन से नाराज़ थे। विश्वविद्यालय शिक्षकों कि उम्रसीमा ६५ साल किए जाने कि घोषणा ने शिक्षकों और युवाओं दोनों को एकसाथ नाराज़ किया। शिक्षक लागू नहीं किए जाने से और युवा इसकी घोषणा मात्र से क्षुब्ध थे।
इस तरह सरकार ने सभी वेतनभोगियों को अपने खिलाफ कर लिया।
जातीय आधार पर देखा जाए तो सवर्ण न्यायिक क्षेत्रों में आरक्षण, बटाईदारी कानून लागू करने की आशंकाओं, पंचायतो में आरक्षण आदि कारणों से सरकार को सबक सिखाने के मूड में थे.
पिछडों में यादव मतदाता फ़िर से आर जे डी की ओर मुड गए, मुस्लिम वोटों में बिखराव आ गया और दलितों को अपना भविष्य एल जे पी के हाथों में ज्यादा सुरक्षित दिखा.
परिणाम आपके सामने है। कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में सुधार अवश्य हुआ है लेकिन अफसरों की तानाशाही भी बढ़ गई है। बिजली एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें स्थितियां सुधरने के बजाए बिगड़ी है। नीतीशजी ने सोचा था कि कांटी और बरौनी ताप विद्युत घर एन टी पी सी के हाथों में देने से स्थिति में सुधार होगा। लेकिन केंद्रीय उपक्रम होने के कारण एन टी पी सी जान-बूझकर बिहार सरकार को परेशां करने लगा है और नीतीशजी सिवाय मूकदर्शक बने रहने के कुछ भी कर पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं। बिहार के मतदाताओं में साक्षरता की कमी भी रा जग की हार में कहीं-न-कहीं जिम्मेवार रही है। लालू जानते थे कि बिहार की जनता नहीं जानती है कि महंगाई के लिए केन्द्र सरकार जिम्मेदार होती है। इसलिए उन्होंने महंगाई के लिए राज्य सरकार को दोषी ठहराया और इसका लाभ भी उन्हें मिला।
परिणाम चाहे जो भी रहा हो मैं मानता हूँ कि बिहार अब विकास की पटरी पर लौट आया है और इसके लिए सबसे ज्यादा साधुवाद के पत्र हैं नीतिश कुमार। कभी-कभी बदलाव जनता को मनमाफिक नहीं भी बैठता है। जैसा आंध्र में चंद्रबाबू के साथ हुआ। इसलिए उन्हें हर कदम फूंक- फूंक कर उठाना होगा। कहने कि जरूरत नहीं- बहुत कठिन है डगर राजनीति की।

बुधवार, 16 सितंबर 2009

शशि थरूर क्या विदेश राज्यमंत्री होने के लायक हैं?

भारत के सार्वकालिक महान कूटनीतिज्ञ और विदेश राज्य मंत्र शशि थरूर ने विमानों के इकोनोमी क्लास को जानवरों का बड़ा कहकर कांग्रेस के सादगी के अभियान को जोरदार झटका दिया है. हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने इकोनोमी क्लास में विमान-यात्रा कर अपनी पार्टी की सरकार के मंत्रियों को सादगी का संदेश दिया था. हालाँकि उनकी यह कथित सादगी भरी यात्रा अंततः सरकारी क्षेत्र की विमान कम्पनी के लिए चूं-चूं का मुरब्बा ही सिद्ध हुई और सुरक्षा कारणों से लगभग आधी सीटें खाली करवानी पर गईं. कुछ इसी तरह की घटना राहुल गाँधी की रेल यात्रा में भी देखने को मिली, जिसका गुब्बार अभी थमा भी नहीं है.
ये श्रीमान शशि थरूर वही व्यक्ति हैं जिनको भारत ने यूएन ओ के महासचिव पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाया था. शशिजी को इकोनोमी क्लास जानवरों का बड़ा लगता है तो इसका सीधा मतलब है की इसमें यात्रा करने वाले उनकी नज़र में जानवर हैं. फ़िर हम ज़मीन पर चलने वाले लोगों के लिए तो नया विशेषण ही गढ़ना होगा. शायद शशिजी ने कुछ सोंच भी रखा हो. क्या बिडम्बना है की शशिजी जिस सरकार में विदेश राज्य मंत्री हैं, वह हम जमीन पर रेंगने वाले कीडे- मकोडों के वोट से बनी है। हालाँकि कांग्रेस पार्टी ने उनके मतों को नकार दिया है, क्या इस तरह की विलासितापूर्ण ज़िन्दगी जीने वाले व्यक्ति को मंत्री बनाये रखना उचित है; वह भी ऐसी सरकार में जो कथित रूप से आमलोगों की चिंता करने वाली सरकार है।

धनवान?

एक बूढा-सा जीर्ण- शीर्ण कायावाला
तथाकथित भिखारी सो रहा है;
खुले आसमान के नीचे
सारी चिंताओं को कदाचित अपने
ईंट रुपी तकिये के नीचे दबाकर,
चेहरे पर लिए परम संतोष का भावः
जो शायद उसकी कंगाली से उपजा है;
वह बीच-बीच में मुस्कुराता भी है,
न जाने कौन- से सपने देखकर;
शायद भरपेट रोटी मिलने के सपने;
आती-जाती सांसों के साथ
गालों के फूलने और पिचकने से,
मालूम हो रहा है की वह जीवित है अब भी;
सीने में बंद यही एक मुट्ठी बंद हवा,
उसकी एकमात्र संपत्ति है;
वह सुख-दुःख, मान-अपमान
से ऊपर उठ चुका है,
और बन चुका है
दुनिया का सबसे धनवान व्यक्ति.

टूटते-दरकते रिश्ते

भारत में विवाह समझौता नहीं बल्कि संस्कार माना जाता रहा है। लेकिन वर्तमान के जटिल यथार्थ के सामने क्या इस रिश्ते में इतनी गर्माहट बच गयी है जिसके चलते पति-पत्नी स्वाभविक जीवन-साथी माने जाते थे? आजकल के युवाओं में वैसे भी सबकुछ ठेंगे पर रखने का फैशन है, चाहे रिश्ते हों या कानून। पहले जहाँ इस पवित्र बंधन के द्वारा दो लोगों का जीवन दो नहीं रहकर एक हो जाता था अब ऐसा नहीं हो पा रहा है।
पति हो या पत्नी दोनों जीवन की अपने हिसाब से व्याख्या करने लगे हैं, अब दोनों की अपनी ज़िन्दगी भी है, अलग-अलग। एकात्मता जहाँ समन्वय को बढ़ता है, अलगाव की अवस्था में सम्बन्ध समझौते में बदल जाता है। फ़िर चाहे वह भक्त या भगवान के बीच का सम्बन्ध हो या मानव और मानव के बीच का। हम अपने आराध्य से मनौती मानते हैं कि मुझे यह दे दो तो मैं पूजा-अनुष्ठान का आयोजन करूंगा या दर्शन के लिए आऊंगा यहाँ भी एक समझौता है।
तो फ़िर रिश्तों के कमजोर पड़ने के कारण क्या हैं? कारण जहाँ तक मेरी दृष्टि जाती है वो है प्रेम की कमी। प्रेम में त्याग छिपा होता है। राम प्रेम की प्रतिमूर्ति होने के साथ-साथ त्याग की भी प्रतिमूर्ति हैं।
आज के युवा अपने अधिकारों के प्रति को जागरूक हो गए हैं लेकिन कर्तव्यों के मामले में यही बात दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है। कर्तव्यों पर अधिकारों को हावी होते हुए आप महाभारत में भी देख सकते है. कर्तव्य और अधिकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक के बिना दूसरा सिर्फ़ अराजकता को जन्म देता है। वर्तमान भारत में चारों ओर छाई अराजकता के पीछे भी शायद यही कारण है। नेताओं और अधिकारियों को असीमित अधिकार तो दे दिए गए लेकिन कर्तव्य ज्ञान कौन कराएगा? कदाचित रिश्तों के दरकने के पीछे भी यही कारण है। रामायण से महाभारत तक के समय में आए अन्तर में हम इसे स्पष्ट देख सकते हैं। जहाँ रामायण में हर कोई त्याग के लिए तत्पर है वहीं महाभारत में बिना कर्तव्य किए ही दुर्योधन अधिकार चाहता है और इस क्रम में पांडवों
के अधिकारों की अनदेखी करने लगता है।

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

नीतिश और भ्रष्टाचार

बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमारजी आजकल भ्रष्टाचार के खिलाफ जेहाद करते दिखना चाह रहे हैं. वे केन्द्र की सरकार से मांग कर रहे हैं की वह भ्रष्टाचार के मामलों को तीव्र गति से सुनवाई करने के लिए नए फास्ट ट्रैक न्यायालयों के गठन की अनुमति दे.
क्या वास्तव में वे भ्रष्टाचार का खत्म चाहते हैं? लोकसभा चुनाव के समय बिहार राज्य विद्युत बोर्ड के अध्यक्ष स्वपन मुखर्जी के खिलाफ निगरानी विभाग ने २१ करोड़ रुपए की हेरा-फेरी का मामला पकड़ा था. लेकिन आज तक कुछ हुआ नहीं और मुखर्जी साहब अब भी बाईज्ज़त अपने पद पर बने हुए हैं. क्या कोई आम आदमी निगरानी के सिकंजे में आता तब भी सरकार का यही रवैय्या होता? क्या निगरानी की तलवार सिर्फ़ छोटे अधिकारीयों और कर्मचारियों के लिए है?

सोमवार, 14 सितंबर 2009

सब कुछ करना पड़ता है

सब कुछ करना पड़ता है;
लाखों दुखों को दबाकर दिल में,
होकर अपमानित भरी महफ़िल में ;
हँसते रहना पड़ता है,
सब कुछ करमा पड़ता है.
सुनते रहना पड़ता है बातें,
फ़िर भी मामूली रकम हैं पाते;
मामूली रकम पाकर भी
बॉस से डरना पड़ता है,
सब कुछ करना पड़ता है.
काम करते हम रात में जगकर ,
घर-परिवार ईष्ट -मित्रों को तजकर;
सुनहरे भविष्य की आशा में
शोषण को तैयार रहना पड़ता है,
सब कुछ करना पड़ता है.

महान बी. एस. एन. एल.

भारत सरकार का उपक्रम बी. एस. एन. एल. अपनी महान कार्यशैली के लिए अपने ग्राहकों के बीच प्रसिद्द रहा है. इसकी सेवाओं से बुरी तरह प्रभावित होने के बाद हम हाजीपुर वासियों ने कुल जमा ५ साल का दुरूपयोग करते हुए इसका नया अब्ब्रेविअशन तैयार किया भाई साहब नहीं लगेगा. क्यों परेशान हो रहे हैं? जिस तरह यह देश सुख और दुःख के अनुभवों से परे रहते हुए चलाया जा रहा है उसी तरह बीएसएनएल भी पूरी तरह भगवान भरोसे चल रहा है.
बेरोजगारों का सम्मान करने में भी इसका जवाब नहीं. जिस काम कंप्यूटर फोरमेशन के लिए हाजीपुर में अधिकतम ३०० रुपए देने का प्रचलन है, इस महान कंपनी के हाजीपुर स्थित अधिकारी १५०० का बिल बनाकर १२०० रुपए कंप्यूटर मिकैनिक को दे डालते हैं. क्या परदुख कातरता है!
छुट्टी चाहे वह साप्ताहिक अवकाश ही क्यों न हो, घर जाने से पहले इसके कर्मचारी और अधिकारी सभी सेवाओं को बंद कर देते हैं और ग्राहकों को भी अमन-चैन से छुट्टी मानाने के अवसर दे जाते हैं.हमारे देश की सबसे बड़ी नदी यानी भ्रष्टाचार की गंगा बीएसएनएल से होकर भी बहती है. इतने महत्वपूर्ण तीर्थस्थल की उपेक्षा उसके बस की बात भी नहीं है. हर काम २० प्रतिशत के कमीशन पर. खुली दूकान है भाई.
अब ज्यादा क्या बोलूं? मैं क्या शेषनाग भी इसकी महिमा का गुणगान करने में अपने-आपको असमर्थ पाएंगे. खैर बांकी का गुणगान फिर कभी. अभी मुझे अपना फ़ोन कनेक्शन ठीक करवाने बी. एस. एन.एल. कार्यालय जाना है.

शनिवार, 12 सितंबर 2009

आम आदमी की सरकार?

देश महंगाई की बुखार से तप रहा है और हमारी आम लोगों की सरकार मंत्री फाइव स्टार होटल में ऐश कर रहे थे। उनका दुःख है कि उनको अलॉट किया गया बंगला उनके रहने लायक नहीं है। जब दिल्ली के लुटियन ज़ोन में बने बंगले इन कथित इंसानों के रहने लायक नहीं हैं तब फिर २०-२५ हज़ार में बने इंदिरा आवास कैसे रहने लायक हो सकते हैं, क्या सरकार बताएगी? गाँधी का नाम लेकर वोट मांगने वाली पार्टी ने किस तरह गाँधी और उनके सिद्धांतों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है, उसका इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है?

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

कब जागेगी सरकार

बचपन में मैंने एक श्लोक पढ़ा था- व्यव्हारेन मित्राणि जायन्ते, रिपवस्तथा। लेकिन लगता है हमारी केन्द्र सरकार के किसी भी मंत्री ने नहीं पढ़ा। तभी तो वह चीन की तरफ़ से लगातार किए जा रहे शत्रुतापूर्ण व्यव्हार में भी मित्रता के लक्षण खोज रहे हैं। चीन भारत के सभी पड़ोसी देशों में अपना प्रभाव बढ़ने की कोशिश कर रहा है और इसमें उसे सफलता भी मिल रही है। चाहे बांग्लादेश हो या बर्मा या इंडोनेशिया या फ़िर श्रीलंका, हर जगह उसकी दखल बढ़ रही है। पाकिस्तान की पीठ पर तो उसका वरदहस्त है। पाकिस्तान वास्तव में अमेरिका नहीं चीन के बल पर भारत को विगत पचास वर्षों से परेशां कर रहा है। चीन भारत से तीन गुना बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और सामरिक शक्ति में सिर्फ़ अमेरिका और रूस ही उससे टक्कर ले सकते है। वास्तव में हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री जब वित्त मंत्री थे तब उन्होंने रक्षा अनुसन्धान पर होनेवाले व्यय में भारी कटौती कर दी थी। वर्तमान में भी स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं है. माना कि आर्थिक विकास आवश्यक है, लेकिन चारों तरफ़ से दुश्मनों से घिरे रहकर कोई भी देश तब तक आर्थिक महाशक्ति नहीं बन सकता है, जब तक उसमें जरुरत होने पर किसी भी देश से निबटने की क्षमता न हो। इसीलिए तो दिनकर ने कुरुक्षेत्र में कहा था-क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो , उसको क्या जो दंतहीन, विष हीन, विनीत, सरल हो। लगता है हमारी केन्द्र सरकार को न तो देश में लगातार बढ़ रही महंगाई से कोई मतलब है और न ही हमारे देश के चारों ओर चल रही राजनयिक, सामरिक और कूटनीतिक गतिविधियों से। मतलब है तो बस सत्ता में बने रहने से यानि उसका पञ्च लाइन है- सत्ता किसी भी कीमत पर। हाँ एक बात तो माननी ही पड़ेगी कि कभी-न- कभी सिंघजी ने रामचरित मानस की ये पक्तियां जरूर पढ़ी होगी- मून्दहूँ आँख कतहूँ कछु नाहीं। तभी तो वे मौका मिलते ही झपकी ले लेते हैं। कुछ समझे, श्रीमान ये सोते हुए व्यक्ति की सरकार है, सोती हुई सरकार।

रविवार, 6 सितंबर 2009

महंगाई के कारण और निवारण

आजकल चारों तरफ़ हमारे देश में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती महंगाई के कारण त्राहि-त्राहि मची हुई है और आम आदमी की सरकार जब रोम जल रहा था तब नीरो बंशी बजा रहा था को चरितार्थ करने पर तुली हुई है। यहाँ तक कि लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार की पहली प्राथमिकता ९ प्रतिशत विकास-दर प्राप्त करना बताया। महगाई को पहली प्राथमिकता बताते भी कैसे? उनकी सरकार के अनुसार तो परेशानी का कारण महंगाई का ज्यादा होना नहीं बल्कि मुद्रास्फीति-दर (सरकारी भाषा में महंगाई-दर का यही नाम है) का शून्य प्रतिशत से नीचे चला जाना है। क्या कहना आम आदमी की सरकार का और उसकी आम आदमी की चिंता का। एक तरफ़ तो चीनी के मूल्य पचास रुपए किलो का सार्वकालिक रिकॉर्ड बनाने की ओर अग्रसर है, अरहर की दाल वाजपेयी काल के ३० रुपए प्रति किलो से १०० रुपए प्रति किलो पर पहुँच चुकी है और सरकार कह रही है कि मुद्रा-स्फीति में वृद्धि की दर धनात्मक की जगह ऋणात्मक हो गई है। सबसे पहली बात कि मुद्रा-स्फीति का बढ़ना किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए स्वाभाविक तो है ही जरूरी भी है। अब जहाँ तक सरकार के मानने की बात है कि महंगाई-दर शून्य प्रतिशत से नीचे चल रही है तो ऐसा वह जनता को भ्रमित करने के लिए कह रही है। सरकार जान बूझकर महंगाई को थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर मापती है, जबकि वास्तविक महंगाई का पता उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से चलता है, जो इस समय भी दहाई अंकों में है. महंगाई मौसमी भी होती है जैसे बरसात में सब्जियों के दाम का बढ़ जाना। बेमौसमी महंगाई भी होती है, जैसे
दाल, अनाज और उपभोक्ता वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि होना। लेकिन इस बार की महंगाई इन दोनों से अलग है। अर्थव्यवस्था वृद्धि-दर में तो गिरावट आ रही है वहीं महंगाई (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर) सातवें आसमान पर है। ऊपर से कोढ़ में खाज यह कि मानसून की बेवफाई के चलते चालू वित्तीय वर्ष में कृषि उत्पादन में भी लगभग १५ प्रतिशत की कमी आने के आसार दिखाई दे रहे हैं। जाहिर है कि मांग और पूर्ति में भारी अन्तर पैदा हो गया है। सरकार ने एक बार फ़िर जनता को यह कह कर गुमराह करना चाहा कि विदेशों से दल और अनाज का आयात किया जाएगा, जबकि दुनिया के किसी भी दूसरे देश में यह क्षमता नहीं है कि सवा अरब लोगों का पेट भर सके। मैं तो सोचता हूँ कि सरकार कितनी बेशर्म हो गई है। आजादी के ६२ साल बाद भी हमारी खेती वर्षा पर निर्भर हैं! कारण साफ है उदारवाद की हवा में हम भूल गए कि कृषि पर भी ध्यान देना जरूरी है। हम डॉलर और पाउंड तो नहीं खा सकते। २००८-०९ में कृषि विकास दर १.६ प्रतिशत रह गई जबकि भारत कि तेजी से बढती आबादी के लिए इसका ४ प्रतिशत होना जरूरी माना जाता है। एक बात और अगर आप भी निजीकरण और बाजारवाद के समर्थक हैं तो यह तो इसके दुष्प्रभाव की एक बानगी भर है। बाजार की शक्तियों को दाम बढ़ने में ही लाभ नज़र आ रहा है। उदहारण के लिए, अब हम आटा पाकेट वाला खाते हैं। स्वाभाविक है कि इस व्यवसाय से जुडी कंपनियों ने
गेहूं के मौसम में जमकर इसकी खरीद की और अपने स्टॉक में जमा कर लिया। अब तक तो मूल्य नियंत्रण सरकार के हाथों में था, अब इन कम्पनियों के हाथों में आ गया। अब भी अगर सरकार चाहे तो सभी बिचौलियों को समाप्त कर स्थिति को नियंत्रित कर सकती है, लेकिन इसके लिए ईमानदार नेताओं की जरूरत होगी, जो भारत से विलुप्त हो चुके हैं। हमें कृषि के महत्व को भी समझाना होगा । सिंचाई के वैकल्पिक साधन खोजने होंगे और विभिन्न योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार पर नियंत्रण पाना होगा, अन्यथा युवाओं की तेजी से बढती जनसंख्या वरदान के बजाय अभिशाप बन जायेगी.

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

शर्म करो मीडिया

कल बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतिश कुमार के नाम १८ साल पुराने एक मामले में सम्मन जारी किया। आश्चर्य की बात है कि बिहार के किसी भी बड़े अख़बार ने इसे पेज १ पर प्रकाशित करने कि हिम्मत नहीं दिखाई। बिहार के सबसे बड़े अख़बार ने तो पेज २ पर भी इसे स्थान नहीं दिया। ये बातें क्या दर्शाती हैं? क्या बिहार की प्रिंट मीडिया ने सरकार के आगे घुटने टेक दिए हैं या फ़िर सरकारी विज्ञापन छिन जाने का डर सता रहा है? लगता है कि इन विशालकाय मीडिया समूहों का जनसेवा से कुछ सरोकार नहीं रह गया है। इस उपभोक्तावादी युग में कुछ लोगों के लिए पैसा ही सब कुछ जो हो गया है, भगवान से भी ज्यादा बड़ा.

हिंदुस्तान कोचिंग स्कॉलरशिप

मैं हिंदुस्तान अख़बार में कई वर्ष तक काम कर चुका हूँ और घर में भी हिंदुस्तान ही लेता हूँ। आजकल उसमें इस परियोजना में चयनित छात्र- छात्रों की प्रतिक्रियाएं और अनुभव छापे जा रहे हैं। कोई कहता है कि मेरी तो लाइफ बन गयी, तो कोई कह रहा है कि हिंदुस्तान ने मुझे बर्बाद होने से बचा लिया। खबरें इतने आकर्षक ढंग से छापी जा रही हैं कि लगता है कि जैसे इनका चयन आई आई टी के लिए हो गया है। मैं इस अभियान का विरोधी नहीं हूँ, लेकिन मैं जानता हूँ कि इस समाचार-पत्र में विज्ञापन नुमा समाचारों के लिए संवाददाताओं की कितनी फजीहत की जाती है। मैं अख़बार के नीति-नियंताओं से यह पूछता हूँ कि फ़िर ये खबरें समाचार हैं या स्वयं हिंदुस्तान और ब्रिल्लिएंत कोचिंग का विज्ञापन। अगर ये समाचार हैं तो फ़िर यही बता दें कि समाचार और विज्ञापन में क्या अन्तर है? दूसरी बात यह कि २०००० रुपए से कम मासिक आय वाले छात्र-छात्राएं भाग ले सकते हैं लेकिन हिंदुस्तान टाईम्स मीडिया लिमिटेड के कर्मियों के बच्चे भाग नहीं ले सकते हैं। मैं पूछता हूँ कि क्या हिंदुस्तान के सभी कर्मचारियों का वेतन २०००० रुपए से ज्यादा है या हिंदुस्तान में काम करना अपराध है? जहाँ तक मैं समझता हूँ हिंदुस्तान, बिहार के संभवतः ९० प्रतिशत कर्मियों का मासिक वेतन ३००० से भी कम है, फ़िर क्यों उन्हें इस योजना से बाहर कर दिया गया?

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

ताज़ी हवा

कलम चले तो जिगर खुश भी हो और छलनी भी
कलम रुके तो निजाम ऐ ज़िन्दगी भी रुक जाये
कलम उठे तो उठे सर तमाम दुनिया का
कलम झुके तो खुदा की नज़र भी झुक जाए


- ताज़ा हवा से साभार

बुधवार, 2 सितंबर 2009

ये क्या हो रहा है

हम अक्सर देखते हैं की देश, समाज और हमारे व्यक्तिगत जीवन में बहुत-सी

ऐसी बातें और घटनाएँ होती रहती हैं जो हमारे नियंत्रण में नहीं होती हैं। तब हम परेशां हो जाते हैं और सोचने को बाध्य हो जाते हैं की ये क्या हो रहा है? बीजेपी में जो हो रहा है उसके बारे में आडवाणी जी ने कभी नहीं सोचा होगा। निराश, हताश अमिताभ बच्चन को कभी हरिवंश राय बच्चन ने कहा था की जब तेरे मन का हो तो अच्छा और मन का न हो तो और भी अच्छा क्योंकि संसार को चलनेवाला आपसे ज्यादा जानता है की आपके लिए क्या अच्छा और क्या बुरा है। जीवन में मैंने न जाने कितने उतार-चढाव देखे हैं। आपने भी देखे होंगे। जीवन की अपने गति होती है, वह कभी और कहीं रूकती नहीं है। रूकते हैं हम। अगर आप सत्य के मार्ग पर चलकर सफर तय करना चाहते हैं तो सफलता में हो सकता है की देरी हो। पर वह सफलता विकार- रहित होगी। बिना साइड-एफ्फेक्ट्स के। और आप ज्यादा आनंद पायेंगे। दुनिया वही है लोगों की सोंच बदल गई है। कुछ लोग माउस की क्लिक की तरह तुंरत सफलता पा लेना चाहते हैं। धन कमा लेना चाहते हैं। इस जल्दीबाजी के कारन बहुत-कुछ पीछे छूट जाता है। छुट जाता है माँ का आँचल और सोंधी-सोंधी खुशबू वाली गाँव की जमीन। अंत में पता चलता है जीवन व्यर्थ हो गया। समाज और राष्ट्र से हर किसी को कुछ-न-कुछ प्राप्त होता है। पर हम समाज और देश को देते क्या हैं? कुछ भी नहीं। बिना कुछ दिए सब-कुछ मुफ्त में पा लेने की आशा रखते हैं और जीवन बिताकर चले जाते हैं। आज हमारे आदर्श राम,कृष्ण,गाँधी नहीं बल्कि आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक अपराधी हो गए हैं। जब उद्देश्य ही ग़लत हो या नामालूम हो तो फ़िर परिणाम तो ग़लत आएगा ही। इस पर आप भी गौर करें हमें भी अपने टिप्पणियों द्वारा अवगत कराएँ.

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

मैं दर्द दबाकर हंसता हूँ

मैं दर्द दबाकर हंसता हूँ
आखों में भरकर के आंसू ,
लेकर किरमिचें टूटे सपनों के दिल में;
सजाता रहता हूँ मुस्कानें
सूखे, मुरझाये अधरों पर,
पर सूख के लिए तरसता हूँ
मैं दर्द दबाकर हंसता हूँ।
छायी रहती हैं धून्धेन दिल पर
हरपल विकट उदासी की,
उग आयीं हैं लहलह फसल
जीवन में सत्यानाशी की;
ठहाकों की गर्जन लेकर
व्यंग्य बनकर बरसता हूँ
मैं दर्द दबाकर हंसता हूँ

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

न दैन्यम न पलायनम

यकीनन आप यकीन नहीं करेंगे,
मैं एक पत्थरदिल इंसान हूँ;
हाँ यह एक अलग बात है की
मेरा दिल अनगढ़ नहीं है,
लगातार वक्त इस पर
अपने छेनी-हथौरे चलाता रहा है
बेरहमी से।
कई बार मैंने महसूस किया है
की जैसे मैं नदी की धारा में फंसा
पत्थर हूँ
देश, काल और परिस्थिति कुछ भी
मेरे नियंत्रण में नहीं है,
और मैं लुढ़कता-पुढ़कता चला
जा रहा हूँ अपनी नियति की ओर;
मेरी यात्रा जारी है सुख-दुःख के दोनों तीरों
के बीच,
परन्तु कभी-कभी मैंने सुखद स्थितियों को
हाथों से नहीं जाने देने की कोशिश भी की है;
पकड़ना चाहा है जमीन को चिमटकर;
भले ही तेज धारा ने धकेल दिया हो आगे करके विवश,
तो क्या मैं हार गया हूँ युद्ध,
नही! कदापि नहीं! लड़ना भी अपने-आपमें कम नहीं है;
फ़िर मैंने तो घनघोर युद्ध किया है
अथक और अनंत,
आज तीरों की शैय्या पर भले ही
जिंदगी ने लिटा दिया हो मुझे,
मैंने इस बदलती दुनिया के एक छोटे
से हिस्से को ही सही,
अपने अनुसार बदलने की जिद
नहीं छोड़ी है;
क्योंकि अभी भी मेरी सांसें
रुकी नहीं हैं, चल रही हैं.

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

बाघ की खाल

तो हर प्रतियोगिता परिक्षा देने के बाद,
नौकरी खोजता हुआ पहुँच गया विचित्र शहर में,
जहाँ हर घर की अलगनी पर सूख रहे व्याघ्रचर्म,
मैं हुआ हतप्रभ की यह कैसा सहर है,
जहाँ के लोगों को अपनी ही चमरी पर नहीं है विश्वास,
यह अभिनय प्रवीण लोगों का तो सहर नहीं है,
एक कार्यालय में संपर्क कराने पर,
मझे भी मिल गयी नौकरी,
भार दिया गया मुझे सच को झूठ
और झूठ को सच में बदलने का;

इससे पहले मैंने मिटटी तेल को पेट्रोल में,
पानी को रसोई गैस में;
कंकर को गेहूं में बदलने
जैसे दंधे देखे-सुने थे;
अजनबी था यह नया काम मेरे लिए,
आरम्भ में मुझे मेरे सहकर्मी बहुत-ही अच्छे लगे,
हमेशा हंसकर बात करनेवाले,
तपाक से मिलनेवाले;
सबने पहन रखे थे व्याघ्रचर्म,
बहुत करा था वहाँ का ड्रेस-कोड;
कुछ दिन बाद एक साथी से इस ड्रेस का राज
पूछने पर उसने बताया,
की यह हमें आम आदमी से अलग तो करता
ही है;
यह दिखाता है की हम,
किसी से नहीं डरते,
न ही सौदेबाजी करते हैं;
साथ ही छिप जाती हैं इसके पीछे,
कर्मियों की बाहर से ही दिख जानेवाली हड्डियां;
और वे कुपोषित की जगह तंदरुस्त दिखाते हैं,
और सबसे बरी बात की,
किसी की खाल गिरगिट जैसी रंग बदलेवाली है;
तो किसी की मगरमच्छ जैसी मोटी,
किसी की भेरिये या गीदर या लोमारी जैसी;
यह खाल सब कुछ छिपा जाती
है अपने भीतर.

वहाँ हँसाने-मुस्कुराने पर थी रोक,
था डर की कहीं लोग यह न
समझ लें की हम कामचोर हैं,
और गंभीरता से काम नहीं करते;
इसलिए एक उदासी चहरे पर ओढे रखना
नौकरी बचाए रखने की अनिवार्य शर्त थी,
साथ की चमचई की अतिरिक्त योग्यता
का अपना अलग ही महत्व था.

सब कुछ सही-सही चल रहा था,
सिर्फ़ पगार बहुत कम थी;
और लोग थे जैसा की
मुझे संदेह था अति
अभिनय कुशल,
इतने की बोल्लीवूद तो क्या
होल्लेय्वूद्वाले भी शरमा जाएँ;
इतना ही नहीं वे अच्छे राजनीतिज्ञ भी थे,
हर आदमी अपने-आपमें एक मुकम्मल गुट था;
दिन-रात राजनीति की दांव-पेंच झेलता,
मैंने पाया एक दिन की मैं
बाहर कर दिया गया हूँ;
क्योंकि मैं न तो गुट ही बना ही पाया,
और न ही नियमानुसार गंभीर
रहकर काम ही कर सका;
चमचई तो जैसे मेरे खून
में ही नहीं था,
सबसे बुरी और बरी बात तो यह थी
की मैं नहीं पहना करता था
बाघ की खाल;
मुझे भरोसा था अपने
आदमजात की खाल पर.

अब आप पूछेंगे भिया उस
सहर का नाम भी तो बता दीजिये,
तो भिया मेरा नाम जाहिर न कराने की शर्त पर
मैं बता रहा हूँ;
उस सहर का नाम है........
पत्रकारिता और वह बाघ
की खाल है जनसेवा का ढोंग.

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

सी बी आई

हमारे घरों की रखवाली करता है कुत्ता,
और देश की रखवाली करती हैं सीबीआई जैसी एजेंसियां,
परन्तु जब घर के लोग ही चोर हों तब,
तब ये कुत्ते काटना तो क्या भौंक भी नहीं पाते
बेखौफ होकर,
और चुपचाप दुम हिलाते रह जाते हैं,
जब मेड ही खेत चरने लगे
तो फिर किसान कर भी क्या सकता है ?
असहाय और अशक्त होकर देखने के सिवाय,
फिर कुत्ता तो कुत्ता है आख़िर
अपने मालिक भले ही वो चोर हो के प्रति वफादारी तो दिखायेगा ही.

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

भारत और पूंजीवाद

यूँ तो भारत की सरकार ९० से पहले अपने को समाजवादी कहती थी. हलाँकि सही मायने में वह पूंजीवादी थी ही नहीं. परन्तु १९९० के बाद जी तरह देश में विनिवेश और निजीकरण का दौर सुरु हुआ है, उससे तो आम आदमी हाशिये पर ही चला गया है। मैं निजी संपत्ति के होने का विरोधी नहीं हूँ। लेकिन जब ९० प्रतिशत पूँजी कुछ लोगों के हाथों में चली जाए, तब बांकी बचे १० प्रतिशत को तो जीविका चलाने के लिए उनके पास जाना ही परेगा। और विकल्प भी क्या बचता है। फिर वह पूंजीपति गरीबों को यह ताना भी दे सकता है की maइन तो आपको बुलाया नहीं था।
उदहारण के लिए मीडिया को ही लीजिये। आज लगभग सभी मीडिया हाउस पर बड़े-बड़े उद्योगपतियों का कब्जा है। नए-नए संस्करण खोलने के लिए तो उनके पास पैसे हैं। लेकिन कर्मी वर्षों से नौकरी स्थाई किए जाने का इंतजार कर रहे हैं। उनका वेतन बढ़ने की बात हो, तो मंदी आ जाती है.

सोमवार, 23 मार्च 2009

कर्म और उसका फल

आज देश चुनावों की चपेट में है। चारों ओर जीत हार के चर्चे हो रहे हैं। लेकिन क्या मानव के लिए जीत और हार की व्याख्या इतनी आसान है। नहीं। कई बार हम जिसे अपनी जीत मानते हैं वही हमारे लिए सबसे बड़ी हार होती है। जब फल हमारे हाथों में है ही नहीं तो फिर जीत और हार कैसी। निष्काम भाव से कर्म करना ही हमारे हाथों में है।

शनिवार, 14 मार्च 2009

मानव गलतियों का पुतला

आज भी मुझे समझ में नहीं आता कि mई जो कर रहा हूँ वह कहाँ तक सही है। जीवन की सही व्याख्या करने का प्रयास मानव सदियों से कर रहा है लेकिन यह प्रयास आजतक पूर्णता तक नहीं पहुंचा। यह काम जितना आसान दिखता है उतना हैं भी नहीं। फिर मैं अपने जीवन को किस कसौटी पर कसूं। इसलिए मेरा मानना है कि इस झमेले में परिये ही नहीं और मान लीजिये कि हमने अब तक जिस तरह जीवन जिया है वही सही है। कुछ गलतियां हुई हैं पर गलती करना तो मानव के स्वाभाव में है।

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

जीवन एक दोराहे पर

मेरी बीपीएससी परीक्षा को पटना हाई कोर्ट ने रोक दिया है और मैं अपने-आपको फिर से दोराहे पर खरा पा रहा हूँ । जीवन भी कैसे-कैसे इम्तिहान लेता है। परिणाम यह हुआ की मुझे फिर से पटना हिंदुस्तान ज्वाइन करना परा । कभी-कभी न चाहते हुए भी हमें बहुत कुछ स्वीकार करना परता है । मेरा मानना है की जब तक संघर्ष है तभी तक जीवन है । मैं आगे भी जब अवसर आएगा संघर्ष से मुंह नहीं मोरुंगा। कर्म करता जाउंगा बिना फल की चिंता किए। मैं जानता हूँ की सब माया है। इसीलिए मैं सुख के पीछे नही भागता .

सोमवार, 8 दिसंबर 2008

कौन कहता है की आसमान में सूराख नहीं हो सकता

मैं आजकल छुट्टी पर हूँ। बी पी एस सी की तयारी में लगा हूँ। कुछ करना चाहता हूँ सिर्फ़ कहना नही। कहने के लिए और भी बहुत से लोग हैं और मैं इस भीर का हिस्सा नही बनाना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ की आप भी मेरा साथ दे कम से कम अपने अधिकारों को जानने और उसका उपयोग करके सूचना का अधिकार एक बहुत बार अधिकार है। इसका उपयोग अवश्य करे भ्रष्टाचार हमारे देश की सबसे बरी बीमारी है और इसका इलाज है सूचना का अधिकार। कौन कहता है ki aasman men सूराख नहीं हो सकता एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों.

सोमवार, 29 सितंबर 2008

करना ज्यादा महत्वपूर्ण

मैं क्या लिखूं ? क्यों लिखूं ? क्या इसे कोई इसे पढेगा भी ? किशी पर कोई प्रभाव परेगा फ़िर भी मैं लिख रहा हूँ। लिखता जा रहा हूँ। हालाँकि मैं यह जनता हूँ कि लिखने से ज्यादा अमल करना जरूरी है।

बुधवार, 10 सितंबर 2008

क्या होगा इस दुनिया का

अभी साड़ी दुनिया इस बहस में लगी हुई है की १० सेप्टेम्बर को दुनिया रहेगी या नहीं. जहाँ तक मेरा मानना है की बदलेगी और रहेगी दुनिया यही रहेगी. होंगे यही झमेले.
खैर यह मानते हुए की ११ सेप्टेम्बर को भी हम वैसे ही जागेंगे जैसे रोज़ जागते है.
इस दुनिया के भीतर ही सही मेरी एक अलग दुनिया है. मई बात कर रहा हूँ खबरों की दुनिया का. हालत कुछ अच्छे नहीं हैं. १०० रुपीस रोजाना पर मैं बिहार के सबसे बड़े पेपर में पेज एक पर काम करता हूँ.
हालत बदलने की कोशिश में लगा मैं ख़ुद ही हालत का शिकार हूँ और शोषित भी. करूँ भी क्या चापलूसी मुझे आती नहीं और काम की कोई क़द्र करनेवाला है नहीं.
बस ये उम्मीद है की वोह सुबह कभी तो आएगी............